श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक १]
- साधक-संजीवनी *
२१७
सुननेसे, उनका मनन-चिन्तन करनेसे स्वाभाविक ही उस उददेश्यकी सिद्धि हो जाती है।
चौथे श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से केवल उनके 'जन्म' के विषयमें पूछा था; परन्तु यहाँ भगवान्ने अर्जुनके पूछे बिना अपनी तरफसे 'कर्म' के विषयमें कहना आरम्भ कर दिया! इसमें भगवान्का यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि जैसे मेरे कर्म दिव्य हैं, वैसे तुम्हारे कर्म भी दिव्य होने चाहिये। कारण कि मनुष्यका जन्म तो दिव्य नहीं हो सकता, पर उसके कर्म अवश्य दिव्य हो सकते हैं; क्योंकि उसीके लिये उसका जन्म हुआ है। कर्मोंमें दिव्यता (शुद्धि) योगसे आती है। जो कर्म बाँधनेवाले होते हैं, उनमें दिव्यता आनेसे वे ही कर्म मुक्ति देनेवाले हो जाते हैं। कर्म दिव्य (फलेच्छा, ममता-आसक्तिसे रहित) होनेपर कर्ता एक तो उन कर्मोंसे बँधता नहीं; दूसरे, वह पुराने कर्मोंसे भी नहीं बँधता—मुक्त हो जाता है; और तीसरे, उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंसे दूसरोंका भी हित स्वतः होता रहता है।
गम्भीरतापूर्वक विचार करके देखें तो उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही कर्मोंमें मलिनता आती है और वे बाँधनेवाले होते हैं। विनाशीसे अपना सम्बन्ध माननेसे अन्तःकरण, कर्म और पदार्थ—तीनों ही मलिन हो जाते हैं और विनाशीसे माना हुआ सम्बन्ध छूट जानेसे ये तीनों स्वतः पवित्र हो जाते हैं। अतः विनाशीसे माना हुआ सम्बन्ध ही मूल बाधा है।
'एवं यो वेत्ति तत्त्वतः'— अजन्मा और अविनाशी होते हुए तथा प्राणिमात्रका ईश्वर होते हुए भी भगवान् मात्र जीवोंके हितके लिये अपनी प्रकृतिको अधीन करके स्वतन्त्रतापूर्वक युग-युगमें मनुष्य आदिके रूपमें अवतार लेते हैं—इस तत्त्वको जानना अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानना भगवान्के जन्मोंकी दिव्यताको जानना है।
सम्पूर्ण क्रियाओंको करते हुए भी भगवान् अकर्ता ही हैं अर्थात् उनमें करनेका अभिमान नहीं है (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक) और किसी भी कर्मफलमें उनकी स्मृहा (फलेच्छा) नहीं है (गीता—चौथे अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)—इस तत्त्वको जानना भगवान्के कर्मोंकी दिव्यताको जानना है।
जैसे भगवान्के जन्ममें स्वाभाविक ही मात्र जीवोंकी हैतिषिता और कर्ममें निलिप्तता है, ऐसे ही मनुष्यमें भी
मात्र जीवोंकी हैतिषिता और कर्ममें निलिप्तता आ जाना ही वास्तवमें भगवान्के जन्म और कर्मके तत्त्वको जानना है।
'त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति'— भगवान्को त्रिलोकीमें न तो कुछ करना शेष है और न कुछ पाना ही शेष है (गीता—तीसरे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। फिर भी वे केवल जीवमात्रका उद्धार करनेके लिये कृपापूर्वक इस भूमण्डलपर अवतार लेते हैं और तरह-तरहकी अलौकिक लीलाएँ करते हैं। उन लीलाओंको गानेसे, सुननेसे, पढ़नेसे और उनका चिन्तन करनेसे भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है। भगवान्से सम्बन्ध जुड़नेपर संसारका सम्बन्ध छूट जाता है। संसारका सम्बन्ध छूटनेपर पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात् मनुष्य जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
वास्तवमें कर्म बन्धनकारक नहीं होते। कर्मोंमें जो बाँधनेकी शक्ति है, वह केवल मनुष्यकी अपनी बनायी हुई (कामना) है। कामनाकी पूर्तिके लिये रागपूर्वक अपने लिये कर्म करनेसे ही मनुष्य कर्मोंसे बँध जाता है। फिर ज्यों-ज्यों कामना बढ़ती है, त्यों-त्यों वह पापोंमें प्रवृत्त होने लगता है। इस प्रकार उसके कर्म अत्यन्त मलिन हो जाते हैं, जिससे वह बारंबार नीच योनियों और नरकोंमें गिरता रहता है। परन्तु जब वह केवल दूसरोंकी सेवाके लिये निष्कामभावपूर्वक कर्म करता है, तब उसके कर्मोंमें दिव्यता, विलक्षणता आती चली जाती है। इस प्रकार कामनाका सर्वथा नाश होनेपर उसके कर्म दिव्य हो जाते हैं, अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते; फिर उसके पुनर्जन्मका प्रश्न ही नहीं रहता।
'मामेति सोऽर्जुन'— नाशवान् कर्मोंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण नित्यप्राप्त परमात्मा भी अप्राप्त प्रतीत होते हैं। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये सम्पूर्ण कर्म करनेसे मात्र कर्मोंका प्रवाह केवल संसारकी तरफ हो जाता है और नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है।
जीवोंपर महान् कृपा ही भगवान्के जन्ममें कारण है—इस प्रकार भगवान्के जन्मकी दिव्यताको जाननेसे मनुष्यकी भगवान्में भक्ति हो जाती है*। भक्तिसे भगवान्की प्राप्ति हो जाती है। भगवान्के कर्मोंकी दिव्यताको जाननेसे मनुष्यके कर्म भी दिव्य हो जाते हैं अर्थात् वे बन्धनकारक न होकर खुदका और दूसरोंका कल्याण करनेवाले हो जाते हैं, जिससे संसारसे सम्बन्ध-
- उमा राम सुभाउ जेहि जान। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥ (मानस ५। ३४। २)
२९८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
विच्छेदपूर्वक भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।
मामिक बात
सम्पूर्ण कर्म आरम्भ और समाप्त होनेवाले हैं (और कर्मके फलस्वरूप जो कुछ प्राप्त होता है, वह भी अनित्य और नाशवान् होता है); परन्तु स्वयं (जीवात्मा) नित्य-निरन्तर रहनेवाला है। अतः वास्तवमें स्वयंका कर्मके साथ कोई सम्बन्ध है नहीं, प्रत्युत माना हुआ है। अतः सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी उनके साथ अपना सम्बन्ध है ही नहीं—ऐसा अनुभव करे तो उसके कर्म दिव्य हो जाते हैं—यह कर्मोंका तत्त्व है। यही कर्मयोग है!
क्रियाशील प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेके कारण मनुष्यमात्रमें कर्म करनेका वेग रहता है। वह क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। संसारमें वह देखता है कि कर्म करनेसे ही सिद्धि (वस्तुकी प्राप्ति) होती है। इसी कारण वह परमात्माकी प्राप्ति भी कर्मोंके द्वारा ही करना चाहता है; परन्तु यह उसकी महान् भूल है। कारण कि नाशवान् कर्मोंके द्वारा नाशवान् वस्तुकी ही प्राप्ति होती है, अविनाशीकी प्राप्ति नहीं होती। अविनाशीकी प्राप्ति तो कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ही होती है। कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद कर्मयोगमें (ज्ञानयोगकी अपेक्षा भी) सरलतासे हो जाता है। कारण कि कर्मयोगमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों शरीरोंसे होनेवाले सम्पूर्ण कर्म निष्कामभावपूर्वक केवल संसारके हितके लिये होनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है और अपना कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —निष्कामभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म (सेवा) करनेपर अथवा भगवान्के लिये कर्म (पूजा) करनेपर वे कर्म दिव्य मुक्तिदायक हो जाते हैं। परन्तु कामनापूर्वक अपने लिये किये गये कर्म मलिन, बन्धनकारक हो जाते हैं।
कर्ममें कर्तृत्वका न होना ही दिव्यता है। अपने लिये कुछ न करनेसे कर्तृत्व नहीं रहता।
भगवान्की छोटी-से-छोटी तथा बड़ी-से-बड़ी प्रत्येक क्रिया 'लीला' होती है। लीलामें भगवान् सामान्य मनुष्यों-जैसी क्रिया करते हुए भी निर्लिप्त रहते हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। भगवान्की लीला दिव्य होती है। यह दिव्यता देवताओंकी दिव्यतासे भी विलक्षण होती है। देवताओंकी दिव्यता मनुष्योंकी अपेक्षासे होनेके कारण सापेक्ष और सीमित होती है, पर भगवान्की दिव्यता निरपेक्ष और असीम होती है। यद्यपि जीवनमुक्त, तत्त्वज्ञ, भगवत्प्रेमी महापुरुषोंकी क्रियाएँ भी दिव्य होती हैं, तथापि वे भी भगवल्लीलाके समान नहीं होतीं। भगवान्की साधारण लीला भी अत्यन्त अलौकिक होती है। जैसे, भगवान्की रासलीला लौकिक दीखती है, पर उसको पढ़ने-सुननेसे साधककी काम-वृत्तिका नाश हो जाता है (श्रीमद्भगवद्गीता १० दशम स्कन्ध, तैत्तीसर्वा अध्याय, चालीसर्वा श्लोक)।
यह जगत् भगवान्का आदि अवतार है—'आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य' (श्रीमद्भगवद्गीता २।६।४९)। तात्पर्य है कि भगवान् ही जगत्-रूपसे प्रकट हुए हैं। परन्तु जीवने भोगासक्तिके कारण जगत्को भगवद्रूपसे स्वीकार न करके नाशवान्
यहाँ भगवान्ने 'माम् एति' पदोंसे यह भाव प्रकट किया है कि मनुष्य कर्मोंके द्वारा जिसकी सिद्धि चाहता है, वह परमात्मतत्त्व स्वतःसिद्ध (नित्यप्राप्त) है। स्वतःसिद्ध वस्तुके लिये करना कैसा? जो वस्तु प्राप्त है, उसे प्राप्त करना कैसा? करनेसे तो उस वस्तुकी प्राप्ति होती है, जो पहले अप्राप्त थी।
एक उत्पत्ति होती है और एक खोज होती है। उत्पत्ति उसकी होती है, जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है; जिसका पहले अभाव है और बादमें जिसका विनाश हो जाता है। खोज उसकी होती है, जिसकी स्वतन्त्र सत्ता है; जो पहलेसे विद्यमान है और नित्य-निरन्तर रहता है; किन्तु जो क्रिया और पदार्थरूप संसारका महत्त्व मान लेनेसे छिप गया है। जब मनुष्य क्रियाओं और पदार्थोंके केवल दूसरोंकी सेवामें लगा देता है, तब क्रिया-पदार्थरूप संसारसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद और नित्यप्राप्त परमात्माका साक्षात् अनुभव हो जाता है। यही नित्यप्राप्तकी खोज है।
कर्तव्य-कर्मोंको न करके प्रमाद-आलस्य करना और कर्तव्य-कर्मोंको करके उनके फलकी इच्छा रखना—इन दोनों कारणोंसे मनुष्यको नित्यप्राप्त परमात्माके अनुभवमें बाधा लगती है। इस बाधाको दूर करनेका उपाय है—फलकी इच्छा न रखकर दूसरोंकी सेवाके रूपसे कर्तव्य-कर्म करना। फलकी इच्छा न रखकर कर्तव्य-कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही परमात्मासे हमारा जो स्वतःसिद्ध नित्य-सम्बन्ध है, उसका अनुभव हो जाता है।
श्लोक १० ]
- साधक-संजीवनी *
२१९
जगत्-रूपसे ही धारण कर रखा है—‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। इस धारणाको मिटानेके लिये साधकको दृढ़तासे ऐसा मानना चाहिये कि जो दीख रहा है, वह भगवान्का स्वरूप है और जो हो रहा है, वह भगवान्की लीला है। ऐसा मानने (स्वीकार करने)-पर जगत् जगत्-रूपसे नहीं रहेगा और ‘भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है’—इसका अनुभव हो जायगा। दूसरे शब्दोंमें, संसार लुप्त हो जायगा और केवल भगवान् रह जायेंगे। कारण कि प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्तिको भगवान्का स्वरूप और प्रत्येक क्रियाको भगवल्लीला माननेसे भोगासक्ति, राग-द्वेष नहीं रहेंगे। भोगासक्तिका नाश होनेपर जो क्रियाएँ पहले लौकिक दीखती थीं, वही क्रियाएँ अलौकिक भगवल्लीलारूपसे दीखने लगेंगी और जहाँ पहले भोगासक्ति थी, वहाँ भगवत्प्रेम हो जायगा।
भगवान् जैसा रूप धारण करते हैं, उसीके अनुरूप लीला करते हैं*। जब वे अर्चावतार अर्थात् मूर्तिका रूप धारण करते हैं, तब वे मूर्तिकी तरह ही अचल रहनेकी लीला करते हैं। अगर वे अचल नहीं रहेंगे तो वह अर्चावतार कैसे रहेगा? भगवान्ने राम, कृष्ण आदि रूप भी धारण किये और मत्स्य, कच्छप आदि रूप भी धारण किये। उन्होंने जैसा रूप धारण किया, वैसी ही लीला की। जैसे, वराहावतारमें भगवान्ने सूअर बनकर लीला की और वामनावतारमें ब्रह्मचारी ब्राह्मण बनकर लीला की। इससे साधकको यह समझना चाहिये कि अभी भी जो हो रहा है, वह सब भगवान्की लीला ही हो रही है!
