संग्रह पर लौटें




















रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
DevanagariHindipublished362 पृष्ठ
पृष्ठ 47स्थायी लिंक
[ २९ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| शिथिलयोनौ इन्द्रगोपप्रयोगः | ८०६ | गुदपाकचिकित्सा | ८१४ |
| विवृतायां माकन्दमूलादिलेपः | ” | मुखपाकचिकित्सा | ८१५ |
| श्रीपर्णीतैलम् | ८०७ | नाभिपाकचिकित्सा | ” |
| बालरोगः | ” | कुण्डलचिकित्सा | ” |
| माहेश्वरधूपः | ” | बालपञ्चामृतम् | ८१६ |
| विजयधूपः | ८०८ | तिक्ताद्यं घृतम् | ” |
| ग्रहनाशिनीगुटिका | ” | राजीकुष्ठादि लेपः | ” |
| सामान्योपायाः | ८०९ | छिन्नातैलम् | ८१७ |
| कणास्वर्णप्रयोगः | ” | स्फूर्जकादितैलम् | ” |
| सद्योजातबालस्य संज्ञाजननोपायः | ” | निम्बादिघृतं क्षीरञ्च | ” |
| सद्योजातबालस्य ज्वरादिनिवारणोपायः | ” | त्रयोविंशोऽध्यायः ।<br>उन्मादरोगः | ८१८ |
| पित्तज्वरे रोहिणीक्षीरम् | ” | उन्मादस्य निदानसम्प्राप्ती | ” |
| पित्तज्वरे अश्वत्थक्षीरम् | ८१० | उन्मादलक्षणम् | ८१९ |
| गन्धोत्पलजटादिकल्कः | ” | उन्मादचिकित्सा | ” |
| सहदेव्यादिचूर्णम् | ” | ग्रहघ्नधूपः | ” |
| न्यग्रोधादिक्वाथः | ” | सामान्योपायाः | ” |
| रक्तातिसारहरचूर्णम् | ८११ | अर्कमूर्तिरसस्यप्रयोगविधिः | ” |
| सक्षीरबोलप्रयोगः | ” | निर्गुण्डिकादितैलम् | ८२० |
| मूत्रविङ्ग्रहहरं मधुकादि | ” | अपस्मारः | ” |
| यष्ट्यादिघृतम् | ” | अपस्मारसम्प्राप्तिलक्षणे | ” |
| शङ्खनाभ्यादिवर्तिः | ८१२ | अपस्मारचिकित्सा | ८२१ |
| अश्वगन्धाघृतम् | ” | अपस्मारनाशनरसः | ” |
| तालुकण्टलक्षणम् | ” | नवाङ्गवटिका | ८२२ |
| तालुकण्टकचिकित्सा | ८१३ | सूतकप्रत्ययः | ” |
| गुदकीटस्य निदानलक्षणे | ” | सर्वेश्वररसः | ८२३ |
| गुदकीटचिकित्सा | ८१४ | धूस्तूरपञ्चाङ्गघृतम् | ८२४ |
पृष्ठ 48स्थायी लिंक
[ ३० ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| चूर्णाञ्जनम् | ८२४ | पित्ताभिष्यन्दे तीक्ष्णादिवर्तिः | ८३७ |
| मसीयोगः | ” | पित्ताभिष्यन्दे नागादिवर्तिः | ” |
| तिलजदीपाञ्जनम् | ८२५ | ताम्रादिवर्तिः | ” |
| चण्डभैरवरसः | ” | पारदादिवर्तिः | ८३८ |
| पर्पटीरसप्रयोगविधिः | ८२६ | एकत्रिशाङ्गवर्तिः | ” |
| पर्पटीरसस्य प्रकारान्तरेण सेवनोपदेशः | ” | षडङ्गवर्तिः | ८३९ |
| नेत्ररोगाणां संख्या | ” | द्वादशाङ्गवर्तिः | ” |
| नेत्ररोग-चिकित्सा | ८२७ | पटलहरेन्द्ररसः | ८४० |
| ताम्रवर्तिः | ” | खर्णादिवर्तिः | ” |
| ताम्रद्रुतिः | ” | विशायाञ्जनम् | ” |
| ताम्रद्रुतिः | ” | पुष्पहराञ्जनम् | ८४१ |
| ताम्रद्रुतिः | ८२९ | शिग्रुमूलाद्याश्च्योतनम् | ” |
| गन्धकद्रुतिः | ८३० | नेत्रशूलघ्नमाश्च्योतनम् | ” |
| गरुडाञ्जनम् | ८३१ | पौनर्नवाञ्जनम् | ” |
| तिमिरहराञ्जनम् | ८३२ | नेत्रजलस्रावहरोयोगः | ” |
| पटलहराञ्जनम् | ” | वक्ररोमहराञ्जनञ्च | ” |
| रक्ताञ्जनम् | ८३३ | नृकपालाञ्जनम् | ८४२ |
| शम्बूकादिवर्तिः | ” | काचान्धह्राञ्जनम् | ” |
| नक्तान्ध्ये पञ्चाङ्गगुटिका | ” | राज्यन्धहराञ्जनम् | ” |
| नवनेत्रदात्रीवर्तिः | ८३४ | अभिष्यन्दहरो योगः | ८४३ |
| नयनरोगहरा वर्तिः | ” | राज्यन्धे व्योषाञ्जनम् | ” |
| शिग्रुतैलम् | ८३५ | राज्यन्धे मरिचाञ्जनम् | ” |
| नागादिवर्तिः | ” | तिमिरहराञ्जनम् | ” |
| वाताभिष्यन्दे इन्द्रादिवर्तिः | ” | चतुर्विंशोऽध्यायः । | ८४५ |
| श्लेष्माभिष्यन्दे शुल्वादिवर्तिः | ८३६ | कर्णरोगः | ” |
| त्रिदोषाभिष्यन्दे रसेन्द्रवर्तिः | ” | कर्णरोगनामानि | ” |
| कर्णरोगचिकित्सा | ८४६ |
पृष्ठ 49स्थायी लिंक
[ ३१ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| कर्णरोगहरी वज्रादिवटिका | ८४६ | धातुबद्दरसगुटिका | ८५३ |
| कर्शामयघ्नतैलम् | ” | महासरस्वतीचूर्णम् | ८५५ |
| क्रिमिकर्णारितैलम् | ८४७ | मुखरोगादिगलगण्डमालारोगाणां सामान्योपायाः | ” |
| सामान्योपायाः | ” | गलकीलके आमलकप्रयोगः | ” |
| कर्णशूले लवणाद्रकप्रयोगः | ” | विषतिन्दुकादि वटी च | ” |
| कर्णशूले तिलपर्णीप्रयोगः | ” | गलकीलके सैन्धवप्रयोगः | ८५६ |
| अर्कपत्रप्रयोगः | ” | गलकीलके भल्लातकप्रयोगः | ” |
| लशुनरसप्रयोगः | ” | दन्तदार्ढ्यंकरोजिह्वापूतिगन्धहरश्च जयाप्रयोगः | ” |
| पूयहरो मेघनाद स्वरसः | ८४८ | मुखपाके पर्पटीरसः | ” |
| बाधिर्यहरं रुषल्यादिचूर्णम् | ” | मुखशोषे महाराष्ट्री गुटिका | ८५७ |
