भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

‘फाइल’ के सामने सख्ती (खं-2-९)

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जाता है, नीचे जाता है, ऊपर जाता है, नीचे जाता है। उसके विचार आते ही! वह तो अंदर निरी गंदगी भरी है, कचरा माल है। अंदर आत्मा की ही कीमत है!

फाइल गैरहाजिर हो और याद आती रहे तो बहुत जोखिम कहलाता है। फाइल गैरहाजिर हो और याद नहीं आए, लेकिन उसके आते ही तुरंत असर हो जाए, वह सेकन्डरी जोखिम। तुम्हें उसका असर होने ही नहीं देना है। स्वतंत्र बन जाने की जरूरत है। उस समय अपनी लगाम टूट ही जाती है। फिर लगाम रह नहीं पाती न!

लकड़ी की पुतली अच्छी

एक यही गलती नहीं होनी चाहिए। फाइल हो और संडास करने बैठो हो और कहे कि धो दो। तो क्या कहेंगे? धो देते हैं सब?

प्रश्नकर्ता : देखना ही अच्छा नहीं लगता तो धोना कैसे अच्छा लगेगा?

दादाश्री : तू तो धो भी देगा क्या? चाटेगा भी? मुझे लगता है! वह संडास करती हुई दिखे और फिर तुझे धोने को कहे, ‘वर्ना नहीं बोल्गी’ कहे तो?

प्रश्नकर्ता : चलेगा, नहीं बोलेगी तो।

दादाश्री : उस समय छोड़ देगा, तो आज ही छोड़ दे न?

इसलिए कृपालुदेव ऐसा लिखते हैं, ‘लकड़ी की पुतली तो अच्छी है।’ उसमें से संडास नहीं निकलती। निरी गंध है यह तो! उसका मुँह देखो तो वह भी बदबू मारता है। भ्रांति चढ़ जाती है न इसलिए नशा चढ़ जाता है। तब भान नहीं रहता। इसलिए फिर धिन नहीं आती।

प्रश्नकर्ता : सभी को इसका अनुभव है ही!

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : उस घड़ी जब संडास करने बैठी हो, तब देखे तो चंचल रहेगा या नहीं?

प्रश्नकर्ता : नहीं रहेगा। प्रेम टूट जाएगा।

दादाश्री : प्रेम है ही कहाँ यह? केवल साइकलॉजिकल इफेक्ट है। उस समय हमें लपेटते रहना पड़ेगा। ये सीधा लपेटा था, उसे उल्टा लपेटने से निकल जाएगा, खत्म हो जाएगा। 'मेरा, मेरा' करके चिपका था। अब 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करेगा तो चला जाएगा।

अग्नि और 'फाइल' एक से

जहाँ आकर्षण होता है, वहाँ जागृत रहो। आकर्षण नहीं हो रहा हो तो हर्ज नहीं है। बार-बार आकर्षण हो रहा हो तो समझना कि यह फाइल है।

प्रश्नकर्ता : कुछ फाइलों के प्रति आकर्षण होता है।

दादाश्री : सावधान रहकर चलना। अपना यह ज्ञान है तो ब्रह्मचर्यव्रत रह सकता है क्योंकि शुद्धात्मा को अलग कर दिया है इसलिए रह सकता है। वर्ना और कहीं नहीं रह सकता। दादा द्वारा दिया गया, 'मैं शुद्धात्मा हूँ' ऐसा कहते ही वह कम्प्लीट अलग हो जाता है। वह शंका रहित है। बाकी सब जगह शंकावाला।

प्रश्नकर्ता : 'खुद' अलग रहता है इसीलिए यह सब पता चल पाता है कि यह कोई फाइल आई और चंचलता हुई।

दादाश्री : हाँ, पता चलेगा ही न। वह अलग नहीं हुआ होता तो पता नहीं चल पाता, तन्मयाकार ही रहता। पता चलता है, हिल उठा है, ऐसा समझ में आता है। अब सब कैसे करना है, वह भी जानता है, सभी संयोग उसे (समझ में) आते हैं।

‘फाइल’ के सामने सख्ती (खंड-2-९)

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तेरा ठीक रहता है या फिर सब यों ही? अभी भी चंचल हो जाता है न?

प्रश्नकर्ता : मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ ही नहीं।

दादाश्री : ऐसा हुआ है। मैं तो चंचलता को देखता हूँ न! तुझे पता नहीं चलता। देह चंचल हो जाए, वह तुझे पता नहीं चलता। मैं पहचान जाता हूँ न चंचलता को!

प्रश्नकर्ता : मन बिगड़ जाए, तब खुद को पता चलता है न?

