साहित्यदर्पण (आचार्य विश्वनाथ - वाक्यं रसात्मकं काव्यम् सटीक)
Sahityadarpana of Vishwanatha with Hindi Commentary
कविरत्न आचार्य विश्वनाथ / पं. शालिग्राम शास्त्री द्वारा
पृष्ठस्य पङ्क्तौ | पृष्ठस्य पङ्क्तौ वस्तुनो द्वैविध्याख्यानम् २८८ ६ | तत्र, उपक्षेप. ... ३०१ १८ प्रासङ्गिकवस्तुकीर्तनम् २८८ ११ | परिकरः ... ३०२ ६ पताकास्थानम् ... २८८ १६ | परिन्यासः ... ३०२ १२ प्रथमं पताकास्थानम्... २८८ १९ | विलोभनम् ... ३०३ ५ द्वितीयं पताकास्थानम् २८९ ९ | युक्तिः... ... ३०३ ११ तृतीयं पताकास्थानम् २९० १ | प्राप्तिः... ... ३०३ १६ चतुर्थं पताकास्थानम् २९० १४ | समाधानम् ... ३०४ १ कविशिक्षा ... ... २९१ ११ | विधानम् ... ३०४ ९ अर्थोपक्षेपका ... २९२ १६ | परिभावना ... ३०४ १५ विष्कम्भकः ... ... २९३ १ | उद्भेदः ... ३०४ १९ प्रवेशकः ... ... २९३ ८ | करणम् ... ३०५ ४ चूलिका ... ... २९३ १३ | भेदः ... ३०५ ७ अङ्कावतारः ... २९४ ४ | प्रतिमुखसन्धिभेदा. ... ३०५ ११ अङ्कमुखम् ... ... २९४ ९ | तत्र, विलास. ... ३०५ १६ अङ्कमुखे मतभेदः ... २९४ १४ | परिसर्पः ... ३०६ ३ कविशिक्षा ... ... २९५ ३ | विधुतम् ... ३०६ ७ अर्थप्रकृतय. ... २९५ १५ | तापनम् ... ३०६ १० बीजम् ... ... २९५ १९ | नर्म ... ३०७ ४ बिन्दुः... ... २९६ ५ | नर्मद्युतिः ... ३०७ ८ पताका (वृत्तम्) ... २९६ ९ | प्रगमनम् ... ३०७ १४ प्रकरी... ... २९७ ९ | विरोधः ... ३०८ ३ कार्यावस्था ... २९८ ३ | पर्युपासनम् ... ३०८ ६ आरम्भः ... २९८ ६ | पुष्पम्... ... ३०८ १० प्रयत्नः ... ... २९८ ९ | वज्रम्... ... ३०८ १६ प्राप्त्याशा ... २९८ १४ | उपन्यासः ... ३०८ २० नियताप्तिः ... २९८ १८ | वर्णसंहारः ... ३०९ ७ फलयोगाः (फलागमः) २९९ ३ | गर्भसंधिभेदा. ... ३१० २ संधिः .. ... २९९ ९ | तत्र, अभूताहरणम् ... ३१० ५ संधिभेदाः ... २९९ १३ | मार्गः ... ३१० ११ तत्र, मुखम् ... २९९ १६ | रूपम्... ... ३१० १५ प्रतिमुखम् ... २९९ १९ | उदाहरणम् ... ३१० १९ गर्भ. ... ... ३०० ५ | क्रमः ... ३११ ६ विमर्शः ... ... ३०० १६ | संग्रहः ... ३११ ११ निर्वहणम् (उपसंहृतिः) ३०१ ६ | अनुमानम् ... ३११ १५ मुखसंधिभेदा. ... ३०१ १४ | प्रार्थना ... ३१२ ३
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| पृष्ठम् | पङ्क्ति | पृष्ठम् | पङ्क्ति | |
|---|---|---|---|---|
| भयानक | १८९ | १८ | गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य भेदनि- | |
| बीभत्स | १९० | ९ | रूपणम् | २३८ |
| अद्भुत | १९१ | ४ | पञ्चमपरिच्छेदे— | |
| शान्त | १९२ | ४ | व्यञ्जनास्थापनम् | २५१ |
| दयावीरगच्छान्तेषु भेद- | अभिधयैव व्यञ्जनाया ग- | |||
| ख्यानम् | १९३ | २ | तार्थताहेतौ | २५७ |
| शान्तस्य रसत्वस्थापनम् | १९३ | ११ | अभिधाभागयोर्गवादिप्रति- | |
| वत्सल | १९४ | १४ | पादनेऽसमर्थत्वनिरूपणम् | २६० |
| रसानां मिथो विरोधाख्यानम् | १९५ | १५ | स्मृत्यादिसद्भावेऽप्यनुमान- | |
| भाव | १९७ | ३ | स्याक्षमप्रतिपादनम् | २६२ |
| रसाभासभावाभासौ | १९९ | १० | व्यञ्जनोद्धार | २७१ |
| अनौचित्यदर्शनम् | १९९ | १४ | षष्ठपरिच्छेदे— | |
| भावशान्त्यादि | २०२ | १२ | काव्यस्य दृश्यश्रव्यभेदौ | २७२ |
| चतुर्थपरिच्छेदे— | रूपकसंज्ञाकारणम् | २७२ | ||
| काव्यभेदौ | २०६ | ३ | अभिनय | २७२ |
| $\left.{l}अभिधामूलध्वनि | ||||
| लक्षणामूलध्वनि\right}$ | २०७ | ३ | रूपकभेदा | २७३ |
| उपरूपकभेदा | २७३ | |||
| लक्षणामूलध्वनेर्भेदाः | २०८ | २ | नाटकलक्षणम् | २७३ |
| अभिधामूलध्वनेर्भेदाः | २१० | १२ | अङ्कलक्षणम् | २७५ |
| संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य ध्वने- | गर्भाङ्कलक्षणम् | २७६ | ||
| स्त्रैविध्यम् | २११ | १० | नाटकरचनापरिपाटी | २७६ |
| शब्दशक्त्युद्भवव्यङ्ग्यस्य | पूर्वरङ्ग | २७६ | ||
| द्वैविध्यम् | २१२ | ७ | नान्या आवश्यकत्वम् | २७७ |
| अर्थशक्त्युद्भवव्यङ्ग्यस्य | नान्दीस्वरूपम् | २७८ | ||
| द्वादशभेदाः | २१४ | ९ | नान्द्यनन्तरैतिकर्तव्यता | २८२ |
| शब्दार्थशक्त्युद्भवव्यङ्ग्यस्यै- | भारतीवृत्ति | २८३ | ||
| कविधत्वाख्यानम् | २२० | ४ | भारतीवृत्तेरङ्गानि | २८३ |
| ध्वनेरष्टादशविधत्वनिरू- | आमुख (प्रस्तावना) | २८३ | ||
| पणम् | २२१ | ३ | प्रस्तावनाभेदा | २८४ |
| अर्थशक्त्युद्भवध्वनेः प्रब- | उद्घात्य(त)क | २८४ | ||
| न्धेऽतिदेशः | २२९ | ७ | कथोद्घात | २८५ |
| पदांशादिवत्संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य- | प्रयोगातिशय | २८६ | ||
| स्याख्यानम् | २३१ | १ | प्रवर्तकम् | २८७ |
