रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
श्लोकानुक्रमणिका ६६५
| श्लोक | सर्ग | श्लोकः | श्लोक | सर्ग | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| स जहार तयोर्मध्ये | १२ | १९ | स धातुभेदारुणयानने | १६ | ३२ |
| स जातकर्मण्यखिले | ३ | १८ | संध्याभ्रकपिशस्तस्य वि | १२ | २८ |
| स तक्षपुष्कलो पुत्रौ | १५ | ८९ | स नन्दिनीस्तन्यमनि | २ | ६९ |
| स तत्र मञ्चेषु मनोज्ञ | ६ | १ | स नर्मदारोधसि | ५ | ४२ |
| स तथेति विनेतुरुदा | ८ | ९१ | स नादं मेघनादस्य | १२ | ७९ |
| स तद्वक्त्रं हिमक्लिष्टकि | १५ | ५२ | स निर्विश्य यथाकामं | ४ | ५१ |
| स तपःप्रतिबन्धमन्यु | ८ | ८० | स निवेश्य कुशावत्यां | १५ | ९७ |
| संतानकमयी वृष्टि | १० | ७७ | स नैषधस्यार्थपतेः सुता | १८ | १ |
| संतानकामाय तथे | २ | ६५ | स नौ विमानादवतीर्य | १६ | ६८ |
| संतानश्रवणाद्भ्रातुः सीमि | १९ | १४ | सन्तस्तस्याभिगमनाद | १७ | ७२ |
| संतानार्थाय विधये | १ | ३४ | स न्यस्तचिह्नामपि | २ | ७ |
| स तावदभिषेकान्ते | १७ | १७ | स परार्ध्यगतेरशोच्य | ८ | २७ |
| स तावाख्याय रामाय | १५ | ७१ | स पल्वलोत्तीर्णवराह | २ | १७ |
| स तीरभूमी विहितोप | १६ | ५५ | स पाटलायां गवि | २ | २९ |
| स तीर्त्वा कपिशां सैन्यै | ४ | ३८ | स पितुः पितृमान्वंशमा | १७ | २ |
| स तेजो वैष्णवं पत्न्यो | १० | ५४ | स पुरं पुरुहूतश्रीः कल्प | १७ | ३२ |
| स तौ कुशलवोन्मृष्टगर्भ | १५ | ३२ | स पूर्वजन्मान्तरदृष्ट | १८ | ५० |
| सत्रान्ते सचिवसखः | ४ | ८७ | स पूर्वजानां कपिलेन | १६ | ३४ |
| सत्यामपि तपःसिद्धौ | १ | ९४ | स पूर्वतः पर्वतपक्षसा | ३ | ४२ |
| स त्वं निवर्तस्व विहाय | २ | ४० | स पृष्टः सर्वतो वार्तामा | १५ | ४१ |
| स त्वनेकवनितासखो | १९ | ५३ | स पौरकार्याणि समीक्ष्य | १४ | २४ |
| स त्वं प्रशस्ते महिते | ५ | २५ | सप्तच्छदक्षीरकटु | ५ | ४८ |
| स त्वं मदीयेन शरीर | २ | ४५ | सप्तसामोपगीतं त्वां | १० | २१ |
| संदष्टवस्त्रेष्वबलानि | १६ | ६५ | स प्रतस्थेऽरिनाशाय | १२ | ६७ |
| स दक्षिणं तूणमुखेन | ७ | ५७ | स प्रतापं महेन्द्रस्य | ४ | ३९ |
| स ददर्श सभामध्ये स | १५ | ३९ | स प्राप हृदयन्यस्तमणि | १२ | ६५ |
| सदयं बुभुजे महाभु | ८ | ७ | स बभूव दुरासदः | ८ | ४ |
| स दुष्प्रापयशाः प्राप | १ | ४८ | संबन्धमाभाषणपूर्वं | २ | ५८ |
| स धर्मस्य सखः शश्वद | १७ | ३९ | सभाजनायोपगतान्स | १४ | १८ |
६६६
रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्गे | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| संभाव्य भर्तारममुं | ६ | ५० | सर्वत्र नो वार्तमवेहि | ५ | १३ |
| संमोचितः सत्त्ववता | ५ | ५६ | सर्वातिरिक्तसारेण | १ | १४ |
| संमोहनं नाम सखे | ५ | ५७ | सर्वासु मातृष्वपि वत्स | १४ | २२ |
| सम्यग्विनीतमथ वर्म | ८ | ९४ | सर्वेर्बलाङ्गैर्द्विरदप्र | ७ | ५९ |
| समतया वसुवृष्टिवि | ९ | ६ | स लक्ष्मणं लक्ष्मणपूर्व | १४ | ४४ |
| समदुःखसुखः सखीज | ८ | ६५ | स ललितकुसुमप्रवाल | ९ | ७० |
| सममापन्नसावास्ता | १० | ५९ | स विभुर्विबुधांशेषु | १५ | १०२ |
| सममेव समाक्रान्तं | ४ | ४ | स विद्धमात्रः किल ना | ५ | ५१ |
| समानेऽपि हि सौभ्रात्रे | १० | ८१ | स विवेश पुरीं तया | ८ | ७४ |
| समाप्तविघ्नेन मया | ५ | २० | स विश्वजितमाजह्रे | ४ | ८६ |
| स मारुतिसमानीतमहौ | १२ | ७८ | स विसृष्टस्तथेत्युक्त्वा | १२ | १८ |
| समुद्रपत्त्योर्जलसंनि | १३ | ५८ | स वृत्तचूलश्चलकाक | ३ | २८ |
| स मुहूतं क्षमस्वेति | १५ | ४५ | स वेलावप्रवलया | १ | ३० |
| स मृण्मये वीतहिर | ५ | २ | स शापो न त्वया राज | १ | ७८ |
| स मोलरक्षोहरिभिः स | १४ | १० | स शुश्रुवान्मातरि भाग | १४ | ४६ |
| स ययौ प्रथमं प्राचीं | ४ | २८ | सशोणितैस्तेन शिलीमु | ७ | ३५ |
| संरम्भं मैथिलीहासः | १५ | ३६ | ससज्जुरश्वक्षुण्णानां | ४ | ४७ |
| सरलासक्तमातङ्ग | ४ | ७५ | स संनिपात्यावरजान्ह | १४ | ३६ |
| सरसीष्वरविन्दानां | १ | ४३ | स सत्त्वमादाय नदीमु | १३ | १० |
| स राजककुदव्यग्रपाणि | १७ | २७ | स सीतालक्ष्मणसखः स | १२ | ९ |
| स राजलोकः कृपवं | ७ | ३१ | स सेतुं बन्धयामास | १२ | ७० |
| स राज्यं गुरुणा दत्तं | ४ | १ | स सेनां महतीं कर्षन्पू | ४ | ३२ |
| स रावणहतां ताभ्यां | १२ | ५५ | स सैन्यपरिभोगेन | ४ | ४५ |
| सरितः कुर्वती गाधाः | ४ | २४ | स सैन्यश्चान्वगाद्रामं | १२ | ९४ |
| सरित्समुद्रान्तरसीञ्च | १४ | ८ | स स्वयं चरणरागमा | १९ | २६ |
| संरुद्धचेष्टस्य मृगे | २ | ४३ | स स्वयं प्रहतपुष्करः | १९ | १४ |
| सरोषदष्टाधिकलोहि | ७ | ५८ | संहारविक्षेपलघु | ५ | ४५ |
| सर्पस्येव शिरोरत्नं ना | १७ | ६३ | स हुत्वा लवणं वीरस्त | १५ | २६ |
| रवेञ्जस्तवमविज्ञात | १० | २० | स हत्वा बालिनं वीरस्त | १२ | ५८ |
श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोकः | सर्गः | श्लोकः | श्लोकः | सर्गः | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| स हि प्रथमजे तस्मिन्न | १२ | १६ | सुखश्रवा मङ्गलतूर्य | ३ | १९ |
