संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
**५—मेरुपर्वतपर भरद्वाजकी लोक-पितामह ब्रह्मासे वर-याचना** ... **२१**
२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भरद्वाजने कहा—भगवन् ! भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी पितामह ! जिस उपायसे यह समस्त मानव-समुदाय सम्पूर्ण दुःखसे छुटकारा पा जाय, वह मुझे बताइये । आज मुझे यही वर अच्छा लगता है ।
श्रीब्रह्माजीने कहा—वत्स ! तुम इस विषयमें शीघ्र ही प्रयत्नपूर्वक अपने गुरु वाल्मीकिजीसे प्रार्थना करो । उन्होंने जिस निर्दोष रामायणकी रचना आरम्भ की है, उसका श्रवण कर लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण मोहसे पार हो जायेंगे ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाजसे यों कहकर सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा भगवान् ब्रह्मा उनके साथ ही मेरे आश्रमपर आये । उस समय मैंने शीघ्र ही अर्घ्य, पाद्य आदिके द्वारा उन भगवान् ब्रह्माजीका पूजन किया । तत्पश्चात् समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले ब्रह्माजीने मुझसे कहा—'श्रेष्ठ महर्षे ! श्रीरामचन्द्रजीके स्वभाव एवं स्वरूपका वर्णन करनेवाले इस निर्दोष रामायणका आरम्भ करके जबतक इसकी समाप्ति न हो जाय, तबतक कितना ही उद्वेग क्यों न हो, तुम इसका परित्याग न करना । इस ग्रन्थके अनुशीलनसे यह जगत् इस संसाररूपी क्लेशसे उसी प्रकार शीघ्र पार हो जायगा, जैसे जहाजके द्वारा लोग अविलम्ब समुद्रसे पार हो जाते हैं। तुम लोकहितके लिये इस रामायण नामक शास्त्रकी रचना करो । इसी बातको कहनेके लिये मैं स्वयं यहाँतक आया हूँ ।' तत्पश्चात् वे मेरे उस पवित्र आश्रमसे उसी क्षण अदृश्य हो गये । तब भरद्वाजने कहा—'भगवन् ! महामना श्रीरामचन्द्रजी, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, यशस्विनी सीतादेवी तथा श्रीरामचन्द्रजीका अनुसरण करनेवाले परम बुद्धिमान् मन्त्रिपुत्र—इन सबने इस संसाररूपी संकटमें पड़कर कैसा व्यवहार किया था, यह बात मुझे बताइये । इसे सुनकर अन्य लोगोंके साथ मैं भी वैसा ही बर्ताव करूँगा ।'
राजेन्द्र ! जब भरद्वाजने आदरपूर्वक मुझसे पूर्वोक्त विषयका प्रतिपादन करनेके लिये अनुरोध किया, तब मैं भगवान् ब्रह्माजीकी आज्ञाका पालन करनेके लिये उक्त विषयके वर्णनमें प्रवृत्त हुआ और बोला—'वत्स भरद्वाज ! सुनो; तुमने जैसा पूछा है, उसके अनुसार तुम्हें सब कुछ बताता हूँ । मेरे उपदेशको सुननेसे तुम अपना सारा मोह दूर कर सकोगे । बुद्धिमान् भरद्वाज ! तुम वैसा ही व्यवहार करो, जैसा कि आनन्दस्वरूप कमलनयन भगवान् श्रीरामने समस्त संसारमें अनासक्तभावसे रहकर किया था ।'
महामना भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा, सीता, राजा दशरथ, श्रीरामसखा कृताङ्ग और अविरोध, पुरोहित वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्यान्य आठ मन्त्री—ये सभी ज्ञानमें पारंगत थे । धृष्टि, जयन्त, भास, सत्यवादी विजय, विभीषण, सुपंपण, हनुमान् और इन्द्रजित्—ये श्रीरामके आठ मन्त्री बताये गये हैं । ये सब-के-सब समदर्शी थे । इनका चित्त विषयोंमें आसक्त नहीं था । ये सभी जीवन्मुक्त महात्मा थे और प्रारब्धवश जो कुछ प्राप्त होता, उसीमें संतुष्ट रहकर तदनुकूल व्यवहार करते थे । बेटा ! इन लोगोंने जिस प्रकार होम, दान और आदान-प्रदान किया था, इन्होंने जगत्में जिस प्रकार निवास किया था और जिस प्रकार स्मरण-चिन्तन अथवा श्रौत-स्मार्त कर्मोंका पालन किया था, उसी प्रकार यदि तुम भी बर्ताव करते हो तो संसाररूपी संकटसे छूटे हुए ही हो । उदार एवं सत्त्वगुणसे सम्पन्न पुरुष अपार संसार-समुद्रमें गिरनेपर भी यदि उपर्युक्त उत्कृष्ट साधनको अपना ले तो उसे न तो शोक प्राप्त होता है और न वह दीनता अथवा दुःखमें ही पड़ता है। सब प्रकारकी चिन्ताओंसे मुक्त हो वह परमानन्द-सुधाका पान करके सदाके लिये परम तृप्त हो जाता है।
(सर्ग २)
**३—जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार, जगत्के मिथ्यात्व तथा द्विविध वासनाका निरूपण तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थ-यात्राका वर्णन**
वैराग्य-प्रकरण ] * जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थयात्राका वर्णन * २३
जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार, जगत्के मिथ्यात्व तथा द्विविध वासनाका निरूपण तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थ-यात्राका वर्णन
भरद्वाज बोले—ब्रह्मन् ! आप श्रीरामचन्द्रजीकी कथासे आरम्भ करके क्रमशः जीवन्मुक्तकी स्थितिका मुझसे वर्णन कीजिये जिससे मैं सदाके लिये परम सुखी हो जाऊँ ।
श्रीवाल्मीकिजीने कहा—साधु पुरुष भरद्वाज ! जैसे रूपरहित आकाशमें नील-पीत आदि वर्णोंका भ्रम होता है उसी प्रकार निर्गुण निराकार ब्रह्ममें अज्ञानवश जगत्की सत्ताका भ्रम होता है । यह जो जगत्सम्बन्धी भ्रम उत्पन्न हो गया है, इसे इस तरह भुला दिया जाय कि फिर कभी इसका स्मरण ही न हो—इसीको मैं उत्तम ज्ञान मानता हूँ । इस दृश्य-प्रपञ्चका अत्यन्त अभाव है—यह बिना हुए ही भासित हो रहा है, जबतक ऐसा बोध नहीं होता, तबतक कोई कभी भी उस उत्कृष्ट आत्मज्ञानका अनुभव नहीं कर सकता; इसलिये आत्मज्ञानका अन्वेषण—उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये । इस (योग-वासिष्ठरूप) शास्त्रका ज्ञान होनेपर इसी जीवनमें उस आत्मतत्त्वका बोध हो जाय—यह सर्वथा सम्भव ही है—वह होकर ही रहेगा । इसी उद्देश्यसे इस शास्त्रका विस्तार (प्रचार-प्रसार) किया जाता है । यदि तुम (श्रद्धा-भक्तिके साथ) इस शास्त्रका श्रवण करोगे तो निश्चय ही तुम्हें उस आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो जायगा; अन्यथा उसकी प्राप्ति असम्भव है ।
निष्पाप भरद्वाज ! यह जगत्रूपी भ्रम यद्यपि प्रत्यक्ष दिखायी देता है, तो भी इस शास्त्रके विचारसे अनायास ही ऐसा अनुभव हो जाता है कि 'यह है ही नहीं'—ठीक उसी तरह जैसे आकाशमें नील आदि वर्ण प्रत्यक्ष दीखनेपर भी विचार करनेसे बिना परिश्रमके ही यह समझमें आ जाता है कि इसका अस्तित्व नहीं है । यह दृश्य-जगत् वास्तवमें है ही नहीं, ऐसा बोध होनेपर जब मनसे दृश्य-प्रपञ्चका मार्जन (निवारण या अभाव) हो जाय, तब परमनिर्वाणरूप शान्तिका स्वतः अनुभव होने लगता है । ब्रह्मन् ! सम्पूर्णरूपसे वासनाओंका जो परित्याग (अत्यन्त अभाव) है, वही उत्तम मोक्ष कहलाता है । उसे अविद्यारूपी मलसे रहित ज्ञानी ही प्राप्त कर सकते हैं । विप्रवर ! जैसे शीतके नष्ट होनेपर हिमकण तुरंत गल जाते हैं, उसी प्रकार वासनाओंके क्षीण हो जानेपर (वासना-पुञ्जरूप) चित्त भी शीघ्र ही गल जाता है (उसका अभाव-सा हो जाता है) ।
वासना दो प्रकारकी बतायी गयी है—एक शुद्ध वासना और दूसरी मलिन वासना । मलिन वासना जन्मकी हेतुभूत है—उसके द्वारा जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ता है और शुद्ध वासना जन्मका नाश करनेवाली (अर्थात् मोक्षकी साधिका) है । विद्वानोंने मलिन वासनाको पुनर्जन्मकी प्राप्ति करानेवाली बताया है । अज्ञान ही उसकी घनीभूत आकृति है तथा वह बढ़े हुए अहङ्कारसे सुशोभित होती है । जो भुने हुए बीजके समान पुनर्जन्मरूपी अङ्कुरको उत्पन्न करनेकी शक्तिको त्यागकर केवल शरीरधारण मात्रके लिये स्थित रहती है, वह वासना 'शुद्धा' कही गयी है । जो लोग शुद्ध वासनासे युक्त हैं, वे फिर जन्मरूप अनर्थके भाजन नहीं होते । जानने योग्य परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले वे परम बुद्धिमान् पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहलाते हैं ।
महामते भरद्वाज ! अब तुम श्रीरामचन्द्रजीकी जीवन-चर्यासे सम्बन्ध रखनेवाली इस मङ्गलकारिणी कथाका क्रमशः श्रवण करो । मैं उसका वर्णन करूँगा, उसीके द्वारा तुम सदाके लिये सम्पूर्ण तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लोगे । वत्स ! जिन्हें कहींसे भी कोई भय नहीं है, वे कमल-नयन भगवान् श्रीराम जब अध्ययनके पश्चात् विद्यालयसे निकलकर घरको लौटे, तब भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते हुए उन्होंने राजभवनमें कुछ दिन व्यतीत किये । तदनन्तर
२४ * अविच्छिन्नचिदारामैः पुमांस्तीर्ण नेतरेत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
कुछ समय बीतनेपर, जब कि राजा दशरथ भूमण्डलके पालनमें लगे थे और प्रजावर्गके लोग रोग-शोकसे रहित हो बड़े सुखसे दिन बिता रहे थे, एक दिन अनन्त कल्याणमय गुणोंसे सुशोभित होनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके मनमें तीर्थों तथा पुण्यमय आश्रमोंके दर्शनकी अत्यन्त उत्कण्ठा जाग उठी। तब श्रीरामने पिताके पास जाकर उनके चरण-कमलोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।
