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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

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सन्तति-शास्त्र ।

१२. गर्भका ग्यारहवों सप्ताह ।

१. इस समयमें आंखोंकी पलकें तैयार हो जाती हैं, परंतु चिपटी रहती हैं । नाकके छेद और होंठ बन जाते हैं, परंतु मुख बन्द रहता है । कलेजा तैयार हो जाता है । लम्बाई ३ इञ्च, वजन ६ तोलेतक होता है ।

१३. गर्भका बारहवों सप्ताह ।

१. इस समयमें हृदयकी चाल सूक्ष्म रीतिसे होती है । हाथ पैर साफ साफ मालूम होते हैं । कन्या और पुत्रका निशान अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है । नलियोंमें रक्त बहना प्रारंभ हो जाता है । हाथ पैरकी अंगुलियों साफ दिखलाई पड़ती हैं । मस्तक कुछ ऊँचा और पिलपिला रहता है । पैरकी पिंडलियां तैयार होने लगती हैं । कमर लचलची, सरके समान होती है । नाभिकमल पूरा बन जाता है । नाल ३ ई इञ्चतक लम्बा होती है । (गर्भ का वजन ) ६ तोले और लम्बाई ३ इञ्चतक होती है ।

३. तीसरे महीनेमें दोनों हाथ, दोनों पाँच और स्तर इन पाँचोंकी पाँच शाखासी निकलने लगती हैं और थोड़ा थोड़ा अंग प्रत्यंगका विभाग प्रगट होने लगता ।

( सु० ७० अ० ३ श्लो० १९ )

३. सारी इन्द्रियां और सारे अवयव तीसरे मासमें एक ही साथ उत्पन्न हो जाते हैं । ( च० ७० अ० ३ श्लो० १ )

वामभट्टने भी ऐसा ही कहा है ।

१४. चौथा महीना ।

१. इस समयमें मस्तक और कलेजेकी अपेक्षा अपेक्षा चीजें अधिक बढ़ती हैं । नाभिकमल पूरा हो जाता है । रंग,

गर्भमें शरीर कैसे बनता है ?

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पट्टे दिखलाई पड़ने लगते हैं। बच्चेका कुछ हिलना भी जान पड़ता है। मांस-रक्त वराबर दिखलाई पड़ती हैं। चेहरा अधिक लम्बा हो जाता है। चमड़ेका रंग गुलाबी होता है। फेफड़ा बन जाता है, लम्वाई ६ इञ्च और वजन २० तोलातक होता है।

२. सारे अंग प्रत्यंग जान पड़ते हैं। हृदय भराट हो जाता है। चैतन्य-धातु आ जाती है; क्योंकि हृदय चेतनाका स्थान है। इस कारण जीव इंद्रियोंके भोगकी क्षति करने लगता है। (सु० श० अ० ३ श्लो० १९)

३. इस मासमें स्त्रीकी दौहद संझा होती है। इसी समय वाञ्चित पदार्थ न मिलनेसे सन्तान अंगहीन हो जाती है। (श० क०)

४. इस मासमें गर्भ दृढ़ होता है और माताका शरीर भारी हो जाता है। (च० १० अ० ४ श्लो० २४)

१५. पाँचवाँ महीना।

१. इस मासमें शरीरकी अपेक्षा सर बड़ा होता है। बालक-की फड़कन मालूम होती है। सर पर भूरे बाल उग आते हैं। चमड़ी चिकनी हो जाती है। रंग और पट्टेखूब अच्छे बन जाते हैं। बच्चा बार बार हिलता है। लम्वाई १० इञ्च और वजन ३० तोले तक होता है।

२. पाँचवें मासमें मनमें अधिक चैतन्यता हो जाती है। (सु० श० अ० ३ श्लो० ३३)

३. इस मासमें गर्भका मांस और स्निग्ध पुष्ट होता है। इसलिये स्त्री दुबली हो जाती है। (च० १० अ० ४ श्लो० २५)

४. इस समयमें बुद्धिका विकास होने लगता है।

(वा० श० अ० १ श्लो० ५७)

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सन्तति-शास्त्र ।

१६. ढ़गा महीना ।

१. ऊपरकी खाल बनकर तैयार हो जाती है । चमड़ेकी सुकड़न चर्बी बननेके कारण कम हो जाती है । श्रृंगु-लियोंमें नाखून निकल आते हैं । चमड़ेका रंग लाल हो जाता है । लम्बाई १२ इञ्च और वजन १ संस्तक हो जाता है ।

२. इस मासमें बालकका बल और वर्ण पुष्ट होता है । इसलिये स्त्रीके बल और वर्णकी हानि होती है ।

( च० ५० अ० ४ श्ल० २६ )

३. इस समयमें बुद्धिका विकास होता है ।

( सु० ५० अ० ३ श्ल० ३३ )

४. इस कालमें स्नायु, शिरा, रोम, वर्ण, नख और त्वचा पुष्ट होती है ।

( वा० १० अ० १ श्ल० ५७ )

१७. सातवों महीना ।

१. इस समय शरीरके सत्र भागवन चुकते हैं । वंश्या गर्भा-शयमें उलट जाता है और निकलनेके रास्तेके सामने आ जाता है । पैर ऊपर और सर बाँफके कारण नीचे हो जाता है । पैर माताकी छातीकी ओर रहते हैं । पलकें खुलने लगती हैं । शरीरमें चर्बीके बढ़ जान से आकार गोल हो जाता है । पुतली परदेसे बन्द मालूम होती हैं । हर एक अवयव पूरा दिखलाई पड़ता है । लम्बाई १४ इञ्च और वजन ढ़ेढ संस्तक होता है ।

२. सातवें महीनेमें सारे श्रृंग प्रत्यंग स्फुट हो जाते हैं ।

( सु० ५० अ० ३ श्ल० ३३ )

३. इस कालमें गर्भ पूर्ण भावोंसे युक्त होकर पुष्ट होता है ।

( वा० ५० अ० १ श्ल० ५८ )

गर्भमें शरीर कैसे बनता है ?