सम्बन्ध—भगवान्के जन्म-कर्मकी दिव्यताको जाननेवाले कैसे होते हैं—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ १० ॥
| वीतरागभयक्रोधाः = राग, भय | माम् = मेरे (ही) | बहवः = बहुत-से |
|---|---|---|
| और क्रोधसे | उपाश्रिताः = आश्रित (तथा) | (भक्त) |
| सर्वथा रहित, | ज्ञानतपसा = ज्ञानरूप तपसे | मद्भावम् = मेरे स्वरूपको |
| मन्मयाः = मुझमें तल्लीन, | पूताः = पवित्र हुए | आगताः = प्राप्त हो चुके हैं। |
व्याख्या—‘वीतरागभयक्रोधाः’ —परमात्मासे विमुख होनेपर नाशवान् पदार्थोंमें ‘राग’ हो जाता है। रागसे फिर प्राप्तमें ‘ममता’ और अप्राप्तकी ‘कामना’ उत्पन्न होती है। रागवाले (प्रिय) पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर तो ‘लोभ’ होता है, पर उनकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचनेपर (बाधा पहुँचानेवालेपर) ‘क्रोध’ होता है। यदि बाधा पहुँचानेवाला व्यक्ति अपनेसे अधिक बलवान् हो और उसपर अपना वश न चल सकता हो तथा समयपर वह हमारा अनिष्ट कर देगा—ऐसी
- भगवान् श्रीकृष्ण उत्तंक ऋषिसे कहते हैं—
धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥ तैस्तैर्वैश्वच रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भाग्व।
(महाभारत, आश्व० ५४।१३-१४)
‘मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत-सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन-उन रूपों और वेषोंद्वारा तदनुरूप वर्ताव करता हूँ।’
यदा त्वहं देवयोनीं वर्तामि भृगुनन्दन। तदाहं देववत् सर्वमाचारामि न संशयः ॥
यदा गन्धर्वयोनीं वा वर्तामि भृगुनन्दन। तदा गन्धर्ववत् सर्वमाचारामि न संशयः ॥
नागयोनीं यदा चैव तदा वर्तामि नागवत्। यक्षराक्षसयोन्योस्तु यथावद् विचराम्यहम् ॥
(महाभारत, आश्व० ५४।१७—१९)
‘भृगुनन्दन! जब मैं देवयोनियोंमें अवतार लेता हूँ, तब देवताओंकी ही भाँति सारे आचार-विचारका पालन करता हूँ, इसमें संशय नहीं है।’
‘जब मैं गन्धर्वयोनियोंमें प्रकट होता हूँ, तब मेरे सारे आचार-विचार गन्धर्वोंके ही समान होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।’
‘जब मैं नागयोनियोंमें जन्म ग्रहण करता हूँ, तब नागोंकी तरह वर्ताव करता हूँ। यक्षों और राक्षसोंकी योनियोंमें प्रकट होनेपर मैं उन्हींके आचार-विचारका यथावत्-रूपसे पालन करता हूँ।’
३००
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
सम्भावना हो तो 'भय' होता है। इस प्रकार नाशवान् पदार्थिके रागसे ही भय, क्रोध, लोभ, ममता, कामना आदि सभी दोषोंकी उत्पत्ति होती है। रागके मिटनेपर ये सभी दोष मिट जाते हैं। पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर, दूसरोंका और दूसरोंके लिये मानकर उनकी सेवा करनेसे राग मिटता है। कारण कि वास्तवमें पदार्थ और क्रियासे हमारा सम्बन्ध है ही नहीं।
अपना कोई प्रयोजन न रहनेपर भी भगवान् केवल हमारे कल्याणके लिये ही अवतार लेते हैं। कारण कि वे प्राणीमात्रके परम सुहृद् हैं और उनकी सम्पूर्ण क्रियाएँ मात्र जीवोंके कल्याणके लिये ही होती हैं। इस प्रकार भगवान्की परम सुहृत्तापर दृढ़ विश्वास होनेसे भगवान्में आकर्षण हो जाता है। भगवान्में आकर्षण होनेसे संसारका आकर्षण (राग) स्वतः मिट जाता है। जैसे, बचपनमें बालकोंका कंकड़-पत्थरोंमें आकर्षण होता है और उनसे वे खेलते हैं। खेलमें वे कंकड़-पत्थरोंके लिये लड़ पड़ते हैं। एक कहता है कि यह मेरा है और दूसरा कहता है कि यह मेरा है। इस प्रकार गलीमें पड़े कंकड़-पत्थरोंमें ही उन्हें महता दीखती है। परन्तु जब वे बड़े हो जाते हैं, तब कंकड़-पत्थरोंमें उनका आकर्षण मिट जाता है और रूप्योंमें आकर्षण हो जाता है। रूप्योंमें आकर्षण होनेपर उन्हें कंकड़-पत्थरोंमें अथवा खिलीनोंमें कोई महता नहीं दीखती। ऐसे ही जब मनुष्यकी परमात्मामें लगन लग जाती है, तब उसके लिये संसारके रुपये और सब पदार्थ आकर्षक न रहकर फीके पड़ जाते हैं। उसका संसारमें आकर्षण या राग मिट जाता है। राग मिटते ही भय और क्रोध—दोनों मिट जाते हैं, क्योंकि ये दोनों रागके ही आश्रित रहते हैं।
'मन्मयाः' —'भगवान्के जन्म और कर्मकी दिव्यताको तत्त्वसे जाननेसे मनुष्योंकी भगवान्में प्रियता हो जाती है, प्रियता होनेसे वे भगवान्के ही शरण हो जाते हैं और शरण होनेसे वे स्वयं 'मन्मयाः' अर्थात् भगवन्मय हो जाते हैं। सांसारिक भोगोंमें आकर्षणवाले मनुष्य भोगोंकी कामनाओंमें तन्मय हो जाते हैं—'कामात्मानः' (गीता २।४३) और भगवान्में आकर्षणवाले मनुष्य भगवान्में तन्मय हो जाते
हैं—'तन्मयाः' (नारदभक्तिसूत्र ७०)। वे हर समय भगवान्में ही तल्लीन रहते हैं। उनके विचारों, आचरणों आदिमें भगवान्की ही मुख्यता रहती है। प्रेमकी अधिकताके कारण वे भगवत्स्वरूप बन जाते हैं, मानो उनकी अपनी कोई अलग सत्ता ही न हो।*
'मामुपाश्रिताः' —'वीतरागभयक्रोधाः' में संसारसे स्वयंका सम्बन्ध-विच्छेद है और 'मन्मयाः मामु उपाश्रिताः' में भगवान्की तल्लीनता है।
किसी-न-किसीका आश्रय लिये बिना मनुष्य रह ही नहीं सकता। भगवान्का अंश जीव भगवान्से विमुख होकर दूसरेका आश्रय लेता है तो वह आश्रय टिकता नहीं, प्रत्युत मिटता जाता है। धनादि नाशवान् पदार्थोंका आश्रय पतन करनेवाला होता है। इतना ही नहीं, शुभ-कर्मोंको करनेमें बुद्धिका, भगवत्प्राप्तिके साधनोंका तथा भोग और संग्रहके त्यागका आश्रय लेनेपर भी भगवत्प्राप्तिमें देरी लगती है। जबतक मनुष्य स्वयं (स्वरूपसे) भगवान्के आश्रित नहीं हो जाता, तबतक उसकी पराधीनता मिटती नहीं और वह दुःख पाता ही रहता है।
संसारके पदार्थोंमें मनुष्यका आकर्षण और आश्रय अलग-अलग होता है, जैसे—मनुष्यका आकर्षण तो स्त्री, पुत्र आदिमें होता है और आश्रय बड़ोंका होता है। परन्तु भगवान्में लगे हुए मनुष्यका भगवान्में ही आकर्षण होता है और भगवान्का ही आश्रय होता है; क्योंकि प्रिय-से-प्रिय भी भगवान् हैं और बड़े-से-बड़े भी भगवान् हैं।
'बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः' —'यद्यपि ज्ञानयोग-(सांख्यनिष्ठा-) से भी मनुष्य पवित्र हो सकता है, तथापि यहाँ भगवान्के जन्म और कर्मकी दिव्यताको तत्त्वसे जाननेको 'ज्ञान' कहा गया है। इस ज्ञानसे मनुष्य पवित्र हो जाता है; क्योंकि भगवान् पवित्रोंसे भी पवित्र हैं—'पवित्राणां पवित्रं यः।' भगवान्का ही अंश होनेसे जीवमें भी स्वतः-स्वाभाविक पवित्रता है—'चेतन अमल सहज सुख रासी' (मानस ७।११७।१)। नाशवान् पदार्थोंको महत्त्व देनेसे, उनको अपना माननेसे ही यह अपवित्र होता है; क्योंकि नाशवान् पदार्थोंकी ममता ही मल (अपवित्रता)
- गतिस्मितप्रेक्षणभाषणदिषु प्रियाः प्रियस्य प्रतिरुद्धमूर्तयः।
असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः॥
(श्रीमद्भा १०।३०।३)
'अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन-बोलन आदिमें श्रीकृष्णकी प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयीं; उनके शरीरमें भी वही गति-मति, वही भाव-भंगी उतर आयी। वे अपनेको सर्वथा भूलकर श्रीकृष्णस्वरूप हो गयीं और उन्हींके लीला-विलासका अनुकरण करती हुई 'मैं श्रीकृष्ण ही हूँ—इस प्रकार कहने लगीं।'
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
३०९
है*। भगवान्के जन्म-कर्मके तत्त्वको जाननेसे जब नाशवान् पदार्थोंका आकर्षण, उनकी ममता सर्वथा मिट जाती है, तब सब मलिनता नष्ट हो जाती है और मनुष्य परम पवित्र हो जाता है।
कर्मयोगका प्रसंग होनेसे उपर्युक्त पदोंमें आये ‘ज्ञान’ शब्दका अर्थ कर्मयोगका ज्ञान भी माना जा सकता है। कर्मयोगका ज्ञान है—शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पद, योग्यता, अधिकार, धन, जमीन आदि मिली हुई मात्र वस्तुएँ संसारकी और संसारके लिये ही हैं, अपनी और अपने लिये नहीं हैं। कारण कि स्वयं (स्वरूप) नित्य है; अतः उसके साथ अनित्य वस्तु कैसे रह सकती है तथा उसके काम भी कैसे आ सकती है? शरीरादि वस्तुएँ जन्मसे पहले भी हमारे साथ नहीं थीं और मरनेके बाद भी नहीं रहेंगी तथा इस समय भी उनका प्रतिक्षण हमसे सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है। इन मिली हुई वस्तुओंका सदुपयोग करनेका ही अधिकार है, अपनी माननेका अधिकार नहीं। ये वस्तुएँ संसारकी ही हैं; अतः इन्हें संसारकी ही सेवामें लगाना है। यही इनका सदुपयोग है। इनको अपनी और अपने लिये मानना ही वास्तवमें बन्धन या अपवित्रता है।
इस प्रकार नाशवान् वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानना ‘ज्ञानतप’ है; जिससे मनुष्य परम पवित्र हो
जाता है। जितने भी तप हैं, उन सबसे बढ़कर ‘ज्ञानतप’ है। इस ज्ञानतपसे जड़के साथ माने हुए सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है। जबतक मनुष्य जड़के साथ अपना सम्बन्ध मानता रहता है, तबतक दूसरी तपस्यासे उसकी उतनी पवित्रता नहीं होती, जितनी पवित्रता ज्ञानतपसे जड़का सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे होती है। इस ज्ञानतपसे पवित्र होकर मनुष्य भगवान्के भाव-(सत्ता-) को अर्थात् सच्चिदानन्दधन परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि जैसे भगवान् नित्य-निरन्तर रहते हैं, ऐसे वह भी उनमें नित्य-निरन्तर रहता है; जैसे भगवान् निलिप्त-निर्विकार रहते हैं, ऐसे वह भी निलिप्त-निर्विकार रहता है; जैसे भगवान्के लिये कुछ भी करना शेष नहीं है, ऐसे ही उसके लिये भी कुछ करना शेष नहीं रहता। ज्ञानमार्गसे भी मनुष्य इसी प्रकार भगवान्के भावको प्राप्त हो जाता है (गीता—चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
पहले भी बहुत-से भक्त ज्ञानतपसे पवित्र होकर भगवान्को प्राप्त हो चुके हैं। अतः साधकोंको वर्तमानमें ही ज्ञानतपसे पवित्र होकर भगवान्को प्राप्त कर लेना चाहिये। भगवान्को प्राप्त करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं, कोई भी परतन्त्र नहीं है। कारण कि मानव-शरीर भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है।
सम्बन्ध—जन्मकी दिव्यताका वर्णन तो हो गया, अब कर्मोंकी दिव्यता क्या होती है—इस विषयका आरम्भ करते हैं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्त्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन! | अहम् | = मैं | मनुष्याः | = सभी मनुष्य |
|---|---|---|---|---|---|
| ये | = जो भक्त | तान् | = उन्हें | सर्वशः | = सब प्रकारसे |
| यथा | = जिस प्रकार | तथा, एव | = उसी प्रकार | मम | = मेरे |
| माम् | = मेरी | भजामि | = आश्रय देता हूँ; | वर्त्त | = मार्गका |
| प्रपद्यन्ते | = शरण लेते हैं, | (क्योंकि) | अनुवर्त्तन्ते | = अनुसरण करते हैं। |
व्याख्या—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’— भक्त भगवान्की जिस भावसे, जिस सम्बन्धसे, जिस प्रकारसे शरण लेता है, भगवान् भी उसे उसी भावसे, उसी सम्बन्धसे, उसी प्रकारसे आश्रय देते हैं। जैसे, भक्त भगवान्को अपना गुरु मानता है तो वे श्रेष्ठ गुरु बन जाते हैं, शिष्य मानता है तो वे श्रेष्ठ शिष्य बन जाते हैं, माता-
पिता मानता है तो वे श्रेष्ठ माता-पिता बन जाते हैं, पुत्र मानता है तो वे श्रेष्ठ पुत्र बन जाते हैं, भाई मानता है तो वे श्रेष्ठ भाई बन जाते हैं, सखा मानता है तो वे श्रेष्ठ सखा बन जाते हैं, नौकर मानता है तो वे श्रेष्ठ नौकर बन जाते हैं। भक्त भगवान्के बिना व्याकुल हो जाता है तो भगवान् भी भक्तके बिना व्याकुल हो जाते हैं।
- ‘ममता मल जरि जाड़’ (मानस ७।११७ क); ‘ममतामेधदूषितः’ (योगवासिष्ठ ६।२।५३।११)
३०२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
अर्जुनका भगवान् श्रीकृष्णके प्रति सखाभाव था तथा वे उन्हें अपना सारथि बनाना चाहते थे; अतः भगवान् सखाभावसे उनके सारथि बन गये। विश्वामित्र ऋषिने भगवान् श्रीरामको अपना शिष्य मान लिया तो भगवान् उनके शिष्य बन गये। इस प्रकार भक्तोंके ब्रह्माभावके अनुसार भगवान्का वैसा ही बननेका स्वभाव है।
अनन्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी भगवान् भी अपने ही बनाये हुए साधारण मनुष्योंके भावोंके अनुसार बर्ताव करते हैं, यह उनकी कितनी विलक्षण उदारता, दयालुता और अपनापन है?