| कर्णमूलस्फोटहरः केतकादिलेपः | ” | सामान्योपायाः | ” |
| कर्णगलादिस्फोटहरः पुत्रजीवलेपः | ” | मुखवैवर्ण्ये पुनर्नवायुद्वर्तनम् | ” |
| गोमक्षिकानिःसारणार्थं तगरचर्वणादिकम् | ” | नीलिकायां रजन्यादिलेपः | ” |
| कर्णपालीवर्धको मुषलीप्रयोगः | ८४९ | मुखवैवर्ण्ये वङ्गभस्मप्रयोगः | ८५८ |
| कर्णवर्धकचर्मचेटप्रयोगः | ” | मुखवैवर्ण्यदौ मातुलुङ्गादिप्रलेपः | ” |
| कर्णवृद्धिकरोवराहतैलप्रलेपः | ” | मञ्जिष्ठादिप्रलेपः | ” |
| नासारोगाः | ८५० | मुखदौर्गन्ध्यनाशिनी कुष्ठादिवटी | ” |
| मणिपर्पटीरसः | ” | मुखदौर्गन्ध्ये गृहधूमक्वाथः | ८५९ |
| पूयास्रलक्षणम् | ८५१ | मुखदौर्गन्ध्ये पथ्यादि वटिका | ” |
| सामान्योपायः | ” | मुखवैरस्ये लाजादिचूर्णम् | ” |
| कुङ्कुमादिनस्यम् | ८५२ | उपजिह्वायां निर्गुण्ड्यादियोगः | ” |
| कामलाहराञ्जनम् | ” | कृमिदन्ते अभयादिगुटिका | ८६० |
| कामलाहरमञ्जनान्तरम् | ” | कृमिदन्ते वासीसादिगुटिका | ” |
| मुखरोगः | ” | कृमिदन्ते विशालाधूमः | ” |
| मुखरोग-चिकित्सा | ८५३ | चलदन्ते जात्यादिदन्तधावनम् | ” |
| ताप्यादिवटी | ” |
पृष्ठ 50स्थायी लिंक
[ ३२ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्कः | विषयाः | पृष्ठाङ्कः |
|---|---|---|---|
| चलदन्ते मूलकबीजप्रयोगः | ८६१ | इन्द्रलुप्ते भल्लातादिलेपः | ८६७ |
| मुखवैरस्ये आरनालगण्डूषः | ” | इन्द्रलुप्ते गुञ्जाप्रयोगः | ८६८ |
| सुखदो गण्डूषः | ” | सूर्यावर्तादौ अभ्रादिवटिका | ” |
| कण्ठशालूकादौ पारदादिप्रलेपः | ” | पलितादौ कटुतैलनस्यम् | ८६९ |
| गलकीले सैन्धवप्रयोगः | ८६२ | खालित्ये स्नुह्यादितैलं विषतैलञ्च | ” |
| गलरोगे मण्डूरलेपः | ” | व्रणस्यभेदनिर्देशः | ८७० |
| अपचीगण्डमालाचिकित्सा | ” | जात्यादिघृतम् | ” |
| गण्डमालायां ब्रह्मदण्डीमूलप्रयोगः | ८६३ | सामान्योपायाः | ८७१ |
| गण्डमालायां गन्धकादिप्रयोगः | ” | व्रणशोधनरोपणार्थंशुल्बादिप्रयोगः | ” |
| गण्डमालायां जैपालप्रयोगः | ” | व्रणरोपणार्थं पटोलादिलेप | ” |
| चलदन्ते हेमतारादिगुटिका | ८६४ | व्रणरोपणार्थं निम्बपत्रादिप्रयोगः | ” |
| चलदन्ते धातुवद्धरसगुटिकोपदेशः | ” | व्रणरोपणे अपामार्गप्रयोगः | ” |
| शिरोरोगाणां नामानि | ” | व्रणरोपणे गुडटङ्कणवर्तिः | ८७२ |
| शिरोरोगचिकित्सा | ८६५ | दुषितव्रणलेखनार्थं पारदादिप्रयोगः | ” |
| शिरोरोगारिरसः | ” | भग्नस्य भेदनिर्देशः | ” |
| मस्तकरोगाणां सामान्योपायाः | ” | भग्नेपर्पटीरसप्रयोगविधिः | ८७३ |
| अर्द्धावभेदके गिरिकर्णीप्रयोगः | ” | भग्ने वज्रीलेपः कान्तपाषाणलेपश्च | ” |
| गुडादिनस्यम् | ” | भगन्दरलक्षणम् | ” |
| मरिचप्रयोगः | ” | भगन्दरस्य निरुक्तिः | ” |
| शिरः शूले कुङ्कुमादिनस्यम् | ८६६ | रविताण्डवरसः | ८७४ |
| अर्धशूले मरिचप्रयोगः | ” | सामान्योपायाः | ८७५ |
| यूकालिक्षायां पारदप्रयोगः | ” | कर्तव्यनिर्देशः | ” |
| दारुणतैलम् | ” | लाङ्गल्यादिप्रलेपः | ” |
| केशपाते हरिद्रादिलेपः | ८६७ | कालाग्निरसः | ” |
| दृढकेशकरो जातिपुष्पादिप्रलेपः | ” | चक्रिकाबद्धरसप्रयोगोपदेशः | ” |
| केशपाते भृङ्गचादितैलम् | ” | स्फोटने चतुरङ्गलेपः | ८७६ |
| स्फोटने हरिद्रादिप्रलेपः | ” |
पृष्ठ 51स्थायी लिंक
[ ३३ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| शोषणे नरास्थितैलप्रयोगः | ८७६ | पञ्चविंशोऽध्यायः । | |
| शोधनरोपणे ताम्रभस्मप्रयोगः | ८७७ | क्षुद्ररोगाणां नामानि | ८८५ |
| रोपणे मार्जारस्थिप्रलेपः | ,, | क्षुद्ररोगे पर्पटोप्रयोगविधिः | ८९५ |
| भगन्दरव्रणक्षालने त्रिफलाकषायः | ८७७ | व्यङ्गे शशरुधिरप्रयोगः-जातिफलप्रयोगश्च | ,, |
| भूतलोत्थचूर्णप्रयोगः | ,, | व्यङ्गे इङ्गुदीमज्जप्रयोगः | ,, |
| कुक्कुरास्थिलेपः | ,, | कुनखे स्नुहीक्षीरादिप्रलेपः | ,, |
| ग्रन्थिलक्षणं व्युत्पत्तिश्च | ८७८ | कुनखे अभयाप्रयोगः | ८९६ |
| मेदोग्रन्थौ अरिमेदादिभस्मलेपः | ,, | कुनखे कुष्ठादिप्रलेपप्रयोगः | ,, |
| मेदोवृद्धौ गुडूच्यादिः | ,, | कुनखे पुत्रजीवप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालायामुदयभास्करः | ,, | कक्षाग्रन्थौ शिग्रुप्रयोगः | ,, |
| कालस्फोटादौ पुत्रजीवप्रलेपः | ८७९ | कक्षाग्रन्थौ विषादिलेपः | ,, |
| सन्धिग्रन्थौ रक्तस्रावविधिः | ,, | स्तनविद्रधौ क्रियाक्रमः | ,, |
| कक्षग्रन्थ्यादौ पुत्रजीवप्रयोगः | ८८० | स्तनविद्रधिस्फोटने एकवीरप्रयोगः | ८९७ |
