संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
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सन्तति-शास्त्र ।
पहचान यह है कि बालकके हृदयकी धड़कन घड़ीके समान टिक-टिकका शब्द बालकके हृदयपेणियोंके संकोचनसे होता है। इसके सुनाई पड़नेसे बालकका गर्भाणियमें होता निश्चय होता है। यह शब्द माताकी बाईं कोखके बीचमें सुन पड़ता है। इसकी चाल प्रायः एक मिनटमें १६० बारतक होती है। कन्याके गर्भमें अधिक और पुत्रमें कम होती है। जब ऐसा न हो, तो मृदुगर्भ समझना चाहिये। इस प्रकार परीक्षा करके सब्जे और मृदुगर्भका निश्चय करना कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त और कई प्रकारसे परीक्षा हो सकती है।
(४५) गर्भ रह जानेपर कवतक संयोग करना चाहिये ?
यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं। खास कारण इसका यह है कि गर्भाधान हो जानेपर लोगोंको मालूम ही नहीं होता कि गर्भ रह गया है या नहीं। इसके अलावा स्वार्थवश विषय-वासनामें फँसकर लोग कुछ भी विचार नहीं करते। इस विषयमें अनेक मत देखे जाने हैं।
१. धर्मशास्त्रका मत ।
१ गर्भवतीके साथ दो मासतक भोग करना चाहिये ।
(त्रा० ४०)
२ गर्भवतीके साथ छ् मासतक मनुष्य विषय कर सकता है ।
(अत्रिस्तुति० १६३)
२. वैद्यकका मत ।
१. गर्भवतीके साथ दो मासतक संयोग करनेमें कोई हर्ज नहीं होता, यदि स्त्रीको कुछ रोग न हो। (१० क०)
45. गर्भ रह जानेपर कवचक संयोग करना चाहिये ?
गर्भ रह जानेपर कतचका संयोग करना चाहिये ? १६३
इस विषयमें दो मत उपस्थित हैं। एक तो यह कि दो मास तक गर्भवतीसे संयोग करना चाहिये, दूसरा यह कि छ मासतक। इसमें सबसे बड़ी बात तो यह देखना है कि छ मासतक संयोग करनेमें कितनी हानि है। यह बात प्रसिद्ध है और वास्तवमें ठीक है कि संयोग करनेसे स्त्रीकी ताकत कम होती है। इसके अतिरिक्त गर्भावस्था में स्त्री मैथुनप्रिय होगी तो सन्तानपर माताके आचरणका दोष पड़ेगा। वैद्यकका मत है कि गर्भकी दशामे यदि स्त्री पुरुषसे संयोग करे और यदि पुत्र पैदा हो तो वदचलन और यदि कन्या हो, तो परपुरुषके साथ गमन करनेवाली होती है। ( १० क० )
प्रायः ऐसा भी होता है कि गर्भ रह गया है और बार बार संयोग हो रहा है। ऐसी दशामें गर्भाशयमें एक सप्ताह तक का मिला हुआ रज-वीर्य अनेक उपद्रवोंसे बाहर निकल आता है। गर्भसाव हो जानेका भी भय रहता है और खासकर आजकलकी स्त्रियोंमें तो निर्बलताके कारण ऐसा होना और भी सम्भव है।
यहांपर हमारे पाठक यह प्रश्न कर सकते हैं कि धर्मशास्त्रकी आज्ञा छ मासतक संयोग करनेकी है, परन्तु यहां यह बात विचार करने योग्य है कि धर्मशास्त्र धर्मके विषयको प्रतिपादन करता है। धर्मशास्त्रमें शारीरिक अर्थात् शरीरकी व्यवस्था नहीं कही गयी है। धर्मशास्त्रका मत है कि प्रातः काल सूर्य उदय होनेके पहले स्नान करना चाहिये, परन्तु एक ऐसा व्यक्ति कि जो हमेशा रोगी रहता हो कैसे कर सकता है। इस विषयमें वैद्यकका मत है कि रोगीको प्रातः काल स्नान न करना चाहिये। इन प्रमाणोंसे स्पष्ट है कि धर्मशास्त्रने धर्म-प्रकरण लेकर और वैद्यकने शारीरिक लेकर लिखा
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सन्ततिशास्त्र ।
है। इसलिये शरीरके ही अनुसार धर्म होना चाहिये। इस बातके माननेमें कि गर्भाधान होनेके छ मास बादतक संयोग किया जाय, अनेक वाधार्थ पड़ती हैं। स्त्री और बच्चेका निर्बल हो जाना, गर्भस्त्राव आदि कारणोंसे छ मास तक गर्भवतीसे संयोग करनेका नियम अनुचित है। इसलिये वैद्यक मतके अनुसार दो मासतक यदि इच्छा हो, तो गर्भवतीसे संयोग करना चाहिये।
जो लोग इससे अधिक दिनोंतक त्रिग्य-वासनामें फँसकर संयोग करने हैं उनसे स्त्री और गर्भके बालकको अनेक प्रकारकी हानि उठानी पड़ती है। यहाँतक कि गर्भवती और बालक दोनोंकी जान जाने तककी नौबत आ पहुँचती है।
