रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
[ ४६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| अपथ्यानि | ५३४ | द्वितीयः | ६१६ |
| प्रमेहविमर्शः | ” | स्थौल्ये पथ्यापथ्यम् | ६२३ |
| स्वास्थ्यलक्षणम् | ” | अम्लपित्तरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ६२९ |
| प्रमेह की उत्पत्ति में कारण | ” | उदरवृद्धि के कारण | ६३२ |
| प्रमेह की सम्प्राप्ति | ” | अष्टपुष्पाणि | ६४१ |
| प्रमेहों का पूर्वरूप | ” | उदररोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ६४३ |
| प्रमेहों के सामान्य लक्षण तथा भेद | ५३५ | पाण्डुरोगे पथ्यापथ्यनिर्देशः | ६६० |
| तन्द्रालक्षणम् | ” | लङ्केश्वररसः | ६६९ |
| कफप्रमेहाः | ५३६ | लूतारोगेतिहासः | ६८९ |
| पित्तप्रमेहाः | ” | मधुरत्रयम् | ६९४ |
| वातप्रमेहाः | ” | मूर्च्छितपारद का स्वरूप | ६९५ |
| प्रमेहों का समन्वय | ” | त्रैलोक्यविजयरसः | ६९६ |
| वरनागलक्षणम् | ५५२ | शुद्धगन्धकप्रयोगविमर्शः | ७०७ |
| मल्लमूषास्वरूपः | ५५६ | गन्धकसेवने वर्जनीयानि | ” |
| कवचीयन्त्रलक्षणम् | ५६५ | वलिवसापरिचयः | ७०८ |
| प्रमेहे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५७१ | सिद्धस्नेह के लक्षण | ७१२ |
| अपथ्यानि | ” | विपादिका | ७१८ |
| विद्रधिरोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५७८ | कुष्ठे पथ्यापथ्यविवेकः | ७२० |
| अपथ्यानि | ” | कृमिरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ७२४ |
| वर्ध्मवृद्धिरोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५८१ | तालकेश्वरः | ७२९ |
| पञ्चकोलस्वरूपम् | ५८३ | पद्मार्कंतैलम् | ७३१ |
| गुल्मे पथ्यानि | ५९३ | आमवाते पथ्यापथ्यव्यवस्था | ७३७ |
| क्षारनिर्माणविधिः | ५९४ | अपस्मारे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ७३९ |
| प्लीहविमर्शः | ५९६ | उन्मादरोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ७४१ |
| प्लीहरोगे पथ्यापथ्यनिर्देशः | ” | वरुणादिगणः | ७४९ |
| नागवल्लभदसः | ६१६ | वातरक्ते पथ्यापथ्यव्यवस्था | ७७२ |
| लक्ष्मणास्वरूपः | ७७५ |
५
[ ५० ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| नागोदरलक्षणम् | ७७९ | पनसिकायाश्चिकित्सा | ८८८ |
| उपविष्टकलक्षणम् | ७८० | पाषाणगर्दभलक्षणम् | ” |
| जलकूर्मकलक्षणम् | ” | चिकित्सा | ” |
| अभ्रकद्रुतिप्रकारवर्णनम् | ” | जालगर्दभलक्षणम् | ” |
| गर्भिण्याः पथ्यापथ्यविवेकः | ७९९ | चिकित्सा | ” |
| बालरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८१८ | इरिवेलिकालक्षणम् | ” |
| त्रिलौहस्वरूपम् | ८२२ | कक्षालक्षणम् | ” |
| नेत्ररोगविमर्शः | ८२७ | चिकित्सा | ” |
| नेत्ररोगे पथ्यापथ्यानि | ८४४ | विस्फोटकलक्षणम् | ” |
| अन्ययोगाः | ८४९ | अग्निरोहिणीलक्षणम् | ” |
| कर्णरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८५० | चिकित्सा | ” |
| नासारोगे पथ्यापथ्यम् | ८५२ | चिप्यकुनखयोर्लक्षणं चिकित्सा च | ८८९ |
| मुखरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८६० | अनुशयीलक्षणम् | ” |
| तन्तुरोगे वर्जनीयम् | ८६४ | चिकित्सा | ” |
| शिरोरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८६९ | विदारिकाया लक्षणं चिकित्सा च | ” |
| भगन्दरे पथ्यापथ्यविवेकः | ८७७ | शर्कराऽर्बुदलक्षणम् | ” |
| अर्बुदरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८८२ | चिकित्सा | ” |
| अपथ्यानि | ” | पाददारिकाया लक्षणं चिकित्सा च | ” |
| अजगल्लिकाया लक्षणं चिकित्सा च | ८८६ | उपोदिकाद्यं तैलम् | ८९० |
| यवप्रख्यायालक्षणं चिकित्सा च | ” | कदरस्य लक्षणं | ” |
| अन्धालज्या लक्षणं चिकित्सा च | ” | कदरचिकित्सा | ” |
| विवृताया लक्षणं चिकित्सा च | ८८७ | अलसस्यलक्षणं चिकित्सा च | ” |
| कच्छप्या लक्षणं चिकित्सा च | ” | इन्द्रलुप्तस्यलक्षणम् | ” |
| वल्मीकस्य लक्षणं चिकित्सा च | ” | चिकित्सा | ८९१ |
| इन्द्रवृद्धालक्षणम् | ” | दारुणकस्यलक्षणम् | ” |
| इन्द्रवृद्धायाश्चिकित्सा | ८८८ | चिकित्सा | ” |
| पनसिकालक्षणम् | ” | अरुंषिकाया लक्षणम् | ” |
[ ५१ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| हरिद्राद्यं तैलम् | ८९२ | चिकित्सा | ८९४ |
| पलितस्य लक्षणम् | :’ | वृषणकच्छूलक्षणम् | ’ |
| चिकित्सा | ” | चिकित्सा | ” |
| मसूरिकायालक्षणं चिकित्सा च | ” | गुदभ्रंशस्य लक्षणम् | ’ |
| यौवनपिडकाया लक्षणम् | ” | चिकित्सा | ” |
| पद्मिनीकण्टकलक्षणम् | ’’ | मूषकतैलम् | ” |
| चिकित्सा | ’’ | क्षुद्ररोगेषु पथ्यापथ्यविधिः | ” |
| जतुमणिलक्षणम् | ” | स्वरभेदे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ९०५ |
| चिकित्सा | ’’ | श्लोपदरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ९०८ |
| मशकलक्षणम् | ’ | स्थौल्ये पथ्यापथ्यम् | ९१० |
| चिकित्सा | ’’ | त्रिफलारसायनस्य विमर्शः | ९३३ |
| तिलकालकलक्षणम् | ’ | कामकलाख्यरसनिर्माणप्रकारान्तरम् | ९४७ |
| चिकित्सा | ’’ | पूर्णेन्दुरसः | ९५० |
| न्यच्छस्य लक्षणम् | ” | मण्डकपरिभाषा | ९६३ |
