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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

द्धायते॒ तस्मा॑द्व॒ स्त्र॒ᳪ॒ स्त्रमे॒वाव॑गूह्येद्द्विपर्या॒सं॑ ॥ २२॥ स्वर्ग॑स्यो ह्यै॒ष लो॒कस्य॒ स- मारो॑हणः क्रियते । यद्यू॑पशकल॒ᳪ॒ स्यु॒ᳪ॒ रश॑ना रश॒नायै॒ यूप॑शकलो यूपशक॒ला- च्चषा॒लं च॑षा॒लात्स्व॒र्गं लो॒कᳪ॒ सम॑श्नुते ॥ २३॥ अथ॒ यस्मा॑त्स्वरुर्नाम॑ । ए॒तस्मा॒द्वा ऽए॒षोऽप॑च्छिद्यते॒ तस्यैत॒त्त्वमे॒वारु॑र्भवति॒ तस्मा॑त्स्वरुर्नाम॑ ॥ २४॥ तस्य॒ यन्नि॒खा- तम् । तेन॑ पितृलो॒कं जय॑त्यथ॒ यदूर्ध्वं नि॒खाता॒दा रश॑नायै॒ तेन॑ मनुष्यलो॒कं जय॑- त्यथ॒ यदूर्ध्वं॒ रश॑नाया॒ आ च॑षा॒लात्तेन॑ देवलो॒कं जय॑त्यथ॒ यदूर्ध्वं॑ चषा॒लाद्द्व्यङ्गु॒लं वा॒ त्र्यङ्गु॒लं वा साध्या॒ दूति॑ दे॒वास्तेन॑ तेषां॑ लो॒कं जय॑ति सलो॒को वै साध्यैर्दे॒- वैर्भवति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ २५॥ तं वै पू॒र्वार्धे॑ मिनोति । व॒ज्रो वै यूपो॑ व॒ज्रो दण्डः॑ पूर्वा॒र्धं वै द॒ण्डस्या॑भि॒प्रय्य॒ प्रह॑रति पूर्वा॒र्ध ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ तस्मा॑त्पूर्वा॒र्धे मि॑नोति ॥ २६॥ य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॒तिं जि॑ग्युर्यैषा॒मियं जि॒तिस्ते हो॑चुः क॒थं न इ॒दं मनु॒ष्यै- रनभ्यारो॒ह्यᳪ॒ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा य॒था मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्द्ध॑येयु॒र्विङ्क्य॑ य॒ज्ञं यूपेन॑ योपयि॒त्वा तिरो॑ऽभव॒न्नथ॒ यदेने॒नायो॑पयं॒स्तस्मा॑द्यू॒पो नाम॑ पु॒रस्ता॒द्धि प्र- ज्ञा पु॒रस्ता॒न्मनो॒ऽन्व॑स्त॒स्मात्पूर्वा॒र्धे मि॑नोति ॥ २७॥ स वा॒ऽअ॒ष्टाश्रि॑र्भवति । अ॒ष्टा- क्षरा॒ वै गा॑य॒त्री पूर्वा॒र्धो वै य॒ज्ञस्य॑ गाय॒त्री पूर्वा॒र्ध ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ तस्मा॑द॒ष्टाश्रि॑र्भव- ति ॥ २८॥ तᳪ॒ ह स्मै॒तं दे॒वा अ॒नुप्र॒हर॑न्ति । य॒द्येद॒मप्येत॒र्ह्येकै॒ऽनुप्र॒हर॑न्तीति दे॒वा अ॒कुर्व॒न्निति॒ ततो॒ रक्षा॑ᳪसि य॒ज्ञमन्व॒वापि॑बन् ॥ २९॥ ते दे॒वा अ॑ध्व॒र्युम॑ब्रुवन् । यूप- शकल॑मे॒व जु॑हुधि॒ तदृहै॒ष स्व॒गाकृ॑तो भवि॒ष्यति॒ तथो॒ रक्षा॑ᳪसि य॒ज्ञं नानू॑त्पा- स्यन्ते॒ऽयं वै व॒ज्र उद्य॑त॒ दूति॑ ॥ ३०॥ सो॒ऽध्व॒र्युः । यूप॑शकलमे॒वाजु॑होत्तदृहै॒ष स्व- गाकृ॑त॒ आसी॒त्तथो॒ रक्षा॑ᳪसि य॒ज्ञं नानू॑दपिबता॒यं वै व॒ज्र उद्य॑त॒ दूति॑ ॥ ३१॥ त- थो॒ऽह्वैवैष ए॒तत् । यूप॑शकल॒मेव जु॑होति॒ तदृहै॒ष स्व॒गाकृ॑तो भवति॒ तथो॒ रक्षा॑ᳪ- सि य॒ज्ञं नानू॒त्पिब॑न्ते॒ऽयं वै व॒ज्र उद्य॑त॒ दूति॒ स जु॑होति दि॒वं ते धू॒मो ग॑च्छतु स्व॒र्ज्योतिः॑ पृथि॒वी भस्म॒नापृ॑ण॒ स्वाहेति॑ ॥ ३२॥ ब्राह्मणम् ॥४ [७. १.]॥

कां० ३, अ० ७, ब्रा० १, कं० २२-३२ शतपथब्राह्मण / ४६५ अनुव्रत होती है। इसलिए उस-उस यूप में उसी-उसी की चिपुटी लगानी चाहिए ॥२२॥ जो यूप-शकल है वह स्वर्ग की सीढ़ी है। वह इस प्रकार कि पहले तो रस्सी हुई, फिर यूप-शकल, फिर चषाल । फिर चषाल से चढ़कर स्वर्गलोक को प्राप्त हो जाता है ॥२३॥ इसका 'स्वरु' नाम इसलिए है कि वह उसी में से काटी जाती है। 'स्व' का अर्थ है 'अपना' और 'अरु' का अर्थ है 'घाव' । इससे मिलकर 'स्वरु' हुआ ॥२४॥ जो नीचे गड़ा हुआ भाग है उससे स्वर्गलोक की प्राप्ति करता है और जो ऊपर का भाग है उससे रस्सी-सहित मनुष्य-लोक की प्राप्ति करता है। और जो रस्सी से ऊपर चषाल है उससे देवलोक को प्राप्त करता है। और चषाल से ऊपर जो दो-तीन अँगुल लकड़ी होती है उससे जो 'साध्य देव' हैं उनके लोक को प्राप्त करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह साध्य देवों का सलोक बन जाता है ॥२५॥ वह यूप को वेदी के पूर्वार्ध में लगाता है। यूप वज्र है। दण्ड वज्र है। जब कोई वज्र को मारता है तो अग्रभाग को पकड़कर मारता है। यह यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसीलिए पूर्वार्ध में यूप को लगाता है ॥२६॥ यज्ञ के द्वारा देवों ने विजय प्राप्त की जो इनको प्राप्त है। उन्होंने कहा कि इस अपने लोक को किस प्रकार ऐसा बनायें कि मनुष्य न आ सकें? उन्होंने यज्ञ का रस चूस लिया जैसे मधु-मक्खियाँ मधु को चूसती हैं। और यज्ञ को यूप के चारों ओर बिखेरकर (योपयित्वा) छिप गये । चूंकि उन्होंने इसको यूप द्वारा (उपापयन) बिखेरा, इसलिए इसका नाम यूप पड़ा। बुद्धि अग्रभाग में होती है। मन का वेग भी अग्रभाग में होता है। इसलिए वह उसको 'अग्रभाग' में लगाता है ॥२७॥ वह अष्ट कोणवाला होता है। गायत्री छन्द के आठ अक्षर होते हैं और गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध होती है। यह भी चूंकि यज्ञ का पूर्वार्ध है, इसलिए वह उसको अष्ट कोणवाला बनाता है ॥२८॥ एक बार देवों ने इसको (प्रस्तर को आग में) पीछे से फेंका था, इसका अनुसरण करके ये भी पीछे फेंक देते हैं, क्योंकि देवों ने ऐसा किया था। इसलिए राक्षसों ने यज्ञ को देवों के पीछे पिया ॥२६॥ देवों ने अध्वर्यु से कहा, 'केवल यूप-शकल की आहुति दे।' इससे यज्ञ सफल हो जायगा और राक्षस उसमें न आवेंगे—यह सोचकर कि यह यूपरूपी वज्र खड़ा हो गया है ॥३०॥ तब अध्वर्यु ने यूप-शकल की आहुति दी, और यजमान सफल हो गया। इसके पीछे राक्षस यज्ञ को न पी सके। यह सोचकर कि यह एक वज्र खड़ा हो गया है ॥३१॥ इसी प्रकार वह यूप-शकल की आहुति ही देता है। यजमान इससे सफल हो जाता है। राक्षस यज्ञ को नहीं पीने पाते, यह सोचकर कि यह तो वज्र खड़ा हो गया है। वह इस मन्त्र से आहुति देता है-“दिवं ते धूमो गच्छतु स्वर्ज्योतिः पृथिवी भस्मनापृण स्वाहा” (यजु० ६।२१)- “द्यौलोक तक तेरा धुआँ जाय, स्वर्लोक तक ज्योति और पृथिवी तेरी भस्म से भर जाय” ॥३२॥