(४६) गर्भवतीके कर्तव्य ।
आज कल स्त्रियोंकी दशा शोचनीय हो रही है। गर्भवती होनेपर इनका ध्यान अपने कर्तव्योंकी ओर जरा भी नहीं जाता। वे नहीं समझतीं कि गर्भ धारण करनेपर उनपर कितनी जिम्मेदारी आ जाती है। गर्भवतीको हमेशा अपना स्वास्थ्य उत्तम रखनेका यत्न करना चाहिये। प्रायः देखा जाता है कि गर्भवती अपने खानेपीनेपर बहुत कम ध्यान रखती हैं। ऐसी दशामें जहाँ तक हो सोजन मधुर और जल्दी पचनेवाला होना चाहिये। पहलेके दो महीनोंमें भूख कम लगती है, मिट्टी इत्यादि खानेकी रुचि तो अवश्य होती है। यदि इन दिनों थोड़ा सोजन किया जाय तो फोई हानि नहीं है। दो महीनेके पीछे भूख स्वयं बढ़ती है। इसलिये दिनरातमें कई बार थोड़ा थोड़ा सोजन करना चाहिये। चौथा महीना लगनेके साथ ही कुछ अधिक सोजनकी जरूरत पड़ती है। प्रकृति भी इन दिनोंमें
46. गर्भवतीके कर्तव्य
गर्भवतीके कर्तव्य ।
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क्रे और जी मचलाना बन्द करके भूख बढ़ाती है। ऐसे समयमें बच्चेका हृदय तैयार हो जाता है, इसलिये माताको अपने हृदय और बच्चे दोनोंके हृदयका पालन करना पड़ता है। यही समय बालकके शरीर बढ़नेका भी होता है। अतएव माता जितना श्रद्धा और अधिक भोजन करती है, उतना ही उत्तम और अधिक रस बनकर बच्चेकी बाढ़में सहायता पहुँचता है और उसका पोषण करता है।
गरिष्ठ, कड़ा, खड़ा, कसैला और फीका भोजन न होना चाहिये। चरबी बढ़नेवाले पदार्थ जैसे घी और मिठाई इत्यादि अधिक न खाना चाहिये। चरबी बढ़नेसे शरीर मोटा पड़ जाता है। इससे सबसे बड़ी हानि यह होती है कि पैदा होते समयमें बच्चा फँस जाता है। प्रायः इसी कारण अनेक बार बच्चोंकी मृत्यु भी देखी गई है।
गर्भवतीको यह सलाह कभी न देनी चाहिये कि वह मांस खावे या शराब पीवे। इससे दुष्ट प्रकृतिकी सन्तान उत्पन्न होती है। प्रत्येक मातापिताको अमूल्य रत्न उत्पन्न करनेकी लालसा रखनी चाहिये।
प्राज्ञ कलके पहनावेकी दशा भी विचार करने योग्य है। स्त्रियाँ सभ्य ललनार्प बननेके लिये सुस्त और बदनसे जकड़ा हुआ कल पहनती हैं। यदि गर्भ-समयको छोड़कर और समयोंमें पहना जाय, तो इतना हर्ज नहीं है, परन्तु गर्भावस्थामें इससे बड़ी हानि होती है। पेट भिचने और काखोंके दबनेसे बड़ा कष्ट होता है, बच्चेकी बाढ़ रुक जाती है तथा स्थानसे दल जानेका भय रहता है।
जिन स्त्रियोंका पेट बड़ा होता है उनका गर्भ नीचेको लटक आता है और बच्चेको महान् कष्ट होता है। इसलिये एक
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सन्तति-शास्त्र ।
बीता चाँड़ा उदर पड़ा, जो मुलायम कपड़ेका हो, बांधन चाहिये।
खियाँ गर्भावस्थामें अपने विचारोंको ठीक नहीं रखतीं। अनेक बुरे विचारोंसे पाला पड़ता है। याद रहे कि जैसे विचार गर्भावस्थामें माताके होते हैं उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है।
रहन-सहनके लिये तो पूछना ही क्या। ऐसे समयमें निश्चय करके असावधानी की जाती है। नीचे ऊपर चढ़ना उतरना, दौड़ना कूदना, परिश्रम और नाचना। यह सब वर्जित है। इससे गर्भपात होनेका भय रहता है। शोक, चिन्ता, भय और क्रोध इतसे बच्चेके मस्तक और स्नायुओंपर धक्का पहुँचता है और दिमाग नियल पड़ जाता है। यह भी न होना चाहिये कि गर्भवती दिन रात पड़ी हो रहे, इससे अनेक प्रकारके शब्दों बुरे विचार उत्पन्न होते हैं। ग्लानि रहती है और पाचन शक्ति बिगड़ जाती है। इसलिये कुछ थोड़ा चलना फिरना आनन्दक है। गर्भवतीका रात्रिमें दस घंटोंसे कम न सोना चाहिये। प्रायः खियाँ चित्त होकर कम सोती हैं। ढेरतक करवट लेकर सोना हानि पहुँचाता है। इससे बच्चा एक और