श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ नवमोऽध्यायः
अवतरणिका-
सातवें अध्यायमें भगवान्के द्वारा विज्ञानसहित ज्ञान कहनेका जो प्रवाह चल रहा था, उसके बीचमें ही अर्जुनने
आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न कर लिये। उनमेंसे छः प्रश्नोंका उत्तर भगवान्ने संक्षेपसे देकर अन्तकालीन
गतिविषयक सातवें प्रश्नका उत्तर विस्तारसे दिया।
अब सातवें अध्यायमें कहनेसे बचे हुए उसी विज्ञानसहित ज्ञानके विषयको विलक्षण रीतिसे कहनेके लिये भगवान्
नवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले-
इदम्
= यह
ते
= तेरे लिये
ज्ञात्वा
= जानकर (तू)
गुह्यतमम्
= अत्यन्त गोपनीय
तु
= तो (मैं फिर)
अशुभात्
= अशुभसे अर्थात्
विज्ञानसहितम् = विज्ञानसहित
प्रवक्ष्यामि
= अच्छी तरहसे
जन्म-मरणरूप
ज्ञानम्
= ज्ञान
कहूँगा,
संसारसे
अनसूयवे
= दोषदृष्टिरहित
यत्
= जिसको
मोक्ष्यसे
= मुक्त हो जायगा।
व्याख्या-'इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे'-
भगवान्के मनमें जिस तत्त्वको, विषयको कहनेकी इच्छा
है, उसकी तरफ लक्ष्य करानेके लिये ही यहाँ भगवान्
सबसे पहले 'इदम्' (यह) शब्दका प्रयोग करते हैं। उस
(भगवान्के मन-बुद्धिमें स्थित) तत्त्वकी महिमा कहनेके
लिये ही उसको 'गुह्यतमम्' कहा है अर्थात् वह तत्त्व
अत्यन्त गोपनीय है। इसीको आगेके श्लोकमें 'राजगुह्यम्'
और अठारहवें अध्यायके चौंसठवें श्लोकमें 'सर्वगुह्यतमम्'
कहा है।
यहाँ पहले 'गुह्यतमम्' कहकर पीछे (गीता ९। ३४
में) 'मन्मना भव' कहा है और अठारहवें अध्यायमें
पहले 'सर्वगुह्यतमम्' कहकर पीछे (गीता १८। ६५ में)
'मन्मना भव' कहा है। तात्पर्य है कि यहाँका और
वहाँका विषय एक ही है, दो नहीं।
यह अत्यन्त गोपनीय तत्त्व हरेकके सामने नहीं कहा
जा सकता; क्योंकि इसमें भगवान्ने खुद अपनी महिमाका
वर्णन किया है। जिसके अन्तःकरणमें भगवान्के प्रति थोड़ी
भी दोषदृष्टि है, उसको ऐसी गोपनीय बात कही जाय,
तो वह 'भगवान् आत्मश्लाघी हैं-अपनी प्रशंसा करनेवाले
हैं' ऐसा उलटा अर्थ ले सकता है। इसी बातको लेकर
भगवान् अर्जुनके लिये 'अनसूयवे' विशेषण देकर कहते
हैं कि भैया ! तू दोष-दृष्टिरहित है, इसलिये मैं तेरे सामने
अत्यन्त गोपनीय बातको फिर अच्छी तरहसे कहूँगा अर्थात्
उस तत्त्वको भी कहूँगा और उसके उपायोंको भी
कहूँगा-'प्रवक्ष्यामि'।
'प्रवक्ष्यामि' पदका दूसरा भाव है कि मैं उस बातको
विलक्षण रीतिसे और साफ-साफ कहूँगा अर्थात् मात्र मनुष्य
मेरे शरण होनेके अधिकारी हैं। चाहे कोई दुराचारी-से-
दुराचारी, पापी-से-पापी क्यों न हो तथा किसी वर्णका,
किसी आश्रमका, किसी सम्प्रदायका, किसी देशका, किसी
६२४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
वेशका, कोई भी क्यों न हो, वह भी मेरे शरण होकर मेरी प्राप्ति कर लेता है—यह बात मैं विशेषतासे कहूँगा।
सातवें अध्यायमें भगवान्के मनमें जितनी बातें कहनेकी आ रही थीं, उतनी बातें वे नहीं कह सके। इसलिये भगवान् यहाँ ‘तु’ पद देते हैं कि उसी विषयको मैं फिर कहूँगा।
‘ज्ञानं विज्ञानसहितम्’—भगवान् इस सम्पूर्ण जगत्के महाकारण हैं—ऐसा दृढ़तासे मानना ‘ज्ञान’ है और भगवान्के सिवाय दूसरा कोई (कार्य-कारण) तत्त्व नहीं है—ऐसा अनुभव होना ‘विज्ञान’ है। इस विज्ञानसहित ज्ञानके लिये ही इस श्लोकके पूर्वार्धमें ‘इदम्’ और ‘गृह्यतम्’—ये दो विशेषण आये हैं।
ज्ञान और विज्ञान-सम्बन्धी विशेष बात
इस ज्ञान-विज्ञानको जानकर तू अशुभ संसारसे मुक्त हो जायगा। यह ज्ञान-विज्ञान ही राजविद्या, राजगुह्य आदि है। इस धर्मपर जो श्रद्धा नहीं करते, इसपर विश्वास नहीं करते, इसको मानते नहीं, वे मौतरूपी संसारके रास्तेमें पड़ जाते हैं और बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं (पहलेसे तीसरे श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने ‘ज्ञान’ बताया। अय्यक्तमूर्ति मेरेसे ही यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ; दूसरा कोई है ही नहीं (चौथेसे छठे श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने ‘विज्ञान’ बताया।
प्रकृतिके परवश हुए सम्पूर्ण प्राणी महाप्रलयमें मेरी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं और महासर्गके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ। परन्तु वे कर्म मेरेको बाँधते नहीं। उनमें मैं उदासीनकी तरह अनासक्त रहता हूँ। मेरी अध्यक्षतामें प्रकृति सम्पूर्ण प्राणियोंकी रचना करती है। मेरे परम भावको न जानते हुए मूढ़लोग मेरी अवहेलना करते हैं। राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेनेवालोंकी आशा, कर्म, ज्ञान सब व्यर्थ हैं। महत्मालोग दैवी प्रकृतिका आश्रय लेकर और मेरेको सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि मानकर मेरा भजन करते हैं। मेरेको नमस्कार करते हैं। कई ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे मेरी उपासना करते हैं; आदि-आदि (सातवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने ‘ज्ञान’ बताया। मैं ही क्रतु, यज्ञ, स्वधा, औषध आदि हूँ और सत्-असत् भी मैं ही हूँ अर्थात् कार्य-कारणरूपसे जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ (सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर ‘विज्ञान’ बताया।
जो यज्ञ करके स्वर्गमें जाते हैं, वे वहाँपर सुख भोगते हैं और पुण्य समाप्त होनेपर फिर लौटकर मृत्युलोकमें आते हैं। अनन्यभावसे मेरा चिन्तन करनेवालेका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ। श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करनेवाले वास्तवमें मेरा ही पूजन करते हैं, पर करते हैं अविधिपूर्वक। जो मुझे सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी नहीं मानते, उनका पतन हो जाता है। जो श्रद्धा-प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प आदिको तथा सम्पूर्ण क्रियाओंको मेरे अर्पण करते हैं, वे शुभ-अशुभ कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं (बीसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने ‘ज्ञान’ बताया। मैं सम्पूर्ण भूतोंमें सम हूँ। मेरा कोई प्रेम या द्वेषका पात्र नहीं है। परन्तु जो मेरा भजन करते हैं वे मेरेमें और मैं उनमें हूँ (उन्तीसवें श्लोक)—ऐसा कहकर ‘विज्ञान’ बताया। इसके आगेके पाँच श्लोक (तीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक) इस विज्ञानकी व्याख्यामें ही कहे गये हैं*।
‘यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’—असत्के साथ सम्बन्ध जोड़ना ही ‘अशुभ’ है, जो कि ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है। असत्-(संसार-) के साथ अपना सम्बन्ध केवल माना हुआ है, वास्तविक नहीं है। जिसके साथ वास्तविक सम्बन्ध नहीं होता, उसीसे मुक्ति होती है। अपने स्वरूपसे कभी किसीकी मुक्ति नहीं होती। अतः मुक्ति उसीसे होती है, जो अपना नहीं है; किन्तु जिसको भूलसे अपना मान लिया है। इस भूलजनित मान्यतासे ही मुक्ति होती है। भूलजनित मान्यताको न माननेमात्रसे ही उससे मुक्ति हो जाती है। जैसे, कपड़ेमें मैल लग जानेपर उसको साफ किया जाता है, तो मैल छूट जाता है। कारण कि मैल आगन्तुक है और मैलकी अपेक्षा कपड़ा पहलेसे है अर्थात् मैल और कपड़ा दो हैं, एक नहीं। ऐसे ही भगवान्का अविनाशी अंश यह जीव भगवान्से विमुख होकर जिस किसी योनिये जाता है, वहाँपर मैं-मेरापन करके शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है अर्थात् मैल चढ़ा लेता है और जन्मता-मरता रहता है। जब यह अपने स्वरूपको जान लेता है अथवा भगवान्के सम्मुख हो जाता है, तब यह अशुभ सम्बन्धसे मुक्त हो जाता है अर्थात् उसका संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। इसी भावको लेकर भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि इस तत्त्वको जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा।
- यहाँ ज्ञानके वर्णनमें विज्ञान और विज्ञानके वर्णनमें ज्ञान नहीं है—ऐसी बात नहीं है।
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
६२५
परिशिष्ट भाव-संसार 'प्रकट' है। कर्मयोग (निष्कामभाव) प्रकट न होनेसे 'गुह्य' है। उससे भी गुप्त होनेसे
ज्ञानयोग (आत्मज्ञान) 'गुह्यतर' है। ज्ञानयोगसे भी गुप्त होनेसे भक्तियोग (परमात्मज्ञान) 'गुह्यतम' है। गुह्य और गुह्यतर
तो लौकिक हैं, पर गुह्यतम अलौकिक है।
ब्रह्मलोकतकके सभी लोक पुनरावर्ती होनेसे 'अशुभ' हैं (गीता-आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। गुह्यतम
विषयको जान लेनेसे मनुष्य अशुभसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। अशुभसे मुक्ति तो कर्मयोग और ज्ञानयोगसे भी हो
जाती है, पर यहाँ अशुभसे मुक्ति होनेका तात्पर्य है-एक परमात्माके सिवाय अन्यकी किंचिन्मात्र भी सत्ता न रहे,
अहम्की वह सूक्ष्म गन्ध भी न रहे, जिससे दार्शनिक मतभेद पैदा होते हैं।
अपने स्वरूपको जानना 'ज्ञान' है और समग्र भगवान्को जानना 'विज्ञान' है। निर्गुणके अन्तर्गत तो सगुण (समग्र)
नहीं आ सकता, पर सगुणके अन्तर्गत निर्गुण भी आ जाता है, इसलिये सगुणका ज्ञान 'विज्ञान' अर्थात् विशेष ज्ञान है।
सम्बन्ध-पूर्वश्लोकमें विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके उसका परिणाम अशुभसे मुक्त होना बताया। अब
आगेके श्लोकमें उसी विज्ञानसहित ज्ञानकी महिमाका वर्णन करते हैं।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥ २॥
इदम्
= यह (विज्ञानसहित
पवित्रम्
= यह अति
धर्म्यम्
= यह धर्ममय है,
ज्ञान अर्थात्
पवित्र
अव्ययम्
= अविनाशी है (और)
समग्ररूप)
(तथा)
कर्तुम्
= करनेमें
राजविद्या
= सम्पूर्ण विद्याओंका
उत्तमम्
= अतिश्रेष्ठ है
सुसुखम्
= बहुत सुगम है
राजा (और)
(और)
अर्थात् इसको प्राप्त
राजगुह्यम्
= सम्पूर्ण गोपनीयोंका
प्रत्यक्षावगमम् = इसका फल भी
करना बहुत सुगम
राजा है।
प्रत्यक्ष है।
है।
व्याख्या-'राजविद्या'-यह विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्ण
विशेष गोपनीय बात है; क्योंकि वह नाटकमें जिस स्वाँगमें
