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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

५७८ फलदीपिका त्रिकोण शोधन के बाद मेष, वृश्चिक, वृष-तुला मिथुन-कन्या, धनु-मीन, मकर-कुंभ इन दो दो राशियों में निम्नलिखित १४ प्रकार की परिस्थिति हो सकती है । एक राशि दूसरी राशि ग्रहयुक्त ग्रहयुक्त १. समान बिन्दु समान बिन्दु २. अधिक " कम " ३. अधिक " शून्य " ४. शून्य " शून्य " —————————————— —————————————— ग्रहयुक्त ग्रहहीन ५. समान बिन्दु समान बिन्दु ६. अधिक " कम " ७. अधिक " शून्य " ८. कम " अधिक " ९. शून्य " अधिक " १०. शून्य " शून्य " —————————————— —————————————— ग्रहहीन ग्रहहीन ११. समान बिन्दु समान बिन्दु १२. अधिक " कम " १३. अधिक " शून्य " १४. शून्य " शून्य "

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५७९ शून्य बिन्दु का अर्थ है कि कोई बिन्दु नहीं हो । एकाधिपत्य शोधन के नियम नीचे दिये जाते हैं । (क) १, २, ३, ४, ७, ९, १०, १३, १४ की परिस्थिति (हालत) में कोई शोधन नहीं होता। जैसी संख्या बिन्दुओं की है वैसी ही रहने दी जाती है । (ख) यदि उपर्युक्त नं० ५ या ६ की परिस्थिति हो तो दूसरी राशि (जिसमें ग्रह नहीं है) में से सब बिन्दु हटा दीजिये । ग्रह युक्त राशि की संख्या वैसी ही रहेगी । (ग) यदि नं० ८ में वर्णित हालत हो तो इस दूसरी राशि में से उतने ही बिन्दु कर दीजिये जितने पहली राशि (ग्रह युक्त राशि) में हों । पहली राशि (ग्रहयुक्त) में जितनी संख्या थी उतनी ही रहेगी । (घ) यदि नं० ११ की परिस्थिति हो तो—दोनों राशियों में संख्या हटा कर ० लिख दीजिये । (ङ) यदि नं० १२ में वर्णित हालत हो तो—जितनी कम बिन्दु वाली राशि में संख्या हो उतनी दोनों में कर दीजिये । संस्कृत के मूल इलोकों की भाषा इस प्रकार की है कि कई प्रकरणों में दो पृथक्-पृथक् (अलग, अलग) अर्थ हो सकते हैं—ऐसी स्थिति में पाठकों की सुविधा के लिये उन अर्थों को अंगीकार किया गया है जो पराशर से अधिक मेल खाते हैं, जिनमें स्पष्ट पराशर से मतभेद है वहाँ मंत्रेश्वर का ही मत दिया गया है । यह दर्शनशास्त्र तो है नहीं कि अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन कर भिन्न भिन्न शाखाओं की व्याख्या कर उस विषय को वहीं छोड़ दिया जावे—जैसे भगवद् गीता में सन्यास परक, निष्काम कर्म परक, भक्ति परक सांख्य, योग आदि के सिद्धान्तों को प्रतिपादन करने वाले भिन्न-भिन्न अर्थों की टीका-भाष्य बड़े-बड़े विद्वानों ने की है—कोई विद्वान् कम नहीं— अब जिसकी जैसी रुचि हो वैसे सिद्धान्त को ग्रहण करे—यह ज्योतिष

५८० फलदीपिका का विषय तो गणित का विषय है। एक सिद्धान्त पर आना पड़ेगा कि इस कोष्ठ में २ रखा जावे या ३, या ४ इत्यादि । जो विद्वान् पाठक तुलनात्मक अध्ययन करना चाहें वे विविध मूल ग्रंथों के वाक्यों का समन्वय या तारतम्य कर सकते हैं—पर इस हिन्दी पुस्तक का उद्देश्य तो नवीन पाठकों को निश्चयात्मक रूप से एक पद्धति या क्रम बताने का है—जिससे वे इसमें बताये गये नियम लागू कर किसी जन्म कुण्डली का त्रिकोण शोधन, एकाधिपत्य शोधन कर सकें। अब उदाहरण कुण्डली का एकाधिपत्य शोधन नीचे दिया जाता है :— त्रिकोणशोधनां कृत्वा पश्चादैकाधिपत्यकम् । क्षेत्रद्वये फलानि स्युस्तदा संशोध्येत्सुधीः ॥१८॥ ग्रहयुक्ते फलैर्हीने ग्रहाभावे फलाधिके । ऊनेन सहशन्त्वस्मिन् शोधयेद्ग्रहवर्जिते ॥१९॥ फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् । सग्रहाग्रहतुल्यत्वे सर्वं संशोध्यमग्रहात् ॥२०॥ उभाभ्यां ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् । उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यं कदाचन ॥२१॥ एकस्मिन् भवने शून्ये न संशोध्यं कदाचन । द्वावग्रहौ चेद्यन्न्यूनं तत्तुल्यं शोधयेद्द्वयोः ॥२२॥ शोध्यावशिष्टं संस्थाप्य राशिमानेन वर्द्धयेत् । ग्रहयुक्तेऽपि तद्राशौ ग्रहमानेन वर्द्धयेत् ॥२३॥