झुक जाता है। थोड़ी देर करवटसे सोना हानि नहीं करता। बाकी समयमें आरामके साथ चित्त होकर सोना चाहिये। सोनेका कमरा साफ़ और ओढने-बिछौने मुलायम होने चाहिये। गर्भवतीको रोगोंकी सेवामें न रहना चाहिये, क्योंकि रोगी निरोग मनुष्य की प्राणशक्ति खोचता है और अपनी रोगशक्तिको दूसरेके शरीरमें प्रवेग करता है। इसलिये गर्भवती और बच्चा दोनोंके रोगी हो जानेका भय रहता है। शरीरमें मस्तक एक काम करनेवाली चीज़ है, परन्तु खियाँ इसकी कुछ भी परवाह नहीं करतीं। मस्तक और दूसरी इन्द्रियोंका बहुत बड़ा सम्बन्ध है।
गर्भवतीके कर्तव्य ।
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यही बुद्धिका स्थान है। यही स्मरण-शक्तिका निवास है। यही प्रेमका गहवर और यही ज्ञानका भण्डार है। उन वच्चोंका दिमाग सुस्त और निकम्मा होता है कि जिनकी माताएँ गर्भावस्थामें अपने दिमागकी परवाह नहीं रखतीं। वैद्यकका मत है कि गर्भवतीके जिस अंगको दुःख पहुँचना है गर्भके बच्चेका वही अंग विगड़ जाता है। ( श०क० )
गर्भवती स्त्रियाँ बालोंकी रस्सिया बनाकर सरको शत्रुकी तरह बांधती हैं जिससे बालोंकी जड़े खिंच जाती हैं। इतना ही नहीं, सर साफ़ करने तककी परवाह भी नहीं करतीं। मैल जम कर बालोंके छिद्रोंको रोक लेता है जिससे वायुका आना जाना रुक जाता है। खासकर गर्भके समयमें चौथे दिन सर साफ़ करना चाहिये।
वैद्यकका मत है कि गर्भवतीको अतुस्तानके दिनसे अति प्रराज-चित्त रहना, शृंगार करना और सफेद वस्त्र पहनना चाहिये। शान्तिपाठ तथा देवता, ब्राह्मणऔर गुरुओंकी सेवा-में तत्पर रहना, मैले, विकारवाले, हीनांग का दर्शन और स्पर्श न करना, वदनुदार पदार्थोंसे बचना तथा चित्तको विगाड़नेवाली कथाओंपर ध्यान न देना, सूखा, चासी, बुसा और सड़ा हुआ पदार्थ न खाना, बाहर न फिरना, सूते घरों और स्मशानोंमें न जाना, वृक्षके नीचे न रहना क्रोध और भय से बचना, क्रिया संकर न करना, बोक न उठाना, चिह्नाकर न बोलना, गर्भको हानि पहुँचानेवाले आहार-विहारोंसे बचने रहना, अधिक तेल और उचटन न लगाना, परिश्रम न करना, अधिक न सोना, बैठे रहना, बिना विछौनेके, पृथ्वीपर बैठना या सोना न चाहिये।
मीठा पतला हृदयको आनन्द देनेवाला चिकना और
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( ३ )
गर्भावस्था में स्त्रीको किन-किन बातोंसे बचना चाहिये ?
१. भारी बोझ उठाना या कठिन परिश्रम करना ।
२. ऊँचे स्थानसे कूदना या तेजीसे दौड़ना ।
३. खट्टी, तीखी, बासी या गरिष्ठ चीजें खाना ।
४. अधिक गरम या अधिक ठण्डी चीजोंका सेवन ।
५. अधिक देर तक जागना या दिनमें बहुत सोना ।
६. क्रोध, शोक, भय या चिन्ता करना ।
७. तंग कपड़े पहनना ।
८. बिना वैद्यकी सलाहके तेज दवाइयाँ खाना ।
९. गर्भावस्थाके अन्तिम महीनोंमें सम्भोग करना ।
१०. ऊबड़-खाबड़ रास्तोंपर सवारी करना ।
इन सब बातोंसे गर्भपात होनेका या सन्तानके निर्बल व रोगी होनेका भय रहता है ।
गर्भवतीके रोग ।
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थोड़ा सा भी बहुत होता है। अतएव ऐसे समयमें तुरन्त उपचार करना आवश्यक है। ऐसी अवस्थामें अनेक प्रकारके रोग होते हैं।
१. जो मचलाणा। यह स्वभावसे होता है। यह कोई ऐसा विशेष रोग नहीं है। आप ही आप अच्छा भी हो जाता है। इस का एक कारण पित्त भी है। जब पित्तके विकारसे जी मचलाता है तो इसे एक रोग समझना चाहिये। इसके अनेक कारण हैं।
१. पित्त बढ़ानेवाले पदार्थोंका खाना।
२. पित्तकी अधिकता होना। (जन्मसे ही)
३. जब कि गर्भ माता या पिताके ऐसे दूषित रज-वीर्यसे स्थापित हो कि जो पित्तसे दूषित हुआ हो।
ऐसी दशामें अधिक दिनोंतक जी मचलाता है और कभी कभी चकरसा भी आ जाता है। यों तो कुछ दिनोंतक हर एक स्त्रीका जी मचलाता ही है।