| ध्वनिभेदाख्यानम् | २३३ | ८ | अवलगितम् | २८७ |
| गुणीभूतव्यङ्ग्यम् | २३८ | २ | नखकुट्टमितिनिरूपणम् | २८७ |
५
| पृष्ठस्य | पङ्क्तौ | पृष्ठस्य | पङ्क्तौ | ||
|---|---|---|---|---|---|
| वस्तुनो द्वैविध्यव्याख्यानम् | २८८ | ६ | तत्र, उपक्षेपः ... | ३०१ | १८ |
| प्रासङ्गिकवस्तुकीर्तनम् | २८८ | ११ | परिकरः ... ... | ३०२ | ६ |
| पताकास्थानम् ... | २८८ | १६ | परिन्यासः ... ... | ३०२ | १२ |
| प्रथमं पताकास्थानम्... | २८८ | १९ | विलोभनम् ... ... | ३०३ | ५ |
| द्वितीयं पताकास्थानम् | २८९ | ९ | युक्तिः... ... ... | ३०३ | ११ |
| तृतीयं पताकास्थानम् | २९० | १ | प्राप्तिः... ... ... | ३०३ | १६ |
| चतुर्थ पताकास्थानम् | २९० | १४ | समाधानम् ... ... | ३०४ | १ |
| कविशिक्षा ... ... | २९१ | ११ | विधानम् ... ... | ३०४ | ९ |
| अर्थोपक्षेपकाः ... | २९२ | १६ | परिभावना ... ... | ३०४ | १५ |
| विष्कम्भकः ... ... | २९३ | १ | उद्भेदः ... ... | ३०४ | १९ |
| प्रवेशकः ... ... | २९३ | ८ | करणम् ... ... | ३०५ | ४ |
| चूलिका ... ... | २९३ | १३ | भेदः ... ... | ३०५ | ७ |
| अङ्कावतारः ... ... | २९४ | ४ | प्रतिमुखसंधिभेदाः ... | ३०५ | ११ |
| अङ्कमुखम् ... ... | २९४ | ९ | तत्र, विलासः ... | ३०५ | १६ |
| अङ्कमुखे मतभेदः ... | २९४ | १४ | परिसर्पः ... ... | ३०६ | ३ |
| कविशिक्षा ... ... | २९५ | ३ | विधूतम् ... ... | ३०६ | ७ |
| अर्थप्रकृतयः ... ... | २९५ | १५ | तापनम् ... ... | ३०६ | १० |
| बीजम् ... ... | २९५ | १९ | नर्म ... ... | ३०७ | ४ |
| बिन्दुः... ... ... | २९६ | ५ | नर्मद्युतिः ... ... | ३०७ | ८ |
| पताका ( वृत्तम् ) ... | २९६ | ९ | प्रगमनम् ... ... | ३०७ | १४ |
| प्रकरी... ... ... | २९७ | ९ | विरोधः ... ... | ३०८ | ३ |
| कार्यावस्था ... ... | २९८ | ३ | पर्युपासनम् ... ... | ३०८ | ६ |
| आरम्भः ... ... | २९८ | ६ | पुष्पम्... ... ... | ३०८ | १० |
| प्रयत्नः ... ... | २९८ | ९ | वज्रम्... ... ... | ३०८ | १६ |
| प्राप्त्याशा ... ... | २९८ | १४ | उपन्यासः ... ... | ३०८ | २० |
| नियताप्तिः ... ... | २९८ | १८ | वर्णसंहारः ... ... | ३०९ | ७ |
| फलयौगः (फलागमः) | २९९ | ३ | गर्भसंधिभेदाः ... | ३१० | २ |
| संधिः ... ... ... | २९९ | ९ | तत्र, अभूताहरणम् ... | ३१० | ५ |
| संधिभेदाः ... ... | २९९ | १३ | मार्गः... ... ... | ३१० | ११ |
| तत्र, मुखम् ... ... | २९९ | १६ | रूपम्... ... ... | ३१० | १५ |
| प्रतिमुखम् ... ... | २९९ | १९ | उदाहरणम् ... ... | ३१० | १९ |
| गर्भः ... ... ... | ३०० | ५ | क्रमः ... ... ... | ३११ | ६ |
| विमर्शः ... ... | ३०० | १६ | संग्रहः ... ... | ३११ | ११ |
| निर्वहणम् ( उपसंहृतिः ) | ३०१ | ६ | अनुमानम् ... ... | ३११ | १५ |
| मुखसंधिभेदाः ... | ३०१ | १४ | प्रार्थना ... ... | ३१२ | ३ |
४ पृष्ठम् पङ्क्ति पृष्ठम् ... १८९ १४ गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य भेदनि- ... १९० ९ रूपणम् ... ... २३८ ... १९१ ४ पञ्चमपरिच्छेदे- ... १९२ ४ व्यञ्जनास्वरूपम् ... २५१ ... अभिधातो व्यञ्जनाया पा- ... १९३ २ र्थक्ये हेतवः ... २५७ ... १९३ ११ अभिधालक्षणयो रसादिप्रति- ... १९४ १६ पादनेऽसमर्थत्वनिरूपणम् २६० ... १९५ ११ रसादिप्रत्यायनेऽनुमान- ... १९७ ३ स्याक्षमत्वप्रतिपादनम् २६१ ... १९९ १० ग्रन्थोपरंहार ... २७१ ... १९९ १८ षष्ठपरिच्छेदे- ... २०२ १२ काव्यस्य दृश्यश्रव्यभेदौ २७२ चतुर्थपरिच्छेदे- रूपकलक्षणम् ... २७२ ... २०४ ३ अभिनयः ... ... २७२ ... रूपकभेदाः ... ... २७३ ... २०५ ३ उपरूपकभेदाः ... २७३ ... २०८ २ नाटकलक्षणम् ... २७३ ... २१० १० अङ्कलक्षणम् . ... २७५ ... गर्भाङ्कलक्षणम् ... २७६ ... २१५ १० नाटकरचनापरिपाटी... २७८ पूर्वरङ्गः . ... २७८ ... २२० ५ नान्दीशब्दव्युत्पत्तिः २८० नान्दीलक्षणम् ... २८० ... २२४ ५ चन्द्रनामाङ्कितपदव्यवस्था २८२ प्ररोचना ... ... २८३ ... २२५ ६ प्ररोचनाप्रवृत्तिः ... २८३ प्रहसन (प्रसाधन) ... २८३ ... २२६ ३ प्रस्तावनाभेदाः ... २८४ ... २२६ ... २२७ ३ ... ... २८५ ... ... २८५ ... २२८ ७ ... ... २८६ ... ८ ... ... २८६ ... ५ ... २८६