| कालस्फोटै गुञ्जापत्रादिचूर्णम् | ,, | स्तनविद्रधिरोपणे यष्ट्यादिचूर्णम् | ,, |
| कालस्फोटे विष्णुक्रान्तादिप्रलेपः | ,, | स्तनविद्रधिरोपणे दारुवर्त्तिः | ,, |
| ग्रन्थ्यादौ पुनर्नवादिप्रलेपः | ,, | लिङ्गरोग-चिकित्सा | ८९८ |
| अर्बुदभेदः | ८८१ | बोलप्रयोगः | ,, |
| अर्बुदहररसः | ,, | लिङ्गपाके उडुम्बरादिक्षालनम् | ,, |
| सामान्योपायाः | ,, | लिङ्गपाके जीरकप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालापचीलक्षणम् | ८८२ | लिङ्गपाके महाशङ्खप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालायां सुरवारुण्यादियोगः | ८८३ | लिङ्गपाके घोण्टादिलेपः | ,, |
| गण्डमालायामर्कक्षीरादिलेपः | ,, | लिङ्गपाके गन्धप्रयोगः | ८९९ |
| अपच्यां गिरिकर्णिकाप्रयोगः | ८८४ | लिङ्गपाके निम्बादिचूर्णम् | ,, |
| गण्डमालायां छुछून्दरी तैलम् | ,, | लिङ्गव्रणरोपणे सैन्धवप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालायां सहदेवीप्रयोगः | ,, | लिङ्गवगादौ शिग्रुप्रयोगः | ,, |
| अपच्यादौ गुञ्जादिलेपः | ,, |
४
पृष्ठ 52स्थायी लिंक
[ ३४ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| लिङ्गादिग्रन्थौ कुष्ठादिलेपः | ८९९ | भस्मकलक्षणम् | ९०७ |
| गुह्यादिगतपीटिकायामश्वत्थादिप्रलेपः | ९०० | श्लीपदस्य सम्प्राप्तिलक्षणे | ,, |
| लिङ्गादिपिटिकायां वाकुचीचित्रकप्रयोगः | ,, | श्लीपदहररसः | ,, |
| लिङ्गादिपिटिकायां सर्पाक्षीप्रयोगः | ,, | श्लीपदहरलेपः | ९०८ |
| उपदंशहरो धूपः | ,, | वल्मीकेपित्तलभस्मप्रयोगः | ,, |
| कण्ड्वादौ काञ्चनीप्रयोगः | ९०१ | स्थौल्ये विडङ्गादिचूर्णम् | ९१० |
| पामायां शाखोटकक्वाथः | ९०२ | स्थौल्ये त्रिफलादिपत्रादिकषायौ | ,, |
| पादकण्डूहरो योगः | ,, | विपरीतरतिजन्यव्याधिलक्षणम् | ,, |
| पाददाहे तिलादिचूर्णम् | ,, | विपरीतरतिजन्याधिप्रतीकारः | ९११ |
| पादकण्डूहरं प्रयोगान्तरम् | ,, | उपदंशादिप्रतीकारः | ,, |
| पादस्फुटने पथ्यामर्दनम् | ,, | सर्वरक्तविकारे उपायः | ९१२ |
| कदरे यवचिञ्चादिकषायः | ९०३ | अस्थिभग्ने लाक्षादिप्रलेपः | ,, |
| विपादिकायां गुड़ादिप्रलेपः | ,, | स्नायुके अस्पर्शारिप्रयोगोपदेशः | ,, |
| विपादिकायां मदनादिप्रलेपः | ,, | योनिव्यापन्निदानम् | ,, |
| विपादिकायां मदनादिप्रलेपः | ,, | योनिव्यापत्सु पिष्टीयोगः | ,, |
| कण्ड्वादौ रसादिप्रलेपः | ,, | योनिशूले निम्बादिगोलकम् | ९१३ |
| स्वरभङ्गे धात्रीफलस्वरसप्रयोगः | ९०४ | योनिरोगे सोमराज्यादिप्रलेपः | ,, |
| स्वरभङ्गे देवदार्वादिचूर्णम् | ,, | योनिकृमिशूले रसोनादिप्रलेपः | ,, |
| गलदाहे सैन्धवादि चूर्णम् | ९०५ | मञ्जिष्ठादिघृतम् | ,, |
| गलदाहे करञ्जमज्जापथ्याप्रयोगः | ,, | रजोनाशे त्रियोनिरसप्रयोगविधिः | ९१४ |
| स्तनवर्द्धने स्नेहनस्यम् | ,, | पुष्परोधहरयोगत्रयम् | ,, |
| स्तनव्रणे कुरूबकतैलम् | ९०६ | पुष्परोधरक्तगुल्महरयोगद्वयम् | ९१५ |
| स्तनविद्रधौ शुल्वप्रयोग | ,, | पुष्परोधे चणकप्रयोगः | ,, |
| स्नायुके कुम्भीप्रयोगः | ९०७ | पुष्परोधे गुढव्योषादिचूर्णम | ,, |
| गर्भाजनने धुस्तूरप्रयोगः | ९१६ | ||
| गर्भाजनने सैन्धवप्रयोगः | ,, | ||
| गर्भस्रावणे चूर्णप्रयोगः | ,, |
पृष्ठ 53स्थायी लिंक
[ ३५ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| गर्भस्रावे एरण्डप्रयोगः | ९१६ | तार्क्ष्यसूतः | ९२४ |
| गर्भस्रावे चित्रकप्रयोगः | ,, | विषहररसः | ,, |
| अतिरक्तस्रावेशरपुङ्खाप्रयोगः | ,, | षड्विंशोऽध्यायः । | |
| अतिरक्तस्रावे अर्कमूर्त्तिरसप्रयोगविधिः | ,, | जरारोग-चिकित्सा | ९२५ |
| योनिशूलहरयोगद्वयम् | ९१८ | रसायनगुणाः | ,, |
| रजोदोषे व्योषादितैलम् | ,, | जरायानिदानम् | ,, |
| पुष्यानुगं चूर्णम् | ,, | वार्धक्यहररसायनम् | ,, |
| विविधविषनिर्देशः | ९१९ | उदयादित्यरसः | ९२६ |
| विष-चिकित्सा | ,, | सर्वरोगहररसायनम् | ९२७ |
| मेघनादप्रयोगः | ,, | मासिकरसायनम् | ,, |
| सूतशतावरीयोगः | ,, | षाण्मासिकरसायनम् | ९२८ |
| सूतसोमराजीयोगः | ९२० | पाक्षिकरसायनम् | ९२९ |
| अभ्रकादिप्रलेपः | ,, | हेमादिरसायनम् | ,, |
| लूताविषेसूतभस्मप्रयोगः | ,, | पिप्पल्यादिरसायनम् | ,, |
| महासर्पविषे नागदमनप्रयोगः | ९२१ | अष्टमासिकरसायनम् | ९३० |
| पञ्चाङ्गशिरीषप्रयोगः | ,, | त्रिवार्षिकरसायनम् | ९३१ |
| अश्वगन्धावन्ध्याप्रयोगौ | ,, | षष्ठ्यधिकत्रिशतवर्षायुष्कर-रसायनम् | ९३२ |
