पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
भाषाटीकासमेतम् । (३९९) दाता, ततो व्यापादयितुं न शक्यते । तत् त्यज एनं मिथ्याग्रहम् । उक्तञ्च- ऐसा कह उसके निमित्त जम्बूफल दिये । वह भी उनको भक्षणकर उसके साथ चिरकाल गोष्ठीसुखका अनुभवकर फिर अपने घरको गया । इस प्रकार नित्यही वह वानर और नाका जामनकी छायामें स्थित हुए विविध शास्त्रकी गोष्ठीसे समय बिताते सुखसे स्थित रहे । वह मकरभी खानेसे बचे हुए जामनके फलोंको घर जाकर अपनी स्त्रीको देता । तब एक दिन उसने उससे पूछा- “नाथ ! कहांसे यह अमृतमय फल लातेहो ?” वह बोला-“ भद्रे ! मेरा एक परम मित्र रक्तमुख वानर प्रीतिसे इन फलोंको देताहै । तब उसने कहा जो सदा ऐसे अमृतमय फल खाताहै उसका हृदयभी अमृतकी समान होगा । सो यदि मुझ भार्यासे तेरा कुछ प्रयोजन हो तो उसका हृदय लाकर मुझेदे । जिससे उसे भक्षणकर जरा मरणसे रहित हो तेरे साथ भोग भोगूं” । वह बोला- “भद्रे ! ऐसा मत कहो कारण कि वह बुद्धिमान् हमारा भ्राता तथा फल देनेवा- लाहै वह मारा नहीं जासक्ता सो इस मिथ्या आग्रहको त्यागदो कहा है कि- एकं प्रसूयते माता द्वितीयं वाक् प्रसूयते । वाग्जातमधिकं प्रोचुः सोदर्य्यादपि बन्धुवत् ॥ ६ ॥ ” माता एक सोदर उत्पन्न करती है, वाणी दूसरा उत्पन्न करती है, वाणीसे उत्पन्न हुआ सोदरसे भी अधिक मित्रकी समान श्रेष्ठ होता है ऐसा पंडितोंने कहा है ॥ ६ ॥” अथ मकरी आह -“ त्वया कदाचित् अपि मम वचनं अन्यथा कृतम् । तत् नूनं सा वानरी भविष्यति यतः तस्या अनुरागतः सकलमपि दिनं तत्र गमयसि । तत् त्वं ज्ञातो मया सम्यक् । यतः- तब मकरी बोली-“तैने कभी मेरा वचन अन्यथा न किया, सो अवश्यही वह वानरी होगी । इससे उसके अनुरागसे सम्पूर्ण दिन वहा बिताते हो सो यह मैंने अच्छी प्रकार जान लिया जिससे- साह्लादं वचनं प्रयच्छसि न मे नो वाञ्छितं किञ्चन प्रायः प्रोच्छ्वसिषि द्रुतं हुतवहज्वालासमं रात्रिषु ।
(४००) पञ्चतन्त्रम् ।
(४००) पञ्चतन्त्रम् । कण्ठाश्लेषपरिग्रहे शिथिलता यन्नादराच्चुम्बसे तत्ते धूर्त्त! हृदि स्थिता प्रियतमा काचिन्ममैवापरा ॥७॥” न अच्छी प्रकार मुझसे बोलते हो, न वांछित देते हो, जलती अग्निकी समान रात्रिमें प्रायः श्वास लेते हो, कंठके आलिंगन करनेमें शिथिलता करते हो, न आदरसे चुम्बन करते हो, इससे हे धूर्त ! मैने जाना कि तुम्हारे हृदयमें मेरेसमान कोई अन्यस्त्री है ॥ ७ ॥” सोऽपि पत्न्याः पादोपसंग्रहं कृत्वा अङ्कोपरि निधाय तस्याः कोपकोटिमापन्नायाः सुदीनमुवाच- वह भी स्त्रीके चरण पकड़ कर गोदीमें रख अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुई स्त्रीसे दीन हो बोला- ः "मयि ते पादपतिते किङ्करत्वमुपागते । त्वं प्राणवल्लभे कस्मात्कोपने कोपमेष्यसि ॥ ८ ॥” "मुझे तेरे चरणोंपर गिरने तथा दीनताको प्राप्त होनेमें भी हे प्राणप्यारी ! हे कोपने ! किस कारण तू क्रोध करती है ॥ ८ ॥” सा अपि तद्वचनमाकर्ण्य अश्रुप्लुतमुखी तमुवाच- यह इस वचनको सुनकर आंसुओंसे मुखको भिगोती उससे बोली- "सार्द्धं मनोरथशतैस्तव धूर्त्त कान्ता सैव स्थिता मनसि कृत्रिमभावरम्या । अस्माकमस्ति न कथञ्चिदिहावकाश- स्तस्मात्कृतं चरणपातविडम्बनाभिः ॥ ९ ॥ हे धूर्त ! सैकडो मनोरथोंकेसाथ कपटसे मन हरने वाली वह कान्ता तेरे मनमें स्थित है । इस हृदयमें हमारे निमित्त स्थान नहीं है सो अब चरणपातकी विडम्बनासे कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ ९ ॥ अपरं सा यदि तव वल्लभा न भवति तत् किं मया भणि- तेऽपि तां न व्यापादयसि ? । अथ यदि स वानरस्तत् कः तेन सह तव स्नेहः ? तत् किंबहुना यदि तस्य हृदयं न भक्ष- यामि, तत् मयाः प्रायोपवेशनं कृतं विद्धि” । एवं तस्याः तं निश्चयं ज्ञात्वा चिन्ताव्याकुलितहृदयः स प्रोवाच-अथवा साधु इदमुच्यते-
भाषाटीकासमेतम् । ( ४०१ ) सो यदि वह तुम्हारी प्यारी न होती तो क्यों मेरे निमित्त तुम उसको न मारते?। और जो वह वानर है तो उसके सहित तेरा स्नेह कैसा ? सो बहुत कहनेसे क्या है यदि उसका हृदय भक्षण न करूंगी तो मेरा मरणक निमित्त कृत सकल्प जानो” । इस प्रकार वह उसके निश्चयको जान चिन्तासे व्याकुल हृदय हो बोला । अथवा अच्छा कहा है- "वज्रलेपस्य मूर्खस्य नारीणां कर्कटस्य च । एको ग्रहस्तु मीनानां नीलीमद्यपयोस्तथा ॥ १०॥ “वज्रलेप ( महा ) मूर्ख, नारी, केंकडा, मत्स्य, नीली और मद्यप इनका एकवारही दृढग्रह होता है ॥ १० ॥ तत् किं करोमि ? कथं स मे वध्यो भवति” इति विचि- न्त्य वानरपार्श्वमगमत् । वानरोऽपि चिरायान्तं तं सोद्वेग - मवलोक्य प्रोवाच "भो मित्र ! किमद्य चिरवेलायां समा- यातोऽसि ? कस्मात् साहादं न आलपसि ? न सुभाषितानि पठसि ?” स आह-“मित्र ! अहं तव भ्रातृजायया निष्ठुर- तरैर्वाक्यैरभिहितः-“ भोः कृतघ्न ! मा मे त्वं स्वमुखं दर्शय यतः त्वं प्रतिदिनं मित्रं उपजीवासि न च तस्य पुनः प्रत्युप- कारं गृहदर्शनमात्रेण अपि करोषि । तत् ते प्रायश्चित्तमपि नास्ति । उक्तञ्च- सो क्या करू किस प्रकार उसको मारू” । ऐसा विचार कर वानरके समीप आया, वानर भी उसे आता देख उद्वेगपूर्वक बोला,-“ भो मित्र ! क्या आज देरसे आये ? क्यों आनन्दपूर्वक नहीं बोलते हो ? क्यो नहीं अच्छे वचन पढते हो ?” वह बोला-“मित्र ! मैं तेरी भाभीसे आज निष्ठुर वचनसे ताडित हुआ हू । उसने कहा है-“भो कृतघ्न ! तू मुझे अपना मुख मत दिखला जो कि तू प्रतिदिन मित्रोंसे उपजीवित होताहै परन्तु घर दिखाने मात्रसे भी उसका प्रत्युपकार नहीं करता है, सो तेरा प्रायश्चित्त भी नहीं है। कहा है- ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते शठे । निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ ११ ॥ २६
( ४०२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४०२ ) पञ्चतन्त्रम् । ब्रह्महत्यारा, सुरापी, चोर, व्रतभंगकरनेवाला सत्पुरुषोंने इनकी निष्कृति कही है परन्तु कृतघ्नकी निष्कृति नहीं है ॥ ११ ॥ तत् त्वं मम देवरं गृहीत्वा अद्य प्रत्युपकारार्थं गृहमानय। नो चेत् त्वया सह मे परलोके दर्शनम्" । तत् अहं तया एवं प्रोक्तः तव सकाशमागतः । तत् अद्य तया सह त्वदर्थे कलहायतो मम इयती वेला विलग्ना। तत् आगच्छ मे गृहम्। तव भ्रातृपत्नी रचितचतुष्का प्रगुणितवस्त्रमणिमाणिक्याद्यु- चिताभरणा द्वारदेशबद्धवन्दनमाला सोत्कण्ठा तिष्ठति" । मर्कट आह-"भो मित्र ! युक्तमभिहितं मद्भ्रातृपत्न्या । उक्तञ्च- सो तू मेरे देवरको ग्रहण कर उसका प्रत्युपकार करनेको घर लेआना । नहीं तो तेरे साथ मेरा परलोक दर्शन होगा"। सो मैं इस प्रकारसे कहा हुआ तुम्हारे पास आया हूं । सो आज तुम्हारे अर्थ स्त्रीके साथ क्लेश करते हुए मुझे इतनी देर लग गई । सो मेरे घरको आओ । तुम्हारी भाभी आंगन सजाये बडे मोलके वस्त्र मणि माणिक्यसे रचित गहनेवाले द्वारदेश बंधी वंदन माला किये उत्कं- ठित स्थित है" वानर बोला-"भो मित्र ! तुम्हारी जायाने सत्य कहा है । कहा है कि- वर्जयेत्कौलिकाकारं मित्रं प्राज्ञतरो नरः । आत्मनः सम्मुखं नित्यं य आकर्षति लोलुपः ॥ १२ ॥ अति बुद्धिमान् मनुष्य कपट आकारवाले मित्रको त्याग दे जो कपटी मित्र लोभके कारण नित्य अपने सम्मुख मित्रको खैंचता है ॥ १२ ॥ तथाच- और देखो- ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति । भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥ १३ ॥ जो देता, ग्रहण करता, गुप्त बात कहता और पूछता, भोजन करता, भोजन कराता है ये छः प्रकारका प्रीतिका लक्षण है ॥ १३ ॥ परं वयं वनचराः, युष्मदीयञ्च जलान्ते गृहं, तत् कथं
भाषाटीकासमेतम् । ( ४०३ ) शक्यते तत्र गन्तुम्,तस्मात् तामपि मे भ्रातृपत्नीमत्र आनय येन प्रणम्य तस्या आशीर्वादं गृह्णामि” । स आह,–“भो मित्र ! अस्ति समुद्रान्तरे सुरम्ये पुलिनप्रदेशेऽस्मद्गृहम् । तत् मम पृष्ठमारूढः सुखेन अकृतभयो गच्छ” । सोऽपि तच्छ्रुत्वा सानन्दमाह,–“भद्र ! यदि एवं तत् किं विलम्ब्यते त्वर्यताम् । एषोऽहं तव पृष्ठमारूढः । तथानुष्ठिते अगाधे जलधौ गच्छन्तं मकरमालोक्य भयत्रस्तमना वानरः प्रोवाच– “भ्रातः ! शनैः शनैः गम्यताम् । जलकल्लोलैः प्लाव्यते मे शरीरम्”। तत् आकर्ण्य मकरः चिन्तयामास । “असौ अगाधं जलं प्राप्तो मे वशः सञ्जातः, मत्पृष्ठगतः तिलमात्रमपि चलितुं न शक्नोति । तस्मात् कथयामि अस्य निजाभिप्रायं, येन अभीष्टदेवतास्मरणं करोति” । आह च,–“मित्र ! त्वं मया वधाय समानीतो भार्यावाक्येन विश्वास्य । तत् स्मर्यतामभीष्टदेवता” । स आह,–“भ्रातः ! किं मया तस्याः तवापि च अपकृतं ? येन मे वधोपायः चिन्तितः” । मकर आह,–“भोः ! तस्याः तावत् तव हृदयस्य अमृतमय- फलरसास्वादनमृष्टस्य भक्षणे दोहदः सञ्जातः तेन एतदनु- ष्ठितम्” । प्रत्युत्पन्नमतिः वानर आह,–“भद्र ! यदि एवं तत् किं त्वया मम तत्र एव न व्याहृतम् । येन स्वहृदयं जम्बूको- टरे सदा एव मया सुगुप्तं कृतम् । तद् भ्रातृपत्नया अर्पया- मि । त्वया अहं शून्यहृदयोऽत्र कस्मात् आनीतः ?” तदा- कर्ण्य मकरः सानन्दमाह,–“भद्र ! यदि एवं तदर्पय मे हृदयं येन सा दुष्टपत्नी तद्भक्षयित्वा अनशनादुत्तिष्ठति । अहं त्वां तमेव जम्बूपादपं प्रापयामि” । एवमुक्त्वा निवृत्य जम्बूतलमगात् । वानरोऽपि कथमपि जल्पितविविधदेवतो- पचारपूजः तीरमासादितवान्। ततश्च दीर्घतरचंक्रमणेन तमेव जम्बूपादपमारूढः चिन्तयामास । “अहो ! लब्धाः तावत् प्राणाः । अथवा साधु इदमुच्यते–
