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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

दसवां समय १३ ] पृथ्थीराजरासो । ४३० और उन्होंने इस वृत्तान्त में के "अहेरिया" शब्द पर जो टिप्पण दी है उसमें पृथ्वीराज जी के इस आखेटक के विषय में यह कहा है- "In his delight for this diversion, the Rajpoot evinces his Scythic propensity: The grand hunts of the last Chohan emperor often led him into warfare, for Prithiraj was a poacher of the first magnitude, and one of his battles with the Tartars was while engaged in field sports on the Ravi." TOD'S RAJASTHAN, VOL. I, PAGE 485. यद्यपि रूपक ४ के वाक्य-बरष रभै षटमास-का अर्थ दो वर्ष और छ महीनों का भी हो सकता है, परन्तु प्रथम रूपक के वाक्य-वरप एक बीते कलह-की उस के साथ संगति मिलाने से उस का अर्थ एक वर्ष का ही होता है अर्थात्, वर्ष अर्थात् दो छमाही। सो पाठक विचार देखें ॥ जैसे "हुसैन कथा" वाली रासो की संवत् ११३५ की लड़ाई का कारण हुसैन और चित्ररेखा का पृथ्वीराज के शरण आना था; वैसेही इस आखेटक चूक की लड़ाई का कारण उनके बेटे ग़ाज़ी हुसैन का रूपक २ के अनुसार एक महिने और पांच दिन पीछे फिर पृथ्वीराज जी के पास चला आना है ॥ तथा रूपक ४ एक अपूर्व वृत्त प्रकाशित करता है कि हमारे एक हिन्दू-निसिराव पत्रीय- दिल्ली में बिराजे हुए हिन्दुओं की बादशाहत नाश करवाने को पृथ्वीराज जी के यहां की मुख़बरी शहाबुद्दीन को लिखा पढ़ा करते थे । ऐसे जीव भी धन्य हैं !!!

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अथ चित्ररेषा समयौ लिख्यते ॥ —❁— ( ग्यारहवां समय । ) चित्ररेखा की उत्पत्ति पूछना ॥ दूहा ॥ पुच्छि चंद वरदाइ नैं । चित्ररेष उतपत्ति ॥ षां हुसेन पावास कचि । जिम लीनी असपति ॥ कूं० ॥ १ ॥ छ० ॥ १ ॥ * शहाबुद्दीन के विक्रम का वर्णन ॥ कवित्त ॥ गज्जनेस अवदेस । साचि पल्हांन कुसावं ॥ बदक खामि मेछरां । कुंडि गष्पर क्षिति आवं ॥ जल जोवन साचाव । दीन दुरँगे करि गिन्निय ॥ हिंदवान मेक्कान । थान थानह करि लिन्निय बजि विषम बाइ सुरतान प्पन । साचि बदौं सब दीन पति ॥ अनसंक कंक मनु लंकपति । जनु जोवन तन रवित पति ॥ छं० ॥ २ ॥ छ० ॥ २ ॥ शहाबुद्दीन का अरब ख़ां पर चढ़ाई करने की इच्छा कर सरदारों से पूछना ॥ कवित्त ॥ दिसि अरब सुरतांन । दिष्टि आलोकि वंक सुश्र ॥ आकंपै दिसि डुक्खि । ऊचल चालंत चित्त दुश्र ॥ सज्जि सेन चतुरंग । जंग अनभंग विचारिय ॥ बोलि षान घुरसान । पान जित्ते अधिकारिय ॥


१ पाठान्तर—पुछि । बरदाईनैं । उतपति । लीनिय । अमपति ॥ * इस समय में कवि ने हुसेन षां के कहे अनुसार जैसे शहाबुद्दीन ने चित्ररेखा को प्राप्त किया था सो वर्णन किया है ॥ २ पाठान्तर—पल्लांणि । पलांन । कसंवि । बदकर । सांमि । दुरंगे । गिनीय । गिनिय । हिंदवांन । मेक्षांन । यांन । लिंनीय । सुरतांन । सहाबदी । मनौ । जुन । जर ॥

