भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

ही नहीं रहा। विषय स्थूल स्वभावी है और आत्मा सूक्ष्म स्वभावी है, ऐसी जागृति रहती नहीं है न! उसमें तो ज्ञानी का ही काम है। ये गॉँठें, ये तो आवरण हैं। जब तक ये गॉँठें हैं, तब तक आत्मा का स्वाद चखने को नहीं मिलता। जिसके ज्यादा विचार आएँ, जहाँ दृष्टि अधिक आकृष्ट हो जाए, वहाँ पर गॉँठ बढ़ी है। दादाश्री ने अक्रम मार्ग में सामायिक को बहुत महत्व दिया है। यहाँ पर तो आत्मस्वरूप होकर दोषों को देखते रहना है। उससे दोष विलय होते हैं, यह एक फायदा और दूसरा खुद ज्ञाता-दृष्टा पद में रहा, उतना आत्मा में रहने का फल भी मिलता है! आनंद-आनंद हो जाता है! सामायिक में तमाम प्रकार के दोषों को रखकर उनसे मुक्त हुआ जा सकता है। इसके बिना इतनी सारी गॉँठें विलय हो सकें, ऐसा नहीं है। अक्रम की यह सामायिक आसान, सीधी और नकद फल देनेवाली है! समूह में की हुई सामायिक बहुत ही प्रभावशाली होती है! पूज्य दादाश्री सामायिक करने पर बहुत जोर देते थे।

अब विषय नहीं चाहिए, लेकिन क्या विषय आपको छोड़ देंगे? खड़ड़े में गिरना किसे पसंद है? फिर भी खड़ड़ा सामने आ जाए तो क्या वह छोड़ देगा? खड़ड़े से बचने के लिए क्या करना चाहिए? हर रोज एक घंटा दादाश्री से माँगना कि, 'हे दादा, मुझे ब्रह्मचर्य की शक्ति दीजिए।' तो शक्ति मिल जाएगी और साथ ही साथ प्रतिक्रमण भी हो जाएगा। फिर उसकी चिंता या बोझ दिमाग पर नहीं रखना है। खड़ड़े में गिरा कि तुरंत सामायिक करके धो देना।

खड़ड़े में गिर जाए, उसमें ज्ञानी को कोई हर्ज नहीं है लेकिन तुम उसका उपाय करना। सामायिक! वही एकमात्र उपाय है!

८. स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता

स्त्री के अंगों को देखने में सुख है, यह मान्यता बिल्कुल गलत है। निरी गंदगी ही है। लेकिन यह तो जो रोग बिलीफवाला मन है, वह उस तरफ खींच ले जाता है। लेकिन आज का ज्ञान रोकता है, उसमें से। अगर सौ बार रोग बिलीफ को सच माना तो सौ बार उसे तोड़ना पड़ेगा। स्त्री के स्पर्श के समय जागृति नहीं रहती और सुख भोग लेता है और स्त्री स्पर्श भी उतना ही पोज़नस होता है। वह इतना अधिक पोज़नस

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होता है कि मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार, सभी पर आवरण आ जाता है। अभान कर देता है! मूर्छित! उस समय जानवर ही बना देता है! शराब पीने के बाद मूर्छित हो जाता है, वैसा। लेकिन शराब पीने के बाद अभान होते होते तो आधा घंटा या घंटा बीत जाता है और यह तो छूते ही इलेक्ट्रिसिटी की तरह असर डाल देता है और अंदर विषय चढ़ जाता है! देर ही नहीं लगती! दादाश्री निज अनुभव कहते हैं, “कम उम्र में सिर्फ छूने से ही अंदर घबराहट हो गई थी कि अरेरे, यह क्या हो जाता है? यह तो इंसान में से हैवान बन जाते हैं! फिर इसकी ‘नो लिमिट’। हम तो अनंत जन्म से ब्रह्मचर्य के रागी हैं इसलिए यह अच्छा नहीं लगता, लेकिन मजबूरन हुआ था। थोड़ा बहुत संसार भोगा लेकिन अरुचिपूर्वक, प्रारब्धवश, ऐसा तो क्या शोभा देता होगा?”

स्पर्श सुख के समय क्या करना चाहिए? ‘यह रोंग बिलीफ है,’ लगातार ऐसे टोकते रहना और स्पर्श जहर जैसा लगना चाहिए। लेकिन यह तो पूर्व जन्म की मान्यता है कि इसमें सुख है, उस आधार पर सुख लगता है। इसलिए अब उस मान्यता को हटा देना है। बाद में ज्ञान की पराकाष्ठा में स्पर्श सहज लगेगा।

स्त्री का दोष नहीं है, अपनी मान्यता का दोष है। विषय में सुख है, यह बिलीफ कैसे बैठ गई? लोकसंज्ञा से। लोगों के कहने से। यह मात्र साइकोलॉजिकल इफेक्ट है।

दृष्टि आकृष्ट होने का साइन्स क्या है? जहाँ पूर्व जन्म का कुछ हिसाब है, वहाँ दृष्टि आकृष्ट हो जाती है। दृष्टि आकृष्ट हुई और उसमें आकर्षण और विषय की रमणता हुई कि परमाणुओं का जबरदस्त असर होने लगता है। फिर खिंचाव और आकर्षण बढ़ता जाता है। उसका पीक (उच्चतम) पॉइंट आने के बाद कुदरती रूप से विकर्षण होने ही लगता है। आकर्षण शुरू हुआ तभी से विकर्षण के कारणों का सेवन शुरू हो गया, ऐसा माना जाता है। ऐसा है परमाणुओं का अट्रैक्शन (आकर्षण)! परमाणुओं का आकर्षण करता है यह सारा काम। आकर्षण के बाद खुद की सत्ता रहती ही नहीं। फिर विकर्षण होता ही है। चारा ही नहीं है। वे परमाणु ही खुद विकर्षण करवाकर अलग करवा देते हैं! उसके अमल का फल देकर!

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मन और चित् विषय में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। चित् बार-बार वहीं पर रमणता करता है। फिर उसका गलन हुए बिना रहता ही नहीं। एक बार विषय को छूआ तो फिर दिन-रात उसी के सपने आते रहते हैं। इतनी अधिक पकड़ आ जाती है, चित् पर विषय की!

