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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ४-५]

  • साधक-संजीवनी *

५०९

है*, जो कि पहले अपरा प्रकृतिसे सम्बन्ध रखनेसे आसक्ति और कामनाके रूपमें था। वह प्रेम अनन्त, अगाध, असीम, आनन्दरूप और प्रतिक्षण वर्धमान है। उसकी प्राप्ति होनेसे यह परा प्रकृति प्राप्त-प्राप्त्य हो जाती है, अपने असंगरूपका अनुभव होनेसे ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाती है और अपरा प्रकृतिको संसारमात्रकी सेवामें लगाकर संसारसे सर्वथा विमुख होनेसे कृतकृत्य हो जाती है। यही मानव-जीवनकी पूर्णता है, सफलता है।

‘प्रकृतिरष्टधा अपरेयम्’ पदोंसे ऐसा मालूम देता है कि यहाँ जो आठ प्रकारकी अपरा प्रकृति कही गयी है, वह ‘व्यष्टि अपरा प्रकृति’ है। इसका कारण यह है कि मनुष्यको व्यष्टि प्रकृति—शरीरसे ही बन्धन होता है, समष्टि प्रकृतिसे नहीं। कारण कि मनुष्य व्यष्टि शरीरके साथ अपनापन कर लेता है, जिससे बन्धन होता है।

व्यष्टि कोई अलग तत्त्व नहीं है, प्रत्युत समष्टिका ही एक क्षुद्र अंश है। समष्टिसे माना हुआ सम्बन्ध ही व्यष्टि कहलाता है अर्थात् समष्टिके अंश शरीरके साथ जीव अपना सम्बन्ध मान लेता है, तो वह समष्टिका अंश शरीर ही ‘व्यष्टि’ कहलाता है। व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बन्धन है। इस बन्धनसे छुड़ानेके लिये भगवान्ने आठ प्रकारकी अपरा प्रकृतिका वर्णन करके कहा है कि जीवरूप परा प्रकृतिने ही इस अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। यदि धारण न करे तो बन्धनका प्रश्न ही नहीं है।

पंद्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने जीवात्माको अपना अंश कहा है—‘ममैवांशो जीवलोकै जीवभूतः सनातनः।’ परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित रहनेवाले मन और पाँचों इन्द्रियोंको खींचता है अर्थात् उनको अपनी मानता है—‘मनः षष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।’ इसी तरह तेरहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्ररूपसे समष्टिका वर्णन करके छठे श्लोकमें व्यष्टिके विकारोंका वर्णन किया; क्योंकि ये विकार व्यष्टिके ही होते हैं, समष्टिके नहीं। इन सबसे यही सिद्ध हुआ कि व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बाधक है। इस व्यष्टिसे सम्बन्ध तोड़नेके लिये ही यहाँ व्यष्टि अपरा प्रकृतिका वर्णन किया गया है, जो कि समष्टिका ही अंग है। व्यष्टि प्रकृति

अर्थात् शरीर समष्टि सृष्टिमात्रके साथ सर्वथा अभिन्न है, भिन्न कभी हो ही नहीं सकता।

वास्तवमें मूल प्रकृति कभी किसीकी बाधक या साधक (सहायक) नहीं होती। जब साधक उससे अपना सम्बन्ध नहीं मानता, तब तो वह सहायक हो जाती है, पर जब वह उससे अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बाधक हो जाती है; क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे व्यष्टि अहंता (मैं-पन) पैदा होती है। यह अहंता ही बन्धनका कारण होती है।

यहाँ ‘इतीयं मे’ पदोंसे भगवान् यह चेता रहे हैं कि यह अपरा प्रकृति मेरी है। इसके साथ भूलसे अपनापन कर लेना ही बार-बार जन्म-मरणका कारण है; और जो भूल करता है, उसीपर भूलको मिटानेकी जिम्मेवारी होती है। अतः जीव इस अपराके साथ अपनापन न करे।

अहंतामें भोगेच्छा और जिज्ञासा—ये दोनों रहती हैं। इनमेंसे भोगेच्छाको कर्मयोगके द्वारा मिटाया जाता है और जिज्ञासाको ज्ञानयोगके द्वारा पूरा किया जाता है। कर्मयोग और ज्ञानयोग—इन दोनोंमेंसे एकके भी सम्यक्तया पूर्ण होनेपर एक-दूसरेमें दोनों आ जाते हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक) अर्थात् भोगेच्छाकी निवृत्ति होनेपर जिज्ञासाकी भी पूर्ति हो जाती है और जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर भोगेच्छाकी भी निवृत्ति हो जाती है। कर्मयोगमें भोगेच्छा मिटनेपर तथा ज्ञानयोगमें जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर असंगता स्वतः आ जाती है। उस असंगताका भी उपभोग न करनेपर वास्तविक बोध हो जाता है और मनुष्यका जन्म सर्वथा सार्थक हो जाता है।

‘जीवभूताम्’ —वास्तवमें यह जीवरूप नहीं है, प्रत्युत जीव बना हुआ है। यह तो स्वतः साक्षात् परमात्माका अंश है। केवल स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीररूप प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही यह जीव बना है। यह सम्बन्ध जोड़ता है—अपने सुखके लिये। यही सुख इसके जन्म-मरणरूप महान् दुःखका खास कारण है।

‘महाबाहो’ —हे अर्जुन! तुम बड़े शक्तिशाली हो, इसलिये तुम अपरा और परा प्रकृतिके भेदको समझनेमें समर्थ हो। अतः तुम इसको समझो—‘विद्धि।’

  • जिस साधकमें ज्ञानमार्गका विशेष महत्त्व होता है, उसमें परमात्माका प्रेम अपने स्वरूपके आकर्षणके रूपमें प्रकट हो जायगा और जिस साधकमें भक्तिके संस्कार होते हैं, उसमें वह प्रभु-प्रेमके रूपमें प्रकट हो जायगा। यदि ज्ञानमार्गवाले साधकका आग्रह नहीं होगा तो उसमें भी प्रभु-प्रेम प्रकट हो जायगा। वास्तवमें स्वरूप-बोध होनेपर ज्ञानमार्गका आग्रह नहीं रहता; अतः उसमें प्रभु-प्रेम प्रकट हो जाता है। इस दृष्टिसे अन्तमें दोनों (भक्तियोगी और ज्ञानयोगी) एक हो जाते हैं।

५०२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

'यथेदं धार्यते जगत्'—वास्तवमें यह जगत् जगद्गुरुप नहीं है, प्रत्युत भगवान्का ही स्वरूप है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९), 'सदसच्चाहम्' (९।१९)। केवल इस परा प्रकृति—जीवने इसको जगत्-रूपसे धारण कर रहा है अर्थात् जीव इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता मानकर अपने सुखके लिये इसका उपयोग करने लग गया। इसीसे जीवका बन्धन हुआ है। अगर जीव संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न मानकर इसको केवल भगवत्स्वरूप ही माने तो उसका जन्म-मरणरूप बन्धन मिट जायगा।

भगवान्की परा प्रकृति होकर भी जीवात्माने इस दृश्यमान जगत्को, जो कि अपरा प्रकृति है, धारण कर रहा है अर्थात् इस परिवर्तनशील, विकारी जगत्को स्थायी, सुन्दर और सुखप्रद मानकर 'मैं' और 'मेरे'-रूपसे धारण कर रहा है। जिसकी भोगों और पदार्थोंमें जितनी आसक्ति है, आकर्षण है, उसको उतना ही संसार और शरीर स्थायी, सुन्दर और सुखप्रद मालूम देता है। पदार्थोंका संग्रह तथा उनका उपभोग करनेकी लालसा ही खास बाधक है। संग्रहसे अभिमानजन्म सुख होता है और भोगोंसे संयोगजन्म सुख होता है। इस सुखासक्तिसे ही जीवने जगत्को जगत्-रूपसे धारण कर रहा है। सुखासक्तिके कारण ही वह इस जगत्को भगवत्स्वरूपसे नहीं देख सकता। जैसे स्त्री वास्तवमें जनन-शक्ति है; परन्तु स्त्रीमें आसक्त पुरुष स्त्रीको मातृरूपसे नहीं देख सकता, ऐसे ही संसार वास्तवमें भगवत्स्वरूप है; परंतु संसारको अपना भोग्य माननेवाला भोगासक्त पुरुष संसारको भगवत्स्वरूप नहीं देख सकता। यह भोगासक्ति ही जगत्को धारण कराती है अर्थात् जगत्को धारण करानेमें हेतु है।

दूसरी बात, मात्र मनुष्योंके शरीरोंकी उत्पत्ति रज-वीर्यसे ही होती है, जो कि स्वरूपसे स्वतः ही मलिन है। परंतु भोगोंमें आसक्त पुरुषोंकी उन शरीरोंमें मलिन बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत रमणीय बुद्धि होती है। यह रमणीय बुद्धि ही जगत्को धारण कराती है।

नदीके किनारे खड़े एक सन्तसे किसीने कहा कि 'देखिये महाराज! यह नदीका जल बह रहा है और उस पुलपर मनुष्य बह रहे हैं।' सन्तने उससे कहा कि 'देखो भाई! नदीका जल ही नहीं, खुद नदी भी बह रही है; और पुलपर मनुष्य ही नहीं, खुद पुल भी बह रहा है।' तात्पर्य

यह हुआ कि ये नदी, पुल तथा मनुष्य बड़ी तेजीसे नाशकी तरफ जा रहे हैं। एक दिन न यह नदी रहेगी, न यह पुल रहेगा और न ये मनुष्य रहेंगे। ऐसे ही यह पृथ्वी भी बह रही है अर्थात् प्रलयकी तरफ जा रही है। इस प्रकार भावरूपसे दीखनेवाला यह सारा जगत् प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है; परन्तु जीवने इसको भावरूपसे अर्थात् 'है' रूपसे धारण (स्वीकार) कर रहा है। परा प्रकृतिकी (स्वरूपसे) उत्पत्ति नहीं होती; पर अपरा प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेके कारण यह शरीरकी उत्पत्तिको अपनी उत्पत्ति मान लेता है और शरीरके नाशको अपना नाश मान लेता है, जिससे यह जन्मता-मरता रहता है। अगर यह अपराके साथ सम्बन्ध न जोड़े, इससे विमुख हो जाय अर्थात् भावरूपसे इसको सत्ता न दे तो जगत् सत्-रूपसे दीख ही नहीं सकता।

'इदम्' पदसे शरीर और संसार—दोनों लेने चाहिये; क्योंकि शरीर और संसार अलग-अलग नहीं हैं। तत्त्वतः (धातु चीज) एक ही है। शरीर और संसारका भेद केवल माना हुआ है, वास्तवमें अभेद ही है। इसलिये तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने 'इदं शरीरम्' पदोंसे शरीरको क्षेत्र बताया (तेरहवें अध्यायका पहला श्लोक); परन्तु जहाँ क्षेत्रका वर्णन किया है, वहाँ समष्टिका ही वर्णन हुआ है (तेरहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और इच्छा-द्वेषादि विकार व्यष्टिके माने गये हैं (तेरहवें अध्यायका छठा श्लोक); क्योंकि इच्छा आदि विकार व्यष्टि प्राणीके ही होते हैं। तात्पर्य है कि समष्टि और व्यष्टि तत्त्वतः एक ही हैं। एक होते हुए भी अपनेको शरीर माननेसे 'अहंता' और शरीरको अपना माननेसे 'ममता' पैदा होती है, जिससे बन्धन होता है। अगर शरीर और संसारकी अभिन्नताका अथवा अपनी और भगवान्की अभिन्नताका साक्षात् अनुभव हो जाय तो अहंता और ममता स्वतः मिट जाती हैं। ये अहंता और ममता कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंसे ही मिटती हैं। कर्मयोगसे—'निर्ममो निरहङ्कारः' (गीता २।७१), ज्ञानयोगसे—'अहङ्कारः' विमुच्य निर्ममः' (गीता १८।५३) और भक्तियोगसे 'निर्ममो निरहङ्कारः' (गीता १२।१३)। तात्पर्य है कि जड़ताके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होना चाहिये, जो कि केवल माना हुआ है। अतः विवेकपूर्वक न माननेसे अर्थात्

  • गीतामें 'जगत्' शब्द कहीं 'परा' प्रकृतिका (७।१३), कहीं 'अपरा' प्रकृतिका (७।५) और कहीं 'परा-अपरा' दोनों प्रकृतियोंका वाचक है (७।६)।

श्लोक ४-५]

  • साधक-संजीवनी *

५०३

वास्तविकताका अनुभव करनेसे वह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है।

विशेष बात

जैसे गुरु-शिष्यका सम्बन्ध होता है, तो इसमें गुरु शिष्यको अपना शिष्य मानता है। शिष्य गुरुको अपना गुरु मानता है। इस प्रकार गुरु अलग है और शिष्य अलग है अर्थात् उन दोनोंकी अलग-अलग सत्ता दीखती है। परन्तु उन दोनोंके सम्बन्धसे एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है, जिसको 'सम्बन्धकी सत्ता' कहते हैं*। ऐसे ही साक्षात् परमात्माके अंश जीवने शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। इस सम्बन्धके कारण एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है, जिसको 'मैं'-पन कहते हैं। सम्बन्धकी यह सत्ता ('मैं'-पन) केवल मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। जीव भूलसे इस माने हुए सम्बन्धको सत्य मान लेता है अर्थात् इसमें सदभाव कर लेता है और बँध जाता है। इस प्रकार जीव संसारसे नहीं, प्रत्युत संसारसे माने हुए सम्बन्धसे ही बँधता है।