श्रीराम बोले—पिताजी ! मेरे स्वामी महाराज ! मेरे मनमें तीर्थों, देवमन्दिरों, वनों तथा आश्रमोंका दर्शन करनेके लिये बड़ी उत्कंठा हो रही है। आपके समक्ष मेरी यह पहली याचना है, आप इसे सफल करने योग्य हैं। नाथ ! संसारमें ऐसा कोई याचक नहीं है, जिसे अभीष्ट वस्तु देकर आपने उसका आदर न किया हो।
श्रीराम पहली बार प्रार्थी होकर राजाके समक्ष उपस्थित हुए थे। उनके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर राजा दशरथने वसिष्ठजीके साथ विचार करके उन्हें तीर्थ-दर्शनके लिये आज्ञा दे दी। उस समय शुभ नक्षत्र और शुभ दिनमें ब्राह्मणोंने आकर उनके लिये स्वस्तिवाचन किया। उनके शरीरको माङ्गलिक वेष-भूषासे अलंकृत किया गया। माताओंने उन्हें हृदयसे लगा-लगाकर आशीर्वाद दिये और आभूषण पहनाये। फिर वे रघुनाथजी तीर्थ-यात्राके लिये उद्यत हो लक्ष्मण और शत्रुघ्न—इन दो भाइयों, वसिष्ठजीके भेजे हुए शास्त्रज्ञ ब्राह्मणों तथा अपने ऊपर स्नेह रखनेवाले कुछ इने-गिने राजकुमारोंके साथ अपने उस राजभवनसे बाहर निकले। श्रीरामचन्द्रजी दान-मान आदिसे ब्राह्मणोंको अपने अनुकूल बनाते, सब ओरसे प्रजाओंके आशीर्वाद सुनते और सम्पूर्ण दिशाओंके दृश्योंपर दृष्टिपात करते वन्य-प्रदेशोंमें भ्रमण करने लगे। उन्होंने अपने निवास-स्थान उस कोसल जनपदसे आरम्भ करके स्नान, दान, तप और ध्यानपूर्वक क्रमशः समस्त तीर्थ-स्थानोंका दर्शन किया। नदियोंके पवित्र तट, पुण्य वन, पावन आश्रम, जंगल, जनपदोंकी सीमाओंमें स्थित समुद्र और पर्वतोंके तट, चन्द्रमाके समान उज्ज्वल आभावाली गङ्गा, नील कमलकी-सी कान्तिवाली निर्मल कलिन्दनन्दिनी यमुना, सरस्वती, शतद्रू (सतलज), चन्द्रभागा (चिनाब), इरावती (रावी), वेणी, कृष्णवेणी, निर्विन्ध्या, सरयू, चर्मण्वती (चम्बल), वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), बाहुदा, प्रयाग, नैमिषारण्य, धर्मारण्य, गया, वाराणसी (काशीपुरी), श्रीशैल, केदारनाथ, पुष्कर, क्रमप्राप्त मानस सरोवर, उत्तरमानस, वड़वामुख, अन्य तीर्थसमुदाय, अग्नितीर्थ, महातीर्थ, इन्द्रद्युम्न सरोवर आदि पुण्यतीर्थ, सरोवर, सरिताएँ, नद, तालाब या कुण्ड—इन सबका उन्होंने आदरपूर्वक दर्शन किया।
१. वेणी नदी कृष्णामें मिलनेसे पहले केवल वेणी कहलाती है, कृष्णामें संगम होनेके पश्चात् उसका नाम कृष्णवेणी हो जाता है।
२. कुछ लोगोंकी मान्यताके अनुसार बाहुदा सुप्रसिद्ध राप्ती नदीकी एक सहायक नदी है।
**४—तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास, राजा दशरथके यहाँ विश्वामित्रका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार**
वैराग्य-प्रकरण ] * तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास * २५
स्वामी कार्तिकेय, शालग्रामस्वरूप श्रीविष्णु, भगवान् विष्णु और शिवके चौसठ स्थान, नाना प्रकारके आश्चर्य-जनक दृश्योंसे विचित्र शोभा धारण करनेवाले चारों समुद्रोंके तट, विन्ध्यपर्वत और मन्दराचलके कुञ्ज, हिमालय आदि सात कुल-पर्वतोंके स्थान तथा बड़े-बड़े राजर्षियों, ब्रह्मर्षियों, देवताओं और ब्राह्मणोंके मङ्गलकारी पावन आश्रमोंका भी श्रीरामचन्द्रजीने श्रद्धापूर्वक दर्शन किया। दूसरोंको मान देनेवाले श्रीरघुनाथजी अपने भाइयोंके साथ बारंबार चारों दिशाओंके प्रान्तभागों तथा भूमण्डलके सभी छोरोंमें घूमते फिरे। जैसे देवताओं आदिसे सम्मानित भगवान् शंकर सम्पूर्ण दिशाओंमें विहार करके पुनः शिवलोकमें लौट आते हैं, उसी प्रकार रघुनन्दन श्रीराम देवताओं, किंनरों तथा मनुष्योंसे सम्मानित हो इस सम्पूर्ण भूमण्डलका अवलोकन करके फिर अपने घर लौट आये। (सर्ग ३)
तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास; राजा दशरथके यहाँ विश्वामित्रका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब श्रीमान् रामचन्द्र नगरको लौटे, उस समय (उनका स्वागत करते हुए) पुरवासीजन उनके ऊपर राशि-राशि पुष्प बिखेरने लगे। उस अवस्थामें, जैसे इन्द्र-पुत्र जयन्त अपने स्वर्गीय भवनमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने अपने महलमें प्रवेश किया। वहाँ पहुँचकर रघुनाथजीने पहले पिताको प्रणाम किया, फिर क्रमशः कुलगुरु वसिष्ठजीको, बड़े बन्धु-बान्धवोंको, ब्राह्मणोंको तथा कुलके बड़े-बूढ़े लोगोंको मस्तक झुकाया। फिर सुहृदों, बन्धुओं, पिता तथा ब्राह्मणसमुदायने श्रीरामको बारंबार हृदयसे लगाया और श्रीरामने भी उनके प्रति अभिवादन एवं प्रिय-भाषण आदि यथोचित आचार-व्यवहारका निर्वाह किया। उस समय श्रीरघुनाथजी आनन्दोल्लाससे फूले नहीं समाते थे। अयोध्यामें श्रीरामचन्द्रजीके शुभागमनके उपलक्ष्यमें लगातार आठ दिनोंतक आनन्दोत्सव मनाया गया। उस समय हर्षसे मतवाली जनताके द्वारा सुखपूर्वक किये गये गीत-वाद्य आदिका मधुर कोलाहल सब ओर व्याप्त हो गया था। तबसे श्रीरघुनाथजी विभिन्न देशोंमें प्रचलित नाना प्रकारके रहन-सहनका जहाँ-तहाँ वर्णन करते हुए घरमें ही सुखपूर्वक रहने लगे।
श्रीरामचन्द्रजी प्रतिदिन सबेरे उठकर (स्नान आदिके पश्चात्) विधिपूर्वक सन्ध्या-वन्दन करके राजसभामें बैठे हुए अपने इन्द्रतुल्य तेजस्वी पिता महाराज दशरथको प्रणाम किया करते थे। वहाँ एक पहरतक मुनियों आदिके साथ बैठकर आदरपूर्वक ज्ञानकी कथा-वार्ता सुना करते थे। भाइयोंके साथ तीर्थयात्रासे लौटनेपर श्रीरघुनाथजी प्रायः ऐसी ही दिनचर्याको अपनाकर पिताके घरमें सुखपूर्वक रहते थे। निष्पाप भरद्वाज !
**१५—वासनाओंके क्षयका उपाय और ब्रह्मचिन्तनके अभ्यासका निरूपण ... १२९**
२६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीरामचन्द्रजीकी प्रत्येक चेष्टा राजोचित व्यवहारके कारण बड़ी मनोहर प्रतीत होती थी; वह सत्पुरुषोंके चित्तमें चन्द्रमाकी चाँदनीके समान आह्लाद उत्पन्न करती थी। सभी उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे तथा वह अमृत-रसके समान मधुर, सुन्दर एवं कोमल होती थी। ऐसी ही चेष्टाके द्वारा वे दिन व्यतीत करते थे।
भरद्वाज! तदनन्तर जब श्रीरघुनाथजीकी अवस्था सोलह वर्षसे कुछ ही कम थी, शत्रुघ्न और लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजीका निरन्तर अनुसरण करते थे, भरत सुखपूर्वक अपने नानाके यहाँ विराज रहे थे, महाराज दशरथ इस सारी पृथ्वीका यथोचित रूपसे पालन कर रहे थे तथा वे महाप्राज्ञ नरेश प्रतिदिन मन्त्रियोंके साथ बैठकर अपने पुत्रोंके विवाहके लिये भी परामर्श करने लगे थे, उन्हीं दिनों तीर्थयात्रा पूरी करके अपने घरमें रहते हुए श्रीराम दिन-पर-दिन कृश होने लगे।
भरद्वाज! महाराज दशरथ श्रीरामसे बारंबार स्नेह-युक्त मधुरवाणीमें पूछते—'बेटा! तुम्हारे मनमें कैसी बड़ी भारी चिन्ता पैदा हो गयी है?' वे उत्तर देते—'पिताजी! मुझे कोई कष्ट नहीं है।' इतना ही कहकर कमलनयन श्रीराम पिताजीकी गोदमें चुपचाप बैठ जाते थे।
तदनन्तर एक दिन राजा दशरथने समस्त कार्योंका ज्ञान रखनेवाले, वक्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीसे पूछा—'गुरुदेव! श्रीराम क्यों खिन्न हैं?' उनके इस प्रकार पूछनेपर वसिष्ठ मुनिने कुछ सोचकर राजासे कहा—'श्रीमन्! महाराज! इसमें कुछ कारण है; किंतु इसके लिये आपके मनमें दुःख नहीं होना चाहिये।'
इसी समय महर्षि विश्वामित्र अयोध्यानरेश दशरथसे मिलनेके लिये वहाँ आये। उन दिनों धर्मकार्यमें तत्पर रहनेवाले उन बुद्धिमान् महर्षिके यहाँ एक यज्ञ हो रहा था। माया, बल और वीर्यसे उन्मत्त रहनेवाले राक्षसोंने एक साथ आक्रमण करके उनके उस यज्ञका विध्वंस कर डाला। उस यज्ञकी रक्षाके लिये ही उन्होंने महाराज दशरथसे मिलनेकी इच्छा की थी; क्योंकि राक्षसोंके उत्पातके कारण वे मुनि अपने उस यज्ञको बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण नहीं कर पाते थे। तब उन निशाचरोंके विनाशके लिये उद्यत हो वे तपोनिधि महातेजस्वी विश्वामित्र मुनि अयोध्यापुरीमें आये। वहाँ पहुँचकर राजासे मिलनेकी अभिलाषा लिये वे द्वारपालोंसे बोले—'तुमलोग शीघ्र जाकर महाराजको मेरे आनेकी सूचना दो। उनसे कहना—गाधिके पुत्र कुशिकवंशी विश्वामित्र आये हैं।'
मुनिका यह वचन सुनकर राजद्वारपर रहनेवाले पहरेदारोंने राजमहलमें जाकर अपने स्वामी छड़ीदारसे बताया—'प्रभो! महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं। तब उस छड़ीदारने सभामण्डपमें राजाओंकी मण्डलीसे घिरे बैठे हुए महाराजके पास तुरंत जाकर सूचना दी—'देव! राजद्वारपर नवोदित सूर्यके समान महातेजस्वी तथा अग्निकी ज्वालाके सदृश अरुण जटाजूटधारी एक दीप्तिमान् पुरुष आकर खड़े हैं। वे महामुनि विश्वामित्र हैं।' राजाकी ओर देखकर छड़ीदारने नम्रता
वैराग्य-प्रकरण ] * तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास * २७
वचनोंमें ज्यों ही यह बात कही, उसकी उस बातको सुनते ही मन्त्री और सामन्तोंसहित वे राजशिरोमणि दशरथ तत्काल सोनेके सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये।
