श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक ३८ ]
- साधक-संजीवनी *
३४५
चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया था कि प्रचलित प्रणालीके अनुसार कर्मोंका त्याग करके गुरुके पास जानेपर वे तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे—‘उपदेश्यन्ति ते ज्ञानम्।’ किंतु गुरु तो उपदेश दे देंगे, पर उससे तत्त्वज्ञान हो ही जायगा—ऐसा निश्चित नहीं है। फिर भी भगवान् यहाँ बताते हैं कि कर्मयोगकी प्रणालीसे कर्म करनेवाले मनुष्यको योगसंसिद्धि मिल जानेपर तत्त्वज्ञान हो ही जाता है।
उपर्युक्त पदोंमें आया ‘कालेन’ पद विशेष ध्यान देनेयोग्य है। भगवान्ने व्याकरणकी दृष्टिसे ‘कालेन’ पद तृतीयामें प्रयुक्त करके यह बताया है कि कर्मयोगसे अवश्य ही तत्त्वज्ञान अथवा परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है*।
‘स्वयम्’ पद देनेका तात्पर्य यह है कि तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेके लिये कर्मयोगीको किसी गुरुकी, ग्रन्थकी या दूसरे किसी साधनकी अपेक्षा नहीं है। कर्मयोगकी विधिसे कर्तव्य-कर्म करते हुए ही उसे अपने-आप तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जायगा।
‘आत्मनि विन्दति’ पदोंका तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञानको प्राप्त करनेके लिये कर्मयोगीको किसी दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं है। कर्मयोग सिद्ध होनेपर उसे अपने-आपमें ही स्वतःसिद्ध तत्त्वज्ञानका अनुभव हो जाता है।
परमात्मा सब जगह परिपूर्ण होनेसे अपनेमें भी है। जहाँ साधक ‘मैं हूँ’-रूपसे अपने-आपको मानता है, वहाँ परमात्मा विराजमान है, परन्तु परमात्मासे विमुख होकर संसारसे अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण अपने-आपमें स्थित परमात्माका अनुभव नहीं होता। कर्मयोगका ठीक-ठीक अनुष्ठान करनेसे जब संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है अर्थात् संसारसे तादात्म्य, ममता और कामना मिट जाती है, तब उसे अपने-आपमें ही तत्त्वका सुखपूर्वक अनुभव हो जाता है—‘निर्दन्तो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ (गीता ५।३)।
परमात्मतत्त्वका ज्ञान करण-निरपेक्ष है। इसलिये उसका अनुभव अपने-आपसे ही हो सकता है, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि
आदि करणोंसे नहीं। साधक किसी भी उपायसे तत्त्वको जाननेका प्रयत्न क्यों न करे, पर अन्तमें वह अपने-आपसे ही तत्त्वको जानेगा। श्रवण-मनन आदि साधन तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेमें असम्भावना, विपरीत भावना आदि ज्ञानकी बाधाओंको दूर करनेवाले परम्परागत साधन माने जा सकते हैं, पर वास्तविक बोध अपने-आपसे ही होता है; कारण कि मन, बुद्धि आदि सब जड़ हैं। जड़के द्वारा उस चिन्मय तत्त्वको कैसे जाना जा सकता है, जो जड़से सर्वथा अतीत है? वास्तवमें तत्त्वका अनुभव जड़के सम्बन्ध-विच्छेदसे होता है, जड़के द्वारा नहीं। जैसे, आँखोंसे संसारको तो देखा जा सकता है, पर आँखोंसे आँखोंको नहीं देखा जा सकता; परन्तु यह कहा जा सकता है कि जिससे देखते हैं, वही आँख है। इसी प्रकार जो सबको जाननेवाला है, उसे किसके द्वारा जाना जा सकता है—‘विज्ञातारमे केन विजानीयात्’ (बृहदारण्यक० २।४।१४)? परन्तु जिससे सम्पूर्ण वस्तुओंका ज्ञान होता है, वही परमात्मतत्त्व है।
विशेष बात
इस अध्यायके तैंतीसवेंसे सैंतीसवें श्लोकतक भगवान्ने ज्ञानकी जो प्रशंसा की है, उससे ज्ञानयोगकी विशेष महिमा झलकती है; परन्तु वास्तवमें उसे ज्ञानयोगकी ही महिमा मान लेना उचित प्रतीत नहीं होता। गहरा विचार करें तो इसमें अर्जुनके प्रति भगवान्का एक गूढ़ अभिप्राय प्रतीत होता है कि जो तत्त्वज्ञान इतना महान् और पवित्र है तथा जिस ज्ञानको प्राप्त करनेके लिये मैं तुझे तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जानेकी आज्ञा दे रहा हूँ, उस ज्ञानको तू स्वयं कर्मयोगके द्वारा अवश्यमेव प्राप्त कर सकता है—‘तत्त्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति’ (गीता ४।३८)। इस प्रकार ज्ञानयोगकी प्रशंसाके ये श्लोक वास्तवमें प्रकारान्तरसे कर्मयोगकी ही विशेषता, महिमा बतानेके लिये हैं। भगवान्का अभिप्राय यह नहीं था कि अर्जुन ज्ञानियोंके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करे। भगवान्का अभिप्राय यह था
- ‘कालेन’—इस शब्दमें ‘कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे’ (पाणिनिस्मृत २।३।५)—इससे प्राप्त द्वितीया विभक्तिका निषेध करके ‘अपवर्गं तृतीया’ (वही २।३।६)—इससे तृतीया विभक्ति हुई है। तृतीया विभक्ति वहाँ होती है, जहाँ अवश्य फलप्राप्तिका अर्थात् कार्य अवश्य सिद्ध होनेका घोषित होता है। परन्तु जहाँ द्वितीया विभक्ति होती है, वहाँ अवश्य फलप्राप्तिका घोषित नहीं होता; जैसे—‘मासम् अर्थाते’ पद द्वितीयामें प्रयुक्त होता है, तो इसका अर्थ है कि एक मासमें भी पूरा न पड़ सकता। परन्तु यही पद यदि ‘मासेन अर्थाते’ इस प्रकार तृतीयामें प्रयुक्त होता है, तो इसका अर्थ है कि एक मासमें पूरा पड़ लिया। इसी प्रकार भगवान्ने यहाँ द्वितीयामें ‘कालम्’ पद न देकर तृतीयामें ‘कालेन’ पद दिया है, जिससे यह अर्थ निकलता है कि कर्मयोगसे अवश्य फलप्राप्ति (सिद्धि) होती है।
३४६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
कि जो ज्ञान इतनी दुर्लभतासे, ज्ञानियोंके पास रहकर उनकी सेवा करके और विनयपूर्वक प्रश्नोत्तर करके तथा उसके अनुसार श्रवण, मनन और निदिध्यासन करके प्राप्त करेगा, वही ज्ञान तुझे कर्मयोगकी विधिसे प्राप्त कर्तव्य-(युद्ध-) का पालन करनेसे ही प्राप्त हो जायगा। जिस तत्त्वज्ञानके लिये मैंने तत्त्वदर्शी महापुरुषोंके पास जानेकी प्रेरणा की है, वह तत्त्वज्ञान प्राप्त हो ही जायगा, यह निश्चित नहीं है; क्योंकि जिस पुरुषके पास जाओगे, वह तत्त्वदर्शी ही है—इसका क्या पता? और उस महापुरुषके प्रति श्रद्धाकी कमी भी रह सकती है। दूसरी बात, इस प्रक्रियामें पहले सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेमें देखेगा और उसके बाद सम्पूर्ण प्राणियोंको एक परमात्मतत्त्वमें देखेगा (गीता—चौथे
परिशिष्ट भाव—‘पवित्रमिह’ —अपवित्रता संसारके अभाव हो जाता है, तब अपवित्रता रहनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसलिये ज्ञानमें किंचिन्मात्र भी अपवित्रता, जड़ता, विकार नहीं है।
‘इह’ पद ‘लोक’ का वाचक है। तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञान लौकिक है, जबकि परमात्मज्ञान अलौकिक है।
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें ज्ञान-प्राप्तिके पात्रका निरूपण करते हैं।
श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
संयतेन्द्रियः | = (जो) जितेन्द्रिय (तथा) | ज्ञानम् | = ज्ञानको | अचिरेण | = तत्काल ---|---|---|---|---|--- तत्परः | = साधन-परायण है, (ऐसा) | लभते | = प्राप्त होता है (और) | पराम् | = परम श्रद्धावान् | = श्रद्धावान् मनुष्य | ज्ञानम् | = ज्ञानको | शान्तिम् | = शान्तिको | | लब्ध्वा | = प्राप्त होकर (वह) | अधिगच्छति | = प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—‘तत्परः संयतेन्द्रियः’ —इस श्लोकमें श्रद्धावान् पुरुषको ज्ञान प्राप्त होनेकी बात आयी है। अपनेमें श्रद्धा कम होनेपर भी मनुष्य भूलसे अपनेको अधिक श्रद्धावाला मान सकता है, इसलिये भगवान्ने श्रद्धाकी पहचानके लिये दो विशेषण दिये हैं—‘संयतेन्द्रियः’ और ‘तत्परः’। जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतया वशमें हैं, वह ‘संयतेन्द्रियः’ है और जो अपने साधनमें तत्परतापूर्वक लगा हुआ है, वह ‘तत्परः’ है। साधनमें तत्परताकी कसीटी है—इन्द्रियोंका संयत होना। अगर इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं और विषयभोगोंकी तरफ जाती हैं, तो साधन-परायणतामें कमी समझनी चाहिये।
‘श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानम्’ —परमात्मामें, महापुरुषोंमें, धर्ममें और शास्त्रोंमें प्रत्यक्षकी तरह आदरपूर्वक विश्वास
अध्यायका पैँतीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार ज्ञान प्राप्त करनेकी इस प्रक्रियामें संशय तथा विलम्बकी सम्भावना है। परन्तु कर्मयोगके द्वारा अन्य पुरुषकी अपेक्षाके बिना, अवश्यमेव और तत्काल उस तत्त्वज्ञानका अनुभव हो जाता है। इसलिये मैं तेरे लिये कर्मयोगको ही ठीक समझता हूँ; अतः तुझे प्रचलित प्रणालीके ज्ञानका उपदेश मैं नहीं दूँगा।
भगवान् तो महापुरुषोंके भी महापुरुष हैं। अतः वे अर्जुनको किसी दूसरे महापुरुषके पास जाकर ज्ञान सीखनेके लिये कैसे कह सकते हैं? आगे इसी अध्यायके इकतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मयोगकी प्रशंसा करके बयालीसवें श्लोकमें अर्जुनको समतामें स्थित होकर युद्ध करनेकी स्पष्टरूपसे आज्ञा दी है।
सम्बन्धसे आती है। तत्त्वज्ञान होनेपर जब संसारका अत्यन्त
होना ‘श्रद्धा’ कहलाती है।
जबतक परमात्मतत्त्वका अनुभव न हो, तबतक
परमात्मामें प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास होना चाहिये।
वास्तवमें परमात्मासे देश, काल आदिकी दूरी नहीं है,
केवल मानी हुई दूरी है। दूरी माननेके कारण ही परमात्मा
सर्वत्र विद्यमान रहते हुए भी अनुभवमें नहीं आ रहे हैं।
इसलिये ‘परमात्मा अपनेमें है’ ऐसा मान लेनेका नाम ही
श्रद्धा है। कैसा ही व्यक्ति क्यों न हो, अगर वह एकमात्र
परमात्माको प्राप्त करना चाहता है और ‘परमात्मा अपनेमें
है’ ऐसी श्रद्धावाला है, तो उसे अवश्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
श्लोक ३९ ]
- साधक-संजीवनी *
३४७
नहीं। उसकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। केवल परमात्माकी सत्तासे ही वह सत्तावान् दीख रहा है। इस तरह संसारकी स्वतन्त्र सत्ताको न मानकर एक परमात्माकी सत्ताको ही मानना श्रद्धा है। ऐसी श्रद्धा होनेपर तत्काल ज्ञान हो जाता है। जबतक इन्द्रियाँ संयत न हों और साधनमें तत्परता न हो, तबतक श्रद्धामें कमी समझनी चाहिये। यदि इन्द्रियाँ विषयोंकी तरफ जाती हैं, तो साधनमें तत्परता नहीं आती। साधनमें तत्परता न होनेसे दूसरेकी परायणता, दूसरेका आदर होता है। जबतक साधन-परायणता नहीं होती, तबतक श्रद्धा भी पूरी नहीं होती। श्रद्धा पूरी न होनेके कारण ही तत्त्वेके अनुभवमें देरी लगती है, नहीं तो नित्यप्राप्त तत्त्वेके अनुभवमें देरीका कारण है ही नहीं।
इसी अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने गुरुके पास जाकर विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रणालीका वर्णन करते हुए तीन साधन बताये—प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा। यहाँ भगवान्ने ज्ञान प्राप्त करनेका एक साधन बताया है—श्रद्धा। चौंतीसवें श्लोकमें ‘उपदेश्यन्ति’ पदसे गुरुके द्वारा केवल ज्ञानका उपदेश देनेकी बात आयी है; उपदेशसे ज्ञान प्राप्त हो जायगा, ऐसी बात वहाँ नहीं आयी। परन्तु इस श्लोकमें ‘लभते’ पदसे ज्ञान प्राप्त होनेकी बात आयी है। तात्पर्य यह है कि चौंतीसवें श्लोकमें कहे साधनोंसे ज्ञान प्राप्त हो जायगा—ऐसा निश्चित नहीं है; परन्तु इस श्लोकमें कहे साधनसे निश्चितरूपसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है। कारण यह है कि चौंतीसवें श्लोकमें कहे साधन बहिरंग होनेसे कपटभावसे तथा साधारणभावसे भी किये जा सकते हैं; परन्तु इस श्लोकमें कहा साधन अन्तरंग होनेसे कपटभावसे तथा साधारणभावसे नहीं किया जा सकता (गीता—सन्नहवै अध्यायका तीसरा श्लोक)। इसलिये ज्ञानकी प्राप्तिमें श्रद्धा मुख्य है।
ऐसा एक तत्त्व या बोध है, जिसका अनुभव मेरेको हो सकता है और अभी हो सकता है—यही वास्तवमें श्रद्धा है। तत्त्व भी विद्यमान है, मैं भी विद्यमान हूँ और तत्त्वका अनुभव करना भी चाहता हूँ, फिर देरी किस बातकी?