७ पृष्ठस्य पङ्क्तौ पृष्ठस्य पङ्क्तौ उपाङ्गः ... ... ३३६ ९ अक्षमा ... ... ३४५ ५ दृष्टान्तः ... ... ३३६ १३ गर्वः ... ... ३४५ ९ तुल्यतर्क ... ... ३३७ ३ वचनः ... ... ३४५ ११ पदोदयः ... ... ३३७ ७ आश्रयः ... ... ३४५ १४ निदर्शनम् ... ... ३३७ १२ उत्थापनम् ... ... ३४५ १७ अभिप्रायः ... ... ३३८ ४ स्पृहा ... ... ३४६ १ प्राप्तिः ... ... ३३८ ८ क्षोभः ... ... ३४६ ५ विचारः ... ... ३३८ ११ पश्चात्तापः ... ... ३४६ ९ दिष्टम् ... ... ३३८ १६ उपपत्ति ... ... ३४६ १२ उपदिष्टम् ... ... ३३९ ४ आशंसा ... ... ३४६ १६ गुणातिपातः ... ... ३३९ १० अध्यवसायः ... ... ३४७ १ गुणातिशयः ... ... ३३९ १४ विसर्प ... ... ३४७ ५ विशेषणम् ... ... ३४० १ ओजस् ... ... ३४७ ८ निरुक्ति ... ... ३४० ५ उत्तेजनम् ... ... ३४७ १३ सिद्धि ... ... ३४० ८ परीवादः ... ... ३४७ १८ भ्रंश ... ... ३४० १२ नीति ... ... ३४८ ४ विपर्यय ... ... ३४० १६ अर्थविशेषणम् ... ... ३४८ ७ दाक्षिण्यम् ... ... ३४१ ४ प्रोत्साहनम् ... ... ३४८ १० अनुबन्ध ... ... ३४१ ९ साहाय्यम् ... ... ३४९ २ प्ररोचना ... ... ३४१ १२ अनुयोगः ... ... ३४९ ५ गर्वोक्ति ... ... ३४१ १८ अनुवर्तनम् ... ... ३४९ ७ गर्हणम् ... ... ३४२ ५ उत्कीर्तनम् ... ... ३४९ ११ पृच्छा ... ... ३४२ ११ याच्ञा ... ... ३४९ १४ प्रसिद्धि ... ... ३४२ १४ परितोष ... ... ३४९ १८ भावाभासः ... ... ३४३ १८ अतिशयः ... ... ३५० २ दृष्टि ... ... ३४३ २ प्रतीप ... ... ३५० ४ कुशलप्रश्नः ... ... ३४३ ४ अवलोकन ... ... ३५० ८ पूजन ... ... ३४३ ८ तृप्ति ... ... ३५० ११ आशीर्वादः ... ... ३४३ ११ प्रश्न ... ... ३५० १५ कथन ... ... ३४३ १४ तर्क ... ... ३५१ १ साधुवादः ... ... ३४४ ४ संशयोपशम ... ... ३५१ ४ प्रतीकार ... ... ३४४ ८ साहाय्याभिलाष ... ... ३५१ ८ दोष ... ... ३४४ १२ उपकार ... ... ३५१ १२ उपालम्भः ... ... ३४४ १५ साहस ... ... ३५१ १५ प्रतिषेध ... ... ३४५ १ असूया ... ... ३५१ १८ सान्त्वम् ... ... ३४५ ३ ... ... ... ... ...
६ पृष्ठस्य पङ्क्तौ | पृष्ठस्य क्षिप्तिः ... ... ३१२ १४ | फलनिरूपणम् ... ३२२ त्रो (तो) टकम् ... ३१२ १८ | अङ्गप्रशंसा ... ... ३२२ अविकलम् ... ३१३ ३ | रसवृत्यनुरोधेनाङ्गाना उद्वेगः ... ... ३१३ ६ | संनिवेशरूपणम् ... ३२२ विद्रवः ... ... ३१३ १० | वृत्तयः ... ... ३२३ विमर्शसंधिभेदाः ... ३१३ १४ | तत्र, कैशिकी... ... ३२३ तत्र, अपवादः ... ३१३ १७ | कैशिक्या अङ्गानि ३२३ सफेटः ... ... ३१४ ३ | तत्र, नर्म ... ... ३२३ व्यवसायः... ... ३१४ ११ | नर्मस्फूर्जः ... ३२४ द्रवः ... ... ३१४ १५ | नर्मस्फोटः ... ३२५ द्युतिः ... ... ३१५ ३ | नर्मगर्भः ... ... ३२५ शक्तिः ... ... ३१५ ९ | सात्वती ... ... ३२५ प्रसङ्गः ... ... ३१५ १६ | सात्वत्या अङ्गानि... ३२६ खेदः ... ... ३१६ ९ | तत्र, उत्थापकः ... ३२६ प्रतिषेधः ... ... ३१६ १६ | सांघात्यः ... ... ३२६ विरोचनम् ... ३१७ ५ | संलापः ... ... ३२६ प्ररोचना ... ... ३१७ ११ | परिवर्तकः ... ३२७ आदानम्... ... ३१८ १ | आरभटी ... ... ३२७ छादनम् ... ... ३१८ ८ | आरभट्या अङ्गानि ३२७ निर्वहणसंधिभेदाः ... ३१८ १४ | तत्र, वस्तूत्थापनम् ... ३२७ तत्र, सन्धिः ... ३१८ १९ | सफेटः ... ... ३२७ विबोधः ... ... ३१८ २३ | संक्षिप्तः ... ... ३२८ ग्रथनम् ... ... ३१९ ७ | अवपातनम् ... ३२९ निर्णयः ... ... ३१९ १२ | नाट्योक्तयः ... ... ३२९ परिभाषणम् ... ३१९ २० | नामकरणम् ... ... ३३० कृतिः . ... ३२० ३ | नाट्यपरिभाषा ... ३३१ प्रसादः ... ... ३२० ७ | भाषाविभागः... ... ३३२ आनन्दः ... ... ३२० ९ | षट्त्रिंशल्लक्षणादीनामा- समयः ... ... ३२० १२ | ख्यानम् ... ३३४ गूहन ... ... ३२० १५ | लक्षणानामुद्देशः ... ३३४ भाषणम् ... ३२० २२ | तत्र, भूषणम्... ... ३३५ पूर्ववाक्यम् ... ३२१ २ | अक्षरसंघातः ... ३३५ काव्यसंहारः ... ३२१ ५ | शोभा ... ... ३३५ प्रशस्तिः ... ... ३२१ ७ | उदाहरणम् ... ३३६ पु०पञ्चोपसंहारः... ३२१ १८ | हेतु ... ... ३३६
॥ श्रीः ॥ श्रीमद्विश्वनाथकविराजप्रणीतः साहित्यदर्पणः । श्रीमद्रामचरणतर्कवागीशकृतया विवृत्या समेतः । प्रथम परिच्छेद । ग्रन्धारम्भे निर्विघ्नेन प्रारिप्सितपरिसमाप्तिकामो वाङ्मयाधिकृततया वाग्देवतायाः साम्मुख्यमाधत्ते— विवृतिः । लक्ष्मीधवं समभिनम्य गिरां गुरुं च तार्तीयिकं च जगतीमहितानुकम्पम् । ईशं त्रिशूलवरशूलधराभिरादौ वन्दे विशेषसुदृढो विनिवृत्तयेऽहम् ॥ ग्रन्थावपि क्वचित्क्वचिद् बहुभिः प्रमादैराक्षिप्ततामपहसिष्णुभिरुद्धतेन्दुः । संवीक्ष्य साम्प्रतमिमं सुगमेव विज्ञाः साहित्त्वदर्पणमिमं विवृणोमि भूयः । पारे परार्धप्रथमानभासां साधारणी काचन नः प्रसादात् । विद्यामयी मूर्तिरथास्तु सद्यः सद्यः प्रसादाय सतामभीष्टा ॥ तत्रादौ ग्रन्थकारश्चिकीर्षितं ... प्रतिजानीते ग्रन्थान्तरप्रारम्भेऽपि तद्दोषवारणाय चिकीर्षितकर्मविशेषमाह ग्रन्थेति। ग्रन्थरूपस्य ... ग्रन्थारम्भः ... इत्यारम्भ इति। यद्यपि आरभ्यत इति ग्रन्थारम्भः ... ग्रन्थो ग्रन्थारम्भः ...