राजाओंके समुदायसे घिरे तथा सामन्तोंसे प्रशंसित होते हुए वे नरेश वसिष्ठ और वामदेवजीके साथ सहसा पैदल ही उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ महामुनि विश्वामित्र खड़े थे। राजाने ड्योढ़ीपर खड़े हुए उन मुनिश्रेष्ठको देखा। वे ब्राह्मणोचित तेज तथा महान् क्षात्र-बलसे भी सम्पन्न थे। वृद्धावस्थाके कारण अधिक पकी हुई और तपस्यामें ही लगे रहनेसे रूखी जटावल्लरीके द्वारा उनके कंधे ढके हुए थे। उन्होंने शान्त (सौम्य), कान्तिमान्, उद्दीप्त, प्रतिवातरहित, विनयशील, हृष्ट-पुष्ट अवयवोंसे युक्त तथा तेजस्वी शरीर धारण कर रखा था। उनका तेज सुन्दर होनेके साथ ही अत्यन्त भयंकर था, प्रसादगुणसे युक्त तथा दूरतक फैला हुआ था, गम्भीर एवं अतिशय पूर्णताको प्राप्त था। उस तेजसे ऋषिकी अङ्ग-कान्ति अनुरञ्जित थी। उन्होंने अपने हाथमें एक कुण्डी (कमण्डलु) ले रक्खी थी, जो चिकनी, निर्दोष एवं उत्तम थी। वह उनके कल्पान्तस्थायी जीवनकालकी सभी अवस्थाओंमें सहचरीकी भाँति उनका साथ देती थी। मुनिका अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल था। उनके चित्तमें करुणा भरी थी, इसलिये उनकी वाणी बड़ी मधुर एवं प्रसन्नतासूचक होती थी। वे अपनी स्नेहपूर्ण दृष्टिसे इस प्रकार देखते थे, मानो सामने खड़ी हुई जनताको अमृतसे सींच रहे हों। उनके अङ्गमें सुन्दर यज्ञोपवीत शोभा पा रहा था। वे दर्शकोंके मनमें अत्यन्त आश्चर्यका संचार-सा कर रहे थे। उन महर्षिको दूरसे ही देखकर राजाका शरीर विनयसे झुक गया और उन्होंने मुकुटमण्डित मस्तकसे उनके चरणोंमें प्रणाम किया। मुनिने भी, जैसे सूर्यदेव इन्द्रका प्रत्यभिवादन करते हैं, उसी प्रकार मधुर एवं उदारतापूर्ण वचनोंद्वारा आशीर्वाद देकर पृथ्वीनाथ दशरथका प्रत्यभिवादन किया। तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि सभी ब्राह्मणोंने स्वागत आदिके क्रमसे विश्वामित्रजीका सत्कार किया।
दशरथने कहा—महात्मन् ! जैसे भगवान् सूर्य अपने तेजस्वी स्वरूपका दर्शन देकर कमलोंसे भरे हुए सरोवरों-पर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आज आपका जो यह असम्भावित तेजोमय दर्शन प्राप्त हुआ है, इससे हम सब लोग अत्यन्त अनुगृहीत हैं।
मुनिके प्रति ऐसी ही बातें कहते हुए अन्य राजा तथा महर्षि, सब लोग राजसभामें आकर यथायोग्य आसनोंपर बैठ गये। राजा दशरथने स्वयं ही मुनिको अर्घ्य निवेदन किया।
राजाके अर्घ्यको स्वीकार करके महर्षिने शास्त्रोक्त विधिसे प्रदक्षिणा करते हुए नरेशकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। राजा दशरथद्वारा पूजित हो विश्वामित्र बडे प्रसन्न हुए। उनका मुखारविन्द खिल उठा। उन्होंने राजासे उनकी कुशल पूछी। तदनन्तर मुनिवर विश्वामित्र हँसकर वसिष्ठजीसे मिले और यथायोग्य सत्कार करके उनके आरोग्यका समाचार पूछने लगे। क्षणभरमें एक दूसरेसे
**५—विश्वामित्रका अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीरामको माँगना और राजा दशरथका उन्हें देनेमें अपनी असमर्थता दिखाना**
२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मिलकर यथायोग्य आदर-सत्कार करके वे सब लोग प्रसन्न-चित्त हो महाराजके महलमें यथायोग्य आसनोंपर बैठ गये। एक दूसरेके सम्पर्कमें आनेसे उन सबके तेज बढ़ गये थे। वे सब आदरपूर्वक आपसमें एक दूसरेकी कुशल पूछने लगे। तदनन्तर प्रसन्नचित्त एवं पवित्र राजा दशरथने हाथ जोड़कर मुनिसे कहा—
"विप्रवर! आप परम धर्मात्मा तथा दानके उत्तम पात्र हैं और सौभाग्यवश यहाँ पधार गये हैं। बताइये आपकी सर्वोत्तम अभिलाषा क्या है? मैं आपकी कौन-सी सेवा करूँ? भगवन्! पहले आप 'राजर्षि' कहे जाते थे, किंतु तपस्याने आपके ब्राह्मतेजको प्रकाशित कर दिया। आपने 'ब्रह्मर्षि'का पद प्राप्त कर लिया, अतः आप मेरे द्वारा सर्वथा पूजनीय हैं। जैसे गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार आपके दर्शनसे भी हो रही है। वह प्रसन्नता मेरे हीत्तलको शीतल-सा किये देती है। ब्रह्मन्! आपके अन्तः-करणसे इच्छा, भय और क्रोध निकल गये हैं, राग-द्वेष दूर हो गये हैं, आप सर्वथा रोगरहित हैं; तो भी मेरे पास आये, यह अत्यन्त अद्भुत बात है। यहाँ पधारे हुए आपका दर्शन, पूजन और वन्दन करके मैं अपनेमें ही फूला नहीं समाता—वैसे ही, जैसे समुद्र अपने ही भीतर पूर्ण चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब देखकर अपने आपमें नहीं समाता, तटकी सीमाको लाँघकर आगे बढ़ आता है। मुनिवर! आपका जो कार्य हो, जिस प्रयोजनसे आप यहाँ पधारे हों, उसे आप सिद्ध हुआ ही समझिये; क्योंकि आप सर्वदा मेरे माननीय हैं। कुशिक-कुलनन्दन! आप कोई विचार न कीजिये। भगवन्! आपके लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है; क्योंकि दी हुई वस्तु आप-जैसे सत्पात्रको प्राप्त होकर ही सार्थक होती है। मैं आपका सारा कार्य पूर्ण करूँगा। आप मेरे परम देवता हैं।"
आत्मज्ञानी महाराज दशरथके द्वारा विनयपूर्वक कहे हुए इस अत्यन्त मधुर, श्रवणसुखद एवं गुणविशिष्ट वचनको सुनकर विख्यातगुण और प्रख्यात यशवाले मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई।
(सर्ग ४—६)
विश्वामित्रका अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीरामको माँगना और राजा दशरथका उन्हें देनेमें अपनी असमर्थता दिखाना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! तदनन्तर महातेजस्वी विश्वामित्रजीने पुलकित होकर कहा—
'नृपश्रेष्ठ! आप महान् कुलमें उत्पन्न हुए हैं और महर्षि वसिष्ठ जीकी आज्ञाके अधीन रहते हैं; अतः आपके मुखसे जो बात निकली है, वह इस भूतलपर आपके ही योग्य है। महाराज! अब मैं अपना हार्दिक अभिप्राय आपसे निवेदन करता हूँ। जब-जब मैं यज्ञके द्वारा देवसमूहोंका पूजन करता हूँ, तब-तब कुछ निशाचर आकर मेरे उस यज्ञको नष्ट कर देते हैं। मैने अनेक बार यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया, किंतु राक्षसनायकोंने उस यज्ञ-मण्डपकी भूमिमें रक्त और मांस बिखेर दिये। मैं यज्ञके लिये परिश्रम करके भी उसमें सफल नहीं हो रहा हूँ, इसलिये विघ्न-निवारणके उद्देश्यको लेकर मैं उस स्थानसे यहाँ आपके पास आया हूँ। पृथ्वीनाथ! मेरे मनमें यह विचार नहीं होता कि मै क्रोध करके उन्हें शाप दे दूँ। मैं चाहता हूँ, आपके प्रसादसे उस यज्ञको बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण करके उसके महान् पुण्य-फलका भागी होऊँ। अतः आर्त होकर शरण पानेकी इच्छासे आपके पास आया हूँ, आप (उस यज्ञकी रक्षाद्वारा) मेरा संकटसे उद्धार करनेके योग्य हैं। आपके पुत्र श्रीमान् राम मतवाले सिंहके समान पराक्रमी हैं। उनका बल-विक्रम देवराज इन्द्रके तुल्य है। वे उन राक्षसोंको विदीर्ण करनेमें पूर्ण समर्थ हैं। अतः राजसिंह! आपके जो ज्येष्ठ पुत्र काकपक्षधारी
वैराग्य-प्रकरण ] * विश्वामित्रका अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीरामको माँगना * २९
सत्यपराक्रमी, शूरवीर श्रीराम हैं उनको मुझे सौंप दीजिये। ये मुझसे सुरक्षित रहकर अपने दिव्य तेजसे उन यज्ञ-विध्वंसक एवं समस्त संसारका अपकार करनेवाले राक्षसोंका मस्तक काटनेमें समर्थ होंगे। मैं इन श्रीरामको (अस्त्र-विद्या प्रदान करके) अनेक प्रकारसे अनन्त कल्याणका भागी बनाऊँगा, जिससे ये तीनों लोकोंके पूजनीय होंगे।
वे पापी राक्षस युद्धमें कालकूटके समान भयानक हैं, उन्हें अपने बल और पराक्रमपर बड़ा गर्व है, वे खर और दूषणके भृत्य हैं तथा कुपित होनेपर यमराजके समान जान पड़ते हैं। किंतु राजसिंह ! वे श्रीरामके सायकोंको उसी प्रकार नहीं सह सकेंगे, जैसे धूलिकण निरन्तर गिरती हुई मेघकी जलधाराको नहीं सह सकते। महाराज ! मैं अपनी तपःशक्तिसे इस बातको निश्चित रूपसे जानता हूँ, आप भी मेरे कथनानुसार उन राक्षसोंको मरा हुआ ही समझिये; क्योंकि हम तथा हमारे-जैसे दूसरे विज्ञ पुरुष संदिग्ध विषयमें नहीं प्रवृत्त होते। कमलनयन श्रीराम कोई साधारण पुरुष नहीं, साक्षात् परमात्मा हैं; इन्हें मैं जानता हूँ, महातेजस्वी वसिष्ठजी जानते हैं तथा दूसरे-दूसरे दीर्घदर्शी महर्षि भी जानते हैं। * यदि आपके हृदयमें धर्म, महत्ता और यशके लिये विशेष स्थान है तो अपने प्रिय पुत्र श्रीरामको आप मुझे दे दीजिये। मेरा वह यज्ञ, जिसमें श्रीरामको यज्ञद्रोही, विघ्नकर्ता राक्षसोंका वध करना है, दस दिनोंमें पूरा हो जायगा। काकुत्स्थ ! इसके लिये भी आपके वसिष्ठ आदि सभी मन्त्री आपको अवश्य अनुमति दे देंगे, अतः आप श्रीरामको मेरे साथ भेज दीजिये। ठीक समयपर किया हुआ थोड़ा-सा भी कार्य बहुत उपकारी होता है और समय बीतनेपर किया हुआ महान् उपकारी भी व्यर्थ हो जाता है।†
इस प्रकार धर्म और अर्थसे युक्त बात कहकर धर्मात्मा, महातेजस्वी मुनीश्वर विश्वामित्र चुप हो गये। मुनिवर विश्वामित्रका वचन सुनकर उन्हें युक्तियुक्त उत्तर देनेके लिये कुछ सोचते हुए महानुभाव राजा दशरथ थोड़ी देरतक चुपचाप बैठे रहे; क्योंकि जिसका मनोरथ पूर्ण न किया गया हो, वह बुद्धिमान् पुरुष युक्तिसंगत उत्तर पाये बिना संतुष्ट नहीं होता है।
