भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
लिंग जारी, उसका जोखिम७६जुदापन से जीत सकते हैं१३५
हार-जीत, विषय की या...७७सत्संग में भी सतर्क रहना है१३८
उसके सेवन से पात्रता७८मन की पोलों के सामने...१३९
मजबूरी से पाशवता८१बुद्धि की वकालत, बिना फौस...१४५

[ २ ]

दृष्टि उखड़े, 'श्री विजन' से

'रेसमी चार' के पीछे

अदभुत प्रयोग, श्री विजन का

खरा ब्रह्मचर्य, जागृतिपूर्वक का

उपयोग जागृति से, टलता है मोह...

मोह राजा का अंतिम व्यूह

विषय में 'छिपी हुई रूचि'...

[ ३ ]

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार

जो कभी न डगमगाए, वही...

पकड़े रखे निश्चय को ठेठ तक...

समझो निश्चय के स्वरूप को...

निश्चय के परिपोषक

इतना ही सँभाल लेना जरा

कहीं पोल को पोषण तो नहीं...

नहीं चल सकता अपवाद...

पुरुषार्थ ही नहीं, लेकिन पराक्रम...

निश्चय मांगे सिन्सियारिटी

'रिज पॉइन्ट' पर रहे जोखिम...

दृढ़ निश्चयी पहुँच सकते हैं

अधूरी समझ, वहाँ निश्चय कच्चा

क्यों गाड़ियों से नहीं टकराता?

जहाँ चोर नीयत, वहाँ नहीं हैं...

विषय के विष की परख क्यों...

'उदय' की परिभाषा तो समझो

पद्व निश्चय को कैसे अंतराय?

[ ४ ]

विषय विचार परेशान करें तब...

वह तो है भरा हुआ माल

जुदापन से जीत सकते हैं

सत्संग में भी सतर्क रहना है

मन की पोलों के सामने...

बुद्धि की वकालत, बिना फौस...

बढ़ता है विषय की लिंग से...

कला से काम निकालो

[ ५ ]

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार

ज्ञान से करो स्वच्छ, मन को

वना मन हो जाए ढीला

विरोधी के पक्षकार?

मन चलाए, मंडप तक...

ध्येय का ही निश्चय

सामायिक में चलन, मन का

ध्येय अनुसार चलाओ...

भले ही शोर मचाएँ

नहीं चलेगा बेवरिग माइन्ड...

जहाँ सिद्धांत है ब्रह्मचर्य का...

चलो, सिद्धांत के अनुसार

निश्चय, ज्ञान और मन के

आपत्तियों की पात्रता

[ ६ ]

'खुद' अपने आपको को डाँटना

खुद को डाँटकर सुधारो

पूरा करो प्रकृति को पटाकर

[ ७ ]

पछतावे सहित प्रतिक्रमण

प्रत्यक्ष आलोचना से, नकद...

जहाँ इन्टेरेस्ट, वहाँ करो...

विषय से संबंधित सामायिक...

विषयों में सुखबुद्धि किसे?

हे गॉलों! हम नहीं या तुम...

विषय बीज निर्मूल शुद्ध...

50

[ ८ ]

स्पर्श सुख की भामक मान्यता देखते ही जुगुप्सा १९२ रोंग बिलीफें, रूट कॉज में १९३ वह आवाज, मन की ही १९४ स्पर्श सुख के जोखिम १९६ स्त्री का स्पर्श लगे विष समान १९७ दोनों स्पर्शों के असर में भिन्नता २०० आकर्षण, वह है मोह २०३ जहाँ आकर्षण है, वहाँ... २०५ नियम आकर्षण - विकर्षण के २०८ एक बार भोगा कि गया २१० मुक्त दशा का थर्मामीटर २१२ भटकती वृत्तियाँ चित की २१३ चित की पकड़, छूटती... २१४

[ ९ ]

'फाइल' के सामने सख्ती विकारी दृष्टि के सामने ढाल २१६ विकारी चंचलता २१८ फाइल बन गई, वहाँ... २१८ सामने 'फाइल' आए, तब... २२० लकड़ी की पुतली अच्छी २२१ अग्नि और 'फाइल' एक से २२२ काटो सख्ती से 'उसे' २२३ वहाँ है चोर नीयत २२५ सखा, इस तरह हो सकते हैं २२७ तोड़ा जा सकता है लफड़ा... २२८ अपना बनाया कहकर डियर... २३०

[ १० ]

विषयी आचरण? तो डिसमिस यहाँ किए हुए पाप से मिले... २३३ नहीं शोभा देता वह २३४ फिसलना सहज, यदि एक... २३५ न हो संग संयोगी २३५

वहाँ पर दादा की मौन सख्ती २३८ आपत्तियों के लिए दफाएँ २४०

[ ११ ]

सेफ साइड तक की बाड़

आवश्यकताएँ, ब्रह्मचर्य के... २४३ संग, कुसंग के परिणाम २४४ लश्कर तैयार करके उतरो... २४५ विषयी वातावरण से फैला... २४८ नहीं सुननी चाहिए विषयी... २४९ समभावियों का समूह २५० संगबल की सहायता... २५१

[ १२ ]

तितिक्षा के तप से गढ़ो मन-देह

सीखो पाठ तितिक्षा के २५४ विकसित होता है मनोबल... २५७ उपवास-उणोदरी मात्र... २५९ ज्ञानियों ने नवाजा है उणोदरी... २६१ आहार जागृति से रक्षा करना... २६३ आहार में घी-शक्कर करवाते... २६४ नहाना भी है, निमंत्रण... २६६ जीना है, ध्येय अनुसार २६८ कंदमूल पोषण दें विषय को २६९

[ १३ ]

न हो असार, पुद्गलसार

पुद्गलसार है, ब्रह्मचर्य २७१ अहो, अहो! उन आत्मवीर्यवालों... २७३ बरते वीर्य, जहाँ जहाँ रुचि २७४ उपाय करना, स्वप्नदोष टालने... २७५ वीर्यशक्ति का ऊर्ध्वगमन कब? २७७ जोखिम, हृष्ट-पुष्ट शरीर के २७९ निरोगी से भागें विषय २८२ ज्ञानी की सूक्ष्म बातें २८५ उल्टी हो गई तो क्या मर... २८९ विचार : मंथन : स्खलन २९१

51

[ १४ ]