गुरु और शिष्यमें तो दोनोंकी अलग-अलग सत्ता है और दोनों एक-दूसरेसे सम्बन्ध मानते हैं; परन्तु जीव (चेतन) और संसार (जड)—इन दोनोंमें केवल एक जीवकी ही वास्तविक सत्ता है और यही भूलसे संसारके साथ अपना सम्बन्ध मानता है। संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है; अतः उससे माना हुआ सम्बन्ध भी प्रतिक्षण स्वतः नष्ट हो रहा है। ऐसा होते हुए भी जबतक संसारमें सुख प्रतीत होता है, तबतक उससे माना हुआ सम्बन्ध स्थायी प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि संसारसे माना हुआ सम्बन्ध सुखासक्तिपर ही टिका हुआ है। संसारसे सुखासक्तिपूर्वक माने हुए सम्बन्धके कारण ही संसार अप्राप्त होनेपर भी

प्राप्त और परमात्मा प्राप्त होनेपर भी अप्राप्त प्रतीत हो रहे हैं। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध टूटते ही परमात्माके वास्तविक सम्बन्धका अथवा संसारकी अप्राप्ति और परमात्माकी प्राप्तिका अनुभव हो जाता है।

'मैं'-पनको मिटानेके लिये साधक प्रकृति और प्रकृतिके कार्यको न तो अपना स्वरूप समझे, न उससे कुछ मिलनेकी इच्छा रखे और न ही अपने लिये कुछ करे। जो कुछ करे, वह सब केवल संसारकी सेवाके लिये ही करता रहे। तात्पर्य है कि जो कुछ प्रकृतिजन्य पदार्थ हैं, उन सबकी संसारके साथ एकता है; अतः उनको केवल संसारका मानकर संसारकी ही सेवामें लगाता रहे। इससे क्रिया और पदार्थोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है और अपना स्वरूप अवशिष्ट रह जाता है अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। यह कर्मयोग हुआ। ज्ञानयोगमें विवेक-विचारपूर्वक प्रकृतिके कार्य पदार्थों और क्रियाओंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर स्वरूपका बोध हो जाता है। इस प्रकार जड़के सम्बन्धसे जो अहंता ('मैं'-पन) पैदा हुई थी, उसकी निवृत्ति हो जाती है।

भक्तियोगमें 'मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं तथा मैं शरीर-संसारका नहीं हूँ और शरीर-संसार मेरे नहीं हैं'—ऐसी दृढ़ मान्यता करके भक्त संसारसे विमुख होकर केवल भगवत्परायण हो जाता है, जिससे संसारका सम्बन्ध स्वतः टूट जाता है और अहंताकी निवृत्ति हो जाती है।

इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीनोंमेंसे किसी एकका भी ठीक अनुष्ठान करनेपर जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।

परिशिष्ट भाव —जब चेतन अपरा प्रकृतिके साथ तादात्म्य कर लेता है अर्थात् 'अहम्' के साथ एक होकर अपनेको 'मैं हूँ' ऐसा मान लेता है, तब वह जीवरूप बनी हुई 'परा प्रकृति' कहलाता है। 'अहम्' (मैं) से इधर जगत् (अपरा प्रकृति) है और उधर परमात्मा हैं। परन्तु जीव उन परमात्माको स्वीकार न करके, प्रत्युत उनकी अपरा प्रकृतिको स्वीकार करके उसको जगत्-रूपसे धारण कर लेता है और जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ जाता है।

'अपरेयमितस्वन्त्याम्' —अपरासे अन्य परा है और परासे अन्य अपरा है। अपरा 'अन्य' अर्थात् विजातीय है। अन्यको पकड़नेसे ही परा 'जीव' बनी है—'जीवभूताम्'।

अपरा (परिवर्तनशील) और परा (अपरिवर्तनशील)—दोनों ही भगवान्की प्रकृतियाँ अर्थात् शक्तियाँ हैं, स्वभाव हैं। भगवान्की शक्ति होनेसे दोनों भगवान्से अभिन्न हैं; क्योंकि शक्तिमान्के बिना शक्तिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। जैसे

  • गुरु-शिष्यके सम्बन्धमें गुरुका काम केवल शिष्यका हित करना है और शिष्यका काम केवल गुरुकी सेवा करना है। इस प्रकार संसारमें माने हुए जितने भी सम्बन्ध हैं, सब केवल एक-दूसरेका हित या सेवा करनेके लिये ही हैं, अपने लिये नहीं।

५०४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

नख और केश निष्प्राण होनेपर भी हमारे प्राणयुक्त शरीरसे अलग नहीं हैं, ऐसे ही अपरा प्रकृति जड़ होनेपर भी चेतन भगवान्से अलग नहीं है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। इस प्रकार जब अपरा और परा—दोनों प्रकृतियाँ भगवान्का स्वरूप हुईं तो फिर भगवान्के सिवाय क्या शेष रहा? कुछ भी शेष नहीं रहा—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। तात्पर्य है कि अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके सहित भगवान्का स्वरूप ‘समग्र’ है अर्थात् परा-अपरा, सत्-असत्, जड़-चेतन सब कुछ भगवान् ही हैं।

‘ययेदं धार्यते जगत्’ का तात्पर्य है कि संसार न तो भगवान्की दृष्टिमें है और न महात्माकी दृष्टिमें है, प्रत्युत जीवकी दृष्टि-(मान्यता-) में है। भगवान्की दृष्टिमें सत्-असत् सब कुछ वे ही हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९) और महात्माकी दृष्टिमें भी सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। जीवने ही राग-द्वेषके कारण जगत्को अपनी बुद्धिमें धारण कर रखा है। इसी बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें ‘मनः षष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ पदोंसे कहा गया है। जगत्को सत्ता देनेसे ही राग-द्वेष पैदा होते हैं।

जीवने संसारकी सत्ता मान ली और सत्ता मानकर उसको महत्ता दे दी। महत्ता देनेसे कामना अर्थात् सुखभोगकी इच्छा पैदा हुई, जिससे जीव जन्म-मरणमें पड़ गया। तात्पर्य यह हुआ कि एक भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता माननेसे ही जीव संसार-बन्धनमें पड़ा है। अतः दूसरी सत्ता न माननेकी जिम्मेवारी जीवकी ही है। अगर वह संसारकी सत्ता न माने तो संसार है ही कहाँ?

भगवान्ने पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—इन आठोंको अपरा (जड़) प्रकृति कहा है। अतः जैसे पृथ्वी जड़ और जाननेमें आनेवाली है, ऐसे ही अहम् भी जड़ और जाननेमें आनेवाला है। तात्पर्य है कि पृथ्वी, जल आदि आठों एक ही जातिके हैं। अतः जिस जातिकी पृथ्वी है, उसी जातिका अहम् भी है अर्थात् अहम् भी मिट्टीके ढेलेकी तरह जड़ और दूष्य है। अतः भगवान्ने अहम्को एतत्तासे कहा है; जैसे—‘एतद् यो वेत्ति’ (गीता १३।१)। ‘एतत्’ (यह) कभी ‘अहम्’ (मैं) नहीं होता; अतः अहम्को एतत्तासे कहनेका तात्पर्य है कि यह अपना स्वरूप नहीं है। परन्तु जब चेतन (जीव) इस अहम्के साथ अपना तादात्म्य मान लेता है, तब वह बँध जाता है—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। इसीको चिञ्चदुग्रन्थि कहते हैं।

‘अहङ्कार इतीयं मे’—यह धातुरूप अहंकार तो अपरा प्रकृतिका (जड़) है, पर ‘मैं हूँ’—यह ग्रन्थिरूप अहंकार केवल अपरा प्रकृति नहीं है, प्रत्युत इसमें परा प्रकृति (चेतन) भी मिली हुई है। तत्त्वज्ञान होनेपर यह जन्म-मरण देनेवाला ग्रन्थिरूप अहंकार तो नहीं रहता, पर अपरा प्रकृतिका धातुरूप अहंकार रहता है।

क्रिया और पदार्थ न तो परा प्रकृतिमें हैं और न परमात्मामें हैं, प्रत्युत अपरा प्रकृतिमें हैं। अपरा प्रकृति क्रियारूप और पदार्थरूप है। परमात्मा प्रकृतिकी सहायतासे ही सृष्टि-रचना करते हैं। परा प्रकृति अर्थात् जीव क्रिया और पदार्थरूप अपरा प्रकृतिमें आसक्ति करके और उसका आश्रय लेकर बँध जाता है। अपराकी आसक्ति और उसका आश्रय लेना ही जगत्को धारण करना है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ही ‘मव्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः’ पदोंसे अपनेमें आसक्ति (प्रेम) करने और अपना आश्रय लेनेकी बात कही है। अगर जीव अपरा प्रकृतिमें आसक्ति न रखे और उसका आश्रय न ले तो वह ‘मुक्त’ हो जायगा। अगर वह भगवान्में आसक्ति (प्रेम) करे और उनका आश्रय ले तो वह ‘भक्त’ हो जायगा।

जगत्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। बाँधनेवाला जगत् तो जीवने ही बना रखा है। जीव जगत्को धारण करता है, इसीसे सुख-दुःख होते हैं, बन्धन होता है, चौरासी लाख योनियाँ, भूत, प्रेत, पिशाच, देवता आदि योनियाँ तथा नरकोंकी प्राप्ति

१-पृथ्वी स्थूल है। पृथ्वीसे सूक्ष्म जल है। जलसे सूक्ष्म तेज है। तेजसे सूक्ष्म वायु है। वायुसे सूक्ष्म आकाश है। आकाशसे सूक्ष्म मन है। मनसे सूक्ष्म बुद्धि है। बुद्धिसे सूक्ष्म अहम् है। अपरा प्रकृतिमें अहम् सबसे सूक्ष्म है। इस प्रकार भगवान्ने स्थूलसे सूक्ष्म तक क्रमसे अपरा प्रकृतिका वर्णन किया है।

२-एक अनेकमें अनुगत हो तो उसे ‘जाति’ कहते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—इन आठोंमें जातीय एकता तो है, पर स्वरूपकी एकता नहीं है अर्थात् जाति एक होनेपर भी इनका स्वरूप अलग-अलग है। इसीलिये इसको ‘अष्टधा’ कहा गया है। अपरा प्रकृतिका कार्य होनेसे यहाँ पृथ्वी, जल आदिको भी अपरा प्रकृति कहा गया है।

श्लोक ४-५]

  • साधक-संजीवनी *

५०५

होती है। सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण कोई बाधा नहीं देते; परन्तु इनका संग करनेसे जीव ऊर्ध्वगति, मध्यगति अथवा अधोगतिमें जाता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनजन्मसु ’ (गीता १३।२१)। गुणोंका संग जीव स्वयं करता है। अपरा प्रकृति किसीके साथ कोई सम्बन्ध नहीं करती। सम्बन्ध न प्रकृति करती है, न गुण करते हैं, न इन्द्रियाँ करती हैं, न मन करता है, न बुद्धि करती है। जीव स्वयं ही सम्बन्ध करता है, इसीलिये सुखी-दुःखी हो रहा है, जन्म-मरणमें जा रहा है। जीव स्वतन्त्र है; क्योंकि यह ‘परा’ अर्थात् उत्कृष्ट प्रकृति है। अपरा प्रकृति तो बेचारी कुछ नहीं करती; क्योंकि उसमें चेतना और कामना नहीं है। उससे सम्बन्ध जोड़कर, उसका सदुपयोग-दुरुपयोग करके जीव ऊँच-नीच योनियोंमें जाता है, भटकता है। तात्पर्य है कि अपरिवर्तनशील होते हुए भी जीव विजातीय जगत्के साथ सम्बन्ध जोड़कर परिवर्तनशील जगत्-रूप हो जाता है१ (इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। उसकी दृष्टि शरीरकी तरफ ही रहती है, अपने स्वरूपकी स्फुरणा होती ही नहीं!

जो हमसे सर्वथा अलग है, उस जगत् अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्के साथ अपनी एकता मान ली—यही जगत्को धारण करना है। वास्तवमें जगत् हमारा है ही नहीं; क्योंकि अगर हमारी चीज हमारेको मिल गयी होती तो हमारी कामनाएँ सदाके लिये मिट जातीं, हम निर्मम, निर्भय, निश्चिन्त, निष्काम हो जाते। परन्तु जगत् हमें ऐसी चीज नहीं दे सकता, जो हमारी हो अर्थात् जो हमसे कभी बिछुडे नहीं। जो चीज वास्तवमें हमारी है, वह जगत्के द्वारा प्राप्त नहीं हो सकती, प्रत्युत जगत्के सम्बन्ध-विच्छेदसे प्राप्त हो सकती है। हमारी वस्तु है—परमात्मा। हम उस परमात्माके ही अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोकै ’ (गीता १५।७)। उसकी प्राप्तिका उपाय (कर्मयोगकी दृष्टिसे) यह है कि जगत्से मिली हुई वस्तुओं-(शरीरादि-) को जगत्की ही सेवामें लगा दें और बदलेमें उससे कुछ भी आशा (फलेच्छा) न रखें। उससे कोई सम्बन्ध न जोड़ें, न क्रियाके साथ, न पदार्थके साथ। सेवा करनेकी अपेक्षा भी किसीको दुःख न देना श्रेष्ठ है। किसीको भी दुःख न देनेसे, किसीका भी अहित न करनेसे सेवा अपने-आप होने लगती है, करनी नहीं पड़ती२। अपने-आप होनेवाली क्रियाका अभिमान नहीं होता और उसके फलकी इच्छा भी नहीं होती। अभिमान और फलेच्छाका त्याग होनेपर हमें वह वस्तु मिल जाती है, जो वास्तवमें हमारी है।

वास्तवमें अपरा प्रकृतिकी परमात्माके सिवाय अलग सत्ता है ही नहीं—‘नासतो विद्यते भावः ’। उसको विशेष सत्ता जीवने ही दी है। जैसे, रूपयोंकी अपनी कोई महत्ता नहीं है, हम ही लोभके कारण उसको महत्ता देते हैं। हम जिसको महत्ता देते हैं, उसीमें हमारा आकर्षण होता है। महत्ता तब देते हैं, जब दोषोंको स्वीकार करते हैं३। कामरूप दोषके कारण ही स्त्रीमें आकर्षण होता है, लोभ-रूप दोषके कारण ही धनमें आकर्षण होता है, मोह-रूप दोषके कारण ही कुटुम्ब-परिवारमें आकर्षण होता है, आदि। परन्तु दोषोंके साथ तादात्म्य होनेके कारण दोष दोषरूपसे नहीं दीखते और हमें इस बातका पता नहीं लगता कि हम ही उनको (अपरा प्रकृतिको) सत्ता और महत्ता दे रहे हैं। तादात्म्य मिटनेपर दोष तो रहते नहीं और गुण दीखते नहीं!