| व्यङ्गस्यलक्षणम् | ’ | कान्तलौलक्षणम् | ९८० |
| तयोश्चिकित्सा | ’’ | लौहशोधनार्थे काथविधिः | ९८१ |
| परिवर्त्तितकालक्षणम् | ’’ | वङ्गभस्मविधिः | ९८२ |
| चिकित्सा | ’’ | अथवा | ” |
| अथवा | ’’ | नागभस्मविधिः | ” |
| अवपाटिकालक्षणम् | ८९३ | अथवा | ” |
| चिकित्सा | ” | लौहमारणविधिः | ९८३ |
| निरुद्धप्रकषस्यलक्षणम् | ’ | निरुत्थभस्मपरीक्षाप्रकारः | ९८४ |
| चिकित्सा | ’’ | कुटीनिर्माणप्रकारः | ९८६ |
| सन्निरुद्धगुदलक्षणम् | ’’ | चरकोक्ताचाररसायनम् | १०६६ |
| चिकित्सा | ’ | ||
| अहिपूतनलक्षणम् | ८९४ |
१ दोलायन्त्रम्—
द्रवद्रव्येण भाण्डस्य पूरितार्धोदकस्य च ।
मुखस्योभयतो द्वारद्वयं कृत्वा प्रयत्नतः ॥
तयोस्तु निक्षिपेद्दण्डं तन्मध्ये रसपोटलीम् ।
बध्वा तु स्वेदयेदेतद्दोलायन्त्रमिति स्मृतम् ॥ १ ॥
इति रसरत्नसमुच्चयः ।
अन्यच्च—विबध्य सौषधं सूतं सभूर्जे त्रिगुणाम्बरे ।
रसपोट्टलिकां काष्ठे दृढं बध्वा गुणेन हि ॥ २ ॥
सन्धानपूर्णकुम्भान्तः प्रलम्बनगतिस्थिताम् ।
अधस्ताद् ज्वालयेदग्निं तत्तदुक्तक्रमेणहि ॥ ३ ॥
दोलायन्त्रमिदं प्रोक्तम्
इति रसेन्द्रचूडामणिः ।
एक मिट्टी की हण्डिका में काञ्जी, निम्बू का रस, क्षारोदक या जयन्ती, निर्गुण्डी आदि स्वेदनार्ह औषधियों का स्वरस या क्वाथ भर कर उस हण्डिका के दोनों किनारों में युक्ति से दो छिद्र बना कर उन छिद्रों में एक काष्ठ की मजबूत पतली लकड़ी डाल दें। फिर उस लकड़ी के बीच में पारद की पोट्टली या अन्य लोह ताम्रादिक या रत्न आदि की पोट्टली बांध कर भाण्डस्थ द्रव में लटका दें। फिर इस हण्डिका को चूल्हे पर चढ़ा कर यथोदित समय तक अग्नि प्रदीप्त कर के पोट्टलीस्थ पदार्थ का स्वेदन करते हैं। इसी को दोलायन्त्र कहते हैं। अर्थात् पारदादिक की पोट्टली काष्ठ के साथ बांधने से दोले ( झूले ) की तरह द्रव में लटकती है अतः दोला यन्त्र कहा गया है।
[ २ ]
२ बालुकायन्त्रं लवणयन्त्रञ्च
रसगर्भां गूढवक्त्रां मृद्वस्त्राङ्गुलघनावृताम् ।
शोषितां काचकलसीं त्रिषु भागेषु पूरयेत् ॥ १ ॥
भाण्डे वितस्तिगम्भीरे बालुकासु प्रतिष्ठितम् ।
तद्भाण्डं पूरयेत् त्रिभिरन्याभिरवगुण्ठयेत् ॥ २ ॥
भाण्डवक्त्रं मणिकया सन्धि लिम्पेन्मृदा पचेत् ।
चुल्ल्यां तृणस्य चादाऽऽहान्मणिकापृष्ठवर्त्तिनः ॥ ३ ॥
एतद्धि बालुकायन्त्रं तद्यन्त्रं लवणाश्रयम् ।
पञ्चाढबालुकापूर्ण-भाण्डे निक्षिप्य यत्नतः ॥ ४ ॥
पच्यते रसगोलाद्यं बालुकायन्त्रमीरितम् ।
एवं लवणनिक्षेपात् प्रोक्तं लवणयन्त्रकम् ॥ ५ ॥
अथवा—
अन्तःकृतरसालेपताम्रपात्रमुखस्य च ।
लिप्त्वा मृल्लवणेनैव सन्धि भाण्डतलस्य च ॥ १ ॥