विद्याओंका राजा है; क्योंकि इसको ठीक तरहसे जान
खेलता है, उसमें वह अपने असली रूपको छिपाये रखता
लेनेके बाद कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता।
है। ऐसे ही भगवान् जब मनुष्यरूपमें लीला करते हैं, तब
भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें कहा है कि 'मेरे
अभक्त लोग उनको मनुष्य मानकर उनकी अवज्ञा करते
समग्ररूपको जाननेके बाद जानना कुछ बाकी नहीं रहता।'
हैं। इससे भगवान् उनके सामने अपने-आपको प्रकट नहीं
पन्द्रहवें अध्यायके अन्तमें कहा है कि 'जो असम्मूढ़ पुरुष
करते (गीता-सातवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)। परन्तु
मेरेको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम जानता है, वह
जो भगवान्के ऐकान्तिक प्यारे भक्त होते हैं, उनके सामने
सर्ववित् हो जाता है अर्थात् उसको जानना कुछ बाकी नहीं
भगवान् अपने-आपको प्रकट कर देते हैं-यह अपने-
रहता', इससे ऐसा मालूम होता है कि भगवान्के सगुण-
आपको प्रकट कर देना ही अत्यन्त गोपनीय बात है।
निर्गुण, साकार-निराकार, व्यक्त-अव्यक्त आदि जितने
'पवित्रमिदम्'-इस विद्याके समान पवित्र करनेवाली
स्वरूप हैं, उन सब स्वरूपोंमें भगवान्के सगुण-साकार
दूसरी कोई विद्या है ही नहीं अर्थात् यह विद्या पवित्रताकी
स्वरूपकी बहुत विशेष महिमा है।
आखिरी हद है। पापी-से-पापी, दुराचारी-से-दुराचारी भी
'राजगुह्यम्'-संसारमें रहस्यकी जितनी गुप्त बातें हैं,
इस विद्यासे बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है अर्थात् पवित्र
उन सब बातोंका यह राजा है; क्योंकि संसारमें इससे बड़ी
बन जाता है और शाश्वती शान्तिको प्राप्त कर लेता है (नवें
दूसरी कोई रहस्यकी बात है ही नहीं।
अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।
जैसे नाटकमें सबके सामने खेलता हुआ कोई पात्र
दसवें अध्यायमें अर्जुनने भगवान्को परम पवित्र
अपना असली परिचय दे देता है, तो उसका परिचय देना
बताया-'पवित्रं परमं भवान्' (१०। १२); चौथे
६२६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
अध्यायमें भगवान्ने ज्ञानको पवित्र बताया—‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ’ (४।३८) और यहाँ राजविद्या आदि आठ विशेषण देकर विज्ञानसहित ज्ञानको पवित्र बताते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि पवित्र परमात्माका नाम, रूप, लीला, धाम, स्मरण, कीर्तन, जप, ध्यान, ज्ञान आदि सब पवित्र हैं अर्थात् भगवत्सम्बन्धी जो कुछ है, वह सब महान् पवित्र है और प्राणिमात्रको पवित्र करनेवाला है*।
‘उत्तमम् ’—यह सर्वश्रेष्ठ है। इसके समकक्ष दूसरी कोई वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि हैं ही नहीं। यह श्रेष्ठताकी आखिरी हद है, क्योंकि इस विद्यासे मेरा भक्त सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। इतना श्रेष्ठ हो जाता है कि मैं भी उसकी आज्ञाका पालन करता हूँ।
इस विज्ञानसहित ज्ञानको जानकर जो मनुष्य इसका अनुभव कर लेते हैं, उनके लिये भगवान् कहते हैं कि ‘वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ ’—‘मयि ते तेषु चाप्यहम् ’ (९।२९) अर्थात् वे मेरेमें तल्लीन होकर मेरा स्वरूप ही बन जाते हैं।
‘प्रत्यक्षावगमम् ’—इसका फल प्रत्यक्ष है। जो मनुष्य इस बातको जितना जानेगा, वह उतना ही अपनेमें विलक्षणताका अनुभव करेगा। इस बातको जानते ही परमगति प्राप्त हो जाय—यह इसका प्रत्यक्ष फल है।
‘धर्मीम् ’—यह धर्ममय है। परमात्माका लक्ष्य होनेपर निष्कामभावपूर्वक जितने भी कर्तव्य-कर्म किये जायें, वे सब-के-सब इस धर्मके अन्तर्गत आ जाते हैं। अतः यह विज्ञानसहित ज्ञान सभी धर्मोंसे परिपूर्ण है।
दूसरे अध्यायमें भगवान्ने अर्जुनको कहा कि इस धर्ममय युद्धके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयस्कर साधन नहीं है—‘धर्म्यादिं युद्धाच्छ्रेयोऽन्यक्षत्रियस्य न
परिशिष्ट भाव —कर्मयोग तथा ज्ञानयोग ‘राजविद्या’ है और भक्तियोग ‘राजगुह्य’ है। इसी अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें राजविद्याकी और चौतीसवें श्लोकमें राजगुह्यकी बात मुख्यतासे कही गयी है।
‘प्रत्यक्षावगमम् ’—इसका प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) फल होता है। कर्मयोगसे शान्ति, ज्ञानयोगसे मुक्ति और भक्तियोगसे प्रेम प्रत्यक्ष प्राप्त होता है। भगवान्के शरणागत होनेपर निभंयता, निःशोकता, निश्चिन्तता और निःशंकता प्रत्यक्षमें प्राप्त होती है। अपने स्वरूपकी सत्ता-स्फूर्ति (सत्-चित्), अपने होनेपनका ज्ञान (अनुभव) भी प्रत्यक्ष है।
‘धर्मीम् ’—यह धर्मसे रहित नहीं है, प्रत्युत धर्ममय है, धर्मसे ओतप्रोत है। इसको जाननेसे मनुष्यजीवन सफल हो जाता है अर्थात् मनुष्य कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है।
- अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्म० १७।१७)
श्लोक ३]
- साधक-संजीवनी *
६२७
'सुसुखं कर्तुम्'—यह करनेमें बहुत सुगम है; क्योंकि यह स्वतः प्राप्त है। सब कुछ परमात्मा ही हैं—इसमें कोई परिश्रम नहीं है, यह तो केवल स्वीकृति है। कर्मयोगकी दृष्टिसे जो वस्तु अपनी नहीं है, प्रत्युत दूसरोंकी है, उसको दूसरोंकी सेवामें लगानेमें क्या जोर आता है! ज्ञानयोगकी दृष्टिसे अपने-आपमें स्थित होनेमें क्या जोर आता है! भक्तियोगकी दृष्टिसे जो अपना है, उसकी तरफ जानेमें क्या जोर आता है! ये सब काम सुखपूर्वक होते हैं।
'अव्ययम्'—वास्तवमें अविनाशी और अन्तिम तत्त्व यही है इससे आगे कुछ नहीं है।
सम्बन्ध—ऐसी सुगम और सर्वोपरि विद्याके होनेपर भी लोग उससे लाभ क्यों नहीं उठा रहे हैं? इसपर कहते हैं—
अश्रद्धधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ ३ ॥
| परन्तप | = हे परन्तप! | पुरुषाः | = मनुष्य | वर्त्मनि | संसारके मार्गमें |
|---|---|---|---|---|---|
| अस्य | = इस | माम् | = मुझे | निवर्तन्ते | = लौटते रहते हैं |
| धर्मस्य | = धर्मकी महिमापर | अप्राप्य | = प्राप्त न होकर | अर्थात् बार-बार | |
| अश्रद्धधानाः | = श्रद्धा न रखनेवाले | मृत्युसंसार- | = मृत्युरूप | जन्मते-मरते रहते हैं। |
व्याख्या— 'अश्रद्धधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य* परन्तप'—धर्म दो तरहका होता है—स्वधर्म और परधर्म। मनुष्यका जो अपना स्वतःसिद्ध स्वरूप है, वह उसके लिये स्वधर्म है और प्रकृति तथा प्रकृतिका कार्यमात्र उसके लिये परधर्म है—'संसारधर्मरविमुद्गमानः ' (श्रीमद्भगवद्गीता ११।२।४९)। पीछेके दो श्लोकोंमें भगवान्ने जिस विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेकी प्रतिज्ञा की और राजविद्या आदि आठ विशेषण देकर जिसका बड़ा माहात्म्य बताया, उसीको यहाँ 'धर्म' कहा गया है। इस धर्मके माहात्म्यपर श्रद्धा न रखनेवाले अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंको सच्चा मानकर उन्हींमें रचे-पचे रहनेवाले मनुष्योंको यहाँ 'अश्रद्धधानाः ' कहा गया है।
यह एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि मनुष्य अपने शरीरको, कुटुम्बको, धन-सम्पत्ति-वैभवको निःसन्देह-रूपसे उत्पत्ति-विनाशशील और प्रतिक्षण परिवर्तनशील जानते हुए भी उनपर विश्वास करते हैं, श्रद्धा करते हैं, उनका आश्रय लेते हैं। वे ऐसा विचार नहीं करते कि इन शरीरादिके साथ हम कितने दिन रहेंगे और ये हमारे साथ कितने दिन रहेंगे? श्रद्धा तो स्वधर्मपर होनी चाहिये थी, पर वह हो गयी परधर्मपर!
'अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि'— परधर्मपर श्रद्धा रखनेवालोंके लिये भगवान् कहते हैं कि सब देशमें,
सब कालमें, सम्पूर्ण वस्तुओंमें, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें सदा-सर्वदा विद्यमान, सबको नित्यप्राप्त मुझे प्राप्त न करके मनुष्य मृत्युरूप संसारके रास्तेमें लौटते रहते हैं। कहीं जन्म गये तो मरना बाकी रहता है और मर गये तो जन्मना बाकी रहता है। ये जिन योनियोंमें जाते हैं, उन्हीं योनियोंमें ये अपनी स्थिति मान लेते हैं अर्थात् 'मैं शरीर हूँ' ऐसी अहंता और 'शरीर मेरा है' ऐसी ममता कर लेते हैं। परन्तु वास्तवमें उन योनियोंसे भी उनका निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद होता रहता है। किसी भी योनिके साथ इनका सम्बन्ध टिक नहीं सकता। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिसे भी इनका निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है अर्थात् वहाँसे भी ये हरदम निवृत्त हो रहे हैं, लौट रहे हैं। ये किसीके साथ हरदम रह ही नहीं सकते। ऐसे ही ये ऊर्ध्वगतिमें अर्थात् ऊँची-से-ऊँची भोग-भूमियोंमें भी चले जायें तो वहाँसे भी इनको लौटना ही पड़ेगा (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ तथा पचीसवाँ और नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि मेरेको प्राप्त हुए बिना ये मनुष्य जहाँ-कहीं भी जायेंगे, वहाँसे इनको लौटना ही पड़ेगा, बार-बार जन्मना और मरना ही पड़ेगा।
'मृत्युसंसारवर्त्मनि' कहनेका मतलब है कि इस संसारके रास्तेमें मरना-ही-मरना है, विनाश-ही-विनाश है,
- यहाँ 'अश्रद्धधानाः' पदमें आये हुए 'शान्च कृत' प्रत्ययके योगमें 'न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्तृनाम्' (पाणि० अष्टा० २।३।६९)—इस सूत्रके नियमसे द्वितीया विभक्ति होनी चाहिये; परन्तु यह सूत्र कारक-षष्ठीका ही निषेध करता है। अतः यहाँ शेष षष्ठीसे 'धर्म' पदमें षष्ठी विभक्ति की गयी है।
६२८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
अभाव-ही-अभाव है अर्थात् जहाँ जायेंगे, वहाँसे लौटना ही पड़ेगा। इसी बातको भगवान्ने बारहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें ‘मृत्युंसंसारसागरात् ’ कहा है अर्थात् यह संसार मौतका ही समुद्र है। इसमें कहीं भी स्थिरतासे टिक नहीं सकते।