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५८१ सूर्य का एकाधिपत्य शोधन

मे.वृ.मि.क.सि.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
शोधन के बाद१५
चन्द्रमा का एकाधिपत्य शोधन
मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
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शोधन के बाद११

५८२ फलदीपिका मंगल का एकाधिपत्य शोधन

मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
शोधन के बाद
बुध का एकाधिपत्य शोधन
मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
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शोधन के बाद

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५८३

बृहस्पति का एकाधिपत्य शोधन

मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
शोधन के बाद

शुक्र का एकाधिपत्य शोधन

मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
शोधन के बाद

५८४ फलदीपिका गोसिंहौ दशगुणितौ वसुभिर्मिथुनालिभे । वणिङ्ऽमेषो च मुनिभिः कन्यकामकरे शरैः ॥२४॥ शेषाः स्वमानगुणिताः कर्किचापघटीझषाः । एते राशिगुणाः प्रोक्ताः पृथग्ग्रहगुणाः पृथक् ॥२५॥ जीवारशुक्रसौम्यानां दशवसुसप्तेन्द्रियैः क्रमाद्गुणिता । बुधसंख्या शेषारणां राशिगुणाद्ग्रहगुणः पृथक्कार्यः ॥२६॥ शोध्यपिंड अब एकाधिपत्य शोधन के बाद जो प्रत्येक अष्टक वर्ग में योग आया वह शोध्यपिंड हुआ :—पृष्ठ ५८१-५८५ देखिये । सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि १५ ११ ६ ६ ७ ५ १४ यह इस उदाहरण कुंडली का शोध्य पिंड है। भिन्न-भिन्न कुंडलियों में भिन्न-भिन्न शोध्यपिंड आवेगा। मंत्रेश्वर ने शोध्य पिंड की परिभाषा ऊपर श्लोक में यह की है कि दोनों शोधन (त्रिकोण और एकाधि- पत्य) के बाद जो बचे उनका जोड़ शोध्य पिंड कहलाता है । परा- शर के मत से राशिगुणक के बाद जो गुणनफल आवे और ग्रह गुणक के बाद जो गुणनफल आवे दोनों के योग (जोड़) को शोध्यपिंड कहते हैं । राशिगुणक और ग्रहगुणक एकाधिपत्य शोधन के बाद जो संख्या प्रति राशि के नीचे प्राप्त हो उसको राशिगुणक (प्रति राशि के लिए नीचे बताया गया है कि किस संख्या से गुणा करें—उस संख्या को राशिगुणक कहते हैं) से गुणा करे । इसी प्रकार एकाधिपत्य शोधन के बाद जो संख्या बचे उसे ग्रह

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५८५ शनि-अष्टक वर्ग का एका० शोधन

मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
शोधन के बाद१४
राशि-गुणक-चक्र
राशिमे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.
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गुणक१०१०१११२
ग्रह गुणक चक्र
ग्रहसू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
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गुणक१०