भरद्वाज ! विश्वामित्रजीका वह भाषण सुनकर (वात्सल्य-भावापन्न) नृपश्रेष्ठ दशरथ दो घड़ीतक निश्चेष्ट बैठे रहे, फिर इस प्रकार दीनतापूर्ण वचन बोले—'मुनीश्वर ! कमलनयन श्रीरामकी अवस्था अभी सोलह वर्षसे भी कम है। ये राक्षसोंके साथ युद्ध कर सकें, ऐसी योग्यता मैं इनमें नहीं देखता। प्रभो ! मेरे पास यह पूरी एक अक्षौहिणी सेना है, जिसका मैं ही स्वामी हूँ। इस सेनाके साथ चलकर मैं ही उन पिशाचोंके साथ युद्ध करूँगा। ये सभी सैनिक मेरे भृत्य हैं—मेरे द्वारा पोषित हुए हैं। ये शूरवीर, पराक्रमी और उचित सलाह देनेमें भी चतुर हैं। मैं युद्धके मुहानेपर हाथमें धनुष लेकर इन सबकी रक्षा करूँगा। इनके साथ रहकर मैं महेन्द्रसे भी बढ़े-चढ़े वीरोंको उसी तरह युद्धका अवसर दूँगा, जैसे सिंह मतवाले हाथियोंको देता है। श्रीराम अभी बालक हैं। इन्हें न तो उत्तम शस्त्रोंका ज्ञान है और न ये युद्धकी कलामें ही निपुण हुए हैं। समराङ्गणमें कोटि-कोटि शूरवीरोंके साथ अस्त्रोंद्वारा कैसे युद्ध किया जाता है, इसका भी इनको ज्ञान नहीं है। केवल फुलवाड़ियोंमें, नगरके उपवनोंमें तथा उद्यानवर्ती वनकुञ्जोंमें इनका
* अहं वेद्मि महात्मानं रामं राजीवलोचनम् ।
वसिष्ठश्च महातेजा ये चान्ये दीर्घदर्शिनः ॥
( वा० रा० ७ । २१ )
† कार्यमल्पमपि काले तु कृतमेत्युपकारताम् ।
महानप्युपकारोऽपि रिक्ततामेत्यकालतः ॥
( यो० वा० ७ । २६ )
**६—विश्वामित्रका रोष, वसिष्ठजीका राजा दशरथको समझाना, राजा दशरथका श्रीरामको बुलानेके लिये द्वारपालको भेजना तथा श्रीरामके सेवकोंका महाराजसे श्रीरामकी वैराग्यपूर्ण स्थितिका वर्णन करना**
३० | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
घूमना-फिरना होता है। ये राजकुमारोंके साथ आँगनकी उस भूमिमें विचरण करना जानते हैं,जिसपर फूल बिछे होते हैं।
‘ब्रह्मन् ! आजकल तो मेरे भाग्यके उलट-फेरसे ये उसी तरह अत्यन्त कृश और पाण्डु वर्णके हो गये हैं, जैसे पाला पड़नेसे कमल पीला पड़कर गलने लगता है। अपने चारों पुत्रोंमें मेरा सबसे अधिक प्रेम इन श्रीरामपर ही है। अतः मेरे धर्मात्मा ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको आप यहाँसे न ले जायँ। मुने ! यदि आपको निशाचर-सेनाका नाश ही अभीष्ट है तो मेरे साथ मेरी चतुरङ्गिणी सेनाको ले चलिये। सुना जाता है कि रावण नामसे प्रसिद्ध एक महापराक्रमी राक्षस है, जो साक्षात् कुबेरका भाई और विश्रवा मुनिका पुत्र है। यदि वही दुर्बुद्धि राक्षस आपके यज्ञमें विघ्न डालता है, तब तो हमलोग उस दुरात्माके साथ युद्ध करनेमें असमर्थ हैं।'
( सर्ग ७ ८ )
विश्वामित्रका रोष, वसिष्ठजीका राजा दशरथको समझाना, राजा दशरथका श्रीरामको बुलानेके लिये द्वारपालको भेजना तथा श्रीरामके सेवकोंका महाराजसे श्रीरामकी वैराग्यपूर्ण स्थितिका वर्णन करना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! स्नेहवश नेत्रोंमें आँसू भरकर राजाके द्वारा कही गयी इस बातको सुनकर विश्वामित्र कुपित हो उठे और उन भूपालसे इस प्रकार बोले—"राजन् ! 'मैं आपकी माँग पूरी करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके आप उसे तोड़ रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आप सिंह होकर अब सियार बनना चाहते हैं। रघुवंशियोंके लिये यह व्यवहार अनुचित है। इससे तो इस कुलकी मर्यादा ही उलट जायगी। शीतरश्मि चन्द्रमासे कभी उष्ण किरणें नहीं प्रकट होतीं (आपसे ऐसे व्यवहारकी कदापि आशा नहीं की जाती थी)। राजन् ! यदि आप अपनी प्रतिज्ञाकी पूर्ति करनेमें असमर्थ हैं तो मैं जैसे आया था, उसी तरह लौट जाऊँगा। ककुत्स्थवंशी नरेश ! आप अपनी प्रतिज्ञासे भ्रष्ट होकर बन्धु-बान्धवोंके साथ सुखी होइये।”
महामुनि विश्वामित्रको क्रोधसे आक्रान्त जान उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धैर्यवान् और बुद्धिमान् वसिष्ठजी बोले—"राजन् ! आप इक्ष्वाकुकुलमें साक्षात् दूसरे धर्मके समान उत्पन्न हुए हैं। आप श्रीमान् दशरथ तीनों लोकोंमें सज्जनोचित सद्गुणोंसे विभूषित हैं। धैर्यवान् तथा उत्तम व्रतके पालक हैं। आपको धर्मका त्याग नहीं करना चाहिये। आप धर्म और यशसे सम्पन्न होकर ही तीनों लोकोंमें विख्यात हुए हैं।
वैराग्य-प्रकरण ] * विश्वामित्रका रोष, वसिष्ठजीका राजा दशरथको समझाना *
अपने धर्मको समझिये। उसका परित्याग न कीजिये।
ये मुनि तीनों लोकोंका शासन करनेमें समर्थ हैं, आपको इनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। राजन्! 'करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके यदि आप उसका पालन नहीं करते तो यह मिथ्याभाषण आपके इष्ट और आपूर्त (यज्ञ-यागादि तथा वापी, कूप आदिके निर्माणसे होनेवाले पुण्य) को हर लेगा। इसलिये श्रीरामको विश्वामित्रजीके हाथमें सौंप दीजिये। आप इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुए हैं और स्वयं विख्यात राजा दशरथ हैं। यदि आप अपने वचनका पालन नहीं करते तो दूसरा कौन करेगा ? ये विश्वामित्रजी धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। ये बल और पराक्रमसे सम्पन्न वीरपुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। संसारमें सबसे अधिक बुद्धिमान् हैं तथा तपस्याके परम आश्रय हैं। चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीमें यह प्रसिद्ध है कि ये विश्वामित्रजी नाना प्रकारके अस्त्रोंको जानते हैं। जिन अस्त्रोंका इन्हें ज्ञान है, उन्हें दूसरा कोई पुरुष न तो जानता है और न भविष्यमें जान
सकेगा। देवता, ऋषि, असुर, राक्षस, नाग, यक्ष, गन्धर्व—ये सब एक साथ मिलकर आ जायँ, तो भी विश्वामित्र मुनिकी समानता नहीं कर सकते। जिन दिनों ये विश्वामित्रजी राज्य करते थे, उन दिनों में इनकी तपस्यासे संतुष्ट हुए रुद्रदेवने कृशाश्वद्वारा उत्पन्न किये गये अस्त्रोंका दान किया था। वे अस्त्र दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्जय हैं। उन अस्त्रोंके अभिमानी देवता कृशाश्वके पुत्र हैं और संहार करनेमें प्रजापतिके पुत्र रुद्रदेवकी समानता करते हैं। उन कान्तिमान्, महातेजस्वी और बल-विक्रमशाली अस्त्र-देवताओंने भी इनका अनुसरण किया है (क्योंकि इन्होंने अपनी तपस्या के प्रभावसे उन्हें सदाके लिये वशमें कर लिया है)। ये विश्वविख्यात महातेजस्वी विश्वामित्र ऐसे महाशक्तिशाली हैं, अतः श्रीरामको इनके साथ भेजनेमें आप अपने हृदयको व्याकुल न होने दें। ये महामुनीश्वर महान् प्रभावशाली हैं। साधु स्वभाववाले नरेश ! जिस पुरुषके समीप खड़े हों, वह मृत्युके आ जानेपर भी अमरत्वको ही प्राप्त होगा। अतः आप मूढ़ मनुष्यों की भाँति अपने मनमें दीनताको स्थान न दीजिये।
भरद्वाज ! जब वसिष्ठजी ऐसी बातें कहकर समाप्त कर लगे, तब राजा दशरथका चित्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने अपने पुत्र श्रीराम तथा लक्ष्मणको बुलानेके लिये द्वारपालको पुकारा—'प्रतीहार ! तुम सत्य-परायण, महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मणको विश्वामित्रके पुण्यमय यज्ञकी निर्विघ्न सिद्धिके लिये शीघ्र यहाँ बुला ले आओ।'
महाराजके इस प्रकार आज्ञा देनेपर वह द्वारपाल अन्तःपुरके श्रीराम-मन्दिरमें गया और दो ही घड़ीमें वहाँसे लौटकर उन भूपालसे बोला—'देव ! अपने बाहुबलसे समस्त शत्रुदलका दर्प दलन करनेवाले महाराज ! जैसे भ्रमर रातको कमलमें बंद होकर उदास बैठा रहता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी भी अपने भवनमें अनमने होकर बैठे हुए हैं।'
३२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
द्वारपालके यह कहनेपर उसके साथ आये हुए श्रीरामके समस्त सेवकोंको महाराजने आश्वासन दिया और क्रमशः उनका समाचार पूछा—'राम कैसे हैं? उनकी ऐसी अवस्था कैसे हो गयी है?' भूपालके इस तरह पूछनेपर श्रीरामके सेवकोंने दुखी होकर उनसे कहा—'देव! आपके पुत्र श्रीरामका शरीर अत्यन्त कृश हो गया है। उनके खेदसे हमलोग भी इतने खिन्न हो गये हैं कि हमलोगोंका शरीर भी गलकर छड़ीके समान पतला हो गया है और हम किसी तरह इसे ढोये जा रहे हैं। कमलनयन श्रीराम जबसे ब्राह्मणोंके साथ तीर्थयात्रासे लौटकर आये हैं, तभीसे उनका मन बहुत उदास रहता है। जो वस्तु उपयोगमें लानेके योग्य, स्वादिष्ट, सुन्दर और मनोहर है, उसीसे वे इस तरह खिन्न हो उठते हैं, मानो उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये हों। भोजन, शय्या, सवारी, विलास, स्नान, आसन आदि उत्तम कार्य या वस्तुके प्रस्तुत होनेपर भी वे उसका अभिनन्दन नहीं करते (उसकी ओरसे विरक्त हो जाते हैं)। 'सम्पत्तिसे, विपत्तिसे, घरसे अथवा विभिन्न चेष्टाओंसे क्या होने-जानेवाला है? क्योंकि सब कुछ मिथ्या है।' यह कहकर वे चुप हो जाते हैं और अकेले बैठे रहते हैं। परिहास होनेपर वे प्रसन्न नहीं होते। भोगोंमें उनकी आसक्ति नहीं है। किसी प्रकारके कार्योंमें उनकी प्रवृत्ति नहीं होती। वे सदा मौनभावका ही अवलम्बन किये रहते हैं। एकान्तमें, विभिन्न दिशाओंमें, नदियोंके तटोंपर, जंगलोंमें तथा गहन वनोंमें उन्हें सुख मिलता है—वहाँ उनका मन लगता है। भूपाल! वे पहननेके वस्त्र तथा खाने-पीने-की वस्तुएँ न लेकर सदा उनकी ओरसे विमुख ही रहते हैं तथा उस विमुखता या विरक्तिके द्वारा संन्यासी या तपस्वीके आचारका अनुसरण करते हैं। जनेश्वर! श्रीरामचन्द्रजी निर्जन स्थानमें अकेले ही रहकर न कभी हँसते हैं न गाते हैं और न रोते ही हैं। सदा पद्मासन लगाये शून्यचित्त (संकल्परहित) हो केवल बैठे रहते हैं। न किसी बातका अभिमान करते हैं न राजा होनेकी अभिलाषा रखते हैं, न सुख प्राप्त होनेपर प्रसन्न होते हैं और न दुःख मिलनेपर विषाद ही करते हैं। हम नहीं समझ पाते कि वे कहाँ जाते हैं, क्या करते हैं, क्या चाहते हैं, किसका ध्यान करते हैं, कहाँ आते हैं और किस तरह किसका अनुसरण करते हैं। वे प्रतिदिन दुबले हो रहे हैं। रोज-रोज पीले पड़ते चले जा रहे हैं और नित्यप्रति उनका वैराग्य बढ़ता ही जाता है। राजन्! सदा श्रीरामचन्द्रजीका अनुसरण करनेवाले ये शत्रुघ्न और लक्ष्मणजी भी उन्हींके समान दुर्बल होते जा रहे हैं। श्रीराम अपने पास रहनेवाले सुहृज्जनों—मित्रोंको यह उपदेश देते हैं कि 'ये भोग ऊपर-ऊपरसे मनोरम दिखायी देते हैं, वास्तवमें नश्वर हैं। अतः इनमें तुमलोग अपना मन न लगाओ। हमलोगोंने आयासरहित परम पदकी प्राप्तिसे दूर हटानेवाली चेष्टाओंद्वारा ही अपनी सारी आयु व्यर्थ बिता दी।' इस प्रकार मधुर और स्फुट वाणी-