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४. इस समयमें गर्भ खूब पुष्ट हो जाता है। इस कारण स्त्री सब आकारोंसे ग्लानियुक्ता होती है।

( च० श० अ० ४ श्लो० २८ )

१८. आठवाँ महीना।

१. इस मासमें शरीरके सब अवयव पुष्ट होकर अपना काम करने लगते हैं। बालकको चैतन्यता आ जाती है। नाखून इत्यादि सब अच्छी तरह दिखलाई पड़ते हैं। बच्चा कुछ मोटा हो जाता है। आँखकी पुतलीका परदा कुछ हटा जान पड़ता है। चमड़ेका रङ्ग लाल रहता है और उसके ऊपर चरबीका कुछ अंश लगा रहता है। लम्बाई १८ इञ्च और वजन ढाई सेरतक होता है।

२. इन दिनोंमें बालकके हृदयमें रसका संचार होता है। कभी माताके हृदयसे बच्चेके हृदयमें और कभी बच्चेके हृदयसे माताके हृदयमें रस आता जाता है। इस कारण माता कभी हर्ष और कभी ग्लानियुक्ता होती है। बच्चेके हृदयमें जब माताके हृदयसे रस आता है तब माता ग्लानियुक्ता और जब बच्चेके हृदयसे माताके हृदयमें जाता है तब हर्षयुक्ता होती है। अतएव इस मासमें बालकका श्रोत्र स्थिर नहीं रहता है। इस कारण आठवें मासका जन्मा बालक प्रायः नहीं जीता।

( च० श० अ० ४ श्लो० २८ )

१९. नवौँ महीना।

१. इस मासमें बच्चा सारे अवयवोंसे परिपूर्ण हो जाता है। किसी भी अंग प्रत्यंगके बननेकी कसर नहीं रहती। लम्बाई २० इञ्च और वजन ४ सेरतक होता है।

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सन्तति-शास्त्र ।

२. नवें महीनेका एक दिन भी वीत जाने से बच्चा पैदा होनेका समय कहा जाता है । ( च० ५० प्र० २ न० २९ )

२०. दसवाँ महीना ।

१. नौ महीनेके बाद पैदा होनेवाले बच्चेका अण्डकोप अत्यन्त पुष्ट होता है । ( रतिभास्त्र )

इस प्रकार गर्भमें बच्चेकी शरीर-रचना होती है । विद्वानोंकी जांचसे पता चलता है कि २० इञ्च तक लम्बा और सात सेर वजन तकका बच्चा उत्पन्न हो सकता है । इतना तो नहीं, इससे कुछ कम वजनके बच्चे तो कई देखे गये हैं । यदि बच्चेका सवल और निर्बल होना माताके स्वास्थ्यपर निर्भर माना जाय, तो निर्बल मातासे सवल और सवल मातासे निर्बल सन्तान उत्पन्न होती हुई देखी जाती है । विद्वानोंकी राय है कि माताके भोजनके अनुसार सवल और निर्बल सन्तान उत्पन्न होती है । इसको वैद्यकर्म भी माना है, परन्तु आज हम यह भी देखते हैं कि माता-पिता दोनों खूब पुष्ट हैं, गर्भके दिनोंमें माताने खाया भी खूब, परन्तु सन्तान निर्बल उत्पन्न हुई । इस विषयमें वैद्यकर्मके एक आचार्यका मत है कि गर्भकी नाभिमें ज्योति-स्थान है । उस जगह वायु हमेशा चलती रहती है । इसीसे गर्भकी देह बढ़ती है । गर्भकी साथमें हवा जैसे जैसे ऊपर तिरछी और नीचेके छिद्रोंको विस्तार करती है उसी प्रकार बच्चेका शरीर बढ़ता है । ( ग० प्र० १० प्र० ३१७ व २३८ )

माताका भोजन गर्भकी देह बढ़नेमें अवश्य सहायक होता है, परन्तु गर्भ बढ़नेका हेतु ज्योतिस्थानकी वायु ही है ।

अतएव उत्तम वायुके होनेपर अच्छी, सामान्य वायुके

गर्भमें बच्चेका पालन कैसे होता है ?

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होनेपर मामूली और मध्यम वायुसे छोटी और निर्बल सन्तान उत्पन्न होती है।

इस प्रकार बच्चा गर्भमें बृद्धि पाकर जन्म लेता है।

(५१) गर्भमें बच्चेका पालन कैसे होता है ?

