समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
कोई दंड लेना चाहिए। मन को जो भाता हो, उस दिन वह चीज कम खाना। ऐसा कोई दंड देना चाहिए।
देखना, सामान्य भाव से
स्त्री की तरफ तो सबसे पहले दृष्टि बिगड़ती है। दृष्टि बिगड़ने के बाद आगे बढ़ता है। जिसकी दृष्टि नहीं बिगड़ती उसे कुछ भी नहीं होता। अब अगर तुझे सेफ साइड करनी हो तो दृष्टि मत बिगड़ने देना और दृष्टि बिगड़ जाए तो प्रतिक्रमण करना।
प्रश्नकर्ता : इस विषय-विकारी दृष्टि के परिणाम क्या हैं?
दादाश्री : अधोगति। यह तो पूरे दिन 'चाय' याद आती है। 'चाय' देखते ही दृष्टि बिगड़े तो फिर वह चाय पीए बिना रहेगा क्या? दृष्टि का नहीं बिगड़ना, वह सबसे बड़ा गुण कहलाता है।
भगवान ने कहा है कि दुनिया में सभी चीजें खाना, लेकिन मनुष्य जाति की आँखों में मत देखना और उसके चेहरे को एकटक मत देखना। अगर देखो तो सामान्य भाव से देखना, विषय भाव से मत देखना। आँखों को देखकर पास में रखोगे तो पड़े रहेंगे। वह एक तरफा है, लेकिन यह जीता-जागता जीव तो चिपक जाएगा, उसके बाद एक तरफ रख दोगे तो दावा करेगी। शादी के समारोह में जब स्वागत द्वार पर खड़े रहते हो तो क्या हर एक आनेवाले को एकटक देखते हो? नहीं। वहाँ तो एक आता है और एक जाता है, यों सामान्य भाव से देखते हो। उसी तरह से देखना है। मैंने ज्ञान होने से पहले ही तय किया हुआ था कि सामान्य भाव से देखना है।
ये सभी लोग नहीं होते तो अच्छा होता न? अपने भाव ही नहीं बिगड़ते न?
प्रश्नकर्ता : नहीं, वह तो अपने अंदर भाव ही ऐसे हैं,
किस समझ से विषय में... (खं-2-1)
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इसीलिए सामने ऐसे निमित्त मिले हैं न? अतः हमें अपने भाव ही तोड़ देने चाहिए, तो फिर निमित्त गले नहीं पड़ेगा न!
दादाश्री : सच कहा है। इसीलिए हम कहते हैं कि भावनिद्रा टालो। ये ऐसे लोग हैं कि सभी तरह के भाव आएँ। उसमें भावनिद्रा नहीं आनी चाहिए, देहनिद्रा आएगी तो चलेगा।
प्रश्नकर्ता : लेकिन भावनिद्रा ही आती है न?
दादाश्री : ऐसा कैसे चलेगा? यदि ट्रेन सामने से आ रही हो तो भावनिद्रा नहीं रखते। ट्रेन से तो एक ही जन्म की मृत्यु है, लेकिन यह तो अनंत जन्मों का जोखिम है। जहाँ चित्र-विचित्र भाव उत्पन्न हों, ऐसा यह जगत् है। उसमें तुझे खुद ही समझ लेना है। भावनिद्रा आती है या नहीं? भावनिद्रा आएगी तो संसार तुझे बाँध लेगा। अब अगर भावनिद्रा आ जाए तो वही, उसी दुकान के शुद्धात्मा से ब्रह्मचर्य के लिए शक्तियाँ माँगना कि, 'हे शुद्धात्मा भगवान, मुझे पूरी दुनिया के साथ ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्तियाँ दीजिए।' यदि हमसे शक्तियाँ माँगांगे तो उत्तम ही है, लेकिन वह तो डायरेक्ट, जिस दुकान से व्यवहार हुआ है, वही माँग लेना सबसे अच्छा।
सुंदर फूल हों तो वहाँ देखने का मन होता है न? वैसे ही इन सुंदर लोगों को देखने का मन हो जाता है और वहाँ पर थप्पड़ पड़ जाती है। इन फूलों को सूंधना, खाना-पीना, लेकिन 'इस' एक ही जगह पर देखने की जरूरत नहीं है, कहीं भी नजर मत मिलाना।
प्रश्नकर्ता : नहीं देखना हो फिर भी यदि सुंदर स्त्री दिख जाए, तब वहाँ क्या करना चाहिए?
दादाश्री : उस समय नजरें मत मिलाना।
प्रश्नकर्ता : नजरें मिल जाएँ तो क्या करना चाहिए?
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : अपने पास प्रतिक्रमण का साधन है, उससे थो देना। नज़रें मिल जाईं, तब तो तुरंत ही प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। इसीलिए तो कहा है न कि मनोहर स्त्री के फोटो या मूर्ति मत रखना।
उस मिठास का पृथक्करण करके तो देखो
अब कहीं भी मीठा लगता है क्या?