भगवान् विशेषरूपसे भक्तोंके लिये ही अवतार लेते हैं—ऐसा प्रस्तुत प्रकरणसे सिद्ध होता है। भक्तलोग जिस भावसे, जिस रूपमें भगवान्की सेवा करना चाहते हैं, भगवान्को उनके लिये उसी रूपमें आना पड़ता है। जैसे, उपनिषद्में आया है—‘एकाकी न रमते’ (बृहदारण्यक० १।४।३)—अकेले भगवान्का मन नहीं लगा, तो वे ही भगवान् अनेक रूपोंमें प्रकट होकर खेल खेलने लगे। ऐसे ही जब भक्तोंके मनमें भगवान्के साथ खेल खेलनेकी इच्छा हो जाती है, तब भगवान् उनके साथ खेल खेलने—(लीला करने—) के लिये प्रकट हो जाते हैं। भक्त भगवान्के बिना नहीं रह सकता तो भगवान् भी भक्तके बिना नहीं रह सकते।
यहाँ आये ‘यथा’ और ‘तथा’—इन प्रकारवाचक पदोंका अभिप्राय ‘सम्बन्ध’, ‘भाव’ और ‘लगन’ से है। भक्त और भगवान्का प्रकार एक-सा होनेपर भी इनमें एक बहुत बड़ा अन्तर यह है कि भगवान् भक्तकी चालसे नहीं चलते, प्रत्युत अपनी चाल—(शक्ति—) से चलते हैं*। भगवान् सर्वत्र विद्यमान, सर्वसमर्थ, सर्वज्ञ, परम सुहृद् और सत्यसंकल्प हैं। भक्तको केवल अपनी पूरी शक्ति लगा देनी है, फिर भगवान् भी अपनी पूरी शक्तिसे उसे प्राप्त हो जाते हैं।
भगवत्प्राप्तमें बाधा साधक स्वयं लगाता है; क्योंकि भगवत्प्राप्तिके लिये वह समझ, सामग्री, समय और सामर्थ्यको अपनी मानकर उन्हें पूरा नहीं लगाता, प्रत्युत अपने पास बचाकर रख लेता है। यदि वह उन्हें अपना न मानकर उन्हें पूरा लगा दे तो उसे शीघ्र ही भगवत्प्राप्ति हो जाती है। कारण कि यह समझ, सामग्री आदि उसकी अपनी नहीं हैं; प्रत्युत भगवान्से मिली हैं; भगवान्को हैं।
अतः इन्हें अपनी मानना ही बाधा है। साधक स्वयं भी भगवान्का ही अंश है। उसने खुद अपनेको भगवान्से अलग माना है, भगवान्ने नहीं।
भक्ति (प्रेम) कर्मजन्म अर्थात् किसी साधन-विशेषका फल नहीं है। भगवान्के सर्वथा शरण होनेवालेको भक्ति स्वतः प्राप्त होती है। दाम्पत्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य आदि भावोंमें सबसे श्रेष्ठ शरणागतिका भाव है। यहाँ भगवान् मानो इस बातको कह रहे हैं कि तुम अपना सब कुछ मुझे दे दोगे तो मैं भी अपना सब कुछ तुम्हें दे दूँगा और तुम अपने-आपको मुझे दे दोगे तो मैं भी अपने-आपको तुम्हें दे दूँगा। भगवत्प्राप्तिका कितना सरल और सस्ता सौदा है!
अपने-आपको भगवच्चरणोंमें समर्पित करनेके बाद भगवान् भक्तकी पुरानी त्रुटियोंको यादतक नहीं करते। वे तो वर्तमानमें साधकके हृदयका दृढ़ भाव देखते हैं—
रहित न प्रभु चित् चूक कि० की।
करत सुरति सय बार हि० की॥
(मानस १।२९।३)
इस (ग्यारहवें) श्लोकमें द्वैत-अद्वैत, सगुण-निर्गुण, सायुज्य-सामीप्य आदि शास्त्रीय विषयका वर्णन नहीं है, प्रत्युत भगवान्से अपनेपनका ही वर्णन है। जैसे, नवें श्लोकमें भगवान्के जन्म-कर्मकी दिव्यताको जाननेसे भगवत्प्राप्ति होनेका वर्णन है। ‘केवल भगवान् ही मेरे हैं और मैं भगवान्का ही हूँ; दूसरा कोई भी मेरा नहीं है और मैं किसीका भी नहीं हूँ’—इस प्रकार भगवान्में अपनापन करनेसे उनकी प्राप्ति शीघ्र एवं सुगमतासे हो जाती है।
अतः साधकको केवल भगवान्में ही अपनापन मान लेना चाहिये (जो वास्तवमें है), चाहे समझमें आये अथवा न आये। मान लेनेपर जब संसारके झूठे सम्बन्ध भी सच्चे प्रतीत होने लगते हैं, फिर जो भगवान्का सदासे ही सच्चा सम्बन्ध है, वह अनुभवमें क्यों नहीं आयेगा? अर्थात् अवश्य आयेगा।
शंका—जो भगवान्को जिस भावसे स्वीकार करते हैं, भगवान् भी उनसे उसी भावसे बर्ताव करते हैं, तो फिर यदि कोई भगवान्को द्वेष, वैर आदिके भावसे स्वीकार करेगा तो क्या भगवान् भी उससे उसी (द्वेष आदिके) भावसे बर्ताव करेंगे?
समाधान—यहाँ ‘प्रपद्यन्ते’ पदसे भगवान्की प्रपत्ति
- दरिया दूषण दास में, नहीं राम में दोष। जन चाले इक पाँवड़ो, हरि चाले सौ कोस॥
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
३०३
अर्थात् शरणागतिका ही विषय है; उनसे द्वेष, वैर आदिका विषय नहीं। अतः यहाँ इस विषयमें शंका ही नहीं उठ सकती। फिर भी इसपर थोड़ा विचार करें तो भगवान्के स्वीकार करनेका तात्पर्य है—कल्याण करना। जो भगवान्को जिस भावसे स्वीकार करता है, भगवान् भी उससे वैसा ही आचरण करके अन्तमें उसका कल्याण ही करते हैं। भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। इसलिये जिसका जिसमें हित होता है, भगवान् उसके लिये वैसा ही प्रबन्ध कर देते हैं। वैर-द्वेष रखनेवालोंका भी जिससे कल्याण हो जाय, वैसा ही भगवान् करते हैं। [वैर-द्वेष रखनेवाले भगवान्का बिगाड़ भी क्या कर लेंगे?] अंगदजीको रावणकी सभामें भेजते समय भगवान् श्रीराम कहते हैं कि वही बात कहना, जिससे हमारा काम भी हो और रावणका हित भी हो—‘काजु हमार तासु हित होई’ (मानस ६।१७।४)।
भगवान्की सुहृताकी तो बात ही क्या, भक्त भी समस्त प्राणियोंके सुहृद् होते हैं—‘सुहृदः सर्वदेहिनाम्’ (श्रीमद्भा० ३।२५।२१)। जब भक्तोंसे भी किसीका किंचिन्मात्र भी अहित नहीं होता, तब भगवान्से किसीका अहित हो ही कैसे सकता है? भगवान्से किसी प्रकारका भी सम्बन्ध जोड़ा जाय, वह कल्याण करनेवाला ही होता है; क्योंकि भगवान् परम दयालु, परम सुहृद् और चिन्मय हैं। जैसे गंगामें स्नान वैशाख मासमें किया जाय अथवा माघ मासमें, दोनोंका ही माहात्म्य एक समान है। परन्तु वैशाखके स्नानमें जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी प्रसन्नता माघके स्नानमें नहीं होती। इसी प्रकार भक्ति-प्रेमपूर्वक भगवान्से सम्बन्ध जोड़नेवालोंको जैसा आनन्द होता है, वैसा आनन्द वैर-द्वेषपूर्वक भगवान्से सम्बन्ध जोड़नेवालोंको नहीं होता।
‘मम वर्त्मानुवर्त्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः’—श्रेष्ठ
१-कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः।
पुरुष जैसा आचरण करता है, दूसरे लोग भी उसीके अनुसार आचरण करने लग जाते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। भगवान् सबसे श्रेष्ठ (सर्वोपरि) हैं, इसलिये सभी लोग उनके मार्गका अनुसरण करते हैं। तीसरे अध्यायमें तेईसवें श्लोकके उत्तरार्धमें भी यही बात (उपर्युक्त पदोंसे ही) कही गयी है।
साधक भगवान्के साथ जिस प्रकारका सम्बन्ध मानता है, भगवान् उसके साथ वैसा ही सम्बन्ध माननेके लिये तैयार रहते हैं। महाराज दशरथजी भगवान् श्रीरामको पुत्रभावसे स्वीकार करते हैं, तो भगवान् उनके सच्चे पुत्र बन जाते हैं और सामर्थ्यवान् होकर भी ‘पिता’ दशरथजीके वचनोंको टालनेमें अपनेको असमर्थ मानते हैं। इस प्रकारके आचरणोंसे भगवान् यह रहस्य प्रकट करते हैं कि यदि तुम्हारी संसारमें किसीके साथ सम्बन्धके नाते प्रियता हो तो वही सम्बन्ध तुम मेरे साथ कर लो, जैसे—मातामें प्रियता हो तो मेरेको अपनी माता मान लो, पितामें प्रियता हो तो मेरेको अपना पिता मान लो; पुत्रमें प्रियता हो तो मेरेको अपना पुत्र मान लो, आदि। ऐसा माननेसे मेरेमें वास्तविक प्रियता हो जायगी और मेरी प्राप्ति सुगमतापूर्वक हो जायगी।
दूसरी बात, भगवान् अपने आचरणोंसे यह शिक्षा देते हैं कि जिस प्रकार मेरे साथ जो जैसा सम्बन्ध मानता है, उसके लिये मैं भी वैसा ही बन जाता हूँ, उसी प्रकार तुम्हारे साथ जो जैसा सम्बन्ध मानता है, तुम भी उसके लिये वैसे ही बन जाओ; जैसे—माता-पिताके लिये तुम सुपुत्र बन जाओ, पत्नीके लिये तुम सुयोग्य पति बन जाओ, बहनेके लिये तुम श्रेष्ठ भाई बन जाओ, आदि। परन्तु बदलेमें उनसे कुछ चाहो मत; जैसे—कुछ लेनेकी इच्छासे माता-पिताको अपने न मानकर केवल सेवा करनेके लिये ही उन्हें अपने मानो। ऐसा मानना ही भगवान्के मार्गका अनुसरण करना है। अभिमानरहित होकर निःस्वार्थभावसे दूसरेकी सेवा
आवेश्य तदर्थं हित्वा बहवस्तदगतिं गताः ॥
(श्रीमद्भा० ७।१।२९)
‘अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर वैसे ही भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे।’
२-अहं हि वचनाद् राज्ञः पतेयमपि पावके। भक्ष्येयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे ॥
(वाल्मीकि०, अयोध्या० १८।२८-२९)
भगवान् श्रीराम कहते हैं—‘मैं महाराज पिताजीके कहनेपर आगमें भी प्रवेश कर सकता हूँ, तीक्ष्ण विषका भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्रमें भी कूद सकता हूँ।’
३०४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
करनेसे शीघ्र ही दूसरेकी ममता छूटकर भगवान्में प्रेम हो जायगा, जिससे भगवान्की प्राप्ति हो जायगी।
विशेष बात
अहंकाररहित होकर निःस्वार्थभावसे कहीं भी प्रेम किया जाय, तो वह प्रेम स्वतः प्रेममय भगवान्की तरफ चला जाता है। कारण कि अपना अहंकार और स्वार्थ ही भगवत्प्रेममें बाधा लगाता है। इन दोनोंके कारण मनुष्यका प्रेमभाव सीमित हो जाता है और इनका त्याग करनेपर उसका प्रेमभाव व्यापक हो जाता है। प्रेमभाव व्यापक होनेपर उसके माने हुए सभी बनावटी सम्बन्ध मिट जाते हैं और भगवान्का स्वाभाविक नित्य-सम्बन्ध जाग्रत् हो जाता है।
जीवमात्रका परमात्माके साथ स्वतः नित्य-सम्बन्ध है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। परन्तु जबतक जीव इस सम्बन्धको पहचानता नहीं और दूसरा सम्बन्ध
जोड़ लेता है, तबतक वह जन्म-मरणके बन्धनमें पड़ा रहता है। उसका यह बन्धन दो ओरसे होता है—एक तो वह भगवान्के साथ अपने नित्य-सम्बन्धको पहचानता नहीं और दूसरे, जिसके साथ वास्तवमें अपना सम्बन्ध है नहीं, उसके सम्बन्धको नित्य मान लेता है। जब जीव 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते' के अनुसार अपना सम्बन्ध केवल भगवान्से मान लेता है अर्थात् पहचान लेता है, तब उसे भगवान्से अपने नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जाता है।
भगवान्के नित्य-सम्बन्धको पहचानना ही भगवान्के शरण होना है। शरण होनेपर भक्त निश्चिन्त, निर्भय, निःशोक और निःशंक हो जाता है। फिर उसके द्वारा भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कोई क्रिया कैसे हो सकती है? उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्के आज्ञानुसार ही होती हैं—'मम वर्त्मानुवर्त्तन्ते'।
परिशिष्ट भाव —यद्यपि यह संसार साक्षात् परमात्माका स्वरूप है, तथापि जो इसको जिस रूपसे देखता है, भगवान् भी उसके लिये उसी रूपसे प्रकट हो जाते हैं। हम अपनेको शरीर मानकर अपने लिये वस्तुओंकी आवश्यकता मानते हैं और उनकी इच्छा करते हैं तो भगवान् भी उन वस्तुओंके रूपमें हमारे सामने आते हैं, हम असत्में स्थित होकर देखते हैं तो भगवान् भी असत्-रूपसे ही दीखते हैं। जैसे बालक खिलौना चाहता है तो पिता रुपये खर्च करके भी उसको खिलौना लाकर देता है, ऐसा ही हम जो चाहते हैं, परम दयालु भगवान् (स्वयं सदा सत्स्वरूप रहते हुए भी) उसी रूपसे हमारे सामने आते हैं। अगर हम भोगोंको न चाहें तो भगवान्को भोगरूपसे क्यों आना पड़े? बनावटी रूप क्यों धारण करना पड़े?