दादाश्री : मन बिगड़े, विचार बिगड़े तो तुझे पता चल जाता है। लेकिन देह चंचल हो जाए तो वह पता नहीं चलता। देह चंचल हो जाती है। उसके सामने देखने की शक्ति होनी चाहिए। संडास में उसका रूप देख लेना चाहिए। सख्त ही रहना चाहिए। यह तो अच्छा लगता है। बिल्कुल सख्त, अग्नि समझकर अलग रहना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता : दादा कभी-कभार उल्टी साइड का कॉन्फिडेन्स बढ़ जाता है।

दादाश्री : उसमें चोर नीयत होती है। सख्त नहीं हुआ तो समझना कि यहाँ कमी है अभी। जिससे खुद को नुकसान होता है, उससे यदि दूर नहीं रहे न तो मूर्ख ही कहलाएगा न? और यह तो अधोगति कहलाती है। इस गलती को नहीं चला सकते। विषय-विकार और मृत्यु दोनों एक समान ही हैं।

काटो सख्ती से ‘उसे’

जिसकी फाइल बन ही चुकी हो, उसके लिए बहुत जोखिम है। उसके प्रति सख्त रहना चाहिए। सामने आ जाए तो आँखें दिखाना, तो वह फाइल डरती रहेगी। फाइल बन जाने के बाद तो बल्कि लोग चप्पल मारते हैं, तो वह फिर से मुँह दिखाना ही भूल जाता

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

है। कई लोग एकदम सतर्क रहते हैं। जिसे सतर्क रहना है, उसे। बर्ना ढीला पड़ जाता है।

नज़र सख्त कर दें न तो फ़ाइल बनेगी ही नहीं। उसे बुग लगे ऐसा व्यवहार करेंगे तो फ़ाइल नहीं बनेगी। मीठा व्यवहार करोगे तो चिपकेगी और खरगब व्यवहार किया तो वह गुनाह दूसरे दिन माफ़ हो सकता है। हमें इस तरह बात करनी चाहिए कि वह हम से चिपके नहीं। वह गुनाह माफ़ होने का रास्ता है लेकिन यह चिपका, उसका गुनाह माफ़ होने का रास्ता नहीं है। उसी से यह संसार खड़ा है सारा।

प्रश्नकर्ता : फ़ाइल हो, उस पर हमें तिरस्कार नहीं हो रहा हो तो क्या जान-बूझकर तिरस्कार खड़ा करना चाहिए?

दादाश्री : हाँ। तिरस्कार क्यों नहीं होता? जो अपना इतना अहित कर रही है, उस पर तिरस्कार नहीं होता? मतलब अभी पोल है! चोर नीयत है! अपना अहित करे, अपना घर जला दिया हो फिर भी क्या हमें उसके प्रति तिरस्कार नहीं होना चाहिए? यह तो भीतर चोर नीयत है, ऐसा हम समझ जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : भीतर तिरस्कार होता है, लेकिन बाद में बुद्धि पलट देती है।

दादाश्री : पलट देती है, उसका कारण यह है कि चोर नीयत है।

प्रश्नकर्ता : बहुत परिचय हो चुका हो तो उसका अपरिचय कैसे करें? तिरस्कार करके?

दादाश्री : 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करके कई प्रतिक्रमण करना। 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करके फिर सब निकाल देना, फिर आमने-सामने मिल जाए तो उस समय सुना देना चाहिए, 'क्या मुँह लेकर घूम रही है, जानवर जैसी, यूज़लेस।' बाद में फिर वह मुँह नहीं दिखाएगी।

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वहाँ है चोर नीयत

प्रश्नकर्ता : जबरदस्त अहंकार करके भी इस विषय को निकाल देना है।

दादाश्री : हाँ। बाद में इस अहंकार का इलाज कर सकते हैं लेकिन वह रोग कि जहाँ बलवा होनेवाला हो, वहाँ दबा देना पड़ता है। यह तो नीयत चोर है, इसलिए मीठे रहते हैं। मैं समझ जाता हूँ।

प्रश्नकर्ता : जहाँ नीयत चोर है तो उसे सुधारने के लिए क्या करना चाहिए? उसका उपाय क्या है? निश्चय को स्ट्रॉंग करना, वही न?

दादाश्री : अपना नुकसान करे तो उस पर द्वेष ही रहना चाहिए, खराब दृष्टि ही रहनी चाहिए। हमें मिलते ही वह घबरा जाए। सख्त हो गया है, पता चल जाएगा। ऐसा सख्त हो जाए तो फिर असर नहीं करेगा। फिर दूसरा दूँढ लेगी वह।

प्रश्नकर्ता : आपके ज्ञान के बाद पता चलता है कि इसके साथ इतना सख्त हूँ और इतना नरम हूँ।

दादाश्री : हाँ। लेकिन नरम रहना वह पोल है। मैं तो जानता हूँ न सब कि यह पोल है।

प्रश्नकर्ता : जहाँ नरम रहते हैं, वहाँ कभी भी गुस्सेवाली वाणी निकली ही नहीं है। बाकी जगह पर तो बहुत गुस्सा हो जाता है। आपकी बात बिल्कुल सही है।

दादाश्री : नीयत चोर है। हम तुरंत ही समझ जाते हैं न! बाहर तो एकदम नरम!

प्रश्नकर्ता : आप जो कह रहे हैं, हमें अभी भी वह समझ में नहीं आ रहा है।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : वह भी हम जानते हैं न! हम जमा नहीं करते! भले ही कितना भी आप प्रॉमिस दो फिर भी जमा नहीं करते। हम जमा कब करते हैं? वैसा वर्तन देखते हैं, तब।

प्रश्नकर्ता : यह एक बहुत बड़ा रोग हो गया है। खुद पर ज़रूरत से ज्यादा विश्वास हो गया है, बेकार ही।

दादाश्री : भान ही नहीं है न, किसी भी तरह का। खुद पर और पराए पर भान ही नहीं है।

प्रश्नकर्ता : हम फाइल का तिरस्कार करें तो अंदर से ऐसा बताता है कि 'वह हमें गलत समझेंगी।'

दादाश्री : गलत ही समझना चाहिए। उसे ऐसा लगना चाहिए कि हम पागल हैं। हमें किसी भी तरीके से तोड़ देना है और बाद में उसका इलाज हो जाएगा। यह बैर बंधा होगा, उसका इलाज हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : जब तक एक जगह पर भी फँसा हुआ रहे, तब तक दूसरी शक्ति प्रकट नहीं होती।

दादाश्री : यह तो मीठा पोइजन है, पोइजन और वह भी मीठा!