अनन्त ब्रह्माण्डोंमें तीन लोक, चौदह भुवन, जड़-चेतन, स्थावर-जंगम, थलचर-जलचर-नभचर, जरायुज-अण्डज-स्वेदज-उद्भिज्ज, सात्त्विक-राजस-तामस, मनुष्य, देवता, पितर, गन्धर्व, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, भूत-प्रेत-पिशाच, ब्रह्म-राक्षस आदि जो कुछ भी देखने, सुनने, पढ़ने तथा कल्पना करनेमें आता है, उसमें ‘परा’ और ‘अपरा’—इन दो प्रकृतियोंके सिवाय कुछ भी नहीं है। जो देखने, सुनने, पढ़ने तथा कल्पना करनेमें आता है और जिन शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्के

१-यहाँ ‘जगत्’ शब्द परिवर्तनशीलका वाचक है—‘गच्छतीति जगत्’।

२-किसीका भी अहित न करनेसे दो बातें होंगी—हम कुछ नहीं करेंगे, अगर कुछ करेंगे तो हमारेसे सेवा ही होगी। कुछ न करना अथवा सेवा करना—इन दोनोंसे ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। कारण कि कुछ न करनेमें कोई दोष होता ही नहीं और अपने-आप सेवा होनेसे सब दोष मिट जाते हैं। जैसे भोजन करनेमें ‘मैं खाता हूँ’—इस प्रकार जो अभिमान होता है, वह भोजन पचनेमें नहीं होता; क्योंकि वह अपने-आप पचता है। ऐसे ही सेवा अपने-आप होनेसे कर्तृत्वाभिमान और फलासक्तिका त्याग स्वतः होता है।

३-संसारके सब सुख दोषजनित हैं। दोषोंको स्वीकार करनेसे ही सुख दीखता है। कामके कारण ही मनुष्य स्त्रीके बिना नहीं रह सकता। लोभके कारण ही मनुष्य धनके बिना नहीं रह सकता। मोहके कारण ही मनुष्य परिवारके बिना नहीं रह सकता। दोषके कारण ही उसको त्यागका महत्त्व नहीं दीखता।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

द्वारा देखा, सुना, पढ़ा, सोचा जाता है, वह सब-का-सब 'अपरा' है। परन्तु जो देखता, सुनता, पढ़ता, सोचता, जानता, मानता है, वह 'परा' है। परा और अपरा—दोनों ही भगवान्की शक्तियाँ होनेसे भगवान्से अभिन्न अर्थात् भगवत्स्वरूप ही हैं। अतः अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रूपमें एक भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९), 'सदसच्चाहमर्जुन' (९।१९)। संसारके सभी दर्शन, मत-मतान्तर आचार्योंको लेकर हैं, पर 'वासुदेवः सर्वम्' किसी आचार्यका दर्शन, मत नहीं है, प्रत्युत साक्षात् भगवान्का अटल सिद्धान्त है, जिसके अन्तर्गत सभी दर्शन, मत-मतान्तर आ जाते हैं।

'अपरा' (जगत्) को स्वतन्त्र सत्ता जीवने ही दी है—'यदेदं धार्यते जगत्'। 'अपरा' भगवान्की है, पर उसको अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्को अपना और अपने लिये मान लेनेसे ही जीव बन्धनमें पड़ा है। अतः साधकको अगर जगत् दीखता है तो यह उसकी व्यक्तित्व दृष्टि है। व्यक्तित्व दृष्टि सिद्धान्त नहीं होता। दीखना सीमित होता है, जबकि तत्त्व असीम है। जैसे, सूर्य थालीकी तरह दीखता है, पर वास्तवमें वह थालीके आकारका नहीं है, प्रत्युत पृथ्वीसे भी कई गुना अधिक बड़ा है!

अगर साधकको जगत् दीखता है तो उसको निष्कामभावपूर्वक जगत्की सेवा करनी चाहिये। जगत्को अपना और अपने लिये मानना तथा उससे सुख लेना ही असाधन है, बन्धन है। कारण कि हमारे पास शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि आदि जो कुछ भी है, वह सब जगत्का है और जगत्के लिये है। अतः जगत्की वस्तुको जगत्की सेवामें लगानेसे जगत् जगत्-रूपसे नहीं दीखेगा, प्रत्युत भगवत्स्वरूप दीखने लगेगा, जो कि वास्तवमें है। तात्पर्य है कि साधक चाहे जगत्को माने, चाहे आत्माको माने, चाहे परमात्माको माने, किसीको भी मानकर वह साधन कर सकता है और अन्तिम तत्त्व 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव कर सकता है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि परा प्रकृतिने अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये अब आगेका श्लोक कहते हैं।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥

सर्वाणि= सम्पूर्णप्रकृतियोंकाकृत्स्नस्य= सम्पूर्ण
भूतानि= प्राणियोंके
(उत्पन्न होनेमें)संयोग ही कारण है—जगतः= जगत्का
एतद्योनीनि= अपरा और
परा—इन दोनोंइति = ऐसाप्रभवः= प्रभव
उपधारय = तुम समझो।तथा= तथा
अहम् = मैंप्रलयः= प्रलय हूँ।

व्याख्या —'एतद्योनीनि भूतानि'*—जितने भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जंगम और वृक्ष, लता, घास आदि स्थावर प्राणी हैं, वे सब-के-सब मेरी अपरा और परा प्रकृतिके सम्बन्धसे ही उत्पन्न होते हैं।

तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके सम्बन्धसे सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंकी उत्पत्ति बताया है। यही बात सामान्य रीतिसे चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी बताया है कि स्थावर, जंगम

योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले जितने शरीर हैं, वे सब प्रकृतिके हैं और उन शरीरोंमें जो बीज अर्थात् जीवात्मा है, वह मेरा अंश है। उसी बीज अर्थात् जीवात्माको भगवान्ने 'परा प्रकृति' (सातवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और 'अपना अंश' (पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) कहा है।

'सर्वाणीत्युपधारय'—'स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक आदि सम्पूर्ण लोकोंके जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सब-के-सब अपरा और परा प्रकृतिके

  • 'एतद्योनीनि भूतानि' पदोंका अर्थ है—'एते अपरा-परे योनी कारणे येषां तानि' अर्थात् 'अपरा और परा—ये दो प्रकृतियाँ जिनकी कारण हैं, ऐसे सम्पूर्ण प्राणी'।

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५०७

संयोगसे ही उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य है कि परा प्रकृतिने अपराको अपना मान लिया है, उसका संग कर लिया है, इसीसे सब प्राणी पैदा होते हैं—इसको तुम धारण करो अर्थात् ठीक तरहसे समझ लो अथवा मान लो।

‘अहं कृतनस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा’ —मात्र वस्तुओंको सता-स्फूर्ति परमात्मासे ही मिलती है, इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव (उत्पन्न करनेवाला) और प्रलय (लीन करनेवाला) हूँ।

‘प्रभवः’ का तात्पर्य है कि मैं ही इस जगत्का निमित्तकारण हूँ; क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि मेरे संकल्पसे पैदा हुई है—‘सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति’ (छान्दोग्य० ६। २। ३)।

जैसे घड़ा बनानेमें कुम्हार और सोनेके आभूषण बनानेमें सुनार ही निमित्तकारण है, ऐसे ही संसारमात्रकी उत्पत्तिमें भगवान् ही निमित्तकारण हैं।

‘प्रलयः’ कहनेका तात्पर्य है कि इस जगत्का उपादान-कारण भी मैं ही हूँ; क्योंकि कार्यमात्र उपादान-कारणसे उत्पन्न होता है; उपादान-कारण-रूपसे ही रहता है और अन्तमें उपादान-कारणमें ही लीन हो जाता है।

जैसे घड़ा बनानेमें मिट्टी उपादान-कारण है, ऐसे ही सृष्टिकी रचना करनेमें भगवान् ही उपादान-कारण हैं। जैसे घड़ा मिट्टीसे ही पैदा होता है, मिट्टीरूप ही रहता है और अन्तमें टूट करके घिसते-घिसते मिट्टी ही बन जाता है; और जैसे सोनेके यावन्मात्र आभूषण सोनेसे ही उत्पन्न होते हैं, सोनारूप ही रहते हैं और अन्तमें सोना ही रह जाता है, ऐसे ही यह संसार भगवान्से ही उत्पन्न होता है, भगवान्में ही रहता है और अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाता है। ऐसा जानना ही ‘ज्ञान’ है। सब कुछ भगवत्स्वरूप है, भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं—ऐसा अनुभव हो जाना ‘विज्ञान’ है।

‘कृतनस्य जगतः’ पदोंमें भगवान्ने अपनेको जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय बताया है। इसमें जड-(अपरा प्रकृति-)का प्रभव और प्रलय बताना तो ठीक है, पर चेतन-(परा प्रकृति अर्थात् जीवात्मा-)का उत्पत्ति और विनाश कैसे हुआ? क्योंकि वह तो नित्य तत्त्व है—‘नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः’ (गीता २। २४)। जो परिवर्तनशील है, उसको जगत् कहते हैं—‘गच्छतीति जगत्’ । पर यहाँ जगत् शब्द जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण संसारका वाचक है। इसमें जड-अंश तो परिवर्तनशील है और चेतन-अंश सदा-सर्वथा परिवर्तनरहित तथा निर्विकार है। वह निर्विकार तत्त्व जब जड़के साथ अपना सम्बन्ध मानकर तादात्म्य कर लेता है, तब वह जड-(शरीर-) के उत्पत्ति-विनाशको अपना उत्पत्ति-विनाश मान लेता है। इसीसे उसके जन्म-मरण कहे जाते हैं। इसीलिये भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण जगत् अर्थात् अपरा और परा प्रकृतिका प्रभव तथा प्रलय बताया है।

अगर यहाँ ‘जगत्’ शब्दसे केवल नाशवान् परिवर्तन-शील और विकारी संसारको ही लिया जाय, चेतनको नहीं लिया जाय तो बड़ी बाधा लगेगी। भगवान्ने ‘कृतनस्य जगतः’ पदोंसे अपनेको सम्पूर्ण जगत्का कारण बताया है। अतः सम्पूर्ण जगत्के अन्तर्गत स्थावर-जंगम, जड-चेतन सभी लिये जायेंगे। अगर केवल जड़को लिया जायगा तो चेतन-भाग छूट जायगा, जिससे ‘मैं सम्पूर्ण जगत्का कारण हूँ’ यह कहना नहीं बन सकेगा और आगे भी बड़ी बाधा लगेगी। कारण कि आगे इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि तीनों गुणोंसे मोहित जगत् मेरेको नहीं जानता, तो यहाँ जानना अथवा न जानना चेतनका ही हो सकता है, जड़का जानना अथवा न जानना होता ही नहीं। इसलिये ‘जगत्’ शब्दसे केवल जड़को ही नहीं, चेतनको भी लेना पड़ेगा।

१-इसमें एक विचित्र बात है कि सम्बन्ध केवल क्षेत्रज्ञने माना है, क्षेत्रने नहीं। यदि यह अपना सम्बन्ध न माने तो इसका पुनर्जन्म हो ही नहीं सकता; क्योंकि पुनर्जन्मका कारण गुणोंका संग ही है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनजन्मसु ।’ (गीता १३। २१)।

२-जीवोंके द्वारा किये हुए अनादिकालके कर्म जीवोंके प्रलयकालमें लीन होनेपर जब परिपक्व होते हैं अर्थात् फल देनेके लिये उन्मुख होते हैं, तब उससे (प्रलयका समय समाप्त होनेपर, सर्गके आदिमें) भगवान्का संकल्प होता है और उसी संकल्पसे शरीरोंकी उत्पत्ति होती है।

३-अपरा प्रकृति और भगवान्में तो कार्य-कारणका सम्बन्ध है; क्योंकि अपरा प्रकृति भगवान्का कार्य है। परन्तु परा प्रकृति और भगवान्में कार्य-कारणका सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि परा प्रकृति (जीव) भगवान्का अंश है, कार्य नहीं। इसलिये अंश-अंशीकी दृष्टिसे ही भगवान् जीवके कारण कहे गये हैं, कार्य-कारणकी दृष्टिसे नहीं।