ग्यारहवां समय २ ] पृथ्वीराजरासो । ४४० मारूफ षान तत्तार षां । षान षान खेरिन सुबर ॥ काजी बल्लाइ कलहंत रिन । बोलि बीर पच्छे सुनर ॥ छं० ॥ ३ ॥ रु० ॥ ३ ॥ अरब ख़ां नवता नहीं है इसलिये उस पर चढ़ाई होनी चाहिए यह आज्ञा दी ॥ दूहा ॥ * आरब पति अर सिंध तट । विन सलाम सुरतान ॥ तिन उप्पर सज्जिय सयन । कद्दर खंडि फुरमांन । छं० ॥ ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥ चढ़ाई की सेना की संख्या ॥ कवित्त ॥ सत्त पंच बाहन बिसाल * । लख दुइ तुरी लखिना ॥ आरब्बी सैं पंच । लख इक सोधि सुलखिना ॥ काविल्ली उर तेज । रोम रोमी पंजाबी ॥ लोचानी जल बान । सेष गोरी आरब्बी ॥ लष एक लख लक्षां मुहा । पारेवह जिन पंष लिय ॥ चालंत कटक गोरी प्रबल । सूधी चाली पंचनिय ॥ छं० ॥ ५ ॥ रु० ॥ ५ ॥ सेना की धूल का वर्णन ॥ छंद भुजंगी ॥ चली पंथिनी सथ्य चौसठ्ठ थानं । चली अग्ग पंती सुदंती प्रमानं ॥ तिनं दंत कंती तडित्ता समानं । ............................ छं० ॥ ६ ॥ ध्वजा पंति फैरंत भादब्ब भारं । झवकैं मनौ सूर संगी कि सारं । बजै चंत्न चंबाल गज्जै कद्दरं । बज्जै तह सहं पपीहं दहूरं ॥ छं० ॥ ७ ॥ धरं बंक य और उड्यौर घंटं । बरं डैर भंजै धरै बिच दहं ॥ अगें चल्लियं अग्गिवानं समीरं । तिनं पुट्ठ षुर्सान षां बंधि भीरं ॥ छं० ॥ ८ ॥ ३ पाठान्तर-दिसि बर आरब साह । दिष्ट । सुय । डुलि । सजि । विचारिय । पांन । षुरसांन । पांन । जिते । अधिकारिय । मारुफ । पांन । ततार । पांन प्रांन । रन । बलाय । पछैँ ॥ ४ पाठान्तर-सिंधु । नट । सलाम । सुरतांन । उपर । सजिय । फुरमांन ॥ * अरब ख़ाँ नामक कोई छोटा राजा वा सरदार उस समय सिंधु तट पर के देश का पति था कि जिसके पास चित्ररेखा थी ॥ ५ पाठान्तर-सत । वाहन । * अधिक पाठ है ॥ लषु । दोइ । लषीना । आरबी । पांच सैं । लष । लीनां । कविली । बांन । शेष । गौरी । आरबी । लष । लषां । मुहां । पारेवाह । षलिय । गौरी । पंषनीय ॥

ग्यारहवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । ४४१ धरै छत्र सीसं विराजंत गोरी । पिलै पंक्ति देवं विचें किल्ल होरी ॥ बलीयोन यानं कुटं मानु पहं । जगी जोग जालं उन्नहै सुयहं ॥ कुं० ॥ ८ ॥ चनै कारवं उप्परे साचि सज्जी । कमठं पिठं उध्यलं सेस दज्जी ॥ बिंटे गट्ट गोचार केशान थानं । मनौ सागरं बीच बडवानलानं ॥ कुं० ॥ १० ॥ बजे थान थानं सुचंवान्न दूरं । गहे पग्ग सीरं बदै मुप्प कूरं ॥ शाह का निसुरति ख़ां को आरब ख़ां के पास भेजना कि चित्ररेषा को देकर पैर पर गिरै तो हम क्षमा करदें ॥ ॥ वरं मोक्कले मेल्वनि स्तुत्ति पांनं । कचौ आरवं लग्गि पायं विच्चानं ॥ कुं०॥११॥ दियौ चित्ररेषा लियौ दंड दोनं । भिरै षेत मोसीं कहूं अज्ज कोनं ॥ पस्यौ तापना आरवं निट्ठ निठ्ठे । गयौ काहरं धीरजं दिट्ठ दिट्ठं ॥ कुं०॥१२ ॥ आरब ख़ां का सादर आज्ञा मानना और चित्ररेषा को देना स्वीकार करना ॥ दियौ जाइ फ़र्मान निस्सत्त ईसं । लियौ आरवं आदरं नाइ सीसं ॥ दई चित्ररेषा सिनावी सुडोरं । तिनं उप्परं गुंज भौंरान बोरं ॥ कुं० ॥ १३ ॥ इह्यं सेत हस्थी दु चार्वै कराकी । पलंगी रजल्ली धरै अंत पाकी ॥ : सतं एक मप्पी दई चित्ररेषा । बनी सुद्ध बानै धरं मद्धि नेहा ॥ कुं० ॥ १४ ॥ रू० ॥ ६ ॥ ६ पाठान्तर-सथ । चौसठि । थानं । अंग । सदंती । पमानं । तडिता ॥ ६ ॥ पत्ति । फहरंत । भादवा । झवकैं । मनौ । गजै । बजै ॥ ७ ॥ पद्धोर उधोर । घटं । बर । बटं । अग्रे । चलियं । अगिवायं । पुठि । पुरंसान ॥ ८ ॥ धरें । गौरी । यांनं २ । कुटे । पह्न । मानो । न उद्वै सुरानं ॥ ९ ॥ उपरं । सनी । कमठं । उघल । दभी । बिंटे । गठ । कै । यांन यांनं । बडवानलानं ॥ १० ॥ यांन यांनं । गहैं । मुष । निसुरति । पांतं । कहौं ॥ ११ ॥ भिरें । मोसूं । कहाँ । कौनं । तापनां । निष्ठ निष्ठ । दिठि दिठं ॥ १२ ॥ फुरमांन । निसुरत्त । नांय । शीशं । सहोरं । उपरं ! भवरांन । भोरं ॥ १३ ॥ हथी । आरब । चैराकी । रजकी । सत्यें । नांने ॥ १४ ॥ ९०