तद्भाण्डं पटुनाऽऽपूर्य्य क्षारैरर्धा पूर्व्ववत् पचेत् ।
एवं लवणयन्त्रं स्याद् रसकर्म्मणि शस्यते ॥ २ ॥— रसरत्नसमुच्चयः ।
एक आतसी शीशी जिसका नीचे का भाग (पेंदी) चौड़ा हो तथा लम्बी और सङ्कुचित नलिका हो, लेकर उस की नलिका में एक पतली लकड़ी डाल कर शीशी को उल्टी करदें। फिर इस लकड़ी को किसी टेबुल के सहारे दृढ़ बांध दें। फिर हण्डिका में २४ घण्टे तक गली हुई मुल्तानी (चिकनी) मिट्टी का आतसी शीशी के पृष्ठ (पीठ) भाग पर पतला एक लेप कर के उसी मिट्टी के घोल में भींगी हुई वस्त्र की पट्टी का प्रलेप कर के सुखा लेवें। फिर सूख जाने पर दूसरी पट्टी का लेप करदें। इस तरह सात बार लेप कर के सुखा लेवें। फिर उस आतसी शीशी के चार भागों में से तीन भागों को कज्जली से भर दें। फिर एक लोहे या मिट्टी की नांद (टब) को बालुका (रेत) से भर कर उस बालुका के मध्य में आतसी शीशी को गले तक गाड दें। फिर उस नांद के मुख पर शराव ढक कर के सन्धि बन्धन कर दें। फिर इस यन्त्र को भट्टी पर चढ़ा कर अग्नि प्रज्वलित कर दें तथा हण्डिका (यन्त्र) के मुख पर स्थित शराव के अन्दर तृण भर दें। स्थान को बालुका, रेत अथवा क्षार या लवण से भर कर यन्त्र को चूल्हे पर चढ़ा कर पाक करना चाहिए। इस को बालुका यन्त्र या लवण यन्त्र कहते हैं।
[ ३ ]
३ भूधरयन्त्रम् ।
बालुकागूढसर्वाङ्गां गर्ते मूषां रसान्विताम् ।
दीप्तोत्पलैः संवृणुयाद् यन्त्रं तद् भूधराह्वयम् ॥ १ ॥
पृथ्वी में एक हस्त गहरा गढा (गर्त) बना कर उसके अर्धभाग को बालुका से भर दें, फिर उस बालुका पर औषध से पूर्ण मूपा को रख दें तथा मूषा का मुख बन्द कर देना चाहिए । पश्चात् शेष गर्त को रेत से भर कर अर्थात् सारी मूषा को रेत से ढक कर उस पर जंगली उपलों की आंच जला देनी चाहिए । इस को भूधर यन्त्र कहते हैं । यह वर्णन चित्र के अनुसार नहीं है । अत्रि संहिता का वर्णन चित्रानुसार है । यथा—
यन्त्रं डमरुवद्वाथ वाऽधःपातनयन्त्रवत् ।
भूगर्ते तत् समाधाय चोर्ध्वमाकीर्य वह्निना ॥ १ ॥
अधः स्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा सूतकं तत्र पातयेत् ।
एतद् भूधरयन्त्रं स्यात् सूतसंस्कारकर्मणि ॥ २ ॥
इत्यत्रिसंहिता
अर्थात् चपटे आकार की दो हण्डिकाएं लेकर एक हण्डिका के भीतरी प्रदेश में पारद के निम्बवादिरस पिष्टकल्क का प्रलेप करके सुखा दें तथा दूसरी हण्डिका में जल भर कर पारद लिप्त हण्डिका को जल पूर्ण हण्डिका के मुख के साथ औंधी कर के मिलाकर दोनों की सन्धियों को बन्द करके डमरू के समानाकार का यन्त्र बनालें । फिर इस यन्त्र को पृथ्वी के अन्दर खोदे हुए गर्त में रखकर सूतलिप्त हण्डिका के पृष्ठ पर अग्नि जला दें । इसको भूधरयन्त्र कहते हैं ।
