रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोकः | सर्गः | श्लोकः | श्लोकः | सर्गः | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| स हि प्रथमजे तस्मिन्न | १२ | १६ | सुखश्रवा मङ्गलतूर्य | ३ | १९ |
| स हि सर्वस्य लोकस्य | ४ | ८ | सुतां तदीयां सुरभेः | १ | ८१ |
| सा किलाश्वासिता चण्डी | १२ | ५ | सुते शिशोवेव सुदर्शना | १८ | ३५ |
| सा केतुमालोपवना | १६ | २६ | सुतौ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ | १० | ७१ |
| साङ्गं च वेदमध्याप्य किं | १५ | १३ | सुरगज इव दन्तैर्भ | १० | ८६ |
| सा चूर्णगौरं रघुनन्दन | ६ | ८३ | सुरतश्रमसंभृतो | ८ | ५१ |
| सातिरेकमदकारणं | १९ | १२ | सुरेन्द्रमात्राश्रितगर्भ | ३ | ११ |
| सा तीरसोपानपथाव | १६ | ५६ | सुवदनावदनासव | ९ | ३० |
| सा दृष्टनीवारबलीनि | १४ | २८ | सेकान्ते मुनिकन्याभिः | १ | ५१ |
| सा दुर्निमित्तोपगताद्वि | १४ | ५० | सेनानिवेशान्पृथिवीक्षि | ७ | २ |
| सा दुष्प्रधर्षा मनसा | २ | २७ | सेनापरिच्छदस्तस्य | १ | १९ |
| साधयाम्यहमविघ्नम | ११ | ९१ | सेयं मदीया जननीव | १३ | ६३ |
| सांनिध्ययोगात्किल तत्र | ७ | ३ | सेयं स्वदेहार्पणनि | २ | ५५ |
| सा नीयमाना रुचिरान्न | १४ | ४८ | सेव्यमानो सुखस्पर्शः | १ | ३८ |
| सानुप्लवः प्रभुरपि | १३ | ७५ | सैकतं च सरयू विवृ | १९ | ४० |
| सा पौरान्पौरकान्तस्य | १२ | ३ | संषा स्थली यत्र विचिन्व | १३ | २३ |
| सा बाणवर्षिणं रामं यो | १२ | ५० | सोऽधिकारमभिकः | १९ | ४ |
| सा मंदुरा संश्रयिभिस्तु | १६ | ४१ | सोऽपश्यत्प्रणिधानेन | १ | ७४ |
| सा यूनि तस्मिन्नभिलाष | ६ | ८१ | सोपानमार्गेषु च येषु | १६ | १५ |
| सा लुप्तसंज्ञा न विवेद | १४ | ५६ | सोऽस्त्रव्रजैश्छन्नरथः प | ७ | ६० |
| सा वक्रनखधारिण्या | १२ | ४१ | सोऽस्त्रमुग्रजवमस्त्रको | ११ | २८ |
| सा शूरसेनाधिपतिं सु | ६ | ४५ | सोऽहं दाशरथिर्भूत्वा | १० | ४४ |
| सा साधुसाधारणपार्थिव | १६ | ५ | सोऽहं सपर्याविधिभा | ५ | २२ |
| सा सीतामङ्कमारोप्य | १५ | ८४ | सोऽहमाजन्मशुद्धा | १ | ५ |
| सा सीतासंनिधावेव तं | १२ | ३३ | सोऽहमिज्याविशुद्धात्मा | १ | ६८ |
| साहं तपः सूर्यनिविष्ट | १४ | ६६ | सौमित्रिणा तदनु संस | १३ | ७३ |
| सा हि प्रणयवत्यासी | १० | ५७ | सौमित्रिणा सावरजेन | १४ | ११ |
| सीता तमुत्थाप्य जगाद | १४ | ५९ | सौमित्रेर्निशितैर्बाणैर | १५ | २० |
| सीतां हित्वा दशमुखरि | १४ | ८७ | स्तम्भेषु योषित्प्रतिमा | १६ | १७ |
६६८ रघुवंशमहाकाव्ये
| श्लोक-प्रतीक | सर्गः | श्लोकः | श्लोक-प्रतीक | सर्गः | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| स्तूयमानः क्षणे तस्मि | १७ | १५ | स्वासिधारापरिहृतः | १० | ४१ |