५०८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

ऐसे ही सोलहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भी आसुरी सम्पदावालोंकी मान्यताके अनुसार 'जगत्' शब्दसे जड और चेतन—दोनों ही लेने पड़ेंगे; क्योंकि आसुरी सम्पदावाले व्यक्ति सम्पूर्ण शरीरधारी जीवोंको असत्य मानते हैं, केवल जडको नहीं। इसलिये अगर वहाँ 'जगत्' शब्दसे केवल जड संसार ही लिया जाय तो जगत्को (जड संसारको) असत्य, मिथ्या और अप्रतिष्ठित कहनेवाले अद्वैत-सिद्धान्ती भी आसुरी सम्पदावालोंमें आ जायेंगे, जो कि सर्वथा अनुचित है। ऐसे ही आठवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें आये 'शुक्लकृष्णो गती ह्येतं जगतः' पदोंमें

परिशिष्ट भाव— जो न खुदको जान सके और न दूसरेको जान सके, वह 'अपरा प्रकृति' है। जो खुदको भी जान सके और दूसरेको भी जान सके, वह 'परा प्रकृति' है। इन अपरा और परा—दोनोंके माने हुए संयोगसे ही सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणी पैदा होते हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।

मूल दोष एक ही है, जो स्थानभेदसे अनेक रूपसे दीखता है, वह है—अपराके साथ सम्बन्ध। इस एक दोषसे ही सम्पूर्ण दोष उत्पन्न होते हैं। यह एक दोष आ जाय तो सम्पूर्ण दोष आ जायेंगे और यह एक दोष दूर हो जाय तो सम्पूर्ण दोष दूर हो जायेंगे। इसी तरह मूल गुण भी एक ही है, जिससे सम्पूर्ण गुण प्रकट होते हैं, वह है—भगवान्के साथ सम्बन्ध।

अपराको चाहे नित्य मानें, चाहे अनित्य मानें, पर उसके साथ हमारा सम्बन्ध अनित्य है—यह सर्वसम्मत बात है। यह सम्बन्ध ही जन्म-मरणका कारण है—'कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनम्यसु' (गीता १३।२१)। यही संसारका बीज है।

मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ—इसका तात्पर्य है कि इस स्थावर-जंगमरूप जगत्को मैं ही उत्पन्न करनेवाला हूँ और मैं ही उत्पन्न होनेवाला हूँ; मैं ही नाश करनेवाला हूँ और मैं ही नष्ट होनेवाला हूँ; क्योंकि मेरे सिवाय संसारका दूसरा कोई भी कारण तथा कार्य नहीं है (इसी अध्यायका सातवाँ श्लोक) अर्थात् मैं ही इसका निमित्त तथा उपादान कारण हूँ। अतः जगत्-रूपसे मैं ही हूँ। नवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है—'अमृतं चैव मृत्युञ्च सदसच्चाहमर्जुन' अर्थात् 'अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।' श्रीमद्भगवतमें भगवान् कहते हैं—

आत्मैव तदिदं विश्वं सूज्यते सूजति प्रभुः। त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः॥

(११।२८।६)

'जो कुछ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वस्तु है, वह सर्वशक्तिमान् परमात्मा ही है। जो कुछ सृष्टि प्रतीत हो रही है, इसके निमित्त कारण भी वे ही हैं और उपादान कारण भी वे ही हैं अर्थात् वे ही विश्व बनाते हैं और वे ही विश्व बनते हैं। वे ही रक्षक हैं और वे ही रक्षित हैं। वे ही सर्वात्मा भगवान् इसका संहार करते हैं और जिसका संहार होता है, वह भी वे ही हैं।'

तैत्तिरीयोपनिषद्में आया है कि अन्न भी मैं ही हूँ और अन्नको खानेवाला भी मैं ही हूँ—'अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः।' (३।१०।६)

तात्पर्य यह हुआ कि अपरा और परा प्रकृति तथा उनके संयोगसे पैदा होनेवाले सम्पूर्ण प्राणी—ये सब-के-सब एक भगवान् ही हैं। कारण भी भगवान् हैं और कार्य भी!

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपनेको परा और अपरा प्रकृतिरूप सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण बताया। अब भगवान्के सिवाय भी जगत्का और कोई कारण होगा—इसका आगेके श्लोकमें निषेध करते हैं।

मत्तः परतरं नात्यक्तिक्विदस्ति धनञ्जय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७॥

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

५०९

इसलिये—

धनञ्जय= हे धनंजय!(कारण तथा कार्य)(पिरोयी हुई होती हैं,)
मत्तः= मेरे= नहींइव= ऐसे ही
परतरम्= सिवाय (इस
जगत्का)अस्ति= है।इदम्= यह
अन्यत्= दूसरा कोईमणिगणाः= (जैसे सूतकी)
मणियाँसर्वम्= सम्पूर्ण जगत्
किञ्चित्= किञ्चिन्मात्र भीसूत्रे= सूतके धागेंमेंमयि= मेरेमें (ही)
प्रोतम्= ओतप्रोत है।

व्याख्या— मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनंजय’— हे अर्जुन! मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है, मैं ही सब संसारका महाकारण हूँ। जैसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही रहती है और आकाशमें ही लीन होती है अर्थात् आकाशके सिवाय वायुकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। ऐसे ही संसार भगवान्से उत्पन्न होता है, भगवान्में स्थित रहता है और भगवान्में ही लीन हो जाता है अर्थात् भगवान्के सिवाय संसारकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।

यहाँ ‘परतरम्’ कहकर सबका मूल कारण बताया गया है। मूल कारणके आगे कोई कारण नहीं है अर्थात् मूल कारणका कोई उत्पादक नहीं है। भगवान् ही सबके मूल कारण हैं। यह संसार अर्थात् देश, काल, व्यक्ति, वस्तु, घटना, परिस्थिति आदि सभी परिवर्तनशील हैं। परन्तु जिसके होनेपनसे इन सबका होनापन दीखता है अर्थात् जिसकी सत्तासे ये सभी ‘है’ दीखते हैं, वह परमात्मा ही इन सबमें परिपूर्ण हैं।

भगवान्ने इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा कि मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिसको जाननेके बाद कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा—‘यज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ञातव्य-मवशिष्यते’ और यहाँ कहते हैं कि मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है—‘मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति’। दोनों ही जगह ‘न अन्यत्’ कहनेका तात्पर्य है कि जब मेरे सिवाय कुछ है ही नहीं, तब मेरेको जाननेके बाद जानना कैसे बाकी रहेगा? अतः भगवान्ने यहाँ ‘मयि सर्वमिदं प्रोतम्’ और आगे ‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९) तथा ‘सदसच्चाहम्’ (९।१९) कहा है।

परिशिष्ट भाव— जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेंमें पिरोयी हुईं हों तो उनमें सूतके सिवाय और कुछ नहीं है, ऐसे ही संसारमें भगवान्के सिवाय और कुछ नहीं है। तात्पर्य है कि मणिरूप अपरा प्रकृति और धागरूप परा प्रकृति—दोनोंमें भगवान् ही परिपूर्ण हैं। मणियाँ बननेमें अपरा प्रकृतिकी मुख्यता है और धागा बननेमें परा प्रकृतिकी मुख्यता है। ‘मणिगणाः’ पद बहुवचनमें देनेका तात्पर्य है कि अपरा प्रकृति स्थावर-जंगम, जलचर-थलचर-नभचर, चौदह भुवन, चौरासी लाख योनियाँ आदि अनन्त रूपोंमें और अनन्त समुदायोंमें विभक्त है।

जो कार्य होता है, वह कारणके सिवाय अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता। वास्तवमें कारण ही कार्यरूपसे दीखता है। इस प्रकार जब कारणका ज्ञान हो जायगा, तब कार्य कारणमें लीन हो जायगा अर्थात् कार्यकी अलग सत्ता प्रतीत नहीं होगी और ‘एक परमात्माके सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है’—ऐसा अनुभव स्वतः हो जायगा।

‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’ —यह सारा संसार सूतमें सूतकी ही मणियोंकी तरह मेरेमें पिरोया हुआ है अर्थात् मैं ही सारे संसारमें अनुस्पृृत (व्याप्त) हूँ। जैसे सूतसे बनी मणियोंमें और सूतमें सूतके सिवाय अन्य कुछ नहीं है; ऐसे ही संसारमें मेरे सिवाय अन्य कोई तत्त्व नहीं है। तात्पर्य है कि जैसे सूतमें सूतकी मणियाँ पिरोयी गयी हों तो दीखनेमें मणियाँ और सूत अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें सूत एक ही होता है। ऐसे ही संसारमें जितने प्राणी हैं, वे सभी नाम, रूप, आकृति आदिसे अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें व्याप्त रहनेवाला चेतन-तत्त्व एक ही है। वह चेतन-तत्त्व मैं ही हूँ—‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्विद्व सर्वक्षेत्रेषु भारत’ (गीता १३।२) अर्थात् मणिरूप अपरा प्रकृति भी मेरा स्वरूप है और धागरूप परा प्रकृति भी मैं ही हूँ। दोनोंमें मैं ही परिपूर्ण हूँ, व्याप्त हूँ। साधक जब संसारको संसारबुद्धिसे देखता है, तब उसको संसारमें परिपूर्णरूपसे व्याप्त परमात्मा नहीं दीखते। जब उसको परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है, तब व्याप्य-व्यापक भाव मिटकर एक परमात्मतत्त्व ही दीखता है। इस तत्त्वको बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ कारणरूपसे अपनी व्यापकताका वर्णन किया है।

५२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

अपरा और पराका भेद 'अपरा' प्रकृतिके कारण ही है; क्योंकि अपराको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही जीव है (इसी अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। अतः अपरा प्रकृति जगत्में भी है और जीवमें भी। परन्तु परमात्मामें न अपरा है, न परा है; न जगत् है, न जीव है। तात्पर्य है कि वास्तवमें न धागा है, न मणियाँ हैं, प्रत्युत एक सूत (रुई) ही है। इसी तरह न अपरा है, न परा है, प्रत्युत एक परमात्मा ही हैं। इसी बातका भगवान्ने आगे बारहवें श्लोकतक वर्णन किया है। इस श्लोकमें आये 'मत्तः' पदसे आरम्भ करके बारहवें श्लोकके 'मत्त एव' पदोंतक भगवान्ने यही बात बतायी है कि मेरे सिवाय कुछ भी नहीं है। यहाँ 'मत्तः' पद समग्र परमात्माका वाचक है, जो परा और अपरा दोनों प्रकृतियोंका मालिक है।

कारण ही कार्यमें परिणत होता है; जैसे, रुई ही धागा बनती है, बीज ही वृक्ष बनता है। अतः सबके परम कारण भगवान् होनेसे सब रूपोंमें भगवान् ही हैं—'वासुदेवः सर्वम्।' इसलिये भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ताको देखना भूल है।

'मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति'—जो दोमें श्रेष्ठ हो, उसको 'परतर' कहते हैं। भगवान् अद्वितीय हैं, उनके सिवाय दूसरी कोई वस्तु ('पर') है ही नहीं, फिर वे 'परतर' कैसे हो सकते हैं? उनमें 'परतर' शब्द लागू ही नहीं होता। यहाँ भगवान्को अद्वितीय बतानेके लिये ही 'परतर' शब्द आया है। तात्पर्य है कि भगवान्से अन्य भी कुछ नहीं है और श्रेष्ठ भी कुछ नहीं है। उपनिषद्में आया है—

पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥

(कठ० १।३।११)

'पुरुषसे पर कुछ भी नहीं है। वही सबकी परम अवधि और वही परम गति है।'

अर्जुनने भी कहा है—

न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।

(गीता ११।४३)

सम्बन्ध—जो कुछ कार्य दीखता है, उसके मूलमें परमात्मा ही हैं—यह ज्ञान करानेके लिये अब भगवान् आठवेंसे बारहवें श्लोकतकका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभारस्मि शशिसूर्ययोः।

प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥८॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!प्रभा= प्रभा (प्रकाश)शब्दः= शब्द
अप्सु= जलोंमेंअस्मि= मैं हूँ,(और)
रसः= रससर्ववेदेषु= सम्पूर्ण वेदोंमेंनृषु= मनुष्योंमें
अहम्= मैं हूँ,प्रणवः= प्रणव (ओंकार),पौरुषम्= पुरुषार्थ
शशिसूर्ययोः= चन्द्रमा और सूर्यमेंखे= आकाशमें(मैं हूँ)।

व्याख्या—[जैसे साधारण दृष्टिसे लोगोंने रुपयोंको ही सर्वश्रेष्ठ मान रखा है तो रुपये पैदा करने और उनका संग्रह करनेमें लोभी आदमीकी स्वाभाविक रुचि हो जाती है। ऐसे ही देखने, सुनने, मानने और समझनेमें जो कुछ जगत् आता है, उसका कारण भगवान् हैं (सातवें अध्यायका छठा श्लोक); भगवान्के सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं—ऐसा माननेसे भगवान्में स्वाभाविक रुचि हो जाती है। फिर स्वाभाविक ही उनका भजन होता है। यही बात

दसवें अध्यायके आठवें श्लोकमें कही है कि 'मैं सम्पूर्ण संसारका कारण हूँ, मेरेसे ही संसारकी उत्पत्ति होती है'—ऐसा समझकर बुद्धिमान् मनुष्य मेरा भजन करते हैं। ऐसे ही अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें कहा है कि 'जिस परमात्मासे सम्पूर्ण जगत्की प्रवृत्ति होती है और जिससे सारा संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त कर लेता है।' इसी सिद्धान्तको बतानेके लिये यह प्रकरण आया है।]