प्रश्नकर्ता : मीठा तो लग जाता है, लेकिन वह जोखिमदारी है, ऐसा समझ में आता है।
दादाश्री : जहाँ तक मीठा लग रहा है न, जोखिमदारी भले ही लग रही हो, लेकिन जब मीठा लगने लगे वहाँ पर वह कभी न कभी जोखिमदारी भुला देगा। कर्म के उदय ऐसे-ऐसे आते हैं कि जोखिमदारी भुला देता है। और यह मीठा किस हिसाब से लगता है, वही मुझे समझ में नहीं आता। इसमें कौन सा भाग मीठा है?!
प्रश्नकर्ता : वह क्या भ्रांति से मीठा लगता है?
दादाश्री : भ्रांति से मीठा लग रहा होता, तो भी अच्छा था। यह तो भ्रांति भी नहीं है। इसे कौन मीठा कहेगा?
यहाँ मुंबई में अगर पानी इतना कम हो जाए कि नहाने का भी ठिकाना नहीं पड़े तो इन लोगों की क्या दशा होगी? घर में सभी से एक रूप में बैठ भी नहीं जा सकेगा, इतने बदबूदार हो जाएँगे! यह तो, हररोज़ नहाते हैं फिर भी बदबू आती है न? और यदि नहीं नहाएँगे तब तो सिर फट जाए इतनी बदबू आएगी। ये नहाते हैं फिर भी दोपहर दो बजे कपड़ा घिसकर यदि पानी में निचोड़ें तो पानी खारा हो जाएगा। फिर भी देह को कीमती क्यों माना है? क्योंकि अंदर भगवान प्रकट हुए हैं, व्यक्त हुए हैं। इसलिए अन्य सभी प्रकार की देह की अपेक्षा इसे कीमती माना
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गया है, जबकि लोगों ने इसे किसी और ही तरह से कीमती माना है।
प्रश्नकर्ता : विषय में सबसे ज्यादा मिठास मानी है, तो किस आधार पर मानी है?
दादाश्री : वह मिठास जो उसे महसूस हुई और अन्य किसी जगह पर मिठास देखी नहीं है, इसलिए उसे विषय में बहुत मिठास लगती है। अगर देखने जाएँ तो सबसे ज्यादा गंदगी वहीं पर है, लेकिन मिठास की वजह से उसे अभानता आ जाती है। इसलिए उसे पता नहीं चलता। यदि इस विषय को गंदगी समझे तो उसकी सारी मिठास गायब हो जाएगी।
गलगलिया (वृत्तियों को गुदगुदी होना, मन में मीठा लगना) से ही जगत् फँसा हुआ है। गलगलिया होने लगे तो तुरंत ही ज्ञान हाज़िर कर देना, ताकि उससे सब अलग अलग दिखे और उससे छूटा जा सके।
फिर भी आकर्षण क्यों?
प्रश्नकर्ता : चित्त किसी एक ही जगह पर ज्यादा आकर्षित होता है।
दादाश्री : उस जगह को खोद देना, खोदकर निकाल देना। वह जगह कहाँ है?
प्रश्नकर्ता : एक जगह यानी कुछ अवयवों की तरफ ही दृष्टि ज्यादा जाती है।
दादाश्री : जिसे ऐसा ज्यादा होता हो, उसे शादी कर लेनी चाहिए। सभी जगह दृष्टि बिगाड़ने के बजाय एक कुएँ में पड़ना अच्छा। बाद में, पचास की उम्र में कोई भी नहीं मिलेगी।
चोरी करना अच्छा लगता है? झूठ बोलना, मरना अच्छा लगता
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हैं? तो फिर क्या परिग्रह अच्छा लगता है? तो सिर्फ विषय में ही ऐसा क्या पड़ा हुआ है कि अच्छा लगता है?
प्रश्नकर्ता : बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता, फिर भी आकर्षण हो जाता है। उसका बहुत खेद रहता है।
दादाश्री : ऐसे खेद रहेगा, तो वह चला जाएगा। सिर्फ आत्मा ही चाहिए। तो फिर विषय(का भाव) कैसे हो सकता है? अन्य कुछ चाहिए, तभी विषय होगा न? तुझे विषय का पृथक्करण करना आता है?
प्रश्नकर्ता : आप बताइए।
दादाश्री : पृथक्करण यानी क्या कि विषय क्या ऐसे होते हैं कि इन आँखों को अच्छे लेंगे? कान सुनें तो अच्छा लगता है? और जीभ से चाटने पर मीठा लगता है? एक भी इन्द्रिय को अच्छा नहीं लगता। इस नाक को तो वास्तव में अच्छा लगता है न? अरे, बहुत खुशबू आती है न? इत्र लगाया हुआ होता है न? यदि इस तरह पृथक्करण करेंगे, तब पता चलेगा। पूरा नर्क ही वहाँ पर पड़ा हुआ है, लेकिन इस तरह पृथक्करण नहीं करने की वजह से लोग उलझ गए हैं। वहाँ पर मोह होता है, वह भी आश्चर्य ही है न!
