ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः. सं देवत्रा बभूवथुः.. (९) हे अग्नि और सोम! तुम समान धन वाले एवं एक साथ आह्वान करने योग्य हो. तुम हमारी स्तुति सुनो. तुम सभी देवों से अधिक प्रसिद्ध हो. (९) अग्नीषोमावनेन वां यो वां घृतेन दाशति. तस्मै दीदयतं बृहत्.. (१०) हे अग्नि एवं सोम! जो यजमान तुम्हें घृत से युक्त हवि प्रदान करता है, उसे पर्याप्त धन दो. (१०) अग्नीषोमाविमानि नो युवं हव्या जुजोषतम्. आ यातमुप नः सचा.. (११) हे अग्नि और सोम! हमारा यह हव्य स्वीकार करो एवं इस कार्य के लिए एक साथ आओ. (११) अग्नीषोमा पिपृतमर्वतो न आ प्यायन्तामुस्रिया हव्यसूदः. अस्मे बलानि मघवत्सु धत्तं कृणुतं नो अध्वरं श्रुष्टिमन्तम्.. (१२) हे अग्नि और सोम! हमारे अश्वों का पालन करो. क्षीर आदि हव्य को उत्पन्न करने वाली हमारी गाएं बढ़ें. तुम धनयुक्त हम लोगों को बल दो एवं हमारे यज्ञ को धनसंपन्न करो. (१२) सूक्त—९४ देवता—अग्नि इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया. भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१) जिस प्रकार बढ़ई रथ का निर्माण करता है, उसी प्रकार हम पूज्य एवं सब प्राणियों को जानने वाले अग्नि के प्रति बुद्धि निर्मित यह स्तुति समर्पित करते हैं. इस अग्नि की सेवा से हमारी बुद्धि कल्याणी बनती है. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर हम हिंसा को प्राप्त न हों. (१) यस्मै त्वमायजसे स साधत्यन्वर्वा क्षेति दधते सुवीर्यम्. स तूताव नैनमश्नोत्यंहतिरग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (२) हे अग्नि! तुम जिस यजमान के निमित्त यज्ञ करते हो, वह अभीष्ट प्राप्त कर लेता है, शत्रुओं की पीड़ा से रहित होकर निवास करता है, उत्तम शक्ति धारण करता है एवं वृद्धि पाता है. उसे कभी दरिद्रता नहीं मिलती. हम तुम्हारी मित्रता को पाकर किसी के द्वारा सताए न जावें. (२) शकेम त्वा समिधं साधया धियस्त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्. ebook converter DEMO Watermarks*
भरामेध्मं कृणवामा हवींषि ते चितयन्तः पर्वणापर्वणा वयम्.
त्वमादित्याँ आ वह तान्ह्यु१ श्मस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (३) हे अग्नि! हम तुम्हें भली प्रकार ज्वलित कर सकें एवं तुम हमारे यज्ञों को पूरा करो, क्योंकि ऋत्विजों द्वारा तुम में डाला गया हव्य देवगण भक्षण करते हैं. तुम अदितिपुत्रों अर्थात् देवों को यहां ले आओ, क्योंकि हम उनकी कामना करते हैं. तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर कोई हमारी हिंसा न करे. (३) भरामेध्मं कृणवामा हवींषि ते चितयन्तः पर्वणापर्वणा वयम्. जीवातवे प्रतरं साधया धियोऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (४) हे अग्नि! हम तुम्हारे यज्ञ के लिए ईंधन एकत्र करते हैं एवं प्रति पर्व पर दर्शपौर्णमास यज्ञ करते हुए तुम्हें ज्ञान कराकर हव्य देते हैं. तुम हमारे जीवनकाल को बढ़ाने के लिए यज्ञ पूर्ण कराओ. तुम हमारे मित्र बन गए हो, अब कोई हमारी हिंसा न करे. (४) विशां गोपा अस्य चरन्ति जन्तवो द्विपच्च यदुत चतुष्पदक्तुभिः. चित्रः प्रकेत उषसो महाँ अस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (५) इसकी किरणें समस्त प्राणियों की रक्षा करती हुईं विचरण करती हैं. दो पैरों और चार पैरों वाले जंतु इसकी किरणों से युक्त हो जाते हैं. हे अग्नि, तुम विचित्र दीप्तिसंपन्न, सबका ज्ञान कराने वाले एवं उषा से भी महान् हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (५) त्वमध्वर्युस्त होतासि पूर्व्यः प्रशास्ता पोता जनुषा पुरोहितः. विश्वा विद्वाँ आर्त्विज्या धीर पुष्यस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (६) हे अग्नि! तुम यज्ञों को देवों के प्रति पहुंचाने वाले, अध्वर्यु, होता, प्रशास्ता, यज्ञ के शोधक अर्थात् पोता एवं जन्म से ही पुरोहित हो. तुम ऋत्विज् के समस्त कर्मों को जानते हो, इसलिए हमारा यज्ञ पूरा करो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (६) यो विश्वतः सुप्रतीकः सद्ङ्डसि दूरे चित्सन्तळिदिवाति रोचसे. रात्र्याश्चिदन्धो अति देव पश्यस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (७) हे अग्नि! तुम शोभन-अंग वाले होते हुए भी सबके समान हो एवं दूर रहकर भी समीप दिखाई देते हो. हे देव! तुम रात के अंधकार का नाश करके चमकते हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (७) पूर्वो देवा भवतु सुन्वतो रथोऽस्माकं शंसो अभ्यस्तु दूढ्यः. तदा जानीतोत पुष्यता वचोऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
हे देवो! सोम निचोड़ने वाले यजमान का रथ अन्य यजमानों के रथ से आगे हो. हमारा पाप हमारे शत्रुओं को बाधा पहुंचावे. तुम हमारी स्तुति पर ध्यान दो और उसके अनुकूल चलकर हमें पुष्ट करो. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर हमारी कोई हिंसा न कर सके. (८) वधैर्दुःशंसाँ अप दूढ्यो जहि दूरे वा ये अन्ति वा के चिदत्रिण. अथा यज्ञाय गृणते सुगं कृध्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (९) हे अग्नि! तुम हननसाधन आयुधों से अपवाद के पात्र एवं दुर्बुद्धि लोगों का वध करो. जो शत्रु हमारे समीप या दूर हैं, उनका नाश करो. इस प्रकार तुम अपनी स्तुति करने वाले यजमान का मार्ग शोभन बनाओ. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (९) यदयुक्तथा अरुषा रोहिता रथे वातजूता वृषभस्येव ते रवः. आदिन्वसि वनिनो धूमकेतुनाग्ने सख्ये मा रिषाम वयं तव.. (१०) हे अग्नि! तुम तेजस्वी, लाल रंग वाले एवं वायु वेग वाले दोनों घोड़ों को रथ में जोतते समय बैल के समान शब्द करते हो एवं अपने झंडे रूपी धूम से वन को घेर लेते हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१०) अध स्वनादुत बिभ्युः पतत्रिणो द्रप्सा यत्ते यवसादो व्यस्थिरन्. सुगं तत्ते तावकेभ्यो रथेभ्योऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (११) हे अग्नि! वन प्रदेश को जलाने वाला तुम्हारा शब्द सुनकर पक्षी डर जाते हैं. जब तुम्हारी ज्वालाएं वन में वर्तमान तिनकों को भक्षण करके सभी ओर फैलती हैं, तब तुम्हारे लिए एवं तुम्हारे रथ के लिए समस्त अरण्य सुगम बन जाता है. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (११) अयं मित्रस्य वरुणस्य धायसे ऽवयातां मरुतां हेळो अद्भुत:. मृळा सु नो भूत्वेषां मनः पुनरग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१२) अग्नि के स्तोता को मित्र और वरुण धारण करें. अंतरिक्ष में वर्तमान मरुतों का क्रोध महान् होता है. हे अग्नि! हमारी रक्षा करो. इन मरुतों का मन हमारे प्रति प्रसन्न हो. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१२) देवो देवानामासि मित्रो अद्भुतो वसुर्वसूनामसि चारुरध्वरे. शर्मन्त्स्याम तव सप्रथस्तमेऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१३) हे तेजस्वी अग्नि! तुम सब देवों के परम मित्र, सुंदर एवं यज्ञों की समस्त संपत्तियों के निवास हो. हम तुम्हारे अति विस्तृत यज्ञगृह में वर्तमान हों. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम ebook converter DEMO Watermarks*
किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१३) तत्ते भद्रं यत्समिद्धः स्वे दमे सोमाहुतो जरसे मृळयत्तमः. दधासि रत्नं द्रविणं च दाशुषेऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१४) हे अग्नि! जिस समय तुम अपने स्थान पर प्रज्वलित एवं सोम द्वारा आहूत होकर ऋत्विजों की स्तुति का विषय बनते हो, उस समय अत्यंत भद्र प्राप्त करते हो. तुम हमारे लिए परम सुखकारक एवं यजमान के लिए रमणीय यज्ञफल एवं धन देने वाले बनो, तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१४) यस्मै त्वं सुद्रविणो ददाशोऽनागास्त्वमदिते सर्वताता. यं भद्रेण शवसा चोदयासि प्रजावता राधसा ते स्याम.. (१५) हे शोभनधनसंपन्न एवं अखंडनीय अग्नि! समस्त यज्ञों में वर्तमान जिस यजमान को तुम पाप से रहित करके कल्याणकारी बल से युक्त करते हो, वह समृद्ध होता है. तुम्हारी स्तुति करने वाले हम पुत्र-पौत्रादि वाले धन से युक्त हों. (१५) स त्वमग्ने सौभगत्वस्य विद्वानस्माकमायुः प्र तिरेह देव. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (१६) हे अग्नि! तुम सौभाग्य को जानते हुए इस यज्ञकर्म में हमारी आयुवृद्धि करो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश हमारी उस आयु की रक्षा करें. (१६) सूक्त—९५ देवता—अग्नि द्वे विरूपे चरतः स्वर्धे अन्यान्या वत्समुप धापयेते. हरिरन्यस्यां भवति स्वधावाञ्छुक्रो अन्यस्यां ददृशे सुवर्चाः.. (१) हे दिवस और रात्रि! तुम सुंदर प्रयोजन वाले एवं परस्पर विरुद्ध रूप से युक्त होकर चलते हो. रात और दिन दोनों, दोनों के पुत्रों—अग्नि और सूर्य की रक्षा करते हैं. रात्रि के पास से सूर्य हवि रूप अन्न प्राप्त करता है एवं दूसरा दिन के पास से शोभन प्रकाश वाला दिखाई देता है. (१) दशमं त्वष्टुर्जनयन्त गर्भमतन्द्रासो युवतयो विभृत्रम्. तिग्मानीकं स्वयशसं जनेषु विरोचमानं परि षीं नयन्ति.. (२) अपने जगत्पोषण रूप कार्य में आलस्यरहित, नित्य युवा, दशों दिशाओं व मेघों में गर्भ रूप से वर्तमान वायु सब पदार्थों में वर्तमान, तीक्ष्ण तेजयुक्त एवं अतिशय यशस्वी अग्नि को उत्पन्न करती है. इसी अग्नि को सब जगह ले जाया जाता है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
त्रीणि जाना परि भूषन्त्यस्य समुद्र एकं दिव्येकमप्सु. पूर्वामनु प्र दिशं पार्थिवानामृतून्प्रशासद्वि दधावनुष्ठु.. (३) समुद्र, आकाश और अंतरिक्ष—ये अग्नि के तीन जन्मस्थान हैं. सूर्यरूप अग्नि ने ऋतुओं को विभक्त करके बताते हुए पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणियों के निमित्त पूर्व दिशा को अनुक्रम से बनाया. (३) क इमं वो निण्यमा चिकेत वत्सो मातॄर्जनयत स्वधाभिः. बह्वीनां गर्भो अपसामुपस्थान्महान्कविर्निश्नरति स्वधावान्.. (४) हे यजमानो! जल, वन आदि में गर्भरूप से स्थित अग्नि को तुम में से कौन जानता है? अर्थात् कोई नहीं. यह पुत्र होकर भी अपनी जलरूपी माताओं को हव्य द्वारा जन्म देता है. यह प्रौढ़ तेज वाला, क्रांतदर्शी एवं हवि रूप अन्न से युक्त अग्नि अनेक प्रकार के जलों को उत्पन्न करने का कारण बनकर समुद्र से सूर्य रूप में निकलता है. (४) आविष्ट्यो वर्धते चारुरासु जिह्मानासूर्ध्वः स्वयशा उपस्थे. उभे त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जायमानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोषयेते.. (५) मेघों में तिरछे रहने वाले जल की गोद में रहकर भी ऊपर की ओर जलता हुआ अग्नि शोभन दीप्ति वाला बनकर चमकता एवं बढ़ता है. त्वष्टा से उत्पन्न अग्नि से धरती और आकाश दोनों डरते हैं एवं सहनशील अग्नि के समीप आकर सेवा करते हैं. (५) उभे भद्रे जोषयेते न मेने गावो न वाश्रा उप तस्थुरैवैः. स दक्षाणां दक्षपतिर्बभूवाज्जन्ति यं दक्षिणतो हविर्भिः.. (६) रात और दिन दोनों शोभन स्त्रियों के समान अग्नि की सेवा करते एवं रंभाती हुई गायों के समान पास में आकर ठहरते हैं. आह्वानीय अग्नि के दक्षिण भाग में स्थित होकर ऋत्विज् हव्य द्वारा जिस अग्नि को तृप्त करते हैं, वह समस्त बलों का स्वामी बनता है. (६) उद्यंयमीति सवितेव बाहू उभे सिचौ यतते भीम ऋञ्जन्. उच्छुक्रमत्कमजते सिमस्मान्नवा मातृभ्यो वसना जहाति.. (७) भयंकर अग्नि सूर्य की भुजा रूपी किरणों के समान अपने तेज को विस्तृत करते एवं धरती-आकाश दोनों को अलंकृत करके उनके काम में लगाते हैं तथा समस्त पदार्थों से तेजस्वी एवं साररूप रस ग्रहण करते हैं. वे अपनी माता रूप जल से सारे संसार को ढकने वाला नवीन तेज बनाते हैं. (७) त्वेषं रूपं कृणुत उत्तरं यत्संपृञ्चानः सदने गोभिरद्भिः. कविर्बुध्नं परि मर्मृज्यते धीः सा देवताता समितिर्बभूव.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
