भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ३६ ]

  • साधक-संजीवनी *

२५१

लिये 'स्वधर्म' हो जाता है, और जब शरीर-संसारको अपना मान लेता है, तब यह उसके लिये 'परधर्म' हो जाता है, जो कि शरीर-धर्म है। जब मनुष्य शरीरसे अपना सम्बन्ध न मानकर परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करता है, तब वह साधन उसका 'स्वधर्म' होता है। नित्यप्राप्त परमात्माका अथवा अपने स्वरूपका अनुभव करानेवाले सब साधन 'स्वधर्म' हैं और संसारकी ओर ले जानेवाले सब कर्म 'परधर्म' हैं। इस दृष्टिसे कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही योगमार्ग मनुष्यमात्रके 'स्वधर्म' हैं। इसके विपरीत शरीरसे अपना सम्बन्ध मानकर भोग और संग्रहमें लगना मनुष्यमात्रका 'परधर्म' है।

स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों शरीरोंसे किये जानेवाले तीर्थ, व्रत, दान, तप, चिन्तन, ध्यान, समाधि आदि समस्त शुभ-कर्म सकामभावसे अर्थात् अपने लिये करनेपर 'परधर्म' हो जाते हैं और निष्कामभावसे अर्थात् दूसरोंके लिये करनेपर 'स्वधर्म' हो जाते हैं। कारण कि स्वरूप निष्काम है और सकामभाव प्रकृतिके सम्बन्धसे आता है। इसलिये कामना होनेसे परधर्म होता है। स्वधर्म मुक्त करनेवाला और परधर्म बाँधनेवाला होता है।

परिशिष्ट भाव— साधक जन्म और कर्मके अनुसार 'स्व' को अर्थात् अपनेको जो मानता है, उसका धर्म (कर्तव्य) उसके लिये 'स्वधर्म' है और जो उसके लिये निषिद्ध है, वह 'परधर्म' है, जैसे, साधक अपनेको किसी वर्ण और आश्रमका मानता है तो उस वर्ण और आश्रमका धर्म उसके लिये स्वधर्म है। वह अपनेको विद्यार्थी या अध्यापक मानता है तो पढ़ना या पढ़ाना उसके लिये स्वधर्म है। वह अपनेको सेवक, जिज्ञासु या भक्त मानता है तो सेवा, जिज्ञासा या भक्ति उसके लिये स्वधर्म है। जिसमें दूसरेके अहितका, अनिष्टका भाव होता है, वह चोरी, हिंसा आदि कर्म किसीके भी स्वधर्म नहीं हैं, प्रत्युत कुधर्म अथवा अधर्म हैं*।

निष्कामभावसे दूसरेके हितके लिये कर्म करना (कर्मयोग) स्वधर्म है। स्वधर्मको ही गीतामें सहज कर्म, स्वकर्म और स्वभावज कर्म नामसे कहा गया है।

कर्तव्यके विरुद्ध कर्म करना ही अकर्तव्य है और कर्तव्यका पालन न करना भी अकर्तव्य है (गीता—दूसरे अध्यायका तैत्तिस्वां श्लोक)।

सम्बन्ध—'स्वधर्म कल्याणकारक और परधर्म भयावह है'—ऐसा जानते हुए भी मनुष्य स्वधर्ममें प्रवृत्त क्यों नहीं होता? इसपर अर्जुन प्रश्न करते हैं।

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।

अनिच्छन्नपि वाष्यीय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥

  • प्रत्येक धर्ममें कुधर्म, अधर्म और परधर्म—ये तीनों होते हैं। दूसरेके अनिष्टका भाव, कूटनीति आदि 'धर्ममें कुधर्म' हैं। यज्ञमें पशुबलि देना आदि 'धर्ममें अधर्म' है। जो अपने लिये निषिद्ध है, ऐसा दूसरे वर्ण, आश्रम आदिका धर्म 'धर्ममें परधर्म' है। कुधर्म, अधर्म और परधर्म—इन तीनोंसे कल्याण नहीं होता। कल्याण उस धर्मसे होता है, जिसमें अपने स्वार्थ तथा अभिमानका त्याग एवं दूसरेका वर्तमानमें और भविष्यमें हित होता हो।

२५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

अर्जुन बोले—

वाष्ण्यं= हे वाष्ण्य !अपि= भीकेन= किससे
अथ= फिरबलात्= जबर्दस्तीप्रयुक्तः= प्रेरित होकर
अयम्= यहनियोजितः= लगायेपापम्= पापका
पुरुषः= मनुष्यहुएकीचरति= आचरण करता
अनिच्छन्= न चाहता हुआइव= तरहहै ?

व्याख्या—‘अथ केन प्रयुक्तोऽयं ..... बलादिव नियोजितः’—यदुकुलमें ‘वृष्णि’ नामका एक वंश था। उसी वृष्णिवंशमें अवतार लेनेसे भगवान् श्रीकृष्णका एक नाम ‘वाष्ण्यं’ है। पूर्वश्लोकमें भगवान्ने स्वधर्म-पालनकी प्रशंसा की है। धर्म ‘वर्ण’ और ‘कुल’ का होता है; अतः अर्जुन भी कुल-(वंश-) के नामसे भगवान्को सम्बोधित करके प्रश्न करते हैं।

विचारवान् पुरुष पाप नहीं करना चाहता; क्योंकि पापका परिणाम दुःख होता है और दुःखको कोई भी प्राणी नहीं चाहता।

यहाँ ‘अनिच्छन्’ पदका तात्पर्य भोग और संग्रहकी इच्छाका त्याग नहीं, प्रत्युत पाप करनेकी इच्छाका त्याग है। कारण कि भोग और संग्रहकी इच्छा ही समस्त पापोंका मूल है, जिसके न रहनेपर पाप होते ही नहीं।

विचारशील मनुष्य पाप करना तो नहीं चाहता, पर भीतर सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छा रहनेसे वह करनेयोग्य कर्तव्य कर्म नहीं कर पाता और न करनेयोग्य पाप-कर्म कर बैठता है।

‘अनिच्छन्’ पदकी प्रबलताको बतानेके लिये अर्जुन ‘बलादिव नियोजितः’ पदोंको कहते हैं। तात्पर्य यह है कि पापवृत्तिके उत्पन्न होनेपर विचारशील पुरुष उस पापको जानता हुआ उससे सर्वथा दूर रहना चाहता है; फिर भी वह उस पापमें ऐसे लग जाता है, जैसे कोई उसको जबर्दस्ती पापमें लगा रहा हो। इससे ऐसा मालूम होता है कि पापमें लगानेवाला कोई बलवान् कारण है।

पापोंमें प्रवृत्तिका मूल कारण है—‘काम’ अर्थात् सांसारिक सुख-भोग और संग्रहकी कामना। परन्तु इस कारणकी ओर दृष्टि न रहनेसे मनुष्यको यह पता नहीं चलता कि पाप करानेवाला कौन है ? वह यह समझता है कि मैं तो पापको जानता हुआ उससे निवृत्त होना चाहता हूँ, पर मेरेको कोई बलपूर्वक पापमें प्रवृत्त करता है; जैसे दुर्घोधनने कहा है—

जानाभि धर्म न च मे प्रवृत्तिर्जानाभ्यधर्म न च मे निवृत्तिः । केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ॥

(गर्गसंहिता, अश्वमेधो ५०। ३६)

‘मैं धर्मको जानता हूँ, पर उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्मको भी जानता हूँ, पर उससे मेरी निवृत्ति नहीं होती। मेरे हृदयमें स्थित कोई देव है, जो मेरेसे जैसा करवाता है, वैसा ही मैं करता हूँ।’

दुर्घोधन द्वारा कहा गया यह ‘देव’ वस्तुतः ‘काम’ (भोग और संग्रहकी इच्छा) ही है, जिससे मनुष्य विचारपूर्वक जानता हुआ भी धर्मका पालन और अधर्मका त्याग नहीं कर पाता।

‘केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति’ पदोंसे भी ‘अनिच्छन्’ पदकी प्रबलता प्रतीत होती है। तात्पर्य यह है कि विचारवान् मनुष्य स्वयं पाप करना नहीं चाहता; कोई दूसरा ही उसे जबर्दस्ती पापमें प्रवृत्त करा देता है। वह दूसरा कौन है ?—यह अर्जुनका प्रश्न है।

भगवान्ने अभी-अभी चौतीसवें श्लोकमें बताया है कि राग और द्वेष (जो काम और क्रोधके ही सूक्ष्म रूप हैं) साधकके महान् शत्रु हैं अर्थात् ये दोनों पापके कारण हैं। परन्तु वह बात सामान्य रीतिसे कहनेके कारण अर्जुन उसे पकड़ नहीं सके। अतः वे प्रश्न करते हैं कि मनुष्य विचारपूर्वक पाप करना न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है ?

अर्जुनके प्रश्नका अभिप्राय यह है कि (इकतीसवेंसे लेकर पैंतीसवें श्लोकतक देखते हुए) अश्रद्धा, असूया, दुष्टचित्ता, मूढ़ता, प्रकृति-(स्वभाव-) की परवशता, राग-द्वेष, स्वधर्ममें अरुचि और परधर्ममें रुचि—इनमेंसे कौन-सा कारण है, जिससे मनुष्य विचारपूर्वक न चाहता हुआ भी पापमें प्रवृत्त होता है ? इसके अलावा ईश्वर, प्रारब्ध, युग, परिस्थिति, कर्म, कुसंग, समाज, रीतिरिवाज, सरकारी कानून आदिमेंसे भी किस कारणसे मनुष्य पापमें प्रवृत्त होता है ?

श्लोक ३७]

  • साधक-संजीवनी *

२५३

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥

श्रीभगवान् बोले—

रजोगुणसमुद्भवः= रजोगुणसेहै।महापाप्मा= महापापी है।
उत्पन्नइह= इस विषयमें
एषः= यहएषः= यह (काम ही)(तू)
कामः= काम अर्थात्क्रोधः= क्रोध (में परिणत
कामना (ही)होता) है।एनम्= इसको (ही)
पापका कारणमहाशनः= (यह) बहुतवैरिणम्= वैरी
खानेवाला (और)विद्धि= जान।

व्याख्या—‘रजोगुणसमुद्भवः’ —आगे चौदहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान् कहेंगे कि तृष्णा (कामना) और आसक्तिसे रजोगुण उत्पन्न होता है और यहाँ यह कहते हैं कि रजोगुणसे काम उत्पन्न होता है। इससे यह समझना चाहिये कि रागसे काम उत्पन्न होता है और कामसे राग बढ़ता है। तात्पर्य यह है कि सांसारिक पदार्थोंको सुखदायी माननेसे राग उत्पन्न होता है, जिससे अन्तःकरणमें उनका महत्त्व दृढ़ हो जाता है। फिर उन्हीं पदार्थोंका संग्रह करने और उनसे सुख लेनेकी कामना उत्पन्न होती है। पुनः कामनासे पदार्थोंमें राग बढ़ता है। यह क्रम जबतक चलता है, तबतक पाप-कर्मसे सर्वथा निवृत्ति नहीं होती।

‘काम एष क्रोध एषः’ —मेरी मनचाही हो—यही काम है। उत्पत्ति-विनाशशील जड़-पदार्थोंके संग्रहकी इच्छा, संयोगजन्य सुखकी इच्छा, सुखकी आसक्ति—ये सब कामके ही रूप हैं।

पाप-कर्म कहीं तो ‘काम’के वशीभूत होकर और कहीं ‘क्रोध’ के वशीभूत होकर किया गया दीखता है। दोनोंसे अलग-अलग पाप होते हैं। इसलिये दोनों पद दिये। वास्तवमें काम अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामना, प्रियता, आकर्षण ही समस्त पापोंका मूल है। कामनामें बाधा लगनेपर काम ही क्रोधमें परिणत हो जाता

है। इसलिये भगवान्ने एक कामनाको ही पापोंका मूल बतानेके लिये उपर्युक्त पदोंमें एकवचनका प्रयोग किया है।

कामनाकी पूर्ति होनेपर ‘लोभ’ उत्पन्न होता है और कामनामें बाधा पहुँचनेपर (बाधा पहुँचानेवालेपर) ‘क्रोध’ उत्पन्न होता है। यदि बाधा पहुँचानेवाला अपनेसे अधिक बलवान् हो तो क्रोध उत्पन्न न होकर ‘भय’ उत्पन्न होता है। इसलिये गीतामें कहीं-कहीं कामना और क्रोधके साथ-साथ भयकी भी बात आयी है; जैसे—‘वीतरागभयक्रोधाः’ (४।१०) और ‘विगतेच्छाभयक्रोधः’ (५।२८)।

कामना-सम्बन्धी विशेष बात

कामना सम्पूर्ण पापों, सन्तापों, दुःखों आदिकी जड़ है। कामनावाले व्यक्तिको जाग्रतमें सुख मिलना तो दूर रहा, स्वप्नमें भी कभी सुख नहीं मिलता—‘काम अछत सुख सपनेहूँ नाहीं’ (मानस ७।१०।१)। जो चाहते हैं, वह न हो और जो नहीं चाहते, वह हो जाय—इसीको दुःख कहते हैं। यदि ‘चाहते’ और ‘नहीं चाहते’ को छोड़ दें, तो फिर दुःख है ही कहाँ!