५८६ फलदीपिक गुणक (प्रत्येक संख्या को किस ग्रह भेद से किस संख्या से गुणा करना चाहिये--इसे ग्रह गुणक कहते हैं) से गुणा करे । प्रत्येक राशि के गुणक अलग-अलग होते हैं । इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह के गुणक अलग अलग होते हैं । यह पृ० ५८५ पर दिये गये हैं:— सूर्य आदि सातों ग्रहों के राशि गुणक तथा ग्रह गुणक नीचे लिखे प्रकार से किये जावेंगे । पहले सूर्य का एकाधिपत्य शोधनचक्र देखिये । मेष में ० इसका है गुणक ७ है । किन्तु ० को ७ से गुणा किया तो ० ही आया । इस कारण मेष में राशि गुणक के स्थान में कुछ नहीं रखा । वृष में ४ लिखा है । वृष की गुणक संख्या १० है ४ × १० = ४० इस कारण ४० लिखा । कर्क में ३ लिखा है इसकी गुणक संख्या ४ है । इस कारण ३ × ४ = १२ लिखा । अब ग्रह गुणक लीजिये । मेष में शनि है शनि का गुणक ५ है किन्तु मेष में ० होने से ० × ५ = ० । इस कारण मेष के नीचे ० रखा । वृश्चिक में ४ लिखा है और सूर्य, मंगल, शुक्र यह तीन ग्रह हैं । सूर्य का गुणक ५, मंगल का ८, शुक्र का ७ है । इस कारण (वृश्चिक राशि { ४ × ५ (सू०) = २० ४ संख्या है { ४ × ८ (मं०) = ३२ इसलिये) { ४ × ७ (शु०) = २८ ८० ८० वृश्चिक के नीचे लिखा । धनु में १ है । और बुध धनु में है । बुध का गुणक ५ है । इस प्रकार १ × ५ = ५ । यह धनु के नीचे लिखा इस प्रकार आगे चन्द्राष्टक वर्ग आदि में राशि गुण के और ग्रह गुणक से गुणा कर संख्या लिखी गई हैं ।

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५८७ सूर्याष्टक वर्ग (राशि गुणक और ग्रह गुणक)

मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.
ए.शो.
रा.गु.४०१२२०३२१११२४
ग्र.गु..८०८५
चन्द्राष्टक वर्ग (राशि गुणक और ग्रह गुणक)
रा.वृ.मं.शु.बु.चं.योग
सू.
मेषवृषमि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.
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राशि
राशि गुणक१२३०३६९०
ग्रह "१५२०

५८८ फलदीपिका मंगलाष्टक वर्ग (राशि गुणक और ग्रह गुणक)

प्र. राशिश. मे.वृ.मि.क.सिं.क.वृ. तु.सू. मं. शु. वृ.बु. ध.म.कुं.चं. मी.योग
ए. शो.
राशि गु.१४३०५१
ग्रह गु.१०१०२०
बुधाष्टक वर्ग (राशि गुणक और ग्रह गुणक)
प्र. रा.श. मे.वृ.मि.क.सिं.क.वृ. तु.सू. मं. शु. वृ.बु. ध.म.कुं.चं. मी.योग
:---:---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---:
ए.
राशि गु.१०१०१०४७
ग्र. गु.२०२५

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५८९ बृहस्पति का अष्टकवर्ग (राशि गुणक और ग्रह गुणक)

ग्रहश.वृ.सू. मं. श.बु.चं
रा.मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुंमी.
ए. शो.
राशि गु.२०१६११६०
ग्र. गु.४०४५
शुक्राष्टक वर्ग (राशि गुणक और ग्रह गुणक)
ग्रहश.वृ. सू. मं. शु.बु.चं.योग
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राशिमे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.
ए. शो.
रा. गु.२०४८
ग्र. गु.२०२५

५९० फलदीपिका

शनि का अष्टक वर्ग (राशि गुणक और ग्रह गुणक)

ग्र.श.वृ. सू. मं.बु.चं.योग
रा.मे.वृ.मि.क.सिंहक.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.
ए. शो.
रा. गु.६०१५१६१२
ग्र. गु.१०४०

इस प्रकार गुणा करके राशि गुणक और ग्रह गुणकों को जोड़िये ।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
राशि गुणक का गुणनफल१२४९०५१४७६०४३११७
ग्रह गुणक का गुणनफल८५२०२०२५४५२५६०
योग पिण्ड२०९११०७१७२१०५६८१७७