१२ पृष्ठस्य पङ्क्तौ । पृष्ठस्य समम्... ... ... ५९५ १ । समुच्चयः ... ... ६०७ विचित्रम् ... ... ५९५ ७ । समाधिः ... ... ६०९ अधिकम् ... ... ५९५ ११ । प्रत्यनीकम् ... ... ६०९ अन्योन्यम् ... ... ५९६ ९ । प्रतीपम् ... ... ६०९ विशेष. . ... ५९६ १२ । मीलितम् ... ... ६११ व्याघातः ... ... ५९७ १० । सामान्यम् ... ... ६११ कारणमाला ... ... ५९८ ७ । तद्गुणः ... ... ६१२ मालादीपकम्... ... ५९८ १२ । अतद्गुण. ... ... ६१२ एकावली ... ... ५९९ २ । सूक्ष्मम् ... ... ६१३ सार. ... ... ... ५९९ १४ । व्याजौक्ति. ... ... ६१४ यथासंख्यम् .. ... ६०० ४ । स्वभावोक्ति ... ६१५ पर्याय. ... ... ६०१ १ । भाविकम् ... ... ६१६ परिवृत्तिः ... ... ६०२ ४ । उदात्तम् ... ... ६१८ परिसंख्या ... ... ६०२ १४ । रसवदाद्यलंकाराः ... ६१८ उत्तरम् ... ... ६०४ ३ । भावोदयाद्यलंकारा. ... ६१९ १ अर्थापत्तिः ... ... ६०५ १ । संसृष्टिसंकरालंकारौ ... ६२२ विकल्पः ... ... ६०५ १३ । ग्रन्थालंकारश्लोकौ ... ६३२
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‘त्रिवर्गसाधनं नाट्यम्’ इति च । विष्णुपुराणेऽपि— ‘काव्यालापाश्च ये केचिद्गीतकान्यखिलानि च । शब्दमूर्तिधरस्यैते विष्णोरंशा महात्मनः ॥’ इति । [१] [२] तेने हेतुना तस्य काव्यस्य स्वरूपं निरूप्यते । एतेनाभिधेयं च प्रदर्शि- तम् । तत्किस्वरूपं तावत्काव्यमित्यपेक्षायां कश्चिदाह—‘तददोषौ शब्दार्थौ कृतिज्ञप्त्यन्यतरजनक संस्कारविशेष ॥ त्रिवर्गो धर्मार्थकामा । नाट्यमभिनय प्रधानं नाटकादि ॥ काव्यालापा इति । रसव्यञ्जकाः शब्दार्था इत्यर्थ ॥ कारि- कास्थं ‘तेन–’ इत्यादि व्याख्यायते—तेनेत्यादि । एतेन ‘चतुर्वर्गफलप्राप्ति- इत्यादिश्लोकेन । अभिधेयं चेति । चकारेण प्रयोजनसम्बन्धयोर्लाभ । सम्बन्ध- श्चात्र प्रयोजनाभिधेययो कार्यकारणभावरूप ॥ कश्चिदिति । काव्यप्रकाशकृत कारिकाकार इत्यर्थः । तदिति । काव्यमित्यर्थ । शब्दार्थाविति । विनिगमन विरहेण उपस्थापकत्वसंबन्धेनार्थविशिष्ट शब्द । उपस्थाप्यत्वसंबन्धेन शब्दविशि- ष्टार्थः काव्यमित्यर्थ । अत्र शब्दार्थयोर्विशेषणविशेष्यभावे व्यञ्जकत्वाव्यञ्जकत्वाभ्या वैचित्र्यविशेषरूपालंकारप्रयोजकत्वाप्रयोजकत्वाभ्या प्रधानाप्रधानभावो नियामक न च यत्रोभयोर्व्यञ्जकत्व वैचित्र्यविशेषाधायकत्वं वा तत्र का गतिरिति वाच्यम् बाहुल्येन व्यञ्जकत्वेन चमत्कारातिशायाधायकत्वेन वा तत्र व्यवहारोपपत्ते । न तथापि यत्र व्यञ्जकयोर्वैचित्र्यविशेषप्रयोजकयोर्वा तुल्यत्व तत्र व्यवहारानुपपत्ति १. स्वरूपमिति । वस्तुनो मत्रस्येव काव्यस्य तद्विदा व्यवहारमन्तरेण किम निर्दिष्ट लक्ष्मा नास्ति । तत. सुन्दोपसुन्दन्यायेन सर्वाणि लक्षणानि खण्डितानि भवन्ति ग्रन्थकारैरपि महत्या आरभट्या यल्लक्षण स्थिरीकृत तदपि लक्ष्यासंग्राहकत्वेन परै खण्डितमेव । तदेतद् यथावसर निरीक्षणीयम् । एव यदधिकलक्ष्यसग्राहकं तदे लक्षणं व्यवहार्यम् । नादृश शब्दार्थात्रेव । उक्त चाचार्यरुद्रेतेन ‘ननु शब्दार्था काव्य- मित्यादि । नत्र शब्दार्थयो. परिष्कारका गुणाल्कारादयो द्रष्टव्याः । एतदादि पय लोच्यैव ‘ध्वनिर्न काव्यमाहुस्तच्छाब्दार्था वगाहने स्पष्टम् । तावपि लक्ष्याभिमतौ व्यङ्ग्य साममद्भावः ॥’ इति निबडन् । इह आत्मत्वव्यपदेशोऽर्थभागस्यैव वास्तविक सारभूतत्वात् । अन्यत्थ तु औपचारिक इत्यपि बोद्धव्यम् ॥ २ काव्यप्रकाशेति । वृत्तिकार एव कारिकाकारः । तथाहि—‘माला तु पूर्ववत्’ इति काव्यप्रकाशगतेन ‘पूर्ववत्’ इति कथनेन वृत्तिकारकारिकाकारयोरेकत्व एव वृत्तिप्रदर्शितायामालोपमायाः ‘पूर्ववत्’ इति दृष्टान्तयोरुपन्यासः सगच्छते । ‘मालोपमा ० रचितोपमा तु ना दृष्टान्तीकृतेति वृत्तिकृत्कारिकाहतोरेक्य मयमेव राग- ० मचिन्त ॥’ इति सुशामान् भीमसेनदीक्षिता अपि वदन्ति ॥ क.च., 'इति' इति षड्पुस्तके नास्ति । २ 'तेन-' इत्यादि 'पुन क्वापि, इति' ३. ग-पुस्तके नास्ति । ३ 'स्वरूप' ग-पुस्तके नास्ति । ४ 'आह' क.ख.घ-पुस्तकेषु 'अथ शब्दार्थौ - ' इति । ५ 'विश्वेश्वरानन्द' इत्यत्र घट पुस्तकान्तरे नास्ति.