४४२ | पृथ्वीराजरासो । | [ ग्यारहवां समय ४ निशुरति षां का अरब खाँ को शाबसी दे कहना कि तुमने शाह के बचन माने और हिन्दु धर्म्म को न मान कर म्लेच्छ कुल कर्म्म को धारण किया सो ठीक किया ॥ कवित्त ॥ कह्यौ साचि जो बचन । सोइ तुम काज सुधार्यौ ॥ तेइ बचन सति होइ । हिंदु भ्रम्मं न बिचार्यौ ॥ मेछ धर्यौ कुल क्रंम । जोगि ग्यानह जिम धारहि ॥ सेवक मत्त सुभाइ । देन आलम नाकारहि ॥ षुरसान षान सुरतान पति । दल बहल पावस मिलिग ॥ चतुरंग सज्जि चौरंग मिलि । सिद्ध चरित सिद्धन चलिग कृं० ॥ १५ ॥ छ० ॥ ७ ॥ शाहाबुद्दीन का सेना समेत सजकर चलना ॥ कवित्त ॥ गज्जनेस आएक । सूर चतुरंगन सज्जिथ ॥ बीर बाल ससि वहि । मोच पूरन जिम भज्जिय ॥ करक निसा दिन मकर । सेन बढ्ढी तिम चंगिय ॥ मिलि अनंग आनंद । रंज आनंद सुजंगिय ॥ द्वादस सहस्ल बारुन समह । दोइ लष सज्जे सुभर ॥ पारब सुअग्म्य आरंभ दल । चल्यौ साच मधि दुप्पहर ॥ दृं० ॥ १६ ॥ ६० ॥ ८ ॥ चलते समय शाह का चित्त चित्ररेखा में मत्त गयंद की भांति लगा हुआ था ॥ गाथा ॥ चित्तं मत्त गयंढं । पुंतारं नत्थि उत्तरयं ॥ त्यौं चित्तरेषय चित्तं । सुविधानं मंडियं नेहं ॥ कृं० ॥ १७ ॥ ६० ॥ ६ ॥ ७ पाठान्तर-सोय । साज सुधारी । होई । धंम । विचारौ । धरौ । कर्म्म । जोग । ग्यांनह । सुभाय । सुभाई । बुरसांन षांन । सजि ॥ ८ पाठान्तर-आएक । चतुरंगति । सजिय । भजिय । निशा । बढी । चंगीद । जंगीव । समुंद । समद । दोय । लषु । सजे । दुपहर ॥ ९ पाठान्तर-चितं । मत । पुतारं । नथि । उतरयं । चित्तं ॥

४४४ पृथ्वीराजरासो । [ ग्यारहवां समय ६ अरब खां का आज्ञा मानकर चित्ररेखा को भेंट में देना ॥ अरिल्ल ॥ आरब षान तन छन मानिय । ज्यौं सुकिया पिय आग्या जानिय ॥ लै फुरमान बंदि सिर धारिय । चित्ररेष दीनी सा नारिय ॥ छं० ॥ २८ ॥ रू० ॥ १२ ॥ चित्ररेखा वेश्या के रूप का वर्णन ॥ साटक ॥ बेस्या बंकित भूप रूप मनस!, स्रंगार धारावली ॥ सोयं सूरति लच्छि अच्छित गुनं, बेली सु कामावली ॥ का बर्ने कबि उक्ति जुक्ति मनयं, त्रैलोक्य मं साधनं ॥ सोयं बाल तिरत्त उष्ट विद्रुमं, का मोह जोगेश्वरं ॥ छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १३ ॥ साटक ॥ रूपं नदि कटाच्छ कूल तटयौ, भायं तरंगं बरं ॥ द्यावं भावति सील ऽसित गुनं, सिद्धं मनं भंजनी ॥ सोयं जोग तरंग रुवति बरं, चीलोक्य ना ता समा । सोयं साचि सहाव दीन अहियं, आनंग क्रीड़ा रसं ॥ छं० ॥ २९ ॥ ६० ॥ १४ ॥ बिना युद्ध चित्ररेखा को लेकर गोरी का लौट आना ॥ दूहा ॥ अंग सुलच्छिन हेम तन । नगधरि सुंदरि सीस ॥ गोरी ग्रहि गोरी गयौ । विना जुद्ध बुझि रीस ॥ छं० ॥ ३० ॥ रू० ॥ १५ ॥ चित्ररेखा के साथ शाह के आदर और प्रेम का वर्णन ॥ दूहा ॥ जिम जिम साह सु आदरिय । तिम तिम बढ़िय पेम ॥ क्रम क्रम फल गुन बढ़ इय । बेली नमैं सु तेम ॥ छं० ३१ ॥ रू० १६ ॥ १२ पाठान्तर-षांन । छन । मंतिय । सुकीया । जांनिय । फुरमांन । धारीय ॥ १३ पाठान्तर-सोयं । लछि । अच्छित । बेली । बरनै । युक्ति । मन । तिरत । जोगेस्रं ॥ १४ पाठान्तर-नत । कंठाह्य । तटयो । मान । असित । भजनी । रुऋति । जीकोन ता संमयं । त्रिलोक्स । नह । समां । साहाब । ग्रहीयं ॥ १५ पाठान्तर-लक्षिन । शीश । गृहि । युद्ध ॥ १६ पाठान्तर-आदरीय । बढ़िय । जिम २ फलगुन वाधइय ॥