भाव प्रकाश में इसका वर्णन निम्न प्रकार से किया गया है। यथा—
त्रिफलाशिश्रुशिखिभिर्लवणासुरिसंयुतैः ।
नष्टपिष्टं रसं कृत्वा लेपयेदूर्ध्वभाजनम् ॥ १ ॥
ततो दीप्तैरधःपातमुपलैस्तस्य कारयेत् ।
यन्त्रे भूधरसंज्ञे तु ततः सूतोविशुद्ध्यति ॥ २ ॥
[ .४ ]
४ तिर्यक्पातनयन्त्रम्—
क्षिपेद्रसं घटे दीर्घनताधोनालसंयुते ।
तन्नालं निक्षिपेदन्यघटकुक्ष्यन्तरे खलु ॥
तत्र रुद्ध्वा मृदा सम्यग्वदने घटयोरथ ।
अधस्ताद्रसकुम्भस्य ज्वालयेत्तीव्रपावकम् ॥
इतरस्मिन् घटे तोयं प्रक्षिपेत् स्वादुशीतलम् ।
तिर्यक्पातनमेतद्धि वार्तिकैरभिधीयते ॥
इति रसरत्नसमुच्चयः ।
एक मिट्टी के घट में पारद भर कर घट की ग्रीवा के कुछ नीचे के भाग में एक छिद्र बना कर उस छिद्र में एक लम्बी तथा टेढी नली लगा देनी चाहिए। फिर उस नली के दूसरे भाग को एक दूसरे घट के मध्य भाग में छिद्र बना कर उस में प्रविष्ट कर दें। फिर पारदातिरिक्त घट में शीतल जल भर कर दोनों
के मुख को ढक्कन से तथा नालीप्रवेशजन्य छिद्रों को कपडमिट्टि द्वारा बन्द कर के सुखा कर युक्ति से चूल्हे पर पारद वाले घट को स्थापित कर के अग्नि जला देवें। अग्नि जलते समय चूल्हे के नीचे स्थित घट पर एक लोटे या पात्र के द्वारा शीतल जल डालते रहना चाहिए। इस तरह चूल्हे पर स्थित घट के अन्दर से पारद अग्नि के ताप के कारण उड कर नीचे वाले घट के जल में नलिका मार्ग से हो कर एकत्रित होता रहता है। वार्त्तिककारों ने इस को तिर्यक्पातन यन्त्र कहा है।
[ ५ ]
५ ऊर्ध्वाधःपातनयन्त्रवर्णनम्।
अष्टाङ्गुलपरीणाहमानाहेन दशाङ्गुलम् ।
चतुरङ्गुलकोत्सेधं तोयाधारं गलादधः ॥ १ ॥
अधोभाण्डमुखं तस्य भाण्डस्योपरिवर्तिनः ।
षोडशाङ्गुलविस्तीर्णपृष्ठस्याऽस्ये प्रवेशयेत् ॥
पार्श्वयोर्महिषीक्षीरचूर्णमण्डूरफाणितैः ।
लिप्त्वा विशोषयेत् सन्धिं जलाधारे जलं क्षिपेत् ॥ ३ ॥
चुल्ल्यामारोपयेदेतत् पातनाथन्त्रमीरितम् ॥ ४ ॥
अष्ट अङ्गुल परिधियुक्त, दश अङ्गुल दीर्घ तथा चार अङ्गुल मोटा एक मिट्टी का भाण्ड लेकर उसमें शीतल जल भर दें। फिर सोलह अङ्गुल चौडे पृष्ठ (पीठ) वाला एक भाण्ड लेकर उसके भीतरी भाग में औषधपिष्ट पारद कल्क का लेप करके सुखाकर अधोमुख करके जलपूर्ण घट की ग्रीवा के नीचे तक इसके मुखको
प्रविष्ट ( धंसा ) करके आस पास की सन्धि को भैंस के दुग्ध से पीसे हुए माष चूर्ण, लौहकिट्ट आदि के कल्क से विलिप्त करके सुखाकर चूल्हे पर चढ़ा के अग्नि जलादें । इससे पारद का अधः पातन होता है ।