नाशवान् पदार्थोंकी इच्छा ही कामना कहलाती है। अविनाशी परमात्माकी इच्छा कामनाके समान प्रतीत होती हुई भी वास्तवमें ‘कामना’ नहीं है; क्योंकि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामना कभी पूरी नहीं होती, प्रत्युत

१-‘इदं मे स्यादिदं मे स्यादितिच्छा कामशब्दिता’ (‘यह मुझे मिल जाय, यह मुझे मिल जाय’—इस प्रकारकी इच्छा ‘काम’ कहलाती है)।

२-यद्यपि भगवत्सदत्त विवेकको महत्त्व न देना और भगवान्से विमुख होना भी पापमें हेतु है, तथापि यहाँ ‘काम’ को ही पापका हेतु इसलिये बताया गया है कि यह (तीसरा) अध्याय ‘कर्मयोग’ का है और कर्मयोगका प्रधान लक्ष्य कामनाको मिटाना ही है।

३-‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई’ (मानस १।१८०।१; ६।१०२।१)।

२५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

बढ़ती ही रहती है, पर परमात्माकी इच्छा (परमात्मप्राप्ति होनेपर) पूरी हो जाती है। दूसरी बात, कामना अपनेसे भिन्न वस्तुकी होती है और परमात्मा अपनेसे अभिन्न है। इसी प्रकार सेवा (कर्मयोग), तत्त्वज्ञान (ज्ञानयोग) और भगवत्प्रेम- (भक्तियोग-) की इच्छा भी 'कामना' नहीं है। परमात्मप्राप्तिकी इच्छा वास्तवमें जीवनकी वास्तविक आवश्यकता (भूख) है। जीवको आवश्यकता तो परमात्माकी है, पर विवेकके दब जानेपर वह नाशवान् पदार्थोंकी कामना करने लगता है।

एक शंका हो सकती है कि कामनाके बिना संसारका कार्य कैसे चलेगा? इसका समाधान यह है कि संसारका कार्य वस्तुओंसे, क्रियाओंसे चलता है, मनकी कामनासे नहीं। वस्तुओंका सम्बन्ध कर्मोंसे होता है, चाहे वे कर्म पूर्वके (प्रारब्ध) हों अथवा वर्तमानके (उद्योग)। कर्म बाहरके होते हैं और कामनाएँ भीतरकी। बाहरी कर्मोंका फल भी (वस्तु, परिस्थिति आदिके रूपमें) बाहरी होता है।

कामनाका सम्बन्ध फल- (पदार्थ, परिस्थिति आदि-) की प्राप्तिके साथ है ही नहीं। जो वस्तु कर्मके अधीन है, वह कामना करनेसे कैसे प्राप्त हो सकती है? संसारमें देखते ही हैं कि धनकी कामना होनेपर भी लोगोंकी दरिद्रता नहीं मिटती। जीवन्मुक्त महापुरुषोंको छोड़कर शेष सभी व्यक्ति जीनेकी कामना रखते हुए ही मरते हैं। कामना करें या न करें, जो फल मिलनेवाला है, वह तो मिलेगा ही। तात्पर्य यह है कि जो होनेवाला है, वह तो होकर ही रहेगा और जो नहीं होनेवाला है वह कभी नहीं होगा, चाहे उसकी कामना करें या न करें। जैसे कामना न करनेपर भी प्रतिकूल परिस्थिति आ जाती है, ऐसे ही कामना न करनेपर अनुकूल परिस्थिति भी आयेगी ही। रोगकी कामना किये बिना भी रोग आता है और कामना किये बिना भी नीरोगता रहती है। निन्दा-अपमानकी कामना न करनेपर भी निन्दा-अपमान होते हैं और कामना किये बिना भी प्रशंसा-सम्मान होते हैं। जैसे प्रतिकूल परिस्थिति कर्मोंका फल है, ऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी कर्मोंका ही फल है, इसलिये वस्तु, परिस्थिति आदिका प्राप्त होना अथवा न होना कर्मोंसे सम्बन्ध रखता है, कामनासे नहीं।

कामना तात्कालिक सुखकी भी होती है और भावी सुखकी भी। भोग और संग्रहकी इच्छा तात्कालिक सुखकी कामना है और कर्मफलप्राप्तिकी इच्छा भावी सुखकी कामना है। इन दोनों ही कामनाओंमें दुःख-ही-दुःख है। कारण कि कामना केवल वर्तमानमें ही दुःख नहीं देती,

प्रत्युत भावी जन्ममें कारण होनेसे भविष्यमें भी दुःख देती है। इसलिये इन दोनों ही कामनाओंका त्याग करना चाहिये।

कर्म और विकर्म (निषिद्धकर्म)—दोनों ही कामनाके कारण होते हैं। कामनाके कारण 'कर्म' होते हैं और कामनाके अधिक बढ़नेपर 'विकर्म' होते हैं। कामनाके कारण ही असत्में आसक्ति दृढ़ होती है। कामना न रहनेसे असत्से सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।

कामना पूरी हो जानेपर हम उसी अवस्थामें आ जाते हैं जिस अवस्थामें हम कामना उत्पन्न होनेसे पहले थे। जैसे, किसीके मनमें कामना उत्पन्न हुई कि मेरेको सौ रुपये मिल जायें। इसके पहले उसके मनमें सौ रुपये पानेकी कामना नहीं थी; अतः अनुभवसे सिद्ध हुआ कि कामना उत्पन्न होनेवाली है। जबतक सौ रुपयोंकी कामना उत्पन्न नहीं हुई थी, तबतक 'निष्कामता' की स्थिति थी। उद्योग करनेपर यदि प्रारब्धवशात् सौ रुपये मिल जायें तो वही 'निष्कामता' की स्थिति पुनः आ जाती है। परन्तु सांसारिक सुखासक्तिके कारण वह स्थिति ठहरती नहीं और नयी कामना उत्पन्न हो जाती है कि मेरेको हजार रुपये मिल जायें। इस प्रकार न तो कामना पूरी होती है और न पूरी तृप्ति ही होती है। कोरे परिश्रमके सिवा कुछ हाथ नहीं लगता!

'काम' अर्थात् सांसारिक पदार्थोंकी कामनाका त्याग करना कठिन नहीं है। थोड़ा गहरा विचार करें कि वास्तवमें कामना छूटती ही नहीं अथवा टिकती ही नहीं? पता लगेगा कि वास्तवमें कामना टिकती ही नहीं! वह तो निरन्तर मिटती ही जाती है; किन्तु मनुष्य नयी-नयी कामनाएँ करके उसे बनाये रखता है। कामना उत्पन्न होती है और उत्पन्न होनेवाली वस्तुका मिटना अवश्यम्भावी है। इसलिये कामना स्वतः मिटती है। अगर मनुष्य नयी कामना न करे तो पुरानी कामना कभी पूरी होकर और कभी न पूरी होकर स्वतः मिट जाती है।

कामनाकी पूर्ति सभीके लिये और सदाके लिये नहीं है; परन्तु कामनाका त्याग सभीके लिये और सदाके लिये है। कारण कि कामना अनित्य और त्याग नित्य है। निष्काम होनेमें कठिनाई क्या है? हम निर्मम नहीं होते, यही कठिनाई है। यदि हम निर्मम हो जायें तो निष्काम होनेकी शक्ति आ जायगी और निष्काम होनेसे असंग होनेकी शक्ति आ जायगी। जब निर्ममता, निष्कामता और असंगता आ जाती है, तब निर्वाकारता, शान्ति और स्वाधीनता

श्लोक ३७ ]

  • साधक-संजीवनी *

२५५

स्वतः आ जाती है।

एक मार्मिक बातपर ध्यान दें। हम कामनाओंका त्याग करना बड़ा कठिन मानते हैं। परन्तु विचार करें कि यदि कामनाओंका त्याग करना कठिन है तो क्या कामनाओंकी पूर्ति करना सुगम है? सब कामनाओंकी पूर्ति संसारमें आजतक किसीकी नहीं हुई। हमारी तो बात ही क्या, भगवान्के बाप-(दशरथजी-) की भी कामना पूरी नहीं हुई! अतः कामनाओंकी पूर्ति होना असम्भव है। पर कामनाओंका त्याग करना असम्भव नहीं है। यदि हम ऐसा मानते हैं कि कामनाओंका त्याग करना कठिन है, तो कठिन बात भी असम्भव बात-(कामनाओंकी पूर्ति-) की अपेक्षा सुगम ही पड़ती है; क्योंकि कामनाओंका त्याग तो हो सकता है, पर कामनाओंकी पूर्ति हो ही नहीं सकती। इसलिये कामनाओंकी पूर्तिकी अपेक्षा कामनाओंका त्याग करना सुगम ही है। गलती यही होती है कि जो कार्य कर नहीं सकते उसके लिये उद्योग करते हैं और जो कार्य कर सकते हैं, उसे करते ही नहीं। इसलिये साधकको कामनाओंका त्याग करना चाहिये, जो कि वह कर सकता है।

कामनाओंके चार भेद हैं—

(१) शरीर-निर्विहमात्रकी आवश्यक कामनाको पूरा कर दे।

(२) जो कामना व्यक्तिगत एवं न्याययुक्त हो और जिसको पूरा करना हमारी सामर्थ्यसे बाहर हो, उसको भगवान्के अर्पण करके मिटा दे।

(३) दूसरोंकी वह कामना पूरी कर दे, जो न्याययुक्त और हितकारी हो तथा जिसको पूरी करनेकी सामर्थ्य हमारेमें हो। इस प्रकार दूसरोंकी कामना पूरी करनेपर हमारेमें कामना-त्यागकी सामर्थ्य आती है।

(४) उपर्युक्त तीनों प्रकारकी कामनाओंके अतिरिक्त

दूसरी सब कामनाओंको विचारके द्वारा मिटा दे।

‘महाशनो महापाप्मा’—कोई वैरी ऐसा होता है, जो भेंट-पूजा अथवा अनुनय-विनयसे शान्त हो जाता है, पर यह ‘काम’ ऐसा वैरी है, जो किसीसे भी शान्त नहीं होता। इस कामकी कभी तृप्ति नहीं होती—

बुद्धै न काम अगनि तुलसी कहुं, विषय-भोग बहु घी ते॥

(विनयपत्रिका १९८)

जैसे धन मिलनेपर धनकी कामना बढ़ती ही चली जाती है; ऐसे ही ज्यों-ज्यों भोग मिलते हैं, त्यों-ही-त्यों कामना बढ़ती ही चली जाती है। इसलिये कामनाको ‘महाशनः’ कहा गया है।

कामना ही सम्पूर्ण पापोंका कारण है। चोरी, डकैती, हिंसा आदि समस्त पाप कामनासे ही होते हैं। इसलिये कामनाको ‘महापाप्मा’ कहा गया है।

कामना उत्पन्न होते ही मनुष्य अपने कर्तव्यसे, अपने स्वरूपसे और अपने इष्ट-(भगवान्-) से विमुख हो जाता है और नाशवान् संसारके सम्मुख हो जाता है। नाशवान्के सम्मुख होनेसे पाप होते हैं और पापोंके फलस्वरूप नरकों तथा नीच योनियोंकी प्राप्ति होती है।

संयोगजन्य सुखकी कामनासे ही संसार सत्य प्रतीत होता है और प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरदि पदार्थ स्थिर दिखायी देते हैं। सांसारिक पदार्थोंको स्थिर माननेसे ही मनुष्य उनसे सुख भोगता है और उनकी इच्छा करता है। सुख-भोगके समय संसारकी क्षणभंगुरताकी ओर दृष्टि नहीं जाती और मनुष्य भोगको तथा अपनेको भी स्थिर देखता है। जो प्रतिक्षण मर रहा है—नष्ट हो रहा है, उस संसारसे सुख लेनेकी इच्छा कैसे हो सकती है? पर ‘संसार प्रतिक्षण मर रहा है’ इस जानकारीका तिरस्कार करनेसे ही सांसारिक सुखभोगकी इच्छा होती है। चलचित्र-(सिनेमा-) में पके

१-ऐसी कामनामें चार बातोंका होना आवश्यक है—

(१) जो कामना वर्तमानमें उत्पन्न हुई हो (जैसे, भूख लगनेपर भोजनकी कामना)।

(२) जिसकी पूर्तिकी साधन-सामग्री वर्तमानमें उपलब्ध हो।

(३) जिसकी पूर्ति किये बिना जीवित रहना सम्भव न हो।

(४) जिसकी पूर्तिसे अपना तथा दूसरोंका—किसीका भी अहित न होता हो।

—इस प्रकार शरीर-निर्विहमात्रकी आवश्यक कामनाओंकी पूर्ति कर लेनी चाहिये। आवश्यक कामनाओंको पूरा करनेसे अनावश्यक कामनाओंके त्यागका बल आ जाता है। परन्तु आवश्यक कामनाओंकी पूर्तिका सुख नहीं लेना है; क्योंकि पूर्तिका सुख लेनेसे नयी-नयी कामनाएँ उत्पन्न होती रहेंगी, जिसका कभी अन्त नहीं आयेगा।

२-उदाहरणार्थ—‘संसारमें अन्याय-अत्याचार न हो’—ऐसी तीव्र व्यक्तिगत कामना न्याययुक्त और अपनी सामर्थ्यसे बाहर है। अतः ऐसी कामनाको भगवान्के अर्पण करके निश्चित हो जाय। ऐसी भगवदपित कामना भविष्यमें (भगवान् चाहें तो) पूरी हो जाती है।

२५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

हुए अंगूर देखनेपर भी उन्हें खानेकी इच्छा नहीं होती, यदि होती है तो सिद्ध हुआ कि हमने उसे स्थिर माना है। परिवर्तनशील संसारको स्थिर माननेसे वास्तवमें जो स्थिर तत्त्व है, उस परमात्मतत्त्वकी तरफ अथवा अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि जाती ही नहीं। उधर दृष्टि न जानेसे मनुष्य उससे विमुख होकर नाशवान् सुख-भोगमें फँस जाता है। इससे सिद्ध होता है कि वास्तविक तत्त्वसे विमुख हुए बिना कोई सांसारिक भोग भोगा ही नहीं जा सकता और रागपूर्वक सांसारिक भोग भोगनेसे मनुष्य परमात्मासे विमुख हो ही जाता है।

भोगबुद्धिसे सांसारिक भोग भोगनेवाला मनुष्य हिंसारूप पापसे बच ही नहीं सकता। वह अपनी भी हिंसा (पतन) करता है और दूसरोंकी भी । जैसे, कोई मनुष्य धनका संग्रह करके उससे भोगोंको भोगता है, तो उसे देखकर निर्धनोंके हृदयमें धन और भोगोंके अभावका विशेष दुःख होता है, यह उनकी हिंसा हुई। भोगोंको भोगकर वह स्वयं अपनी भी हिंसा (पतन) करता है; क्योंकि स्वयं परमात्माका चेतन अंश होते हुए भी जड-(धन-) को महत्त्व देनेसे वह वस्तुतः जडका दास हो जाता है, जिससे उसका पतन हो जाता है। संसारके सब भोगपदार्थ सीमित होते हैं; अतः मनुष्य जितना भोग भोगता है, उतना भोग दूसरोंके हिस्सेसे ही आता है। हाँ, शरीर-निर्वाहमात्रके लिये पदार्थोंको स्वीकार करनेसे मनुष्यको पाप नहीं लगता। शरीर-निर्वाहमें भी शास्त्रोंमें केवल अपने लिये भोग भोगनेका निषेध है। अपने माता, पिता, गुरु, बालक, स्त्री, वृद्ध आदिको शरीर-निर्वाहके पदार्थ पहले देकर फिर स्वयं लेने चाहिये।