( ४०४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४०४ ) पञ्चतन्त्रम् । परन्तु हम वनचर हैं और तुम्हारा जलके अन्तमें घर है सो मैं किस प्रकार वहां जासक्ता हूं । इस कारण उस हमारी भाभीको यहीं लाओ जिससे प्रणाम कर उसका आशीर्वाद ग्रहण करूं” । वह बोला,-“भो मित्र ! समुद्रके भीतर तटमें मनोहर बालुकामय स्थानमें हमारा घर है । सो मेरी पीठपर चढ़ सुखसे निर्भय हो चलो” । वहभी यह सुन आनन्दसे बोला,-“भद्र ! यदि ऐसा है तो देर करनेका क्या काम शीघ्रता करो यह मैं तुम्हारी पीठपर चढ़ा” । ऐसा कहकर जलमें जाते हुए मकरको देख कर भयसे व्याकुल मन हो वानर बोला- “भाई शनैः २ चलो । जलकी लहरोंसे मेरा शरीर ढका जाता है” । यह सुन- कर मकर विचारने लगा । “यह अगाध जलमें प्राप्तहो मेरे वशीभूत हुआ है, मेरी पीठको प्राप्त हुआ तिलमात्रभी नहीं चल सकता है । सो इससे अपना अभिप्राय कहूं जिससे यह अपने इष्ट देवताका स्मरण करे” । और बोला भी- “मित्र ! तुमको मैं भार्याके वाक्यसे विश्वास दिलाकर मारनेके निमित्त लाया हूं ! सो अपने इष्ट देवताका स्मरण करो” । वह बोला,-“भ्राता ! क्या मैंने उसका और तुम्हारा अपकार किया है? जो मेरे वधका उपाय विचार किया है”। मकर बोला,-“भो ! उसको अमृतमय फलके रसास्वादसे मीठे तुम्हारे हृदय खानेका गर्भावस्थाका मनोरथ है तिससे यह अनुष्ठान किया है” । तत्कालबुद्धि प्रगटवाला वानर बोला,-“भद्र ! जो ऐसा है तो वहीं तुमने क्यों न मुझसे कहा । जो कि मैने अपना हृदय जम्बूकी कोटरमें सदाहीसे गुप्त कर रक्खा है । सो तुम्हारी पत्नीकोही अर्पण करूं । सो तुम मुझ शून्यहृदयको यहां क्यों लाये”। यह सुनकर मकर आनन्दसे बोला,-“भद्र ! जो ऐसा है तो मुझको अपना हृदय दे जिससे वह दुष्टपत्नी भक्षण करके अनशन ( अभोजन ) से उठे । मैं तुझे उस जम्बूवृक्षको प्राप्त करता हूं” । ऐसा कह लौटकर जामन- वृक्षके नीचे गया । वानरभी किसी प्रकार विविध देवतोंकी सत्कार पूजाकी जल्पना कर तटपर आया । फिर बडी कुलांच मारकर उस जामनके पेड़पर चढ़कर विचारने लगा । “अहो ! अब प्राण बचे । अथवा अच्छा कहा है- न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥ १४ ॥ अविश्वासीका विश्वास न करे और विश्वासीकाभी विश्वास न करे विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय जड़से नष्ट कर देता है ॥ १४ ॥
भाषाटीकासमेतम्। (४०५) तन्मम एतदद्य पुनर्जन्मदिनमिव सञ्जातम्”। इति चिन्त- मानं मकर आह,–“भो मित्र ! अर्पय तत् हृदयं यथा ते भ्रातृपत्नी भक्षयित्वा अनशनादुत्तिष्ठति”। अथ विहस्य निर्भर्त्सयन् वानरः तमाह,–“धिक् धिक् मूर्ख ! विश्वास- घातक ! किं कस्यचित् हृदयद्वयं भवति ?। तदाशु गम्यतां जम्बूवृक्षस्य अधस्तात, न भूयोऽपि त्वया अत्र आगन्तव्य- म्। उक्तञ्च यतः– सो आज यह मेरे नये जन्मका दिन है”। ऐसा विचार करते मकर उससे बोला,-“भो ! मित्र उस हृदयको अर्पण करो जिसे तुम्हारी भाभी भक्षण कर अनशन व्रतसे उठे”। फिर हँसकर घुडकता हुआ वानर उससे बोला-“धिक् धिक् मूर्ख ! विश्वासघातक ! क्या किसीके दो हृदय होते हैं । सो शीघ्र जाओ जम्बूवृक्षके नीचे फिर कभी मत आना। कहा है- सकृद्दुष्टञ्च यो मित्रं पुनः सन्धातुमिच्छति । स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ १५ ॥” एक बार दुष्ट हुए मित्रसे जो फिर मिलनेकी इच्छा करता है वह मृत्यु- कोही ग्रहण करता है जैसे खिचड़ी गर्भको ग्रहण कर मृत्युको प्राप्त होती है ॥ १५ ॥” तत् श्रुत्वा मकरः सविलक्षं चिन्तितवान्,–“अहो ! मया अतिमूढेन किमस्य स्वचित्ताभिप्रायो निवेदितः तद्यदि असौ पुनरपि कथञ्चिद्विश्वासं गच्छति तद्भूयोऽपि विश्वास- यामि”। आह च–“मित्र ! हास्येन मया तेऽभिप्रायो लब्धः । तस्या न किञ्चित् तव हृदयेन प्रयोजनम् । तत् आगच्छ प्राघुणिकन्यायेन अस्मद्गृहम् । तव भ्रातृपत्नी सोत्कण्ठा वर्त्तते”। वानर आह–“भो दुष्ट ! गम्यताम् अधुना नाहमागमिष्यामि । उक्तञ्च– यह सुनकर नाका लजित हो विचारने लगा-“अहो ! मुझ अति मूर्खने क्यो इसके प्रति अपने चित्तका अभिप्राय कथन कर दिया । सो यदि यह फिर किसी प्रकार विश्वासको प्राप्त हो तो इसको फिर विश्वास प्राप्त करू”।