अथवा एक मिट्टी का भाण्ड लेकर औंधामुख करके पृथ्वी पर रखकर उसके पृष्ठ भाग पर आठ अङ्गुल चौड़ा, दश अङ्गुल लम्बा तथा चार अङ्गुल मोटा एक चिकनी मिट्टी अथवा उड़दी की पिष्टी का आलवाल ( थाला ) बनाकर सुखालें । फिर सोलह अङ्गुल चौड़े पृष्ठ वाला एक भाण्ड लेकर उसके भीतरी तल में पारद कल्क का लेप करके सुखाकर इसके मुख को पृष्ठ पर आल वाल वाले अधोमुखकृत भाण्ड के मुख से मिलाकर भैंस के दुग्ध, माषचूर्ण और मण्डूर किट्टादिकृत कल्क से सन्धिबन्धन करके सुखाकर चूल्हे पर चढ़ा के अग्नि जला दें । आलवाल के भीतरी गरम हुए जल को थोडी२ देर में निकालर कर उसमें शीतल जल बार२ डालते रहना चाहिए । इससे पारद का ऊर्ध्वपातन संस्कार होता है तथा यह अर्थ चित्रानुकूल भी है ।
[ ६ ]
६ अधःपातनयन्त्रवर्णनम्
अथोर्ध्वभाजने लिप्तस्थापितस्य जले सुधीः ।
दीप्तैर्वनोत्पलैः कुर्यादधःपातं प्रयत्नतः ॥ १ ॥
रसरत्न समुच्चयः ।
एक छोटा भाण्ड लेकर उसके भीतरी तलो में पारदकल्क का प्रलेप कर दें तथा पृष्ठ प्रदेश पर माषचूर्णादिक से एक आलवाल ( क्यारी = थाला ) बनाकर सुखालें। फिर एक चौडे उदर वाले भाण्ड में शीतल जल भरकर औषधलिप्त भाण्ड को अधोमुख करके दोनों के मुखों को मिलाकर सन्धिबन्धन कर दें। फिर यन्त्र को एक गढे में रखकर ऊपरी भाण्ड के आलवाल में जङ्गली उपले भर कर अग्नि जला दें। इससे पारद का अधोघट के शीतल जल में अधःपातन होता है।
रसेन्द्रचूडामणि ग्रन्थ में इसका वर्णन निम्नरूप से है ।
यथा—
उपर्यधस्तनस्थाल्यां क्षिपेदन्यामधोमुखीम् । स्थालिकां चिपटीभूततलान्तर्लिप्तपारदाम् ॥ १ ॥ क्षिप्त्वा तां पङ्किले गर्ते ज्वालयेन् मूर्ध्नि पावकम् । अधःपातनयन्त्रं हि तदेतत् परिकीर्तितम् ॥ २ ॥
[ ७ ]
७ विद्याधर ( ऊर्ध्वपातन ) यन्त्र वर्णनम्—
यन्त्रं विद्याधरं ज्ञेयं स्थालीद्वितयसम्पुटात ।
चुल्लीं चतुर्मुखीं कृत्वा यन्त्रभाण्डं निवेशयेत् ॥ १ ॥
तत्रौषधं विनिक्षिप्य निरुन्ध्याद्भाण्डकाननम् ।
यन्त्रं विद्याधरं नाम तन्त्रज्ञैः परिकीर्तितम् ॥ २ ॥
रसरत्नसमुच्चयः ।
समानाकार दो मिट्टी के भाण्डों को परस्पर मिलाने को विद्याधर यन्त्र कहते हैं ।
**विधि:--**एक चारमुख वाला चूल्हा बनाकर उसपर औषधादिक से भरा हुआ एक मिट्टी का भाण्ड रखना चाहिए । फिर इस भाण्ड के मुखपर एक ऊर्ध्वमुख वाला दूसरा भाण्ड रखकर नीचे के भाण्ड के मुख को ऊपरी भाण्ड के तल के
साथ कपडमिट्टी द्वारा बन्दकर देते हैं। फिर सूखने पर अग्नि प्रज्वलित कर देनी चाहिए। इसको रसशास्त्रज्ञों ने विद्याधर यन्त्र कहा है।
भावप्रकाश में इसका वर्णन अत्यन्त स्पष्ट मिलता है। यथा-
अधः स्थाल्यां रसं क्षिप्त्वा निदध्यात्तन्मुखोपरि।