विशेष बात
बड़े आश्चर्यकी बात है कि जो नित्य-निरन्तर विद्यमान रहता है, वह तो प्रिय नहीं लगता और जो निरन्तर ही बदल रहा है, जा रहा है, वह संसार प्रिय लगता है! इसमें कारण यही है कि जिस संसारकी एक क्षण भी
स्थिति नहीं है, जो निरन्तर ही अभावमें जा रहा है, उसे हम स्थायी मान लेते हैं। स्थायी माननेके कारण ही उससे स्थायी सुख लेना चाहते हैं, जो सर्वथा असम्भव है।
सुख लेनेके लिये हम संसारमें अपनापन कर लेते हैं, जो किसी भी कालमें अपना नहीं है। अपनी वस्तु वही है, जो हमसे कभी अलग नहीं होती और जिससे हम कभी अलग नहीं होते। यदि संसार अपना होता, तो प्रत्येक परिस्थिति हमारे साथ रहती। परन्तु न तो परिस्थिति हमारे साथ रहती है और न हम ही परिस्थितिके साथ रहते हैं। इसलिये वह अपनी है ही नहीं। जिन अन्तःकरण और इन्द्रियोंसे हम संसारको देखते हैं, उन्हें भी हम भूलसे अपनी मान लेते हैं। परन्तु इनपर भी हमारा कोई अधिकार नहीं चलता। अन्तःकरण और इन्द्रियोंसहित सम्पूर्ण संसार प्रलयकी ओर जा रहा है। उसकी स्थिति है ही नहीं।
संसारकी प्रतीतिमात्र होती है, इसलिये इसकी प्राप्ति कभी हो ही नहीं सकती। संसार अपने स्वरूपतक पहुँच ही नहीं सकता, पर स्वरूप सब जगह सत्कारूपसे विद्यमान रहता है। संसारका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है, पर अपना अस्तित्व नित्य-निरन्तर रहता है। स्वरूपका अर्थात् अपने होनेपनका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। स्वरूप अपरिवर्तनशील है। यदि वह परिवर्तनशील होता, तो संसारके परिवर्तनको कौन देखता? हमें जैसे संसारके निरन्तर परिवर्तन और अभावका अनुभव होता है, ऐसे अपने परिवर्तन और अभावका अनुभव कभी नहीं होता। ऐसा होनेपर भी परिवर्तनशील शरीरके साथ अपनेको मिलाकर उसके परिवर्तनको भूलसे अपना परिवर्तन मान लेते हैं। शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर शरीरकी अवस्थाको अपनी अवस्था मान लेते हैं। विचार करें कि यदि शरीरकी अवस्थाके साथ हम एक होते, तो अवस्थाके चले जानेपर हम भी चले गये होते। इससे सिद्ध होता है कि जानेवाली अवस्था दूसरी है और हम दूसरे हैं। इस प्रकारके अपने नित्यसिद्ध स्वरूपका अनुभव होना ‘ज्ञान’ है।
दूसरी बात, इस उन्तालीसवें श्लोकमें ‘लभते’ पद आया है, जिसका तात्पर्य है—जिस वस्तुका निर्माण नहीं होता, ऐसी नित्यसिद्ध वस्तुकी प्राप्ति। जिस वस्तुका निर्माण होता है अर्थात् जो वस्तु पहले नहीं होती, प्रत्युत बनायी जाती है, उस वस्तुकी प्राप्तिको ‘लभते’ नहीं कह सकते। कारण कि जो वस्तु पहले नहीं थी तथा बादमें भी नहीं
३४८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
रहेगी, ऐसी वस्तुकी प्रतीति तो होती है, पर प्राप्त नहीं होती। प्रतीत होनेवाली वस्तुको प्राप्त मान लेना अपने विवेकका सर्वथा अनादर है।
जो संसारकी उत्पत्तिके पहले भी रहता है, संसारकी (उत्पन्न होकर होनेवाली) स्थितिमें भी रहता है और संसारके नष्ट होनेके बाद भी रहता है, वह तत्त्व 'है' नामसे कहा जाता है, और 'है' की प्राप्तिको ही 'लभते' कहते हैं। परन्तु जो वस्तु उत्पन्न होनेसे पहले भी नहीं थी और नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहेगी तथा बीचमें भी निरन्तर नाशकी ओर जा रही है, वह वस्तु 'नहीं' नामसे कही जाती है। 'नहीं' की प्रतीति होती है, प्राप्ति नहीं। जो 'है', वह तो है ही और जो 'नहीं', वह है ही नहीं। 'नहीं' को 'नहीं'-रूपसे मानते हुए 'है' को 'है'-रूपसे मान लेना श्रद्धा है, जिससे नित्यसिद्ध ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है—'श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानम्'।
'ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति'—नवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने निषेध-मुखसे कहा है
परिशिष्ट भाव— 'श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानम्'—श्रद्धा-विश्वास और विवेककी आवश्यकता सभी साधकोंके लिये हैं। हाँ, कर्मयोग तथा ज्ञानयोगमें विवेककी मुख्यता है और भक्तियोगमें श्रद्धा-विश्वासकी मुख्यता है। आरम्भमें 'तत्त्वज्ञान है'—ऐसी श्रद्धा होगी, तभी साधक उसकी प्राप्तिके लिये साधन करेगा।
सम्बन्ध— जो ज्ञानप्राप्तिका अपात्र है, ऐसे विवेकहीन संशयात्मा मनुष्यकी भगवान् आगेके श्लोकमें निन्दा करते हैं।
अज्ञश्चाश्रद्धातनश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
| अज्ञः | = विवेकहीन | संशयात्मनः | = संशयात्मा | न | = न |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = और | मनुष्यके लिये | परः | = परलोक | |
| अश्रद्धातनः | = श्रद्धारहित | न | = न तो | (हितकारक) है | |
| संशयात्मा | = संशयात्मा मनुष्यका | अयम् | = यह | च | = और |
| विनश्यति | = पतन हो जाता है। | लोकः | = लोक (हितकारक) | न | = न |
| (ऐसे) | अस्ति | = है | सुखम् | = सुख (ही) है। |
व्याख्या— 'अज्ञश्चाश्रद्धातनश्च संशयात्मा विनश्यति'—जिस पुरुषका विवेक अभी जाग्रत् नहीं हुआ है तथा जितना विवेक जाग्रत् हुआ है, उसको महत्त्व नहीं देता और साथ ही जो अश्रद्धालु है, ऐसे संशययुक्त पुरुषका पारमार्थिक मार्गसे पतन हो जाता है। कारण कि संशययुक्त पुरुषकी अपनी बुद्धि तो प्राकृत—शिक्षारहित है और दूसरेकी बातका आदर नहीं करता, फिर ऐसे पुरुषके संशय कैसे नष्ट हो सकते हैं? और
कि श्रद्धारहित पुरुष मेरेको प्राप्त न होकर जन्म-मरणरूप संसार-चक्रमें घूमते रहते हैं। उसी बातको यहाँ विधि-मुखसे कहते हैं कि श्रद्धावान् पुरुष परमशान्तिको प्राप्त हो जाता है अर्थात् मेरेको प्राप्त होकर जन्म-मरणरूप संसार चक्रसे छूट जाता है।
परमशान्तिका तत्काल अनुभव न होनेका कारण है—जो वस्तु अपने-आपमें है, उसको अपने-आपमें न दूँदकर बाहर दूसरी जगह दूँदना। परमशान्ति प्राणिमात्रमें स्वतःसिद्ध है। परन्तु मनुष्य परमशान्ति-स्वरूप परमात्मासे तो विमुख हो जाता है और सांसारिक वस्तुओंमें शान्ति दूँदता है। इसलिये अनेक जन्मोंतक शान्तिकी खोजमें भटकते रहनेपर भी उसे शान्ति नहीं मिलती। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंमें शान्ति मिल ही कैसे सकती है? तत्त्वज्ञानका अनुभव होनेपर जब दुःखरूप संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब स्वतःसिद्ध परमशान्तिका तत्काल अनुभव हो जाता है।
संशय नष्ट हुए बिना उसकी उन्नति भी कैसे हो सकती है?