[ ग्यारहवां समय ९ ] पृथ्वीराजरासो । ४४५ चित्ररेषा को सुलतान को वश करने का वर्णन ॥ कवित्त ॥ वसि कीनौ सुरतान । चंग जिस भ्रमै डोरि कर ॥ ज्यौं भावी बसि जाइ । बचन उद्योत बाल सुर ॥ ज्यौं वसि जीवन संन । प्रात वसि जेम क्रांस गुर ॥ ज्यौं वसि नाद कुरंग । वास वसि जेम मधुक्कर ॥ मछिजा सु मुक्ति सब वस्ति भय । मच्छिजा मच्छिज सुमति वसि ॥ एकांग एक अंदर सछल । रचै साछि सुरतान रसि ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ १७ ॥ चित्ररेषा की कथा सुन कर कवि का आनंदित होना ॥ दो० ॥ पंथी पेम परेव जिस । सुमन मनोहर मिष्ट ॥ सुनत कथा संलुद्ध दृष्ट । अनंदिय मन इष्ट ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ १८ ॥ * इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके चित्ररेषा वर्णनं नाम एकादसो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ११ ॥ १७ पाठान्तर—कीनौं । सुरतांन । भ्रमै । होई । मंत । क्रम । नद । वशि । मधुकर । सुमति । जांसि । मति । रहैं । सुरतांन । रस ॥ १८ पाठान्तर—यह । आनंदीय ॥

  • यह दोहा Caulfield, Ms. में नहीं है, परन्तु वह हमारी सं० १६४७ और सं० १८५९ की पुस्तकों में है ॥

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४३४ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय १० सुलतान का बढ़कर लड़ना, दो घड़ी घोर युद्ध होना ॥ कवित्त ॥ रुप्यौ सेन सुरतान । राज चढि नंधि सुरंगं ॥ कै तिमर अग्ग तपभांन । सिंघ चकौ कि कुरंगं ॥ तब * रूप्यौ राव सिंघरिय । लाज सुविचान षटकिय ॥ सस्त्र तेज बल बंधि । सेन चहुआन घटकिय ॥ द्वै घरिय टोप उप्पर बह्यौ । सार तिनंगा तारयौ ॥ जानै कि तिंदु दारुन जरै । जैत षंभ पर झारयो ॥ छंद० ॥ ३२ ॥ रू० ॥ २७ ॥ दूहा ॥ अथ मुक्क्यौ सिरदार दुहु । देखि भयौ नृप चूक्क ॥ घरी एक झरि सार बहु । ज्यौं अगि संजुत्त जक ॥ छंद० ॥ ३३ ॥ रू० ॥ २८ ॥ यवन सरदारों का माराजाना, पृथ्वीराज की विजय ॥ कवित्त ॥ जुद्ध जुरे सिरदार । राव रंगच बाजी दह ॥ घालि बध्य गज हत्थ । हड्डु संजिय रग गूदह ॥ ज्यौ मुष्टिक चानूर । कन्ह भंजिय अप्पारह ॥ उत्तभंग लै हूर । सूर अपछर उप्पारह ॥ वाजीद षान ओरी धरिय । धाड पंच रंगर नृपति ॥ रष्यै जु षॉन् मिट्टै कवन । निमष मांहि उतपति षपति ॥ छंद० ॥ ३४ ॥ रू० ॥ २९ ॥ हारकर शहाबुद्दीन का ग़ज़नी की ओर लौट जाना ॥ दूहा ॥ चूक चूक भय असुर सुर । फिरि गज्जन दिसि धांन ॥ हारि जुआरी ज्यौं चलै । कर घट्टै कर जान ॥ छंद० ॥ ३५ ॥ रू० ॥ ३० ॥ २७ पाठान्तर—सुरतांन । बाजि चढि । भांन । हक्कै । * अधिक पाठ है । रिघरिय । विहांन । चहुआंन । हटकिय । घरीय । जानैं ॥ २८ पाठान्तर—दुहुं । अगनि । उक्क ॥ २९ पाठान्तर—युद्ध । झुरै । सिरहार । रांव । बाजींदह । बघ । गर । हथ । रंग । अप्पारह । उपारह । वर्जीद । घांड । घाव । यु । सांरं ॥ ३० पाठान्तर—गजन । धांन । युवारी । चले । घठे । जांन ॥