और 'फाइल' आए, उस समय तो सख्त हो ही जाना चाहिए तभी 'फाइल' कॉपेगी! 'यूज़लेस फेलो' ऐसा भी कह देना अकेले में, ताकि वह बैर रखे। चिढ़ जाए तो भी हर्ज नहीं। चिढ़ जाए तो राग खत्म हो जाएगा, आसक्ति खत्म हो जाएगी सारी और वह समझ भी जाएगी कि अब यह फिर से मेरे हाथ में नहीं आएगा। वर्ना फिर वह मौका ढूँढ़ती रहेगी। अब यह सब सँभालना।

फाइल तो अपने नजदीक आए न, तभी से मन में कड़वा जहर जैसा हो जाना चाहिए, अभी ये कहाँ से? यह तो चोर नीयत

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है! इतना ही सावधान रहने जैसा है। बाकी सभी कुछ खाना-पीना न, मैं कहा मना कर रहा हूँ?

सख्त, इस तरह हो सकते हैं

प्रश्नकर्ता : सामनेवाली फाइल, वह हमारे लिए फाइल नहीं है, लेकिन उसके लिए हम फाइल हैं, ऐसा हमें पता चले तो हमें क्या करना चाहिए?

दादाश्री : तब तो और भी जल्दी खत्म कर देना। ज्यादा सख्त हो जाना चाहिए। वह कल्पना करना ही बंद कर देगी न। न हो तो बेतुका बोलना। उससे कहना कि, ‘चार थप्पड़ लगा दूँगा, यदि तू मेरे सामने आई तो! मेरे जैसा सिरफिरा नहीं मिलेगा कोई।’ ऐसा कहोगे तो फिर वापस नहीं आएगी। वह तो इसी तरह खिसकेगी।

प्रश्नकर्ता : ऐसा क्रैक बोलना तो मुझे अच्छे से आता है।

दादाश्री : हाँ। तुझे ऐसा सख्त बोलना अच्छे से आता है और इन सभी को सिखाना पड़ता है। तुझे सहज आता है।

ढीला पड़ना, वह तो सब रोग ही है। यह तो तुम्हें भान ही नहीं है कि उल्टा बोलकर छूट सकते हैं। अपमान किसी को भी अच्छा नहीं लगता। जो फाइल हो, उसे भी अच्छा नहीं लगता। वह भी बेशर्म नहीं होती। अपमान करने पर क्या वह फाइल खड़ी रहेगी?! फिर कल्पनाएँ करना ही बंद कर देगी न? और जब तक यह ढीला रहेगा न, तब तक कल्पनाएँ करती रहेगी। उसके कल्पना करने से अपना मन ढीला पड़ जाता है। इफेक्ट है सारा। भले ही तेरी दृष्टि उस पर नहीं हो, लेकिन अगर वह कल्पना करे तो तेरे अंदर बहुत इफेक्ट होता है, इसलिए फिर गिरता है। इसलिए ऐसा कर देना चाहिए कि वह कल्पनाएँ करना ही बंद कर दे, बल्कि जब-तब गालियाँ दे। तब फिर अपने बारे में कहेगी,

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्व)

‘छोड़ो न उसकी बात, वह तो बहुत खराब है।’ अतः यदि उल्टा सोचेगी तो हमें छोड़ देगी!

प्रश्नकर्ता : मतलब यदि हमें किसी के प्रति ऐसा बुरा विचार आए तो उसे भी आएगा ही, ऐसा?

दादाश्री : कई दिनों तक विचार आते रहें तो सामनेवाले पर उसका असर पड़े बिना नहीं रहता। ऐसा है यह जगत्। इसलिए ऐसा सख्त बोलकर काट दो कि फिर से अपना नाम लेना ही बंद कर दे। दूसरे कई लड़के हैं, वहाँ जा न! यहाँ क्यों आ रही है? उसे ऐसा भी कह सकते हैं कि मेरे जैसा क्रैक हेडेड दूसरा कोई नहीं मिलेगा तो वह भी कहना शुरू कर देगी कि क्रैक हेडेड है। किसी भी रास्ते से छूटना है न हमें! अन्य सभी जगह सयाने बनना न!