जब अग्नि अंतरिक्ष में चलने वाले जलों से संयुक्त, तेजस्वी एवं सर्वोत्तम प्रकाश धारण करते हैं, तब क्रांतदर्शी एवं सर्वाधार अग्नि समस्त जल के मूलभूत आकाश को अपने तेज के द्वारा ढक लेते हैं. तेजस्वी अग्नि द्वारा फैलाई हुई चमक तेजसमूह बन गई थी. (८) उरु ते ज्रयः पर्येति बुध्नं विरोचमानं महिषस्य धाम. विश्वेभिरग्ने स्वयशोभिरिद्धोऽदब्धेभिः पायुभिः पाह्यस्मान्.. (९) हे महान् अग्नि! तुम्हारा सबको पराभूत करने वाला एवं चमकता हुआ तेज जल के मूल कारण आकाश को सब ओर से घेरे हुए है. तुम्हारा तेज अदृश्य एवं पालक है. तुम हमारे द्वारा प्रज्वलित होकर अपने तेजों के साथ यहां आओ. (९) धन्वन्त्स्रोतः कृणुते गातुमूर्मिं शुक्रैरूर्मिभिरभि नक्षति क्षाम्. विश्वा सनानि जठरेषु धत्तेऽन्तर्नवासु चरति प्रसूषु.. (१०) अग्नि आकाश में गमनशील जलसमूह को प्रवाह का रूप देते एवं उसी निर्मल किरणों वाले जलसमूह से धरती को भिगोते हैं. वे जठर में संपूर्ण अन्नों को धारण करते हैं, इसीलिए वर्षा के पश्चात् उत्पन्न नवीन फसलों के भीतर रहते हैं. (१०) एवा नो अग्ने समिधा वृधानो रेवत्पावक श्रवसे वि भाहि. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (११) हे शोधक अग्नि! समिधाओं के कारण प्रज्वलित होकर हमें धनयुक्त अन्न देने के लिए विशेष रूप से चमको. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश उस अन्न की पूजा करें. (११) सूक्त—९६ देवता—अग्नि स प्रत्नथा सहसा जायमानः सद्यः काव्यानि बळधत्त विश्वा. आपश्च मित्रं धिषणा च साधन्देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (१) बलपूर्वक काष्ठ घर्षण से उत्पन्न अग्नि शीघ्र ही चिरंतन के समान क्रांतदर्शियों के समस्त यज्ञकर्मों को धारण करते हैं. उस विद्युत्रूप अग्नि को वायु और जल मित्र बना लेते हैं. ऋत्विजों ने धनदाता अग्नि को धारण किया है. (१) स पूर्वया निविदा कव्यतायोरिमाः प्रजा अजनयन्मनूनाम्. विवस्वता चक्षसा द्यामपश्च देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (२) अग्नि ने आयु की पूर्वकाल कृत एवं गुणनिष्ठ स्तुति को सुनकर इस मानवी प्रजा को उत्पन्न किया है एवं आच्छादक तेज के आकाश को व्याप्त किया है. ऋत्विजों ने धनदाता ebook converter DEMO Watermarks*
अग्नि को धारण किया है. (२) तमीळत प्रथमं यज्ञसाधं विश आरीराहुतमृञ्जसानम्. ऊर्जः पुत्रं भरतं सृप्रदानुं देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (३) हे मनुष्यो! देवों में प्रमुखतया यज्ञसाधक, हव्य द्वारा आहूत, स्तोत्रों द्वारा प्रसन्न, अन्न के पुत्र, प्रजाओं के पोषक एवं दानशील स्वामी अग्नि के समीप जाकर उनकी स्तुति करो. ऋत्विजों ने धनदाता अग्नि को धारण किया है. (३) स मातरिश्वा पुरुवारपुष्टिर्विदद्गातुं तनयाय स्वर्वित्. विशां गोपा जनिता रोदस्योर्देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (४) अंतरिक्ष में वर्तमान अग्नि हमारे पुत्रों के लिए अनेक अनुष्ठान मार्ग प्राप्त करावें. वे वरणीय पुष्टि वाले, स्वर्गदाता, प्रजाओं के रक्षक, देव, धरती और आकाश के उत्पन्नकर्त्ता हैं. ऋत्विजों ने धनदाता अग्नि को धारण किया है. (४) नक्तोषासा वर्णमामेम्याने धापयेते शिशुमेकं समीची. द्यावाक्षामा रुक्मो अन्तर्वि भाति देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (५) दिन और रात बार-बार एक-दूसरे का रूप नष्ट करके मिलते हुए अग्नि रूपी एक ही बालक का पालन करते हैं. वे तेजस्वी अग्नि, धरती और आकाश के मध्य में विशेष रूप से प्रकाशित होते हैं. ऋत्विजों ने धनदाता अग्नि को धारण किया है. (५) रायो बुध्नः संगमनो वसूनां यज्ञस्य केतुर्मन्मसाधनो वेः. अमृतत्वं रक्षमाणास एनं देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (६) अपने अमृतत्व की रक्षा करने वाले देवों ने धन के मूल निवास हेतु, धनों को मिलाने वाले, स्तोताओं की अभिलाषा के पूरक तथा यज्ञ के केतुरूप धनदाता अग्नि को धारण किया था. (६) नू च पुरा च सदनं रयीणां जातस्य च जायमानस्य च क्षाम्. सतश्च गोपां भवतश्च भूरेर्देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (७) प्राचीनकाल में एवं आजकल होने वाले समस्त धनों के निवासस्थान, उत्पन्न एवं भविष्य में होने वाले कार्यसमूह के निवासभूत तथा इस समय उपस्थित एवं भविष्य में जन्म लेने वाले पदार्थों के रक्षक तथा धनदाता अग्नि को देवों ने धारण किया. (७) द्रविणोदा द्रविणसस्तुरस्य द्रविणोदाः सनरस्य प्र यंसत्. द्रविणोदा वीरवतीमिषं नो द्रविणोदा रासते दीर्घमायुः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
धन देने वाले अग्नि हमें स्थावर एवं जंगम संपत्ति का एक अंश दें. वे हमें वीर पुरुषों से युक्त अन्न एवं दीर्घ आयु दें. (८) एवा नो अग्ने समिधा वृधानो रेवत्पावक श्रवसे वि भाहि. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (९) हे पवित्र करने वाले अग्नि! समिधाओं के कारण प्रज्वलित होकर हमें धनयुक्त अन्न देने के लिए विशेष रूप से प्रकाशित बनो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश उस अन्न की पूजा करें. (९) सूक्त—९७ देवता—अग्नि अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्. अप नः शोशुचदघम्.. (१) हे अग्नि! हमारा पाप नष्ट हो. तुम हमारे धन को सब ओर से प्रकाशित करो. हमारा पाप नष्ट हो. (१) सुक्षेत्रिया सुगातुया वसूया च यजामहे. अप नः शोशुचदघम्.. (२) हे अग्नि! हम शोभन क्षेत्र, शोभन मार्ग और धन की इच्छा से हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं. हमारा पाप नष्ट हो. (२) प्र यद्भन्दिष्ठ एषां प्रास्माकासश्च सूरयः. अप नः शोशुचदघम्.. (३) हे अग्नि! हमारे स्तोता कुत्स के समान श्रेष्ठ हों. वे सभी स्तोताओं में उत्तम हैं. हमारा पाप नष्ट हो. (३) प्र यत्ते अग्ने सूरयो जायेमहि प्र ते वयम्. अप नः शोशुचदघम्.. (४) हे अग्नि! तुम्हारी स्तुति करने वाले पुत्र-पौत्रादि पाकर बढ़ते हैं, इसीलिए हम भी तुम्हारी स्तुति करके बढ़ें. हमारे पाप नष्ट हों. (४) प्र यदग्नेः सहस्वतो विश्वतो यन्ति भानवः. अप नः शोशुचदघम्.. (५) शत्रुओं को पराजित करने वाली अग्नि की किरणें सभी जगह जाती हैं, इसलिए हमारे पाप नष्ट हों. (५) त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसि. अप नः शोशुचदघम्.. (६) हे अग्नि! तुम्हारे मुख चारों ओर हैं, इसलिए तुम चारों ओर से हमारी रक्षा करो. हमारा पाप नष्ट हो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