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६ साहित्यदर्पणे 'त्रिवर्गसाधनं नाट्यम्' इति च। विष्णुपुराणेऽपि- 'काव्यालापाश्च ये केचिद्गीतकान्यखिलानि च। शब्दमूर्तिधरस्यैते विष्णोरंशा महात्मनः॥' इति। तेने हेतुना तस्य काव्यस्य स्वरूपं निरूप्यते। एतेनाभिधेयं च प्रदर्शितम्। तत्किंस्वरूपं तावत्काव्यमित्यपेक्षायां कश्चिदाह- 'तद्दोषौ शब्दार्थौ' श्रुतिशून्यन्यतरजनक- संस्कारविशेष ॥ त्रिवर्गो धर्मार्थकामाः। नाट्यमभिनय- प्रधानं नाटकादि॥ काव्यालापा इति। गद्यात्मकाः शब्दादी इत्यर्थे॥ कवि- कास्थं 'तेन-' इत्यादि व्याख्यायते-तेनेत्यादि। एतेन 'चतुर्वर्गफलप्राप्ति-' इत्यादिश्लोकेन। अभिधेयं चेति। चकारेण प्रयोजनसम्बन्धयोर्लाभः। सम्ब- न्धश्चात्र प्रयोजनाभिधेययो कार्यकारणभावरूपः ॥ कश्चिदिति। काव्यप्रकाशस्य कारिकाकार इत्यर्थः। तदिति। काव्यमित्यर्थः। शब्दार्थाविति। विनिगमना- विरहेण उपस्थापकत्वसम्बन्धेनान्वितशिष्ट शब्दः। उपस्थाप्यतासम्बन्धेन शब्दविशिष्ट- श्चार्थः काव्यमित्यर्थः। अत्र शब्दार्थयोर्विशेषणविशेष्यभावे व्यञ्जकतावच्छेदकतान्या- वैचित्र्यविशेषरूपालंकारप्रयोजकत्वाप्रयोजकत्वाभ्यां प्रधानाप्रधानभावो नियामकः। न च यत्रोभयोर्व्यञ्जकत्वं वैचित्र्यविशेषाधायकत्वं वा तत्र का गतिरिति वाच्यम्। बाहुल्येन व्यञ्जकत्वेन चमत्कारातशयाधायकत्वेन वा तत्र व्यवहारोपपत्तेः। न च तथापि यत्र व्यञ्जकयोर्वैचित्र्यविशेषप्रयोजकयोर्वा तुल्यत्वं तत्र व्यवहारानुपपत्ति-
- स्वरूपमिति। वस्तुतो मन्येव काव्यस्य तादृशो व्यवहारमन्तरेण किमपि निर्दुष्टं लक्षणं नास्ति। ततः सुन्दोपसुन्दन्यायेन सर्वाणि लक्षणानि खण्डितानि भवन्ति। ग्रन्थकारैरपि महत्या आरभट्या यल्लक्षणं स्थिरीकृतं तदपि लक्ष्यासङ्ग्राहकत्वेन परैः खण्डितमेव। तदेतद् यथावसरं निरीक्षणीयम्। एवं यदधिकलक्ष्यसङ्ग्राहकं तदेव लक्षणं व्यवहार्थम्। तादृक् शब्दार्थावेव। उक्तं चाचार्यरुद्रेन 'ननु शब्दोथ काव्य-' इत्यादि। तत्र शब्दार्थयोः परिष्कारका गुणाकारादयो द्रष्टव्याः। एतददि पर्या- लोच्यैव 'कविकर्म काव्यमाहुस्तच्छाब्दार्थौ वगाहते स्पष्टम्। तावपि लक्ष्याभिमतानि- त्युक्तं शास्त्रसद्भावः॥' इति निबन्धृन्। इह आत्मत्वव्यपदेशोऽर्थभागस्यैव वास्तविकः, सारभूतत्वात्। अन्यस्य तु औपचारिक इत्यपि बोध्यम्॥
- काव्यप्रकाशेति। वृत्तिकार एव कारिकाकारः। तथाहि- 'माला तु पूर्ववत्' इति काव्यप्रकाशकारिकायां 'पूर्ववत्' इति कथनेन वृत्तिकारकारिकारयोरेकत्व एव वृत्तिमात्रप्रदर्शितमालोपमायाः 'पूर्ववत्' इति दृष्टान्ततोपन्यासः संगच्छते। 'मालोपमा तु लक्षिता कारिकायां तु सा दृष्टान्तीकृतेति वृत्तिकृत्कारिकारूतोरेक्यं स्वयमेव राजा- नकैः सूचितम्॥' इति सुधासागरे भीमसेनदीक्षिता अपि वदन्ति॥ क. स, 'अपि' इति घ पुस्तके नास्ति २ 'तेन-' इत्यादि 'पुनः कापि, इति' ऽतो ग पुस्तके नास्ति ३ 'तावत्' ग पुस्तके नास्ति ४ 'आह' क ख घ-पुस्तकेषु ५ 'अत्र शब्दार्थयो-' इत्यादि 'विशेष्यत्वोपगमात्' इत्यन्तः पाठः पुस्तकान्तरे नास्ति 1
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२८ साहित्यदर्पणे आसत्तिर्बुद्धयविच्छेदः । बुद्धिविच्छेदेऽपि वाक्यत्वे इदानीमुच्चारितस्य देवदत्तशब्दस्य दिनान्तरोच्चारितेन गच्छतीति पदेन संगतिः स्यात् । अत्राकाङ्क्षायोग्यतयोरात्मार्थधर्मत्वेऽपि पदोच्चयधर्मत्वमुपचारात् । वाक्योच्चयो महावाक्यम्— योग्यताकाङ्क्षासत्तियुक्त इत्येव । 