भगवान्के स्वभावमें 'यथा-तथा' होते हुए भी जीवपर उनकी बड़ी भारी कृपा है; क्योंकि कहाँ जीव और कहाँ भगवान्! अभिमानके सिवाय जीवमें और क्या सामर्थ्य है? फिर भी जीवका भगवान्में आकर्षण होता है तो भगवान्का भी जीवमें आकर्षण होता है। जैसे, विदुरानीजी अपने-आपको भूल गयीं तो भगवान् भी अपने-आपको भूल गये और केलेके छिलके खाने लगे तथा उसीमें आनन्द लेने लगे!
भगवान्के स्वभावमें 'यथा-तथा' केवल क्रियामें है, भावमें नहीं। भगवान्का आस्तिक-से-आस्तिक व्यक्तिके प्रति जो स्नेह है, कृपा है, वैसा ही स्नेह, कृपा नास्तिक-से-नास्तिक व्यक्तिके प्रति भी है। इसलिये भगवान्के 'यथा-तथा' में स्वार्थभाव नहीं है, प्रत्युत यह तो भगवान्की महत्ता है कि कहाँ जीव और कहाँ भगवान्! फिर भी वे जीवको अपना मित्र बनाते हैं, उसको अपने समान दर्जा देते हैं! भगवान् अपनेमें बड़प्पनका भाव नहीं रखते—यह उनकी महत्ता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि जो मुझे जिस भावसे स्वीकार करता है, मैं भी उसे उसी भावसे स्वीकार करता हूँ अर्थात् मेरी प्राप्ति बहुत सरल और सुगम है। ऐसा होनेपर भी लोग भगवान्का आश्रय क्यों नहीं लेते—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
३०५
| कर्मणाम् | = कर्मोंकी | यजन्ते | = उपासना किया | कर्मजा | = कर्मोंसे उत्पन्न |
|---|---|---|---|---|---|
| सिद्धिम् | = सिद्धि (फल) | करते हैं; | होनेवाली | ||
| काङ्क्षन्तः | = चाहनेवाले | हि | = क्योंकि | सिद्धिः | = सिद्धि |
| (मनुष्य) | इह | = इस | क्षिप्रम् | = जल्दी | |
| देवताः | = देवताओंकी | मानुषे, लोके | = मनुष्यलोकमें | भवति | = मिल जाती है। |
व्याख्या—‘काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः’ —मनुष्यको नवीन कर्म करनेका अधिकार मिला हुआ है। कर्म करनेसे ही सिद्धि होती है—ऐसा प्रत्यक्ष देखनेमें आता है। इस कारण मनुष्यके अन्तःकरणमें यह बात दृढ़तासे बैठी हुई है कि कर्म किये बिना कोई भी वस्तु नहीं मिलती। वे ऐसा समझते हैं कि सांसारिक वस्तुओंकी तरह भगवान्की प्राप्ति भी कर्म (तप, ध्यान, समाधि आदि) करनेसे ही होती है। नाशवान् पदार्थोंकी कामनाओंके कारण उनकी दृष्टि इस वास्तविकताकी ओर जाती ही नहीं कि सांसारिक वस्तुएँ कर्मजन्य हैं, एकदेशीय हैं, हमें नित्य प्राप्त नहीं हैं, हमारेसे अलग हैं और परिवर्तनशील हैं, इसलिये उनकी प्राप्तिके लिये कर्म करने आवश्यक हैं। परन्तु भगवान् कर्मजन्य नहीं हैं, सर्वत्र परिपूर्ण हैं, हमें नित्यप्राप्त हैं, हमारेसे अलग नहीं हैं और अपरिवर्तनशील हैं इसलिये भगवत्प्राप्तिमें सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिका नियम नहीं चल सकता। भगवत्प्राप्ति केवल उत्कट अभिलाषासे होती है। उत्कट अभिलाषा जाग्रत् न होनेमें खास कारण सांसारिक भोगोंकी कामना ही है।
भगवान् तो पिताके समान हैं और देवता दूकानदारके समान। अगर दूकानदार वस्तु न दे, तो उसको पैसे लेनेका अधिकार नहीं है; परन्तु पिताको पैसे लेनेका भी अधिकार है और वस्तु देनेका भी। बालकको पितासे कोई वस्तु लेनेके लिये कोई मूल्य नहीं देना पड़ता, पर दूकानदारसे वस्तु लेनेके लिये मूल्य देना पड़ता है। ऐसे ही भगवान्से कुछ लेनेके लिये कोई मूल्य देनेकी जरूरत नहीं है; परन्तु देवताओंसे कुछ प्राप्त करनेके लिये विधिपूर्वक कर्म करने पड़ते हैं। दूकानदारसे बालक दियासलाई, चाकू आदि हानिकारक वस्तुएँ भी पैसे देकर खरीद सकता है; परन्तु यदि वह पितासे ऐसी हानिकारक वस्तुएँ माँगे तो वे उसे नहीं देंगे और पैसे भी ले लेंगे। पिता वही वस्तु देते हैं, जिसमें बालकका हित हो। इसी प्रकार देवतालोग अपने उपासकोंको (उनकी उपासना सांगोपांग होनेपर) उनके हित-अहितका विचार किये बिना उनकी इच्छित वस्तुएँ दे देते हैं; परन्तु परमपिता भगवान् अपने भक्तोंको अपनी
इच्छासे वे ही वस्तुएँ देते हैं, जिसमें उनका परमहित हो। ऐसा होनेपर भी नाशवान् पदार्थोंकी आसक्ति, ममता और कामनाके कारण अल्प-बुद्धिवाले मनुष्य भगवान्की महत्ता और सुहृत्ताको नहीं जानते, इसलिये वे अज्ञानवश देवताओंकी उपासना करते हैं (गीता—सातवें अध्यायके बाईसवेंसे तेईसवें श्लोकतक तथा नवें अध्यायका तेईसवाँ-चौबीसवाँ श्लोक)।
‘क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा’ —यह मनुष्यलोक कर्मभूमि है—‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’ (गीता १५।२)। इसके सिवाय दूसरे लोक (स्वर्ग-नरकादि) भोगभूमियाँ हैं। मनुष्यलोकमें भी नया कर्म करनेका अधिकार मनुष्यको ही है, पशु-पक्षी आदिको नहीं। मनुष्य-शरीरमें किये हुए कर्मोंका फल ही लोक तथा परलोकमें भोगा जाता है।
मनुष्यलोकमें कर्मोंकी आसक्तिवाले मनुष्य रहते हैं—‘कर्मसद्विगु जायते’ (गीता १४।१५)। कर्मोंकी आसक्तिके कारण वे कर्मजन्य सिद्धिपर ही लुब्ध होते हैं। कर्मोंसे जो सिद्धि होती है, वह यद्यपि शीघ्र मिल जाती है, तथापि वह सदा रहनेवाली नहीं होती। जब कर्मोंका आदि और अन्त होता है, तब उनसे होनेवाली सिद्धि (फल) सदा कैसे रह सकती है? इसलिये नाशवान् कर्मोंका फल भी नाशवान् ही होता है। परन्तु कामनावाले मनुष्यकी दृष्टि शीघ्र मिलनेवाले फलपर तो जाती है, पर उसके नाशकी ओर नहीं जाती। विधिपूर्वक सांगोपांग किये गये कर्मोंका फल देवताओंसे शीघ्र मिल जाया करता है; इसलिये वे देवताओंकी ही शरण लेते हैं और उन्हींकी आराधना करते हैं। कर्मजन्य फल चाहनेके कारण वे कर्मबन्धनसे मुक्त नहीं होते और परिणामस्वरूप बारंबार जन्मते-मरते रहते हैं।
जो वास्तविक सिद्धि है, वह कर्मजन्य नहीं है। वास्तविक सिद्धि ‘भगवत्प्राप्ति’ है। भगवत्प्राप्तिके साधन—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग भी कर्मजन्य नहीं हैं। योगकी सिद्धि कर्मोंके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत कर्मोंके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है।
शंका—‘कर्मयोग’ की सिद्धि तो कर्म करनेसे ही बतायी गयी है—‘आरुरुक्षोमुनेयोगं कर्म कारणमुच्यते’
३०६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
(गीता ६।३), तो फिर कर्मयोग कर्मजन्म कैसे नहीं है? समाधान —कर्मयोगमें कर्मोंसे और कर्म-सामग्रीसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये ही कर्म किये जाते हैं। योग (परमात्माका नित्य-सम्बन्ध) तो स्वतःसिद्ध और स्वाभाविक है। अतः योग अथवा परमात्मप्राप्ति कर्मजन्म नहीं है। वास्तवमें कर्म सत्य नहीं है, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके साधनरूप कर्मोंका विधान सत्य है। कोई भी कर्म जब सत्के लिये किया जाता है, तब उसका परिणाम सत् होनेसे उस कर्मका नाम भी सत् हो जाता है—‘कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ’ (गीता १७।२७)।
अपने लिये कर्म करनेसे ही ‘योग’—(परमात्माके साथ नित्ययोग—) का अनुभव नहीं होता। कर्मयोगमें दूसरोंके लिये ही सब कर्म किये जाते हैं, अपने लिये अर्थात् फल-प्राप्तिके लिये नहीं—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु
कदाचन ’ (गीता २।४७)। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्य बँधता है (गीता—तीसरे अध्यायका नवों श्लोक) और दूसरोंके लिये कर्म करनेसे वह मुक्त होता है (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवों श्लोक)। कर्मयोगमें दूसरोंके लिये ही सब कर्म करनेसे कर्म और फलसे सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, जो ‘योग’का अनुभव करानेमें हेतु है।
कर्म करनेमें ‘पर’ अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, व्यक्ति, देश, काल आदि परिवर्तनशील वस्तुओंकी सहायता लेनी पड़ती है। ‘पर’की सहायता लेना परतन्त्रता है। स्वरूप ज्यों-का-त्यों है। उसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिये उसकी अनुभूतिमें ‘पर’ कहे जानेवाले शरीरादि पदार्थोंके सहयोगकी लेशमात्र भी अपेक्षा, आवश्यकता नहीं है। ‘पर’से माने हुए सम्बन्धका त्याग होनेसे स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है।
सम्बन्ध—आठवें श्लोकमें अपने अवतारके उद्देश्यका वर्णन करके नवें श्लोकमें भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको जाननेका माहात्म्य बताया। कर्मजन्म सिद्धि चाहनेसे ही कर्मोंमें अदिव्यता (मलिनता) आती है। अतः कर्मोंमें दिव्यता (पवित्रता) कैसे आती है—इसे बतानेके लिये अब भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यताका विशेष वर्णन करते हैं।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥
| मया | = मेरे द्वारा | माम् | = मुझ | कर्माणि | = कर्म |
|---|---|---|---|---|---|
| गुणकर्मविभागशः | = गुणों और कर्मोंके विभाग-पूर्वक | अव्ययम् | = अविनाशी परमेश्वरको (तू) | न, लिम्पन्ति | = लिप्त नहीं करते। |
| चातुर्वर्ण्यम् | = चारों वर्णोंकी | अकर्तारम् | = अकर्ता | इति | = इस प्रकार |
| सृष्टम् | = रचना की गयी है। | विद्धि | = जान! (कारण कि) | यः | = जो |
| तस्य | = उस (सृष्टि-रचना आदि)-का | कर्मफले | = कर्मोंके फलमें | माम् | = मुझे |
| कर्तारम् | = कर्ता होनेपर | मे | = मेरी | अभिजानाति | = तत्त्वसे जान लेता है, |
| अपि | = भी | स्पृहा | = स्पृहा | सः | = वह (भी) |
| न | = नहीं है, (इसलिये) | कर्मभिः | = कर्मोंसे | ||
| माम् | = मुझे | न | = नहीं | ||
| बध्यते | = बँधता। |
व्याख्या—‘चातुर्वर्ण्यं * मया सृष्टं गुणकर्म-विभागशः’—पूर्वजन्मोंमें किये गये कर्मोंके अनुसार
सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंमें न्यूनाधिकता रहती है। सृष्टि-रचनाके समय उन गुणों और कर्मोंके अनुसार
* ‘चत्वारो वर्णाश्चातुर्वर्ण्यम्’ यहाँपर ‘चतुर्वर्णादीनां स्वार्थे उपसंख्यानम्’ इस वार्तिकसे स्वार्थमें ‘ष्यञ् प्रत्यय’ किया गया है।
श्लोक १३-१४ ]
- साधक-संजीवनी *
३०७
भगवान् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र—इन चारों वर्णोंकी रचना करते हैं*। मनुष्यके सिवाय देव, पितर, तिर्यक् आदि दूसरी योनियोंकी रचना भी भगवान् गुणों और कर्मोंके अनुसार ही करते हैं। इसमें भगवान्की किंचिन्मात्र भी विषमता नहीं है।
‘चातुर्वर्ण्यम् ’ पद प्राणिमात्रका उपलक्षण है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य ही चार प्रकारके नहीं होते, अपितु पशु, पक्षी, वृक्ष आदि भी चार प्रकारके होते हैं; जैसे—पक्षियोंमें कबूतर आदि ब्राह्मण, बाज आदि क्षत्रिय, चील आदि वैश्य और कौआ आदि शुद्र पक्षी हैं। इसी प्रकार वृक्षोंमें पीपल आदि ब्राह्मण, नीम आदि क्षत्रिय, इमली आदि वैश्य और बबूल (कौकर) आदि शुद्र वृक्ष हैं। परन्तु यहाँ ‘चातुर्वर्ण्यम् ’ पदसे मनुष्योंको ही लेना चाहिये; क्योंकि वर्ण-विभागको मनुष्य ही समझ सकते हैं और उसके अनुसार कर्म कर सकते हैं। कर्म करनेका अधिकार मनुष्यको ही है।