माता और बच्चेका बड़ा सम्बन्ध है। जब तक बच्चा गर्भमें रहता है उसका जीवन मातापर ही निर्भर करता है; क्योंकि वह बच्चेकी धात्री और जीवनदात्री है।

जब तक गर्भमें बच्चेका एक एक अवयव नहीं बन जाता, वह गिलगिला एक पिंड मरीखा होता है। नाल भी नहीं होता। गर्भ-स्थिति होनेके समयसे ही गर्भवतीके सारे शरीरमें फैलानेवाली, रस वहानेवाली और तीर्थभ्रमन करनेवाली धमनियोंका सारभूत द्रव पदार्थ गर्भका पोषण करता है।

( सु० श० अ० ३ श्ल० ३७ )

गर्भाधानके दो महिने पीछे नाल बनता है। यह बच्चेके पालनकी एक खास चीज़ है। दूसरी ओर या शील होती है, यह स्पृशके समान गोल अवयव है। ६ इञ्च लम्बी, बीचमें डेढ़ इञ्च मोटी और तीन पावके लगभग भारी होती है। इसका एक सिरा गर्भाशयसे मिला होता है। दूसरा बच्चेको ओर रहता है। इसीसे नाल उत्पन्न होकर बच्चेके नाभिसे जा लगता है। वैद्यकका मत है कि माताके शरीरमें रसके वहानेवाली नाड़ियों से नालकी नाभी लगी रहती है। वह माताके किये हुए आहार के रस और वीर्यको लेकर उसके सारसे गर्भके बालककी बृद्धि करती है।

( सु० श० अ० ३ श्ल० ३६ )

नाल, दो रक्तवाहिनी और एक साधारण नाड़ीका बना हुआ होता है। लम्बाई बच्चे लम्बाईके बराबर होती है। ज्यों

51. गर्भमें बच्चेका पालन कैसे होता है ?

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सन्तति-शास्त्र ।

ज्यों वच्चा बढ़ता जाता है त्यों त्यों नाल भी बढ़ता जाता है । माताके शरीरसे वच्चेका पोषण करनेके लिये रक्त नालसे वच्चे के शरीरमें पहुँचता है और वच्चेके शरीरका दूषित रक्त रक्त-वाहिनी नाडियोंसे श्रोरमें चला आता है ।

जिस प्रकार हम लोगोंमें भोजन किये हुए पदार्थसे रक्त बनाने और श्वास द्वारा उसको शुद्ध करनेका काम फेफड़ेका है, उसी भांति वच्चेमें पोषणके लिये माताके शरीरसे पांण-तत्व खींचने और दूषित रक्त निकालनेका काम श्रोर करता है । वैद्यकका मत है कि माता जो कुछ भोजन करती है उससे रस बनता है । यह रस तीन भागमें बँट जाता है । पहला भाग माताके शरीरको पुष्ट करता है, दूसरेसे स्तनोंमें दूध आता है, और तीसरे भागसे गर्भका पोषण होता है ।

( च० १० अ० ३ ५-७० २३ )

जिस प्रकार वृक्षकी जड़ें भूमिमें लगी रहकर रस खींचती हैं और वृक्ष द्वारा रहता है, इसी प्रकार नाल और श्रोरका काम है । यही कारण है कि माताके अन्धे डुरे भोजनका असर वच्चे पर पड़ता है । जो माताएँ उत्तम आहार करती हैं उनके वच्चे उसीके अनुसार उत्तम होते हैं । जो भोजनपर ध्यान नहीं रखतीं जो इसकी परवाह नहीं करतीं उनके वच्चे निर्बल और नाना प्रकारके रोगी उत्पन्न होते हैं । अतएव चर्मवतीका गाने पीनेका विशेष विचार रखना चाहिये ।

(५२) बच्चोंमें माता पिताके रोगोंका संसार ।

जिस प्रकार शस्त्रके अन्धे और डुरे बननेका भार सामग्री और बनानेवालोंपर निर्भर है, इसी प्रकार सन्तानका उत्तम वा मध्यम होना रजवीर्य, गर्भाशय और माता पितापर है । इस

52. बच्चोंमें मातापिताके रोगोंका संचार

बच्चोंमें माता पिताके रोगोका संचार ।

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बातको माननेके लिये सब तैयार हैं कि सन्तान माता-पिताके गुण-दोषोंके अनुसार होती है। इसलिये यह बात निश्चय रूपसे मानी गयी है कि बच्चोंमें रज-वीर्यका असर अवश्य होता है।

यह प्रकृतिका नियम है कि वीर्य जैसा होगा उसीके अनुसार वृक्ष उत्पन्न होकर फल लेंगे। जिस प्रकार फलमें बीजके अनुसार खड़ा मीठा स्वाद रहता है इसी प्रकार बच्चोंमें माता-पिताके गुण-दोष का असर आ जाता है। जिन माता-पितामें कोई ऐसा रोग है कि जिसका असर रज-वीर्यतक पहुँच चुका है, तो ऐसे रज-वीर्यसे जो सन्तान पैदा होगी, उसका असर अवश्य सन्तानपर होगा। शरीरका हर हिस्सा अपनेमें से बहुत छोटा हिस्सा पैदा करता है। ऐसे परमाणु सारे शरीर को संचालन करते और अपने ही समान दूसरे परमाणु उत्पन्न करते हैं। इन्हीं परमाणुओंमें से शरीर उत्पन्न करनेवाले कोषोंकी उत्पत्ति होती है। इन्हीं कोषोंसे माता-पिताके गुण-दोष बच्चोंमें आ जाते हैं। ऐसे दोष दो प्रकार के होते हैं। एक खाई, दूसरे नष्ट हो जानेवाले। खायी कोष कभी नष्ट नहीं होते। इन्हीं कोषोंसे वीर्य बनता है अर्थात् ऐसे कोष वीर्यमय होते हैं। नष्ट हो जानेवाले कोष दिन-रातमें सहस्रों चार नष्ट होते और भोजन इत्यादिसे फिर पैदा हो जाते हैं।

