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रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

रोगों की पहचान

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  • ❑ पेट बाहर की ओर निकल आता है।
  • ❑ मुँह खुला-सा हो जाता है।

रोग होने की संभावना

  • ❑ फेफड़े खराब होने की संभावना रहती है।
  • ❑ दाँतों के खराब होने की संभावना रहती है।
  • ❑ आँख के रोग होने की संभावना रहती है।
  • ❑ सिर में गंज पड़ सकती है।
  • ❑ खसरा (एक प्रकार का दानेदार संक्रामक रोग) हो सकता है।
  • ❑ ज्वर हो सकता है।

सामने के भाग में यदि दूषित पदार्थ जमा हो जाए तो उसे निकालना मुश्किल नहीं होता है। इससे उत्पन्न रोग दाएँ-बाएँ के जमाव से भयंकर नहीं होते।

दाएँ या बाएँ भाग में दूषित पदार्थ के जमाव से रंग-रूप में आने वाले बदलाव

जब गंदे पदार्थ का जमाव दाएँ या बाएँ भाग में होता है तो शरीर में निम्नलिखित में से कुछ बदलाव आ सकते हैं-

  • ❑ सिर दाएँ या बाएँ, जहाँ भी दूषित पदार्थ इकट्ठा होगा, वहाँ की तरफ झुक जाता है।
  • ❑ जिस ओर जमाव होगा, उस तरफ की गर्दन फूली हुई और सख्त हो जाती है।
  • ❑ दाएँ या बाएँ में से, जहाँ दूषित पदार्थ का जमाव होगा, केवल वहाँ का हिस्सा बड़ा और चौड़ा हो जाने की वजह से पूरा शरीर बेडौल हो जाता है।
  • ❑ दूषित पदार्थ के जमाव वाली साइड से चेहरा ज्यादा लंबा हो जाता है।

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साहिब बन्दगी

  • ▯ दूषित पदार्थ के जमाव वाली तरफ से सिर और गर्दन की मध्य की रेखा साफ दिखाई नहीं पड़ती है।
  • ▯ एक साइड का पैर भी दूसरे पैर की अपेक्षा अधिक मोटा होगा।
  • ▯ पेट भी बाहर की ओर हो सकता है। यह तो रोग का महा चिह्न है। फिर दोष किस तरफ है, यह भी कभी-कभी स्पष्ट दिख पड़ता है।

रोग की संभावना

  • ▯ वर्षों तक रहने वाला आधे सिर का दर्द हो जाता है।
  • ▯ आँखें खराब हो जाती हैं। मोतियाबिंद हो जाता है।
  • ▯ दाँत खराब होकर टूट जाते हैं।
  • ▯ ज्वर की संभावना बाईं तरफ के जमाव में ज्यादा रहती है।

पीछे के भाग में गंदे द्रव्य के जमाव से

रंग-रूप में आने वाले बदलाव

जब शरीर में गंदे पदार्थ का जमाव पीछे की ओर हो जाता है तो निम्नलिखित में से कुछ बदलाव स्पष्ट दिख सकते हैं—

  • ▯ कंधे गोल हो जाते हैं।
  • ▯ माथे पर चर्बी की गद्दी बन जाती है।
  • ▯ पीछे की तरफ से सिर बड़ा हो जाता है।
  • ▯ चाल डगमगा जाती है।
  • ▯ गर्दन दाएँ-बाएँ नहीं घुमाए जा सकती है।
  • ▯ गर्दन और सिर के पीछे के भाग की रेखा दिखाई नहीं पड़ती।
  • ▯ कभी-कभी गर्दन सिर जितनी बड़ी हो जाती है।
  • ▯ कूबड़ निकल जाता है।

रोगों की संभावना

  • ▯ याददाश्त कमज़ोर हो सकती है।

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  • ❑ दिमागी नुक्स हो सकता है।
  • ❑ बच्चों को तेज बुखार हो सकते हैं।
  • ❑ पति-पत्नी दोनों के पिछले भाग में यह जमाव होने से संतान उत्पत्ति नहीं हो सकती है।

पीछे के भाग में दूषित पदार्थ का जमाव मनुष्य को विनाश की ओर ले जाता है। यह बड़ा खतरनाक सिद्ध होता है। इससे शीघ्र ही सही विधि से बचने का प्रयास करना चाहिए।

मिश्रित भागों में रोगों के जमाव से होने वाले रोग और बदलाव

अधिकतर गंदे पदार्थ का जमाव मिश्रित भागों में होता है। जैसे पीछे और बाईं या दाईं ओर। कभी आगे और दाईं ओर। फिर जब ये दोनों तरफ के जमाव आपस में मिल जाते हैं तब कई भयंकर रोगों की उत्पत्ति होती है। तो बदलाव इस तरह के हो सकते हैं-