२ वमन (कै) का होना। यों तो कै उस समय समयतक होती है जबतक कि बच्चा पेटमें डोलता नहीं है, परन्तु ऐसे समयमें कै नित्य नहीं होती, कभी कभी हो जाती है। उसकाई अवश्य प्रायः नित्य आ जाया करती है। इसके अनेक कारण हैं।
१. गर्भवतीकी इन्द्रियाँ और अवयवोंके गर्भावस्थामें अधिक काम करनेसे।
२. बालकके बोभका दबाव अवयवों, धमनी और स्नायु-तन्तुओंपर पड़नेसे।
ऐसी दशामें मामूली कै होती है, परन्तु जब कै इससे आगे बढ़ती है तब उसको रोग समझना चाहिये। दूसरे
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सन्तति शास्त्र ।
महीनीसे वृक्षमें डोलनेकी शक्ति आनेतक कै होनेका समय विद्वानोंने माना है। यदि इससे अधिक दिनतक कै होती रहे, तो उसे कुपक्ष और निर्बलता का कारण समझना चाहिये। पैंसी दशामें अनेक उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं।
| (१) पेटमें पेटन। | (२) हाथ-पाँवमें जलन और भड़कन। |
|---|---|
| (३) सीढ़में दर्द। | (४) जाँघोंमें दर्द। |
| (५) सूच्छों आ जाना। | (६) स्तनमें दर्द। |
| (७) नींद न आना। | (८) बेचैनी। |
| (९) कज्ज रहना। | (१०) पक्वाशय (मेढे) में दर्द। |
| (११) आमाशयमें दर्द। | (१२) हृदयका कड़कना। |
| (१३) ऊपरके श्वासका चलन। | (१४) पैरोंमें भक्तभक्ताहट और सूजन। |
| (१५) प्यास लगना। | (१६) गलेका सूख जाना। |
| (१७) गलेमें छोटे छोटे दाने | (१८) जीभमें दाने पड़ जाना। |
| पड़ जाना। | |
| (१९) कैंमें रुधिरका आना। | (२०) ज्वरका होना। |
पैंसी दशामें पित्त बढ़ जाता है। कैंमें पित्तका लसदार बह्वा पानी ही विशेष आता है। थोड़े दिनोंतक कै होकर बन्द हो जाना अच्छा है। वह जानेपर दशा बिगड़ जाती है। परिणाम यह होता है कि या तो गर्भ गिर जाता है या स्त्री ही मर जाती है। गर्भ गिर जानेपर ये उपद्रव शान्त हो जाते हैं। प्रायः देखा गया है कि किसी किसी स्त्रीके वृक्षा पैदा होनेतक कै होती रहती है। कभी प्रातःकाल मचली प्रारम्भ होकर दोपहरको बन्द हो जाती है। कभी दोपहरसे प्रारम्भ होकर गणितक रहती है। इसी बीचमें एक दो बार या कई बार कै
गर्भचतुर्तिके रोग ।
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हो जाती है । बढ़ती हुई दशा में कै बराबर हुआ करती है । कभी कभी बेहोशी भी आ जाया करती है । उस समय रोग कठिन पड़ जाता है जब कि कै बार बार होती है और खून आने लगता है । ऐसी दशा कुछ काल तक रहनेसे मृत्यु अवश्य हो जाती है ।
३. फेफड़ेके रोगोंका होना । ऐसे समयमें यह रोग खास तौर से होता है । कारण इसका यह है कि ज्यों ज्यों गर्भ बढ़ता है त्यों त्यों फेफड़ेपर दबाव पहुँचता है । इससे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
१. स्वाँसका कष्टसे निकलना । इस रोगमें स्वाँस उखड़ जाती है और दम घुटने लगता है ।
२. मामूली खाँसी । प्रायः सूखी खाँसी आती है ।
३. कूकरखाँसी । यह खाँसी खास तरहकी होती है । इसमें कुत्तोंकी तरह खाँसी आती है, इसीलिये इसको कूकर खाँसी कहते हैं । यह तुरन्त अच्छी नहीं होती, इसमें धीरे धीरे आराम होता है ।
४. अतिसार । यह रोग कुपचसे होता है । जब अन्न नहीं पचता तब अग्नि मन्द पड़ जाती है । इस कारण दस्त आने लगते हैं । कभी यह रोग इतना बढ़ता है, कि गर्भ गिर जाता है ।
५. हिचकी । यों तो दस पाँच बार हिचकी आ जाना दूसरी बात है, परन्तु यह हिचकी एक खास तरहकी होती है । ऐसी हिचकी सोनेके समयको छोड़कर दिनरात आया करती है । इसको वैद्य लोग हिका कहते हैं । इसका कारण कुपच है । इससे गर्भको बहुत बड़ा थक्का पहुँ-
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सन्तति-शास्त्र ।
चता है । बार बार थक्का लगनेसे गर्भाशय ढीला पड़ जाता है और गर्भपात हो जानेका भय रहता है ।