भोगबुद्धिसे भोग भोगनेवाला पुरुष अपना तो पतन करता है, भोग्य वस्तुओंका दुरुपयोग करके उनका नाश करता है, और अभावग्रस्त पुरुषोंकी हिंसा करता है; परन्तु जीवनमुक्त महापुरुषके विषयमें यह बात लागू नहीं होती। उसके द्वारा हिंसारूप पाप नहीं होता; क्योंकि उसमें भोगबुद्धि नहीं होती और उसके द्वारा निष्क्रामभावसे निर्वाहमात्रके लिये शास्त्रविहित क्रियाएँ होती हैं (गीता—चौथे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक और अठारहवाँ अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। उस महापुरुषके उपयोगमें आनेवाली वस्तुओंका विकास होता है, नाश नहीं अर्थात् उसके पास आनेपर वस्तुओंका सदुपयोग होता है, जिससे वे सार्थक हो जाती हैं। जबतक संसारमें

उस महापुरुषका कहलानेवाला शरीर रहता है, तबतक उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक प्राणियोंका उपकार होता रहता है।

शरीर-निर्वाहमात्रकी आवश्यकता ‘महाशनः’ और ‘महापाप्मा’ नहीं है। कारण कि शरीर-निर्वाहमात्रकी आवश्यकता ‘कामना’ नहीं है। आवश्यकताकी पूर्ति होती है; जैसे—भूख लगी और भोजन करनेसे तृप्त हो गयी। परन्तु कामनाकी वृद्धि होती है।

‘विद्धरेनमिह वैरिणम्’—यद्यपि वास्तवमें सांसारिक पदार्थोंकी कामनाका त्याग होनेपर ही सुख-शान्तिका अनुभव होता है, तथापि मनुष्य अज्ञानवश पदार्थोंसे सुखका होना मान लेता है। इस प्रकार मनुष्यने पदार्थोंकी कामनाको सुखका कारण मानकर उसे अपना मित्र और हितैषी मान रखा है। इस मान्यताके कारण कामना कभी मिटती नहीं। इसलिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि इस कामनाको अपना मित्र नहीं, प्रत्युत वैरी जानो। कामना मनुष्यकी वैरी इसलिये है कि यह मनुष्यके विवेकको ढककर उसे पापोंमें प्रवृत्त कर देती है।

संसारके सम्पूर्ण पापों, दुःखों, नरकों आदिके मूलमें एक कामना ही है। इस लोक और परलोकमें जहाँ कहीं कोई दुःख पा रहा है, उसमें असत्की कामना ही कारण है। कामनासे सब प्रकारके दुःख होते हैं और सुख कोई-सा भी नहीं होता।

विशेष बात

कामको नष्ट करनेका मुख्य और सरल उपाय है—दूसरोंकी सेवा करना, उन्हें सुख पहुँचाना। अन्य शरीरधारी तो दूसरे हैं ही, अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और प्राण भी दूसरे ही हैं। अतः इनका निर्वाह भी सेवाबुद्धिसे करना है, भोगबुद्धिसे नहीं। इनसे सुख नहीं लेना है।

कर्मयोगमें स्थूलशरीरसे होनेवाली ‘क्रिया’, सूक्ष्म-शरीरसे होनेवाला ‘चिन्तन’ और कारण-शरीरसे होनेवाली ‘स्थिरता’—तीनों ही अपने लिये नहीं हैं, प्रत्युत संसारके लिये ही हैं। कारण कि स्थूल-शरीरकी स्थूल-संसारके साथ, सूक्ष्म-शरीरकी सूक्ष्म-संसारके साथ और कारण-शरीरकी कारण-संसारके साथ एकता है। अतः शरीर, पदार्थ और क्रियासे दूसरोंकी सेवा करना तो उचित है, पर अपनेमें सेवकपनका अभिमान करना अनुचित है। सूक्ष्म-शरीरसे परहित-चिन्तन करना तो उचित है, पर उससे सुख लेना

लोक ३८ ]

  • साधक-संजीवनी *

२५७

अनुचित है। कारणशरीरसे स्थिर होना तो उचित है, पर स्थिरताका सुख लेना अनुचित है*। इस प्रकार सुख न लेनेसे फलकी आसक्ति मिट जाती है, फलकी आसक्ति मिटनेपर कर्मकी आसक्ति सुगमतापूर्वक मिट जाती है।

मेरा आदेश चले; अमुक व्यक्ति मेरी आज्ञामें चले; अमुक वस्तु मेरे काम आ जाय; मेरी बात रह जाय—ये सब कामनाके ही स्वरूप हैं। उत्पत्ति-विनाशशील (असत्) संसारसे कुछ लेनेकी कामना महान् अनर्थ करनेवाली है। दूसरोंकी न्याययुक्त कामना—(जिसमें दूसरेका हित हो और जिसे पूर्ण करनेकी सामर्थ्य हमारेमें हो—) को पूरी करनेसे अपनेमें कामनाके त्यागका बल आ जाता है। दूसरोंकी कामना पूरी न भी कर सकें तो भी हृदयमें पूरी करनेका भाव रहना ही चाहिये।

तादात्म्य—अहंता (अपनेको शरीर मानना), ममता (शरीरादि पदार्थोंको अपना मानना) और कामना (अमुक वस्तु मिल जाय—ऐसा भाव)—इन तीनोंसे ही जीव संसारमें बँधता है। तादात्म्यसे परिच्छिन्ना, ममतासे विकार

और कामनासे अशान्ति पैदा होती है। कामनाके त्यागसे ममता और ममताके त्यागसे तादात्म्य मिटता है। कर्मयोगी सिद्धान्तसे इनमें किसीके भी साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता; क्योंकि वह शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहम्, पदार्थ आदि किसीको भी अपना और अपने लिये नहीं मानता, वह इन शरीरादिको केवल संसारका और संसारकी सेवाके लिये ही मानता है, जो कि वास्तवमें है।

किसीको भी दुःख न देनेका भाव होनेपर सेवाका आरम्भ हो जाता है। अतः साधकके अन्तःकरणमें 'किसीको भी दुःख न हो'—यह भाव निरन्तर रहना चाहिये। भूलसे अपने कारण किसीको दुःख हो भी जाय तो उससे क्षमा माँग लेनी चाहिये। वह क्षमा न करे तो भी कोई डर नहीं। कारण कि सच्चे हृदयसे क्षमा माँगनेवालेकी क्षमा भगवान्की ओरसे स्वतः होती है। सेवा करनेमें साधक सदा सावधान रहे कि कहीं सेवाके बदलेमें कुछ लेनेका भाव उसमें न आ जाय। इस प्रकार सेवा करनेसे 'कामरूप' वैरी सुगमतापूर्वक नष्ट हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे सुख चाहनेका नाम 'काम' है। इस काम-रूप एक दोषमें अनन्त दोष, अनन्त विकार, अनन्त पाप भरे हुए हैं। अतः जबतक मनुष्यके भीतर काम है, तबतक वह सर्वथा निर्दोष, निर्वाकार, निष्पाप नहीं हो सकता। अपने सुखके लिये कुछ चाहनेसे ही बुराई होती है। जो किसीसे कुछ नहीं चाहता, वह बुराईरहित हो जाता है।

कर्मफल तीन प्रकारके होते हैं—इष्ट, अनिष्ट और मिश्र (गीता—अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। तीनोंमें 'काम' का केवल 'अनिष्ट' फल ही मिलता है।

शास्त्रनिषिद्ध कर्म प्रारब्धसे नहीं होता, प्रत्युत 'काम' से होता है। प्रारब्धसे (फलभोगके लिये) कर्म करनेकी वृत्ति तो हो जायगी, पर निषिद्ध कर्म नहीं होगा; क्योंकि प्रारब्धका फल भोगनेके लिये निषिद्ध आचरणकी जरूरत ही नहीं है।

'काम' रजोगुणसे पैदा होता है। अतः पापोंका कारण तो रजोगुण है और कार्य तमोगुण है। सभी पाप रजोगुणसे पैदा होते हैं।

सम्बन्ध—'यह पाप है'—ऐसी जानकारी होनेपर भी मनुष्य पापमें प्रवृत्त हो जाता है; अतः इस जानकारीका प्रभाव आचरणमें न आनेका क्या कारण है? इसका विवेचन भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

धूमेनात्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च। यथोत्खेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥

  • सेवा, परहित-चिन्तन, स्थिरता आदिका सुख लेना और इनके बने रहनेकी इच्छा करना भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक है (गीता १४।६)। इसलिये साधकको सात्त्विक, राजस और तामस—तीनों ही गुणोंसे असंग होना है; क्योंकि स्वरूप असंग है।

२५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

यथा= जैसे
धूमेन= धुएँसे
वह्निः= अग्नि
= और
मलेन= मैलसे
आदर्शः= दर्पण

आव्रियते | = ढका जाता है (तथा) ---|--- यथा | = जैसे उल्लेन | = जेरसे गर्भः | = गर्भ आवृतः | = ढका रहता है,

तथा= ऐसे ही
तेन= उस कामनाके
द्वारा
इदम्= यह (ज्ञान अर्थात्
विवेक)
आवृतम्= ढका हुआ है।

व्याख्या —‘धूमेनाव्रियते वह्निः’—जैसे धुएँसे अग्नि ढकी रहती है, ऐसे ही कामनासे मनुष्यका विवेक ढका रहता है अर्थात् स्पष्ट प्रतीत नहीं होता।

विवेक बुद्धिमें प्रकट होता है। बुद्धि तीन प्रकारकी होती है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। सात्त्विकी बुद्धिमें कर्तव्य-अकर्तव्यका ठीक-ठीक ज्ञान होता है, राजसी बुद्धिमें कर्तव्य-अकर्तव्यका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता और तामसी बुद्धिमें सब वस्तुओंका विपरीत ज्ञान होता है (गीता—अठारहवें अध्यायके तीसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक)। कामना उत्पन्न होनेपर सात्त्विकी बुद्धि भी धुएँसे अग्निके समान ढकी जाती है, फिर राजसी और तामसी बुद्धिका तो कहना ही क्या है!

सांसारिक इच्छा उत्पन्न होते ही पारमार्थिक मार्गमें धुआँ हो जाता है। अगर इस अवस्थामें सावधानी नहीं हुई तो कामना और अधिक बढ़ जाती है। कामना बढ़नेपर तो पारमार्थिक मार्गमें अंधेरा ही हो जाता है।

उत्पत्ति विनाशशील जड़ वस्तुओंमें प्रियता, महत्ता, सुखरूपता, सुन्दरता, विशेषता आदि दीखनेके कारण ही उनकी कामना पैदा होती है। यह कामना ही मूलमें विवेकको ढकनेवाली है। अन्य शरीरोंकी अपेक्षा मनुष्य-शरीरमें विवेक विशेषरूपसे प्रकट है; किन्तु जड़ पदार्थोंकी कामनाके कारण वह विवेक काम नहीं करता। कामना उत्पन्न होते ही विवेक धुँधला हो जाता है। जैसे धुँएसे ढकी रहनेपर भी अग्नि काम कर सकती है, ऐसे ही यदि साधक कामनाके पैदा होते ही सावधान हो जाय तो उसका विवेक काम कर सकता है।

प्रथमावस्थामें ही कामनाको नष्ट करनेका सरल उपाय यह है कि कामना उत्पन्न होते ही साधक विचार करे कि हम जिस वस्तुकी कामना करते हैं, वह वस्तु हमारे साथ सदा रहनेवाली नहीं है। वह वस्तु पहले भी हमारे साथ नहीं थी और बादमें भी हमारे साथ नहीं रहेगी तथा बीचमें भी उस वस्तुका हमारेसे निरन्तर वियोग हो रहा है। ऐसा विचार करनेसे कामना नहीं रहती।

‘यथार्थो मलेन च’—जैसे मैलसे ढक जानेपर दर्पणमें प्रतिबिम्ब दीखना बंद हो जाता है, ऐसे ही कामनाका वेग बढ़नेपर ‘मैं साधक हूँ; मेरा यह कर्तव्य और यह अकर्तव्य है’—इसका ज्ञान नहीं रहता। अन्तःकरणमें नाशवान् वस्तुओंका महत्त्व ज्यादा हो जानेसे मनुष्य उन्हीं वस्तुओंके भोग और संग्रहकी कामना करने लगता है। यह कामना ज्यों-ज्यों बढ़ती है, त्यों-ही-त्यों मनुष्यका पतन होता है।

वास्तवमें महत्त्व वस्तुका नहीं, प्रत्युत उसके उपयोगका होता है। रुपये, विद्या, बल आदि स्वयं कोई महत्त्वकी वस्तुएँ नहीं हैं, उनका सदुपयोग ही महत्त्वका है—यह बात समझमें आ जानेपर फिर उनकी कामना नहीं रहती; क्योंकि जितनी वस्तुएँ हमारे पासमें हैं, उन्हींके सदुपयोगकी हमारेपर जिम्मेवारी है। उन वस्तुओंको भी सदुपयोगमें लगाना है, फिर अधिककी कामनासे क्या होगा? कारण कि कामना-मात्रसे वस्तुएँ प्राप्त नहीं होतीं।

सांसारिक वस्तुओंका महत्त्व ज्यों-ज्यों कम होगा, त्यों-ही-त्यों परमात्माका महत्त्व साधकके अन्तःकरणमें बढ़ेगा। सांसारिक वस्तुओंका महत्त्व सर्वथा नष्ट होनेपर परमात्माका अनुभव हो जायगा और कामना सर्वथा नष्ट हो जायगी।

‘यथोल्बेनावृतो गर्भः’—दर्पणपर मैल आनेसे उसमें अपना मुख तो नहीं दीखता, पर ‘यह दर्पण है’ ऐसा ज्ञान तो रहता ही है। परन्तु जैसे जेरसे ढके गर्भका यह पता नहीं लगता कि लड़का है या लड़की, ऐसे ही कामनाकी तृतीयावस्थामें कर्तव्य-अकर्तव्यका पता नहीं लगता अर्थात् विवेक पूरी तरह ढक जाता है। विवेक ढक जानेसे कामनाका वेग बढ़ जाता है।