प्रश्नकर्ता : तो वह आकर्षण किस वजह से रहता है?
दादाश्री : नासमझी की वजह से। जिस तरह नासमझी की वजह से तार जोड़न्त रह गया हो तो उसका आकर्षण होता रहता है लेकिन अब समझ में आ गया कि यह तो ऐसा है। पहले तो हम सही बात नहीं जानते थे और ऐसा पृथक्करण किया ही नहीं था न! लोगों ने जो माना, उसी को हमने सच माना कि यही सही रास्ता है, लेकिन अब जब से जाना तब से हम समझ गए कि इसमें तो पोलवाला खाता है। इसमें तो ओहोहोहो..... इतने सारे जोखिम हैं कि इसी वजह से तो पूरा संसार खड़ा है और
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पूरे दिन मार भी इसी की वजह से पड़ती है। उसमें भी यदि इन्द्रियों को अच्छा लगे वैसा हो तो ठीक है, लेकिन यह तो एक भी इन्द्रिय को अच्छा नहीं लगता।
प्रश्नकर्ता : चित्त अभी भी खिंच जाता है, दृष्टि बिगड़ जाती है।
दादाश्री : अपनी बहन हो, वहाँ किस तरह देखते हो?
प्रश्नकर्ता : वहाँ तो कुछ नहीं होता।
दादाश्री : क्यों? वह भी स्त्री ही है न? वहाँ पर क्यों विकार नहीं होता? उसके प्रति विचार क्यों नहीं बिगड़ते होंगे? क्या बहन स्त्री नहीं है?
प्रश्नकर्ता : परमाणुओं का असर रहता होगा, इसलिए?
दादाश्री : यह तो जहाँ पर भाव किए हों, वही अपनी दृष्टि बिगड़ती है। बहन पर कभी भी भाव नहीं किया था, इसलिए दृष्टि भी नहीं बिगड़ती और कुछ लोगों ने बहन पर भी भाव किए हों तो वहाँ पर भी दृष्टि बिगड़ती है!
प्रश्नकर्ता : फिर भी, यों व्यवहार में जब स्त्री के संयोग मिलते हैं, तब यों नजर पड़ ही जाती है।
दादाश्री : नजर पड़ जाना तो स्वाभाविक है। उसमें पिछले जन्म का दोष है लेकिन अब हमें क्या करना चाहिए? नजर पड़ जाए, उसमें तो किसी का कुछ नहीं चलता। तुम भले ही कितना भी पकड़कर रखो, फिर भी आँखों का स्वभाव है देखना, वह देखे बिना रहेगी ही नहीं। हिसाब है, इसलिए देखे बिना रहेगी नहीं।
प्रश्नकर्ता : ऐसा दिन में दो-चार बार हो जाता है। दो-चार बार। तब ऐसा लगता है कि यह कुछ ठीक नहीं हो रहा है।
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दादाश्री : वह और तुम दोनों अलग ही हो न? और वह तो बदलेगा नहीं। जो बदलनेवाला नहीं है, अगर उसे हम बदलने जाएँ तो क्या होगा? लेकिन प्रतिक्रमण से दिन ब दिन बदलाव होता जा रहा है न?
प्रश्नकर्ता : हाँ। उस ओर की स्थिरता यों बढ़ रही है।
राजा जीतने से, जीतेंगे पूरा राज
कृपालुदेव ने तो क्या कहा है कि,
“नीरखीने नवयौवना, लेश न विषय निदान, गणे काष्ठनी पूतड़ी, ते भगवान समान ”
- श्रीमद् राजचंद्र
अक्रम मार्ग में हमें स्त्री को काष्ठ की पुतली नहीं मानना है। हमें आत्मा देखना है। यह तो क्रमिकमार्गवाले काष्ठ की पुतली कहते हैं, लेकिन ऐसा कब तक रह पाएगा? जरा फिर से विचार आ जाए तो उस समय वापस गायब हो जाएगा लेकिन अगर हम शुद्धात्मा देखें तो? यानी नवयौवना को देखकर भीतर चित्त आकर्षित हो गया हो तो वहाँ पर शुद्धात्मा को देखते रहने से सब चला जाएगा, चित्त फिर छूट जाएगा। विषय को जीतने के लिए यदि शुद्धात्मा को देखेंगे, तब निबेड़ा आएगा। वर्ना निबेड़ा नहीं आएगा।
“आ सघव्या संसारनी, रमणी नायकरूप, ए त्यागी त्याग्युं बधुं, केवल शोक स्वरूप ”
- श्रीमद् राजचंद्र
सारा शोक उसी से खड़ा हुआ है। स्त्री का त्याग हुआ, उससे अलग हुए कि पूरा निबेड़ा आ जाएगा। जो निरंतर शोक का ही स्वरूप है। पूरे दिन शोक, शोक और शोक ही रहता
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है। यदि शोक ही मिलता रहेगा, तो फिर वह चला जाएगा। वना जो चिपक गया है तो फिर वह छूटेगा ही नहीं न?