चारों वर्णोंकी रचना मैंने ही की है—इससे भगवान्का यह भाव भी है कि एक तो ये मेरे ही अंश हैं; और दूसरे, मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ, इसलिये मैं सदा उनके हितको ही देखता हूँ। इसके विपरीत ये न तो देवताके अंश हैं और न देवता सबके सुहृद् ही हैं। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह अपने वर्णके अनुसार समस्त कर्तव्यकर्मोंसे मेरा ही पूजन करे (गीता—अठारहवें अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)।
‘तस्य कर्तारमपि मां विद्व्यकर्तारमव्ययम् ’—यहाँ ‘अकर्तारम् ’ पद कर्म करते हुए भी कर्तृत्वाभिमानका अभाव बतानेके लिये आया है। सृष्टिकी रचना, पालन, संहार आदि सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी भगवान् उन कर्मोंसे सर्वथा अतीत, निर्लिप्त ही रहते हैं।
सृष्टि-रचनामें भगवान् ही उपादान कारण हैं और वे ही निमित्त कारण हैं। मिट्टीसे बने पात्रमें मिट्टी उपादान कारण है और कुम्हार निमित्त कारण है। मिट्टीसे पात्र बननेमें मिट्टी व्यय (खर्च) हो जाती है और उसे बनानेमें कुम्हारकी शक्ति भी खर्च होती है; परन्तु सृष्टि-रचनामें भगवान्का कुछ भी व्यय नहीं होता। वे ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं। इसलिये उन्हें ‘अव्ययम् ’ कहा गया है।
जीव भी भगवान्का अंश होनेसे अव्यय ही है। विचार
करें कि शरीरादि सब वस्तुएँ संसारकी हैं और संसारसे ही मिली हैं। अतः उन्हें संसारकी ही सेवामें लगा देनेसे अपना क्या व्यय हुआ? हम तो (स्वरूपतः) अव्यय ही रहे। इसलिये यदि साधक शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, धन, सम्पत्ति आदि मिले हुए सांसारिक पदार्थोंको अपना और अपने लिये न माने, तो फिर उसे अपनी अव्ययताका अनुभव हो जायगा।
यहाँ ‘विद्धि ’ पदसे भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको समझनेकी आज्ञा दी है। कर्म करते हुए भी कर्म, कर्म-सामग्री और कर्मफलसे अपना कोई सम्बन्ध न रहना ही कर्मोंकी दिव्यता है।
‘न मां कर्माणि लिम्यन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ’—विश्व-रचनादि समस्त कर्म करते हुए भी भगवान्का उन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। उनके कर्मोंमें विषमता, पक्षपात आदि दोष लेशमात्र भी नहीं हैं। उनकी कर्म-फलमें किंचिन्मात्र भी आसक्ति, ममता या कामना नहीं है। इसलिये वे कर्म भगवान्को लिप्त नहीं करते।
उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुमात्र कर्मफल है। भगवान् कहते हैं कि जैसे मेरी कर्मफलमें स्पृहा नहीं है, ऐसे ही तुम्हारी भी कर्मफलमें स्पृहा नहीं होनी चाहिये। कर्मफलमें स्पृहा न रहनेसे सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी तुम कर्मोंसे बँधोगे नहीं।
पीछेके (तेरहवें) श्लोकमें भगवान्ने बताया कि सृष्टि-रचनादि समस्त कर्मोंका कर्ता होते हुए भी मैं अकर्ता हूँ अर्थात् मुझमें कर्तृत्वाभिमान नहीं है और इस श्लोकमें बताते हैं कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है अर्थात् मुझमें भोक्तृत्वाभिमान भी नहीं है। अतः साधकको भी इन दोनोंसे रहित होना चाहिये। फलेच्छाका त्याग करके केवल दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्तृत्व और भोक्तृत्व—दोनों ही नहीं रहते। कर्तृत्व-भोक्तृत्व ही संसार है। अतः इनके न रहनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध ही है।
‘इति मां योऽभिजानाति ’—मनुष्यमें जब कामनाएँ उत्पन्न होती हैं, तब उसकी दृष्टि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंपर रहती है। उत्पत्ति-विनाशशील (अनित्य) पदार्थोंपर दृष्टि रहनेसे वह नित्य भगवान्को तत्त्वसे नहीं जान सकता। पर कामनाओंके मिटनेसे जब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब भगवान्की ओर स्वतः दृष्टि जाती है।
- सत्त्वगुणकी प्रधानतासे ब्राह्मणकी, रजोगुणकी प्रधानता तथा सत्त्वगुणकी गौणतासे क्षत्रियकी, रजोगुणकी प्रधानता तथा तमोगुणकी गौणतासे वैश्यकी और तमोगुणकी प्रधानतासे शुद्रकी रचना की गयी है।
३०८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
भगवान्की ओर दृष्टि जानेपर मनुष्य जान जाता है कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं, इसलिये उनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाएँ प्राणिमात्रके हितके लिये ही होती हैं। भगवान् तो जीवोंको कर्म-बन्धनसे रहित करनेके लिये ही उन्हें मनुष्य-शरीर देते हैं, पर इस बातको न समझनेके कारण जीव कर्मोंसे नये-नये सम्बन्ध मानकर और बन्धन उत्पन्न कर लेता है। इसलिये कर्तापन और फलेच्छा न होनेपर भी वे केवल कृपा करके जीवोंको कर्म-बन्धनसे रहित करके उनका उद्धार करनेके लिये ही सृष्टि-रचनाका कार्य करते हैं। भगवान्को इस तरह जान लेनेसे मनुष्य भगवान्की ओर खिंच जाता है—
उमा राम सुभाउ जेहि जाना।
ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
(मानस ५। ३४। २)
‘कर्मभिर्न स बध्यते’—भगवान्के कर्म तो दिव्य हैं ही, सन्त-महात्माओंके कर्म भी दिव्य हो जाते हैं। वास्तवमें सन्त-महात्मा ही नहीं, मनुष्यमात्र अपने कर्मोंको दिव्य बना सकता है। जब कर्मोंमें मलिनता (कामना, ममता, आसक्ति आदि) होती है, तब वे कर्म बाँधनेवाले हो जाते हैं। जब मलिनताके दूर हो जानेपर कर्म दिव्य हो जाते हैं, तब वे उसे नहीं बाँधते। इतना ही नहीं, वे कर्म उस कर्ताको और दूसरोंको भी (उसके अनुसार आचरण करनेसे) मुक्त करनेवाले हो जाते हैं।
अपने कर्मोंको दिव्य बनानेका सरल उपाय है—संसारसे मिली हुई वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर (संसारकी ओर संसारके लिये मानते हुए) संसारकी सेवामें लगा देना।
विचार करना चाहिये कि हमारे पास शरीर आदि जितनी भी बाह्य वस्तुएँ हैं, उन सबको हम साथ लाये नहीं
परिशिष्ट भाव—जैसे सृष्टि-रचना आदि करनेपर भी भगवान्का अकर्तापन सुरक्षित (ज्यों-का-त्यों) रहता है, ऐसी ही जीवका भी स्वरूपसे अकर्तापन स्वतः सुरक्षित रहता है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३। ३१)। परन्तु वह मूढ़तापूर्वक अपनेमें कर्तापन स्वीकार कर लेता है—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३। २७)।
कर्म, क्रिया और लीला—तीनों एक दीखते हुए भी वास्तवमें सर्वथा भिन्न हैं। जो क्रिया कर्तृत्वाभिमानपूर्वक की जाय तथा अनुकूल-प्रतिकूल फल देनेवाली हो, वह क्रिया ‘कर्म’ कहलाती है। जो कर्तृत्वाभिमानपूर्वक न की जाय तथा जो फल देनेवाली भी न हो, वह ‘क्रिया’ होती है; जैसे—शवासोंका आना-जाना, आँखका खुलना और बन्द होना, नाड़ियोंका चलना, हृदयका धड़कना आदि। जो क्रिया कर्तृत्वाभिमान तथा फलेच्छासे रहित तो होती ही है, साथ-साथ दिव्य तथा दुनियामात्रका हित करनेवाली भी होती है, वह ‘लीला’ होती है। सांसारिक लोगोंके द्वारा ‘कर्म’ होता है, मुक्त पुरुषोंके
और जार्यों तब साथ ले जा सकते नहीं, उनके रहते हुए उनमें इच्छानुसार परिवर्तन कर सकते नहीं, उन्हें इच्छानुसार रख सकते नहीं अर्थात् उनपर हमारा कोई आधिपत्य नहीं है। इसी प्रकार जन्म-जन्मान्तरोंसे साथ आये सूक्ष्म और कारण-शरीर भी परिवर्तनशील और प्रकृतिके कार्य हैं, इसलिये उनके साथ भी हमारा सम्बन्ध नहीं है। वे वस्तुएँ अपने लिये भी नहीं हैं; क्योंकि उनके मिलनेपर भी ‘और मिले’ यह इच्छा रहती है। यदि वे वस्तुएँ अपने लिये होतीं तो और मिलनेकी इच्छा नहीं रहती। ऐसा होनेपर भी उन वस्तुओंको अपनी और अपने लिये मानना कितनी बड़ी भूल है? उन वस्तुओंमें जो अपनापन दीखता है, वह वास्तवमें केवल उनका सदुपयोग करनेके लिये है, उनपर अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं।
सेवा करनेके लिये तो सब अपने हैं, पर लेनेके लिये कोई अपना नहीं है। संसारकी तो बात ही क्या है, भगवान् भी लेनेके लिये अपने नहीं हैं अर्थात् भगवान्से भी कुछ नहीं लेना है, प्रत्युत अपने-आपको ही भगवान्के समर्पित करना है। कारण कि जो वस्तु हमें चाहिये और हमारे हितकी है, वह भगवान्ने हमें पहलेसे ही बिना माँग दे रखी है; और ज्यादा दे रखी है, कम नहीं। हमारी जरूरतको जितना भगवान् समझते हैं, उतना हम समझ भी नहीं सकते; क्योंकि भगवान्की उदारता अपार है। उनके सामने हमारी समझ तो बहुत ही अल्प है। इसलिये उनसे माँगना किस बातका? जो कुछ हमें मिला है, उसीका हमें सदुपयोग करना है। वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर निष्कामभावपूर्वक दूसरोंके हितमें लगा देना ही वस्तुओंका सदुपयोग है। इससे कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और महान् आनन्दस्वरूप परमात्माका अनुभव हो जाता है।
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
३०९
द्वारा 'क्रिया' होती है१ और भगवान् के द्वारा 'लीला' होती है—'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' (ब्रह्मसूत्र २।१।३३) अर्थात् जैसे संसार न होते हुए भी दीखता है, ऐसे ही भगवान् का सृष्टि-रचना आदि कार्य केवल लीला मात्र है। तात्पर्य है कि भगवान् कर्ता न होते हुए भी लीलासे कर्ता दीखते हैं।
'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः' पदोंसे सिद्ध होता है कि गीता जन्म (उत्पत्ति)-से ही जाति मानती है। जो मनुष्य जिस वर्णमें जिस जातिके माता-पितासे पैदा हुआ है, उसीसे उसकी जाति मानी जाती है। 'जाति' शब्द ही 'जनी प्रादुर्भावै' धातुसे बनता है जो जन्मसे जातिको सिद्ध करता है। कर्मसे तो 'कृति' शब्द होता है, जो 'दुकृज् करणे' धातुसे बनता है। हाँ, जातिकी पूर्ण रक्षा उसके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेसे ही होती है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपना उदाहरण देकर अब आगेके श्लोकमें भगवान् मुमुक्षु पुरुषोंका उदाहरण देते हुए अर्जुनको निष्कामभावपूर्वक अपना कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मान्तं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥
| पूर्वैः | = पूर्वकालके | कर्म | = कर्म | पूर्वतरम् | = सदासे |
|---|---|---|---|---|---|
| मुमुक्षुभिः | = मुमुक्षुओंने | कृतम् | = किये हैं, | कृतम् | = किये जानेवाले |
| अपि | = भी | तस्मात् | = इसलिये | कर्म | = कर्मोंको |
| एवम् | = इस प्रकार | त्वम् | = तू (भी) | एव | = ही (उन्हींकी तरह) |
| ज्ञात्वा | = जानकर | पूर्वैः | = पूर्वजोंके द्वारा | कुरु | = कर । |
व्याख्या—[नवें श्लोकमें भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताका जो प्रसंग आरम्भ किया था, उसका यहाँ उपसंहार करते हैं।]
'एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः'—अर्जुन मुमुक्षु थे अर्थात् अपना कल्याण चाहते थे। परन्तु युद्धरूपसे प्राप्त अपने कर्तव्य-कर्मको करनेमें उन्हें अपना कल्याण नहीं दीखता, प्रत्युत वे उसको घोर-कर्म समझकर उसका त्याग करना चाहते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका पहला श्लोक)। इसलिये भगवान् अर्जुनको पूर्वकालके मुमुक्षु पुरुषोंका उदाहरण देते हैं कि उन्होंने भी अपने-अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करके कल्याणकी प्राप्ति की है, इसलिये तुम्हें भी उनकी तरह अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये।
तीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें जनकादिका उदाहरण देकर तथा इसी (चौथे) अध्यायके पहले-दूसरे श्लोकोंमें विवस्वान्, मनु, इक्ष्वाकु आदिका उदाहरण देकर भगवान्ने जो बात कही थी, वही बात इस श्लोकमें भी कह रहे हैं।
शास्त्रोंमें ऐसी प्रसिद्धि है कि मुमुक्षा जाग्रत् होनेपर कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि मुमुक्षाके बाद मनुष्य कर्मका अधिकारी नहीं होता; प्रत्युत ज्ञानका अधिकारी हो जाता है१। परन्तु यहाँ भगवान् कहते हैं कि मुमुक्षुओंने भी कर्मयोगका तत्त्व जानकर कर्म किये हैं। इसलिये मुमुक्षा जाग्रत् होनेपर भी अपने कर्तव्य-कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक कर्तव्य-कर्म करते रहना चाहिये।
कर्मयोगका तत्त्व है—कर्म करते हुए योगमें स्थित रहना और योगमें स्थित रहते हुए कर्म करना। कर्म संसारके लिये और योग अपने लिये होता है। कर्मोंको करना और न करना—दोनों अवस्थाएँ हैं। अतः प्रवृत्ति (कर्म करना) और निवृत्ति (कर्म न करना)—दोनों ही प्रवृत्ति (कर्म करना) हैं। प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंसे ऊँचा उठ जाना योग है, जो पूर्ण निवृत्ति है। पूर्ण निवृत्ति कोई अवस्था नहीं है।
१-इसको गीताने 'चेष्टा' भी कहा है—'सदृशं चेष्टते' (३।३३)।
२-तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादी वा श्रद्धा यावन जायते ॥
(श्रीमद्भा० ११।२०।१२)
'तभीतक कर्म करने चाहिये, जबतक वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी (भगवान्की) कथाके श्रवण आदिमें श्रद्धा उत्पन्न न हो जाय।'
३१०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म नहीं बाँधते। जो मनुष्य कर्म करनेकी इस विद्या-(कर्मयोग-) को जानकर फलेच्छाका त्याग करके कर्म करता है, वह भी कर्मोसे नहीं बाँधता; कारण कि फलेच्छासे ही मनुष्य बाँधता है—‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)। अगर मनुष्य अपने सुखभोगके लिये अथवा धन, मान, बड़ाई, स्वर्ग आदिकी प्राप्तिके लिये कर्म करता है तो वे कर्म उसे बाँध देते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका नवौं श्लोक)। परन्तु यदि उसका लक्ष्य उत्पत्ति-विनाशशील संसार नहीं है, प्रत्युत वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये निःस्वार्थ सेवा-भावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है, तो वे कर्म उसे बाँधते नहीं (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। कारण कि दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्मोका प्रवाह संसारकी तरफ
परिशिष्ट भाव —तेरहवें-चौदहवें श्लोकोंमें भगवान्ने बताया कि कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छासे रहित होकर सृष्टि-रचना आदि कर्म करनेके कारण वे कर्म मुझे नहीं बाँधते। यहाँ भगवान् कहते हैं कि मुमुक्षुओंने भी इसी तरह कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छाका त्याग करके कर्म किये हैं। कारण कि कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छा होनेपर ही कर्म बन्धनकारक होते हैं। इसलिये तू भी उसी प्रकारसे कर्म कर।
ज्ञानयोगमें पहले कर्तृत्वाभिमानका त्याग किया जाता है, फिर फलेच्छाका त्याग स्वतः होता है। कर्मयोगमें पहले फलेच्छाका त्याग किया जाता है, फिर कर्तृत्वाभिमानका त्याग सुगमतासे हो जाता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें ‘एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म’ पदोंसे कर्मोंको जाननेकी बात कही गयी थी। अब भगवान् आगेके श्लोकसे कर्मोंको ‘तत्त्व’ से जाननेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं।
किं कर्म किमकर्मिति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥
| कर्म | = कर्म | अपि | = भी | कहूँगा, |
|---|---|---|---|---|
| किम् | = क्या है (और) | मोहिताः | = मोहित हो जाते हैं। | यत् |
| अकर्म | = अकर्म | (अतः) | ज्ञात्वा | |
| किम् | = क्या है— | तत् | = वह | अशुभात् |
| इति | = इस प्रकार | कर्म | = कर्म-तत्त्व (मैं) | |
| अत्र | = इस विषयमें | ते | = तुझे | मोक्ष्यसे |
| कवयः | = विद्वान् | प्रवक्ष्यामि | = भलीभाँति |
व्याख्या —‘किं कर्म’—साधारणतः मनुष्य-शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको ही कर्म मान लेते हैं तथा शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाएँ बंद होनेको अकर्म मान लेते हैं। परन्तु भगवान्ने शरीर, वाणी और मनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाओंको कर्म माना है—‘शरीरवाडमनोर्भिर्थकर्म पारभते नरः’ (गीता १८।१५)।
हो जाता है, जिससे कर्मोका सम्बन्ध (राग) मिट जाता है और फलेच्छा न रहनेसे नया सम्बन्ध पैदा नहीं होता।
‘कुरु कर्मैव तस्मान्चं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्’ —इन पदोंसे भगवान् अर्जुनको आज्ञा दे रहे हैं कि तू मुमुक्षु है, इसलिये जैसे पहले अन्य मुमुक्षुओंने लोकहितार्थ कर्म किये हैं, ऐसे ही तू भी संसारके हितके लिये कर्म कर।
शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि कर्मकी सब सामग्री अपनेसे भिन्न तथा संसारसे अभिन्न है। वह संसारकी है और संसारकी सेवाके लिये ही मिली है। उसे अपनी मानकर अपने लिये कर्म करनेसे कर्मोका सम्बन्ध अपने साथ हो जाता है। जब सम्पूर्ण कर्म केवल दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं, तब कर्मोका सम्बन्ध हमारे साथ नहीं रहता। कर्मोसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘योग’ अर्थात् परमात्माके साथ हमारे नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव हो जाता है, जो कि पहलेसे ही है।
भावके अनुसार ही कर्मकी संज्ञा होती है। भाव बदलनेपर कर्मकी संज्ञा भी बदल जाती है। जैसे, कर्म स्वरूपसे सात्त्विक दीखता हुआ भी यदि कर्ताका भाव राजस या तामस होता है, तो वह कर्म भी राजस या तामस हो जाता है। जैसे, कोई देवीकी उपासनारूप कर्म कर रहा है, जो स्वरूपसे सात्त्विक है। परन्तु यदि कर्ता उसे किसी
श्लोक १६ ]
- साधक-संजीवनी *
३११
कामनाकी सिद्धिके लिये करता है, तो वह कर्म राजस हो जाता है और किसीका नाश करनेके लिये करता है, तो वही कर्म तामस हो जाता है। इसी प्रकार यदि कर्तामें फलेच्छा, ममता और आसक्ति नहीं है, तो उसके द्वारा किये गये कर्म 'अकर्म' हो जाते हैं अर्थात् फलमें बाँधनेवाले नहीं होते। तात्पर्य यह है कि केवल बाहरी क्रिया करने अथवा न करनेसे कर्मके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। इस विषयमें शास्त्रोंको जाननेवाले बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं अर्थात् कर्मके तत्त्वका यथार्थ निर्णय नहीं कर पाते। जिस क्रियाको वे कर्म मानते हैं वह कर्म भी हो सकता है, अकर्म भी हो सकता है और विकर्म भी हो सकता है। कारण कि कर्ताके भावके अनुसार कर्मका स्वरूप बदल जाता है। इसलिये भगवान् मानो यह कहते हैं कि वास्तविक कर्म क्या है? वह क्यों बाँधता है? कैसे बाँधता है? इससे किस तरह मुक्त हो सकते हैं?—इन सबका मैं विवेचन करूँगा, जिसको जानकर उस रीतिसे कर्म करनेपर वे बाँधनेवाले न हो सकेंगे।
यदि मनुष्यमें ममता, आसक्ति और फलेच्छा है, तो कर्म न करते हुए भी वास्तवमें कर्म ही हो रहा है अर्थात् कर्मोंसे लिप्तता है। परन्तु यदि ममता, आसक्ति और फलेच्छा नहीं है, तो कर्म करते हुए भी कर्म नहीं हो रहा है अर्थात् कर्मोंसे निलिप्तता है। तात्पर्य यह है कि यदि कर्ता निलिप्त है तो कर्म करना अथवा न करना—दोनों ही अकर्म हैं और यदि कर्ता लिप्त है तो कर्म करना अथवा न करना—दोनों ही कर्म हैं और बाँधनेवाले हैं।
'किमकर्मैति' —भगवान्ने कर्मके दो भेद बताये हैं—कर्म और अकर्म। कर्मसे जीव बाँधता है और अकर्मसे (दूसरोंके लिये कर्म करनेसे) मुक्त हो जाता है।
कर्मोंका त्याग करना अकर्म नहीं है। भगवान्ने मोहपूर्वक किये गये कर्मोंके त्यागको 'तामस' बताया है (गीता—अठारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। शारीरिक कष्टके भयसे किये गये कर्मोंके त्यागको 'राजस' बताया गया है (गीता—अठारहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। तामस और राजस त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग होनेपर भी कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होता। कर्मोंमें फलेच्छा और आसक्तिका त्याग 'सात्त्विक' है (गीता—अठारहवें अध्यायका नवाँ श्लोक)। सात्त्विक त्यागमें स्वरूपसे कर्म करना भी वास्तवमें अकर्म है; क्योंकि सात्त्विक त्यागमें कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। अतः कर्म करते हुए
भी उससे निलिप्त रहना वास्तवमें अकर्म है।
शास्त्रोंके तत्त्वको जाननेवाले विद्वान् भी अकर्म क्या है—इस विषयमें मोहित हो जाते हैं। अतः कर्म करने अथवा न करने—दोनों ही अवस्थाओंमें जिससे जीव बाँधे नहीं, उस तत्त्वको समझनेसे ही कर्म क्या है और अकर्म क्या है—यह बात समझमें आयेगी। अर्जुन युद्धरूप कर्म न करनेको कल्याणकारक समझते हैं। इसलिये भगवान् मानो यह कहते हैं कि युद्धरूप कर्मका त्याग करनेमात्रसे तेरी अकर्म-अवस्था (बन्धनसे मुक्ति) नहीं होगी (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक), प्रत्यतु युद्ध करते हुए भी तू अकर्म-अवस्थाको प्राप्त कर सकता है (गीता—दूसरे अध्यायका अङ्गीतीसवाँ श्लोक); अतः अकर्म क्या है—इस तत्त्वको तू समझ।
निलिप्त रहते हुए कर्म करना अथवा कर्म करते हुए निलिप्त रहना—यही वास्तवमें अकर्म-अवस्था है।
'कवयोऽप्यत्र मोहिताः' —साधारण मनुष्योंमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि वे कर्म और अकर्मका तात्त्विक निर्णय कर सकें। शास्त्रोंके ज्ञाता बड़े-बड़े विद्वान् भी इस विषयमें भूल कर जाते हैं। कर्म और अकर्मका तत्त्व जाननेमें उनकी बुद्धि भी चकरा जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि इनका तत्त्व या तो कर्मयोगसे सिद्ध हुए अनुभवी तत्त्वज्ञ महापुरुष जानते हैं अथवा भगवान् जानते हैं।
'तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि' —जीव कर्मोंसे बाँध है तो कर्मोंसे ही मुक्त होगा। यहाँ भगवान् प्रतिज्ञा करते हैं कि मैं वह कर्म-तत्त्व भलीभाँति कहूँगा, जिससे कर्म करते हुए भी वे बन्धनकारक न हों। तात्पर्य यह है कि कर्म करनेकी वह विद्या बताऊँगा, जिससे तू कर्म करते हुए भी जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त हो जायगा।
कर्म करनेके दो मार्ग हैं—प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग। प्रवृत्तिमार्गको 'कर्म करना' कहते हैं और निवृत्तिमार्गको 'कर्म न करना' कहते हैं। ये दोनों ही मार्ग बाँधनेवाले नहीं हैं। बाँधनेवाली तो कामना, ममता, आसक्ति है, चाहे यह प्रवृत्तिमार्गमें हो, चाहे निवृत्तिमार्गमें हो। यदि कामना, ममता, आसक्ति न हो तो मनुष्य प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग—दोनोंमें स्वतः मुक्त है। इस बातको समझना ही कर्म-तत्त्वको समझना है।