तोड़ा जा सकता है लफड़ा कला से

अब्रह्मचर्य से तो यह सब ऐसा गड़बड़ है ही।

प्रश्नकर्ता : फिर खुद की दृष्टि से बाहर ही चले जाते हैं।

दादाश्री : विमुख ही हो जाता है! टच ही नहीं रहना चाहिए न! एक लड़की उसे छोड़ ही नहीं रही थी तो फिर किसी दूसरी लड़की को बुलाकर यों ही उसके साथ चलने लगा तो वह झगड़ने लगी! टैकल करना आना चाहिए। इसे कलाई आती हैं सभी। छूट गया मेरा भाई! इसे नहीं आती और तरह-तरह की गठरियाँ ही बाँधता रहता है।

प्रश्नकर्ता : कला सिखाईएगा।

दादाश्री : ये सिखाई तो हैं कितनी सारी! जो अकेले में कहने की होती हैं, वे भी! बंधा हुआ हो न उनमें से, फिर कोई एक जन खुद का तोड़ देने की कोशिश करे लेकिन टूटता नहीं

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है। अगर वह तोड़ नहीं सके तो उसका फ्रैक्चर कर देना पड़ता है, वहाँ वहेम डाल देना पड़ता है।

प्रश्नकर्ता : कोई एक जन फ्रैक्चर करे, लेकिन सामनेवाला नहीं करने देता उसे।

दादाश्री : सामनेवाले का ही फ्रैक्चर करना है। खुद का फ्रैक्चर नहीं करना है। सामनेवाला ही चिढ़ जाए कि बल्कि यह तो खराब निकला, बनावटी।

प्रश्नकर्ता : सामनेवाले को ऐसा लगना चाहिए कि इसने बनावट की।

दादाश्री : अगर ऐसा रह कि ‘यह टेढ़ा ही है’ तो दिनोंदिन उसके अभिप्राय टूटते ही जाएँगे। बाद में कुछ और ऐसी-वैसी सुना दे, तब तुम्हें छूटना हो तो छूटा जा सकेगा।

प्रश्नकर्ता : यदि खुद का ही पूरी तरह से फ्रैक्चर नहीं हुआ हो तो? खुद का मन पूरी तरह फ्रैक्चर नहीं हुआ हो तो?

दादाश्री : तो फिर कौन मना कर रहा है? तो फिर यह समुद्र नहीं है? डूब जाएगा।

प्रश्नकर्ता : पहले खुद का फ्रैक्चर हो जाना चाहिए न?

दादाश्री : खुद का करने की जरूरत नहीं है। पहले सामनेवाले का फ्रैक्चर कर देना, पूरा। बाद में जब तुम्हें खुद का करना होगा, तब हो सकेगा! जिसे यह करना है, उसका! पहले खुद का तो होगा ही नहीं न!

प्रश्नकर्ता : जब तक सामनेवाले का आकर्षण है, तब तक खुद का पहले नहीं हो सकता, ऐसा है?

दादाश्री : कभी भी नहीं हो सकता। यदि सामनेवाला गाली देना शुरू कर दे तो हमें जब छोड़ना हो तब छूट सकेंगे।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्व)

प्रश्नकर्ता : तो सामनेवाले का फ्रैक्चर कैसे कर सकते हैं?

दादाश्री : हजार रास्ते हैं! नहीं तो एक दिन तो उसे मुँह पर कह देना कि 'क्या करूँ, मेरा मन दुविधा में है! तेरे जैसी दो-तीन हैं। सभी को वचन दिए हैं' कहना। यह तो यहाँ से चिट्ठी लिखता है कि, 'मुझे अच्छा नहीं लगता तेरे बिना।' तब छूटेगा कैसे? फिर और ज्यादा चिपकेगी वह। अब तुझे आ जाएगा न?

अपना बनाया कहकर डियर, तोड़ो देकर फियर

अपना विज्ञान इतना सुंदर है कि हर तरह से आपको एडजस्ट हो जाए। बाहर का एक्सेस हो जाए तो आत्मा खो देता है। बहुत जोरदार हो गया हो तो आत्मा का वेदक चला जाता है। ज्ञाता-दृष्टापन चला जाए और भ्रांति में डाल दे, वह है मोहनीय कर्म।

प्रश्नकर्ता : बाहर का एक्सेस हो जाता है, ऐसा आपने कहा न, ऐसा कैसे है वह?

दादाश्री : किसी को स्त्री के साथ एकता हो गई। अब खुद छोड़ना चाहे लेकिन अगर वह छोड़े तब न? तू उसे मिला नहीं न, फिर भी वह तुम्हारे ही बारे में सोचती रहेगी। तुम्हारे विचार करती रहे, तो तुम बंधे हुए कहलाओगे। विचारों से ही बंधे हुए। वे विचार बंद होते नहीं और अपना छुटकारा हो नहीं पाता। इसलिए पहले समझ लेना चाहिए। और उसके विचार तोड़ने के लिए क्या करना पड़ेगा? उसके साथ झगड़े करने पड़ेंगे, ऐसा करना चाहिए, उसे सब उल्टा-उल्टा बताना चाहिए। दूसरी लड़की को यों ही कहना, तुम तो मेरी बहन हो, कहकर चलो जरा मेरे साथ घूमने, ऐसा उसे दिखाना, मतलब उसका मन फैंक्चर कर देना, धीरे से।

प्रश्नकर्ता : दूसरीवाली चिपक जाए तो?

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दादाश्री : दूसरी चिपक जाए तो दूसरी से छूटना। जिसे छूटना है, उसे सबकुछ आता है।

प्रश्नकर्ता : इसके अलावा, व्यवहार में जरूरत से ज्यादा ढूब जाएँ, धंधे-व्यापार में तो अपना ज्ञाता-दृष्टापन कम हो जाता है, ऐसा नहीं है न?