'विमलं जलं, नद्या कच्छे महिषश्चरति' इत्यत्र नद्या इति पदार्थोपस्थितेर्जलमिति पदार्थेनान्वयबोधे सति सिद्धे 'इच्छाविरहात्' इति न्यायेन 'कच्छे' इत्यनेन श्रोतूरन्व- यबोधे इच्छाविरहः । यदि पुनरुभयान्वयेच्छया प्रयुज्यते तदा 'नद्या' इत्यस्य काकाक्षि- गोलकन्यायादनुषङ्गाद्वा 'कच्छे' इत्यनेन सबन्धाद्गृहीतवक्तृतातपर्यस्य श्रोतुरुभयान्वय- बोधेच्छा संभवतीति ध्येयम् । आसत्तिमाह—आसत्तिरिति । बुद्धे पदार्थोपस्थि- तेरविच्छेदोऽव्यवधानम् । अव्यवहितपदार्थोपस्थितिरिति तात्पर्यार्थः । व्यवधानं च का- लबाहुल्येन प्रकृतानुपयोगिपदार्थोपस्थित्या च संभवति । तत्राद्यमाह—बुद्धीति । वाक्यत्वे वाक्यत्वस्वीकारे । दिनान्तरेत्यत्यन्तव्यवदर्शनार्थम् । प्रहरादिव्यवधा नेनाप्यनासन्नत्वं बोध्यम् । संगतिर्वाक्यव्यवहारोपयोगिमेलकः । द्वितीये यथा— ‘गिरिर्भुक्तमग्निमान्देवदत्तेन’ इत्यत्र गिरिर्मान्, भुक्तं देवदत्तेनेति वाक्यार्थबोध द्वयं प्रकृतम् । तत्र प्रथमानुयोगिन्या भुक्तमिति पदार्थोपस्थित्या, द्वितीयानुयोगिन्या अग्निमानिति पदार्थोपस्थित्या व्यवधानम् । प्रकृतोपयोगिपदार्थोपस्थित्या व्यवधाने त्वासत्तिरस्त्येव । तेन ‘अश्वेन ग्रामं गच्छति’ इत्यादौ ग्रामपदार्थोपस्थितिव्यवधानेऽपि अश्वपदस्य गच्छतीत्यनेनासत्तिर्व्याहतैव । स्वार्थबोधसमाप्तत्वमपि पदोच्चयविशेषणं बोध्यम् । तेन ‘शून्यं वासगृहं–’ इत्यादिभागस्य न वाक्यत्वम् । योग्यताकाङ्क्षयो पदो- च्चयधर्मत्वमुपपादयति—आकाङ्क्षति । आकाङ्क्षाया इच्छारूपत्वाद्विपरीतबुद्ध्यभाव- रूपयोग्यतायाश्चात्मनिष्ठत्वान्वयबोधहेतुत्वादात्मवृत्तित्वमेव । उपचारात्स्वजन्यज- नकत्वरूपपरम्परासंबन्धात् । एकपदार्थायापरपदार्थसद्भावरूपयोग्यतायास्तु पदार्थध- र्मत्वेऽपि स्वाश्रयोपस्थापकत्वसंबन्धेन पदोच्चयधर्मत्वमेवावगन्तव्यम् । निरुक्तासत्तेर- प्यात्मधर्मत्वात् तत्राप्यैषैव रीतिरनुसर्तव्या । यदि पुन समभिव्याहारविशेष आकाङ्क्षा, अव्यवधानोच्चरितत्वमासत्ति , तदानयो साक्षादेव पदोच्चयधर्मत्वमित्यास्ता विस्तार । महावाक्यमाह—वाक्योच्चय इति । योग्यताद्यभावे महावाक्यत्वस्वीकारे ‘चक्षुषा
- उपेने । उपचारो लक्षणा । तात्पर्यानुपपत्तिश्चोपचारे बीजम् ॥ १ 'चैत्र' ग. २ 'पद्म्य' रा. ३. 'उच्चरितेन' घ. ४ 'तत्र' क. ५ 'योग्यता-' इति ६ ग पुस्तके नास्ति, घ पुस्तके तु 'वाक्योच्चय -' इत्यस्य प्राग्दृश्यते ६ अव्यवहितपदार्थो पस्थितिरिति तात्पर्य र्थ' इति पुस्तकान्तरे नास्ति ७ 'प्रकृतोप- इत्यादिः -'अव्याहतैव' इत्यन्तं पुस्तकान्तरे न दृश्यते ८ 'तामवृत्तित्वमेव । एकपदार्थेऽपरपदार्थमद्भावरूपयोग्यताया ंतु स्वोपस्थापकत्वसंबन्धेन पदोच्चयधर्मत्वमेवावगन्तव्यम् ।' इत्युपलभ्यते पाठभेद पुस्तकान्तरे ।
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३२ साहित्यदर्पणे प्रथमं प्रतिपद्यते, अनन्तरं च 'गां बधान' 'अश्वमानय' इत्यादावावापो- द्वापाभ्यां गोशब्दस्य 'सास्नादिमानर्थः' आनयनपदस्य च 'आहरणमर्थः' इति संकेतमवधारयति । क्वचिच्च प्रसिद्धपदसन्निहारात्, यथा— 'इह प्रफुल्लकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबति' इत्यत्र । क्वचिदाप्तोप- न चेष्टया गामानयने गोचरं ज्ञानमनुमिनोति, तद्गोचरप्रवृत्तिं प्रति तद्गोचरज्ञानस्य हेतुत्वात्, तत्रान्यत्र ज्ञानस्य को हेतुरित्याकाङ्क्षायामुपस्थितत्वात् 'गामानय' इति शब्देन गामानयने हेतुतां कल्पयतीति भावः । अश्वमानयेत्यादाविति । ऽर्थे इति शेषः । आवापोद्वापाभ्यामिति । आवापोद्वापाभ्यामन्वयव्यतिरे- काभ्यां 'गां बधान' इत्यत्र गोपद्गते सास्नादिमत्पदार्थबोधः । आनयनपदव्यति- रेकेणानयनपदार्थस्याभावः । 'अश्वमानय' इत्यत्र गोपद्व्यतिरेकेण सास्नादिमद- र्थस्याभावः । आनयनपद्मत्त्वे आहरणपदार्थबोध, इत्येवंरूपान्वयव्यतिरेकौ । संकेतग्रहमवगमयितुम् । सा चातिरेकितया न तस्माच्छब्दादयमर्थो बोद्धव्य इती- श्वरेच्छा । ईश्वर पदतया पामरादीनामपि शाब्दबोधोदयादतिप्रसङ्गाच्च । अत एवा- धुनितानां चैत्रादिपदानापि संकेतं सुगच्छन्ते । न चाशौचव्यपगमे पित्रा कल्पितमिति गामानयनं चैत्रादिपदानामीश्वरसंकेतितवमिति वाच्यम् । तत्र शाब्दबोधाभावेन वाटभित्त्यादिसंकेतितवित्थादिपदानां संकेतासङ्गतिप्रसङ्गात् । त- दयं पदार्थविशिष्टानां शब्दानां कल्पने 'अयं घटपदमित्येय' इत्यादिप्रती- तिर्न स्यादित्याक्षेपः । क्वचिदिति । प्रसिद्धस्य गृहीतसंकेतस्य पदस्य गम- नार्थस्य सन्निधानात् । ननु तेषामित्यादिग्रन्थे । प्रेक्षावद्भिः प्रायेण योग्यपदा- र्थानामेव संसर्गे प्रयुज्यत इत्यादिवचनतः प्रसिद्धपदार्थान्वययोग्यपदार्थे ऽपि संकेतं निश्चिनोति भावः । एवं च संशयस्य योग्यतासत्त्वेऽपि वक्तृत्त्वानुपपत्ति- र्न स्यादित्यन्यथाभावं न सांशय्यः । संकेतववारयतीत्यनुपदः । एवम- ग्रेऽपि । प्रफुल्लेति । प्रफुल्लत्वे । 