| वृश्चिकविषेव्योषादितैलम् | ,, | सहस्रवर्षायुष्कररसायनम् | ,, |
| मृतसञ्जीवनम् | ,, | त्रिफलारसायनम् | ९३३ |
| आखुविषेशिरीषप्रयोगः | ९२२ | द्वितीयत्रिफलारसायनम् | ,, |
| सर्पविषे देवदार्यादियोगः | ,, | तृतीयत्रिफलारसायनम् | ९३४ |
| सर्पविषे टङ्कणप्रयोगः | ,, | षडङ्गरसायनम् | ,, |
| वृश्चिकविषे मनोहादिगुलिका | ९२३ | वार्षिकरसायनम् | ,, |
| वृश्चिकविषे पलाशबीजगुलिका | ,, | कुष्ठादिहररसायनम् | ९३५ |
| गरविषे कनकादिवटी | ,, | ज्योतिष्मतीतैलरसायनम् | ,, |
| सविषान्ने वृक्षामादियोगः | ,, | सर्वरोगान्तकरसायनम् | ९३६ |
पृष्ठ 54स्थायी लिंक
[ ३६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| कान्तरसायनम् | ९३६ | उमापतिरसः | ९५९ |
| अन्यत् त्रिफलारसायनम् | ९३७ | महाकनकसुन्दररसः | ९६० |
| द्वितीयकान्तरसायनम् | ९३८ | अमृतार्णवरसः | ९६१ |
| तृतीयकान्तरसायनम् | ” | मदनसञ्जीवनरसः | ९६४ |
| कान्ताभ्रकरसायनम् | ९३९ | पुष्पधन्वारसः | ९६५ |
| पाठादिघृतम् | ९४० | रसेन्द्रचूडामणिः | ९६६ |
| ताप्यादिवटकः | ” | पूर्णचन्द्ररसः | ९६८ |
| कमलाविलासरसः | ९४१ | महाकल्कः | ” |
| लक्ष्मीविलासरसः | ९४२ | मदनमोदकः | ९७२ |
| सौश्रुतनारिकेलप्रयोगः | ९४३ | कामेश्वरमोदकः | ९७३ |
| सप्तविंशोऽध्यायः । | वाजीकरणे सामान्योपायाः | ९७४ | |
| वाजीकरणम् | ९४५ | मधुकप्रयोगः | ” |
| वाजीकरणगुणाः | ” | शृङ्गीप्रयोगः | ९७५ |
| वाजीकरणस्य निरुक्तिः | ” | स्वयङ्गुप्तादिचूर्णंम् | ” |
| शुक्रक्षयस्य निदानम् | ” | तिलप्रयोगः | ” |
| वाजीकरणयोगादेशे प्रतिज्ञा | ” | सिन्दूररसः | ” |
| वाजीकरणप्रयोगे पूर्वकृत्यम् | ९४६ | कार्य्यहरयोगः | ९७६ |
| कामकलाख्यरसः | ” | कार्य्यहरयोगत्रयम् | ” |
| कामदेवरसः | ९४७ | लिङ्गलेपाः, द्रावणश्च | ९७७ |
| मदनसुन्दररसः | ९४८ | द्रावणे सूतप्रयोगः | ” |
| पूर्णचन्द्ररसः | ९४९ | सिन्दूरमधुलेपः | ” |
| मदनसुन्दररसः | ” | स्तम्भने कुकवाकुप्रयोगः | ” |
| कुसुमायुधः | ९५१ | कर्पूरादिप्रलेपः | ९७८ |
| सूतेन्द्ररसः | ९५३ | पुण्डरीकप्रयोगः | ” |
| मदनकामदेवरसः | ९५४ | मदनजीवनः | ” |
| कामधेनुरसः | ९५६ | अष्टविंशोऽध्यायः । | |
| महाभ्रसत्त्वम् | ९५८ | लोहकल्पः | ” |
पृष्ठ 55स्थायी लिंक
[ ३७ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| रसस्य प्राधान्यकीर्तनम् | ९७९ | प्रथमद्वितीयलोहकल्पौ | ९९६ |
| रसभेदाः | ,, | तृतीयलौहकल्पः | ,, |
| पानीयकषायविधिः | ,, | चतुर्थोलौहकल्पः | ९९७ |
| स्वर्णरौप्यशोधनम् | ,, | पञ्चमो लौहकल्पः | ,, |
| ताम्रशोधनम् | ,, | षष्ठलौहकल्पः | ,, |
| वङ्गनागयोः शोधनम् | ९८० | शूले सप्तमलौहकल्पः | ९९८ |
| कान्तलौहस्य लक्षणम् | ,, | जीर्णज्वरादौ अष्टमोलौहकल्पः | ,, |
| कान्तलौहस्य शोधनम् | ,, | क्षयादौनवमो लौहकल्पः | ९९९ |
| धातूनां सामान्यमारणम् | ९८१ | विविधरोगे दशमोलौहकल्पः | ,, |
| स्वर्णमारणम् | ,, | यक्ष्मादौ एकादशोलौहकल्पः | ,, |
| रौप्यताम्रमारणम् | ,, | गरादौ द्वादशत्रयोदशलौहकल्पौ | १००० |
| वङ्गसीसकमारणम् | ८२९ | अम्लपित्तादौ चतुर्दशोलौहकल्पः | ,, |
| सीसकस्यमारणान्तरम् | ,, | ग्रहण्यादौ पञ्चदशो लौहकल्पः | ,, |
| लौहमारणम् | ९८३ | सर्वरोगेषु षोडशो लौहकल्पः | १००१ |
| असम्यङ्मारितलौहस्यलक्षणम् | ,, | कुष्ठे सप्तदशो लौहकल्पः | १००२ |
| निरुत्थलौहस्य लक्षणम् | ,, | मेदः प्रभृतिरोगेषु अष्टादशोलौहकल्पः | ,, |
| निरुत्थलौहस्य परीक्षा | ९८४ | कुष्ठे एकोनविंशो लौहकल्पः | ,, |
| अनिरुत्थलौहस्य मारणम् | ,, | सर्वरोगेषु विशतितमो लौहकल्पः | ,, |
| मृत्युहारी रसः | ,, | नेत्ररोगे कान्तनागाख्येकविंशलोहकल्पः | ,, |
| लोहकल्पः | ९८६ | रसायने द्वाविंश लौहकल्पः | १००४ |
| लोहमारणप्रकारः | ९८७ | अरिष्टलक्षणे त्रयोविंश लौहकल्पः | ,, |
| लोहकल्पः | ९८८ | जरादौ चतुर्विंश लौहकल्पः | ,, |
| लोहकल्पे दन्त्यादिगणः | ९९४ | पञ्चविंशादिलौहकल्पचतुष्टयम् | ,, |
| ताम्रद्रुतिसंज्ञको लोहकल्पः | ,, | रसायने षड्विंश लौहकल्पः | १००५ |
| क्षयादौ खण्डखाद्याख्यो लोहकल्पः | ९९५ | मृतलौहानां रसस्वकथनम् | ,, |
| धातुभस्मनां पृथक्पृथक् तत्तद्रोगेषु प्रयोगः | ९९६ |
पृष्ठ 56स्थायी लिंक
[ ३८ ]
एकोनत्रिंशोऽध्यायः ।
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| विषकल्पः | १००६ | जीर्णज्वरे विषकल्पः | १०१६ |