“एक विषय ने जीतता, जीत्यो सहु संसार, नृपति जीतता जीतिए, दल, पूर ने अधिकार ”
— श्रीमद् राजचंद्र
एक सिर्फ राजा को जीत लिया तो दल, नगर और अधिकार सबकुछ हमें मिल जाता है। उसकी पूरी सेना वगैरह सबकुछ मिल जाता है। सेना जीतने जाओगे तो राजा को नहीं जीत पाओगे। उसी तरह इस राजा (विषयरूपी) को जीत लिया कि सबकुछ अपने अधिकार में आ जाएगा। तभी तो हम मुक्त रहते हैं न! सिर्फ यह विषय ही ऐसा है कि जिसे जीतने पर सारा राज्य हाथ में आ जाएगा। हमें विषय का विचार तक नहीं आता।
टले ज्ञान और ध्यान...
“विषयरूप अंकुरथी, टले ज्ञान अने ध्यान, लेश मदिरापानथी, छाके ज्यम अज्ञान ”
— श्रीमद् राजचंद्र
एक ही बार यदि विषय भोगा तो सबकुछ बिगड़ जाता है। बाद में अनंत जन्मों का नुकसान होता है और नर्कगति का अधिकारी बनता है। कौन सा ऐसा विषय है कि जो नर्कगति नहीं दिलवाता? जो लोकमान्य है। कोई शादीशुदा ईंसान, उसकी स्त्री को लेकर जा रहा हो तो लोग आपत्ति उठाएँगे?
प्रश्नकर्ता : नहीं उठाएँगे।
दादाश्री : और शादीशुदा नहीं हो और जा रहा हो तो?
प्रश्नकर्ता : तो आपत्ति उठाएँगे।
दादाश्री : वह लोकमान्य नहीं कहलाएगा। वह नर्कगति का
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अधिकारी बनेगा। दोनों को नर्क में जाना पड़ेगा, दोनों को नर्क में साथ में रहना पड़ेगा, वापस।
प्रश्नकर्ता : 'विषयरूप अंकुरथी....' मतलब?
दादाश्री : अंकुर मतलब अंदर बीज हो, वह विचार आए और उसमें तन्मयाकार हो जाए तो वह अंकुर कहलाता है। वह अंकुर फूटा कि गया... इसलिए हम तय करते हैं न कि विचार आने से पहले खींचकर बाहर फेंक देना। वह अंकुर फूटा कि फिर ज्ञान और ध्यान सबकुछ टूट जाता है, खत्म हो जाता है।
प्रश्नकर्ता : इस अक्रम विज्ञान में भी ऐसा ही होता है?
दादाश्री : ज्ञान और ध्यान मिट जाता है। विचार आए न तो सिर्फ ज्ञान और ध्यान ही नहीं, लेकिन आत्मा भी चला जाता है। क्रमिक में तो ज्ञान और ध्यान चला जाता है और अक्रम में तो, जो आत्मा दिया हुआ है, वह चला जाता है। अतः अंकुर तक नहीं ले जाना चाहिए।
लिंग जारी, उसका जोखिम
इसमें है कुछ भी नहीं। ज्ञान प्राप्त हो जाने पर समझ में आ जाता है कि विषय में है कुछ भी नहीं।
प्रश्नकर्ता : आप के ज्ञान के बाद हम इसी जन्म में विषय बीज से एकदम निर्ग्रंथ हो सकते हैं?
दादाश्री : सभी कुछ हो सकता है। अगले जन्म के लिए बीज नहीं डलेंगे। ये जो भी पुराने बीज हों, उन्हें आप धो देना, नए बीज नहीं डलेंगे।
प्रश्नकर्ता : यानी अगले जन्म में विषय का एक भी विचार नहीं आएगा?
दादाश्री : नहीं आएगा। थोड़ा बहुत कच्चा रह गया होगा
किस समझ से विषय में... (खं-2-1)
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तो पहले के थोड़े बहुत विचार आएँगे लेकिन वे विचार बहुत स्पर्श नहीं करेंगे। जहाँ पर हिसाब नहीं है, उसका जोखिम नहीं है। वह तो अगर लिंक जारी रहे तो उसका जोखिम आता है। ईसान को तो कभी यों ही खुद की माँ के प्रति भी विषय का विचार आ जाता है लेकिन लिंक नहीं होती, इसलिए फिर गायब हो जाता है।
विषय का जरा सा भी ध्यान करे तो ज्ञान भ्रष्ट हो जाता है। 'हतो भ्रष्ट, ततो भ्रष्ट' हो जाता है। जलेबी का ध्यान करने से वैसा नहीं होता। इस योनी के विषय का ध्यान करने से वैसा हो जाता है।
हार-जीत, विषय की या खुद की?