'इह प्रफुल्ले मधूदरे मधु पिबति' इति पदा- नामन्वययोग्यार्थज्ञानेन मधुकरपदस्य भ्रमर एव शक्तिग्रहः । मक्षिकादौ प्यन्वययोग्येऽपि प्रफुल्लकमलोदरोद्भवमकरन्दवति शक्तिग्रहः । भ्रमरसन्नि- धानेनैव मक्षिका मधु पिबतीति इत्यत्र शब्देन भ्रमरपदससन्निधानन्मधुकरपदस्य शक्तिग्रहो दृश्यते । उत्तरोत्तरस्य प्रमाणेऽवचनात् । एतत्पदसामर्थ्यात् । क्वचि- दाप्तोपदेशादिति ग्रन्थकृताऽप्युक्त्या । तदुक्तम्—'शक्तिग्रहं व्याकरणोपमान- कोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च । वाक्यस्य शेषाद्विवृतेर्वदन्ति प्रसिद्धपदस्य सान्निध्यात्' इति । तत्र व्यवहारत इति प्रथममुपपादितम् । कोशोप- मानाभ्यां व्यवहारत एव शक्तिग्रहे द्वितीयादिप्रवृत्तिः सामाधानम् । प्रसिद्धपद- सन्निधानादाप्तोपदेशाच्च प्रथमतोऽपि शक्तिग्रहो जायते । आप्तोपदेशेन यथा 'पिको मधुरं कूजति' अत्र कोकिल इति बोधनात् । व्याकरणेन
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३२ काव्यप्रकाशे जातीत्यादिरूपेण गौश्चतुर्विधा । गौः स्वरूपेण... भिन्नोऽपि, गवान्तरेण नाभिन्नो नापि भिन्नः । द्वित्वापत्तेः स्वरूपेण भिन्नाचेत् = जात्यिति । गौरन्तः प्रवेशाद् गौरिति ज्ञेयः । यत्तु गोत्वं स्वरूपेण न व्यक्तिव्यतिरिक्तं गौरित्यवगतेः । विशेषा- न्तरापेक्षत्वाद्देशाद्यपेक्षत्वाद्वा भेदे हेतुः । द्वित्वादिसङ्ख्यापत्तेश्चेति प्रदीपे स्पष्टम् उक्तम् । तन्न । न हि गौरित्यत्र गोत्वापेक्षया भेदे हेतुत्वं प्रवृत्तेर्हेतुत्वं वा । न च देशभेदाद्गोत्वाद्व्यक्तेर्भेदः, देशान्तरेऽपि गोत्वा- वच्छिन्नोपलम्भात् । तथोक्तं प्रागेव । नाभिनिर्वृत्त्यादेः पूर्वमपि तत्त्वं प्रवृत्तिकालपर्यन्तं यदनियतं तत्प्रत्यक्षविषयः स्यात् ? स्वरूपेण नाभि- र्नो नापि भिन्नोऽपि । द्वित्वापत्तेरित्युक्तम् । न च गोत्वमेव व्यक्तिव्यतिरेकेण न प्रतिभातीति वाच्यम् । तथा सति गवादिष्वप्येवमस्तु । न ह्यन्यः कश्चिद् गौरिति प्रत्येति । कश्चित्तु प्रकृते अवधारणार्थः ... भिन्नोऽपि न भिन्न इति । न च तत्प्रतीत्यर्थम् इत्यर्थः । सर्वोपादानां कौटस्थ्यं प्राप्यते 'तत्तद्भेदेन च भिन्नत्वमुक्तितोऽप्यन्यथा' इति नाङ्गीकृतः । तदुक्तं वाक्यपदीये — 'गोः स्वरूपेण न गौर्नाप्यगौः, गोत्वाभिसम्बन्धात्तु गौः' इति । तथाहि — गौः स्वरूपेण गवादिभिरन्यथा स्वरूपेण नाभिन्नो नापि प्रपञ्चोप्यर्थे इति व्याख्यातम् । 'शब्दार्थरूपं सामान्यमुभयोरपि यत्प्रवृत्तिकारणं गौः' न निष्पन्नमभिधीयते । नाप्यसौ... नापि चाभिन्नः स जात्यन्तराद् यथा गौरश्वादिति । एवं मपि दुग्धदधि शुक्लश्यामनया बालगोवृद्धानां बाल्ययौवनवार्धक्येन विभिन्नमप्यात्म- स्यात् । तस्मात्प्रातिस्विकैर्गुणैर्योगान्नापि चाभिन्नो वा व्यवहाराय नापि भिन्नः । 'अधोः' इत्यत्र 'पोरित्यादिकं' शास्त्रादृते सोऽन्यथा 'न हि गोः शुक्लः' इति रीति- भावान् । गोत्वाभिसम्बन्धाद्दो वस्तुना स्वातन्त्र्योपाधिशब्दितमिति । एवं च स्वाभेदेना- ध्यारस्य गोपिण्डे गोत्वम् अस्त्याध्यासेन ज्ञातो भावः । एवं च नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यं जातिरिति तल्लक्षणो बोध्यम् । गुणं ब्रूतेऽपि शुक्लादिपदप्रतिपाद्यम् । डत्थ- दिना हि लब्धसत्ताकं गवादिकं वस्तु व्यावर्तयन् शाब्दान्वयेन। ततश्च तद्रूप- त्स्य द्रव्यस्य गुणेन पश्चाद् योग इति । एवं चोत्पन्नम् द्रव्यम् क्षणमेकं निर्गुणं स्यात् । जातियुक्तस्यैव द्रव्यस्योत्पत्तिः । 