श्लोक ८ ]

  • साधक-संजीवनी *

५११

‘रसोऽहमप्सु कौन्तेय’—हे कुन्तीनन्दन! जलोंमें ‘रस’ हूँ। जल रस-तन्मात्रासे पैदा होता है; रस-तन्मात्रामें रहता है और रस-तन्मात्रामें ही लीन होता है। जलमैंसे अगर ‘रस’ निकाल दिया जाय तो जलतत्त्व कुछ नहीं रहेगा। अतः रस ही जलरूपसे है। वह रस मैं हूँ।

‘प्रभास्मि शशिसूर्ययोः’—चन्द्रमा और सूर्यमें प्रकाश करनेकी जो एक विलक्षण शक्ति ‘प्रभा’ है, वह मेरा स्वरूप है। प्रभा रूप-तन्मात्रासे उत्पन्न होती है, रूप-तन्मात्रामें रहती है और अन्तमें रूप-तन्मात्रामें ही लीन हो जाती है। अगर चन्द्रमा और सूर्यमेंसे प्रभा निकाल दी जाय तो चन्द्रमा और सूर्य निस्तत्त्व हो जायेंगे। तात्पर्य है कि केवल प्रभा ही चन्द्र और सूर्यरूपसे प्रकट हो रही है। भगवान् कहते हैं कि वह प्रभा भी मैं ही हूँ।

‘प्रणवः सर्ववेदेषु’—सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मेरा स्वरूप है। कारण कि सबसे पहले प्रणव प्रकट हुआ। प्रणवसे त्रिपदा गायत्री और त्रिपदा गायत्रीसे वेदत्रयी प्रकट हुई है। इसलिये वेदोंमें सार ‘प्रणव’ ही रहा। अगर वेदोंमेंसे प्रणव निकाल दिया जाय तो वेद वेदरूपसे नहीं रहेंगे। प्रणव ही वेद और गायत्रीरूपसे प्रकट हो रहा है। वह प्रणव मैं ही हूँ।

‘शब्दः खे’—सब जगह यह जो पोलाहट दीखती है, यह आकाश है। आकाश शब्द-तन्मात्रासे पैदा होता है,

परिशिष्ट भाव—छठे-सातवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण जगत्का कारण बताया है। इसलिये अब भगवान् आठवें श्लोकसे बारहवें श्लोकतक ‘कारण’-रूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन करते हैं। यद्यपि कारणकी अपेक्षा कार्यमें विशेष गुण होता है, पर स्वतन्त्र सत्ता कारणकी ही होती है अर्थात् कारणके बिना कार्यकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। जैसे, मिट्टी कारण है और घड़ा कार्य है। घड़ेमें जल भरा जा सकता है, पर यह विशेषता मिट्टीमें नहीं है। परन्तु मिट्टीके बिना घड़ेकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। तात्पर्य है कि कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है। घड़ेकी रचनामें कर्ता, कारण और कार्य—तीनों एक नहीं होते अर्थात् कारण (मिट्टी) और कार्य-(घड़ा-) की तो एक सत्ता होती है, पर

१-पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन स्थूल पंचमहाभूतोंके कारणोंका नाम भी क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द है, जो ‘पंचतन्मात्राएँ’ कहलाती हैं। पंचतन्मात्राएँ इन्द्रियों और अन्तःकरणकी विषय नहीं हैं तथा केवल शास्त्रोंसे सुनकर मानी जाती हैं। पंचमहाभूतोंके कार्योंका नाम भी गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द है, जो इन्द्रियों और अन्तःकरणके विषय हैं।

२-रूप-तन्मात्रामें दो शक्तियाँ होती हैं—एक ‘प्रकाशिका’ अर्थात् प्रकाश करनेवाली और एक ‘दाहिका’ अर्थात् जलानेवाली। प्रकाशिका शक्तिको ‘प्रभा’ कहते हैं और दाहिका शक्तिको ‘तेज’ कहते हैं। ‘प्रकाशिका शक्ति’ दाहिका शक्तिके बिना भी रह सकती है (जैसे—माण, चन्द्र आदिमें), पर ‘दाहिका शक्ति’ प्रकाशिका शक्तिके बिना नहीं रह सकती। यहाँ ‘प्रभास्मि शशिसूर्ययोः’ पदोंमें चन्द्रमा और सूर्यकी ‘प्रकाशिका शक्ति’ की प्रधानताको लेकर ‘प्रभा’ शब्दका प्रयोग हुआ है और आगे इसी अध्यायके नवें श्लोकमें ‘तेजश्चारस्मि विभावसी’ पदोंमें अग्निकी ‘दाहिका शक्ति’ की प्रधानताको लेकर ‘तेज’ शब्दका प्रयोग हुआ है।

सूर्य और अग्निमें प्रकाशिका और दाहिका—दोनों शक्तियाँ हैं। चन्द्रमामें प्रकाशिका शक्ति तो है, पर उसमें दाहिका शक्ति तिरस्कृत होकर ‘सौम्य शक्ति’ प्रकट हो गयी है, जो कि शीतलता देनेवाली है।

शब्द-तन्मात्रामें ही रहता है और अन्तमें शब्द-तन्मात्रामें ही लीन हो जाता है। अतः शब्द-तन्मात्रा ही आकाश-रूपसे प्रकट हो रही है। शब्द-तन्मात्राके बिना आकाश कुछ नहीं है। वह शब्द मैं ही हूँ।

‘पौरुषं नृपु’—मनुष्योंमें सार चीज जो पुरुषार्थ है, वह मेरा स्वरूप है। वास्तवमें नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव करना ही मनुष्योंमें असली पुरुषार्थ है। परन्तु मनुष्योंने अप्राप्तको प्राप्त करनेमें ही अपना पुरुषार्थ मान रखा है; जैसे—निर्धन आदमी धनकी प्राप्तिमें पुरुषार्थ मानता है, अपढ़ आदमी पढ़ लेनेमें पुरुषार्थ मानता है, अप्रसिद्ध आदमी अपना नाम विख्यात कर लेनेमें अपना पुरुषार्थ मानता है, इत्यादि। निष्कर्ष यह निकला कि जो अभी नहीं है, उसकी प्राप्तिमें ही मनुष्य अपना पुरुषार्थ मानता है। पर यह पुरुषार्थ वास्तवमें पुरुषार्थ नहीं है। कारण कि जो पहले नहीं थे, प्राप्तिके समय भी जिनका निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है और अन्तमें जो ‘नहीं’ में भरती हो जायेंगे, ऐसे पदार्थोंको प्राप्त करना पुरुषार्थ नहीं है। परमात्मा पहले भी मौजूद थे, अब भी मौजूद हैं और आगे भी सदा मौजूद रहेंगे; क्योंकि उनका कभी अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको उत्साहपूर्वक प्राप्त करनेका जो प्रयत्न है, वही वास्तवमें पुरुषार्थ है। उसकी प्राप्ति करनेमें ही मनुष्योंकी मनुष्यता है। उसके बिना मनुष्य कुछ नहीं है अर्थात् निरर्थक है।

५१२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

कर्ता-(कुम्हार-) की अलग (स्वतन्त्र) सत्ता होती है। परन्तु सृष्टिकी रचनामें कर्ता, कारण और कार्य—तीनों एक भगवान् ही होते हैं। अतः रस भी भगवान् हैं और जल भी भगवान् हैं। प्रभा भी भगवान् हैं और चन्द्र-सूर्य भी भगवान् हैं। ओंकार भी भगवान् हैं और वेद भी भगवान् हैं। शब्द भी भगवान् हैं और आकाश भी भगवान् हैं। पुरुषार्थ भी भगवान् हैं और मनुष्य भी भगवान् हैं।

[मिट्टी तो घड़ेके रूपमें परिणत होती है, पर परमात्मा संसारके रूपमें परिणत नहीं होते। कारण कि परिणत होनेवाली वस्तु विकारी होती है, जबकि परमात्मा निर्विकार हैं। अतः जैसे अँधेरेमें रस्सी ही साँपके रूपमें दीखती है अथवा साँप ही कुण्डलीरूपमें दीखता है, ऐसे ही परमात्मा संसाररूपमें दीखते हैं। तात्पर्य है कि परमात्मामें कार्य-कारणका भेद नहीं है; क्योंकि उनके सिवाय अन्य कोई वस्तु है ही नहीं। कार्य-कारणका भेद मनुष्योंकी दृष्टिमें ही है। इसलिये मनुष्योंको समझानेके लिये अन्य वस्तुकी कुछ-न-कुछ सत्ता मानकर ही परमात्माका वर्णन, विवेचन, विचार, चिन्तन, प्रश्नोत्तर आदि किया जाता है—‘नोद्यं वा परिहारो वा क्रियतां द्वैतभाषया।’]

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ १ ॥

पृथिव्याम्= पृथ्वीमेंतेजः= तेजजीवनम्= जीवनीशक्ति (मैं हूँ)
पुण्यः= पवित्रअस्मि= मैं हूँ= और
गन्धः= गन्ध (मैं हूँ)= तथातपस्विषु= तपस्वियोंमें
= औरसर्वभूतेषु= सम्पूर्णतपः= तपस्या
विभावसौ= अग्निमेंप्राणियोंमेंअस्मि= मैं हूँ।

व्याख्या—‘पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्’— पृथ्वी गन्ध-तन्मात्रासे उत्पन्न होती है, गन्ध-तन्मात्रारूपसे रहती है और गन्ध-तन्मात्रामें ही लीन होती है। तात्पर्य है कि गन्धके बिना पृथ्वी कुछ नहीं है। भगवान् कहते हैं पृथ्वीमें वह पवित्र गन्ध मैं हूँ।

यहाँ गन्धके साथ ‘पुण्यः’ विशेषण देनेका तात्पर्य है कि गन्धमात्र पृथ्वीमें रहती है। उसमें पुण्य अर्थात् पवित्र गन्ध तो पृथ्वीमें स्वाभाविक रहती है, पर दुर्गन्ध किसी विकृतिसे प्रकट होती है।

‘तेजश्चास्मि विभावसौ’— तेज रूप-तन्मात्रासे प्रकट होता है, उसीमें रहता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। अग्निमें तेज ही तत्त्व है। तेजके बिना अग्नि निस्तत्त्व

है, भगवान् ही कारण हैं और भगवान् ही कार्य हैं। अतः गन्ध और पृथ्वी, तेज और अग्नि, जीवनीशक्ति और प्राणी, तपस्या और तपस्वी—ये सब-के-सब (कारण तथा कार्य) एक भगवान् ही हैं। कारण कि परा और अपरा—दोनों ही भगवान्की शक्ति होनेसे भगवान्से अभिन्न हैं। अतः परा-अपराके संयोगसे पैदा होनेवाली सम्पूर्ण सृष्टि भगवत्स्वरूप ही है।

‘पुण्यो गन्धः’— गन्ध-तन्मात्रा कारण है और पृथ्वी उसका कार्य है। गन्धको पवित्र कहनेका तात्पर्य है कि कारण (तन्मात्रा) सदा पवित्र ही होता है। अपवित्रता कार्यमें विकृति होनेसे ही आती है। अतः जैसे गन्ध-तन्मात्रा पवित्र है, ऐसे ही शब्द, स्पर्श, रूप और रस-तन्मात्रा भी पवित्र समझनी चाहिये।

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

५१३

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।

बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥

पार्थ = हे पृथानन्दन ! सर्वभूतानाम् = सम्पूर्ण प्राणियोंका सनातनम् = अनादि बीजम् = बीज | माम् = मुझे विद्धि = जान । बुद्धिमताम् = बुद्धिमानोंमें बुद्धिः = बुद्धि (और) | तेजस्विनाम् = तेजस्वियोंमें तेजः = तेज अहम् = मैं अस्मि = हूँ। ---|---|---

व्याख्या— ‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि’* पार्थ सनातनम्’—हे पार्थ! सम्पूर्ण प्राणियोंका सनातन (अविनाशी) बीज मैं हूँ अर्थात् सबका कारण मैं ही हूँ। सम्पूर्ण प्राणी बीजरूप मेरेसे उत्पन्न होते हैं, मेरेमें ही रहते हैं और अन्तमें मेरेमें ही लीन होते हैं। मेरे बिना प्राणीकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।

जितने बीज होते हैं, वे सब वृक्षसे उत्पन्न होते हैं और वृक्ष पैदा करके नष्ट हो जाते हैं। परन्तु यहाँ जिस बीजका वर्णन है, वह बीज ‘सनातन’ है अर्थात् आदि-अन्तसे रहित (अनादि एवं अनन्त) है। इसीको नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘अव्यय बीज’ कहा गया है। यह चेतन-तत्त्व अव्यय अर्थात् अविनाशी है। यह स्वयं विकाररहित रहते हुए ही सम्पूर्ण जगत्का उत्पादक, आश्रय और प्रकाशक है तथा जगत्का कारण है।

गीतामें ‘बीज’ शब्द कहीं भगवान् और कहीं जीवात्मा—दोनोंके लिये आया है। यहाँ जो ‘बीज’ शब्द आया है, वह भगवान्का वाचक है; क्योंकि यहाँ कारणरूपसे विभूतियोंका वर्णन है। दसवें अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें विभूतरूपसे आया ‘बीज’ शब्द भी भगवान्का ही वाचक है; क्योंकि वहाँ उनको सम्पूर्ण प्राणियोंका कारण कहा गया है। नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘बीज’ शब्द भगवान्के लिये आया है; क्योंकि उसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें ‘सदसच्चाहमर्जुन’ पदमें कहा गया है कि कार्य और कारण सब मैं ही हूँ। सब कुछ भगवान् ही होनेसे ‘बीज’ शब्द भगवान्का वाचक है। चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘अहं बीजप्रदः पिता’ ‘मैं बीज प्रदान करनेवाला पिता हूँ’—ऐसा होनेसे वहाँ ‘बीज’ शब्द जीवात्माका वाचक है। ‘बीज’ शब्द जीवात्माका वाचक तभी होता है, जब यह