जब इन खायी कोषोंमें किसी प्रकारके रोगका असर पहुँचता है, तो वे दूषित हो जाते हैं। इसी प्रकार मातामें भी समझना चाहिये। यही कारण है कि जिस रोगमें माता पिता म्रस्त होते हैं, दो दो चार चार वर्षकी अवधामें वही रोग बच्चोंमें देखे जाते हैं। तुलनेके पैदा हुए बच्चेतक भी प्रायः इस बातकी साक्षी होते हैं। देखा गया है कि आठ दस दिन का बच्चा है, बदनेमें दढ़ीड़े हो गए हैं। शरीरकी रंगतमें अन्तर

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सन्तति-शास्त्र ।

पड़ गया है । फोड़े फुँसी हो गए हैं । इन सबका कारण क्या है ? माता-पितासे प्राप्त हुआ रोग । यहाँपर यह शंका होती है कि पिताके बहुत दिनोंसे कोई रोग है और उनके चार लड़के हैं । इन चारों लड़कोंमें एक लड़केके वह रोग मालूम होता है, तो ऐसी दशामें क्या कहा जायगा कि उन तीन लड़कोंमें पिताको रोग है या नहीं ? यदि यह कहा जाय कि जब इन तीन लड़कोंका गर्भाधान हुआ तब पिताको वह रोग नहीं था, तो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि बौद्धके एक एक परमाणु उस रोगसे दूषित हो चुके हैं ।

जहाँ ऐसा हो वहाँ यह मानना चाहिये कि जिस समय गर्भाधान हुआ, उस समय किसी कारणसे परमाणुओंमें उस रोगका असर कम था या जन्म लेनेपर या गर्भमें ही माताकी औषधि और मंजानसे पितासे प्राप्त रोगका असर कम हो गया । या जल वायुके परिवर्तनसे ऐसा हुआ ॥ जहाँ ऐसा होता है वहाँ बच्चोंमें ऐसे रोग नहीं दिखलाई पड़ते, परन्तु उसका अंश शरीरमें रहता अवश्य है । ऐसा भी होता है कि बहुतसे रोग समय और सहायता पाकर खड़े होते हैं । उनको भी ऐसे ही समझना चाहिये ।

जब माता पितामें रोग खूब बढ़ा हो और गर्भाधान हो जाय, तो ऐसे बालकोंमें वह रोग जन्मसे ही हो जाता है, जैसे रक्त-विकार, मिर्जी, बवासीर, अतिसार, क्षयी संग्रहणी, गरमी, सूजाक, आतिशक, नेत्र-रोग और दंत-रोग इत्यादि ।

माता पितासे पाप हुए रोग औषधि करनेसे हलके अवश्य पड़ जाते हैं, परंतु जड़से जाना असंभव है । अतएव बालकों-को निरोग पैदा होनेके लिये माता-पिताको अत्यन्त सावधानी

शरीरका वर्ण ( रंग )

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से रहना चाहिये, जिससे वे ऐसे रोगोंसे बचे रहें, जो वंश परंपरासे बच्चोंमें आते हैं।

(५३) शरीर का वर्ण ( रंग )

इस बातमें प्रायः लोगोंको सन्देह होना है कि एक ही प्रान्तके रहने वालों और एकही माता-पिता से उत्पन्न सन्तानोंके रङ्गोंमें क्यों अन्तर पड़ता है ? इसके अनेक कारण हैं।

१. वैधकका मत।

१. तेज ( अग्नि ) धातुसे ही सब रंगके बालक उत्पन्न होते हैं। गर्भाधान समयमें यदि तेज धातु जल धातुके अधिकांशसे युक्त हो, तो गौर रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है। यदि तेज धातु पृथ्वी धातुके अधिकांशसे युक्त हो तो काले रंगकी सन्तान होती है। यदि तेज धातु पृथ्वी और आकाशके अधिकांशसे युक्त हो, तो कालापन लिये साँवले रंगकी सन्तान होगी। यदि तेज धातु जल और आकाशके अधिकांशसे युक्त हो, तो गोरापन लिये साँवले रंगकों सन्तान होगी।

( सु० १० अ० २ श्लो० ३७ )

२. गर्भवती जैसे वर्णका आहार करे वैसे ही रंगकी सन्तान होती है। ( सु० १० अ० २ श्लो० ३८ )

३. गर्भाधान समयमें माताका चित्त जैसे रंग रूपवाले स्त्री-पुरुषपर पहुँचता है, उसीके अनुसार सन्तान होती है।

( रतिशास्त्र )

४. गर्भाधान समयमें जैसा रूप स्त्रीके सामने आ जाता है, वैसी ही सन्तान होती है। ( १० क० )

53. शरीरका वर्ण (रंग)

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मनोविज्ञान ।

इस समय इन विषयों का विचार उभरता है । पहला विचार यह है कि वेद वातु और दूसरी वातुओंसे मिलकर उनके रंगोंको सम्मान उत्पन्न करती है । यहाँ पर यह बात सुख है कि शरीरमें जो वातु अधिक होती वही वेद वातुसे मिलती है । इसी कारण एक ही गन्धसे कभी काली और कभी गंधा मन्त्राण पैदा होती है । इसीसे जैसे रंगोंको सम्मान पैदा होता है, उसी वातुओं और शरीरोंसे मानवियोंपर वृद्धि उत्पन्न होती है, जो मन्त्राण रंगोंको सम्मान पैदा हो सकते हैं ।