हमने तो कई जन्मों से भाव किए थे। इसलिए हमें तो विषय के प्रति बहुत ही चिढ़। ऐसा करते-करते वे छूट गए। विषय हमें मूलतः अच्छा ही नहीं लगता था लेकिन क्या करें? कैसे छूटें? लेकिन हमारी दृष्टि बहुत गहरी, बहुत विचारशील, यों कैसे भी कपड़े पहने हों, फिर भी सबकुछ आरपार दिखता था, दृष्टि की वजह से यों ही चारों ओर का बहुत कुछ दिखता था। इसलिए राग नहीं होता न? हमें और क्या हुआ कि आत्मसुख प्राप्त हुआ। जलेबी खाने के बाद चाय फीकी लगती है। उसी तरह जिसे आत्मा का सुख प्राप्त हो गया, उसे सभी विषयसुख फीके लगते हैं। तुझे फीका नहीं लगता? जैसा पहले लगता था, वैसा अब नहीं लगता न?
प्रश्नकर्ता : फीका तो लगता है, लेकिन वापस मोह उत्पन्न हो जाता है।
दादाश्री : मोह तो उत्पन्न हो सकता है। वह तो कर्म का उदय होता है। कर्म बंधे हुए हैं, वे मोह उत्पन्न करवाते हैं लेकिन आपको क्या ऐसा लगता है कि खरा सुख तो आत्मा में ही है?
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प्रश्नकर्ता : हाँ, ऐसा तो ठीक से लगता है। इस विषय में सुख नहीं है, यह तो पक्का समझ में आ गया है।
दादाश्री : अन्य किसी स्त्री को देखे तो तुझे विचार नहीं आता न ?
प्रश्नकर्ता : आता है कभी-कभार।
दादाश्री : ऐसा होता है, इसका मतलब अभी भी कमी है।
प्रश्नकर्ता : सिर्फ यों साधारण मोह ही होता है, और कुछ नहीं।
दादाश्री : मोह तो फिर घसीट ही ले जाएगा न! इस विषय को जीतना तो बहुत कठिन चीज है। इसे हमारे ज्ञान से जीता जा सकता है। यह ज्ञान निरंतर सुखदायी है न, इसलिए जीत सकते हैं।
उसके सेवन से पात्रता
फिर कृपालुदेव तो क्या कहते हैं, कि
“ पात्र विना वस्तु ना रहे, पात्रे आत्मिक ज्ञान, पात्र थवा सेवो सदा, ब्रह्मचर्य मति मान ”
- श्रीमद् राजचंद्र
ब्रह्मचर्य के सेवन से तो पात्र बनेगा, कृपालुदेव ऐसा कहते हैं। उन्होंने ऐसा नहीं कहा है कि आम मत खाना। जड़ को ही पकड़ा है पूरा। यदि सामनेवाला निर्जीव होता और दावा नहीं करता तो ब्रह्मचर्य सेवन नहीं करते जबकि ये तो दावा करते हैं।
“ जे नववाड विशुद्धथी, धरे शियळ सुखदाय ”
- श्रीमद् राजचंद्र
किस समझ से विषय में... (खं-2-1)
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प्रश्नकर्ता : ‘नववाड विशुद्ध’ ब्रह्मचर्य की परिभाषा क्या है?
दादाश्री : ‘नववाड’ यानी ऐसा है कि, मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य पालन करना। मन में जो सोचते हों, वैसा कुछ सोचना करना नहीं है। पहले के विषय याद आएँ तो उस घड़ी सबकुछ भुला देना है। वाणी से नहीं बोलना है, देह से बहुत दूर रहना है।
नौ बाड़ बताई हैं न, कि जहाँ स्त्री बैठी हो, वहाँ पर हमें नहीं बैठना है, उसे देखना नहीं है। कोई विषय भोग रहा हो तो छुपकर दरार में से नहीं देखना है। देखने से भी मन बिगड़ जाता है। पहले संसार जो भोगा हो, उसे याद नहीं करना है। याद करने से वापस वे विचार आ जाएँगे, इस तरह ये सब नौ बाड़ हैं।
जहाँ पर स्त्री बैठी हो उस जगह पर मत बैठना, ऐसा कहते हैं। फिर उस जगह पर क्या होगा? राग होगा या द्वेष? द्वेष होता रहेगा। बल्कि, राग-द्वेष के कारखाने बढ़ेंगे। इसलिए नौ बाड़ का हमें क्या करना है? उसके बजाय एक बाड़ कर दे, तो भी बहुत हो गया। नौ बाड़ करने जाते हुए तो दूसरे राग-द्वेष खड़े हो जाएँगे। इसके बजाय स्थूल ब्रह्मचर्य का पालन करो न और मन में जो विचार आएँ तो उनके प्रतिक्रमण करके धो देना। नौ बाड़ का पालन तो अभी किसी से भी नहीं हो सकता, एक-दो बाड़ तो टूट चुकी होती हैं। तब आप नौ बाड़ कैसे पूरी कर सकोगे? आप तो हमने जो बताया है, उसमें रहो। इतना कोई करे तो उसमें सभी नौ बाड़ आ जाएँगी। नौ बाड़ करने में अहंकार की जरूरत पड़ेगी लेकिन अपने यहाँ तो करने का मार्ग ही नहीं है।
प्रश्नकर्ता : तो फिर प्रतिक्रमण करते वक्त हम जो याद करते हैं, तो उससे नया बंध नहीं पड़ता?