नहीं डालना चाहिए दबाव... ३५४

ब्रह्मचर्य प्राप्त करवाए ब्रह्मांड का आनंदराजा-रानी का तलाक, शादी... ३५५
इससे क्या नहीं मिल सकता?३९९ व्रत की विधि से, टूटते हैं... ३५७
समझो गंभीरता, ब्रह्मचर्य व्रत...३०२ साधना, 'संयमी' के संग ३५९
आजीवन ब्रह्मचर्य, शुरू करवाए...३०३ अक्रम में ऐसे आश्रम की... ३६१
चारित्र का सुख कैसा बरते३०६ ब्रह्मचर्य के बिना नहीं जा... ३६२
फायदा उठाएँ या नुकसान रोके?३०८ मन बिगड़े तब ३६४

[ १५ ]

'विषय' के सामने विज्ञान सेजागृति सपने के भोग का पूर्वापर... ३६५
आकर्षण के सामने चाहिए...३११ दावावाणी निकली ब्रह्मचारियों... ३६८
पूर्व में चूके, उसके ये फल हैं३१४ ब्रह्मचर्य का एक और... ३६९
वहाँ पर देखो शुद्धात्मा ही३१६ दृष्टि से ही बिगड़ता है... ३७०
पुद्गल का स्वभाव ज्ञान से...३१७ किसी की बहन पर दृष्टि... ३७१
दृष्टि निर्मल कर सकते हैं ऐसे३१८ प्रतिक्रमण ही एक उपाय ३७२
विचार ध्यान में तो परिवर्तित...३२० कैसा मोह, कि शौक से... ३७४
देखने से पिघलें, गँठि विषय३२१ 'जवानी' सँभल जाए तो ३७५
'देखना' 'जानना' आत्मस्वरूप से३२६ आनंद की अनुभूति वहाँ ३७८
जहाँ जागृति में झोंका, वहाँ ...३२८ व्यवहार गढ़ता है ब्रह्मचारियों... ३८०
अंत में तो आत्मरूप ही...३३१ निश्चय के साथ में वचनबल... ३८३

[ १६ ]

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ातेहैं इसमें कर्मबंधन के नियम ३८८
सिर-माथे पर रखना ज्ञानी को...३३४ ब्रह्मचर्य, चार्ज या डिस्चार्ज ? ३९०
जानो गुनाह के फल को पहले३३५ विषय टूटे, विरोधी बनने पर ३९१
व्यापार में खो गए कि खोए...३३५ आलोचना, आपत्तपुरुष से ही ३९५
एक ध्येय, एक ही भाव३३७ अब तो उधार चुका दो ३९७
जिस राह पर चले, बताई ...३४० वह पाए परमात्म पद ३९७

[ १८ ]

'दादा' बोलते ही दादा हाजिरदादा देते पुष्टि, आपत्तपुत्रियों को ३९९
ध्येयी का हाथ थामें, दादा...मोह ढक देता है जागृति को ३९९
ज्ञानी मिटाए अनंतकाल के रोगशादी करने का आधार निश्चय... ४०२

[ १७ ]

अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यकदोष, आँखों का या अज्ञानता... ४०३
बिना निराई किए हुए खेतइस विवाह-संबंध के स्वरूप... ४११
नूर झलकता है ब्रह्मचर्य काआकर्षण कुछ के प्रति ही... ४१२
दोनों में से उच्च कौन सा?ऐसी 'समझ' कौन देगा? ४२०
चारित्रबल से कांपती हैं स्त्रियाँकल्याण करना है या कल्याण... ४२३

52

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

(पूर्वार्ध)

खंड : १

विषय का स्वरूप, ज्ञानी की दृष्टि से

[ १ ]

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का

कीचड़ में ठंडक का मजा

मनुष्य होकर भी इस पाँच इन्द्रियों के कीचड़ में क्यों पड़ा है, वही आश्चर्य है! भयंकर कीचड़ है यह तो! लेकिन इतना नहीं समझने से, जगत् अभानता में चल रहा है। यदि थोड़ा सा सोचे तब भी, ऐसा समझ में आ सकता है कि कीचड़ है लेकिन लोग सोचते ही नहीं हैं न?! निरा कीचड़ है। तो मनुष्य क्यों ऐसे कीचड़ में पड़े हुए हैं? तो इसलिए कि ‘और किसी जगह पर साफ-सुथरा नहीं मिलता। इसलिए ऐसे कीचड़ में सो गया है।’

प्रश्नकर्ता : यानी कीचड़ के प्रति अज्ञानता ही है न?

दादाश्री : हाँ, उसके प्रति अज्ञानता है। इसीलिए कीचड़ में पड़ा है। फिर यदि इसे समझने का प्रयत्न करे तो समझ में आए ऐसा है, लेकिन खुद समझने का प्रयत्न ही नहीं करता न!

कोई पूछे कि क्या जानवरों को ये विषय प्रिय हैं? तो मैं

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

कहूँगा कि नहीं, जानवरों को ये विषय बिल्कुल पसंद नहीं हैं लेकिन फिर भी उन्हें 'नैचुरल' उत्तेजना होती है। बाकी, इस विषय को तो कोई पसंद ही नहीं करे। सच्चा पुरुष हो तो पसंद ही न करे। तो ये मनुष्य क्यों इस विषय में पड़ते हैं? क्योंकि पूरे दिन भागदौड़, भागदौड़ करता है। थका हुआ होता है इसलिए उसे भान नहीं रहता कि यह कीचड़ है, इसलिए फिर पड़ जाता है उसमें। बाकी, जब बिल्कुल ही 'सेन्स' खत्म हो जाए तब यह कीचड़ याद आता है। वर्ना 'सेन्सिबल' इंसान को तो यह कीचड़ अच्छा ही नहीं लगेगा न! यह तो भागदौड़ की मेहनत और उसकी जलन है, उसका शमन करने के लिए इस कीचड़ में गिरता है। गड़दे में गिरने से यह जलन कहीं शांत नहीं हो जाती। थोड़ा-बहुत संतोष महसूस होता है, बस उतना ही और नींद आ जाती है। बाकी, उसके बाद तो मरने जैसा लगता है। इस विषय के कीचड़ से ज्यादा तो बांद्रा की खाड़ी का कीचड़ अच्छा है। सिर्फ दुर्गंध आती है, उतना ही है। बाकी कुछ नहीं। जबकि यह तो बेहद दुर्गंध है और निरे कितने ही जीव मर जाते हैं, लेकिन भान नहीं है और ऊपर से कहता है कि, 'मैं जैन हूँ।' अरे, जैन तो ऐसा नहीं होता। इसमें तो करोड़ों जीव खत्म हो जाते हैं!