अलग-अलग बातोंको सुननेसे 'यह ठीक है अथवा वह ठीक है?'—इस प्रकार सन्देहयुक्त पुरुषका नाम संशयात्मा है। पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले साधकमें संशय पैदा होना स्वाभाविक है; क्योंकि वह किसी भी विषयको पढ़ेगा तो कुछ समझेगा और कुछ नहीं समझेगा। जिस विषयको कुछ नहीं समझते, उस विषयमें संशय पैदा
श्लोक ४० ]
- साधक-संजीवनी *
३४९
नहीं होता और जिस विषयको पूरा समझते हैं, उस विषयमें संशय नहीं रहता। अतः संशय सदा अधूरे ज्ञानमें ही पैदा होता है, इसीको अज्ञान कहते हैं। इसलिये संशयका उत्पन्न होना हानिकारक नहीं है, प्रत्युत संशयको बनाये रखना और उसे दूर करनेकी चेष्टा न करना ही हानिकारक है। संशयको दूर करनेकी चेष्टा न करनेपर वह संशय ही 'सिद्धान्त' बन जाता है। कारण कि संशय दूर न होनेपर मनुष्य सोचता है कि पारमार्थिक मार्गमें सब कुछ ढकोसला है और ऐसा सोचकर उसे छोड़ देता है तथा नास्तिक बन जाता है। परिणामस्वरूप उसका पतन हो जाता है। इसलिये अपने भीतर संशयका रहना साधकको बुरा लगना चाहिये। संशय बुरा लगनेपर जिज्ञासा जाग्रत् होती है, जिसकी पूर्ति होनेपर संशय-विनाशक ज्ञानकी प्राप्ति होती है।
साधकका लक्षण है—खोज करना। यदि वह मन और इन्द्रियोंसे देखी बातको ही सत्य मान लेता है, तो वहीँ रुक जाता है, आगे नहीं बढ़ पाता। साधकको निरन्तर आगे ही बढ़ते रहना चाहिये। जैसे रास्तेपर चलते समय मनुष्य यह न देखे कि कितने मील आगे आ गये, प्रत्युत यह देखे कि कितने मील अभी बाकी पड़े हैं, तब वह ठीक अपने लक्ष्यतक पहुँच जायगा। ऐसे ही साधक यह न देखे कि कितना जान लिया अर्थात् अपने जाने हुएपर सन्तोष न करे, प्रत्युत जिस विषयको अच्छी तरह नहीं जानता, उसे जाननेकी चेष्टा करता रहे। इसलिये संशयके रहते हुए कभी सन्तोष नहीं होना चाहिये, प्रत्युत जिज्ञासा अगिनकी तरह दहकती रहनी चाहिये। ऐसा होनेपर साधकका संशय सन्त-महात्माओंसे अथवा ग्रन्थोंसे किसी-न-किसी प्रकारसे दूर हो ही जाता है। संशय दूर करनेवाला कोई न मिले तो भगवत्कृपासे उसका संशय दूर हो जाता है।
विशेष बात
जीवात्मा परमात्माका अंश है—'ममैवांशो जीवलोकै' (गीता १५।७)। इसलिये जब उसमें अपने अंशी परमात्माको प्राप्त करनेकी भूख जाग्रत् होती है और
उसकी पूर्ति न होनेका दुःख होता है, तब उस दुःखको भगवान् सह नहीं सकते। अतः उसकी पूर्ति भगवान् स्वतः करते हैं। ऐसे ही जब साधकको अपने भीतर स्थित संशयसे व्याकुलता या दुःख होता है, तब वह दुःख भगवान्को असह्य होता है। संशय दूर करनेके लिये भगवान्से प्रार्थना नहीं करनी पड़ती, प्रत्युत जिस संशयको लेकर साधकको दुःख हो रहा है, उस संशयको दूर करके भगवान् स्वतः उसका वह दुःख मिटा देते हैं। संशयात्मा पुरुषकी एक पुकार होती है, जो स्वतः भगवान्तक पहुँच जाती है।
संशयके कारण साधककी वास्तविक उन्नति रुक जाती है, इसलिये संशय दूर करनेमें ही उसका हित है। भगवान् प्राणिमात्रके सुदृढ़ हैं—'सुदृढं सर्वभूतानाम्' (गीता ५।२९), इसलिये जिस संशयको लेकर मनुष्य व्याकुल होता है और वह व्याकुलता उसे असह्य हो जाती है, तो भगवान् उस संशयको किसी भी रीति—उपायसे दूर कर देते हैं। गलती यही होती है कि मनुष्य जितना जान लेता है, उसीको पूरा समझकर अभिमान कर लेता है कि मैं ठीक जानता हूँ। यह अभिमान महान् पतन करनेवाला हो जाता है।
'नार्थ लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः'—
इस श्लोकमें ऐसे संशयात्मा मनुष्यका वर्णन है, जो 'अज्ञ' और 'अश्रद्धालु' है। तात्पर्य यह है कि भीतर संशय रहनेपर भी उस मनुष्यकी न तो अपनी विवेकवती बुद्धि है और न वह दूसरेकी बात ही मानता है। इसलिये उस संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। उसके लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।
संशयात्मा मनुष्यका इस लोकमें व्यवहार बिगड़ जाता है। कारण कि वह प्रत्येक विषयमें संशय करता है, जैसे—यह आदमी ठीक है या बेठीक है? यह भोजन ठीक है या बेठीक है? इसमें मेरा हित है या अहित है? आदि। उस संशयात्मा मनुष्यको परलोकमें भी कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती; क्योंकि कल्याणमें निश्चयात्मिका बुद्धिकी
१-अज्ञानका अर्थ ज्ञानका अभाव नहीं है। अधूरे ज्ञानको अंश होनेसे जीवमें ज्ञानका सर्वथा अभाव हो ही नहीं सकता, केवल नाशवान् असत्की सत्ता मानकर उसे महत्त्व दे देता है, असत्को असत् मानकर भी असत्से विमुख नहीं होता—यही अज्ञान है। इसलिये मनुष्यमें जितना ज्ञान है, यदि उस ज्ञानके अनुसार वह अपना जीवन बना ले, तो अज्ञान सर्वथा मिट जायगा और ज्ञान प्रकट हो जायगा। कारण कि अज्ञानकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं।
२-कुछ श्रद्धा, कुछ दुष्टता, कुछ संशय, कुछ ज्ञान। घरका रहा न घाटका, ज्यों धोबीका श्वान॥
३५०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
आवश्यकता होती है और संशयात्मा मनुष्य दुविधामें रहनेके कारण कोई एक निश्चय नहीं कर सकता; जैसे— जप करें या स्वाध्याय करें? संसारका काम करें या परमात्मप्राप्ति करें? आदि। भीतर संशय भरे रहनेके कारण उसके मनमें भी सुख-शान्ति नहीं रहती। इसलिये विवेकवती बुद्धि और श्रद्धाके द्वारा संशयको अवश्य ही मिटा देना चाहिये।
परिशिष्ट भाव —ज्ञान हो तो संशय मिट जाता है—‘ज्ञानसंछिन्नसंशयम्’ (गीता ४।४१) और श्रद्धा हो तो भी संशय मिट जाता है—‘श्रद्धावौल्लभते ज्ञानम्’ (गीता ४।३९)। परन्तु ज्ञान और श्रद्धा—ये दोनों ही न हो तो संशय नहीं मिट सकता। इसलिये जिस संशयात्मा मनुष्यमें न तो ज्ञान (विवेक) है और न श्रद्धा ही है अर्थात् जो न तो खुद जानता है और न दूसरेकी बात मानता है, उसका पतन हो जाता है।
सम्बन्ध—भगवान्ने तैत्तिरीयश्लोकसे ज्ञानयोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए ज्ञान-प्राप्तिका उपाय तथा ज्ञानकी महिमा बताया। जो ज्ञान गुरुके पास रहकर उनकी सेवा आदि करनेसे होता है, वही ज्ञान कर्मयोगसे सिद्ध हुए मनुष्यको अपने-आप प्राप्त हो जाता है—ऐसा बताकर भगवान्ने ज्ञानप्राप्तिके पात्र-अपात्रका वर्णन करते हुए प्रकरणका उपसंहार किया।
अब प्रश्न होता है कि सिद्ध होनेके लिये कर्मयोगीको क्या करना चाहिये? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
योगसन्व्यस्तकर्माणि ज्ञानसछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥
| धनञ्जय | = हे धनंजय ! | हो गया है (और) | आत्मवन्तम् | = स्वरूप-परायण |
|---|---|---|---|---|
| योगसन्व्यस्त- | = योग (समता) | ज्ञानसछिन्न- | = विवेकज्ञानके | मनुष्यको |
| कर्माणिम् | के द्वारा जिसका | संशयम् | द्वारा जिसके सम्पूर्ण | कर्माणि |
| सम्पूर्ण कर्मोंसे | संशयोंका नाश | न | = नहीं | |
| सम्बन्ध-विच्छेद | हो गया है, (ऐसे) | निबध्नन्ति | = बाँधते। |
व्याख्या —‘योगसन्व्यस्तकर्माणिम्’—शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जो वस्तुएँ हमें मिली हैं और हमारी दीखती हैं, वे सब दूसरोंकी सेवाके लिये ही हैं, अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं। इस दृष्टिसे जब उन वस्तुओंको दूसरोंकी सेवामें (उनका ही मानकर) लगा दिया जाता है, तब कर्मों और वस्तुओंका प्रवाह संसारकी ओर ही हो जाता है और अपनेमें स्वतःसिद्ध समताका अनुभव हो जाता है। इस प्रकार योग-(समता)-के द्वारा जिसने कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है, वह पुरुष ‘योगसन्व्यस्तकर्मा’ है।
जब कर्मयोगी कर्ममें अकर्म तथा अकर्ममें कर्म देखता है अर्थात् कर्म करते हुए अथवा न करते हुए—दोनों अवस्थाओंमें नित्य-निरन्तर असंग रहता है, तब वही
दो अलग-अलग बातोंको पढ़ने-सुननेसे संशय पैदा होता है। वह संशय या तो विवेक-विचारके द्वारा दूर हो सकता है या शास्त्र तथा सन्त-महापुरुषोंकी बातोंको श्रद्धापूर्वक माननेसे। इसलिये संशययुक्त पुरुषमें यदि अज्ञता है तो वह विवेक-विचारको बढ़ाये और यदि अश्रद्धा है तो श्रद्धाको बढ़ाये; क्योंकि इन दोनोंमेंसे किसी एकको विशेषतासे अपनाये बिना संशय दूर नहीं होता।
वास्तवमें ‘योगसन्व्यस्तकर्मा’ होता है।
‘ज्ञानसछिन्नसंशयम्’—मनुष्यके भीतर प्रायः ये संशय रहते हैं कि कर्म करते हुए ही कर्मोंसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कैसे होगा? अपने लिये कुछ न करें तो अपना कल्याण कैसे होगा? आदि। परन्तु जब वह कर्मोंके तत्त्वको अच्छी तरह जान लेता है*, तब उसके समस्त संशय मिट जाते हैं। उसे इस बातका स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि कर्मों और उनके फलोंका आदि और अन्त होता है, पर स्वरूप सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। इसलिये कर्ममात्रका सम्बन्ध ‘पर’-(संसार-) के साथ है, ‘स्व’-(स्वरूप) के साथ बिलकुल नहीं। इस दृष्टिसे अपने लिये कर्म करनेसे कर्मोंके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और निष्कामभावपूर्वक
- कर्मोंके तत्त्वका वर्णन इसी अध्यायके सोलहवेंसे बत्तीसवें श्लोकतकके प्रकरणमें विशेषतासे हुआ है। इसमें भी अठारहवाँ श्लोक मुख्य है।
श्लोक ४२ ]
- साधक-संजीवनी *
३५१
केवल दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्मोसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। इससे सिद्ध होता है कि अपना कल्याण दूसरोंके लिये कर्म करनेसे ही होता है, अपने लिये कर्म करनेसे नहीं।
‘आत्मवन्तम्’ —कर्मयोगीका उद्देश्य स्वरूपबोधको प्राप्त करनेका होता है, इसलिये वह सदा स्वरूपके परायण रहता है। उसके सम्पूर्ण कर्म संसारके लिये ही होते हैं। सेवा तो स्वरूपसे ही दूसरोंके लिये होती है, खाना-पीना, सोना-बैठना आदि जीवन-निर्वाहकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भी
दूसरोंके लिये ही होती हैं; क्योंकि क्रियामात्रका सम्बन्ध संसारके साथ है, स्वरूपके साथ नहीं।
‘न कर्माणि निबध्नन्ति’ —अपने लिये कोई भी कर्म न करनेसे कर्मयोगीका सम्पूर्ण कर्मोसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है अर्थात् वह सदाके लिये संसार-बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाता है (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)।
कर्म स्वरूपसे बन्धनकारक हैं ही नहीं। कर्मोंमें फलेच्छा, ममता, आसक्ति और कर्तृत्वाभिमान ही बाँधनेवाला है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि ज्ञानके द्वारा संशयका नाश होता है और समताके द्वारा कर्मोसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। अब आगेके श्लोकमें भगवान् ज्ञानके द्वारा अपने संशयका नाश करके समतामें स्थित होनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हैं।
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृतस्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्तैवं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥
तस्मात् = इसलिये भारत = हे भरतवंशी अर्जुन! हृतस्थम् = हृदयमें स्थित एनम् = इस
अज्ञानसम्भूतम् = अज्ञानसे उत्पन्न आत्मनः = अपने संशयम् = संशयका ज्ञानासिना = ज्ञानरूप तलवारसे
छित्त्वा = छेदन करके योगम् = योग (समता)-में आतिष्ठ = स्थित हो जा (और) उत्तिष्ठ = (युद्धके लिये) खड़ा हो जा।
व्याख्या—‘तस्मादज्ञानसम्भूतं...छित्तैवं संशयम्’ —पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह सिद्धान्त बताया कि जिसने समताके द्वारा समस्त कर्मोसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है और ज्ञानके द्वारा समस्त संशयोंको नष्ट कर दिया है, उस आत्मपरायण कर्मयोगीको कर्म नहीं बाँधते अर्थात् वह जन्म-मरणसे मुक्त हो जाता है। अब भगवान् ‘तस्मात्’ पदसे अर्जुनको भी वैसा ही जानकर कर्तव्य-कर्म करनेकी प्रेरणा करते हैं।
अर्जुनके हृदयमें संशय था—युद्धरूप घोर कर्मसे मेरा कल्याण कैसे होगा? और कल्याणके लिये मैं कर्मयोगका अनुष्ठान करूँ अथवा ज्ञानयोगका? इस श्लोकमें भगवान् इस संशयको दूर करनेकी प्रेरणा करते हैं; क्योंकि संशयके रहते हुए कर्तव्यका पालन ठीक तरहसे नहीं हो सकता।
‘अज्ञानसम्भूतम्’ पदका भाव है कि सब संशय अज्ञानसे अर्थात् कर्मोंके और योगके तत्वको ठीक-ठीक न समझनेसे ही उत्पन्न होते हैं। क्रियाओं और पदार्थोंको अपना और अपने लिये मानना ही अज्ञान है। यह अज्ञान जबतक रहता है, तबतक अन्तःकरणमें संशय रहते हैं; क्योंकि क्रियाएँ और पदार्थ विनाशी हैं और स्वरूप अविनाशी है।