अध्याय-७, ब्राह्मण-२

४६६ शतपथ ब्राह्मण याव॑ती वै वेदि॒स्ताव॑ती पृथि॒वी । वज्रो॒ वै यूपा॒स्तदि॒मामे॒वैतत्पृथि॒वीमे॒तैर्य॒ज्ञे स्पृणुते॒ऽस्यै स॒पत्नान्नि॒र्भज॑ति॒ तस्मा॒द्यूपैकादशिनी॑ भवति॒ द्वाद॑श उपश॒यो भ॑वति वित॑स्तस्तं द॑क्षि॒णत॒ उप॑निदधाति॒ तय॒द्द्वाद॑श उपश॒यो भ॑वति ॥ १॥ ॥ शतम् २००० ॥ ॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॑न्वा॒नाः । तेᳪसुररक्ष॒सेभ्य आसङ्गा॒द्विभ॑यां चक्रुस्तद्य॑- ऽएत॒ऽइक्षिता॒ यथेषु॑रस्ता तया॒ वै स्तृ॑णुते वा॒ न वा स्तृ॑णुते॒ यथा दण्डः प्रहृत- स्तेन॒ वै स्तृ॑णुते वा॒ न वा स्तृ॑णुते॒ऽथ य ऽए॒ष द्वाद॑श उपश॒यो भ॑वति॒ यथेषुर॑प- तान॒स्ता यथोद्य॑तमप्रहृतमे॒वमे॒ष वज्र॒ उद्य॑तो दक्षि॒णतो॒ नाष्ट्राणांᳪ रक्ष॑सामप॒हत्यै॒ तस्मा॒द्द्वाद॑श उपश॒यो भ॑वति ॥ २॥ तं नि॒दधा॑ति । ए॒ष ते॑ पृथि॒व्यां लोक आ- रण्य॒स्ते प॒शुरिति॑ प॒शुश्च॒ वै यूप॑श्च॒ तद॒स्माऽआ॑र॒ण्यमे॒व प॑शू॒नामनु॑दिशति॒ तेनो॑ ऽए॒ष प॒शुमा॒न्भव॑ति॒ तद्ध्यं यूपैकाद॒शिन्यै सं॑श॒यनमा॒हुः श्वःसु॒त्यायै ह्वैके सं- मि॒न्वन्ति॒ प्रकु॑र्वताये॒ चैव॒ श्वःसु॒त्यायै॒ यूपं॑ मिन्वन्तीत्यु च॑ ॥ ३॥ तदु॒ तथा॒ न कु- र्यात् । अ॒ग्निष्ठ॑मे॒वोछ्र॑येदि॒दं वै यूप॒मुच्छ्रित्या॑धर्यु॒रा प॑रिव्ययणा॒न्नान्व॑र्त्तयत्य॒परिवी॑ता वाऽए॒ताᳪ रा॒त्रिं वस॑न्ति॒ सा न्वे॒व परि॑चक्षा प॒शवे॒ वै यूप॒मुच्छ्र॑यन्ति प्रात॒र्वै प॒शूना॒लभ॑न्ते॒ तस्मा॒त् प्रातरे॒वोछ्र॑येत् ॥ ४॥ स य उत्त॑रो॒ऽग्निष्ठा॒त्स्यात् । तमे॒वाग्र ऽउच्छ्र॑ये॒दथ दक्षि॑णामयोत्त॑रं दक्षि॒णार्द्धमुत्त॑मं तयोदी॑ची भ॑वति ॥ ५॥ अथो॒ऽइत॑र- थाहुः । दक्षि॑णामे॒वाग्रे॒ऽग्निष्ठा॑दु॒च्छ्रये॒दथोत्त॑रमथ द॑क्षि॒णमुत्त॒रार्द्धमुत्त॑मं तथो हास्यो- दगेव कर्मानु॒संति॑ष्ठतऽइति॑ ॥ ६॥ स यो वर्षि॑ष्ठः स दक्षि॑णार्ध्यः स्यात् । अथ ह्र- सी॑यानथ ह्रसी॑यानुत्त॒रार्ध्यो᳭ ह्रसि॑ष्ठस्तथोदी॑ची भ॑वति ॥ ७॥ अथ पत्नीभ्यः पत्नी- यूप॒मुच्छ्र॑यन्ति । सर्व॑वाय॒न्वेव पत्नी॑यूप उ॒च्छ्रा॑यते त॒द्यत्त्वा॑ष्ट्रं प॒शुमाल॑भते॒ त्वष्टा॒ वै सि- क्तᳪ रेतो॒ वि क॑रोति॒ तदे॒ष उ॒वैतत्सि॒क्तᳪ रेतो॒ वि क॑रोति मुष्क॒रो भ॑वत्येष वै प्र॒जनयि॑ता॒ यन्मु॑ष्क॒रस्तस्मान्मु॑ष्क॒रो भ॑वति॒ तं न सᳪस्थापयेत्पर्य॑ग्निकृतमे॒वोत्सृ॑-