दूसरा विचार यह है कि गन्धवीज जैसे वृक्षोंका आहार संवत् करे वैसे ही सुगन्ध उत्पन्न होता है । यह ठीक है, परन्तु लोग यह समझते हैं कि गन्धके मन्त्रमें जो जैसे वृक्षोंका आहार करे वैसे ही सुगन्ध होता है । नहीं, इस जगह यह समझना है कि गन्धवीजों जैसा आहार माया हो अर्थात् गंध वृक्ष, होनेसे पहले मन्त्राण जैसे आहारका सेवन किया हो वैसे सम्मान होता है । इनका कारण यह है कि जैसा आहार माया जाता है उसीके अनुसार शरीरमें स्थित वातुओं की वृद्धि होती है । इसीसे जैसा मन्त्र या आहार वातुओं की वृद्धि होती है वही वातु वेद वातुसे मिल कर अपने रंगोंके अनुसार सम्मान उत्पन्न करती है । इसीसे जैसा रंगोंको सम्मान उत्पन्न करनेवाली वृक्षोंका आहार करती चाहिये ।

तीसरा विचार यह है कि जैसे गंध सुगन्धों और पुरुरा पर मायाका ध्यान होता उसीके अनुसार सम्मान होता है । ठीक है परन्तु इसमें बहुत गहरा विचार है । वैदिक का मत है कि जिस तरह ओकों पुलकके सूँवनेसे और पुलकको ओकों सूँवनेसे ही कन्दहरा हो जाता है, उसी तरह गन्धाधान सम्मान

शरीरका वर्ण ( रंग )

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दूसरे स्त्री वा पुष्पके रूप रंगका खयाल आ जानेसे अपने शरीरमें उसी रंगकी सन्तान उत्पन्न करनेवाली धातु उत्कट होकर तेज धातुसे मिलकर वैसे ही रंगकी सन्तान उत्पन्न करती है।

चौथा विचार यह है कि 'जैसा रूप रंग गर्भाधान समयमें स्त्रीके सामने आ जाता है उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है। ठीक है, यह भी एक गौरवका सिद्धान्त है। इस विषयमें बहुत बड़ा एक प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि प्रायः सौदागर ऐसा करते हैं कि घोड़ीसे जिस रंगका बच्चा उनको लेना होता है तो घोड़ीके गर्भाधानके समय उसी रंगका घोड़ा घोड़ी के सामने खड़ा करते हैं और घोड़ीकी आंखोंमें पट्टी बांध देते हैं, जब गर्भाधान हो चुकता है तब उस घोड़ेको, कि जिससे गर्भाधान हुआ था, अलग कर देते हैं और आंखोंकी पट्टी खोल देते हैं। पट्टी खोलते ही घोड़ीकी नजर सामनेवाले घोड़ेपर पड़ती है और उसी रंगका घोड़ा पैदा होता है। इसी प्रकार स्त्रियोंमें भी दृष्टिका बहुत बड़ा असर होता है। गर्भाधान समयमें जैसा रूप रंग स्त्रीके सामने आ जाता है, तो उसका एक ऐसा प्रभाव स्त्री पर पड़ता है कि जिससे स्त्रीके शरीरमें वैसा ही रंग उत्पन्न करनेवाली धातु उत्कट होती है और वह तेज धातुसे मिलकर गर्भाधान समयमें देखे हुए रंगके समान रंगवाली सन्तान उत्पन्न करती है। इस विषयमें यूरोपकी एक बहुत बड़ी यह आख्यायिका प्रसिद्ध है। एक यूरोपियन व्यक्ति के यहां काले रंगकी सन्तान उत्पन्न हुई थी। कारण यह सावित हुआ कि गर्भाधानके समयमें स्त्रीकी लगाह एक काले रंगके हवश्रीके चित्र पर पड़ी थी, जो पलंगके सामने था। इन प्रमाणों से सारे विचारोंका एक ही सिद्धान्त निकलता है कि शरीरम

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सन्तति-शास्त्र ।

स्थित धातु भोजन, चिन्तवन और दृष्टिसे उसीके अनुसार उत्तेजित हो तेज धातुसे मिलकर सन्तान उत्पन्न करती है ।

यहां पर एक बहुत बड़ी शंका यह होती है कि यूरोपमें सब गोरे ही रंगके क्यों पैदा होते हैं? इस विषयमें जहांतक निश्चय किया गया यह बात पायी गयी है कि सर्दीके कारण यूरोपके लोगोंमें तेज धातु अधिकांश जलयुक्त होती है । इस कारण लोग गोरे रंगके उत्पन्न होते हैं । हमारे देशमें ही जहां सर्दी अधिक पड़ती है वहांके लोग इसी कारण कुछ गोरे होते हैं । इसी प्रकार जहां गर्मी अधिक पड़ती है, वहांके लोगोंमें तेज धातुके साथ पृथ्वी और आकाश धातु अधिक होती है । इस कारण वहांपर काले रंगके लोग होते हैं । खानेके पदार्थोंमें भी बड़ा हेरफेर हो जाता है । सर्द देशमें खानेकी चीजें सर्दीसे अधिक जलयुक्त होती हैं । गर्म देशोंमें खानेके पदार्थ अधिक पृथ्वी धातुके अंशोंसे युक्त रहते हैं । शुद्ध लोगोंमें कि जिनको सुखसे खाने पीनेको मिलता है, उनके वच्चोंकी रंगत कुछ और ही होती है । इन सब विचारोंसे यह बात निश्चय है कि हर देशके खाने पीनेकी चीजोंमें पंचतत्वोंकी कमी-चेशी जरूर होती है । यह भी प्रत्येक प्रान्तके निवासियोंके रंगमें अन्तर होनेका एक विशेष कारण है ।