दसवां समय ११] पृथ्वीराजरासो । ४३५ चौहान की विजय पर चन्द कवि का जै जै कार करना ॥ दूहा ॥ जीति राज चहुवांन वन । आखेटक असुरान ॥ जै जै जै कविचंद कहि । चंद सूर वप्पान ॥ छं० ॥ ३६ ॥ रु० ॥ ३१ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके राजा पहूवन आखेटक रन सुरतांन चूक करनं नाम दसम प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ १० ॥ ३१ पाठान्तर-चहुवांन । असुरान । वषान ॥

उपसंहारकी टिप्पणी । यह समय भी हमारे स्वदेशी इतिहास के लिये बहुत उपयोगी है। क्योंकि एक लड़ाई तो "हुसैन कथा" नामक समय में रासो के अनन्द संवत् अर्थात्, पृथ्वीराज के तृतीय साक ११३५ माघ शुक्ला १३=११३५+९० । ९१=१२२५ । २६ वर्त्तमान विक्रमी में आगे हो चुकी थी और दूसरी उसके एक बरस पीछे यह "आखेष्टक चूक" नामक हुई है। इस लड़ाई के होने का समय कवि ने स्पष्ट न बताकर प्रथम रूपक में-बरष एक बीते कलह-से पहिली के एक वर्ष पीछे इसका होना वर्णन किया है अर्थात् पहिली के सं० ११३५+९० । ९१=१२२५ । २६ में एक जोड़ने से ११३५+१=११३६+९० । ९१= १२२६ । २७ वर्त्तमान विक्रमी होता है। वैसे ही "आखेष्टक" शब्द के नियत समय के अर्थ से "फाल्गुण" मास का होना भी प्रकाश किया है। प्राचीन समय में हमारे देशी राज्यों में वर्ष भर के अनेक त्यौहारों में फाल्गुण मास में जिस दिन ज्योतिषी आखेट का महूर्त्त देते थे उस दिन एक बड़ा त्यौहार मनाया जाता था। इसीसे यहां कवि ने "आखेष्टक" शब्द से फाल्गुन का संकेत अर्थ में माना है। अब यह त्यौहार लुप्त सा होता चला जाता है, तथापि वह प्राचीन राज्य उदयपुर में इस समय तक भी माना जाता है और उसको वहां "अहेरिया" वा "महूरत का शिकार" करके कहते हैं। और उसका सविस्तर वृत्तान्त कर्नल टॉड साहब ने अपने परम प्रसिद्ध ग्रंथ "राज स्थान" में यह लिखा है ॥ "The merry month of Phalgun is ushered in with the Ahaireä, or spring-hunt. The preceeding day the Rana distributes to all his chiefs and servants either a dress of green, or some portion thereof, in which all appear habited on the morrow, whenever the astrologer has fixed the hour for sallying forth to slay the boar to Gouri, the Ceres of the Rajpoots: the Ahairea is therefore called the Máhoorut ca sikar or the chase fixed astrolo- gically. As their success on this occasion is ominous of future good, no means are neglected to secure it, either by scouts previously discovering the lair, or the desperate efforts of the hunters to slay the boar when roused. With the sovereign and his sons all the chiefs sally forth, each on his best steed, and all animated by the desire to surpass each other in acts of prowess and dexterity. It is very rare that in some one of the passes or recesses of the valley the hog is not found; the spot is then surrounded by the bunters, whose vociferations soon start the dhokra and frequently a drove of hogs. Then each cavalier impels his steed, and with lance or sword, regardless of rock, ravine, or tree, presses on the bristly foe, whose knowledge of the country is of no avail when thus circumvented, and the ground soon reeks with gore, in which not unfrequently is mixed that of horse or rider. On the past occasion, there occurred fewer casualties than usual, though the Chandawut Hamira, whom we nicknamed the "Red Riever," had his leg broken, and the second son of Sheodan Singh, a near relation of the Rana, had his neighbour's lance driven through his arm. The young chief of Saloombara was amongst the distinguished of this day's sport. It would appal even an English fox-hunter to see the Rajpoots driving their steeds at full speed, bounding like the antelope over every barrier, the thick jungle covert, or rocky steep bare of soil or vegetation." with their lances balanced in the air, or leaning on the saddle bow slashing at the boar". TOD'S RAJASTHAN, VOL. I, PAGE 435.