ऐसा है, निर्विषय विषय किसे कहा गया है? इस जगत् में निर्विषयी विषय हैं। इस शरीर की जरूरत के लिए जो कुछ दाल-चावल-सब्जी-रोटी, जो कुछ मिले वह खाओ। वह विषय नहीं है। विषय कब कहा जाता है? कि जब तुम लुब्धमान हो जाओ तब विषय कहलाता है, वर्ना वह विषय नहीं है, वह निर्विषयी विषय है। अतः जो कुछ इस जगत् में आँखों से दिखाई देता है, वह सारा विषय नहीं है। लुब्धमान हो जाए, तभी विषय है। हमें कोई विषय छूता ही नहीं। विषय की जरूरत क्या है, यही मैं नहीं समझ पाता। ये जानवर भी जिससे तंग आ चुके हैं, उसी विषय में मनुष्यों को मजा आता है, यह कैसा आश्चर्य है?! क्यों इस कीचड़ में फँसता है, इसका विचार ही नहीं आता, ऐसे 'ब्लंट' हो गए हैं!

विरलेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

इसलिए भगवान महावीर ने पाँचवाँ महाव्रत, ब्रह्मचर्य का दिया कि आज के मनुष्यों को विषय के कीचड़ का भान ही नहीं रहेगा, इसलिए जो चार महाव्रत थे, उसके पाँच कर दिए। उनके मन में यह था कि लोग थोड़ा-बहुत सोचेंगे और इसकी जोखिमदारी समझेंगे। यह तो भयंकर विकृति है। इसके बजाय तो नर्क का दुःख अच्छा, नर्क की वेदना अच्छी, लेकिन यह वेदना तो बहुत भयंकर है!

मुझसे कुछ लोग कहते हैं कि, 'इस विषय में ऐसा क्या है कि विषयसुख चखने के बाद मैं मरणतुल्य हो जाता हूँ, मेरा मन मर जाता है, वाणी मर जाती है?' मैंने कहा कि, ये सब मेरे हुए ही हैं, लेकिन आपको भान नहीं आता और वापस वही की वही दशा उत्पन्न हो जाती है। वर्ना ब्रह्मचर्य यदि संभल जाए तो एक-एक मनुष्य में तो कितनी शक्ति है! आत्मा के ज्ञान में रहना, उसे समयसार कहते हैं। आत्माज्ञान प्राप्त करे और जागृति रहे तो समय का सार उत्पन्न होता है और ब्रह्मचर्य, वह पुद्गलसार (जो पूर्ण और गलन होता है) है। अतः इस विषय में तो एक दिन भी नहीं बिगाड़ना चाहिए। वह तो जंगली अवस्था कहलाती है।

मन, वचन, काया से ब्रह्मचर्य पालन करे तो कितना अच्छा मनोबल रहेगा, कितना अच्छा वचनबल रहेगा और कितना अच्छा देहबल रहेगा! अपने यहाँ भगवान महावीर के समय तक कैसा व्यवहार था? एक-दो बच्चों तक 'व्यवहार' रखते थे लेकिन इस काल में वह व्यवहार बिगड़ जाएगा, ऐसा भगवान जानते थे, इसलिए उन्हें पाँचवाँ महाव्रत देना पड़ा।

इस जहर को जहर जाना?

विषय को जहर समझा ही नहीं। जहर समझे तो उसे छूएगा ही नहीं न! इसलिए भगवान ने कहा है कि ज्ञान का फल है

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

विरति! समझने का फल क्या? कि रुक जाए। विषयों के जोखिम को समझ ही नहीं, इसलिए वैसा करने से रुका नहीं।

यदि कोई भय रखने जैसा हो तो वह इस विषय का भय रखने जैसा है। इस जगत् में अन्य कोई भय रखने जैसी जगह है ही नहीं। इसलिए सावधान हो जाओ। इन साँप, बिच्छू और बाघ से सावधान नहीं रहते? सावधान रहते हैं न? जब बाघ की बात आए, तब हमें उससे भय नहीं रखना हो, फिर भी उससे भय लगता है न? उसी तरह जब विषय की बात आए तो भय लगना चाहिए। जहाँ पर भय लगे, वहाँ पर क्या मजे से खाना खाते हैं? नहीं। अतः जहाँ पर भय हो, वहाँ मजा नहीं होता। जगत् के लोग इस विषय को भयसहित भोगते होंगे? नहीं। लोग तो यह मजे से भोगते हैं। जहाँ भय हो, वहाँ भोग ही नहीं सकते।

कोई पूछे कि जलेबी खाऊँ? तो मैं कहूँगा कि वह अच्छी है, खाना आराम से। दहीबड़े खाना, सब खाना। इन सभी में स्वाद आता है। ज्ञानी को स्वाद समझ में आता है, लेकिन उन्हें इस स्वाद में, अच्छा या बुरा है, ऐसा नहीं होता कि यह होगा तभी चलेगा। विषय का तो ज्ञानीपुरुष को सपने में भी विचार नहीं आता। वह तो पाशवी विद्या है। मनुष्य में खुली पाशवता कहनी हो तो वह इतनी ही है। मनुष्यपन तो मोक्ष के लिए ही होना चाहिए।

अनंत जन्मों तक कमाई करे, तब जाकर उच्च गोत्र, उच्च कुल में जन्म होता है लेकिन फिर लक्ष्मी और विषय के पीछे अनंत जन्मों की कमाई खो देता है!!

परवशताएँ कैसे पुसाए?

मोक्ष की इच्छा तो बहुत है, लेकिन मोक्ष का रास्ता नहीं मिल पाता। इसीलिए अनंत जन्मों से भटकते ही रहे हैं और बिना अवलंबन के जी नहीं पाते। इसीलिए उसे स्त्री वगैरह, सभी कुछ

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

चाहिए। शादी करता है, वह भी इसलिए कि आधार दृढ़ता है। इसलिए शादी करता है न। इंसान निराधार रह ही नहीं सकता न! निरालंब नहीं रह सकता न! ज्ञानीपुरुष के अलावा अन्य कोई निरालंब रह ही नहीं सकता, कुछ न कुछ अवलंबन दृढ़ता ही है!