| विषोत्पत्तिस्तद्भेदाश्च | ,, | जीर्णज्वरादौ विषकल्पः | ,, |
| स्थावरविषाणां जातिभेदाः | ,, | विषमज्वरे विषकल्पः | ,, |
| कन्दविषाणां नामानि | १००८ | रक्तपित्ते विषकल्पः | ,, |
| कर्कटादिकन्दविषाणां लक्षणम् | ,, | श्वासकासे विषकल्पः | ,, |
| श्वेतादिवर्णभेदेन विषाणां जातिभेदः | ,, | श्वासहिक्कयोर्विषकल्पः | १०१७ |
| वर्णभेदेन विषाणां क्रियाभेदः | १००९ | छर्द्यां विषकल्पः | ,, |
| विषामृतयोः तुल्ययोनित्वनिर्देशः | ,, | क्षये विषकल्पः | ,, |
| रसायनार्थं विषप्रयोगे विधिः | ,, | ग्रहण्यां विषकल्पः | ,, |
| विषप्रयोगार्हपुरुषकालयोर्निर्देशः | १०१० | मूत्रकृच्छ्रे विषकल्पः | १०१८ |
| विषे निषिद्धद्रव्याणि | ,, | उदावर्त्ताश्मर्योः विषकल्पः | ,, |
| अवस्थाविशेषे विषस्यापकारत्वनिर्देशः | ,, | अश्मर्यां विषकल्पः | ,, |
| विषविद्रावणघृतम् | १०११ | गुल्मे विषकल्पः | ,, |
| चित्रारितैलम् | ,, | शूले विषकल्पः | ,, |
| सूर्यप्रभावर्त्तिः | १०१२ | गुल्मप्लीह्नोः विषकल्पः | ,, |
| विषादिगुटिका | १०१३ | प्लीह्नि विषकल्पः | १०१९ |
| जयागुटी | ,, | कुष्ठे विषकल्पः | ,, |
| द्वितीया जयागुटी | ,, | अन्यो विषकल्पः | ,, |
| तृतीया जयागुटी | १०१४ | कुष्ठघ्नो लेपः | ,, |
| विषस्य मात्रानिर्देशः | ,, | विचर्चिकादौ विषकल्पः | ,, |
| प्रयोगकालभेदेन विषस्यक्रियाविशेषः | ,, | विचर्चिकादौ विषकल्पः | १०२० |
| विषशोधनप्रयोगः | १०१५ | कुष्ठे विषकल्पः | ,, |
| नवज्वरे विषकल्पः | ,, | विषतैलम् | ,, |
| कुष्ठहरतैलम् | १०२१ | ||
| कुष्ठादौ चन्दनादितैलम् | ,, | ||
| श्वित्रादौ विषकल्पः | १०२२ | ||
| अन्योयोगः | ,, | ||
| वाते विषकल्पः | १०२३ |
पृष्ठ 57स्थायी लिंक
[ ३६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| अग्निदाहे विषकल्पः | १०२३ | अपचीघ्नतैलाख्य विषकल्पः | १०२९ |
| वन्ध्यायां विषकल्पः | ,, | अपच्यादौ विषकल्पः | ,, |
| मूढगर्भे विषकल्पः | १०२४ | दुःसाध्यरोगे विषकल्पः | १०३० |
| बुद्धिवर्द्धने विषकल्पः | ,, | रसायने विषकल्पः | ,, |
| तिमिरे विषकल्पः | ,, | जयागुटिकाख्यो विषकल्पः | १०३१ |
| तिमिरे द्वितीयो विषकल्पः | ,, | तत्तद्रोगेषु विषकल्पः | ,, |
| तिमिरे तृतीयो विषकल्पः | ,, | रसायने विषकल्पः | १०३३ |
| काचे विषकल्पः | १०२५ | वाजीकरणे विषकल्पः | ,, |
| द्वितीयो विषकल्पः | ,, | विषहरो योगः | १०३४ |
| तृतीयो विषकल्पः | ,, | आखुविषे विषकल्पः | ,, |
| शुक्रार्मजिद्विषकल्पः | ,, | सर्वविषे विषकल्पः | ,, |
| शुक्लादौ विषकल्पः | ,, | संज्ञासञ्जनने विषकल्पः | ,, |
| पिल्ले विषकल्पः | १०२६ | विषदाहे विषकल्पः | १०३५ |
| नक्तान्ध्ये विषकल्पः | ,, | मात्राऽमात्राभेदेन विषामृतयोर्गुणागुणौ | ,, |
| नक्तान्ध्ये अन्यविषकल्पः | ,, | सहसाविषसेवने अष्टौवेगाः | ,, |
| कर्णशूले विषकल्पः | १०२७ | विषसेवने संशोधनविधिः | ,, |
| शिरःशूले विषकल्पः | ,, | विषघ्नगणः | १०३६ |
| शिरःशूले द्वितीयो विषकल्पः | ,, | गव्यघृतस्य विषघ्नत्वोक्तिः | ,, |
| पूतिनस्ये विषकल्पः | ,, | विषस्य प्रयोगविधिः | ,, |
| मुखरोगे विषकल्पः | ,, | विषसेविनः पथ्यापथ्यविधिः | १०३७ |
| मुखरोगेऽन्यो विषकल्पः | ,, | प्रयोज्यविषाणि | ,, |
| पलितादौ विषकल्पः | १०२८ | तीक्ष्णविषातियुक्तविषयोश्चिकित्सा | १०३८ |
| खलतौ विषकल्पः | ,, | विषेमन्त्रादिक्रियावैफल्ये प्रतीकारः | ,, |
| दिग्धाहते विषकल्पः | ,, | सर्पदष्टे विषकल्पः | ,, |
| दुष्टव्रणे विषकल्पः | ,, | ||
| अपच्यां कृतमालादिघृताख्यो विषकल्पः | १०२९ |
पृष्ठ 58स्थायी लिंक
[ ४० ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| सर्पविषेमूलविषस्य मात्रा | १०३९ | अतिसारे विसूच्याञ्च | १०५० |
| कीटविषे वृश्चिकविषे च मूलविषस्य मात्राः | ,, | अजीर्णे | १०५१ |
| लूताविषे विषकल्पः | ,, | प्रवाहिकायाम् | ,, |
| जयावटिकाख्यो विषकल्पः | ,, | मूत्रकृच्छ्रे | ,, |
| विषसेवनस्य फलम् | १०४० | मेहेषु | ,, |
| त्रिंशोऽध्यायः। | प्लीहादौ | १०५२ | |
| रसकल्पः | ,, | पक्तिशूले | ,, |
| वडवानलोविडः | ,, | आमशूले | ,, |
| रसमारणम् | १०४१ | उदरे | ,, |
| रसमारणे प्रकारान्तरम् | ,, | कामलायाम् | ,, |
| सप्तप्रकारेण प्रकारान्तरम् | १०४२-१०४३ | पाण्ड्वादौ | १०५३ |
| पारदजारणम् | १०४३ | शोथे | ,, |
| रसजारणे निषिद्धद्रव्याणि | १०४५ | कुष्ठे | ,, |