**७—विश्वामित्र आदिकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर उनका मस्तक सूँघना और मुनिके पूछनेपर श्रीरामका अपने विचार-मूलक वैराग्यका कारण बताना**
वैराग्य-प्रकरण] * विश्वामित्रकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर मस्तक सूँघना * ३३
द्वारा वे बारंबार गुनगुनाते रहते हैं। यदि पास बैठा हुआ कोई सेवक उनका अभिनन्दन करते हुए यह कहे कि 'आप सम्राट् हों तो वे उसके इस कथनको उन्मत्त प्रलाप-सा समझकर अन्यमनस्क हो हँसने लगते हैं तथा सदा मुनिवृत्तिसे रहते हैं। न तो किसीकी कही हुई बातको सुनते हैं और न सामने पड़ी हुई वस्तुकी ओर दृष्टिपात ही करते हैं। सुन्दर-से-सुन्दर वस्तु प्राप्त होनेपर भी सर्वत्र उसकी अवहेलना ही करते हैं। जैसे मेघद्वारा बरसाये गये जलकी धाराएँ किसी बड़े भारी दुर्भेद्य पत्थरका भेदन नहीं कर सकतीं, उसी प्रकार कामदेवके बाण कान्तिमती वनिताओंके बीचमें रहते हुए भी श्रीरामचन्द्रजीके मनका भेदन नहीं कर पाते । 'धन आपत्तियोंका एकमात्र स्थान है। तू इसकी इच्छा क्यों करता है ?' श्रीरामचन्द्रजी सबको ऐसी ही शिक्षा देते हैं और अपना सारा धन उसकी इच्छा रखनेवाले दीन याचकोंको बाँट देते हैं। 'यह आपत्ति है, यह सम्पत्ति है—इस प्रकारकी कल्पनाओंके रूपमें केवल मनका मोह (अज्ञान) ही प्रकट होता है।' इस तरहके श्लोकोंका वे सदा गान किया करते हैं। 'हाय ! मैं मारा गया, मैं अनाथ हो गया—इस प्रकार सब लोग चीखते-चिल्लाते रहते हैं, तो भी किसीको इस संसारसे वैराग्य नहीं होता--यह कितने आश्चर्यकी बात है !' श्रीराम प्रायः ऐसी ही बातें कहा करते हैं।' (सर्ग ९-१०)
विश्वामित्र आदिकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर उनका मस्तक सूँघना और मुनिके पूछनेपर श्रीरामका अपने विचारमूलक वैराग्यका कारण बताना
तब विश्वामित्रजीने कहा—परम बुद्धिमान् सत्पुरुषो ! यदि ऐसी बात है तो जैसे मृगोंका झुंड अपने यूथपतिको ले आता है, उसी प्रकार आपलोग भी रघुकुलनन्दन श्रीरामको शीघ्र यहाँ बुला लाइये। श्रीरामचन्द्रजीको यह मोह न तो किसी आपत्तिसे हुआ है और न आसक्तिसे ही। वे विवेक और वैराग्यसे सम्पन्न हैं अतः उन्हें मोह नहीं, बोध ही प्राप्त हुआ है, जो महान् अभ्युदयकारक है। इस विचारमूलक मोहका युक्तिद्वारा निवारण कर देनेपर रघुकुलनन्दन श्रीराम हमलोगोंकी ही भाँति परम पदमें प्रतिष्ठित हो जायँगे। हमारे उपदेशसे वास्तविक बोधका उदय हो जानेपर श्रीरामचन्द्रजी अमृत पीये हुए पुरुषकी भाँति सत्यता १ (त्रिकालाबाधित ब्रह्मरूपता), मुदिता २ (परमानन्दरूपता), प्रज्ञा ३ (अपरिच्छिन्न ज्ञानरूपता) को प्राप्त होकर विश्रान्ति-सुखसे सम्पन्न, संतापशून्य, शरीरसे हृष्ट-पुष्ट और उत्तम कान्तिसे युक्त हो जायँगे। फिर तो मनमें अपनी पूर्णताका अनुभव करते हुए माननीय श्रीरामचन्द्रजी अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार प्राप्त होनेवाली व्यवहार-परम्पराका निर्बाधरूपसे पालन करने लगेंगे। वे महान् सत्त्वगुणसे युक्त तथा लोकव्यापी निर्गुण-सगुणरूप परब्रह्म परमात्माके ज्ञानसे सम्पन्न हो जायँगे। उन्हें सुख-दुःखोंकी दशाएँ नहीं प्राप्त होंगी। वे मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णमें कोई अन्तर नहीं देखेंगे—इन सबको समान समझने लगेंगे।
मुनीश्वर विश्वामित्रके यों कहनेपर राजा दशरथ बड़े प्रसन्न हुए, मानो उनका सारा मनोरथ पूर्ण हो गया। उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको बुला लानेके लिये बारंबार दूत-पर-दूत भेजना आरम्भ किया। जब राजा और मुनिका संवाद हो रहा था, उसी समय श्रीरामचन्द्रजी अपने थोड़े-से सेवकों और दोनों भाई लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नके साथ अपने पिताके पवित्र स्थान—राजसभामें गये। श्रीरामने दूरसे ही महाराज दशरथको देखा। जैसे इन्द्र देवसमूहसे
१-३. अमृत पीये हुए पुरुषके पक्षमें सत्यताका अर्थ यथार्थ स्वर्गसुख, मुदिताका अर्थ आनन्द तथा प्रज्ञाका अर्थ उत्तम बुद्धि समझना चाहिये। अन्य शब्दोंके अर्थ उभय पक्षमें समान ही हैं।
३४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
घिरकर बैठते हैं, उसी प्रकार वे भी राजाओंकी मण्डलीसे घिरे हुए बैठे थे। उनके दोनों ओर महर्षि वसिष्ठ और विश्वामित्रजी विराजमान थे। सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थका ज्ञान रखनेवाले मन्त्रीगण मालाकी भाँति उन्हें सब ओरसे घेरकर बैठे थे। इधर वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि ऋषियों तथा दशरथ आदि राजाओंने भी कुमार कार्तिकेयके समान सुन्दर श्रीरामचन्द्रजीको दूरसे ही अपने पास आते देखा। वे सौम्य और समदर्शी थे। उनकी आकृति मङ्गलमयी थी। उनका हृदय विनीतभावसे युक्त और उदार था। शरीर कान्तिमान् और शान्त (सौम्य) दिखायी देता तथा वे परम पुरुषार्थके भाजन (परमार्थस्वरूप) थे। पवित्र गुणवाले पुरुषोंके आश्रय थे। समस्त सद्गुणोंने मानो एकमात्र महान् सत्त्वगुणके लोभसे उनका आश्रय ले रखा था।
मुनीश्वर विश्वामित्र जब राजासे पूर्वोक्त बात-चीत करते हुए श्रीरामको बुलानेका अनुरोध कर रहे थे, उसी समय कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी पिताके चरणोंमें प्रणाम करनेके लिये उनके सामने आये। सबके सुहृद् श्रीरामने पहले पिताके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तदनन्तर माननीय पुरुषोंद्वारा भी मुख्यरूपसे सम्मानित होनेवाले दोनों मुनि वसिष्ठ और विश्वामित्रजीको प्रणाम किया। इसके बाद अन्य ब्राह्मणों, बन्धु-बान्धवों तथा गुरुजनोंका अभिवादन किया। तत्पश्चात् राजाओंके समूहद्वारा की जानेवाली प्रणाम-परम्पराको उन्होंने प्रसन्न दृष्टिसे उनकी ओर देखकर अपने मस्तकको किञ्चित् झुकाकर तथा मधुर वाणीके द्वारा कुछ बोलकर स्वीकार किया।
इसके बाद दोनों महर्षियोंने श्रीरामचन्द्रजीको आशीर्वाद दिया। तदनन्तर जिनके हृदयमें अत्यन्त समताका भाव भरा हुआ था, वे देवोपम सुन्दर श्रीराम अपने पिताकी पवित्र संनिधिमें आये। उस समय भूपाल दशरथने अपनी चरण-वन्दना करनेवाले पुत्रको हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा। इसी तरह शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले राजा दशरथने घनीभूत स्नेहसे युक्त हो लक्ष्मण और शत्रुघ्नको भी हृदयसे लगाया (और उनके मस्तक सूँघे)। फिर श्रीरामचन्द्रजी पृथ्वीपर ही परिजनोंद्वारा बिछाये गये वस्त्रके ऊपर बैठ गये।
तत्पश्चात् राजा बोले—बेटा ! तुम्हें विवेक प्राप्त हो
वैराग्य-प्रकरण ] * विश्वामित्रकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर मस्तक सूंघना * ३५
गया है। तुम विविध कल्याणमय गुणोंके भाजन हो। तुम्हारे-जैसे पुरुष बड़े-बूढ़े लोगों, ब्राह्मणों तथा गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करते हुए ही पवित्र परमपद प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग मोहका अनुसरण करते हैं, उन्हें वह पद नहीं प्राप्त होता। वत्स ! तभीतक आपत्तियाँ दुर्बल एवं तुच्छ होकर दूर ही रहती हैं (पास नहीं फटकने पातीं) जबतक कि मोहको फैलनेका अवसर नहीं दिया जाता।
इसके बाद श्रीवसिष्ठजीने कहा--महाबाहु राजकुमार ! तुम बड़े शूरवीर हो। तुमने उन विषयरूपी शत्रुओंपर भी विजय पा ली है, जो दुःखकी परम्पराके उत्पादक तथा बड़ी कठिनाईसे नष्ट होनेवाले हैं ऐसे प्रभावशाली होनेपर भी तुम अज्ञानी मनुष्योंके योग्य विक्षेपरूपी अगणित तरङ्गमालाओंसे युक्त तथा आवरणरूपी जडता (जलरूपता) से सुशोभित होनेवाले व्यामोहके समुद्रमें आत्मज्ञानशून्य पुरुषकी भाँति क्यों डूबे जा रहे हो ?