| स हि सर्वस्य लोकस्य | ४ | ८ | सुतां तदीयां सुरभेः | १ | ८१ |
| सा किलाश्वासिता चण्डी | १२ | ५ | सुते शिशोवेव सुदर्शना | १८ | ३५ |
| सा केतुमालोपवना | १६ | २६ | सुतौ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ | १० | ७१ |
| साङ्गं च वेदमध्याप्य किं | १५ | १३ | सुरगज इव दन्तैर्भ | १० | ८६ |
| सा चूर्णगौरं रघुनन्दन | ६ | ८३ | सुरतश्रमसंभृतो | ८ | ५१ |
| सातिरेकमदकारणं | १९ | १२ | सुरेन्द्रमात्राश्रितगर्भ | ३ | ११ |
| सा तीरसोपानपथाव | १६ | ५६ | सुवदनावदनासव | ९ | ३० |
| सा दृष्टनीवारबलीनि | १४ | २८ | सेकान्ते मुनिकन्याभिः | १ | ५१ |
| सा दुर्निमित्तोपगताद्वि | १४ | ५० | सेनानिवेशान्पृथिवीक्षि | ७ | २ |
| सा दुष्प्रधर्षा मनसा | २ | २७ | सेनापरिच्छदस्तस्य | १ | १९ |
| साधयाम्यहमविघ्नम | ११ | ९१ | सेयं मदीया जननीव | १३ | ६३ |
| सांनिध्ययोगात्किल तत्र | ७ | ३ | सेयं स्वदेहार्पणनि | २ | ५५ |
| सा नीयमाना रुचिरान्न | १४ | ४८ | सेव्यमानो सुखस्पर्शः | १ | ३८ |
| सानुप्लवः प्रभुरपि | १३ | ७५ | सैकतं च सरयू विवृ | १९ | ४० |
| सा पौरान्पौरकान्तस्य | १२ | ३ | संषा स्थली यत्र विचिन्व | १३ | २३ |
| सा बाणवर्षिणं रामं यो | १२ | ५० | सोऽधिकारमभिकः | १९ | ४ |
| सा मंदुरा संश्रयिभिस्तु | १६ | ४१ | सोऽपश्यत्प्रणिधानेन | १ | ७४ |
| सा यूनि तस्मिन्नभिलाष | ६ | ८१ | सोपानमार्गेषु च येषु | १६ | १५ |
| सा लुप्तसंज्ञा न विवेद | १४ | ५६ | सोऽस्त्रव्रजैश्छन्नरथः प | ७ | ६० |
| सा वक्रनखधारिण्या | १२ | ४१ | सोऽस्त्रमुग्रजवमस्त्रको | ११ | २८ |
| सा शूरसेनाधिपतिं सु | ६ | ४५ | सोऽहं दाशरथिर्भूत्वा | १० | ४४ |
| सा साधुसाधारणपार्थिव | १६ | ५ | सोऽहं सपर्याविधिभा | ५ | २२ |
| सा सीतामङ्कमारोप्य | १५ | ८४ | सोऽहमाजन्मशुद्धा | १ | ५ |
| सा सीतासंनिधावेव तं | १२ | ३३ | सोऽहमिज्याविशुद्धात्मा | १ | ६८ |
| साहं तपः सूर्यनिविष्ट | १४ | ६६ | सौमित्रिणा तदनु संस | १३ | ७३ |
| सा हि प्रणयवत्यासी | १० | ५७ | सौमित्रिणा सावरजेन | १४ | ११ |
| सीता तमुत्थाप्य जगाद | १४ | ५९ | सौमित्रेर्निशितैर्बाणैर | १५ | २० |
| सीतां हित्वा दशमुखरि | १४ | ८७ | स्तम्भेषु योषित्प्रतिमा | १६ | १७ |
६६८ रघुवंशमहाकाव्ये