दूसरे अध्यायके पचासवें श्लोकमें भगवान्ने 'योगः कर्मसु कौशलम्' 'कर्मोंमें योग ही कुशलता है'—ऐसा कहकर कर्म-तत्त्व बताया है। तात्पर्य है कि कर्म-बन्धनसे
३२२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
छूटनेका वास्तविक उपाय ‘योग’ अर्थात् समता ही है। परन्तु अर्जुन इस तत्त्वको पकड़ नहीं सके, इसलिये भगवान् इस तत्त्वको पुनः समझानेकी प्रतिज्ञा कर रहे हैं।
विशेष बात
कर्मयोग कर्म नहीं है, प्रत्युत सेवा है। सेवामें त्यागकी मुख्यता होती है। सेवा और त्याग—ये दोनों ही कर्म नहीं हैं। इन दोनोंमें विवेककी ही प्रधानता है।
हमारे पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं। मिली हुई वस्तुको अपनी माननेका हमें अधिकार नहीं है। संसारसे मिली वस्तुको संसारकी ही सेवामें लगानेका हमें अधिकार है। जो वस्तु वास्तवमें अपनी है, उस—(स्वरूप या परमात्मा—) का त्याग कभी हो ही नहीं सकता और जो वस्तु अपनी नहीं है, उस—(शरीर या संसार—) का त्याग स्वतःसिद्ध है। अतः त्याग उसीका होता है जो अपना नहीं है, पर जिसे भूलसे अपना मान लिया है अर्थात् अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग होता है। इस प्रकार जो वस्तु अपनी है ही नहीं, उसे अपना न मानना त्याग कैसे ? यह तो विवेक है।
कर्म-सामग्री (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि) अपनी और अपने लिये नहीं हैं, प्रत्युत दूसरोंकी और दूसरोंके लिये ही हैं। इसका सम्बन्ध संसारके साथ है। स्वयंके साथ इसका कोई सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि स्वयं नित्य-निरन्तर निर्विकाररूपसे एकरस रहता है, पर कर्म-सामग्री पहले अपने पास नहीं थी, बादमें भी अपने पास नहीं रहेगी और अब भी निरन्तर बिछुड़ रही है। इसलिये इसके द्वारा जो भी कर्म किया जाय, वह दूसरोंके लिये ही होता है, अपने लिये नहीं। इसमें एक मार्मिक बात है कि कर्म-सामग्रीके बिना कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता; जैसे—कितना ही बड़ा लेखक क्यों न हो, स्याही, कलम और कागजके बिना वह कुछ भी नहीं लिख सकता। अतः जब कर्म-सामग्रीके बिना कुछ किया नहीं जा सकता, तब यह विधान मानना ही पड़ेगा कि अपने लिये कुछ करना नहीं है। कारण कि कर्म-सामग्रीका सम्बन्ध संसारके साथ है, अपने साथ नहीं। इसलिये कर्म-सामग्री और कर्म सदा दूसरोंके हितके लिये ही होते हैं, जिसे सेवा कहते हैं। दूसरोंकी ही वस्तु दूसरोंको मिल गयी तो यह सेवा कैसे ? यह तो विवेक है।
इस प्रकार त्याग और सेवा—ये दोनों ही कर्मसाध्य नहीं हैं, प्रत्युत विवेकसाध्य हैं। मिली हुई वस्तु अपनी नहीं है, दूसरोंकी और दूसरोंकी सेवामें लगानेके लिये ही है—यह विवेक है। इसलिये मूलतः कर्मयोग कर्म नहीं है, प्रत्युत विवेक है।
विवेक किसी कर्मका फल नहीं है, प्रत्युत प्राणिमात्रको अनादिकालसे स्वतः प्राप्त है। यदि विवेक किसी शुभ कर्मका फल होता तो विवेकके बिना उस शुभ कर्मको कौन करता ? क्योंकि विवेकके द्वारा ही मनुष्य शुभ और अशुभ कर्मके भेदको जानता है तथा अशुभ कर्मका त्याग करके शुभ कर्मका आचरण करता है। अतः विवेक शुभ कर्मोंका कारण है, कार्य नहीं। यह विवेक स्वतःसिद्ध है, इसलिये कर्मयोग भी स्वतःसिद्ध है अर्थात् कर्मयोगमें परिश्रम नहीं है। इसी प्रकार ज्ञानयोगमें अपना असंग स्वरूप स्वतःसिद्ध है और भक्ति-योगमें भगवान्के साथ अपना सम्बन्ध स्वतःसिद्ध है।
‘यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’—जीव स्वयं शुभ है और परिवर्तनशील संसार अशुभ है। जीव स्वयं परमात्माका नित्य अंश होते हुए भी परमात्मासे विमुख होकर अनित्य संसारमें फँस गया है। भगवान् कहते हैं कि मैं उस कर्म-तत्त्वका वर्णन करूँगा, जिसे जानकर कर्म करनेसे तू अशुभसे अर्थात् जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे मुक्त हो जायगा।
[ इस श्लोकमें कर्मोंको जाननेका जो प्रकरण आरम्भ हुआ है, उसका उपसंहार बत्तीसवें श्लोकमें ‘एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे’ पदोंसे किया गया है। ]
मार्मिक बात
कर्मयोगका तात्पर्य है—‘कर्म’ संसारके लिये और ‘योग’ अपने लिये। कर्मके दो अर्थ होते हैं—करना और न करना। कर्म करना और न करना—ये दोनों प्राकृत अवस्थाएँ हैं। इन दोनों ही अवस्थाओंमें अहंता रहती है। कर्म करनेमें ‘कार्य’-रूपसे अहंता रहती है, और कर्म न करनेमें ‘कारण’ रूपसे। जबतक अहंता है तबतक संसारसे सम्बन्ध है और जबतक संसारसे सम्बन्ध है, तबतक अहंता है। परन्तु ‘योग’ दोनों अवस्थाओंसे अतीत है। उस योगका अनुभव करनेके लिये अहंतासे रहित होना आवश्यक है। अहंतासे रहित होनेका उपाय है—कर्म करते हुए अथवा न करते हुए योगमें स्थित रहना और योगमें स्थित रहते हुए
श्लोक १७]
- साधक-संजीवनी *
३१३
कर्म करना अथवा न करना। तात्पर्य है कि कर्म करने
अथवा न करने-दोनों अवस्थाओंमें निर्लिप्त रहे-
'योगस्थ: कुरु कर्माणि' (गीता २। ४८)।
कर्म करनेसे संसारमें और कर्म न करनेसे परमात्मामें
प्रवृत्ति होती है-ऐसा मानते हुए संसारसे निवृत्त होकर
एकान्तमें ध्यान और समाधि लगाना भी कर्म करना ही है।
एकान्तमें ध्यान और समाधि लगानेसे तत्त्वका साक्षात्कार
होगा-इस प्रकार भविष्यमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके
भाव भी कर्मका सूक्ष्म रूप है। कारण कि करनेके
आधारपर ही भविष्यमें तत्त्वप्राप्तिकी आशा होती है। परन्तु
परमात्मतत्त्व करने और न करने-दोनोंसे अतीत है।
भगवान् कहते हैं कि मैं वह कर्म-तत्त्व कहूँगा जिसे
जाननेसे तत्काल परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी। इसके
लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं है; क्योंकि परमात्मतत्त्व
सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, शरीर, इन्द्रियाँ, मन,
बुद्धि, प्राण आदिमें समानरूपसे परिपूर्ण है। मनुष्य
अपनेको जहाँ मानता है, परमात्मा वहीं हैं। कर्म करते समय
अथवा न करते समय-दोनों अवस्थाओंमें परमात्मतत्त्वका
हमारे साथ सम्बन्ध ज्यों-का-त्यों रहता है। केवल
प्रकृतिजन्य क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध माननेके कारण ही
उसकी अनुभूति नहीं हो रही है।
अहंतापूर्वक किया हुआ साधन और साधनका
अभिमान जबतक रहता है, तबतक अहंता मिटती नहीं,
प्रत्युत दृढ़ होती है, चाहे वह अहंता स्थूलरूपसे (कर्म
करनेके साथ) रहे अथवा सूक्ष्मरूपसे (कर्म न करनेके
साथ) रहे।
'मैं करता हूँ'-इसमें जैसी अहंता है, ऐसी ही अहंता
'मैं नहीं करता हूँ'-इसमें भी है। अपने लिये कुछ न
करने अर्थात् कर्ममात्र संसारके हितके लिये करनेसे
अहंता संसारमें विलीन हो जाती है।
सम्बन्ध-अब भगवान् कर्मोंके तत्त्वको जाननेकी प्रेरणा करते हैं।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण:।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ॥ १७ ॥
कर्मण: = कर्मोंका (तत्त्व) | बोद्धव्यम् = जानना चाहिये | कर्मण: = कर्मोंकी
अपि = भी | च = तथा | गति: = गति
बोद्धव्यम् = जानना चाहिये | विकर्मण: = विकर्मका (तत्त्व भी) | गहना = गहन है अर्थात्
च = और | बोद्धव्यम् = जानना चाहिये; | समझनेमें बड़ी
अकर्मण: = अकर्मका (तत्त्व भी) | हि = क्योंकि | कठिन है।
व्याख्या-'कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यम्'-कर्म करते हुए
निर्लिप्त रहना ही कर्मके तत्त्वको जानना है, जिसका वर्णन
आगे अठारहवें श्लोकमें 'कर्मण्यकर्म य: पश्येत्' पदोंसे
किया गया है।
कर्म स्वरूपसे एक दीखनेपर भी अन्तःकरणके
भावके अनुसार उसके तीन भेद हो जाते हैं-कर्म, अकर्म
और विकर्म। सकामभावसे की गयी शास्त्रविहित क्रिया
'कर्म' बन जाती है। फलेच्छा, ममता और आसक्तिसे
रहित होकर केवल दूसरोंके हितके लिये किया गया कर्म
'अकर्म' बन जाता है। विहित कर्म भी यदि दूसरेका अहित
करने अथवा उसे दुःख पहुँचानेके भावसे किया गया हो
तो वह भी 'विकर्म' बन जाता है। निषिद्ध कर्म तो
'विकर्म' है ही।
'अकर्मणश्च बोद्धव्यम्'-निर्लिप्त रहते हुए कर्म
करना ही अकर्मके तत्त्वको जानना है, जिसका वर्णन आगे
अठारहवें श्लोकमें 'अकर्मणि च कर्म य:' पदोंसे किया
गया है।
'बोद्धव्यं च विकर्मण:'-कामनासे कर्म होते हैं।
जब कामना अधिक बढ़ जाती है, तब विकर्म (पापकर्म)
होते हैं।
दूसरे अध्यायके अड़तीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया
है कि अगर युद्ध-जैसा हिंसायुक्त घोर कर्म भी शास्त्रकी
आज्ञासे और समतापूर्वक (जय-पराजय, लाभ-हानि और
सुख-दु:खको समान समझकर) किया जाय, तो उससे
पाप नहीं लगता। तात्पर्य यह है कि समतापूर्वक कर्म
करनेसे दीखनेमें विकर्म होता हुआ भी वह 'अकर्म' हो
जाता है।
शास्त्रनिषिद्ध कर्मका नाम 'विकर्म' है। विकर्मके होनेमें
३१४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
कामना ही हेतु है (गीता—तीसरे अध्यायका छत्तीसवाँ-सौतीसवाँ श्लोक)*। अतः विकर्मका तत्त्व है—कामना; और विकर्मके तत्त्वको जानना है—विकर्मका स्वरूपसे त्याग करना तथा उसके कारण कामनाका त्याग करना।
‘गहना कर्मणो गतिः’ —कौन-सा कर्म मुक्त करने-वाला और कौन-सा कर्म बाँधनेवाला है—इसका निर्णय करना बड़ा कठिन है। कर्म क्या है, अकर्म क्या है और विकर्म क्या है—इसका यथार्थ तत्त्व जाननेमें बड़े-बड़े शास्त्रज्ञ विद्वान् भी अपने-आपको असमर्थ पाते हैं। अर्जुन भी इस तत्त्वको न जाननेके कारण अपने युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको घोर कर्म मान रहे हैं। अतः कर्मकी गति (ज्ञान या तत्त्व) बहुत गहन है।
शंका —इस (सत्रहवें) श्लोकमें भगवान्ने ‘बोद्धव्यं च विकर्मणः’ पदोंसे यह कहा कि विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये। परन्तु उन्नीसवें-से-तेईसवें श्लोकतकके प्रकरणमें भगवान्ने ‘विकर्म’ के विषयमें कुछ कहा ही नहीं! फिर केवल इस श्लोकमें ही विकर्मकी बात क्यों कही? समाधान —उन्नीसवें श्लोकसे लेकर तेईसवें श्लोकतकके प्रकरणमें भगवान्ने मुख्यरूपसे ‘कर्ममें अकर्म’ की बात कही है, जिससे सब कर्म अकर्म हो जायें अर्थात् कर्म करते हुए भी बन्धन न हो। विकर्म कर्मके बहुत पास पड़ता
परिशिष्ट भाव —हमारे लिये और दूसरोंके लिये, अभी और परिणामोंमें किस कर्मका क्या फल होता है, यह समझना बड़ा कठिन है। किसी कर्मको करनेमें मनुष्य अपना हित समझता है, पर हो जाता है अहित! वह लाभके लिये करता है पर हो जाता है नुकसान! वह सुखके लिये करता है, पर मिलता है दुःख! कारण कि कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छा (सुखासक्ति) रहनेके कारण मनुष्य कर्मोंकी गतिको नहीं समझ सकता।
सम्बन्ध—अब भगवान् कर्मोंके तत्त्वको जाननेवाले मनुष्यकी प्रशंसा करते हैं।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥
| यः | = जो मनुष्य | अकर्मणि | = अकर्ममें | सः | = वह |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्मणि | = कर्ममें | कर्म | = कर्म (देखता है), | युक्तः | = योगी है (और) |
| अकर्म | = अकर्म | सः | = वह | कृत्स्नकर्मकृत् | = सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला |
| पश्येत् | = देखता है | मनुष्येषु | = मनुष्योंमें | (कृतकृत्य) है। | |
| च | = और | बुद्धिमान् | = बुद्धिमान् है, | ||
| यः | = जो |
- सोलहवें अध्यायमें जहाँ आसुरी-सम्पत्तिका वर्णन हुआ है, वहाँ आठवें श्लोकसे तेईसवें श्लोकतक ‘काम’ शब्द कुल नौ बार आया है। इससे सिद्ध होता है कि ‘काम’ अर्थात् कामना ही सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्ति-(विकर्म-) का कारण है।
श्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
३१५
व्याख्या—‘कर्मण्यकर्म यः पश्येत्’— कर्ममें अकर्म देखनेका तात्पर्य है—कर्म करते हुए अथवा न करते हुए उससे निर्लिप्त रहना अर्थात् अपने लिये कोई भी प्रवृत्ति या निवृत्ति न करना। अमुक कर्म मैं करता हूँ, इस कर्मका अमुक फल मुझे मिले—ऐसा भाव रखकर कर्म करनेसे ही मनुष्य कर्मसे बँधता है। प्रत्येक कर्मका आरम्भ और अन्त होता है, इसलिये उसका फल भी आरम्भ और अन्त होनेवाला होता है। परन्तु जीव स्वयं नित्य-निरन्तर रहता है। इस प्रकार यद्यपि जीव स्वयं परिवर्तनशील कर्म और उसके फलसे सर्वथा सम्बन्धरहित है, फिर भी वह फलकी इच्छाके कारण उनसे बँध जाता है। इसीलिये चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मेरेको कर्म नहीं बाँधते; क्योंकि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है। फलकी स्पृहा या इच्छा ही बाँधनेवाली है—‘फले सत्को निबध्यते ’ (गीता ५।१२)।
फलकी इच्छा न रखनेसे नया राग उत्पन्न नहीं होता और दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे पुराना राग नष्ट हो जाता है। इस प्रकार रागरूप बन्धन न रहनेसे साधक सर्वथा वीतराग हो जाता है। वीतराग होनेसे सब कर्म अकर्म हो जाते हैं।
जीवका जन्म कर्मके अनुबन्धसे होता है। जैसे, जिस परिवारमें जन्म लिया है, उस परिवारके लोगोंसे ऋणानुबन्ध है अर्थात् किसीका ऋण चुकाना है और किसीसे ऋण वसूल करना है। कारण कि अनेक जन्मोंमें अनेक लोगोंसे लिया है और अनेक लोगोंको दिया है। यह लेन-देनका व्यवहार अनेक जन्मोंसे चला आ रहा है। इसको बंद किये बिना जन्म-मरणसे छुटकारा नहीं मिल सकता। इसको बंद करकेका उपाय है—आगेसे लेना बंद कर दें अर्थात् अपने अधिकारका त्याग कर दें और हमारेपर जिनका अधिकार है, उनकी सेवा करनी आरम्भ कर दें। इस प्रकार नया ऋण लेँ नहीं और पुराना ऋण (दूसरोंके लिये कर्म करके) चुका दें, तो ऋणानुबन्ध (लेन-देनका व्यवहार) समाप्त हो जायगा अर्थात् जन्म-मरण बंद हो जायगा (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। जैसे, कोई दूकानदार अपनी दूकान उठाना चाहता है, तो वह दो काम करेगा—पहला, जिसको देना है, उसको दे देगा और दूसरा, जिससे लेना है, वह ले लेगा अथवा छोड़ देगा। ऐसा करनेसे उसकी दूकान उठ जायगी। अगर वह यह विचार रखेगा कि जो लेना है, वह सब-का-सब ले लूँ, तो दूकान उठेगी नहीं।
कारण कि जबतक वह लेनेकी इच्छासे वस्तुएँ देता रहेगा, तबतक दूकान चलती ही रहेगी, उठेगी नहीं।
अपने लिये कुछ भी न करने और न चाहनेसे असंगता स्वतः प्राप्त हो जाती है। कारण कि करण (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण) और उपकरण (कर्म करनेमें उपयोगी सामग्री) संसारके हैं और संसारकी सेवामें लगानेके लिये ही मिले हैं, अपने लिये नहीं। इसलिये सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म (सेवा, भजन, जप, ध्यान, समाधि भी) केवल संसारके हितके लिये ही करनेसे कर्मका प्रवाह संसारकी ओर चला जाता है और साधक स्वयं असंग, निर्लिप्त रह जाता है। यही कर्ममें अकर्म देखना है।
जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है, तबतक कर्म करना अथवा न करना—दोनों ही ‘कर्म’ हैं। इसलिये कर्म करने अथवा न करने—दोनों ही अवस्थाओंमें कर्मयोगीको निर्लिप्त रहना चाहिये। कर्म करनेमें निर्लिप्त रहनेका तात्पर्य है—कर्म करनेसे हमें अच्छा फल मिलेगा, हमें लाभ होगा, हमारी सिद्धि होगी, लोग हमें अच्छा मानेंगे, इस लोकमें और परलोकमें भोग मिलेंगे—इस प्रकारकी किसी भी इच्छाका न होना। ऐसे ही कर्म न करनेमें निर्लिप्त रहनेका तात्पर्य है—कर्मका त्याग करनेसे हमें मान, आदर, भोग, शरीरका आराम आदि मिलेंगे—इस प्रकारकी किंचिन्मात्र भी इच्छाका न होना।
दुःख समझकर एवं शारीरिक क्लेशके भयसे कर्म न करना राजस त्याग है और मोह, आलस्य, प्रमादके कारण कर्म न करना तामस त्याग है। ये दोनों ही त्याग सर्वथा त्याज्य हैं। इसके सिवाय कर्म न करना यदि अपनी विलक्षण स्थितिके लिये है, समाधिका सुख भोगनेके लिये है, जीवनमुक्तिका आनन्द लेनेके लिये है तो इस त्यागसे भी प्रकृतिका सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होता। कारण कि जबतक कर्म न करनेसे सम्बन्ध है, तबतक प्रकृतिसे सम्बन्ध बना रहता है। प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर कर्मयोगी कर्म करने और न करने—इन दोनों अवस्थाओंमें ज्यों-का-त्यों निर्लिप्त रहता है।
‘अकर्मणि च कर्म यः’— अकर्ममें कर्म देखनेका तात्पर्य है—निर्लिप्त रहते हुए कर्म करना अथवा न करना। भाव है कि कर्म करते समय अथवा न करते समय भी नित्य-निरन्तर निर्लिप्त रहे।
संसारमें कोई कार्य करनेके लिये प्रवृत्त होता है तो उसके सामने प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना)—
३१६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
दोनों आती हैं। किसी कार्यमें प्रवृत्ति होती है और किसी कार्यसे निवृत्ति होती है। परन्तु कर्मयोगीकी प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों निलिप्ततापूर्वक और केवल संसारके हितके लिये होती हैं। प्रवृत्ति और निवृत्ति— दोनोंसे ही उसका कोई प्रयोजन नहीं होता—‘नैव तस्य कृतेनार्थां नाकृतेनेह कश्चन’ (गीता ३।१८)। यदि प्रयोजन होता है तो वह कर्मयोगी नहीं है, प्रत्युत कर्म है।
साधक जबतक प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक वह कर्म करनेसे अपनी सांसारिक उन्नति मानता है और कर्म न करनेसे अपनी पारमार्थिक उन्नति मानता है। परन्तु वास्तवमें प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों ही प्रवृत्ति हैं; क्योंकि दोनोंमें ही प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है। जैसे चलना-फिरना, खाना-पीना आदि स्थूल-शरीरकी क्रियाएँ हैं, ऐसे ही एकात्ममें बैठे रहना, चिन्तन करना, ध्यान लगाना सूक्ष्म-शरीरकी क्रियाएँ और समाधि लगाना कारण-शरीरकी क्रियाएँ हैं। इसलिये निलिप्त रहते हुए ही लोकसंग्रहार्थ कर्तव्य-कर्म करना है। यही अकर्ममें कर्म है। इसीको दूसरे अध्यायके अङ्गतालीसवें श्लोकमें ‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ (योग अर्थात् समतामें स्थित होकर कर्म कर) पदोंसे कहा गया है।
सांसारिक प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों ‘कर्म’ हैं। प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति करते हुए निलिप्त रहना और निलिप्त रहते हुए ही प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति करना—इस प्रकार प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंमें सर्वथा निलिप्त रहना ‘योग’ है। इसीको कर्मयोग कहते हैं।
शंका—कर्म करते हुए अथवा न करते हुए निलिप्त रहना और निलिप्त रहते हुए कर्म करना अथवा न करना—इन दोनोंमें ‘अकर्म’ अर्थात् एक निलिप्तता ही मुख्य हुई; फिर भगवान्ने कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म—ये दो बातें क्यों कही हैं?
समाधान—कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म—इन दोनोंमें एक निलिप्तता सार होते हुए भी पहले-(कर्ममें अकर्म-में) कर्म करते हुए अथवा न करते हुए—दोनों अवस्थाओंमें रहनेवाली निलिप्तताकी मुख्यता है और दूसरे-(अकर्ममें कर्म-में) निलिप्त रहते हुए कर्म करने अथवा न करनेकी मुख्यता है। तात्पर्य है कि निलिप्तता अपने लिये और कर्म संसारके लिये है; क्योंकि निलिप्तताका सम्बन्ध ‘स्व’-(स्वरूप-के) साथ और कर्म करने अथवा न करनेका सम्बन्ध ‘पर’-(शरीर, संसार-के) साथ है।
इसलिये निलिप्तता स्वधर्म और कर्म करना अथवा न करना परधर्म है। इन दोनोंका विभाग सर्वथा अलग-अलग बतानेके लिये ही भगवान्ने उपर्युक्त दो बातें कही हैं।
कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म—ये दोनों बातें कर्मयोगकी हैं, जिनका तात्पर्य यह है कि प्रकृतिसे तो सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाय अर्थात् करने अथवा न करनेसे अपना कोई प्रयोजन न रहे और लोकसंग्रहके लिये कर्मोंको करना अथवा न करना हो। कारण कि कर्म करते हुए निलिप्त रहना और निलिप्त रहते हुए भी दूसरोंके हितके लिये कर्म करना—ये दोनों ही गीताके सिद्धान्त हैं।
प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना)—दोनों प्रकृतिके राज्यमें ही हैं। प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है, इसलिये प्रवृत्तिका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा निवृत्तिका भी आरम्भ और अन्त होता है। परन्तु इनसे सर्वथा अतीत परमनिवृत्ततत्त्व—अपने स्वरूपका आदि और अन्त नहीं होता। वह प्रवृत्ति और निवृत्तिके आरम्भमें भी रहता है और उनके अन्तमें भी रहता है तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति-कालमें भी ज्यों-का-त्यों रहता है। वह प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंका प्रकाशक और आधार है। इसलिये उसमें न प्रवृत्ति है और न निवृत्ति है—इस तत्त्वको समझनेके लिये और उसमें स्थित होकर लोक-संग्रहार्थ-(यज्ञार्थ- ) कर्म करनेके लिये यहाँ कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म—ये दो बातें कही गयी हैं।
‘स बुद्धिमान्मनुष्येषु’—‘जो पुरुष कर्ममें अकर्म देखता है और अकर्ममें कर्म देखता है अर्थात् नित्य-निरन्तर निलिप्त रहता है, वही वास्तवमें कर्म-तत्त्वको जाननेवाला है। जबतक वह निलिप्त नहीं हुआ है अर्थात् कर्म और पदार्थको अपना और अपने लिये मानता है, तबतक उसने कर्म-तत्त्वको समझा ही नहीं है।
परमात्माको जाननेके लिये स्वयंको परमात्मासे अभिन्नताका अनुभव करना होता है और संसारको जाननेके लिये स्वयंको संसार-(क्रिया और पदार्थ- ) से सर्वथा भिन्नताका अनुभव करना होता है। कारण कि वास्तवमें हम (स्वरूपसे) परमात्मासे अभिन्न और संसारसे भिन्न हैं। इसलिये कर्मोंसे अलग होकर अर्थात् निलिप्त होकर ही कर्म-तत्त्वको जान सकते हैं। कर्म आदि-अन्तवाले हैं और मैं (स्वयं जीव) नित्य रहनेवाला हूँ; अतः मैं स्वरूपसे कर्मोंसे अलग (निलिप्त) हूँ—इस वास्तविकताका अनुभव करना ही ‘जानना’ है। वास्तविकताकी तहमें बैठे बिना