विषय के जो विचार आते हैं, वे मन की ग्रंथि में से। उसका और चित् का कोई लेना देना नहीं है। चित् ने यदि विषय को स्पर्श कर लिया तो कितने ही समय तक ध्यान में स्थिरता नहीं रह पाती। दादाश्री कहते हैं कि हमारा चित् कैसा है कि कभी भी अपने स्थान पर से खिसका ही नहीं। तभी तो दादा की आँखों में सदा वीतरागमय प्रेम और करुणा ही दिखती है!

चित्तवृत्तियाँ जहाँ-जहाँ भटकती हैं, वहाँ आत्मा को भटकना पड़ता है! चित्तवृत्तियाँ अगले जन्म के लिए जाने-आने का नक्शा बनाती हैं। चित्, वह मिश्रचेतन है इसलिए भटकता है। जहाँ-जहाँ चिपके, वहाँ-वहाँ! अब जहाँ जाए वहाँ तुरंत ही प्रतिक्रमण से धो दे तो वह विषय दोष नहीं माना जाएगा।

जो चित् को डिगाएँ, वे सभी विषय हैं। चित् को आत्मा से बाहर जकड़कर रखें, वे सभी विषय। विचारों की नहीं लेकिन चित् का झंझट बड़ा है! मन में भले ही विषय के कितने भी विचार आएँ, उन्हें हटाते रहो। उनसे बातचीत करो तो परेशानी नहीं होगी। लेकिन चित् तो बाहर जाना ही नहीं चाहिए। पहले जिन पर्यायों का खूब वेदन किया होगा, चित् अभी वहाँ पर ज्यादा जाता है। वहीं चिपका रहता है। उसे अटकण कहा गया है। उसे अलग रखकर कहना, 'तू ज्ञेय और मैं ज्ञाता।' उससे फिर तुरंत मुक्त हो जाएगा। यह चित् फ्रैक्चर होने से विषय में फँस गया है, जिसका फल है जानवर गति!

९. 'फाइलों' के सामने सख्ती

स्त्री यदि मोह का जाल डाले तो उससे कैसे बचें? जहाँ फँसाव हो तो वहाँ हमें दृष्टि ही नहीं डालनी चाहिए और उसकी आँखों से आँखे भी नहीं मिलानी चाहिए। उसे मिलना ही मत। कई बार ऐसे संयोगों में

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आ जाते हैं कि हमारे जान-पहचानवाले या सगे संबंधियों की ही दृष्टि खराब होती है, तो वहाँ पर क्या करना चाहिए? जैसे हमें उसके इरादों का कुछ पता ही नहीं है, 'नो रिस्पाँस', ऐसे रखना और नीचा देखना, जितना हो सके उतना उसे टालना। आकर्षण में वह मत जाना। जहाँ पर आँखें आकृष्ट हों, वहाँ से दूर रहना। निकाचित विकारी मालवाला, सत्संग में भी फिसल जाता है, वह तो भारी नुकसान उठाता है। उसे ज्ञानी से पूछकर साफ कर लेना चाहिए।

'फाइल' कब कहलाएगा कि थोड़ी ही देर में आकृष्ट हो जाए। भूत की तरह लिपट जाए। 'फाइल' सामने आए तो अंदर उथल-पाथल मचा देती है। ऊपर जाता है, नीचे जाता है... भीतर चंचलता खड़ी हो जाती है। अकारण मुख पर लाली आ जाती है, खुश-खुश हो जाता है और 'उसकी दृष्टि कहाँ घूम रही है' यह दूँढने में ही खुद की दृष्टि खो जाती है। और 'फाइल' मौजूद नहीं हो फिर भी याद आए, वह तो बहुत भारी जोखिम है, मौजूदगी में असर डाले उससे भी ज्यादा। तब तो लगाम ही नहीं रहती। मन चंचल हो जाता है और दुःख होता है।

कृपालुदेव ने 'काष्ठ की पुतली है, ऐसा मानना' कहा है। संडास करती हुई स्त्री को देखे तो क्या चित वहाँ पर फिर से जाएगा? ऐसा सेट कर देना। या फिर अगर 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करेगा तो भी चला जाएगा।

अग्नि और 'फाइल' दोनों एक समान। जलाकर मार डालता है। छूते ही जला देता है। 'फाइल' के साथ हमें सख्त नज़र से ही रहना है। उसे खराब लगे, अपमान हो, उस तरह से व्यवहार करना। वहाँ बहुत भारी जोखिम है।

फाइल पर तिरस्कार आए, फिर भी हर्ज नहीं। उसका उपाय है। लेकिन तिरस्कार नहीं आए तो समझ जाना कि अभी भी अंदर पोल(गड़बड़) है, चोर नीयत है। जिस 'फाइल' के साथ बहुत गाढ़ हिसाब हो गया हो तो वहाँ 'नहीं है मेरी, नहीं है मेरी' करके कई-कई प्रतिक्रमण कर लेना। रूबरू मिले तो अपमान कर देना, तो वह वापस फड़केगी ही नहीं।

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और यदि तुम किसी के लिए ‘फाइल’ बन गए हो, तब तो बहुत आसान है वहाँ से छूटना। थोड़ा अपमान करो या उल्टा बोल दो तो वह छोड़ देगी तुम्हें। वहाँ पर अगर ‘हमें समभाव से निकाल करना है’, कहकर उसे दुःख न हो ऐसा व्यवहार करने जाओगे तो दोनों का ही विषय में बिगड़ेगा। वहाँ समभाव से निकाल यानी उसका अपमान करके तोड़ देना, वह ! जब तक तुम्हारी तरफ से ढीला रहेगा, तब तक वह कल्पनाएँ करती रहेगी। इसलिए सामनेवाले की कल्पनाएँ करना जड़ से ही बंद हो जाए, उसके लिए तुम्ही को सख्ती रखकर, तुम्हारे प्रति उसे अभाव आ जाए, ऐसा वर्तन और वाणी सेट कर देने चाहिए या फिर दोस्तों से कहलवा देना कि तेरे जैसी दूसरी दो-तीन को प्रोमिस दिया हुआ है। तुम्हें किसी के प्रति बार-बार विषय के विचार आते रहें, तो फिर सामनेवाले पर भी उसका असर होता है और उसे भी विचार शुरू हो ही जाते हैं।