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५९१ एवं गुणित्वा संयोज्य सप्तभिर्गुणयेत्पुनः । सप्तविंशहताल्लब्धवर्षाण्यत्र भवन्ति हि ॥२७॥ द्वादशाद्गुणयेल्लब्धा मासाहर्घटिकाः क्रमात् । सप्तविंशति वर्षाणि मण्डलं शोधयेत्पुनः ॥२८॥ अब इस योग २०९ को ७ से गुणा कीजिये और २७ से भाग दीजिये जो लब्धि होगी वह वर्ष होंगे । १२ से गुणा कर २७ से भाग देने पर लब्धि आवे वह मास हां गे, जो शेष बचे उसे ३० से गुणा कर २७ से भाग दीजिये, जो लब्धि आवे उतने दिन होंगे । इसी प्रकार ६० से गुणा कर २७ से भाग देने से घड़ी .आ जावेगीं सबको जोड़िये । २७ वर्ष का एक मंडल होता है । इसलिये यदि २७ वर्ष से अधिक वर्ष आवें तो २७ कम करके जो संख्या आवे—उतने वर्ष उस ग्रह की दशा समझनी चाहिये । अब उदाहरण कुंडली में ग्रहों की दशा निकाल कर बताया जाता है । (१) सूर्याष्टक वर्ग का राशि ग्रह योग पिण्ड २०९ है । इसको ७ से गुणा किया = १४६३ । इसको २७ से भाग दिया = ५४ वर्ष । शेष ५ बचे, इस को १२ से गुणा किया = ६० । इस को २७ से भाग दिया = २ मास । शेष को ३० से गुणा कर के २७ का भाग दिया = ७ दिन । क्योंकि ५४ वर्ष २ मास ७ दिन, २७ वर्ष से अधिक हैं २७ वर्ष कम किये शेष २७ वर्ष २ मास ७ दिन । सूर्य की दशा । (२) इसी प्रकार चन्द्राष्टक वर्ग का योग पिंड ११० । इसको ७ से गुणा किया = ७७० । इसको २७ से भाग दिया । = २८ वर्ष ६ मास ७ दिन । २७ वर्ष कम किये शेष १ वर्ष ६ मास ७ दिन चन्द्रमा की दशा ।

५९२ फलदीपिका (३) मंगल के अष्टक वर्ग का योग पिंड ७१ । इसको ७ से गुणा किया = ४९७ । इसे २७ से भाग दिया = १८ वर्ष ४ मास २७ दिन मंगल की दशा । (४) बुध के अष्टक वर्ग का योग पिंड ७२ । इसे ७ से गुणा किया = ५०४ । इसे २७ से भाग दिया = १८ वर्ष ८ मास । बुध की दशा । (५) बृहस्पति का योग पिंड १०५ । इसको ७ से गुणा किया = ७३५ । इसे २७ से भाग दिया = २७ वर्ष २ मास २० दिन । २७ वर्ष कम किया, शेष २ मास २० दिन बृहस्पति की दशा । (६) शुक्र का योग पिंड ६८ । इसको ७ से गुणा किया = ४७६ । २७ से भाग दिया = १७ वर्ष ७ मास १७ दिन यह शुक्र की दशा हुई । (७) शनि का योग पिंड १७७ । इसको ७ से गुणा किया = १२३९ से । इसे २७ से भाग दिया = ४५ वर्ष १० मास २० दिन । २७ वर्ष कम किये = १८ वर्ष १० मास २० दिन शनि की दशा । जातक पारिजात तथा शंभु हीरा प्रकाश में अष्टक वर्ग से दशा निकालने की पद्धति (प्रकार) में भिन्नता है । विस्तार भय से उसे यहाँ नहीं दिया जा रहा है । हरण अन्योन्यमर्द्धहरणं ग्रहयुक्ते तु कारयेत् । नीचेऽर्द्धमस्तगेऽप्यर्द्धहरणं तेषु कारयेत् ॥२६॥ (१) यदि कोई ग्रह दूसरे ग्रह के साथ हो तो उसकी दशा का आधा कर दीजिये । (२) यदि कोई ग्रह अस्त हो या नीच राशि में हो तो भी उसकी दशा का आधा कर दीजिये ।