( ४०६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४०६ ) पञ्चतन्त्रम् । और बोला- "मित्र ! हास्यसे मैंने आपका अभिप्राय जाना । उसको कुछभी तुम्हारे हृदयसे प्रयोजन नहीं है । सो आओ अतिथिरूपसे हमारे घर चलो । तेरी भाभी उत्कंठित है" । वानर बोला- "भो दुष्ट ! अब जाओ । मैं नहीं आऊंगा । कहा है- बुभुक्षितः किं न करोति पापं क्षीणा जना निष्करुणा भवन्ति । आख्याहि भद्रे प्रियदर्शनस्य न गङ्गदत्तः पुनरेति कूपम् ॥ १६ ॥" भूखा क्या पाप नहीं करता ? क्षीण मनुष्य करुणाहीन हो जाते है, हे भद्रे ! प्रियदर्शनसे कहना गंगदत्त फिर कूपमें नहीं आवेगा ॥ १६ ॥” मकर आह- "कथमेतत् ?" स आह- मकर बोला- "यह कैसी कथा है ?" वह बोला- कथा २. कस्मिंश्चित् कूपे गङ्गदत्तो नाम मण्डूकराजः प्रतिवसति स्म । स कदाचित दायादैः उद्वेजितोऽरघट्टघटीमारुह्य निष्क्रान्तः। अथ तेन चिन्तितम् । "यत् कथं तेषां दायादानां मया प्रत्यपकारः कर्त्तव्यः । उक्तञ्च- किसी कूपमें गंगदत्त नामक मेडकराजा रहता था, वह कभी हिस्सेदारोंसे उद्वेजित हुआ कुएकी ढेकलीको आलम्बन कर बाहर निकला । और उसने विचारा "इन गोतियोंका अपकार किस प्रकार करूं। कहा है- आपदि येनापकृतं येन च हसितं दशासु विषमासु । अपकृत्य तयोरुभयोः पुनरपि जातं नरं मन्ये ॥ १७ ॥” जिसने आपत्तिमें अपकार किया और विषम दशामें हँसा उन दोनोंके प्रति फिर अपकार करकेही मनुष्यको उत्पन्न हुआ ऐसा मैं मानता हूं ॥ १७ ॥" एवं चिन्तयन् बिले प्रविशन्तं कृष्णसर्पमपश्यत् । तं दृष्ट्वा भूयोऽपि अचिन्तयत् । "यत् एनं तत्र कूपे नीत्वा सकलदा- यादानां उच्छेदं करोमि । उक्तञ्च- ऐसा विचार कर बिलमें प्रवेश करते काले सांपको देखा । उसको देखकर
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फिरभी विचारने लगा कि "इसको उस कूपमें लेजाकर सम्पूर्ण दायादोका नाश करूं। कहा है-- शत्रुभिर्योजयेच्छत्रुं बलिना बलवत्तरम्। स्वकार्याय यतो न स्यात्काचित्पीडात्र तत्क्षये ॥ १८ ॥ शत्रुओंके साथ शत्रुओंको भिड़ावै, बलवान्के साथ बलवान्को अपने कार्यके निमित्त लगावै कारण कि, उसके क्षयमें फिर कुछ पीडा नहीं होती १८ तथाच- और देखो- शत्रुमुन्मूलयेत्प्राज्ञस्तीक्ष्णं तीक्ष्णेन शत्रुना। व्यथाकरं सुखार्थाय कण्टकेनेव कण्टकम् ॥ १९ ॥ " बुद्धिमान् तीक्ष्ण शत्रुको तीक्ष्ण शत्रुसे नष्ट करावै व्यथा करनेवाला काटा सुखके निमित्त कांटेसेही निकाला जाता है ॥ १९ ॥" एवं स विभाव्य बिलद्वारं गत्वा तमाहूतवान्-"एहि ! एहि !! प्रियदर्शन ! एहि !" तत् श्रुत्वा सर्पश्चिन्तयामास । "य एष मां आह्वयति, स स्वजातीयो न भवति यतो नैषा सर्पवाणी । अन्येन केनापि सह मम मर्त्यलोके सन्धानं नास्ति । तदत्र एव दुर्गे स्थितः तावत् वेद्मि कोऽयं भवि- ष्यति । उक्तञ्च-- ऐसा विचार बिलके द्वारे जाकर उसे बुलाता हुआ--"आओ ! आओ !! प्रियदर्शन ! आओ ।" तब सुनकर साप विचारने लगा। "यह मुझे बुलाता है सो अवश्यही मेरी जातीका न होगा। कारण कि यह सर्पकी वाणी नहीं है। और किसीके साथ मर्त्यलोकमें मेरी मित्रता नहीं है। सो इसी दुर्गमें स्थित हुआ पहले जानू कि यह कौन होगा। कहा है कि-- यस्य न ज्ञायते शीलं न कुलं न च संश्रयः। न तेन सङ्गतिं कुर्यादित्यवाच बृहस्पतिः ॥ २० ॥ जिसका कुल शील और आश्रय न जाना हो उसकी संगति न करे ऐसा बृहस्पतिजीने कहा है ॥ २० ॥ कदाचित् कोऽपि मन्त्रवादी औषधचतुरो वा मामाहूय
( ४०८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४०८ ) पञ्चतन्त्रम् । बन्धने क्षिपति । अथवा कश्चित पुरुषो वैरमाश्रित्य कस्य- चिद्भक्षणार्थे मामाह्वयति”। आह च-“भोः ! को भवान् ?” स आह-“अहं गङ्गदत्तो नाम मण्डूकाधिपतिः त्वत्सकाशे मैत्र्यर्थमभ्यागतः”। तच्छ्रुत्वा सर्प आह,-“भो ! अश्रद्धेयमे- तत् यत्तृणानां वह्निना सह सङ्गमः । उक्तञ्च- कभी कोई सर्पमंत्रमें कुशल भौषधीमें चतुर मुझे बुलाकर बंधनमें डालना चाहता है । अथवा कोई पुरुष वैरको आश्रित कर किसीके भक्षणके निमित्त मुझे बुलाता है” । बोला भी-“भो ! आप कौन हैं ?” । वह बोला-“मैं गंगदत्तनामक मण्डूकराजा तुम्हारे पास मित्रता करनेको आयाहूं” । यह सुनकर सर्प बोला-“भो ! यह श्रद्धाके अयोग्य वचन हैं जो तृण और अग्निका समागम होना, कहा है- यो यस्य जायते वध्यः स स्वप्नेऽपि कथञ्चन । न तत्समीपमभ्येति तत्किमेवं प्रजल्पसि ॥ २१ ॥” जो जिसका वध्य हो वह स्वप्नमेंभी कभी उसके समीप न जाय, सो तू ऐसी जल्पना क्यों करता है ॥ २१ ॥” गङ्गदत्त आह-“भोः सत्यमेतत् । स्वभाववैरी त्वम् अस्माकम् । परं परपरिभवात् प्राप्तोऽहं ते सकाशम् । उक्तञ्च- गंगदत्त बोला-“भो ! यह सत्य है तुम हमारे स्वभाविक वैरी हो परन्तु शत्रुओंसे तिरस्कृत होकर मैं तुम्हारे पास आया हूं । कहा है- सर्वनाशे च सञ्जाते प्राणानामपि संशये । अपि शत्रुं प्रणम्यापि रक्षेत्प्राणधनानि च ॥ २२ ॥” सर्वनाश और प्राणसंशयके उत्पन्न होनेमें शत्रुकोभी प्रणाम कर अपने प्राण और धनकी रक्षा करे ॥ २२ ॥” सर्प आह-“कथय कस्मात् ते परिभवः ?” स आह- “दायादेभ्यः”। सोऽपि आह-“क्व ते आश्रयो वाप्यां कूपे तडागे ह्रदे वा ? तत्कथय स्वाश्रयम् ।” तेनोक्तम्-“पाषा- णचयनिवद्धे कूपे”। सर्प आह-“अहो ! अपदा वयं तन्ना- स्ति तत्र मे प्रवेशः । प्रविष्टस्य च स्थानं नास्ति । यत्र स्थितः तव दायादान् व्यापदयामि । तद्गम्यताम् । उक्तञ्च-