यह मकड़ी जाला बुनती है, फिर खुद ही उसमें फँस जाती है। उसी तरह यह संसार का जाल भी खुद ने ही खड़ा किया है। पिछले जन्म में खुद ने माँग की थी। बुद्धि के आशय में टेंडर भरा था कि एक स्त्री तो चाहिए ही। दो-तीन कमरे होंगे, एकाध बेटा और एकाध बेटी और नौकरी, इतना ही चाहिए। उसके बदले में वाइफ तो दी सो दी, लेकिन सास-ससुर, साला-साली, मौसैरी सास, चचेरी सास, फूफी सास, ममेरी सास... अरे फँसाव, फँसाव! इतना सारा फँसाव साथ में आएगा, यदि ऐसा पता होता तो ऐसी माँग ही नहीं करते! टेंडर तो भरा था सिर्फ वाइफ का, तो फिर यह सब क्यों दिया? तब कुदरत कहती है, 'भाई, वह अकेला तो नहीं दे सकते, ममेरी सास, फूफी सास वह सब देना पड़ता है। आपको उसके बिना अच्छा नहीं लगेगा। यह तो जब पूरा लंगर होगा, तभी असली मज़ा आएगा।' एक इतना सा लेने जाऐं, उसके साथ तो कितने बंधन, कितनी सारी परवशताएँ। वह परवशता फिर सहन नहीं होती।

प्रश्नकर्ता : ये मन, वचन, काया के लफड़े ही अच्छे नहीं लगते न अब तो!

दादाश्री : इसमें तो छः भागीदार है। शादी की तो उसमें और छः की भागीदारी, मतलब बारह भागीदारों का कोर्पोरेशन खड़ा हो गया ऊपर से। छः के बीच तो कितने लड़ाई-झगड़े चल ही रहे थे, वहाँ फिर बारह की लड़ाई खड़ी हो जाती है। फिर हर एक संतान के साथ छः नये भागीदार जुड़ते जाते हैं। यानी कितना फँसाव खड़ा हो जाता है!

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

शादी करने के परिणाम तो देखो

अब, तुझे संसार में क्या-क्या चाहिए? वह बता न।

प्रश्नकर्ता : मुझे तो शादी ही नहीं करनी है।

दादाश्री : यह देह ही निरी उपाधि (बाहर से आनेवाला दुःख) है न! जब पेट में दर्द होता है, तब इस देह पर कैसा होता है? तो दूसरे की दुकान तक व्यापार बढ़ाएँगे, तो क्या होगा? कितने दुःख देती है? और फिर दो-चार बच्चे हों तो। सिर्फ बीवी हो तो ठीक है, वह सीधी रहेगी लेकिन ये तो चार बच्चे! तो क्या होगा? बेहद परेशानी! निरी 'फाइलें' ही बढ़ जाती हैं। इसलिए भगवान ने ऐसा कहा है कि औपचारिक मत करना। अनुपचार मतलब आपने जिसका उपचार तक नहीं किया, वैसी है यह देह। इसका तो कोई चारा ही नहीं है लेकिन वह तो उपचार करता है। शादी करता है, व्यापार करता है, वह मत करना, जबकि और इसे अब उपचार करने की इच्छा नहीं है, इसलिए कह रहा है कि शादी ही नहीं करनी है।

योनी में से जन्म लेता है। योनी में तो इतने भयंकर दुःखों में रहना पड़ता है और बड़ी उम्र के होने पर वापस योनी पर ही जाता है। इस जगत् का व्यवहार ही ऐसा है। किसी ने सही बात सिखाई ही नहीं है न! माँ-बाप भी कहते हैं कि शादी कर लो अब, और माँ-बाप का फर्ज भी तो है न? लेकिन कोई सही सलाह नहीं देता कि इसमें ऐसा दुःख है। वे तो कहेंगे, 'शादी करवा दो अब। ताकि उसके वहाँ बच्चा हो तो मैं दादा बन जाऊँ।' बस, उन्हें इतनी ही उत्कंठा होती है। 'अरे, लेकिन दादा बनने के लिए मुझे क्यों इस कुएँ में धकेल रहे हो?' पिता जी को दादा बनना होता है, इसलिए हमें कुएँ में धकेल देते हैं। शादी में तो कितने ही ऐक्सिडेंट होते हैं, फिर भी कितनी ही शादियाँ होती हैं न? यह तो, शादी के कुएँ में गिरना पड़ता है। कुछ

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

न हो तो अंत में माँ-बाप भी उठाकर उस कुएँ में डाल देते हैं। वे लोग नहीं डालेंगे तो मामा उठाकर डाल देगा। ऐसा है यह फँसाववाला जगत्!

शादी तो सचमुच में बंधन है। भैंस को डिब्बे में भरने जैसी दशा हो जाती है। उस फँसाव में नहीं फँसें, वही उत्तम है, फँस गए हों तो फिर निकल जाएँ तो और भी उत्तम और न हो तो अंत में फल चखने के बाद निकल जाना चाहिए! शादी से पहले, दस दिन पहले लड़की अगर गाड़ी में मिल जाए तो वह धक्का मारता है। उसी को फिर खुद ने पसंद किया। लो, वह वाइफ बन गई! किसकी बेटी, किसका बेटा, कुछ लेना-देना नहीं है! वाइफ मर जाए तो फिर रोता है। क्यों रोता है? वह कहाँ अपनी रिश्तेदार थी? माँ का रिश्ता सचमुच में रिश्ता कहलाता है, भाई का रिश्ता, रिश्ता कहलाता है, पिता जी का रिश्ता, रिश्ता कहलाता है, लेकिन वाइफ का कौन सा रिश्ता है? पराए घर की बेटी, उसे देखने गया था तब तो यों घूमो, यों घूमो कर रहा था, मर्जी में आए तो सैंकशन करता है। घर पर लाता है। उसके बाद यदि मेल न खाए तो फिर कहेगा कि ‘डाइवोर्स लो।’