देश और प्रान्तका यदि विचार करके एक एक घरमें देखा जाय तो मालूम होगा कि संयमके साथ भोजन करने-वालों और लापरवाहीसे बिना विचारके भोजन करनेवालोंकी सन्तानोंमें कितना अन्तर होता है । इन सब विचारोंसे यह बात सिद्ध हुई कि तेज धातुके साथ जल इत्यादि दूसरी धातु अधिकांशसे मिलकर अनेक रूप रंगकी सन्तान उत्पन्न करती है । यह बात मुख्य करके मानी गई है कि भोजनका प्रभाव

मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ? २२५

रूप रंगके विषयमें दृष्टि और चिन्तवनसे प्रभावशाली होता है। क्योंकि अंगरेजोंके यहाँ गोरी ही सन्तान होती है, चाहेवे किसी देशमें रहें। इसी प्रकार काबुली, चीनी, जापानी और रंगूली कहीं रहते हुए अपने ही रूप रंगके अनुसार सन्तान उत्पन्न करते हैं। इसका कारण यह है कि प्रायः इनका भोजन दूसरे देशमें जाकर नहीं बदलता, परन्तु भारतमें यह बात नहीं है। बंगाली और मदरासी भारतके ही दूसरे प्रान्तोंमें जाकर भोजन बदल देते हैं। इनको पञ्जाब ऐसे देशमें जाकर चावलके साथ गेहूँ खानेकी वान पड़ जाती है इत्यादि। इस प्रकार भोजन बदल जाने या उसमें हेर फेर हो जानेसे शरीरकी धातुओंमें कमी वेशी हो जाती है। इस कारण भारतीय भारत के दूसरे प्रान्तोंमें जाकर वहाँके अनुसार सन्तान उत्पन्न करते हैं। इतना ही नहीं, एक ही स्थान और एक ही माता-पितासे दो रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है। पहला लड़का गोरा दूसरा काला, इसका कारण भी भोजनका हेर फेर है, जैसे जाड़ेके दिनोंमें गरम पदार्थों और गरमियोंमें ठंडी वस्तुओंका अत्यन्त सेवन इत्यादि। इस प्रकार अनेक रङ्गकी सन्तानें उत्पन्न होती हैं कि जिनका मुख्य कारण जलादि धातु हैं और वे भोजन किये हुए पदार्थोंसे बनती हैं। अतएव भोजनके पदार्थोंका संशोधन करके मनुष्य मन-चाहे रङ्गकी सन्तान उत्पन्न कर सकता है; क्योंकि जिस धातुकी इच्छा हो वह मुख्य रीतिसे भोजनके पदार्थों द्वारा विशेष रूपसे उत्पन्न हो सकती है।

(५४) मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?

संसारमें जितने मनुष्य हैं सबके चेहरेकी बनावट अलग अलग होती है। एकका चेहरा दूसरेसे नहीं मिलता। बहुत

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54. मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?

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नन्दिनि-शाल ।

सी सूरतोंमें जब कि यह कहा जाता है कि इनमें कुछ भी भेद नहीं है तथापि कुछ न कुछ अन्तर अवश्य होता है। इनके अनेक कारण हैं।

१. वैचक्यका भत।

२. रजोदर्शनके समयमें मानाके हृदयपर जिस सूत्र गललके स्त्री पुरुषका ध्यान आ जाता है या आनन्दके समयमें जैसे पुरुषका दर्शन हो और उसका ध्यान बना रहे उसी रूपको सन्तान होगी है। (रतिशास्त्र)

इसी कारण रजोदर्शन समयमें एकान्तवासका विधान कहा गया है।

२. गर्भाधान समयमें जिस जीवमें स्त्रीका चित्त होगा अर्थात् जिस जीवका ध्यान आ जावेगा उसीके अनुसार सन्तान होगी। (च० श० अ० २ श्ल० २८)

इसी प्रकार भोज वैद्य और अन्य विद्वानोंने भी कहा है। इसके अनेक उदाहरण इसी पुस्तकमें 'मनोवेल' के विषयमें लिखे गये हैं।

३. माता-पिताके मिले हुए रज-चीर्थमें गरीरके जिस अंग प्रत्यंगके बनानेवाला अंग निर्बल होता है तो गरीरका वह अंग उत्तम नहीं होता अथवा जब अंग प्रत्यंग बनानेका अंग नहीं होता तो अंग ही नहीं बनता।

(श० ६०)

४. गर्भावस्थामें माताका भोजन ठीक न होनेसे भी सन्तान की मित्र मिश्र आकृति होती है। इसके कई भेद हैं।

१. जिस अंगके जिस प्रकारका भोजन उपयोगी होता है उसके कम होने अथवा न होनेपर अधूरा अंग रह जाता है। (श० ६०)

56. अवयजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती है ?

मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?