का० ३ अ० ७, ब्रा० २, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / ४६७ अध्याय ७—ब्राह्मण २ जितनी बड़ी वेदी होती है उतनी बड़ी पृथिवी। यूप वज्र होते हैं। इन्हीं वज्रों के द्वारा वह पृथिवी पर स्वत्व कर लेता है और शत्रुओं को जीत लेता है। इसलिए ११ यूप होते हैं और बारहवां छिला-छिलाया अलग पड़ा रहता है। वह उसको वेदी के दक्षिण को डालता है। यह बारहवां अलग क्यों रहता है, इसका कारण आगे दिया है—॥१॥ [शतम् २०००] यज्ञ करनेवाले देवताओं कोअसुर राक्षसों के आक्रमण का भय हुआ। यहजो ग्यारह यूप खड़े कर दिये गये वे उन तीरों के समान थे जो छोड़ दिये गये हों, चाहे किसी (शत्रु) के लगे हों या न लगे हों; या वे उस लाठी के समान थे जो मार दी गई, चाहे वह लगी या न लगी। और जो यह बारहवां यूप पड़ा हुआ है वह उस तीर के समान है जो खींचा तो गया है परन्तु अभी छोड़ा नहीं गया। यह उस शस्त्र के समान है जो उठा तो लिया गया लेकिन अभी छोड़ा नहीं गया। यह यूप वह वज्र था जो दक्षिण की ओर शत्रु राक्षसों को मारने के लिए रक्खा गया था। इसलिए बारहवां यूप पड़ा रहता है ॥२॥ वह इस यूप को इस मन्त्र से रखता है—"एष ते पृथिव्यां लोकऽआरण्यस्ते पशुः" (यजु० ६।६) —"पृथिवी में तेरा यह स्थान है। जंगली पशु तेरे हैं।" पशु भी हैं और यूप भी। इसलिए जंगलों के पशुओं का इसकी ओर निर्देश करता है। इसलिए यह भी पशुवाला कहा जाता है। ये ग्यारह यूप दो तरह के होते हैं। कुछ लोग तो सब यूपों को एक-साथ लगाते हैं, दूसरे दिन के सोम-याग के लिए। कुछ दूसरे दिन के सोमयोग के लिए एक ही यूप लगाते हैं (अर्थात् कुछ तो एक-साथ लगाते हैं और कुछ एक-एक करके) ॥३॥ परन्तु ऐसा न करना चाहिए। केवल अग्नि के सम्मुख एक लगाना चाहिए, क्योंकि इसको लगाकर अध्वर्यु इसको नहीं छोड़ता जब तक कि वह इसको घेरता नहीं (परिव्ययण) ; और दूसरे यूप रात-भर अपरिवीत रहते हैं। यह दोष होगा क्योंकि यूप पशु के लिए हैं। पशु (पशुता) की बलि दूसरे दिन प्रातःकाल के समय होगी।' इसलिए औरयूपों को दूसरे दिन प्रातः- काल ही लगाना चाहिए ॥४॥ अब उसको वह यूप लगाना चाहिए जो अग्नि के सामनेवाले यूप के ठीक उत्तर में है, फिर दक्षिण को, फिर उत्तर को, अन्तिम दक्षिण की ओर। इस प्रकार यूपों की पंक्ति उत्तर की ओर होती है ॥५॥ कुछ इसके विरुद्ध भी कहते हैं। अर्थात् पहले अग्नि के सामनेवाले यूप के दक्षिण की ओर लगाये, फिर उत्तर की ओर, फिर दक्षिण की ओर, अन्तिम उत्तर की ओर। इस प्रकार उसका उत्तर का काम समाप्त हो जाता है ॥६॥ दक्षिण की ओर सबसे बड़ा होना चाहिए। फिर उससे छोटा, फिर उससे छोटा, जो सबसे उत्तर में हो वह सबसे छोटा। इस प्रकार पंक्ति उत्तर की ओर हो जाती है ॥७॥ तत्पश्चात् पत्नियों के लिए पत्नी-यूप गाड़ते हैं। पत्नी-यूप सम्पूर्णता के लिए गाड़ा जाता है। यहाँ त्वष्टा के पशु को पकड़ते हैं, क्योंकि त्वष्टा वीर्य का पोषक है। इस प्रकार वह सींचे हुए वीर्य को बनाता है। यदि यह पशु अण्डकोषों वाला है तो उत्पादक है। इसकी बलि न दे। इसको अग्नि के चारों ओर फिराकर छोड़ दे। यदि बलि देगा तो प्रजा का अन्त हो जायगा। परन्तु इस १. वेदों में पशु-प्रेम के मन्त्र तो जहाँ-तहाँ मिलेंगे, पशु-बलि के कहीं नहीं; अतः 'शतपथ ब्राह्मण' में 'पशु-बलि' के सन्दर्भ प्रक्षिप्त हैं। — स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

अध्याय-७, ब्राह्मण-३

४६८ शतपथ ब्राह्मण डे॒त्त य॒त्सँस्थापये॒त्प्रजा॑ये ह्या॒त्मियात्प्र॒जामुत्सृजति॒ तस्मा॒न्न सँ॑स्थापये॒त्पर्य॑ग्नि- कृतमे॒वोत्सृ॑जेत् ॥ ८॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [७.२] ॥ ॥ प॒शुश्च॑ वै यूप॑श्च । न वाऽऋ॒ते यूपा॒त्पशु॑मालभन्ते कदा॑ चन तद्यत्तथा न ह वाऽए॒तस्मा॒ऽग्रे पशव॒श्चन्नमिरे यद॒न्नम॑भविष्य॒न्येद॒न्नं भूता य॒था ह्ये॒वायं द्विपा- त्पुरुष उच्छ्रित एवँ ह्ये॑व द्विपाद् उ॒च्छ्रिताश्रि॒शुः ॥ १॥ त॒तो देवा ए॒तं वज्रं॑ ददृशुः । यद्यूपं॒ तमु॑च्छिश्रियु॒स्तस्मा॒दीषा प्रावे॑पन्त ततश्चतुष्पादा अभ्रवँस्ततोऽन्नमभव॒न्येद- मन्नं॑ भूता ए॒तस्मै हि वाऽए॒तेऽतिष्ठन्त॒ तस्माद्यूप॒ऽएव पशू॒मालभन्ते॒ नर्ते यूपा- त्कदा॑ चन ॥२॥ अथोपाकृत्य प॒शुम् । अ॒ग्निं मथि॒त्वा नियु॑नक्ति तद्यत्तथा न ह वाऽए॒तस्मा॒ऽग्रे पशव॒श्चन्नमिरे यद्धवि॒रभविष्य॒न्येनानिद॒ हविर्भूतानग्नौ जुहु- ति तांन्द्रेवा उ॑प॒निरु॑ध्रुवँस्त॒ऽउपनिरुद्धा नोपावेयुः ॥३॥ ते होचुः । न वाऽइ॒मे ऽस्य धामं॑ विदुर्यद॒ग्नौ हविर्जुह्वति॒ नैतां प्रतिष्ठा॑मुप॒रुध्ये॑व पशून॒ग्निं मथि॒त्वाग्राव॒ग्निं जुहुवाम ते वेदिष्य॒न्त्येष वै किल हवि॒षो धाम॑ ए॒षा प्रतिष्ठा॒ग्नौ वै किल ह॒वि- र्जुह्व॒तीति॒ ततो॒ऽभ्यवैष्यन्ति॒ ततो रातमनस आ॒लम्भाय॑ भविष्यन्तीति ॥४॥ त ऽउ॒परुध्ये॑व पशून् । अ॒ग्निं मथि॒त्वाग्राव॒ग्निमजुहुवु॒स्तेऽविदु॒रेष वै किल हवि॒षो धाम॑ ए॒षा प्रतिष्ठा॒ग्नौ वै किल ह॒विर्जुह्व॒तीति॒ ततो॒ऽभ्यवायँस्ततो रातमनस आ- लम्भाया॑भवन् ॥५॥ तथो॒ऽएवैष ए॒तत् । उप॒रुध्ये॑व पशुम॒ग्निं मथि॒त्वाग्राव॒ग्निं जु- होति॒ स वेदैष वै किल हवि॒षो धाम॑ ए॒षा प्रतिष्ठा॒ग्नौ वै किल ह॒विर्जुह्व॒तीति ततो॒ऽभ्यवै॑ति ततो रातमना आलम्भाय॑ भवति तस्मादुपाकृत्य प॒शुम॒ग्निं मथि॒त्वा नियु॑नक्ति ॥६॥ तदाहुः । नोपाकुर्यान्ना॒ग्निं मन्येद्रशनामेवा॒दाया॒ङ्गेसोप॒रेत्याभि- धाय नियुञ्ज्यादिति॒ तडु तथा न कुर्याद्यथार्धमं तिरश्च्या चिकीर्षेदे॒वं तत्तस्मादे- तद्देवानुपरीयात् ॥७॥ अथ तृणा॒मादायोपाकरोति । द्वितीयवान्निरुषण्डाऽइति द्वि- तीयवान्हि वी॒र्यवान् ॥८॥ स तृणामादत्ते । उपावी॑रसीत्युप हि द्वितीयोऽवति