द्विषो नो विश्वतोमुखाति नावेक पारय. अप नः शोशुचदघम्.. (७) हे सर्वतोमुख अग्नि! जिस प्रकार नाव से नदी को पार करते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे कल्याण के लिए हमें शत्रुरहित देश में पहुंचाओ. हमारे पाप नष्ट हों. (७) स नः सिन्धुमिव नावयाति पर्षा स्वस्तये. अप नः शोशुचदघम्.. (८) हे अग्नि! जिस प्रकार नाव से नदी को पार करते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे कल्याण के लिए हमें शत्रुरहित देश में पहुंचाकर हमारा पालन करो. हमारे पाप नष्ट हों. (८) सूक्त—९८ देवता—अग्नि वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः. इतो जातो विश्वमिदं वि चष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण.. (१) हम पर वैश्वानर अग्नि की अनुग्रहबुद्धि हो. वे सामने से सेवनीय एवं सबके स्वामी हैं. दो काष्ठों से उत्पन्न होकर अग्नि संसार को देखते हैं एवं प्रातःकाल उदय होते हुए सूर्य से मिल जाते हैं. (१) पृष्टो दिवि पृष्टो अग्निः पृथिव्यां पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश. वैश्वानरः सहसा पृष्टो अग्निः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम्.. (२) अग्नि आकाश में सूर्यरूप से तथा धरती पर गार्हपत्यादि रूप से वर्तमान हैं. अग्नि ने सारी ओषधियों में उन्हें पकाने के लिए प्रवेश किया है. वही हमें दिवस एवं रात्रि में शत्रु से बचावें. (२) वैश्वानर तव तत्सत्यमस्त्वस्मान्नायो मघवानः सचन्ताम्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (३) हे वैश्वानर! तुमसे संबंधित यह यज्ञ सफल हो, हमें धन प्राप्त हो एवं अति शीघ्र पुत्र हमारी सेवा करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश हमारे धन की रक्षा करें. (३) सूक्त—९९ देवता—अग्नि जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो नि दहाति वेदः. स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः.. (१) हम सब भूतों को जानने वाले अग्नि के निमित्त सोमरस निचोड़ते हैं. अग्नि हमारे प्रति शत्रुता का व्यवहार करने वालों का धन नष्ट करें. जिस प्रकार नाव की सहायता से नदी पार ebook converter DEMO Watermarks*
करते हैं, वैसे ही अग्नि हमें दुःखों एवं पापों से पार करावें. (१) सूक्त—१०० देवता—इंद्र स यो वृषा वृष्ण्येभिः समोका महो दिवः पृथिव्याश्च सम्राट्. सतीनसत्वा हव्यो भरेषु मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (१) जो इंद्र कामवर्षी, शक्तिसंपन्न, महान्, आकाश और धरती के ईश्वर, जल बरसाने वाले तथा संग्राम में स्तुतिकर्त्ताओं द्वारा बुलाने योग्य हैं, वे मरुतों के साथ मिलकर हमारे रक्षक बनें. (१) यस्यानप्ताः सूर्यस्येव यामो भरेभरे वृत्रहा शुष्मो अस्ति. वृषन्तमः सखिभिः स्वेभिरेवैर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (२) जिस प्रकार सूर्य की चाल को दूसरा कोई नहीं पा सकता, उसी प्रकार जिनकी गति दूसरों के लिए अप्राप्य है, जो अपने गतिशील मित्रों-मरुतों के साथ अतिशय कामवर्धक हैं, जो सभी संग्रामों में शत्रुओं के हंता और शोषक हैं, वे इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (२) दिवो न यस्य रेतसो दुघानाः पन्थासो यन्ति शवसापरीताः. तरद्द्वेषाः सासहिः पौंस्येभिर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (३) जिसकी बलयुक्त एवं दूसरों द्वारा अप्राप्य किरणें सूर्य के समान आकाश में वर्षा के जल को गिराती हुईं इधर-उधर फैलती हैं, वे ही जितशत्रु एवं शक्ति द्वारा शत्रुओं को पराजित करने वाले इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (३) सो अङ्गिरोभिरङ्गिरस्तमो भूद्वृषा वृष्णिभिः सखिभिः सखा सन्. ऋग्मिभिर्ऋग्मी गातुभिर्ज्येष्ठो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (४) जो गतिशीलों में अत्यंत तीव्रगति, अभीष्टदाताओं में सर्वोत्तम कामपूरक, मित्रों में परम हितकारी, अर्चनीयों में सर्वाधिक पूजापात्र एवं स्तुतिपात्रों में सर्वाधिक स्तुति योग्य हैं, वे इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (४) स सूनुभिर्न रुद्रेभिर्ऋभ्वा नृषाह्ये सासह्वाँ अमित्रान्. सनीळेभिः श्रवस्यानि तूर्वन्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (५) जो रुद्रपुत्र मरुतों की सहायता से महान् बनकर संग्राम में मनुष्यों के शत्रुओं को पराजित करते हैं एवं अपने सहवासी मरुतों की सहायता से अन्न के कारण जल को बादलों से नीचे गिराते हैं, वे इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