दसवां समय १३ ] पृथ्थीराजरासो । ४३७ और उन्होंने इस वृत्तान्त में के "अहेरिया" शब्द पर जो टिप्पण दी है उसमें पृथ्वीराज जी के इस आखेटक के विषय में यह कहा है- "In his delight for this diversion, the Rajpoot evinces his Scythic propensity: The grand hunts of the last Chohan emperor often led him into warfare, for Prithiraj was a poacher of the first magnitude, and one of his battles with the Tartars was while engaged in field sports on the Ravi." TOD'S RAJASTHAN, VOL. I, PAGE 485. यद्यपि रूपक ४ के वाक्य-बरष २भै षटमास-का अर्थ दो वर्ष और छ महीनों का भी हो सकता है, परन्तु प्रथम रूपक के वाक्य-बरष एक बीति कलह-की उस के साथ संगति मिलाने से उस का अर्थ एक वर्ष का ही होता है अर्थात्, वर्ष अर्थात् दो छमाही। सो पाठक विचार देखें ॥ जैसे "हुसैन कथा" वाली रासो की संवत् ११३५ की लड़ाई का कारण हुसैन और चित्ररेखा का पृथ्वीराज के शरण आना था; वैसेही इस आखेटक चूक की लड़ाई का कारण उनके बेटे ग़ाज़ी हुसैन का रूपक २ के अनुसार एक महिने और पांच दिन पीछे फिर पृथ्वीराज जी के पास चला आना है ॥ तथा रूपक ४ एक अपूर्व वृत्त प्रकाशित करता है कि हमारे एक हिन्दू-निसिराव पत्रीय- दिल्ली में बिराजे हुए हिन्दुओं की बादशाहत नाश करवाने को पृथ्वीराज जी के यहां की मुख़बरी शहाबुद्दीन को लिखा पढ़ा करते थे । ऐसे जीव भी धन्य हैं !!!

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अथ चित्ररेषा समयौ लिख्यते ॥ ( ग्यारहवां समय । ) चित्ररेखा की उत्पत्ति पूछना ॥ दूहा ॥ पुच्छि चंद वरदाइ नैं । चित्ररेष उतपत्ति ॥ षां हुसेन पावास कचि । जिम लीनी असपति ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥ * शहाबुद्दीन के विक्रम का वर्णन ॥ कवित्त ॥ गज्जनेस अवदेस । साचि पल्हांन कुसावं ॥ बदक स्वामि भेद्वां । कुंडि गष्पर क्षिति आवं ॥ जल जोवन साचाव । दीन दुरंगे करि गिन्निय ॥ हिंदंवान मेछान । थान थानह करि जिन्निय बजि विषम वाइ सुरतान प्पन । साचि बदौं सब दीन पति ॥ अनसंक कंक मनु लंकपति । जनु जोवन तन रवित पति ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥ शहाबुद्दीन का अरब ख़ां पर चढ़ाई करने की इच्छा कर सरदारों से पूछना ॥ कवित्त ॥ दिसि अरब सुरतांन । दिष्टि आलोकि वंक सुन्न ॥ आकंपै दिसि डुल्लि । अचल चालंन चित्त दुन्न ॥ सज्जि सेन चतुरंग । जंग अनभंग विचारिय ॥ बोलि षान षुरसान । पान जित्ते अधिकारिय ॥ १ पाठान्तर-पुछि । बरदाईनैं । उतपति । लीनिय । अमपति ॥ * इस समय में कवि ने हुसेन षां के कहे अनुसार जैसे शहाबुद्दीन ने चित्ररेखा को प्राप्त किया था सो वर्णन किया है ॥ २ पाठान्तर-पलांणि । पलांन । कसांबि । बदकर । सांभि । दुरंगे । गिनीय । गिनिय । हिंदवांन । मेक्षांन । थांन । लिंनिय । सुरतांन । सहाबदी । मनौं । जुन । जर ॥

ग्यारहवां समय २ ] पृथ्वीराजरासो । ४४० मारूफ षान तत्तार षां । षान षान खेरिन सुबर ॥ काजी बल्लाइ कलहंत रिन । बोलि बीर पच्छे सुनर ॥ छं० ॥ ३ ॥ रु० ॥ ३ ॥ अरब ख़ां नवता नहीं है इसलिये उस पर चढ़ाई होनी चाहिए यह आज्ञा दी ॥ दूहा ॥ * आरब पति अर सिंध तट । विन सन्नाम सुरतान ॥ तिन उप्पर सज्जिय सयन । कढ्ढर कंडि फुरमांन । छं० ॥ ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥ चढ़ाई की सेना की संख्या ॥ कवित्त ॥ सत्त पंच वाहन्न बिसाल * । लष दुइ तुरी लषिन्ना ॥ आरब्बी सैं पंच । लष इक सोधि सुखिन्ना ॥ काविल्ली उर तेज । रोम रोमी पंजाबी ॥ लोहानी जल्ह वान । सेष गोरी आरब्बी ॥ लष एक लष लष्यां मुहा । पारेवह जिन पंष लिय ॥ चालंत कटक गोरी प्रबल । क्षूणी चाली पंचनिय ॥ छं० ॥ ५ ॥ रु० ॥ ५ ॥ सेना की धूल का वर्णन ॥ छंद भुजंगी ॥ चली पंषिनी सथ्य चौसठ्ठ थानं । चढी अग्ग पंती सुदंती प्रमानं ॥ तिनं दंत कंती तडित्ता समानं । ............................ छं० ॥ ६ ॥ ध्वजा पंति फैरंत भादब्ब भारं । झवक्कै मनौ सूर संगी कि सारं । बजै चंत्न चंबाल गज्जै कद्दारं । बज्जै तह सहं पपीहं दहूरं ॥ छं० ॥ ७ ॥ धरं बंक थहौर उड्डौर घंटं । बरं डैर भंजे धरै बिच दहं ॥ अगैं चल्लियं अग्गिवानं समीरं । तिनं पुट्ठ षुर्सान षां बंधि भीरं ॥ छं० ॥ ८ ॥ ३ पाठान्तर-दिसि बर आरब साह । दिष्ट । सुय । डुलि । सजि । विचारिय । पांन । षुरसांन । पांन । जिते । अधिकारिय । मारूफ । पांन । ततार । पांन पांन । रन । बलाय । पक्कै ॥ ४ पाठान्तर-सिंधु । नट । सलाम । सुरतांन । उपर । सजिय । फुरमांन ॥ * अरब ख़ां नामक कोई छोटा राजा वा सरदार उस समय सिंधु तट पर के देश का पति था कि जिसके पास चित्ररेखा थी ॥ ५ पाठान्तर-सत । वाहन । * अधिक पाठ है ॥ लघु । दोइ । लषीना । आरबी । पांच सें । लष । लीनां । कविली । बांन । शेष । गौरी । आरबी । लष । लषां । मुहां । पारेवाह । षलिय । गौरी । पंषनीय ॥