स्थालींमूर्द्धर्वमुखीं सम्यङ् निरुध्य मृदुमृत्स्नया ॥ १ ॥
उदूर्ध्वस्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा चुल्ल्यामारोप्य यत्नतः।
अधस्ताद् ज्वालयेदग्निं यावत् प्रहरपञ्चकम् ॥ २ ॥
स्वाङ्गशीतं ततो यन्त्राद् गृह्णीयाद्रसमुत्तमम् ।
विद्याधराभिधं यन्त्रमेतत्तज्ज्ञैरुदाहृतम् ॥ ३ ॥
इति भावप्रकाशः।
[ ८ ]
स्वेदन ( कन्दुक ) यन्त्रवर्णनम्
स्थूलस्थाल्यां ज ' क्षिप्त्वा वासो बध्वा मुखे दृढम् ।
तत्र स्वेद्यं विनिक्षिप्य तन्मुखं प्रपिधाय च ॥ १ ॥
अधस्ताद् ज्वालयेदग्निं यन्त्रं तत् कन्दुकामभिधम् ।
स्वेदनीयन्त्रमित्यन्ये प्राहुश्चेदं मनीषिणः ॥ २ ॥
एक बडे मिट्टी के भाण्ड में जल, किसी औषधि का स्वरस अथवा क्वाथ भर कर उसके मुख को एक मजबूत वस्त्र से बन्द करके वस्त्र पर स्वेदनीय औषध को रख कर ऊपर से मुख को शराव द्वारा या जैसे चित्र में दिखाया है वैसे हण्डिका द्वारा बन्द करके कपडमट्टी द्वारा सन्धिबन्धन कर देना चाहिए । फिर यन्त्र को चूल्हे पर चढाकर अग्नि प्रदीप्त कर देनी चाहिए । इस को कन्दुकयन्त्र कहते हैं । रसशास्त्र के अन्य आचार्यों ने इसे स्वेदनीयन्त्र भी कहा है ।
**अथवा—**यद्वा स्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा तृणं दत्वामुखोपरि ।
स्वेद्यद्रव्यं विनिक्षिप्य पिधानं प्रविधाय च ॥
अधस्ताद् ज्वालयेदग्नि यन्त्रं तत् कन्दुकं स्मृतम् ॥
एक स्थाली में जल या औषधस्वरस भर कर उसके मुख पर वस्त्र न लगा के तृण (घास) रख कर उन पर स्वेदनीयौषध रख के शराव से बन्द करके कपडमिट्टी द्वारा सन्धिबन्धन कर देते हैं, फिर अग्नि जला कर स्वेदन करते हैं । यह भी कन्दुकयन्त्र कहलाता है । अन्यत्र इसका वर्णन निम्न रूप से मिलता है ।
यथा—
स्थूलस्थाल्यां द्रवं क्षिप्त्वा वासो बद्ध्वामुखे दृढम् ।
तत्र स्वेद्यं विनिक्षिप्य पिधान्या प्रपिधाय च ॥
आधोऽग्निं ज्वालयेत्तत्र तत् स्यात् कन्दुकयन्त्रकम् ।
स्वेदनं यन्त्रमित्येतत् प्राहुरन्ये मनीषिणः ॥
रसेन्द्रचूडामणिः
[ ६ ]
६ धूपयन्त्रवर्णनम्
विधायाष्टाङ्गुलं पात्रं लौहमष्टाङ्गुलोच्छ्रयम् ।
कण्ठाधो द्व्यङ्गुले देशे गलाधारे हि तत्र च ॥ १ ॥
तिर्यग्लोहशलाकाश्च तन्वीस्तिर्यग्विनिक्षिपेत् ।
तनूनि स्वर्णपत्राणि तासामुपरि विन्यसेत् ॥ २ ॥
पत्राधो निक्षिपेद्धूमं वक्ष्यमाणमिहैव हि ।
तत्पात्रं न्युब्जपात्रेण च्छादयेदपरेण हि ॥ ३ ॥
मृदा विलिप्य सन्धिञ्च वह्निं प्रज्वालयेदधः ।
तेन पत्राणि कृत्स्नानि हतान्युक्तविधानतः ॥ ४ ॥
रसश्चरति वेगेन द्रुतं गर्भे द्रवन्ति च ।
गन्धाल्कशिलानां हि कज्जल्या वा मृताहिना ॥