| क्षयादौ रसकल्पः | ,, | कुष्ठे रसकल्पः | १०५४ |
| वज्रपञ्जररसः | १०४६ | किलासे रसकल्पः | ,, |
| पञ्चामृतरसः | १०४७ | श्वित्रे रसकल्पः | ,, |
| मृतसञ्जीवनी वटी | ,, | कृमौ रसकल्पः | १०५५ |
| महानीलतैलम् | १०४८ | वातरोगे रसकल्पः | ,, |
| ज्वरे रसकल्पः | १०४९ | गृध्रस्यां रसकल्पः | ,, |
| त्रिदोषज्वरे | ,, | वातरक्ते रसकल्पः | ,, |
| रक्तपित्ते | ,, | स्थौल्ये रसकल्पः | ,, |
| कासे | ,, | कार्श्ये रसकल्पः | ,, |
| क्षये | १०५० | अपस्मारादौ रसकल्पः | १०५६ |
| हिक्कायाम् | ,, | अपस्मारादौ अन्ययोगः | ,, |
| छर्दिदाहयोः | ,, | पक्ष्मशाते रसकल्पः | ,, |
| अर्शसि | ,, | नेत्ररोगे रसकल्पः | ,, |
| तिमिरे | १०५७ |
पृष्ठ 59स्थायी लिंक
[ ४१ ]
| विषया: | पृष्ठाङ्का: | विषया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| जाड्ये | ” | निषिद्धद्रव्यव्यवहारजदोषे प्रतीकार: | १०६४ |
| व्रणे | ” | नागवज्रयुक्तरससेवनेप्रतीकार: | ” |
| ग्रन्थौ मसूरिकायाञ्च | ” | ग्रन्थस्योपसंहार: | १०६५ |
| सिध्मादौ | ” | औषधीनां गुणदोषकरणे कारणम् | ” |
| अस्थिस्रावे | १०५८ | औषधसेवनविधि: | १०६६ |
| विषे | ” | आचाररसायनम् | ” |
| विषे प्रयोगान्तरम् | १०५९ | आयुर्वेदोपदेशस्यावश्यपालनीयोक्ति: | १०६७ |
| सर्पविषे | ” | कुवैद्यवर्जनोपदेश: | ” |
| सर्पविषे पिशाचाद्यञ्जनम् | ” | शास्त्रज्ञवैद्यस्य साफल्योक्ति: | १०६८ |
| उन्दुरुविषे | ” | चिकित्साया: सर्वत्रसाफल्यतोक्ति: | ” |
| वृश्चिकविषे | १०६० | चिकित्साकर्मणि प्रमादेदोषा: | ” |
| विषदिग्धव्रणे | ” | चिकित्साकर्तव्यावधि: | १०६९ |
| रसायने रसकल्प: | ” | वैद्यातुरयोरन्योन्यकर्तव्य: | ” |
| अन्योरसकल्प: | ” | वैद्यस्य सर्वत्रावश्यकता | ” |
| पञ्चप्रकारेणकल्पान्तरम् | १०६०-१०६२ | पुरावृत्तद्वारा वैद्यस्य सर्वत्र सर्वपूज्यत्वप्रतिपादनम् | ” |
| बाजीकरणे मदनवर्धनाख्यो रसकल्प: | ” | ग्रन्थकर्तुर्विज्ञप्ति: | १०७१ |
| वाजीकरणे | ” | ||
| रसप्रयोगे उपचारविधि: | १०६३ | ||
| रससेवनेऽपथ्यानि | ” | ||
| निषिद्धव्यवहारे दोष: | १०६४ |
पृष्ठ 60स्थायी लिंक
॥ श्रीः ॥
विमर्शानुक्रमणिका-
| विषया: | पृष्ठाङ्का: | विषया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| जारणलक्षणम् | ६ | रसकर्पूरकीप्राचीननिर्माणविधि | २९ |
| ग्रसनप्रकार: | ७ | रसकर्पूरकीनव्यनिर्माणविधि | ३० |
| मूर्च्छनाप्रकार: | ८ | प्राकृतिकपारद | ३१ |
| बन्धनप्रकार: | ” | पारदरजतमिश्रक | ” |
| भस्मकरणप्रकार: | ” | टेट्राहाईड्राइट | ” |
| रसायनलक्षणम् | ९ | परीक्षा | ” |
| गौतमोक्तअष्टगुण | ११ | पारदप्राप्ति के कुछ गौण खनिज | ” |
| ब्रह्मज्ञानोपाय | १२ | लिविङ्ग्स्टोनाईट | ” |
| सदाचारनिर्देश | ” | बासैनाईट | ३२ |
| दोषगणना | १६ | ग्वाडलकाजाराईट | ” |
| रसायनलक्षणम् | ” | टर्लिंग्ग्वाईट | ३३ |
| अष्टादशसंस्कारा: | ” | इग्लेस्टोनाईट | ” |
| नागादिअष्टदोष | १८ | क्लेनाइट | ” |
| पर्पटादि सप्तकञ्चुकदोष | ” | मोजेसाइट | ” |
| रसरक्षामन्त्र: | ” | मोन्ट्रोयडाईट | ” |
| ध्यानप्रकार: | ” | रिमेनाइट | ” |
| पारदीयविमर्श: | २० | ओनोफ्राइट | ” |
| पारदकी उपस्थिति | २१ | कोलोरेडोआईट | ” |
| पारदकोसर्वप्रथमप्राप्ति | २३ | लेहरबेकाइट | ३४ |
| पारदनिकालनेयोग्य खनिज | २७ | आयौडीराइट | ” |
| हिङ्गुल: | ” | पारदीयखनिजप्राप्तिकेस्थान | ३५ |
| चर्मार: | २८ | वृटिशबोर्नियों | ” |
| हीरकद्युति: | ” | भारतवर्ष | ” |
पृष्ठ 61स्थायी लिंक
[ ४३ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| अफ्रीका | ३५ | ट्युनिस | ४१ |
| उत्तरीय अमेरिका | ,, | नार्थअमेरिका | ,, |
| आस्ट्रेलिया | ,, | होण्डुरास | ,, |
| पापुआ | ३६ | मेक्सको | ,, |
| न्यूजीलेण्ड | ,, | यूनाईटेडस्टेट्स | ,, |
| अल्वेनिया | ,, | अलस्का | ४२ |
| जेकोस्लोविया | ,, | एटिजाना | ,, |
| फ्रान्स और कार्सिका | ,, | केलिफोर्निया | ४३ |
| जर्मनी | ,, | कार्नकोष्टी | ,, |
| हङ्गरी | ३७ | सेण्टाक्लेरा कौण्टि | ४५ |
| इटली | ,, | सोलेनो | ४६ |
| स्टील | ,, | सोनोमा | ४७ |
| लीवर ओर | ,, | सोक्रेट की खान | ,, |
| कोरेलाइन | ,, | ट्रिनिटी | ,, |
| पोर्तुगाल | ३८ | वेली | ,, |
| रस्सीया | ,, | इडाहो | ,, |
| स्केण्डिनेविया | ,, | निवाडा | ,, |
| स्पेन | ,, | ओरेगन | ,, |
| युगोस्लेविया | ३९ | लेन | ४८ |