कामनामें बाधा लगनेसे क्रोध उत्पन्न होता है। फिर उससे सम्मोह उत्पन्न होता है। सम्मोहसे बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धि नष्ट हो जानेपर मनुष्य करनेयोग्य कार्य नहीं करता और झूठ, कपट, बेईमानी, अन्याय, पाप, अत्याचार आदि न करनेयोग्य कार्य करने लग जाता है। ऐसे लोगोंको भगवान् ‘मनुष्य’ भी नहीं कहना चाहते। इसीलिये सोलहवें

श्लोक ३८ ]

  • साधक-संजीवनी *

२५९

अध्यायमें जहाँ ऐसे लोगोंका वर्णन हुआ है, वहाँ भगवान्ने (आठवेंसे अठारहवें श्लोकतक) मनुष्यवाचक कोई शब्द नहीं दिया। स्वर्गलोककी कामनावाले लोगोंको भी भगवान्ने ‘कामात्मानः’ (गीता २।४३) कहा है; क्योंकि ऐसे लोग कामनाके ही स्वरूप होते हैं। कामनामें ही तदाकार होनेसे उनका निश्चय होता है कि सांसारिक सुखसे बढ़कर और कुछ है ही नहीं (गीता—सोलहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।

[यद्यपि कामनाकी इस तृतीयावस्थामें मनुष्यकी दृष्टि अपने वास्तविक उद्देश्य (परमात्मप्राप्ति)–की तरफ नहीं जाती, तथापि किन्हीं पूर्वसंस्कारोंसे, वर्तमानके किसी अच्छे संगसे अथवा अन्य किसी कारणसे उसे अपने उद्देश्यकी जागृति हो जाय तो उसका कल्याण भी हो सकता है।]

‘तथा तेनेदमावृतम्’—इस श्लोकमें भगवान्ने एक कामके द्वारा विवेकको ढकनेके विषयमें तीन दृष्टान्त दिये हैं। अतः उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य यह है कि एक कामके द्वारा विवेक ढका जानेसे ही कामकी तीनों अवस्थाएँ प्रबुद्ध होती हैं।

कामना उत्पन्न होनेपर उसकी ये तीन अवस्थाएँ सबके हृदयमें आती हैं। परन्तु जो मनुष्य कामनाको ही सुखका कारण मानकर उसका आश्रय लेते हैं और कामनाको त्याज्य नहीं मानते, वे कामनाको पहचान ही नहीं पाते। परन्तु परमार्थमें रुचि रखनेवाले तथा साधन करनेवाले पुरुष इस कामनाको पहचान लेते हैं। जो कामनाको पहचान लेता है, वही कामनाको नष्ट भी कर सकता है।

भगवान्ने इस श्लोकमें कामनाकी तीन अवस्थाओंका वर्णन उसका नाश करनेके उद्देश्यसे ही किया है, जिसकी आज्ञा उन्होंने आगे इकतालीसवें और तैंतालीसवें श्लोकमें दी है। वास्तवमें कामना उत्पन्न होनेके बाद उसके बढ़नेका क्रम इतनी तेजीसे होता है कि उसकी उपर्युक्त तीन अवस्थाओंको कहनेमें तो देर लगती है, पर कामनाके बढ़नेमें कोई देर नहीं लगती। कामना बढ़नेपर तो अनर्थ-परम्परा ही चल पड़ती है। सम्पूर्ण पाप, सन्ताप, दुःख आदि कामनाके कारण ही होते हैं। अतएव मनुष्यको चाहिये कि वह अपने विवेकको जाग्रत रखकर कामनाको उत्पन्न ही न होने दे। यदि कामना उत्पन्न हो जाय, तो भी उसे प्रथम या द्वितीय–अवस्थामें ही नष्ट कर दे। उसे तृतीयावस्थामें तो कभी आने ही न दे।

विशेष बात

धुओं दिखायी देनेसे यह सिद्ध हो जाता है कि वहाँ अग्नि है; क्योंकि अगर वहाँ अग्नि न होती तो धुओं कहाँसे आता? अतः जिस प्रकार धुएँसे ढकी होनेपर भी अग्निके होनेका ज्ञान, मैलसे ढका होनेपर भी दर्पणके होनेका ज्ञान और जेरेसे ढका होनेपर भी गर्भके होनेका ज्ञान सभीमें रहता है, उसी प्रकार कामसे ढका होनेपर भी विवेक (कर्तव्य–अकर्तव्यका ज्ञान) सभीमें रहता है, पर कामनाके कारण वह उपयोगमें नहीं आता।

शास्त्रोंके अनुसार परमात्माकी प्राप्तिमें तीन दोष बाधक हैं—मल, विश्लेष और आवरण। ये दोष असत् (संसार)–के सम्बन्धसे उत्पन्न होते हैं। असत्का सम्बन्ध कामनासे होता है। अतः मूल दोष कामना ही है। कामनाका सर्वथा नाश होते ही असत्से सम्बन्ध–विच्छेद हो जाता है। असत्से सम्बन्ध–विच्छेद होते ही सम्पूर्ण दोष मिट जाते हैं और विवेक प्रकट हो जाता है।

परमात्मप्राप्तिमें मुख्य बाधा है—सांसारिक पदार्थोंको नाशवान् मानते हुए उन्हें महत्त्व देना। जबतक अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका महत्त्व है और वे सत्य, सुन्दर और सुखद प्रतीत होते हैं, तभीतक मल, विश्लेष और आवरण—ये तीनों दोष रहते हैं। इन तीनोंमें भी मलदोषको अधिक बाधक माना जाता है। मलदोष–(पाप–) का मुख्य कारण कामना ही है; क्योंकि कामनासे ही सब पाप होते हैं। जिस समय साधक यह दृढ़ निश्चय कर लेता है कि ‘मैं अब पाप नहीं करूँगा’, उसी समय सब दोषोंकी जड़ कट जाती है और मलदोष मिटने लग जाता है। सर्वथा निष्काम होनेपर मलदोष सर्वथा नष्ट हो जाता है।

श्रीमद्भागवतमें भगवान्ने कामनावाले पुरुषोंके कल्याणका उपाय कर्मयोग (निष्काम–कर्म) बताया है—‘कर्मयोगस्तु कामिनाम्’ (११।२०।७)। अतः कामनावाले पुरुषोंको अपने कल्याणके विषयमें निराश नहीं होना चाहिये; क्योंकि जिसमें कामना आयी है, वही निष्काम होगा। कर्मयोगके द्वारा कामनाओंका नाश सुगमतापूर्वक हो जाता है। छोटी–से–छोटी अथवा बड़ी–से–बड़ी प्रत्येक लौकिक या पारमार्थिक क्रिया करनेमें ‘मैं क्यों करता हूँ और कैसे करता हूँ?’—ऐसी सावधानी हो जाय, तो उद्देश्यकी जागृति हो जाती है। निरन्तर उद्देश्यपर दृष्टि रहनेसे अशुभ–कर्म तो होते नहीं और शुभ–कर्मोंको भी आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके करनेपर निष्कामताका अनुभव हो जाता है और मनुष्यका कल्याण हो जाता है।

२६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

परिशिष्ट भाव —परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें कामना ही खास बाधक है। जैसे, पानीसे भरा हुआ घड़ा है और उसमें हमें दो काम करने हैं—उसको खाली करना है और उसमें आकाश भरना है। परन्तु वास्तवमें हमें दो काम नहीं करने हैं, प्रत्युत एक ही काम करना है—घड़ेको खाली करना। घड़ेमेंसे पानी निकाल दें तो आकाश अपने-आप भर जायगा। ऐसे ही कामनाका त्याग करना और परमात्माको प्राप्त करना—ये दो काम नहीं हैं। कामनाका त्याग कर दें तो परमात्माकी प्राप्ति अपने-आप हो जायगी। केवल कामनाके कारण ही परमात्मा अप्राप्त दीख रहे हैं।

आवृत्तं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३१ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन !होनेवालेनित्यवैरिणा= नित्य वैरिके द्वारा
एतेन= इस= औरज्ञानम्
अनलेन= अग्निके (समान)ज्ञानिनः= विवेकियोंकेविवेक
दुष्पूरेण= (कभी) तृप्त नकामरूपेण= कामना-रूपआवृत्तम्

व्याख्या —‘एतेन’—सँतीसवें श्लोकमें भगवान्ने पाप करवानमें मुख्य कारण ‘काम’ अर्थात् कामनाको बताया था। उसी कामनाके लिये यहाँ ‘एतेन’ पद आया है।

‘दुष्पूरेणानलेन च’ —जैसे अग्निमें धीकी सुहाती-सुहाती (अनुकूल) आहुति देते रहनेसे अग्नि कभी तृप्त नहीं होती, प्रत्युत बढ़ती ही रहती है, ऐसे ही कामनाके अनुकूल भोग भोगते रहनेसे कामना कभी तृप्त नहीं होती, प्रत्युत अधिकाधिक बढ़ती ही रहती है*। जो भी वस्तु सामने आती रहती है, कामना अग्निकी तरह उसे खाती रहती है।

भोग और संग्रहकी कामना कभी पूरी होती ही नहीं। जितने ही भोग-पदार्थ मिलते हैं, उतनी ही उनकी भूख बढ़ती है। कारण कि कामना जड़की ही होती है, इसलिये जड़के सम्बन्धसे वह कभी मिटती नहीं, प्रत्युत अधिकाधिक बढ़ती है। सुन्दरदासजी लिखते हैं—

जो दस बीस पचास भये सत, होइ हजार तो लाख भँगैगी। कोटि अरब्ब खरब्ब असंख्य, पृथ्वीपति होन की चाह जगैगी ॥ स्वर्ग पतालको राज करें, तृष्णा अघकी अति आग लगैगी। ‘सुन्दर’ एक संतोष बिना सठ, तेरी तो भूख कभी न भगैगी ॥

जैसे, सौ रुपये मिलनेपर हजार रुपयोंकी भूख पैदा होती है, तो इससे सिद्ध हुआ कि नौ सौ रुपयोंका घाटा हुआ है। हजार रुपये मिलनेपर फिर सीधे दस हजार रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है, तो यह नौ हजार रुपयोंका घाटा हुआ है। दस हजार रुपये मिलनेपर फिर सीधे एक लाख रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है, तो यह नब्बे हजार

रुपयोंका घाटा हुआ है। लाख रुपये मिलनेपर फिर दस लाख रुपयोंसे सन्तोष नहीं होता, प्रत्युत सीधे करोड़ रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है, तो सिद्ध हुआ कि निन्यानबे लाख रुपयोंका घाटा हुआ है। इस प्रकार वहम तो यह होता है कि लाभ बढ़ गया, पर वास्तवमें घाटा ही बढ़ा है। जितना धन मिलता है, उतनी ही दरिद्रता (धनकी भूख) बढ़ती है। वास्तवमें दरिद्रता उसकी मिटती है, जिसे धनकी भूख नहीं है।

चाह गयी चिन्ता मिटी, मनुओं बेपरवाह।

जिनको कष्ट न चाहिये, सो साहनपति साह॥

वास्तवमें धन उतना बाधक नहीं है, जितनी बाधक उसकी कामना है। धनकी कामना चाहे धनीमें हो या निर्धनमें, दोनोंको वह परमात्मप्राप्तिसे वंचित रखती है। कामना किसीकी भी कभी पूरी नहीं होती; क्योंकि यह पूरी होनेवाली चीज ही नहीं है। कामनासे रहित तो कामनाके मिटनेपर ही हो सकते हैं।

‘कामरूपेण’ —जड़के सम्बन्धसे होनेवाले सुखकी चाहको ‘काम’ कहते हैं। नाशवान् संसारमें थोड़ी भी महत्त्व-बुद्धिका होना ‘काम’ है।

अप्राप्तको प्राप्त करनेकी चाह ‘कामना’ है। अन्तःकरणमें जो अनेक सूक्ष्म कामनाएँ दबी रहती हैं, उनको ‘वासना’ कहते हैं। वस्तुओंकी आवश्यकता प्रतीत होना ‘स्मृता’ है। वस्तुमें उत्तमता और प्रियता दीखना ‘आसक्ति’ है। वस्तु मिलनेकी सम्भावना रखना ‘आशा’ है। और अधिक वस्तु

  • न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्तैव भूय एवाभिवर्धते ॥

(श्रीमद्भा० ९।१९।१४; मनुस्मृति २।१४)

श्लोक ३९ ]

  • साधक-संजीवनी *

२६१

मिल जाय—यह 'लोभ' या 'तृष्णा' है। वस्तुकी इच्छा अधिक बढ़नेपर 'याचना' होती है। ये सभी 'काम' के ही रूप हैं।

'ज्ञानिनो नित्यवैरिणा'—यहाँ 'ज्ञानिनः' पद साधनमें लगे हुए विवेकशील साधकोंके लिये आया है। कारण कि विवेकशील साधक ही इस कामरूप वैरिको पहचानता है और उसका नाश करता है। साधन न करने-वाले दूसरे लोग तो इसे पहचानते ही नहीं प्रत्युत इसे सुखदायी समझते हैं।

भगवान् कहते हैं कि यह काम विवेकशील साधकोंका नित्य वैरि है। कामना उत्पन्न होते ही विवेकशील साधकको विचार आता है कि अब कोई-न-कोई आफत आयेगी! कामनामें संसारका महत्त्व और आश्रय रहता है, जो पारमार्थिक मार्गमें महान् बाधक है। विवेकी साधकको कामना आरम्भसे ही चुभती रहती है। परिणाममें तो कामना सबको दुःख देती ही है। इसलिये यह साधककी नित्य (निरन्तर) वैरि है।

भोगोंमें लगे हुए अज्ञानियोंको यह कामना मित्रके समान मालूम देती है; क्योंकि कामनाके कारण ही भोगोंमें सुख प्रतीत होता है। कामना न हो तो भोगपदार्थ सुख नहीं दे सकते। परन्तु परिणाममें उन्हें दुःख, सन्ताप, कैद, नरक आदि प्राप्त होते ही हैं। इसलिये वास्तवमें यह कामना अज्ञानियोंकी भी नित्य वैरि है। परन्तु अज्ञानियोंको जागृति नहीं रहती, जब कि विवेकशील साधकोंको जागृति रहती है।