| स्तूयमानः स जिह्वाय स्तु | १७ | ७३ | स्वेदानुविद्धाद्रंनखक्ष | १६ | ४८ |
| ह | |||||
| स्थाणुदग्धवपुषस्तपो | ११ | १३ | हंसश्रेणीषु तारासु | ४ | १९ |
| स्थाने भवानेकनरा | ६ | १६ | हरैर्यथैकः पुरुषोत्त | ३ | ४९ |
| स्थाने वृता भूपतिभिः | ७ | १३ | हरेः कुमारोऽपि कुमार | ३ | ५५ |
| स्थितः स्थितामुच्चलितः | २ | ६ | हविर्भुजामेघवतां च | १३ | ४१ |
| स्थित्यै दण्डयतो दण्ड्यां | १ | १५ | हविरावर्जिते होत | १ | ६२ |
| स्नात्वा यथाकाममसो | १६ | ७३ | हविःशमीपल्लवलाज | ७ | २६ |
| स्नानाद्रंमुक्तेष्वनुधूप | १६ | ५० | हविषे दीर्घसत्रस्य | १ | ८० |
| स्निग्धगम्भीरनिर्घोष | १ | ३६ | हस्तेन हस्तं परिगृह्य | ७ | २१ |
| स्फुरत्प्रभामण्डलभानु | १४ | १४ | हा तातेति क्रन्दितमाक | ९ | ७५ |
| स्मरतेव सशब्दनूपु | ८ | ६३ | हीनान्यनुपकर्तृणि | १७ | ५८ |
| स्रगियं यदि जीवितापहा | ८ | ४६ | हुतहुताशनदीप्तिव | ९ | ४० |
| स्रष्टुर्वरतिसर्गात्तु | १० | ४२ | हृष्टापि सा ह्रीविजिता | ७ | ६९ |
| स्वप्रकीर्तितविपक्षमङ्गनाः | १९ | २२ | हृदबस्थमनासन्न | १० | १९ |
| स्वरसंस्कारवत्यासौ पुत्रा | १५ | ७६ | हेमपक्षप्रभाजालं | १० | ६१ |
| स्वर्गामिनस्तस्य तर्मै | १८ | ३६ | हेमपत्रागतं दोर्भ्यामा | १० | ५१ |
| स्वशरीरशरीरिणाव | ८ | ८९ | हैयंगवीनमादाय | १ | ४५ |
| स्वसुर्विदर्भाधिपतेस्त | ६ | ६६ | ह्रेपिता हि बहवो नरे | ११ | ४० |
| स्वाभाविकं विनीतत्वं | १० | ७९ |
रघुवंशपद्यानां छन्दसां विवरणम्
| सर्गाः | छन्दांसि |
|---|---|
| १ | अनुष्टुप् १-९४, प्रहर्षणी ९५ । |
| २ | उपजातिः १-४, ६, ८-२५, २७-४५, ४७-५७, ५९-६९, ७१-७४, इन्द्रवज्रा ५, ७, २६, ४६, ५८, ७०, मालिनी ७५ । |
| ३ | वंशस्थम् १-६९, हरिणी ७० । |
| ४ | अनुष्टुप् १-८६ प्रहर्षणी ८७, ८८ । |
| ५ | उपजातिः १, २, ४, ६-८, १०-१२, १४-२१, २३-२६, २८-३४, ३६, ३७, ३९, ४१-५२, ५४-५९, ६१, ६२, इन्द्रवज्रा ५, ९, १३, २२, ३५, ३८, ४०, ६०, उपेन्द्रवज्रा ३, २७, ५३, वसन्ततिलका ६३-७३, मालिनी ७४, ७५, पुष्पिताग्रा ७६ । |
| ६ | उपजातिः १-१४, १६-२१, २३-४२, ४४, ४६, ४८-६०, ६३, ६४, ६६-७४, ७६-८२, इन्द्रवज्रा १५, २२, ४३, ४५, ४७, ६१, ६२, ६५, ७५, ८३, उपेन्द्रवज्रा ८४, मालिनी ८५, पुष्पिताग्रा ८६ । |
| ७ | उपजातिः १, ३-१५, १७-३५, ३७-३८, ४०-४२, ४४-४८, ५०, ५३, ५५-५८, ६०-६९, इन्द्रवज्रा २, १६, ३६, ३९, ४३, ५१, ५२, ५४, ५९, उपेन्द्रवज्रा ४९, मालिनी ७०, ७१ । |
| ८ | वैतालीयं १-९०, तोटकम् ९१, प्रहर्षणी ९२, वसन्ततिलका ९३, ९४, मन्दाक्रान्ता ९५ । |