एक भाई ने मुझसे कहा कि ‘मेरी वाइफ के बिना मुझे ऑफिस में अच्छा नहीं लगता।’ अरे, एक बार हाथ में पीप हो जाए तो तू चाटेगा? नहीं तो क्या देखकर स्त्री पर मोह कर रहा है? पूरा शरीर पीप से ही भरा है। यह पोटली किसकी है, इसका विचार नहीं आता? भले आचार नहीं छूटे लेकिन क्या ऐसा विचार नहीं आना चाहिए? जितना प्रेम मनुष्य को अपनी स्त्री पर होता है, उससे अधिक प्रेम तो सूअर को सूअरनी पर है। यह क्या कोई प्रेम कहलाता होगा? यह तो पाशवता है निरी! प्रेम तो किसे कहते हैं, कि जो बड़े नहीं, घटे नहीं, उसे प्रेम कहते हैं। यह सब तो आसक्ति है। बढ़ गई तो आसक्ति और कम हो गई, वह विकर्षण शक्ति। यदि अच्छे इयरिंग लाकर दिए, हीरे के टोप्स

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

लाकर दे दिए तो बीबी आसक्ति में ही खुश और यदि नहीं लाकर दिए तो, 'आप ऐसे हो, आप वैसे हो', फिर झगड़े नहीं होते? मतभेद नहीं होते? इसमें कौन सा सुख है जो पड़े हुए हो? क्या माना है तुमने? अनंत जन्मों से भटक रहे हो, तो अभी भी क्या तुम्हें भटकने का शौक है? क्या हुआ है तुम्हें?

वीतराग भगवान के भक्तों को भी चिंता? जब शास्त्र पढ़ता है, उतने समय तक थोड़ी अंदर टंडक रहती है। उसमें भी फिर पढ़ते-पढ़ते याद तो आ ही जाता है कि आज कारखाने में तो बारह सौ का नुकसान हो गया है। वह फिर उसे चुभता (कचोटा) है! पूरे दिन चुभन, चुभन और चुभन। भीतर यह कचोटा है और बाहर मकोड़े, मच्छर जो भी हों, वे काटते हैं। रसोई में बीबी काटती है। मैंने एक जने से पूछा, 'क्यों तंग आ गए हो?' तब उसने कहा कि 'यह पत्नी नागिन की तरह काटती है।' कुछ लोगों को ऐसी भी पत्नियाँ मिलती हैं न? पूरे दिन 'आप ऐसे और आप वैसे' करती रहती है, वह शांति से खाने भी नहीं देती बेचारे को! अब वह औरत कौन सा सुख दे देनेवाली है? वह क्या 'परमानेन्ट' सुख देगी? तो क्यों खुद दबा हुआ बैठा रहता है? विषय-भूखा है इसलिए। वर्ना निर्विषयी को डरानेवाला कौन? सिर्फ विषय के लिए पड़े रहना और खुद की स्वतंत्रता खो देनी? बीबी-बच्चों का जंगल और वह अनंत जन्म बिगाड़ देता है। जो इसमें से कुदरती रूप से छूट गया, उसकी तो बात ही क्या करनी?

पूरी दुनिया की है वह जूठन

बाकी, विषय भोग तो निरी जूठन ही है। पूरी दुनिया की जूठन है। आत्मा का कहीं ऐसा आहार होता होगा? आत्मा को बाहर की किसी भी चीज की जरूरत नहीं है, निरालंब है। किसी भी अवलंबन की उसे जरूरत नहीं है। परमात्मा ही है खुद। निरालंब अनुभव में आ जाए तो परमात्मा ही हो गया! उसे कुछ भी नहीं

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

छू सकता। दीवारों के आरपार निकल जाए, अंदर ऐसा आत्मा है, अनंत सुख का धाम है!

इस पैकिंग का हमें क्या करना है? पैकिंग तो कल को सड़ जाएगा, गिर जाएगा, बिगड़ जाएगा, पैकिंग तो किस चीज से बना है? यह हम नहीं जानते? फिर भी लोग भूल जाते हैं न? भूल नहीं जाते लोग? लेकिन यह पैकिंग आपको भी भ्रम में डाल दे। हमें, ज्ञानीपुरुष को, यों आरपार दिखता है। कपड़े वगैरह हों फिर भी कपड़ों के अंदर, चमड़ी के अंदर जैसा है वैसा यथावत् दिखता है। फिर राग कैसे होगा? खुद सिर्फ आत्मा को ही देखते हैं और बाकी सब तो कचरा है, सड़ा हुआ माल है। उसमें देखने जैसा क्या है? वहीं पर राग होता है। वही आश्चर्य है न! खुद क्या यह नहीं जानता? जानता है सबकुछ, लेकिन उसे ऐसा समझाया नहीं गया है। ज्ञानियों ने पहले से ही माल देखा हुआ है। इसमें नया क्या है? और फिर बीबी के साथ सो जाता है। अरे, इस मांस को ही दबाकर सो जाता है? लेकिन भान नहीं है न। उसी का नाम मोह है न! हमें निरंतर जागृति रहती है, एवरी सेकन्ड जागृति रहती है, इसलिए हम जानते हैं कि निरा मांस ही है यह सब।

अब ऐसी बात कोई करता नहीं है न? क्योंकि लोगों को विषय पसंद है। इसलिए यह बात करता ही नहीं है न कोई। जो निर्विषयी है, वही यह बात कर सकते हैं, वना ऐसा खुल्लम खुल्ला कौन कहेगा? अंत में तो यह सब छोड़े बिना चारा ही नहीं है। आप हम से कहो कि मुझे ब्रह्मचर्यव्रत लेना है। तो हम 'हाँ' कहते हैं। क्यों? कि भई बहुत अच्छा है, खरा सुखी होने का मार्ग यही है, यदि आपका उदय हो तो। वना शादी कर लो। शादी करके अनुभव लो। एक बार अनुभव हो गया तो दूसरे जन्म में मुक्त हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : कोई-कोई मुक्त हो जाता है, नहीं तो छूटना मुश्किल है।

१०

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : उस अनुभव को याद रखे तो छूट सकता है। हम तो हर क्षण याद रखनेवाले।

प्रश्नकर्ता : ऐसा तो शायद ही कोई याद रखनेवाला होगा। नहीं तो कीचड़ में उतरता ही जाता है।

दादाश्री : हाँ, यह तो कीचड़ ही है। गहरा कीचड़ है। उसमें उतरता ही जाता है। रिसर्च तो, जो निर्विषयी हो, वही कर सकता है। विषयी ईमान रिसर्च कर ही नहीं सकता।

सुख के साधन या अशुचिति का संग्रहस्थान?