यह मनुष्यशरीर केवल परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। भगवान्ने कृपा करके सम्पूर्ण कर्मफलोंको (जो कि सत्-असत् योनियोंके कारण हैं) स्थगित करके मुक्तिका अवसर दिया है। ऐसे मुक्तिके अवसरको प्राप्त करके भी जो जीव जन्म-मरणकी परम्परामें चले जाते हैं, उनको देखकर भगवान् मानो पश्चाताप करते हैं कि मैंने अपनी तरफसे इनको जन्म-मरणसे छूटनेका पूरा अवसर दिया था, पर ये उस अवसरको प्राप्त करके भी जन्म-मरणमें जा रहे हैं! केवल साधारण मनुष्योंके लिये ही नहीं, प्रत्युत महान् आसुरी योनियोंमें पड़े हुए जीवोंके लिये भी भगवान् पश्चाताप करते हैं कि मेरेको प्राप्त किये बिना ही ये अधम गतिको जा रहे हैं—‘मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्यधर्मा गतिम् ’ (गीता १६।२०)।
‘अप्राप्य माम् ’ (मेरेको प्राप्त न होकर) पदोंसे यह सिद्ध होता है कि मनुष्यमात्रको भगवत्प्राप्तिका अधिकार मिला हुआ है। इसलिये मनुष्यमात्र भगवान्की ओर चल सकता है, भगवान्को प्राप्त कर सकता है। सोलहवें अध्यायके बीसवें श्लोकमें ‘मामप्राप्यैव ’ पदसे भी यह सिद्ध होता है कि आसुरी प्रकृतिवाले भी भगवान्की ओर चल सकते हैं, भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं। इसलिये गीतामें कहा गया है कि दुराचारी-से-दुराचारी भी भक्त बन सकता है, धर्मात्मा बन सकता है और भगवान्को प्राप्त कर सकता है (नवें अध्यायका तीसरा-इकतीसवाँ श्लोक) तथा पापी-से-पापी भी ज्ञानके द्वारा सम्पूर्ण पापोंसे तर सकता है (चौथे अध्यायका छत्तीसवाँ श्लोक)।
एक शहर था। उसके चारों तरफ ऊँची दीवार बनी हुई थी। शहरसे बाहर निकलनेके लिये एक ही दरवाजा था। एक सूरदास (अन्धा) शहरसे बाहर निकलना चाहता था। वह एक हाथसे लाठीका सहारा और एक हाथसे दीवारका सहारा लेते हुए चल रहा था। चलते-चलते जब बाहर जानेका दरवाजा आया, तब उसके माथेपर खुजली आयी। वह एक हाथसे खुजलाते और एक हाथसे लाठीके सहारे चलता रहा, तो दरवाजा निकल गया और उसका हाथ फिर दीवारपर लग गया। इस तरह चलते-चलते जब
दरवाजा आता, तब खुजली आ जाती। खुजलानेके लिये वह हाथ माथेपर लगाता, तबतक दरवाजा निकल जाता। इस प्रकार वह चक्कर ही काटता रहा। ऐसे ही यह जीव स्वर्ग, नरक, चौरासी लाख योनियोंमें घूमता रहता है। उन भोगयोनियोंसे यह स्वयं छूटकारा नहीं पा सकता, तो भगवान् कृपा करके जन्म-मरणके चक्करसे छूटनेके लिये मनुष्यशरीर देते हैं। परन्तु मनुष्यशरीरको पाकर उसके मनमें भोगोंकी खुजली चलने लगती है, जिससे वह परमात्माकी तरफ न जाकर सांसारिक पदार्थोंका संग्रह करने और उन पदार्थोंसे सुख लेनेमें ही लगा रहता है। ऐसा करते-करते ही वह मर जाता है और पुनः स्वर्ग, नरक आदिकी योनियोंके चक्करमें पड़ जाता है। इस प्रकार वह बार-बार उन योनियोंमें लौटता रहता है—यही मृत्युरूप संसार-मार्गमें लौटना है।
यह जीव साक्षात् परमात्माका अंश है; अतः परमात्मा ही इस जीवका असली घर है। जब यह जीव उस परमात्माको प्राप्त कर लेता है, तब उसको अपना असली स्थान (घर) प्राप्त हो जाता है। फिर वहाँसे इसको लौटना नहीं पड़ता अर्थात् गुणोंके परवश होकर जन्म नहीं लेना पड़ता—इसको गीतामें जगह-जगह कहा गया है; जैसे—‘त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ’ (४।१); ‘गच्छन्त्यपुनरावृत्तिम् ’ (५।१७); ‘यं प्राप्य न निवर्तन्ते ’ (८।२१); ‘यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः ’ (१५।४); ‘यद्गत्वा न निवर्तन्ते ’ (१५।६) आदि-आदि। श्रुति भी कहती है—‘न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ’ (छान्दोग्य० ४।१५।१)।
विशेष बात
प्रायः लोगोंके भीतर यह बात जँची हुई है कि हम संसारी हैं, जन्मने-मरनेवाले हैं, यहाँ ही रहनेवाले हैं, इत्यादि। पर ये बातें बिलकुल गलत हैं। कारण कि हम सभी परमात्माके अंश हैं, परमात्माकी जातिके हैं, परमात्माके साथी हैं और परमात्माके धामके वासी हैं। हम सभी इस संसारमें आये हैं; हम संसारके नहीं हैं। कारण कि संसारके सब पदार्थ जड़ हैं, परिवर्तनशील हैं, जब कि हम स्वयं चेतन हैं और हमारेमें (स्वयंमें) कभी परिवर्तन नहीं होता। अनेक जन्म होनेपर भी हम स्वयं नित्य-निरन्तर वे ही रहते हैं—‘भूतग्रामः स एवायम् ’ (८।१९) और ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं।
संसारके साथ हमारा संयोग और परमात्माके साथ
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
६२९
हमारा वियोग कभी हो ही नहीं सकता। हम चाहे स्वर्गमें जायें, चाहे नरकोंमें जायें, चाहे चौरासी लाख योनियोंमें जायें, चाहे मनुष्ययोनियोंमें जायें, तो भी हमारा परमात्मासे वियोग नहीं होता, परमात्माका साथ नहीं छूटता। परमात्मा सभी योनियोंमें हमारे साथ रहते हैं। परन्तु मनुष्येतर योनियोंमें विवेककी जागृति न रहनेसे हम परमात्माको पहचान नहीं सकते। परमात्माको पहचाननेका मौका तो इस मनुष्यशरीरमें ही है। कारण कि भगवान्ने कृपा करके इस मनुष्यको ऐसी शक्ति, योग्यता दी है, जिससे वह सत्संग, विचार, स्वाध्याय आदिके द्वारा विवेक जाग्रत् करके परमात्माको जान सकता है, परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है। इसलिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि इन प्राणियोंको मनुष्यशरीर प्राप्त हुआ है, तो मेरेको प्राप्त हो ही जाना चाहिये और 'हम भगवान्ने की हैं तथा भगवान् ही हमारे हैं' यह बात उनकी समझमें आ ही जानी चाहिये। परन्तु ये इस बातको न समझकर, मेरेपर श्रद्धा-विश्वास न करके; मेरेको प्राप्त न होकर संसाररूपी मौतके मार्गमें पड़ गये हैं—यह बड़े दुःखकी और आश्चर्यकी बात है!
संसारमें आना, चौरासी लाख योनियोंमें भटकना हमारा काम नहीं है। ये देश, गाँव, कुटुम्ब, धन, पदार्थ, शरीर आदि हमारे नहीं हैं और हम इनके नहीं हैं। ये देश आदि सभी अपरा प्रकृति हैं और हम परा प्रकृति हैं। परन्तु
परिशिष्ट भाव —पूर्वश्लोकमें कही विज्ञानसहित ज्ञानकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य इससे लाभ नहीं उठाते, प्रत्युत नाशवान् भोगोंको महत्त्व देकर उन्हींमें लगे रहते हैं। इसलिये वे भगवान्को प्राप्त न होकर बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं, स्वतःप्राप्त अमरताका रास्ता छोड़कर मृत्युके रास्तेपर चलते रहते हैं।
'अप्राप्य माम्' कहनेका तात्पर्य है कि मनुष्यशरीरमें भगवान्की प्राप्तिका मौका था, मनुष्य भगवत्प्राप्तिके नजदीक आ गया था, पर श्रद्धा न होनेके कारण वह भगवान्की प्राप्ति न करके संसारमें ही घूमता रहता है। जो नित्य विद्यमान है, उसको न मानकर वह जो एक क्षण भी नहीं टिकता, उसको मानता है। उसका अन्तःकरण इतना अशुद्ध होता है कि भगवान्का प्रत्यक्ष प्रभाव देखकर भी उसपर श्रद्धा नहीं करता। जैसे—सत्संग, कीर्तन आदिमें प्रत्यक्ष लाभ दीखनेपर भी वह उसमें विशेषतासे नहीं लगता। किसी प्रिय व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर या अन्य कोई घटना घटनेपर उसको संसारसे वैराग्य होता है, फिर भी वह उसमें स्थिर नहीं रहता। आश्विन कृष्ण द्वादशी, सं० दो हजार बावन (दिनांक-इक्कीस सितम्बर, उन्नीस सौ पंचानवे)–को भूमण्डलमात्रमें भगवान् गणेशजीकी प्रतिमाओंके द्वारा दूध पीनेकी प्रत्यक्ष घटना लोगोंके देखनेमें आयी। परन्तु अपनेको बुद्धिमान् समझनेवाले कई लोगोंने ऐसी प्रत्यक्ष घटनापर भी श्रद्धा नहीं की और अखबार, टेलिविजन आदिके माध्यमसे इसका खण्डन किया। कौरवोंकी सभामें भी जब द्रौपदीका चीर-हरण करनेकी चेष्टा की गयी, तब साड़ियोंका ढेर लग गया, पर दुःशासन द्रौपदीको किंचिन्मात्र भी नग्न नहीं कर सका। इतना बड़ा चमत्कार प्रत्यक्ष देखनेपर भी कौरवोंको चेत नहीं हुआ! अतः जिनकी बुद्धि तामसी है, अशुद्ध है, उनपर ऐसी विलक्षण घटनाओंका असर नहीं पड़ता, उनकी श्रद्धा नहीं होती। उनको सब उलटा-ही-उलटा दीखता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। ऐसे अश्रद्धालु मनुष्य अमरताके मार्गको छोड़कर मृत्युके मार्गमें चलते रहते हैं, जिसमें केवल मृत्यु-ही-मृत्यु है। वे उस मार्गको पकड़ लेते हैं, जिस मार्गसे कभी भगवान्की प्राप्ति न हो सके।
भूलसे हमने अपनेको यहाँका रहनेवाला मान लिया है। इस भूलको मिटाना चाहिये; क्योंकि हम भगवान्के अंश हैं, भगवान्के धामके हैं। जहाँसे लौटकर नहीं आना पड़ता, वहाँ जाना हमारा खास काम है, जन्म-मरणसे रहित होना हमारा खास काम है। परन्तु अपने घर जानेको, खुदकी चीजको कठिन मान लिया, उद्योगसाध्य मान लिया! वास्तवमें यह कठिन नहीं है। कठिन तो संसारका रास्ता है, जो कि नया पकड़ना पड़ता है, नया शरीर धारण करना पड़ता है, नये कर्म करने पड़ते हैं; और कर्मिके फल भोगनेके लिये नये-नये लोकोंमें नयी-नयी योनियोंमें जाना पड़ता है। भगवान्की प्राप्ति तो सुगम है; क्योंकि भगवान् सब देशमें हैं, सब कालमें हैं, सब वस्तुओंमें हैं, सब व्यक्तियोंमें हैं, सब घटनाओंमें हैं, सब परिस्थितियोंमें हैं और सभी भगवान्में हैं। हम हरदम भगवान्के साथ हैं और भगवान् हरदम हमारे साथ हैं। हम भगवान्से और भगवान् हमारेसे कभी अलग हो ही नहीं सकते।
तात्पर्य यह हुआ कि हम यहाँके, जन्म-मृत्युवाले संसारके नहीं हैं। यह हमारा देश नहीं है। हम इस देशके नहीं हैं। यहाँकी वस्तुएँ हमारी नहीं हैं। हम इन वस्तुओंके नहीं हैं। हमारे ये कुटुम्बी नहीं हैं। हम इन कुटुम्बियोंके नहीं हैं। हम तो केवल भगवान्के हैं और भगवान् ही हमारे हैं।
६३०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
अपराको पकड़नेसे ही मनुष्य मौतके रास्तेमें चला जाता है। अगर वह अपराको न पकड़े, प्रत्युत जिसकी अपरा है, उस भगवान्को पकड़े तो सदाके लिये जन्म-मरणसे मुक्त हो जाय! मनुष्य इसी जन्ममें मुक्त हो सकता है और मुक्तिसे भी बढ़कर भगवान्का प्रेम (भक्ति) प्राप्त कर सकता है। परन्तु भगवान्से इतनी बड़ी योग्यता, पात्रता, अधिकारिता पाकर भी वह मौतके रास्तेमें चल पड़ा! इसलिये भगवान् दुःखके साथ कहते हैं—‘अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युंसंसारवर्त्तनिं’! और ‘मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्यधर्मा गतिम्’ (गीता १६।२०)। इससे सिद्ध होता है कि अभी कल्याणप्राप्तिका बड़ा सुन्दर मौका है। मनुष्य खुद अपने कल्याणमें लग जाय तो इसमें धर्म, ग्रन्थ, महात्मा, संसार, भगवान् सब सहायता करते हैं!