| श्लोक-प्रतीक | सर्गः | श्लोकः | श्लोक-प्रतीक | सर्गः | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| स्तूयमानः क्षणे तस्मि | १७ | १५ | स्वासिधारापरिहृतः | १० | ४१ |
| स्तूयमानः स जिह्वाय स्तु | १७ | ७३ | स्वेदानुविद्धाद्रंनखक्ष | १६ | ४८ |
| ह | |||||
| स्थाणुदग्धवपुषस्तपो | ११ | १३ | हंसश्रेणीषु तारासु | ४ | १९ |
| स्थाने भवानेकनरा | ६ | १६ | हरैर्यथैकः पुरुषोत्त | ३ | ४९ |
| स्थाने वृता भूपतिभिः | ७ | १३ | हरेः कुमारोऽपि कुमार | ३ | ५५ |
| स्थितः स्थितामुच्चलितः | २ | ६ | हविर्भुजामेघवतां च | १३ | ४१ |
| स्थित्यै दण्डयतो दण्ड्यां | १ | १५ | हविरावर्जिते होत | १ | ६२ |
| स्नात्वा यथाकाममसो | १६ | ७३ | हविःशमीपल्लवलाज | ७ | २६ |
| स्नानाद्रंमुक्तेष्वनुधूप | १६ | ५० | हविषे दीर्घसत्रस्य | १ | ८० |
| स्निग्धगम्भीरनिर्घोष | १ | ३६ | हस्तेन हस्तं परिगृह्य | ७ | २१ |
| स्फुरत्प्रभामण्डलभानु | १४ | १४ | हा तातेति क्रन्दितमाक | ९ | ७५ |
| स्मरतेव सशब्दनूपु | ८ | ६३ | हीनान्यनुपकर्तृणि | १७ | ५८ |
| स्रगियं यदि जीवितापहा | ८ | ४६ | हुतहुताशनदीप्तिव | ९ | ४० |
| स्रष्टुर्वरतिसर्गात्तु | १० | ४२ | हृष्टापि सा ह्रीविजिता | ७ | ६९ |
| स्वप्रकीर्तितविपक्षमङ्गनाः | १९ | २२ | हृदबस्थमनासन्न | १० | १९ |
| स्वरसंस्कारवत्यासौ पुत्रा | १५ | ७६ | हेमपक्षप्रभाजालं | १० | ६१ |
| स्वर्गामिनस्तस्य तर्मै | १८ | ३६ | हेमपत्रागतं दोर्भ्यामा | १० | ५१ |
| स्वशरीरशरीरिणाव | ८ | ८९ | हैयंगवीनमादाय | १ | ४५ |
| स्वसुर्विदर्भाधिपतेस्त | ६ | ६६ | ह्रेपिता हि बहवो नरे | ११ | ४० |
| स्वाभाविकं विनीतत्वं | १० | ७९ |
रघुवंशपद्यानां छन्दसां विवरणम्
| सर्गाः | छन्दांसि |
|---|---|
| १ | अनुष्टुप् १-९४, प्रहर्षणी ९५ । |
| २ | उपजातिः १-४, ६, ८-२५, २७-४५, ४७-५७, ५९-६९, ७१-७४, इन्द्रवज्रा ५, ७, २६, ४६, ५८, ७०, मालिनी ७५ । |
| ३ | वंशस्थम् १-६९, हरिणी ७० । |
| ४ | अनुष्टुप् १-८६ प्रहर्षणी ८७, ८८ । |
| ५ | उपजातिः १, २, ४, ६-८, १०-१२, १४-२१, २३-२६, २८-३४, ३६, ३७, ३९, ४१-५२, ५४-५९, ६१, ६२, इन्द्रवज्रा ५, ९, १३, २२, ३५, ३८, ४०, ६०, उपेन्द्रवज्रा ३, २७, ५३, वसन्ततिलका ६३-७३, मालिनी ७४, ७५, पुष्पिताग्रा ७६ । |
| ६ | उपजातिः १-१४, १६-२१, २३-४२, ४४, ४६, ४८-६०, ६३, ६४, ६६-७४, ७६-८२, इन्द्रवज्रा १५, २२, ४३, ४५, ४७, ६१, ६२, ६५, ७५, ८३, उपेन्द्रवज्रा ८४, मालिनी ८५, पुष्पिताग्रा ८६ । |