कां० ३, अ० ७, ब्रा० २-३, कं० ८ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४६६ प्रकार वह सन्तान को स्वतन्त्र कर देता है। इसलिए इसकी बलि न दे। इसको अग्नि के चारों ओर फिराकर ही छोड़ दे ॥८॥ अध्याय ७-ब्राह्मण ३ पशु भी और यूप भी। बिना यूप के पशु कभी नहीं मारा जाता। ऐसा इसलिए होता है कि पहले पशुओं ने अन्न अर्थात् खाद्य-पदार्थ बनना स्वीकार नहीं किया, जैसा अब कर लिया; क्योंकि जैसा आजकल मनुष्य दो पैरों पर और खड़ा चलता है उसी प्रकार पशु भी दो पैरों पर और खड़े-खड़े चलते थे ॥१॥ तब देवों ने उस वज्र को देखा जिसका नाम यूप है। उन्होंने उस यूप को स्थापित किया। उसके डर से पशु सिकुड़ गये और अन्न बन गये, जैसा कि अब हो गये हैं क्योंकि उन्होंने मान लिया है। इसीलिए पशु को यूप पर ही मारते हैं; बिना यूप के कभी नहीं मारते ॥२॥ पशु को लाकर, अग्नि को मथकर पशु को यूप से बाँधते हैं। ऐसा क्यों करते हैं? पहले पशुओं ने यह बात स्वीकार नहीं की कि वे हवि बन जायें, जैसे वे अब हवि बन गये हैं और अग्नि में बलि दिये जाते हैं। उनको देवों ने वश में किया। इस प्रकार वश में होकर भी वे न माने ॥३॥ उन्होंने कहा, 'यह पशु इस नियम (याम) को नहीं जानते कि अग्नि में आहुति दी जाती हैं न इस (अग्निरूपी) प्रतिष्ठा को मानते हैं। पशुओं को लाकर और आग को मथकर अग्नि में अग्नि की आहुति दें। तब वे जान लेंगे कि हवि का नियम यह है और अग्नि की यह प्रतिष्ठा है। अग्नि में ही आहुति दी जाती है। तब वे मान जायेंगे और मारे जाने के लिए तैयार हो जायेंगे ॥४॥ तब पशुओं को लाकर, आग में मथकर उन्होंने अग्नि में अग्नि की आहुति दी। तब पशुओं ने जाना कि हवि का यह नियम है, अग्नि की यह प्रतिष्ठा है और अग्नि में ही हवि की आहुति दी जाती है। तब वे पशु मान गये और बलि के लिए तैयार हो गये। ॥५॥ इसी प्रकार यह भी पशुओं को लाकर, अग्नि को मथकर, अग्नि में अग्नि की आहुति देता है। वह (पशु) जान लेता है कि हवि का नियम क्या है, अग्नि की प्रतिष्ठा क्या है। अग्नि में ही हवि की आहुति दी जाती है। इसलिए वह मान जाता है और बलि के लिए तैयार हो जाता है। इसीलिए पशु को लाकर और अग्नि को मथकर वह पशु को (यूप से) बाँधता है ॥६॥ इसके विषय में कहते हैं कि न तो पशु को लाये और न अग्नि को मथे। केवल रस्सी को लेकर और सीधा जाकर रस्सी को डालकर पशु को बाँध ले। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। यह बात ऐसी ही होगी जैसे कोई चुपके-चुपके नियम का उल्लंघन करे। इसलिए उसको वहाँ जाना ही चाहिए ॥७॥ वह तृण को लेकर पशु को लाता है। यह सोचकर कि दूसरे को साथ लेकर मैं पशु को ले आऊँगा, क्योंकि जिसका कोई साथी होता है वह शक्तिवाला होता है ॥८॥ इस मन्त्रांश को पढ़कर तृण लेता है-“उपावीरसि" (यजु० ६।७)-"तू समीप रक्षा

अध्याय-७, ब्राह्मण-४

४७० शतपथ ब्राह्मण त॒स्मादाहोपावीर॒सीत्युप॑ दे॒वान्दैवी॒र्विशः॒ प्रागु॒रिति॑ दे॒व्यो वाऽए॒ता विशो॒ यत्प- शवोऽस्थिषत दे॒वेभ्य इत्ये॒वैतदा॒ह यदाहोप॑ दे॒वान्दैवी॒र्विशः॒ प्रागु॒रिति॑ ॥ ९॥ उ- शिचो॒ वह्नि॑तमानिति । विद्वा॑सो॒ हि दे॒वास्तस्मादाहोशिचो॒ वह्नि॑तमानिति ॥१०॥ दे॒व त्वष्ट्र्व॑सु॒ रमेति॑ । त्वष्टा॒ वै पशूनाम॑ष्टे पशवो॒ वसु॒ ताने॒तद्देवा॒ अति॑ष्ठमा- नांस्त्वष्टारमब्रुवन्नुपनिमद्रेति यदाह दे॒व त्वष्ट्र्व॑सु॒ रमेति॑ ॥११॥ हव्या ते स्वदन्तामि॒- ति । यदा वाऽए॒तद्‌ए॒तस्मा॒ऽग्रधि॒यन्त॒ यद्ध॒विरभ॑विष्यंस्तस्मादाह हव्या ते स्वद- न्तामिति ॥ १२॥ रेवती॒ रम॑ध्मिति । रेव॑ती॒ हि प॒शवस्तस्मादाह॒ रेवती॒ रम॑ध- मिति॒ बृह॑स्पते धा॒रया॒ वसू॒नीति॒ ब्रह्म॒ वै बृह॒स्पतिः॑ पशवो॒ वसु॒ ताने॒तद्देवा अति॑ष्ठमानान॒ब्रह्म॑णैव पुर॒स्तात्पर्य॑दधुस्तन्नात्य्याय॑स्तथो॒ ऽए॒वैनाने॒ष एतद्‌ब्रह्म॑णैव प- र॒स्तात्परि॑दधाति॒ तन्ना॑तियन्ति तस्मादाह॒ बृह॑स्पते धा॒रया॒ वसू॒नीति॒ पाशं॑ कृत्वा प्रति॑मुञ्चत्यथातो नियोजनस्यैव ॥ १३॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [७. ३] ॥ ॥ पञ्चमः प्रपाठ- कः ॥ कण्डिकासंख्या १२७ ॥ ॥ पाशं॑ कृत्वा॒ प्रति॑मुञ्चति । ऋ॒तस्य॑ त्वा देव॒हविः॒ पाशेन॒ प्रति॑मुञ्चामी॒ति वरु॑ण्या वाऽए॒षा यद्र॒ज्जुस्तदे॑नमे॒तदृतस्यै॒व पाशे॒ प्रति॑मुञ्चति॒ तथो॒ हैनमेशा वरु॑ण्या र॒- ज्जुर्न॑ हिनस्ति ॥१॥ धर्षा॒ मानु॑ष॒ इति॑ । न वाऽए॒तमग्रे॑ मनुष्यो॒ऽधृ॑ष्णोत्स यदैव ऽर्तस्य॑ पाशे॒नैतद्देव॒हविः॒ प्रति॑मुञ्चत्यथैनं मनुष्यो॑ धृष्णोति तस्मादाह धर्षा॒ मानु॑ष इति॑ ॥२॥ अथ॒ नियु॑नक्ति । दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॒सवे॒ऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो ह- स्ताभ्यामग्नीषोमाभ्यां॒ जुष्टं॒ नियु॑नज्मी॒ति तद्यथैवा॒दो दे॒वता॑यै ह॒विर्गृह्णन्नादिश॒त्ये- वमेवैतद्देवताभ्यामादिशत्यथ प्रोक्षत्येको वै प्रोक्षणस्य बन्धुर्मेध्यमेवैतत्करोति ॥३॥ स प्रोक्ष॑ति । अ॒द्भ्यस्त्वौष॑धीभ्य॒ इति॒ तद्यत एव॒ सम्भव॑ति॒ तत॑ ए॒वैतन्मेध्यं॑ करोतीदं॒ हिं यदा वर्षत्यथौषधयो जायन्त॒ऽओष॑धीर्जग्ध्वापः॑ पीत्वा॒ तत॑ ए॒ष रसः॒ सम्भव॑ति॒ रस॒दितो रेत॑तः प॒शवस्तद्यत एव॒ सम्भव॑ति॒ यतश्च॒ जाय॑ते॒ तत॑ ए॒वैत-