स मन्युमीः समदनस्य कर्तास्माकेभिर्नृभिः सूर्यं सनत्. अस्मिन्नहन्सत्पतिः पुरुहूतो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (६) शत्रुहिंसक, संग्रामकर्त्ता, सज्जनों के पालक एवं अनेक यजमानों द्वारा बुलाए गए इंद्र आज के दिन हमें सूर्य के प्रकाश का उपभोग करने दें एवं मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (६) तमूतयो रणयञ्छूरसातौ तं क्षेमस्य क्षितयः कृण्वत त्राम्. स विश्वस्य करुणस्येश एको मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (७) वीर पुरुषों द्वारा लड़े गए संग्राम में मरुत् शब्द द्वारा जिस इंद्र को प्रसन्न करते हैं एवं मनुष्य जिसे रक्षणीय धन का रखवाला बनाते हैं, वे अभिमत फल देने में एकमात्र समर्थ इंद्र मरुतों की सहायता से हमारे रक्षक बनें. (७) तमप्सन्त शवस उत्सवेषु नरो नरमवसे तं धनाय. सो अन्धे चित्तमसि ज्योतिर्विन्दन्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (८) स्तोता लोग संग्रामों में रक्षा एवं धन पाने के उद्देश्य से इंद्र की शरण में जाते हैं, क्योंकि वे युद्ध में विजयरूपी प्रकाश देते हैं. वे इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (८) स सव्येन यमति व्राधतश्चित्स दक्षिणे संगृभीता कृतानि. स कीरिणा चित्सनिता धनानि मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (९) इंद्र बाएं हाथ से शत्रुओं को रोकते हैं, दाएं हाथ से यजमानों द्वारा दिया हुआ हव्य स्वीकार करते हैं एवं स्तोता की स्तुति सुनकर धन देते हैं. वे मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (९) स ग्रामेभिः सनिता स रथेभिर्विदे विश्वाभिः कृष्टिभिर्न्व१द्य. स पौंस्येभिरभिभूरशस्तीर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (१०) जो इंद्र मरुतों के साथ धन देते हैं, वे आज अपने रथ के कारण सभी मनुष्यों द्वारा पहचाने जा रहे हैं एवं जिन्होंने अपने बलों से शत्रुओं को पराजित किया है, वे मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (१०) स जामिभिर्यत्समजाति मीळ्हेऽजामिभिर्वा पुरुहूत एवैः. अपां तोकस्य तनयस्य जेषे मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (११) जो इंद्र बहुत से यजमानों द्वारा बुलाए जाने पर अपने बांधवों एवं बांधवहीन मानवों के साथ युद्धक्षेत्र में सम्मिलित होते हैं और दोनों प्रकार के शरणागत लोगों एवं उनके पुत्र-पौत्रों को विजय दिलाते हैं, वे मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
स वज्रभृद्दस्युहा भीम उग्रः सहस्रचेताः शतनीथ ऋभ्वा. चम्रीषो न शवसा पाञ्चजन्यो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (१२) वज्रधारी, असुरहंता, भयहेतु, तेजस्वी, सर्वज्ञ, प्रभूत स्तुतियों के पात्र, भासमान, सोमरस के समान पांच प्रकार के जनों के रक्षक इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (१२) तस्य वज्रः क्रन्दति स्मत्स्वर्षा दिवो न त्वेषो रवथः शिमीवान्. तं सचन्ते सनयस्तं धनानि मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (१३) जिनका वज्र शत्रुओं को बहुत रुलाता है, जो शोभन उदक के दाता, सूर्य के समान तेजस्वी, गर्जन-शब्दकर्त्ता एवं लोकानुग्रह संबंधी कर्म में संलग्न हैं, धन और धन का दान जिनकी सेवा करते हैं, वे इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (१३) यस्याजसं शवसा मानमुक्थं परिभुजद्रोदसी विश्वतः सीम्. स पारिषत्क्रतुभिर्मन्दसानो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (१४) जिस इंद्र का सर्वोपमान एवं प्रशंसनीय बल धरती और आकाश का सर्वदा एवं भली- भांति पालन करता है, वे हमारे यज्ञों से प्रसन्न होकर हमें पापों से बचावें एवं मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (१४) न यस्य देवा देवता न मर्ता आपश्चन शवसो अन्तंमापुः. स प्ररिक्वा त्वक्षसा क्ष्मो दिवश्च मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (१५) देव, मानव एवं जल जिन इंद्र के बल का अंत प्राप्त नहीं करते, वे अपने शत्रुनाशक बल से धरती एवं आकाश से भी आगे बढ़ गए हैं. वे मरुतों के सहयोग से हमारी रक्षा करें. (१५) रोहिच्छ्यावा सुमदंशुलक्ष्मीर्धुक्षा राय ऋज्राश्वस्य. वृषण्वन्तं बिभ्रती धूर्षु रथं मन्द्रा चिकेत नाहुषीषु विक्षु.. (१६) इंद्र के अश्व लाल एवं काले रंग वाले, दीर्घ अवयवों से युक्त, आभूषणधारी एवं आकाश में निवास करने वाले हैं. वे ऋज्राश्व ऋषि को धन देने के निमित्त आने वाले कामवर्षी इंद्र से अधिष्ठित रथ के जुए को खींचते हैं. मनुष्य सेना इन प्रसन्नतादायक अश्वों को जानती है. (१६) एतत्त्यत्त इन्द्र वृष्ण उक्थं वार्षागिरा अभि गृणन्ति राधः. ऋज्राश्वः प्रष्टिभिरम्बरीषः सहदेवो भयमानः सुराधाः.. (१७) हे अभीष्टदाता इंद्र! वृषागिरि के पुत्र अर्थात् ऋज्राश्व, अंबरीष, सहदेव, भयमान एवं सुराधर तुम्हारी प्रसन्नता के निमित्त यह स्तोत्र बोलते हैं. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
दस्यूँञ्छिम्ँयूँश्च पुरुहूत एवैर्हत्वा पृथिव्यां शर्वा नि बर्हीत्. सनत्क्षेत्रं सखिभिः श्वित्येभिः सनत्सूर्यं सनदपः सुवज्रः.. (१८) अनेक यजमानों द्वारा बुलाए गए इंद्र ने गतिशील मरुतों के सहयोग को पाकर धरती पर रहने वाले शत्रुओं एवं राक्षसों पर आक्रमण करके हिंसक वज्र द्वारा उनका वध किया. शोभन वज्रयुक्त इंद्र ने श्वेत वर्ण के अलंकारों से दीप्तांग मरुतों के साथ उनकी शत्रुओं द्वारा अधिकृत भूमि, सूर्य एवं जलों को बांट लिया. (१८) विश्वाहेन्द्रो अधिवक्ता नो अस्तवपरिह्वुतः सनुयाम वाजम्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (१९) सभी कालों में वर्तमान इंद्र हमारे पक्षपाती बनकर बोलें एवं हम अकुटिल गति बनकर हव्य रूपी अन्न का उपभोग करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु धरती एवं आकाश उसकी पूजा करें. (१९) सूक्त—१०१ देवता—इंद्र प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना. अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे.. (१) ऋत्विजो! जिन इंद्र ने राजा ऋजिश्व्रा की मित्रता के कारण कृष्ण असुर की गर्भिणी पत्नियों को मारा था, उन्हीं स्तुतिपात्र इंद्र के उद्देश्य से हवि रूप अन्न के साथ-साथ स्तुति वचन बोलो. वे कामवर्षी दाएं हाथ में वज्र धारण करते