श्रीविश्वामित्रजीने कहा--राजकुमार ! हिलते हुए नील कमलोंके समूहकी भाँति जो तुम्हारे नेत्र चञ्चल हो रहे हैं, इसमें तुम्हारे चित्तकी व्यग्रता ही कारण है। इस व्यग्रताजनित नेत्रोंकी चञ्चलताको त्यागकर बताओ, क्यों मोहित हो रहे हो ? तुम्हारे इस मोह अथवा भ्रमका क्या कारण है ? निष्पाप श्रीराम ! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसे शीघ्र बताओ। तुम्हें वह सब मनोरथ प्राप्त होगा, जिससे मानसिक व्यथाएँ फिर तुम्हें कष्ट नहीं पहुँचायेंगी।
उत्तम बुद्धिवाले विश्वामित्रजीका यह वचन, जिसके भीतर अपनी अभिलाषाके अनुरूप अर्थका प्रकाश निहित था, सुनकर रघुकुलकेतु श्रीरामने खेद त्याग दिया।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं--भरद्वाज ! मुनीश्वर विश्वामित्रके इस प्रकार पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीने धैर्य धारण करके परिपूर्ण अर्थके गौरवसे दबी हुई-सी मन्द-मन्द मनोहर वाणीमें कहा—
श्रीराम बोले-मुनीश्वर ! मैं अपने पिताजीके इस महलमें उत्पन्न हुआ, क्रमशः बढ़ा और फिर मैंने विद्या भी प्राप्त की। तत्पश्चात् सदाचारके पालनमें तत्पर रहकर तीर्थयात्राके उद्देश्यसे समुद्रोंद्वारा घिरी हुई सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया। इतने समयमें मेरे मनमें जो विचार उत्पन्न हुआ, वह इस संसारविषयक आस्थाको उठा देनेवाला है। तीर्थयात्रा करनेके अनन्तर मेरा मन विवेकसे पूर्ण हो गया, जिससे मेरी बुद्धि भोगोंकी ओरसे नीरस (विरक्त) हो गयी और उसके द्वारा मैंने इस प्रकार विचारना आरम्भ किया—
'यह जो संसारका विस्तार है, इसमें क्या सुख है ? (कुछ भी तो नहीं है।) चर और अचर प्राणियोंकी चेष्टाओंके विषय तथा केवल वैभवकालमें ही रहनेवाले ये जितने भोगके साधनभूत पदार्थ हैं, सब-के-सब अस्थिर (क्षणभङ्गुर), आपत्तियोंके स्वामी (अर्थात् केवल विपत्तिमें ही डालनेवाले) तथा पापङ्करूप हैं। जैसे मरीचिकामें जल न होनेपर भी भ्रमसे उसे जल समझकर उसके द्वारा मोहित हुए मृग वनमें बड़ी दूरतक खिंचे चले जाते हैं, उसी प्रकार मूढ़बुद्धि हुए लोग संसारके पदार्थोंमें सुख न होनेपर भी उनमें सुख मानते हैं और उसीके लोभसे आकृष्ट होकर इधर-उधर भटकते रहते हैं। यद्यपि यहाँ लोग किसीके द्वारा बेंचे नहीं गये हैं तथापि बिके हुएके समान परवश हो रहे हैं। इस बातको जानते हुए भी कि यह सब कुछ मायाका खेल है, हम सब लोग मूढ बने बैठे हैं (इस मायासे मुक्त होनेका प्रयत्न नहीं करते), यह कितने खेदकी बात है !
संसारके इस प्रपञ्चमें जो अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण भोग दिखायी देते हैं, ये क्या हैं—इसपर विचार करना चाहिये। सब लोग व्यर्थ ही उनके मोहमें पड़कर भ्रान्तिवश अपनेको बद्ध मानकर बैठे हुए हैं। जैसे वनमें किसी गड्ढेके भीतर गिरे हुए मूढ़ मृग दीर्घकालके पश्चात् यह जान पाते हैं कि हम गड्ढेमें पड़े हैं, उसी प्रकार लोगोंने
**८—धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन**
| ३६ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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बहुत समयके बाद यह जाना है कि हम मूढ़ जीव व्यर्थ ही मोहमें पड़े हुए हैं। मुझे राज्यसे क्या लेना है और भोगोंसे भी क्या प्रयोजन है ? मैं कौन हूँ ? यह दृश्य-प्रपञ्च क्या है और किस लिये सामने आया है ? जो मिथ्या है, वह मिथ्या ही रहे। उसके मिथ्या होनेसे किसकी क्या हानि होनेवाली है। ब्रह्मन् ! जैसे यत्र-तत्र भ्रमण करनेवाले पथिकको मरुभूमिसे विरक्ति हो जाती है, वैसे ही इस प्रकार विचार करते-करते सभी भोग्य पदार्थोंसे मेरी अरुचि हो गयी है।
मुनीश्वर ! देखिये, भिन्न-भिन्न रूपोंमें उपलब्ध होनेवाले उन तुच्छ भोगोंने हमको उसी प्रकार जर्जर बना दिया है, जैसे प्रचण्ड वायु पर्वतीय वृक्षोंको जर्जर कर देती है। सब लोग अचेतन-से होकर प्राणनामधारी पवनसे प्रेरित हो व्यर्थ ही शब्दोच्चारण कर रहे हैं, जैसे कीचक नामक बाँस अपने छेदोंमें हवा भर जानेसे बाँसुरीकी-सी ध्वनि करने लगते हैं। संसारकी सम्पदाएँ सदा सबकी वञ्चना करती रहती हैं। ये मनुष्योंकी मनोवृत्तिको मोह लेती हैं, उनकी सद्गुण-राशिका नाश कर देती हैं और तरह-तरहके दुःख दिया करती हैं। दुःखोंका जाल-सा बिछाती रहती हैं। ये धन-वैभव चिन्ताओंके चक्करमें डालनेवाले हैं, इसलिये मुझे आनन्द नहीं देते तथा बच्चोंवाली स्त्रियोंसे भरे हुए घर भी भयानक विपत्तियोंके आवास-स्थानकी भाँति मुझे दुःख ही प्रदान करते हैं, सुख नहीं। मुने ! जैसे बाँस और तिनकोंसे आच्छादित गर्तमें गिरनेके कारण प्राप्त होनेवाले क्षुधा, पिपासा आदि दोषोंका तथा बन्धन आदि दुर्दशाओंका विचार करते रहनेसे बँधे हुए हाथीको कभी सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार देह आदि पदार्थोंकी क्षणभङ्गुरताके कारण उनमें अनेक प्रकारके दोषों और दुर्दशाओंका स्मरण करके मेरे मनको भी शान्ति नहीं मिल रही है। अज्ञानरूपी रात्रिमें तीव्र मोहरूपी कुहरेसे लोगोंकी ज्ञानरूपी ज्योतिके नष्ट हो जानेपर दूसरोंको दुःख देनेमें परम चतुर विषयरूपी सैकड़ों चोर हर समय और प्रत्येक दिशामें विवेकरूपी श्रेष्ठ रत्नका अपहरण करनेके लिये जी-जानसे लगे हुए हैं। युद्धमें उन्हें मार भगानेके लिये तत्त्वज्ञानी पुरुषोंको छोड़कर दूसरे कौन-से सुभट समर्थ हो सकते हैं (तत्त्वज्ञानी ही उनको नष्ट करनेमें समर्थ हैं, दूसरे नहीं)। (सर्ग ११-१२)
धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुने ! यह लक्ष्मी, यह धन-सम्पत्ति संसारमें यदि स्थिर होकर रहे तो बहुत-से सुखोंकी साधनभूत होनेके कारण वह सबसे उत्कृष्ट वस्तु है—यह मूढ़ मनुष्योंकी ही कल्पना है। वास्तवमें न तो वह कभी स्थिर रहती है और न उत्कृष्ट ही कहलाने योग्य है; क्योंकि वह सबको व्यामोहमें ही डालती रहती है। अतः (विषयोंकी भाँति) वह भी निश्चय ही अनर्थकी प्राप्ति करानेवाली है। जैसे नदीसे असंख्य चञ्चल तरङ्गें प्रकट होती और वायुकी सहायतासे बढ़ती रहती हैं,–उसी प्रकार इस श्री अथवा सम्पत्तिसे बहुत-सी चिन्तारूपिणी पुत्रियाँ उत्पन्न होती हैं और विविध दुश्चेष्टाओंद्वारा वृद्धिको प्राप्त होती रहती हैं। यह सम्पत्ति शास्त्रोक्त सदाचारसे रहित पुरुषको पाकर इधर-उधर दौड़ती रहती है, कहीं एक जगह पैर जमाकर स्थिर नहीं रहती। यह मूढ़ सम्पत्ति किसी गुणवान् पुरुषके द्वारा बड़े दुःखसे उपार्जित होनेपर भी प्रायः उसके उपभोगमें नहीं आती और राजाओंकी प्रकृतिके समान (श्रेष्ठ पुरुषकी उपेक्षा करके भी) गुण-अवगुणका विचार किये बिना ही जो कोई भी अपने पास रहता है, उसीका अवलम्बन कर लेती है। लोग तभीतक अपने और पराये जनोंके प्रति शीतल-मृदुल (दया, उदारता और स्नेह आदिसे सम्पन्न) बने रहते हैं जबतक कि वे प्रबल
वैराग्य-प्रकरण ] * धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन * ३७
वायुके वेगसे बर्फकी भाँति धन-सम्पत्तिके द्वारा कठोर एवं दुःसह नहीं बना दिये जाते। जैसे मुट्ठीभर धूल मणियोंको मलिन कर देती है, उसी प्रकार धन-सम्पत्तिने बड़े-बड़े विद्वान्, शूरवीर, कृतज्ञ, सुन्दर और कोमल-स्वभाववाले पुरुषोंको भी मलिन ( कलङ्कित ) कर दिया है। भगवन् ! धन-सम्पत्ति सुख देनेके लिये नहीं, दुःख देनेके लिये ही बढ़ती है; जैसे विषकी बेल सुरक्षित रक्खी जाय तो वह मौत ही देती है, उसी प्रकार धन-सम्पत्तिकी रक्षा करनेपर भी वह विनाशका ही कारण होती है।
जो धन-सम्पत्तिसे युक्त होकर भी जनताकी निन्दाका पात्र न हो, शूरवीर होकर भी अपने ही मुँहसे अपनी बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा न करता हो तथा स्वामी होकर भी समस्त सेवकों अथवा प्रजा-जनोंपर समान दृष्टि रखना हो—ये तीन तरहके पुरुष संसारमें दुर्लभ हैं। यह धन-सम्पत्ति दुःखरूपी सर्पोंके रहनेके लिये विषम ( भयंकर ) और गहन ( दुर्गम ) गुफा है तथा महान् मोहरूपी गजराजोंके निवासके लिये विन्ध्याचलकी विशाल तटभूमि है। अर्थात् यह महान् दुःख देनेवाली और महान् मोहसे आवृत करनेवाली है। सत्कर्मरूपी कमलोंको संकुचित करनेके लिये यह रात्रिके समान है। दुःखरूपी कुमुदोंके विकासके लिये चाँदनीका काम करनेवाली है तथा उत्तम दृष्टि ( श्रेष्ठ बुद्धि ) रूपी दीपकको बुझानेके लिये वायुके तुल्य है। धन-सम्पत्ति भय और भ्रान्तिरूपी बादलोंकी उत्पत्ति तथा वृद्धि करनेवाली है, विषादरूपी विषको बढ़ानेवाली है, विकल्प ( संशय ) रूपी खेतीकी उपजके लिये क्यारीके समान है तथा खेद या कष्ट प्रदान करनेके लिये भयंकर सर्पिणीके तुल्य है। वैराग्यरूपी लताओंको नष्ट करनेके लिये ओलेके समान है। काम आदि मनोविकाररूपी उल्लुओंको सबल बनानेके लिये अँधेरी रात्रिके तुल्य है। विवेकरूपी चन्द्रमाको ग्रस लेनेके लिये राहुकी दाढ़^१ है और सौजन्यरूपी कमलको संकुचित कर देनेके लिये चन्द्रमाकी चाँदनी है। इतना ही नहीं, यह इन्द्र-धनुषके समान क्षणस्थायी विविध रंगों ( रागों ) के कारण मनोहर जान पड़ती है तथा बिजलीके समान चपल तथा उत्पन्न होते ही नष्ट हो जानेवाली है। प्रायः जड़ ही इसके आश्रय हैं। यह एक रूपसे कहीं क्षणभर भी नहीं ठहरती। पानीकी लहर और दीपककी लौके समान चञ्चल है तथा जिन्हें जानना अत्यन्त कठिन है, ऐसी असङ्ख्य दुर्दशाओंकी प्राप्ति करानेवाली है। यह धन-सम्पत्ति मनोरम होनेके कारण चित्त-वृत्तिको अपनी ओर खींच लेती है। प्रायः अनर्थकारी कर्मोंसे इसकी प्राप्ति होती है और प्राप्त होकर भी यह क्षणभरमें नष्ट हो जानेवाली है।