  • ❑ मुँह खुला-सा हो जाता है।
  • ❑ नाक बहुत पतली या मोटी हो जाती है।
  • ❑ सिर बहुत बड़ा हो जाता है।
  • ❑ आँखें दब-सी जाती हैं
  • ❑ कंधे ढीले हो जाते हैं।

विभिन्न भागों के जमाव में जो बदलाव आते हैं, उनमें से कोई भी बदलाव आ सकता है।

रोगों की संभावना

  • ❑ बहरापन आ सकता है।
  • ❑ आँख से अंधापन आ सकता है।
  • ❑ दाँत खराब होकर टूटने लग सकते हैं।

कुछ खतरनाक रोगों के चिह्न

कुछ खतरनाक रोगों के चिह्न

क्षय रोग के चिह्न

जब भी पेट में पिण्ड बनने लगे, चेहरे का रंग लाल और चमकदार होने लगे और चेहरा चौरस शक्ल लेने लगे तो समझ जाना चाहिए कि इंसान क्षय रोग की ओर बढ़ रहा है।

ऐसे में नाक पहले फूलती है और फिर बाद में पतली होती जाती है। गले में पिण्ड बनने लगते हैं और गला लंबा होने लगता है। मुँह खुला-सा हो जाता है। नाक पुरानी बलगम से भर जाती है और भीतर से काली पड़ने लगती है।

क्षय रोग सामने और पीछे दोनों में से किसी भी तरफ के जमाव से हो सकता है। पर यदि पीछे के जमाव से हुआ तो खतरनाक होता है। ऐसे में छाती या पीठ पर फोड़े भी निकलते हैं, जो शरीर द्वारा दूषित द्रव्य को बाहर निकालने का प्रयास होता है। पर उष्ण या जीवनी-शक्ति की कमजोरी आड़े आती है तो दोष बाहर नहीं हो पाता और यही दोष सख्त होकर गाँठों की शक्ल ले लेता है। दर्द न होने से मनुष्य को इस रोग का पता भी नहीं चल पाता है।

जिन बच्चों को गंठमाल होता है, वे क्षय रोग की ओर बढ़ रहे होते हैं।

इसका एक और लक्षण है कि ऐसे बच्चों को प्रायः सर्दी और खाँसी की शिकायत होती रहती है। यदि यह सर्दी और खाँसी लंबे समय तक समय-समय पर होती है तो क्षय रोग का संकेत समझा जा सकता है।

जिस मनुष्य के शरीर का रंग पीला या निर्जीव हो, सिर आगे की

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ओर झुका हो, गालों की हडिड़याँ बाहर निकली हुई हों, सीना लगभग खोखला लग रहा हो तो समझना चाहिए कि उसका मेदा खराब है और उसका शरीर क्षय को प्राप्त हो रहा है।

जिगर की खराबी के चिह्न

गंदे पदार्थ का जमाव कहीं भी हो, पर पाचन इन्द्रियों तो प्रभावित होगी ही। यह प्रमुख बात है। शुरुआत ही तो यहीं से होती है। जिनके शरीर में बाईं ओर जमाव होता है, उनकी पाचन इन्द्रियों के बाएँ हिस्से में गंदे पदार्थ का जमाव होगा, वहाँ जरूर कुछ गड़बड़ समझनी चाहिए। ऐसे ही पीछे के भाग में जमाव होने से आँतों के पिछले हिस्से प्रभावित होंगे। यदि दाहिनी ओर जमाव है तो जिगर प्रभावित होगा। जिगर के प्रभावित होने से रक्त से पित्त अलग नहीं हो पाता है और परिणाम-स्वरूप त्वचा पीली पड़ने लगती है। ऐसे लोगों के पैरों में पसीना भी खूब आता है। इसलिए पीला रंग और पैरों का पसीजना इस बात की ओर संकेत करता है कि जिगर में खराबी है।

कैंसर के चिह्न

कैंसर आप 5 साल पहले जान सकते हैं कि होने वाला है। जब भोजन में रुचि कम लगे, भोजन करने की इच्छा न करे तो समझना कि कैंसर ने पैर पसारना शुरू कर दिया है। इस स्टेज पर यह आसानी से कण्ट्रोल हो सकता है।

गुर्दे की बीमारी के चिह्न

शरीर के पीछे के भाग और बाईं ओर में दूषित पदार्थ के जमाव से गुर्दे प्रभावित हो जाते हैं। ऐसे में आँखों के नीचे की त्वचा सिकुड़ जाती है और एक तरह की थैली-सी बन जाती है। इसलिए जब भी आँखों के नीचे की त्वचा सिकुड़कर थैली का रूप ले तो समझ जाना चाहिए कि