१०. विषयी वर्तन ? तो डिसमिस

सत्संग में कहीं पर भी दृष्टि बिगड़नी नहीं चाहिए। दृष्टि बिगड़ जाए तो प्रतिक्रमण करके उड़ा देना, तो भी चलेगा। लेकिन यहाँ पर वर्तन में तो आना ही नहीं चाहिए। यदि ऐसा किसी को हो रहा हो तो वह चलाया ही नहीं जा सकता। उसे फिर डिसमिस करना पड़ेगा। फिर कभी भी सत्संग में आने को नहीं मिलेगा। ‘धर्म क्षेत्रे कृतम् पापम्, ब्रजलेपम् भविष्यति’ धर्मक्षेत्र में किया हुआ पाप ब्रजलेप जैसा होता है, जो नर्क में ही ले जाता है। यहाँ रहकर पाशवता करने से तो शादी कर लेना अच्छा। हक्र का तो कहलाएगा। ब्रह्मचर्यवाला एक ही बार फिसला कि खत्म हो गया। यदि संयोग संबंध हो जाए तो वह आत्महत्या के बराबर है। उसका बहुत जोखिम है। वह चलेगा ही नहीं। बाकी सभी गलतियाँ चलाई जा सकती हैं लेकिन यह नहीं चलाई जाएगी। वहाँ दादा की नज़र बहुत सख्त हो जाती है। नज़रें लाल ही रहती हैं, उस पर। इसलिए ब्रह्मचारियों से दो नियम लिखवाए थे। एक तो, विषय संयोग हो जाए तो खुद ही यह सत्संग छोड़कर हमेशा के लिए दूर चले जाना होगा और दूसरा पूज्य दादाश्री की मौजूदगी में कोई झोंका नहीं खा सकता। यदि झोंका खा ले तो उसे खुद ही रूप छोड़कर चले जाना होगा।

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११. सेफ साइड तक की बाड़

ब्रह्मचर्य पालन करने के लिए इतने कारण तो होने ही चाहिए। एक तो अपना यह ज्ञान होना चाहिए। दूसरा ब्रह्मचारियों का संगबल चाहिए। शहर से दूर आवास होना चाहिए। बाहर का कुसंग नहीं छूना चाहिए। जिसे निरंतर दादा का निदिध्यासन रहे, उसे कुसंग छू ही नहीं सकता।

परम पूज्य दादाश्री खुद के सिद्धांत के लिए क्या कहते हैं, 'हम कोई वंश बढ़ाने थोड़े ही आए हैं? क्या किसी गद्दी की स्थापना करने आए हैं? हम तो निकाल करने के लिए आए हैं।'

१२. तितिक्षा के तप से गढ़ों, मन और देह

तितिक्षा यानी क्या? जब घास या चारे में सोना पड़े, कंकड़ चुभ रहे हों, उस समय अगर घर याद आए तो वह तितिक्षा नहीं कहलाती। कंकड़ चुभें, तो वह भी अच्छा लगना चाहिए।

रात को दो बजे स्मशान में छोड़ आएँ तो क्या होगा? चिता देखकर? डर बैठ जाएगा? बुखार चढ़ जाएगा?

मोक्षमार्ग में जबरदस्त मनोबल की जरूरत है। किसी भी प्रकार के विकट संयोगों में भी ऐसा कभी भी नहीं हो कि 'अब मेरा क्या होगा?' स्थिरता से पार निकल जाए।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि मैंने अपनी जिंदगी में एक भी उपवास नहीं किया है। पित्त प्रकृति थी, इसलिए उनसे उपवास नहीं हो सकता था। चोविहार, कंदमूल त्याग, उणोदरी (भूख लगे जब भोजन के उपरांत पेट में १ भाग भोजन, १ भाग पानी, १ भाग हवा रहे) तप आदि किया था। उपवास से जागृति बढ़ती है, अंदर जो कचरा जमा हो, वह जल जाता है। वाणी भी कम हो जाती है। ब्रह्मचारियों को हफ्ते में एक दिन उपवास करना चाहिए।

ज्ञानी उणोदरी तप को बहुत महत्व देते हैं। दादाश्री ने हमेशा उणोदरी की थी। उणोदरी यानी पेट को आधा खाली रखना। उससे जागृति

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बहुत बढ़ती है। बीच-बीच में खाते नहीं रहना चाहिए। आहार से अंदर नशा चढ़ता है, दारू बनती है। चरबीवाला, मिठाई, तला हुआ आहार नहीं लेना चाहिए। अपने रोटी-दाल-चावल-सब्जी, वह आदर्श आहार माना जाता है। नींद भी बहुत कम आती है। घी-तेल से मांस बढ़ता है और मांस बढ़ने से वीर्य बढ़ता है। छोटे बच्चों को मगस(गुजराती व्यंजन) या घी, मेवे के लड्डू नहीं खिलाने चाहिए। नहीं तो बाद में बड़े होकर बहुत ही विकारी बन जाएंगे। माँ-बाप ही बिगाड़ते हैं उन्हें। नहाने से भी विषय जागृत होता है। इसलिए स्पंज कर लेना चाहिए। बीमार इंसान को कभी विषय याद आता है? जो तीन दिन से भूखा हो, उसे विषय याद आता है? कंदमूल खाने से ब्रह्मचर्य नहीं टिकता। इसलिए वह नहीं खाना चाहिए।

१३. न हो असार, पुद्गलसार

ब्रह्मचर्य, वह पुद्गलसार है। आहार का सार क्या? वीर्य। इसलिए ब्रह्मचर्य मोक्षमार्ग का आधार है। ज्ञान के साथ अगर ब्रह्मचर्य हो तो सुख की सीमा नहीं रहेगी। लोकसार, वह मोक्ष है और पुद्गलसार, वह वीर्य है। महंगे से महंगी चीज वीर्य है। उसे मुफ्त में कैसे व्यर्थ कर सकते हैं? वीर्य ऊर्ध्वगामी हो, ऐसे भाव रखने चाहिए। अक्रम ज्ञान वीर्य का ऊर्ध्वगमन करवानेवाला है। अज्ञान, वीर्य को अधोगामी करवाता है और ज्ञान ऊर्ध्वगामी करवाता है! हैं तो दोनों रिलेटिव। लेकिन वीर्य के परमाणु सूक्ष्मरूप से ओजस में परिणामित होते हैं, उसके बाद वह अधोगामी नहीं होता। वीर्य या तो संसार के रूप में परिणामित होता है या ऐश्वर्य के रूप में!