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५९३ शत्रुक्षेत्रे त्रिभागोनं दृश्यार्द्धहरणं तथा । त्र्यंशोनहरणं भङ्गे सूर्येन्द्वोः पातसंश्रयात् ॥३०॥ (१) यदि कोई ग्रह शत्रु राशि में हो तो उसकी दशा का जो समय आया हैं उसका एक तिहाई कम कर दीजिये । (२) यदि कोई ग्रहदृश्यार्द्ध (१२वें घर, ११वें घर, १०वें घर ९वें घर आदि-जितना मार्ग पृथ्वी के ऊपर है) में हो तो भी एक-तिहाई दशा कम कीजिये । (३) जो ग्रह अन्य ग्रह के साथ (उसी राशि अंश में होने से) होने से युद्ध में पराजित हो या सूर्य या चन्द्रमा के पात के अन्तर्गत हो-उसकी दशा में भी एक-तिहाई कम कीजिये । बहुत्वे हरणे प्राप्ते कारयेद्बलवत्तरम् । पश्चात्तान् सकलान् कृत्वा वराङ्गेन विवर्द्धयेत् ॥३१॥ मातङ्गलब्धं शुद्धायुर्भवतीति न संशयः । पूर्ववद्दिनमासाब्दान् कृत्वा तस्य दशा भवेत् ॥ ३२॥ यदि हरण की अनेक परिस्थिति जो ऊपर बताई गई है-उपस्थित हों तो--जिस परिस्थिति में सबसे अधिक हरण होता है--केवल उस परिस्थिति के अनुसार जो हरण आता हो उतना कम कर दीजिये । अन्यहरण छोड़ दीजिये । इस प्रकार जो आयु आवे इसे ३२४ से गुणा कीजिये ओर ३६५ से भाग दीजिये । जो वर्ष, मास दिन आवे वह दशा होगी , एवं ग्रहाणां सर्वेषां दशां कुर्यात् पृथक् पृथक् । अष्टवर्गदशामार्गः सर्वेषामुत्तमोत्तमः ॥३३॥

५९४ फलदीपिका इस प्रकार प्रत्येक ग्रह की अष्टक वर्ग के अनुसार दशा निकालनी चाहिये। अष्टक वर्ग की दशा निकाल कर फलादेश करना उत्तमोत्तम है। बालो बलिष्ठो लवणागमोसुरो रागी मुरारिः शिखरीन्द्रगाथया । भौमो गणेन्द्रो लघुभावतासुरो गोकर्णरक्ता तु पुराणमैथिली ॥३४॥ रुद्रः परं गह्वरभैरवस्थली रागी वली भास्वरगीर्भगाचलाः । गिरौ विवस्वान्बलवद्विवक्षया शूली मम प्रीतिकरोऽत्र तीर्थकृत् ॥३५॥ अष्टकवर्ग कौन-सा ग्रह जिस राशि में वह है—वहाँ से गिनने पर--किस राशि में कितने शुभ बिन्दु प्रदान करता है यह बताते हैं। देखिये अध्याय तेईस। सूर्य अपने अष्टक वर्ग में पहले स्थान में बिन्दु प्रदान करता है; बृहस्पति के अष्टक वर्ग में अपने स्थान से पहले में बिन्दु प्रदान करता है; शनि के अष्टक वर्ग में अपने स्थान से प्रथम स्थान में एक शुभ बिन्दु प्रदान करता है। तो सब अष्टक वर्गों में मिला कर उसने अपने स्थान से प्रथम स्थान पर ३ बिन्दु प्रदान किये। इसी प्रकार सूर्य अपने स्थान से द्वितीय स्थान में (अपने अष्टक वर्ग में १, बृहस्पति के अष्टक वर्ग में १, शनि के अष्टक वर्ग में १) कुल ३ बिन्दु प्रदान करता है। इसी प्रकार सूर्य आदि सातों ग्रह तथा लग्न से किस स्थान पर कितने बिन्दु पड़ते हैं इनका हिसाब करने से नीचे लिखी संख्या आती है :

"? It looks like "गु." with the loop, or "वृ."? In Devanagari font here, 'गु' has a round curve: 'गु.'. Wait, under 'शु.' there is nothing, it's just 'वृ.'! Wait, why did I think there was another letter? Ah, look at the text: गु. सू. मं. शु. Wait, let's read the characters carefully: Look above 'तु.': It has: गु. सू. Wait, why is there an 'म.' and 'श.'? Wait! Look at the header of the two columns between क. and ध.: Column 7 (तु.): Top: गु. Next: सू. Column 8 (वृ.): Top: म. Next: शु. Wait, let's look at the letters: Wait, look at गु. - it looks like: वृ. or गु.? It has a circle and a vertical line, exactly like वृ. or गु.. Wait, look at म. - it is म.! Look at सू. - it is सू.! Look at शु. - it is शु.! Wait, but wait! Look at the row of rashis: मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. |