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साहिब बन्दगी

गुदें खराब हैं।

बाँझपन के चिह्न

जब स्त्रियों के शरीर के पिछले भाग में गंदे पदार्थ का जमाव हो जाता है तो जननेन्द्रियाँ प्रभावित होती हैं। तब बाँझपन का खतरा रहता है। प्रसव के समय अधिक पीड़ा की भी यही कारण होता है। दूध का कम उतरना भी इसी का चिह्न है। इस तरह स्त्रियों के पिछले भाग में गंदे पदार्थ उनके बाँझ हो सकने के खतरे की ओर संकेत करता है।

गठिया की बीमारी के चिह्न

जब बाईं ओर गंदा पदार्थ जमा हो जाता है तो वात-रोग होता है। यदि इस रोग का सही उपाय न किया जाए या दबा दिया जाए तो यही वात-रोग गठिया का रूप ले लेता है। इस तरह बाईं ओर गंदे पदार्थ का जमाव भविष्य में गठिया जैसे रोग के होने की संभावना की ओर इशारा करता है। भाप-स्नान इसका सबसे बेहतर उपचार है। इससे दर्द वाले स्थान के छिद्र खुल जाते हैं और दोष बाहर निकल जाता है।

अंधेपन की बीमारी के चिह्न

सिर पर गाँठों का बनना अंधेपन को भी जन्म देता है। इसलिए सिर की गाँठें बहुत खतरनाक रूप ले सकती हैं। जब भी किसी का सिर आगे की तरफ झुका हो, आँखें अंधमुदी हों और त्वचा का रंग भी पीला-सा पड़ गया हो तो समझना चाहिए कि वो अंधेपन की ओर बढ़ रहा है।

हृदय रोग की बीमारी के चिह्न

जब दूषित पदार्थ का जमाव पीछे की तरफ और बाईं तरफ हो तो समझना चाहिए कि हृदय-रोग हो सकता है। ऐसे में सिर शरीर के

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बीचोंबीच नहीं होगा, शरीर का बायाँ भाग चौड़ा दिखेगा। ऐसे चिह्न वाले व्यक्ति को हृदय रोग होने की संभावना है।

पागलपन की बीमारी के चिह्न

जब गर्दन के दाएँ-बाएँ दोनों तरफ सूजन हो, पीछे के भाग में भी दूषित पदार्थ का जमाव होने से सिर आगे की तरफ झुका हुआ हो, चेहरा अतिरिक्त चमकीला हो, माथे पर चर्बी की गद्दी हो, गाल मोटे और लटके हुए हों, सिर और गर्दन के बीच की रेखा साफ न हो तो समझ लेना चाहिए कि इसे भविष्य में पागलपन की बीमारी हो सकती है। ऐसे आदमी का मन किसी काम में ज्यादा देर नहीं लगेगा। कहीं भी वो ज्यादा देर नहीं बैठ सकता है।

कुछ रोग के चिह्न

  • ▣ पिछले भाग में दूषित पदार्थ के जमाव के कारण जब सिर पर दूषित पदार्थ जमा होकर गाँठों का रूप ले ले तो मनुष्य कुछ रोग की ओर बढ़ने लगता है। शरीर जब स्वयं घाव उत्पन्न कर उन गाँठों का दोष बाहर नहीं कर पाता तो धीरे-धीरे गाँठें सूख जाती हैं और हड्डी में घाव हो जाता है, जिससे हड्डी और अंग-दोनों सड़ना शुरू हो जाते हैं। इसमें दोष पूरे शरीर में फैल जाता है। जब तक शरीर सड़ना शुरू न हो तब तक इसका इलाज हो सकता है। इस तरह सिर पर गाँठों का होना भविष्य में होने वाले कुछ रोग की निशानी है।
  • ▣ यदि किसी की गर्दन में चारों ओर छोटे-छोटे पिण्ड हों तो कई तकलीफें एक साथ हो सकती हैं। जैसे-हृदय शूल, कान दर्द, गंजा पन आदि। ऐसे लोगों के सिर में भी गाँठें बनने की पूरी-पूरी संभावना रहती है यानी भविष्य में कुछ रोग का खतरा रहता है।

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साहिब बन्दगी

गले के ट्यूमर के चिह्न

सिर को घुमाने पर यदि गर्दन में छोटे-छोटे माँस-पिण्ड दिखाई पड़े तो यह भी दूषित पदार्थ का जमाव है, जो होने वाले रोग की ओर इशारा करता है। यही जमाव आगे चलकर ट्यूमर की शक्ल ले लेता है।