संसार-व्यवहार में साधक के रिबोल्यूशन रुक जाते हैं। उसका क्या कारण है? आत्मवीर्य प्रकट नहीं होता। इसलिए मन में संसार-व्यवहार सहन करने की शक्ति नहीं रहती। इसलिए भगौड़ा बन जाता है। उसके बजाय तो आत्मा में ही रहने जैसा है। आत्मवीर्य का अभाव अर्थात व्यवहार का सोल्यूशन नहीं ला सकते। आत्मवीर्य कब प्रकट होता है? आत्मा के अलावा अन्य कहीं पर भी रुचि न रहे। दुनिया की कोई चीज ललचा न सके तब।

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वीर्य के ऊर्ध्वगमन होने के लक्षण क्या हैं? चेहरे पर तेज आ जाता है। ब्रह्मचर्य का नूर झलकता है! वाणी और वर्तन मीठे हो जाते हैं। मनोबल खूब बढ़ जाता है!

स्वप्नदोष का कारण क्या है? जैसे टंकी छलककर उभर जाती है, वैसा। यदि आहार पर कंट्रोल रखा जाए तो स्वप्नदोष नहीं होंगे। उसमें भी रात को भोजन नहीं लेना चाहिए। उणोदरी करे और चाय-काँफ़ी नहीं लेने चाहिए आदि। फिर भी स्वप्न दोष को इतना बड़ा गुनाह नहीं माना गया है। लेकिन जान-बूझकर नहीं करना चाहिए। वह भयंकर गुनाह है। वह आत्महत्या कहलाता है। जान-बूझकर डिस्चार्ज की छूट नहीं होती। कोई क्या जान-बूझकर कुएँ में गिरता है?

सामान्यतः लौकिक तौर पर ऐसा प्रचलित है कि वीर्य का गलन, वह पुद्गल स्वभाव ही है। वह लीकेज नहीं है। ज्ञानियों की ज्ञानदृष्टि क्या कहती है कि जब दृष्टि बिगड़े या विचार बिगड़े तब वीर्य का कुछ हिस्सा 'एकजॉस्ट' हो जाता है। फिर वह डिस्चार्ज होता रहता है। स्वप्नदोष को गुनाह नहीं माना है। लेकिन फिर भी सुबह उसका प्रतिक्रमण करना पड़ता है। पछतावा करना चाहिए। दादा की पाँच आज्ञा का पालन करे, उसे विषय-विकार हो सकें, ऐसा नहीं है। बाह्य उपायों में उपवास, आर्यबिल (जैनों में किया जानेवाला व्रत, जब भोजन में एक ही प्रकार का धान खाया जाता है) वगैरह। शरीर को हृष्ट पुष्ट नहीं होने देना चाहिए। सर्दी-गर्मी को सहन कर सके और सादा सात्विक आहार ले। जिसका वीर्य ऊर्ध्वगामी होने लगे, वह ज्ञान धारण कर सकता है। जैन शास्त्र में नौ बाड़ के नियम दिए गए हैं, ब्रह्मचारियों के लिए। निरोगी कभी भी विषयी नहीं होता। संपूर्ण निरोगी तो तीर्थंकर ही होते हैं!

आत्मज्ञान की दृष्टि से विचार अच्छे या बुरे नहीं होते। दोनों ही ज़ेय हैं। उसे ज्ञाता रहकर देखते रहें, तो वे खत्म हो जाते हैं। लेकिन यदि उनमें तन्मयाकार हो जाए तो कर्म बंधन होने लगता हैं। लेकिन अगर तुरंत ही प्रतिक्रमण कर लें तो वह धुल जाएगा। यदि उसका काल पक जाए और अवधि पूरी हो जाए तो कर्म बंधन होता है, लेकिन अगर उससे पहले ही प्रतिक्रमण से धो दिया जाए तो कर्म बंधन नहीं होगा।

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जहाँ तक विषय का सवाल है, इन्द्रियों पर इफेक्ट और मन दोनों अलग भी रह सकते हैं। स्थूल विषय भोगने से पहले, मन विषय भोगे या नहीं भी भोगे। चित्त से भोगना मतलब तरंगों (शेखचिल्ली जैसी कल्पनाएँ) से, फिल्म से भोगना। जब चित्त से या मन से भोगे, उसी को भोगना कहते हैं। अगर मन से मंथन में चला जाए तो पूरा सार मर जाता है। वह मरा हुआ पड़ा रहेगा और फिर वह डिस्चार्ज होगा ही। विषय के विचार में तन्मयाकार हो जाना, वही मंथन है। तन्मयाकार नहीं हुआ तो पार उत्तर जाएगा, ब्रह्मचर्य के साइन्स में! मंथन होने लगे कि तुरंत ही प्रतिक्रमण कर लेना। प्रतिक्रमण का टाइमिंग संभालना आवश्यक है। यदि कुछ ज्यादा टाइम बीत जाए तो फिर मंथन हो ही जाता है। इसलिए विचार आते ही, ऑन द मोमन्ट प्रतिक्रमण हो जाना चाहिए। आगे-आगे विचार और पीछे-पीछे प्रतिक्रमण हो ही जाना चाहिए। जहर पीया लेकिन गले से नीचे उतरने से पहले ही यदि उल्टी कर दे तभी बच जाएगा! उसी प्रकार यह प्रतिक्रमण भी तुरंत ही हो जाना चाहिए। जरा सा भी विचारों में फँसा तो फिर मंथन शुरू हो जाता है। फिर स्खलन हुए बिना नहीं रहेगा। आधे घंटे तक उल्टा चला हो लेकिन अगर जागृत हो जाए तो प्रतिक्रमण से सब धो सकता है! ऐसा ग़ज़ब का है यह अक्रम विज्ञान!

