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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

३५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

व्याख्या—‘सन््यासं कर्मणां कृष्ण’— कौटुम्बिक स्नेहके कारण अर्जुनके मनमें युद्ध न करनेका भाव पैदा हो गया था। इसके समर्थनमें अर्जुनने पहले अध्यायमें कई तर्क और युक्तियाँ भी सामने रखीं। उन्होंने युद्ध करनेको पाप बताया (गीता—पहले अध्यायका पैतालीसवाँ श्लोक)। वे युद्ध न करके भिक्षाके अन्तसे जीवन-निर्वाह करनेको श्रेष्ठ समझने लगे (दूसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और उन्होंने निश्चय करके भगवान्से स्पष्ट कह भी दिया कि मैं किसी भी स्थितिमें युद्ध नहीं करूँगा (दूसरे अध्यायका नवाँ श्लोक)।

प्रायः वक्ताके शब्दोंका अर्थ श्रोता अपने विचारके अनुसार लगाया करते हैं। स्वजनोंको देखकर अर्जुनके हृदयमें जो मोह पैदा हुआ, उसके अनुसार उन्हें युद्धरूप कर्मके त्यागकी बात उचित प्रतीत होने लगी। अतः भगवान्के शब्दोंको वे अपने विचारके अनुसार समझ रहे हैं कि भगवान् कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके प्रचलित प्रणालीके अनुसार तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी ही प्रशंसा कर रहे हैं।

‘पुनर्योगं च शंससि’— चौथे अध्यायके अङ्गीतसर्वे श्लोकमें भगवान्ने कर्मयोगीको दूसरे किसी साधनके बिना अवश्यमेव तत्त्वज्ञान प्राप्त होनेकी बात कही है। उसीको लक्ष्य करके अर्जुन भगवान्से कह रहे हैं कि कभी तो आप ज्ञानयोगकी प्रशंसा (चौथे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक) करते हैं और कभी कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं (चौथे अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक)।

‘यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चिततम्’— इसी तरहका प्रश्न अर्जुनने दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें भी ‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे’ पदोंसे किया था। उसके उत्तरमें भगवान्ने दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें-अड़तालीसवें श्लोकोंमें कर्मयोगकी व्याख्या करके उसका आचरण करनेके लिये कहा। फिर तीसरे अध्यायके दूसरे श्लोकमें अर्जुनने ‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्’ पदोंसे पुनः अपने कल्याणकी बात पूछी, जिसके उत्तरमें भगवान्ने तीसरे अध्यायके तीसवें श्लोकमें निष्काम, निर्भय और निःसंतप्त होकर युद्ध करनेकी आज्ञा दी तथा पैँतीसवें श्लोकमें अपने धर्मका पालन करनेको श्रेयस्कर बताया।

यहाँ उपर्युक्त पदोंसे अर्जुनने जो बात पूछी है, उसके उत्तरमें भगवान्ने कहा है कि कर्मयोग श्रेष्ठ है (पाँचवें अध्यायका दूसरा श्लोक), कर्मयोगी सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है (पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक), कर्मयोगके बिना सांख्ययोगका साधन सिद्ध होना कठिन है; परन्तु कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है (पाँचवें अध्यायका छठा श्लोक)। इस प्रकार कहकर भगवान् अर्जुनको मानो यह बता रहे हैं कि कर्मयोग ही तेरे लिये शीघ्रता और सुगमतापूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है; अतः तू कर्मयोगका ही अनुष्ठान कर।

अर्जुनके मनमें मुख्यरूपसे अपने कल्याणकी ही इच्छा थी। इसलिये वे बार-बार भगवान्के सामने श्रेयविषयक जिज्ञासा रखते हैं (दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला श्लोक)। कल्याणकी प्राप्तिमें इच्छाकी प्रधानता है। साधनकी सफलतामें देरीका कारण भी यही है कि कल्याणकी इच्छा पूरी तरह जाग्रत् नहीं हुई। जिन साधकोंमें तीव्र वैराग्य नहीं है, वे भी कल्याणकी इच्छा जाग्रत् होनेपर कर्मयोगका साधन सुगमतापूर्वक कर सकते हैं*। अर्जुनके हृदयमें भोगोंसे पूरा वैराग्य नहीं है, पर उनमें अपने कल्याणकी इच्छा है, इसलिये वे कर्मयोगके अधिकारी हैं।

पहले अध्यायके बत्तीसवें तथा दूसरे अध्यायके आठवें श्लोकको देखनेसे पता लगता है कि अर्जुन मृत्युलोकके राज्यकी तो बात ही क्या है, त्रिलोकिका राज्य भी नहीं चाहते। परन्तु वास्तवमें अर्जुन राज्य तथा भोगोंको सर्वथा नहीं चाहते हों, ऐसी बात भी नहीं है। वे कहते हैं कि युद्धमें कुटुम्बीजनोंको मारकर राज्य तथा विजय नहीं चाहता। इसका तात्पर्य है कि यदि कुटुम्बीजनोंको मारे बिना राज्य मिल जाय तो मैं उसे लेनेको तैयार हूँ। दूसरे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें अर्जुन यही कहते हैं कि गुरुजनोंको मारकर भोग भोगना ठीक नहीं है। इससे यह ध्वनि भी निकलती है कि गुरुजनोंको मारे बिना राज्य मिल जाय तो वह स्वीकार है। दूसरे अध्यायके छठे श्लोकमें अर्जुन कहते हैं कि कौन जीतेगा—इसका हमें पता नहीं और उन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते। इसका तात्पर्य है कि यदि हमारी विजय निश्चित हो तथा उनको मारे बिना राज्य मिलता हो तो मैं

  • योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया। .....

..... तेष्ठनिर्विर्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥

( श्रीमद्भा० ११।२०।६-७ )

श्लोक २ ] * साधक-संजीवनी * ३५५

लेनेको तैयार हूँ। आगे दूसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें

भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरे तो दोनों हाथोंमें लड्डू

हैं; यदि युद्धमें तू मारा गया तो तुझे स्वर्ग मिलेगा और जीत

गया तो राज्य मिलेगा। यदि अर्जुनके मनमें स्वर्ग और

संसारके राज्यकी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं होती तो भगवान्

शायद ही ऐसा कहते। अतः अर्जुनके हृदयमें प्रतीत होनेवाला

वैराग्य वास्तविक नहीं है। परन्तु उनमें अपने कल्याणकी

इच्छा है, जो इस श्लोकमें भी दिखायी दे रही है।

सम्बन्ध—अब भगवान् अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।

तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥

श्रीभगवान् बोले—

सन्न्यासः = सन्न्यास (सांख्ययोग)

निःश्रेयसकरौ = कल्याण करनेवाले हैं।

कर्मसन्न्यासात् = कर्मसन्न्यास (सांख्य-योग)-से

च = और

तु = परन्तु

कर्मयोगः = कर्मयोग

तयोः = उन दोनोंमें (भी)

कर्मयोगः = कर्मयोग

उभौ = दोनों ही

विशिष्यते = श्रेष्ठ है।

व्याख्या—[ भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार सांख्ययोग

और कर्मयोगका पालन प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय

आदिके मनुष्य कर सकते हैं। कारण कि उनका सिद्धान्त

किसी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिको लेकर नहीं है। इसी

अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्मोंका त्याग करके

विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीको 'कर्मसन्न्यास'

नामसे कहा है। परन्तु भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार ज्ञान-

प्राप्तिके लिये सांख्ययोगका पालन प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्रतासे

कर सकता है और उसका पालन करनेमें कर्मोंका स्वरूपसे

त्याग करनेकी आवश्यकता भी नहीं है। इसलिये भगवान्

प्रचलित मतका भी आदर करते हुए अपने सिद्धान्तके

अनुसार अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।]

'सन्न्यासः'—यहाँ 'सन्न्यासः' पदका अर्थ 'सांख्य-

योग' है, कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं। अर्जुनके प्रश्नका

उत्तर देते हुए भगवान् कर्मोंके त्यागपूर्वक सन्न्यासका

विवेचन न करके कर्म करते हुए ज्ञानको प्राप्त करनेका

जो सांख्ययोगका मार्ग है, उसका विवेचन करते हैं। उस

सांख्ययोगके द्वारा मनुष्य प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय

आदिमें रहते हुए प्रत्येक परिस्थितिमें स्वतन्त्रतापूर्वक ज्ञान

प्राप्त कर सकता है अर्थात् अपना कल्याण कर सकता है।

सांख्ययोगकी साधनामें विवेक-विचारकी मुख्यता रहती

है। विवेकपूर्वक तीव्र वैराग्यके बिना यह साधना सफल

नहीं होती। इस साधनामें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव

होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वपर दृष्टि रहती है। राग मिटे

बिना संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन

है। इसलिये भगवान्ने देहाभिमानियोंके लिये यह साधन

क्लेशयुक्त बताया है (गीता—बारहवें अध्यायका पाँचवाँ

श्लोक)। इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भी भगवान्ने कहा

है कि कर्मयोगका साधन किये बिना सन्न्यासका साधन होना

कठिन है; क्योंकि संसारसे राग हटानेके लिये कर्मयोग ही

सुगम उपाय है।

'कर्मयोगश्च'—मानवमात्रमें कर्म करनेका राग

अनादिकालसे चला आ रहा है, जिसे मिटानेके लिये कर्म

करना आवश्यक है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा

श्लोक)। परन्तु वे कर्म किस भाव और उद्देश्यसे कैसे

किये जायँ कि करनेका राग सर्वथा मिट जाय, उस

कर्तव्य-कर्मको करनेकी कलाको 'कर्मयोग' कहते हैं।

कर्मयोगमें कार्य छोटा है या बड़ा, इसपर दृष्टि नहीं रहती।

जो भी कर्तव्य-कर्म सामने आ जाय, उसीको निष्कामभावसे

दूसरोंके हितके लिये करना है। कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद

करनेके लिये यह आवश्यक है कि कर्म अपने लिये न

किये जायँ। अपने लिये कर्म न करनेका अर्थ है—कर्मोंके

बदलेमें अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा न होना।

जबतक अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा रहती है,

तबतक कर्मोंके साथ सम्बन्ध बना रहता है।

'निःश्रेयसकरावुभौ'—अर्जुनका प्रश्न था कि

सांख्ययोग और कर्मयोग—इन दोनों साधनोंमें कौन-सा

साधन निश्चयपूर्वक कल्याण करनेवाला है? उत्तरमें

३५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! ये दोनों ही साधन निश्चयपूर्वक कल्याण करनेवाले हैं। कारण कि दोनोंके द्वारा एक ही समताकी प्राप्ति होती है। इसी अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें भी भगवान्ने इसी बातकी पुष्टि की है। तेरहवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनोंसे परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेकी बात कही है। इसलिये ये दोनों ही परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक)।

‘तयोस्तु कर्मसन््यासात्’—एक ही सांख्ययोगके दो भेद हैं—एक तो चौथे अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें कहा हुआ सांख्ययोग, जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग है और दूसरा, दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक कहा हुआ सांख्ययोग, जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं है। यहाँ ‘कर्मसन््यासात्’ पद दोनों ही प्रकारके सांख्ययोगका वाचक है।

‘कर्मयोगो विशिष्यते’—आगेके (तीसरे) श्लोकमें भगवान्ने इन पदोंकी व्याख्या करते हुए कहा है कि कर्मयोगी नित्यसन््यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि वह सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। फिर छठे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कर्मयोगके बिना सांख्य-योगका साधन होना कठिन है तथा कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें तो कर्मयोगकी आवश्यकता है, पर कर्मयोगमें सांख्ययोगकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये दोनों साधनोंके कल्याण-कारक होनेपर भी भगवान् कर्मयोगको ही श्रेष्ठ बताते हैं।

कर्मयोगी लोकसंग्रहके लिये कर्म करता है—‘लोक-सङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुर्महंसि’ (गीता—तीसरे अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। लोकसंग्रहका तात्पर्य है—निःस्वार्थभावसे लोक-मर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये, लोगोंको उन्मागसे हटाकर सन्मागमें लगानेके लिये कर्म करना अर्थात् केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। इसीको गीतामें ‘यज्ञार्थ कर्म’ के नामसे भी कहा गया है। जो केवल अपने लिये कर्म करता है, वह बंध जाता है (तीसरे अध्यायका नवाँ और तेरहवाँ श्लोक)। परन्तु कर्मयोगी निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है; अतः वह कर्मबन्धनसे सुगमतापूर्वक मुक्त हो जाता है (चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। इसलिये कर्मयोग श्रेष्ठ है। कर्मयोगका साधन प्रत्येक परिस्थितिमें और प्रत्येक व्यक्तिके द्वारा किया जा सकता है, चाहे वह किसी भी

वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो। परन्तु अर्जुन जिस कर्मसन््यासकी बात कहते हैं, वह एक विशेष परिस्थितिमें किया जा सकता है (गीता—चौथे अध्यायका चौतीसवाँ श्लोक); क्योंकि तत्त्वज्ञ महापुरुषका मिलना, उनमें अपनी श्रद्धा होना और उनके पास जाकर निवास करना—ऐसी परिस्थिति हरेक मनुष्यको प्राप्त होनी सम्भव नहीं है। अतः प्रचलित प्रणालीके सांख्ययोगका साधन एक विशेष परिस्थितिमें ही साध्य है, जबकि कर्मयोगका साधन प्रत्येक परिस्थितिमें और प्रत्येक व्यक्तिके लिये साध्य है। इसलिये कर्मयोग श्रेष्ठ है।

प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करना कर्मयोग है। युद्ध-जैसी घोर परिस्थितिमें भी कर्मयोगका पालन किया जा सकता है। कर्मयोगका पालन करनेमें कोई भी मनुष्य किसी भी परिस्थितिमें असमर्थ और पराधीन नहीं है; क्योंकि कर्मयोगमें कुछ भी पानेकी इच्छाका त्याग होता है। कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छा रहनेसे ही कर्तव्य-कर्म करनेमें असमर्थता और पराधीनताका अनुभव होता है।

कर्तृत्व-भोक्तृत्व ही संसार है। सांख्ययोगी और कर्मयोगी—इन दोनोंको ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करना है, इसलिये दोनों ही साधकोंको कर्तृत्व और भोक्तृत्व—इन दोनोंको मिटानेकी आवश्यकता है। तीव्र वैराग्य और तीक्ष्ण बुद्धि होनेसे सांख्ययोगी कर्तृत्वको मिटाता है। उतना तीव्र वैराग्य और तीक्ष्ण बुद्धि न होनेसे कर्मयोगी दूसरोंके हितके लिये ही सब कर्म करके भोक्तृत्वको मिटाता है। इस प्रकार सांख्ययोगी कर्तृत्वका त्याग करके संसारसे मुक्त होता है और कर्मयोगी भोक्तृत्वका अर्थात् कुछ पानेकी इच्छाका त्याग करके मुक्त होता है। यह नियम है कि कर्तृत्वका त्याग करनेसे भोक्तृत्वका त्याग और भोक्तृत्वका त्याग करनेसे कर्तृत्वका त्याग स्वतः हो जाता है। कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छासे ही कर्तृत्व होता है। जिस कर्मसे अपने लिये किसी प्रकारके भी सुखभोगकी इच्छा नहीं है, वह क्रियामात्र है, कर्म नहीं। जैसे यन्त्रमें कर्तृत्व नहीं रहता, ऐसे ही कर्मयोगीमें कर्तृत्व नहीं रहता।

साधकको संसारके प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिमें स्पष्ट ही अपना राग दीखता है। उस रागको वह अपने बन्धनका खास कारण मानता है तथा उसे मिटानेकी चेष्टा भी करता है। उस रागको मिटानेके लिये कर्मयोगी किसी भी प्राणी, पदार्थ आदिको अपना नहीं मानता*, अपने लिये

  • कर्मयोगी सेवा करनेके लिये तो सबको अपना मानता है, पर अपने लिये किसीको भी अपना नहीं मानता।

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

३५७

कुछ नहीं करता तथा अपने लिये कुछ नहीं चाहता। क्रियाओंसे सुख लेनेका भाव न रहनेसे कर्मयोगीकी क्रियाएँ परिणाममें सबका हित तथा वर्तमानमें सबकी प्रसन्नता और सुखके लिये ही हो जाती हैं। क्रियाओंसे सुख लेनेका भाव होनेसे क्रियाओंमें अभिमान (कर्तृत्व) और ममता हो जाती है। परन्तु उनसे सुख लेनेका भाव सर्वथा न रहनेसे कर्तृत्व समाप्त हो जाता है। कारण कि क्रियाएँ दोषी नहीं हैं, क्रियाजन्य आसक्ति और क्रियाओंके फलको चाहना ही दोषी है। जब साधक क्रियाजन्य सुख नहीं लेता तथा क्रियाओंका फल नहीं चाहता तब कर्तृत्व रह ही कैसे सकता है? क्योंकि कर्तृत्व टिकता है भोक्तृत्वपर। भोक्तृत्व न रहनेसे कर्तृत्व अपने उद्देश्यमें (जिसके लिये कर्म करता है, उसमें) लीन हो जाता है और एक परमात्मतत्त्व शेष रह जाता है। कर्मयोगीका 'अहम्' (व्यक्तित्व) शीघ्र तथा सुगमता-पूर्वक नष्ट हो जाता है, जबकि ज्ञानयोगीका 'अहम्' दूरतक साथ रहता है। कारण यह है कि 'मैं सेवक हूँ' (केवल सेव्यके लिये सेवक हूँ, अपने लिये नहीं)—ऐसा माननेसे कर्मयोगीका 'अहम्' भी सेव्यकी सेवामें लग जाता है; परन्तु 'मैं मुमुक्षु हूँ' ऐसा माननेसे ज्ञानयोगीका 'अहम्' साथ रहता है। कर्मयोगी अपने लिये कुछ न करके केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करता है, पर ज्ञानयोगी अपने हितके लिये साधन करता है। अपने हितके लिये साधन करनेसे 'अहम्' ज्यों-का-त्यों बना रहता है।

ज्ञानयोगकी मुख्य बात है—संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव करना और कर्मयोगकी मुख्य बात है—रागका अभाव करना। ज्ञानयोगी विचारके द्वारा संसारकी सत्ताका अभाव तो करना चाहता है, पर पदार्थोंमें राग रहते हुए उसकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन है। यद्यपि विचारकालमें ज्ञानयोगके साधकको पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव दीखता है, तथापि व्यवहारकालमें उन पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ता प्रतीत होने लगती है। परन्तु कर्मयोगके साधकका लक्ष्य दूसरोंको सुख पहुँचानेका रहनेसे उसका राग स्वतः मिट जाता है। इसके अतिरिक्त मिली हुई सामग्रीका त्याग करना कर्मयोगीके लिये जितना सुगम पड़ता है, उतना ज्ञानयोगीके लिये नहीं। ज्ञानयोगकी

दृष्टिसे किसी वस्तुको मायामात्र समझकर ऐसे ही उसका त्याग कर देना कठिन पड़ता है; परन्तु वही वस्तु किसीके काम आती हुई दिखायी दे तो उसका त्याग करना सुगम पड़ता है। जैसे, हमारे पास कम्बल पड़े हैं तो उन कम्बलोंको दूसरोंके काममें आते जानकर उनका त्याग करना अर्थात् उनसे अपना राग हटाना साधारण बात है; परन्तु (यदि तीव्र वैराग्य न हो तो) उन्हीं कम्बलोंको विचारद्वारा अनित्य, क्षणभंगुर, स्वप्नके मायामय पदार्थ समझकर ऐसे ही छोड़कर चल देना कठिन है। दूसरी बात, मायामात्र समझकर त्याग करनेमें (यदि तेजीका वैराग्य न हो तो) जिन वस्तुओंमें हमारी सुखबुद्धि नहीं है, उन खराब वस्तुओंका त्याग तो सुगमतासे हो जाता है, पर जिनमें हमारी सुखबुद्धि है, उन अच्छी वस्तुओंका त्याग कठिनतासे होता है। परन्तु दूसरेके काम आती देखकर जिन वस्तुओंमें हमारी सुखबुद्धि है, उन वस्तुओंका त्याग सुगमतासे हो जाता है; जैसे—भोजनके समय थालीमेंसे रोटी निकालनी पड़े तो ठंडी, बासी और रूखी रोटी ही निकालेंगे। परन्तु यदि वही रोटी किसी दूसरेको देनी हो तो अच्छी रोटी ही निकालेंगे, खराब नहीं। इसलिये कर्मयोगकी प्रणालीसे रागको मिटाये बिना सांख्ययोगका साधन होना बहुत कठिन है। विचारद्वारा पदार्थोंकी सत्ता न मानते हुए भी पदार्थोंमें स्वाभाविक राग रहनेके कारण भोगोंमें फँसकर पतनतक होनेकी सम्भावना रहती है।

केवल असत्के ज्ञानसे अर्थात् असत्को असत् जान लेनेसे रागकी निवृत्ति नहीं होती*। जैसे, सिनेमामें दीखनेवाले पदार्थों आदिकी सत्ता नहीं है—ऐसा जानते हुए भी उसमें राग हो जाता है। सिनेमा देखनेसे चरित्र, समय, नेत्र-शक्ति और धन—इन चारोंका नाश होता है—ऐसा जानते हुए भी रागके कारण सिनेमा देखते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वस्तुकी सत्ता न होनेपर भी उसमें राग अथवा सम्बन्ध रह सकता है। यदि राग न हो तो वस्तुकी सत्ता माननेपर भी उसमें राग उत्पन्न नहीं होता। इसलिये साधकका मुख्य काम होना चाहिये—रागका अभाव करना, सत्ताका अभाव करना नहीं; क्योंकि बाँधनेवाली वस्तु राग या सम्बन्ध ही है, सत्तामात्र नहीं। पदार्थ चाहे सत् हो,

  • असत्को असत् जाननेसे उसकी निवृत्ति तभी होती है, जब अपने स्वरूपमें स्थित होकर असत्को असत् रूपसे जानते हैं। स्वरूपमें स्थिति करण-निरपेक्ष है। परन्तु बुद्धि आदि करणोंसे असत्को असत् जाननेसे उसकी निवृत्ति नहीं होती; क्योंकि बुद्धि आदि करण भी असत् हैं। अतः असत्के ही द्वारा असत्को जाननेसे उसकी निवृत्ति कैसे हो सकती है?

३५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

चाहे असत् हो, चाहे सत्-असत्से विलक्षण हो, यदि उसमें भी पदार्थ नहीं बाँधता। बाँधता है हमारा सम्बन्ध, जो रागसे राग है तो वह बाँधनेवाला हो ही जायगा। वास्तवमें हमें कोई होता है। अतः हमारेपर राग मिटानेकी ही जिम्मेवारी है।

परिशिष्ट भाव —यद्यपि 'योग' के बिना कर्म और ज्ञान—दोनों ही बन्धनकारक हैं, तथापि कर्म करनेसे उतना पतन नहीं होता, जितना पतन वाचिक (सीखे हुए) ज्ञानसे होता है। वाचिक ज्ञान नरकोंमें ले जा सकता है— अज्ञस्यार्थप्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मिति यो वदेत्। महानिरयजालेषु स तेन विनियोजितः ॥

(योगवासिष्ठ, स्थिति० ३९१)

'जो बेसमझ मनुष्यको 'सब कुछ ब्रह्म है' ऐसा उपदेश देता है, वह उस मनुष्यको महान् नरकोंके जालमें डाल देता है।'

अतः वाचक ज्ञानीकी अपेक्षा कर्म करनेवाला श्रेष्ठ है। फिर जो कर्मयोगका आचरण करता है, उसकी श्रेष्ठताका तो कहना ही क्या! ज्ञानयोगी तो केवल अपने लिये उपयोगी होता है, पर कर्मयोगी संसारमात्रके लिये उपयोगी होता है। जो संसारके लिये उपयोगी होता है, वह अपने लिये भी उपयोगी हो जाता है—यह नियम है। इसलिये कर्मयोग विशेष है।

सांख्ययोगके बिना तो कर्मयोग हो सकता है, पर कर्मयोगके बिना सांख्ययोग होना कठिन है (गीता—पाँचवें अध्यायका छठा श्लोक)। इसलिये सांख्ययोगकी अपेक्षा कर्मयोग विशेष है। सांख्ययोगसे कर्मयोग श्रेष्ठ है और कर्मयोगसे भक्तियोग श्रेष्ठ है (गीता—छठे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक)। इसलिये गीतामें पहले सांख्ययोग, फिर कर्मयोग और फिर भक्तियोग—इस क्रमसे विवेचन किया गया है*।

फलमें कर्मयोग और ज्ञानयोग एक हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। साधनमें कर्मयोग और भक्तियोग एक हैं—'मैत्रः करुण एव च ' (गीता १२।१३); क्योंकि कर्मयोग और भक्तियोग—दोनोंमें ही दूसरेको सुख देनेका भाव रहता है। कर्म करनेमें कर्मी और कर्मयोगी एक हैं (गीता—तीसरे अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) तथा तत्त्वज्ञ महापुरुष और भगवान् भी कर्म करनेमें साथ हैं (गीता—तीसरे अध्यायके बाईसवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक)। इस प्रकार कर्मी, ज्ञानयोगी, भक्तियोगी और भगवान्—चारोंके साथ कर्मयोगी एक हो जाता है—यह कर्मयोगकी विशेषता है।