६. कृच्छ्र । इसको लोग मामूली रोग समझते हैं, परन्तु यह एक बड़ा भयंकर रोग है । आंतोंपर दवाव पड़नेसे यह हो जाता है । इससे गर्भको बहुत बड़ा हानि पहुँचती है क्योंकि शौच जाते समय कान्धनेसे गर्भपर दवाव पड़ता, जिसका सहन करना पूरे दिनोंकी गर्भवतीका कठिन होता है । जब पेशा हो, तो जल्दी पचनेवाला हलका भोजन करना चाहिये ।
७. रक्तका कम बनना । यह रोग उन स्त्रियोंको विशेष होता है कि जो अत्यन्त दुबली और सूखी होती हैं जिनके शरीरमें रक्त पहले हीसे कम होता है और गर्भ स्थित होनेपर कम बनता भी है । कारण यह है कि भोजन किये हुए पदार्थोंसे रस बनता है और रससे रक्त । जबकि भोजन ही कम किया जाता है और चने हुए रससे चञ्चेका भी पोषण होता है, तो यदि पेशे समयमें कुपच या अतिसार पेशी बीमारी हो गई तो रक्त कम बनने लगता है और गर्भवती अत्यन्त निर्बल हो जाती है । अतएव बच्चा उत्पन्न होते समयमें कठिनाई पड़ती है ।
८. मूत्ररोग । यह उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका गर्भाशय टल जाता है । इसके कई कारण हैं ।
१. बार बार मूत्रका आना—पेशा दो तरहसे होता है । यदि यह रोग गर्भके प्रारम्भके दिनोंमें हो, तो मूत्राशयकी गरदनकी खाड़से और जब अन्तके दिनोंमें हो, तो मसानेपर गर्भाशयके दवाव पड़नेसे होता है । जब पेशा होता है तो गर्भाशयमें सूत्र रहने ही नहीं पाता ।
गर्भवतीके रोग ।
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२. मूत्रका बन्द हो जाना—ऐसा भी गर्भके दवावके कारण होता है। यदि ऐसा कुछ दिनोंतक रहे, तो मूत्राशयमें सूजन आ जाती है।
६. बच्चेकी थैलीमें अधिक जल भर जाना। गर्भाशयमें एक थैली होती है जिसमें जल भरा रहता है। बच्चा उसी जलमें तैरा करता है। यह रोग थैलीमें सूजन हो जानेसे होता है इसमें खेड़ी बड़ी और सूजी हुई होती है। यह पाँचवें या छठे महीनेमें होता है और गर्भ गिर जाता है।
१०. रक्तकी नादियोंका फूल जाना। यह रोग गर्भाशयपर दवाव पड़नेसे होता है। पैरमें काले रूधिरकी नसें फूल जाती है। खड़े होनेमें पैरोंका कांपना, सनसनाहट और तलुवोंमें जलन होना इसका लक्षण है।
११. गर्भाशयके रोग। ये अनेक प्रकारसे होते हैं।
१. गर्भाशयका आगे-पीछे-दहिने और बाएँ टल जाना या आगे निकल आना।
२. गर्भाशयका फट जाना और उलट जाना।
इन रोगोंकी व्याख्या 'गर्भाशयके रोग' प्रकरणमें लिखी गई है, अतएव यहाँ आवश्यकता नहीं है।
१२. हृदयकी धड़कन। यह रोग उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका हृदय निर्बल है। इसका खास कारण हृदयपर गर्भका बोझ पड़ना है। इससे हृदयमें धड़कन और दर्द होता है।
१३. दस्तोंका होना। यह रोग उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका हृदय निर्बल है, जिनको रंजकी बात सुननेमें दिलकी धड़कन और बेहोशी तुरन्त हो जाती है। प्रायः गर्भके पाँचवेंसे आठवें महीनेतक ऐसा होता है और इसका कारण मत्ताशयपर दवाव पहुँचना है। ऐसा रोग दो रीतिसे होता है।
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सन्तति-शास्त्र ।
एक तो वह कि दो चार दस्त बराबर चार छः दिन आजावे; और दूसरा वह कि एक ही दिनमें दस-चीस-पचास दस्त हो जावें। इसमें बहुत सोच समझकर चिकित्सा करनी चाहिये।
गर्भावस्थामें कोई भी रोग क्यों न हो अत्यन्त कष्ट होता है। पेटके रोगोंमें बहुत सावधानीसे औषधि करनी चाहियें; क्योंकि जरा भी प्रतिकूल होनेसे गर्भस्त्राव या गर्भपात हो जानेका भय रहता है।
(४८) गर्भस्त्राव और गर्भ-पात ।
१. गर्भस्त्रावके कारण ।
समय पूरा न होने के अन्दर ही बालकका पैदा होना गर्भ-पात कहलाता है। इसमें दो भेद हैं। जब चार मास तकका गर्भ गिर जावे, तो उसको गर्भस्त्राव कहते हैं और जब सात मास तकका गिरे तो उसको गर्भ-पात कहते हैं ।