कां० ३, अ० ७, ब्रा० ३-४, कं० ९-१३ व १-४ शतपथब्राह्मण / ४७१ करनेवाला है।" साथी रक्षा करता है इसलिए कहता है 'उपावीरसि।' "उपदेवान् दैवीर्विशः प्रागुः" (यजु० ६।७) [महीधर-भाष्य में 'विशेषायुः' पाठ है] - "दैवी लोग देवों के पास आये हैं।" ये जो पशु हैं वे दैवी लोग हैं। जब वह 'उपदेवान्' आदि कहता है तो इसका तात्पर्य यह है कि वह देवों के वश में आ गया है ॥९॥ "उशिजो वह्नितमान्" (यजु० ६।७) - उशिज = मेधावी, 'वह्नितम' = सबसे अच्छा वाहक ॥१०॥ "देव त्वष्टर्वसु रम" (यजु० ६।७) - "हे देव त्वष्टा, धन में रम।" त्वष्टा ही पशुओं का ईश है। पशु ही वसु हैं। जो पशु माने नहीं उन्हीं के लिए देवों ने त्वष्टा से कहा, 'देव त्वष्टर्वसु रम' ॥११॥ "हव्या ते स्वदन्ताम्" (यजु० ६।७) - "हवि तुझको स्वादिष्ट लगें।" चूंकि वे स्वयं ही मान गये कि हम हवि हो जायें, इसलिए कहा, 'हव्या ते स्वदन्ताम्' ॥१२॥ "रेवती रमध्वम्" (यजु० ६।८) - 'हे सुखी, सुख उठाओ।' पशु 'सुखी' हैं इसलिए कहा "रेवती रमध्वम् । बृहस्पते धारया वसूनि" (यजु० ६।८) - 'हे बृहस्पति, धनों को धारो।' ब्रह्म बृहस्पति है। पशु वसु हैं। जो पशु माने नहीं थे वे ब्रह्म के साथ सुरक्षित थे। इसी प्रकार यह भी उनको ब्रह्म के साथ सुरक्षित रख देता है जो मानते नहीं हैं, इसलिए कहता है 'बृहस्पते धारया वसूनि।' पाश या फन्दा बनाकर वह उसके पशु के गले में डालता है। बाँधने के विषय में अगले ब्राह्मण में है ॥१३॥ अध्याय ७- ब्राह्मण ४ फन्दा बनाकर (पशु के गले में) डालता है, इस मन्त्रांश से- "ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेन प्रति मुञ्चामि" (यजु० ६।८) - "हे देव-हवि, तुझको ऋत के फन्दे से बाँधता हूँ।" क्योंकि जो रस्सी है वह वरुण की है। इसलिए ऋत के फन्दे से उसको बाँधता है (अर्थात् वरुण की रस्सी में ऋत का फन्दा लगाता है)। इसलिए वह वरुण की रस्सी उसको नहीं सताती ॥१॥ "धर्षा मानुषः" (यजु० ६।८) - "मनुष्य धृष्ट है।" क्योंकि पहले मनुष्य (पशु के) पास तक नहीं जा सकता था। लेकिन जब उसने उसको ऋत के पाश से देव-हवि के रूप में बाँध लिया तब मनुष्य उसके पास जा सकता है, इसलिए कहा 'धर्षा मानुषः' ॥२॥ अब वह उस (पशु) को यूप में बाँधता है, इस मन्त्रांश से- "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे- ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नीषोमाभ्यां जुष्टं नियुनज्मि" (यजु० ६।१६) - "देव सविता की प्रेरणा से दोनों अश्विनों के बाहुओं और पूषा के हाथों से तुझको अग्नि और सोम का प्रिय बनाता हूँ।" जिस प्रकार एक देवता को निर्दिष्ट करके हवि की आहुति दी जाती है, उसी प्रकार दो देवताओं को निर्दिष्ट करके आहुति दी जाती है। अब वह जल-सिंचन करता है। जल-सिंचन का वही एक तात्पर्य है अर्थात् यज्ञ के लिए पवित्र करना ॥३॥ वह इस मन्त्र से जल-सिंचन करता है- "अद्भ्यस्त्वौषधीभ्यः" (यजु० ६।१६) - "तुझको जलों और ओषधियों के लिए।" जिससे उस (पशु) की स्थिति है उसी से उसको पवित्र करता है। क्योंकि जब जल बरसता है तब पृथिवी पर ओषधियां उत्पन्न होती हैं। ओषधियों को खाकर

न्मेधं करोति ॥४॥ अनु॑ वा मा॒ता म॑न्यता॒मनु॑ पि॒तेति॑ । स हि मातुश्चाधि पितु- श्च जाय॑ते॒ तद्यत॑ एव जाय॑ते॒ तत॑ एवैतन्मेधं करोत्यनु॒ भ्राता सगर्भ्यो॑ऽनु सखा॑ स॒यूथ्य॒ इति स यत्ते॒ जन्म॒ तेन॒ ह्यनु॑मतमा॒रभ॑ऽ इ॒त्येवैतदाहाग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामीति तद्याभ्यां देवताभ्यामारभते ताभ्यां मेधं करोति ॥५॥ अथोप॑गृह्णाति । अ॒पां पेरुर॑सीति तदेनमन्तरतो मेधं करोत्यधस्तादपोद्भात॒यापो॑ दे॒वीः स्वद॑न्तु स्वात्तं॑ चित्सद्देव॒हवि॒रिति॒ तदेनᳪ सर्व॑तो मेधं करोति ॥६॥ अथाहाग्नये समि- ध्यमानायानुब्रूहीति । स उत्तरमाघारमाघार्यासंस्पर्शयन्त्स्रुचौ पर्येत्य जुह्वा पशुᳪ समनक्ति शिरो वै यज्ञस्योत्तर आघार एष वाऽअत्र यज्ञो भवति यत्पशूस्तद्यज्ञ ऽएवैतच्छिरः प्रतिदधाति तस्माज्जुह्वा पशुᳪ समनक्ति ॥७॥ स ललाटे समनक्ति । सं ते प्राणो वातेन गच्छतामिति समङ्गानि यज्ञैरित्यᳪसयोः सं यज्ञपतिराशिषेति श्रोण्योः स यस्मै कामाय पशुमालभते तत्प्राप्नुहीत्येवैतदाह ॥८॥ इदं वै पशोः संज्ञप्यमानस्य । प्राणो वातमपिपद्यते तत्प्राप्नुहि यत्ते प्राणो वातमपिपद्यातां ऽइत्येवैतदाह समङ्गानि यज्ञैरित्यङ्गैरर्वाऽअस्य यज्ञस्ते तत्प्राप्नुहि यत्तेऽङ्गैर्र्यज्ञाप्ता ऽइत्येवैतदाह स यज्ञपतिराशिषेति यजमानाय वाऽएतेनाशिषमाशासते 'तत्प्राप्नु- हि यञ्चया यजमानायाशिषमाशासाताऽइत्येवैतदाह सादयति स्रुचावथ प्रवराया- श्रावयति सोऽसावेव बन्धुः ॥९॥ अथ द्वितीयमाश्रावयति । द्वौ ह्यत्र होतारौ भवतः स मैत्रावरुणायाह्नैवाश्रावयति यजमानं त्वेव प्रवृणीतेऽग्निर्द् दैवीनां वि- शां पुरए॒तेत्यग्निर्हि दे॒वतानां मुखं तस्मादाहाग्निर्ह दै॒वीनां विशां पुरए॒तेत्ययं य- जमानो मनुष्याणामिति तᳪ हि सोऽन्वर्थी भवति यस्मिन्नर्थे यजते तस्मादाहायं यजमानो मनुष्याणामिति तयो॒रस्तूरि॒ गार्हपत्यं॑ दीद्यच्छ॒तᳪ हि॒मा द्वा यूऽइति तयो- र्नाता॑नि॒ गार्हपत्यानि शतं वर्षाणि सन्त्वित्येवैतदाह ॥१०॥ राधाᳪसीत्सम्पृ- ञ्चाना॒वसम्पृञ्चानौ त॒न्व॒ इति॑ । राधाᳪस्येव सम्पृञ्चाथां मापि तनूरित्येवैतदाह तौ