जहाँ भ्रांतरस में एक होकर जगत् ढूँबा हुआ है। भ्रांतरस यानी वास्तव में रस नहीं है, फिर भी मान बैठा है! न जाने क्या मान बैठा है! इस सुख का विश्लेषण किया जाए तो निरी उल्टियाँ होंगी!

इस शरीर की राख बन जाती है और उस राख के परमाणुओं से वापस शरीर बनता है। अनंत जन्मों की राख के ये परिणाम हैं। निरी जूठन है! यह तो जूठन की भी जूठन और उसकी भी जूठन! वही की वही राख। वही के वही परमाणु सारे। उसी से फिर बनता रहता है! बर्तन को अगले दिन मांजने से वे साफ दिखते हैं, लेकिन मांजे बगैर अगर उसी में रोज खाते रहें तो क्या वह गंदगी नहीं है?

पुद्गल के जो गुण हैं न, जो स्थूल गुण हैं जो ऐसे हैं कि आँखों से दिखाई दें, कान से सुनाई दें, यों स्पर्श से अनुभव में आएँ, नाक को सुगंध दें, जीभ को स्वाद दें। पुद्गल के गुण और प्राकृतिक गुण दोनों एकत्रित हुए हैं। प्राकृतिक गुण मिश्र चेतन के हैं और पुद्गल के जो गुण हैं, उन सबके एक होने से यह खून-पीप और यह सब खड़ा हो गया और संसार खड़ा हो गया है। इसी से यह पूरा जगत् उलझन में हैं। खुद की अज्ञानता की वजह से उसे इस सारी अशुचिति का भान

विरलेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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नहीं रहता और भान नहीं रहता इसलिए यह संसार खड़ा रहा है।

रात को जलेबी खाता है तो सुबह में जलेबी की क्या दशा होगी? ऐसा भान रहता है क्या लोगों को? क्यों भान नहीं रहता? क्योंकि पुद्गल के गुणों में ही अनुराग है उसे। यह तो पुद्गल है, यह पूर्ण (चार्य होना, भरना) हुआ है और वह जो है, वह गलन (डिस्चार्ज होना, खाली होना) है ऐसा भान ही नहीं है न? जब गलन होता है सुबह-सुबह, तब घिन आती है? अरे, दोनों पुद्गल ही हैं। दोनों पुद्गल के ही गुण हैं, लेकिन उसे अशुचि का भान ही नहीं है, इसलिए जलेबी खाते समय टेस्ट से भोगता है न?!

प्रश्नकर्ता : जब आत्मा और पुद्गल का संयोग होता है तब हर किसी को ऐसा ही होता है न?

दादाश्री : नहीं, लेकिन जब तक उसे भ्रांति है, तभी तक। ‘मैं कौन हूँ’ उसका भान नहीं रहा इसलिए अभानता में ऐसा चलता रहता है। भान होने के बाद खुद अलग हो गया। बाद में उसे विषयसुख फीके लगते हैं। जलेबी खाने के बाद चाय पी है? तो फीकी लगती है न? फिर हम चाय में कितना भी टेस्ट करने जाएँ, लेकिन टेस्ट नहीं आता। उसी तरह यह जगत् भी असरवाला है!

अरे, यों अच्छी खीर खाई हो, उसकी भी उल्टी हो जाए तो कैसी दिखेगी? सुंदर, हाथ में पकड़ सकें, ऐसी दिखेगी? अभी जो अंदर डाला था, वही वापस निकला है, उसे हाथ में क्यों नहीं पकड़ सकते? यानी अंदर अशुचि का संग्रहस्थान है। अंदर डालते ही अशुचि हो जाती है। कटोरी साफ हो, खीर अच्छी हो, लेकिन अंदर डालते ही, वही की वही खीर फिर उल्टी करके दी जाए कि फिर से पी जाओ, तो नहीं पीएगा और कहेगा, ‘जो होना हो, वह हो, लेकिन नहीं पीऊँगा।’ यानी कि ऐसा सब भान रहता नहीं है न!

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

सच्चा आम का भोग, विषय की तुलना में

यह जलेबी नीचे धूल में गिर गई हो। फिर वह खाने के लिए दे तो खाओगे या नहीं? नहीं। क्यों? यों मुँह में तो मीठी लगती है, फिर भी? देखकर ही मना कर देगा न? यों अच्छा आम हो लेकिन खट्टा निकले तो? तब भी कहेगा 'नहीं। नहीं खाना।' मतलब ये लोग इतना सब देखकर खाते हैं। जीभ मना करे तो भी फेंक देता है, सिर्फ आँखें मना करें तो भी मना कर देता है, सिर्फ नाक मना करे तो भी छोड़ देता है। यानी कि इसमें जब पाँचों इन्द्रियाँ खुश हो जाएँ, तभी उस चीज़ को खाता है लेकिन सिर्फ विषय ही ऐसा है कि किसी भी इन्द्रिय को वह अच्छा ही नहीं लगता। फिर भी 'उसे' विषय में मजा आता है, वह भी आश्चर्य है न!

पाँच इन्द्रियों के विषय में सिर्फ जीभ का विषय ही सचमुच का विषय है। बाकी सब तो बनावट है। शुद्ध विषय हो तो सिर्फ यही एक है! फर्स्ट क्लास हाफूस के आम हों, तो कैसा स्वाद आता है? भ्रांति में यदि कोई शुद्ध विषय हो तो वह यही है। शुद्ध आहार मिलता हो और उसका स्वाद, बेस्वाद नहीं हो तो वह विषय स्वीकार करने योग्य है। है तो यह भी कल्पित, लेकिन सबसे ऊँचा कल्पित है। इस के बारे में सोचने से घृणा नहीं होती और विषय में तो सोचते ही घृणा होती है।

विषयों में भोग है ही नहीं, लेकिन मानते हैं कि यह भोग है। भोग में तो पाँचों इन्द्रियाँ खुश रहती है। यह आम, वह भोग कहलाता है। उसकी सुगंध अच्छी होती है, स्पर्श भी अच्छा होता है, स्वाद भी आता है, आँखों को यों अच्छा लगता है। जबकि इस विषय में तो कुछ है ही नहीं। यह तो फूलस पैरडाइस है। विषय में कोई इन्द्रिय खुश नहीं होती। आँखें भी अंधेरा ढूँढ़ती हैं। आम देखने के लिए आखें अंधेरा ढूँढ़ती हैं? नाक कहती है कि (नाक) बंद कर दो? लोग बदबू मारते होंगे क्या? दो दिन