दादाश्री : व्यापार ऐसी फाइल नहीं है। यह तो दावा करे ऐसी फाइल है। वह दिन-रात तुम्हारे लिए सोचती रहेगी और तुम्हें दिन-रात बाँधती रहेगी। हम अपने घर हों तो भी व्यापार नहीं बाँधता या फिर जलेबी भी नहीं बाँधती, आम भी नहीं बाँधता। यह जो जीवित है, वह बाँधती है, इसमें क्लेम है न? तुम जो सुख दूँढ रहे हो उस तरफ का, तो कोई माँगेंगा मतलब यह क्लेमवाला है। सुख तो जलेबी खाई और अच्छी नहीं लगी तो फेंक दी। उसके अलावा क्या है? कोई दावा भी नहीं है जलेबी का, कोई हर्ज नहीं। ये सारी हमारी सूक्ष्म खोज हैं। वर्ना छूटेंगे कैसे?

तुझे ये बातें बहुत काम आएगी। कितने दिनों से मुझसे पूछता जा रहा है, ‘कैसे छूटना?’ लेकिन यों ही तो मुझसे कहा नहीं जा सकता, कभी ऐसा कुछ कहूँ तब समझ जाना। यह भी, अगर समझोगे तो हल आएगा, नहीं समझोगे तो फिर...

प्रश्नकर्ता : अब जल्दी हल लाने की जरूरत है।

दादाश्री : घर का बिगड़ेगा, घर में खड़ा नहीं रहने देंगे।

प्रश्नकर्ता : बाहर भी अगर बिगड़ गया तो सब जगह बिगड़ जाएगा।

दादाश्री : और घर पर भी फ्रैक्चर हो जाएगा। यहाँ पर भी सब फ्रैक्चर हो जाएगा।

पूरी रात मेरे लिए किसी को कुछ भी विचार आए कि

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

‘दादा ने मेरा ऐसा किया और वैसा किया। दादा ने मेरा नुकसान किया या दूसरी और व्यापार में ऐसे हुआ, फलाना हुआ,’ तो उससे बाँध लेता है, लेकिन मुझे उसके लिए ऐसा विचार आए, ऐसा मेरे पास है ही नहीं न, तो बाँधेगा कैसे? मैं वीतराग ही रहता हूँ, तो वह बाँधे कैसे? मैं वहाँ चिपकूँगा तब मुझे बाँधेगा। वहाँ वीतराग रहना है। छूटने का रास्ता यही है।

प्रश्नकर्ता : कैसे वीतराग रहते हैं?

दादाश्री : भले ही कुछ भी करके भी हमें उस प्रकृति के प्रति द्वेष भी नहीं और राग भी नहीं करना है। वह कहलाता है समभाव से निकाल! वह कितना भी खराब करे, उल्टा करे, नुकसान करे, यदि मैं उसे थोड़ा भी रिपेयर करने जाऊँ तो उसका मतलब इतना है कि मैं राग-द्वेष में पड़ा तो मुझे अभी भी जरूरत है, इच्छा है मेरी, राग-द्वेषवाली प्रकृति है। उसका समभाव से निकाल करने को कहा है।

उसका मन अपने प्रति राग में रहेगा तो बाँधेगा। ऐसा नहीं होना चाहिए। राग या द्वेष से लोगों के मन बाँधते हैं, लेकिन मेरे साथ सच्चे प्रेम से बाँधे तो बल्कि पूरे दिन शांति रहेगी। भगवान महावीर इसी तरह छूटे थे, वर्ना नहीं छूट पाते।

❖ ❖ ❖ ❖ ❖

[ १० ]

विषयी आचरण? तो डिसमिस

यहाँ किए हुए पाप से मिले नर्क

दृष्टि बिगड़े तब वह गलत कहलाता है। दृष्टि नहीं बिगड़े वह ब्रह्मचर्य कहलाता है। बाहर बिगड़े तो हर्ज नहीं। उसका भी प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। यहाँ तो सभी विश्वास से आते हैं न!

अन्य जगह पाप किए हों न, वे यहाँ आने से धुल जाते हैं, लेकिन यहाँ पर किया हुआ पाप नर्कगति में भुगतना पड़ता है। जो हो चुके हों उन्हें लेट गो करते हैं, लेकिन नया तो नहीं होने देना चाहिए न! जो हो चुका है, उसका फिर कुछ उपाय है क्या?

एक बार उल्टा काम हो जाए, अपने आप ही यहाँ से कहीं और चला जाए, मुँह दिखाने के लिए भी खड़ा न रहे। वर्ना फिर दुनिया उल्टी ही चलेगी न, ब्रह्मचर्य के नाम पर! यहाँ ऐसा नहीं चलेगा!

‘अन्य क्षेत्रे कृतम् पापम्, धर्म क्षेत्रे विनश्यति।’

बाहर जो संसार में पाप किया हों, वे धर्मक्षेत्र में जाने से नाश हो जाते हैं और ‘धर्मक्षेत्र कृतम् पापम् वज्रलेपो भविष्यति’ वे नर्कगति में ले जाते हैं। बाहर पाप करने और यहाँ पाप करने में बहुत फर्क है! यहाँ पर तो पाप का विचार तक नहीं आना चाहिए, वज्रलेप होता है। वज्रलेप यानी नर्क के बंधन बंधते हैं, भयंकर यातना भुगतनी पड़ती है!