जड़के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, नहीं तो यह भगवान्का स्वरूप ही है।

‘बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि’—बुद्धिमानोंमें बुद्धि मैं हूँ। बुद्धिके कारण ही वे बुद्धिमान् कहलाते हैं। अगर उनमें बुद्धि न रहे तो उनकी बुद्धिमान् संज्ञा ही नहीं रहेगी।

‘तेजस्तेजस्विनामहम्’—तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। यह तेज दैवी-सम्पत्तिका एक गुण है। तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंमें एक विशेष तेज—शक्ति रहती है, जिसके प्रभावसे दुर्गुण-दुराचारी मनुष्य भी सदगुण-सदाचारी बन जाते हैं। यह तेज भगवान्का ही स्वरूप है।

विशेष बात

भगवान् ही सम्पूर्ण संसारके कारण हैं, संसारके रहते हुए भी वे सबमें परिपूर्ण हैं और सब संसारके मिटनेपर भी वे रहते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि सब कुछ भगवान् ही हैं। इसके लिये उपनिषदोंमें सोना, मिट्टी और लोहेका दृष्टान्त दिया गया है कि जैसे सोनेसे बने हुए सब गहने सोना ही हैं, मिट्टीसे बने हुए सब बर्तन मिट्टी ही हैं और लोहेसे बने हुए सब अस्त्र-शस्त्र लोहा ही हैं, ऐसे ही भगवान्से उत्पन्न हुआ सब संसार भगवान् ही है। परन्तु गीतामें भगवान्ने बीजका दृष्टान्त दिया है कि सम्पूर्ण संसारका बीज मैं हूँ। बीज वृक्षसे पैदा होता है और वृक्षको पैदा करके स्वयं नष्ट हो जाता है अर्थात् बीजसे अंकुर निकल आता है, अंकुरसे वृक्ष हो जाता है और बीज स्वयं मिट जाता है। परन्तु भगवान्ने अपनेको संसारमात्रका बीज कहते हुए भी यह एक विलक्षण बात बतायी कि मैं अनादि बीज हूँ, पैदा हुआ बीज नहीं हूँ—‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्’ (७।१०), और मैं अविनाशी बीज हूँ—‘बीजमव्ययम्’ (१।१८)। अविनाशी बीज कहनेका

  • इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भगवान्ने ‘उपधारय’ कहा और यहाँ ‘विद्धि’ कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि मात्र संसारमें साररूपसे मैं ही हूँ—इस बातको समझो और समझकर धारण करो। समझकर धारण करनेसे असली प्रेम जाग्रत् हो जाता है।

५१४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

मतलब यह है कि संसार मेरेसे पैदा हो जाता है, पर मैं मिटता नहीं हूँ, जैसा-का-तैसा ही रहता हूँ।

सोना, मिट्टी और लोहेके दृष्टान्तमें गहनोमें सोना दीखता है, बर्तनोंमें मिट्टी दीखती है और अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहा दीखता है, पर संसारमें परमात्मा दीखते नहीं। अगर बीजका दृष्टान्त लें तो वृक्षमें बीज नहीं दीखता। जब वृक्षमें बीज आता है, तब पता लगता है कि इस वृक्षमें ऐसा बीज है, जिससे यह वृक्ष पैदा हुआ है। सम्पूर्ण वृक्ष बीजसे ही निकलता है और बीजमें ही समाप्त हो जाता है। वृक्षका आरम्भ बीजसे होता है और अन्त भी बाजमें ही होता है अर्थात् वह वृक्ष चाहे सौ वर्षांतक रहे, पर उसकी अन्तिम परिणति बीजमें ही होगी, बीजके सिवाय और क्या होगा? ऐसे ही भगवान् संसारके बीज हैं अर्थात् भगवान्से ही संसार उत्पन्न होता है और भगवान्में ही लीन हो जाता है। अन्तमें एक भगवान् ही बाकी रहते हैं—‘शिष्यते शेषसंज्ञः’ (श्रीमद्भा० १०।३।२५)।

वृक्ष दीखते हुए भी ‘यह बीज ही है’—ऐसा जो जानते हैं, वे वृक्षको ठीक-ठीक जानते हैं और जो बीजको न देखकर केवल वृक्षको देखते हैं, वे वृक्षके तत्त्वको नहीं जानते। भगवान् यहाँ ‘बीजं मां सर्वभूतानाम्’ कहकर सबको यह ज्ञान कराते हैं कि तुम्हारेको जितना यह संसार दीखता है, इसके पहले मैं ही था, मैं एक ही प्रजारूपसे बहुत रूपोंमें प्रकट हुआ हूँ—‘बहु स्यां प्रजायेय’ (छान्दोग्य० ६।२।३) और इनके समाप्त होनेपर मैं ही रह जाता हूँ। तात्पर्य है कि पहले मैं ही था और पीछे मैं ही रहता हूँ तो बीचमें भी मैं ही हूँ।

यह संसार पांचभौतिक भी उन्हींको दीखता है, जो विचार करते हैं, नहीं तो यह पांचभौतिक भी नहीं दीखता।

परिशिष्ट भाव —अपनेको सम्पूर्ण प्राणियोंका बीज कहनेका तात्पर्य यह है कि सब प्राणियोंके रूपमें मैं ही हूँ। सृष्टि अनन्त है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें अनन्त जीव हैं। परन्तु उन अनन्त जीवोंका बीज (परमात्मा) एक ही है। अनन्त सृष्टि पैदा होनेपर भी उस बीजमें कोई फर्क नहीं पड़ता; क्योंकि वह अव्यय है—‘बीजमव्ययम्’ (गीता ९।१८)। उस एक ही बीजसे अनेक प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न होती है (गीता—दसवें अध्यायका उनातालीसवाँ श्लोक)। बीजको कितनी ही सूक्ष्म दृष्टिसे देखें, उसमें फल-फूल-पत्ते आदि नहीं दीखेंगे; क्योंकि वे उस बीजमें कारणरूपसे विद्यमान हैं। उस बीजसे पैदा होनेवाले वृक्षके दो पत्ते भी आपसमें नहीं मिलते—यह अनेकता भी उस एक बीजमें ही रहती है।

सृष्टिकी एक-एक वस्तुमें अनेक भेद हैं। विभिन्न देशोंमें मनुष्योंकी अनेक जातियाँ हैं। उनमें भी इतना भेद है कि दो मनुष्योंके अँगूठेकी रेखाएँ भी परस्पर नहीं मिलतीं। उनके रूप, स्वभाव, रुचि, प्रकृति, मान्यता, भाव आदि भी परस्पर नहीं मिलते। गाय, भैंस, भेंड़, बकरी, घोड़ा, ऊँट, कुत्ता आदिकी अनेक जातियाँ हैं और उनकी एक-एक जातिमें भी अनेक भेद हैं। वृक्षोंमें भी एक-एक वृक्षकी अनेक जातियाँ होती हैं। एक-एक विद्याको देखें तो उसमें इतने भेद हैं कि उनका अन्त नहीं आता। मूल रंग तीन हैं, पर उनके मिश्रणसे अनेक रंग बन जाते हैं। उनमें भी एक-एक रंगमें इतने

जैसे कोई कह दे कि ये अपने सब-के-सब शरीर पार्थिव (पृथ्वीसे पैदा होनेवाले) हैं, इसलिये इनमें मिट्टीकी प्रधानता है तो दूसरा कहेगा कि ये मिट्टी कैसे हैं? मिट्टीसे तो हाथ धोते हैं, मिट्टी तो रेतो होती है; अतः ये शरीर मिट्टी नहीं हैं। इस तरह शरीर मिट्टी होता हुआ भी उसको मिट्टी नहीं दीखता। परन्तु यह जितना संसार दीखता है, इसको जलाकर राख कर दिया जाय तो अन्तमें एक मिट्टी ही हो जाता है।

विचार करें कि इन शरीरोंके मूलमें क्या है? माँ-बापमें जो रज-वीर्यरूप अंश होता है, जिससे शरीर बनता है, वह अंश अन्तसे पैदा होता है। अन्त मिट्टीसे पैदा होता है। अतः ये शरीर मिट्टीसे ही पैदा होते हैं और अन्तमें मिट्टीमें ही लीन हो जाते हैं। अन्तमें शरीरकी तीन गतियाँ होती हैं—चाहे जमीनमें गाड़ दिया जाय, चाहे जला दिया जाय और चाहे पशु-पक्षी खा जायें। तीनों ही उपायोंसे वह अन्तमें मिट्टी हो जाता है। इस तरह पहले और आखिरमें मिट्टी होनेसे बीचमें भी शरीर या संसार मिट्टी ही है। परन्तु बीचमें यह शरीर या संसार देखनेमें मिट्टी नहीं दीखता। विचार करनेसे ही मिट्टी दीखता है, आँखोंसे नहीं। इसी तरह यह संसार विचार करनेसे परमात्मस्वरूप दीखता है। विचार करें तो जब भगवान्ने यह संसार रचा तो कहींसे कोई सामान नहीं मँगवाया, जिससे संसारको बनाया हो और बनानेवाला भी दूसरा नहीं हुआ है। भगवान् आप ही संसारको बनानेवाले हैं और आप ही संसार बन गये। शरीरोंकी रचना करके आप ही उनमें प्रविष्ट हो गये—‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ (तैत्तिरीयोपनिषद् २।६)। इन शरीरोंमें जीवरूपसे भी वे ही परमात्मा हैं। अतः यह संसार भी परमात्माका स्वरूप ही है।

श्लोक ११]

  • साधक-संजीवनी *

५१५

भेद हैं कि दो व्यक्तियोंको भी एक रंग समानरूपसे नहीं दीखता। इस प्रकार सृष्टिमें एक समान दीखनेवाली दो चीजें भी वास्तवमें समान नहीं होतीं। इतनी अनेकता होनेपर भी सृष्टिका बीज एक ही है। तात्पर्य है कि एक ही भगवान् अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं और अनेक रूपोंमें प्रकट होनेपर भी एक ही रहते हैं।

भगवान् देश, काल आदि सभी दृष्टियोंसे अनन्त हैं। जब भगवान्की बनायी हुई सृष्टिका भी अन्त नहीं आ सकता तो फिर भगवान्का अन्त आ ही कैसे सकता है? आजतक भगवान्के विषयमें जो कुछ सोचा गया है, जो कुछ कहा गया है, जो कुछ लिखा गया है, जो कुछ माना गया है, वह पूरा-का-पूरा मिलकर भी अधूरा है। इतना ही नहीं, भगवान् भी अपने विषयमें पूरी बात नहीं कह सकते, अगर कह दें तो अनन्त कैसे रहेंगे?

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥

भरतर्षभ= हे भरतवंशियोंमेंरागसे रहितधर्माविरुद्धः= धर्मसे
श्रेष्ठ अर्जुन!बलम्= बलअविरुद्ध
बलवताम्अहम्= मैं हूँ(धर्मयुक्त)
कामराग-= औरकामः= काम
विवर्जितम्भूतेषु= प्राणियोंमेंअस्मि= मैं हूँ।

व्याख्या —‘बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्’—कठिन-से-कठिन काम करते हुए भी अपने भीतर एक कामना-आसक्तिरहित शुद्ध, निर्मल उत्साह रहता है। काम पूरा होनेपर भी ‘मेरा कार्य शास्त्र और धर्मके अनुकूल है तथा लोकमर्यादाके अनुसार सन्तजनानुमोदित है’—ऐसे विचारसे मनमें एक उत्साह रहता है। इसका नाम ‘बल’ है। यह बल भगवान्का ही स्वरूप है। अतः यह बल ग्राह्य है।

गीतामें भगवान्ने खुद ही बलकी व्याख्या कर दी है। सत्रहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘कामरागबलान्विताः’ पदमें आया बल कामना और आसक्तिसे युक्त होनेसे दुराग्रह और हठका वाचक है। अतः यह बल भगवान्का स्वरूप नहीं है, प्रत्युत आसुरी सम्पत्ति होनेसे त्याज्य है। ऐसे ही ‘सिद्धोऽहं बलवान्सुखी’ (गीता १६।१४) और ‘अहङ्कारं बलं दर्पम्’ (गीता १६।१८; १८।५३) पदोंमें आया बल भी त्याज्य है। छठे अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें

‘बलवदूदृढम्’ पदमें आया बल शब्द मनका विशेषण है। वह बल भी आसुरी सम्पत्तिका ही है; क्योंकि उसमें कामना और आसक्ति है। परन्तु यहाँ (७।११में) जो बल आया है, वह कामना और आसक्तिसे रहित है, इसलिये यह सात्त्विक उत्साहका वाचक है और ग्राह्य है। सत्रहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें ‘आयुःसत्त्वबलारोग्य’ पदमें आया बल शब्द भी इसी सात्त्विक बलका वाचक है।

‘धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ’ —हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! मनुष्योंमें धर्मसे अविरुद्ध अर्थात् धर्मयुक्त ‘काम’ मेरा स्वरूप है। कारण कि शास्त्र और लोक-मर्यादाके अनुसार शुभ-भावसे केवल सन्तान-उत्पत्तिके लिये जो काम होता है, वह काम मनुष्यके अधीन होता है। परंतु आसक्ति, कामना, सुखभोग आदिके लिये जो काम होता है, उस काममें मनुष्य पराधीन हो जाता है और उसके वशमें होकर वह न करनेलायक शास्त्रविरुद्ध काममें