सांख्ययोगमें तो अहम्का सूक्ष्म संस्कार रह सकता है, पर कर्मयोगमें क्रिया और पदार्थसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे अहम्का सूक्ष्म संस्कार भी नहीं रहता। कर्मयोगमें अकर्म (अभाव) शेष रहता है (गीता—चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक) और सांख्ययोगमें आत्मा शेष रहता है (गीता—छठे अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—अब भगवान् कर्मयोगको श्रेष्ठ कहनेका कारण बताते हैं।

ज्ञेयः स नित्यसन््यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥

महाबाहो= हे महाबाहो!काङ्क्षति= आकांक्षा करता है;निर्द्वन्द्वः= द्वन्द्वोंसे रहित (मनुष्य)
यः= जो मनुष्यसः= वह (कर्मयोगी)सुखम्= सुखपूर्वक
= ननित्यसन््यासी= सदा सन््यासीबन्धात्= संसार-बन्धनसे
द्वेष्टि= (किसीसे) द्वेष करता है (और)ज्ञेयः= समझनेयोग्य है;प्रमुच्यते= मुक्त हो जाता है।
= न (किसीकी)हि= क्योंकि
  • भागवतमें भी यही क्रम है—

योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधितस्या। ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥

(श्रीमद्भगवद्गीता ११।२०।६)

'अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योग-मार्ग बताये हैं—ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग। इन तीनोंके सिवाय दूसरा कोई कल्याणका मार्ग नहीं है।'

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

३५९

व्याख्या—‘महाबाहो’—‘महाबाहो’ सम्बोधनके दो अर्थ होते हैं—एक तो जिसकी भुजाएँ बड़ी और बलवान् हों अर्थात् जो शूरवीर हो; और दूसरा, जिसके मित्र तथा भाई बड़े पुरुष हों। अर्जुनके मित्र थे प्राणिमात्रके सुहृद् भगवान् श्रीकृष्ण और भाई थे अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर। इसलिये यह सम्बोधन देकर भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि कर्मयोगके अनुसार सबकी सेवा करनेका बल तुम्हारेमें है। अतः तुम सुगमतासे कर्मयोगका पालन कर सकते हो।

‘यो न द्वेष्टि’ —कर्मयोगी वह होता है, जो किसी भी प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति, सिद्धान्त आदिसे द्वेष नहीं करता। कर्मयोगीका काम है सबकी सेवा करना, सबको सुख पहुँचाना। यदि उसका किसीके भी साथ किंचिन्मात्र भी द्वेष होगा तो उसके द्वारा कर्मयोगका आचरण सांगोपांग नहीं हो सकेगा। अतः जिससे कुछ भी द्वेष हो, उसकी सेवा कर्मयोगीको सर्वप्रथम करनी चाहिये।

सबसे पहले ‘न द्वेष्टि’ पद देनेका तात्पर्य यह है कि जो किसीको भी बुरा समझता है और किसीका भी बुरा चाहता है, वह कर्मयोगके तत्त्वको समझ ही नहीं सकता।

मार्मिक बात

प्राणिमात्रके हितके उद्देश्यसे कर्मयोगीके लिये बुराईका त्याग करना जितना आवश्यक है, उतना भलाई करना आवश्यक नहीं है। भलाई करनेसे केवल समाजका हित होता है; परन्तु बुराईरहित होनेसे विश्वमात्रका हित होता है। कारण यह है कि भलाई करनेमें सीमित क्रियाओं और पदार्थोंकी प्रधानता रहती है; परन्तु बुराईरहित होनेमें भीतरका असीम भाव प्रधान रहता है। यदि भीतरसे बुरा भाव दूर न हुआ हो और बाहरसे भलाई करें तो इससे अभिमान पैदा होगा, जो आसुरी सम्पत्तिका मूल है। भलाई करनेका अभिमान तभी पैदा होता है, जब भीतर कुछ-न-कुछ बुराई हो। जहाँ अपूर्णता (कमी) होती है, वहीं अभिमान पैदा होता है। परन्तु जहाँ पूर्णता है, वहाँ अभिमानका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

गहराईसे देखा जाय तो नाशवान् वस्तुओंकी सहायताके बिना भलाई नहीं की जा सकती। जिन वस्तुओंसे हम भलाई करते हैं, वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं; प्रत्युत उन्हींकी हैं, जिनकी हम भलाई करते हैं। फिर भी यदि भलाईका अभिमान होता है, तो यह नाशवान्का संग है। जबतक नाशवान्का संग है, तबतक ‘योग’की सिद्धि नहीं होती।

मैंने भलाई की—यह अभिमान बुराईसे भी अधिक भयंकर है; क्योंकि यह भाव मैं-पनमें बैठ जाता है। कर्म और फल तो मिट जाते हैं, पर जबतक मैं-पन रहता है, तबतक मैं-पनमें बैठता हुआ भलाईका अभिमान नहीं मिटता। दूसरी बात, बुराईको तो हम बुराईरूपसे जानते ही हैं, पर भलाईको बुराईरूपसे नहीं जानते। इसलिये भलाईके अभिमानका त्याग करना बहुत कठिन है; जैसे—लोहेकी हथकड़ीका तो त्याग कर सकते हैं; पर सोनेकी हथकड़ीका त्याग नहीं कर सकते; क्योंकि वह गहनारूपसे दीखती है। इसलिये बुराईरहित होकर ही भलाई करनी चाहिये। वास्तवमें बुराईका त्याग होनेपर विश्वमात्रकी भलाई अपने-आप होती है, करनी नहीं पड़ती। इसलिये बुराईरहित महापुरुष अगर हिमालयकी एकान्त गुफामें भी बैठता हो, तो भी उसके द्वारा विश्वका बहुत हित होता है।

‘न काङ्क्षति’ —कर्मयोगमें कामनाका त्याग मुख्य है। कर्मयोगी किसी भी प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिकी कामना नहीं करता। कामना-त्याग और परहितमें परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। निष्काम होनेके लिये दूसरेका हित करना आवश्यक है। दूसरेका हित करनेसे कामनाके त्यागका बल आता है।

कर्मयोगमें कर्ता निष्काम होता है, कर्म नहीं; क्योंकि जड़ होनेके कारण कर्म स्वयं निष्काम या सकाम नहीं हो सकते। कर्म कर्ताके अधीन होते हैं, इसलिये कर्माँकी अभिव्यक्ति कर्तासे ही होती है। निष्काम कर्ताके द्वारा ही निष्काम-कर्म होते हैं, जिसे कर्मयोग कहते हैं। अतः चाहे ‘कर्मयोग’ कहें या ‘निष्काम-कर्म’—दोनोंका अर्थ एक ही होता है। सकाम कर्मयोग होता ही नहीं। निष्काम होनेसे कर्ता कर्मफलसे असंग रहता है; परन्तु जब कर्तामें सकामभाव आ जाता है, तब वह कर्मफलसे बँध जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। सकामभाव तभी नष्ट होता है, जब कर्ता कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता, प्रत्युत सम्पूर्ण कर्म दूसरोंके हितके लिये ही करता है। इसलिये कर्ताका भाव नित्य-निरन्तर निष्काम रहना चाहिये। कर्तामें जितना निष्कामभाव होगा, उतना ही कर्मयोगका सही आचरण होगा। कर्ताके सर्वथा निष्काम होनेपर कर्मयोग सिद्ध हो जाता है।

‘ज्ञेयः स नित्यसन््यासी’ —अर्जुनने युद्ध न करके भिक्षा माँगकर जीवन-निर्वाह करनेकी इच्छा प्रकट की

३६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

थी—‘गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भेक्ष्यमपीह लोके’ (गीता २।५) अर्थात् गुरुजनोंको न मारकर संन्यास लेना ही श्रेष्ठ है। भगवान् उसी बातका उत्तर देते हुए मानो कह रहे हैं कि हे अर्जुन! वह संन्यास तो गुरुजनोंके मर जानेके भयसे किया जानेवाला बाहरी संन्यास है, पर कर्मयोगीका संन्यास राग-द्वेषके त्यागसे होनेवाला नित्य संन्यास अर्थात् भीतरी एवं सच्चा संन्यास है। आगे छठे अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने केवल अग्निका त्याग करनेवाले अर्थात् संन्यास-आश्रममात्र ग्रहण करनेवाले पुरुषको संन्यासी न कहकर भीतरसे संसारके आश्रयका त्याग करनेवाले कर्मयोगीको ही संन्यासी कहा है। इस प्रकार भगवान्के मतमें कर्मयोगी ही वास्तविक संन्यासी है।

कर्म करते हुए भी कर्मोंसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रखना ही संन्यास है। कर्मोंसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रखनेवालेको कर्मिका फल कभी किसी अवस्थामें किंचिमात्र भी नहीं मिलता—‘न तु सन्यासिनां क्वचित्’ (गीता १८।१२)। इसलिये शास्त्र-विहित समस्त कर्म करते हुए भी कर्मयोगी सदा संन्यासी ही है।

कर्मयोगका अनुष्ठान किये बिना सांख्ययोगका पालन करना कठिन है। इसलिये सांख्ययोगका साधक पहले कर्मयोगी होता है, फिर संन्यासी (सांख्ययोगी) होता है। परन्तु कर्मयोगके साधकके लिये सांख्ययोगका अनुष्ठान करना आवश्यक नहीं है। इसलिये कर्मयोगी आरम्भसे ही संन्यासी है।

जिसके राग-द्वेषका अभाव हो गया है, उसे संन्यास-आश्रममें जानेकी आवश्यकता नहीं है। कोई भी व्यक्ति, वस्तु, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि अपनी नहीं है और अपने लिये भी नहीं है—ऐसा निश्चय होनेके बाद राग-द्वेष मिटकर ऐसा ही यथार्थ अनुभव हो जाता है, फिर व्यवहारमें संसारसे सम्बन्ध दीखनेपर भी भीतरसे (राग-द्वेष न रहनेसे) सम्बन्ध होता ही नहीं। यही ‘नित्यसंन्यास’ है। लौकिक अथवा पारलौकिक प्रत्येक कार्य करते समय कर्मयोगीका संसारसे सर्वथा संन्यास रहता है, इसलिये वह नित्यसंन्यासी ही समझनेयोग्य है।

संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद अर्थात् लिप्तताका अभाव ही संन्यास है और कर्मयोगीमें राग-द्वेष न रहनेसे संसारसे लिप्तता रहती ही नहीं। अतः कर्मयोगी नित्यसंन्यासी है।

‘निर्द्वन्द्वो हि .....सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’*—साधनाके आरम्भमें साधकके अन्तःकरणमें द्वन्द्व रहता है। सत्संग, स्वाध्याय, विचार आदि करनेसे वह परमात्मप्राप्तिको अपना ध्येय तो मान लेता है, पर उसके अपने कहलानेवाले मन, इन्द्रियों आदिकी रुचि स्वाभाविक ही भोग भोगने तथा संग्रह करनेमें रहती है। इसलिये साधक कभी परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करना चाहता है और कभी भोग एवं संग्रहको। उसे जैसा संग मिलता है, उसीके अनुसार उसके भावोंमें परिवर्तन होता रहता है। ऐसा होनेपर भी वह भोगोंको शान्तिसे नहीं भोग सकता; क्योंकि सत्संग आदिके संस्कार उसके अन्तःकरणमें वैराग्य (भोगोंसे अरुचि) पैदा करते रहते हैं। इस प्रकार साधकके अन्तःकरणमें द्वन्द्व (भोग भोग्ने या साधन कर्ने) चलता रहता है। इस द्वन्द्वपर ही अहंभाव टिका हुआ है। हमें सांसारिक भोग और संग्रहमें लगना ही नहीं है, प्रत्युत एकमात्र परमात्मतत्त्वको ही प्राप्त करना है—ऐसा दृढ़ निश्चय होनेपर द्वन्द्व नहीं रहता और अहंभाव परमात्मतत्त्वमें लीन हो जाता है।

वास्तवमें संसारका महत्त्व अन्तःकरणमें अंकित हो जानेसे ही द्वन्द्व रहता है। भोग भोगते रहनेसे, दूसरोंसे सुख चाहते रहनेसे संसारके प्राणी-पदार्थोंका महत्त्व अन्तःकरणमें अंकित हो जाता है। उनसे सुख लेनेसे वह महत्त्व बढ़ता जाता है, जिससे उनको प्राप्त करनेकी रुचि प्रबल हो जाती है। वह रुचि एक परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको स्थायी और दृढ़ नहीं होने देती। इससे साधकमें द्वन्द्व बना रहता है। उद्देश्यकी दृढ़ताके लिये साधकको यह पक्का विचार करना चाहिये कि कितना ही सुख, आराम, भोग क्यों न मिल जाय, मुझे उसे लेना ही नहीं है, प्रत्युत परहितके लिये उसका त्याग करना है। यह विचार जितना दृढ़ होगा, उतना ही साधक निर्द्वन्द्व होगा।

निर्द्वन्द्व होनेकी मुख्य बात इसी श्लोकमें ‘न द्वेष्टि न काङ्क्षति’ पदोंसे कही गयी है; जिसका तात्पर्य है—राग-द्वेषसे रहित होना। राग-द्वेषको मिटानेके लिये यह विचार