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

नहीं शोभा देता वह

प्रश्नकर्ता : अभी भी ऐसे विचार और ऐसा क्यों हो जाता है?

दादाश्री : अंदर विचार ही भरे पड़े हैं। वे तो निकलेंगे, लेकिन आचरण में नहीं आना चाहिए। आचरण में आ गया तो बिल्कुल बंद फिर। हमेशा के लिए बंद कर देते हैं हम। ऐसे अपवित्र इंसान यहाँ चलेंगे नहीं न? विचार आएँ तो उन्हें देखनेवाले तुम हो।

प्रश्नकर्ता : वह तो ठीक है, सत्संग में तो ऐसा चलेगा ही नहीं।

दादाश्री : नहीं। नहीं चलेगा। यह तो बहुत पवित्र जगह है, यहाँ तो कभी ऐसा हुआ ही नहीं है।

ऐसों का आना तो हमेशा के लिए बंद ही कर देना चाहिए। कोई इतना विकारी होगा तभी ऐसा हो सकता है! आपको तो विचार आते ही तुरंत उसी समय देख लेना चाहिए। नहीं देख पाओ तो उसका पश्चाताप करना कि यह देख नहीं पाया इसलिए उसका पश्चाताप करता हूँ और अब तो सख्त कदम ही उठाना है, भले ही कोई भी हो लेकिन उसका आना बंद कर देना चाहिए। ऐसी पवित्र जगह! बाकी आचरण में ऐसा हो उसे, पहले एक-दो का आना बंद कर दिया था, तो देखो न अभी तक हमेशा के लिए आ ही नहीं पाते। मुँह भी नहीं दिखाते हैं न!!

पहले जो कुछ हो गया हो, यहाँ पर उस भूल को स्वीकार करना है, नये सिरे से तो होनी ही नहीं चाहिए न! अब इतना देखना है कि आचरण में नहीं आए। आचरण में कभी-भी नहीं आए और जो आचरण में आए, उसे हम यहाँ एडमिट नहीं करते।

इसलिए अपवित्र विचार आएँ तो खोदकर निकाल देना, विचार

विषयी आचरण? तो डिसमिस (खं-2-१०)

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आते ही। जिस तरह अपने खेत-बगीचे में कोई फालतू चीज़ उग जाए तो उसे निकाल देते हैं, उसी तरह उल्टी चीज़ को तुरंत उखाड़ देना चाहिए।

पाशवता करने से तो अच्छा शादी कर लेना। शादी करने में क्या हर्ज है? वह पाशवता अच्छी है, शादीवाली! शादी नहीं करना और गलत नखरे करना, वह तो भयंकर पाशवता कहलाती है, नर्कगति के अधिकारी! और वह तो यहाँ होना ही नहीं चाहिए न? शादी करना तो हक का विषय कहलाता है। सोचकर देखना, शादी करनी है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : सवाल ही नहीं। नो चान्स।

दादाश्री : अभी जब तक पक्का नहीं हो जाता, तब तक डिसीजन नहीं लेना ही ठीक है, धीरे धीरे पक्का करने के बाद ही डिसीजन लेना।

फिसलना सहज, यदि एक बार फिसला

ब्रह्मचर्य भंग करना, वह बहुत बड़ा दोष है। ब्रह्मचर्य भंग हो जाए, तो मुश्किल है। थे वहाँ से गिर पड़े। दस साल से रोपा हुआ पेड़ हो और गिर जाए तो फिर आज ही रोपा हो, ऐसा ही हो गया न और वापस दसों साल व्यर्थ गए! और ब्रह्मचर्यवाला गिर गया। एक ही दिन गिर जाए तो खत्म हो गया।

और जो इंसान यहाँ से फिसला तो फिर वह जो फिसला, वह उतना हिस्सा फिर से जोर लगाएगा, वही हिस्सा फिर से उसे फिसलाएगा। फिर खुद के क्राबू में नहीं रह पाता। फिर क्राबू-कंट्रोल खो देता है, खत्म हो जाता है। वहाँ हम सावधान रहने को कहते हैं। ‘मर जाएगा,’ कहते हैं।

न हो संग संयोगी

जागृति रहती है न, अब? आनंद शुरू हो गया है न! वे

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

सब तो आनंद में आ गए। सभी के चेहरे पर नया ही तेज आ गया है। एक ही दीवार पार करे तो आनंद की शुरुआत हो जाती है और प्रकट हो जाता है तुरंत ही और अगर पार नहीं की और फिसल गया तो वहाँ पर फिर गाढ़ हो जाता है। फिर वापस उल्टा हो जाता है इसलिए कसौटी के टाइम पर संभाल लेना। पाताल फूटकर फिर आनंद उभरता रहता है!