मुने ! जीवकी आयु पत्तेके सिरेपर लटकते हुए जल-बिन्दुके समान अस्थिर है। वह उन्मत्तके समान असमयमें ही इस कुत्सित शरीरको छोड़कर चल देती है। जिनका चित्त विषयरूपी विषधर सर्पोंके संसर्गसे सर्वथा जर्जर हो गया है और जिनमें प्रौढ़ आत्म-विवेकका अभाव है, उन लोगोंकी आयु उन्हें क्लेश देनेवाली ही है। जो जानने योग्य वस्तु ( परब्रह्म परमात्मा ) को जान चुके हैं और उस अपरिच्छिन्न ब्रह्मपदमें प्रतिष्ठित हैं, ऐसे महापुरुषोंकी आयु लाभ-हानि एवं सुख-दुःखमें चित्तको समानभावसे सुस्थिर रखनेवाली होनेके कारण सुखदायिनी है। महर्षे ! हमलोग नपे-तुले आकारवाले शरीरमें ही 'यह आत्मा है' ऐसा निश्चय किये बैठे हैं। अतः संसाररूपी मेघमें बिजलीके समान चमककर विलुप्त हो जानेवाली इस क्षणभङ्गुर आयुमें हम सुखी नहीं हैं। शरद्ऋतुके छिटफुट बादल, तैलरहित दीपक तथा जलकी तरङ्गके समान चञ्चल आयु गयी हुई ही देखी जाती है। तरङ्गको, जल आदिमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाको, विद्युत्-पुञ्जको और आकाशकमलको हाथसे पकड़नेका तो मैं विश्वास रख सकता हूँ; परंतु इस अस्थिर आयुपर मेरा कोई भरोसा
१. यहाँ जड़के दो अर्थ हैं—जल और मूर्ख। बिजलीका आश्रय जल होता है और धन-सम्पत्तिका आश्रय मूर्ख।
**९—अहंकार और चित्तके दोष**
३८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
नहीं है (असम्भव बातें भी भले ही सम्भव हो जायें, पर आयुको पकड़े रखना असम्भव है)। जैसे खच्चरी दुःख भोगनेके लिये ही गर्भ-धारणकी इच्छा करती है, उसी प्रकार जिसका मन विश्रान्त (तृष्णाओंसे अत्यन्त उपरत) नहीं है, ऐसा मूर्ख मनुष्य कष्ट उठानेके लिये ही व्यर्थ आयुका विस्तार (अधिक कालतक जीना) चाहता है। ब्रह्मन् ! इस संसार-चक्रमें जो देहरूपी लता है, यह सृष्टिरूपी समुद्रके जलका विकारभूत फेन ही है (क्योंकि उसीके समान अत्यन्त अस्थिर है)। अतः इसमें अधिक कालतक जीवित रहना मुझे अच्छा नहीं लगता। वास्तवमें वही जीवन उत्तम जीवन कहलाता है, जिससे अवश्य पाने योग्य वस्तु (परमात्म-ज्ञान) की प्राप्ति होती है, जिससे फिर शोक नहीं करना पड़ता तथा जो परम निर्वाणरूप सुखका स्थान है। यों तो वृक्ष भी जीते हैं, पशु और पक्षी भी जीवित रहते हैं; परंतु वास्तवमें उसी पुरुषका जीवन सफल है, जिसका मन मननके द्वारा जीवित न रहे—अमनीभावको प्राप्त हो जाय। संसारमें उन्हीं जीवोंका जन्म लेना सफल है और उन्हींका जीवन श्रेष्ठ है, जो फिर यहाँ जन्म नहीं लेते। शेष प्राणी तो बूढ़े गदहोंके समान हैं (जैसे गदहे अधिक कालतक जीनेपर भी उत्तम जीवन नहीं बिताते, उसी प्रकार उन प्राणियोंका भी जीवन है, जो इस अपवित्र देहको ही आत्मा माने बैठे हैं)।
अविवेकी मनुष्यके लिये शास्त्रोंका अध्ययन भाररूप है। रागी (विषयासक्त) पुरुषके लिये तत्त्वज्ञान भार है। अशान्त मनुष्यके लिये मन भार है तथा जो आत्मज्ञानसे शून्य है, उसके लिये शरीर भार है। जिसकी बुद्धि दूषित है, उस पुरुषके लिये रूप, आयु, मन, बुद्धि, अहंकार तथा चेष्टा,—ये सब-के-सब उसी प्रकार दुःखदायक हैं, जैसे बोझ ढोनेवाले मनुष्यके लिये उसके सिरका बोझ कष्टदायक होता है। आयु कठोर परिश्रम एवं सुदृढ़ कष्टको ही देनेवाली है। इसमें श्रमकी निवृत्ति कभी नहीं होती, कामनाओंकी पूर्तिका भी अभाव ही रहता है। यह आपत्तियोंका परम आश्रय और रोगरूपी पक्षियोंका घोंसला है। जैसे बिलमें विश्राम करनेवाले तथा विषके द्वारा संताप देनेवाले भयंकर सर्प वनकी वायुका पान करते हैं, उसी प्रकार शरीररूपी बिलमें रहकर विषतुल्य दाह पैदा करनेवाले भीषण रोगरूपी सर्प जीवकी आयुका पान करते हैं। जैसे काठके छोटे-छोटे कीड़े उसके भीतर रहकर पुराने पेड़को सदा काटते और उससे धूल-सी गिराते रहते हैं, उसी प्रकार सदा पीब, रक्त और मल बहानेवाले तथा देहके भीतर निवास करनेवाले दुष्ट रोग आदि दुःख निरन्तर आयुका उच्छेद करते रहते हैं। जैसे बिल्ली चूहेको शीघ्र निगल जानेके लिये उत्कट अभिलाषाके साथ निरन्तर उसकी ओर ताकती रहती है, उसी प्रकार मृत्यु भी आयुको अपना ग्रास बनानेके लिये ही सदा उसकी ताकमें बैठी रहती है। इस संसारमे यह आयु जिस प्रकार स्थिरता और सुखके द्वारा सदाके लिये परित्यक्त, अत्यन्त तुच्छ, गुणहीन तथा मृत्युकी भाजन है, वैसी दूसरी कोई वस्तु नहीं है। (सर्ग १३-१४)
अहंकार और चित्तके दोष
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ ! यह अनेक रूपवाला संसार दीनोंसे भी दीन विषयलम्पट लोगोंको अहंकारके वशीभूत होनेके कारण ही निरन्तर राग-द्वेष आदि दोषोंके कोशरूप अनर्थकी प्राप्ति कराता रहता है। अहंकारके वशमें होनेसे ही मनुष्यपर आपत्ति आती है—उसे शारीरिक कष्ट भोगने पड़ते हैं। अहंकारसे ही अनेक दुःखद मानसिक व्यथाएँ होती हैं तथा अहंकारसे ही राग अथवा दुश्चेष्टाएँ होती हैं। जैसे बहेलियेके द्वारा मृगोंको पकड़नेके लिये बहुत बड़ा जाल बिछाया जाता है, उसी प्रकार अहंकाररूपी टोपके कारण
वैराग्य-प्रकरण ] * अहंकार और चित्तके दोष * ३९
संसाररूपी अँधेरी रातमें जीवोंके मनको मोहित करनेवाली विशाल माया बिछी हुई है। अहंकार शान्तिरूपी चन्द्रमाको निगलनेके लिये राहुका मुख है, पुण्यरूपी कमलोंका विनाश करनेके लिये हिमरूप वज्र है। और सब भूतोंमें समदर्शितारूपी मेघका विध्वंस करनेके लिये शरद् ऋतु है। ऐसे अहंकारका मैं त्याग करता हूँ*। न मैं अमुक नामवाला हूँ, न विषयोंमें मेरी रुचि है और न मन ही मेरा है। मैं शान्त होकर मनको जीतनेवाले महात्मा पुरुषकी भाँति अपने-आपमें ही स्थित रहना चाहता हूँ। ब्रह्मन् ! यदि अहंकार रहता है तो आपत्तिकालमें मुझे दुःख होता है और यदि नहीं रहता तो मैं निरन्तर सुखका अनुभव करता हूँ। इसलिये अहंकाररहित होना ही श्रेष्ठ है।
मुने ! मैं अहंकारका त्याग करके शान्तचित्त हो उद्वेगशून्य होकर बैठा रहता हूँ; क्योंकि भोगोंके समूहका आधार ही क्षणभङ्गुर है। इस देहरूपी विशाल वनमें जो घनीभूत अहंकाररूपी मोटा-ताजा सिंह है, उसीने इस जगत्का विस्तार किया है (इसे अपनी क्रीडास्थली बनाया है)। मुने ! जैसे शत्रु किसीको मारनेके लिये मन्त्र-तन्त्रके द्वारा मारण-उच्चाटन आदिका जाल फैलाता है, उसी प्रकार इस अहंकाररूपी महान् शत्रुने संसारमें जीवका पतन करनेके लिये बिना मन्त्र-तन्त्रके ही स्त्री, पुत्र, मित्र आदिके जाल फैला रक्खे हैं। इस अहंकारका मूलोच्छेदपूर्वक निराकरण कर देनेपर ये सभी मानसिक दुश्चिन्ताएँ तुरत अपने-आप विलीन हो जाती हैं। अहंकाररूपी बादलके फट जानेपर शान्तिका विनाश करनेवाला एवं हृदयाकाशमें छाया हुआ महान् मोहरूपी कुहासा धीरे-धीरे न जाने कहाँ विलीन हो जाता है। महानुभाव मुनीश्वर ! जो सम्पूर्ण आपत्तियोंका घर, शान्ति आदि उत्तम गुणोंसे रहित तथा हृदयके भीतर निवास करनेवाला है, उस अनित्य अहंकारका मैं आश्रय लेना नहीं चाहता (उसके अधीन होना नहीं चाहता)। अपने सुदृढ़ विवेकके द्वारा मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ कि यह अहंकार नामक वस्तु सब ओरसे अतिशय दुःखरूप ही है। अतः अब मेरे लिये जो कुछ भी कर्त्तव्य शेष रह गया हो, उसे बताते हुए आप मुझे अध्यात्मविषयक उपदेश दीजिये।