भाषाटीकासमेतम् । (४०९) सर्प बोला- "कहो किससे तुम्हारा परिभव हुआ है?" वह बोला-"गोत्रियों- से"। वह बोला- "कहा तेरा आश्रय है । वावडी, कुए, तडाग वा हृदमे २ सो अपना आश्रय कहो" वह बोला-"पत्थरसमूहसे बनेहुए कूपमें"। सर्प बोला- "भो ! हमारे चरण नहीं हैं सो हमारा वहा प्रवेश नहीं हो सकता न रहनेका स्थान है जहा स्थित होकर तुम्हारे दायादोंको भक्षण करू सो जाऊँ । कहा है- यच्छक्यं ग्रसितुं शस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् । हितञ्च परिणामे यत्तदाद्यं भूतिमिच्छता ॥ २३ ॥" जो वस्तु भक्षण करनेको सामर्थ्य हो वह प्रशस्त है और जो खाकर पाक होजाय और पाकमे हितकारक हो कल्याणकी इच्छावालेको वह वस्तु खानी चाहिये ॥ २२ ॥ गंगदत्त आह-"भोः ! समागच्छ त्वं अहं सुखोपायेन तत्र तव प्रवेशं कारयिष्यामि । तथा तस्य मध्ये जलोपान्ते रम्य- तरं कोटरं अस्ति । तत्र स्थितः त्वं लीलया दायादान् व्या- पादयिष्यसि"। तच्छ्रुत्वा सर्पो व्यचिन्तयत् । "अहं तावत् परिणतवयाः, कदाचित् कथञ्चित् मूषकमेकं प्राप्नोमि । तत्सुखावहो जीवनोपायोऽयमनेन कुलाँगारेण मे दर्शितः । तद्गत्वा तान् मण्डूकान् भक्षयामि" इति । अथवा साधु इदमुच्यते- गंगदत्त बोला- "भो ! आप आइये मैं सुख उपायसे वहा तुम्हारा प्रवेश कराऊगा । उसके मध्य जलके समीप मनोहर खखोडल है । वहा स्थित होकर तू लीलासे ही दायादोंको भक्षण करना " । यह सुन सर्प विचा- रने लगा । "मेरी अवस्था वृद्ध होगई है कभी एक चूहा प्राप्त होता है । सो सुखदायक जीवनोपाय इस कुलाङ्गारने वर्णन किया है। सो जाकर उन मण्डूकों- को भक्षण करूंगा । अथवा अच्छा कहा है- यो हि प्राणपरिक्षीणः सहायपरिवर्जितः । स हि सर्वसुखोपायां वृत्तिमाराचयेद्बुधः ॥ २४ ॥" जो प्राणोंसे परिक्षीण सहायसे रहित हो वह पंडित सर्व सुखके उपायवाली वृत्तिको आचरण करे ॥ २४ ॥"
(४१०) पञ्चतन्त्रम् ।
(४१०) पञ्चतन्त्रम् ।
एवं विचिन्त्य तमाह-“भो गंगदत्त ! यदि एवं तदग्रे भव येन तत्र गच्छावः”। गंगदत्त आह-“भोः प्रियदर्शन ! अहं त्वां सुखोपायेन तत्र नेष्यामि स्थानञ्च दर्शयिष्यामि। परं त्वया अस्मत्परिजने रक्षणीयः। केवलं यानहं तव दर्शयि- ष्यामि ते एव भक्षणीयाः” इति । सर्प आह-“साम्प्रतं त्वं मे मित्रं जातं तन्न भेतव्यम्, तव वचनेन भक्षणीयाः ते दाया- दाः” एवमुक्त्वा बिलात् निष्क्रम्य तमालिङ्ग्य च तेनैव सह प्रस्थितः। अथ कूपमासाद्य अरघट्टघटिकामार्गेण सर्पः तेन आत्मना स्वालयं नीतः। ततश्च गङ्गदत्तेन कृष्णसर्प कोटरे धृत्वा दर्शिताः ते दायादाः। ते च तेन शनैः शनैः भक्षिताः। अथ मण्डूकाभावे सर्पेण अभिहितम्-“भद्र ! निःशेषिताः ते रिपवः तत् प्रयच्छ अन्यत् मे किञ्चित् भोजनं, यतोऽहं त्वया अत्र आनीतः”। गङ्गदत्त आह-“भद्र ! कृतं त्वया मित्रकृत्यम्, तत् साम्प्रतम् अनेन एव घटिकायन्त्रमार्गेण गम्यताम्” इति। सर्प आह-“भो गङ्गदत्त ! न सम्यगभिहितं त्वया । कथमहं तत्र गच्छामि । मदीयबिलदुर्गमन्येन रुद्धं भविष्यति । तस्मात् अत्रस्थस्य मे मण्डूकमेकैकं स्ववर्गीयं प्रयच्छ नो चेत् सर्वानपि भक्षयिष्यामि” इति । तच्छ्रुत्वा गङ्गदत्तो व्याकुलमना व्यचिन्तयत् । “अहो ! किमेतन्मया कृतं सर्पमानयता तद्यदि निषेधयिष्यामि तत्स- र्वानपि भक्षयिष्यति । अथवा युक्तमुच्यते- ऐसा विचार कर उससे बोला-“भो ! गंगदत्त यदि ऐसा हो तो आगे हो जिससे वहां चले”। गंगदत्त बोला-“भो ! प्रियदर्शन ! मैं तुमको सुखके उपा- यसे वहां ले जाऊंगा और स्थान भी दिखाऊंगा । परन्तु हमारे परिजनोंकी तुमने रक्षा करना । केवल जिनको मै दिखाऊं उन्हींको खाना”। सर्प बोला-“अब तू हमारा मित्र होगया । सो मतडरो तुम्हारे वचनसे मै तुम्हारे गोतियोंको भक्षण करूंगा”। ऐसा कह बिलसे निकल उसको आलिंगन कर उसके संग चला । तब कूपको प्राप्त हो ढेंकलीके मार्गसे सर्पको वह स्वयं अपने स्थानमें लाया । तब
भाषाटीकासमेतम् । (४११) गंगदत्तने काले सर्पको खखोडलमे धरकर उन दायादोको दिखाया वे उसने शनैः २ खालिये । तब मण्डूकोंका अभाव देखकर सर्पने कहा-“भद्र ! तुम्हारे *शत्रु तो निःशेष होगये सो मुझे कुछ और भोजन दो, जो कि तुम मुझे यहा लाये हो” । गंगदत्त बोला-“मित्र ! तुमने मित्रका कार्य किया है । सो अब इसी ढेकलीके मार्गसे जाओ” । सर्प बोला-“भो गंगदत्त ! तुमने अच्छा नहीं कहा कैसे मैं वहां जाऊ । मेरा बिलदुर्ग औरोंने घेर लिया होगा इस कारण यहीं स्थित हुए मुझे एक एक मेढक अपने कुटुम्बका दो । नहीं तो सबको खाजा- ऊंगा” यह सुन गंगदत्त व्याकुल मनसे विचारने लगा । “अहो ! सर्पको लाकर यह मैंने क्या किया । सो यदि निषेध करू तो यह सबहीको खाजायगा । अथवा युक्त कहा है- योऽमित्रं कुरुते मित्रं वीर्याभ्यधिकमात्मनः । स करोति न सन्देहः स्वयं हि विषभक्षणम् ॥ २५ ॥ जो अपने पराक्रमसे अधिक अमित्रको मित्र करता है इसमें सन्देह नहीं वह स्वयंही विष भक्षण करता है ॥ २५ ॥ तत् प्रयच्छामि अस्य एकं दिनं प्रतिसुहृदम् । उक्तञ्च- सो प्रतिदिन इसको मै एक एक सुहृद दू । कहा है- सर्वस्वहरणे युक्तं शत्रुं बुद्धियुता नराः । तोषयन्त्यल्पदानेन वाडवं सागरो यथा ॥ २६ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य सर्वस्व हरण करनेमें युक्त हुए शत्रुको अल्प दानसे सन्तुष्ट करे जैसे सागर वडवा अग्निको प्रतिदिन अल्प जल देताहै ॥ २६ ॥ तथाच- और देखो- यो दुर्बलोऽप्यूनमपि याच्यमानो बलीयसा यच्छति नैव साम्ना । प्रयच्छते नैव च दर्शमानं खारीं स चूर्णस्य पुनर्ददाति ॥ २७ ॥ जो दुर्बल प्रबलकी सात्वनापूर्वक याचना करनेपर अल्पभी प्रदान नहीं करता है तथा दर्शमानभी नहीं देता है वह डाटनेसे चूर्णके स्थानमें खारी
परिमाण द्रव्यको फिर देता है (अर्थात् बलवानके थोडा मांगने पर न देनेसे फिर अधिक देना पडता है) उपजाति वृत्त ॥ २७ ॥ तथाच- और देखो- सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्द्धं त्यजति पण्डितः । अर्द्धेन कुरुते कार्य्यं सर्वनाशो हि दुस्तरः ॥ २८ ॥ सर्व नाश उत्पन्न होनेमें पंडित जन आधा त्याग देते हैं और आधेसे कार्य करते हैं, सर्व नाश बडा दुस्तर है ॥ २८ ॥ न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः । एतदेव हि पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद्भूरिरक्षणम् ॥ २९ ॥" बुद्धिमान् मनुष्य थोडेके निमित्त बहुतका नाश न करे यही चतुराई है कि थोडे देकर बहुतकी रक्षा करनी ॥ २९ ॥" एवं निश्चित्य नित्यमेकैकं आदिशति । सोऽपि तं भक्ष- यित्वा तस्य परोक्षेऽन्यानपि भक्षयति । अथवा साधु इदमुच्यते- ऐसा विचार कर नित्यही एक एक देने लगा। वहभी उसे भक्षण कर उसके पीछेमें औरोंकोभी भक्षण कर जाता । अथवा यह अच्छा कहा है- यथा हि मलिनैर्वस्त्रैर्यत्र तत्रोपविश्यते । एवं चलितवित्तस्तु वित्तशेषं न रक्षति ॥ ३० ॥ जैसे मलीन वस्त्र पहरे हुए मनुष्य जहां तहां बैठ जाता है इस प्रकार निर्धन होनेपर यह प्राणी शेष धनकी भी रक्षा नहीं करता है ॥ ३० ॥ अथ अन्यदिने तेन अपरान् मण्डूकान् भक्षयित्वा गङ्गदत्त- सुतो यमुनादत्तो भक्षितः । तं भक्षितं ज्ञात्वा गङ्गदत्तः तार- स्वरेण धिक् धिक् प्रलापपरः कथञ्चिदपि न विरराम । ततः स्वपत्न्या अभिहितः- तब दूसरे दिन वह और मेडकोंको भक्षण करके गंगदत्तके पुत्र यमुनादत्तको भी भक्षण कर गया उसको खाया हुआ जानकर गंगदत्त तारस्वरसे अपनेको धिक् धिक् करता हुआ किंचित् काल भी विरामको प्राप्त न हुआ। तब उसकी स्त्रीने कहा-
भाषाटीकासमेतम् । (४१३) "किं क्रन्दसि दुराक्रन्द स्वपक्षक्षयकारक । स्वपक्षस्य क्षये जाते को नस्त्राता भविष्यति ॥ ३१ ॥ "हे दुष्ट रोदन करनेवाले ! क्यो रोदन करता है, हे अपने पक्षके क्षय करने वाले ! अपना पक्ष क्षय होनेपर अब कौन हमारी रक्षा करेगा ॥ ३१ ॥ तत् अद्यापि विचिन्त्यतां आत्मनो निष्क्रमणमस्य वधोपायश्च” । अथ गच्छता कालेन सकलमपि कवलितं मण्डूककुलम् । केवलमेको गङ्गदत्तः तिष्ठति । ततः प्रियदर्श- नेन भणितं ,-“भो गङ्गदत्त ! बुभुक्षितोऽहं निःशेषिताः सर्वे मण्डूकाः । तदीयतां मे किञ्चित् भोजनं यतोऽहं त्वया अत्र आनीतः”। स आह,-“भो मित्र ! न त्वया अत्र विषये मया अवस्थितेन कापि चिन्ता कार्या तत् यदि मां प्रेषयसि ततोऽन्यकूपस्थान् अपि मण्डूकान् विश्वास्य अत्र आनयामि”। स आह-“मम तावत् त्वं अभक्ष्यो भ्रातृस्थाने, तत् यदि एवं करोषि तत् साम्प्रतं पितृस्थाने भवसि,तदेवं क्रियताम्”इति । सोऽपि तत् आकर्ण्य अरघट्टघटिकां आश्रित्य विविधदेवतो- पकल्पितपूजोपयाचितः तस्मात् कूपात् विनिष्क्रान्तः । प्रिय- दर्शनोऽपि तदाकांक्षया तत्रस्थः प्रतीक्षमाणः तिष्ठति । अथ चिरात् अनागते गंगदत्ते प्रियदर्शनोऽन्यकोटरनिवासिनीं गो- धामुवाच-“भद्रे ! क्रियतां स्तोकं साहाय्यम् । यतः चिरपरि- चितः ते गङ्गदत्तः तद्गत्वा तत्सकाशं कुत्रचिज्जलाशये अन्विष्य मम सन्देशं कथय । येन आगम्यतां एकाकिना अपि भवता द्रुततरं यदि अन्ये मण्डूका न आगच्छन्ति । अहं त्वया बिना नात्र वस्तुं शक्नोमि । तथा यदि अहं तव विरुद्धं आ- चरामि तत् सुकृतमन्तरं मया विधृतम्” गोधा अपि तद्वच- नात् गङ्गदत्तं द्रुततरमन्विष्य आह-“भद्र गङ्गदत्त ! स तव सुहृत् प्रियदर्शनः तव मार्गं समीक्षमाणः तिष्ठति । तत् शीघ्रं आगम्यतामिति । अपरञ्च तेन तव विरूपकरणे सुकृतमन्तरे
( ४१४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४१४ ) पञ्चतन्त्रम् । धृतम् । तत् निःशङ्केन मनसा समागम्यताम्" । तत् आकर्ण्य गङ्गदत्त आह- सो अब भी अपने निकलनेका उपाय विचार करो इसके वधका उपाय भी विचारो" इस प्रकार समयके बीतते २ वह सम्पूर्ण मण्डूककुलको भक्षण करगया । केवल एक गंगदत्त रहगया । तब प्रियदर्शनने कहा- "भो गंग- दत्त ! मैं भूखा हूं सम्पूर्ण निःशेष होगये । सो मुझे कुछ भोजन दे क्यों कि तू मुझे यहां लाया है" । वह बोला- "भो मित्र ! इस विषयमें तुझे मेरे रहते कुछ चिन्ता न करनी चाहिये । सो यदि तुम मुझे भेजो तो और कूपमें स्थित मेंडकोंको विश्वास देकर यहां लाऊं" । वह बोला- "भो ! तू तो भाईके स्था- नमें होनेसे मेरा अभक्ष्य है । सो यदि ऐसा करेगा तो तू मेरे पिताके स्थानमें होगा । सो ऐसाही करो" वह भी यह सुनकर उस ढेंकलीका आश्रय कर अनेक देवताओंकी पूजाका संकल्प करके उस कूपसे निकला । प्रियदर्शन भी उसकी आकांक्षासे वहीं स्थित हो वाट देखता स्थित था । तब बहुत दिनोंतक गंग- दत्तके न आनेमें प्रियदर्शन दूसरी खखोडलमें रहनेवाली गोधासे बोला- "भद्रे ! थोडी हमारी सहाय करो । कारण कि तुम गंगदत्तको बहुत समयसे जानती हो । सो जा उसके पास उसे किसी सरोवरमें ढूंढकर मेरा संदेशा कह तुम इकले ही शीघ्र चले आओ यदि दूसरे मेंडक नहीं आते हैं तो मैं तुम्हारे बिना यहां रहनेको समर्थ नहीं हूं । और यदि म तेरे साथ विरुद्ध आचरण करूं तो मैंने इस अन्तरमें अपने पुण्यका फल लगा दिया है" । गोधा भी उसके बचन- से शीघ्र गंगदत्तको ढूंढ कर बोली- "भद्र गंगदत्त ! वह तुम्हारा मित्र प्रियदर्शन तुम्हारी वाट देखता स्थित है सो शीघ्र आओ । कदाचित् शंका हो तो तुमसे विरुद्ध आचरण करनेपर उसने अपना पुण्य बीचमें धर दिया है । सो निश्शंक मनसे आओ" । यह सुन गंगदत्त बोला- “बुभुक्षितः किं न करोति पापं क्षीणा नरा निष्करुणां भवन्ति । आख्याहि भद्रे प्रियदर्शनस्य
भाषाटीकासमेतम् । ( ४१६ ) “भूखा क्या पाप नहीं करता है, क्षीण मनुष्य दयारहित होजाते हैं भद्रे प्रियदर्शनसे कहना मैं फिर कूपमें नहीं आऊगा ॥३२॥” एवमुक्त्वा स तां विसर्जयामास । यह कह उसने उसको विदा करादिया । तत् भो दुष्ट जलचर ! अहमपि गंगदत्त इव त्वद्गृहे न कदाञ्चित् अपि यास्यामि” । तत् श्रुत्वा मकर आह-“भो मित्र ! न एतद् युज्यते । सर्वथा एव मे कृतघ्नतादोषं अप- नय मद्गृहागमनेन । अथवा अत्र अहं अनशनात् प्राणत्यागं तव उपरि करिष्यामि” । वानर आह-“मूढ ! किं अहं लम्बकर्णो मूर्खो दृष्टापायोऽपि स्वयमेव तत्र गत्वा आत्मानं व्यापादयामि । सो हे दुष्ट जलचर ! मैंभी तेरे घर गंगदत्तकी समान किसी प्रकार नहीं जाऊंगा” । यह सुनकर मकर बोला-“भो मित्र ! सर्वथा तुमको यह युक्त नहीं है मेरे कृतघ्नता दोषको मेरे घर चल कर दूरकरो । अथवा मैं यहा लंघनकर तुम्हारे ऊपर प्राण त्यागन करूंगा” वानर बोला-“मूर्ख ! क्या मैं लम्बकर्ण मूर्ख हू जो अपाय ( आपत्ति ) देखकर भी स्वय वहा जाकर अपनेको नष्ट करू ' आगतश्च गतश्चैव दृष्ट्वा सिंहपराक्रमम् । अकर्णहृदयो मूर्खो यो गत्वा पुनरागतः ॥ ३३ ॥” जो आकर सिंहके पराक्रमको देखकर भाग गया और कर्णहृदयरहित होनेके कारण वह मूर्ख फिरभी आगया ॥ ३३ ॥” मकर आह,-“भद्र ! स को लम्बकर्णः ? कथं दृष्टापायो- ऽपि मृतः ? तत् मे निवेद्यताम्” ! वानर आह- मकर बोला,-“भद्र वह लम्बकर्ण कौनहै ? किस प्रकार आपत्ति देखकर भी वहा जाकर मृत हुआ २ । सो मुझसे कहो” । वानर बोला- कथा ३. कस्मिंश्चित् वनोद्देशे करालकेशरो नाम सिंहः प्रति- वसति स्म । तस्य च धूसरको नाम शृगालः सदा एव अनु-
यायी परिचारकोऽस्ति । अथ कदाचित् तस्य हस्तिना सह युद्ध्यमानस्य शरीरे गुरुतराः प्रहाराः सञ्जाता येः पदमेकमपि चलितुं न शक्नोति तस्य अचलनात् च धूसरकः क्षुत्क्षामक- ण्ठो दौर्बल्यं गतः । अन्यस्मिन् अहनि तं अवोचत् - "स्वामि- न् ! बुभुक्षया पीडितोऽहं पदात् पदमपि चलितुं न शक्नोमि तत्कथं ते शुश्रूषां करोमि" । सिंह आह- "भो ! गच्छ अन्वे- षय किञ्चित् सत्त्वं येन इमां अवस्थां गतोऽपि व्यापादयामि" । तदाकर्ण्य शृगालोऽन्वेषयन् कञ्चित्समीपवर्त्तिनं ग्रामं आसा- दितवान् । तत्र लम्बकर्णो नाम गर्दभः तडागोपान्ते प्रविरल- दूर्वाङ्कुरान् कृच्छ्रादास्वादयन् दृष्टः । ततश्च समीपवर्त्तीना भूत्वा तेन अभिहितः - "माम!नमस्कारोऽयं मदीयः सम्भा- व्यतां चिरात् दृष्टोऽसितात कथय तत् किमेवं दुर्बलतां गतः?" स आह,-"भो भगिनीपुत्र ! किं कथयामि,रजकोऽतिनिर्दयो- ऽतिभारेण मां पीडयति,घासमुष्टिमाप न प्रयच्छति। केवलं दू- र्वाङ्कुरान् धूलिमिश्रितान् भक्षयामि।तत्कुतो मे शरीरे पुष्टिः?" शृगाल आह- "माम ! यदि एवं तदस्ति मरकतसदृशशष्प- प्रायो नदीसनाथो रमणीयतरः प्रदेशः। तत्र आगत्य मया सह सुभाषितगोष्ठीसुखमनुभवन् तिष्ठ । लम्बकर्ण आह- "भो भगिनीसुत ! युक्तमुक्तं भवता परं वयं ग्राम्याः पशवोऽरण्य- चारिणां वध्यास्तत् किं तेन भव्यप्रदेशेन " शृगाल आह- "माम ! मैवं वद, मद्भुजपञ्जरपरिरक्षितः स देशः । तन्नास्ति कस्यचित् अपरस्य तत्र प्रवेशः । परमेनैन एव दोषेण रजक- कदर्थिताः तत्र तिस्रो रासभ्योऽनाथाः सन्ति । ताश्च पुष्टिमा- पन्ना यौवनोत्कटा इदं मां ऊचुः-'यदि त्वं अस्माकं सत्यो मातुलः तदा किञ्चित् ग्रामान्तरं गत्वा अस्मद्योग्यं कञ्चित पतिमानय' । तदर्थे त्वामहं तत्र नयामि" । अथ शृगालवच- नानि श्रुत्वा कामपीडितांगः तमवोचत् । "भद्र ! यदि एवं तदग्रे भव, येन आगच्छामि । अथवा साधु इदमुच्यते-