दादाश्री : हाँ! याद आता है, लेकिन प्रतिक्रमण यानी हम
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तो क्या करना चाहते हैं? विषय को उड़ा देना चाहते हैं और वे तो लालच के मारे याद करते हैं। दोनों के भावों में फर्क है। वह जो याद आता है, वह लालच से याद आता है और यह तो प्रतिक्रमण से याद आता है। प्रतिक्रमण करने के पीछे छोड़ने का भाव है, जबकि उसमें लालच का भाव है। दोनों के भाव में फर्क है।
“भव तेनो लव पछी रहे तत्त्व वचन ए भाई ”
—श्रीमद् राजचंद्र
‘लव पछी’ यानी थोड़े ही जन्म बाकी रहते हैं फिर। जन्म कम हो जाते हैं। वह तत्त्व वचन है, तत्त्व का सार है।
“सुंदर शियळ सुरतरु, मन-वाणी ने देह, जे नर-नारी सेवशे, अनुपम फल ले तेह ”
—श्रीमद् राजचंद्र
‘शियळ’ मतलब शीलवान। जो मन-वचन-काया से शीलवान रहे हैं, वह अनुपम फल प्राप्त करता है।
प्रश्नकर्ता : शीलवान किसे कहते हैं?
दादाश्री : विषय का विचार तक नहीं आए। जिसे क्रोध-मान-माया-लोभ नहीं हों, उसे शीलवान कहते हैं। सिर्फ यह स्त्री विषय ही नहीं, लेकिन जिसके क्रोध-मान-माया-लोभ भी खुद के वश हो चुके हों, तब वह शीलवान कहलाता है। जो क्रोध-मान-माया-लोभ खुद को दुःख दें, दूसरों को दुःख नहीं दें, वे ‘कंट्रोलैबल’ कहलाते हैं। तभी से भगवान ने उसे ‘शील’ कहा है।
प्रश्नकर्ता : अतः मन-वचन-काया से किसी भी जीव मात्र को किंचित्मात्र भी दुःख नहीं देना, वह जो भाव है, वह शीलवान?
किस समझ से विषय में... (खं-2-1)
८१
दादाश्री : वह भाव तो है ही। वह तो अहिंसक भाव कहलाता है। वह चीज अलग है और यह तो जिसने स्त्री से संबंधित विषय को जीता, उसने सबकुछ जीत लिया।
प्रश्नकर्ता : मैंने ब्रह्मचर्यव्रत लेने के बाद एक महीने तक कृपालुदेव का पद ‘ निरखीने नवयौवना ’ गाया था।
दादाश्री : जो यह पद गाए न, उनका साफ हो जाता है। यह पद तो आपको रोज गाना चाहिए, दो-दो बार गाना चाहिए। सिर्फ विषय को जीत लिया तो पूरा जगत् जीत लिया, बस! भले ही फिर कुछ भी खाओ या पीओ, उसमें से कुछ भी बाधक नहीं होगा लेकिन जिसने यह जीत लिया, उसने पूरा जगत् जीत लिया। सिर्फ यही, इंसान यहीं पर फँसता है। विषय को जीत लिया तो फिर दुनिया का राजा न! कर्म बंधन ही नहीं होगा न! उसमें से तो निरे कर्म, भयंकर कर्म बंधते हैं। एक ही बार का विषय कितने ही जीवों को खत्म कर देता है। उन सभी जीवों के साथ ऋणानुबंध बंध जाता है। अतः इतना, सिर्फ विषय को जीत लिया तो बहुत हो गया।
मजबूरी से पाशवता
प्रश्नकर्ता : आगे आपने कहा है कि शादी करने जैसा तो सत्युग में था। कलियुग में तो शादी करने जैसा है ही नहीं।
दादाश्री : बाकी, इसमें शादी करने जैसा है ही क्या? यह तो नासमझी की वजह से शादी करते हैं, वर्ना शादी करते ही नहीं।
प्रश्नकर्ता : मैंने एक चीज देखी है कि लोगों को यह मार्ग चाहिए, ब्रह्मचर्य का, लेकिन मिलता नहीं है।
दादाश्री : हाँ, नहीं मिलता। ऊपरी (बॉस, वरिष्ठ मालिक) होना चाहिए न, वचनबलवाला चाहिए। खुद अकेले अपने आप ही
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
पालन नहीं किया जा सकता। वह तो मेरा यह वचनबल और मेरा यह मार्गदर्शन, इस वजह से पालन कर सकते हैं और इसका पालन किया कि राजा! पूरी दुनिया का राजा!