तीसरे अध्यायमें कर्मयोगका आचरण करनेकी और इस चौथे अध्यायमें कर्मयोगको तत्वसे जाननेकी बात विशेषरूपसे आयी है। कारण कि कर्म करनेके साथ-साथ कर्मको जाननेकी भी बहुत आवश्यकता है। ठीक-ठीक जाने बिना कोई भी कर्म बढ़िया रीतिसे नहीं होता। इसके सिवाय अच्छी तरह जानकर कर्म करनेसे जो कर्म बाँधने-वाले होते हैं, वे ही कर्म मुक्त करनेवाले हो जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका सोलहवाँ और बत्तीसवाँ श्लोक)। इसलिये इस अध्यायमें भगवान्ने कर्मोंको तत्वसे जाननेपर विशेष जोर दिया है।
पूर्वश्लोकमें भी ‘ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्’ पद इसी अर्थमें आया है। जो मनुष्य कर्म करनेकी विद्याको जान लेता है, उसके समस्त संशयोंका नाश हो जाता है। कर्म करनेकी विद्या है—अपने लिये कुछ करना ही नहीं है।
‘योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत’ —अर्जुन अपने धनुष-बाणका त्याग करके रथके मध्यभागमें बैठ गये थे (पहले अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक)। उन्होंने भगवान्से साफ कह दिया था कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ —‘न योत्स्ये’ (गीता २।९)। यहाँ भगवान् अर्जुनको योगमें स्थित
३५२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
होकर युद्धके लिये खड़े हो जानेकी आज्ञा देते हैं। यही बात भगवान्ने दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें 'योगस्थः कुरु कर्माणि' (योगमें स्थित होकर कर्तव्य-कर्म कर) पदोंसे भी कही थी। योगका अर्थ 'समता' है— 'समत्वं योग उच्यते' (गीता २।४८)।
अर्जुन युद्धको पाप समझते थे (गीता—पहले अध्यायका छत्तीसवाँ और पैतालीसवाँ श्लोक)। इसलिये भगवान् अर्जुनको समतामें स्थित होकर युद्ध करनेकी आज्ञा देते हैं; क्योंकि समतामें स्थित होकर युद्ध करनेसे पाप नहीं लगता (गीता—दूसरे अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। इसलिये समतामें स्थित होकर कर्तव्य-कर्म करना ही कर्म-बन्धनसे छूटनेका उपाय है।
संसारमें रात-दिन अनेक कर्म होते रहते हैं, पर उन कर्मोंमें राग-द्वेष न होनेसे हम संसारके उन कर्मोंसे बँधते नहीं, प्रत्युत निलिप्त रहते हैं। जिन कर्मोंमें हमारा राग या
द्वेष हो जाता है, उन्हीं कर्मोंसे हम बँधते हैं। कारण कि राग या द्वेषसे कर्मोंके साथ अपना सम्बन्ध जुड़ जाता है। जब राग-द्वेष नहीं रहते अर्थात् समता आ जाती है, तब कर्मोंके साथ अपना सम्बन्ध नहीं जुड़ता; अतः मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
अपने स्वरूपको देखें तो उसमें समता स्वतःसिद्ध है। विचार करें कि प्रत्येक कर्मका आरम्भ होता है और समाप्ति होती है। उन कर्मोंका फल भी आदि और अन्तवाला होता है। परन्तु स्वरूप निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है। कर्म और फल अनेक होते हैं, पर स्वरूप एक ही रहता है। अतः कोई भी कर्म अपने लिये न करनेसे और किसी भी पदार्थको अपना और अपने लिये न माननेसे जब क्रिया-पदार्थरूप संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब स्वतःसिद्ध समताका अपने-आप अनुभव हो जाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूत्रनिष्ठस्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये कर्मयोग और सांख्ययोगका वर्णन होनेसे इस चौथे अध्यायका नाम 'ज्ञानकर्म-संन्यासयोग' है।
चौथे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें 'अथ चतुर्थोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके छः, श्लोकोंके पाँच सौ ग्यारह और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग पाँच सौ तैंतीस है।
(२) इस अध्यायमें 'अथ चतुर्थोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके बीस, श्लोकोंके एक हजार तीन सौ चौवालीस और पुष्पिकाके पचास अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार चार सौ इक्कीस है।
इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें तीन उवाच हैं—'दो श्रीभगवानुवाच' और एक 'अर्जुन उवाच'।
चौथे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके बयालीस श्लोकोंमेंसे—इकत्तीसवें और अड़तीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा दूसरे, दसवें, तेरहवें और चालीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; छठे श्लोकके प्रथम चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे 'र-विपुला'; और चौबीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा तीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष तैंतीस श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने चौथे अध्यायके तैत्तिरीसर्वे सौत्तीसर्वे श्लोकतक कर्म तथा पदार्थोक्ता स्वरूपसे त्याग करके तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीकी प्रशंसा की और इसके लिये (चौथे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें) अर्जुनको आज्ञा दी। तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी इस प्रणालीमें कर्मोक्ता स्वरूपसे त्याग करके एकात्ममें परमात्मतत्त्वका मनन करना आवश्यक है। अर्जुनके मनमें पहले ही युद्धरूप कर्म न करनेका भाव था; क्योंकि वे अपना कल्याण चाहते थे और युद्धको पाप समझते थे। अतः अर्जुनने समझा कि भगवान् मेरे लिये इस प्रकार कर्मोक्ता स्वरूपसे त्याग करके ज्ञान-प्राप्तिके लिये साधन करनेको कहते हैं।
फिर चौथे अध्यायके ही अड़तीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि उसी तत्त्वज्ञानको साधक कर्मयोगके द्वारा अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें प्राप्त कर लेता है। भाव यह है कि कर्मयोगके साधकको ज्ञान-प्राप्तिके लिये दूसरे साधनोंकी तथा तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर निवास करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इससे स्पष्ट ही तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिमें कर्मयोगकी विशेषरूपसे प्रशंसा हुई है।
इस प्रकार अर्जुनने चौथे अध्यायके तैत्तिरीसर्वे श्लोकमें ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीकी प्रशंसा सुनी और चौंतीसवें श्लोकमें 'विद्धि' पदसे उस प्रणालीसे ज्ञान प्राप्त करनेकी अपने लिये विशेष आज्ञा मानी। फिर अड़तीसवें और इकतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगकी प्रशंसा सुनी। बयालीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको 'योगमातिष्ठोत्तिष्ठ' पदसे कर्मयोगकी विधिसे युद्ध करनेकी आज्ञा दी। इस तरह ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंकी प्रशंसा सुनकर तथा दोनोंके लिये आज्ञा प्राप्त होनेपर अर्जुन यह निर्णय नहीं कर सके कि इन दोनोंमें कौन-सा साधन मेरे लिये श्रेष्ठ है। अतः इसका निर्णय भगवान्से करानेके उद्देश्यसे अर्जुन प्रश्न करते हैं।
अर्जुन उवाच
सन्त्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
अर्जुन बोले—
| कृष्ण | = हे कृष्ण! (आप) | योगम् | = कर्मयोगकी | सुनिश्चितम् | = निश्चितरूपसे |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्मणाम् | = कर्मोक्ता | शंससि | = प्रशंसा करते हैं। | ||
| (अतः) | श्रेयः | = कल्याणकारक | |||
| हो, | |||||
| सन्त्यासम् | = स्वरूपसे त्याग | ||||
| करनेकी | एतयोः | = इन दोनों साधनोंमें | तत् | = उसको | |
| च | = और | यत् | = जो | मे | = मेरे लिये |
| पुनः | = फिर | एकम् | = एक | ब्रूहि | = कहिये। |
३५४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
व्याख्या—‘सन््यासं कर्मणां कृष्ण’— कौटुम्बिक स्नेहके कारण अर्जुनके मनमें युद्ध न करनेका भाव पैदा हो गया था। इसके समर्थनमें अर्जुनने पहले अध्यायमें कई तर्क और युक्तियाँ भी सामने रखीं। उन्होंने युद्ध करनेको पाप बताया (गीता—पहले अध्यायका पैतालीसवाँ श्लोक)। वे युद्ध न करके भिक्षाके अन्तसे जीवन-निर्वाह करनेको श्रेष्ठ समझने लगे (दूसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और उन्होंने निश्चय करके भगवान्से स्पष्ट कह भी दिया कि मैं किसी भी स्थितिमें युद्ध नहीं करूँगा (दूसरे अध्यायका नवाँ श्लोक)।
प्रायः वक्ताके शब्दोंका अर्थ श्रोता अपने विचारके अनुसार लगाया करते हैं। स्वजनोंको देखकर अर्जुनके हृदयमें जो मोह पैदा हुआ, उसके अनुसार उन्हें युद्धरूप कर्मके त्यागकी बात उचित प्रतीत होने लगी। अतः भगवान्के शब्दोंको वे अपने विचारके अनुसार समझ रहे हैं कि भगवान् कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके प्रचलित प्रणालीके अनुसार तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी ही प्रशंसा कर रहे हैं।
‘पुनर्योगं च शंससि’— चौथे अध्यायके अङ्गीतसर्वे श्लोकमें भगवान्ने कर्मयोगीको दूसरे किसी साधनके बिना अवश्यमेव तत्त्वज्ञान प्राप्त होनेकी बात कही है। उसीको लक्ष्य करके अर्जुन भगवान्से कह रहे हैं कि कभी तो आप ज्ञानयोगकी प्रशंसा (चौथे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक) करते हैं और कभी कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं (चौथे अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक)।
‘यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चिततम्’— इसी तरहका प्रश्न अर्जुनने दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें भी ‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे’ पदोंसे किया था। उसके उत्तरमें भगवान्ने दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें-अड़तालीसवें श्लोकोंमें कर्मयोगकी व्याख्या करके उसका आचरण करनेके लिये कहा। फिर तीसरे अध्यायके दूसरे श्लोकमें अर्जुनने ‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्’ पदोंसे पुनः अपने कल्याणकी बात पूछी, जिसके उत्तरमें भगवान्ने तीसरे अध्यायके तीसवें श्लोकमें निष्काम, निर्भय और निःसंतप्त होकर युद्ध करनेकी आज्ञा दी तथा पैँतीसवें श्लोकमें अपने धर्मका पालन करनेको श्रेयस्कर बताया।
यहाँ उपर्युक्त पदोंसे अर्जुनने जो बात पूछी है, उसके उत्तरमें भगवान्ने कहा है कि कर्मयोग श्रेष्ठ है (पाँचवें अध्यायका दूसरा श्लोक), कर्मयोगी सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है (पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक), कर्मयोगके बिना सांख्ययोगका साधन सिद्ध होना कठिन है; परन्तु कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है (पाँचवें अध्यायका छठा श्लोक)। इस प्रकार कहकर भगवान् अर्जुनको मानो यह बता रहे हैं कि कर्मयोग ही तेरे लिये शीघ्रता और सुगमतापूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है; अतः तू कर्मयोगका ही अनुष्ठान कर।
अर्जुनके मनमें मुख्यरूपसे अपने कल्याणकी ही इच्छा थी। इसलिये वे बार-बार भगवान्के सामने श्रेयविषयक जिज्ञासा रखते हैं (दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला श्लोक)। कल्याणकी प्राप्तिमें इच्छाकी प्रधानता है। साधनकी सफलतामें देरीका कारण भी यही है कि कल्याणकी इच्छा पूरी तरह जाग्रत् नहीं हुई। जिन साधकोंमें तीव्र वैराग्य नहीं है, वे भी कल्याणकी इच्छा जाग्रत् होनेपर कर्मयोगका साधन सुगमतापूर्वक कर सकते हैं*। अर्जुनके हृदयमें भोगोंसे पूरा वैराग्य नहीं है, पर उनमें अपने कल्याणकी इच्छा है, इसलिये वे कर्मयोगके अधिकारी हैं।
पहले अध्यायके बत्तीसवें तथा दूसरे अध्यायके आठवें श्लोकको देखनेसे पता लगता है कि अर्जुन मृत्युलोकके राज्यकी तो बात ही क्या है, त्रिलोकिका राज्य भी नहीं चाहते। परन्तु वास्तवमें अर्जुन राज्य तथा भोगोंको सर्वथा नहीं चाहते हों, ऐसी बात भी नहीं है। वे कहते हैं कि युद्धमें कुटुम्बीजनोंको मारकर राज्य तथा विजय नहीं चाहता। इसका तात्पर्य है कि यदि कुटुम्बीजनोंको मारे बिना राज्य मिल जाय तो मैं उसे लेनेको तैयार हूँ। दूसरे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें अर्जुन यही कहते हैं कि गुरुजनोंको मारकर भोग भोगना ठीक नहीं है। इससे यह ध्वनि भी निकलती है कि गुरुजनोंको मारे बिना राज्य मिल जाय तो वह स्वीकार है। दूसरे अध्यायके छठे श्लोकमें अर्जुन कहते हैं कि कौन जीतेगा—इसका हमें पता नहीं और उन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते। इसका तात्पर्य है कि यदि हमारी विजय निश्चित हो तथा उनको मारे बिना राज्य मिलता हो तो मैं
- योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया। .....