'आवृत्ते ज्ञानम्'—विवेक प्राणिमात्रमें है। पशु-पक्षी आदि मनुष्येतर योनियोंमें यह विवेक विकसित नहीं होता और केवल जीवन-निर्वाहतक सीमित रहता है। परन्तु मनुष्यमें यदि कामना न हो तो यह विवेक विकसित हो सकता है; क्योंकि कामनाके कारण ही मनुष्यका विवेक ढका रहता है। विवेक ढका रहनेसे मनुष्य अपने लक्ष्य परमात्मप्राप्तिकी ओर बढ़ नहीं सकता, क्योंकि कामना उसे चिन्मय-तत्त्वकी ओर नहीं जाने देती, प्रत्युत जड-तत्त्वमें ही लगाये रखती है।

अपने प्रति कोई अप्रिय एवं असत्य बोले तो वह बुरा लगता है और प्रिय एवं सत्य बोले तो अच्छा लगता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अच्छे-बुरे, सदगुण-दुर्गुण, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिका ज्ञान अर्थात् विवेक सभी मनुष्योंमें रहता है। परन्तु ऐसा होनेपर भी वह अप्रिय और असत्य बोलता है, अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, तो इसका कारण यही है कि कामनाने उसका विवेक ढक

दिया है।

कामनाके कारण ही 'त्यागमें सुख है'—यह ज्ञान काम नहीं करता। मनुष्यको प्रतीत तो ऐसा होता है कि अनुकूल भोग-पदार्थके मिलनेसे सुख होता है, पर वास्तवमें सुख उसके त्यागसे होता है। यह सभीका अनुभव है कि जाग्रत् और स्वप्नमें भोग-पदार्थसे सम्बन्ध रहनेपर सुख और दुःख दोनों होते हैं, पर सुषुप्ति-(गाढ़ निद्रा- ) में भोग-पदार्थकी किंचित् भी स्मृति न रहनेपर सुख ही होता है, दुःख नहीं। इसलिये गाढ़ निद्रासे जागनेपर वह कहता है कि 'मैं बड़े सुखसे सोया'। इसके सिवाय जाग्रत् और स्वप्नसे थकावट आती है, जब कि सुषुप्तिसे थकावट दूर होती है और ताजगी आती है। इससे सिद्ध होता है कि भोग-पदार्थके त्यागमें ही सुख है।

धनकी कामना होते ही धन मनके द्वारा पकड़ा जाता है। जब बाहरसे धन प्राप्त हो जाता है, तब मनसे पकड़े हुए धनका त्याग हो जाता है और सुखकी प्रतीति होती है। अतः वास्तवमें सुखकी प्रतीति बाहरसे धन मिलनेपर नहीं हुई, प्रत्युत मनसे पकड़े हुए धनके त्यागसे ही हुई है। यदि धनके मिलनेसे ही सुख होता तो उस धनके रहते हुए कभी दुःख नहीं आता; परन्तु उस धनके रहते हुए भी दुःख आ जाता है।

जब मनुष्य किसी वस्तुकी कामना करता है, तब वह पराधीन हो जाता है। जैसे, उसके मनमें घड़ीकी कामना पैदा हुई। कामना पैदा होते ही उसको घड़ीके अभावका दुःख होने लगता है तो यह घड़ीकी पराधीनता है। वह सोचता है कि यदि रुपये मिल जायँ तो अभी घड़ी खरीद लूँ अर्थात् रुपयोंके होनेसे अपनेको स्वाधीन और न होनेसे अपनेको पराधीन मानता है। यह मान्यता बिल्कुल गलत है। वास्तवमें रुपये मिलनेपर घड़ीकी पराधीनता तो नहीं रही, पर रुपयोंकी पराधीनता तो हो ही गयी; क्योंकि रुपये भी 'पर' हैं, 'स्व' नहीं। जैसे वस्तुकी कामना होनेसे वह वस्तुके पराधीन हुआ, ऐसे ही रुपयोंकी कामना होनेसे रुपयोंके पराधीन हुआ। पराधीनता तो वैसी-की-वैसी ही रही! परन्तु कामनासे विवेक ढका जानेके कारण मनुष्यको वस्तुकी पराधीनताका तो अनुभव होता है, पर रुपयोंकी पराधीनताका अनुभव नहीं होता, प्रत्युत रुपयोंके कारण वह स्वाधीनताका अनुभव करता है। जो पराधीनता स्वाधीनताके रूपमें दिखायी देती है, उस पराधीनतासे छूटना बड़ा कठिन होता है।

संसारमात्र क्षणभंगुर है। शरीर, धन, जमीन, मकान

२६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

आदि जितनी भी सांसारिक वस्तुएँ हैं, वे सब-की-सब प्रतिक्षण विनाशकी ओर जा रही हैं और हमारेसे वियुक्त भी हो रही हैं। परन्तु भोग भोगते समय उनकी क्षणभंगुरताका ज्ञान नहीं रहता। पदार्थको नित्य और स्थिर माने बिना सुखभोग हो ही नहीं सकता। साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, साधक भी भोगोंको नित्य और स्थिर माननेपर ही उनमें फँसता है। इसका कारण कामनाद्वारा विवेक ढका जाना ही है।

विशेष बात

मनुष्यको सदाके लिये महान् बनानेके उद्देश्यसे भगवान् कामनाको 'नित्यवैरी' बताकर उससे बचनेके लिये सावधान करते हैं; क्योंकि कामना ही सम्पूर्ण पापों और दुःखोंका कारण है। एक मनुष्य अपनी स्त्रीको दूँद रहा था। लोगोंने पूछा—तुम्हारी स्त्रीका नाम क्या है? उसने कहा—फजीती। फिर पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? उसने कहा—बदमाश। लोगोंने कहा—घबराओ मत, बड़ी पतिव्रता स्त्री है, अपने-आप आ जायगी! कारण कि बदमाशको फजीती (बदनामी) अवश्य मिलती है। इसी प्रकार

संसारके नाशवान् भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्यके पास दुःख अपने-आप आते हैं।

मनुष्य दुःखोंसे तो बचना चाहता है, पर दुःखोंके कारण 'काम'-(कामना-) को नहीं छोड़ता। कामनाके रहते हुए स्वप्नमें भी सुख नहीं मिलता—'काम अछत सुख सपनेहूँ नाहीं' (मानस ७।१०।१)। भगवान् 'अनलेन, दुष्पूरेण' पदोंसे यह बताते हैं कि भोग-पदार्थोंसे कामना कभी पूरी नहीं होती। ज्यों-ज्यों भोग-पदार्थ मिलते हैं, त्यों-ही-त्यों उनकी कामना बढ़ती है और ज्यों-ज्यों कामना बढ़ती है, त्यों-ही-त्यों अभावका अधिक अनुभव होता है एवं अभावको मिटानेके लिये मनुष्य पाप-कर्मोंमें प्रवृत्त होता है। जैसे, धनकी कामना उत्पन्न होनेपर मनुष्य धनकी प्राप्तिमें न्याय-अन्यायका विचार नहीं करता। फिर कामना बढ़नेपर (द्वितीयावस्थामें) वह चोरी, डाके आदिमें भी लग जाता है। फिर और अधिक कामना बढ़नेपर (तृतीयावस्थामें) वह धनके लिये दूसरोंको जानसे भी मार डालता है। इस प्रकार नाशवान् सुखकी कामना करनेवाला मनुष्य अपने लोक और परलोक—दोनोंको महान् दुःखरूप बना लेता है।

परिशिष्ट भाव —साधनकी मुख्य बाधा है—संयोगजन्य सुखकी कामना। यह बाधा साधनमें बहुत दूरतक रहती है। साधक जहाँ सुख लेता है, वहीं अटक जाता है। यहाँतक कि वह समाधिका भी सुख लेता है तो वहाँ अटक जाता है। सात्त्विक सुखकी कामना, आसक्ति भी बन्धनकारक हो जाती है—'सुखसंगेन बन्धाति' (गीता १४।६)। इसलिये यहाँ भगवान्ने संयोगजन्य सुखकी कामनाको विवेकी साधकोंका नित्य वैरी बताया है—'न तेषु रमते बुधः' (गीता ५।२२), 'दुःखमेव सर्वं विवेकिनः' (योगदर्शन २।१५)।

सम्बन्ध—किसी शत्रुको नष्ट करनेके लिये उसके रहनेके स्थानोंकी जानकारी होनी आवश्यक है, इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें ज्ञानियोंके नित्यवैरी 'काम' के रहनेके स्थान बताते हैं ?

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते। एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥

इन्द्रियाणि= इन्द्रियाँ,उच्यते= कहे गये हैं।ज्ञानम्= ज्ञानको
मनः= मन (और)एषः= यह कामनाआवृत्य= ढककर
बुद्धिः= बुद्धिएतैः= इन (इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि)-केदेहिनम्= देहाभिमानी मनुष्यको
अस्य= इस कामनाकेद्वाराविमोहयति= मोहित करती है।
अधिष्ठानम्= वास-स्थान

१-भोगोंका सुख संयोगजन्य और समाधिका सुख वियोगजन्य है। संयोगजन्य सुख लेनेसे पतन हो जाता है और वियोगजन्य सुख लेनेसे साधक अटक जाता है।

२-परमात्मप्राप्तिके मार्गमें सात्त्विक सुखकी आसक्ति अटकाती है और राजस-तामस सुखकी आसक्ति पतन करती है।

श्लोक ४० ]

  • साधक-संजीवनी *

२६३

व्याख्या —‘इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठान-मुच्यते’—काम पाँच स्थानोंमें दीखता है—(१) पदार्थोंमें (गीता—तीसरे अध्यायका चौतीसवाँ श्लोक), (२) इन्द्रियोंमें, (३) मनमें, (४) बुद्धिमें और (५) माने हुए अहम् (मैं) अर्थात् कर्तामें (गीता—दूसरे अध्यायका उनसठवाँ श्लोक)। इन पाँच स्थानोंमें दीखनेपर भी काम वास्तवमें माने हुए ‘अहम्’—(चिज्जडग्रन्थि- ) में ही रहता है। परन्तु उपर्युक्त पाँच स्थानोंमें दिखायी देनेके कारण ही वे इस कामके वास-स्थान कहे जाते हैं।

समस्त क्रियाएँ शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धिसे ही होती हैं। ये चारों कर्म करनेके साधन हैं। यदि इनमें काम रहता है तो वह पारमार्थिक कर्म नहीं होने देता। इसलिये कर्मयोगी निष्काम, निर्मम और अनासक्त होकर शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धिके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करता है (गीता—पाँचवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।

वास्तवमें काम अहम्—(जड-चेतनके तादात्म्य- ) में ही रहता है। अहम् अर्थात् ‘मैं’—पन केवल माना हुआ है। मैं अमुक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदायवाला हूँ—यह केवल मान्यता है। मान्यताके सिवाय इसका दूसरा कोई प्रमाण नहीं है। इस माने हुए सम्बन्धमें ही कामना रहती है। कामनासे ही सब पाप होते हैं। पाप तो फल भुगताकर नष्ट हो जाते हैं, पर ‘अहम्’ से कामना दूर हुए बिना नये-नये पाप होते रहते हैं। इसलिये कामना ही जीवको बाँधनेवाली है। महाभारतमें कहा है—

कामबन्धनमेवैकं नायदस्तीह बन्धनम्।

कामबन्धनमुत्तो हि ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

(शान्तिपर्व २५१।७)

‘जगत्में कामना ही एकमात्र बन्धन है, दूसरा कोई बन्धन नहीं है। जो कामनाके बन्धनसे छूट जाता है, वह ब्रह्मभाव प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है।’

‘ऐतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्’ —कामनाके कारण मनुष्यको जो करना चाहिये, वह नहीं करता और जो नहीं करना चाहिये, वह कर बैठता है। इस प्रकार कामना देहाभिमानी पुरुषको मोहित कर देती है।

दूसरे अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि कामनासे क्रोध

उत्पन्न होता है—‘कामात् क्रोधोऽभिजायते’ (२।६२) और क्रोधसे सम्मोह (अत्यन्त मूढ़भाव) उत्पन्न होता है—‘क्रोधाद्भवति सम्मोहः’ (२।६३)। इससे यह समझना चाहिये कि कामनामें बाधा पहुँचनेपर तो क्रोध उत्पन्न होता है, पर यदि कामनामें बाधा न पहुँचे, तो कामनासे लोभ और लोभसे सम्मोह उत्पन्न होता है। तात्पर्य यह है कि कामनासे पदार्थ न मिले तो ‘क्रोध’ उत्पन्न होता है और पदार्थ मिले तो ‘लोभ’ उत्पन्न होता है। उनसे फिर ‘मोह’ उत्पन्न होता है। कामना रजोगुणका कार्य है और मोह तमोगुणका कार्य। रजोगुण और तमोगुण पास-पास रहते हैं। अतः काम, क्रोध, लोभ और मोह पास-पास ही रहते हैं। काम इन्द्रियों, मन और बुद्धिके द्वारा देहाभिमानी पुरुषको मोहित (बेहोश) कर देता है। इस प्रकार ‘काम’ रजोगुणका कार्य होते हुए भी तमोगुणका कार्य ‘मोह’ हो जाता है।

कामना उत्पन्न होनेपर मनुष्य पहले इन्द्रियोंसे भोग भोगनेकी कामना करता है। पहले तो भोग-पदार्थ मिलते नहीं और मिल भी जायें तो टिकते नहीं। इसलिये उन्हें किसी तरह प्राप्त करनेके लिये वह मनमें तरह-तरहकी कामनाएँ करता है। बुद्धिमें उन्हें प्राप्त करनेके लिये तरह-तरहके उपाय सोचता है। इस प्रकार कामना पहले इन्द्रियोंको संयोगजन्य सुखके प्रलोभनमें लगाती है। फिर इन्द्रियाँ मनको अपनी ओर खींचती हैं और उसके बाद इन्द्रियाँ और मन मिलकर बुद्धिको भी अपनी ओर खींच लेते हैं। इस तरह काम देहाभिमानीके ज्ञानको ढककर इन्द्रियों, मन और बुद्धिके द्वारा उसे मोहित कर देता है तथा उसे पतनके गड़ढेमें डाल देता है।