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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नहीं कहाँ तो क्या होता है? आम की तरह महकते हैं? यानी ये विषय तो नाक को जरा भी अच्छे नहीं लगते, आँखों को भी अच्छे नहीं लगते। जीभ की तो बात ही क्या करनी? उल्टी आने जैसा होता है। आम को सड़ जाने के बाद सूँघें तो अच्छा लगता है? सड़े हुए आम को छूना, स्पर्श करना अच्छा लगता है? तो फिर वहाँ भोगने का रहता ही कहाँ है? कोई इन्द्रिय एक्सेप्ट नहीं करती, फिर भी लोग विषय भोगते हैं, वह आश्चर्य है न? यह सब सोचना। आपको साधु बनाने नहीं आया हूँ। ये कितनी सारी गलत मान्यताएँ घुस गई हैं, उन्हें निकालने की जरूरत है। विषय संबंध के बारे में विस्तार से समझ लिया जाए तो विषय रहेगा ही नहीं।

हमारे जैसा तो किसी को भी समझ में नहीं आता और अगर बताएँ भी तो दूसरे दिन भूल जाते हैं। वर्ना विषय, वह सोचे-समझे बगैर की बात है। ये लोग देखा देखी से उसमें पड़े हुए हैं। सिर्फ लोक संज्ञा है वह और ज्ञानी की संज्ञा, यदि कभी ज्ञानी से पूछा जाए तो इसमें कोई पड़ेगा ही नहीं। एक भी इन्द्रिय इसे 'पास' नहीं करती। इसलिए ज्ञानियों ने कहा है कि जहाँ सुख नहीं है, वहाँ कहाँ सुख मान बैठे हो? लेकिन इस विषय में उसे मूर्च्छा बहुत है। इसलिए मूर्च्छा को लेकर उसे भान नहीं रहता।

सभी इन्द्रियों ने निंदा की विषय की

विषय, वह संडास है। नाक-कान में से, मुँह में से, सब जगहों से जो-जो निकलता है, वह सब संडास ही है। डिस्चार्ज, वह भी संडास ही है। जो परिणामिक भाग है, वह संडास है लेकिन तन्मयाकार हुए बिना गलन नहीं हो सकता। संडास होता है वह भी, अंदर जो कॉजेज होते हैं, उनका परिणाम है। खीर-पूड़ी किसे अच्छी नहीं लगती? लेकिन भगवान कहते हैं कि कल सुबह वह संडास बन जाएगा। विषय को संडास क्यों कहा गया है? इसीलिए, क्योंकि वह गलन है।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

विचारशील इंसान विषय में सुख कैसे मान बैठा है, उसी पर मुझे आश्चर्य होता है? विषय का पृथक्करण करे तो दाद को खुजलाने जैसा है। हमें तो बहुत विचार आते हैं और लगता है कि अरेरे! अनंत जन्मों से यही किया? जितना कुछ हमें पसंद नहीं है, वह सबकुछ विषय में है। निरी दुर्गंध है। आँखों को देखना अच्छा नहीं लगता। नाक को सूंघना अच्छा नहीं लगता। तूने सूंघकर देखा था? सूंघकर देखना था न? तो वैराग तो आ जाता। कान को नहीं रुचता। सिर्फ चमड़ी को रुचता है। लोग तो पैकिंग को देखते हैं, माल को नहीं देखते। जो चीज़ पसंद नहीं है, पैकिंग में तो वही चीज़ें भरी हुई है। निरी दुर्गंध का बोरा है! लेकिन मोह के कारण भान नहीं रहता और इसीलिए तो पूरा जगत् चकरा गया है।

यह बांद्रा स्टेशन की जो खाड़ी आती है, उसकी दुर्गंध पसंद है? उससे भी बुरी दुर्गंध इस पैकिंग में हैं। आँखों को पसंद नहीं आएँ, ऐसे चित्र-विचित्र पार्ट्स अंदर है। इस बोरे में तो बेहद विचित्र गंदगी है। यह अपने अंदर जो हृदय है, उसी लौंदे को निकालकर हाथ में दे दे तो? और कहे कि अपने साथ हाथ में रखकर सो जा, तो? नींद ही नहीं आएगी न? यह तो समुद्र के विचित्र जीव जैसा दिखता है। जो पसंद नहीं है, वह सभी कुछ इस देह में है। ये आखें यों बहुत सुंदर दिखती हों, लेकिन मोतियाबिंद हो जाए और उन सफेद आँखों को देखा हो तो? अच्छा नहीं लगेगा। ओहोहो सबसे ज्यादा दुःख इसी में हैं। यह शराब जो नशा चढ़ाती है, उस शराब की दुर्गंध इंसान को अच्छी नहीं लगती और यह विषय तो सर्व दुर्गंध का कारण है। सभी नापसंद चीज़ें वहाँ पर है। अब क्या होगा यह आश्चर्य? इसमें से छूट गए तो फिर राजा। जिसे भूख ही नहीं लगी हो उसे क्या? जो भूखा होगा वही होटल में जाएगा न? जहाँ-तहाँ झॉकता रहेगा, लेकिन जिसने खाना खाया है, खाकर आराम से टहल रहा है, रस-रोटी खाकर टहल रहा है, वह क्यों होटल में जाएगा? गंदगीवाली

विरलेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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होटलें! विषय के बारे में गहराई से सोचने पर यही लगता है कि यह गटर तो खोलने जैसा है ही नहीं। कितना बंधन! यह जगत् इसीलिए खड़ा है न!

बुद्धि से सोचा है विषय के बारे में कभी?