सम्बन्ध—इस अध्यायके पहले और दूसरे श्लोकमें जिस राजविद्याकी महिमा कही गयी है, अब आगेके दो श्लोकोंमें उसीका वर्णन करते हैं।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥ न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभून् च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥
| इदम् | = यह | तेषु | = उनमें | भूतभावनः | = सम्पूर्ण प्राणियोंको |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वम् | = सब | न, अवस्थितः | = स्थित नहीं हूँ | उत्पन्न | |
| जगत् | = संसार | च | = तथा | करनेवाला | |
| मया | = मेरे | भूतानि | = (वे) प्राणी (भी) | च | = और |
| अव्यक्तमूर्तिना | = निराकार | मत्स्थानि | = मुझमें स्थित | भूतभूत् | = प्राणियोंका धारण, |
| स्वरूपसे | न | = नहीं हैं— | भरण-पोषण | ||
| तत्म् | = व्याप्त है। | मे | = मेरे (इस) | करनेवाला | |
| सर्वभूतानि | = सम्पूर्ण | ऐश्वरम् | = ईश्वर- | मम | = मेरा |
| प्राणी | सम्बन्धी | आत्मा | = स्वरूप | ||
| मत्स्थानि | = मुझमें स्थित हैं; | योगम् | = योग- | भूतस्थः | = उन प्राणियोंमें |
| च | = परन्तु | (सामर्थ्य-) को | स्थित | ||
| अहम् | = मैं | पश्य | = देख। | न | = नहीं है। |
व्याख्या—‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’—मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसे जिसका ज्ञान होता है, वह भगवान्का व्यक्तरूप है और जो मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय नहीं है अर्थात् मन आदि जिसको नहीं जान सकते, वह भगवान्का अव्यक्तरूप है। यहाँ भगवान्ने ‘मया’ पदसे व्यक्त- (साकार-) स्वरूप और ‘अव्यक्तमूर्तिना’ पदसे अव्यक्त- (निराकार-) स्वरूप बताया है। इसका तात्पर्य है कि भगवान् व्यक्तरूपसे भी हैं और अव्यक्तरूपसे भी हैं। इस प्रकार भगवान्की यहाँ व्यक्त-अव्यक्त (साकार-निराकार) कहनेकी गूढ़ाभिपत्ति समग्ररूपसे है अर्थात् सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदिका भेद तो सम्प्रदायोंको
लेकर है, वास्तवमें परमात्मा एक हैं। ये सगुण-निर्गुण आदि एक ही परमात्माके अलग-अलग विशेषण हैं, अलग-अलग नाम हैं।
गीतामें जहाँ सत्-असत्, शरीर-शरीरीका वर्णन किया गया है, वहाँ जीवके वास्तविक स्वरूपके लिये आया है—‘येन सर्वमिदं तत्म्’ (२।१७); क्योंकि यह परमात्माका साक्षात् अंश होनेसे परमात्माके समान ही सर्वत्र व्यापक है अर्थात् परमात्माके साथ इसका अभेद है। जहाँ सगुण-निराकारकी उपासनाका वर्णन आया है, वहाँ बताया है—‘येन सर्वमिदं तत्म्’ (८।२२), जहाँ कर्मके द्वारा भगवान्का पूजन बताया है, वहाँ भी कहा है—
श्लोक ४-५]
- साधक-संजीवनी *
६३१
‘येन सर्वमिदं ततम्’ (१८। ४६)। इन सबके साथ एकता करनेके लिये ही भगवान् यहाँ कहते हैं—‘मया ततमिदं सर्वम्।’
‘मत्स्थानि सर्वभूतानि’—सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं अर्थात् परा-अपरा प्रकृतिरूप सारा जगत् मेरेमें ही स्थित है। वह मेरेको छोड़कर रह ही नहीं सकता। कारण कि सम्पूर्ण प्राणी मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं, मेरेमें ही स्थित रहते हैं और मेरेमें ही लीन होते हैं अर्थात् उनका उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप जो कुछ परिवर्तन होता है, वह सब मेरेमें ही होता है। अतः वे सब प्राणी मेरेमें स्थित हैं।
‘न चाहं तेष्वावस्थितः’—पहले भगवान्ने दो बातें कही—पहली ‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ और दूसरी ‘मत्स्थानि सर्वभूतानि।’ अब भगवान् इन दोनों बातोंके विरुद्ध दो बातें कहते हैं।
पहली बात—(मैं सम्पूर्ण जगत्में स्थित हूँ—) के विरुद्ध यहाँ कहते हैं कि मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। कारण कि यदि मैं उनमें स्थित होता तो उनमें जो परिवर्तन होता है, वह परिवर्तन मेरेमें भी होता; उनका नाश होनेसे मेरा भी नाश होता और उनका अभाव होनेसे मेरा भी अभाव होता। तात्पर्य है कि उनका तो परिवर्तन, नाश और अभाव होता है; परन्तु मेरेमें कभी किंचिन्मात्र भी विकृति नहीं आती। मैं उनमें सब तरहसे व्याप्त रहता हुआ भी उनसे निर्लिप्त हूँ, उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित हूँ। मैं तो निर्विकाररूपसे अपने-आपमें ही स्थित हूँ।
वास्तवमें ‘मैं उनमें स्थित हूँ’—ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि मेरी सत्तासे ही उनकी सत्ता है, मेरे होनेपनसे ही उनका होनापन है। यदि मैं उनमें न होता, तो जगत्की सत्ता ही नहीं होती। जगत्का होनापन तो मेरी सत्तासे ही दीखता है। इसलिये कहा कि मैं उनमें स्थित हूँ।
‘न च मत्स्थानि भूतानि’*—अब भगवान् दूसरी बात—(सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं—) के विरुद्ध यहाँ कहते हैं कि वे प्राणी मेरेमें स्थित नहीं हैं। कारण कि अगर वे प्राणी मेरेमें स्थित होते तो मैं जैसा निरन्तर निर्विकाररूपसे ज्यों-का-त्यों रहता हूँ, वैसा संसार भी निर्विकाररूपसे ज्यों-का-त्यों रहता। मेरा कभी उत्पत्ति-विनाश नहीं होता, तो संसारका भी उत्पत्ति-विनाश नहीं होता। एक देशमें हूँ और एक देशमें नहीं हूँ, एक कालमें हूँ और एक कालमें
नहीं हूँ, एक व्यक्तिमें हूँ और एक व्यक्तिमें नहीं हूँ—ऐसी परिच्छिन्नता मेरेमें नहीं है, तो संसारमें भी ऐसी परिच्छिन्नता नहीं होती। तात्पर्य है कि निर्विकारता, नित्यता, व्यापकता, अविनाशीपन आदि जैसे मेरेमें हैं, वैसे ही उन प्राणियोंमें भी होते। परन्तु ऐसी बात नहीं है। मेरी स्थिति निरन्तर रहती है और उनकी स्थिति निरन्तर नहीं रहती, तो इससे सिद्ध हुआ कि वे मेरेमें स्थित नहीं हैं।
अब उपर्युक्त विधिपरक और निषेधपरक चारों बातोंको दूसरी रीतिसे इस प्रकार समझे। संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है; तथा परमात्मा संसारमें नहीं हैं और संसार परमात्मामें नहीं है। जैसे, अगर तरंगकी सत्ता मानी जाय तो तरंगमें जल है और जलमें तरंग है। कारण कि जलको छोड़कर तरंग रह ही नहीं सकती। तरंग जलसे ही पैदा होती है, जलमें ही रहती है और जलमें ही लीन हो जाती है; अतः तरंगका आधार, आश्रय केवल जल ही है। जलके बिना उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इसलिये तरंगमें जल है और जलमें तरंग है। ऐसे ही संसारकी सत्ता मानी जाय तो संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है। कारण कि परमात्माको छोड़कर संसार रह ही नहीं सकता। संसार परमात्मासे ही पैदा होता है, परमात्मामें ही रहता है और परमात्मामें ही लीन हो जाता है। परमात्माके सिवाय संसारकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इसलिये संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है।
अगर तरंग उत्पन्न और नष्ट होनेवाली होनेसे तथा जलके सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता न होनेसे तरंगकी सत्ता न मानी जाय, तो न तरंगमें जल है और न जलमें तरंग है अर्थात् केवल जल-ही-जल है और जल ही तरंगरूपसे दीख रहा है। ऐसे ही संसार उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होनेसे तथा परमात्माके सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता न होनेसे संसारकी सत्ता न मानी जाय, तो न संसारमें परमात्मा हैं और न परमात्मामें संसार है अर्थात् केवल परमात्मा-ही-परमात्मा हैं और परमात्मा ही संसाररूपसे दीख रहे हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे तत्त्वसे एक जल ही है, तरंग नहीं है, ऐसे ही तत्त्वसे एक परमात्मा ही है, संसार नहीं है—‘वासुदेवः सर्वम्’ (७। १९)।
अब कार्य-कारणकी दृष्टिसे देखें तो जैसे मिट्टीसे बने हुए जितने बर्तन हैं, उन सबमें मिट्टी ही है; क्योंकि वे मिट्टीसे ही बने हैं, मिट्टीमें ही रहते हैं और मिट्टीमें ही लीन
- ‘न च मत्स्थानि भूतानि’ का दूसरा भाव यह भी है कि वे प्राणी अपनेको मेरेमें स्थित नहीं मानते, प्रत्युत अपनेको प्रकृतिमें स्थित मानते हैं। इसलिये वे मेरेमें स्थित नहीं हैं।
६३२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
होते हैं अर्थात् उनका आधार मिट्टी ही है। इसलिये बर्तनोंमें मिट्टी है और मिट्टीमें बर्तन हैं। परन्तु वास्तवमें देखा जाय तो बर्तनोंमें मिट्टी और मिट्टीमें बर्तन नहीं हैं। अगर बर्तनोंमें मिट्टी होती, तो बर्तनोंके मिट्टेनेपर मिट्टी भी मिट जाती। परन्तु मिट्टी मिटती ही नहीं। अतः मिट्टी मिट्टीमें ही रही अर्थात् अपने-आपमें ही स्थित रही। ऐसे ही अगर मिट्टीमें बर्तन होते, तो मिट्टीके रहनेपर बर्तन हरदम रहते। परन्तु बर्तन हरदम नहीं रहते। इसलिये मिट्टीमें बर्तन नहीं हैं। ऐसे ही संसारमें परमात्मा और परमात्मामें संसार रहते हुए भी संसारमें परमात्मा और परमात्मामें संसार नहीं है। कारण कि अगर संसारमें परमात्मा होते तो संसारके मिट्टेनेपर परमात्मा भी मिट जाते। परन्तु परमात्मा मिटते ही नहीं। इसलिये संसारमें परमात्मा नहीं हैं। परमात्मा तो अपने-आपमें स्थित हैं। ऐसे ही परमात्मामें संसार नहीं है। अगर परमात्मामें संसार होता तो परमात्माके रहनेपर संसार भी रहता; परन्तु संसार नहीं रहता। इसलिये परमात्मामें संसार नहीं है।
जैसे, किसीने हरिद्वारको याद किया तो उसके मनमें हरिकी पैड़ी दीखने लग गयी। बीचमें घण्टाघर बना हुआ है। उसके दोनों ओर गंगाजी बह रही हैं। सीढ़ियोंपर लोग स्नान कर रहे हैं। जलमें मछलियाँ उछल-कूद मचा रही हैं। यह सब-का-सब हरिद्वार मनमें है। इसलिये हरिद्वारमें बना हुआ सब कुछ (पत्थर, जल, मनुष्य, मछलियाँ आदि) मन ही है। परन्तु जहाँ चिन्तन छोड़ा, वहाँ फिर हरिद्वार नहीं रहा, केवल मन-ही-मन रहा। ऐसे ही परमात्माने 'बहु स्यां प्रजायेय' संकल्प किया, तो संसार प्रकट हो गया। उस संसारके कण-कणमें परमात्मा ही रहे और संसार परमात्मामें ही रहा; क्योंकि परमात्मा ही संसाररूपमें प्रकट हुए हैं। परन्तु जहाँ परमात्माने संकल्प छोड़ा, वहाँ फिर संसार नहीं रहा, केवल परमात्मा-ही-परमात्मा रहे।
तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मा हैं और संसार हैं—इस दृष्टिसे देखा जाय तो संसारमें परमात्मा और परमात्मामें संसार है। परन्तु तत्वकी दृष्टिसे देखा जाय तो न संसारमें परमात्मा हैं और न परमात्मामें संसार है; क्योंकि वहाँ संसारकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। वहाँ तो केवल
परमात्मा-ही-परमात्मा हैं—'वासुदेवः सर्वम्'। यही जीवन्मुक्तोंकी, भक्तोंकी दृष्टि है।
'पश्य मे योगमेश्वरम्'—मैं सम्पूर्ण जगत्में और सम्पूर्ण जगत् मेरेमें होता हुआ भी सम्पूर्ण जगत् मेरेमें नहीं है और मैं सम्पूर्ण जगत्में नहीं हूँ अर्थात् मैं संसारसे सर्वथा निलिप्त हूँ, अपने-आपमें ही स्थित हूँ—मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योगको अर्थात् प्रभाव-(सामर्थ्य-) को देख। तात्पर्य है कि मैं एक ही अनेकरूपसे दीखता हूँ और अनेकरूपसे दीखता हुआ भी मैं एक ही हूँ; अतः केवल मैं-ही-मैं हूँ।
'पश्य' क्रियाके दो अर्थ होते हैं—जानना और देखना। जानना बुद्धिसे और देखना नेत्रोंसे होता है। भगवान्के योग-(प्रभाव-) को जाननेकी बात यहाँ आयी है और उसे देखनेकी बात ग्यारहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें आयी है।