१-प्राणियोंमें अनेकता होनेपर भी उनमें परस्पर प्रेमकी एकता होनी चाहिये। जैसे काँटा पैरमें गड़ता है, पर आँसू नेत्रोंमें आते हैं, ऐसा ही भाव सम्पूर्ण प्राणियोंमें रहना चाहिये—‘सर्वभूतहिते रताः’ (गीता ५।२५, १२।४)। एकमात्र प्रेम ही ऐसी चीज है, जिसमें कोई भेद नहीं रहता। प्रेमका भेद नहीं कर सकते। प्रेममें सब एक हो जाते हैं। ज्ञानमें तत्त्वभेद तो नहीं रहता, पर मतभेद रहता है। प्रेममें मतभेद भी नहीं रहता। अतः प्रेमसे आगे कुछ भी नहीं है। प्रेमसे त्रिलोकीनाश भगवान् भी वशमें हो जाते हैं।

२-धर्मका विधान मनुष्योंके लिये ही है; क्योंकि मनुष्येतर प्राणियोंमें धर्मकी मर्यादा लागू ही नहीं होती।

३-तीसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने जिस कामको सम्पूर्ण पापीका हेतु बताया है, उस कामका वाचक यहाँ ‘काम’ शब्द नहीं है। यहाँ ‘काम’ शब्द गृहस्थधर्मके पालनका वाचक है।

५१६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

प्रवृत्त हो जाता है। शास्त्रविरुद्ध काम पतनका तथा सम्पूर्ण पापों और दुःखोंका हेतु होता है।

कृत्रिम उपायोंसे सन्तति-निरोध करार कर केवल भोग-बुद्धिसे काममें प्रवृत्त होना महान् नरकोंका दरवाजा है। जो सन्तानकी उत्पत्ति कर सके, वह 'पुरुष' कहलाता है और जो गर्भ धारण कर सके, वह 'स्त्री' कहलाती है। अगर पुरुष और स्त्री आपरेषनके द्वारा अपनी सन्तानोत्पत्ति करनेकी योग्यता-(पुरुषत्व और स्त्रीत्व-) को नष्ट कर

परिशिष्ट भाव —जंगम सृष्टिमात्र कामसे पैदा होती है। अतः मनुष्यमें जो काम धर्मसे विरुद्ध नहीं है, मर्यादाके अनुसार है, वह काम भगवान्का स्वरूप है। भगवान् पहले कह चुके हैं—'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति' (७।७) और आगे भी कहेंगे—'ये चैव सात्त्विका भावाः' (७।१२), 'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९)। अतः जैसे धर्मयुक्त काम भगवान्का स्वरूप है, ऐसे ही धर्मविरुद्ध काम भी भगवान्से अलग नहीं है। जो धर्मविरुद्ध कामका आचरण करते हैं, उनको नरकरूपसे भगवान् मिलते हैं; क्योंकि नरक भी भगवान् ही हैं! परन्तु गीताका उद्देश्य मनुष्यको नरकोंमें अथवा जन्म-मरणमें भेजना नहीं है, प्रत्युत उसका कल्याण करना है। उद्देश्य सदा कल्याणका, आनन्दका ही होता है, दुःखका नहीं। दुःख कोई भी नहीं चाहता। अर्जुनने भी कल्याणकी बात पूछी है। उदाहरणार्थ, शब्द अच्छे भी होते हैं और बुरे भी, पर व्याकरणमें अच्छे शब्दोंपर ही विचार किया जाता है; क्योंकि व्याकरण आदि भी मनुष्यके उद्धारके लिये हैं।

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।

मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥

और तो क्या कहूँ—

ये= जितने= तथाविद्धि= समझो।
एव= भीतामसाः= तामस (भाव हैं,
वे सब)तु= परन्तु
सात्त्विकाः= सात्त्विकमत्तः= मुझसेअहम्= मैं
भावाः= भाव हैं (और)एव= ही होते हैं—तेषु= उनमें (और)
ये= जितनेइति= ऐसाते= वे
= भीतान्= उनकोमयि= मुझमें
राजसाः= राजस= नहीं हैं।

व्याख्या —'ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये'—ये जो सात्त्विक, राजस और तामस भाव (गुण, पदार्थ और क्रिया) हैं, वे भी मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिमात्रमें जो कुछ हो रहा है, मूलमें सबका आश्रय, आधार और प्रकाशक भगवान्

ही हैं अर्थात् सब भगवान्से ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं। सात्त्विक, राजस और तामस भाव भगवान्से ही होते हैं, इसलिये इनमें जो कुछ विलक्षणता दीखती है, वह सब भगवान्की ही है; अतः मनुष्यकी दृष्टि भगवान्की तरफ ही जानी चाहिये, सात्त्विक आदि भावोंकी तरफ नहीं। यदि

१-'स्यै शब्दसंधातयोः।' स्यायतः—संगते भवतः अस्यां शुक्लशोणिते इति स्त्री। (सिद्धान्तकौमुदी, बालमनोरमा)।

२-अंगहीनाश्रोत्रियषण्दशृङ्गवर्जम्। (कात्यायनश्रौतसूत्र १।१।५)

३-'यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे' (गीता २।७)

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाजुष्याम् ॥ (गीता ३।२)

यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ (गीता ५।१)

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

५१७

उसकी दृष्टि भगवान्की तरफ जायगी तो वह मुक्त हो जायगा और यदि उसकी दृष्टि सात्त्विक आदि भावोंकी तरफ जायगी तो वह बँध जायगा।

सात्त्विक, राजस और तामस—इन भावोंके (गुण, पदार्थ और क्रियामात्रके) अतिरिक्त कोई भाव है ही नहीं। ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं। यहाँ शंका होती है कि अगर ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं तो हमलोग जो कुछ करें, वह सब भगवत्स्वरूप ही होगा, फिर ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये—यह विधि-निषेध कहाँ रहा ? इसका समाधान यह है कि मनुष्यमात्र सुख चाहता है, दुःख नहीं चाहता। अनुकूल परिस्थिति विहित-कर्माका फल है और प्रतिकूल परिस्थिति निषिद्ध-कर्माका फल है। इसलिये कहा जाता है कि विहितकर्म करो और निषिद्धकर्म मत करो। अगर निषिद्धको भगवत्स्वरूप मानकर करोगे तो भगवान् दुःखों और नरकोंके रूपमें प्रकट होंगे। जो अशुभ कर्मोंकी उपासना करता है, उसके सामने भगवान् अशुभरूपसे ही प्रकट होते हैं; क्योंकि दुःख और नरक भी तो भगवान्के ही स्वरूप हैं।

जहाँ करने और न करनेकी बात होती है, वहाँ विधि और निषेध लागू होता है। अतः वहाँ विहित ही करना चाहिये, निषिद्ध नहीं करना चाहिये। परंतु जहाँ मानने और जाननेकी बात होती है, वहाँ परमात्माको ही 'मानना' चाहिये और अपनेको अथवा संसारको 'जानना' चाहिये।

जहाँ माननेकी बात है, वहाँ परमात्माको ही मानकर उनके मिलनेकी उत्कण्ठा बढ़ानी चाहिये। उनको प्राप्त और प्रसन्न करनेके लिये उनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये तथा उनकी आज्ञा और सिद्धान्तोंके विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिये। भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कार्य करेंगे तो उनको प्रसन्नता कैसे होगी ? और विरुद्ध कार्य करनेवालेको उनकी प्राप्ति कैसे होगी ? जैसे, किसी मनुष्यके मनके विरुद्ध काम करनेसे वह राजी कैसे होगा और प्रेमसे कैसे मिलेगा ?

जहाँ जाननेकी बात है, वहाँ संसारको जानना चाहिये। जो उत्पत्ति-विनाशशील है, सदा साथ रहनेवाला नहीं है, वह अपना नहीं है और अपने लिये भी नहीं है—ऐसा जानकर उससे सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहिये। उसमें कामना, ममता, आसक्ति नहीं करनी चाहिये। उसका महत्त्व हृदयसे उठा देना चाहिये। इससे सत्-तत्त्व प्रत्यक्ष हो जायगा और जानना पूर्ण हो जायगा। असत् (नाशवान्) वस्तु हमारे साथ रहनेवाली नहीं है—ऐसा समझनेपर भी

अगर समय-समयपर उसको महत्त्व देते रहेंगे तो वास्तविकता (सत्-वस्तु)-की प्राप्ति नहीं होगी।

'मत्त एवेति तान्निद्धि'—उन सबको तू मेरेसे ही उत्पन्न होनेवाला समझ अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ। कार्य और कारण—ये दोनों भिन्न दीखते हुए भी कार्य कारणसे अपनी भिन्न एवं स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता। अतः कार्य कारणरूप ही होता है। जैसे, सोनेसे गहने पैदा होते हैं तो वे सोनेसे अलग नहीं होते अर्थात् सोना ही होते हैं। ऐसे ही परमात्मासे पैदा होनेवाली अनन्त सृष्टि परमात्मासे भिन्न स्वतन्त्र सत्ता नहीं रख सकती।

'मत्त एव' कहनेका तात्पर्य है कि अपरा और परा प्रकृति मेरा स्वभाव है; अतः कोई उनको मेरेसे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकता। सातवें अध्यायके परिशिष्टरूप नवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि 'कल्पके आदिमें प्रकृतिको वशमें करके मैं बार-बार सृष्टिकी रचना करता हूँ' (नवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और आगे कहते हैं कि मेरी अध्यक्षतामें प्रकृति चराचर संसारको रचती है' (नवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)—ये दोनों बातें एक ही हुई। चाहे प्रकृतिको लेकर भगवान् रचना करें, चाहे भगवान्की अध्यक्षतामें प्रकृति रचना करे—इन दोनोंका तात्पर्य एक ही है। भगवान् रचना करते हैं तो प्रकृतिको लेकर ही करते हैं, तो मुख्यता भगवान्की ही हुई और प्रकृति भगवान्की अध्यक्षतामें रचना करती है, तो भी मुख्यता भगवान्की ही हुई। इसी बातको यहाँ कहा है कि 'मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय हूँ (सातवें अध्यायका छठा श्लोक), और इसका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि 'सात्त्विक, राजस और तामस—ये भाव मेरेसे ही होते हैं।'

भगवान्ने विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके जाननेवालेकी दुर्लभता बताते हुए जो प्रकरण आरम्भ किया, उसमें अपरा और परा प्रकृतिका कथन किया। अपरा और परा प्रकृतियोंको सम्पूर्ण प्राणियोंका कारण बताया; क्योंकि इनके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं। फिर अपनेको इन अपरा और पराका कारण बताया—'मत्तः परतरं नान्यत्' (७।७)। यही बात विभूतियोंके वर्णनका उपसंहार करते हुए यहाँ कही है कि सात्त्विक, राजस और तामस भावोंको मेरेसे ही होनेवाला जान।

'न त्वहं तेषु ते मयि'—मैं उनमें नहीं हूँ और वे मेरेमें नहीं हैं। तात्पर्य है कि उन गुणोंकी मेरे सिवाय कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है अर्थात् मैं-ही—मैं हूँ; मेरे सिवाय और कुछ है

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

ही नहीं। वे सात्त्विक, राजस और तामस जितने भी प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ हैं, वे सब-के-सब उत्पन्न और नष्ट होते हैं। परन्तु मैं उत्पन्न भी नहीं होता और नष्ट भी नहीं होता। अगर मैं उनमें होता तो उनका नाश होनेपर मेरा भी नाश हो जाता; परन्तु मेरा कभी नाश नहीं होता, इसलिये मैं उनमें नहीं हूँ। अगर वे मेरेमें होते तो मैं जैसा अविनाशी हूँ, वैसे वे भी अविनाशी होते; परंतु वे तो नष्ट होते हैं और मैं रहता हूँ, इसलिये वे मेरेमें नहीं हैं।

जैसे बीज ही वृक्ष, शाखाएँ, पत्ते, फूल आदिके रूपमें होता है; परंतु वृक्ष, शाखाएँ, पत्ते आदिमें बीजको खोजेंगे तो उनमें बीज नहीं मिलेगा। कारण कि बीज उनमें तत्त्व-रूपसे विद्यमान रहता है। ऐसे ही सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं; परन्तु उन भावोंमें मेरेको खोजोगे तो उनमें मैं नहीं मिलूँगा (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। कारण कि मैं उनमें मूलरूपसे और तत्वरूपसे विद्यमान हूँ। अतः मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ।

जैसे, बादल आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, आकाशमें ही रहते हैं और आकाशमें ही लीन होते हैं; परंतु आकाश ज्यों-का-त्यों निर्विकार रहता है। न आकाशमें बादल रहते हैं और न बादलोंमें आकाश रहता है। ऐसे ही आठवें श्लोकसे लेकर यहाँतक जितनी (सत्रह) विभूतियाँ बतायी गयी हैं, वे सब मेरेसे ही उत्पन्न होती हैं, मेरेमें ही रहती हैं और मेरेमें ही लीन हो जाती हैं। परंतु वे मेरेमें नहीं हैं और मैं उनमें नहीं हूँ। मेरे सिवाय उनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इस दृष्टिसे सब कुछ मैं ही हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्के सिवाय जितने सात्त्विक, राजस और तामस भाव अर्थात् प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ दिखायी देती हैं, उनकी सत्ता मानकर और उनको महत्ता देकर ये मनुष्य उनमें फँस रहे हैं। अतः भगवान् उन मनुष्योंका लक्ष्य इधर कराते हैं कि इन सब पदार्थों और क्रियाओंमें सत्ता और महत्ता मेरी ही है।