अन्य कुछ भी हो जाए तो परेशानी नहीं है। संग संयोगी नहीं बन जाना चाहिए। बाकी कुछ हो जाए तो उसमें हर्ज नहीं है, उसका अर्थ ऐसा है कि वैसा हो तो बहुत हुआ इतनी फिक्र करने जैसा नहीं है लेकिन संयोग तो मूल्य है। स्त्री-पुरुष का संयोग, वह तो मूल्य ही है, तुम लोगों के लिए ऐसा ही है।

प्रश्नकर्ता : यानी कि मर जाएँ लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए।

दादाश्री : नहीं, वह मूल्य ही है। यों ही मूल्य हो गई क्योंकि जो आनंद प्रकट होनेवाला था, उसी समय फिसल गए। जैसे कि उपवास किया हो, तो थोड़े समय के बाद अंदर अच्छा हो जानेवाला होता है, लेकिन उससे पहले ही खा लेता है!

इसलिए सावधान रहना। वर्ना फिर से यह भूमिका नहीं मिलेगी। ऐसी भूमिका किसी काल में मिलनेवाली नहीं है इसलिए सावधान रहना। यह सब बिल्कुल भी चूकना मत और बहुत बड़ा हमला हो तो मुझे खबर कर देना और इसके अलावा कुछ और हो तो वह सब बताने की कोई जरूरत नहीं है। वह सब यूजलेस! स्त्री-पुरुष का संयोग नहीं होना चाहिए। बस इतना ही। बाकी सब को तो मैं लेट गो कर लूँगा।

प्रश्नकर्ता : यानी उसके जितना जोखिम नहीं है, बाकी सब में?

दादाश्री : नहीं, जोखिम नहीं। सबसे बड़ा जोखिम यही है। यह तो आत्महत्या ही है। उसमें तो पट्टी लगा सकते हैं, उसकी दवाई है।

विषयी आचरण? तो डिस्पिस (खं-2-१०)

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अभी तो, जितना खरा तप करोगे, उतना ही आनंद। यही तप करना है, और कोई तप नहीं। आमने-सामने छोटा हुल्लड हो जाए और खबर कर दें तो तुरंत प्रबंध हो जाता है। इस तरह से प्रबंध रखना है।

प्रश्नकर्ता : अब अंदर यों ब्रह्मचर्य का पक्का निश्चय हो ही गया है!

दादाश्री : तेरा निश्चय हो ही गया है। चेहरे पर नूर आ गया है न!

प्रश्नकर्ता : ज्ञान में थोड़ी कमी रह जाए तो हर्ज नहीं है, लेकिन ब्रह्मचर्य का तो बिल्कुल परफेक्ट (निश्चित) कर लेना है। यानी कम्लीट (संपूर्ण) निर्मूल ही कर देना है। फिर अगले जन्म का जोखिम नहीं रहेगा।

दादाश्री : बस, बस।

प्रश्नकर्ता : अभी तो दादा मिले हैं तो पूरा कर ही देना है।

दादाश्री : पूरा कर ही देना है। वह निश्चय डगमगाए नहीं, इतना रखना है। विषय का संयोग नहीं होना चाहिए। तुम से और कुछ भी होगा तो लेट गो करेंगे (चला लेंगे)। उसका इलाज बता देंगे। बाकी सभी गलतियाँ पाँच-सात-दस तरह की होंगी तो उसका सभी तरह का इलाज बता देंगे। उसका इलाज है, मेरे पास सभी प्रकार का इलाज है। लेकिन इसका इलाज नहीं है। नौ हजार मील आया और वहाँ पर नहीं मिला तो वापस लौट गया। अब नौ हजार पाँचसौ मील पर 'वह' था! यों वापस लौटने की मेहनत की, उससे अच्छा आगे बढ़ न! देखो न इसे निश्चय नहीं हुआ है, कितनी परेशानी है?

प्रश्नकर्ता : निश्चय तो है लेकिन गलतियाँ हो जाती हैं।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : दूसरी कोई गलतियाँ होंगी तो चला लेंगे। विषय संयोग नहीं होना चाहिए। लेकिन तुझे हमने इस गिनती में नहीं लिया है और जिसे गिनती में लिया हो, यह बात उसके लिए है। तू जब तेरा यह टेस्ट एक्ज़ामिनेशन देगा, तब तुझे गिनती में ले लेंगे। फिर तुझे भी डॉटिंगे। अभी तुझे नहीं डॉटिंगे। मजे कर। खुद के हित के लिए मजे करने हैं न? किस के लिए मजे करने हैं?

प्रश्नकर्ता : मजे करने में खुद का हित तो नहीं होता है।

दादाश्री : नहीं होता। तो फिर मजे क्यों करता है?

वहाँ पर दादा की मौन सख्ती

विषय में संयोग हुआ तो हमारी नज़र कड़वी हो जाती है, हमें तुरंत सबकुछ पता चल जाता है? 'दादा' की नज़र कड़वी रहती है, वह सिर्फ विषय के बारे में ही, बाकी चीज़ों में नहीं। बाकी चीज़ों में कड़वी नज़र नहीं रखते। दूसरी गलतियाँ हो सकती हैं, लेकिन 'यह' तो होनी ही नहीं चाहिए, अगर हो जाए तो हमें बता देना। रिपेयर कर देंगे, छुड़वा देंगे।

प्रश्नकर्ता : हर तरह से छूटने के लिए ही यहाँ दादा के पास आना है।

दादाश्री : उसमें हर्ज नहीं। इसीलिए तो इन आप्तपुत्रों से मैंने सब लिखवा लिया है ताकि मुझे नहीं निकालना पड़े, तुम्हें अपने आप ही चले जाना है।