कां० ३, अ० ७, ब्रा० ४, कं० ४-११ शतपथब्राह्मण / ४७३ और पानी को पीकर रस बनता है, रस से वीर्य, वीर्य से पशु । इसलिए जिससे उत्पन्न होता या जन्मता है उसीसे उसको पवित्र करता है ॥४॥ “अनु त्वा माता मन्यतामनु पिता” (यजु० ६।६)-'तेरी माता तुझे अनुमति दे और तेरा पिता ।' क्योंकि माता और पिता से उसकी उत्पत्ति है। इसलिए जिससे उसका जन्म हुआ है उसी से उसकी यज्ञ के लिए पवित्रता करता है। “अनु भ्रातासगर्म्योऽनु सखा सयूथ्यः” (यजु० ६।६) -'तेरा ही सगा भाई, तेरे ही दलवाला सखा ।' इसका तात्पर्य यह है कि जो तेरे रिश्तेदार हैं उनकी अनुमति लेता हूँ। “अग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि” (यजु० ६।६)-"अग्नि और सोम की प्रसन्नता के लिए तुझ पर जल छिड़कता हूँ।" अर्थात् जिन दो देवतों के लिए मारता है उन्हीं के लिए पवित्र करता है। (आ+रभ का अर्थ 'मारना' लिया है। यह विचारणीय है) ॥५॥ इस मंत्रांश से (जल को पिलाने के लिए) लेता है-“अपां पेरुरसि” (यजु० ६।१०)- "तू जलों का पीनेवाला है।" इससे वह उसकी आन्तरिक शुद्धि करता है। अब (शरीर के निचले भाग को) धोता है, इस मन्त्र से-“आपो देवीः स्वदन्तु स्वात्तं चित् सद् देवहविः” (यजु० ६।१०)-"दिव्य जल तुझको सच्ची देवहवि के लिए स्वादिष्ट बनावे।" इस प्रकार वह इसको हर प्रकार से यज्ञ के लिए पवित्र कर देता है ॥६॥ अब वह (होता से) कहता है-'प्रज्वलित अग्नि के लिए मन्त्र बोल ।' पिछली आधार-आहुति देकर स्रुचों को बिना छुए हुए जब वह अपने स्थान पर लौटकर आता है तो जुहू में बचे हुए घी से पशु को चुपड़ता है। पिछली आधार-आहुति यज्ञ का शिर है। और यह जो पशु है वह यज्ञ है। यह पशु का घी से चुपड़ना ऐसा है जैसा यज्ञ के सिर लगा देना ॥७॥ वह ललाट में घी लगाता है, इस मन्त्रांश से-“सं ते प्राणो वातेन गच्छताम्” (यजु० ६।१०)-"तेरे प्राण वायु से मिल जावें ।" इस मन्त्रांश से कन्धों पर-“समङ्गानि यजत्रैः” (यजु० ६।१०)-"तेरे अङ्ग यज्ञ करनेवालों से मिलें।" इस मन्त्रांश से पिछाड़ी पर-“सं यज्ञपतिराशिषा” (यजु० ६।१०)-"यज्ञपति आशीर्वाद से मिले।" इसका तात्पर्य यह है कि जिस किसी कार्य के लिए पशु का बलि दी गई हो उसी की प्राप्ति हो ॥८॥ बलि दिये हुए पशु के प्राण वायु में मिल जाते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि ऐसा कर कि तेरे प्राण वायु में मिल जायें, अर्थात् तेरे प्राण वायु में मिल जायें, 'यज्ञ करनेवालों से तेरे अंग मिल जायें'; इसलिए कहता है कि अंगों से ही तो यज्ञ किया जाता है अर्थात् ऐसा कर कि अंगों से यज्ञ हो जाय । 'यज्ञपति आशीर्वाद से' ये शब्द इसलिए कहे जाते हैं कि यह आशीर्वाद है अर्थात् 'हे यजमान, तुझे यह आशीर्वाद दिया जाता है।' अब वह दोनों स्रुचों को रखकर होता के प्रवर (निर्वाचन) के लिए प्रौषट् कहता है। उसका वैसा ही तात्पर्य है ॥६॥ अब वह द्वितीय श्रौषट् कहता है। यहाँ दो होता होते हैं। वह मित्र-वरुण के लिए श्रौषट् कहता है। यजमान का वरण करता है जब कहता है कि 'अग्नि ही दैवी मनुष्यों के आगे चलता है।' अग्नि देवों का मुख है इसलिए कहा 'अग्नि ही दैवी मनुष्यों के आगे चलता है।' 'मनुष्यों का यजमान' इसलिए कि जिन लोकों में वह यज्ञ करता है वे उससे नीच हैं। इसलिए वह कहता है कि 'यजमान मनुष्यों का (सिर) है।' अब कहता है, "इन दोनों के घर चमकें, न एक बैल से, सौ वर्ष तक दो से।' अर्थात् उनके घर सौ वर्ष तक आपत्तियों से मुक्त रहें ॥१०॥ अब वह कहता है-'वैभव मिल जाय, न कि शरीर' इसका तात्पर्य यह है कि 'तुम

अध्याय-८, ब्राह्मण-१

४७४ शतपथ ब्राह्मण

हु॒ यत्त॒नूरपि॑ सम्पृ॒च्योयाता॑म् प्रा॒म्रिय॑त॒मानं॑ द॒हेत्स॒ यद॒ग्नौ जुहो॑ति तदे॒षोऽग्नये॑ प्रय- क्त्यय॒ यामि॒वात्रा॒ऽर्त्विजो॒ यज॑मानाया॒शिष॒माशा॑सते॒ तामस्मै॒ सर्व्वाम॒ग्निः स॒मर्धय॑ति तद्रा॒धाꣳस्ये॒व सम्पृ॑ञ्चाते॒ नापि॑ त॒नूस्तस्मादाह॒ राधा॑ꣳसीत्सम्पृञ्चानाव॒सम्पृ॑ञ्चानौ त॒न्व॒ इति॑ ॥ ११॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [७.४.] ॥ सप्तमोऽध्यायः [२२] ॥ ॥ तद्य॒त्रैतत्प्रवृ॑तो॒ होता॑ होतृष॒दन॒ऽउप॒विश॑ति । तदुप॒विश्य॑ प्र॒स्तौति॒ प्रसू॑तो ऽध्व॒र्युः स्रुचावा॒दत्ते॑ ॥ १॥ अ॒थाप्रीभि॒श्चर॑न्ति । तद्यदा॒प्रीभि॒श्चर॑न्ति॒ सर्व्वे॑णेव॒ वाऽए॒ष मन॑सा॒ सर्व

कां० ३, अ० ७-८, ब्रा० ४-१, कं० ११ व १-७ शतपथब्राह्मण / ४७५ अपने वैभव को ही मिलाओ, शरीरों को नहीं।' क्योंकि अगर वह मिला दें तो अग्नि उस यजमान को जला देगी। जब कोई अग्नि में आहुति देता है तो मानो अग्नि के अर्पण करता है। और ऋत्विज लोग जो आशीर्वाद यजमान को देते हैं अग्नि उन सबका सम्पादन करता है। इस प्रकार ये अपने वैभव को ही जोड़ते हैं, न कि शरीरों को। इसीलिए कहता है कि 'अपने वैभव को मिलाओ, न कि शरीरों को' ॥११॥ अध्याय ८—ब्राह्मण १ इस प्रकार चुना जाकर होता, होता के स्थान में बैठता है, बैठकर प्रेरणा करता है और अध्वर्यु प्रेरित होकर दो स्रुचों को लेता है ॥१॥ अब वे आप्रि मन्त्रों से कार्य करते हैं। आप्रि मन्त्रों से क्यों करते हैं? इसलिए कि जो दीक्षा लेता है वह अपने सब मन से और सम्पूर्ण आत्मा से यज्ञ की तैयारी करता है। उसका आत्मा खाली-सा हो जाता है। इन आप्रि मन्त्रों से वे उसको भर-सा देते हैं। और चूंकि वे इनसे भरते हैं इसलिए इनका नाम आप्रि है ॥२॥ ये ग्यारह प्रयाज होते हैं। इस पुरुष में दस प्राण हैं और ग्यारहवां आत्मा है, जिसमें ये दसों प्राण स्थापित हैं। इतना सम्पूर्ण पुरुष है। इस प्रकार ये उसको पूर्ण कर देते हैं। इसलिए ग्यारह प्रयाज होते हैं ॥३॥ (अध्वर्यु) आग्नीध्र में श्रौषट् कहकर (मैत्रावरुण से) कहता है—'समिधाओं के लिए प्रेरणा कर।' इस प्रकार 'प्रैष्य'-'प्रैष्य' कहकर हर चौथी आहुति में घी को साथ-साथ छोड़ता हुआ दस प्रयाजों का कार्य करता है। दस प्रयाजों को कहकर कहता है, 'शास (घातक) को लाओ।' शास नाम है 'असि' या तलवार का ॥४॥ अब वह यूप के टुकड़े को लेता है। और इन दोनों (अर्थात् शास और यूप-शकल) को जुहू में से घी लगाकर उनसे पशु के ललाट को छूता है—"घृतेनाक्तौ पशूंस्त्रायेथाम्" (यजु० ६।१९)—"घृत से युक्त तुम दोनों पशुओं की रक्षा करो।" यूप-शकल वज्र है। शास वज्र है। आज्य (घृत) वज्र है। इन सबको मिलाकर वज्र बनाकर उसको उस पशु का रक्षक नियत करता है जिससे दुष्ट राक्षस उसकी हिंसा न कर सकें। अब यूप के टुकड़े को छिपा देता है और (घातक के हाथ में) शास को देकर कहता है कि यह प्रज्ञात (स्वीकृत) धार है। और दोनों स्रुचों को रख देता है ॥५॥ अब (होता से) कहता है कि परि-अग्नि के लिए अनुवाक कह। (इस पर होता ऋग्वेद ४।१५।१-३ को पढ़ता है)। आग्नीध्र आग की लकड़ी को लेकर (पशु के) चारों ओर फिराता है। वह अग्नि को चारों ओर इसलिए फिराता है कि चारों ओर से छिद्र-रहित परिखा बन जाय और दुष्ट राक्षस उसको सता न सकें। अग्नि ही राक्षसों का घातक है, इसलिए अग्नि को चारों ओर फिराता है। जहाँ उसे पकाते हैं वहाँ वह अग्नि को फिराता है ॥६॥ कुछ लोगों का कहना है कि उस लकड़ी को फिर वापस (आहवनीय तक) ले जाना चाहिए और अन्य अग्नि का मन्थन करके उससे पकाना चाहिए, क्योंकि यह आहवनीय है और इसमें कच्चे को पकाना ठीक नहीं। यह तो इसलिए है कि पके-पकाये की आहुति दी जाय ॥७॥