  • गीतामें आये ‘कर्मबन्धं प्रहास्यसि’ (२।३९); ‘त्रायते महतो भयात्’ (२।४०); ‘जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते’ (२।५०); ‘मोक्ष्यसेजुभात्’ (४।१६, १।१); ‘वृजिनं संतरिष्यसि’ (४।३६); नाप्नुवन्ति दुःखालयमशाश्वतम्’ (८।१५); ‘शुभाशुभफलैरैवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः’ (१।२८); ‘मृत्युसंसारसागरात् समुद्भर्ता भवामि’ (१२।७) आदि पद यहाँ आये ‘बन्धात् प्रमुच्यते’ पदोंके ही पर्यायवाची हैं।

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

३६१

करना चाहिये कि अपने न चाहनेपर भी अनुकूलता और प्रतिकूलता आती ही है अर्थात् अपने चाहनेपर अनुकूलता आती हो—ऐसी बात नहीं है और न चाहनेपर प्रतिकूलता न आती हो—ऐसी बात भी नहीं है। अनुकूलता-प्रतिकूलता तो प्रारब्धके फलस्वरूप आती-जाती रहती है, फिर इसके आने अथवा जानेकी चाहना क्यों करें? अनुकूलताके प्रति राग और प्रतिकूलताके प्रति द्वेष अपनी भूलसे होता है। इस प्रकार विचार करनेसे भूल मिटकर राग-द्वेष सर्वथा समाप्त हो जाते हैं।

दूसरी बात यह है कि अपनी (स्वयंकी) सत्ता स्वतन्त्र है, किसी पदार्थ, व्यक्ति, क्रियाके अधीन नहीं है; क्योंकि सुषुप्ति-अवस्थामें जब हम संसारको भूल जाते हैं, तब भी अपनी सत्ता बनी रहती है; जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थामें भी हम प्राणी, पदार्थके बिना रह सकते हैं। फिर (अपनी स्वतन्त्र सत्ता होते हुए भी) उनमें राग-द्वेष करके हम उनके अधीन क्यों बनें? इस प्रकार विचार करनेसे भी राग-द्वेष मिट जाते हैं।

संसारका राग उत्पन्न और नष्ट होनेवाला है। यह राग कभी स्थायी नहीं रहता; किन्तु हम नये-नये प्राणी, पदार्थमें राग करके इसे बनाये रखनेकी चेष्टा करते हैं। परन्तु परमात्माकी अभिलाषा उत्पन्न और नष्ट होनेवाली नहीं है; क्योंकि परमात्माका ही अंश होनेके नाते जीवका परमात्मासे अखण्ड सम्बन्ध है। परमात्माकी अभिलाषा कभी घटती-बढ़ती भी नहीं। केवल संसारमें राग अधिक होनेपर वह

परिशिष्ट भाव— बाहरके सुख-दुःख (सुखदायी-दुःखदायी परिस्थिति)-में सम और भीतरके सुख-दुःखसे रहित होना 'निर्द्वन्द्व' अर्थात् द्वन्द्वरहित होना है।

तादात्म्यमें चेतन-अंशकी मुख्यतासे 'जिज्ञासा' रहती है और जड़-अंशकी मुख्यतासे 'कामना' रहती है। मनुष्यमें भूख तो अविनाशी-तत्त्वकी रहती है, पर रुचि नाशवान्की रहती है; क्योंकि अविनाशीकी भूखको वह नाशवान्के द्वारा मिटाना चाहता है। भूख और रुचिका यह द्वन्द्व मनुष्यके संसार-बन्धनको दृढ़ करता है। जब मनुष्यका संसारमें राग-द्वेष नहीं रहता, तब उसकी जिज्ञासा पूर्ण हो जाती है और कामना मिट जाती है अर्थात् वह निर्द्वन्द्व हो जाता है।

सम्बन्ध— इस अध्यायके दूसरे श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंको परम कल्याण करनेवाले बताया। उसकी व्याख्या अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यग्भुभ्योर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥

  • एतावानेव योगेन समग्रेणेह योगिनः । युज्यतेऽभिमतो ह्यर्थो यदसंगस्तु कृतन्शः ॥

( श्रीमद्भा० ३।३२।२७ )

'योगियोंके समस्त योग-साधनोंका एकमात्र अभीष्ट फल है—सम्पूर्ण संसारमें आसक्तिका अभाव हो जाना।'

३६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

बालाः= बेसमझ लोग= न किसम्यक्= अच्छी तरहसे
साङ्ख्ययोगी= सांख्ययोग और
कर्मयोगकोपण्डिताः= पण्डितजन;
(क्योंकि)आस्थितः= स्थित (मनुष्य)
पृथक्= अलग-अलग
(फलवाले)एकम्= (इन दोनोंमेंसे)
एक साधनमेंउभयोः= दोनोंके
प्रवदन्ति= कहते हैं,अपि= भीफलम्= फलरूप
(परमात्माको)
विन्दते= प्राप्त कर लेता है।

व्याख्या —‘साङ्ख्ययोगी पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः’—इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्माका स्वरूपसे त्याग करके तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करनेके साधनको ‘कर्मसंन्यास’ नामसे कहा है। भगवान्ने भी दूसरे श्लोकमें अपने सिद्धान्तकी मुख्यता रखते हुए उसे ‘संन्यास’ और ‘कर्मसंन्यास’ नामसे कहा है। अब उस साधनको भगवान् यहाँ ‘सांख्य’ नामसे कहते हैं। भगवान् शरीर-शरीरीके भेदका विचार करके स्वरूपमें स्थित होनेको ‘सांख्य’ कहते हैं। भगवान्के मतमें ‘संन्यास’ और ‘सांख्य’ पर्यायवाची हैं, जिसमें कर्माका स्वरूपसे त्याग करनेकी आवश्यकता नहीं है।

अर्जुन जिसे ‘कर्मसंन्यास’ नामसे कह रहे हैं, वह भी निःसन्देह भगवान्के द्वारा कहे ‘सांख्य’ का ही एक अवान्तर भेद है। कारण कि गुरुसे सुनकर भी साधक शरीर-शरीरीके भेदका ही विचार करता है।

‘बालाः’ पदसे भगवान् यह कहते हैं कि आयु और बुद्धिमें बड़े होकर भी जो सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले मानते हैं, वे बालक अर्थात् बेसमझ ही हैं।

परिशिष्ट भाव —जो अन्य शास्त्रीय बातोंको तो जानता है, पर सांख्ययोग और कर्मयोगके तत्त्वको गहराईसे नहीं जानता, वह वास्तवमें बालक अर्थात् बेसमझ है।

गीताभरमें अविनाशी तत्त्वके लिये ‘फल’ शब्द इसी श्लोकमें आया है। ‘फल’ शब्दका अर्थ है—परिणाम। कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों साधनोंसे प्राप्त होनेवाले तत्त्वको ‘फल’ कहनेका तात्पर्य है कि इन दोनों साधनोंमें मनुष्यका अपना उद्योग मुख्य है। ज्ञानयोगमें विवेकरूप उद्योग मुख्य है और कर्मयोगमें परहितकी क्रियारूप उद्योग मुख्य है। साधकका अपना उद्योग, परिश्रम सफल हो गया, इसलिये इसको ‘फल’ कहा गया है। यह फल नष्ट होनेवाला नहीं है। कर्मयोग तथा ज्ञानयोग—दोनोंका फल आत्मज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान है।

कर्तव्य-कर्म करना कर्मयोग है और कुछ न करना ज्ञानयोग है। कुछ न करनेसे जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती है, उसी तत्त्वकी प्राप्ति कर्तव्य-कर्म करनेसे हो जाती है। ‘करना’ और ‘न करना’ तो साधन हैं और इनसे जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती है, वह साध्य है।


**यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥**

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

३६३

साङ्ख्यैः= सांख्ययोगियोंकेद्वारा= और
यत्= जोअपियोगम्= कर्मयोगको
(फलरूपमें)
स्थानम्= तत्त्वतत्एकम्= एक
प्राप्यते= प्राप्त किया जातागम्यतेपश्यति= देखता है,
है,यःसः, च= वही (ठीक)
योगैः= कर्मयोगियोंकेसाङ्ख्यम्पश्यति= देखता है।

व्याख्या—'यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते' —पूर्वश्लोकके उत्तरार्धमें भगवान्ने कहा था कि एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित होकर मनुष्य दोनों साधनोंके फलरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है। उसी बातकी पुष्टि भगवान् उपर्युक्त पदोंमें दूसरे ढंगसे कर रहे हैं कि जो तत्त्व सांख्ययोगी प्राप्त करते हैं, वही तत्त्व कर्मयोगी भी प्राप्त करते हैं।

संसारमें जो यह मान्यता है कि कर्मयोगसे कल्याण नहीं होता, कल्याण तो ज्ञानयोगसे ही होता है—इस मान्यताको दूर करनेके लिये यहाँ 'अपि ' अव्ययका प्रयोग किया गया है।

सांख्ययोगी और कर्मयोगी—दोनोंका ही अन्तमें कर्मोंसे अर्थात् क्रियाशील प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर दोनों ही योग एक हो जाते हैं। साधनकालमें भी सांख्ययोगका विवेक (जड़-चेतनका सम्बन्ध-विच्छेद) कर्मयोगीको अपनाना पड़ता है और कर्मयोगकी प्रणाली (अपने लिये कर्म न करनेकी पद्धति) सांख्ययोगीको अपनानी पड़ती है। सांख्ययोगका विवेक प्रकृति-पुरुषका सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये होता है और कर्मयोगका कर्म संसारकी सेवाके लिये होता है। सिद्ध होनेपर सांख्ययोगी और कर्मयोगी—दोनोंकी एक स्थिति होती है; क्योंकि दोनों ही साधकोंकी अपनी निष्ठाएँ हैं (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक)।

संसार विषम है। घनिष्ठ-से-घनिष्ठ सांसारिक सम्बन्धमें भी विषमता रहती है। परन्तु परमात्मा सम है। अतः समरूप परमात्माकी प्राप्ति संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ही होती है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये दो योगमार्ग हैं—ज्ञानयोग और कर्मयोग। मेरे सत्-स्वरूपमें कभी अभाव नहीं होता, जबकि कामना-आसक्ति अभावमें ही पैदा होती है—ऐसा समझकर असंग हो जाय—यह ज्ञानयोग है। जिन वस्तुओंमें साधकका राग

है, उन वस्तुओंको दूसरोंकी सेवामें खर्च कर दे और जिन व्यक्तियोंमें राग है, उनकी निःस्वार्थभावसे सेवा कर दे—यह कर्मयोग है। इस प्रकार ज्ञानयोगमें विवेक-विचारके द्वारा और कर्मयोगमें सेवाके द्वारा संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।

'एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति' —पूर्वश्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने व्यतिरेक रीतिसे कहा था कि सांख्ययोग और कर्मयोगको बेसमझ लोग ही अलग-अलग फल देनेवाले कहते हैं। उसी बातको अब अन्वय रीतिसे कहते हैं कि जो मनुष्य इन दोनों साधनोंको फलदृष्टिसे एक देखता है, वही यथार्थरूपमें देखता है।

इस प्रकार चौथे और पाँचवें श्लोकका सार यह है कि भगवान् सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनोंको स्वतन्त्र साधन मानते हैं और दोनोंका फल एक ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति मानते हैं। इस वास्तविकताको न जानेवाले मनुष्यको भगवान् बेसमझ कहते हैं और इसे जानेवालेको भगवान् यथार्थ जाननेवाला (बुद्धिमान्) कहते हैं।

विशेष बात

किसी भी साधनकी पूर्णता होनेपर जीनेकी इच्छा, मरनेका भय, पानेका लालच और करनेका राग—ये चारों सर्वथा मिट जाते हैं।

जो निरन्तर मर रहा है अर्थात् जिसका निरन्तर अभाव हो रहा है; उस शरीरमें मरनेका भय नहीं हो सकता; और जो नित्य-निरन्तर रहता है, उस स्वरूपमें जीनेकी इच्छा नहीं हो सकती तो फिर जीनेकी इच्छा और मरनेका भय किसे होता है? जब स्वरूप शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब उसमें जीनेकी इच्छा और मरनेका भय उत्पन्न हो जाता है। जीनेकी इच्छा और मरनेका भय—ये दोनों 'ज्ञानयोग' से (विवेकद्वारा) मिट जाते हैं।

पानेकी इच्छा उसमें होती है, जिसमें कोई अभाव होता है। अपना स्वरूप भावरूप है, उसमें कभी अभाव नहीं हो

३६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

सकता, इसलिये स्वरूपमें कभी पानेकी इच्छा नहीं होती। पानेकी इच्छा न होनेसे उसमें कभी करनेका राग उत्पन्न नहीं होता। स्वयं भावरूप होते हुए भी जब स्वरूप अभावरूप शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब उसे अपनेमें अभाव प्रतीत होने लग जाता है, जिससे उसमें पानेकी इच्छा उत्पन्न हो जाती है और पानेकी इच्छासे

करनेका राग उत्पन्न हो जाता है। पानेकी इच्छा और करनेका राग—ये दोनों ‘कर्मयोग’से मिट जाते हैं।

ज्ञानयोग और कर्मयोग—इन दोनों साधनोंमेंसे किसी एक साधनकी पूर्णता होनेपर जीनेकी इच्छा, मरनेका भय, पानेका लालच और करनेका राग—ये चारों सर्वथा मिट जाते हैं।

परिशिष्ट भाव— सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनों साधन लौकिक होनेसे एक ही हैं। सांख्ययोगमें साधक चिन्मयतामें स्थित होता है और चिन्मयतामें स्थित होनेपर जड़ताका त्याग हो जाता है। कर्मयोगमें साधक जड़ताका त्याग करता है और जड़ताका त्याग होनेपर चिन्मयतामें स्थिति हो जाती है। इस प्रकार सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनों ही साधनोंके परिणाममें चिन्मयताकी प्राप्ति अर्थात् चिन्मय स्वरूपमें स्थितिका अनुभव हो जाता है।

शरीरको संसारकी सेवामें लगा देना कर्मयोग है और शरीरसे स्वयं अलग हो जाना ज्ञानयोग है। चाहे शरीरको संसारकी सेवामें लगा दें, चाहे शरीरसे स्वयं अलग हो जायें—दोनोंका परिणाम एक ही होगा अर्थात् दोनों ही साधनोंसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वरूपमें स्थिति हो जायगी।

यहाँ चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें चौथे श्लोकके पूर्वार्धका सम्बन्ध पाँचवें श्लोकके उत्तरार्धके साथ है और पाँचवें श्लोकके पूर्वार्धका सम्बन्ध चौथे श्लोकके उत्तरार्धके साथ है।

कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीन साधनोंमें ज्ञानयोग और भक्तियोगका प्रचार तो अधिक है, पर कर्मयोगका प्रचार बहुत कम है। भगवान्ने भी गीतामें कहा है कि ‘बहुत समय बीत जानेके कारण यह कर्मयोग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया है (चौथे अध्यायका दूसरा श्लोक)। इसलिये कर्मयोगके सम्बन्धमें यह धारणा बनी हुई है कि यह परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन नहीं है। अतः कर्मयोगका साधक या तो ज्ञानयोगमें चला जाता है अथवा भक्तियोगमें चला जाता है; जैसे—

तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन् जायते॥

(श्रीमद्भा० ११।२०।१९)

‘तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक भोगोंसे वैराग्य न हो जाय, (ज्ञानयोगका अधिकारी न बन जाय) अथवा मेरी लीला-कथाके श्रवणादिमें श्रद्धा न हो जाय (भक्तियोगका अधिकारी न बन जाय)।’

परन्तु यहाँ भगवान् ज्ञानयोगकी तरह कर्मयोगको भी परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बता रहे हैं। उपर्युक्त चौथे-पाँचवें श्लोकोंके सिवाय गीतामें अनेक जगह कर्मयोगके द्वारा स्वतन्त्रतापूर्वक तत्त्वज्ञान, परमशान्ति, मुक्ति अथवा परमात्मतत्वकी प्राप्ति होनेकी बात आयी है; जैसे—‘तत्त्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति’ (४।३८), ‘योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म निचिरेणाधिगच्छति’ (५।६), ‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (४।२३), ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणि तमाहुः पण्डितं बुधाः’ (४।१९), ‘युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्’ (५।१२)।

श्रीमद्भगवतमें भी कर्मयोगको परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बताया गया है—

स्वधर्मस्थो यजन् यज्ञैरनाशीः काम उद्ध्वव। न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन् समाचरेत्॥

(११।२०।१०)

‘जो स्वधर्ममें स्थित रहकर तथा भोगोंकी कामनाका त्याग करके अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा भगवान्का पूजन करता है तथा सकामभावपूर्वक कोई कर्म नहीं करता, उसको स्वर्ग या नरकमें नहीं जाना पड़ता अर्थात् वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।’

अस्मिँल्लोके वर्तमानः स्वधर्मस्थोऽनघः शुचिः। ज्ञानं विशुद्धमाप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया॥

(११।२०।११)

‘स्वधर्ममें स्थित वह कर्मयोगी इस लोकमें सब कर्तव्य-कर्मोंका आचरण करते हुए भी पाप-पुण्यसे मुक्त होकर बिना परिश्रमके तत्त्वज्ञानको अथवा परमप्रेम (पराभक्ति)-को प्राप्त कर लेता है।’

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

३६५

तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोग साधकको ज्ञानयोग अथवा भक्तियोगका अधिकारी भी बना देता है और स्वतन्त्रतासे कल्याण भी कर देता है। दूसरे शब्दोंमें, कर्मयोगसे साधन-ज्ञान अथवा साधन-भक्तिकी प्राप्ति भी हो सकती है और साध्य-ज्ञान (तत्त्वज्ञान) अथवा साध्य-भक्ति (परमप्रेम या पराभक्ति)-की प्राप्ति भी हो सकती है।

सम्बन्ध—इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने संन्यास-(सांख्ययोग-) की अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ बताया। अब उसी बातको दूसरे प्रकारसे कहते हैं।

सन्त्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्नुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥

तु= परन्तुआप्नुम्= सिद्ध होनानचिरेण= शीघ्र ही
महाबाहो= हे महाबाहो!दुःखम्= कठिन है।ब्रह्म= ब्रह्मको
अयोगतः= कर्मयोगके बिनामुनिः= मननशीलअधिगच्छति= प्राप्त हो
सन्त्यासः *= सांख्ययोगयोगयुक्तः= कर्मयोगीजाता है।

व्याख्या—‘सन्त्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्नुमयोगतः’— सांख्ययोगकी सफलताके लिये कर्मयोगका साधन करना आवश्यक है; क्योंकि उसके बिना सांख्ययोगकी सिद्धि कठिनतासे होती है। परन्तु कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सांख्ययोगका साधन करनेकी आवश्यकता नहीं है। यही भाव यहाँ ‘तु’ पदसे प्रकट किया गया है।

सांख्ययोगीका लक्ष्य परमात्मतत्त्वका अनुभव करना होता है। परन्तु राग रहते हुए इस साधनके द्वारा परमात्मतत्त्वके अनुभवकी तो बात ही क्या है, इस साधनका समझमें आना भी कठिन है!

राग मिटायेका सुगम उपाय है—कर्मयोगका अनुष्ठान करना। कर्मयोगमें प्रत्येक क्रिया दूसरोंके हितके लिये ही की जाती है। दूसरोंके हितका भाव होनेसे अपना राग स्वतः मिटता है। इसलिये कर्मयोगके आचरणद्वारा राग मिटाकर सांख्ययोगका साधन करना सुगम पड़ता है। कर्मयोगका साधन किये बिना सांख्ययोगका सिद्ध होना कठिन है।

‘योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति’— अपने निष्कामभावका और दूसरोंके हितका मनन करनेवाले कर्मयोगीको यहाँ ‘मुनिः’ कहा गया है।

कर्मयोगी छोटी या बड़ी प्रत्येक क्रियाको करते समय यह देखता रहता है कि मेरा भाव निष्काम है या सकाम? सकामभाव आते ही वह उसे मिटा देता है; क्योंकि सकामभाव आते ही वह क्रिया अपनी और अपने लिये हो जाती है।

दूसरोंका हित कैसे हो? इस प्रकार मनन करनेसे रागका त्याग सुगमतासे होता है।

उपर्युक्त पदोंसे भगवान् कर्मयोगकी विशेषता बता रहे हैं कि कर्मयोगी शीघ्र ही परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें विलम्बका कारण है—संसारका राग। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करते रहनेसे कर्मयोगीके रागका सर्वथा अभाव हो जाता है और रागका सर्वथा अभाव होनेपर स्वतः सिद्ध परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो जाती है। इसी आशयको भगवान्ने चौथे अध्यायके अङ्कीसवें श्लोकमें ‘तत्त्वव्यं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति’ पदोंसे बताया है कि योगसंसिद्ध होते ही अपने-आप तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति अवश्यमेव हो जाती है। इस साधनमें अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं है। इसकी सिद्धिमें कठिनाई और विलम्ब भी नहीं है।

दूसरा कारण यह है कि देहधारी—देहाभिमानी मनुष्य सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग नहीं कर सकता, पर जो कर्मफलका त्यागी है, वह त्यागी कहलाता है (अठारहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। इससे यह ध्वनि निकलती है कि देहधारी कर्मोंका त्याग तो नहीं कर सकता, पर कर्मफलका—फलच्छका त्याग तो कर ही सकता है। इसलिये कर्मयोगमें सुगमता है।

कर्मयोगकी महिमामें भगवान् कहते हैं कि कर्मयोगीको तत्काल ही शान्ति प्राप्त हो जाती है—‘त्यागाच्छान्ति-रनन्तरम्’ (गीता १२। १२)। वह संसारबन्धनसे

  • यद्यपि यहाँ ‘सन्त्यास’ पद ‘आप्नुम्’ क्रियाका कर्म होनेसे उसमें द्वितीया होनी चाहिये, तथापि ‘तु’ पदको निपात संज्ञा मानकर उससे कर्म उक्त होनेसे ‘सन्त्यास’ पदमें प्रथमा हुई है।

३६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है—‘सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ (गीता ५।३)। अतः कर्मयोगका साधन सुगम, शीघ्र

सिद्धिदायक और किसी अन्य साधनके बिना परमात्मप्राप्ति करानेवाला स्वतन्त्र साधन है।

सम्बन्ध—अब भगवान् कर्मयोगीके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।

सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥

जितेन्द्रियः | = जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, | सर्वभूतात्म- भूतात्मा | (और) = सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा | योगयुक्तः | = कर्मयोगी ---|---|---|---|---|--- विशुद्धात्मा | = जिसका अन्तः-करण निर्मल है, | | | कुर्वन् | = (कर्म) करते हुए विजितात्मा | = जिसका शरीर अपने वशमें है | | ही जिसकी आत्मा है, (ऐसा) | अपि न, लिप्यते | = भी = लिप्त नहीं होता।

व्याख्या—‘जितेन्द्रियः’ —इन्द्रियाँ वशमें होनेका तात्पर्य है—इन्द्रियोंका राग-द्वेषसे रहित होना। राग-द्वेषसे रहित होनेपर इन्द्रियोंमें मनको विचलित करनेकी शक्ति नहीं रहती। साधक उनको अपने मनके अनुकूल चाहे जहाँ लगा सकता है।

कर्मयोगके साधकके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना आवश्यक है। इसीलिये भगवान् कर्मयोगके प्रकरणमें इन्द्रियोंको वशमें करनेकी बात विशेषरूपसे कहते हैं; जैसे—‘यत्स्विन्द्रियाणि मनसा नियम्य’ (३।७); ‘तस्मात्तमिन्द्रियाण्यदादी नियम्य’ (३।४१)। कर्मयोगी-का कर्मके साथ अधिक सम्बन्ध रहता है; इसलिये इन्द्रियाँ वशमें न होनेसे उसके विचलित होनेकी सम्भावना रहती है। कर्मयोगके साधनमें दूसरोंके हितके लिये सेवारूपसे कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है, जिसके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना बहुत जरूरी है। इन्द्रियाँ वशमें हुए बिना कर्मयोगका साधन होना कठिन है।

‘विशुद्धात्मा’ —अन्तःकरणकी मलिनतामें हेतु है—सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व। जहाँ पदार्थोंका महत्त्व रहता है, वहीं उनकी कामनाएँ रहती हैं। साधक निष्काम तभी होता है, जब उसके अन्तःकरणमें सांसारिक पदार्थोंका

महत्त्व नहीं रहता। जबतक पदार्थोंका महत्त्व है, तबतक वह निष्काम नहीं हो सकता।

एक परमात्मप्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होनेसे अन्तःकरणकी जितनी जल्दी और जैसी शुद्धि होती है, उतनी जल्दी और वैसी शुद्धि दूसरे किसी अनुष्ठानसे नहीं होती। इसलिये कर्मयोगमें एक उद्देश्य होनेकी जितनी महिमा है, उतनी किसीकी नहीं।

‘विजितात्मा’ —कर्मयोगमें शरीरके सुख-आरामका त्याग करनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है। अगर शरीरसे आलस्य-प्रमाद होगा, तो कर्मयोगका अनुष्ठान नहीं हो पायेगा। अतः यहाँ भगवान्ने शरीरको वशमें करनेकी बात कही है।

‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’ —कर्मयोगीको सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है। जैसे शरीरके किसी एक अंगमें चोट लगनेसे दूसरा अंग उसकी सेवा करनेके लिये सहजभावसे, किसी अभिमानके बिना, कृतज्ञता चाहे बिना स्वतः लग जाता है, ऐसे ही कर्मयोगीके द्वारा दूसरोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा सहजभावसे, किसी अभिमान या कामनाके बिना, कृतज्ञता चाहे बिना स्वतः होती है। वह सेवा करनेके लिये किसी भी

१-श्रुत्वा स्मृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा श्रात्वा च यो नरः । न ह्ययति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥

(मनुस्मृति २।१८)

‘जो पुरुष सुनकर, छूकर, देखकर, खाकर और सँघकर न तो प्रसन्न होता है और न विघ्न होता है, उसे ही जितेन्द्रिय जानना चाहिये।’

२-चाहे अपने शरीरसे असंग हो जायँ, चाहे अपने शरीर-जैसे सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंसे एकता मान लें—दोनोंका परिणाम एक ही होगा। ज्ञानयोगी अपने शरीरसे असंग होता है और कर्मयोगी सब शरीरोंके साथ अपने शरीरकी एकता मानता है। एकता माननेसे वह उदार हो जाता है।

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

३६७

प्राणीको अपनेसे अलग नहीं समझता, सबको अपने ही अंग मानता है।

जैसे अपने शरीरमें भिन्न-भिन्न अवयवोंसे भिन्न-भिन्न व्यवहार होनेपर भी सब अवयवोंके साथ अपनापन समान (एक ही) रहता है, ऐसे ही कर्मयोगीके द्वारा मर्यादाके अनुसार संसारमें यथार्थयोग्य भिन्न-भिन्न व्यवहार होनेपर भी सबके साथ अपनापन समान रहता है।

अपना राग मिटानेके लिये 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' होना अर्थात् सब प्राणियोंके साथ अपनी एकता मानना बहुत आवश्यक है। कर्मयोगीका स्वभाव है—उदारता। सर्वभूतात्मभूतात्मा हुए बिना उदारता नहीं आती।

विशेष बात

क्रिया और पदार्थके साथ हम निरन्तर नहीं रह सकते और वे हमारे साथ निरन्तर नहीं रह सकते। कारण यह है कि क्रिया और पदार्थमें निरन्तर परिवर्तन होता है, पर हमारेमें (स्वरूपसे) कभी परिवर्तन नहीं होता। इसलिये क्रिया और पदार्थ निरन्तर हमारा त्याग कर रहे हैं। हम भी इनका त्याग करके ही मुक्ति पा सकते हैं, परमशान्ति पा सकते हैं। इनके साथ रहकर हम मुक्ति, परमशान्ति नहीं पा सकते; क्योंकि इनके साथ रहनेका हमारा स्वभाव नहीं है और हमारे साथ रहनेका इनका स्वभाव नहीं है। इसलिये क्रिया और पदार्थको दूसरोंकी सेवामें लगाना है। दूसरोंकी सेवामें लगाना हमारी महत्ता नहीं है, प्रत्युत वास्तविकता है। जो वास्तविकता होती है, वह सहज होती है अर्थात् उसमें परिश्रम और अभिमान नहीं होता। अवास्तविकतामें ही परिश्रम और अभिमान होता है।

क्रिया और पदार्थ दूसरोंकी सेवामें तभी लग सकते हैं, जब हमारेमें 'उदारता' आ जाय। यहाँ ध्यान देनेकी बात है कि उदारता हमारा स्वरूप है*। इसलिये उदारतामें न तो धन खर्च करनेकी आवश्यकता है और न परिश्रम करनेकी आवश्यकता है। आवश्यकता केवल इसी बातकी है कि हम सुखीको देखकर प्रसन्न हो जायँ और दुःखीको देखकर करुणित, दयालु हो जायँ। हृदयमें यह करुणा पैदा हो जाय कि यह सुखी कैसे हो? सुखीको

देखकर ऐसा भाव हो जाय कि सभी सुखी हो जायँ और दुःखीको देखकर ऐसा भाव हो जाय कि कोई दुःखी न रहे।

भगवानुने भोग और संग्रहको साधनमें बाधक बताया है (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। सुखीको देखकर प्रसन्न होनेसे भोग भोगनेकी इच्छा मिट जाती है; क्योंकि भोग भोगनेमें जो सुख मिलता है, वह सुख हमें दूसरोंको सुखी देखकर विशेषतासे मिल जायगा तो हमें भोग भोगनेकी आवश्यकता नहीं रहेगी। दुःखीको देखकर दुःखी होनेसे संग्रह करनेकी इच्छा मिट जाती है; क्योंकि अपना दुःख मिटानेके लिये जिन वस्तुओंका हम संग्रह करते हैं और व्यय करते हैं, वे स्वतः दूसरोंका दुःख दूर करनेमें लग जायँगी। जैसे अपनेपर कोई दुःख आनेसे हम उसे दूर करनेकी चेष्टा करते हैं, ऐसे ही दूसरोंको दुःखी देखकर अपनी शक्तिके अनुसार उनका दुःख दूर करनेकी चेष्टा होने लगेगी।

प्रसन्नता और करुणामें एक विलक्षण रस है। वह रस क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करके जीवको परमात्मस्वरूप नित्य रसके साथ अभिन्न करा देता है।

'योगयुक्तः'—जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, विजितात्मा और सर्वभूतात्मभूतात्मा—इन चार पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त जो कर्मयोगी है, उसे ही यहाँ 'योगयुक्तः' कहा गया है।

साधनमें स्वाभाविक प्रवृत्ति न होनेमें कारण है—उद्देश्य और रुचिमें भिन्नता। जबतक अन्तःकरणमें संसारका महत्त्व है, तबतक उद्देश्य और रुचिका संघर्ष प्रायः मिटता नहीं। उद्देश्य अविनाशी परमात्माका होता है और रुचि प्रायः नाशवान् संसारके प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिकी होती है। उद्देश्य और रुचि अभिन्न हो जानेपर साधन स्वतः तेजीसे होने लगता है। यहाँ 'योगयुक्तः' पद ऐसे कर्मयोगीके लिये आया है, जिसका उद्देश्य और रुचि अभिन्न हो गयी है अर्थात् उद्देश्य और रुचि—दोनों एक परमात्मामें ही हो गये हैं।

उत्पन्न और नष्ट होनेवाला फल किंचिन्मात्र भी न चाहें, तभी कर्मयोग होता है। फल और उद्देश्य दोनों भिन्न-भिन्न होते हैं। कर्मयोगीमें फलकी इच्छा तो नहीं होती, पर उद्देश्य

  • उदारता गुण भी है और अपना स्वरूप भी। हमारे पास जो पदार्थ हैं, वे दूसरोंकी सेवामें लग जायँ—इस भावसे उन्हें दूसरोंकी सेवामें लगाया जाय, यह उदारता 'गुण' है। हमारे पास जो पदार्थ हैं, वे हमारे हैं ही नहीं—ऐसा समझकर उन्हें दूसरोंकी सेवामें लगाया जाय, यह उदारता हमारा 'स्वरूप' है; क्योंकि इसमें पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और स्वरूप ज्यों-का-त्यों रह जाता है।

३६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

अवश्य होता है। कर्मयोगीका उद्देश्य वही होता है, जो सबको मिल सकता है और सदा साथ रहता है। जो किसीको मिलता है, किसीको नहीं मिलता और कभी रहता है, कभी नहीं रहता, वह उसका उद्देश्य नहीं होता है। इस दृष्टिसे उद्देश्य सदा परमात्मतत्त्वका ही होता है। परमात्मतत्त्व किसी कर्म, अभ्यास आदिका फल नहीं है। फल उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है, पर परमात्मा नित्य रहते हैं। उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुको कर्मयोगी चाहता ही नहीं; क्योंकि उसकी चाहना ही परमात्मप्राप्तिमें बाधक है। एकमात्र परमात्माका ही उद्देश्य होनेसे कर्मयोगीको 'योगयुक्त' कहा गया है।

यहाँ जिसे 'योगयुक्तः' कहा गया है, उसे ही छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें 'योगारूढः' कहा गया है।

'कुर्वन्नपि न लिप्यते '—कर्मयोगी कर्म करते हुए भी कर्मसे नहीं बँधता। कर्मके बन्धनमें हेतु हैं—कर्मके प्रति ममता, कर्मके फलकी इच्छा, कर्मजन्म सुखकी इच्छा तथा उसका भोग और कर्तृत्वाभिमान*। सारांशमें कर्मसे कुछ—न—कुछ पानेकी इच्छा ही बन्धनमें कारण है। किंचिन्मात्र भी पानेकी इच्छा न होनेके कारण कर्मयोगी कर्म करते हुए भी उनसे बँधता नहीं अर्थात् उसके कर्म अकर्म हो जाते हैं।

सांख्ययोगी तो 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' (गीता ३।२८) 'गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं'—ऐसा मानकर कर्मसे नहीं

परिशिष्ट भाव —शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरणसे प्राणियोंके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है, तब कर्म करते हुए भी उसमें कर्तापन नहीं रहता। कर्तापन न रहनेसे उसके द्वारा होनेवाले कर्म बन्धनकारक नहीं होते (गीता—अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—कर्मके होनेके विषयमें कर्मयोगीकी बात कहकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें सांख्ययोगके साधनकी बात कहते हैं।

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।

पश्यत्शृण्वन्स्पृशज्जिघ्नन्शननाच्छस्वपञ्चवसन् ॥ ८ ॥

प्रलपन्विस्मृजन्गृह्णन्नुमिषन्निमिषन्निपि ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥

तत्त्ववित्= तत्त्वकोयुक्तः= सांख्ययोगीशृण्वन्= सुनता हुआ,
जाननेवालापश्यन्= देखता हुआ,स्पृशन्= छूता हुआ,
  • दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगके स्वरूपका विवेचन करते हुए भगवान्ने 'मा कर्मफलहेतुर्भूः' पदोंसे कर्मके प्रति ममता, कर्मजन्म सुखकी इच्छा तथा उसका भोग और कर्तृत्वाभिमान मिटानेके लिये कहा है तथा 'मा फलेषु कदाचन' पदोंसे कर्मके फलकी इच्छा मिटानेके लिये कहा है।

श्लोक ८-९]

  • साधक-संजीवनी *

३६९

जिघ्न्= सँघृता हुआ,श्वसन= श्वास लेता हुआवर्तन्ते= बरत रही हैं—
अशन्= खाता हुआ,(तथा)इति= ऐसा
गच्छन्= चलता हुआउन्मिषन्= आँख खोलता हुआधारयन्= समझकर
गृह्णन्= ग्रहण करता हुआ,(और)किञ्चित्= '(मैं स्वयं) कुछ
निमिषन्= मूँदता हुआएव= भी
प्रलपन्= बोलता हुआ,अपि= भी= नहीं
विमुञ्जन्= (मल-मूत्रका) त्याग करता हुआ,इन्द्रियाणि= 'सम्पूर्ण इन्द्रियाँकरोमि= करता हूँ—
इन्द्रियार्थेषु= इन्द्रियोंके विषयोंमेंइति= ऐसा
स्वप्न= सोता हुआ,मन्येत= माने।

व्याख्या —'तत्त्ववित् युक्तः'—यहाँ ये पद सांख्य-योगके विवेकशील साधकके वाचक हैं, जो तत्त्ववित् महापुरुषकी तरह निश्चित अनुभव करनेके लिये तत्पर रहता है। उसमें ऐसा विवेक जाग्रत् हो गया है कि सब क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं, उन क्रियाओंका मेरे साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं।

जो अपनेमें अर्थात् स्वरूपमें कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी क्रियाके कर्तापनको नहीं देखता, वह 'तत्त्ववित्' है। उसमें नित्य-निरन्तर स्वाभाविक ही यह सावधानी रहती है कि स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं। प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिके साथ वह कभी भी अपनी एकता स्वीकार नहीं करता, इसलिये इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको वह अपनी क्रियाएँ मान ही कैसे सकता है?

वास्तवमें उपर्युक्त स्थिति स्वरूपसे सभी मनुष्योंकी है; परन्तु वे भूलसे स्वरूपको क्रियाओंका कर्ता मान लेते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। परमात्माकी जिस शक्तिके समष्टि संसारकी क्रियाएँ हो रही हैं, उसी शक्तिके व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी हो रही हैं। परन्तु समष्टिके ही क्षुद्र अंश व्यष्टिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण मनुष्य व्यष्टिकी कुछ क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है। इस मान्यताको हटानेके लिये ही भगवान् कहते हैं कि साधक अपनेको कभी कर्ता न माने। जबतक किसी भी अंशमें कर्तापनकी मान्यता है, तबतक वह साधक कहा जाता है। जब अपनेमें कर्तापनकी मान्यताका सर्वथा अभाव होकर अपने स्वरूपका अनुभव हो जाता है, तब वह तत्त्ववित् महापुरुष कहा जाता है। जैसे स्वप्नसे जगनेपर मनुष्यका स्वप्नसे बिलकुल सम्बन्ध नहीं रहता, ऐसे ही तत्त्ववित् महापुरुषका शरीरादिके होनेवाली

क्रियाओंसे बिलकुल सम्बन्ध (कर्तापन) नहीं रहता।

यहाँ 'तत्त्ववित्' वही है, जो प्रकृति और पुरुषके विभागको अर्थात् गुण और क्रिया सब प्रकृतिमें है, प्रकृतिके अतीत तत्त्वमें गुण और क्रिया नहीं है—इसको ठीक-ठीक जानता है। प्रकृतिके अतीत निर्विकार तत्त्व तो सबका प्रकाशक और आधार है। सबका प्रकाशक होता हुआ भी वह प्रकाशके अन्तर्गत ओत-प्रोत है। प्रकाश (शरीर आदि) में घुला-मिला रहनेपर भी प्रकाशक प्रकाशक ही है और प्रकाश प्रकाश ही है। ऐसे ही वह सबका आधार होता हुआ भी सबके (आधेयके) कण-कणमें व्याप्त है; पर वह कभी आधेय नहीं होता। कारण कि जो प्रकाशक और आधार है, उसमें करना और होना नहीं है। करना और होनारूप परिवर्तन तो प्रकाश अथवा आधेयमें ही है। इस तरह प्रकाशक और प्रकाश, आधार और आधेयके भेद-(विभाग-) को जो ठीक तरहसे जानता है, वही 'तत्त्ववित्' है। इसी प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष-(क्षेत्रज्ञ-) के विभागको जाननेकी बात भगवान्ने पहले दूसरे अध्यायके सोलहवाँ श्लोकमें और आगे सातवाँ अध्यायके चौथे-पाँचवाँ तथा तेरहवाँ अध्यायके दूसरे, उन्नीसवाँ, तेईसवाँ और चौतीसवाँ श्लोकमें कही है।

'पर्यञ्शृण्वन्स्पृशन्' " " उन्मिषन्निमिषन्निपि' — यहाँ देखना, सुनना, स्पर्श करना, सँघृणा और खाना—ये पाँचों क्रियाएँ (क्रमशः नेत्र, श्रोत्र, त्वचा, प्राण और रसना—इन पाँच) ज्ञानेन्द्रियोंकी हैं। चलना, ग्रहण करना, बोलना और मल-मूत्रका त्याग करना—ये चारों क्रियाएँ (क्रमशः पाद, हस्त, वाक्, उपस्थ और गुदा—इन पाँच) कर्मेन्द्रियोंकी हैं*। सोना—यह एक क्रिया अन्तःकरणकी है। श्वास लेना—यह एक क्रिया प्राणकी और आँखें खोलना

  • यहाँ पाँचों कर्मेन्द्रियोंकी क्रियाओंका वर्णन चार क्रियाओंके अन्तर्गत किया गया है अर्थात् 'विमुञ्जन्' क्रियाके अन्तर्गत ही उपस्थ और गुदाकी क्रियाओंका वर्णन किया गया है।

३७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

तथा मूँदना—ये दो क्रियाएँ ‘कूर्म’ नामक उपप्राणकी हैं। उपर्युक्त तेरह क्रियाएँ देकर भगवान्ने ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, अन्तःकरण, प्राण और उपप्राणसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंका उल्लेख कर दिया है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिके द्वारा ही होती हैं, स्वयंके द्वारा नहीं। दूसरा एक भाव यह भी प्रतीत होता है कि सांख्ययोगीके द्वारा वर्ण, आश्रम, स्वभाव, परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रविहित शरीर-निर्वाहकी क्रियाएँ, खान-पान, व्यापार करना, उपदेश देना, लिखना, पढ़ना, सुनना, सोचना आदि क्रियाएँ न होती हैं—ऐसी बात नहीं है। उसके द्वारा ये सब क्रियाएँ हो सकती हैं।

मनुष्य अपनेको उन्हीं क्रियाओंका कर्ता मानता है, जिनको वह जानकर अर्थात् मन-बुद्धिपूर्वक करता है; जैसे पढ़ना, लिखना, सोचना, देखना, भोजन करना आदि। परन्तु अनेक क्रियाएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें मनुष्य जानकर नहीं करता; जैसे—श्वासका आना-जाना, आँखोंका खुलना और बंद होना आदि। फिर इन क्रियाओंका कर्ता अपनेको न माननेकी बात इस श्लोकमें कैसे कही गयी? इसका उत्तर यह है कि सामान्यरूपसे श्वासोंका आना-जाना आदि क्रियाएँ स्वाभाविक होनेवाली हैं; किन्तु प्राणायाम आदिमें मनुष्य श्वास लेना आदि क्रियाएँ जानकर करता है। ऐसे ही आँखोंको खोलना और बंद करना भी जानकर किया जा सकता है। इसलिये इन क्रियाओंका कर्ता भी अपनेको न माननेके लिये कहा गया है। दूसरी बात, जैसे मनुष्य ‘श्वसन् उन्मिषन् निमिषन्’ (श्वास लेना, आँखोंको खोलना और मूँदना)—इन क्रियाओंको स्वाभाविक मानकर इनमें अपना कर्तापन नहीं मानता, ऐसे ही अन्य क्रियाओंको भी स्वाभाविक मानकर उनमें अपना कर्तापन नहीं मानना चाहिये।

यहाँ ‘पश्यन्’ आदि जो तेरह क्रियाएँ बतायी हैं, इनका बिना किसी आधारके होना सम्भव नहीं है। ये क्रियाएँ जिसके आश्रित होती हैं अर्थात् इन क्रियाओंका जो आधार है, उसमें कभी कोई क्रिया नहीं होती। ऐसे ही प्रकाशित होनेवाली ये सम्पूर्ण क्रियाएँ बिना किसी प्रकाशके सिद्ध नहीं हो सकतीं। जिस प्रकाशसे ये क्रियाएँ प्रकाशित होती हैं, जिस प्रकाशके अन्तर्गत होती हैं, उस प्रकाशमें कभी कोई क्रिया हुई नहीं, होती नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं और होनी सम्भव भी नहीं। ऐसा वह तत्त्व सबका आधार, प्रकाशक और स्वयं प्रकाशस्वरूप

है। वह सबमें रहता हुआ भी कुछ नहीं करता। उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें ही उपर्युक्त इन तेरह क्रियाओंका तात्पर्य है।

‘इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्’—जब स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं, तब क्रियाएँ कैसे और किसके द्वारा हो रही हैं?—इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् उपर्युक्त पदोंमें कहते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाएँ इन्द्रियोंके द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंमें ही हो रही हैं। यहाँ भगवान्का तात्पर्य इन्द्रियोंमें कर्तृत्व बतानेमें नहीं है, प्रत्युत स्वरूपको कर्तृत्वरहित (निर्लिप्त) बतानेमें है।

ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, अन्तःकरण, प्राण, उपप्राण आदि सबको यहाँ ‘इन्द्रियाणि’ पदके अन्तर्गत लिया गया है। इन्द्रियोंके पाँच विषय हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। इन विषयोंमें ही इन्द्रियोंका बर्ताव होता है। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय प्रकृतिका कार्य हैं। इसलिये इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं—

(१) प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः।

(गीता ३।२७)

(२) प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।

(गीता १३।२९)

गुणोंका कार्य होनेसे इन्द्रियों और उनके विषयोंको ‘गुण’ ही कहा जाता है। अतः गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (गीता ३।२८)। गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है—‘नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति’ (गीता १४।१९)। तात्पर्य यह है कि क्रियामात्रको चाहे प्रकृतिसे होनेवाली कहें, चाहे प्रकृतिके कार्य गुणोंके द्वारा होनेवाली कहें, चाहे इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली कहें, बात वास्तवमें एक ही है।

क्रियाका तात्पर्य है—परिवर्तन। परिवर्तनरूप क्रिया प्रकृतिमें ही होती है। स्वरूपमें परिवर्तनरूप क्रिया लेशमात्र भी नहीं है। कारण कि प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है और स्वरूप कर्तापनसे रहित है। प्रकृति कभी अक्रिय नहीं हो सकती और स्वरूपमें कभी क्रिया नहीं हो सकती। क्रियामात्र प्रकाश्य है और स्वरूप प्रकाशक है।

‘नैव किञ्चित्करोमीति मन्यते’—यहाँ ‘मैं (स्वरूपसे) कर्ता नहीं हूँ’—इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं (स्वरूप) पहले कर्ता था। स्वरूपमें कर्तापन न तो वर्तमानमें है, न भूतमें था और न भविष्यमें ही होगा।

श्लोक ८-९]

  • साधक-संजीवनी *

३७९

क्रियामात्र प्रकृतिमें ही हो रही है; क्योंकि प्रकृति सदा क्रियाशील है और पुरुष अर्थात् चेतन-तत्त्व सदा क्रियारहित है। जब चेतन अनादि भूलसे प्रकृतिके कार्यके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब वह प्रकृतिकी क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है और उन क्रियाओंका कर्ता स्वयं बन जाता है (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)।

जैसे, एक मनुष्य चलती हुई रेलगाड़ीके डिब्बेमें बैठा हुआ है, चल नहीं रहा है; परन्तु रेलगाड़ीके चलनेके कारण उसका चले बिना ही चलना हो जाता है। रेलगाड़ीमें चढ़नेके कारण अब वह चलनेसे रहित नहीं हो सकता। ऐसे ही क्रियाशील प्रकृतिके कार्यरूप स्थूल, सूक्ष्म और कारण—किसी भी शरीरके साथ जब स्वयं अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब स्वयं कर्म न करते हुए भी वह उन शरीरोंसे होनेवाली क्रियाओंका कर्ता हुए बिना रह नहीं सकता।

सांख्ययोगी शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदिके साथ कभी अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इसलिये वह कर्मोंका कर्तापन अपनेमें कभी अनुभव नहीं करता (गीता—पाँचवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। जैसे शरीरका बालकसे युवा होना, बालोंका कालेसे सफेद होना, खाये हुए अन्नका पचना, शरीरका सबल अथवा निर्बल होना आदि क्रियाएँ स्वाभाविक (अपने-आप) होती हैं, ऐसे ही दूसरी सम्पूर्ण क्रियाओंको भी सांख्ययोगी स्वाभाविक होनेवाली अनुभव करता है। तात्पर्य है कि वह अपनेको किसी भी क्रियाका कर्ता अनुभव नहीं करता।

गीतामें स्वयंको कर्ता माननेवालेकी निन्दा की गयी है (तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। इसी प्रकार शुद्ध स्वरूपको कर्ता माननेवालेको मलिन अन्तःकरणवाला और दुर्मीत कहा गया है (अठारहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। परन्तु स्वरूपको अकर्ता माननेवालेकी प्रशंसा की गयी है (तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)।

‘एव’ पद देनेका तात्पर्य है कि साधक कभी किंचिन्मात्र भी अपनेमें कर्तापनकी मान्यता न करे अर्थात् कभी किसी भी अंशमें अपनेको किसी कर्मका कर्ता न माने। इस प्रकार जब अपनेमें कर्तापनका भाव नहीं रहता, तब उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंकी संज्ञा ‘कर्म’ नहीं रहती, प्रत्युत ‘क्रिया’ रहती है। उन्हें ‘चेष्टामात्र’ कहा जाता है। इसी लक्ष्यसे तीसरे अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें ज्ञानी महापुरुषसे होनेवाली क्रियाको ‘चेष्टते’ पदसे कहा गया है।

यहाँ ‘एव’ पद देनेका दूसरा तात्पर्य यह है कि स्वयंका शरीरके साथ तादात्म्य होनेपर भी, शरीरके साथ कितना ही घुल-मिल जानेपर भी और अपनेको ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसे मान लेनेपर भी स्वयंमें कभी कर्तृत्व आता ही नहीं और न कभी आ ही सकता है। किंतु प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके यह स्वयं अपनेमें कर्तृत्व मान लेता है; क्योंकि इसमें मानने और न माननेकी सामर्थ्य है, स्वतन्त्रता है, इसलिये यह अपनेको कर्ता भी मान लेता है और जब यह अपनी तरफ देखता है तो अकर्तापन भी इसके अनुभवमें आता है। ये दोनों बातें (अपनेमें कर्तृत्व मानना और न मानना) होनेपर भी स्वयंमें कभी कर्तृत्व आता ही नहीं। तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है—शरीरमें रहता हुआ भी वह न करता है और न लिप्त ही होता है। भोक्ता तो प्रकृतिस्थ पुरुष ही बनता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)। गुणोंका—क्रियाफलका भोक्ता बननेपर भी वह वास्तवमें अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होता; किन्तु अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि न रहनेसे अपनेमें लिप्तताका भाव पैदा होता है।

यद्यपि पुरुष स्वयं स्वरूपसे निलिप्त है, उसमें भोक्तापन है नहीं, हो सकता नहीं, तथापि सुख-दुःखका भोक्ता तो स्वयं पुरुष (चेतन) ही बनता है अर्थात् सुखी-दुःखी तो स्वयं पुरुष (चेतन) ही होता है, जड़ नहीं; क्योंकि जड़में सुखी-दुःखी होनेकी शक्ति और योग्यता नहीं है। तो फिर पुरुषमें भोक्तापन है नहीं और सुख-दुःखका भोक्ता पुरुष ही बनता है—ये दोनों बातें कैसे? भोगके समय जो भोगाकार—सुख-दुःखाकार वृत्ति बनती है, वह तो प्रकृतिकी होती है और प्रकृतिमें ही होती है। परन्तु उस वृत्तिके साथ तादात्म्य होनेसे सुखी-दुःखी होना अर्थात् ‘मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ’—ऐसी मान्यता अपनेमें स्वयं पुरुष ही करता है। कारण कि यह मानना पुरुषके बिना नहीं होता अर्थात् यह मानना पुरुषमें ही हो सकता है, जड़में नहीं; इस दृष्टिसे पुरुष भोक्ता कहा गया है। सुखी-दुःखी होना अपनेमें माननेपर भी अर्थात् सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी—ऐसी मान्यता अपनेमें करनेपर भी पुरुष स्वयं अपने स्वरूपसे निलिप्त और सुख-दुःखका प्रकाशकमात्र ही रहता है; इस दृष्टिसे पुरुषमें भोक्तापन है नहीं और हो सकता ही नहीं। कारण कि एकदेशीयपनसे ही भोक्तापन होता है और एकदेशीयपन अहंकारसे होता है। अहंकार प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति जड़ है; अतः उसका कार्य भी जड़ ही होता

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

है अर्थात् भोक्तापन भी जड़ ही होता है। इसलिये भोक्तापन पुरुष-(चेतन-) में नहीं है। अगर यह पुरुष सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी होता तो इसका स्वरूप परिवर्तनशील ही होता; क्योंकि सुखका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा दुःखका भी आरम्भ और अन्त होता है। ऐसे ही यह पुरुष भी आरम्भ और अन्तवाला हो जाता, जो कि सर्वथा अनुचित है। कारण कि गीताने इसको अक्षर, अव्यय और निलिप्त कहा है और तत्त्वज्ञ पुरुषोंने इसका स्वरूप एकरस, एकरूप माना है। अगर इस पुरुषको सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी होनेवाला ही मानें, तो फिर पुरुष सदा एकरस, एकरूप रहता है—ऐसा कैसे कह सकते हैं?

विशेष बात

तीसरे अध्यायके सताईसवें श्लोकमें ‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’—इसमें आये ‘मन्यते’ पदसे जो बात आयी थी, उसीका निषेध यहाँ ‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’—इसमें आये ‘मन्येत’ पदसे किया गया है। ‘मन्येत’ पदका अर्थ मानना नहीं है, प्रत्युत अनुभव करना है; क्योंकि स्वरूपमें क्रिया नहीं है—यह अनुभव है, मान्यता नहीं। कर्म करते समय अथवा न करते समय—दोनों अवस्थाओंमें स्वरूपमें अकर्तापन ज्यों-का-त्यों है। इसलिये तत्त्ववित् पुरुष यह अनुभव करता है कि कर्म करते समय भी मैं वही था और कर्म न करते समय भी मैं वही रहा; अतः कर्म करने अथवा न करनेसे अपने स्वरूप-(अपनी सत्ता-) में क्या फर्क पड़ा? अर्थात् स्वरूप तो अकर्ता ही रहा। इस प्रकार प्रकृतिके परिवर्तनका ज्ञान (अनुभव) तो सबको होता है, पर अपने स्वरूपके

परिशिष्ट भाव —विवेकशील ज्ञानयोगी पहले ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, अन्तःकरण तथा प्राणोंसे होनेवाली क्रियाओंको करते हुए भी ‘मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ’—ऐसा मानता है, फिर उसको ऐसा अनुभव हो जाता है। वास्तवमें चिन्मय सत्तामात्रमें न करना है, न होना है! प्रकृतिमें ही होती हैं, स्वयंमें नहीं। अतः स्वयंका किसी

अहंकारसे मोहित होकर स्वयंने भूलसे अपनेको कर्ता मान लिया तो वह कर्मोंसे तथा उनके फलोंसे बँध गया और चौरासी लाख योनियोंमें चला गया। अब अगर वह अपनेको अहंमसे अलग माने और अपनेको कर्ता न माने अर्थात् स्वयं वास्तवमें जैसा है, वैसा ही अनुभव कर ले तो उसके तत्त्ववित् (मुक्त) होनेमें आश्चर्य ही क्या है? तात्पर्य है कि जो असत्य है, वह भी जब सत्य मान लेनेसे सत्य दीखने लग गया, तो फिर जो वास्तवमें सत्य है, उसको मान लेनेपर

परिवर्तनका ज्ञान किसीको नहीं होता। स्वरूप सम्पूर्ण क्रियाओंका निलिप्तरूपसे आश्रय, आधार और प्रकाशक है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तनकी सम्भावना नहीं है।

स्वरूपमें कभी अभाव नहीं होता। जब वह प्रकृतिके साथ रागसे तादात्म्य मान लेता है, तब उसे अपनेमें अभाव प्रतीत होने लग जाता है। उस अभावकी पूर्तिके लिये वह पदार्थोंकी कामना करने लग जाता है। कामनाकी पूर्तिके लिये उसमें कर्तापन आ जाता है; क्योंकि कामना हुए बिना स्वरूपमें कर्तापन नहीं आता।

प्रकृतिसे सम्बन्धके बिना स्वयं कोई क्रिया नहीं कर सकता। कारण कि जिन करणोंसे कर्म होते हैं, वे करण प्रकृतिके ही हैं। कर्ता करणके अधीन होता है। जैसे कितना ही योग्य सुनार क्यों न हो, पर वह अहरन, हथौड़ा आदि औजारोंके बिना कार्य नहीं कर सकता, ऐसे ही कर्ता करणोंके बिना कोई क्रिया नहीं कर सकता। इस प्रकार योग्यता, सामर्थ्य और करण—ये तीनों प्रकृतिमें ही हैं और प्रकृतिके सम्बन्धसे ही अपनेमें प्रतीत होते हैं। ये तीनों घटते-बढ़ते हैं और स्वरूप सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। अतः इनका स्वरूपसे सम्बन्ध है ही नहीं।

कर्तापन प्रकृतिके सम्बन्धसे है, इसलिये अपनेको कर्ता मानना परधर्म है। स्वरूपमें कर्तापन नहीं है, इसलिये अपनेको अकर्ता मानना स्वधर्म है। जैसे ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपन-(मैं ब्राह्मण हूँ, इस-) में निरन्तर स्थित रहता है, ऐसे ही तत्त्ववित् अपने अकर्तापन-(स्वधर्म-) में निरन्तर स्थित रहता है—यही ‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ पदोंका भाव है।

श्लोक ८-१]

  • साधक-संजीवनी *

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वह वैसा ही दीखने लग जाय तो इसमें क्या आश्चर्य है?

वास्तवमें स्वयं जिस समय अपनेको कर्ता-भोक्ता मानता है, उस समय भी वह कर्ता-भोक्ता नहीं है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३।३१)। कारण कि अपना स्वरूप सत्तामात्र है। सत्तामें अहम् नहीं है और अहम्की सत्ता नहीं है। अतः ‘मैं कर्ता हूँ’—यह मान्यता कितनी ही दृढ़ हो, है तो भूल ही! भूलको भूल मानते ही भूल मिट जाती है—यह नियम है। किसी गुफामें सैकड़ों वर्षोंसे अन्धकार हो तो प्रकाश करते ही वह तत्काल मिट जाता है, उसके मिटनेमें अनेक वर्ष-महीने नहीं लगते। इसलिये साधक दृढ़तासे यह मान ले कि ‘मैं कर्ता नहीं हूँ।’ फिर यह मान्यता मान्यतारूपसे नहीं रहेगी, प्रत्युत अनुभवमें परिणत हो जायगी।

जड़-चेतनका तादात्म्य होनेसे ‘मैं’ का प्रयोग जड़ (तादात्म्यरूप अहम्) के लिये भी होता है और चेतन (स्वरूप) के लिये भी होता है। जैसे, ‘मैं कर्ता हूँ’—इसमें जड़की तरफ दृष्टि है और ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’—इसमें (जड़का निषेध होनेसे) चेतनकी तरफ दृष्टि है। जिसकी दृष्टि जड़की तरफ है अर्थात् जो अहम्को अपना स्वरूप मानता है, वह ‘अहंकारविमूढात्मा’ है और जिसकी दृष्टि चेतन (अहंरहित स्वरूप) की तरफ है, वह ‘तत्त्ववित्’ है।

जब साधक वर्तमानमें ‘मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ’—इस प्रकार स्वयंको अकर्ता अनुभव करनेकी चेष्टा करता है, तब उसके सामने एक बड़ी समस्या आती है। जब उसको भूतकालमें किये हुए अच्छे कर्मोंकी याद आती है, तब वह प्रसन्न हो जाता है कि मैंने बहुत अच्छा काम किया, बहुत ठीक किया! और जब उसको निषिद्ध कर्मोंकी याद आती है, तब वह दुःखी हो जाता है कि मैंने बहुत बुरा काम किया, बहुत गलती की। इस प्रकार भूतकालमें किये गये कर्मोंके संस्कार उसको सुखी-दुःखी करते हैं। इस विषयमें एक मार्मिक बात है। स्वरूपमें कर्तापन न तो वर्तमानमें है, न भूतकालमें था और न भविष्यमें ही होगा। अतः साधकको यह देखना चाहिये कि जैसे वर्तमानमें स्वयं अकर्ता है, ऐसे ही भूतकालमें भी स्वयं अकर्ता ही था। कारण कि वर्तमान ही भूतकालमें गया है। स्वरूप सत्तामात्र है और सत्तामात्रमें कोई कर्म करना बनता ही नहीं। कर्म केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाले अज्ञानी मनुष्यके द्वारा ही होते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। साधकको भूतकालमें किये हुए कर्मोंकी याद आनेसे जो सुख-दुःख होता है, चिन्ता होती है, यह भी वास्तवमें अहंकारके कारण ही है। वर्तमानमें अहंकारविमूढात्मा होकर अर्थात् अहंकारके साथ अपना सम्बन्ध मानकर ही साधक सुखी-दुःखी होता है। स्थूलदृष्टिसे देखें तो जैसे अभी भूतकालका अभाव है, ऐसे ही भूतकालमें किये गये कर्मोंका भी अभी प्रत्यक्ष अभाव है। सूक्ष्मदृष्टिसे देखें तो जैसे भूतकालमें वर्तमानका अभाव था, ऐसे ही भूतकालका भी अभाव था। इसी तरह वर्तमानमें जैसे भूतकालका अभाव है, ऐसे ही वर्तमानका भी अभाव है। परन्तु सत्ताका नित्य-निरन्तर भाव है। तात्पर्य है कि सत्तामात्रमें भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनोंका ही सर्वथा अभाव है। सत्ता कालसे अतीत है। अतः वह किसी भी कालमें कर्ता नहीं है। उस कालातीत और अवस्थातीत सत्तामें किसी कालविशेष और अवस्थाविशेषको लेकर कर्तृत्व तथा भोक्तृत्वका आरोप करना अज्ञान है। अतः भूतकालमें किये गये कर्मोंकी स्मृति अहंकारविमूढात्माकी स्मृति है, तत्त्ववित्की नहीं।

‘नैव किञ्चित्करोमि’ का तात्पर्य है कि क्रिया नहीं है, पर सत्ता है। अतः साधककी दृष्टि सत्तामात्रकी तरफ रहनी चाहिये। वह सत्ता चिन्मय होनेसे ज्ञानस्वरूप है और निर्विकार होनेसे आनन्दस्वरूप है। यह आनन्द अखण्ड, शान्त, एकरस है।

शरीरसे तादात्म्य होनेके कारण प्रत्येक क्रियामें स्वयंकी मुख्यता रहती है कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ आदि। क्रिया तो होती है शरीरमें, पर मान लेते हैं अपनी। स्वयंमें कोई क्रिया नहीं है, वह करने और न करने—दोनोंसे रहित है (गीता—तीसरे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), इसलिये शरीरके द्वारा क्रिया होनेपर भी सत्तामात्र अपने स्वरूपपर दृष्टि रहनी चाहिये कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।

सम्बन्ध—सातवें श्लोकमें कर्मयोगीकी और आठवें-नवें श्लोकोंमें सांख्ययोगीकी कर्मोंसे निलिप्तता बताकर अब भगवान् भक्तियोगीकी कर्मोंसे निलिप्तता बताते हैं।