| एशिया माइनर | ,, | टेक्सास | ,, |
| चीन | ,, | उटाह | ४९ |
| जापान | ४० | वाशिङ्गटन | ,, |
| न्यूकेलिडोनिया | ,, | दक्षिण अमेरिका | ५० |
| पर्सिया | ,, | चिली | ,, |
| अफ्रीका | ,, | कोलम्बिया | ,, |
| एलजीरिया | ,, | डवगायना | ,, |
| इटालियन सोमेलिलेण्ड | ,, | यूकोडर | ,, |
पृष्ठ 62स्थायी लिंक
[ ४४ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| पेरू | ५० | यौगिकगन्धक | १०२ |
| जुनिन | ५१ | गन्धकनिम्नरूप में मिलता है | १०५ |
| हुवानुको | ” | गन्धक और गन्धकीय खनिज | |
| वीनेजुए | ” | प्राप्ति के स्थान | ” |
| पारद के दोष | ५२ | अफगानिस्तान | ” |
| पारद के सप्तकञ्चुक | ५३ | आसाम | ” |
| पारद के भेद | ५५ | बलुचिस्तान | ” |
| शुद्ध पारद के लक्षण | ५६ | कच्छी | ” |
| अशुद्ध पारद के लक्षण | ५७ | लास बेला | १०६ |
| अभ्रकीयविमर्शः | ५९ | मेकरन तट | ” |
| उत्पत्ति | ” | सिबि | ” |
| वैक्रान्तीयविमर्शः | ६९ | बिहार और उड़ीसा | ” |
| उपलब्धिः | ७० | बम्बई | १०७ |
| मामाक्षिकीयविमर्शः | ७४ | बर्मा | ” |
| स्वर्णमाक्षिक | ” | दक्षिण हैदराबाद | ” |
| रौप्यमाक्षिक | ” | काश्मीर | ” |
| कांस्यमाक्षिक | ” | गोदावरी | १०८ |
| विमलः | ७७ | ट्रावनकोर | ” |
| उपलब्धिः | ” | शिरानी | ” |
| शिलाजतुविमर्शः | ८० | पञ्जाब | ” |
| चपलविमर्शः | ८७ | संयुक्तप्रान्त | १०९ |
| उपस्थिति | ” | कुमायूँ | ” |
| गुण | ८८ | गैरिकविमर्शः | ११० |
| विस्मथ का उपयोग | ” | कासीसविमर्शः | ” |
| रसकविमर्शः | ८९ | हरतालविमर्शः | ११५ |
| गन्धकीयविमर्शः | १०१ | अञ्जनविमर्शः | १२१ |
| उपलब्धि | १०२ | सौवीराञ्जन | ” |
पृष्ठ 63स्थायी लिंक
[ ४५ ]
| विषया: | पृष्ठाङ्का: | विषया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| रसाञ्जन | १२१ | कृत्रिमकांस्यनिर्माणविधि: | २८२ |
| स्रोतोऽञ्जन | १२२ | शृङ्गिकविषलक्षणम् | २८५ |
| पुष्पाञ्जन | ,, | कालकूटविषपरिचय: | ,, |
| नीलाञ्जन | ,, | वत्सनाभलक्षणम् | ,, |
| कङ्कुष्ठविमर्श: | १२४ | विषवर्गीकरणम् | २८६ |
| गौरीपाषाणविमर्श: | १२७ | उपविषाणि | ,, |
| आर्सेनिक की उपलब्धि | १२८ | रक्तवर्गविमर्श: | २८७ |
| आर्सेनिक की पहचान | ,, | पारदग्रहणपरिमाण | २९५ |
| आर्सेनिक के आक्साइड | ,, | स्वेदनप्रकार: | २९६ |
| आर्सेनिक के सल्फाइड | ,, | मर्दनलक्षणम् | २९७ |
| नवसारविमर्श: | १२९ | मूर्च्छन लक्षणम् | ,, |
| नियामकगण | २३८ | मतान्तरेण पारदस्य मूर्च्छनम् | २९८ |
| नियमनसंस्कार: | ,, | उत्थापनस्वरूपम् | २९९ |
| कपोतलक्षणम् | २५० | बोधनस्य प्रथमप्रकार: | ३०४ |
| पञ्चक्षार | २५१ | द्वितीयप्रकार: | ,, |
| अष्टमूत्र | ,, | तृतीय: प्रकार: | ,, |
| मूषोपयोगिमृत्तिकास्वरूपम् | २७४ | नियामनलक्षणम् | ,, |
| वङ्कनाललक्षणम् | ,, | क्षारद्वयं क्षारत्रयञ्च | ३०५ |
| अपुनर्भवलक्षणम् | २७५ | दीपनसंस्कार: | ,, |
| वारितरस्यलक्षणम् | २७६ | रसतरङ्गिण्युक्तप्रकार: | ३०६ |
| रेखापूर्णतायाः स्वरूपम् | ,, | नियामकगण: | ,, |
| गोष्ठस्वरूपम् | २७९ | दीपनसंस्कारकरणविधि: | ,, |
| गर्वरपुटलक्षणम् | ,, | दीपनस्वरूपम् | ३०७ |
| भाण्डपुटलक्षणम् | ,, | दीपनस्य प्रथमप्रकार: | ,, |
| लावकपुटविमर्श: | २८० | द्वितीय: प्रकार: | ,, |
| लावकपुटलक्षणम् | २८१ | तृतीय: प्रकार: | ,, |
| कृत्रिमपित्तलनिर्माणविधि: | २८२ | चतुर्थ: प्रकार: | ,, |
पृष्ठ 64स्थायी लिंक
[ ४६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| क्षेत्रीकरणस्वरूपम् | ३११ | विषतिन्दुकबीजशोधनविधिः | ३४३ |
| क्षेत्रीकरणप्रक्रिया | ,, | प्रकारान्तरम् | ,, |
| खोटबन्धस्य लक्षणम् | ३१३ | प्रकारान्तरम् | ,, |
| कज्जलीस्वरूपम् | ३१४ | विषमज्वरलक्षणम् | ३४६ |
| बाह्यद्रुतिलक्षणम् | ३१७ | चूर्णकूष्माण्डस्वरसयोर्हरताल शोधनविधिः | ३४९ |
| उपद्रवलक्षणम् | ,, | चूर्णोदकनिर्माणविधिः | ,, |
| अरिष्टलक्षणम् | ,, | तिलक्षारोदके तालशोधनविधिः | ,, |
| रसायनलक्षणम् | ,, | धुस्तूरबीजशोधनविधिः | ३५० |
| भूधरयन्त्रस्वरूपम् | ३३० | प्रकारान्तरम् | ३५१ |
| रसायनोचितरसः | ३३१ | व्योषपरिभाषा | ,, |
| रसभक्षणकालः | ,, | विषनिषेधविमर्शः | ३५४ |
| मात्राभेदः: | ,, | लवणपञ्चकम् | ,, |
| पञ्चकर्मयोग्यव्यक्तिः | ,, | कवचीयन्त्रनिर्माणविधिः | ३५५ |
| हंसोदकः | ३३२ | अग्निजारपरिचयः | ३६१ |
| सुरा | ३३३ | शृङ्गीविषलक्षणम् | ३६३ |