यह सिद्धान्त है कि नौकर अच्छा हो, पर मालिक तिरस्कारपूर्वक उसे निकाल दे तो फिर उसे अच्छा नौकर नहीं मिलेगा। ऐसे ही मालिक अच्छा हो, पर नौकर उसका तिरस्कार कर दे तो फिर उसे अच्छा मालिक नहीं मिलेगा। इसी प्रकार मनुष्य परमात्मप्राप्ति किये बिना शरीरको सांसारिक भोग और संग्रहमें ही खो देता है तो फिर उसे मनुष्यशरीर नहीं मिलेगा। अच्छी वस्तुका तिरस्कार होता है अन्तःकरण अशुद्ध होनेसे और अन्तःकरण अशुद्ध होता है कामनासे। इसलिये सबसे पहले कामनाका नाश करना चाहिये।

१-रगात् कामः प्रभवति कामाल्लोभोऽभिजायते। लोभाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः॥

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणशयति॥ (मार्कण्डेयपुराण ३।७१-७२)

२-तमोगुण, रजोगुण, और सत्त्वगुण—तीनोंमें परस्पर (क्रमशः १,१० और १०० अंकोंकी तरह) दसगुनेका अन्तर है।

फिर भी तमोगुण (१) से रजोगुण (१०) नजदीक है और सत्त्वगुण (१००) इन दोनोंसे दूर पड़ता है।

२६४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ३

'देहिनम् विमोहयति' - पदोंका तात्पर्य यह है कि

यह काम देहाभिमानी पुरुषको ही मोहित करता है।

शरीरको 'मैं' और 'मेरा' माननेवाला ही देहाभिमानी होता

है। भगवान्ने अपने उपदेशके आरम्भमें ही देह (शरीर)

और देही (शरीरी-आत्मा)-का विवेचन किया है (गीता-

दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक)। देह और

देही दोनों अलग-अलग हैं-यह सबका अनुभव है। यह

काम ज्ञानको ढककर देहाभिमानी-(देहसे अपना सम्बन्ध

माननेवाले-) को बाँधता है, देही-(शुद्ध स्वरूप-) को नहीं।

जो देहके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता, उसे यह बाँध

नहीं सकता। देहको 'मैं' 'मेरा' और 'मेरे लिये' माननेसे ही

मनुष्य उत्पत्ति-विनाशशील जड वस्तुओंको महत्त्व देता है;

जिससे उसमें जडताका राग उत्पन्न हो जाता है। राग उत्पन्न

होनेपर जडतासे सम्बन्ध हो जाता है। जडतासे सम्बन्ध

होनेपर ही कामनाकी उत्पत्ति होती है। कामना उत्पन्न

होनेपर जीव मोहित होकर संसार-बन्धनमें बँध जाता है।

सम्बन्ध-अब आगेके तीन श्लोकोंमें भगवान् कामको मारनेका प्रकार बताते हुए उसे मारनेकी आज्ञा देते हैं।

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥ ४१॥

तस्मात् = इसलिये | इन्द्रियाणि = इन्द्रियोंको | करनेवाले

भरतर्षभ = हे भरतवंशियोंमें | नियम्य = वशमें करके | पाप्मानम् = महान् पापी

श्रेष्ठ अर्जुन ! | एनम् = इस | कामको

त्वम् = तू | ज्ञानविज्ञाननाशनम् = ज्ञान और | हि = अवश्य ही

आदौ = सबसे पहले | विज्ञानका नाश | प्रजहि = बलपूर्वक मार डाल।

व्याख्या-'तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ'-

इन्द्रियोंको विषयोंमें भोग-बुद्धिसे प्रवृत्त न होने देना, अपितु

केवल निर्वाह-बुद्धिसे अथवा साधन-बुद्धिसे प्रवृत्त होने

देना ही उनको वशमें करना है। तात्पर्य है कि इन्द्रियोंकी

विषयोंमें रागपूर्वक प्रवृत्ति न हो और द्वेषपूर्वक निवृत्ति न

हो। (गीता-अठारहवें अध्यायका दसवाँ श्लोक) रागपूर्वक

प्रवृत्ति और द्वेषपूर्वक निवृत्ति होनेसे राग-द्वेष पुष्ट हो जाते

हैं और न चाहते हुए भी मनुष्यको पतनकी ओर ले जाते

हैं। इसलिये प्रवृत्ति और निवृत्ति अथवा कर्तव्य और

अकर्तव्यको जाननेके लिये शास्त्र ही प्रमाण है। (गीता-

सोलहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक) शास्त्रके अनुसार

कर्तव्यका पालन और अकर्तव्यका त्याग करनेसे इन्द्रियाँ

वशमें हो जाती हैं।

'काम' को मारनेके लिये सबसे पहले इन्द्रियोंका

नियमन करनेके लिये कहनेका कारण यह है कि जबतक

मनुष्य इन्द्रियोंके वशमें रहता है, तबतक उसकी दृष्टि

तत्त्वकी ओर नहीं जाती; और तत्त्वकी ओर दृष्टि गये

बिना अर्थात् तत्त्वका अनुभव हुए बिना 'काम' का सर्वथा

नाश नहीं होता।

मनुष्यकी प्रवृत्ति इन्द्रियोंसे ही होती है। इसलिये वह

सबसे पहले इन्द्रियोंके विषयोंमें ही फँसता है, जिससे उसमें

उन विषयोंकी कामना पैदा हो जाती है। कामना-सहित

कर्म करनेसे मनुष्य पूरी तरह इन्द्रियोंके वशमें हो जाता है

और इससे उसका पतन हो जाता है। परन्तु जो मनुष्य

इन्द्रियोंको वशमें करके निष्काम-भावपूर्वक कर्तव्य-कर्म

करता है, उसका शीघ्र ही उद्धार हो जाता है।

'एनम् ज्ञानविज्ञाननाशनम्'-'ज्ञान' पदका अर्थ

शास्त्रीय ज्ञान भी लिया जाता है; जैसे-ब्राह्मणके

स्वाभाविक कर्मोंके अन्तर्गत 'ज्ञानम्' पद शास्त्रीय

ज्ञानके लिये ही आया है। (गीता-अठारहवें अध्यायका

बयालीसवाँ श्लोक)। परन्तु यहाँ प्रसंगके अनुसार 'ज्ञान'

का अर्थ विवेक (कर्तव्य-अकर्तव्यको अलग-अलग

जानना) लेना ही उचित प्रतीत होता है। 'विज्ञान' पदका

अर्थ विशेष ज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान (अनुभव-ज्ञान, असली

ज्ञान या बोध) है।

विवेक और तत्त्वज्ञान-दोनों ही स्वतःसिद्ध हैं। तत्त्व-

ज्ञानका अनुभव तो सबको नहीं है, पर विवेकका अनुभव

सभीको है। मनुष्यमें यह विवेक विशेषरूपसे है। अर्जुनके

प्रश्न-(मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है?)

में आये 'अनिच्छन्नपि' पदसे भी यही सिद्ध होता है कि

श्लोक ४२-४३ ]

  • साधक-संजीवनी *

२६५

मनुष्यमें विवेक है और इस विवेकसे ही वह पाप और पुण्य-दोनोंको जानता है और पाप नहीं करना चाहता। पाप न करनेकी इच्छा विवेकके बिना नहीं होती। परन्तु यह 'काम' उस विवेकको ढक देता है और उसको जाग्रत् नहीं होने देता।

विवेक जाग्रत् होनेसे मनुष्य भविष्यपर अर्थात् परिणामपर दृष्टि रखकर ही सब कार्य करता है। परन्तु कामनासे विवेक ढक जानेके कारण परिणामकी ओर दृष्टि ही नहीं जाती। परिणामकी तरफ दृष्टि न जानेसे ही वह पाप करता है।

इस प्रकार जिसका अनुभव सबको है, उस विवेकको भी जब यह 'काम' जाग्रत् नहीं होने देता, तब जिसका अनुभव सबको नहीं है, उस तत्त्वज्ञानको तो जाग्रत् होने ही कैसे देगा? इसलिये यहाँ 'काम' को ज्ञान (विवेक) और विज्ञान (बोध)—दोनोंका नाश करनेवाला बताया गया है।

वास्तवमें यह 'काम' ज्ञान और विज्ञानका नाश (अभाव) नहीं करता, प्रत्युत उन दोनोंको ढक देता है अर्थात् प्रकट नहीं होने देता। उन्हें ढक देनेको ही यहाँ उनका नाश करना कहा गया है। कारण कि ज्ञान-विज्ञानका कभी नाश होता ही नहीं। नाश तो वास्तवमें 'काम' का ही होता है। जिस प्रकार नेत्रोंके सामने बादल आनेपर 'बादलोंने सूर्यको ढक दिया' ऐसा कहा जाता है, पर वास्तवमें सूर्य नहीं ढका जाता, प्रत्युत नेत्र ढके जाते हैं, उसी प्रकार 'कामनाने ज्ञान-विज्ञानको ढक दिया' ऐसा कहा तो जाता है, पर वास्तवमें ज्ञान-विज्ञान ढके नहीं जाते, प्रत्युत बुद्धि ढकी जाती है।

'पाप्मानं हि प्रजहि '—कामना सम्पूर्ण पापोंकी जड़ है। इसलिये कामना उत्पन्न होनेसे पाप होनेकी सम्भावना रहती है। आगे चलकर कामना मनुष्यके विवेकको ढककर उसे अन्ध बना देती है, जिससे उसे पाप-पुण्यका ज्ञान ही नहीं रहता और वह पापोंमें ही लग जाता है। इससे उसका महान् पतन हो जाता है। इसलिये भगवान् कामनाको

महापापी बताकर उसे अवश्य ही मार डालनेकी आज्ञा देते हैं।

गृहस्थ-जीवन ठीक नहीं, साधु हो जायँ, एकान्तमें चले जायँ—ऐसा विचार करके मनुष्य कार्यको तो बदलना चाहता है, पर कारण 'कामना' को नहीं छोड़ता; उसे छोड़नेका विचार ही नहीं करता। यदि वह कामनाको छोड़ दे तो उसके सब काम अपने-आप ठीक हो जायँ। जब मनुष्य जीनेकी कामना तथा अन्य कामनाओंको रखते हुए मरता है, तब वे कामनाएँ उसके अगले जन्मका कारण बन जाती हैं। तात्पर्य यह है कि जबतक मनुष्यमें कामना रहती है, तबतक वह जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ा रहता है। इस प्रकार बाँधनेके सिवाय कामना और कुछ काम नहीं आती।

जब मनुष्यका जड़-पदार्थकी तरफ आकर्षण होता है, तभी उनकी कामना उत्पन्न होती है। कामना उत्पन्न होते ही विवेक-दृष्टि दब जाती है और इन्द्रिय-दृष्टिकी प्रधानता हो जाती है। इन्द्रियाँ मनुष्यको केवल शब्दादि विषयोंके सुख-भोगमें ही लगाती हैं। पशु-पक्षियोंकी भी प्रवृत्ति इन्द्रियोंसे मिलनेवाले सुखतक ही रहती है। परन्तु कामनासे विवेक ढक जानेके कारण मनुष्य इन्द्रियजन्य सुखके लिये पदार्थकी कामना करने लगता है और फिर पदार्थके लिये रूपयोंकी कामना करने लग जाता है। इतना ही नहीं, उसकी दृष्टि रूपयोंसे भी हटकर रूपयोंकी गिनती-(संग्रह-) में हो जाती है। फिर वह रूपयोंकी गिनती बढ़ानेमें ही लग जाता है। निर्वाहमात्रके रूपयोंकी अपेक्षा उनका संग्रह अधिक पतन करनेवाला है और संग्रहकी अपेक्षा भी रूपयोंकी गिनती महान् पतन करनेवाली है। गिनती बढ़ानेके लिये वह झूठ, कपट, धोखा, चोरी आदि पाप-कर्मोंको भी करने लग जाता है और गिनती बढ़नेपर उसमें अभिमान भी आ जाता है, जो आसुरी-सम्पत्तिका मूल है। इस प्रकार कामनाके कारण मनुष्य महान् पतनकी ओर चला जाता है। इसलिये भगवान् इस महान् पापी कामका अच्छी तरह नाश करनेकी आज्ञा देते हैं।

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥ एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥

२६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

इन्द्रियाणि | = इन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) | तु | = भी | बुद्ध्वा | = जानकर ---|---|---|---|---|--- पराणि | = पर ( श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म ) | परा | = पर | आत्मना | = अपने द्वारा आहुः | = कहते हैं। | बुद्धिः | = बुद्धि है (और) | आत्मानम् | = अपने- आपको इन्द्रियेभ्यः | = इन्द्रियोंसे | यः | = जो | संस्तभ्य | = वशमें करके परम् | = पर | बुद्धेः | = बुद्धिसे | महाबाहो | = हे महाबाहो! (तू इस) मनः | = मन है, | तु | = भी | कामरूपम् | = कामरूप मनसः | = मनसे | परतः | = पर है, | दुरासदम् | = दुर्जय | | सः | = वह (काम) है। | शत्रुम् | = शत्रुको | | एवम् | = इस तरह | जहि | = मार डाल। | | बुद्धेः | = बुद्धिसे | | | | परम् | = पर (काम)-को | |

व्याख्या—‘इन्द्रियाणि पराण्याहुः’ —शरीर अथवा विषयोंसे इन्द्रियाँ पर हैं। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका ज्ञान होता है, पर विषयोंके द्वारा इन्द्रियोंका ज्ञान नहीं होता। इन्द्रियाँ विषयोंके बिना भी रहती हैं, पर इन्द्रियोंके बिना विषयोंकी सत्ता सिद्ध नहीं होती। विषयोंमें यह सामर्थ्य नहीं कि वे इन्द्रियोंको प्रकाशित करें, प्रत्युत इन्द्रियाँ विषयोंको प्रकाशित करती हैं। इन्द्रियाँ वही रहती हैं, पर विषय बदलते रहते हैं। इन्द्रियाँ व्यापक हैं और विषय व्याप्य हैं अर्थात् विषय इन्द्रियोंके अन्तर्गत आते हैं, पर इन्द्रियाँ विषयोंके अन्तर्गत नहीं आतीं। विषयोंकी अपेक्षा इन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं। इसलिये विषयोंकी अपेक्षा इन्द्रियाँ श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक और सूक्ष्म हैं।