जिस बालकका जन्म आठवें मासमें होता है तो उसे अपूर्ण जन्म होना कहते हैं। बच्चा पैदा होनेकी अपेक्षा गर्भस्त्राव और गर्भपातमें विशेष हानि और भय समझना चाहिये ।
बालकका जन्म प्रकृति के अनुसार स्वाभाविक है, परन्तु बीच में ही गर्भ गिर पड़ना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। इस कारण गर्भस्त्राव या गर्भपात होनेमें स्त्रीको बड़ा कष्ट होता है। बच्चा पैदा होने की अपेक्षा गर्भस्त्राव और गर्भपात होनेमें रक्त इतना अधिक निकलता है कि जिससे बाज़ी बाज़ी निर्बल स्त्रियाँ बेहोश हो जाती हैं। सबसे अधिक कष्ट होनेका कारण यह है कि पूरे दिनोंमें गर्भाशयसे गर्भका सर्वत्र प्रकृति
48. गर्भलाव और गर्भपात
गर्भसाव और गर्भपात ।
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के अनुसार सरलतापूर्वक कुछ थोड़े कष्टके साथ छूट जाता है, परन्तु समय पूरा न होनेके पहले बीचमें गर्भाशयसे गर्भका अधूरा संवन्ध अत्यन्त कठिनाईसे छूटता है । गर्भसाव और गर्भपातके अनेक कारण होते ।
१. गर्भसावके कारण ।
- १. अतिमैथुन और पेटपर चोट लगनेसे ।
- २. एकाएक किसी प्रकारका शोक और सदमा पहुँचनेसे ।
- ३. शूल, दस्त और पेटमें पैंठन होनेसे ।
- ४. किसी प्रकार गर्भाशयका मुख खुल जानेसे ।
- ५. गर्भके ठीक पोषण न हो सकनेसे ।
- ६. अनेक प्रकारकी औषधियोंके खानेसे ।
२. गर्भपातके कारण ।
- १. गर्भका ठीक पोषण न होना ।
- २. माताका क्षय इत्यादि कठिन रोगोंमें असित होना ।
- ३. स्त्रीको गर्मी सृजाक इत्यादि छूतदार रोगोंके होनेसे ।
- ४. शूल दस्त और विशूचिका इत्यादिके होनेसे ।
- ५. ऐसी गहरी चोटसे कि जिससे गर्भाशयको एकदम धक्का पहुँचे ।
- ६. जगरके अनेक रोगोंसे और कमरको कसकर बाँधनेसे ।
- ७. गर्भाशयके दल जाने या फट जानेसे ।
- ८. अतिमैथुन और अत्यन्त परिश्रमसे ।
- ९. ऐसा व्यवहार कि जिससे पेटको हाल पहुँचे ।
- १०. बारंबार नीचे ऊपर चढ़ने और उतरनेसे ।
जहाँतक देखा गया है देहातकी रहनेवाली स्त्रियोंका गर्भसाव या गर्भपात कम होता है । शहरकी रहनेवाली नाज़ुक-
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सन्तर्ता-शारङ्ग ।
दिमाग, आलसी और दिन रात आराम करनेवाली स्त्रियोंको विशेष होता है। गर्भसाव या गर्भपातमें सबसे पहले रक्त निकलता है। जब कि दो तीन मासका गर्भ होता है तो स्त्रियों को रजस्वला होनेका धोखा हो जाता है। ऐसी दशामें जब पीड़ा हो तो तुरन्त गर्भसाव और गर्भपातका प्रकोप समझना चाहिये। रक्तसाव होनेके साथ ही गर्भसाव या गर्भपात नहीं होता। प्रायः दो दो तीन तीन दिन तक जारी रहकर हानि होती है। किसी किसी स्त्रीके रक्तसाव होकर रह जाता है, गर्भसाव या गर्भपात नहीं होता। जब अत्यन्त पीड़ा हो तो गर्भसाव या गर्भपात का समय समझना चाहिये।
कभी कभी ऐसे समयमें दशा जडी भयंकर हो जाती है और स्त्रीको सदाके लिये संसार छोड़ देना पड़ता है।
(५०) मातापिताके किस किस अंशसे क्या क्या उत्पन्न होता है ?
यह एक बड़ा सवाल है कि शरीरमें क्या क्या माता पिताके किस किस अंश से उत्पन्न होता है ? या तो शरीरकी उत्पत्ति मातापिताके अंशसे ही होती है, परन्तु वैद्योंने गर्भको मातृज, पितृज, आत्मज, स्वात्मज और रसज माना है। इनके ही अंश से सब कुछ बनकर शरीर तैयार होता है।
१. वैद्यकका मत ।
१. माताके भ्रंशसे क्या क्या बनता है ?
१. गर्भ मातृज होता है, क्योंकि विना माताके गर्भ रह ही नहीं सकता। शरीरमें मातासे उत्पन्न होनेवाली वस्तुयें ये हैं—चमड़ा, रक्त, मांस, मेदा, नाभि, हृदय मूत्रा-शय क्रोम (प्यास लगनेकी जगह) तिह्री, पिलही,
49. मातापिताके किस किस अंशसे क्या क्या उत्पन्न होता है ?