१४. ब्रह्मचर्य प्राप्त करवाए ब्रह्मांड का आनंद

ब्रह्मचर्य से अपार आनंद मिलता है। अन्य किसी चीज़ में कभी भी न चखा हो, ऐसा आनंद उत्पन्न हो जाता है! महा-महा पुण्यात्मा को प्राप्त होता है ब्रह्मचर्य। खरा ब्रह्मचर्य ज्ञानी की आज्ञानुसार होना चाहिए। और गलती हो जाए तो उनसे माफी माँग लेना। जो संपूर्ण ब्रह्मचर्य में आ जाए, उसका अनंत जन्मों का सभी नुकसान पूरा हो गया माना जाएगा। निर्भय हो जाता है और ब्रह्मचर्य का तेज तो सामनेवाली दीवार पर भी पड़ता है! जिसे शुद्धात्मा का वैभव चाहिए, उसके लिए ब्रह्मचर्य पालन आवश्यक है। ज्ञान में बहुत मदद करता है वह! ब्रह्मचर्य, वह महाव्रत है। उससे आत्मा का स्मेशल अनुभव होता है!

ब्रह्मचर्य व्रत लेने के बाद उसे तोड़ने से भयंकर दोष लगता है। मारा ही जाता है, वह। व्रत देनेवाले निमित्त को भी दोष लगता है।

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इसलिए उसके लिए बहुत जल्दबाजी करने की ज़रूरत नहीं है। ब्रह्मचर्य का अंतिम फल है, सर्वसंग परित्याग!

एक ही सच्चा व्यक्ति हो तो भी जगत् कल्याण कर सकेगा। अधिक से अधिक जगत् कल्याण कब हो सकता है? त्याग मुद्रा होने पर अधिक हो सकता है। गृहस्थ मुद्रा में जगत् का कल्याण अधिक नहीं हो सकता। कुछ कुछ लोगों को प्राप्ति होती है (बड़े पैमाने पर), लेकिन सारी पब्लिक को प्राप्ति नहीं हो सकती। ऊपरी तौर पर पूरे बड़े-बड़े वर्ग को प्राप्ति हो जाएगी, लेकिन पब्लिक को प्राप्ति नहीं हो पाएगी। और फिर अपना त्याग अहंकार रहित होना चाहिए! अक्रम का चारित्र तो बहुत उच्च कहलाता है! ग़ज़ब का सुख बर्तता है।

‘मैं शुद्धात्मा हूँ’, यह निरंतर लक्ष्य में रहे तो वह सबसे महान ब्रह्मचर्य है। ब्रह्म में चर्या, वही है रियल ब्रह्मचर्य।

विषय से छूट गया, ऐसा कब कहा जाएगा? जब विषय से संबंधित कोई भी विचार नहीं आए, दृष्टि आकृष्ट नहीं हो तब।

१५. ‘विषय’ के सामने विज्ञान की जागृति

आकर्षण हो जाए, तो उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन उसे पकड़ लिया, तन्मयाकार हो गया तो वह आपत्ति जनक है। आकर्षण के सामने अपना विरोध, वही है तन्मयाकार नहीं होने की वृत्ति। तन्मयाकार हुआ यानी गोता खा गया समझना। कोई जान-बूझकर फिसलता है? चिकनी मिट्टी पर से होकर उतरते समय पैरों की उँगलियों को कैसे दबाकर चलते हैं? हम गिरने के विरोध में कितना रहते हैं?

कोई दादाश्री से पूछे कि दृष्टि पड़ते ही यदि अंदर चंचल परिणाम खड़े हो जाते हैं, तो वहाँ क्या करना चाहिए? उसे दादाश्री विज्ञान बताते हैं, कि दृष्टि ‘हम’ से अलग चीज़ है। तो फिर अगर दृष्टि पड़े तो उससे हमें क्या हो सकता है? हम नहीं चिपकेंगे तो दृष्टि क्या कर सकती है? होली को देखने से आँखें जल जाती हैं क्या? ‘खुद के’ भीतर की गलती से आकर्षण होता है।

एट ए टाइम दोनों दृष्टियाँ रखनी हैं। रियल में शुद्धात्मा देखना है और रिलेटिव में श्री विज्ञान देखना है।

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दृष्टि मलिन हुई कि तुरंत ही दादा के दिए हुए ज्ञान का उपाय करके तुरंत निर्मल कर देना। अंदर फोर्सफुली पाँच-दस बार बोल देना चाहिए कि 'मैं शुद्धात्मा हूँ ...' तब भी वापस ठिकाने पर आ जाएगा। अथवा 'मैं दादा भगवान जैसा निर्विकारी हूँ, निर्विकारी हूँ' बोलना। इसका उपयोग करना, यह तो विज्ञान है। तुरंत फलदायी है। वर्ना गाफिल रहे तो उड़ाकर रख देगा सबकुछ!

यदि एक घंटे तक किसी भी स्त्री संबंधित विषयी ध्यान रहे तो अगले जन्म में वह अपनी माँ या बाइफ बनेगी। इसलिए सावधान हो जाओ। इसलिए विषय का विचार ध्यान रूपी नहीं हो जाना चाहिए। उन्हीं विचारों में रमणता करते रहने को कहते हैं, ध्यान रूपी। उसे उखाड़कर फेंक देना चाहिए। विचारों को देखने से ही गॉटें विलय हो जाती है, पुद्गल शुद्ध हो जाता है। स्त्री को देखते ही अंदर स्पंदन हों तो उसका तुरंत प्रतिक्रमण करना।

जागृति जरा सी भी मंद हुई कि विषय घुस ही जाता है। उसका आवरण आ ही जाता है!

एक बार स्लिप हुए तो स्लिप नहीं होने की शक्ति कम हो जाती है। वह वापस स्लिप करवा देती है, मतलब वह ढीली पड़ जाती है। असंयम हुआ कि ढीला पड़ जाता है। संयम कम-ज्यादा हो तो हर्ज नहीं लेकिन संयम टूट जाए तो फिर हो चुका!