विशेष बात

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाले तरह-तरहके जितने भाव (प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ) हैं, वे सब-के-सब भगवान्की शक्ति प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं। परंतु प्रकृति भगवान्से अभिन्न होनेके कारण इन गुणोंको भगवान्ने 'मत्त एव' 'मेरेसे ही होते हैं'—ऐसा

कहा है। तात्पर्य यह कि प्रकृति भगवान्से अभिन्न होनेसे ये सभी भाव भगवान्से उत्पन्न होते हैं और भगवान्में ही लीन हो जाते हैं, पर परा प्रकृति (जीवात्मा-) ने इनके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया अर्थात् इनको अपना और अपने लिये मान लिया—यही परा प्रकृतिद्वारा जगत्को धारण करना है। इसीसे वह जन्मता-मरता रहता है। अब उस बन्धनका निवारण करनेके लिये यहाँ कहते हैं कि सात्त्विक, राजस और तामस—ये सब भाव मेरेसे ही होते हैं। इसी रीतिसे दसवें अध्यायमें कहा है—'भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथगविधाः' (१०।५) अर्थात् प्राणियोंके ये अलग-अलग प्रकारवाले (बीस) भाव मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं; और 'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वप्रवर्तते' (१०।८) अर्थात् सबका प्रभव मैं हूँ और सब मेरेसे प्रवृत्त होते हैं। पंद्रहवें अध्यायमें भी कहा है कि स्मृति, ज्ञान आदि सब मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहन् च' (१५।१५)। जब सब कुछ परमात्मासे ही उत्पन्न होता है, तब मनुष्यके साथ उन गुणोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। अपने साथ गुणोंका सम्बन्ध न माननेसे यह मनुष्य बँधता नहीं अर्थात् वे गुण उसके लिये जन्म-मरणके कारण नहीं बनते।

गीतामें जहाँ भक्तिका वर्णन है, वहाँ भगवान् कहते हैं कि सब कुछ मैं ही हूँ—'सदसच्चाहमर्जुन' (९।१९) और अर्जुन भी भगवान्के लिये कहते हैं कि आप सत् और असत् भी हैं तथा उनसे पर भी हैं—'सदसत्तत्परं यत्' (११।३७)। ज्ञानी (प्रेमी) भक्तके लिये भी भगवान् कहते हैं कि उसकी दृष्टिमें सब कुछ वासुदेव ही है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९)। कारण यह है कि भक्तिमें श्रद्धा और मान्यताकी मुख्यता होती है तथा भगवान्में दृढ़ अनन्यता होती है। भक्तिमें अन्यका अभाव होता है। जैसे उत्तम पत्रित्त्राको एक पत्रिके सिवाय संसारमें दूसरा कोई पुरुष दीखता ही नहीं, ऐसे ही भक्तको एक भगवान्के सिवाय और कोई दीखता ही नहीं, केवल भगवान् ही दीखते हैं।

गीतामें जहाँ ज्ञानका वर्णन है, वहाँ भगवान् बताते हैं कि सत् और असत्—दोनों अलग-अलग हैं—'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' (२।१६)। ऐसे ही ज्ञानमार्गमें शरीर-शरीरी, देह-देही, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, प्रकृति-पुरुष—दोनोंको अलग-अलग जाननेकी बात बहुत बार आयी है; जैसे—'प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्वद्गनादी

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

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उभावपि' (१३।१९); 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोज्ञानम्' (१३।२); 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्' (१३।२६); 'क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नम्' (१३।३३); 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरैवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा' (१३।३४)। कारण यह है कि ज्ञानमार्गमें विवेककी प्रधानता होती है। अतः वहाँ नित्य-अनित्य, अविनाशी-विनाशी आदिका विचार होता है और फिर अपना स्वरूप बिलकुल निलिप्त है—ऐसा बोध होता है।

साधकमें श्रद्धा और विवेक—दोनों ही रहने चाहिये। भक्तिमार्गमें श्रद्धाकी मुख्यता होती है और ज्ञानमार्गमें विवेककी मुख्यता होती है। ऐसा होनेपर भी भक्तिमार्गमें विवेकका और ज्ञानमार्गमें श्रद्धाका अभाव नहीं है। भक्ति-मार्गमें मानते हैं कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव

परिशिष्ट भाव—'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति' (७।७) का विस्तार करते हुए भगवान्ने पिछले चार श्लोकोंमें जो बात कही है और जो बात नहीं कही है, वह सब-की-सब बात उपसंहाररूपसे भगवान्ने इस श्लोकमें कह दी है। भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं, मेरेसे ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं, तथापि मैं इनमें नहीं हूँ और ये मेरेमें नहीं हैं अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ। अतः मेरी प्राप्ति चाहनेवाले साधककी दृष्टि इन भावोंकी तरफ न जाकर मेरी तरफ ही जानी चाहिये। अगर वह उन भावोंमें ही उलझ जायगा तो कभी मुक्त अथवा भक्त नहीं हो सकेगा।

देखने, सुनने, समझने आदिमें जो भी भाव आते हैं और जो नहीं आते, वे सब-के-सब 'ये' पदके अन्तर्गत समझने चाहिये।

भगवान्ने उत्पन्न होनेके कारण यहाँ सात्त्विक, राजस और तामस गुणोंको 'भाव' नामसे कहा गया है। तात्पर्य है कि भगवान् भाव (सत्ता)-रूप हैं; अतः उनसे भाव ही उत्पन्न होगा, अभाव कैसे उत्पन्न होगा? भगवान्ने उत्पन्न होनेके कारण सब भाव भगवान्के ही स्वरूप हैं—'भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः' (गीता १०।५)। तात्पर्य है कि शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव, क्रिया, पदार्थ आदि ग्रहण किये जाते हैं, वे सब भगवान् ही हैं। मनकी स्फुरणामात्र चाहे अच्छी हो या बुरी, भगवान् ही हैं। संसारमें अच्छा-बुरा, शुद्ध-अशुद्ध, शत्रु-मित्र, दुष्ट-सज्जन, पापात्मा-पुण्यात्मा आदि जो कुछ भी देखने, सुनने, कहने, सोचने, समझने आदिमें आता है, वह सब केवल भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय कहीं कुछ भी नहीं है।

अपना कुछ स्वार्थ रखें, लेनेकी इच्छा रखें, तभी सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन भेद होते हैं। यदि अपना कुछ स्वार्थ न रखें और दूसरेके हितकी दृष्टि रखें तो ये भगवान्के ही स्वरूप हैं। इनको अपने लिये मानना, इनसे सुख लेना ही पतनका कारण है (गीता—तीसरे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)।

'तीनों गुण मेरेसे ही प्रकट होते हैं'—ऐसा कहकर भगवान्ने यह भाव प्रकट किया है कि साधककी दृष्टि इन गुणोंकी तरफ न जाकर मुझ गुणातीतकी तरफ ही जानी चाहिये, अर्थात् मेरी सत्ता और महत्ता मानकर मेरे ही साथ सम्बन्ध जोड़ना चाहिये, जिससे मेरी प्राप्ति हो जाय और सदाके लिये दुःख मिटकर महान् आनन्दका अनुभव हो जाय। 'मैं उनमें नहीं

१-'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' (गीता २।१६); 'मद्भावं सोऽधिगच्छति' (गीता १४।१९); 'सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।' (गीता १८।२०)

२-मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः। अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमंजसा॥

(श्रीमद्भा ११।१३।२४)

'मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ (शब्दादि विषय) ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अतः मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार करके अनुभव कर लें।'।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

हूँ और वे मेरेमें नहीं हैं'—ऐसा कहकर भगवान्ने यह भाव प्रकट किया है कि अगर कोई मनुष्य मेरेको सत्ता और महत्ता न देकर सात्त्विक, राजस और तामस गुण, पदार्थ तथा क्रियाको सत्ता और महत्ता देकर उनके साथ सम्बन्ध जोड़ेगा तो वह मेरेको प्राप्त न होकर जन्म-मरणमें चला जायगा—'कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनमस्यु' (गीता १३।२१)।

'मत्त एव' पदोंका प्रयोग करके भगवान् मानो यह कहते हैं कि तीनों गुण मेरेसे ही होते हैं, फिर तुम मेरी तरफ न आकर गुणोंमें क्यों फँसते हो ? जो गुणोंमें फँस जाते हैं, वे मेरा भजन नहीं कर सकते (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। परन्तु जो गुणोंमें नहीं फँसते, वे भक्त मेरा भजन करते हैं (गीता—सातवें अध्यायका सोलहवाँ और दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। ये गुण टिकनेवाले नहीं हैं; क्योंकि कारण टिकता है, कार्य नहीं टिकता। जैसे सोना टिकता है, गहने नहीं टिकते; मिट्टी टिकती है, घड़ा नहीं टिकता, ऐसे ही भगवान् टिकते हैं, गुण नहीं टिकते। गुण तो परिवर्तनशील और मिटनेवाले हैं, पर भगवान् नित्य-निरन्तर ज्यों-के-त्यों रहनेवाले हैं। उनका न परिवर्तन होता है, न नाश। इसलिये भगवान्की प्राप्ति गुणोंसे नहीं होती, प्रत्युत गुणोंके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है। अतः तमोगुणको रजोगुणसे और रजोगुणको सत्त्वगुणसे जीतकर गुणोंसे अतीत होना है।

यहाँ एक विशेष बात समझनेयोग्य है कि सगुण-साकार भगवान् भी वास्तवमें निर्गुण ही हैं; क्योंकि वे सत्त्व, रज और तमोगुणसे युक्त नहीं हैं, प्रत्युत ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि गुणोंसे युक्त हैं। इसलिये सगुण-साकार भगवान्की भक्तिको भी निर्गुण (सत्त्वादि गुणोंसे रहित) बताया गया है; जैसे—'मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम्', 'मन्निकेतं तु निर्गुणम्', 'निर्गुणो मदपाश्रयः', 'मत्सेवायां तु निर्गुणा' (श्रीमद्भ० ११।२५।२४—२७)।

प्रश्न —जब सब कुछ भगवान् ही हैं, तो फिर सात्त्विक-राजस-तामस भाव त्याग्य क्यों हैं?

उत्तर —जैसे जमीनमें जल सब जगह रहता है, पर उसका प्राप्ति-स्थान कुआँ है, ऐसे ही भगवान् सब जगह हैं, पर उनका प्राप्ति-स्थान यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) है—'तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्' (गीता ३।१५)। परन्तु सात्त्विक-राजस-तामस भाव भगवान्के प्राप्ति-स्थान नहीं हैं अर्थात् इनके द्वारा भगवान्की प्राप्ति नहीं होती (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। अतः ये साधकके लिये कामके नहीं हैं। इसलिये भगवान्ने कहा है कि ये भाव मेरेसे होनेपर भी मैं इनमें और ये मेरेमें नहीं हैं।

जैसे, बाजरीकी खेतीमें बाजरी ही मुख्य होती है, पत्ती-डंटल नहीं। किसानका लक्ष्य केवल बाजरीको प्राप्त करनेका ही होता है। बाजरीको प्राप्त करनेके लिये वह खेतीको जल, खाद आदिसे पुष्ट करता है, जिससे बढ़िया बाजरी प्राप्त हो सके। ऐसे ही साधकका लक्ष्य भी केवल भगवान्का होना चाहिये, संसारका नहीं। भगवान्को प्राप्त करनेके लिये साधकको संसारकी सेवा करनी चाहिये। सेवाके सिवाय संसारसे अपना कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। महत्त्व बाजरी (दाने-) का है, पत्ती-डंटलका नहीं; क्योंकि आरम्भमें भी बाजरी रहती है और अन्तमें भी बाजरी ही रहती है। बाजरी प्राप्त करनेके बाद जो शेष बचता है, वह (पत्ती-डंटल) बाजरीसे अलग न होनेपर भी अपने लिये किसी कामकी चीज नहीं है, प्रत्युत पशुओंके खानेकी चीज है। ऐसे ही सात्त्विक-राजस-तामस भाव मूढ़ (अविवेकी) मनुष्योंके लिये हैं। ये तीनों ही भाव मनुष्यको बाँधनेवाले हैं (गीता—चौदहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। इसलिये ये भाव भगवान्के रूप होते हुए भी स्वयंके लिये नहीं हैं, प्रत्युत विवेकपूर्वक सांसारिक व्यवहारके लिये हैं। जैसे, जहर भी भगवान्का रूप है, पर वह खानेके लिये नहीं है!

जैसे बाजरी (बीज)-से पत्ती-डंटल पैदा होनेपर भी पत्ती-डंटलमें बाजरी नहीं है और बाजरीमें पत्ती-डंटल नहीं है, ऐसे ही भगवान्से पैदा होनेपर भी सात्त्विक-राजस-तामस भावोंमें भगवान् नहीं हैं और भगवान्में सात्त्विक-राजस-तामस भाव नहीं हैं।

सम्बन्ध —भगवान्ने पहले बारहवें श्लोकमें कहा कि ये सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं, पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं। इस विवेचनसे यह सिद्ध हुआ कि भगवान् प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा निलिप्त हैं। ऐसे ही भगवान्का शुद्ध अंश यह जीव भी निलिप्त है। इसपर यह प्रश्न होता है कि यह जीव निलिप्त होता हुआ भी बँधता कैसे है? इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।