दाँतों के रोग के चिह्न

कुछ लोगों की गर्दन के अगले भाग में सूजन होती है, जो कि गर्दन को ऊपर की ओर करने से दिख पड़ती है। फिर यही सूजन टुट्टी की तरफ आ रही होगी तो उसे दाँतों की तकलीफ़ होने की पूरी-पूरी संभावना होगी। उसके दाँत तो उम्र के पहले गिरेंगे-ही-गिरेंगे। फिर यदि समय रहते इलाज न किया गया तो यही सूजन आगे बढ़कर आँखों को भी परेशानी दे सकती है और बाल भी झड़ सकते हैं।

बवासीर के चिह्न

जब भी गर्दन का पिछला भाग मोटा हो जाए तो समझना कि दोषयुक्त पदार्थ शरीर के पिछले भाग से होता हुआ सिर तक पहुँच गया है। शरीर के पिछले भाग में दूषित पदार्थ जमा होने से बवासीर की संभावना आम हो जाती है।

सतगुरु

शब्द

सहाई।

निकट गये तन रोग न व्यापे, पाप ताप मिट जाई॥

रोगों के उपचार में जल-चिकित्सा का महत्व

रोगों के उपचार में जल-

चिकित्सा का महत्व

जल-चिकित्सा द्वारा मनुष्य के शरीर के भीतर मौजूद गंदे पदार्थ को निकाला जा सकता है। इसमें निम्नलिखित स्थानों का खास महत्व है—

मेहन स्नान (जन्म के बाद बच्चे का पहला स्नान)

  • ❑ बड़ा-सा टब लें।
  • ❑ टब में एक काठ या प्लास्टिक की चौकी रख लें, जो एक तरफ से चंद्रकार हो। (इसी पर आपको बैठना है)
  • ❑ उस टब में ठंडा पानी भरें। पानी इतना भरें कि चौकी पर आधा इंच तक आ जाए, ज्यादा ऊपर न आए।

अथवा

(यदि टब न हो)

  • ❑ बाल्टी में पानी भर लें और खुद किसी स्टूल पर बैठ जाएँ। अब कपड़े खोलकर उस चौकी पर या स्टूल पर बैठें। फिर मूत्रेन्द्रिय की ऊपरी खाल को एक हाथ की उँगलियों से पकड़कर आगे खींच लें ताकि अंदर वाला भाग पूरी तरह ढक जाए और फिर अत्यन्त मुलायम कपड़े से बहुत धीरे-धीरे रगड़ें। यह क्रिया आप 20-25 मिनट तक कर लें। फिर पीठ में रीढ़ की हड्डी को ऊपर से नीचे तक लगभग दो मिनट तक गीले तौलिये से रगड़ें। ध्यान रहे कि बाकी अंग सूखे रहें और पानी मूत्रेन्द्रिय के अंदर न जाए।

अगर स्त्री है तो वो मेहन-स्नान के लिए एक हाथ से योनि के दोनों ओठों को पकड़कर अत्यन्त मुलायम कपड़े से योनि के दोनों तरफ

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साहिब बन्दगी

के ओठों को धीरे-2 धोए। रीढ़ वैसे ही धोए।

नोट

  • □ स्नान के बाद शरीर को गर्म करना चाहिए। इसके लिए कंबल लेकर सोने के बजाय व्यायाम कर लेना बेहतर है।
  • □ साधारण स्नान डेढ़ घण्टे के अंतराल के बाद ही करना चाहिए, पहले नहीं।
  • □ मेहन स्नान को शुरू में 5 मिनट से बढ़ाकर 20 मिनट तक पहुँचें।

मेहन स्नान निम्नलिखित रोगों के निदान में सहायक

नपुंसकता, स्वप्न-दोष, स्नायु-दुर्बलता, अनिद्रा, पागलपन आदि।

सावधानी: मासिक धर्म में मत करें।

कटि स्नान (जन्म के बाद बच्चे का दूसरा स्नान)

  • □ एक बड़ा-सा ढलान वाला टब लें, जिसमें बैठकर आपके सिर और पीठ को पीछे सहारा मिल जाए।
  • □ टब में ठंडा पानी इतना भरें कि बैठने पर पानी नाभि तक आ जाए।
  • □ टब के बाहर एक चौकी रख लें जिसपर आप अपने पाँव रख सकें।

अब टब में बैठकर पैरों को बाहर चौकी पर रखें। एक खुरदरा तौलिया लें और पेट को दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ धीरे-धीरे मलते जाएँ। बाकी अंग सूखे ही रहने चाहिए। यह क्रिया 15 मिनट करें। बाद में सूखे तौलिये से उस स्थान को साफ़ कर लें।

अथवा

(टब न होने पर)