‘इन्द्रियेभ्यः परं मनः’ —इन्द्रियाँ मनको नहीं जानतीं, पर मन सभी इन्द्रियोंको जानता है। इन्द्रियोंमें भी प्रत्येक इन्द्रिय अपने-अपने विषयको ही जानती है, अन्य इन्द्रियोंके विषयोंको नहीं; जैसे—कान केवल शब्दको जानते हैं, पर स्पर्श, रूप, रस और गंधको नहीं जानते; त्वचा केवल स्पर्शको जानती है, पर शब्द, रूप, रस और गन्धको नहीं जानती; नेत्र केवल रूपको जानते हैं, पर शब्द, स्पर्श, रस और गन्धको नहीं जानते; रसना केवल रसको जानती है, पर शब्द, स्पर्श, रूप और गन्धको नहीं जानती; और नासिका केवल गन्धको जानती है, पर शब्द, स्पर्श, रूप और रसको नहीं जानती; परन्तु मन पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको तथा उनके विषयोंको जानता है। इसलिये मन इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक और सूक्ष्म है।

‘मनसस्तु परा बुद्धिः’ —मन बुद्धिको नहीं जानता, पर बुद्धि मनको जानती है। मन कैसा है? शान्त है या व्याकुल? ठीक है या बेठीक? इत्यादि बातोंको बुद्धि जानती है। इन्द्रियाँ ठीक काम करती हैं या नहीं?—इसको भी

बुद्धि जानती है, तात्पर्य है कि बुद्धि मनको तथा उसके संकल्पोंको भी जानती है और इन्द्रियोंको तथा उनके विषयोंको भी जानती है। इसलिये इन्द्रियोंसे पर जो मन है, उस मनसे भी बुद्धि पर (श्रेष्ठ, बलवान्, प्रकाशक, व्यापक और सूक्ष्म) है।

‘यः बुद्धेः परतस्तु सः’ —बुद्धिका स्वामी ‘अहम्’ है, इसलिये कहता है—‘मेरी बुद्धि।’ बुद्धि करण है और ‘अहम्’ कर्ता है। करण परतन्त्र होता है, पर कर्ता स्वतन्त्र होता है। उस ‘अहम्’में जो जड-अंश है, उसमें ‘काम’ रहता है। जड-अंशसे तादात्म्य होनेके कारण वह काम स्वरूप-(चेतन- )में रहता प्रतीत होता है।

वास्तवमें ‘अहम्’ में ही ‘काम’ रहता है; क्योंकि वही भोगोंकी इच्छा करता है और सुख-दुःखका भोक्ता बनता है। भोक्ता, भोग और भोग्य—इन तीनोंमें सजातीयता (जातीय एकता) है। इनमें सजातीयता न हो तो भोक्तामें भोग्यकी कामना या आकर्षण हो ही नहीं सकता। भोक्तापनका जो प्रकाशक है, जिसके प्रकाशमें भोक्ता, भोग और भोग्य—तीनोंकी सिद्धि होती है, उस परम प्रकाशक-( शुद्ध चेतन- ) में ‘काम’ नहीं है। ‘अहम्’ तक सब प्रकृतिका अंश है। उस ‘अहम्’ से भी आगे साक्षात् परमात्माका अंश ‘स्वयं’ है, जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम्—इन सबका आश्रय, आधार, कारण और प्रेरक है तथा श्रेष्ठ, बलवान्, प्रकाशक, व्यापक और सूक्ष्म है।

जड-(प्रकृति- )का अंश ही सुख-दुःखरूपमें परिणत होता है अर्थात् सुख-दुःखरूप विकृति जडमें ही होती है। चेतनमें विकृति नहीं है, प्रत्युत चेतन विकृतिका ज्ञाता है; परन्तु जडसे तादात्म्य होनेसे सुख-दुःखका भोक्ता चेतन ही बनता है अर्थात् चेतन ही सुखी-दुःखी होता है। केवल

लोक ४२-४३ ]

  • साधक-संजीवनी *

२६७

जड़में सुखी-दुःखी होना नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि 'अहम्' में जो जड़-अंश है, उसके साथ तादात्म्य कर लेनेसे चेतन भी अपनेको 'मैं भोक्ता हूँ' ऐसा मान लेता है। परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होते ही रसबुद्धि निवृत्त हो जाती है—'रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते' (गीता २।५९)। इसमें 'अस्य' पद भोक्ता बने हुए 'अहम्' का वाचक है और जो भोक्तापनसे निर्लिप्त तत्त्व है, उस परमात्माका वाचक 'परम' पद है। उसके ज्ञानसे रस अर्थात् 'काम' निवृत्त हो जाता है। कारण कि सुखके लिये ही कामना होती है और स्वरूप सहजसुखराशि है। इसलिये परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेसे 'काम' (संयोगजन्य सुखकी इच्छा) सर्वदा और सर्वथा मिट जाता है।

मार्मिक बात

स्थूलशरीर 'विषय' है, इन्द्रियाँ 'बहिःकरण' हैं और मन-बुद्धि 'अन्तःकरण' हैं। स्थूलशरीरसे इन्द्रियाँ पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक और सूक्ष्म) हैं तथा इन्द्रियोंसे बुद्धि पर है। बुद्धिसे भी पर 'अहम्' है, जो कर्ता है। उस 'अहम्'-(कर्ता-) में 'काम' अर्थात् लौकिक इच्छा रहती है।

अपनी सत्ता (होनापन) अर्थात् अपना स्वरूप चेतन, निर्विचार और सत्-चित्-आनन्दरूप है। जब वह जड़-(प्रकृतिजन्य शरीर-) के साथ तादात्म्य कर लेता है, तब 'अहम्' उत्पन्न होता है और स्वरूप 'कर्ता' बन जाता है। इस प्रकार कर्तामें एक जड़-अंश होता है और एक चेतन-अंश। जड़-अंशकी मुख्यतासे संसारकी तरफ और चेतन-अंशकी मुख्यतासे परमात्माकी तरफ आकर्षण होता है*। तात्पर्य यह है कि उसमें जड़-अंशकी प्रधानतासे लौकिक (संसारकी) इच्छाएँ रहती हैं और चेतन-अंशकी प्रधानतासे पारमार्थिक (परमात्माकी) इच्छा रहती है। जड़-अंश मिटनेवाला है, इसलिये लौकिक इच्छाएँ मिटनेवाली हैं और चेतन-अंश सदा रहनेवाला है, इसलिये पारमार्थिक इच्छा पूरी होनेवाली है। इसलिये लौकिक इच्छाओं-

(कामनाओं-) की निवृत्ति और पारमार्थिक इच्छा-(संसारसे छूटनेकी इच्छा, स्वरूपबोधकी जिज्ञासा और भगवत्प्रेमकी अभिलाषा-) की पूर्ति होती है। लौकिक इच्छाएँ उत्पन्न हो सकती हैं, पर टिक नहीं सकतीं। परन्तु पारमार्थिक इच्छा दब सकती है, पर मिट नहीं सकती। कारण कि लौकिक इच्छाएँ अवास्तविक और पारमार्थिक इच्छा वास्तविक है। इसलिये साधकको न तो लौकिक इच्छाओंकी पूर्तिकी आशा रखनी चाहिये और न पारमार्थिक इच्छाकी पूर्तिसे निराश ही होना चाहिये।

वस्तुतः मूलमें इच्छा एक ही है, जो अपने अंशी परमात्माकी है। परन्तु जड़के सम्बन्धसे इस इच्छाके दो भेद हो जाते हैं और मनुष्य अपनी वास्तविक इच्छाकी पूर्ति परिवर्तनशील जड़-(संसार-) के द्वारा करनेके लिये जड़-पदार्थोंकी इच्छाएँ करने लगता है, जो उसकी भूल है। कारण कि लौकिक इच्छाएँ 'परधर्म' और पारमार्थिक इच्छा 'स्वधर्म' है। परन्तु साधकमें लौकिक और पारमार्थिक—दोनों इच्छाएँ रहनेसे द्वन्द्व पैदा हो जाता है। द्वन्द्व होनेसे साधकमें भजन, ध्यान, सत्संग आदिके समय तो पारमार्थिक इच्छा जाग्रत् रहती है, पर अन्य समयमें उसकी पारमार्थिक इच्छा दब जाती है और लौकिक (भोग एवं संग्रहकी) इच्छाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। लौकिक इच्छाओंके रहते हुए साधकमें साधन करनेका एक निश्चय स्थिर नहीं रह सकता। पारमार्थिक इच्छा जाग्रत् हुए बिना साधककी उन्नति नहीं होती। जब साधकका एकमात्र परमात्मप्राप्ति करनेका दृढ़ उद्देश्य हो जाता है, तब यह द्वन्द्व मिट जाता है और साधकमें एक पारमार्थिक इच्छा ही प्रबल रह जाती है। एक ही पारमार्थिक इच्छा प्रबल रहनेसे साधक सुगमतापूर्वक परमात्मप्राप्ति कर लेता है (गीता—पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। इसलिये लौकिक और पारमार्थिक इच्छाका द्वन्द्व मिटाना साधकके लिये बहुत आवश्यक है।

शुद्ध स्वरूपमें अपने अंशी परमात्माकी ओर स्वतः एक आकर्षण या रुचि विद्यमान रहती है, जिसको 'प्रेम' कहते

  • जड़-चेतनके तादात्म्य और आकर्षणको समझनेके लिये एक दृष्टान्त दिया जाता है। चार कोनोंवाले किसी लोहेका अगिन्से तादात्म्य अर्थात् सम्बन्ध होनेपर लोहेमें जलानेकी शक्ति न होनेपर भी वह जलानेवाला हो जाता है; और अगिन चार कोनोंवाली न होनेपर भी चार कोनोंवाली हो जाती है। अगिन्से तादात्म्य होनेपर भी चुम्बककी ओर लोहा ही आकर्षित होता है, अगिन नहीं; क्योंकि चुम्बकके साथ लोहेकी सजातीयता है। अगिन अपने सजातीय निराकार अगिन-तत्त्वकी ओर ही आकर्षित होती है, इसलिये वह स्वतः शान्त हो जाती है। इसी प्रकार जड़ और चेतनके तादात्म्यमें जड़-अंश संसारकी ओर एवं चेतन-अंश परमात्माकी ओर आकर्षित होता है। चेतन-अंशके परमात्माकी ओर आकृष्ट होनेपर जड़-अंश छूट जाता है; क्योंकि जड़ अनित्य है। परन्तु जड़-अंशके संसारकी ओर आकृष्ट होनेपर भी चेतन-अंश नहीं छूटता; क्योंकि चेतन नित्य है।

२६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

है। जब वह संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह 'प्रेम' दब जाता है और 'काम' उत्पन्न हो जाता है। जबतक 'काम' रहता है, तबतक 'प्रेम' जाग्रत् नहीं होता। जबतक 'प्रेम' जाग्रत् नहीं होता, तबतक 'काम' का सर्वथा नाश नहीं होता। जड-अंशकी मुख्यतासे जिसमें सांसारिक भोगोंकी इच्छा (काम) रहती है, उसीमें चेतन-अंशकी मुख्यतासे परमात्माकी इच्छा भी रहती है। अतः वास्तवमें 'काम' का निवास जड-अंशमें ही है, पर वह भी चेतनके सम्बन्धसे ही है। चेतनका सम्बन्ध छूटते ही 'काम' का नाश हो जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि चेतनद्वारा जडसे सम्बन्ध-विच्छेद करते ही जड-चेतनके तादात्म्यरूप 'अहम्' का नाश हो जाता है और 'अहम्' का नाश होते ही 'काम' भी नष्ट हो जाता है।

'अहम्'में जो जड-अंश है, उसमें 'काम' रहता है—इसकी प्रबल युक्ति यह है कि दृश्यरूपसे दीखनेवाला संसार, उसे देखनेवाली इन्द्रियाँ तथा बुद्धि और उसे देखनेवाला स्वयं भोक्ता—इन तीनोंमें जातीय (धातुगत) एकताके बिना भोक्ताका भोग्यकी ओर आकर्षण हो ही नहीं सकता। कारण कि आकर्षण सजातीयतामें ही होता है, विजातीयतामें नहीं; जैसे—नेत्रोंका रूपके प्रति ही आकर्षण होता है, शब्दके प्रति नहीं। यही बात सब इन्द्रियोंमें लागू होती है। बुद्धिका भी समझनेके विषय-(विवेक-विचार-) में आकर्षण होता है, शब्दादि विषयोंमें नहीं (यदि होता है तो इन्द्रियोंको साथमें लेनेसे ही होता है)। ऐसे ही स्वयं-(चेतन-) की परमात्मासे तात्त्विक एकता है, इसलिये 'स्वयं' का परमात्माकी ओर आकर्षण होता है। यह तात्त्विक एकता जड-अंशका सर्वथा त्याग करनेसे अर्थात् जडसे माने हुए सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद करनेसे ही अनुभवमें आती है। अनुभवमें आते ही 'प्रेम' जाग्रत् हो जाता है। प्रेममें जडता-(असत्-) का अंश भी शेष नहीं रहता अर्थात् जडताका अत्यन्त अभाव हो जाता है।

प्रकृतिके कार्य महत्त्व-(समष्टि बुद्धि-) का अत्यन्त सूक्ष्म अंश 'कारणशरीर' ही 'अहम्' का जड-अंश है। इस कारणशरीरमें ही 'काम' रहता है। कारणशरीरके तादात्म्यसे 'काम' स्वयंमें दीखता है। तादात्म्य मिटनेपर जिसमें 'काम' का लेश भी नहीं है, ऐसे अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है। स्वरूपका अनुभव हो जानेपर 'काम' सर्वथा निवृत्त हो जाता है।

'एवं बुद्धेः परं बुद्ध्या'—पहले शरीरसे पर इन्द्रियाँ,

इन्द्रियोंसे पर मन, मनसे पर बुद्धि और बुद्धिसे पर 'काम' को बताया गया। अब उपर्युक्त पदोंमें बुद्धिसे पर 'काम' को जाननेके लिये कहनेका अभिप्राय यह है कि यह 'काम' 'अहम्'में रहता है। अपने वास्तविक स्वरूपमें 'काम' नहीं है। यदि स्वरूपमें 'काम' होता तो कभी मिटता नहीं। नाशवान् जडके साथ तादात्म्य कर लेनेसे ही 'काम' उत्पन्न होता है। तादात्म्यमें भी 'काम' रहता तो जडमें ही है, पर दीखता है स्वरूपमें। इसलिये बुद्धिसे पर रहनेवाले इस 'काम'को जानकर उसका नाश कर देना चाहिये।