मुनीश्वर ! जैसे वायुके प्रवाहमें पड़कर मोर-पंखका अग्रभाग वेगसे हिलता रहता है, उसी प्रकार यह चञ्चल चित्त भी अत्यन्त व्यग्र होकर व्यर्थ ही इधर-उधर दौड़ता रहता है। जैसे कुत्ता अपना पेट भरनेके लिये व्याकुल हो गाँवमें दूर-से-दूरतकके घरों या स्थानोंका चक्कर लगाया करता है, वही दशा इस चञ्चल मनकी है। इसे कहीं भी कोई अनुकूल वस्तु नहीं प्राप्त होती। इसलिये यह दीन बना रहता है। यदि इसे कभी विशाल धनका भंडार प्राप्त हो जाय, तो भी यह भीतरसे तृप्त नहीं होता। जैसे बाँस या बेंतकी बनी हुई पिटारी कभी जलसे नहीं भरती, उसी प्रकार धनसे मनुष्यका जी नहीं भरता। मुने ! जैसे अपने झुंडसे बिछुड़कर जालमें जकड़े हुए मृगको कभी सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार समस्त साधनोंसे शून्य (एवं सत्सङ्गरहित) मन सदा दुर्वासनाओंके जालमें जकड़ा रहता है। इसलिये उसे कभी सुख और संतोष नहीं प्राप्त होता। मुने ! तरङ्गोंके समान चञ्चल वृत्तिको धारण करनेवाला यह मन अपने स्थूल-सूक्ष्म अवयव-विभागको छोड़कर एक क्षणके लिये भी हृदयमें स्थिर नहीं रहता। विषयोंके चिन्तनसे क्षोभको प्राप्त हुआ यह मन मन्दराचलके आघातसे उछलती हुई क्षीरसागर-की दुग्धराशिके समान दसों दिशाओंमें दौड़ता वा
* जैसे चन्द्रमाको राहु निगल जाता है, कमलोंको हिम या ओलोंकी वर्षा नष्ट कर देती है और शरद् ऋतु मेघोंका विध्वंस कर डालती है, उसी प्रकार अहंकार शान्ति, क्षमा, दया तथा प्राणिमात्रमें समभावको नष्ट कर देता है।
**१०—तृष्णाकी निन्दा**
४० * अविवेकविशाखार्त्तः पुमानस्मीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अत्यन्त विकल है, किन्तु कहीं भी शान्तिको नहीं पाता।
भगवन् ! जैसे मृग गड्ढेमें गिरनेकी कोई चिन्ता न करके दूर-ही-दूर जानेकी इच्छासे प्रेरित हो बहुत दूरतक दौड़ लगाता रहता है, उसी प्रकार यह मन नरकके गर्तमें गिरनेकी परवा न करके भोग-रूपी आशासे बड़ी दूरतक चक्कर लगाता रहता है (भाँति-भाँतिके मनसूबे बाँधता रहता है)। जैसे पिंजरेमें बंद किया हुआ सिंह चिन्ताके कारण एक जगह स्थिर होकर नहीं रहता, उसी तरह नाना प्रकारकी चिन्ताओंमें अत्यन्त चञ्चल हुआ मन अपनी चञ्चल वृत्तिके कारण कहीं स्थिर नहीं रह पाता। जैसे हंस जलमें दूधको निकाल लेता है, वैसे ही स्नेहरूपी रसपर आरूढ हुआ यह मन भी इस शरीरसे उद्वेगशून्य समताके सुखका अपहरण कर लेता है। भगवन् ! मनरूपी ग्रह अग्निसे भी अधिक उष्ण है। इसके ऊपर चढ़ना पर्वतपर चढ़नेसे भी अधिक कठिन है तथा यह वज्रसे भी बढ़कर कठोर है। उसको वशमें लाना बहुत ही कठिन है। जैसे मांसभक्षी पक्षी मांसपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार मन भी इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध होनेवाले विषयोंकी ओर दौड़ पड़ता है। परंतु जैसे बालक पहले तो खिलौनेकी ओर झपटता है, फिर उसे पाकर थोड़ी ही देरमें उससे मुँह मोड़ लेता है, उसी तरह यह मन प्राप्त हुए विषयमें क्षणभरमें ही विरक्त हो जाता है (और नये-नये विषयकी खोज करने लगता है)।
समुद्रको पी जाना, सुमेरु पर्वतको जड़से उखाड़ फेंकना तथा अग्निका ही आहार करना—ये महान् एवं दुःसाध्य कार्य हैं। परंतु चञ्चल चित्तको वशमें कर लेना इनसे भी महान् एवं कठिन कार्य है। सम्पूर्ण पदार्थोंका कारण चित्त ही है। जबतक चित्त है, तभीतक तीनों लोकोंकी सत्ता है, उसके क्षीण होते ही जगत् क्षीण हो जाता है। इसलिये इस चित्तरूपी रोगकी यत्नपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये। मुने ! जैसे महान् पर्वतसे अनेकानेक वनों एवं काननोंकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार मनसे ये सैकड़ों सुख-दुःख पैदा हुए हैं—इसमें संशय नहीं है। अध्यात्मविषयक विवेकसे जब यह मन दुर्बल हो जाता है, तब ये सारे सुख-दुःख निश्चय ही पूर्णरूपसे गल जाते हैं—ऐसा मेरा विश्वास है। महान् मुमुक्षु पुरुष जिसके जीते जानेपर शम, दम, क्षमा, दया, समता, शान्ति, संतोष, सरलता आदि समस्त सद्गुणोंके स्वाधीन होनेकी आशा करते रहते हैं, उस शत्रुरूप चित्तको जीतनेके लिये मैं सब प्रकारसे उद्यत हुआ हूँ। अतएव जैसे चन्द्रमा मेघमालाका अभिनन्दन नहीं करता, उसी प्रकार मैं तीव्र वैराग्य-सम्पत्तिसे युक्त होनेके कारण जड़ और मलिन विलासवाली लक्ष्मीका अभिनन्दन नहीं करता। (सर्ग १५-१६)
तृष्णाकी निन्दा
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! चेतन जीवरूपी उद्यानमें हृदयरूपी अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण दुस्तर गुहामयी गर्तिका तड़ाग बनकर नाना प्रकारके दोषरूपी उल्लुओंकी उसमें निकासी हो उठती है। जैसे शरद् ऋतुके दिनोंमें अभिषिक्त तथा ओस-वायुके टकरानेसे गिरे हुए कादल पुञ्ज (चनेके वृन्द) की उज्ज्वल शोभासे सुशोभित चनेकी फलियाँ निश्चय ही अधिक विकासको प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार अनेक तरहके दुःखमय सन्तापोंसे प्रकट हुए अश्रुबिन्दुओंसे आर्द्र तथा निकटवर्ती सुवर्ण आदिकी अभिलाषाद्वारा उच्चण्ड हुई चिन्ता या तृष्णा अवश्य अधिकाधिक बढ़ने लगती है। जैसे समुद्रके भीतर
वैराग्य-प्रकरण ] * तृष्णाकी निन्दा * ४१
भँवर एवं हलचल उत्पन्न करनेके लिये ही तरङ्गें उठा करती हैं, उसी तरह हृदयको चञ्चल बना देनेवाली तृष्णा अन्तःकरणमें भ्रम एवं आकुलता पैदा करनेके लिये ही उस सीमातक आ पहुँचती है, जहाँ वह धनादिकी प्राप्तिके लिये कष्टप्रद उत्साहको बढ़ावा देती है। यद्यपि तृष्णाके वेगको रोकनेके लिये यह चित्तरूपी चातक नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करता है, तथापि जैसे आँधी सड़े-गले तिनकेको न जाने कहाँ-से-कहाँ उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार कलङ्किनी तृष्णाने इसे न जाने कहाँ-किस अयोग्य अवस्थामें पहुँचा दिया। जैसे जालमें फँसे हुए पक्षी अपने घोंसलेमें जानेकी शक्तिसे वञ्चित हो वहीं शोक-दुःखसे मोहित हो जाते हैं, वैसे ही हमलोग चिन्ता या तृष्णाके जालमें फँसकर अपने पारमार्थिक स्वरूपको प्राप्त करनेमें असमर्थ हो मोहमें डूबे रहते हैं।
तृष्णा एक पागल घोड़ीके समान है, जो यहाँसे दूर-दूर जाकर बारंबार लौट आती और फिर तुरंत ही सम्पूर्ण दिशाओंमें चक्कर काटने लगती है। जैसे घटीयन्त्र (रहट) के ऊपर लगी हुई रस्सी घटके साथ सदा ऊपर-नीचे आती रहती है, जड़ या जलसे सम्बन्ध रखती है, अपने भीतर गाँठें रखती है और चञ्चल बनी रहती है, उसी तरह यह तृष्णा धर्म और अधर्मके अनुसार सदा स्वर्ग और नरकमें गमनागमन कराती, चेतन और जड़की ग्रन्थिसे जुड़ी रहती, जड़ पदार्थोंसे सम्बन्ध रखती और सदा विक्षुब्ध बनी रहती है। जो देहके भीतर मनमें गुँथी हुई है, जिसका छेदन करना प्रायः सभीके लिये अत्यन्त कठिन है, उस तृष्णाके द्वारा मनुष्य उसी प्रकार शीघ्र भारवाही बना लिया जाता है, जैसे रासकी रस्सी बैलको तत्काल भार ढोनेके लिये विवश कर देती है। जैसे बहेलियेकी स्त्री पक्षियोंको फँसानेके लिये जाल बनाती है, उसी प्रकार सदा आकर्षणशील स्वभाववाली तृष्णा लोगोंको फँसानेके लिये स्त्री, पुत्र और मित्र आदिकी
परम्परा रचती रहती है। यद्यपि मैं धीर हूँ, तथापि भयानक काली रातके समान तृष्णा मुझे भयभीत-सा कर देती है। विवेकरूपी नेत्रसे सम्पन्न हूँ, तो भी वह मुझे अंधा-सा बना देती है और सच्चिदानन्दघनरूप होनेपर भी मुझे वह मानो खेदमें डाल देती है।
तृष्णाको काली नागिनके समान समझना चाहिये। वह सहस्रों कुटिलताओंसे भरी हुई है। विषयभोग-सुख ही उसका कोमल स्पर्श है। वह विषमतारूपी विषको ही उगलती है और तनिक-सा स्पर्श हो जानेपर भी डँस लेती है (अपने सम्पर्कमें आये हुए प्राणीका नाश कर देती है*)। इतना ही नहीं, तृष्णा काली-कलूट्टी राक्षसीके समान भी बतायी गयी है। वह पुरुषोंके हृदयका भेदन करनेवाली तथा मायामय जगत्को रचनेवाली है। दुर्भाग्य प्रदान करनेवाली तथा दीनताकी प्रतिमूर्ति है। पर्वतकी गुफामें एक प्रकारकी लता होती है, जो सूर्य-किरणोंके न मिलनेसे सदा अत्यन्त मलिन रहती है। वह खानेमें कडवी और परिणाममें उन्मादका रोग पैदा करनेवाली है। उसकी बेल बहुत लंबी होती है और उसमें रसकी मात्रा अधिक रहती है। यह तृष्णा भी उसी लताके समान निरन्तर अत्यन्त मलिन, परिणाममें दुःखसे पागल बना देनेवाली, वासनारूपी विशाल ताँतोंसे युक्त तथा विषयोंमें गहरा स्नेह पैदा करनेवाली है। जैसे ऊँचे वृक्षोंकी शाखाके अग्रभागमें स्थित सूखी हुई मञ्जरी पुष्पशून्य, निष्फल तथा कण्टकाकीर्ण होनेके कारण आनन्ददायिनी नहीं होती, उसी प्रकार तृष्णा सर्वथा सूनी, निष्फल, व्यर्थ विस्तारको प्राप्त होनेवाली, अमङ्गलकारिणी और क्रूर है। यह कभी सुखदायिनी नहीं होती। संसाररूपी विशाल वनमें तृणारूपिणी विषकी बेल फैली हुई है। जरा-मृत्यु आदि ही इसके फूल तथा
* नागिनकी भी चाल टेढ़ी और स्पर्श कोमल होता है तथा वह थोड़ा-सा छू जाय तो भी छूनेवालेको डँसकर मार डालती है।