कुङ्गु॒रिति॑ ॥७॥ तद्वै॒ तथा॑ न कु॒र्यात् । य॒था वै ग्रसि॒तमे॒वम॒स्यैतद्भवति॒ यदे॑नेन॒ प॒र्य॒ग्निं क॒रोति॒ स य॒था ग्रसि॒तमनुहा॒याच्छि॒द्य तद॒न्यस्मै॑ प्रय॒च्छेद्वं तत्त्स्मा॑देतस्यै- वो॒ल्मुकस्या॒ङ्गारान्निनृ॑द्य॒ तस्मि॑न्नेनं श्रपयेयुः ॥८॥ अथो॒ल्मुकमा॒दाया॒ग्नीत्पु॒रस्ता॒त्प्र- ति॒पद्य॑ते । अ॒ग्निमे॒वैतत्पु॒रस्ता॒त्करोत्य॒ग्निः पु॒रस्ता॒न्नाष्ट्रा रक्षारं॒स्यप॑घ्नन्नेत्यथाभ॑येना- नाष्ट्रेण॑ प॒शुं न॑यन्ति॒ तं व॒पाश्र॑पणीभ्यां प्रतिप्रस्था॒तान्वा॑रभते प्रतिप्रस्था॒तार॑मध्व॒र्यु- र्ध्व॒र्युं यज॑मानः ॥ ९॥ तदा॑हुः । नैष यज॑मानेनान्वार॒भ्यो मृ॒त्यवे॒ ह्येतं नय॑न्ति॒ त- स्मान्नान्वा॑रभेतेति॒ तद्वन्वे॑वारभेत॒ न वाऽए॒तं मृ॒त्यवे॑ नय॑न्ति॒ यं य॒ज्ञाय॑ नय॑न्ति॒ तस्मा॒दन्वे॑वारभेत यज्ञा॒डु हैवात्मानमन्तरियाद्यन्नान्वा॑रभेत॒ तस्मा॒दन्वे॑वारभेत त- त्परो॒ऽक्षमन्वा॑रब्धं भवति वपाश्रपणीभ्यां प्रतिप्रस्था॒ता प्रतिप्रस्था॒तार॑मध्व॒र्युर्ध्व॒र्युं यज॑मान ए॒तडु परो॒ऽक्षमन्वा॑रब्धं भवति ॥१०॥ अथ॒ स्तीर्णा॑यै वेदेः । द्वे तृणे ऽअध्व॒र्युरा॒दत्ते॒ स आ॒श्राव्या॒होपैष्व॒ होत॑र्ह॒व्या दे॒वेभ्य॒ इत्ये॒तद्वै वैश्वदे॒वं प॒शौ ॥ ११॥ अथ॑ वाचयति । रेव॑ति य॒जमान॒ऽइति॑ वाग्वै रेव॑ती सा यद्वाग्ब॒द्ध वद॑ति तेन॒ वाग्रेव॑ती प्रि॒यं धा आ॒विशेत्य॒नार्तिमाविशेत्ये॒वैतदा॒होर॒न्तरि॑क्षात्स॒न्तू॑र्द्व- वेन॒ वाते॑नेत्य॒न्तरि॑क्षं वाऽअनु॒ रक्ष॑श्च॒रत्यमूल॒मुभ॑यतः परिच्छिन्नं॒ यथा॒यं पुरु॑षोऽमू- ल उभ॑यतः परिच्छिन्नो॒ऽन्तरि॑क्षम॒नुच॑रति॒ तद्वाते॑नैव संविदा॒नान्तरि॑क्षाद्गोपायेत्ये- वैतदा॒ह यदा॒होरु॒न्तरि॑क्षात्स॒न्तू॑र्द्ववेन॒ वाते॑नेति ॥ १२॥ अस्य ह॒विष्स्त्॒मना यजे- ति । वाच॑मे॒वैतदाहा॒नार्तस्यास्य ह॒विष् स्त्॒मना यजेति॒ सम॑स्य त॒न्वा॑ भवेति॒ वाच॑मे॒वैतदाहा॒नार्तस्यास्य ह॒विष्स्त॒न्वा सम्भ॑वेति ॥ १३॥ तद्यत्रे॑नं विशस॑न्ति । तत्पु॒रस्ता॒त्तृण॒मुपा॑स्यति॒ वर्षि॑ वर्षियसि य॒ज्ञे य॒ज्ञपतिं॑ धा॒ इति॑ ब॒र्हिरे॒वास्मा॒ऽए- तत्स्तृणात्यस्कन्नं ह॒विर॑सदिति॒ तद्य॒द्देवा॑स्या॒त्र विश॒स्यमा॑नस्य॒ किंचि॑त्स्कन्द॑ति तदे॒तस्मिन्प्रतिति॑ष्ठति॒ तथा॒ नामुया॑ भव॑ति ॥ १४॥ अथ पुन॒रेत्याहवनीयम॒भ्यावृ॑- त्यासते । नेद॒स्य संशम्यमानस्याध्यक्षा अ॒सामेति॒ तस्य न कूटेन॒ प्रघ्न॑न्ति॒ मानुषं॑