| ७ | उपजातिः १, ३-१५, १७-३५, ३७-३८, ४०-४२, ४४-४८, ५०, ५३, ५५-५८, ६०-६९, इन्द्रवज्रा २, १६, ३६, ३९, ४३, ५१, ५२, ५४, ५९, उपेन्द्रवज्रा ४९, मालिनी ७०, ७१ । |
| ८ | वैतालीयं १-९०, तोटकम् ९१, प्रहर्षणी ९२, वसन्ततिलका ९३, ९४, मन्दाक्रान्ता ९५ । |
| ९ | द्रुतविलंबितम् १-५४, वसन्ततिलका ५५-६३, ७६-८२, शालिनी ६४, प्रहर्षणी ६५, औपच्छन्दसिकम् ६६, मालिनी ६७, रथोद्धता ६८, मञ्जुभाषिणी ६९, पुष्पिताग्रा ७०, ७१, ( विषमवृत्तम् ७२ ) स्वागता ७३, वैतालीयं ७४, मत्तमयूरम् ७५ । |
| १० | अनुष्टुप् १-८५, मालिनी ८६ । |
| ११ | रथोद्धता १-९१, वसन्ततिलका ९२, मालिनी ९३ । |
| ६७० | रघुवंशमहाकाव्ये |
|---|
| सर्गाः | छन्दांसि |
|---|---|
| १२ | अनुष्टुप् १-१०१, मालिनी १०२, वसन्ततिलका १०३, नाराचम् (सिंहविक्रीडितम्) १०४। |
| १३ | उपजातिः १, ३-८, १०-१५, १८, २०-२६, २८-३५, ३७, ३९-४६, ४८, ५०-६१, ६३, ६४, ६६, ६७, इन्द्रवज्रा २, १६, १७, २७, ३६, ३८, ४७, ६२, ६५, उपेन्द्रवज्रा ९, १९, ४९, वसन्ततिलका ६८-७८, प्रहर्षणी ७९। |
| १४ | उपजातिः १-५, ७-१२, १४, १६-२२, २४-४९, ५१-५५, ५७, ५९-६८, ७०-७२, ७४, ७६-८२, ८४-८६, इन्द्रवज्रा ६, १३, १५, २३, ५०, ५६, ५८, ६९, ७३, उपेन्द्रवज्रा ७५, ८३, मन्दाक्रान्ता ८७। |
| १५ | अनुष्टुप् १-१०२, मन्दाक्रान्ता १०३। |
| १६ | उपजातिः १, ३, ४, ६-१४, १६-१८, २०-३५, ३७-४०, ४२-४९, ५२-५९, ६१-६३, ६५, ६७-६९, ७१-७८, ८०-८५, इन्द्रवज्रा २, ५, १५, १९, ३६, ४१, ५०, ५१, ६०, ६४, ६६, ७९, उपेन्द्रवज्रा ७०, वसन्ततिलका ८६, मन्दाक्रान्ता ८७, ८८। |
| १७ | अनुष्टुप् १-८०, मन्दाक्रान्ता ८१। |
| १८ | उपजातिः १, २, ४-१५, १७-२०, २३, २५, २६, २८, २९, ३१, ३३-३७, ४१-४४, ४६-५१, इन्द्रवज्रा ३, १६, २२, २४, २७, ३०, ३२, ३८-४०, उपेन्द्रवज्रा २१, ४५। |
| १९ | रथोद्धता १-५५, वसन्ततिलका ५६, मन्दाक्रान्ता ५७। |
रघुवंशमहाकाव्ये कालिदास-वर्णितानां राज्ञां वंश-विवरणम्
(दिलीपादारभ्याऽग्निवर्णपर्यन्तम्)
दिलीपः
│
रघुः
│
अजः
│
दशरथः
┌──────┬─────┴─────┬──────┐
रामः लक्ष्मणः भरतः शत्रुघ्नः
│
┌┴─────┐
कुशः लवः
│
अतिथिः
│
निषधः
│
नलः
│
नभः
│
पुण्डरीकः
│
क्षेमधन्वा
│
देवानीकः
↓
६७२ रघुवंशमहाकाव्ये
<div align="center">( देवानीकः )
|
┌───────┴───────┐
( पुत्री ) अहीनगुः
|
पारियात्रः
|
शीलः
|
उन्नाभः
|
शङ्खणः
|
व्युषिताश्वः
|
विश्वसहः
|
हिरण्यनाभः
|
कौशल्यः (सोमसुतः)
|
पुत्रः
|
पौष्यः
|
ध्रुवसन्धिः
|
सुदर्शनः
|
अग्निवर्णः
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