..... तेष्ठनिर्विर्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥
( श्रीमद्भा० ११।२०।६-७ )
श्लोक २ ] * साधक-संजीवनी * ३५५
लेनेको तैयार हूँ। आगे दूसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें
भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरे तो दोनों हाथोंमें लड्डू
हैं; यदि युद्धमें तू मारा गया तो तुझे स्वर्ग मिलेगा और जीत
गया तो राज्य मिलेगा। यदि अर्जुनके मनमें स्वर्ग और
संसारके राज्यकी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं होती तो भगवान्
शायद ही ऐसा कहते। अतः अर्जुनके हृदयमें प्रतीत होनेवाला
वैराग्य वास्तविक नहीं है। परन्तु उनमें अपने कल्याणकी
इच्छा है, जो इस श्लोकमें भी दिखायी दे रही है।
सम्बन्ध—अब भगवान् अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥
श्रीभगवान् बोले—
सन्न्यासः = सन्न्यास (सांख्ययोग)
निःश्रेयसकरौ = कल्याण करनेवाले हैं।
कर्मसन्न्यासात् = कर्मसन्न्यास (सांख्य-योग)-से
च = और
तु = परन्तु
कर्मयोगः = कर्मयोग
तयोः = उन दोनोंमें (भी)
कर्मयोगः = कर्मयोग
उभौ = दोनों ही
विशिष्यते = श्रेष्ठ है।
व्याख्या—[ भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार सांख्ययोग
और कर्मयोगका पालन प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय
आदिके मनुष्य कर सकते हैं। कारण कि उनका सिद्धान्त
किसी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिको लेकर नहीं है। इसी
अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्मोंका त्याग करके
विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीको 'कर्मसन्न्यास'
नामसे कहा है। परन्तु भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार ज्ञान-
प्राप्तिके लिये सांख्ययोगका पालन प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्रतासे
कर सकता है और उसका पालन करनेमें कर्मोंका स्वरूपसे
त्याग करनेकी आवश्यकता भी नहीं है। इसलिये भगवान्
प्रचलित मतका भी आदर करते हुए अपने सिद्धान्तके
अनुसार अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।]
'सन्न्यासः'—यहाँ 'सन्न्यासः' पदका अर्थ 'सांख्य-
योग' है, कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं। अर्जुनके प्रश्नका
उत्तर देते हुए भगवान् कर्मोंके त्यागपूर्वक सन्न्यासका
विवेचन न करके कर्म करते हुए ज्ञानको प्राप्त करनेका
जो सांख्ययोगका मार्ग है, उसका विवेचन करते हैं। उस
सांख्ययोगके द्वारा मनुष्य प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय
आदिमें रहते हुए प्रत्येक परिस्थितिमें स्वतन्त्रतापूर्वक ज्ञान
प्राप्त कर सकता है अर्थात् अपना कल्याण कर सकता है।
सांख्ययोगकी साधनामें विवेक-विचारकी मुख्यता रहती
है। विवेकपूर्वक तीव्र वैराग्यके बिना यह साधना सफल
नहीं होती। इस साधनामें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव
होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वपर दृष्टि रहती है। राग मिटे
बिना संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन
है। इसलिये भगवान्ने देहाभिमानियोंके लिये यह साधन
क्लेशयुक्त बताया है (गीता—बारहवें अध्यायका पाँचवाँ
श्लोक)। इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भी भगवान्ने कहा
है कि कर्मयोगका साधन किये बिना सन्न्यासका साधन होना
कठिन है; क्योंकि संसारसे राग हटानेके लिये कर्मयोग ही
सुगम उपाय है।
'कर्मयोगश्च'—मानवमात्रमें कर्म करनेका राग
अनादिकालसे चला आ रहा है, जिसे मिटानेके लिये कर्म
करना आवश्यक है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा
श्लोक)। परन्तु वे कर्म किस भाव और उद्देश्यसे कैसे
किये जायँ कि करनेका राग सर्वथा मिट जाय, उस
कर्तव्य-कर्मको करनेकी कलाको 'कर्मयोग' कहते हैं।
कर्मयोगमें कार्य छोटा है या बड़ा, इसपर दृष्टि नहीं रहती।
जो भी कर्तव्य-कर्म सामने आ जाय, उसीको निष्कामभावसे
दूसरोंके हितके लिये करना है। कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद
करनेके लिये यह आवश्यक है कि कर्म अपने लिये न
किये जायँ। अपने लिये कर्म न करनेका अर्थ है—कर्मोंके
बदलेमें अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा न होना।
जबतक अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा रहती है,
तबतक कर्मोंके साथ सम्बन्ध बना रहता है।
'निःश्रेयसकरावुभौ'—अर्जुनका प्रश्न था कि
सांख्ययोग और कर्मयोग—इन दोनों साधनोंमें कौन-सा
साधन निश्चयपूर्वक कल्याण करनेवाला है? उत्तरमें
३५६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! ये दोनों ही साधन निश्चयपूर्वक कल्याण करनेवाले हैं। कारण कि दोनोंके द्वारा एक ही समताकी प्राप्ति होती है। इसी अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें भी भगवान्ने इसी बातकी पुष्टि की है। तेरहवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनोंसे परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेकी बात कही है। इसलिये ये दोनों ही परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक)।
‘तयोस्तु कर्मसन््यासात्’—एक ही सांख्ययोगके दो भेद हैं—एक तो चौथे अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें कहा हुआ सांख्ययोग, जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग है और दूसरा, दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक कहा हुआ सांख्ययोग, जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं है। यहाँ ‘कर्मसन््यासात्’ पद दोनों ही प्रकारके सांख्ययोगका वाचक है।
‘कर्मयोगो विशिष्यते’—आगेके (तीसरे) श्लोकमें भगवान्ने इन पदोंकी व्याख्या करते हुए कहा है कि कर्मयोगी नित्यसन््यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि वह सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। फिर छठे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कर्मयोगके बिना सांख्य-योगका साधन होना कठिन है तथा कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें तो कर्मयोगकी आवश्यकता है, पर कर्मयोगमें सांख्ययोगकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये दोनों साधनोंके कल्याण-कारक होनेपर भी भगवान् कर्मयोगको ही श्रेष्ठ बताते हैं।
कर्मयोगी लोकसंग्रहके लिये कर्म करता है—‘लोक-सङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुर्महंसि’ (गीता—तीसरे अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। लोकसंग्रहका तात्पर्य है—निःस्वार्थभावसे लोक-मर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये, लोगोंको उन्मागसे हटाकर सन्मागमें लगानेके लिये कर्म करना अर्थात् केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। इसीको गीतामें ‘यज्ञार्थ कर्म’ के नामसे भी कहा गया है। जो केवल अपने लिये कर्म करता है, वह बंध जाता है (तीसरे अध्यायका नवाँ और तेरहवाँ श्लोक)। परन्तु कर्मयोगी निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है; अतः वह कर्मबन्धनसे सुगमतापूर्वक मुक्त हो जाता है (चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। इसलिये कर्मयोग श्रेष्ठ है। कर्मयोगका साधन प्रत्येक परिस्थितिमें और प्रत्येक व्यक्तिके द्वारा किया जा सकता है, चाहे वह किसी भी
वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो। परन्तु अर्जुन जिस कर्मसन््यासकी बात कहते हैं, वह एक विशेष परिस्थितिमें किया जा सकता है (गीता—चौथे अध्यायका चौतीसवाँ श्लोक); क्योंकि तत्त्वज्ञ महापुरुषका मिलना, उनमें अपनी श्रद्धा होना और उनके पास जाकर निवास करना—ऐसी परिस्थिति हरेक मनुष्यको प्राप्त होनी सम्भव नहीं है। अतः प्रचलित प्रणालीके सांख्ययोगका साधन एक विशेष परिस्थितिमें ही साध्य है, जबकि कर्मयोगका साधन प्रत्येक परिस्थितिमें और प्रत्येक व्यक्तिके लिये साध्य है। इसलिये कर्मयोग श्रेष्ठ है।
प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करना कर्मयोग है। युद्ध-जैसी घोर परिस्थितिमें भी कर्मयोगका पालन किया जा सकता है। कर्मयोगका पालन करनेमें कोई भी मनुष्य किसी भी परिस्थितिमें असमर्थ और पराधीन नहीं है; क्योंकि कर्मयोगमें कुछ भी पानेकी इच्छाका त्याग होता है। कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छा रहनेसे ही कर्तव्य-कर्म करनेमें असमर्थता और पराधीनताका अनुभव होता है।
कर्तृत्व-भोक्तृत्व ही संसार है। सांख्ययोगी और कर्मयोगी—इन दोनोंको ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करना है, इसलिये दोनों ही साधकोंको कर्तृत्व और भोक्तृत्व—इन दोनोंको मिटानेकी आवश्यकता है। तीव्र वैराग्य और तीक्ष्ण बुद्धि होनेसे सांख्ययोगी कर्तृत्वको मिटाता है। उतना तीव्र वैराग्य और तीक्ष्ण बुद्धि न होनेसे कर्मयोगी दूसरोंके हितके लिये ही सब कर्म करके भोक्तृत्वको मिटाता है। इस प्रकार सांख्ययोगी कर्तृत्वका त्याग करके संसारसे मुक्त होता है और कर्मयोगी भोक्तृत्वका अर्थात् कुछ पानेकी इच्छाका त्याग करके मुक्त होता है। यह नियम है कि कर्तृत्वका त्याग करनेसे भोक्तृत्वका त्याग और भोक्तृत्वका त्याग करनेसे कर्तृत्वका त्याग स्वतः हो जाता है। कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छासे ही कर्तृत्व होता है। जिस कर्मसे अपने लिये किसी प्रकारके भी सुखभोगकी इच्छा नहीं है, वह क्रियामात्र है, कर्म नहीं। जैसे यन्त्रमें कर्तृत्व नहीं रहता, ऐसे ही कर्मयोगीमें कर्तृत्व नहीं रहता।
साधकको संसारके प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिमें स्पष्ट ही अपना राग दीखता है। उस रागको वह अपने बन्धनका खास कारण मानता है तथा उसे मिटानेकी चेष्टा भी करता है। उस रागको मिटानेके लिये कर्मयोगी किसी भी प्राणी, पदार्थ आदिको अपना नहीं मानता*, अपने लिये
- कर्मयोगी सेवा करनेके लिये तो सबको अपना मानता है, पर अपने लिये किसीको भी अपना नहीं मानता।
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
३५७
कुछ नहीं करता तथा अपने लिये कुछ नहीं चाहता। क्रियाओंसे सुख लेनेका भाव न रहनेसे कर्मयोगीकी क्रियाएँ परिणाममें सबका हित तथा वर्तमानमें सबकी प्रसन्नता और सुखके लिये ही हो जाती हैं। क्रियाओंसे सुख लेनेका भाव होनेसे क्रियाओंमें अभिमान (कर्तृत्व) और ममता हो जाती है। परन्तु उनसे सुख लेनेका भाव सर्वथा न रहनेसे कर्तृत्व समाप्त हो जाता है। कारण कि क्रियाएँ दोषी नहीं हैं, क्रियाजन्य आसक्ति और क्रियाओंके फलको चाहना ही दोषी है। जब साधक क्रियाजन्य सुख नहीं लेता तथा क्रियाओंका फल नहीं चाहता तब कर्तृत्व रह ही कैसे सकता है? क्योंकि कर्तृत्व टिकता है भोक्तृत्वपर। भोक्तृत्व न रहनेसे कर्तृत्व अपने उद्देश्यमें (जिसके लिये कर्म करता है, उसमें) लीन हो जाता है और एक परमात्मतत्त्व शेष रह जाता है। कर्मयोगीका 'अहम्' (व्यक्तित्व) शीघ्र तथा सुगमता-पूर्वक नष्ट हो जाता है, जबकि ज्ञानयोगीका 'अहम्' दूरतक साथ रहता है। कारण यह है कि 'मैं सेवक हूँ' (केवल सेव्यके लिये सेवक हूँ, अपने लिये नहीं)—ऐसा माननेसे कर्मयोगीका 'अहम्' भी सेव्यकी सेवामें लग जाता है; परन्तु 'मैं मुमुक्षु हूँ' ऐसा माननेसे ज्ञानयोगीका 'अहम्' साथ रहता है। कर्मयोगी अपने लिये कुछ न करके केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करता है, पर ज्ञानयोगी अपने हितके लिये साधन करता है। अपने हितके लिये साधन करनेसे 'अहम्' ज्यों-का-त्यों बना रहता है।