  • □ एक चौकी पर गीला कपड़ा बिछाकर दीवार के पास रखें।
  • □ एक अन्य चौकी उससे इतनी दूर रखें कि उसपर बैठने पर दूसरी

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चौकी पर पैर रखे जा सकें।

❑ पास में पानी से भरी बाल्टी रख लें।

अब उस गीले कपड़े वाली चौकी पर बैठें और पैरों को दूसरी चौकी पर रखें। अब कपड़े को पानी की बाल्टी में डालकर भिगोते जाएँ और पेट को वैसे ही दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ मलते जाएँ।

नोट

❑ पैर, टोंगें आदि अन्य अंग सूखे रहें।

❑ आप 5 मिनट से शुरू करके धीरे-धीरे बढ़ाकर 15 मिनट तक पहुँचें।

❑ बच्चे 5 मिनट ही करें।

❑ साधारण स्नान इसके डेढ़ घण्टे बाद ही करें। यदि पहले करना हो तो भी इतना समय ही पहले करें।

कटिस्नान निम्नलिखित रोगों के निदान में सहायक

ज्वर, बवासीर, मन्दगनि पागलपन, प्रदर, कैंसर, क्षय-रोग, सिर-दर्द, कब्ज, बाँझपन, लकवा आदि।

सावधानी : हृदय रोग, गठिया, निमोनिया, मासिक धर्म में यह स्नान मत करें।

पूर्ण टब का गर्म स्नान

एक बड़े सीमेंट के टब में गर्म पानी डालें और कपड़े खोलकर उसमें लेट जाएं, पर सिर बाहर की तरफ रहे। एक अन्य आदमी सिर पर गीला तौलिया रखकर उसपर थोड़ा-2 ठंडा पानी समय-2 पर डालता जाए। यह भी ध्यान रहे कि टब का गर्म पानी ठंडा होने पर और गर्म पानी भी डालता जाए। 10-12 मिनट रोगी उस टब में लेटा रहे। फिर अपने शरीर को रगड़े और बाहर आ जाए। अब ठंडे पानी से अच्छी तरह स्नान करे और वस्त्र ओढ़कर कुछ समय तक के लिए लेट जाए।

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साहिब बन्दगी

पूर्ण टब स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—

गठिया, लकवा, कमर दर्द, दमा आदि।

भाप स्नान

❑ दो चूल्हों पर दो बर्तनों में पानी उबालें।

रोगी को एक गिलास गर्म पानी पिलाएँ और उसके कपड़े उतारकर बेंत की बुनी किसी कुर्सी पर बिठाएँ। रोगी के ऊपर कंबल इस तरह डाल दें कि वो कुर्सी सहित ढक जाए, केवल सिर नंगा रहे।

अब उबले हुए पानी का बर्तन लाकर उस कुर्सी के नीचे रख दें और बर्तन का ढक्कन थोड़ा खुला रखें। जब लगे कि भाप निकलना बंद हो रही है तो दूसरा उबलते हुए पानी का पतीला लाकर वहाँ रखें और उसे उठाकर पुनः उबलने को रखें। 10 से 15 मिनट तक भाप स्नान ले सकते हैं। बाद में ठंडे पानी से नहा लें।

नोट

❑ यह स्नान बेंत की बुनी चारपाई पर लिटाकर भी लिया जा सकता है। पर नीचे बर्तन कम-से-कम दो रखें—एक टाँगों के नीचे और दूसरा पीठ के नीचे।

❑ यदि बीच में अधिक घबराहट होने लगे तो उसी समय यह स्नान बंद कर दें।

❑ इस स्नान से आई गर्मी को दूर करने के लिए 5 मिनट का कटि-स्नान लें, जिसमें पेड़ स्थान को न मलें।

❑ हफ्ते-हफ्ते ही यह स्नान करें।

भाप स्नान से रोगों का निदान

हैजा, गठिया, पथरी, गुर्दे की खराबी, दमा, मोटापा, मूत्र-रोग आदि

सावधानी: कुछ रोगी, गर्भवती स्त्री, स्नायु दुर्बलता से पीड़ित

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व्यक्ति, क्षय रोगी, हृदय रोगी, तीव्र ज्वर से पीड़ित, रक्तचाप से पीड़ित लोग यह स्नान मत लें।

नेत्र स्नान

सुबह-शाम ठण्डे पानी से मुख भरकर ठण्डे पानी से ही आँखों में छीटे मारें।

नेत्र स्नान से मिलने वाला लाभ

आँखों की ज्योति बढ़ती है।

नासिका स्नान

❑ एक टॉंटीदार लोटा लें।

❑ लोटे में गुनगुना या शीतल जल डालें।

अब घुटनों के बल बैठ जाएँ और लोटे की टॉंटी नासिका के एक तरफ डालें। गर्दन को एक तरफ घुमा लें ताकि पानी आसानी से नाक में चला जाए। साथ ही पानी को दूसरी नासिका से बाहर निकालते जाएँ। यदि शुरू में ऐसा न हो सके तो मुँह से ही निकाल लें।