ग्यारहवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । ४४१ धरै छत्र सीसं विराजंत गोरी । पिल्लै पंति देवं विचें किल्ल होरी ॥ बलीय़ान थानं छुटें मानु पहं । जगी जोग जालं उन्नहैं सुयद ॥ छं० ॥ ८ ॥ चल्लै बारवं उपरे साचि सज्जी । कमठं पिठं उथ्यलं सेस दज्जी ॥ विंटे गट्ट गोचार क्लेशन थानं । मनौं सागरं वीच बद्धानलानं ॥ छं० ॥ १० ॥ वजे थान थानं सुचंवान्च दूरं । गहे पग्ग सीरं वदै मुष्प कूरं ॥ शाह का निसुरति ख़ां को आरब ख़ां के पास भेजना कि चित्ररेखा को देकर पैर पर गिरै तो हम क्षमा करदें ॥ ॥ वरं मोकले मेल्लनि खुत्ति पांनं । कचौ आरवं लग्गि पायं विच्चानं ॥ छं०॥ ११॥ दियौ चिचरेषा लियौ दंड दोनं । भिरै षेत मोसीं कहूं अज्ज कोनं ॥ पस्यौ तापना आरवं निट्ठ निट्ठं । गयौ काहरं धीरजं दिट्ठ दिट्ठं ॥ छं०॥१२ ॥ आरब ख़ां का सादर आज्ञा मानना और चित्ररेखा को देना स्वीकार करना ॥ दियौ जाइ फुर्मान निस्रत्त ईसं । लियौ आरवं आदरं नाइ सीसं ॥ दई चिचरेषा सिनाबी सुडोरं । तिनं उप्परं गुंज भौंरान बोरं ॥ छं० ॥ १३ ॥ इकं सेत हस्थी दु चार्वें कराकी । पलंगी रजल्ली धरै अंत पाक्की ॥ सतं एक मप्पी दई चिचरेचा । बनी सुद्ध बानै धरं मद्धि नेहा ॥ छं० ॥ १४ ॥ रू० ॥ ६ ॥ ६ पाठान्तर-सथ । चौसठि । थानं । अंग । सदंती । प्रमानं । तडिता ॥ ६ ॥ पत्ति । फहरंत । भादवा । झावकैं । मनौं । गजै । बजै ॥ ७ ॥ पट्टोर उधोर । घटं । बर । बटं । अग्रे । चलियं । अगिवाचं । पुठि । पुरंसान ॥ ८ ॥ धरें । गौरी । यांनं २। छुटे । पहू । मांनो । न उठै सुराने ॥ ८ ॥ उपरें । सनी । कमठं । उथल । दभी । बिंटे । गढ । कै । यांन यांनं । बडवानलानं ॥ १० ॥ यांन यांनं । गहें । मुप । निसुरति । पांतं । कहौं ॥ ११ ॥ भिरें । मोसूं । कहौ । क्रीनं । तापनां । निच निठं । दिठि दिठं ॥ १२ ॥ फुरमानं । निसुरत्त । नांय । शीशं । सहोरं । उपरं ! भवरांन । भोरं ॥ १३ ॥ हथी । आरब । चौराकी । रजकी । मध्यें । बांने ॥ १४ ॥ ९०