हैं. रक्षा के इच्छुक हम उन्हीं इंद्र का मरुतों सहित आह्वान करते हैं. (१) यो व्यंसं जाहृषाणेन मन्युना यः शम्बरं यो अहन्पिप्रुमव्रतम्. इन्द्रो यः शुष्णमशुषं न्यावृणङ्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे.. (२) जिन इंद्र ने अतिशय कोप के कारण बिना बांहों वाले वृत्र असुर का वध किया, जिन्होंने शंबर, यज्ञ न करने वाले पिप्रु एवं विश्वशोषक शुष्ण का नाश किया, हम उन्हीं इंद्र को मरुतों के सहित अपना मित्र बनाने के लिए बुलाते हैं. (२) यस्य द्यावापृथिवी पौंस्यं महद्यस्य व्रते वरुणो यस्य सूर्यः. यस्येन्द्रस्य सिन्धवः सश्चति व्रतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे.. (३) हम मित्र बनाने हेतु इंद्र को मरुतों के साथ बुलाते हैं. द्यौ, पृथिवी, सूर्य, वरुण एवं नदियां उनके नियम मानते हैं. (३) यो अश्वानां यो गवां गोपतिर्वशी य आरितः कर्मणिकर्मणि स्थिरः. ebook converter DEMO Watermarks*
वीळोश्चिदिन्द्रो यो असुन्वतो वधो मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे.. (४) जो अश्वों एवं समस्त गायों के स्वामी, स्वतंत्र, स्तुति प्राप्तकर्त्ता, समस्त यज्ञकर्मों में स्थित एवं यज्ञ में सोम निचोड़ने वालों के प्रबल शत्रुओं को नष्ट करते हैं, हम उन्हीं इंद्र को मरुतों के साथ अपना मित्र बनाने के लिए बुलाते हैं. (४) यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्यो ब्रह्मणे प्रथमो गा अविन्दत्. इन्द्रो यो दस्यूँरधराँ अवातिरन्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे.. (५) जो चलने वाले एवं सांस लेने वाले प्राणियों के स्वामी हैं, जिन्होंने पणि द्वारा अपहृत गायों का सभी देवों से पहले ब्राह्मणों के निमित्त उद्धार किया था एवं जिन्होंने असुरों को निकृष्ट बनाकर मारा था, उन्हीं इंद्र को हम अपना सखा बनाने के लिए मरुतों के साथ बुलाते हैं. (५) यः शूरैर्भिर्हव्यो यश्च भीरुभिर्यो धावद्भिर्हूयते यश्च जिग्युभिः. इन्द्रं यं विश्वा भुवनाभि संदधुर्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे.. (६) जो शूरों और कायरों द्वारा बुलाने योग्य हैं, युद्ध में हारकर भागने वाले एवं विजयी दोनों ही जिन्हें बुलाते हैं एवं सभी प्राणी जिन्हें अपने-अपने कार्यों में आगे रखते हैं, उन्हीं इंद्र को हम अपना मित्र बनाने के लिए मरुतों के साथ बुलाते हैं. (६) रुद्राणामेति प्रदिशा विचक्षणो रुद्रेभिर्योषा तनुते पृथु ज़्रयः. इन्द्रं मनीषा अभ्यर्चति श्रुतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे.. (७) प्रकाशमान इंद्र सभी प्राणियों में प्राणरूप से वर्तमान रुद्रपुत्रों—मरुतों को मनुष्यों के लिए प्रदान करते हुए आकाश में उदित होते हैं एवं उन्हीं मरुतों के साथ प्राणियों में मध्यमा वाणी का विस्तार करते हैं. स्तुतिरूपी वाणी उन्हीं इंद्र की पूजा करती है. उन्हें हम मरुतों के साथ अपना मित्र बनाने के लिए बुलाते हैं. (७) यद्वा मरुत्वः परमे सधस्थे यद्वावमे वृजने माद्यासे. अत आ याह्यध्वरं नो अच्छा त्वाया हविश्चकृमा सत्यराधः.. (८) हे मरुतों सहित इंद्र! तुम उत्तम घर अथवा नवीन स्थान में प्रसन्न रहते हो. तुम हमारे यज्ञ में आओ. हे सत्यधन! तुम्हारी कामना से हम हव्य देते हैं. (८) त्वायेंद्र सोमं सुषुमा सुदक्ष त्वाया हविश्चकृमा ब्रह्मवाहः. अधा नियुत्वः सगणो मरुद्भिरस्मिन्यज्ञे बर्हिषि मादयस्व.. (९) हे शोभन बल वाले इंद्र! हम तुम्हारी कामना से सोमरस निचोड़ते हैं. हे स्तुति द्वारा बुलाने योग्य इंद्र! हम तुम्हारी कामना से हवि देते हैं. हे अश्वों के स्वामी! तुम मरुतों के साथ ebook converter DEMO Watermarks*
गणरूप में वर्तमान यज्ञ में बिछे हुए कुशों पर तृप्त बनो. (९) मादयस्व हरिभिर्ये त इन्द्र वि ष्यस्व शिप्र वि सृजस्व धेने. आ त्वा सुशिप्र हरयो वहन्तूशनहव्यानि प्रति नो जुषस्व.. (१०) हे इंद्र! अपने घोड़ों के साथ प्रसन्न बनो, सोमपान के निमित्त अपने जबड़ों, जिह्वा एवं उपजिह्वा को खोलो. हे सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र! घोड़े तुम्हें यहां लावें. तुम हमारी कामना करते हुए हमारा हव्य ग्रहण करो. (१०) मरुत्स्तोत्रस्य वृजनस्य गोपा वयमिन्द्रेण सनुयाम वाजम्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (११) मरुतों के साथ स्तुति किए जाने वाले एवं शत्रुहंता इंद्र के द्वारा सुरक्षित हम उनसे अन्न प्राप्त करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश उस अन्न की पूजा करें. (११) सूक्त—१०२ देवता—इंद्र इमां ते धियं प्र भरे महो महीमस्य स्तोत्रे धिषणा यत्त आनजे. तमुत्सवे च प्रसवे च सासहिमिन्द्रं देवासः शवसामदन्ननु.. (१) हे इंद्र! तुझ महान् के उद्देश्य से मैं यह महती स्तुति कर रहा हूं, क्योंकि तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि मेरे स्तोत्र पर ही आधारित है. ऋत्विजों ने अभिवृद्धि एवं धन पाने के लिए शत्रु पराभवकारी इंद्र को स्तुतियों द्वारा प्रसन्न किया है. (१) अस्य श्रवो नद्यः सप्त बिभ्रति द्यावाक्षामा पृथिवी दर्शतं वपुः. अस्मे सूर्याचन्द्रमसाभिचक्षे श्रद्धे कमिन्द्र चरतो वितर्तुरम्.. (२) गंगा आदि सात सरिताएं इंद्र की कीर्ति एवं आकाश, पृथ्वी तथा अंतरिक्ष इंद्र का दर्शनीय रूप धारण करते हैं. हे इंद्र! पदार्थों को हमारे सामने प्रकाशित करने एवं हमारी श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए सूर्य और चंद्र बारीबारी से बार-बार घूमते हैं. (२) तं स्म रथं मघवन्प्राव सातये जैत्रं यं ते अनुमदाम संगमे. आजा न इन्द्र मनसा पुरुष्टुत त्वायद्भ्यो मघवञ्छर्म यच्छ नः.. (३) हे हमारी बुद्धि द्वारा अनेक बार स्तुति किए गए इंद्र! तुम्हारे जिस जयशील रथ को शत्रुओं के साथ होने वाले संग्राम में देखकर हम प्रसन्न होते हैं, हे धनस्वामी इंद्र! हमें धन देने के लिए उसी रथ को चलाओ एवं अपने अभिलाषी हम लोगों को सुख दो. (३) वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदवा भरेभरे. अस्मभ्यमिन्द्र वरिवः सुगं कृधि प्र शत्रूणां मघवन्वृष्ण्या रुज.. (४)