नोट

❑ यह स्नान आप रोज कर सकते हैं।

नासिका स्नान से मिलने वाला लाभ

नेत्र ज्योति बढ़ती है, याददाश्त में वृद्धि होती है, जुकाम ठीक होता है।

पैर का गर्म स्नान

❑ एक पतीले में गर्म पानी उबालें।

❑ एक बाल्टी में इतना गर्म पानी डालें, जिसमें आपके पैर पूरी तरह से डूब जाएँ। पानी इतना गर्म हो कि आपके पैर सह सकें।

अब एक कुर्सी पर बैठ बाल्टी सहित अपने को किसी कम्बल

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साहिब बन्दगी

से लपेट लें। और पैरों को बाल्टी में डाल दें। सिर पर ठंडे पानी में भिगोया हुआ तौलिया रख दें और समय-समय पर ठंडक कम होने से साथ-2 उसे बदलते रहना चाहिए। जैसे ही लगे कि पानी की गर्मी कम हो गयी है तो थोड़ा गर्म पानी और डाल लें। विशेष ध्यान रहे कि पानी पैरों पर सीधा न पड़े, जिससे पाँव न जलने पाएँ। 15 मिनट यह स्नान लेने के बाद पावों को ठण्डे पानी से धोकर पोछ लें।

पैर स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—

हृदय-रोग, दमा, अनिद्रा, रक्तचाप, मासिक धर्म, जुकाम, लकवा, सिर दर्द आदि।

स्थानीय भाप स्नान

  • □ एक पतीले में पानी उबालें।
  • □ एक टॉंटीदार बर्तन में पानी को डालें। बर्तन का ढक्कन पूरी तरह से ढका हुआ हो।

अब जिस अंग में सूजन है, उसी अंग को भाप का यह स्नान दें। बाद में गीले कपड़े से पोंछ लें। फिर कोई गर्म कपड़ा 5 मिनट के लिए लपेट दें।

नोट

  • □ यह स्नान रोज़ लिया जा सकता है।

स्थानीय भाप स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभकारी है—

छाती, पेट, पीठ, मुँह, हाथ, पाँव आदि अंगों में सूजन हो तो उन अंगों को यह स्नान देना लाभकारी सिद्ध होता है।

गर्म-ठंडा पूर्ण स्नान

नहाते समय आपके पास एक गर्म पानी की बाल्टी और दूसरी ठण्डे पानी की बाल्टी होनी चाहिए। अब अपने सिर पर थोड़ा ठण्डा जल फेंककर तौलिया बाँधें दें ताकि सिर पर गर्म पानी न गिरने पाए। फिर गर्म

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पानी के दो लोटे शरीर पर डालकर रगड़ें। इसके बाद ठण्डे जल का एक लोटा डालें और रगड़ें। ऐसा बार-बार करें। कोई 5 बार कर लें। अंत में जब ठण्डे पानी का लोटा डालें तो स्नान बंद कर दें और तौलिये से शरीर को पौछ लें। सिर पर बाँधा तौलिया भी उतार दें।

गर्म-ठंडा पूर्ण स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—

कमर दर्द, पीठ में दर्द, कंधों में दर्द, टाँगों में दर्द और अन्य दर्दों में लाभकारी है।

गर्म सेंक

एक पतली में गर्म पानी करके रख लें। अब जिस अंग में रोग हो, उसपर नारियल का पानी लगाकर एक सूखा कपड़ा रख दें। फिर एक तौलिये को उस गर्म पानी में डालकर बाहर निकालें और निचोड़ लें। अब उस अंग पर रखें और ऊपर से कोई मोटा या ऊनी कपड़ा डाल दें। जब लगे कि कपड़े की गर्मी कम हो गयी है तो पुनः गर्म पानी में डालकर वैसा ही करें। बाद में ठंडे गीले तौलिये से उस अंग को मलें और कोई ऊनी कपड़ा लपेट दें।

नोट

□ यह सेंक 20-30 मिनट दें।

यह सेंक निम्नलिखित रोगों में लाभकारी है—

मोच, जिगर में पीड़ा, किसी भी अंग में दर्द।

धूप स्नान

सारे कपड़े खोलकर किसी एकांत स्थान में, जहाँ धूप पड़ती हो, बैठकर धूप-स्नान लिया जा सकता है। इसका समय सूर्य निकलने के बाद एक-डेढ़ घण्टे के अंदर ही होता है। कम-से-कम 15 मिनट तक यह स्नान लें।