विषय तो ऐसी चीज है जिसे मूर्ख भी न चाहे। बुद्धि का संपूर्ण प्रकाश हो चुका हो, बुद्धि का विकास हो चुका हो, वह भी विषय से डरता है बेचारा। क्योंकि विषय, वह तो बिल्कुल मूर्खतापूर्ण चीज है। इस काल में, यह तो जलन की वजह से विषय के कीचड़ में गिरता है। नहीं तो कोई कीचड़ में गिरेगा ही नहीं न! बहुत जलन होने लगे, तब ईंसान क्या करे? इसलिए उल्टा उपाय करता है। विषय के बारे में यदि सोचा जाए तो विचारक ईंसान को वह अच्छा ही नहीं लगेगा। यानी कि बुद्धि से भी विषय छूट सकता है। उसमें फिर ज्ञान का और इसका क्या लेना-देना? विषय के बारे में यदि सोचा होता न, तो उसे विषय बिल्कुल अच्छा ही नहीं लगता। निर्मल बुद्धिवाले को विषय का पृथ्यकरण करने को कहें तो, 'विषय थूकने जैसी चीज भी नहीं है।' ऐसे कहेगा। अतः जिसकी बुद्धि निर्मल हो, उसे तो विषय अच्छा ही नहीं लगेगा। वह छूएगा ही नहीं न! लेकिन जिसकी बुद्धि में मल जम गया हो, उसे तो सबकुछ उल्टा ही दिखेगा।

प्रश्नकर्ता : इस मनुष्य जाति में ब्रह्मचर्य रह ही नहीं सकता, इसका क्या कारण है? मोह है? राग है?

दादाश्री : बुद्धिपूर्वक का सुख नहीं है यह। बिना सोचे-समझे माना गया सुख है। लोगों ने जो माना, वही हमने मान लिया। वह सिर्फ मान्यता का ही सुख है और जलेबी सुखदायी है, वह बुद्धिपूर्वक का सुख है।

विषय का खेल तो बुद्धिपूर्वक नहीं है, यह तो सिर्फ मन की एंठन ही है। कोई भी बुद्धिमान ईंसान यदि बुद्धि से विषय

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

के बारे में समझने जाए तो बुद्धि विषय को लेट गो नहीं करेगी। ये बुद्धिमान लोग लेट गो करते हैं, इसका क्या कारण है? लोकसंज्ञा के अनुसार चलते हैं, इसलिए उस तरफ का आवरण नहीं टूटा।

एक जन ने कहा कि बुद्धिपूर्वक में क्या हर्ज है? तब मैंने कहा, बुद्धिपूर्वक की चीजें उजाले में करनी होती है। सीक्रेसी(गुप्त) नहीं होती। हजार लोगों की मौजूदगी में बैठकर जलेबी खा सकते हैं? जलेबी में हर्ज नहीं है न? उसे शर्म नहीं आती?

प्रश्नकर्ता : नहीं। शर्म नहीं आती, रौब से खाई जा सकती है!

दादाश्री : यानी विषय के बारे में यदि कोई सोचे न, यदि सोचना आए, तो वह विषय की ओर कभी जाएगा ही नहीं। लेकिन सोचना भी नहीं आता न? विषय, वह अजागृति है। विषय पुसाए ही कैसे? जो चीजें सोचने पर अच्छी नहीं लेंगे, उसी चीज का संबंध कैसे पुसाए?

निरि गंदगी दिखे विषय में

अब कितने ही लोग चारित्र (दीक्षा) लेने लगे हैं। क्योंकि विषय में इतनी गंदगी है कि जिस पर अगर निबंध लिखना हो तो निबंध लिखने में भी घिन आ जाए। यह तो ठीक है, एक तरह की हैबिट हो गई है। मूलतः अज्ञानता और मूर्च्छा की वजह से गंदगी में हाथ डाला। अब भान में आने के बाद क्या घिन नहीं आएगी? इस बिल्कुल ही गंदगीवाले सुख को छोड़ देना है। इसे तो गंदगी देखकर ही छोड़ देना है। यदि इस विषय का सुख छोड़ दे तो पूरी दुनिया का मालिक बन जाएगा। वास्तव में तो वह सुख है ही नहीं। इस जलेबी में सुख है, श्रीखंड में सुख है, ऐसा कह सकते हैं, उसके लिए मना नहीं कर सकते लेकिन इस विषय में तो सुख है ही नहीं।

मुझे तो इस विषय में इतनी गंदगी दिखती है कि मुझे यों

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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ही सहज ही उस ओर का विचार तक नहीं आता। मुझे विषय का कभी भी विचार ही नहीं आता। मैंने इतना कुछ देख लिया है, इतना कुछ देखा है कि मुझे इंसान आरपार दिखाई दे, ऐसा देखा है। विषय का यदि पृथक्करण किया जाए, ज्ञान से नहीं लेकिन बुद्धि से, तो भी इंसान पागल हो जाए।

यह सब तो नासमझी से खड़ा है। प्याज की गंध किसे आती है? जो प्याज खाता है, उसे गंध नहीं आती। जो प्याज नहीं खाता है, उसे तुरंत ही गंध आती है। विषयों में पड़ा है इसलिए विषयों में रही गंदगी को नहीं समझ पाता। इसलिए विषय नहीं छूट पाता और राग करता रहता है। वह भी अभानता का राग है। सिर्फ आत्मा ही मांसरूपी नहीं है। बाकी सब निरा मांस ही है न? !

जिस तरह आहारी आहार करता है, उसी तरह विषयी विषय करता है लेकिन बात समझ में आनी चाहिए न? और वह लक्ष्य में रहना चाहिए न? आहार तो हर रोज अच्छा खाता है, लेकिन चार दिन का भूखा हो तो बासी गंदी रोटी भी खा जाता है। यह आहार तो अच्छा होता है, लेकिन यह विषय तो उससे भी ज्यादा गंदगीवाला है। भूख की जलन की वजह से गंदी रोटी खाता है। उसी तरह जलन की वजह से वह विषय भोगता है। लेकिन गंदी रोटी खाते समय कहता है, 'चलेगा'। लेकिन क्या फिर से वैसा खाने की इच्छा होती है? नहीं। दोबारा वैसा खाने की इच्छा तो किसी को भी नहीं होती लेकिन विषय में ऐसा नहीं रहता न? विषय में भी ऐसा ही रहना चाहिए।

कई लोग मांसाहार करते हैं, वे राजीखुशी से करते हैं न? और आपको मांसाहार करने को कहा हो तो? धिन आपणी न? इसका क्या कारण है? क्योंकि मांसाहार करनेवाले का डेवेलपमेन्ट अलग है और आपका डेवेलपमेन्ट अलग है। जैसे-जैसे डेवेलपमेन्ट बढ़ता जाता है, वैसे वैसे संसार की चीजों पर धिन आती जाती