ब्रह्मचर्य के आग्रही होने की छूट है, लेकिन ब्रह्मचर्य के दुराग्रही नहीं बनना चाहिए। अंत में तो आत्मरूप बनना है। ब्रह्मचर्य के निमित्त से यदि कषाय हो जाएँ तो वह नहीं चलेगा। आत्मा में रहना है या ब्रह्मचर्य में?

ब्रह्मचर्य व्यवहार के अधीन है। निश्चय तो ब्रह्मचारी ही है न? आत्मा तो सदा ब्रह्मचारी ही है न!

१६. फिसलनेवालों को, उठाकर दौड़ाते हैं

विषय के गुनाह का फल क्या है, पहले वह समझ लेना चाहिए। वह समझ में आए, तभी वह गुनाह करने से रूकेंगे। ज्ञानी को जो पकड़े रखेगा, वह छूट जाएगा एक दिन।

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जिसे दादा का निदिध्यासन रहता है, उसके सारे ताले खुल जाते हैं। दादा के निदिध्यासन का साक्षात् फल मिलता है।

जगत् कल्याण का निमित्त बनने का जिसने बीड़ा उठाया है, उसे दुनिया में कौन रोक सकता है? देवी-देवता भी पुष्पवृष्टि करते हैं।

जब से इस मार्ग में आगे बढ़े हैं, तभी से पूर्णाहुति हो सकती है। अगर आप चोखे हो तो आपका नाम देनेवाला कोई नहीं है।

१७. अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यक

मोक्ष और ब्रह्मचर्य का क्या लेना-देना? काफी कुछ लेना-देना है। ब्रह्मचर्य के बिना आत्मा के अनुभव का पता ही नहीं चलता। यह जो सुख महसूस हो रहा है, वह आत्मा का है या पुद्गल का है, वह पता ही नहीं चलता न। अब, कितने ही अब्रह्मचारी मोक्ष में गए हैं। वहाँ क्या होता है कि ब्रह्मचर्य के लिए पॉजिटिव होना चाहिए। नेगेटिववाले को कभी भी आत्मा प्राप्त नहीं होगा। शादी करके ब्रह्मचर्य पालन करें, वह उच्च है या शादी नहीं करके? ज्ञानियों ने शादी करके ब्रह्मचर्य पालन करने को उच्च कहा है। फिर भी मोक्ष में जानेवालों को आखिरी दस-पंद्रह साल तो सर्वसंग परित्याग बरतना ही चाहिए। ब्रह्मचर्य के बिना तो मोक्ष में जाया ही नहीं जा सकता।

ब्रह्मचर्य के लिए किसी पर दबाव नहीं डालना चाहिए। ब्रह्मचर्य व्रत एकदम से किसी को नहीं दे सकते। एकाध साल के लिए देकर धीरे-धीरे आगे बढ़ सकते हैं। आपका निश्चय और हमारा वचनबल विषय को खत्म कर देगा। अंतराय तोड़ देगा।

अक्रम मार्ग में आश्रम जैसा नहीं होता। लेकिन जो ब्रह्मचारी बने हैं, उनके लिए होना चाहिए। ब्रह्मचारियों के संग में रहना पड़ेगा।

दादाश्री खुद के बारे में बताते हैं कि हमें ब्रह्मचर्य पालन नहीं करना होता, हमें तो वह बर्ताता है। विषय जैसी कोई चीज है भी, ऐसा याद तक नहीं आता। शरीर में वे परमाणु ही नहीं हैं न! और खुद भी पूर्वजन्मों से यह माल खाली करते हुए आए हैं। इसलिए बचपन से ही विषय में रुचि नहीं थी।

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पहले के जमाने में बाल-विवाह होते थे। इसलिए अन्य कहीं दृष्टि बिगड़ने का सवाल ही नहीं रहता था न। जीवन कितना सुंदर और पवित्र बीतता था। उसका असर बच्चों पर कितना सुंदर पड़ता था। बच्चे भी संस्कारी और एक जैसे होते थे।

शादी करने में इतने सारे जोखिम हैं, फिर भी शौक से घोड़े पर चढ़कर शादी करते हैं, क्या यही आश्चर्य नहीं है? इसका कारण यही है कि वह इसके परिणामों को जानता ही नहीं है। थोड़ा सा दुःख लेकिन अंततः तो सुख ही है, ऐसी मान्यता के आधार पर ही सभी शादी करते हैं।

जिसे पुद्गलसार (ब्रह्मचर्य) और अध्यात्मसार (शुद्धात्मा) दोनों प्राप्त हो गए, उसका तो कल्याण ही हो गया न!

ब्रह्मचर्य आत्मा के स्वाभाविक गुणों को प्रकट होने देता है, आत्मानुभव होने देता है, आत्मा के गुणों का अनुभव होने देता है।

ब्रह्मचर्य और परफेक्ट व्यवहार दोनों साथ में होंगे तो ब्रह्मचारी जगत् का कल्याण करने में बहुत ही हितकारी हो सकेंगे।

खुद का व्यवहार कैसा है यह बताते हुए दादाश्री ने कहा है, ‘हमारी एक दहाड़ से तुरंत ही महात्माओं के रोग निकल जाते हैं। इनका हाथ छू जाए तो भी सामनेवाले का काम बन जाता है। ऐसी सारी सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं।’

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि आपका निश्चय और हमारा वचनबल, अगर एक साथ ये दोनों होंगे तो पूरा ‘व्यवस्थित’ बदल सकता है। यहीं पर एक अपवाद सर्जित होता है।

ब्रह्मचारियों को पैंतीस साल तक विषय के सामने निरंतर सतर्क रहना पड़ता है। वर्ना मोह का वातावरण ‘रिज पॉइन्ट’ पर आ जाए तो उसे उड़ा देता है! तब ज्ञान बीज को भी उड़ा देता है। लेकिन अगले जन्म में यह ज्ञान सहायक होगा।

शादी करने के लिए मना करने से क्या अंतराय कर्म बंधते हैं?