'भूतभुन च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः'—मेरा जो स्वरूप है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंको पैदा करनेवाला, सबको धारण करनेवाला तथा उनका भरण-पोषण करने-वाला है। परन्तु मैं उन प्राणियोंमें स्थित नहीं हूँ अर्थात् मैं उनके आश्रित नहीं हूँ, उनमें लिप्त नहीं हूँ। इसी बातको भगवान्ने पंद्रहवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें कहा है कि क्षर (जगत्) और अक्षर (जीवात्मा)—दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जिसको 'परमात्मा' नामसे कहा गया है और जो सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त होकर सबका भरण-पोषण करता हुआ सबका शासन करता है।
तात्पर्य यह हुआ कि जैसे मैं सबको उत्पन्न करता हुआ और सबका भरण-पोषण करता हुआ भी अहंता-ममतासे रहित हूँ और सबमें रहता हुआ भी उनके आश्रित नहीं हूँ, उनसे सर्वथा निलिप्त हूँ। ऐसे ही मनुष्यको चाहिये कि वह कुटुम्ब-परिवारका भरण-पोषण करता हुआ और सबका प्रबन्ध, संरक्षण करता हुआ उनमें अहंता-ममता न करे और जिस-किसी देश, काल, परिस्थितिमें रहता हुआ भी अपनेको उनके आश्रित न माने अर्थात् सर्वथा निलिप्त रहे।
भक्तके सामने जो कुछ परिस्थिति आये, जो कुछ घटना घटे, मनमें जो कुछ संकल्प-विकल्प आये, उन सबमें
- यहाँ 'योग' शब्द 'युज् संयमने' धातुसे बना हुआ लिया गया है; क्योंकि सम्पूर्ण संसारका संयमन भगवान् ही करते हैं। ऐसे तो यमराज भी प्राणियोंके पाप-पुण्योंके अनुसार उनका संयमन करते हैं; परन्तु वे तो एक मृत्युलोकके प्राणियोंका ही संयमन करते हैं, जब कि भगवान् अनन्त ब्रह्माण्डोंका तथा उनमें अलग-अलग नियुक्त किये हुए यमराजोंका भी संयमन करते हैं। इस संयमन करनेकी शक्तिका नाम ही यहाँ योग, सामर्थ्य, प्रभाव है। यह योग, सामर्थ्य, प्रभाव पूर्णरूपसे केवल भगवान्में ही होता है।
श्लोक ४-५]
- साधक-संजीवनी *
६३३
उसको भगवान्की ही लीला देखनी चाहिये। भगवान् ही कभी उत्पत्तिकी लीला, कभी स्थितिकी लीला और कभी संहारकी लीला करते हैं। यह सब संसार स्वरूपसे तो भगवान्का ही रूप है और इसमें जो परिवर्तन होता है, वह सब भगवान्की ही लीला है—इस तरह भगवान् और उनकी लीलाको देखते हुए भक्तको हरदम प्रसन्न रहना चाहिये।
मार्मिक बात
‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—इस बातको खूब गहरा उतरकर समझनेसे साधकको इसका यथार्थ अनुभव हो जाता है। यथार्थ अनुभव होनेकी कसौटी यह है कि अगर उसकी कोई प्रशंसा करे कि ‘आपका सिद्धान्त बहुत अच्छा है’ आदि, तो उसको अपनेमें बड़प्पनका अनुभव नहीं होना चाहिये। संसारमें कोई आदर करे या निरादर—इसका भी
साधकपर असर नहीं होना चाहिये। अगर कोई कह दे कि ‘संसार नहीं है और परमात्मा हैं—यह तो आपकी कोरी कल्पना है और कुछ नहीं’ आदि, तो ऐसी काट-छाँटसे साधकको किंचिन्मात्र भी बुरा नहीं लगना चाहिये। उग बातको सिद्ध करनेके लिये दृष्टान्त देनेकी, प्रमाण खोजनेकी इच्छा ही नहीं होनी चाहिये और कभी भी ऐसा भाव नहीं होना चाहिये कि ‘यह हमारा सिद्धान्त है, यह हमारी मान्यता है, इसको हमने ठीक समझा है’ आदि। अपने सिद्धान्तके विरुद्ध कोई कितना ही विवेचन करे, तो भी अपने सिद्धान्तमें किसी कमीका अनुभव नहीं होना चाहिये और अपनेमें कोई विकार भी पैदा नहीं होना चाहिये। अपना यथार्थ अनुभव स्वाभाविकरूपसे सदा-सर्वदा अटल और अखण्डरूपसे बना रहना चाहिये। इसके विषयमें साधकको कभी सोचना ही नहीं पड़े।
परिशिष्ट भाव—‘मया तत्मिदं सर्वम्’ कहनेका तात्पर्य है कि बर्फमें जलकी तरह संसारमें सत्ता (‘है’)—रूपसे एक सम, शान्त, सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है। जिसका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है, उस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। अज्ञानके कारण संसारमें जो सत्ता प्रतीत हो रही है, वह भी परमात्मतत्त्वकी सत्ताके कारण ही है। जब सबमें एक अविभक्त सत्ता (‘है’) ही परिपूर्ण है तो फिर उसमें मैं, तू, यह और वह—ये चार विभाग कैसे हो सकते हैं? अहंता और ममता कैसे हो सकती है? राग-द्वेष कैसे हो सकते हैं? जिसकी सत्ता ही नहीं है, उसको मिटानेका अभ्यास भी कैसे हो सकता है?
भगवान्ने ‘मत्स्थानि सर्वभूतानि ’ के लिये ‘न च मत्स्थानि भूतानि ’ पद कहे हैं और ‘मया तत्मिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ’ के लिये ‘न चाहं तेष्ववस्थितः ’ पद कहे हैं। जबतक साधकमें यह भाव है कि परमात्मा और संसार दो हैं, तबतक उसको यह समझना चाहिये कि परमात्मामें संसार है और संसारमें परमात्मा हैं (गीता—छठे अध्यायका तीसवाँ श्लोक)। परन्तु जब दोका भाव न हो, तब न परमात्मामें संसार है और न संसारमें परमात्मा हैं।
संसारको स्वतन्त्र सत्ता जीवने ही दी है—‘ययेदं धार्यते जगत् ’ (गीता ७।५) संसारकी स्वतन्त्र सत्ता अहंता, ममता और कामनाके कारण ही है। अतः जबतक अहंता, ममता और कामना है, तबतक (साधककी दृष्टिमें) परमात्मामें संसार है और संसारमें परमात्मा हैं। परन्तु अहंता, ममता और कामनाके मिटनेपर (सिद्धकी दृष्टिमें) न परमात्मामें संसार है, न संसारमें परमात्मा हैं अर्थात् परमात्मा-ही-परमात्मा हैं—‘वासुदेवः सर्वम् ’।
परमात्मामें संसार है, संसारमें परमात्मा हैं—यह ‘ज्ञान’ है और न परमात्मामें संसार है, न संसारमें परमात्मा हैं अर्थात् परमात्माके सिवाय कुछ नहीं है—यह ‘विज्ञान’ है।
श्रीमद्भागवतमें आया है कि जबतक साधककी दृष्टिमें जगत्की स्वतन्त्र सत्ता है, तबतक वह अपने बर्तावके द्वारा प्राणियोंमें भगवद्बुद्धिसे उपासना करे। परन्तु जब उसकी दृष्टिमें जगत्की सत्ता न रहे अर्थात् केवल भगवान् ही रह जायें, तब ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इस चिन्तनसे भी उपराम हो जायें।
१-यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावे नोपजायते। तावदेवमुपासीत वाङ्मनःकायवृत्तिभिः॥
(श्रीमद्भा० ११।२१।१७)
‘जबतक सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरा भाव अर्थात् ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’ ऐसा वास्तविक भाव न होने लगे, तबतक इस प्रकार मन, वाणी और शरीरकी सभी वृत्तियों-(बर्ताव- ) से मेरी उपासना करता रहे।’
२-सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्मनीषया। परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशयः॥
(श्रीमद्भा० ११।२१।१८)
६३४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
‘भूतभून् च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः’—भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करते हैं—‘अहं सर्वस्य प्रभवः’ (गीता १०।८), ‘अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः’ (गीता ७।६)। उन प्राणियोंका भरण-पोषण भी भगवान् ही करते हैं—‘यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः’ (गीता १५।१७)। सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करने तथा उनका भरण-पोषण करते हुए भी भगवान् उनमें लिप्त, आसक्त नहीं होते, उनके आश्रित नहीं होते। भगवान् उन प्राणियोंमें स्थित नहीं हैं; अतः उन प्राणियों और पदार्थोंमें आसक्त होनेसे भगवान्की प्राप्ति नहीं होती।
वास्तवमें एक चिन्मय सत्ताके सिवाय जड़ताकी सत्ता है ही नहीं—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २।१६)। जड़ता-(संसार-) की सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध केवल कामना-(भोगेच्छा-) के कारण ही है। अतः जबतक सुखकी इच्छा है, तभीतक यह संसार है।
जो परमात्मामें संसारको देखते हैं अर्थात् संसारको परमात्मरूपसे न देखकर संसाररूपसे (जड़) देखते हैं, वे नास्तिक होते हैं। परन्तु जो संसारमें परमात्माको देखते हैं अर्थात् संसारको संसाररूपसे न देखकर परमात्मरूपसे (चिन्मय) देखते हैं, वे आस्तिक होते हैं।
सम्बन्ध—अब भगवान् पीछेके दो श्लोकोंमें कही हुई बातोंको दृष्टान्तद्वारा स्पष्ट करते हैं।
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥
| यथा | = जैसे | नित्यम् | = नित्य ही | भूतानि | = प्राणी |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वत्रगः | = सब जगह | आकाश- | = आकाशमें स्थित | मत्स्थानि | = मुझमें ही स्थित |
| विचरनेवाली | स्थितः | रहती है, | रहते हैं— | ||
| महान् | = महान् | तथा | = ऐसे ही | इति | = ऐसा |
| वायुः | = वायु | सर्वाणि | = सम्पूर्ण | उपधारय | = तुम मान लो। |
व्याख्या—‘यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्’ —जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है अर्थात् वह कहीं निःस्पन्दरूपसे रहती है, कहीं सामान्यरूपसे क्रियाशील रहती है, कहीं बड़े वेगसे चलती है आदि, पर किसी भी रूपसे चलनेवाली वायु आकाशसे अलग नहीं हो सकती। वह वायु कहीं रुकी हुई मालूम देगी और कहीं चलती हुई मालूम देगी, तो भी वह आकाशमें ही रहेगी। आकाशको छोड़कर वह कहीं रह ही नहीं सकती। ऐसे ही तीनों लोकों और चौदह भुवनोंमें घूमनेवाले स्थावर-जंगम सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें ही स्थित रहते हैं—‘तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानि’।
भगवान्ने चौथे श्लोकसे छठे श्लोकतक तीन बार ‘मत्स्थानि’ शब्दका प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि ये सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें ही स्थित हैं। मेरेको छोड़कर ये कहीं जा सकते ही नहीं। ये प्राणी प्रकृति और
प्रकृतिके कार्य शरीर आदिके साथ कितना ही घनिष्ठ सम्बन्ध मान लें, तो भी वे प्रकृति और उसके कार्यसे एक हो सकते ही नहीं; और अपनेको मेरेसे कितना ही अलग मान लें, तो भी वे मेरेसे अलग हो सकते ही नहीं।
वायुको आकाशमें नित्य स्थित बतानेका तात्पर्य यह है कि वायु आकाशसे कभी अलग हो ही नहीं सकती। वायुमें यह किंचिन्मात्र भी शक्ति नहीं है कि वह आकाशसे अलग हो जाय; क्योंकि आकाशके साथ उसका नित्य-निरन्तर घनिष्ठ सम्बन्ध अर्थात् अभिन्नता है। वायु आकाशका कार्य है और कार्यकी कारणके साथ अभिन्नता होती है। कार्य केवल कार्यकी दृष्टिसे देखनेपर कारणसे भिन्न दीखता है; परन्तु कारणसे कार्यकी अलग सत्ता नहीं होती। जिस समय कार्य कारणमें लीन रहता है, उस समय कार्य कारणमें प्रागभावरूपसे अर्थात् अप्रकटरूपसे रहता है, उत्पन्न होनेपर कार्य भावरूपसे अर्थात् प्रकटरूपसे रहता है और लीन
‘पूर्वोक्त साधन करनेवाले भक्तका ‘सब कुछ परमात्मस्वरूप ही है’ ऐसा निश्चय हो जाता है। फिर वह इस अध्यात्मविद्या (ब्रह्मविद्या) द्वारा सब प्रकारसे संशयरहित होकर सब जगह परमात्माको भलीभाँति देखता हुआ उपराम हो जाय अर्थात् ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’ यह चिन्तन भी न रहे, प्रत्युत साक्षात् परमात्मा ही दीखने लगे।’
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
६३५
होनेपर कार्य प्रध्वंसाभावरूपसे अर्थात् कारणरूपसे रहता है। कार्यका प्रध्वंसाभाव नित्य रहता है, उसका कभी अभाव नहीं होता; क्योंकि वह कारणरूप ही हो जाता है। इस रीतिसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही स्थित रहती है और आकाशमें ही लीन हो जाती है अर्थात् वायुकी स्वतन्त्र सत्ता न रहकर आकाश ही रह जाता है। ऐसे ही यह जीवात्मा परमात्मासे ही प्रकट होता है, परमात्मामें ही स्थित रहता है और परमात्मामें ही लीन हो जाता है अर्थात् जीवात्माकी स्वतन्त्र सत्ता न रहकर केवल परमात्मा ही रह जाते हैं।