ज्ञानयोगकी मुख्य बात है—संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव करना और कर्मयोगकी मुख्य बात है—रागका अभाव करना। ज्ञानयोगी विचारके द्वारा संसारकी सत्ताका अभाव तो करना चाहता है, पर पदार्थोंमें राग रहते हुए उसकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन है। यद्यपि विचारकालमें ज्ञानयोगके साधकको पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव दीखता है, तथापि व्यवहारकालमें उन पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ता प्रतीत होने लगती है। परन्तु कर्मयोगके साधकका लक्ष्य दूसरोंको सुख पहुँचानेका रहनेसे उसका राग स्वतः मिट जाता है। इसके अतिरिक्त मिली हुई सामग्रीका त्याग करना कर्मयोगीके लिये जितना सुगम पड़ता है, उतना ज्ञानयोगीके लिये नहीं। ज्ञानयोगकी
दृष्टिसे किसी वस्तुको मायामात्र समझकर ऐसे ही उसका त्याग कर देना कठिन पड़ता है; परन्तु वही वस्तु किसीके काम आती हुई दिखायी दे तो उसका त्याग करना सुगम पड़ता है। जैसे, हमारे पास कम्बल पड़े हैं तो उन कम्बलोंको दूसरोंके काममें आते जानकर उनका त्याग करना अर्थात् उनसे अपना राग हटाना साधारण बात है; परन्तु (यदि तीव्र वैराग्य न हो तो) उन्हीं कम्बलोंको विचारद्वारा अनित्य, क्षणभंगुर, स्वप्नके मायामय पदार्थ समझकर ऐसे ही छोड़कर चल देना कठिन है। दूसरी बात, मायामात्र समझकर त्याग करनेमें (यदि तेजीका वैराग्य न हो तो) जिन वस्तुओंमें हमारी सुखबुद्धि नहीं है, उन खराब वस्तुओंका त्याग तो सुगमतासे हो जाता है, पर जिनमें हमारी सुखबुद्धि है, उन अच्छी वस्तुओंका त्याग कठिनतासे होता है। परन्तु दूसरेके काम आती देखकर जिन वस्तुओंमें हमारी सुखबुद्धि है, उन वस्तुओंका त्याग सुगमतासे हो जाता है; जैसे—भोजनके समय थालीमेंसे रोटी निकालनी पड़े तो ठंडी, बासी और रूखी रोटी ही निकालेंगे। परन्तु यदि वही रोटी किसी दूसरेको देनी हो तो अच्छी रोटी ही निकालेंगे, खराब नहीं। इसलिये कर्मयोगकी प्रणालीसे रागको मिटाये बिना सांख्ययोगका साधन होना बहुत कठिन है। विचारद्वारा पदार्थोंकी सत्ता न मानते हुए भी पदार्थोंमें स्वाभाविक राग रहनेके कारण भोगोंमें फँसकर पतनतक होनेकी सम्भावना रहती है।
केवल असत्के ज्ञानसे अर्थात् असत्को असत् जान लेनेसे रागकी निवृत्ति नहीं होती*। जैसे, सिनेमामें दीखनेवाले पदार्थों आदिकी सत्ता नहीं है—ऐसा जानते हुए भी उसमें राग हो जाता है। सिनेमा देखनेसे चरित्र, समय, नेत्र-शक्ति और धन—इन चारोंका नाश होता है—ऐसा जानते हुए भी रागके कारण सिनेमा देखते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वस्तुकी सत्ता न होनेपर भी उसमें राग अथवा सम्बन्ध रह सकता है। यदि राग न हो तो वस्तुकी सत्ता माननेपर भी उसमें राग उत्पन्न नहीं होता। इसलिये साधकका मुख्य काम होना चाहिये—रागका अभाव करना, सत्ताका अभाव करना नहीं; क्योंकि बाँधनेवाली वस्तु राग या सम्बन्ध ही है, सत्तामात्र नहीं। पदार्थ चाहे सत् हो,
- असत्को असत् जाननेसे उसकी निवृत्ति तभी होती है, जब अपने स्वरूपमें स्थित होकर असत्को असत् रूपसे जानते हैं। स्वरूपमें स्थिति करण-निरपेक्ष है। परन्तु बुद्धि आदि करणोंसे असत्को असत् जाननेसे उसकी निवृत्ति नहीं होती; क्योंकि बुद्धि आदि करण भी असत् हैं। अतः असत्के ही द्वारा असत्को जाननेसे उसकी निवृत्ति कैसे हो सकती है?
३५८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
चाहे असत् हो, चाहे सत्-असत्से विलक्षण हो, यदि उसमें भी पदार्थ नहीं बाँधता। बाँधता है हमारा सम्बन्ध, जो रागसे राग है तो वह बाँधनेवाला हो ही जायगा। वास्तवमें हमें कोई होता है। अतः हमारेपर राग मिटानेकी ही जिम्मेवारी है।
परिशिष्ट भाव —यद्यपि 'योग' के बिना कर्म और ज्ञान—दोनों ही बन्धनकारक हैं, तथापि कर्म करनेसे उतना पतन नहीं होता, जितना पतन वाचिक (सीखे हुए) ज्ञानसे होता है। वाचिक ज्ञान नरकोंमें ले जा सकता है— अज्ञस्यार्थप्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मिति यो वदेत्। महानिरयजालेषु स तेन विनियोजितः ॥
(योगवासिष्ठ, स्थिति० ३९१)
'जो बेसमझ मनुष्यको 'सब कुछ ब्रह्म है' ऐसा उपदेश देता है, वह उस मनुष्यको महान् नरकोंके जालमें डाल देता है।'
अतः वाचक ज्ञानीकी अपेक्षा कर्म करनेवाला श्रेष्ठ है। फिर जो कर्मयोगका आचरण करता है, उसकी श्रेष्ठताका तो कहना ही क्या! ज्ञानयोगी तो केवल अपने लिये उपयोगी होता है, पर कर्मयोगी संसारमात्रके लिये उपयोगी होता है। जो संसारके लिये उपयोगी होता है, वह अपने लिये भी उपयोगी हो जाता है—यह नियम है। इसलिये कर्मयोग विशेष है।
सांख्ययोगके बिना तो कर्मयोग हो सकता है, पर कर्मयोगके बिना सांख्ययोग होना कठिन है (गीता—पाँचवें अध्यायका छठा श्लोक)। इसलिये सांख्ययोगकी अपेक्षा कर्मयोग विशेष है। सांख्ययोगसे कर्मयोग श्रेष्ठ है और कर्मयोगसे भक्तियोग श्रेष्ठ है (गीता—छठे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक)। इसलिये गीतामें पहले सांख्ययोग, फिर कर्मयोग और फिर भक्तियोग—इस क्रमसे विवेचन किया गया है*।
फलमें कर्मयोग और ज्ञानयोग एक हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। साधनमें कर्मयोग और भक्तियोग एक हैं—'मैत्रः करुण एव च ' (गीता १२।१३); क्योंकि कर्मयोग और भक्तियोग—दोनोंमें ही दूसरेको सुख देनेका भाव रहता है। कर्म करनेमें कर्मी और कर्मयोगी एक हैं (गीता—तीसरे अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) तथा तत्त्वज्ञ महापुरुष और भगवान् भी कर्म करनेमें साथ हैं (गीता—तीसरे अध्यायके बाईसवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक)। इस प्रकार कर्मी, ज्ञानयोगी, भक्तियोगी और भगवान्—चारोंके साथ कर्मयोगी एक हो जाता है—यह कर्मयोगकी विशेषता है।
सांख्ययोगमें तो अहम्का सूक्ष्म संस्कार रह सकता है, पर कर्मयोगमें क्रिया और पदार्थसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे अहम्का सूक्ष्म संस्कार भी नहीं रहता। कर्मयोगमें अकर्म (अभाव) शेष रहता है (गीता—चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक) और सांख्ययोगमें आत्मा शेष रहता है (गीता—छठे अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—अब भगवान् कर्मयोगको श्रेष्ठ कहनेका कारण बताते हैं।
ज्ञेयः स नित्यसन््यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
| महाबाहो | = हे महाबाहो! | काङ्क्षति | = आकांक्षा करता है; | निर्द्वन्द्वः | = द्वन्द्वोंसे रहित (मनुष्य) |
|---|---|---|---|---|---|
| यः | = जो मनुष्य | सः | = वह (कर्मयोगी) | सुखम् | = सुखपूर्वक |
| न | = न | नित्यसन््यासी | = सदा सन््यासी | बन्धात् | = संसार-बन्धनसे |
| द्वेष्टि | = (किसीसे) द्वेष करता है (और) | ज्ञेयः | = समझनेयोग्य है; | प्रमुच्यते | = मुक्त हो जाता है। |
| न | = न (किसीकी) | हि | = क्योंकि |
- भागवतमें भी यही क्रम है—
योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधितस्या। ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ११।२०।६)
'अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योग-मार्ग बताये हैं—ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग। इन तीनोंके सिवाय दूसरा कोई कल्याणका मार्ग नहीं है।'
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
३५९
व्याख्या—‘महाबाहो’—‘महाबाहो’ सम्बोधनके दो अर्थ होते हैं—एक तो जिसकी भुजाएँ बड़ी और बलवान् हों अर्थात् जो शूरवीर हो; और दूसरा, जिसके मित्र तथा भाई बड़े पुरुष हों। अर्जुनके मित्र थे प्राणिमात्रके सुहृद् भगवान् श्रीकृष्ण और भाई थे अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर। इसलिये यह सम्बोधन देकर भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि कर्मयोगके अनुसार सबकी सेवा करनेका बल तुम्हारेमें है। अतः तुम सुगमतासे कर्मयोगका पालन कर सकते हो।
‘यो न द्वेष्टि’ —कर्मयोगी वह होता है, जो किसी भी प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति, सिद्धान्त आदिसे द्वेष नहीं करता। कर्मयोगीका काम है सबकी सेवा करना, सबको सुख पहुँचाना। यदि उसका किसीके भी साथ किंचिन्मात्र भी द्वेष होगा तो उसके द्वारा कर्मयोगका आचरण सांगोपांग नहीं हो सकेगा। अतः जिससे कुछ भी द्वेष हो, उसकी सेवा कर्मयोगीको सर्वप्रथम करनी चाहिये।
सबसे पहले ‘न द्वेष्टि’ पद देनेका तात्पर्य यह है कि जो किसीको भी बुरा समझता है और किसीका भी बुरा चाहता है, वह कर्मयोगके तत्त्वको समझ ही नहीं सकता।
मार्मिक बात
प्राणिमात्रके हितके उद्देश्यसे कर्मयोगीके लिये बुराईका त्याग करना जितना आवश्यक है, उतना भलाई करना आवश्यक नहीं है। भलाई करनेसे केवल समाजका हित होता है; परन्तु बुराईरहित होनेसे विश्वमात्रका हित होता है। कारण यह है कि भलाई करनेमें सीमित क्रियाओं और पदार्थोंकी प्रधानता रहती है; परन्तु बुराईरहित होनेमें भीतरका असीम भाव प्रधान रहता है। यदि भीतरसे बुरा भाव दूर न हुआ हो और बाहरसे भलाई करें तो इससे अभिमान पैदा होगा, जो आसुरी सम्पत्तिका मूल है। भलाई करनेका अभिमान तभी पैदा होता है, जब भीतर कुछ-न-कुछ बुराई हो। जहाँ अपूर्णता (कमी) होती है, वहीं अभिमान पैदा होता है। परन्तु जहाँ पूर्णता है, वहाँ अभिमानका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।
गहराईसे देखा जाय तो नाशवान् वस्तुओंकी सहायताके बिना भलाई नहीं की जा सकती। जिन वस्तुओंसे हम भलाई करते हैं, वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं; प्रत्युत उन्हींकी हैं, जिनकी हम भलाई करते हैं। फिर भी यदि भलाईका अभिमान होता है, तो यह नाशवान्का संग है। जबतक नाशवान्का संग है, तबतक ‘योग’की सिद्धि नहीं होती।