[header] भाषाटीकासमेतम् । (४१७) [/header]
किसी स्थानमें करालकेशर ( कठिन गर्दनके वालवाला ) नामक सिंह रहता था, उसका धूसरक नाम शृगाल सदा अनुगामी परिचारक था । एक समय हाथीके साथ युद्ध करते उसके शरीरमे कठिन प्रहार पडगयेथे जिनसे एक पगभी चलनेको समर्थ नहीं था । उसके असमर्थ होनेसे वह धूसरक भी भूखसे व्याकुलकण्ठ दुर्बलतताको प्राप्त होगया और किसी दिन उससे बोला- "स्वामिन् ! मैं भूखसे व्याकुल हो एक पगभी नहीं चल सकता । सो किस प्रकार तुम्हारी शुश्रूषा करू" सिंह बोला- "भो ! जाकर कोई जीव ढूंढ जिससे इस अवस्थाको प्राप्त हुआ भी उसे मारू" । यह सुन शृगाल खोज कर्ता किसी समीपवर्ती ग्राममे प्राप्त हुआ । वह लम्बकर्ण नामवाला गधा सरोवरके समीप लम्बायमान दूर्वादलके अंकुरोंकू कृच्छ्र ( कष्ट ) से खाता हुआ देखा । तब समीपवर्ती होकर उसने कहा- "मामा ! हमारा नमस्कार ग्रहण करो, बहुत दिनोंसे देखा है कहो क्यो ऐसे दुर्बल हो रहे हो ?" वह बोला "भो भान्जे ! क्या कहू यह निर्दयी धोबी अति बोझसे मुझको पीडा देताहै मुट्ठीभर घासभी नही देता । केवल धूरिमिले दूर्वाङ्कुर भक्षण करता हू तो कहासे मेरे शरीरमे पुष्टि होगी" । शृगाल बोला- "जो ऐसा है तो मरकतमणीकी समान शष्प ( घास ) वाला नदीके किनारे मनोहर स्थान है। वहा आकर मेरे साथ सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभवकर स्थित हो" । लम्बकर्ण बोला,- "भो भान्जे ! ठीक कहा तुमने । परन्तु हम ग्राम्य पशु वनचारियोंके वध्य हैं सो उस मनोहर स्थानसे क्या है " शृगाल बोला- "मामा ! ऐसा मत कहो वह देश मेरे भुजपजरसे रक्षित है । सो वहा किसी औरका प्रवेश नहीं है किन्तु इसी दोषसे रजकसे क्लेशित हुई तीन गधी अनाथा वहा और भी हैं । वे पुष्टिको प्राप्त हुई जवानीसे उत्कट मुझसे यों बोलीं - "जो तू हमारा सत्य मामा है तो-किसी ग्रामान्तरमें जाकर हमारे- योग्य किसी स्वामीको लाओ" । उस कारण मैं तुमको वहा लिये जाता हू" । तब शृगालके वचन सुन कामसे पीडित अग हो उससे बोला- "भद्र ! जो ऐसा है तो आगे हो जिससे मैं वहा पहुचू । अथवा अच्छा कहा है- नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्ता नितम्बिनीम् । यस्याः सङ्गेन जीव्येत म्रियेत च वियोगतः ॥ ३४ ॥ २७
( ४१८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४१८ ) पञ्चतन्त्रम् । एक स्त्रीको छोडकर कोई वस्तु अमृत और विष नहीं है जिसके संगसे प्राणी जीता और वियोगसे मरता है ॥ ३४ ॥ तथाच- और देखो- यासां नाम्नापि कामः स्यात्सङ्गमं दर्शनं विना । तासां दृक्सङ्गमं प्राप्य यन्न द्रवति कौतुकम् ॥ ३५ ॥ ” जिसका संगम व दर्शन तो दूर रहो नाम मात्रसेही कामके उद्रेक होता है उस स्त्रीजनके दृष्टिको प्राप्त हो जो न द्रवै वह आश्चर्य है ॥ ३५ ॥ ” तथानुष्ठिते शृगालेन सह सिंहान्तिकमागतः । सिंहोऽपि व्यथाकुलितस्तं दृष्ट्वा यावत् समुत्तिष्ठति तावत् रासभः पलायितुं आरब्धवान् । अथ तस्य पलायमानस्य सिंहेन तलप्रहारो दत्तः। स च मन्दभाग्यस्य व्यवसाय इव व्यर्थतां गतः ! अत्रान्तरे शृगालः कोपाविष्टस्तमुवाच-“भोः ! किं एवंविधः प्रहारस्ते यद्गर्दभोऽपि तव पुरतो बलाद्गच्छति । तत्कथं गजेन सह युद्धं करिष्यसि ? तद् दृष्टं ते बलम्”। अथ विलक्षस्मितं सिंह आह-“भोः ! किमहं करोमि। मया न क्रमः सज्जीकृत आसीत् । अन्यथा गजोऽपि मत्क्रमाक्रान्तो न गच्छति” शृगाल आह-“अद्यापि एकवारं तवान्तिके तमानेष्यामि । परं त्वया सज्जीकृतक्रमेण स्थातव्यम्” । सिंह आह-“भद्र ! यो मां प्रत्यक्षं दृष्ट्वा गतः स पुनः कथ- मत्र आगमिष्यति । तदन्यत् किमपि सत्त्वमन्विष्यताम्” । शृगाल आह-“किं तव अनेन व्यापारेण त्वं केवलं सज्जित- क्रमः तिष्ठ” । तथा अनुष्ठिते शृगालोऽपि यावत् रासभ- मार्गेण गच्छति तावत् तत्रैव स्थाने चरन् दृष्टः । अथ शृगालं दृष्ट्वा रासभः प्राह-“भो भगिनीसुत ! शोभनस्थाने त्वया अहं नीतः, द्राक् मृत्युवशं गतः तत्कथय किं तत्सत्त्वम् ? यस्य अतिरौद्रवज्रसदृशकरप्रहारात् अहं मुक्तः ” । तत श्रुत्वा प्रहसन् शृगाल आह-“भद्र ! रासभी त्वां आयान्तं