'संतस्थात्मानमात्मना'—बुद्धिसे पर 'अहम्' में रहनेवाले 'काम'को मारनेका उपाय है—अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करना अर्थात् अपना सम्बन्ध केवल अपने शुद्ध स्वरूपके साथ अथवा अपने अंशी भगवान्के साथ रखना, जो वास्तवमें है। छठे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें 'उद्धरेदात्मनात्मानम्' पदसे और छठे श्लोकमें 'येनात्यैवात्मना जितः' पदोंसे भी यही बात कही गयी है।

स्वरूप (स्वयं) साक्षात् परमात्माका अंश है और शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि संसारके अंश हैं। जब स्वरूप अपने अंशी परमात्मासे विमुख होकर प्रकृति-(संसार-) के सम्मुख हो जाता है, तब उसमें कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। कामनाएँ अभावसे उत्पन्न होती हैं और अभाव संसारके सम्बन्धसे होता है; क्योंकि संसार अभावरूप ही है—'नासतो विद्यते भावः' (गीता २।१६)। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही कामनाओंका नाश हो जाता है; क्योंकि स्वरूपमें अभाव नहीं है—'नाभावो विद्यते सतः' (गीता २।१६)।

परमात्मासे विमुख होकर संसारसे अपना सम्बन्ध माननेपर भी जीवकी वास्तविक इच्छा (आवश्यकता या भूख) अपने अंशी परमात्माको प्राप्त करनेकी ही होती है। 'मैं सदा जीता रहूँ; मैं सब कुछ जान जाऊँ; मैं सदाके लिये सुखी हो जाऊँ'—इस रूपमें वह वास्तवमें सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप परमात्माकी ही इच्छा करता है, पर संसारसे सम्बन्ध माननेके कारण वह भूलसे इन इच्छाओंको संसारसे ही पूरी करना चाहता है—यही 'काम' है। इस 'काम'की पूर्ति तो कभी हो ही नहीं सकती। इसलिये इस 'काम'का नाश तो करना ही पड़ेगा।

जिसने संसारसे अपना सम्बन्ध जोड़ा है, वही उसे तोड़ भी सकता है। इसलिये भगवान्ने अपने द्वारा ही संसारसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करके 'काम' को मारनेकी आज्ञा दी है।

श्लोक ४२-४३ ]

  • साधक-संजीवनी *

२६९

अपने द्वारा ही अपने-आपको वशमें करनेमें कोई अभ्यास नहीं है; क्योंकि अभ्यास संसार-(शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि-) की सहायतासे ही होता है। इसलिये अभ्यासमें संसारके सम्बन्धकी सहायता लेनी पड़ती है। वास्तवमें अपने स्वरूपमें स्थिति अथवा परमात्माकी प्राप्ति संसारकी सहायतासे नहीं होती, प्रत्युत संसारके त्याग-(सम्बन्ध-विच्छेद-) से, अपने-आपसे होती है।

मार्मिक बात

जब चेतन अपना सम्बन्ध जड़के साथ मान लेता है, तब उसमें संसार-(भोग-) की भी इच्छा होती है और परमात्माकी भी। जड़से सम्बन्ध माननेपर जीवसे यही भूल होती है कि वह सत्-चित्-आनन्दस्वरूप परमात्माकी इच्छा-अभिलाषाको संसारसे ही पूरी करनेके लिये सांसारिक पदार्थोंकी इच्छा करने लगता है। परिणामस्वरूप उसकी ये दोनों ही इच्छाएँ (स्वरूपबोधके बिना) कभी मिटती नहीं।

संसारको जाननेके लिये संसारसे अलग होना और परमात्माको जाननेके लिये परमात्मासे अभिन होना आवश्यक है; क्योंकि वास्तवमें 'स्वयं' की संसारसे भिन्नता और परमात्मासे अभिन्नता है। परन्तु संसारकी इच्छा करनेसे 'स्वयं' संसारसे अपनी अभिन्नता या समीपता मान लेता है, जो कभी सम्भव नहीं; और परमात्माकी इच्छा करनेसे 'स्वयं' परमात्मासे अपनी भिन्नता या दूरी (विमुखता) मान लेता है, पर इसकी सम्भावना ही नहीं। हाँ, सांसारिक इच्छाओंको मिटानेके लिये पारमार्थिक इच्छा करना बहुत उपयोगी है। यदि पारमार्थिक इच्छा तीव्र हो जाय तो लौकिक इच्छाएँ स्वतः मिट जाती हैं। लौकिक इच्छाएँ सर्वथा मिटनेपर पारमार्थिक इच्छा पूरी हो जाती है अर्थात्

नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है। कारण कि वास्तवमें परमात्मा सदा-सर्वत्र विद्यमान है, पर लौकिक इच्छाएँ रहनेसे उनका अनुभव नहीं होता।

'जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्'— 'महाबाहो' का अर्थ है—बड़ी और बलवान् भुजाओंवाला अर्थात् शूरवीर। अर्जुनको 'महाबाहो' अर्थात् शूरवीर कहकर भगवान् यह लक्ष्य कराते हैं कि तुम इस 'काम'-रूप शत्रुका दमन करनेमें समर्थ हो।

संसारसे सम्बन्ध रखते हुए 'काम' का नाश करना बहुत कठिन है। यह 'काम' बड़ों-बड़ोंके भी विवेकको ढककर उन्हें कर्तव्यसे च्युत कर देता है, जिससे उनका पतन हो जाता है। इसलिये भगवान्ने इसे दुर्जय शत्रु कहा है।

'काम' को दुर्जय शत्रु कहनेका तात्पर्य इससे अधिक सावधान रहनेमें है, इसे दुर्जय समझकर निराश होनेमें नहीं।

प्रत्येक कामनाकी उत्पत्ति, पूर्ति, अपूर्ति और निवृत्ति होती है, इसलिये मात्र कामनाएँ उत्पन्न और नष्ट होनेवाली हैं। परन्तु 'स्वयं' निरन्तर रहता है और कामनाओंके उत्पन्न तथा नष्ट होनेको जानता है। अतः कामनाओंसे वह सुगमतापूर्वक सम्बन्ध-विच्छेद कर सकता है; क्योंकि वास्तवमें सम्बन्ध है ही नहीं। इसलिये साधकको कामनाओंसे कभी घबराना नहीं चाहिये। यदि साधकका अपने कल्याणका पक्का उद्देश्य है तो वह 'काम'को सुगमतापूर्वक मार सकता है।

कामनाओंके त्यागमें अथवा परमात्माके प्राप्तिमें सब स्वतन्त्र, अधिकारी, योग्य और समर्थ हैं। परन्तु कामनाओंकी पूर्तिमें कोई भी स्वतन्त्र, अधिकारी, योग्य और समर्थ नहीं है। कारण कि कामना पूरी होनेवाली है ही नहीं। परमात्माने मानव-शरीर अपनी प्राप्तिके लिये ही दिया है।

१-यदा सर्वं प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्याऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥

(कठ० २।३।१४; बृहदा० ४।४।७)

'साधकके हृदयमें स्थित सम्पूर्ण कामनाएँ जब समूल नष्ट हो जाती हैं, तब मरणधर्मा मनुष्य अमर हो जाता है और यहाँ (मनुष्यशरीरमें ही) ब्रह्मका भलीभाँति अनुभव कर लेता है।'

विमुञ्चति यदा कामान् मानवो मनसि स्थितान्। तर्हिव पुण्डरीकाक्ष भगवत्त्वाय कल्प्यते ॥ (श्रीमद्भा० ७।१०।९)

'कमललयन! जिस समय मनुष्य अपने मनमें रहनेवाली समस्त कामनाओंका परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेता है।'

२-उद्देश्य या लक्ष्य सदैव अविनाशी-(चेतन-तत्त्व—परमात्मा-) का ही होता है, नाशवान्-(संसार-) का नहीं। नाशवान्की कामनाएँ ही होती हैं, उद्देश्य नहीं होता। उद्देश्य वह होता है, जिसे मनुष्य निरन्तर चाहता है। चाहे शरीरके टुकड़े-टुकड़े ही क्यों न कर दिये जायें, तो भी वह उद्देश्यको ही चाहता है। उद्देश्यकी सिद्धि अवश्य होती है, पर कामनाओंकी सिद्धि नहीं होती, प्रत्युत नाश होता है। उद्देश्य सदा एक ही रहता है, पर कामनाएँ बदलती रहती हैं।

२७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

अतः कामनाका त्याग करना कठिन नहीं है। सांसारिक भोग-पदार्थोंको महत्त्व देनेके कारण ही कामनाका त्याग कठिन मालूम देता है।

सुख-(अनुकूलता- )की कामनाको मिटानेके लिये ही भगवान् समय-समयपर दुःख (प्रतिकूलता) भेजते हैं कि सुखकी कामना मत करो; कामना करोगे तो दुःख पाना ही पड़ेगा। सांसारिक पदार्थोंकी कामनावाला मनुष्य दुःखसे कभी बच ही नहीं सकता—यह नियम है; क्योंकि संयोग-जन्म भोग ही दुःखके हेतु हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।

‘स्वयं’-(स्वरूप- ) में अनन्त बल है। उसकी सत्ता और बलको पाकर ही बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ सत्तावान् एवं बलवान् होते हैं। परन्तु जडसे सम्बन्ध जोड़नेके कारण वह अपने बलको भूल रहा है और अपनेको बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके अधीन मान रहा है। अतएव ‘काम’-रूप शत्रुको मारनेके लिये अपने-आपको जानना और अपने बलको पहचानना बड़ा आवश्यक है।

‘काम’ जडके सम्बन्धसे और जडमें ही होता है। तादात्म्य होनेसे वह स्वयंमें प्रतीत होता है। जडका सम्बन्ध न रहे तो ‘काम’ है ही नहीं। इसलिये यहाँ ‘काम’ को मारनेका तात्पर्य वस्तुतः ‘काम’ का सर्वथा अभाव बतानेमें ही है। इसके विपरीत यदि ‘काम’ अर्थात् कामनाकी सत्ताको मानकर उसे मिटानेकी चेष्टा करें तो कामनाका मिटना कठिन है। कारण कि वास्तवमें कामनाकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। कामना उत्पन्न होती है और उत्पन्न होनेवाली वस्तु नष्ट होगी ही—यह नियम है। नयी कामना न करें तो पहलेकी कामनाएँ अपने-आप नष्ट हो जायँगी। इसलिये कामनाको मिटानेका तात्पर्य है—नयी कामना न करना।

शरीरादि सांसारिक पदार्थोंको ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिये’ माननेसे ही अपने-आपमें कमीका अनुभव होता है,

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिका नाम तो लिया है, पर ‘अहम्’ का नाम नहीं लिया। अहम् बुद्धिसे परे है। सातवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी भगवान्ने बुद्धिके बाद अहम्को लिया है—‘भूमिरापोऽन्तलो वायुः खं मनो बुद्धिरैव च। अहङ्कार इतीय मे ।। ’। अतः यहाँ भी ‘सः’ पदसे अहम्में रहनेवाले ‘काम’ को लेना चाहिये।

जबतक स्वरूपका साक्षात्कार नहीं होता, तबतक अहम्में काम रहता है। स्वरूपका साक्षात्कार होनेपर अहम्में काम नहीं रहता—‘परं दृष्ट्वा निवर्तते ’ (गीता २।५९)। सुख तो है स्वरूपमें, पर कामके कारण मनुष्य जड़ताको सत्ता और महत्ता देकर उससे सुख चाहता है। जबतक जड़ताका सम्बन्ध है, तबतक ‘काम’ है, जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘प्रेम’ होता है।

‘काम’ अपनेमें है—‘रसोऽप्यस्य ’ (गीता २।५९)। अपनेमें होनेसे ही काम हमारे लिये बाधक होता है। अगर यह अपनेमें न हो, दूसरे (इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि)-में हो तो हमारेको क्या बाधा लगी? अपनेमें काम होनेसे ही स्वयं

पर मनुष्य भूलसे उस कमीकी पूर्ति भी सांसारिक पदार्थोंसे ही करना चाहता है। इसलिये वह उन पदार्थोंकी कामना करता है। परन्तु वास्तवमें आजतक सांसारिक पदार्थोंसे किसीकी भी कमीकी पूर्ति हुई नहीं, होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। कारण कि स्वयं अविनाशी है और पदार्थ नाशवान् हैं। स्वयं अविनाशी होकर भी नाशवान्की कामना करनेसे लाभ तो कोई होता नहीं और हानि कोई-सी भी बाकी रहती नहीं। इसलिये भगवान् कामनाको शत्रु बताते हुए उसे मार डालनेकी आज्ञा देते हैं।

कर्मयोगके द्वारा इस कामनाका नाश सुगमतासे हो जाता है। कारण कि कर्मयोगका साधक संसारकी छोटी-से-छोटी अथवा बड़ी-से-बड़ी प्रत्येक क्रिया परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर दूसरोंके लिये ही करता है, कामनाकी पूर्तिके लिये नहीं। वह प्रत्येक क्रिया निष्कामभावसे एवं दूसरोंके हित और सुखके लिये ही करता है, अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। उसके पास जो समय, समझ, सामग्री और सामर्थ्य है, वह सब अपनी नहीं है, प्रत्युत मिली हुई है और बिछुड़ जायगी। इसलिये वह उसे अपनी कभी न मानकर निःस्वार्थभावसे (संसारकी ही मानकर) संसारकी ही सेवामें लगा देता है। उसे पूरी-की-पूरी संसारकी सेवामें लगा देता है, अपने पास बचाकर नहीं रखता। अपना न माननेसे ही वह पूरी-की-पूरी सेवामें लगती है, अन्यथा नहीं।

कर्मयोगी अपने लिये कुछ करता ही नहीं, अपने लिये कुछ चाहता ही नहीं और अपना कुछ मानता ही नहीं। इसलिये उसमें कामनाओंका नाश सुगमतापूर्वक हो जाता है। कामनाओंका सर्वथा नाश होनेपर उसके उद्देश्यकी पूर्ति हो जाती है और वह अपने-आपमें ही अपने-आपको पाकर कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता।