श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
व्याख्या —‘प्रशान्तमनसं होनं ..... ब्रह्मभूत-मकल्मषम्’—जिसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गये हैं अर्थात् तमोगुण और तमोगुणकी अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह (गीता—चौदहवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)—ये वृत्तियाँ नष्ट हो गयी हैं, ऐसे योगीको यहाँ ‘अकल्मषम्’ कहा गया है।
जिसका रजोगुण और रजोगुणकी लोभ, प्रवृत्ति, नये-नये कर्मोंमें लगना, अशान्ति और स्मृहा (गीता—चौदहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)—ये वृत्तियाँ शान्त हो गयी हैं, ऐसे योगीको यहाँ ‘शान्तरजसम्’ बताया गया है।
तमोगुण, रजोगुण तथा उनकी वृत्तियाँ शान्त होनेसे जिसका मन स्वाभाविक शान्त हो गया है अर्थात् जिसकी मात्र प्राकृत पदार्थोंसे तथा संकल्प-विकल्पोंसे भी उपरति हो गयी है, ऐसे स्वाभाविक शान्त मनवाले योगीको यहाँ ‘प्रशान्तमनसम्’ कहा गया है।
‘प्रशान्त’ कहनेका तात्पर्य है कि ध्यानयोगी जबतक मनको अपना मानता है, तबतक मन अध्याससे शान्त तो हो सकता है, पर प्रशान्त अर्थात् सर्वथा शान्त नहीं हो सकता। परन्तु जब ध्यानयोगी मनसे भी उपराम हो जाता
है अर्थात् मनको भी अपना नहीं मानता, मनसे भी सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है, तब मनमें राग-द्वेष न होनेसे उसका मन स्वाभाविक ही शान्त हो जाता है।
पचीसवें श्लोकमें जिसकी उपरामताका वर्णन किया गया है, वही (उपराम होनेसे) पापरहित, शान्त रजोगुणवाला और प्रशान्त मनवाला हुआ है। अतः उस योगीके लिये यहाँ ‘एनम्’ पद आया है। ऐसे ब्रह्मस्वरूप ध्यानयोगीको स्वाभाविक ही उत्तम सुख अर्थात् सात्त्विक सुख प्राप्त होता है।
पहले तेईसवें श्लोकके उत्तरार्धमें जिस योगका निश्चय-पूर्वक अभ्यास करनेकी आज्ञा दी गयी थी—‘स निश्चयेन योक्तव्यः’ उस योगका अभ्यास करनेवाले योगीको निश्चित ही उत्तम सुखकी प्राप्ति हो जायगी, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। इस निःसन्दिग्धताको बतानेके लिये यहाँ ‘हि’ पदका प्रयोग हुआ है।
‘सुखमुपैति’ कहनेका तात्पर्य है कि जो योगी सबसे उपराम हो गया है, उसको उत्तम सुखकी खोज नहीं करनी पड़ती, उस सुखकी प्राप्तिके लिये उद्योग, परिश्रम आदि नहीं करने पड़ते, प्रत्युत वह उत्तम सुख उसको स्वतः—स्वाभाविक ही प्राप्त हो जाता है।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पृशमित्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥
| एवम् | = इस प्रकार | लगाता हुआ | ब्रह्मसंस्पृशम् | = ब्रह्मप्राप्तिरूप |
|---|---|---|---|---|
| आत्मानम् | = अपने-आपको | विगतकल्मषः | = पापरहित | अत्यन्तम् |
| सदा | = सदा | योगी | = योगी | सुखम् |
| युञ्जन् | = (परमात्मामें) | सुखेन | = सुखपूर्वक | अश्नुते |
व्याख्या —‘युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगत-कल्मषः’—‘अपनी स्थितिके लिये जो (मनको बार-बार लगाना आदि) अभ्यास किया जाता है, वह अभ्यास यहाँ नहीं है। यहाँ तो अभ्यास ही अभ्यास है अर्थात् अपने स्वरूपमें अपने-आपको दृढ़ रखना ही अभ्यास है। इस अभ्यासमें अभ्यासवृत्ति नहीं है। ऐसे अभ्याससे वह योगी अहंता-ममतारहित हो जाता है। अहंता और ममतासे रहित होना ही पापोंसे रहित होना है; क्योंकि संसारके साथ अहंता-ममतापूर्वक सम्बन्ध रखना ही पाप है।
पंद्रहवें श्लोकमें ‘युञ्जन्नेवम्’ पद सगुणके ध्यानके लिये आया है और यहाँ ‘युञ्जन्नेवम्’ पद निर्गुणके
ध्यानके लिये आया है। ऐसे ही पंद्रहवें श्लोकमें ‘नियतमानसः’ आया है और यहाँ ‘विगतकल्मषः’ आया है; क्योंकि वहाँ परमात्मामें मन लगानेकी मुख्यता है और यहाँ जड़ताका त्याग करनेकी मुख्यता है। वहाँ तो परमात्माका चिन्तन करते-करते मन सगुण परमात्मामें तल्लीन हो गया तो संसार स्वतः ही छूट गया और यहाँ अहंता-ममतारूप कल्मषसे अर्थात् संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करके अपने ध्येय परमात्मामें स्थित हो गया। इस प्रकार दोनोंका तात्पर्य एक ही हुआ अर्थात् वहाँ परमात्मामें लगनेसे संसार छूट गया और यहाँ संसारको छोड़कर परमात्मामें स्थित हो गया।
‘सुखेन ब्रह्मसंस्पृशमित्यन्तं सुखमश्नुते’—उसकी
श्लोक २१]
- साधक-संजीवनी *
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ब्रह्मके साथ जो अभिन्नता होती है, उसमें 'मैं'-पनका संस्कार भी नहीं रहता, सत्ता भी नहीं रहती। यही सुखपूर्वक ब्रह्मका संसर्ष करना है। जिस सुखमें अनुभव करनेवाला और अनुभवमें आनेवाला—ये दोनों ही नहीं रहते, वह 'अत्यन्त
सुख' है। इस सुखको योगी प्राप्त कर लेता है। यह 'अत्यन्त सुख', 'अक्षय सुख' (पाँचवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक) और 'आत्यन्तिक सुख' (छठे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)—ये एक ही परमात्मतत्वरूप आनन्दके वाचक हैं।
सम्बन्ध—अठारहवेंसे तेईसवें श्लोकतक स्वरूपका ध्यान करनेवाले जिस सांख्ययोगीका वर्णन हुआ है, उसके अनुभवका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २१ ॥
| सर्वत्र | = सब जगह | अन्तःकरणवाला | ईक्षते | = देखता है (और) |
|---|---|---|---|---|
| समदर्शनः | = अपने स्वरूपको देखनेवाला | (सांख्ययोगी) | सर्वभूतानि | = सम्पूर्ण प्राणियोंको |
| च | = और | आत्मानम् | = अपने स्वरूपको | आत्मनि |
| योगयुक्तात्मा | = ध्यानयोगसे युक्त | सर्वभूतस्थम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित |
व्याख्या—'ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः'— सब जगह एक सच्चिदानन्दधन परमात्मा ही परिपूर्ण है। जैसे मनुष्य खाँडसे बने हुए अनेक तरहके खिलौनोंके नाम, रूप, आकृति आदि भिन्न-भिन्न होनेपर भी उनमें समानरूपसे एक खाँड़को, लोहेसे बने हुए अनेक तरहके अस्त्र-शस्त्रोंमें एक लोहेको, मिट्टीसे बने हुए अनेक तरहके बर्तनोंमें एक मिट्टीको और सोनेसे बने हुए आभूषणोंमें एक सोनेको ही देखता है, ऐसे ही ध्यानयोगी तरह-तरहकी वस्तु, व्यक्ति आदिमें समरूपसे एक अपने स्वरूपको ही देखता है।
'योगयुक्तात्मा'— इसका तात्पर्य है कि ध्यानयोगका अभ्यास करते-करते उस योगीका अन्तःकरण अपने स्वरूपमें तल्लीन हो गया है। [तल्लीन होनेके बाद उसका अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, जिसका संकेत 'सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि' पदोंसे किया गया है।]
'सर्वभूतस्थमात्मानम्'— वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपनी आत्माको—अपने सत्स्वरूपको स्थित देखता है। जैसे साधारण प्राणी सारे शरीरमें अपने-आपको देखता है अर्थात् शरीरके सभी अवयवोंमें, अंशोंमें 'मैं' को ही पूर्णरूपसे देखता है, ऐसे ही समदर्शी पुरुष सब प्राणियोंमें अपने स्वरूपको ही स्थित देखता है।
किसीको नींदमें स्वप्न आये, तो वह स्वप्नमें स्थावर-जंगम प्राणी-पदार्थ देखता है। पर नींद खुलनेपर वह स्वप्नकी सृष्टि नहीं दीखती; अतः स्वप्नमें स्थावर-जंगम
आदि सब कुछ स्वयं ही बना है। जाग्रत्-अवस्थामें किसी जड़ या चेतन प्राणी-पदार्थकी याद आती है, तो वह मनसे दीखने लग जाता है और याद हटते ही वह सब दृश्य अदृश्य हो जाता है; अतः यादमें सब कुछ अपना मन ही बना है। ऐसे ही ध्यानयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपने स्वरूपको स्थित देखता है। स्थित देखनेका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें सत्तरूपसे अपना ही स्वरूप है। स्वरूपके सिवाय दूसरी कोई सत्ता ही नहीं है; क्योंकि संसार एक क्षण भी एकरूप नहीं रहता, प्रत्युत प्रतिक्षण बदलता ही रहता है। संसारके किसी रूपको एक बार देखनेपर अगर दुबारा उसको कोई देखना चाहे, तो देख ही नहीं सकता; क्योंकि वह पहला रूप बदल गया। ऐसे परिवर्तनशील वस्तु, व्यक्ति आदिमें योगी सत्तरूपसे अपरिवर्तनशील अपने स्वरूपको ही देखता है।
'सर्वभूतानि चात्मनि'— वह सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने अन्तर्गत देखता है अर्थात् अपने सर्वगत, असीम, सच्चिदानन्दधन स्वरूपमें ही सभी प्राणियोंको तथा सारे संसारको देखता है। जैसे एक प्रकाशके अन्तर्गत लाल, पीला, काला, नीला आदि जितने रंग दीखते हैं, वे सभी प्रकाशसे ही बने हुए हैं और प्रकाशमें ही दीखते हैं और जैसे जितनी वस्तुएँ दीखती हैं, वे सभी सूर्यसे ही उत्पन्न हुई हैं और सूर्यके प्रकाशमें ही दीखती हैं, ऐसे ही वह योगी सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने स्वरूपसे ही पैदा हुए, स्वरूपमें ही लीन होते हुए और स्वरूपमें ही स्थित देखता है। तात्पर्य है कि उसको जो कुछ दीखता है, वह सब अपना स्वरूप ही
४६० * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ६
दीखता है। एकरूप रहनेवाला है, पर प्राणी उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं।
इस श्लोकमें प्राणियोंमें तो अपनेको स्थित बताया है, इस श्लोकका तात्पर्य यह हुआ कि व्यवहारमें तो
पर अपनेमें प्राणियोंको स्थित नहीं बताया। ऐसा कहनेका प्राणियोंके साथ अलग-अलग बर्ताव होता है, परन्तु
तात्पर्य है कि प्राणियोंमें तो अपनी सत्ता है, पर अपनेमें अलग-अलग बर्ताव होनेपर भी उस समदर्शी योगीकी
प्राणियोंकी सत्ता नहीं है। कारण कि स्वरूप तो सदा स्थितिमें कोई फर्क नहीं पड़ता।
सम्बन्ध-भगवान्ने चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें सगुण-साकारका ध्यान करनेवाले जिस भक्तियोगीका वर्णन किया
था, उसके अनुभवकी बात आगेके श्लोकमें कहते हैं।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥
य: = जो (भक्त) मयि = मुझमें न, प्रणश्यामि = अदृश्य नहीं होता
सर्वत्र = सबमें सर्वम् = सबको च = और
माम् = मुझे पश्यति = देखता है, स: = वह
पश्यति = देखता है तस्य = उसके लिये मे = मेरे लिये
च = और अहम् = मैं न, प्रणश्यति = अदृश्य नहीं होता।
व्याख्या-'यो मां पश्यति सर्वत्र'-जो भक्त सब परन्तु जब उन्होंने अपने-अपने बालकोंको देखा, तब
देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पशु, पक्षी, देवता, यक्ष, राक्षस, उनका गुस्सा शान्त हो गया और स्नेह उमड़ पड़ा। वे
पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिमें मेरेको देखता है। जैसे, बालकोंको हृदयसे लगाने लगे, उनका माथा सूँघने लगे।
ब्रह्माजी जब बछड़ों और ग्वालबालोंको चुराकर ले गये, इस लीलाको देखकर दाऊ दादाने सोचा कि यह क्या बात
तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही बछड़े और ग्वालबाल बन है; उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो उनको बछड़ों और
गये। बछड़े और ग्वालबाल ही नहीं, प्रत्युत उनके बेंत, ग्वालबालोंके रूपमें भगवान् श्रीकृष्ण ही दिखायी दिये।
सींग, बाँसुरी, वस्त्र, आभूषण आदि भी भगवान् स्वयं ही ऐसे ही भगवान्का सिद्ध भक्त सब जगह भगवान्को ही
बन गये*। यह लीला एक वर्षतक चलती रही, पर देखता है अर्थात् उसकी दृष्टिमें भगवत्सत्ताके सिवाय दूसरी
किसीको इसका पता नहीं चला। बछड़ोंमेंसे कई बछड़े तो किंचिन्मात्र भी सत्ता नहीं रहती।
केवल दूध ही पीनेवाले थे, इसलिये वे घरपर ही रहते थे 'सर्वं च मयि पश्यति'-और जो भक्त देश, काल,
और बड़े बछड़ोंको भगवान् श्रीकृष्ण अपने साथ वनमें ले वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिको मेरे ही अन्तर्गत
जाते थे। एक दिन दाऊ दादा (बलरामजी) ने देखा कि देखता है। जैसे, गीताका उपदेश देते समय अर्जुनके द्वारा
छोटे बछड़ोंवाली गायें भी अपने पहलेके (बड़े) बछड़ोंको प्रार्थना करनेपर भगवान् अपना विश्वरूप दिखाते हुए कहते
देखकर उनको दूध पिलानेके लिये हुंकार मारती हुई दौड़ हैं कि चराचर सारे संसारको मेरे एक अंशमें स्थित
पड़ीं। बड़े गोपोंने उन गायोंको बहुत रोका, पर वे रुकी देख-'इहै कस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्। मम
नहीं। इससे गोपोंने उन गायोंपर बहुत गुस्सा आ गया। देहे ........' (११।७), तो अर्जुन भी कहते हैं कि मैं
- यावद्वत्सपवत्सकल्पकवपुर्यावत्त्वराड्व्ययादिकं यावद्दिष्टविषाणवेणुदलशिगायावद्विभूषाम्बरम्।
यावच्छीलगुणाभिधाकृतिकवियो यावद्विहारादिकं सर्वं विष्णुमयं गिरोऽङ्गवदज: सर्वस्वरूपो बभौ॥
(श्रीमद्भा० १०।१३।१९)
'वे बालक और बछड़े संख्यामें जितने थे, जितने छोटे-छोटे उनके शरीर थे, उनके हाथ-पैर आदि जैसे-जैसे थे, उनके
पास जितनी और जैसी छड़ियाँ, सींग, बाँसुरी, पत्ते और छींके थे, जैसे और जितने वस्त्राभूषण थे, उनके शील, स्वभाव,
गुण, नाम, रूप और अवस्थाएँ जैसी थीं, जिस प्रकार वे खाते-पीते, चलते आदि थे, ठीक वैसे ही और उतने ही रूपोंमें सर्वस्वरूप
भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उस समय 'यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है'-यह वेदवाणी मानो मूर्तिमती होकर प्रकट हो गयी।
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
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आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको देख रहा हूँ—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वास्तथा भूतविशेषसङ्गान् ’ (११।१५)। संजयने भी कहा कि अर्जुने भगवान्के शरीरमें सारे संसारको देखा—‘तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमेकधा ’ (११।१३)। तात्पर्य है कि अर्जुने भगवान्के शरीरमें सब कुछ भगवत्स्वरूप ही देखा। ऐसे ही भक्तको देखने, सुनने, समझनेमें जो कुछ आता है, उसको भगवान्में ही देखता है और भगवत्स्वरूप ही देखता है।
‘तस्याहं न प्रणश्यामि ’—भक्त जब सब जगह मुझे ही देखता है, तो मैं उससे कैसे छिपूँ, कहाँ छिपूँ और किसके पीछे छिपूँ? इसलिये मैं उस भक्तके लिये अदृश्य नहीं रहता अर्थात् निरन्तर उसके सामने ही रहता हूँ।
‘स च मे न प्रणश्यति ’—जब भक्त भगवान्को सब जगह देखता है, तो भगवान् भी भक्तको सब जगह देखते हैं; क्योंकि भगवान्का यह नियम है कि ‘जो जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं भी उसी प्रकार उनको आश्रय देता हूँ’—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ’ (गीता ४।११)। तात्पर्य है कि भक्त भगवान्के साथ घुल-मिल जाते हैं, भगवान्के साथ उनकी आत्मीयता, एकता हो जाती
परिशिष्ट भाव —पूर्वश्लोकमें आत्मज्ञानकी बात कहकर अब भगवान् परमात्मज्ञानकी बात कहते हैं। ध्यानयोगके किसी साधकमें ज्ञानके संस्कार रहनेसे विवेककी मुख्यता रहती है और किसी साधकमें भक्तिके संस्कार रहनेसे श्रद्धा-विश्वासकी मुख्यता रहती है। अतः ज्ञानके संस्कारवाला ध्यानयोगी विवेकपूर्वक आत्माका अनुभव करता है—‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ’ (गीता ६।२९) और भक्तिके संस्कारवाला ध्यानयोगी श्रद्धाविश्वासपूर्वक परमात्माका अनुभव करता है—‘यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ’।
‘यो मां पश्यति सर्वत्र ’ पदोंका भाव है कि जो मेरेको दूसरोंमें भी देखता है और अपनेमें भी देखता है। ‘सर्वं च मयि पश्यति ’ पदोंका भाव है कि जो दूसरोंको भी मेरेमें देखता है और अपनेको भी मेरेमें देखता है।
जैसे सब जगह बर्फ-ही-बर्फ पड़ी हो तो बर्फ कैसे छिपेगी? बर्फके पीछे बर्फ रखनेपर भी बर्फ ही दीखेगी। ऐसे ही जब सब रूपोंमें एक भगवान् ही हैं तो फिर वे कैसे छिपें, कहाँ छिपें और किसके पीछे छिपें? क्योंकि एक परमात्माके सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं। परमात्मामें शरीर और शरीरी, सत् और असत्, जड़ और चेतन, ईश्वर और जगत्, सगुण और निर्गुण, साकार और निराकार आदि कोई विभाग है ही नहीं। उस एकमें ही अनेक विभाग हैं और अनेक विभागोंमें वह एक ही है। वह विवेक-विचारका विषय नहीं है, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासका विषय है। अतः ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—इसको साधक श्रद्धा-विश्वासपूर्वक मान ले, स्वीकार कर ले। दृढ़तासे माननेपर फिर वैसा ही अनुभव हो जायगा।
साधक पहले परमात्माको दूर देखता है, फिर नजदीक देखता है, फिर अपनेमें देखता है, और फिर केवल परमात्माको ही देखता है। कर्मयोगी परमात्माको नजदीक देखता है, ज्ञानयोगी परमात्माको अपनेमें देखता है और भक्तियोगी सब जगह परमात्माको ही देखता है।
—◆—
सम्बन्ध—अब भगवान् ध्यान करनेवाले सिद्ध भक्तियोगीके लक्षण बताते हैं।
है; अतः भगवान् अपने स्वरूपमें उनको सब जगह देखते हैं। इस दृष्टिसे भक्त भी भगवान्के लिये कभी अदृश्य नहीं होता।
यहाँ शंका होती है कि भगवान्के लिये तो कोई भी अदृश्य नहीं है—‘वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि ’ (गीता ७।२६), फिर यहाँ केवल भक्तके लिये ही ‘वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता’—ऐसा क्यों कहा है? इसका समाधान है कि यद्यपि भगवान्के लिये कोई भी अदृश्य नहीं है, तथापि जो भगवान्को सब जगह देखता है, उसके भावके कारण भगवान् भी उसको सब जगह देखते हैं। परन्तु जो भगवान्से विमुख होकर संसारमें आसक्त है, उसके लिये भगवान् अदृश्य रहते हैं—‘नाहं प्रकाशः सर्वस्य ’ (गीता ७।२५)। अतः (उसके भावके कारण) वह भी भगवान्के लिये अदृश्य रहता है। जितने अंशमें उसका भगवान्के प्रति भाव नहीं है, उतने अंशमें वह भगवान्के लिये अदृश्य रहता है। ऐसी ही बात भगवान्ने नवें अध्यायमें भी कही है कि ‘मैं सब प्राणियोंमें समान हूँ। न तो कोई मेरा द्वेपी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ।’
४६२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥
| एकत्वम् | = (मुझमें) | प्राणियोंमें स्थित | अपि | = भी |
|---|---|---|---|---|
| एकीभावसे | माम् | = मेरा | मयि | |
| आस्थितः | = स्थित हुआ | भजति | = भजन करता है, | वर्तते |
| यः | = जो | सः | = वह | |
| योगी | = भक्तियोगी | सर्वथा | = सब कुछ | |
| सर्वभूतस्थितम् | = सम्पूर्ण | वर्तमानः | = बर्ताव करता हुआ |
व्याख्या —‘एकत्वमास्थितः’—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया था कि जो मेरेको सबमें और सबको मेरेमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। अदृश्य क्यों नहीं होता? कारण कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित मेरे साथ उसकी अभिन्नता हो गयी है अर्थात् मेरे साथ उसका अत्यधिक प्रेम हो गया है। अद्वैत-सिद्धान्तमें तो स्वरूपसे एकता होती है, पर यहाँ वैसी एकता नहीं है। यहाँ द्वैत होते हुए भी अभिन्नता है अर्थात् भगवान् और भक्त दीखनेमें तो दो हैं, पर वास्तवमें एक ही हैं*। जैसे पति और पत्नी दो शरीर होते हुए भी अपनेको अभिन्न मानते हैं, दो मित्र अपनेको एक ही मानते हैं; क्योंकि अत्यन्त स्नेह होनेके कारण वहाँ द्वैतपना नहीं रहता। ऐसे ही जो भक्तियोगका साधक भगवान्को प्राप्त हो जाता है, भगवान्में अत्यन्त स्नेह होनेके कारण उसकी भगवान्से अभिन्नता हो जाती है। इसी अभिन्नताको यहाँ ‘एकत्वमास्थितः’ पदसे बताया गया है।
‘सर्वभूतस्थितं यो मां भजति’—सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें भगवान् ही परिपूर्ण हैं अर्थात् सम्पूर्ण चराचर जगत् भगवत्स्वरूप ही है—‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९)—यही उसका भजन है। ‘सर्वभूतस्थितम्’ पदसे ऐसा असर पड़ता है कि भगवान् केवल प्राणियोंमें ही स्थित हैं। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। भगवान् केवल प्राणियोंमें ही स्थित नहीं हैं, प्रत्युत संसारके कण-कणमें परिपूर्णरूपसे स्थित हैं। जैसे, सोनेके आभूषण सोनेसे ही बनते हैं, सोनेमें ही स्थित रहते हैं और सोनेमें ही उनका पर्यवसान होता है अर्थात् सब समय एक सोना-ही-सोना है। परन्तु लोगोंकी दृष्टिमें आभूषणोंकी सत्ता अलग प्रतीत होनेके कारण उनको
समझानेके लिये कहा जाता है कि आभूषणोंमें सोना ही है। ऐसे ही सृष्टिके पहले, सृष्टिके समय और सृष्टिके बाद एक परमात्मा-ही-परमात्मा है। परन्तु लोगोंकी दृष्टिमें प्राणियों और पदार्थोंकी सत्ता अलग प्रतीत होनेके कारण उनको समझानेके लिये कहा जाता है कि सब प्राणियोंमें एक परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं है। इसी वास्तविकताको यहाँ ‘सर्वभूतस्थितं माम्’ पदोंसे कहा गया है।
‘सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते’—वह शास्त्र और वर्ण-आश्रमकी मर्यादाके अनुसार खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते आदि सभी क्रियाएँ करते हुए मेरेमें ही बरतता है, मेरेमें ही रहता है। कारण कि जब उसकी दृष्टिमें मेरे सिवाय दूसरी कोई सत्ता ही नहीं रही, तो फिर वह जो कुछ बर्ताव करेगा, उसको कहाँ करेगा? वह तो मेरेमें ही सब कुछ करेगा।
तेरहवें अध्यायमें ज्ञानयोगके प्रकरणमें भगवान्ने यह बताया कि सब कुछ बर्ताव करते हुए भी उसका फिर जन्म नहीं होता—‘सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते’ (१३।२३); और यहाँ भगवान्ने बताया है कि सब कुछ बर्ताव करते हुए भी वह मेरेमें ही रहता है। इसका तात्पर्य यह है कि वहाँ संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेकी बात है और यहाँ भगवान्के साथ अभिन्न होनेकी बात है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ज्ञानयोगी मुक्त हो जाता है और भगवान्के साथ अभिन्नता होनेपर भक्त प्रेमके एक विलक्षण रसका आस्वाद करता है, जो अनन्त और प्रतिक्षण वर्धमान है।
यहाँ भगवान्ने कहा है कि वह योगी मेरेमें बर्ताव करता है अर्थात् मेरेमें ही रहता है। इसपर शंका होती है कि क्या अन्य प्राणी भगवान्में नहीं रहते? इसका समाधान यह है कि वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणी भगवान्में ही बरतते हैं,
- ज्ञानमें तो दो होकर एक होते हैं, पर भक्तिमें प्रेमके विलक्षण आनन्दका आदान-प्रदान करनेके लिये, प्रेमका विस्तार करनेके लिये एक होकर दो हो जाते हैं; जैसे—भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीजी एक होकर भी दो हैं।
श्लोक ३२ ]
- साधक-संजीवनी *
४६३
भगवान्में ही रहते हैं; परन्तु उनके अन्तःकरणमें संसारकी सत्ता और महत्ता रहनेसे वे भगवान्में अपनी स्थिति जानते नहीं, मानते नहीं। अतः भगवान्में बरतते हुए भी, भगवान्में रहते हुए भी उनका बर्ताव संसारमें ही हो रहा है अर्थात् उन्होंने जगत्में अहंता-ममता करके जगत्को धारण कर रखा है—‘यथेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। वे
परिशिष्ट भाव —भक्त सम्पूर्ण जगत्को परमात्माका ही स्वरूप देखता है। उसकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय और किसीकी सत्ता नहीं रहती। उसके लिये द्रष्टा, दृश्य और दर्शन—तीनों ही परमात्मस्वरूप हो जाते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। इसलिये जैसे गंगाजलसे गंगाका पूजन किया जाय, ऐसे ही उस भक्तका सब बर्ताव परमात्मामें ही होता है। जैसे शरीरमें तादात्म्यवाला व्यक्ति सब क्रिया करते हुए शरीरमें ही रहता है, ऐसे ही भक्त सब क्रिया करते हुए भी परमात्मामें ही रहता है।
आगे तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने ज्ञानयोगीके लिये कहा है—‘सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते’ (१३।२३) और यहाँ भक्तके लिये कहा है—‘सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।’ तात्पर्य यह हुआ कि ज्ञानमार्गमें तो जन्म-मरण मिट जाता है, मुक्ति हो जाती है, पर भक्तिमार्गमें जन्म-मरण मिटकर भगवान्से अभिन्नता होती है, आत्मीयता होती है। इसी भावको गीतामें इस प्रकार भी कहा गया है—‘तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति’ (६।३०), ‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ (७।१७), ‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’ (७।१८), ‘ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्’ (९।२९)। ज्ञानमार्गमें तो सूक्ष्म अहम्की गन्ध रहनेसे दार्शनिक मतभेद रह सकता है, पर भक्तिमार्गमें भगवान्से आत्मीयता होनेपर सूक्ष्म अहम्की गन्ध तथा उससे होनेवाला दार्शनिक मतभेद नहीं रहता। ‘न स भूयोऽभिजायते’ में स्वरूपमें स्थितिका अनुभव होनेपर केवल स्वयं (स्वरूप) रहता है और ‘स योगी मयि वर्तते’ में केवल भगवान् रहते हैं, स्वयं (योगी) नहीं रहता अर्थात् स्वयं योगीरूप नहीं रहता, प्रत्युत भगवत्स्वरूप रहता है।
सम्बन्ध—भक्त सब बर्ताव करते हुए भी मेरेमें कैसे बर्ताव करता है—यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥
| अर्जुन | = हे अर्जुन! | समम् | = समान | (भी समान) |
|---|---|---|---|---|
| यः | = जो (भक्त) | पश्यति | = देखता है | देखता है), |
| आत्मौपम्येन | = अपने शरीरकी उपमासे | वा | = और | सः = वह |
| सर्वत्र | = सब जगह | सुखम् | = सुख | परमः = परम |
| (मुझे) | यदि, वा | = अथवा | योगी = योगी | |
| दुःखम् | = दुःखको | मतः = माना गया है। |
व्याख्या —‘आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन’—साधारण मनुष्य जैसे अपने शरीरमें अपनी स्थिति देखता है, तो उसके शरीरके किसी अंगमें किसी तरहकी पीड़ा हो—ऐसा वह नहीं चाहता, प्रत्युत सभी अंगोंका समानरूपसे आराम चाहता है। ऐसे ही सब प्राणियोंमें भगवान्को समान देखनेवाला भक्त सभी प्राणियोंका समानरूपसे आराम चाहता है। उसके सामने कोई दुःखी
जगत्को भगवान्का स्वरूप न समझकर अर्थात् जगत् समझकर बर्ताव करते हैं। वे कहते भी हैं कि हम तो संसारी आदमी हैं, हम तो संसारमें रहनेवाले हैं। परन्तु भगवान्का भक्त इस बातको जानता है कि यह सब संसार वासुदेवरूप है। अतः वह भक्त हरदम भगवान्में ही रहता है और भगवान्में ही बर्ताव करता है।
‘सर्वत्र’ कहनेका तात्पर्य है कि उसके द्वारा वर्ण,
४६४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
आश्रम, देश, वेश, सम्प्रदाय आदिका भेद न रखकर सबको समान रीतिसे सुख पहुँचानेकी स्वाभाविक चेष्टा होती है। ऐसे ही पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदि स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंको भी समानरीतिसे सुख पहुँचानेकी चेष्टा होती है और साथ-ही-साथ उनका दुःख दूर करनेका भी स्वाभाविक उद्योग होता है।
अपने शरीरके अंगोंका दुःख दूर करनेकी समान चेष्टा होनेपर भी अंगोंमें भेद-द्वष्टि तो रहती ही है और रहना आवश्यक भी है। जैसे, हाथका काम पैरसे नहीं किया जाता। अगर हाथको हाथ छू जाय तो हाथ धोनेकी जरूरत नहीं पड़ती; परन्तु पैरको हाथ छू जाय तो हाथ धोना पड़ता है। अगर मल-मूत्रके अंगोंको हाथसे साफ किया जाय, तो हाथको मिट्टी लगाकर विशेषतासे धोना, निर्मल करना पड़ता है। ऐसे ही शास्त्र और वर्ण-आश्रमकी मर्यादाके अनुसार सबके सुख-दुःखमें समान भाव रखते हुए भी स्पर्श-अस्पर्शका खयाल रखकर व्यवहार होना चाहिये। किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी घृणाकी सम्भावना ही नहीं होनी चाहिये। जैसे अपने शरीरके पवित्र-अपवित्र अंगोंकी रक्षा करनेमें और उनको सुख पहुँचानेमें कोई कमी न रखते हुए भी शुद्धिकी दृष्टिसे उनमें स्पर्श-अस्पर्शका भेद रखते हैं। ऐसे ही शास्त्र-मर्यादाके अनुसार संसारके सभी प्राणियोंमें स्पर्श-अस्पर्शका भेद मानते हुए भी भक्तके द्वारा उनका दुःख दूर करनेकी और उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टामें कभी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं आती। तात्पर्य है कि जैसे अपने शरीरका कोई अंग अस्पृश्य होनेपर भी वह अप्रिय नहीं होता, ऐसे ही शास्त्रमर्यादाके अनुसार कोई प्राणी अस्पृश्य होनेपर भी उसमें प्रियता, हितैषिताकी कभी कमी नहीं होती।
‘सुखं वा यदि वा दुःखम्’ —अपने शरीरकी उपमासे दूसरोंके सुख-दुःखमें समान रहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि दूसरोंके शरीरके किसी अंगमें पीड़ा हो जाय, तो वह पीड़ा अपने शरीरमें भी हो जाय, अपनेको भी उस पीड़ाका अनुभव हो जाय। अगर ऐसी समता ली जाय तो अपनेको दुःख ही ज्यादा होगा और दुःख मिटेगा भी नहीं; क्योंकि संसारमें दुःखी प्राणी ही ज्यादा हैं।
दूसरी बात, जैसे विरक्त त्यागी महात्मा लोग अपने शरीरकी और अपने शरीरके अंगोंमें होनेवाली पीड़ाकी उपेक्षा कर देते हैं, ऐसे ही दूसरोंके शरीरोंकी और उनके शरीरोंके अंगोंमें होनेवाली पीड़ाकी उपेक्षा हो जाय अर्थात् जैसे उनपर अपने शरीरके सुख-दुःखका असर नहीं होता,
ऐसे ही दूसरोंके सुख-दुःखका भी अपनेपर असर न हो—यह भी उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य नहीं है।
उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है कि जैसे शरीरमें आसक्त अज्ञानी पुरुषके शरीरमें पीड़ा होनेपर उस पीड़ाको दूर करनेमें और सुख पहुँचानेमें उसकी जैसी चेष्टा होती है, तत्परता होती है, ऐसे ही दूसरोंका दुःख दूर करनेमें और सुख पहुँचानेमें भक्तकी स्वाभाविक चेष्टा होती है, तत्परता होती है।
जैसे, किसीके हाथमें चोट लग गयी और वह लोक-समुदायमें जाता है तो उस पीड़ित हाथको धक्का न लग जाय, इसलिये दूसरे हाथको सामने रखकर उस पीड़ित हाथकी रक्षा करता है और उसको धक्का न लगे, ऐसा उद्योग करता है। परन्तु उसके मनमें कभी यह अभिमान नहीं आता कि मैं इस हाथकी पीड़ा दूर करनेवाला हूँ, इसको सुख पहुँचानेवाला हूँ। वह उस हाथपर ऐसा एहसान भी नहीं करता कि देख हाथ! मैंने तेरी पीड़ा दूर करनेके लिये कितनी चेष्टा की! पीड़ाको शान्त करनेपर वह अपनेमें विशेषताका भी अनुभव नहीं करता। ऐसे ही भक्तके द्वारा दुःखी प्राणियोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा स्वाभाविक होती है। उनके मनमें यह अभिमान नहीं आता कि मैं प्राणियोंका दुःख दूर कर रहा हूँ; दूसरोंको सुख पहुँचा रहा हूँ। उनका दुःख दूर करनेकी चेष्टा करनेपर वे अपनेमें कोई विशेषता भी नहीं देखते। उनका स्वभाव ही दूसरोंका दुःख दूर करनेका, उनको सुख पहुँचानेका होता है।
भक्तके शरीरमें पीड़ा होती है, तो वह उसको सह सकता है और उसके द्वारा उस पीड़ाकी उपेक्षा भी हो सकती है; परन्तु दूसरेके शरीरमें पीड़ा हो तो उसको वह सह नहीं सकता। कारण कि जिसकी सर्वत्र भगवद्विद्धि है, उस भक्तके अन्तःकरणमें तो पीड़ा सहनेकी शक्ति है पर दूसरोंके अन्तःकरणमें पीड़ा सहनेकी वैसी सामर्थ्य नहीं है। अतः उनके द्वारा दूसरोंके शरीरोंकी पीड़ा दूर करनेमें विशेष तत्परता होती है। जैसे, इन्द्रने बिना किसी अपराधके दधीचि ऋषिका सिर काट दिया। पीछे अश्विनीकुमारोंने उनको पुनः जिला दिया। परन्तु जब इन्द्रका काम पड़ा, तब दधीचिने अपना शरीर छोड़कर उनको (वज्र बनानेके लिये) अपनी हड्डियाँ दे दीं!
यहाँ शंका हो सकती है कि अपने शरीरके दुःखकी तो उपेक्षा होती है और दूसरोंके दुःखकी उपेक्षा नहीं होती—यह तो विषमता हो गयी! यह समता कहाँ रही? इसका
श्लोक ३३ ]
- साधक-संजीवनी *
४६५
समाधान है कि वास्तवमें यह विषमता समताकी जनक है, समताको प्राप्त करानेवाली है। यह विषमता समतासे भी ऊँचे दर्जेकी चीज है। साधक साधन-अवस्थामें ऐसी विषमता करता है, तो सिद्ध-अवस्थामें भी उसकी ऐसी ही स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। परन्तु उसके अन्तःकरणमें किंचिन्मात्र भी विषमता नहीं आती।
परिशिष्ट भाव —जैसे साधारण मनुष्य शरीरमें अपनेको देखता है, शरीरके किसी भी अंगकी पीड़ा न चाहकर, किसी भी अंगसे द्वेष न करके सब अंगोंको समानरूपसे अपना मानता है, ऐसे ही भक्त सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपने अंशी भगवान्को देखता है और सबका दुःख दूर करने तथा सुख पहुँचानेकी समानरूपसे स्वाभाविक चेष्टा करता है। वह वस्तु, योग्यता और सामर्थ्यकी अपनी न मानकर भगवान्की मानता है। जैसे गंगाजलसे गंगाका पूजन किया जाय, दीपकसे सूर्यका पूजन किया जाय, ऐसे ही भक्त भगवान्की वस्तुको भगवान्की सेवामें अर्पित करता है—‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ’।
जैसे शरीरके सब अंगोंसे यथायोग्य व्यवहार करते हुए भी उनमें आत्मबुद्धि एक ही रहती है तथा उन अंगोंकी पीड़ा दूर करने तथा उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टा भी समान ही रहती है, ऐसे ही ‘जैसा देव, वैसी पूजा’ के अनुसार ब्राह्मण और चाण्डाल, साधु और कसाई, गाय और कुत्ता आदि सबसे शास्त्रमर्यादाके अनुसार यथायोग्य व्यवहार करते हुए भी भक्तकी भगवदबुद्धिमें तथा उनका दुःख दूर करने और उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टामें कोई अन्तर नहीं आता।
जैसे भक्त सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्माके साथ भगवान्की एकता मानता है (इसी अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक), ऐसे ही वह सब शरीरोंकी भी अपने शरीरके साथ एकता मानता है। इसलिये वह दूसरेके दुःखसे दुःखी और सुखसे सुखी होता है—‘पर दुख दुख सुख सुख देखे पर ’ (मानस, उत्तर० ३८।१)। वह अपने शरीरके सुख-दुःखकी तरह सबके सुख-दुःखको अपना ही सुख-दुःख समझता है। दूसरेके दुःखसे दुःखी होनेका तात्पर्य खुद दुःखी होना नहीं है, प्रत्युत दूसरेका दुःख दूर करनेकी चेष्टा करना है। इसी तरह खुद सुखी होनेके लिये दूसरेका दुःख दूर नहीं करना है, प्रत्युत करुणा करके दूसरेको सुखी करनेकी चेष्टा करना है। तात्पर्य है कि खुद सुखका भोग नहीं करना है, प्रत्युत ‘दूसरेका दुःख दूर हो गया, वह सुखी हो गया’—इसको लेकर प्रसन्न होना है।
औख और पैरका भेद इतना है कि आँखोंसे देखते हैं और पैरोंसे चलते हैं; आँख ज्ञानेन्द्रिय है और पैर कर्मनेन्द्रिय है। इतना भेद होते हुए भी अभिन्नता इतनी है कि काँटा पैरमें लगता है, आँसू आँखोंमें आ जाते हैं और मिट्टी आँखमें पड़ती है, लड़खड़ाते पैर हैं! तात्पर्य है कि हम शरीरको संसारसे और संसारको शरीरसे अलग नहीं कर सकते। इसलिये अगर हम शरीरकी परवाह करते हैं तो वैसे ही संसारकी भी परवाह करें और अगर संसारकी बेपरवाह करते हैं तो वैसे ही शरीरकी भी बेपरवाह करें। दोनों बातोंमें चाहे कोई मान लें, इसीमें ईमानदारी है!
सम्बन्ध —जिस समताकी प्राप्ति सांख्ययोग और कर्मयोगके द्वारा होती है, उसी समताकी प्राप्ति ध्यानयोगके द्वारा भी होती है—इसको भगवान्ने दसवें श्लोकसे उन्तीसवें श्लोकतक बताया। अब अर्जुन ध्यानयोगसे प्राप्त समताको लेकर आगेके दो श्लोकोंमें अपनी मान्यता प्रकट करते हैं।
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥
अर्जुन बोले—
| मधुसूदन | = हे मधुसूदन ! | यः | = जो | प्रोक्तः | = कहा है, |
|---|---|---|---|---|---|
| त्वया | = आपने | अयम् | = यह | चञ्चलत्वात् | = (मनकी) |
| साम्येन | = समतापूर्वक | योगः | = योग | चंचलताके कारण |
४६६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
| अहम् | = मैं | स्थिराम् | = स्थिर | न | = नहीं |
|---|---|---|---|---|---|
| एतस्य | = इस योगकी | स्थितिम् | = स्थिति | पश्यामि | = देखता हूँ। |
व्याख्या —[मनुष्यके कल्याणके लिये भगवान्ने गीतामें खास बात बतायी कि सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति-अप्राप्तिको लेकर चित्तमें समता रहनी चाहिये। इस समतासे मनुष्यका कल्याण होता है। अर्जुन पापोंसे डरते थे तो उनके लिये भगवान्ने कहा कि 'जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर तुम युद्ध करो, फिर तुम्हारेको पाप नहीं लगेगा' (गीता—दूसरे अध्यायका अङ्तीसर्वां श्लोक)। जैसे दुनियामें बहुत-से पाप होते रहते हैं, पर वे पाप हमें नहीं लगते; क्योंकि उन पापोंमें हमारी विषम-बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत समबुद्धि रहती है। ऐसे ही समबुद्धिपूर्वक सांसारिक काम करनेसे कर्मोंसे बन्धन नहीं होता। इसी भावसे भगवान्ने इस अध्यायके आरम्भमें कहा है कि जो कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है। इसी कर्मफल-त्यागकी सिद्धि भगवान्ने 'समता' बतायी (छठे अध्यायका नवों श्लोक)। इस समताकी प्राप्तिके लिये भगवान्ने दसवें श्लोकसे बत्तीसवें श्लोकतक ध्यानयोगका वर्णन किया। इसी ध्यानयोगके वर्णनका लक्ष्य
करके अर्जुन यहाँ अपनी मान्यता प्रकट करते हैं।]
'योऽयं योगस्तव्या प्रोक्तः साम्येन' —यहाँ अर्जुनने जो अपनी मान्यता बतायी है, वह पूर्वश्लोकको लेकर नहीं है, प्रत्युत ध्यानके साधनको लेकर है। कारण कि बत्तीसवों श्लोक ध्यानयोगद्वारा सिद्ध पुरुषका है और सिद्ध पुरुषकी समता स्वतः होती है। इसलिये यहाँ 'यः' पदसे इस प्रकरणसे पहले कहे हुए योग-(समता-) का संकेत है और 'अयम्' पदसे दसवें श्लोकसे अट्ठाईसवें श्लोकतक कहे हुए ध्यानयोगके साधनका संकेत है।
'एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं स्थिराम्' —इन पदोंसे अर्जुनका यह आशय मालूम देता है कि कर्मयोगसे तो समताकी प्राप्ति सुगम है, पर यहाँ जिस ध्यानयोगसे समताकी प्राप्ति बतायी है, मनकी चंचलताके कारण उस ध्यानमें स्थिर स्थिति रहना मुझे बड़ा कठिन दिखायी देता है। तात्पर्य है कि जबतक मनकी चंचलताका नाश नहीं होगा, तबतक ध्यानयोग सिद्ध नहीं होगा और ध्यानयोग सिद्ध हुए बिना समताकी प्राप्ति नहीं होगी।
सम्बन्ध —जिस चंचलताके कारण अर्जुन अपने मनकी दृढ़ स्थिति नहीं देखते, उस चंचलताका आगेके श्लोकमें उदाहरणसहित स्पष्ट वर्णन करते हैं।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरेव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥
हि | = कारण कि | दृढम् | = दृढ़ (जिद्दी) | स्थित | ---|---|---|---|---|--- कृष्ण | = हे कृष्ण! | बलवत् | = (और) | वायोः | = वायुकी मनः | = मन | | बलवान् है। | इव | = तरह चञ्चलम् | = (बड़ा ही) | तस्य | = उसको | सुदुष्करम् | = अत्यन्त | चंचल, | निग्रहम् | = रोकना | | कठिन प्रमाथि | = प्रमथनशील, | अहम् | = मैं (आकाशमें) | मन्ये | = मानता हूँ।
व्याख्या —'चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्'—यहाँ भगवान्को 'कृष्ण' सम्बोधन देकर अर्जुन मानो यह कह रहे हैं कि हे नाथ! आप ही कृपा करके इस मनको खींचकर अपनेमें लगा लें, तो यह मन लग सकता है। मेरेसे तो इसका वशमें होना बड़ा कठिन है! क्योंकि यह मन बड़ा ही चंचल है। चंचलताके साथ-साथ यह 'प्रमाथि' भी है अर्थात् यह साधकको अपनी स्थितिसे विचलित कर देता है। यह बड़ा जिद्दी और बलवान् भी है।
भगवान्ने 'काम'-(कामना-) के रहनेके पाँच स्थान बताये हैं—इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, विषय और स्वयं (गीता—तीसरे अध्यायका चालीसवों तथा चौतीसवों और दूसरे अध्यायका उनसठवों श्लोक)। वास्तवमें काम स्वयंमें अर्थात् चिज्जड़-ग्रन्थिमें रहता है और इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा विषयोंमें इसकी प्रतीति होती है। काम जबतक स्वयंसे निवृत्त नहीं होता, तबतक यह काम समय-समयपर इन्द्रियों आदिमें प्रतीत होता रहता है। पर जब यह स्वयंसे निवृत्त हो
श्लोक ३५ ]
- साधक-संजीवनी *
४६७
जाता है, तब इन्द्रियों आदिमें भी यह नहीं रहता। इससे यह सिद्ध होता है कि जबतक स्वयंमें काम रहता है, तबतक मन साधकको व्यथित करता रहता है। अतः यहाँ मनको 'प्रमाथि' बताया गया है। ऐसे ही स्वयंमें काम रहनेके कारण इन्द्रियाँ साधकके मनको व्यथित करती रहती हैं। इसलिये दूसरे अध्यायके साठवें श्लोकमें इन्द्रियोंको भी प्रमाथि बताया गया है—'इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः'। तात्पर्य यह हुआ कि जब कामना मन और इन्द्रियोंमें आती है, तब वह साधकको महान् व्यथित कर देती है, जिससे साधक अपनी स्थितिपर नहीं रह पाता। उस कामके स्वयंमें रहनेके कारण मनका पदार्थके प्रति गाढ़ खिंचाव रहता है। इससे मन किसी तरह भी उनकी ओर जानेको छोड़ता नहीं, हठ कर लेता है; अतः मनको दूढ़ कहा है। मनकी यह दूढ़ता बहुत बलवती होती है; अतः मनको 'बलवत्' कहा है। तात्पर्य है कि मन बड़ा बलवान् है, जो कि साधकको जबर्दस्ती विषयोंमें ले जाता है। शास्त्रोंने तो यहाँतक कह दिया है कि मन ही मनुष्योंके मोक्ष और बन्धनमें कारण है—'मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।' परन्तु मनमें यह प्रमथनशीलता, दूढ़ता और बलवत्ता तभीतक रहती है, जबतक साधक अपनेमेंसे कामको सर्वथा निकाल
नहीं देता। जब साधक स्वयं कामरहित हो जाता है, तब पदार्थोंका, विषयोंका कितना ही संसर्ग होनेपर भी साधकपर उनका कुछ भी असर नहीं पड़ता। फिर मनकी प्रमथनशीलता आदि नष्ट हो जाती है।
मनकी चंचलता भी तभीतक बाधक होती है, जबतक स्वयंमें कुछ भी कामका अंश रहता है। कामका अंश सर्वथा निवृत्त होनेपर मनकी चंचलता किंचिन्मात्र भी बाधक नहीं होती। शास्त्रकारोंने कहा है—
देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि। यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परामृतम्॥
(सरस्वतीरहस्योपनिषद् ३१)
अर्थात् देहाभिमान (जड़के साथ मैं-पन) सर्वथा मिट जानेपर जब परमात्मतत्त्वका बोध हो जाता है, तब जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ परमात्मतत्त्वका अनुभव होता है अर्थात् उसकी अखण्ड समाधि (सहज समाधि) रहती है।
'तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्'—इस चंचल, प्रमाथि, दूढ़ और बलवान् मनका निग्रह करना बड़ा कठिन है। जैसे आकाशमें विचरण करते हुए वायुको कोई मुट्ठीमें नहीं पकड़ सकता, ऐसे ही इस मनको कोई पकड़ नहीं सकता। अतः इसका निग्रह करनेको मैं महान् दुष्कर मानता हूँ।
परिशिष्ट भाव — भगवान्ने उन्तीसवें श्लोकमें स्वरूपका ध्यान करनेवाले साधकका अनुभव बताया और तीसवेंसे बत्तीसवें श्लोकोंमें सगुण-साकार भगवान्का ध्यान करनेवाले साधकका अनुभव बताया। इन श्लोकोंमें भगवान्का आशय यह था कि सबमें आत्मदर्शन अथवा सबमें भगवद्दर्शन करना ही ध्यानयोगका अन्तिम फल है। ज्ञानके संस्कारवाले ध्यानयोगी सबमें आत्माको और भक्तिके संस्कारवाले ध्यानयोगी सबमें भगवान्को देखते हैं। सबमें आत्माको देखना 'आत्मज्ञान' है और सबमें भगवान्को देखना 'परमात्मज्ञान' है। आत्मज्ञानमें विवेककी और परमात्मज्ञानमें श्रद्धा-विश्वासकी मुख्यता है, मनकी स्थिरताकी मुख्यता नहीं है। परन्तु अर्जुनके भीतर दसवेंसे अट्टाईसवें श्लोकतक कहे ध्यानयोगका संस्कार बैठा था; अतः उन्होंने आत्मज्ञान अथवा परमात्मज्ञान न होनेमें मनकी चंचलताको हेतु मान लिया। उनकी दृष्टि ध्यानयोगीके भीतरके ज्ञान या भक्तिके संस्कारकी तरफ नहीं गयी, प्रत्युत मनकी चंचलताकी तरफ गयी। अतः उन्होंने मनकी चंचलताको बाधक मान लिया।
सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें भगवान् अर्जुनकी मान्यताका अनुमोदन करते हुए मनके निग्रहके उपाय बताते हैं।
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| महाबाहो | = हे महाबाहो! | चलम् | = बड़ा चंचल है | दुर्निग्रहम् | = इसका निग्रह |
|---|---|---|---|---|---|
| मनः | = यह मन | (और) | करना भी बड़ा |
४६८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
असंशयम् | कठिन है— = यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। | तु कौन्तेय अभ्यासेन च | = परन्तु = हे कुन्तीनन्दन! = अभ्यास = और | वैराग्येण गृह्णते | = वैराग्यके द्वारा = (इसका) निग्रह किया जाता है। ---|---|---|---|---|---
व्याख्या —‘असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्’—यहाँ ‘महाबाहो’ सम्बोधनका तात्पर्य शूरवीरता बतानेमें है अर्थात् अभ्यास करते हुए कभी उकताना नहीं चाहिये। अपनेमें धैर्यपूर्वक वैसी ही शूरवीरता रखनी चाहिये।
अर्जुनने पहले चंचलताके कारण मनका निग्रह करना बड़ा कठिन बताया। उसी बातपर भगवान् कहते हैं कि तुम जो कहते हो, वह एकदम ठीक बात है, निःसन्दिग्ध बात है; क्योंकि मन बड़ा चंचल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है।
‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्णते’ —अर्जुनकी माता कुन्ती बहुत विवेकवती तथा भोगोंसे विरक्त रहनेवाली थीं। कुन्तीने भगवान् श्रीकृष्णसे विपत्तिका वरदान माँगा था*। ऐसा वरदान माँगनेवाला इतिहासमें बहुत कम मिलता है। अतः यहाँ ‘कौन्तेय’ सम्बोधन देकर भगवान् अर्जुनको कुन्ती माताकी याद दिलाते हैं कि जैसे तुम्हारी माता कुन्ती बड़ी विरक्त है, ऐसे ही तुम भी संसारसे विरक्त होकर परमात्मामें लगे अर्थात् मनको संसारसे हटाकर परमात्मामें लगाओ।
मनको बार-बार ध्येयमें लगानेका नाम ‘अभ्यास’ है। इस अभ्यासकी सिद्धि समय लगानेसे होती है। समय भी निरन्तर लगाया जाय, रोजाना लगाया जाय। कभी अभ्यास किया, कभी नहीं किया—ऐसा नहीं हो। तात्पर्य है कि अभ्यास निरन्तर होना चाहिये और अपने ध्येयमें महत्त्व तथा आदर-बुद्धि होनी चाहिये। इस तरह अभ्यास करनेसे अभ्यास दृढ़ हो जाता है।
अभ्यासके दो भेद हैं—(१) अपना जो लक्ष्य, ध्येय है, उसमें मनोवृत्तिको लगाये और दूसरी वृत्ति आ जाय अर्थात् दूसरा कुछ भी चिन्तन आ जाय, उसकी उपेक्षा कर दे, उससे उदासीन हो जाय।
(२) जहाँ-जहाँ मन चला जाय, वहाँ-वहाँ ही अपने लक्ष्यको, इष्टको देखे।
उपर्युक्त दो साधनोंके सिवाय मन लगानेके कई उपाय हैं; जैसे—
(१) जब साधक ध्यान करनेके लिये बैठे, तब सबसे पहले दो-चार श्वास बाहर फेंककर ऐसी भावना करे कि मैंने मनसे संसारको सर्वथा निकाल दिया, अब मेरा मन संसारका चिन्तन नहीं करेगा, भगवान्का ही चिन्तन करेगा और चिन्तनमें जो कुछ भी आयेगा, वह भगवान्का ही स्वरूप होगा। भगवान्के सिवाय मेरे मनमें दूसरी बात आ ही नहीं सकती। अतः भगवान्का स्वरूप वही है, जो मनमें आ जाय और मनमें जो आ जाय, वही भगवान्का स्वरूप है—यह ‘वासुदेवः सर्वम्’ का सिद्धान्त है। ऐसा होनेपर मन भगवान्में ही लगेगा; और लगेगा ही कहाँ?
(२) भगवान्के नामका जप करे, पर जपमें दो बातोंका खयाल रखे—एक तो नामके उच्चारणमें समय खाली न जाने दे अर्थात् ‘रा....म....रा....म’ इस तरह नामका भले ही धीरे-धीरे उच्चारण करे, पर बीचमें समय खाली न जाने दे और दूसरे, नामको सुने बिना न जाने दे अर्थात् जपके साथ-साथ उसको सुने भी।
(३) जिस नामका उच्चारण किया जाय, मनसे उस नामकी निगरानी रखे अर्थात् उस नामको अंगुली अथवा मालासे न गिनकर मनसे ही नामका उच्चारण करे और मनसे ही नामकी गिनती करे।
(४) एक नामका तो वाणीसे उच्चारण करे और दूसरे नामका मनसे जप करे; जैसे—वाणीसे तो ‘राम-राम-राम’ का उच्चारण करे और मनसे ‘कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण’ का जप करे।
(५) जैसे राग-रागिनीके साथ बोलकर नामका कीर्तन करते हैं, ऐसे ही राग-रागिनीके साथ मनसे नामका कीर्तन करे।
(६) चरणोंसे लेकर मुकुटतक और मुकुटसे लेकर चरणोंतक भगवान्के स्वरूपका चिन्तन करे।
(७) भगवान् मेरे सामने खड़े हैं—ऐसा समझकर
- विपदः सन्तु नः शशवत्त्र तत्र जगदुरो। भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥ (श्रीमद्भा० १।८।२५)
‘हे जगदुरो! हमारे जीवनमें सर्वदा पद-पदपर विपत्तियाँ आती रहें, जिससे हमें पुनः संसारकी प्राप्ति न करानेवाले आपके दुर्लभ दर्शन मिलते रहें।’
श्लोक ३६ ]
- साधक-संजीवनी *
४६९
भगवान्के स्वरूपका चिन्तन करे। भगवान्के दाहिने चरणकी पाँच अंगुलियोंपर मनसे ही पाँच नाम लिख दे। अंगुलियोंके ऊपरका जो भाग है, उसपर लम्बाईमें तीन नाम लिख दे। चरणोंकी पिण्डीका जो आरम्भ है, उस पिण्डीकी सन्धिपर दो नामोंके कड़े बना दे। फिर पिण्डीपर लम्बाईमें तीन नाम लिख दे। घुटनेके नीचे और ऊपर एक-एक नामका गोल कड़ा बना दे अर्थात् गोलाकार नाम लिख दे। ऊरू (जंघा) पर लम्बाईमें तीन नाम लिख दे। आधी (दाहिने तरफकी) कमरमें दो नामोंकी कथनी बना दे। तीन नाम पसलीपर लिख दे। दो नाम कन्धेपर और तीन नाम बाजूपर (भुजाके ऊपरके भागपर) लिख दे। कोहनीके ऊपर और नीचे दो-दो नामोंका कड़ा बना दे। फिर तीन नाम (कोहनीके नीचे) पहुँचासे ऊपरके भागपर लिख दे। पहुँचामें दो नामोंका कड़ा बना दे तथा पाँच अंगुलियोंपर पाँच नाम लिख दे। गलेमें चार नामोंका आधा हार और कानमें दो नामोंका कुण्डल बना दे। मुकुटके दाहिने आधे भागपर छः नाम लिख दे अर्थात् नीचेके भागपर दो नामोंका कड़ा, मध्यभागपर दो नामोंका कड़ा और ऊपरके भागपर दो नामोंका कड़ा बना दे।
तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्के दाहिने अंगमें चरणसे लेकर मुकुटतक चौवन नाम अथवा मन्त्र आने चाहिये और बायें अंगमें मुकुटसे लेकर चरणतक चौवन नाम अथवा मन्त्र आने चाहिये। इससे भगवान्की एक परिक्रमा हो जाती है, भगवान्के सम्पूर्ण अंगोंका चिन्तन हो जाता है और एक सौ आठ नामोंकी एक माला भी हो जाती है। प्रतिदिन ऐसी कम-से-कम एक माला करनी चाहिये। इससे अधिक करना चाहें, तो अधिक भी कर सकते हैं। इस तरह अभ्यास करनेके अनेक रूप, अनेक तरीके
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अभ्यास और वैराग्यद्वारा मनके निग्रहकी बात कहकर अब आगेके श्लोकमें भगवान् ध्यानयोगकी प्राप्तिमें अन्वय-व्यतिरेकसे अपना मत बताते हैं।
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यतात्मना तु यतता शक्योऽवाप्नुमुपायतः ॥ ३६ ॥
| असंयतात्मना | = जिसका मन पूरा | तु | = परन्तु | साधकको |
|---|---|---|---|---|
| वशमें नहीं है, | उपायतः | = उपायपूर्वक | अवाप्नुम् | |
| उसके द्वारा | यतता | = यत्न करनेवाले | शक्यः | |
| योगः | = योग | (तथा) | इति | |
| दुष्प्रापः | = प्राप्त होना | वश्यतात्मना | = वशमें किये हुए | मे |
| कठिन है। | मनवाले | मतिः |
४७०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
व्याख्या—‘असंयतात्मना योगो दुष्पापः’ —मेरे मतमें तो जिसका मन वशमें नहीं है; उसके द्वारा योग सिद्ध होना कठिन है। कारण कि योगकी सिद्धिमें मनका वशमें न होना जितना बाधक है, उतनी मनकी चंचलता बाधक नहीं है। जैसे, पतिव्रता स्त्री मनको वशमें तो रखती है, पर उसे एकाग्र नहीं करती। अतः ध्यानयोगीको अपना मन वशमें करना चाहिये। मन वशमें होनेपर वह मनको जहाँ लगाना चाहे, वहाँ लगा सकता है, जितनी देर लगाना चाहे, उतनी देर लगा सकता है और जहाँसे हटाना चाहे, वहाँसे हटा सकता है।
प्रायः साधकोंकी यह प्रवृत्ति होती है कि वे साधन तो श्रद्धा-पूर्वक करते हैं, पर उनके प्रयत्नमें शिथिलता रहती है, जिससे साधकमें संयम नहीं रहता अर्थात् मन, इन्द्रियाँ, अन्तःकरणका पूर्णतया संयम नहीं होता। इसलिये योगकी प्राप्तिमें कठिनता होती है अर्थात् परमात्मा सदा-सर्वत्र विद्यमान रहते हुए भी जल्दी प्राप्त नहीं होते।
भगवान्की तरफ चलनेवाले, वैष्णव संस्कारवाले साधकोंकी मांस आदिमें जैसी अरुचि होती है, वैसी अरुचि साधककी विषय-भोगोंमें नहीं होती अर्थात् विषय-भोग उतने निषिद्ध और पतन करनेवाले नहीं दीखते। कारण कि विषयभोगोंका ज्यादा अभ्यास होनेसे उनमें मांस आदिकी तरह ग्लानि नहीं होती। मांस आदि सर्वथा निषिद्ध वस्तु खानेसे पतन तो होता ही है, पर उससे भी ज्यादा पतन होता है—रागपूर्वक विषयभोगोंको भोगनेसे। कारण कि मांस आदिमें तो ‘यह निषिद्ध वस्तु है’ ऐसी भावना रहती है, पर भोगोंको भोगनेसे ‘यह निषिद्ध है’ ऐसी भावना नहीं रहती। इसलिये भोगोंको जो संस्कार भीतर बैठ जाते हैं, वे बड़े भयंकर होते हैं। तात्पर्य है कि मांस आदि खानेसे जो पाप लगता है, वह दण्ड भोगकर नष्ट हो जायगा। वह पाप आगे नये पापोंमें नहीं लागेयगा। परन्तु रागपूर्वक विषयभोगोंका सेवन करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं, वे जन्म-जन्मान्तरतक विषयभोगोंमें और उनकी रुचिके परिणामस्वरूप पापोंमें लगाते रहेंगे।
तात्पर्य है कि साधकके अन्तःकरणमें विषयभोगोंकी रुचि रहनेके कारण ही वह संयतात्मा नहीं हो पाता, मन-इन्द्रियोंको अपने वशमें नहीं कर पाता। इसलिये उसको योगकी प्राप्तिमें अर्थात् ध्यानयोगकी सिद्धिमें कठिनता होती है।
‘वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्नुमुपायतः’ —परन्तु जो तत्परतापूर्वक साधनमें लगा हुआ है अर्थात् जो
ध्यानयोगकी सिद्धिके लिये ध्यानयोगके उपयोगी आहार-विहार, सोना-जागना आदि उपायोंका अर्थात् नियमोंका नियतरूपसे और दृढ़तापूर्वक पालन करता है और जिसका मन सर्वथा वशमें है, ऐसे वश्यात्मा साधकके द्वारा योग प्राप्त किया जा सकता है अर्थात् उसको ध्यानयोगकी सिद्धि मिल सकती है, ऐसा मेरा मत है— ‘इति मे मतिः।’
वश्यात्मा होनेका उपाय है—सबसे पहले अपने-आपको यह समझे कि ‘मैं भोगी नहीं हूँ। मैं जिज्ञासु हूँ तो केवल तत्त्वको जानना ही मेरा काम है; मैं भगवान्का हूँ तो केवल भगवान्के अर्पित होना ही मेरा काम है; मैं सेवक हूँ तो केवल सेवा करना ही मेरा काम है। किसीसे कुछ भी चाहना मेरा काम नहीं है’—इस तरह अपनी अहंताका परिवर्तन कर दिया जाय तो मन बहुत जल्दी वशमें हो जाता है।
जब मन शुद्ध हो जाता है, तब वह स्वतः वशमें हो जाता है। मनमें उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका राग रहना ही मनकी अशुद्धि है। जब साधकका एक परमात्मप्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य हो जाता है, तब उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका राग हट जाता है और मन शुद्ध हो जाता है।
व्यवहारमें साधक यह सावधानी रखे कि कभी किसी अंशमें पराया हक न आ जाय; क्योंकि पराया हक लेनेसे मन अशुद्ध हो जाता है। कहीं नौकरी, मजदूरी करे, तो जितने पैसे मिलते हैं, उससे अधिक काम करे। व्यापार करे तो वस्तुका तौल, नाप या गिनती औरोंकी अपेक्षा ज्यादा भले ही हो जाय, पर कम न हो। मजदूर आदिको पैसे दे तो उसके कामके जितने पैसे बनते हों, उससे कुछ अधिक पैसे उसे दे। इस प्रकार व्यवहार करनेसे मन शुद्ध हो जाता है।
मार्मिक बात
ध्यानयोगमें अर्जुनने मनकी चंचलताको बाधक माना और उसको रोकना वायुको रोकनेकी तरह असम्भव बताया। इसपर भगवान्ने मनके निग्रहके लिये अभ्यास और वैराग्य—ये दो उपाय बताये। इन दोनोंमें भी ध्यान-योगके लिये ‘अभ्यास’ मुख्य है (गीता—छठे अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)। ‘वैराग्य’ ज्ञानयोगके लिये विशेष उपयोगी होता है। यद्यपि वैराग्य ध्यानयोगमें भी सहायक है, तथापि ध्यानयोगमें रागके रहते हुए भी मनको रोकना जा सकता है। अगर यह कहा जाय कि रागके रहते हुए मन
श्लोक ३७ ]
- साधक-संजीवनी *
४७९
नहीं रुकता, तो एक आपत्ति आती है। पातंजलयोगदर्शनके अनुसार चित्त-वृत्तियोंका निरोध अभ्याससे ही हो सकता है। अगर उसमें वैराग्य ही कारण हो, तो सिद्धियोंकी प्राप्ति कैसे होगी ? (जिसका वर्णन पातंजलयोगदर्शनके विभूतिपादमें किया गया है।) तात्पर्य है कि अगर भीतर राग रहते हुए चित्त एकाग्र और निरुद्ध होता है, तो उसमें रागके कारणसे सिद्धियाँ प्रकट होती हैं। कारण कि संयम (धारणा, ध्यान और समाधि) किसी-न-किसी सिद्धिके लिये किया जाता है और जहाँ सिद्धिका उद्देश्य है, वहाँ रागका अभाव कैसे हो सकता है? परन्तु जहाँ केवल परमात्मतत्त्वका उद्देश्य होता है, वहाँ ये धारणा, ध्यान और समाधि भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें सहायक हो जाते हैं।
एकाग्रताके बाद जब चित्तकी निरुद्ध-अवस्था आती है, तब समाधि होती है। समाधि कारणशरीरमें होती है और समाधिसे भी व्युत्थान होता है। जबतक समाधि और व्युत्थान—ये दो अवस्थाएँ हैं, तबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर तो सहजावस्था होती है, जिससे व्युत्थान होता ही नहीं। अतः चित्तकी चंचलताको रोकनेके विषयमें भगवान् ज्यादा नहीं
बोले; क्योंकि चित्तको निरुद्ध करना भगवान्का ध्येय नहीं है अर्थात् भगवान्ने जिस ध्यानका वर्णन किया है, वह ध्यान साधन है, ध्येय नहीं। भगवान्के मतमें संसारमें जो राग है, यही खास बाधा है और इसको दूर करना ही भगवान्का उद्देश्य है। ध्यान तो एक शक्ति है, एक पूँजी है, जिसका लौकिक-पारलौकिक सिद्धियों आदिमें सम्यक् उपयोग किया जा सकता है।
स्वयं केवल परमात्मतत्त्वको चाहता है, तो उसको मनको एकाग्र करनेकी इतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी आवश्यकता प्रकृतिके कार्य मनसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी, मनसे अपनापन हटानेकी है। अतः जब समाधिसे भी उपरति हो जाती है, तब सर्वातीत तत्त्वकी प्राप्ति होती है। तात्पर्य है कि जबतक समाधि-अवस्थाकी प्राप्ति नहीं होती, तबतक उसमें एक आकर्षण रहता है। जब वह अवस्था प्राप्त हो जाती है, तब उसमें आकर्षण न रहकर सच्चे जिज्ञासुको उससे उपरति हो जाती है। उपरति होनेसे अर्थात् अवस्थामात्रसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे अवस्थातीत चिन्मय-तत्त्वकी अनुभूति स्वतः हो जाती है। यही योगकी सिद्धि है। चिन्मय-तत्त्वके साथ स्वयंका नित्ययोग अर्थात् नित्य-सम्बन्ध है।
परिशिष्ट भाव —वास्तवमें ध्यानयोगकी सिद्धिके लिये मनका निग्रह करना उतना आवश्यक नहीं है, जितना उसको वशमें करना अर्थात् शुद्ध करना आवश्यक है। शुद्ध करनेका तात्पर्य है—मनमें विषयोंका राग न रहना। जिसने अपने मनको शुद्ध कर लिया है, उसका ध्यानयोग प्रयत्न करनेपर सिद्ध हो जाता है।
भगवान्ने इकलीसवें श्लोकमें ‘सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः’ पदोंसे जो बात कही थी, उसमें मुख्य बाधा है—भगवद्वबुद्धि न होना और बत्तीसवें श्लोकमें ‘आत्मीप्स्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन’ पदोंसे जो बात कही थी, उसमें मुख्य बाधा है—राग-द्वेष होना। परन्तु अर्जुनने भूलसे मनकी चंचलताको बाधक समझ लिया! वास्तवमें मनकी चंचलता बाधक नहीं है, प्रत्युत सबमें भगवद्वबुद्धि न होना और राग-द्वेष होना बाधक है। जबतक राग-द्वेष रहते हैं, तबतक सबमें भगवद्वबुद्धि नहीं होती और जबतक सबमें भगवद्वबुद्धि नहीं होती अर्थात् भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ताकी मान्यता रहती है, तबतक मनका सर्वथा निरोध नहीं होता।
वृत्तिका निरोध करनेसे वृत्तिकी सत्ता आती है; क्योंकि वृत्तिकी सत्ता स्वीकार की है, तभी तो निरोध करते हैं। स्वरूपमें कोई वृत्ति नहीं है। अतः वृत्तिका निरोध करनेसे कुछ कालके लिये मनका निरोध होगा, फिर व्युत्थान हो जायगा। अगर दूसरी सत्ताकी मान्यता ही न रहे, तो फिर व्युत्थानका प्रश्न ही पैदा नहीं होगा। कारण कि दूसरी सत्ता न हो तो मन है ही नहीं!
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि जिसका अन्तःकरण पूरा वशमें नहीं है अर्थात् जो शिथिल प्रयत्नवाला है, उसको योगकी प्राप्तिमें कठिनता होती है। इसपर अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें प्रश्न करते हैं।
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥
४७२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
अर्जुन बोले—
| कृष्ण | = हे कृष्ण ! | अन्त समयमें अगर) | योगसिद्धिको |
|---|---|---|---|
| श्रद्धया, उपेतः | = जिसकी साधनमें | योगात् | = योगसे |
| श्रद्धा है, | चलितमानसः | = विचलितमना | काम् |
| अयतिः | = पर जिसका प्रयत्न | हो जाय (तो) | |
| शिथिल है, (वह | योगसंसिद्धिम् | = (वह) | गच्छति |
व्याख्या—‘अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्छलित-मानसः’— ‘जिसकी साधनमें अर्थात् जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदिमें रुचि है, श्रद्धा है और उनको करता भी है, पर अन्तःकरण और बहिःकरण वशमें न होनेसे साधनमें शिथिलता है, तत्परता नहीं है। ऐसा साधक अन्तसमयमें संसारमें राग रहनेसे, विषयोंका चिन्तन होनेसे अपने साधनसे विचलित हो जाय, अपने ध्येयपर स्थिर न रहे तो फिर उसकी क्या गति होती है?
‘अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति’— विषयासक्ति, असावधानीके कारण अन्तकालमें जिसका मन विचलित हो गया अर्थात् साधनासे हट गया और इस कारण उसको योगकी संसिद्धि—परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई तो फिर वह किस गतिको प्राप्त होता है?
परिशिष्ट भाव— करणसापेक्ष साधनमें मनको साथ लेकर स्वरूपमें स्थिति होती है—‘यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते’ (गीता ६।१८)। अतः मनके साथ सम्बन्ध रहनेसे विचलितमना होकर योगभ्रष्ट होनेकी सम्भावना रहती है। कारणको अपना माननेसे ही करणसापेक्ष साधन होता है। ध्यानयोगी मन (करण)—को अपना मानकर उसको परमात्मामें लगाता है। मन लगानेसे ही वह योगभ्रष्ट होता है। अतः योगभ्रष्ट होनेमें करणसापेक्षता कारण है। यह करणसापेक्षता कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही साधनोंमें नहीं है।
ध्यानयोगीका पुनर्जन्म होता है—मनके विचलित होनेसे अर्थात् अपने साधनसे भ्रष्ट होनेसे, पर कर्मयोगी अथवा ज्ञानयोगीका पुनर्जन्म होता है—सांसारिक आसक्ति रहनेसे। भक्तियोगमें भगवान्का आश्रय रहनेसे भगवान् अपने भक्तकी विशेष रक्षा करते हैं—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ (गीता ९।२२), ‘मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि’ (गीता १८।५८)।
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥
| महाबाहो | = हे महाबाहो ! | विमूढः | = मोहित अर्थात् | कच्छात् | = क्या |
|---|---|---|---|---|---|
| अप्रतिष्ठः | = संसारके | विचलित | छिन्नाभ्रम् | = छिन्न-भिन्न | |
| आश्रयसे | उभयविभ्रष्टः | = (—इस | बादलकी | ||
| रहित (और) | तरह) दोनों | इव | = तरह | ||
| ब्रह्मणः | = परमात्मप्राप्तिके | ओरसे भ्रष्ट | न, नश्यति | = नष्ट तो नहीं हो | |
| पथि | = मार्गमें | हुआ साधक | जाता ? |
व्याख्या—[अर्जुनने पूर्वोक्त श्लोकमें ‘कां गतिं कृष्ण गच्छति’ कहकर जो बात पूछी थी, उसीका इस श्लोकमें
खुलासा पूछते हैं।]
‘अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि’— वह
श्लोक ३८ ]
- साधक-संजीवनी *
४७३
सांसारिक प्रतिष्ठा-(स्थिति-) से तो जानकर रहित हुआ है अर्थात् उसने संसारके सुख-आराम, आदर-सत्कार, यश-प्रतिष्ठा आदिकी कामना छोड़ दी है, इनको प्राप्त करनेका उसका उद्देश्य ही नहीं रहा है। इस तरह संसारका आश्रय छोड़कर वह परमात्मप्राप्तिके मार्गपर चला; पर जीवित-अवस्थामें परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई और अन्तसमयमें साधनसे विचलित हो गया अर्थात् परमात्माकी स्मृति नहीं रही।
‘कच्चिनोभयविभ्रष्टछिन्नाभ्रमिव नश्यति’—ऐसा वह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ अर्थात् सांसारिक और पारमार्थिक—दोनों उन्नतियोंसे रहित हुआ साधक छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता? तात्पर्य है कि जैसे किसी बादलके टुकड़ेने अपने बादलको तो छोड़ दिया और दूसरे बादलतक वह पहुँचा नहीं, वायुके कारण बीचमें ही छिन्न-भिन्न हो गया। ऐसे ही साधकने संसारके आश्रयको तो छोड़ दिया और अन्तसमयमें परमात्माकी स्मृति नहीं रही, फिर वह नष्ट तो नहीं हो जाता? उसका पतन तो नहीं हो जाता?
बादलका दृष्टान्त यहाँ पूरा नहीं बैठता। कारण कि वह बादलका टुकड़ा जिस बादलसे चला, वह बादल और जिसके पास जा रहा था, वह बादल तथा वह स्वयं (बादलका टुकड़ा)—ये तीनों एक ही जातिके हैं अर्थात् तीनों ही जड़ हैं। परन्तु जिस साधकने संसारको छोड़ा, वह संसार और जिसकी प्राप्तिके लिये चला वह परमात्मा तथा वह स्वयं (साधक)—ये तीनों एक जातिके नहीं हैं। इन तीनोंमें संसार जड़ है और परमात्मा तथा स्वयं चेतन हैं। इसलिये ‘पहला आश्रय छोड़ दिया और दूसरा प्राप्त नहीं हुआ’—इस विषयमें ही उपर्युक्त दृष्टान्त ठीक बैठता है।
इस श्लोकमें अर्जुनके प्रश्नका आशय यह है कि साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे जीवका अभाव तो कभी हो ही नहीं सकता। अगर इसके भीतर संसारका उद्देश्य होता, संसारका आश्रय होता, तो यह स्वर्ग आदि लोकोंमें अथवा नरकोंमें तथा पशु-पक्षी आदि आसुरी योनियोंमें चला जाता, पर रहता तो संसारमें ही है। उसने संसारका आश्रय छोड़ दिया और उसका उद्देश्य केवल परमात्मप्राप्ति
हो गया, पर प्राणोंके रहते-रहते परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई और अन्तकालमें किसी कारणसे उस उद्देश्यके अनुसार साधनमें स्थिति भी नहीं रही, परमात्मचिन्तन भी नहीं रहा, तो वह वहाँसे भी भ्रष्ट हो गया। ऐसा साधक किस गतिको जायगा?
विशेष बात
अगर इस श्लोकमें ‘परमात्माकी प्राप्तिसे और साधनसे भ्रष्ट (च्युत) हुआ’—ऐसा अर्थ लिया जाय, तो ऐसा कहना यहाँ बन ही नहीं सकता। कारण कि आगे जो बादलका दृष्टान्त दिया है, वह उपर्युक्त अर्थके साथ ठीक नहीं बैठता। बादलका टुकड़ा एक बादलको छोड़कर दूसरे बादलकी तरफ चला, पर दूसरे बादलतक पहुँचनेसे पहले बीचमें ही वायुसे छिन्न-भिन्न हो गया। इस दृष्टान्तमें स्वयं बादलके टुकड़ेने ही पहले बादलको छोड़ा है अर्थात् अपनी पहली स्थितिको छोड़ा है और आगे दूसरे बादलतक पहुँचा नहीं, तभी वह उभयभ्रष्ट हुआ है। परन्तु साधकको तो अभी परमात्माकी प्राप्ति हुई ही नहीं, फिर उसको परमात्माकी प्राप्तिसे भ्रष्ट (च्युत) होना कैसे कहा जाय?
दूसरी बात, साध्यकी प्राप्ति होनेपर साधक साध्यसे कभी च्युत हो ही नहीं सकता अर्थात् किसी भी परिस्थितिमें वह साध्यसे अलग नहीं हो सकता, उसको छोड़ नहीं सकता। अतः उसको साध्यसे च्युत कहना बनता ही नहीं। हाँ, अन्तसमयमें स्थिति न रहनेसे, परमात्माकी स्मृति न रहनेसे उसको ‘साधनभ्रष्ट’ तो कह सकते हैं, पर ‘उभयभ्रष्ट’ नहीं कह सकते। अतः यहाँ बादलके दृष्टान्तके अनुसार वही उभयभ्रष्ट लेना युक्तिसंगत बैठता है, जिसने संसारके आश्रयको जानकर ही अपनी ओरसे छोड़ दिया और परमात्माकी प्राप्तिके लिये चला, पर अन्तसमयमें किसी कारणसे परमात्माकी याद नहीं रही, साधनसे विचलितमना हो गया। इस तरह संसार और साधन—दोनोंमें उसकी स्थिति न रहनेसे ही वह उभयभ्रष्ट हुआ है। अर्जुनने भी सँतोसवें श्लोकमें ‘योगाच्चलितमानसः’ कहा है और इस (अङ्गीसवें) श्लोकमें ‘अप्रतिष्ठः’, ‘विमूढो ब्रह्मणः पथि’ और ‘छिन्नाभ्रमिव’ कहा है। इसका तात्पर्य यही है कि उसने संसारको छोड़ दिया और परमात्माकी प्राप्तिके साधनसे विचलित हो गया, मोहित हो गया।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त सन्देहको दूर करनेके लिये अर्जुन आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रार्थना करते हैं।
४७४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
एतन्मे संशयं कृष्ण छेतुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥
| कृष्ण | = हे कृष्ण ! | छेतुम् | = छेदन करनेके लिये | छेत्ता | = छेदन करनेवाला |
|---|---|---|---|---|---|
| मे | = मेरे | अर्हसि | = (आप ही) योग्य हैं; | त्वदन्यः | = आपके सिवाय |
| एतत् | = इस | हि | = क्योंकि | दूसरा | |
| संशयम् | = सन्देहका | अस्य | = इस | न, उपपद्यते | = कोई हो नहीं |
| अशेषतः | = सर्वथा | संशयस्य | = संशयका | सकता । |
व्याख्या— ‘एतन्मे संशयं कृष्ण छेतुमर्हस्यशेषतः’—परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेसे साधक पापकर्मोंसे तो सर्वथा रहित हो गया, इसलिये वह नरकोंमें तो जा ही नहीं सकता और स्वर्गका ध्येय न रहनेसे स्वर्गमें भी जा नहीं सकता। मनुष्ययोनियमें आनेका उसका उद्देश्य नहीं है, इसलिये वह उसमें भी नहीं आ सकता और परमात्मप्राप्तिके साधनसे भी विचलित हो गया। ऐसा साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता? यह मेरा संशय है।
‘त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते’ —इस संशयका सर्वथा छेदन करनेवाला अन्य कोई हो नहीं सकता। इसका तात्पर्य है कि शास्त्रकी कोई गुत्थी हो, शास्त्रका कोई गहन विषय हो, कोई ऐसी कठिन पंक्ति हो, जिसका अर्थ न लगता हो, तो उसको शास्त्रोंका ज्ञाता
कोई विद्वान् भी समझा सकता है। परन्तु योगभ्रष्टकी क्या गति होती है? इसका उत्तर वह नहीं दे सकता। हाँ, योगी कुछ हदतक इसको जान सकता है, पर वह सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति-आगतिको अर्थात् जाने और आनेको नहीं जान सकता; क्योंकि वह ‘युंजान योगी’ है अर्थात् अभ्यास करके योगी बना है। अतः वह वहीतक जान सकता है, जहाँतक उसकी जाननेकी हद है। परन्तु आप तो ‘युक्त योगी’ हैं अर्थात् आप बिना अभ्यास, परिश्रमके सर्वत्र सब कुछ जाननेवाले हैं। आपके समान जानकार कोई हो सकता ही नहीं। आप साक्षात् भगवान् हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति-आगतिको जाननेवाले हैं*। अतः इस योगभ्रष्टके गतिविषयक प्रश्नका उत्तर आप ही दे सकते हैं। आप ही मेरे इस संशयको दूर कर सकते हैं।
परिशिष्ट भाव— अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णकी भगवत्तापर विश्वास था, तभी यहाँ वे योगभ्रष्टकी गतिके विषयमें प्रश्न करते हैं और कहते हैं कि इस बातको आपके सिवाय दूसरा कोई बता नहीं सकता। भगवान् श्रीकृष्णकी भगवत्तापर विश्वास होनेके कारण ही उन्होंने एक अक्षौहिणी सशस्त्र नारायणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान्को ही स्वीकार किया था !
सम्बन्ध— अङ्गीसर्वे श्लोकमें अर्जुनने शंका की थी कि संसारसे और साधनसे च्युत हुए साधकका कहीं पतन तो नहीं हो जाता? उसका समाधान करनेके लिये भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिददुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥
श्रीभगवान् बोले—
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | न | = न तो | (और) | |
|---|---|---|---|---|---|
| तस्य | = उसका | इह | = इस लोकमें | न | = न |
- उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥
(विष्णुपुराण ६।५।७८; नारदपुराण, पूर्व० ४६।२१)
‘जो सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयको, गति और अगतिको एवं विद्या और अविद्याको जानता है, वही भगवान् कहलानेयोग्य है।’
श्लोक ४० ]
- साधक-संजीवनी *
४७५
| अमृत्र | = परलोकमें | हि | = क्योंकि | कश्चित् | = कोई भी मनुष्य |
|---|---|---|---|---|---|
| एव | = ही | तात | = हे प्यारे ! | दुर्गतिम् | = दुर्गतिको |
| विनाशः | = विनाश | कल्याणकृत् | = कल्याणकारी काम | न | = नहीं |
| विद्यते | = होता है ; | करनेवाला | गच्छति | = जाता । |
व्याख्या —[जिसको अन्तकालमें परमात्माका स्मरण नहीं होता, उसका कहीं पतन तो नहीं हो जाता—इस बातको लेकर अर्जुनके हृदयमें बहुत व्याकुलता है। यह व्याकुलता भगवान्से छिपी नहीं है। अतः भगवान् अर्जुनके 'कां गतिं कृष्ण गच्छति'—इस प्रश्नका उत्तर देनेसे पहले ही अर्जुनके हृदयकी व्याकुलता दूर करते हैं।]
'पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते' —हे पृथानन्दन! सच्चे हृदयसे साधन करनेवाले मनुष्यका न तो इस जन्ममें पतन होता है और न मरनेके बाद ही पतन होता है (गीता—छठे अध्यायके इकतालिसवेंसे पैतालिसवें श्लोकतक)। तात्पर्य है कि उसकी योगमें जितनी स्थिति बन चुकी है, उससे नीचे वह नहीं गिरता। उसकी साधन-सामग्री नष्ट नहीं होती। उसका पारमार्थिक उद्देश्य नहीं बदलता। जैसे अनादिकालसे वह जन्मता-मरता रहा है, ऐसे ही आगे भी जन्मता-मरता रहे—उसका यह पतन नहीं होता।
जैसे भरत मुनि भारतवर्षका राज्य छोड़कर एकात्ममें तप करते थे। वहाँ दयापरवश होकर वे हरिणके बच्चेमें आसक्त हो गये, जिससे दूसरे जन्ममें उनको हरिण बनना पड़ा। परन्तु उन्होंने जितना त्याग, तप किया था, उनकी जितनी साधनकी पूँजी इकट्ठी हुई थी, वह उस हरिणके जन्ममें भी नष्ट नहीं हुई। उनको हरिणके जन्ममें भी पूर्वजन्मकी बात याद थी, जो कि मनुष्यजन्ममें भी नहीं रहती। अतः वे (हरिण-जन्ममें) बचपनसे ही अपनी माँके साथ नहीं रहे। वे हरे पते न खाकर सूखे पते खाते थे। तात्पर्य यह है कि अपनी स्थितिसे न गिरनेके कारण हरिणके जन्ममें भी उनका पतन नहीं हुआ (श्रीमद्भागवत, पाँचवाँ स्कन्ध, सातवाँ-आठवाँ अध्याय)। इसी तरहसे पहले मनुष्यजन्ममें जिनका स्वभाव सेवा करनेका, जप-ध्यान करनेका रहा है और विचार अपना उद्धार करनेका रहा है, वे किसी कारणवश अन्तसमयमें योगभ्रष्ट हो जायें तथा इस लोकमें पशु-पक्षी भी बन जायें, तो भी उनका वह अच्छा स्वभाव और सत्संस्कार नष्ट नहीं होते। ऐसे बहुत-से उदाहरण आते हैं कि कोई दूसरे जन्ममें हाथी, ऊँट आदि बन गये, पर उन योनियोंमें भी वे भगवान्की कथा सुनते थे। एक जगह कथा होती थी, तो एक काला कुत्ता आकर वहाँ बैठता और कथा सुनता। जब कीर्तन
करते हुए कीर्तन-मण्डली घूमती, तो उस मण्डलीके साथ वह कुत्ता भी घूमता था। यह हमारी देखी हुई बात है।
'न हि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गतिं तात गच्छति' —भगवान्ने इस श्लोकके पूर्वार्धमें अर्जुनके लिये 'पार्थ' सम्बोधन दिया, जो आत्मीय-सम्बन्धका द्योतक है। अर्जुनके सब नामोंमें भगवान्को यह 'पार्थ' नाम बहुत प्यारा था। अब उत्तरार्धमें उससे भी अधिक प्यारभरे शब्दोंमें भगवान् कहते हैं कि 'हे तात! कल्याणकारी कार्य करनेवालेकी दुर्गति नहीं होती।' यह 'तात' सम्बोधन गीताभरमें एक ही बार आया है, जो अत्यधिक प्यारका द्योतक है।
इस श्लोकमें भगवान्ने मात्र साधकके लिये बहुत आश्वासनकी बात कही है कि जो कल्याणकारी काम करनेवाला है अर्थात् किसी भी साधनसे सच्चे हृदयसे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करना चाहता है, ऐसे किसी भी साधककी दुर्गति नहीं होती।
उसकी दुर्गति नहीं होती—यह कहनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य कल्याणकारी कार्यमें लगा हुआ है अर्थात् जिसके लिये मनुष्य-शरीर मिला है, उस अपने असली काममें लगा हुआ है तथा सांसारिक भोग और संग्रहमें आसक्त नहीं है, वह चाहे किसी मार्गसे चले, उसकी दुर्गति नहीं होती। कारण कि उसका ध्येय चिन्मय-तत्त्व में (परमात्मा) हूँ; अतः उसका पतन नहीं होता। उसकी रक्षा मैं करता ही रहता हूँ, फिर उसकी दुर्गति कैसे हो सकती है?
मेरी दृष्टि स्वतः प्राणिमात्रके हितमें रहती है। जो मनुष्य मेरी तरफ चलता है, अपना परमहित करनेके लिये उद्योग करता है, वह मुझे बहुत प्यारा लगता है; क्योंकि वास्तवमें वह मेरा ही अंश है, संसारका नहीं। उसका वास्तविक सम्बन्ध मेरे साथ ही है। संसारके साथ उसका वास्तविक सम्बन्ध नहीं है। उसने मेरे साथ इस वास्तविक सम्बन्धको, असली लक्ष्यको पहचान लिया, तो फिर उसकी दुर्गति कैसे हो सकती है? उसका किया हुआ साधन भी नष्ट कैसे हो सकता है? हाँ, कभी-कभी देखनेमें वह मोहित हुआ-सा दीखता है, उसका साधन छूटा हुआ-सा दीखता है; परन्तु ऐसी परिस्थिति उसके अभिमानके कारण ही उसके सामने आती है। मैं भी उसको चेतानेके लिये, उसका अभिमान दूर
४७६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
करनेके लिये ऐसी घटना घटा देता हूँ, जिससे वह व्याकुल हो जाता है और मेरी तरफ तेजीसे चल पड़ता है। जैसे, गोपियोंका अभिमान (मद) देखकर मैं रासमें ही अन्तर्धान हो गया, तो सब गोपियाँ घबरा गयीं! जब वे विशेष व्याकुल हो गयीं, तब मैं उन गोपियोंके समुदायके बीचमें ही प्रकट हो गया और उनके पूछनेपर मैंने कहा—‘मया परोक्षं भजता तिरोहितम् ’ (श्रीमद्भा० १०।३२।२१) अर्थात् तुमलोगोंका भजन करता हुआ ही मैं अन्तर्धान हुआ था। तुमलोगोंकी याद और तुमलोगोंका हित मेरेसे छूटा नहीं है। इस प्रकार मेरे हृदयमें साधन करनेवालोंका बहुत बड़ा स्थान है। इसका कारण यह है कि अनन्त जन्मोंसे भूला हुआ यह प्राणी जब केवल मेरी तरफ लगता है, तब वह मेरेको बहुत प्यारा लगता है; क्योंकि उसने अनेक योनियोंमें बहुत दुःख पाया है और अब वह सन्मार्गपर आ गया है। जैसे माता अपने छोटे बच्चेकी रक्षा, पालन और हित करती रहती है, ऐसे ही मैं उस साधकके साधन और उसके हितकी रक्षा करते हुए उसके साधनकी वृद्धि करता रहता हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि जिसके भीतर एक बार साधनके संस्कार पड़ गये हैं, वे संस्कार फिर कभी नष्ट नहीं होते। कारण कि उस परमात्माके लिये जो काम किया जाता है, वह ‘सत्’ हो जाता है—‘कर्म चैव तदर्थीयं सत्त्वेवाभिधीयते ’ (गीता १७।२७) अर्थात् उसका अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः ’ (गीता २।१६)। इसी बातको भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि कल्याणकारी काम करनेवाले किसी भी मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती। उसके जितने सद्भाव बने हैं, जैसा स्वभाव बना है, वह प्राणी किसी कारणवशात् किसी भी योनियें चला जाय अथवा किसी भी परिस्थितियें पड़ जाय, तो भी वे सद्भाव उसका कल्याण करके ही छोड़ेंगे। अगर वह किसी कारणसे किसी नीच योनियें भी चला जाय, तो वहाँ भी अपने सजातीय
योनियालोंकी अपेक्षा उसके स्वभावमें फर्क रहेगा।१
यहाँ शंका हो सकती है कि अजामिल-जैसा शुद्ध ब्राह्मण भी वेश्यागामी हो गया, बिल्खमंगल भी चिन्तामणि नामकी वेश्याके वशमें हो गये, तो इनका इस जीवित अवस्थामें ही पतन कैसे हो गया? इसका समाधान यह है कि लोगोंको तो उनका पतन हो गया—ऐसा दीखता है, पर वास्तवमें उनका पतन नहीं हुआ है; क्योंकि अन्तमें उनका उद्धार ही हुआ है। अजामिलको लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आये और बिल्खमंगल भगवान्के भक्त बन गये। इस प्रकार वे पहले भी सदाचारी थे और अन्तमें भी उनका उद्धार हो गया, केवल बीचमें ही उनकी दशा अच्छी नहीं रही। तात्पर्य यह हुआ कि किसी कुसंगसे, किसी विघ्न-बाधासे, किसी असावधानीसे उसके भाव और आचरण गिर सकते हैं और ‘मैं कौन हूँ, मैं क्या कर रहा हूँ, मुझे क्या करना चाहिये’—ऐसी विस्मृति होकर वह संसारके प्रवाहमें बह सकता है। परन्तु पहलेकी साधनावस्थामें वह जितना साधन कर चुका है, उसका संसारके साथ जितना सम्बन्ध टूट चुका है, उतनी पूँजी तो उसकी वैसी-की-वैसी ही रहती है अर्थात् वह कभी किसी अवस्थामें छूटती नहीं, प्रत्युत उसके भीतर सुरक्षित रहती है। उसको जब कभी अच्छा संग मिलता है अथवा कोई बड़ी आफत आती है तो वह भीतरका भाव प्रकट हो जाता है और वह भगवान्की ओर तेजीसे लग जाता है२। हाँ, साधनमें बाधा पड़ जाना, भाव और आचरणोंका गिरना तथा परमात्मप्राप्तियें देरी लगना—इस दृष्टिसे तो उसका पतन हुआ ही है। अतः उपर्युक्त उदाहरणोंसे साधकको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि हमें हर समय सावधान रहना है, जिससे हम कहीं कुसंगमें न पड़ जायँ, कहीं विषयोंके वशीभूत होकर अपना साधन न छोड़ दें और कहीं विपरीत कामोंमें न चले जायँ।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको आश्वासन दिया कि किसी भी साधकका पतन नहीं होता और वह दुर्गतिमें नहीं जाता। अब भगवान् अर्जुनद्वारा सैतीसवें श्लोकमें किये गये प्रश्नके अनुसार योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन करते हैं।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥
१-जिसका स्वभाव अच्छा बन गया है, जिसके भीतर सद्भाव हैं, वह किसी नीच योनियें साँप, बिच्छू आदि नहीं बन सकता। कारण कि उसका स्वभाव साँप, बिच्छू आदि योनियोंके अनुरूप नहीं है और वह उन योनियोंके अनुरूप काम भी नहीं कर सकता।
२-बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं। (मानस १।३।५)
श्लोक ४९ ]
- साधक-संजीवनी *
४७७
| योगभ्रष्टः | = (वह) योगभ्रष्ट | प्राप्य | = प्राप्त होकर (और) | शुचीनाम् | = शुद्ध (ममत्तरहित) |
|---|---|---|---|---|---|
| पुण्यकृताम् | = पुण्यकर्म करनेवालोंके | शाश्वतीः | = (वहाँ) बहुत | श्रीमताम् | = श्रीमानोंके |
| लोकान् | = लोकोंको | समाः | = वर्षांतक | गेहे | = घरमें |
| उषित्वा | = रहकर (फिर यहाँ) | अभिजायते | = जन्म लेता है। |
व्याख्या —‘प्राप्य पुण्यकृतां लोकान्’—जो लोग शास्त्रीय विधि-विधानसे यज्ञ आदि कर्मोंको सांगोपांग करते हैं, उन लोगोंका स्वर्गादि लोकोंपर अधिकार है, इसलिये उन लोकोंको यहाँ ‘पुण्यकर्म करनेवालोंके लोक’ कहा गया है। तात्पर्य है कि उन लोकोंमें पुण्यकर्म करनेवाले ही जाते हैं, पापकर्म करनेवाले नहीं। परन्तु जिन साधकोंको पुण्य-कर्मके फलरूप सुख भोगनेकी इच्छा नहीं है, उनको वे स्वर्गादि लोक विघ्नरूपमें और मुप्तमें मिलते हैं! तात्पर्य है कि यज्ञादि शुभ कर्म करनेवालोंको परिश्रम करना पड़ता है, उन लोकोंकी याचना—प्रार्थना करनी पड़ती है, यज्ञादि कर्मोंको विधि-विधानसे और सांगोपांग करना पड़ता है, तब कहीं उनको स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति होती है। वहाँ भी उनकी भोगोंकी वासना बनी रहती है; क्योंकि उनका उद्देश्य ही भोग भोगनेका था। परन्तु जो किसी कारणवश अन्तसमयमें साधनसे विचलितमना हो जाते हैं, उनको स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्तिके लिये न तो परिश्रम करना पड़ता है, न उनकी याचना करनी पड़ती है और न उनकी प्राप्तिके लिये यज्ञादि शुभ कर्म ही करने पड़ते हैं। फिर भी उनको स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति हो जाती है। वहाँ रहनेपर भी उनकी वहाँके भोगोंसे अरुचि हो जाती है; क्योंकि उनका उद्देश्य भोग भोगनेका था ही नहीं। वे तो केवल सांसारिक सूक्ष्म वासनाके कारण उन लोकोंमें जाते हैं। परन्तु उनकी वह वासना भोगी पुरुषोंकी वासनाके समान नहीं होती।
जो केवल भोग भोगनेके लिये स्वर्गमें जाते हैं, वे जैसे भोगोंमें तल्लीन होते हैं, वैसे योगभ्रष्ट तल्लीन नहीं हो सकता। कारण कि भोगोंकी इच्छावाले पुरुष भोगबुद्धिसे भोगोंको स्वीकार करते हैं और योगभ्रष्टको विघ्नरूपसे भोगोंमें जाना पड़ता है।
‘उषित्वा शाश्वतीः समाः’ —स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें यज्ञादि शुभकर्म करनेवाले भी (भोग भोगनेके उद्देश्यसे) जाते हैं और योगभ्रष्ट भी जाते हैं। भोग भोगनेके उद्देश्यसे स्वर्गमें जानेवालोंके पुण्य क्षीण होते हैं और पुण्योंके क्षीण होनेपर उन्हें लौटकर मृत्युलोकमें आना पड़ता है। इसलिये वे वहाँ सीमित वर्षांतक ही रह सकते हैं। परन्तु जिसका
उद्देश्य भोग भोगनेका नहीं है, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिका है, वह योगभ्रष्ट किसी सूक्ष्म वासनाके कारण स्वर्गमें चला जाय, तो वहाँ उसकी साधन-सम्पत्ति क्षीण नहीं होती। इसलिये वह वहाँ असीम वर्षांतक रहता है अर्थात् उसके लिये वहाँ रहनेकी कोई सीमा नहीं होती।
जो भोग भोगनेके उद्देश्यसे ऊँचे लोकोंमें जाते हैं, उनका उन लोकोंमें जाना कर्मजन्य है। परन्तु योगभ्रष्टका ऊँचे लोकोंमें जाना कर्मजन्य नहीं है; किन्तु यह तो योगका प्रभाव है, उनकी साधन-सम्पत्तिका प्रभाव है, उनके सत्-उद्देश्यका प्रभाव है।
स्वर्ग आदिका सुख भोगनेके उद्देश्यसे जो उन लोकोंमें जाते हैं, उनको न तो वहाँ रहनेमें स्वतन्त्रता है और न वहाँसे आनेमें ही स्वतन्त्रता है। उन्होंने भोग भोगनेके उद्देश्यसे ही यज्ञादि कर्म किये हैं, इसलिये उन शुभ कर्मोंका फल जबतक समाप्त नहीं होता, तबतक वे वहाँसे नीचे नहीं आ सकते और शुभ कर्मोंका फल समाप्त होनेपर वे वहाँ रह भी नहीं सकते। परन्तु जो परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही साधन करनेवाले हैं और केवल अन्तसमयमें योगसे विचलित होनेके कारण स्वर्ग आदिमें गये हैं, उनका वासनाके तारतम्यके कारण वहाँ ज्यादा-कम रहना हो सकता है, पर वे वहाँके भोगोंमें फँस नहीं सकते। कारण कि जब योगका जिज्ञासु भी शब्दब्रह्माका अतिक्रमण कर जाता है (छटे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक), तब वह योगभ्रष्ट वहाँ फँस ही कैसे सकता है?
‘शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते’ —स्वर्गादि लोकोंके भोग भोगनेपर जब भोगोंसे अरुचि हो जाती है, तब वह योगभ्रष्ट लौटकर मृत्युलोकमें आता है और शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है। उसके फिर लौटकर आनेमें क्या कारण है? वास्तवमें इसका कारण तो भगवान् ही जानें; किन्तु गीतापर विचार करनेसे ऐसा दीखता है कि वह मनुष्य-जन्ममें साधन करता रहा। वह साधनको छोड़ना नहीं चाहता था, पर अन्तसमयमें साधन छूट गया। अतः उस साधनका जो महत्त्व उसके अन्तःकरणमें अंकित है, वह स्वर्गादि लोकोंमें भी उस योगभ्रष्टको अज्ञातरूपसे