जैसे वायु गतिशील होती है अर्थात् सब जगह घूमती है, ऐसे यह जीवात्मा गतिशील नहीं होता। परन्तु जब यह गतिशील प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ अपनापन (मैं-मेरापन) कर लेता है, तब शरीरकी गति इसको अपनी गति दीखने लग जाती है। गतिशीलता दीखनेपर भी यह नित्य-निरन्तर परमात्मामें ही स्थित रहता है। इसलिये दूसरे अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भगवान्ने जीवात्माको नित्य, सर्वगत, अचल, स्थान और सनातन बताया है। यहाँ शरीरोंकी गतिशीलताके कारण इसको 'सर्वगत' बताया है। अर्थात् यह सब जगह विचरनेवाला दीखता हुआ भी अचल और स्थान है। यह स्थिर स्वभाववाला है। इसमें हिलने-डुलनेकी क्रिया नहीं है। इसलिये भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि सब प्राणी अटलरूपसे नित्य-निरन्तर मेरेमें ही स्थित हैं।
तात्पर्य हुआ कि तीनों लोक और चौदह भुवनोंमें घूमनेवाले जीवोंकी परमात्मासे भिन्न किंचिन्मात्र भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और हो सकती भी नहीं अर्थात् सब योनियोंमें घूमते रहनेपर भी वे नित्य-निरन्तर परमात्माके सच्चिदानन्दघन-स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। परन्तु प्रकृतिके कार्यके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे इसका अनुभव नहीं हो रहा है। अगर ये मनुष्य-शरीरमें अपनापन न करें, मैं-मेरापन न करें तो इनको असीम आनन्दका अनुभव हो जाय। इसलिये मनुष्यमात्रको चेतावनी देनेके लिये यहाँ भगवान् कहते हैं कि तुम मेरेमें नित्य-निरन्तर स्थित हो, फिर मेरी प्राप्तिमें परिश्रम और देरी किस बातकी ? मेरेमें अपनी स्थिति न माननेसे और न जाननेसे ही मेरेसे दूरी प्रतीत हो रही है।
‘इति उपधारय’ —यह बात तुम विशेषतासे धारण कर लो, मान लो कि चाहे सर्ग-(सृष्टि-) का समय हो, चाहे
प्रलयका समय हो, अनन्त ब्रह्माण्डोंके सम्पूर्ण प्राणी सर्वथा मेरेमें ही रहते हैं; मेरेसे अलग उनकी स्थिति कभी हो ही नहीं सकती। ऐसा दृढ़तासे मान लेनेपर प्रकृतिके कार्यसे विमुखता हो जायगी और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जायगा।
इस वास्तविक तत्त्वका अनुभव करनेके लिये साधक दृढ़तासे ऐसा मान ले कि जो सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें सर्वथा परिपूर्ण हैं, वे परमात्मा ही मेरे हैं। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदि कोई भी मेरा नहीं है और मैं उनका नहीं हूँ।
विशेष बात
सम्पूर्ण जीव भगवान्में ही स्थित रहते हैं। भगवान्में स्थित रहते हुए भी जीवोंके शरीरोंमें उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका क्रम चलता रहता है; क्योंकि सभी शरीर परिवर्तनशील हैं और यह जीव स्वयं अपरिवर्तनशील है। इस जीवकी परमात्माके साथ तात्त्विक एकता है। परन्तु जब यह जीव परमात्मासे विमुख होकर शरीरके साथ अपनी एकता मान लेता है, तब इसे 'मैं'-पनकी स्वतन्त्र सत्ताका भान होने लगता है कि 'मैं शरीर हूँ।' इस 'मैं'-पनमें एक तो परमात्माका अंश है और एक प्रकृतिका अंश है—यह जीवका स्वरूप हुआ। जीव अंश तो है परमात्माका, पर पकड़ लेता है प्रकृतिके अंशको।
इस 'मैं'-पनमें जो प्रकृतिका अंश है, वह स्वतः ही प्रकृतिकी तरफ खिंचता है। परन्तु प्रकृतिके अंशके साथ तादात्म्य होनेसे परमात्माका अंश जीव उस खिंचावको अपना खिंचाव मान लेता है और 'मुझे सुख मिल जाय, धन मिल जाय, भोग मिल जाय'—ऐसा भाव कर लेता है। ऐसा भाव करनेसे वह परमात्मासे विशेष विमुख हो जाता है। उसमें 'संसारका सुख हरदम रहे; पदार्थोंका संयोग हरदम रहे; यह शरीर मेरे साथ और मैं शरीरके साथ सदा रहूँ'—ऐसी जो इच्छा रहती है, यह इच्छा वास्तवमें परमात्माके साथ रहनेकी है; क्योंकि उसका नित्य सम्बन्ध तो परमात्माके साथ ही है।
जीव शरीरोंके साथ कितना ही घुल-मिल जाय, पर परमात्माकी तरफ उसका खिंचाव कभी मिटता नहीं, मिटनेकी सम्भावना ही नहीं। 'मैं नित्य-निरन्तर रहूँ, सदा रहूँ, सदा सुखी रहूँ तथा मुझे सर्वोपरि सुख मिले'—इस रूपमें परमात्माका खिंचाव रहता ही है। परन्तु उससे भूल यह होती है कि वह (जड़-अंशकी मुख्यातासे) इस सर्वोपरि
६३६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
सुखको जड़के द्वारा ही प्राप्त करनेकी इच्छा करता है। वह भूलसे उस सुखको चाहने लगता है, जिस सुखपर उसका अधिकार नहीं है। अगर वह सजग, सावधान हो जाय और 'भोगोंमें कोई सुख नहीं है, आजतक कोई-सा भी संयोग नहीं रहा, रहना सम्भव ही नहीं'—ऐसा समझ ले, तो सांसारिक संयोगजन्य सुखकी इच्छा मिट जायगी और
परिशिष्ट भाव —जैसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही स्थित रहती है तथा आकाशमें ही लीन हो जाती है अर्थात् आकाशको छोड़कर वायुकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी भगवान्से ही उत्पन्न होते हैं, भगवान्में ही स्थित रहते हैं तथा भगवान्में ही लीन हो जाते हैं अर्थात् भगवान्को छोड़कर प्राणियोंकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं—इस बातको साधक दृढ़तासे स्वीकार कर ले तो उसको 'सब कुछ भगवान् ही हैं' इस वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जायगा।
इस श्लोकको समझनेके लिये कार्य-कारणभाव जैसा ठीक बैठता है, वैसा विवर्तवाद ठीक नहीं बैठता। 'विवर्त' का अर्थ है— विरुद्ध बर्ताव। जो नहीं है और दीखता है, जैसे रस्सीमें साँप दीखना—यह विवर्तवाद है। विवर्तवादमें दो सत्ता होना आवश्यक है; जैसे—रस्सी और उसमें दीखनेवाला साँप—दोनोंकी अलग-अलग (व्यावहारिक और प्रातिभासिक) सत्ता है। परन्तु गीताके इस श्लोकमें आकाश और वायुका दृष्टान्त दिया गया है, जो दोनों एक ही (व्यावहारिक) सत्ता है। तात्पर्य है कि रस्सीमें साँपकी तरह आकाशमें वायु अध्यक्ष नहीं है अथवा आकाशमें वायुकी प्रतीतिमात्र नहीं है, प्रत्युत वायु आकाशका कार्य है। कार्यकी कारणके साथ अभिन्नता होती है अर्थात् कार्य और कारणकी एक सत्ता होती है; जैसे—सोना और उसका कार्य गहने—दोनोंकी एक सत्ता है। अतः जैसे सोना और गहने—दोनोंमें तत्त्वसे एक सोना-ही-सोना है, ऐसे ही परमात्मा और सम्पूर्ण प्राणी—दोनोंमें तत्त्वसे एक परमात्मा-ही-परमात्मा है। इसी बातको गीताने 'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९) और 'सदसच्चाहम्' (९।१९) पदोंसे कहा है, जो गीताका खास सिद्धान्त है। विवर्तवाद सिद्धान्त नहीं है, प्रत्युत संसारमें सत्यत्वबुद्धि हटानेका एक साधन है।
अगर वायु स्पन्दित हो तो वायुमें आकाश है और आकाशमें वायु है। अगर वायु स्पन्दित न हो तो न वायुमें आकाश है, न आकाशमें वायु है अर्थात् आकाश-ही-आकाश है। दूसरे शब्दोंमें, जबतक वायुकी स्वतन्त्र सत्ताकी मान्यता है, तबतक आकाशमें वायु और वायुमें आकाश है। परन्तु तात्त्विक दृष्टिसे देखें तो न आकाशमें वायु है, न वायुमें आकाश है अर्थात् आकाश-ही-आकाश है। इसी तरह तात्त्विक दृष्टिसे न परमात्मामें प्राणी हैं, न प्राणियोंमें परमात्मा है अर्थात् परमात्मा-ही-परमात्मा है (गीता—इसी अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)।
इस श्लोकमें वायुके लिये दो पद आये हैं—'सर्वत्रगः' और 'महान्'। इससे यह समझना चाहिये कि जीवात्मा भी संसारकी दृष्टिसे (प्रकृतिके सम्बन्धसे) चौरासी लाख योनियाँ, तीन लोक, चौदह भुवन आदिमें घूमनेके कारण 'सर्वत्रगः' है। 'महान्' पदसे अनन्त ब्रह्माण्डोंके सभी जीव (जीव-समुदाय) समझना चाहिये। जैसे वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है अर्थात् वायुका आकाशके साथ नित्य सम्बन्ध है, ऐसे ही जीवमात्रका परमात्माके साथ नित्य सम्बन्ध (नित्ययोग) है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सम्पूर्ण प्राणियोंकी स्थिति अपनेमें बतायी, पर उनके महासर्ग और महाप्रलयका वर्णन करना बाकी रह गया। अतः उसका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
| कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन ! | (महाप्रलय- | मामिकाम् | = मेरी |
|---|---|---|---|---|
| कल्पक्षये | = कल्पाँका क्षय | के समय) | प्रकृतिम् | = प्रकृतिको |
| होनेपर | सर्वभूतानि | = सम्पूर्ण प्राणी | यान्ति |
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
६३७
कल्यादी | = कल्पोंके आदिमें (महासर्गके समय) | अहम् | = मैं | तानि | = उनकी ---|---|---|---|---|--- | | पुनः | = फिर | विमुजामि | = रचना करता हूँ।
व्याख्या— ‘सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकां कल्पक्षये’—सम्पूर्ण प्राणी मेरे ही अंश हैं और सदा मेरेमें ही स्थित रहनेवाले हैं। परन्तु वे प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदिके साथ तादात्म्य (मैं-मेरेपनका सम्बन्ध) करके जो कुछ भी कर्म करते हैं, उन कर्मों तथा उनके फलोंके साथ उनका सम्बन्ध जुड़ता जाता है, जिससे वे बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। जब महाप्रलयका समय आता है (जिसमें ब्रह्माजी सौ वर्षकी आयु पूरी होनेपर लीन हो जाते हैं), उस समय प्रकृतिके परवश हुए वे सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिजन्म सम्बन्धको लेकर अर्थात् अपने-अपने कर्मोंको लेकर मेरी प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं। महासर्गके समय प्राणियोंका जो स्वभाव होता है, उसी स्वभावको लेकर वे महाप्रलयमें लीन होते हैं।
‘पुनस्तानि कल्यादी विमुजाम्यहम्’ —महाप्रलयके समय अपने-अपने कर्मोंको लेकर प्रकृतिमें लीन हुए प्राणियोंके कर्म जब परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं, तब प्रभुके मनमें ‘बहु स्यां प्रजायेय’ ऐसा संकल्प हो जाता है। यही महासर्गका आरम्भ है। इसीको आठवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहा है—‘भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्चितः ’ अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंका जो होनापन है, उसको प्रकट करनेके लिये भगवान्का जो संकल्प है, यही विसर्ग (त्याग) है और यही आदिकर्म है। चौदहवें अध्यायमें इसीको ‘गर्भं दधाम्यहम् ’ (१४।३) और ‘अहं बीजप्रदः पिता ’ (१४।४) कहा है।
तात्पर्य यह हुआ कि कल्पोंके आदिमें अर्थात् महासर्गके आदिमें ब्रह्माजीके प्रकट होनेपर मैं पुनः प्रकृतिमें लीन हुए, प्रकृतिके परवश हुए, उन जीवोंका उनके कर्मोंके अनुसार उन-उन योनियों-(शरीरों-) के साथ विशेष सम्बन्ध करा देता हूँ—यह मेरा उनको रचना है। इसीको भगवान्ने चौथे अध्यायके तेरहवें श्लोकमें कहा है—‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ’ अर्थात् मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है।
परिशिष्ट भाव— सृष्टिमें तीन बातें मुख्य हैं—उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय। साधककी दृष्टि संसारकी स्थितिकी तरफ ही रहती है, इसलिये पहले पूर्वश्लोकमें स्थितिकी बात कहकर अब भगवान् इस श्लोकमें उत्पत्ति और प्रलयकी बात कहते हैं। तात्पर्य है कि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—तीनों ही समग्र परमात्मासे होते हैं।
ब्रह्माजीके एक दिनका नाम ‘कल्प’ है, जो मानवीय एक हजार चतुर्युगीका होता है। इतने ही समयको ब्रह्माजीकी एक रात होती है। इस हिसाबसे ब्रह्माजीकी आयु सौ वर्षकी होती है। ब्रह्माजीकी आयु समाप्त होनेपर जब ब्रह्माजी लीन हो जाते हैं, उस महाप्रलयको यहाँ ‘कल्पक्षये ’ पदसे कहा गया है। जब ब्रह्माजी पुनः प्रकट होते हैं, उस महासर्गको यहाँ ‘कल्यादी ’ पदसे कहा गया है।