मैंने भलाई की—यह अभिमान बुराईसे भी अधिक भयंकर है; क्योंकि यह भाव मैं-पनमें बैठ जाता है। कर्म और फल तो मिट जाते हैं, पर जबतक मैं-पन रहता है, तबतक मैं-पनमें बैठता हुआ भलाईका अभिमान नहीं मिटता। दूसरी बात, बुराईको तो हम बुराईरूपसे जानते ही हैं, पर भलाईको बुराईरूपसे नहीं जानते। इसलिये भलाईके अभिमानका त्याग करना बहुत कठिन है; जैसे—लोहेकी हथकड़ीका तो त्याग कर सकते हैं; पर सोनेकी हथकड़ीका त्याग नहीं कर सकते; क्योंकि वह गहनारूपसे दीखती है। इसलिये बुराईरहित होकर ही भलाई करनी चाहिये। वास्तवमें बुराईका त्याग होनेपर विश्वमात्रकी भलाई अपने-आप होती है, करनी नहीं पड़ती। इसलिये बुराईरहित महापुरुष अगर हिमालयकी एकान्त गुफामें भी बैठता हो, तो भी उसके द्वारा विश्वका बहुत हित होता है।
‘न काङ्क्षति’ —कर्मयोगमें कामनाका त्याग मुख्य है। कर्मयोगी किसी भी प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिकी कामना नहीं करता। कामना-त्याग और परहितमें परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। निष्काम होनेके लिये दूसरेका हित करना आवश्यक है। दूसरेका हित करनेसे कामनाके त्यागका बल आता है।
कर्मयोगमें कर्ता निष्काम होता है, कर्म नहीं; क्योंकि जड़ होनेके कारण कर्म स्वयं निष्काम या सकाम नहीं हो सकते। कर्म कर्ताके अधीन होते हैं, इसलिये कर्माँकी अभिव्यक्ति कर्तासे ही होती है। निष्काम कर्ताके द्वारा ही निष्काम-कर्म होते हैं, जिसे कर्मयोग कहते हैं। अतः चाहे ‘कर्मयोग’ कहें या ‘निष्काम-कर्म’—दोनोंका अर्थ एक ही होता है। सकाम कर्मयोग होता ही नहीं। निष्काम होनेसे कर्ता कर्मफलसे असंग रहता है; परन्तु जब कर्तामें सकामभाव आ जाता है, तब वह कर्मफलसे बँध जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। सकामभाव तभी नष्ट होता है, जब कर्ता कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता, प्रत्युत सम्पूर्ण कर्म दूसरोंके हितके लिये ही करता है। इसलिये कर्ताका भाव नित्य-निरन्तर निष्काम रहना चाहिये। कर्तामें जितना निष्कामभाव होगा, उतना ही कर्मयोगका सही आचरण होगा। कर्ताके सर्वथा निष्काम होनेपर कर्मयोग सिद्ध हो जाता है।
‘ज्ञेयः स नित्यसन््यासी’ —अर्जुनने युद्ध न करके भिक्षा माँगकर जीवन-निर्वाह करनेकी इच्छा प्रकट की
३६०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
थी—‘गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भेक्ष्यमपीह लोके’ (गीता २।५) अर्थात् गुरुजनोंको न मारकर संन्यास लेना ही श्रेष्ठ है। भगवान् उसी बातका उत्तर देते हुए मानो कह रहे हैं कि हे अर्जुन! वह संन्यास तो गुरुजनोंके मर जानेके भयसे किया जानेवाला बाहरी संन्यास है, पर कर्मयोगीका संन्यास राग-द्वेषके त्यागसे होनेवाला नित्य संन्यास अर्थात् भीतरी एवं सच्चा संन्यास है। आगे छठे अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने केवल अग्निका त्याग करनेवाले अर्थात् संन्यास-आश्रममात्र ग्रहण करनेवाले पुरुषको संन्यासी न कहकर भीतरसे संसारके आश्रयका त्याग करनेवाले कर्मयोगीको ही संन्यासी कहा है। इस प्रकार भगवान्के मतमें कर्मयोगी ही वास्तविक संन्यासी है।
कर्म करते हुए भी कर्मोंसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रखना ही संन्यास है। कर्मोंसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रखनेवालेको कर्मिका फल कभी किसी अवस्थामें किंचिमात्र भी नहीं मिलता—‘न तु सन्यासिनां क्वचित्’ (गीता १८।१२)। इसलिये शास्त्र-विहित समस्त कर्म करते हुए भी कर्मयोगी सदा संन्यासी ही है।
कर्मयोगका अनुष्ठान किये बिना सांख्ययोगका पालन करना कठिन है। इसलिये सांख्ययोगका साधक पहले कर्मयोगी होता है, फिर संन्यासी (सांख्ययोगी) होता है। परन्तु कर्मयोगके साधकके लिये सांख्ययोगका अनुष्ठान करना आवश्यक नहीं है। इसलिये कर्मयोगी आरम्भसे ही संन्यासी है।
जिसके राग-द्वेषका अभाव हो गया है, उसे संन्यास-आश्रममें जानेकी आवश्यकता नहीं है। कोई भी व्यक्ति, वस्तु, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि अपनी नहीं है और अपने लिये भी नहीं है—ऐसा निश्चय होनेके बाद राग-द्वेष मिटकर ऐसा ही यथार्थ अनुभव हो जाता है, फिर व्यवहारमें संसारसे सम्बन्ध दीखनेपर भी भीतरसे (राग-द्वेष न रहनेसे) सम्बन्ध होता ही नहीं। यही ‘नित्यसंन्यास’ है। लौकिक अथवा पारलौकिक प्रत्येक कार्य करते समय कर्मयोगीका संसारसे सर्वथा संन्यास रहता है, इसलिये वह नित्यसंन्यासी ही समझनेयोग्य है।
संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद अर्थात् लिप्तताका अभाव ही संन्यास है और कर्मयोगीमें राग-द्वेष न रहनेसे संसारसे लिप्तता रहती ही नहीं। अतः कर्मयोगी नित्यसंन्यासी है।
‘निर्द्वन्द्वो हि .....सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’*—साधनाके आरम्भमें साधकके अन्तःकरणमें द्वन्द्व रहता है। सत्संग, स्वाध्याय, विचार आदि करनेसे वह परमात्मप्राप्तिको अपना ध्येय तो मान लेता है, पर उसके अपने कहलानेवाले मन, इन्द्रियों आदिकी रुचि स्वाभाविक ही भोग भोगने तथा संग्रह करनेमें रहती है। इसलिये साधक कभी परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करना चाहता है और कभी भोग एवं संग्रहको। उसे जैसा संग मिलता है, उसीके अनुसार उसके भावोंमें परिवर्तन होता रहता है। ऐसा होनेपर भी वह भोगोंको शान्तिसे नहीं भोग सकता; क्योंकि सत्संग आदिके संस्कार उसके अन्तःकरणमें वैराग्य (भोगोंसे अरुचि) पैदा करते रहते हैं। इस प्रकार साधकके अन्तःकरणमें द्वन्द्व (भोग भोग्ने या साधन कर्ने) चलता रहता है। इस द्वन्द्वपर ही अहंभाव टिका हुआ है। हमें सांसारिक भोग और संग्रहमें लगना ही नहीं है, प्रत्युत एकमात्र परमात्मतत्त्वको ही प्राप्त करना है—ऐसा दृढ़ निश्चय होनेपर द्वन्द्व नहीं रहता और अहंभाव परमात्मतत्त्वमें लीन हो जाता है।
वास्तवमें संसारका महत्त्व अन्तःकरणमें अंकित हो जानेसे ही द्वन्द्व रहता है। भोग भोगते रहनेसे, दूसरोंसे सुख चाहते रहनेसे संसारके प्राणी-पदार्थोंका महत्त्व अन्तःकरणमें अंकित हो जाता है। उनसे सुख लेनेसे वह महत्त्व बढ़ता जाता है, जिससे उनको प्राप्त करनेकी रुचि प्रबल हो जाती है। वह रुचि एक परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको स्थायी और दृढ़ नहीं होने देती। इससे साधकमें द्वन्द्व बना रहता है। उद्देश्यकी दृढ़ताके लिये साधकको यह पक्का विचार करना चाहिये कि कितना ही सुख, आराम, भोग क्यों न मिल जाय, मुझे उसे लेना ही नहीं है, प्रत्युत परहितके लिये उसका त्याग करना है। यह विचार जितना दृढ़ होगा, उतना ही साधक निर्द्वन्द्व होगा।
निर्द्वन्द्व होनेकी मुख्य बात इसी श्लोकमें ‘न द्वेष्टि न काङ्क्षति’ पदोंसे कही गयी है; जिसका तात्पर्य है—राग-द्वेषसे रहित होना। राग-द्वेषको मिटानेके लिये यह विचार
- गीतामें आये ‘कर्मबन्धं प्रहास्यसि’ (२।३९); ‘त्रायते महतो भयात्’ (२।४०); ‘जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते’ (२।५०); ‘मोक्ष्यसेजुभात्’ (४।१६, १।१); ‘वृजिनं संतरिष्यसि’ (४।३६); नाप्नुवन्ति दुःखालयमशाश्वतम्’ (८।१५); ‘शुभाशुभफलैरैवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः’ (१।२८); ‘मृत्युसंसारसागरात् समुद्भर्ता भवामि’ (१२।७) आदि पद यहाँ आये ‘बन्धात् प्रमुच्यते’ पदोंके ही पर्यायवाची हैं।
श्लोक ४ ]
- साधक-संजीवनी *
३६१
करना चाहिये कि अपने न चाहनेपर भी अनुकूलता और प्रतिकूलता आती ही है अर्थात् अपने चाहनेपर अनुकूलता आती हो—ऐसी बात नहीं है और न चाहनेपर प्रतिकूलता न आती हो—ऐसी बात भी नहीं है। अनुकूलता-प्रतिकूलता तो प्रारब्धके फलस्वरूप आती-जाती रहती है, फिर इसके आने अथवा जानेकी चाहना क्यों करें? अनुकूलताके प्रति राग और प्रतिकूलताके प्रति द्वेष अपनी भूलसे होता है। इस प्रकार विचार करनेसे भूल मिटकर राग-द्वेष सर्वथा समाप्त हो जाते हैं।
दूसरी बात यह है कि अपनी (स्वयंकी) सत्ता स्वतन्त्र है, किसी पदार्थ, व्यक्ति, क्रियाके अधीन नहीं है; क्योंकि सुषुप्ति-अवस्थामें जब हम संसारको भूल जाते हैं, तब भी अपनी सत्ता बनी रहती है; जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थामें भी हम प्राणी, पदार्थके बिना रह सकते हैं। फिर (अपनी स्वतन्त्र सत्ता होते हुए भी) उनमें राग-द्वेष करके हम उनके अधीन क्यों बनें? इस प्रकार विचार करनेसे भी राग-द्वेष मिट जाते हैं।
संसारका राग उत्पन्न और नष्ट होनेवाला है। यह राग कभी स्थायी नहीं रहता; किन्तु हम नये-नये प्राणी, पदार्थमें राग करके इसे बनाये रखनेकी चेष्टा करते हैं। परन्तु परमात्माकी अभिलाषा उत्पन्न और नष्ट होनेवाली नहीं है; क्योंकि परमात्माका ही अंश होनेके नाते जीवका परमात्मासे अखण्ड सम्बन्ध है। परमात्माकी अभिलाषा कभी घटती-बढ़ती भी नहीं। केवल संसारमें राग अधिक होनेपर वह
परिशिष्ट भाव— बाहरके सुख-दुःख (सुखदायी-दुःखदायी परिस्थिति)-में सम और भीतरके सुख-दुःखसे रहित होना 'निर्द्वन्द्व' अर्थात् द्वन्द्वरहित होना है।
तादात्म्यमें चेतन-अंशकी मुख्यतासे 'जिज्ञासा' रहती है और जड़-अंशकी मुख्यतासे 'कामना' रहती है। मनुष्यमें भूख तो अविनाशी-तत्त्वकी रहती है, पर रुचि नाशवान्की रहती है; क्योंकि अविनाशीकी भूखको वह नाशवान्के द्वारा मिटाना चाहता है। भूख और रुचिका यह द्वन्द्व मनुष्यके संसार-बन्धनको दृढ़ करता है। जब मनुष्यका संसारमें राग-द्वेष नहीं रहता, तब उसकी जिज्ञासा पूर्ण हो जाती है और कामना मिट जाती है अर्थात् वह निर्द्वन्द्व हो जाता है।
सम्बन्ध— इस अध्यायके दूसरे श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंको परम कल्याण करनेवाले बताया। उसकी व्याख्या अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यग्भुभ्योर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥
- एतावानेव योगेन समग्रेणेह योगिनः । युज्यतेऽभिमतो ह्यर्थो यदसंगस्तु कृतन्शः ॥
( श्रीमद्भा० ३।३२।२७ )
'योगियोंके समस्त योग-साधनोंका एकमात्र अभीष्ट फल है—सम्पूर्ण संसारमें आसक्तिका अभाव हो जाना।'
३६२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
| बालाः | = बेसमझ लोग | न | = न कि | सम्यक् | = अच्छी तरहसे |
|---|---|---|---|---|---|
| साङ्ख्ययोगी | = सांख्ययोग और | ||||
| कर्मयोगको | पण्डिताः | = पण्डितजन; | |||
| (क्योंकि) | आस्थितः | = स्थित (मनुष्य) | |||
| पृथक् | = अलग-अलग | ||||
| (फलवाले) | एकम् | = (इन दोनोंमेंसे) | |||
| एक साधनमें | उभयोः | = दोनोंके | |||
| प्रवदन्ति | = कहते हैं, | अपि | = भी | फलम् | = फलरूप |
| (परमात्माको) | |||||
| विन्दते | = प्राप्त कर लेता है। |
व्याख्या —‘साङ्ख्ययोगी पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः’—इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्माका स्वरूपसे त्याग करके तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करनेके साधनको ‘कर्मसंन्यास’ नामसे कहा है। भगवान्ने भी दूसरे श्लोकमें अपने सिद्धान्तकी मुख्यता रखते हुए उसे ‘संन्यास’ और ‘कर्मसंन्यास’ नामसे कहा है। अब उस साधनको भगवान् यहाँ ‘सांख्य’ नामसे कहते हैं। भगवान् शरीर-शरीरीके भेदका विचार करके स्वरूपमें स्थित होनेको ‘सांख्य’ कहते हैं। भगवान्के मतमें ‘संन्यास’ और ‘सांख्य’ पर्यायवाची हैं, जिसमें कर्माका स्वरूपसे त्याग करनेकी आवश्यकता नहीं है।