मातापिताके किस किस अंशसे क्या क्या उत्पन्न होता है ? २०७
वृक्ष, बस्ती आमाशय, पुरीषाधान, पक्षाशय, ऊपरका गुदस्थान, अग्नोगुद, छोटी अंतर्दूहि, मेद और मेदवाही । ( च० श० अ० ३ श्ल० ९ )
शुश्रुतने भी कहा है कि 'कोमल अवयव माताके अंशसे उत्पन्न होते हैं ।' ( सु० श० अ० ३ श्ल० ४६ )
२ पिताके अंशसे क्या क्या बनता है ?
१. गर्भ पितृज होता है, क्योंकि बिना पिताके जन्म नहीं हो सकता । शरीरमें पितासे उत्पन्न होने वाली वस्तुएँ ये हैं—बाल, दाढ़ी, मूँछ, नखून, रोएँ, दांत, हड्डी, नस बड़ी नस, धमनी और वीर्य । ( च० श० अ० ३ श्ल० १० )
शुश्रुतने भी ऐसा ही कहा है कि 'स्थिर पदार्थ पिताके अंशसे उत्पन्न होते हैं ।' ( सु० श० अ० ३ श्ल० ४५ )
३ आत्माके अंशसे क्या क्या बनता है ?
१. गर्भ आत्मज होता है । शरीर बिना जीवके नहीं रह सकता और न जीव बिना शरीरके उत्पन्न होता है । आत्मासे आत्मा उत्पन्न होती है । इसलिये गर्भ को आत्मज माना गया है । शरीरमें आत्मासे उत्पन्न होने वाली वस्तुएँ ये हैं—आयु, आत्मज्ञान, मन, इन्द्रिय, उच्छ्वास, निस्वास, प्रेरणा, धारणा, आकृति भेद, स्वरवरण भेद, सुख, दुःख, रुक्षा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति, अहङ्कार और यत्न । ( च० श० अ० ३ श्ल० १५ )
सुश्रुतका भी इसीसे मिलता हुआ कथन है ।
( सु० श० अ० ३ श्ल० २७ )
२. सात्त्विक अंशसे क्या क्या बनता है ?
१. गर्भ सात्त्विक होता है । यदि स्त्री पुरुष असात्त्विकसेवी न होते तो उनको वन्धव्यत्व अथवा गर्भमें अनिष्ट भाव
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सन्तति-शास्त्र ।
उत्पन्न न होता । जबतक बात पित्त और कफ विग- कर रजवीर्य और गर्भाशय को न विगाड़ें, तब तक ही असात्य सेवन भी गर्भ उत्पन्न कर सकता है। सात्यसेवी स्त्री पुरुषका रजवीर्य और गर्भाशय शुद्ध होनेपर ऋतु कालमें मिलाप होता है, परन्तु जब तक जीवात्मा प्रवेश न करे तबतक गर्भ नहीं रह सकता । यदि यह कहा जाय कि सात्य से ही गर्भ उत्पन्न होता है, सो नहीं, परन्तु बात यह है कि गर्भ उत्पन्न होनेमें सात्य भी एक कारण है। इससे ये वस्तुएं शरीरमें उत्पन्न होती हैं—आरोग्य, अनास्यता, नीला- भता, इन्द्रियाँकी प्रसन्नता, स्वरसम्यक्ता, वीजसम्यक्- ता और हर्षकी अधिकता । ये सब सात्यसे उत्पन्न होती हैं । (च० श० अ० ३ श्ल० १७ )
२. वीर्य, आरोग्यता, बल, वर्ण और मेधा भी सात्य से उत्पन्न होते हैं । (सु० श० अ० ३ श्ल० ४७ )
५ रसके अशसे क्या क्या बनता है ?
१. गर्भ रसज होता है । गर्भ उत्पन्न करना तो दूर रह- किलु आहार रसके चिना माताकी भी जीवन-यात्रा नहीं चल सकती । अच्छी तरह रस सेवन करनेसे गर्भ उत्पन्न हो सकता है । परंतु केवल रस-सेवनसे ही गर्भ उत्पन्न नहीं होता । बात यह है कि गर्भ उत्पन्न होनेमें रस भी एक कारण है । (च० श० अ० ३ श्ल० ५९ )
२. शरीरका मोटापन, बल, वर्ण स्थिति और क्षीणता ये रससे उत्पन्न होते हैं । (सु० श० अ० ३ श्ल० ४७ )
यहांपर एक यह शब्दा होती है कि सुश्रुत महाराज ने वीर्यको पित्तज और सात्यज तथा बल और वर्णको सात्यज
गर्भमें शरीर कैसे बनता है ?
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और रसज क्यों कहा ? इसका तात्पर्य यह है कि सुश्रुतके मतानुसार वीर्य-पिता और सात्त्व्य दोनोंसे तथा बल और वर्ण सात्त्व्य और रससे उत्पन्न होता है । इस प्रकार माता-पिताके अंशोंसे शरीरका सङ्गठन होता है ।
(५) गर्भमें शरीर कैसे बनता है ?