यहाँ ‘सर्वभूतानि प्रकृतिं यान्ति ’ महाप्रलयमें तो जीव स्वयं प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और ‘तानि कल्यादी विमुजामि ’ महासर्गके आदिमें मैं उनकी रचना करता हूँ—ये दो प्रकारकी क्रियाएँ देनेका तात्पर्य है कि क्रियाशील होनेसे प्रकृति स्वयं लयकी तरफ जाती है अर्थात् क्रिया करते-करते थकावट होती है तो प्रकृतिका परमात्मामें लय होता है। ऐसी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखनेसे महाप्रलयके समय प्राणी भी स्वयं प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं और प्रकृति परमात्मामें लीन हो जाती है। महासर्गके आदिमें उनके परिपक्व कर्मोंका फल देकर उनको शुद्ध करनेके लिये मैं उनके शरीरोंकी रचना करता हूँ। रचना उन्हीं प्राणियोंकी करता हूँ, जो कि प्रकृतिके परवश हुए हैं। जैसे मकानका निर्माण तो किया जाता है, पर वह धीरे-धीरे स्वतः गिर जाता है, ऐसे ही सृष्टिकी रचना तो भगवान् करते हैं, पर प्रलय स्वतः होता है। इससे सिद्ध हुआ कि प्रकृतिके कार्य-(संसार-शरीर-) की रचनामें तो भगवान्का हाथ होता है; पर प्रकृतिका कार्य ह्रासकी तरफ स्वतः जाता है। ऐसे ही भगवान्का अंश होनेके कारण जीव स्वतः भगवान्की तरफ, उत्थानकी तरफ जाता है। परन्तु जब वह कामना, ममता, आसक्ति करके स्वतः पतन-(ह्रास-) की तरफ जानेवाले नाशवान् शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह पतनकी तरफ चला जाता है। इसलिये मनुष्यको अपने विवेकको महत्त्व देकर तत्परतासे अपना उत्थान करना चाहिये अर्थात् कामना, ममता, आसक्तिका त्याग करके केवल भगवान्के ही सम्मुख हो जाना चाहिये।
६३८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
वास्तवमें संसारकी स्थिति है ही नहीं, प्रत्युत उत्पत्ति और प्रलयके प्रवाहको ही स्थिति कह देते हैं। तात्त्विक दृष्टिसे देखें तो संसारकी उत्पत्ति भी नहीं है, प्रत्युत प्रलय-ही-प्रलय अर्थात् अभाव-ही-अभाव है। अतः संसारका प्रलय, अभाव अथवा वियोग ही मुख्य है—‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २।१६)।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥
| प्रकृतेः | = प्रकृतिके | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण | प्रकृतिम् | = प्रकृतिको |
|---|---|---|---|---|---|
| वशात् | = वशमें होनेसे | भूतग्रामम् | = प्राणिसमुदायकी | ||
| (कल्पोंके आदिमें) | अवष्टभ्य | = वशमें करके | |||
| अवशम् | = परतन्त्र हुए | स्वाम् | = (मैं) अपनी | पुनः, पुनः | = बार-बार |
| इमम् | = इस | विसृजामि | = रचना करता हूँ। |
व्याख्या— भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्—यहाँ ‘प्रकृति’ शब्द व्यक्ति प्रकृतिका वाचक है। महाप्रलयके समय सभी प्राणी अपनी व्यक्ति प्रकृति-(कारणशरीर-) में लीन हो जाते हैं, व्यक्ति प्रकृति समष्टि प्रकृतिमें लीन होती है और समष्टि प्रकृति परमात्मामें लीन हो जाती है। परन्तु जब महासर्गका समय आता है, तब जीवोंके कर्म फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं। उस उन्मुखताके कारण भगवान्में ‘बहुस्यां प्रजायेय’ (छान्दोग्य० ६।२।३)—यह संकल्प होता है, जिससे समष्टि प्रकृतिमें श्लोभ (हलचल) पैदा हो जाता है। जैसे, दहीको बिलोया जाय तो उसमें मक्खन और छाछ—ये दो चीजें पैदा हो जाती हैं। मक्खन तो ऊपर आ जाता है और छाछ नीचे रह जाती है। यहाँ मक्खन सात्त्विक है, छाछ तामस है और बिलोनारूप क्रिया राजस है। ऐसे ही भगवान्के संकल्पसे प्रकृतिमें श्लोभ हुआ तो प्रकृतिसे सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गुण पैदा हो गये। उन तीनों गुणोंसे स्वर्ग, मृत्यु और पाताल—ये तीनों लोक पैदा हुए। उन तीनों लोकोंमें भी अपने-अपने गुण, कर्म और स्वभावसे सात्त्विक, राजस और तामस जीव पैदा हुए अर्थात् कोई सत्त्व-प्रधान हैं, कोई रजःप्रधान हैं और कोई तमःप्रधान हैं।
इसी महासर्गका वर्णन चौदहवें अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें भी किया गया है। वहाँ परमात्माकी प्रकृतिको ‘महद्वब्रह्म’ कहा गया है और परमात्माके अंश जीवोंका अपने-अपने गुण, कर्म और स्वभावके अनुसार प्रकृतिके साथ विशेष सम्बन्ध करा देनेको बीज-स्थापन करना कहा गया है।
ये जीव महाप्रलयके समय प्रकृतिमें लीन हुए थे, तो तत्त्वतः प्रकृतिका कार्य प्रकृतिमें लीन हुआ था और
परमात्माका अंश—चेतन-समुदाय परमात्मामें लीन हुआ था। परन्तु वह चेतन-समुदाय अपने गुणों और कर्मोंके संस्कारोंको साथ लेकर ही परमात्मामें लीन हुआ था, इसलिये परमात्मामें लीन होनेपर भी वह मुक्त नहीं हुआ। अगर वह लीन होनेसे पहले गुणोंका त्याग कर देता, तो परमात्मामें लीन होनेपर सदाके लिये मुक्त हो जाता, जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूट जाता। उन गुणोंका त्याग न करनेसे ही उसका महासर्गके आदिमें अलग-अलग योनियोंके शरीरोंके साथ सम्बन्ध हो जाता है अर्थात् अलग-अलग योनियोंमें जन्म हो जाता है।
अलग-अलग योनियोंमें जन्म होनेमें इस चेतन-समुदायकी व्यक्ति प्रकृति अर्थात् गुण, कर्म आदिसे माने हुए स्वभावकी परवशता ही कारण है। आठवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जो परवशता बतायी गयी है, वह भी व्यक्ति प्रकृतिकी है। तीसरे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें जो अवशता बतायी गयी है, वह जन्म होनेके बादकी परवशता है। यह परवशता तीनों लोकोंमें है। इसी परवशताका चौदहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें गुणोंकी परवशताके रूपमें वर्णन हुआ है।
‘प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य’ —प्रकृति परमात्माकी एक अनिवर्चनीय अलौकिक विलक्षण शक्ति है। इसको परमात्मासे भिन्न भी नहीं कह सकते और अभिन्न भी नहीं कह सकते। ऐसी अपनी प्रकृतिको स्वीकार करके परमात्मा महासर्गके आदिमें प्रकृतिके परवश हुए जीवोंकी रचना करते हैं।
परमात्मा प्रकृतिको लेकर ही सृष्टिकी रचना करते हैं, प्रकृतिके बिना नहीं। कारण कि सृष्टिमें जो परिवर्तन होता है, उत्पत्ति-विनाश होता है, वह सब प्रकृतिमें ही होता है,
श्लोक ९ ]
- साधक-संजीवनी *
६३९
भगवान्में नहीं। अतः भगवान् क्रियाशील प्रकृतिको लेकर ही सृष्टिकी रचना करते हैं। इसमें भगवान्की कोई असमर्थता, पराधीनता, अभाव, कमजोरी आदि नहीं है। जैसे मनुष्यके द्वारा विभिन्न कार्य होते हैं, तो वे विभिन्न करण, उपकरण, इन्द्रियों और वृत्तियोंसे होते हैं। पर यह मनुष्यकी कमजोरी नहीं है, प्रत्युत यह उसका इन करण, उपकरण आदिपर आधिपत्य है, जिससे वह इनके द्वारा कर्म करा लेता है। (हाँ, मनुष्यमें यह कमी है कि वह उन कर्मोंको अपना और अपने लिये मान लेता है, जिससे वह लिप्त हो जाता है अर्थात् अधिपति होता हुआ भी गुलाम हो जाता है।) ऐसे ही भगवान् सृष्टिकी रचना करते हैं तो उनका प्रकृतिपर आधिपत्य ही सिद्ध होता है। पर आधिपत्य होनेपर भी भगवान्में लिप्तता आदि नहीं होती।
परिशिष्ट भाव —तत्त्वसे प्रकृति भगवान्से अभिन्न है। अतः वास्तवमें भगवान्का स्वरूप प्रकृतिसहित ही है। भगवान्को प्रकृतिरहित मानना उनको एकदेशीय मानना है, जो सम्भव ही नहीं है।
‘अवशं प्रकृतेर्वशात्’ —परा प्रकृति अर्थात् स्वयं सर्वथा स्वतन्त्र (स्वस्थ) है। विजातीय अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही वह परतन्त्र (प्रकृतिस्थ) हुआ है, अन्यथा वह परतन्त्र हो सकता ही नहीं। गुणोंका संग होना ही परतन्त्रता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)।
जो प्रकृतिके वशमें (अवश) हैं, उन्हीं प्राणियोंकी भगवान् बार-बार रचना करते हैं। जो प्रकृतिके वशमें (अवश) नहीं हैं, उनकी रचना नहीं होती—‘सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च’ (गीता १४।२)।
सम्बन्ध—आसक्ति और कर्तृत्वाभिमानपूर्वक कर्म करनेसे मनुष्य कर्मोंसे बँध जाता है। भगवान् बार-बार सृष्टि-रचनारूप कर्म करनेसे भी क्यों नहीं बँधते? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥
| धनञ्जय | = हे धनंजय! | च | = और | तानि | = वे |
|---|---|---|---|---|---|
| तेषु | = उन | ||||
| (सृष्टि-रचना आदि) | उदासीनवत् | = उदासीनकी तरह | कर्माणि | = कर्म | |
| कर्मसु | = कर्मोंमें | आसीनम् | = रहते हुए | न | = नहीं |
| असक्तम् | = अनासक्त | माम् | = मुझे | निबध्नन्ति | = बाँधते। |
व्याख्या—‘उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु’ —महासर्गके आदिमें प्रकृतिके परवश हुए प्राणियोंकी उनके कर्मोंके अनुसार विविध प्रकारसे रचनारूप जो कर्म हैं, उसमें मेरी आसक्ति नहीं है। कारण कि मैं उनमें उदासीनकी तरह रहता हूँ अर्थात् प्राणियोंके उत्पन्न होनेपर मैं हर्षित नहीं
‘विसृजामि पुनः पुनः’ —यहाँ ‘वि’ उपसर्गपूर्वक ‘सृजामि’ क्रिया देनेका तात्पर्य है कि भगवान् जिन जीवोंकी रचना करते हैं, वे विविध (अनेक प्रकारके) कर्मोंवाले ही होते हैं। इसलिये भगवान् उनकी विविध प्रकारसे रचना करते हैं अर्थात् स्थावर-जंगम, स्थूल-सूक्ष्म आदि भौतिक शरीरोंमें भी कई पृथ्वीप्रधान, कई तेजप्रधान, कई वायुप्रधान आदि अनेक प्रकारके शरीर होते हैं, उन सबकी भगवान् रचना करते हैं।
यहाँ यह बात समझनेकी है कि भगवान् उन्हीं जीवोंकी रचना करते हैं, जो व्यष्टि प्रकृतिके साथ ‘मैं’ और ‘मेरा’ करके प्रकृतिके वशमें हो गये हैं। व्यष्टि प्रकृतिके परवश होनेसे ही जीव समष्टि प्रकृतिके परवश होता है। प्रकृतिके परवश न होनेसे महासर्गमें उसका जन्म नहीं होता।
होता और उनके प्रकृतिमें लीन होनेपर मैं खिन्न नहीं होता। यहाँ ‘उदासीनवत्’ पदमें जो ‘वत्’ (वति) प्रत्यय है, उसका अर्थ ‘तरह’ होता है; अतः इस पदका अर्थ हुआ—उदासीनकी तरह। भगवान्ने अपनेको उदासीनकी तरह क्यों कहा? कारण कि मनुष्य उसी वस्तुसे उदासीन होता है,
- यहाँ (छठे, सातवें और आठवें श्लोकमें) ‘विसृजामि’ पदसे उत्पत्तिका, ‘मत्स्थानि’ पदसे स्थितिका और ‘प्रकृतिं यानि मामिकां कल्पश्चये’ पदोंसे प्रलयका वर्णन आ गया है।
६४०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
जिस वस्तुकी वह सत्ता मानता है। परन्तु जिस संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होता है, उसकी भगवान्के सिवाय कोई स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। इसलिये भगवान् उस संसारकी रचनारूप कर्मसे उदासीन क्या रहें? वे तो उदासीनकी तरह रहते हैं; क्योंकि भगवान्की दृष्टिमें संसारकी कोई सत्ता ही नहीं है। तात्पर्य है कि वास्तवमें यह सब भगवान्का ही स्वरूप है, इनकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं, तो अपने स्वरूपसे भगवान् क्या उदासीन रहें? इसलिये भगवान् उदासीनकी तरह हैं।
‘न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति’ —पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैं प्राणियोंको बार-बार रचना हूँ, उन रचनारूप कर्मोंको ही यहाँ ‘तानि’ कहा गया है। वे कर्म मेरेको नहीं बाँधते; क्योंकि उन कर्मों और उनके फलोंके साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसा कहकर भगवान्
मनुष्यमात्रको यह शिक्षा देते हैं, कर्म-बन्धनसे छूटनेकी युक्ति बताते हैं कि जैसे मैं कर्मोंमें आसक्त न होनेसे बाँधता नहीं हूँ, ऐसे ही तुमलोग भी कर्मोंमें और उनके फलोंमें आसक्ति न रखो, तो सब कर्म करते हुए भी उनसे बाँधोगे नहीं। अगर तुमलोग कर्मोंमें और उनके फलोंमें आसक्ति रखोगे, तो तुमको दुःख पाना ही पड़ेगा, बार-बार जन्मना-मरना ही पड़ेगा। कारण कि कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है तथा फल भी उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, पर कर्मफलकी इच्छाके कारण मनुष्य बाँध जाता है। यह कितने आश्चर्यकी बात है कि कर्म और उसका फल तो नहीं रहता, पर (फलेच्छाके कारण) बन्धन रह जाता है! ऐसे ही वस्तु नहीं रहती, पर वस्तुका सम्बन्ध (बन्धन) रह जाता है! सम्बन्धी नहीं रहता, पर उसका सम्बन्ध रह जाता है! मूर्खताकी बलिहारी है!!