| ९ | द्रुतविलंबितम् १-५४, वसन्ततिलका ५५-६३, ७६-८२, शालिनी ६४, प्रहर्षणी ६५, औपच्छन्दसिकम् ६६, मालिनी ६७, रथोद्धता ६८, मञ्जुभाषिणी ६९, पुष्पिताग्रा ७०, ७१, ( विषमवृत्तम् ७२ ) स्वागता ७३, वैतालीयं ७४, मत्तमयूरम् ७५ । |
| १० | अनुष्टुप् १-८५, मालिनी ८६ । |
| ११ | रथोद्धता १-९१, वसन्ततिलका ९२, मालिनी ९३ । |
| ६७० | रघुवंशमहाकाव्ये |
|---|
| सर्गाः | छन्दांसि |
|---|---|
| १२ | अनुष्टुप् १-१०१, मालिनी १०२, वसन्ततिलका १०३, नाराचम् (सिंहविक्रीडितम्) १०४। |
| १३ | उपजातिः १, ३-८, १०-१५, १८, २०-२६, २८-३५, ३७, ३९-४६, ४८, ५०-६१, ६३, ६४, ६६, ६७, इन्द्रवज्रा २, १६, १७, २७, ३६, ३८, ४७, ६२, ६५, उपेन्द्रवज्रा ९, १९, ४९, वसन्ततिलका ६८-७८, प्रहर्षणी ७९। |
| १४ | उपजातिः १-५, ७-१२, १४, १६-२२, २४-४९, ५१-५५, ५७, ५९-६८, ७०-७२, ७४, ७६-८२, ८४-८६, इन्द्रवज्रा ६, १३, १५, २३, ५०, ५६, ५८, ६९, ७३, उपेन्द्रवज्रा ७५, ८३, मन्दाक्रान्ता ८७। |
| १५ | अनुष्टुप् १-१०२, मन्दाक्रान्ता १०३। |
| १६ | उपजातिः १, ३, ४, ६-१४, १६-१८, २०-३५, ३७-४०, ४२-४९, ५२-५९, ६१-६३, ६५, ६७-६९, ७१-७८, ८०-८५, इन्द्रवज्रा २, ५, १५, १९, ३६, ४१, ५०, ५१, ६०, ६४, ६६, ७९, उपेन्द्रवज्रा ७०, वसन्ततिलका ८६, मन्दाक्रान्ता ८७, ८८। |
| १७ | अनुष्टुप् १-८०, मन्दाक्रान्ता ८१। |
| १८ | उपजातिः १, २, ४-१५, १७-२०, २३, २५, २६, २८, २९, ३१, ३३-३७, ४१-४४, ४६-५१, इन्द्रवज्रा ३, १६, २२, २४, २७, ३०, ३२, ३८-४०, उपेन्द्रवज्रा २१, ४५। |
| १९ | रथोद्धता १-५५, वसन्ततिलका ५६, मन्दाक्रान्ता ५७। |
रघुवंशमहाकाव्ये कालिदास-वर्णितानां राज्ञां वंश-विवरणम्
(दिलीपादारभ्याऽग्निवर्णपर्यन्तम्)
दिलीपः
│
रघुः
│
अजः
│
दशरथः
┌──────┬─────┴─────┬──────┐
रामः लक्ष्मणः भरतः शत्रुघ्नः
│
┌┴─────┐
कुशः लवः
│
अतिथिः
│
निषधः
│
नलः
│
नभः
│
पुण्डरीकः
│
क्षेमधन्वा
│
देवानीकः
↓
६७२ रघुवंशमहाकाव्ये
<div align="center">( देवानीकः )
|
┌───────┴───────┐
( पुत्री ) अहीनगुः
|
पारियात्रः
|
शीलः
|
उन्नाभः
|
शङ्खणः
|
व्युषिताश्वः
|
विश्वसहः
|
हिरण्यनाभः
|
कौशल्यः (सोमसुतः)
|
पुत्रः
|
पौष्यः
|
ध्रुवसन्धिः
|
सुदर्शनः
|
अग्निवर्णः
(इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं है / This page is blank)
[मुद्रा (Seal/Stamp):]
... संस्कृत महाविद्यालय जय...
इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त (blank) पृष्ठ है।
इस पृष्ठ पर कोई भी पठनीय पाठ (Text) उपलब्ध नहीं है। यह पृष्ठ अत्यधिक जीर्ण-शीर्ण, रिक्त तथा टेप आदि से ढका हुआ प्रतीत होता है।