इस बातको सब मानते हैं कि गर्भ रज और वीर्यसे ही होता है । इनके मिले हुए पदार्थमें शरीर बननेका पूरा सामान रहता है ; परन्तु सूक्ष्म होनेके कारण नहीं दिखाई पड़ता । ऐसा मिला हुआ पदार्थ जब गर्भाशयमें पहुँचता है उसी समयसे गर्भका वृद्धि-क्रम प्रारंभ हो जाता है और उत्पन्न होनेतक उसमें अनेक परिवर्तन होते रहते हैं ।
१. गर्भका पहिला दिन ।
- १. पहली रात्रिमें रज और वीर्य मिलकर एक हो जाता है और आकार \frac{1}{16} द्रव्यसे कुछ अधिक होता है ।
- २. इस समय गर्भ एक एक दागके समान बीचमें कुछ उभरा सा होता । ( १० क० )
२. गर्भका पाँचवा दिन ।
- १. इस समय गर्भ एक बुदबुद या पानीके बबुलेकी भाँति हो जाता है । ( १० क० )
- २. ऐसे समयमें गर्भको खूनके एक वारीक दागके बराबर होना भी लोग मानते हैं । ( जापानी मत )
३. गर्भका दूसरा सप्ताह ।
- १. इस समयसे गर्भका वजन एक ग्रैन और आकार \frac{1}{8} द्रव्य होता है और साफ दिखाई पड़ता है । ( जापानी मत )
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सन्तति-शास्त्र ।
२ सात दिनेके बाद गर्भकफकीसी गाँठके समान (कलस ) हो जाता है । ( वा० श० अ० १ श्लो० ३७ )
३ दूसरे सप्ताहके अन्तमें आकर १ ईश और वजन ई रत्तीके बराबर लोग मानते हैं ।
४, गर्भका तीसरा सप्ताह ।
१ इस समयमें गर्भका वजन चार गेहूँके दानेके बराबर और आकार जूएँके सामान होता है । ( १० क० )
१ इस समयमें सर तथा पैरका आकार बनने लगता है । लम्बाई ई इक्षतक वह जाती है ।
५, गर्भका चौथा सप्ताह ।
२. ऐसे समयमें गर्भ एक बड़ी भक्कीके समान होता है और आकार एक कीड़ेके सहस देहा, लम्बाई ई इक्ष, मस्तक कुछ उभरता जान पड़ता है ।
३. पहले महीनेमें गर्भ एक लोथड़ा सरीखा होता है । ( सु० श० अ० ३ श्लो० १७ )
६, गर्भका पाँचवाँ सप्ताह ।
१ इस समयमें सर और पैरोंकी ओर कुछ उभार सा मालूम होने लगता है ।
२. ऐसे समयमें गर्भ घन पिंड और अर्द्धके समान हो जाना है ।
७, गर्भका छठा सप्ताह । १ इस समयमें शरीरस सर बड़ा होता है । हाथ पैर दूठे- के समान होते हैं । अरिब, कान, नाक और मुँहके स्थान ( च० श० अ० ४ श्लो० ८ )
गर्भमे शरीर कैसे बनता है?
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पर काले काले दाग मालूम होते हैं। लम्बाई एक इञ्च तक हो जाती है।
८. गर्भका सातवाँ सप्ताह।
१. इस समयमें छातीकी हँसली, जवड़ा, पसली और हड्डी बनने लगती है। हृदय बढ़ जाता है। सर कुछ बड़ा हो जाता है। हाथ पैर कुछ कुछ निकलने लगते हैं। आंख, कान, मुँह और नाक दिखलाई पड़ते हैं। जिगर और स्त्रीहा बड़ा हो जाता है। लम्बाई मायः १३ इञ्च होती है।
९. गर्भका आठवाँ सप्ताह।
१. इस समयमें हाथ, पैर, पंजे, मुँह, नाक, कान इत्यादि दिखलाई देते हैं। आंखोंके डौल उभरे मालूम होते हैं। मुख कुछ बड़ासा जान पड़ता है। लम्बाई २ इञ्च तक और वजन दो तोले होता है। आकार सुर्गीके अण्डेके समान होता है और नाभिकमलको बनानेवाले अंकुर बड़े होने लगते हैं।
१०. गर्भका नवाँ सप्ताह।
१. इस समय गर्भ जल्दीके साथ बढ़ता है। सर पुष्ट होने लगता है, आंखें बड़ी हो जाती है। पलकें दिखलाई पड़ती है। नाक, कान, गला साफ दिखलाई देते हैं और हृदय पूर्ण तैयार हो जाता है। लम्बाई २३ इञ्च और वजन तीन तोला होता है।
११. गर्भका दसवाँ सप्ताह।
१. इस समयमें भी गर्भ जल्दीके साथ बढ़ता है। सर गिल-गिला रहता है। गला और गुठी साफ दिखलाई पड़ती है। लम्बाई २३ इञ्च व वजन ४३ तोले तक होता है।