परिशिष्ट भाव —‘कर्मोंसे मनुष्य बाँधता है ( कर्मणा बध्यते जनतु: )’—इस सांसारिक दृष्टिसे ही भगवान् कहते हैं कि मैं कर्मोंसे नहीं बाँधता (गीता—चौथे अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); क्योंकि मेरेमें न कर्मासक्ति है, न फलासक्ति है और न कर्तृत्व है। परन्तु तात्त्विक दृष्टिसे देखें तो कर्मोंकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं! सृष्टि-रचना-रूप कर्म भगवान्का ही स्वरूप है—‘ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्’ (गीता ७।२९), ‘भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः’ (गीता ८।३)। तात्पर्य है कि सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय आदि जो कुछ हो रहा है, वह सब भगवान्के द्वारा ही हो रहा है तथा भगवान्का ही स्वरूप है। उत्पन्न करनेवाला तथा उत्पन्न होनेवाला, पालन करनेवाला तथा पालित होनेवाला, नाश करनेवाला तथा नष्ट होनेवाला—ये सब एक ही समग्र भगवान्के अंग (स्वरूप) हैं—‘अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा’ (गीता ७।६)।
सब कुछ भगवान् ही हैं, दूसरा कोई है ही नहीं, फिर भगवान् किससे उदासीन हों? इसलिये भगवान्ने अपनेको ‘उदासीनवत्’ अर्थात् उदासीनकी तरह कहा है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें आसक्तिका निषेध करके अब भगवान् कर्तृत्वाभिमानका निषेध करते हैं।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूर्यते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥
| प्रकृतिः | = प्रकृति | जगत्की | हेतुना | = हेतुसे |
|---|---|---|---|---|
| मया | = मेरी | सूर्यते | = रचना करती है। | जगत् |
| अध्यक्षेण | = अध्यक्षतामें | कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन! | विपरिवर्तते |
| सचराचरम् | = चराचरसहित सम्पूर्ण | अनेन | = इसी |
व्याख्या —‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूर्यते सचराचरम्’—मेरेसे सत्ता-स्फूर्ति पाकर ही प्रकृति चर-अचर, जड-चेतन आदि भौतिक सृष्टिको रचती है। जैसे बर्फका जमना, हीटरका जलना, ट्राम और रेलका आना-जाना, लिफ्टका चढ़ना-उतरना, हजारों मील दूरीपर बोले जानेवाले शब्दोंको
सुनना, हजारों मील दूरीपर होनेवाले नाटक आदिको देखना, शरीरके भीतरका चित्र लेना, अल्पसमयमें ही बड़े-से-बड़ा हिसाब कर लेना, आदि-आदि कार्य विभिन्न-विभिन्न यन्त्रोंके द्वारा होते हैं। परन्तु उन सभी यन्त्रोंमें शक्ति बिजलीकी ही होती है। बिजलीकी शक्तिके बिना ये यन्त्र
श्लोक १० ]
- साधक-संजीवनी *
६४९
स्वयं काम कर ही नहीं सकते; क्योंकि उन यन्त्रोंमें बिजलीको छोड़कर कोई सामर्थ्य नहीं है। ऐसे ही संसारमें जो कुछ परिवर्तन हो रहा है अर्थात् अनन्त ब्रह्माण्डोंका सर्जन, पालन और संहार, स्वर्गादि लोकोंमें और नरकोंमें पुण्य-पापके फलका भोग, तरह-तरहकी विचित्र परिस्थितियाँ और घटनाएँ, तरह-तरहकी आकृतियाँ, वेश-भूषा, स्वभाव आदि जो कुछ हो रहा है, वह सब-का-सब प्रकृतिके द्वारा ही हो रहा है; पर वास्तवमें हो रहा है भगवान्की अध्यक्षता अर्थात् सत्ता-स्फूर्तिसे ही। भगवान्की सत्ता-स्फूर्तिके बिना प्रकृति ऐसे विचित्र काम कर ही नहीं सकती; क्योंकि भगवान्को छोड़कर प्रकृतिमें ऐसी स्वतन्त्र सामर्थ्य ही नहीं है कि जिससे वह ऐसे-ऐसे काम कर सके। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे बिजलीमें सब शक्तियाँ हैं, पर वे मशीनोंके द्वारा ही प्रकट होती हैं, ऐसे ही भगवान्में अनन्त शक्तियाँ हैं, पर वे प्रकृतिके द्वारा ही प्रकट होती हैं।
भगवान् संसारकी रचना प्रकृतिको लेकर करते हैं; और प्रकृति संसारकी रचना भगवान्की अध्यक्षतामें करती है। 'भगवान् अध्यक्ष हैं'—इसी हेतुसे जगत्का विविध परिवर्तन होता है—'हेतुनानेन जगद्विपरिवर्तते'। वह विविध परिवर्तन क्या है? जबतक प्राणियोंका प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरोंके साथ 'मैं' और 'मेरा-पन' बना हुआ है, तबतक उनका विविध परिवर्तन होता ही रहता है अर्थात् कभी किसी लोकमें तो कभी किसी लोकमें, कभी किसी शरीरमें तो कभी किसी शरीरमें परिवर्तन होता ही रहता है। तात्पर्य हुआ कि भगवत्प्राप्तिके बिना उन प्राणियोंकी कहीं भी स्थायी स्थिति नहीं होती। वे जन्म-मरणके चक्करमें घूमते ही रहते हैं (गीता—नवें अध्यायका तीसरा श्लोक)।
सभी प्राणी भगवान्में स्थित होनेसे भगवान्को प्राप्त हैं, पर जब वे अपनेको भगवान्में न मानकर प्रकृतिमें मान लेते हैं अर्थात् प्रकृतिके कार्यके साथ 'मैं' और 'मेरा-पन' का सम्बन्ध मान लेते हैं, तब वे प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं। फिर भगवान्की अध्यक्षतामें प्रकृति उनके शरीरोंको
परिशिष्ट भाव —भगवान्से सत्ता-स्फूर्ति पाकर ही प्रकृति चराचरसहित सम्पूर्ण प्राणियोंकी रचना करती है अर्थात् सब परिवर्तन प्रकृतिमें ही होता है, भगवान्में नहीं। जबतक प्राणियोंका प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक प्रकृतिकी परवशताके कारण उनमें विविध परिवर्तन होता रहता है अर्थात् उनकी कहीं भी स्थायी स्थिति नहीं होती, प्रत्युत वे जन्म-मरणके चक्करमें घूमते रहते हैं।
प्रकृति तो परमात्माके अधीन रहकर सम्पूर्ण सृष्टिकी रचना करती है, पर जीव प्रकृतिके अधीन होकर जन्म-मरणके चक्करमें घूमता है। तात्पर्य है कि परमात्मा तो स्वतन्त्र हैं, पर उनका अंश जीवात्मा सुखकी इच्छाके कारण परतन्त्र हो जाता है।
उत्पन्न और लीन करती रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो उन प्राणियोंको उत्पन्न और लीन करनेकी शक्ति प्रकृतिमें नहीं है; क्योंकि वह जड़ है। यह स्वयं भी जन्मता-मरता नहीं; क्योंकि परमात्माका अंश होनेसे स्वयं अविनाशी है, चेतन है, निर्विकार है। परन्तु प्रकृतिजन्म पदार्थोंके साथ मैं-मेरापनका सम्बन्ध जोड़कर, उनके परवश होकर इसको जन्मना-मरना पड़ता है अर्थात् नये-नये शरीर धारण करने और छोड़ने पड़ते हैं।
जगत्-मात्रकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी जो क्रिया होती है, वह सब प्रकृतिसे ही होती है, प्रकृतिमें ही होती है और प्रकृतिकी ही होती है। परन्तु उस प्रकृतिको परमात्मासे ही सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। परमात्मासे सत्ता-स्फूर्ति मिलनेपर भी परमात्मामें कर्तृत्व नहीं आता। जैसे, सूर्यके प्रकाशमें सभी प्राणी सब कर्म करते हैं और उनके कर्मोंमें विहित तथा निषिद्ध सब तरहकी क्रियाएँ होती हैं। उन कर्मोंके अनुसार ही प्राणी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंका अनुभव करते हैं अर्थात् कोई सुखी है तो कोई दुःखी है; कोई ऊँचा है तो कोई नीचा है, कोई किसी लोकमें है तो कोई किसी लोकमें है, कोई किसी वर्ण-आश्रममें है तो कोई किसी वर्ण-आश्रममें है आदि तरह-तरहका परिवर्तन होता है। परन्तु सूर्य और उसका प्रकाश ज्यों-का-त्यों ही रहता है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी कोई अन्तर नहीं आता। ऐसे ही संसारमें विविध प्रकारका परिवर्तन हो रहा है, पर परमात्मा और उनका अंश जीवात्मा ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं। वास्तवमें अपने स्वरूपमें किंचिन्मात्र भी परिवर्तन न है, न हुआ, न होगा और न हो ही सकता है। केवल परिवर्तनशील संसारके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे अर्थात् तादात्म्य, ममता और कामना करनेसे ही संसारका परिवर्तन अपनेमें होता हुआ प्रतीत होता है। अगर प्राणी जिन भगवान्की अध्यक्षतामें सब परिवर्तन होता है, उनके साथ अपनी वास्तविक एकता मान ले (जो कि स्वतःसिद्ध है), तो भगवान्के साथ इसका जो वास्तविक प्रेम है, वह स्वतः प्रकट हो जायगा।