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मुंबई जाते हैं, उससे क्या बाकी शहरों से अंतराय डाला ऐसा कहा जाएगा ?

ब्रह्मचर्य पालन करने से कर्म बंधते हैं ?

अज्ञानदशा में ब्रह्मचर्य पालन करने से पुण्य बंधता है और अब्रह्मचर्य से पाप बंधता है। लेकिन अक्रम ज्ञान से तो कर्म ही नहीं बंधता। दोनों डिस्चार्ज ही माना जाता है। इसमें कर्ता बनकर ज्ञानी की आज्ञा सहित पालन करते हैं, उतना ही चार्ज है। ब्रह्मचर्य इटसेल्फ डिस्चार्ज है, लेकिन उसके पीछे जो भाव है, वह 'चार्ज' माना जाता है। आज्ञा पालन करने जितना चार्ज माना जाता है। इसका फल सम्यक पुण्य मिलता है। जिससे सीमंधर स्वामी के नजदीक रहने की सहूलियतें आसानी से मिल जाएँगी। यह सब वैज्ञानिक खोज है दादा की !

संपूज्य दादाश्री ब्रह्मचर्य की मजबूती के लिए हर रविवार को पूरी तरह से उपवास करने का नियम देते थे, जिससे विषय का विरोधी बने और ब्रह्मचर्य में बहुत पुष्टि मिले।

जिसे लक्ष्मी या विषय से संबंधित विचार ही नहीं आते, देह से अलग रहता है, उसे जगत् भगवान कहे बगैर नहीं रहेगा !

१८. दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को

परम पूज्य दादाश्री ने बहनों को पुष्टि देकर ब्रह्मचर्य के मार्ग पर मोड़ा है। उनके हाथों आप्तपुत्रियाँ तैयार हुई हैं।

अच्छे कपड़े पहने हुए, अप टू डेट युवक को देखकर लड़कियाँ मूर्छित हो जाती हैं, लेकिन अंदर माल कितना कचरेवाला होगा, वह नहीं देख सकतीं! सुंदरता देखकर ही मूर्छित हो जाती हैं। वहाँ पर फँसना नहीं, वरना वह जन्म बिगाड़ देगा। अगले जन्म की गाँठ पड़ जाएगी। दादाश्री ने ऐसा बताया है कि लड़कियों के लिए ब्रह्मचर्य पालन करने में ज्यादा मुश्किलें हैं। अगर निश्चय नहीं डगमगाए तो गारन्टी से ब्रह्मचर्य पालन कर पाएँगी। श्री विजन की जागृति रहेगी तो वह मोह को निकाल पाएँगी।

युवाओं को शादी करने के लिए कहें तो वे मना करते हैं। घर

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पर माँ-बाप का सुख(!) देखकर उन्हें जबरदस्त वैराग्य आ जाता है।

भले ही कितना भी आकर्षण हो, लेकिन खूब प्रतिक्रमण करते रहने पर उसमें से छूट सकते हैं।

आजकल पति कैसे होते हैं? पति तो उसे कहते हैं कि एक क्षण भी पत्नी को न भूले! यह तो सारा कचरा! बाहर कितनी ही स्त्रियों के साथ सौदे करते फिरते हैं। इस काल में प्रेम नहीं लेकिन आसक्ति ही देखने को मिलती है। प्रेम भूखे नहीं लेकिन विषय भूखे होते हैं। यह एक तरह की संडास ही कहलाती है, विषय यानी शादी की इसलिए घर का संडास आ गया, वना बाहर जहाँ-तहाँ जाते फिरेंगे! उसके बिना चारा ही नहीं है न, इसलिए!

जिसे एकावतारी पद प्राप्त करके मोक्ष में ही जाना है, उसे सबसे पहले ज्ञानी से आत्मज्ञान प्राप्त करना पड़ेगा। फिर आज्ञा में आकर ब्रह्मचर्य पालन करेंगे तभी हो पाएगा। स्त्रियों को इसके अलावा मोह और कपट से पूर्णतः मुक्त होना पड़ेगा। परपुरुष के लिए विचार तक नहीं आना चाहिए। और यदि आ जाए तो तुरंत ही प्रतिक्रमण करके धो देना पड़ेगा। जो मिश्र-चेतन से सावधान रहा, उसका कल्याण हो गया! मिश्रचेतन के साथ यदि विकारी संबंधों की लपेट में आ गए तो जानवर गति में खींच ले जाएगा!

ज्ञानीपुरुष के पास खुद का कल्याण कर लेना है। खुद कल्याण स्वरूप हो जाए तो उससे बिना कुछ बोले दूसरों का कल्याण हो जाएगा। बोलते रहने से या भाषण देने से कुछ नहीं होता। चात्रि की मूर्ति देखते ही सभी भावों का शमन हो जाता है! इसलिए प्योर बनना है, शीलवान बनना है!

- डॉ. नीरुबहन अमीन - जय सच्चिदानंद

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चेत रे ब्रह्मचारी...

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, दगा जैसा है संसार, हँसकर बात मत लगा, मोक्ष के लिए हो जा तैयार, नजर से नजर मत मिला, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, चटनी के लिए खोया थाल नखराली नजरे हो तुच्छकार, विषय में तृप्ति नहीं जरा भी, कड़ी नजर में है उपकार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, गाफिल होना नहीं जरा भी, स्त्री सदा दावा करना, दृष्टि दोष से कायम संसार, नौ गज से कर रे नमस्कार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, शादी की फाइल है तैयार, नैनों के लागे गोलीबार, कसौटी का यह तेरा काल, हथियार कुंद होते हार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, विषय कीचड़ में डूबनेवाले, कड़ी नजर के रख हथियार, विश्व में नहीं मिलते हाथ पकड़नेवाले, टूटते पहले बाँध ले बाड़, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, निश्चय क्यों डिगाना, चेतना स्त्री के तिरस्कार से, आंधी तो आए बार-बार। छिपा उसमें विषय का रणकार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