४४२ पृथ्वीराजरासो । [ ग्यारहवां समय ४ निसुरति षां का अरब खाँ को शाबसी दे कहना कि तुमने शाह के बचन माने और हिन्दु धर्म्म को न मान कर म्लेच्छ कुल कर्म्म को धारण किया सो ठीक किया ॥ कवित्त ॥ कह्यौ साचि जो बचन । सोइ तुम काज सुधार्यौ ॥ तेइ बचन सति होइ । हिंदु भ्रम्मं न विचार्यौ ॥ मेछ धर्यौ कुल क्रंम । जोगि ग्यानह जिम धारहि ॥ सेवक मत्त सुभाइ । देन आलम नाकारहि ॥ घुरसान षान सुरतान पति । दल बहल पावस मिलिग ॥ चतुरंग सज्जि चौरंग मिलि । सिद्ध चरित सिद्धन चलिग छं० ॥ १५ ॥ ६० ॥ ७ ॥ शाहाबुद्दीन का सेना समेत सजकर चलना ॥ कवित्त ॥ गज्जनेस आएस । सूर चतुरंगन सज्जिथ ॥ बीर बाल ससि वहि । सोच पूरन जिम भज्जिय ॥ करक निसा दिन मकर । सेन बढ्ढी निम चंगिय ॥ मिलि अनंग आनंद । रंज आनंद सुजंगिय ॥ द्वादस सहस्र बारुन समद । दोइ लष सज्जे सुभर ॥ पारब सुअम्य आरंस दल । चव्यौ साच मधि दुप्पहर ॥ छं० ॥ १६ ॥ ६० ॥ ८ ॥ चलते समय शाह का चित्त चित्तरेखा में मत्त गयंद की भांति लगा हुआ था ॥ गाथा ॥ चित्तं मत्त गयंदं । पुंतारं नत्थि उत्तरयं ॥ त्यों चित्तरेषय चित्तं । सुविच्चानं मंडियं नेहं ॥ छं० ॥ १७ ॥ ६० ॥ ६ ॥ ७ पाठान्तर-सोय । साज सुधारौ । होई । धंम । विचारौ । धरौ । कर्म्म । जोग । ग्यांनह । सुभाय । सुभाई । घुरसांन षांन । सजि ॥ ८ पाठान्तर-आएक । चतुरंगति । सजिय । भजिय । निशा । बढी । चंगीय । जंगीय । समुंद । समद । दोय । लखु । सजे । दुपहर ॥ ६ पाठान्तर-चितं । मत । पुतारं । नथि । उतरयं । चित्तं ॥

४४४ पृथ्वीराजरासो । [ ग्यारहवां समय ६ अरब खां का आज्ञा मानकर चित्ररेषा को भेंट में देना ॥ अरिल्ल ॥ आरब षान तन छन मानिय । ज्यौं सुकिया पिय आग्या जानिय ॥ लै फुरमान बंदि सिर धारिय । चित्ररेष दीनी सा नारिय ॥ छं० ॥ २८ ॥ रू० ॥ १२ ॥ चित्ररेषा वेश्या के रूप का वर्णन ॥ साटक ॥ बेस्र्या बंकित भूप रूप मनस!, स्रंगार धारावली ॥ सोयं सूरति लच्छि अच्छित गुन॑, बेली सु कामावली ॥ का बर्नै कवि उत्ति जुक्ति मनथं, त्रैलोक्य मं साधनं ॥ सोयं बाल तिरत्त उष्ट विद्रुमं, का मोह जोगेश्वरं ॥ छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १३ ॥ सटक ॥ रूपं नहि कटाच्छ कूल तटयौ, भायं तरंगं बरं ॥ द्यावं भावति सीन असित गुन॑, सिद्धं मनं भंजनी ॥ सोयं जोग तरंग रुवति बरं, चीलोक्य ना ता समा । सोयं साचि सहाव दीन अहियं, आनंग क्रीड़ा रसं ॥ छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १४ ॥ बिना युद्ध चित्ररेषा को लेकर गोरी का लौट आना ॥ दूहा ॥ अंग सुलच्छिन हेम तन । नगधरि सुंदरि सीस ॥ गोरी ग्रहि गोरी गयौ । बिना जुद्ध बुझि रीस ॥ छं० ॥ ३० ॥ रू० ॥ १५ ॥ चित्ररेषा के साथ शाह के आदर और प्रेम का वर्णन ॥ दूहा ॥ जिम जिम साह सु आदरिय । तिम तिम बढ्ढिय पेम ॥ क्रम क्रम फल गुन बढ़ इय । बेली नमैं सु तेम ॥ छं० ३१ ॥ रू० १६ ॥ १२ पाठान्तर-षांन । छन । मंतिय । सुकीया । जांनिय । फुरमांन । धारीय ॥ १३ पाठान्तर-सोयं । लछि । अछित । बेली । बरनै । युक्ति । मन । तिरत । जोगेस्ररं ॥ १४ पाठान्तर-नत । कंठाख्य । तटयो । मान । ग्रसित । भजनी । रुञ्जति । जीकोन ता संमयं । त्रिलोक्स । नह । समां । साहाब । ग्रहीयं ॥ १५ पाठान्तर-लछिन । शीश । गृहि । युद्ध ॥ १६ पाठान्तर-आदरीय । बढ़िय । जिम २ फलगुन वाधरय ॥