हे इंद्र! तुम्हें सहायक पाकर हम स्तोता शत्रु को जीत लेंगे. संग्राम में हमारे भाग की रक्षा करो. हे मघवन्! हमें धन सुलभ कराओ तथा शत्रुओं की शक्ति बाधित करो. (४) नाना हि त्वा हवमाना जना इमे धनानां धर्तरवसा विपन्यवः. अस्माकं स्मा रथमा तिष्ठ सातये जैत्रं हीन्द्र निभृतं मनस्तव.. (५) हे धनधारणकर्त्ता इंद्र! अपनी रक्षा के निमित्त बहुत से लोग तुम्हारी स्तुति करते एवं तुम्हें बुलाते हैं, उन में केवल हमें धन प्रदान करने के लिए रथ पर बैठो. हे इंद्र! तुम्हारा मन अव्याकुल एवं जयशील है. (५) गोजिता बाहू अमितक्रतुः सिमः कर्मन्कर्मञ्छतमूतिः खजङ्करः. अकल्प इन्द्रः प्रतिमानमोजसाथा जना वि ह्वयन्ते सिषासवः.. (६) हे इंद्र! तुम्हारी भुजाएं शत्रु-विजय द्वारा गायों को प्राप्त कराने वाली एवं तुम्हारा ज्ञान असीमित है. तुम श्रेष्ठ हो और स्तोताओं के यज्ञों की अनेक प्रकार से रक्षा करते हो. तुम संग्रामकर्त्ता, स्वतंत्र एवं समस्त प्राणियों की शक्ति के प्रतिमान हो. इसीलिए धन पाने के इच्छुक तुम्हें अनेक प्रकार से बुलाते हैं. (६) उत्ते शतान्मघवन्नुच्च भूयस उत्सहस्राद्रिरिचे कृष्टिषु श्रवः. अमात्रं त्वा धिषणा तित्त्विषे मह्यधा वृत्राणि जिघ्नसे पुरन्दर.. (७) हे धनस्वामी इंद्र! मनुष्यों को तुम्हारे द्वारा दिया गया अन्न सौ धनों से अधिक, शताधिक से भी अधिक अथवा हजार से भी अधिक है. अगणित गुणों से युक्त तुमको हमारी स्तुति प्रकाशित करती है. हे पुरंदर! तुम शत्रुओं का विनाश करते हो. (७) त्रिविष्टधातु प्रतिमानमोजसस्तिस्रो भूमीर्नृपते त्रीणि रोचना. अतीदं विश्वं भुवनं ववक्षिथा शत्रुरिन्द्र जनुषा सनादसि.. (८) हे मनुष्यों के पालनकर्त्ता इंद्र! जिस प्रकार तिगुनी बटी हुई रस्सी दृढ़ होती है, उसी प्रकार तुम बल में सभी प्राणियों के प्रतिमान हो. हे इंद्र! तुम अपने जन्मकाल से ही शत्रुरहित थे, इसलिए तुम तीन लोकों में तीन प्रकार के तेज एवं इस संसार को ढोने में पूरी तरह समर्थ हो. (८) त्वां देवेषु प्रथमं हवामहे त्वं बभूथ पृतनासु सासहिः. सेमं नः कारुमुपमन्युमुद्भिदमिन्द्रः कृणोतु प्रसवे रथं पुरः.. (९) हे इंद्र! तुम देवों में श्रेष्ठ एवं संग्रामों में शत्रुपराभवकर्त्ता हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमें स्तुतिकर्त्ता, सर्वज्ञ एवं शत्रुनाशक पुत्र दो तथा युद्ध होने पर हमारा रथ अन्य रथों से आगे करो. (९)
त्वं जिगेथ न धना रुरोधिथाऽर्भेष्विाजा मघवन्महत्सु च. त्वामुग्रमवसे सं शिशीमस्यथा न इन्द्र हवनेषु चोदय.. (१०) हे इंद्र! तुम शत्रुओं को जीतते हो एवं उनका धन छिपाकर नहीं रखते. हे मघवन्! छोटे एवं बड़े संग्राम में हम स्तुति द्वारा तुझ उग्र को अपनी रक्षा के निमित्त बुलाते हैं. हमें युद्ध के निमित्त आह्वानों से प्रेरित करो. (१०) विश्वाहेन्द्रो अधिवक्ता नो अस्त्वपरिह्वुतः सनुयाम वाजम्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौ.. (११) सभी कालों में वर्तमान इंद्र हमारे पक्षपाती बनकर बोलें एवं हम अकुटिल गति बनकर हव्य रूपी अन्न का उपभोग करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती एवं आकाश उसकी पूजा करें. (११) सूक्त—१०३ देवता—इंद्र तत्त इन्द्रियं परमं पराचैरधारयन्त कवयः पुरेदम्. क्षमेदमन्यद्दिव्य१न्यदस्य समी पृच्यते समनेव केतुः.. (१) हे इंद्र! प्राचीन काल में क्रांतदर्शी स्तोताओं ने तुम्हारे इस प्रसिद्ध बल को सम्मुख धारण किया था. इंद्र की धरती पर रहने वाली एवं आकाश में रहने वाली ज्योतियां इस प्रकार मिल जाती हैं, जिस प्रकार युद्ध में विरोधी योद्धाओं के झंडे मिल जाते हैं. (१) स धारयत्पृथिवीं पप्रथच्च वज्रेण हत्वा निरपः ससर्ज. अहन्नहिमभिनद्रौहिणं व्यहन्व्संसं मघवा शचीभिः.. (२) इंद्र ने असुर पीड़ित धरती को धारण एवं विस्तृत किया है, वज्र से शत्रुओं को मारकर वर्षा का जल बहाया है, अंतरिक्ष में वर्तमान मेघ का वध किया है, रोहिण असुर को विदीर्ण किया है एवं अपने शौर्य से बाहुहीन वृत्र को समाप्त किया है. (२) स जातूभर्मा श्रद्दधान ओजः पुरो विभिन्दन्नचरद्वि दासीः. विद्वान्वज्रिन्दस्यवे हेतिमस्यार्यं सहो वर्धया द्युम्नमिन्द्र.. (३) वज्रायुध एवं शक्तिसाध्य कार्य में श्रद्धा रखने वाले इंद्र ने दस्युओं के नगरों का विनाश करके विविध गमन किया था. हे वज्रधारी! हमारी स्तुतियों को समझते हुए तुम हमारे शत्रुओं पर आयुध छोड़ो एवं स्तुतिकर्त्ताओं का बल तथा यश बढ़ाओ. (३) तदूचुषे मानुषेमा युगानि कीर्तेन्यं मघवा नाम बिभ्रत्. उपप्रयन्दस्युहत्याय वज्री यद्ध सूनुः श्रवसे नाम दधे.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
वृत्रादि दस्यु को मारने के लिए घर से निकलते हुए वज्रधारी एवं शत्रुप्रेरक इंद्र ने जय लक्षण के लिए जो नाम धारण किया था, उससे बल का वर्णन करने वाले यजमान के लिए धनस्वामी इंद्र सूर्य रूप से मानवोपयोगी दिनरात के समूह का निर्माण करते हैं. (४) तदस्येदं पश्यता भूरि पुष्टं श्रदिन्द्रस्य धत्तन वीर्याय. स गा अविन्दत्सो अविन्ददश्वान्तस ओषधीः सो अपः स वनानि.. (५) हे यजमानो! इंद्र के प्रबुद्ध एवं विस्तृत शौर्य को देखो एवं इस पर श्रद्धा करो. इंद्र ने गायों, अश्वों ओषधियों, जलों एवं वनों को प्राप्त किया. (५) भूरिकर्मणे वृषभाय वृष्णे सत्य शुष्माय सुनवाम सोमम्. य आदृत्या परिपन्थीव शूरोऽयज्वनो विभजन्नेति वेदः... (६) अनेकविध कर्मयुक्त, देवों में श्रेष्ठ, इच्छापूर्ति में समर्थ एवं यथार्थ शक्ति वाले इंद्र के निमित्त हम सोम निचोड़ते हैं. जिस प्रकार बटमार जानेवाले भले मनुष्यों का धन छीन लेता है, उसी प्रकार शूर इंद्र धन का आदर करके यज्ञ न करने वालों का धन छीनकर उसे यजमानों को देने के लिए ले जाते हैं. (६) तदिन्द्र प्रेव वीर्यं चकर्थ यत्ससन्तं वज्रेणाबोधयोऽहिम्. अनु त्वा पत्नीर्हृषितं वयश्च विश्वे देवासो अमदन्ननु त्वा.. (७) हे इंद्र! तुमने यह वीरता का कर्म किया जो सोते हुए अहि राक्षस को अपने वज्र द्वारा जगा दिया. तब तुम्हें हर्षित देखकर देवपत्नियों ने प्रसन्नता अनुभव की. गतिशील मरुद्गण एवं अन्य देव भी तुम्हारे साथ-साथ प्रसन्न हुए थे. (७) शुष्णं पिप्रुं कुयवं वृत्रमिन्द्र यदावधीर्वि पुरः शम्बरस्य. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः... (८) हे इंद्र! तुमने शुष्ण, पिप्रु एवं कुयव का वध तथा शंबर असुर के नगरों को विदीर्ण किया था. हमने इस स्तोत्र द्वारा जो चाहा है, उसकी पूजा मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश करें. (८) सूक्त—१०४ देवता—इंद्र योनिष्ठ इन्द्र निषदे अकारि तमा नि षीद स्वानो नार्वा. विमुच्या वयोऽवसायाश्वान्दोषा वस्तोर्वहीयसः प्रपित्वे.. (१) हे इंद्र! तुम्हारे बैठने के लिए जो स्थान बनाया गया है, उस पर हंसते हुए घोड़े के समान आकर शीघ्र बैठो. जो रस्सियां घोड़ों को रथ से बांधती हैं, उन्हें खोलकर घोड़ों को रथ से
अलग कर दो, क्योंकि यज्ञकाल आने पर वे घोड़े रात-दिन तुम्हें ढोते हैं. (१) ओ त्ये नर इन्द्रमूतये गुर्नू चित्तान्सद्यो अध्वनो जगम्यात्. देवासो मन्युं दासस्य श्चम्नन्ते न आ वक्षन्त्सुविताय वर्णम्.. (२) यज्ञ के नेता यजमान की रक्षा की इच्छा से इंद्र के समीप आते हैं और इंद्र उनको उसी समय यज्ञ के अनुष्ठान में लगाते हैं. देवगण असुरों का क्रोध समाप्त करें एवं हमारे यज्ञ के निमित्त इंद्र को लावें. (२) अव त्मना भरते केतवेदा अव त्मना भरते फेनमुदन्. क्षीरेण स्नातः कुयवस्य योषे हते ते स्यातां प्रवणे शिफाया:.. (३) दूसरों के धन को जानने वाला कुयव असुर स्वयं धन का अपहरण करता है एवं जल में रहकर फेन वाले जल को चुराता है. चुराए हुए जल में स्नान करने वाली कुयव की दो स्त्रियां शिफा नामक नदी के गहरे जल में नष्ट हों. (३) युयोप नाभिरुपरस्यायोः प्र पूर्वाभिस्तिरते राष्टि शूरः. अञ्जसी कुलिशी वीरपत्नी पयो हिन्वाना उदभिर्भरन्ते.. (४) उदक के मध्य में स्थित एवं दूसरों को परेशान करने के निमित्त इधर-उधर जाने वाले कुयव का स्थान जल में गुप्त था. वह शूर अपहृत जलों से बढ़ता एवं तेजस्वी बनता है. अंजसी, कुलिशी एवं वरिपत्नी नाम की नदियां अपने जल से उसे प्रसन्न करके धारण करती हैं. (४) प्रति यत्स्या नीथादर्शि दस्योरोको नाच्छा सदनं जानती गात्. अध स्मा नो मघवञ्चर्कतादिन्मा नो मघेव निष्षपी परा दा:.. (५) अपने बछड़े को जानती हुई गाय जिस प्रकार अपने निवासस्थान में पहुंचती है, उसी प्रकार हमने भी कुयव असुर के घर की ओर जाता हुआ मार्ग देखा है. हे इंद्र! हमारी रक्षा करो, हमें इस प्रकार मत त्यागो, जिस प्रकार दासी का पति धन त्याग देता है. (५) स त्वं न इन्द्र सूर्ये सो अप्स्वनागास्त्व आ भज जीवशंसे. मान्तरां भुजमा रीरिषो नः श्रद्धितं ते महत इन्द्रियाय.. (६) हे इंद्र! हमें सूर्य के प्रति, जलों के प्रति एवं पापरहित होने के कारण जीवों द्वारा प्रशंसित मानवों के प्रति भक्त बनाओ. हमारी गर्भस्थ संतान की हिंसा मत करना. हम तुम्हारे महान् बल के प्रति श्रद्धालु हैं. (६) अधा मन्ये श्रत्ते अस्मा अधायि वृषा चोदस्व महते धनाय. मा नो अकृते पुरुहूत योनाविन्द्र क्षुध्यद्भ्यो वय आसुतिं दा:.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! हम तुम्हें मन से जानते हैं एवं तुम्हारी शक्ति पर श्रद्धा रखते हैं. हे कामवर्षी! तुम हमें महान् धन के निमित्त प्रेरित करो. हे अनेक यजमानों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हमें धनरहित घर में मत रखो तथा अन्य भूखों को अन्न एवं दूध दो. (७) मा नो वधीरिन्द्र मा परा दा मा नः प्रिया भोजनानि प्र मोषीः. आण्डा मा नो मघवञ्छक्र निर्भेन्मा नः पात्रा भेत्सहजानुषाणि.. (८) हे इंद्र! हमें मत मारना, हमारा त्याग मत करना एवं हमारे प्रिय उपभोग पदार्थों को मत छीनना. हे धनस्वामी एवं शक्तिशाली इंद्र! हमारे गर्भस्थ एवं घुटने के बल चलने वाले बच्चों को नष्ट मत करो. (८) अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहुरयं सुतस्तस्य पिबा मदाय. उरुव्यचा जठर आ वृषस्व पितेव नः शृणुहि हूयमानः.. (९) हे इंद्र! हमारे सम्मुख आओ, क्योंकि प्राचीन लोगों ने तुम्हें सोमप्रिय बताया है. यह सोम निचोड़ा हुआ रखा है, इसे पीकर प्रसन्न बनो. विस्तीर्ण शरीर वाले बनकर हमारे उदरों में सोमरस की वर्षा करो. जिस प्रकार पिता पुत्र की बात सुनता है, उसी प्रकार हमारे द्वारा बुलाए हुए तुम हमारी बात सुनो. (९) सूक्त—१०५ देवता—विश्वेदेव चन्द्रमा अप्स्व१न्तरा सुपर्णो धावते दिवि. न वो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्ति विद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (१) उदकमय मंडल में वर्तमान सुंदर किरणों वाला चंद्रमा आकाश में दौड़ता है. हे सुवर्णमयी चंद्रकिरणो! कुएं से ढकी होने के कारण मेरी इंद्रियां तुम्हारे अग्रभाग को नहीं प्राप्त करतीं. हे धरती और आकाश! हमारे इस स्तोत्र को जानो. (१) अर्थमिद्द्वा उ अर्थिन आ जाया युवते पतिम्. तुञ्जाते वृष्ण्यं पयः परिदाय रसं दुहे वित्तं मे अस्य रोदसी.. (२) धन चाहने वाले लोगों को निश्चित रूप से धन मिल रहा है. दूसरों की स्त्रियां अपने पतियों को समीप ही पाती हैं, उनसे समागम करती हैं एवं गर्भ में वीर्य धारण करके संतान उत्पन्न करती हैं. हे धरती और आकाश! मेरे इस कष्ट को जानो. (२) मो षु देवा अदः स्व१रव पादि दिवस्परि. मा सोम्यस्य शंभुवः शूने भूम कदा चन वित्तं मे अस्य रोदसी.. (३) हे देवो! स्वर्ग में वर्तमान हमारे पूर्वपुरुष वहां से पतित न हों. सोमपान योग्य पितर के ebook converter DEMO Watermarks*