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चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
विषय अंत में धिक्कार,विषय से बंधे नर्कांगार,
अणहक्क बाँधे नर्कांगार,आलोचना एक ही उबारनार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
अग्नि और पेट्रोल मिलनसार,भयंकर विषय दोष का बोझ,
मिलते विषयी भीषण झाल,आलोचना करके उतार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
विषय है जलानेवाला,दृष्टि आकर्षित हो जहाँ पलभर,
निर्विषयी दादा जैसा बननेवाला,बीज पड़े होते ही तम्याकार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
शील का ग्रही ले अलंकार,बीज दो पत्तियों से फूटनार,
कल्याणी हेतु आकर्षनार,उखेड़ तत्क्षण दूर फेंकनार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
श्री विज्ञन से विषय जीतनार,दो पत्तियाँ फिर तेरी हार,
दादापुत्र बनो आप होनहार,सूक्ष्म में वीर्य स्वल्पन थनार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
स्पर्श दोष जहरीला अपार,दृष्टि से सूक्ष्म गलन थनार,
चेत नहीं तो तू फिसलनार,स्थूल में फिर न कोई रोकनार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।

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चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, उखाड़ कॉपल तत्वार, विषयों चित् उपचार, अटके स्वल्पन था होशियार, निदिध्यासन एक ही सार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, विषय विचारे तन्मयाकार, बुद्धि से माना सुखसार, मंथन से वीर्य स्वल्पनार, विषय में कहाँ सुख तलभार? इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, मन कमजोर पड़े फिर भी मत हार, ब्रह्मचर्य का क्या आधार? दादाई कृपा अपरंपार, समझ से या अहंकार? इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, चित्त से खींचे फोटो बार-बार, वीर्य है पुद्गलसार, प्रतिक्रमण करके धोना कोटि बार, वह जीतने से प्राप्त समयसार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, चित्त को बिखरने मत देना, खुद जैसा जग करनार, आत्म ऐश्वर्य लूटनार, कैसे चले ध्येय तोड़नार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, चित्त का ऐसा है धिरधार, अखंड ब्रह्मचर्य की धार, एक बार टिके, वहीं जनार, मर जाना, लेकिन न चुकनार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

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चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, स्थूल दोष चले नहीं एक भी बार, स्पष्ट वेदन किसे मिलेगा, एक बार डूबा तो क्या विचार? ब्रह्मचर्य धारण करना, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, ध्येय का महान है चितार, विषयों की अब क्या मदार, कदम छोटे और प्रमाद अपार, दादा कृपा अपरंपार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, विषय तो भोगे अनंतबार, ब्रह्मचर्य बिना नहीं है उद्धार, ज्ञानी नहीं आए हाथ दोबारा, मोक्ष गए सर्वसंग त्यागनार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, विश्व में विषय अंधकार, ब्रह्मचारी विश्वे अचरजकार, दीप बनकर तू जग तार, क्रम-अक्रम को आप जोड़नार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, कब निकलोगे विषय पार, जग कल्याणी ध्येय सवार, तभी झगमगाएगा ज्ञान अपार, शील से कष्ट कंपावनार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, ब्रह्मचर्य ही सर्वाधार, आपोपु गए पूर्ण थनार, भगवंत पद पर पहुँचानेवाला, निरालंब स्व में बर्तनार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

(साधक को 'चेतन' की जगह पर खुद का नाम लेना है)

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अनुक्रमणिका

खंड : १ | | ---|---|--- विषय का स्वरूप, ज्ञानी की दृष्टि से | वासना, वस्तु नहीं, लेकिन रस ज्ञानी ही छुड़वाते हैं, वासना... विषय और कथा की भेदरेखा | ३९ ४० ४१

[ १ ]

[ ३ ]

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का | माहात्म्य ब्रह्मचर्य का | ---|---|--- कीचड़ में टंडक का मजा | १ विषय की कीमत कितनी? | ४३ इस जहर को जहर जाना? | ३ विषय से जर्जरित हुए जीवन | ४३ परवशताएँ कैसे पुसाए? | ४ ब्रह्मचर्य पालन करने की सीढ़ियाँ | ४४ शादी करने के परिणाम तो देखो | ६ व्रत के परिणाम | ४५ पूरी दुनिया की है वह जूटन | ८ आज्ञासहित व्रत ही सही | ४६ सुख के साधन या अशुचित् का... | १० ब्रह्मचर्य तो कैसा होना चाहिए? | ४७ सच्चा आम का भोग, विषय... | १२ अभिप्राय बदलते ही निकलना... | ५१ सभी इन्द्रियों ने निंदा की... | १३ गजब के वे ब्रह्मचारी | ५१ बुद्धि से सोचा है विषय... | १५ | निरा गंदगी दिखे विषय में | १६ 'शादी नहीं करने' के निश्चयवालों | खरा सुख किस में? | के लिए राह | चल रहे हैं कहाँ? दिशा... | १८ | समझो ब्रह्मचर्य की कमाई | १९ | किफायत करो वीर्य और... | २१ किस समझ से विषय में से छूटा जा सकता है? | अक्रम विज्ञान प्राप्ति करवाए... | २३ शादी नहीं करने के निश्चयवाले... | ५३ इतना आवश्यक है, ब्रह्मचर्य... | २३ समझकर दाखिल होना इसमें | ५५ ज्ञान कितने अधिक रहता है,... | २५ बार-बार करना निश्चय दृढ़ | ५७ शरीर का राजा कौन? | २६ हे विषय! अब तेरे पक्ष में नहीं | ५८

[ २ ]

विकारों से विमुक्त की राह | | ---|---|--- विकारों को हटाना है? | २९ आँखें गड़ाएँगे तो दृष्टि... | ६३ ब्रह्मचर्य, प्रोजेक्ट का परिणाम | ३० प्रतिक्रमण के बाद, दंड... | ६५ उसके हेतु पर आधारित है | ३२ देखना, सामान्य भाव से | ६७ नहीं समझा जगत् ने, स्वरूप... | ३३ उस मिठास का पृथक्करण... | ६८ अज्ञान की गलतियों की सजा... | ३४ फिर भी आकर्षण क्यों? | ७० विषय का शौक, बढ़ाए विषय | ३५ राजा जीतने से, जीतेंगे पूरा राज | ७१ नहीं रोकना चाहिए मन को | ३६ टले ज्ञान और ध्यान... | ७४

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