| आसवः | ,, | शृङ्गीविषशोधनम् | ,, |
| पित्तज्वरलक्षणम् | ३३८ | सूचिकाभरणरसनिर्माणविधिः | ,, |
| श्लेष्मज्वरलक्षणम् | ,, | कृष्णसर्पविषस्याहरणविधिः | ३६४ |
| द्वन्द्वजसन्निपातजज्वराणां लक्षणम् | ३३९ | कृष्णसर्पविषशोधनविधिः | ,, |
| वातपित्तज्वरलक्षणम् | ,, | अशुद्धलाङ्गलीसेवनेदोषाः | ३६७ |
| वातश्लेष्मज्वरलक्षणम् | ,, | लाङ्गलीशोधनविधिः | ,, |
| पित्तश्लेष्मज्वरलक्षणम् | ,, | अभिन्यासज्वरलक्षणम् | ,, |
| सन्निपातज्वरलक्षणम् | ,, | ससारादिश्लोकव्याख्या | ३६८ |
| जयपालशोधनविधिः | ३४२ | कुक्कुटपुटलक्षणम् | ३६९ |
| प्रकारान्तरम् | ,, | पञ्चपित्तम् | ३७३ |
| प्रकारान्तरम् | ,, | ज्वरेपथ्यापथ्यव्यवस्था | ३८३ |
| स्नुहीदुग्धशोधनविधिः | ३४३ |
पृष्ठ 65स्थायी लिंक
[ ४७ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| पथ्यस्य प्रयोजनम् | ३८२ | त्रिकत्रयस्वरूपम् | ४०३ |
| सर्वविधज्वरेषु पथ्यानि | ” | श्वासेपथ्यापथ्यम् | ४०५ |
| मध्यमज्वरेहितानि | ३८३ | अपथ्यम् | ” |
| पुराणज्वरे हितानि | ” | अतिव्यायामनिषेधः | ४०६ |
| आगन्तुकज्वरे हितानि | ” | व्यायामानर्हाः | ” |
| विषमज्वरे हितानि | ३८४ | व्यायामार्हा | ” |
| अतिलङ्घनं वर्ज्यम् | ” | व्यायामसमयः | ” |
| सम्यग्लङ्घितलक्षणानि | ” | बलाबललक्षणम् | ” |
| उष्णजललक्षणम् | ” | अधारणीया वेगाः | ” |
| रक्तपित्तविमर्शः | ३८५ | हिक्कास्वरूपं निरुक्तिश्च | ४०७ |
| रक्तपित्तव्याख्या | ” | तासां पूर्वरूपम् | ” |
| रक्तपित्तनिदान और गति | ” | तासां नामानि | ” |
| द्राक्षादिगणौषधियां | ” | धान्याम्लस्वरूपम् | ४०८ |
| लौहारिवर्गः | ३८९ | विश्वादिश्लोकव्याख्या | ४१० |
| रक्तरोधकौषधयः | ” | क्षीरपाकविधिः | ४११ |
| रक्तपित्ते साधारणपथ्यः | ३९० | हिक्कायां पथ्यापथ्यम् | ४१२ |
| कासनिदानम् | ३९१ | त्रिकटुस्वरूपम् | ४१६ |
| पैत्तिककासनिदानम् | ३९४ | त्रिफलास्वरूपम् | ” |
| क्षयकासनिदानलक्षणादिकम् | ” | आरनालस्वरूपम् | ” |
| कफजकासलक्षणम् | ३९५ | दशमूलस्वरूपम् | ” |
| कासघ्नधूमविमर्शः | ३९७ | उभयपञ्चमूलम् | ” |
| धूमसेवनविधिः | ” | स्वरभेदे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ४१७ |
| धूमकालाः | ” | अथापथ्यम् | ” |
| धूमपानवर्ज्यावस्था | ” | राजयक्ष्मनिदानम् | ४१८ |
| वातकासे पथ्यानि | ३९८ | राजयक्ष्मलक्षणम् | ” |
| कासेसाधारणपथ्यनिर्देशः | ” | राजयक्ष्मणि साधारणपथ्यम् | ४३४ |
| ऊर्ध्वश्वासलक्षणादिकम् | ३९९ | यक्ष्मीशोधनव्यवस्था | ” |
पृष्ठ 66स्थायी लिंक
[ ४८ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| वमनविधिः | ४३५ | वैद्यनाथवटीनिर्माणम् | ४७९ |
| विरेचनम् | ” | लौहप्रयोगः | ” |
| अरोचके पथ्यापथ्यव्यवस्था | ४३६ | उदावर्त्तेऽपथ्यानि | ” |
| अपथ्यानि | ” | अतीसारनिदानम् | ४८० |
| छर्द्याम्पथ्यानि | ४३८ | नवीन तथा पुराने धान्यों के ग्रहण करने का निर्देश | ” |
| अपथ्यानि | ” | अध्यशनलक्षणम् | ” |
| हृदयरोगलक्षणसम्प्राप्ती | ४३९ | अतीसारे पथ्यानि | ४८८ |
| अध्यशनलक्षणम् | ” | अतीसारेऽपथ्यानि | ” |
| हृद्रोगे पथ्यापथ्यम् | ४४१ | अतीसारे पानीयम् | ४८९ |
| तृष्णारोगेऽपथ्यम् | ४४२ | ग्रहणीरोगसम्प्राप्त्यादिवर्णनम् | ” |
| पालिकायन्त्रस्वरूपः | ४४८ | पञ्चकोलस्वरूपः | ४९९ |
| मदात्ययपथ्यापथ्यव्यवस्था | ४५० | रुदन्तीपरिचयः | ५०२ |
| अम्लवर्गः | ” | क्षारत्रयस्वरूपम् | ” |
| पित्तार्शसां लक्षणम् | ४५१ | ग्रहण्यां पथ्यापथ्यविमर्शः | ५०५ |
| वातार्शसां लक्षणम् | ४५२ | ग्रहण्यामपथ्यानि | ” |
| श्लेष्मसन्निपातार्शसां लक्षणम् | ” | अग्निमान्द्यादिषु पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५२२ |
| श्लेष्मार्शसन्निदोषजस्य च लक्षणम् | ” | अपथ्यानि | ” |
| सहजार्शसांलक्षणम् | ” | मूत्रकृच्छ्रविमर्शः | ५२३ |
| अन्धमूषापरिभाषा | ४६७ | मूत्रदोषाङ्कुरोरसः | ” |
| अर्शोरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ४७५ | अश्मरीनाशकोपायाः | ५२४ |
| अन्नेषु | ४७६ | अश्मरी की उत्पत्ति | ५२५ |
| मांसेषु | ” | अश्मरी के भेद | ” |
| शाकेषु | ” | अश्मरी का पूर्वरूप तथा लक्षण | ५२६ |
| अर्शोरोगेऽपथ्यानि | ” | मूत्रकृच्छ्रकारणानि | ५३१ |
| स्नेहपाकविधिः | ४७८ | अश्मरीरोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५३४ |
| स्नेहपाकपरीक्षा | ” |