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२. जिस पदार्थके खानेसे शरीरके जिस अंगको हानि पहुँचती है गर्भमें बच्चेका वही अंग विकृत हो जाता है। ( श० क० )

३. जिस पदार्थके खानेसे जिस अंगकी पुष्टि होती है गर्भमें बालकका वह अंग उत्तम रीतिसे विकसित होता है। ( श० क० )

यही कारण है कि बच्चे माता पिता, मामा और नौकरों इत्यादिकी आकृतिके होते हैं। इसमें माताका विचार रजस्वला समयका दर्शन तथा गर्भाधान समयका चिन्तवन कारण है। स्त्री के हृदयमें एक ऐसी दैवीशक्ति है कि जिससे चिन्तवन किये हुए मनुष्यकी आकृतिकी सन्तान उत्पन्न होती है। जिस प्रकार तसवीर खिचते समयमें हँसने रोनेवालेकी उसी विकारके अनुसार तसवीर खिंच जाती है, इसी प्रकार माताके हृदयपर पड़े हुए स्त्री पुरुषके आकारके अनुसार सन्तान होती है। इस विषयमें माता-पिताका मिला हुआ रज-वीर्य भी कम असर नहीं रखता। जिस अंगके बननेका सामान रजवीर्यमें कम होता है, वह अंग बेदंगा और निस्तेज होता है। जिस अंगके बननेका अंश प्रबल होता है वह अंग पूरी रीतिसे प्रफुल्लित रहता है। इसी प्रकार गर्भावस्थामें माताके खाए हुए भोजनका कुछ कम प्रभाव नहीं पड़ता। जिस पदार्थके खानेसे जिन्न अंगकी पुष्टि होती है उसके खानेसे वह अंग गर्भमें उत्तम बन जाता है और जिसके खानेसे जिस अंगको हानि होती है वह ठेढ़ा और बदस्वरत हो जाता है।

अतएव इस विषयमें रजोधर्म और गर्भाधान समयका चिन्तवन और ध्यान तथा गर्भावस्थामें माताका भोजन मुख्य

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सन्तति-शास्त्र ।

कारण है कि जो एक सा सारी स्त्रियाँका नहीं हो सकता । अतएव प्रत्येक मनुष्यकी आकृति भिन्न भिन्न होती है ।

( ५५ ) नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होना ।

जिस प्रकार मनुष्यका रूप रंग एकसा नहीं होता इसी प्रकार नेत्र भी एक प्रकारके नहीं होते । गर्भ जब चार महीनेका हो जाता है तब आँखोंमें कुछ ज्योति आने लगती है । इसलिये चौथे महीनेमें जैसा तेज दृष्टि-भाग में आता है वैसी ही आँखें होती हैं ।

वैयक्तिका मत ।

( सु० श० अ० २ ख० ० ९३ )

१ यदि गर्भके बालककी आँखोंमें तेज धातु न पहुँचे तो बालक जन्मसे ही अन्ध होता है ।

२ यदि तेज धातु रक्तके साथ होकर दृष्टि-भागमें जावे तो बालक लाल नेत्रोंवाला होता है ।

३ यदि तेज धातु पित्तके साथ होकर आँखोंमें पहुँचे तो बालक पीले नेत्रोंवाला होता है ।

४. यदि तेज धातु कफके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो सफेद नेत्रोंवाला बालक होता है ।

५ यदि तेज धातु वायुके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो मँडी आँखोंवाला या नेत्र रोग वाला या चंचलाक्ष बालक होता है ।

तेज धातुके साथ दूसरी धातुओंके मेलसे इस प्रकार वच्चों-की आँखें बनती हैं । यहाँपर एक बहुत बड़ा प्रश्न यह होता है कि तेज धातुके साथ वात पित्त इत्यादि किस प्रकार पहुँचते हैं । शरीरमें वात पित्त इत्यादिमें से जिसकी अधिकता

55. नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होता

अल्पजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती ? २२६

होगी वही प्रबल होगा और वही तेज धातुके साथ नेत्रोंमें पहुँचेगा। माता जैसा भोजन करती है उसीके अनुसार शरीर में वात पित्त इत्यादि बढ़ते हैं। बहुतसे लोग ऐसे देखे जाते हैं कि जिनकी आंखें बिल्डों की सी पीली होती हैं। उनकी आंखोंमें तेज धातुके साथ पित्त ऐसा विकार उत्पन्न करता है। यह रोग वंश परंपरासे भी देखा जाता है। माता पिता दोनोंकी आंखें पीली होनेपर बच्चोंकी भी आंखें पीली होती हैं; परंतु माता या पिता एककी आंखोंमें ऐसा विकार होने पर नहीं होती। यहां पर यह सवाल हो सकता है कि यूरोपमें सबकी आंखें सफेद क्यों होती है? इसका कारण यह है कि यूरोप सदा देश है और कफ सदीसे उत्पन्न होता है, इसलिये वहांके निवासियोंमें कफकी अधिकता रहती है। जब शरीरमें कफकी अधिकता होती है तो तेज धातुके साथ कफ दृष्टि-भागमें पहुँचता है, इस कारण यूरोप निवासियोंकी आंखें कंजी होती हैं। इस प्रकार तेजके साथ पित्तादि धातुओंके बिगाड़से अनेक प्रकारकी आंखें होती हैं।

( ५६ ) अल्पजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती है ?