प्रश्नकर्ता : क्योंकि लोग शादी करते वक्त बोलते हैं कि अब मैं गया लेकिन बेचारे के पास और कोई मार्ग नहीं है।
दादाश्री : पाशवता अच्छी नहीं लगती, लेकिन फिर क्या करे?
वहाँ मजबूरी से पाशवतावाला है यह सब। विषय तो खुली पाशवता है। चारा ही नहीं है न? इतना जीत गए तो बस हो गया। इसलिए रोज मन में ऐसा तय करना कि, एक ही बार इसे जीतना है, और कुछ नहीं। और अभी जीता जा सकता है, ऐसा। दादाजी की निश्रा में सभी लोगों द्वारा जीता जा सकता है। कभी कसौटी का मौका आए तो, उसके लिए उपवास कर लेना दो-तीन। जब कर्म बहुत जोर मारें न, तब उपवास करने से बंद हो जाएगा। उस तरह के उपवास करवाने से तो वह लकड़ी जैसा हो जाएगा। उपवास से वह मर नहीं जाएगा।
प्रश्नकर्ता : यानी उपवास करने से वे सब फोर्स कम हो जाएँगे?
दादाश्री : सभी बंद हो जाएँगे। यह सारा आहार का ही फोर्स है। दूसरे गुनाह चलाए जा सकते हैं। ऐसा है कि सिर्फ यही एक गुनाह नहीं चलाया जा सकता। यह तो अनंत जन्मों का खतम कर देता है। मिट्टी में मिला देता है। इतना जीत लिया तो बहुत हो गया।
ब्रह्मचर्य का बल हो तो फिर वह विषय की गाँठ बंद हो जाएगी। अतः बल ऐसा रखना कि ये विचार आते ही धो देना, कुचल देना।
किस समझ से विषय में... (खं-2-1)
८३
प्रश्नकर्ता : विचार तो मुझे ब्रह्मचर्य के ही आते हैं।
दादाश्री : नहीं। वही कह रहा हूँ मतलब ब्रह्मचर्य के ही आते हैं? नहीं!
प्रश्नकर्ता : हाँ, हाँ।
दादाश्री : अब्रह्मचर्य के विचार नहीं आते?
प्रश्नकर्ता : वह तो मुझे बहुत गंदा लगता है।
दादाश्री : बहुत अच्छा।
प्रश्नकर्ता : और मुझे इतना समझ में आ गया है कि यह जो जन्म हुआ है, वह इस विषय की गाँठ निकालने के लिए ही हुआ है। बाकी का सब तैयार ही है मेरा!
दादाश्री : तब तो बहुत अच्छा, तब तो समझदार है। मेरी पसंद की बात आई अब। बस, बस। मुझे पसंद आई यह बात। अब ऑलराइट। इससे बहुत संतोष हुआ मुझे।
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[ २ ]
दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञन' से
'रेणी चादर' के पीछे
खून में मांस के टुकड़े पड़े हों, तो आपको उन्हें देखना अच्छा लगेगा क्या?
प्रश्नकर्ता : नहीं।
दादाश्री : और इडली देखना अच्छा लगता है?
प्रश्नकर्ता : हाँ, अच्छा लगता है।
दादाश्री : धनिया और हरी मिर्च की चटनी बनाई जाए तो, वह देखना अच्छा लगता है या मांस देखना अच्छा लगता है?
प्रश्नकर्ता : चटनी अच्छी लगती है।
दादाश्री : चटनी हरे खून से बनी है और यह लाल खून से। यह तो सिर्फ राग-द्वेष करता रहता है। इस पर राग करता है और मांस पर द्वेष करता है! चटनी कौन से खून से बनी है? स्थावर एकेन्द्रिय का ग्रीन कलर का खून है और अपना खून लाल है। पाँच इन्द्रिय के सभी जीवों का खून लाल कलर का होता है। लाल खून में तरह तरह के घटक होते हैं। हड्डियों को तू कभी छूता नहीं है न?
प्रश्नकर्ता : कभी कभार गलती से छू लेता हूँ।
दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञान' से (खं-2-२)
८५
दादाश्री : खाने के साथ मांस रखा हुआ हो तो तुझे खाना भाएगा या नहीं?
प्रश्नकर्ता : नहीं भाएगा।
दादाश्री : लेकिन अगर वह मांस ढका हुआ हो तो?
प्रश्नकर्ता : तो गलती से शायद खा भी जाऊँ।
दादाश्री : इस देह पर चादर ढकी हुई है और वह खुला मांस है।
प्रश्नकर्ता : वह खुला तो दिखता है, लेकिन यह ढका हुआ है तो नहीं दिखता।
दादाश्री : अभी चादर हटा दें तो?