५९६ फलदीपिका सूर्य ३,३,३३ २,३,४,५ ३,५,७,२ = ४३ चन्द्र २,३,५,२ २,५,२,२ २,३,७,१ = ३६ मंगल ४,५,३,५ २,३,४,४ ४,६,७,२ = ४९ बुध ३,१,५,२ ६,६,१,२ ५,५,७,३ = ४६ बृहस्पति २,२,१,२ ३,४,२,४ २,४,७,३ = ३६ शुक्र २,३,३,३ ४,४,२,३ ४,३,६,३ = ४० शनि ३,२,४,४ ४,३,३,४ ४,४,६,१ = ४२ लग्न ५,३,५,५ २,६,१,२ २,६,७,१ = ४५ सर्वाष्टक वर्ग योग = ३३७ सर्वाष्टक वर्ग योग वराहमिहिर ने जो अष्टक वर्ग बनाने के लिये-कहाँ-कहाँ किस-किस स्थान में प्रत्येक ग्रह से शुभ बिन्दु पड़ते हैं—जो शुभस्थान में दिये हैं— उनमें और इसमें थोड़ा मतभेद है। अब उपर्युक्त संख्याओं के द्वारा उदाहरण कुंडली में सर्वाष्टक वर्ग बनाया गया है। देखिये पृष्ठ ५९५ ऊपर सूर्य के लिये ३,३,३,३,२,३, आदि संख्या दी है। सूर्य वृश्चिक में है इसलिये तह ३,३,३,३,२,३ आदि संख्या वृश्चिक से प्रारम्भ की हैं। इस लिये सूर्य के आगे-वृश्चिक के नीचे *यह चिह्न दिया गया है। सब ग्रहों से इसी प्रकार संख्या रखनी चाहिये। चन्द्रमा मीन में है इस कारण २,३,५,२,२,५,२, २ आदि की संख्या मीने से प्रारम्भ की है। मीन में यह * चिह्न दे दिया गया है॥३५॥ सर्वकर्मफलोपेतमष्टवर्गकमुच्यते । अन्यथा बलविज्ञानं दुर्ज्ञेयं गुणदोषजम् ॥३६॥ अष्टक वर्ग से फलित ज्योतिष देखने का प्रकार बहुत उत्तम है। बिना अष्टक वर्ग के ग्रहों, राशियों और भावों के—ये बलवान् हैं या निर्बल यह जानने का और कोई उपाय नहीं है ॥३६॥

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५९७. त्रिंशाधिकफला ये स्यू राशयस्ते शुभप्रदाः । पञ्चविंशात्परं मध्यं कष्टं तस्मादधः फलम् ॥३७॥ जिन राशियों में ३० से अधिक बिन्दु हों वे उत्तम हैं। जिनमें २५ से ३० तक मध्यम और जिनमें २५ से कम बिन्दु हों वे अधम (निकृष्ट) फल देती हैं ॥३७॥ मध्यात्फलाधिकं लाभे लाभात् क्षीणतरे व्यये । यस्य व्ययाधिके लग्ने भोगवानर्थवान् भवेत् ॥३८॥ यदि दशम घर से अधिक ग्यारहवें घर में हों; ग्यारहवें से कम बारहवें घर में हों और बारहवें से अधिक लग्न में हों वह जातक भोग- वान् (सांसारिक सुख के साधनों सहित) और अर्थवान् (द्रव्य वाला) होता है ॥३८॥ मूर्त्यादि व्ययभावान्तं दृष्ट्वा भावफलानि वै । अधिके शोभनं विद्याद्धीने दोषं विनिर्दिशेत् ॥३९॥ लग्न आदि भावों में-प्रत्येक में-सर्वाष्टक वर्ग में कितने शुभ बिन्दु हैं यह देखकर फलादेश करना चाहिये । अधिक बिन्दु लग्न में हों तो शरीर स्वास्थ्य उत्तम, धन स्थान में अधिक हो तो धन संग्रह विशेष, सप्तम में अधिक हों तो पत्नी सुख उत्तम, भाग्य में अधिक हों तो विशेष भाग्योदय आदि उत्कृष्ट फल कहना चाहिये। थोड़े बिन्दु होने से अच्छा फल नहीं होता ॥३९॥ षष्ठाष्टमव्ययांस्त्यक्त्वा शेषेष्वेव प्रकल्पयेत् । श्रेष्ठराशिषु सर्वाणि शुभकार्याणि कारयेत् ॥४०॥