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साहिब बन्दगी

नोट

यदि एकांत स्थान न मिले तो सफेद कपड़ा पहन लें।

साधारण स्नान

साधारण स्नान की भी वास्तव में एक विधि है। जब भी आप नहाएँ, पहले हाथों से या किसी तौलिये से अपने शरीर को अच्छी तरह रगड़ लें। यह रगड़ना ऊपर से शुरू करें और नीचे पैरों में ख़त्म।

नोट

साधारणतया ठण्डे पानी से नहाएँ, ताकि रक्त का संचालन ठीक रहे और चुस्ती बनी रहे।

हफ्ते में एक बार गर्म पानी से नहाएँ, ताकि आपके रोम छिद्र खुल जाएँ और गंदगी भी अच्छी तरह से साफ़ हो।

अधिक ठण्ड होने पर गुनगुने पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।

रोज़ गर्म पानी से मत नहाएँ। इससे पाचन-क्रिया कमजोरी होती है, शरीर में सुस्ती बढ़ती है।

साधारण स्नान भोजन के बाद करना हो तो कम-से-कम ढाई घण्टे बाद करें। अन्यथा साधारणतया भोजन के आधे से एक घण्टा पहले ही करें।

व्यायाम या शारीरिक श्रम से आई हुई थकान को दूर करने के बाद ही स्नान करना चाहिए।

सत्यनाम निज औषधि, सतगुरु देइ बताय।

औषध खाय अरू पथ रहै, ताकी वेदन जाये॥

बीमारियों से बचे रहने के सरल और बेहतरीन उपाय

बीमारियों से बचे रहने के सरल और बेहतरीन उपाय

कसरत

हररोज कम-से-कम आधा घण्टा व्यायाम करें। 27 डण्ड, 27 बैठक निकालें और इतने ही लेटकर सिटअप निकालें। अन्य व्यायाम भी कर सकते हैं। व्यायाम शुरू करने से पहले शरीर पर देसी तेल या घी की मालिश जरूर करें। यह कसरत सुबह-शाम दोनों समय भी कर सकते हैं। शाम के समय करें तो भोजन के कम-से-कम तीन घण्टे बाद ही करें।

प्राणायाम

शरीर में अधिकांश रोग वायु-विकार से ही होते हैं और प्राणायाम इस वायु-विकार को ठीक कर लेता है। इसलिए सुबह-सुबह यह प्राणायाम भी 5 मिनट कर लें।

उपवास

10 दिन में एक बार व्रत रखना चाहिए। यह व्रत कैसे रखना, ध्यान से समझें। पूरा दिन कुछ नहीं खाना; रात को भी नहीं खाना; केवल पानी पी लें। सुबह उठकर एक बड़ा गिलास पानी पीकर शौच जाना। बड़ा सख्त मल बाहर आयेगा; आँतें खुलेंगी। फिर मुँह-हाथ धोकर 4 लीटर पानी पीना। पेट में गैस होगी, इसलिए डकारते जाना, गैस बाहर निकालते जाना और पानी पीते जाना। ऐसे में दिल घबराने लगेगा। चिंता नहीं करना। शुरू-2 में मुश्किल आयेगी, फिर आसान हो जायेगा। इतना

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साहिब बंदगी

पानी पीना कि आँतों के नीचे उतर जाए। अब शौच जाने की इच्छा होगी। पहले तो रोटी के सड़े हुए अंश, काले-काले दाने, छिलके आदि, जो शरीर में फँसे होंगे, पानी के साथ बाहर आयेंगे। ये ही गैस बनाते हैं। फिर पीला-पीला पानी बाहर आयेगा। यदि पानी नीचे से उतरे तो थोड़ा हिलना-डुलना। तो तीसरी बार अब बची-खुची गंदगी के साथ थोड़ा-थोड़ा साफ पानी निकलेगा। चौथी बार नल की तरह साफ पानी बाहर आयेगा। फिर हाथ साफ करके मुँह में अंगुली डालकर बचा पानी भी बाहर निकाल लेना। इसके बाद अब हल्का भोजन करना। जब ऐसा व्रत होगा तो शरीर का वात, पित्त और कफ सब ठीक हो जायेगा, इसलिए रोग नहीं हो पायेंगे।

योगासन

योगासन भी शरीर को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए यह भी आधा घण्टा तक कर सकते हैं।