प्रश्नकर्ता : मांस आदि सब देखकर धिन आएगी।
दादाश्री : और नहीं दिखे तो?
प्रश्नकर्ता : तो फिर पता नहीं चलेगा।
दादाश्री : ये आँखें कैसी है अपनी, कि हैं फिर भी नहीं दिखता? हम जानते हैं कि यह चादर से बंधा हुआ है फिर भी वह दिखता क्यों नहीं? यों बुद्धि तो कहती है कि है अंदर, फिर भी नहीं दिखता, तो वे कैसी आँखें? यह जो चादर है, इसकी वजह से यह सब सुंदर लगता है। चादर खिसक जाए तो कैसा लगेगा?
प्रश्नकर्ता : खून-मांस जैसा।
दादाश्री : तो वहाँ धिन नहीं आएगी?
प्रश्नकर्ता : आएगी।
दादाश्री : किसी को यहाँ पर जल गया हो और पीप निकल रहा हो, तो क्या वहाँ पर हाथ फेरना अच्छा लगेगा?
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : नहीं।
दादाश्री : यह विषय कैसे खड़ा है, वही समझ में नहीं आता। वह खुली आँखों से सो रहा है तो, उस सोनेवाले का क्या करे? लोग तो यह नहीं जानते कि 'देह के अंदर क्या है।' तू रॉकेट(आतिशबाजी) लाए तो तुझे पता चलेगा न, कि इसमें बारूद भरा हुआ है?
प्रश्नकर्ता : हाँ।
दादाश्री : तो इसमें क्यों पता नहीं चलता? रॉकेट का तो ध्यान में रहता ही है कि यह बारूद से भरा हुआ है। यह फूटा नहीं है, अभी फूटना बाकी है और यह फूट चुका है। ऐसा पता चलता है न? और इस जीवित मनुष्य में कैसा बारूद भरा हुआ है, इसका क्यों पता नहीं चलता? इसमें कौन-कौन सा बारूद भरा है?
प्रश्नकर्ता : हड़िड़यों, खून, मांस।
दादाश्री : अंदर हड़िड़यों हैं क्या? तूने कैसे देख लीं?
प्रश्नकर्ता : देखा नहीं है लेकिन बुद्धि से पता चलता है न?
दादाश्री : बुद्धि तो परावलंबी है, स्वावलंबी नहीं है। कहीं ओर देखा होगा तो उस पर से पता चलता है कि इंसान में ऐसा-ऐसा होता है, तो वैसा ही मुझ में भी होना चाहिए। बुद्धि परावलंबी है और ज्ञान परावलंबी नहीं है। ज्ञान सीधा देखता है। जिससे गंद जैसा लगे, ऐसा और कुछ होता होगा शरीर में?
प्रश्नकर्ता : दुष्टता होती है।
दादाश्री : दुष्टता तो मान लो कि ठीक है, वह प्राकृत गुण कहलाती है, लेकिन इसमें माल क्या-क्या है?
दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञन' से (खं-2-२)
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प्रश्नकर्ता : और कुछ मालूम नहीं है।
दादाश्री : खाने में क्या-क्या खाता है?
प्रश्नकर्ता : दाल, चावल, रोटी, सब्जी।
दादाश्री : फिर जब वह गलन होता है, तब क्या होता है?
प्रश्नकर्ता : मल बन जाता है।
दादाश्री : ऐसा क्यों होता है? हम जो आहार खाते हैं न, उसमें से सभी सार खिंच जाता है और खून आदि सब बनता है और शरीर जीवित रहता है और जो असार बचता है, वह निकल जाता है। यह तो सारी मशीनरी है। खून चलता रहे, तो आखें चलती रहती है, अंदर सभी वायर कार्यरत ही हैं। आहार डालते हैं तो इलेक्ट्रिसिटि पैदा होती है। इलेक्ट्रिसिटि से श्वासोच्छ्वास चलते हैं।
अभी एक पोटली में रेशमी चादर से हड्डियाँ और मांस बाँध लिए, फिर उसे यहाँ पर लाकर रख दिया हो तो तुझे वह ध्यान तो रहेगा न, कि इसमें यह भरा हुआ है?
प्रश्नकर्ता : रह सकता है न!
दादाश्री : तो ठीक है। जिसे यह लक्ष्य में रहे, उसे बड़ा अधिपति कहा गया है, वह जागृत कहलाता है। जो जागृत हो, वह इस संसार में नहीं उतरता, और जागृत ही वीतराग बन सकते हैं।
अद्भुत प्रयोग, श्री विज्ञन का
मैंने जो प्रयोग किया था, उसी प्रयोग का उपयोग करना है। हमारे अंदर वह प्रयोग निरंतर सेट ही रहता है, इसलिए हमें ज्ञान होने से पहले भी जागृति रहती थी। यों सुंदर कपड़े पहने