वह विषय यदि 'संयोग' रूप में हो रहा हो न, तो उस पर हमारी कड़वी नज़र होने पर वह अपने आप ही छूट जाता है। ताप ही छुड़वा देता है। हमें डॉटना नहीं पड़ता। इतनी कड़वी नज़र पड़ती है, उस ताप की वजह से उसे रात को नींद तक नहीं आती। वह सौम्यता का ताप कहलाता है। प्रताप का ताप

विषयी आचरण? तो डिस्पिस (खं-2-१०)

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तो जगत् के लोगों के पास है। प्रताप तो, चेहरे पर तेज रहता है, ऐसे ब्रह्मचर्य भी अच्छा, शरीर बलवान होता है, वाणी ऐसी प्रतापवान, व्यवहार ऐसा प्रतापवान। प्रताप तो होता है संसार में, लेकिन सौम्यता का ताप नहीं होता किसी के पास। अब ये दोनों साथ में हों, तब जाकर काम होता है। सूर्य-चंद्र के दोनों गुण। सिर्फ प्रतापी पुरुष होते हैं, लेकिन कुछ ही, ज्यादा तो इस दृषमकाल में होते ही नहीं हैं न!

प्रश्नकर्ता : और अपना यह ज्ञान ही ऐसा है कि अंदर से ही यों जोर लगाकर सावधान करता रहता है।

दादाश्री : हाँ, वह जोर लगाता है।

प्रश्नकर्ता : यानी थोड़ा सा भी कुछ इधर-उधर हो जाए न, तो अंदर शोर मच जाता है कि 'यहाँ चूके, वापस लौटो यहाँ से।' मतलब अंदर सेफ की तरफ ही पूरा खींच लाता है हमें।

दादाश्री : हारने लगे तो मुझे बता देना। एक ही जन्म यदि अपवित्र नहीं हुआ तो मोक्ष हो जाएगा, हरी झंडी। अगर शादी कर लो तो भी हर्ज नहीं है। तब भी मोक्ष में दिक्कत नहीं आएगी।

प्रश्नकर्ता : हम इच्छापूर्वक किसी को छूएँ तो वह वर्तन में आया ऐसा कहा जाएगा न?

दादाश्री : इच्छापूर्वक छूना? तब तो वर्तन में ही आया कहलाएगा न। इच्छापूर्वक अंगारों को छूकर देखना न?!

प्रश्नकर्ता : समझ गया।

दादाश्री : उसके बाद अगर आगे की इच्छा तो, इच्छा होते ही वहाँ से निकाल ही देना चाहिए जड़ से, उगते ही, बीज उगते ही जान जाओ कि यह कौन सा बीज उग रहा है? तो वह है विषय का। तो तोड़कर निकाल देना है। वरना उसे छूते ही आनंद हुआ, तब तो फिर खत्म हो गया। वह जीवन ही नहीं

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

रहा न, मनुष्य का! अब कानून समझकर करना यह सब। जिसके वर्तन में आ जाए, तो उसका आना हम बंद कर देते हैं क्योंकि नहीं तो यह संघ टूट जाएगा। संघ में तो विषय की दुर्गंध आनी ही नहीं चाहिए। अतः अगर ऐसा हो तो मुझे बता देना। शादी करेगा फिर भी उपाय है। शादी करने से मोक्ष चला नहीं जाएगा। तेरे पास उपाय रहे, ऐसा कर देंगे।

आप्तपुत्रों के लिए दफाएँ

जिसका निश्चय है न, वह रह सकता है! सिर पर ज्ञानीपुरुष की छत्रछाया है। ज्ञान लिया हुआ है, अंदर सुख तो रहता ही है न, फिर किसलिए कुएँ में गिरना? इसलिए यह जो प्रमाद किए हैं न, उसके बाद मुझे अच्छे ही नहीं लगते तुम। अभी भी प्रमादी और यों सारे यूजलेस। कुछ ठिकाना ही नहीं है न! मेरी मौजूदगी में सोते हैं, फिर क्या बात करनी? कब लिखकर देनेवाले हो?

प्रश्नकर्ता : आप कहें तब। अभी लिखकर दे देते हैं।

दादाश्री : दो दफाएँ, एक विषयी व्यवहार, यदि विषयी व्यवहार हो जाए तो हम खुद ही निवृत्त हो जाएँगे, किसी को निवृत्त नहीं करना पड़ेगा। ऐसा लिखना है। हम खुद ही यह स्थान छोड़कर चले जाएँगे और दूसरा अगर यह प्रमाद हो जाए तो उस समय संघ हमें जो भी दंड देगा, वह। तीन दिन तक भूखे रहने की या कुछ भी, जो भी दंड देंगे, उसे स्वीकार कर लेंगे। हम कहाँ बीच में आएँ! यह संघ है न। ये लोग मेरी मौजूदगी में इतना सोते हैं तो क्या यह अच्छा दिखता है? हाँ, दोपहर में तो सो रहे थे, तो ये पकड़े गए सब। पहले भी कई बार पकड़े गए थे। यह तो सारा कचरा माल है। वह तो जैसे तैसे थोड़ा बहुत सुधरा। तुझे ऐसा लिखकर देना है। आप्तपुत्र ऐसा लिखकर देंगे, हमें। दो दफाएँ, कौन सी दफाएँ लिखकर देंगे?