भोजन में सावधानी बरतें

  • □ भोजन करते समय पानी 1-2 घूँट करके ही पिएँ। बहुत अधिक पानी भोजन के साथ मत लें। भोजन के साथ घूँट-2 पानी अमृत समान है, लेकिन बहुत अधिक पानी ठीक नहीं। भोजन के तुरंत बाद पानी मत पिएँ, यह विष समान है।
  • □ एक बार भोजन करके दूसरी बार भोजन करने में पाँच-छः घण्टे का अंतर जरूर रखें।
  • □ भोजन को चबा-चबाकर तरल बनाकर खाएँ।
  • □ हो सके तो भोजन खुली-ताजी-स्वच्छ हवा और धूप में खाएँ। पर यदि कमरे में खाना हो तो ताजी हवा के आने का मार्ग बंद न करें।
  • □ भोजन का समय भी निश्चित होना चाहिए। असमय भोजन करना भी हानिकारक हो जाता है। यदि आप शाम को 6 बजे भोजन

रोगों की पहचान

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करते हैं तो ज्यादा-से-ज्यादा साढ़े छः ही होने दें।

  • ❑ सुबह पाचन-शक्ति तेज होती है, फिर यह शाम तक लगातार धीरे-धीरे कम होती जाती है, इसलिए भोजन का अधिक अंश सुबह ही कर लें। शाम को कम भोजन करना चाहिए और रात को सोते समय तो बिल्कुल भी नहीं खाना चाहिए।
  • ❑ शाम का भोजन सोने से कम-से-कम दो घण्टा पहले होना चाहिए। ऐसे में नींद भी अच्छी आयेगी।
  • ❑ चखो पर चरो मत, चरो तो फरो, न फरो तो मरो। किसी ने कितना प्यारा कहा है। भोजन के मामले में अल्प आहारी बनें। यानी कुछ भी खाना हो, बहुत ज्यादा नहीं खाएँ। यदि ज्यादा खा लिया तो फिर सैर कर लो। यदि खुराक बहुत है और सैर भी नहीं करते हो तो जल्दी मरने के लिए तैयार रहो।

पानी में सावधानी बरतें

जल को ऋग्वेद में परम औषधी कहा गया है।

सर्वेषाम् भेषजम् आपुं में॥

अर्थात-जल में सभी प्रकार की औषधियाँ हैं। अथर्ववेद भी कह रहा है-

अप्सवन्तर मुतमप्सु भेषजम्॥

अर्थात-जल में अमृत है, जल में औषधी है। पर हमें जल पीने का समय पता होना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है-

अजीर्णो भेषजं बारि, जीर्णो बारि बलप्रदम्।

भोजने चामृतो बारि, भोजनान्ते विषप्रदम्॥

जब भोजन न किया जाए, केवल जल का ही सेवन किया जाए, तब जल औषधी का काम करता है। जब भोजन पच जाए तब जल बल प्रदान करता है। जब भोजन के बीच में थोड़ा-2 जल पिया जाए, तब जल अमृत समान होता है। पर भोजन करने के ठीक बाद पिया हुआ जल

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साहिब बन्दगी

विष-तुल्य होता है।

इसलिए जल पीने के मामले में निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए—

  • ❑ पानी पीने की मात्रा आयु और मौसम के अनुसार होनी चाहिए।
  • ❑ साधारणतया हररोज़ दो लीटर पानी ज़रूर पीना चाहिए।
  • ❑ सुबह उठकर एक बड़े गिलास पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर पीना मल की सही सफाई के लिए बड़ा लाभाकारी होता है।
  • ❑ जल घूँट-2 करके पीना चाहिए। दो-तीन सैकेण्ड मुँह में रखने के बाद ही नीचे उतारना चाहिए।
  • ❑ जो जल आप पी रहे हैं, ध्यान रहे कि वो न अधिक गर्म हो और न अधिक ठण्डा। चाहे कितनी भी गर्मी हो, पर अधिक ठण्डे जल का सेवन मत करें। वो हानिकारक ही होता है।
  • ❑ भूख लगने पर पानी मत पिएँ, इससे जलोदर रोग हो सकता है।

पानी का पीना निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—

थोड़े-थोड़े समय के अंतराल में एक बड़ा गिलास ठण्डा पानी पीते रहना पत्थरी, उच्च रक्तचाप, ज्वर, कब्ज आदि रोगों में लाभकारी सिद्ध होता है।

इसके अतिरिक्त यदि नींद न आए तो किसी खुले बर्तन में पानी डालें। 8 मिनट तक दोनों पैर उसमें डाले रखें। सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडे पानी का सहारा ले सकते हैं। फिर यदि पेशाब रुक-रुक कर आता हो तो ठंडे-ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर नाभि स्थान के नीचे रखें। इस तरह पानी के बहुत गुण हैं। पर सावधानी बरतें कि पानी स्वच्छ पिएँ। यदि पानी स्वच्छ न हो तो उबालकर उसे ठंडा करके पिएँ।