'जन्मना जायते शूद्रः' इत्युक्तेः । गुणजातिगुणयोर्भेदो- भेद इति बहवः । प्रदीपकृतस्तु — 'यद्यपि शुक्लादीनां स्वाश्रयोपगमे गोत्वादिना समना- त्समैव संबन्धित्वम्, तथापि तस्य सम्बन्धः कदाचिदपैत्यपि, न तु गोत्वादेरिति विशेषः' इत्याहुः । कदाचित्पाकाद्यवस्थायाम् । नादिपदेन रचनाद्यवस्थाया घटणम्। पाकेन रूप- नेन च वर्णान्तरसंपादन इति तदर्थः । एवञ्च 'सत्त्वे निविशतेऽपैति पृथग्जातिषु दृश्यते । आधेयश्चाक्रियाजश्च सोऽसत्त्वप्रकृतैर्गुणः ॥' इति गुणलक्षणं बोध्यम् । अयमर्थः —द्रव्य- माश्रयते, तत एव च द्रव्यान्निवर्तते, भिन्नजातीयेषु द्रव्येषु दृश्यते यः स गुणः । एतेन जातेर्गुणत्वं वारितम् । सा हि द्रव्ये निविशमाना द्रव्यं न कदाचिञ्जहाति । नच भिन्नजा- तीयानि द्रव्याण्यभिनिविशते । यद्यपि गवाश्वादिषु प्राणित्वमस्ति, तथापि प्राणित्वेन तेषा- मेकजातीयत्वमेव । ननु क्रियायाः पूर्वोक्तलक्षणयोगाद्गुणत्वं प्राप्नोति, सापि हि द्रव्ये निवि-
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३८ साहित्यदर्पणे 'कलिङ्गः साहसिक' इत्यादौ कलिङ्गादिशब्दो देशविशेषादिरूपे ऽर्थेऽसंभवत्तया शब्दशक्त्या तत्संयुक्तान्पुरुषादीन्प्रत्याययति, यया च 'गङ्गायां घोषः' इत्यादौ गङ्गादिशब्दो जलमयादिरूपार्थवाचकत्वाल्ल- क्षणार्थसंबन्धं सामीप्यादिसंबन्धसंबन्धिनं तटादिं बोधयति, सा सम्बन्धिना साम्प्रतिकेनेरा ईश्वराद्युद्भाविता वा शक्तिर्लक्षणा नाम। पूर्वत्र हेतु रूढिः प्रसिद्धिरत्रे। उत्तरत्र 'गङ्गातटे घोषः' इति प्रतिपाद- नाद् ... 'रामोऽस्मि सर्वं सहे' इति वक्ष्यमाणायां स्वार्थस्यैव दुःखा- तिशयेन बोधनायां रामशब्दलक्षणायामव्याप्त्यापत्तेश्च। अत एव 'कदली कदली' इत्यादौ व्यङ्ग्यान्तरसंक्रमितवाच्यलक्षणाया मूलानेरुदाहरणमपि संग- च्छते। अत्र द्वितीयादि कदलीशब्दानां पौनरुक्त्यात् कदलीत्वादिना अन्वयासम्भ- वेऽपि सौन्दर्यादिना कदल्यादिरूपमुख्यार्थस्यैव बोधकतया लक्षणास्वीकारात्। तथा चोक्तम्- 'अतः परं प्रबोधाय करसङ्कचितां कुरु करद्वयीम्।' अत्र द्वितीयकरपदस्य पूर्वोपात्तार्थसाधारण्येऽपि करविशेषप्रतीतावपि लक्षणा। एवं च अन्यत्राप्येवंरीत्याऽपि लक्षणा संभवति। शक्यतावच्छेदकघटितविशि- ष्टशक्यसंबन्धरूपा लक्षणा स्वीकारात्। यथा 'त्वामस्मि वच्मि'- इत्यादौ द्रष्टव्यम्। सा च रूढिप्रयोजनरूपा, तथा ज्ञानात्। अतो द्वयोरेकतरसद्भावादेव सर्वत्रापि लक्षणाप्रयोजनेनाह। प्रयोजनञ्च शीतपावनत्वादिप्रतीतिः साम्प्रतं न सम्भवति तस्य हेतुत्वमुपगतम्। 'प्रयो- जनवतः' इत्यर्थः। अत्र प्रागुक्तयोर्दृष्टान्तयोरुभयोरेव विवक्षितयोरेव यथोक्तलक्षणासंभवेऽप्युभयोर्द्वैविध्येनोभयत्रोदाहरणं भवतीति ज्ञापनायाय द्वित्रि- प्रयोगेन च तेषां निर्देशः। वस्तुगत्या तु हि लक्षणा। तत्रोभयोस्तु रूपान्तरमेवेति बोध्यम्। तच्च ग्रन्थकारेणैवोक्तम्। 'कलिंग' इत्यादिना साक्षात् संयोगादिना लक्षणाऽनन्तरं देशसंबन्धाल्लक्षणायां मुख्यस्तद्वान्प्रतीय- मानः पुरुषः। मुख्यशक्यस्य कलिङ्गदेशस्य वा प्रत्यक्षानुपलम्भेन देशसंबन्धाल्लक्ष- णाभ्युपगमात्। तत्र चेत्थं मुख्यार्थबाधः। कलिङ्गः साहसिक इत्यादौ मुख्यार्थबाधः कलिङ्ग इति। साहसिकत्वासम्भवे मुख्योऽर्थे कलिङ्गादिशब्द इति। द्वितीयोदाहरणेऽपि तादृशं बाधमाह - गङ्गायामिति। गङ्गापदस्य प्रवाहविशेषे रूढत्वात्प्रवाह- स्याधारत्वेनावस्थितेर्घोषस्याधारत्वं न सम्भवतीत्याह-जलमयेत्यादिना। यत्त्वत्रापि शैत्यपावनत्वादिप्रतीतिर्भवति, तदग्रिमग्रन्थैरेव व्यक्तीभवि- ष्यतीति प्रतिपादयति-इत्यादिना। ननु रूढौ प्रयोजने च कथं लक्षणे- त्याशङ्क्य तयोर्लक्षणं दर्शयति - पूर्वत्रेत्यादिना। पूर्वत्र कलिङ्गादौ रूढिर्हेतुः। रूढिर्नाम प्रसिद्धिरित्यर्थः। उत्तरत्र गङ्गायां घोष इत्यादौ