यह एक बड़ा गंभीर विषय है। बहुतोंका तो कहना यह है कि यह वात ईश्वरके हाथमें है। बहुतसे लोग पूर्व जन्मके पाप और पुण्य पर मानते हैं, परंतु हम किसीके मन्तव्य पर आश्रय नहीं करते। हमने भी कई जगह ऐसा पढ़ा है कि आयु कर्मोंके अनुसार होती है, परंतु आजकालकी नवीन रीतिके अनुसार यह बात सिद्ध हुई है कि गर्भ रज-वीर्यके कीड़ोंसे

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सन्तति-शास्त्र ।

ही रहता है। वीर्य जव मज्जा धातुसे बनकर २६ से लेकर ३६ घंटे पर्यन्त वीर्यशयमें रह चुकता है, तव उस वीर्यके कौठे पुष्ट होते हैं। जो लोग इससे कम समयमें या दिन रातमें कई बार प्रसंग करते हैं तो कच्चे रहते हैं उनके वीर्यमें वीर्य-जन्तु होते ही नहीं, यदि होते भी हैं तो कच्चे रहते हैं और उनमें कूदने और गर्भ बनानेकी शक्ति ही नहीं होती।

इसमें एक बहुत बड़ी वारीकी यह है कि पुरुषकी कम अवस्थामें ऐसे जन्तु कभी नहीं पकते। एक विद्वानकी राय है कि जन्तुओंका पकना वीस वर्षकी अवस्थासे प्रारंभ होता है, और पचीस वर्षकी अवस्थामें खूब अच्छी तरह पक जाते हैं इनके बाद हमेशा पकते रहते हैं। यह बात उन लोगोंमें पाई जाती है कि जिन्होंने पचीस वर्षतक ब्रह्मचर्य पालन किया है, परन्तु जिसका ब्रह्मचर्य इस नियत समयतक नहीं रहा, उनके वीर्य-जन्तु हमेशा बुरी दशामें रहते हैं। इस विषयमें ऐसा नहीं होता कि जिन्होंने पच्चीस वर्षतक ब्रह्मचर्य नहीं पालन किया है, सोलह अथवा वीस वर्षकी अवस्थासे ही स्त्री संयोग प्रारंभ हो गया है, तां उनका वीर्य जन्तु पचीस वर्षकी अवस्थामें जाकर पक जावेगा। यह एक बड़ी भूल है, ऐसे लोगोंके वीर्य जन्तु आगे चलकर नहीं पकते, किन्तु अधिकचरे रह जाते हैं। इसी प्रकार स्त्रियोंमें रजवती होनेके समयसे लेकर १६ वर्ष तक रज-जन्तु पक कर ठीक हो जाते हैं और सीतही अवस्थाओंमें पुष्टता आ जाती है। वैद्यकने भी ऐसा ही माना है कि पचीस वर्षकी अवस्थामें पुरुष और सोलह वर्षकी अवस्थामें स्त्री दोनों बराबरकी शक्तिवाले होते हैं। १० क

इस विषयमें स्त्री और पुरुषोंको कुर्पके संमान समझना चाहिये। जिस प्रकार दो चार हाथ भूमिमें गले हुए कुर्प थोडा

अल्पजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती? २३१

सा पानी निकालने पर सूख जाते हैं और जो कुरपें अच्छी तरह से गले हैं वे चाहे जितना पानी निकालने पर भी, नहीं सूखते, इसी प्रकार जिन माता पिताओंने थोड़े दिन ब्रह्मचर्य पालन करके संयोग किया है, वे झिल्ले कुरपेंके समान हैं, परंतु जिनका ब्रह्मचर्य पूरा पालन हुआ है उनको गहर और गंभीर कुरपेंके समान समझना चाहिये।

एक खेतको देखना चाहिये, उसमें बहुतसे पेड़ हानेपर कुछ छोटे ही रह जाते हैं। कुछ बड़े होते हैं, कुछ सबमें अच्छे रहते हैं। इनका कारण यह है कि जैसा पका हुआ अच्छा वीर्य होता है उसीके अनुसार अच्छे लम्बे चौड़े पेड़ होते हैं। यह बात भी देखनेमें आवेगी कि पके हुए वीर्यके पेड़की जड़ गहरीमें होगी और वह कुछ देरमें सूखेगा परंतु जो पेड़ अध-पके वीर्यसे उगेगा उसकी जड़ तो अधिक नीचे न जायगी और वह जल्द सूख जायगा। इसी प्रकार मनुष्योंमें भी जानना चाहिये। जिन बच्चोंका गर्भ उत्तम और पके रजवीर्यके जन्तुओं से हुआ है, वे दीर्घजीवी अर्थात् ज्यादा दिन जीनेवाले; और जिनका गर्भ खराब कुछ कच्चे वीर्यसे हुआ है वे अल्पजीवी अर्थात् कम दिनों जीनेवाले होते हैं।

अच्छा और पका हुआ वीर्य हानेपर भी अल्पजीवी अर्थात् कम दिनों जीनेवाली सन्तान भी होती है। इसका कारण यह है कि जब अच्छा सूख पका हुआ वीर्य घुन जाता है, तो उससे पेड़ होता ही नहीं। यदि होता भी है तो छोटा और जल्द सूख जानेवाला। इसी प्रकार स्त्री और पुरुषोंके बीजोंमें भी समझना चाहिये। जब स्त्री पुरुषके रजवीर्यके जीव किसी रोगसे दूषित हो जाते हैं तो वह घुने हुए बीजके समान गर्भ ही नहीं उत्पन्न करते। यदि करते भी हैं, तो कच्चे