अर्जुन जिसे ‘कर्मसंन्यास’ नामसे कह रहे हैं, वह भी निःसन्देह भगवान्के द्वारा कहे ‘सांख्य’ का ही एक अवान्तर भेद है। कारण कि गुरुसे सुनकर भी साधक शरीर-शरीरीके भेदका ही विचार करता है।
‘बालाः’ पदसे भगवान् यह कहते हैं कि आयु और बुद्धिमें बड़े होकर भी जो सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले मानते हैं, वे बालक अर्थात् बेसमझ ही हैं।
परिशिष्ट भाव —जो अन्य शास्त्रीय बातोंको तो जानता है, पर सांख्ययोग और कर्मयोगके तत्त्वको गहराईसे नहीं जानता, वह वास्तवमें बालक अर्थात् बेसमझ है।
गीताभरमें अविनाशी तत्त्वके लिये ‘फल’ शब्द इसी श्लोकमें आया है। ‘फल’ शब्दका अर्थ है—परिणाम। कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों साधनोंसे प्राप्त होनेवाले तत्त्वको ‘फल’ कहनेका तात्पर्य है कि इन दोनों साधनोंमें मनुष्यका अपना उद्योग मुख्य है। ज्ञानयोगमें विवेकरूप उद्योग मुख्य है और कर्मयोगमें परहितकी क्रियारूप उद्योग मुख्य है। साधकका अपना उद्योग, परिश्रम सफल हो गया, इसलिये इसको ‘फल’ कहा गया है। यह फल नष्ट होनेवाला नहीं है। कर्मयोग तथा ज्ञानयोग—दोनोंका फल आत्मज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान है।
कर्तव्य-कर्म करना कर्मयोग है और कुछ न करना ज्ञानयोग है। कुछ न करनेसे जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती है, उसी तत्त्वकी प्राप्ति कर्तव्य-कर्म करनेसे हो जाती है। ‘करना’ और ‘न करना’ तो साधन हैं और इनसे जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती है, वह साध्य है।
**यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥**
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
३६३
| साङ्ख्यैः | = सांख्ययोगियोंके | द्वारा | च | = और |
|---|---|---|---|---|
| यत् | = जो | अपि | योगम् | = कर्मयोगको |
| (फलरूपमें) | ||||
| स्थानम् | = तत्त्व | तत् | एकम् | = एक |
| प्राप्यते | = प्राप्त किया जाता | गम्यते | पश्यति | = देखता है, |
| है, | यः | सः, च | = वही (ठीक) | |
| योगैः | = कर्मयोगियोंके | साङ्ख्यम् | पश्यति | = देखता है। |
व्याख्या—'यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते' —पूर्वश्लोकके उत्तरार्धमें भगवान्ने कहा था कि एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित होकर मनुष्य दोनों साधनोंके फलरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है। उसी बातकी पुष्टि भगवान् उपर्युक्त पदोंमें दूसरे ढंगसे कर रहे हैं कि जो तत्त्व सांख्ययोगी प्राप्त करते हैं, वही तत्त्व कर्मयोगी भी प्राप्त करते हैं।
संसारमें जो यह मान्यता है कि कर्मयोगसे कल्याण नहीं होता, कल्याण तो ज्ञानयोगसे ही होता है—इस मान्यताको दूर करनेके लिये यहाँ 'अपि ' अव्ययका प्रयोग किया गया है।
सांख्ययोगी और कर्मयोगी—दोनोंका ही अन्तमें कर्मोंसे अर्थात् क्रियाशील प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर दोनों ही योग एक हो जाते हैं। साधनकालमें भी सांख्ययोगका विवेक (जड़-चेतनका सम्बन्ध-विच्छेद) कर्मयोगीको अपनाना पड़ता है और कर्मयोगकी प्रणाली (अपने लिये कर्म न करनेकी पद्धति) सांख्ययोगीको अपनानी पड़ती है। सांख्ययोगका विवेक प्रकृति-पुरुषका सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये होता है और कर्मयोगका कर्म संसारकी सेवाके लिये होता है। सिद्ध होनेपर सांख्ययोगी और कर्मयोगी—दोनोंकी एक स्थिति होती है; क्योंकि दोनों ही साधकोंकी अपनी निष्ठाएँ हैं (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक)।
संसार विषम है। घनिष्ठ-से-घनिष्ठ सांसारिक सम्बन्धमें भी विषमता रहती है। परन्तु परमात्मा सम है। अतः समरूप परमात्माकी प्राप्ति संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ही होती है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये दो योगमार्ग हैं—ज्ञानयोग और कर्मयोग। मेरे सत्-स्वरूपमें कभी अभाव नहीं होता, जबकि कामना-आसक्ति अभावमें ही पैदा होती है—ऐसा समझकर असंग हो जाय—यह ज्ञानयोग है। जिन वस्तुओंमें साधकका राग
है, उन वस्तुओंको दूसरोंकी सेवामें खर्च कर दे और जिन व्यक्तियोंमें राग है, उनकी निःस्वार्थभावसे सेवा कर दे—यह कर्मयोग है। इस प्रकार ज्ञानयोगमें विवेक-विचारके द्वारा और कर्मयोगमें सेवाके द्वारा संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
'एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति' —पूर्वश्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने व्यतिरेक रीतिसे कहा था कि सांख्ययोग और कर्मयोगको बेसमझ लोग ही अलग-अलग फल देनेवाले कहते हैं। उसी बातको अब अन्वय रीतिसे कहते हैं कि जो मनुष्य इन दोनों साधनोंको फलदृष्टिसे एक देखता है, वही यथार्थरूपमें देखता है।
इस प्रकार चौथे और पाँचवें श्लोकका सार यह है कि भगवान् सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनोंको स्वतन्त्र साधन मानते हैं और दोनोंका फल एक ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति मानते हैं। इस वास्तविकताको न जानेवाले मनुष्यको भगवान् बेसमझ कहते हैं और इसे जानेवालेको भगवान् यथार्थ जाननेवाला (बुद्धिमान्) कहते हैं।
विशेष बात
किसी भी साधनकी पूर्णता होनेपर जीनेकी इच्छा, मरनेका भय, पानेका लालच और करनेका राग—ये चारों सर्वथा मिट जाते हैं।
जो निरन्तर मर रहा है अर्थात् जिसका निरन्तर अभाव हो रहा है; उस शरीरमें मरनेका भय नहीं हो सकता; और जो नित्य-निरन्तर रहता है, उस स्वरूपमें जीनेकी इच्छा नहीं हो सकती तो फिर जीनेकी इच्छा और मरनेका भय किसे होता है? जब स्वरूप शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब उसमें जीनेकी इच्छा और मरनेका भय उत्पन्न हो जाता है। जीनेकी इच्छा और मरनेका भय—ये दोनों 'ज्ञानयोग' से (विवेकद्वारा) मिट जाते हैं।
पानेकी इच्छा उसमें होती है, जिसमें कोई अभाव होता है। अपना स्वरूप भावरूप है, उसमें कभी अभाव नहीं हो
३६४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
सकता, इसलिये स्वरूपमें कभी पानेकी इच्छा नहीं होती। पानेकी इच्छा न होनेसे उसमें कभी करनेका राग उत्पन्न नहीं होता। स्वयं भावरूप होते हुए भी जब स्वरूप अभावरूप शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब उसे अपनेमें अभाव प्रतीत होने लग जाता है, जिससे उसमें पानेकी इच्छा उत्पन्न हो जाती है और पानेकी इच्छासे
करनेका राग उत्पन्न हो जाता है। पानेकी इच्छा और करनेका राग—ये दोनों ‘कर्मयोग’से मिट जाते हैं।
ज्ञानयोग और कर्मयोग—इन दोनों साधनोंमेंसे किसी एक साधनकी पूर्णता होनेपर जीनेकी इच्छा, मरनेका भय, पानेका लालच और करनेका राग—ये चारों सर्वथा मिट जाते हैं।
परिशिष्ट भाव— सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनों साधन लौकिक होनेसे एक ही हैं। सांख्ययोगमें साधक चिन्मयतामें स्थित होता है और चिन्मयतामें स्थित होनेपर जड़ताका त्याग हो जाता है। कर्मयोगमें साधक जड़ताका त्याग करता है और जड़ताका त्याग होनेपर चिन्मयतामें स्थिति हो जाती है। इस प्रकार सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनों ही साधनोंके परिणाममें चिन्मयताकी प्राप्ति अर्थात् चिन्मय स्वरूपमें स्थितिका अनुभव हो जाता है।
शरीरको संसारकी सेवामें लगा देना कर्मयोग है और शरीरसे स्वयं अलग हो जाना ज्ञानयोग है। चाहे शरीरको संसारकी सेवामें लगा दें, चाहे शरीरसे स्वयं अलग हो जायें—दोनोंका परिणाम एक ही होगा अर्थात् दोनों ही साधनोंसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वरूपमें स्थिति हो जायगी।
यहाँ चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें चौथे श्लोकके पूर्वार्धका सम्बन्ध पाँचवें श्लोकके उत्तरार्धके साथ है और पाँचवें श्लोकके पूर्वार्धका सम्बन्ध चौथे श्लोकके उत्तरार्धके साथ है।
कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीन साधनोंमें ज्ञानयोग और भक्तियोगका प्रचार तो अधिक है, पर कर्मयोगका प्रचार बहुत कम है। भगवान्ने भी गीतामें कहा है कि ‘बहुत समय बीत जानेके कारण यह कर्मयोग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया है (चौथे अध्यायका दूसरा श्लोक)। इसलिये कर्मयोगके सम्बन्धमें यह धारणा बनी हुई है कि यह परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन नहीं है। अतः कर्मयोगका साधक या तो ज्ञानयोगमें चला जाता है अथवा भक्तियोगमें चला जाता है; जैसे—
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन् जायते॥
(श्रीमद्भा० ११।२०।१९)
‘तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक भोगोंसे वैराग्य न हो जाय, (ज्ञानयोगका अधिकारी न बन जाय) अथवा मेरी लीला-कथाके श्रवणादिमें श्रद्धा न हो जाय (भक्तियोगका अधिकारी न बन जाय)।’
परन्तु यहाँ भगवान् ज्ञानयोगकी तरह कर्मयोगको भी परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बता रहे हैं। उपर्युक्त चौथे-पाँचवें श्लोकोंके सिवाय गीतामें अनेक जगह कर्मयोगके द्वारा स्वतन्त्रतापूर्वक तत्त्वज्ञान, परमशान्ति, मुक्ति अथवा परमात्मतत्वकी प्राप्ति होनेकी बात आयी है; जैसे—‘तत्त्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति’ (४।३८), ‘योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म निचिरेणाधिगच्छति’ (५।६), ‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (४।२३), ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणि तमाहुः पण्डितं बुधाः’ (४।१९), ‘युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्’ (५।१२)।
श्रीमद्भगवतमें भी कर्मयोगको परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बताया गया है—
स्वधर्मस्थो यजन् यज्ञैरनाशीः काम उद्ध्वव। न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन् समाचरेत्॥
(११।२०।१०)
‘जो स्वधर्ममें स्थित रहकर तथा भोगोंकी कामनाका त्याग करके अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा भगवान्का पूजन करता है तथा सकामभावपूर्वक कोई कर्म नहीं करता, उसको स्वर्ग या नरकमें नहीं जाना पड़ता अर्थात् वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।’
अस्मिँल्लोके वर्तमानः स्वधर्मस्थोऽनघः शुचिः। ज्ञानं विशुद्धमाप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया॥
(११।२०।११)
‘स्वधर्ममें स्थित वह कर्मयोगी इस लोकमें सब कर्तव्य-कर्मोंका आचरण करते हुए भी पाप-पुण्यसे मुक्त होकर बिना परिश्रमके तत्त्वज्ञानको अथवा परमप्रेम (पराभक्ति)-को प्राप्त कर लेता है।’