कां० ३, अ० ८, ब्रा० १, कं० ८-१५ शतपथब्राह्मण / ४७७ परन्तु ऐसा न करना चाहिए। अग्नि जिसके चारों ओर फिरा ली गई वह तो अग्नि से ग्रसित हो गया। इसका अर्थ यह होगा कि जो ग्रसित हो चुका उसको छीनकर दूसरे को दे.दिया गया। इसलिए इस लकड़ी से ही अंगारों को लेकर उसमें पका लेना चाहिए ॥८॥ अब आग्नीध्र एक और जलती लकड़ी लेकर आगे आता है। इस प्रकार वह अग्नि को आगे रखता है कि वह दुष्ट राक्षसों को दूर भगा देगी। और भयरहित मार्ग से पशु को ले जाता है। दोनों वपाश्रपणियों से प्रतिप्रस्थाता उस (आग्नीध्र) को देता है। प्रतिप्रस्थाता को अध्वर्यु देता है और अध्वर्यु को यजमान ॥९॥ इस पर कुछ लोग कहते हैं कि यजमान न पकड़े। क्योंकि उसको मृत्यु के लिए ले जाते हैं, इसलिए उसको नहीं थामना चाहिए। परन्तु उसको थामना चाहिए ही, क्योंकि जिसको यज्ञ के लिए ले जाते हैं उसे मृत्यु के लिए नहीं ले जाते। दूसरे यह कि यदि वह न थामेगा तो अपने को यज्ञ से हटा लेगा, इसलिए उसे थामना अवश्य चाहिए। यह एक प्रकार का परोक्ष थामना है अर्थात् वपाश्रपणियों द्वारा प्रतिप्रस्थाता थामता है। प्रतिप्रस्थाता को अध्वर्यु देता है और अध्वर्यु को यजमान। इस प्रकार यह थामना परोक्ष प्रकार का है ॥१०॥ अब छायी हुई वेदी में से अध्वर्यु दो तृण निकालता है, और श्रौषट् कहकर कहता है— 'होता, देवों के लिए हव्य ला।' पशु-याग १ में यह विश्वेदेवों का भाग है ॥११॥ अब वह यजमान से कहलवाता है—"रेवति यजमाने" (यजु० ६।११)—"हे भाग्यवती, तू यजमान में।" वाणी रेवती है क्योंकि वह बहुत बोलती है, इसलिए वाणी रेवती हुई। "प्रियं धाऽआविश" (यजु० ६।११) —"प्रिय को धारण कर। तू आ।" अर्थात् तू बिना आपत्ति के आ। "उरोरन्तरिक्षात् सजूर्देवेन वातेन" (यजु० ६।११) —"विस्तृत अन्तरिक्ष से दैवी वायु के द्वारा।" जिस प्रकार मनुष्य बिना किसी जड़ के स्वच्छन्दता से अन्तरिक्ष में विचरता है, इसी प्रकार राक्षस भी अन्तरिक्ष में बिना किसी मूल के विचरता है। (नोट-पेड़ की मूल होती है, वह स्थावर है। राक्षस और मनुष्य दोनों जंगम हैं)। यह जो कहा कि 'विस्तृत अन्तरिक्ष से दैवी वायु के द्वारा' इसका तात्पर्य है कि वायु से मिलकर इसकी अन्तरिक्ष से रक्षा कर ॥१२॥ "हविष्पस्तमना यज" (यजु० ६।११) —"हवि की आत्मा से यज्ञ कर।" अर्थात् वाणी से कहता है कि हवि की आत्मा से यज्ञ कर। "समस्य तन्वा भव" (यजु० ६।११) —अर्थात् वाणी से कहता है कि इस हवि की आत्मा के साथ संयुक्त हो ॥१३॥ जहाँ उसको मारते हैं उसके सामने तृण को फेंकते हैं। "वर्षो वर्षीयांसं यज्ञे यज्ञपतिं धाः" (यजु० ६।११) —"हे महान्, इस महान् यज्ञ में यज्ञपति को ले जा।" इस प्रकार कुशों को नीचे बिछा देता है कि हवि का कोई भाग भी नष्ट न हो सके। इस प्रकार काटने में जो कुछ नीचे गिरता है वह इन्हीं कुशों में गिरता है। इस प्रकार नष्ट नहीं होता ॥१४॥ अब आहवनीय की ओर जाकर उधर को मुंह करके बैठते हैं कि इस कटते हुए को देख न लें। वे इसको 'कूट' अर्थात् सामने की हड्डी से नहीं काटते; यह मानुषी विधि है। न कान के

१. 'पशु-याग' वेद-विरुद्ध एवं प्रक्षिप्त है। मन्त्रांश (यजु० ६-११) स्पष्ट कहता है—'पशून्- स्त्रायेश्चाम्' अर्थात् 'पशुओं की रक्षा करो'। —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

अध्याय-८, ब्राह्मण-२

हि॒ तन्नोऽए॒व पश्चात्कर्णं पितृ॒देव॒त्य॑ हि॒ तद॒पिगृह्य॑ वैव मुखं॑ तमयन्ति वेष्कं॑ वा कुर्वन्ति॒ तन्नाह॒ जहि॒ मारे॒येति॑ मानुष॒ꣳ हि॒ तत्संज्ञ॑पयान॒वग॑न्निति॒ तद्धि॑ दे॒वत्रा स यदाहा॒न्वग॑न्नित्येतर्हि॒ ह्येष॑ दे॒वाननुग॒च्छति॒ तस्मादाहा॒न्वग॑न्निति ॥ १५॥ तथ॑- त्रे॒नं निविध्यन्ति । तत्पु॒रा संज्ञ॑पनाज्जुहोति स्वाहा॑ दे॒वेभ्य॒ इत्य॑थ यदा॒ प्राहु॒ सं- ज्ञप्तः प॒शुरित्य॑थ जुहोति दे॒वेभ्यः॒ स्वाहेति॑ पु॒रस्तात्स्वाहा॑कृतयो वाऽअ॒न्ये देवा॑ उपरि॑ष्टात्स्वाहा॑कृतयोऽन्ये ताने॒वैतत्प्रीणाति॒ तऽएनमुभये॑ दे॒वाः प्रीताः॒ स्वर्गं॑ लो॒कम॒भिव॑हन्ति ते वाऽए॒ते परि॑पशव्ये॒ऽइत्याहुती॒ स यदि॑ कामयेत जुहुया॒दिते यद्यु॑ कामये॒तापि॑ नाद्रियेत ॥ १६॥ ब्राह्मणम् ॥ २ [८. १.] ॥ ॥ यदा॒ प्राहु॒ संज्ञ॑प्तः प॒शुरिति॑ । अथा॑ध्व॒र्युराह॒ नेष्टः॒ पत्नी॒मुदानये॒त्युदानयति नेष्टा पत्नीं॑ पाने॒जनं॒ बिभ्र॑तीम् ॥ १॥ तां वाचयति । नम॑स्तऽअतात॒नेति॑ य॒ज्ञो वाऽआ- तानो॒ यज्ञꣳ हि॑ तन्व॑ते॒ तेन॑ य॒ज्ञ आत॑ता॒नो ऽथ॒नार्थी वाऽए॒ष य॒ज्ञस्य॒ यत्पत्नी॑ तामेतत्प्राचीं॑ य॒ज्ञं प्रसा॒दयि॑ष्य॒न्वद॑ति॒ तस्मा॑दुवैतद्य॒ज्ञाय॑ निह्लुते तथो॒ हैनामे॒ष य॒ज्ञो न॑ हिनस्ति॒ तस्मा॑दाह॒ नम॑स्तऽआतात॒नेति॑ ॥ २॥ अन॑र्वा॒ प्रेहीति॑ । असप- त्नेन प्रेहीत्ये॒वैतदा॒ह घृ॒तस्य॒ कुल्या॒ उप॑ऽऋत॒स्य प॒थ्या॒ अन्वि॑ति साधू॒पेत्ये॒वैतदा॒ह दे॒वीरापः॒ शुद्धा वोढुꣳ सु॒परिविष्टा दे॒वेषु॑ सु॒परिविष्टा व॒यं परि॑वे॒ष्टारो॑ भूयास्मे- त्यप॒ ए॒वैतत्पावयति ॥ ३॥ अथ पशोः प्राणा॒नद्भिः॒ पत्न्यु॒पस्पृ॑शति । तद्यद॒द्भिः॒ प्रा- णा॒नुपस्पृ॑शति । जीवं॒ वै दे॒वानाꣳ ह॒विर॒मृतम॒मृताना॒मथैतत्प॒शुं घ्न॑न्ति॒ यत्संज्ञप- य॑न्ति यद्विशसत्यापो॒ वै प्रा॒णास्तद॑स्मिन्ने॒तान्प्राणा॒न्दधा॑ति तथैतत्सजीवमे॒व दे॒वानाꣳ ह॒विर्भव॒त्यमृ॑तममृ॒तानाम् ॥ ४॥ अथ॒ यत्पत्न्युपस्पृ॑शति । योषा॒ वै पत्नी॒ योषा॑यै वाऽइ॒माः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ तदे॑नमेत॒स्यै योषा॑यै प्र॒जनयति॒ तस्मा॑त्पत्न्यु॒पस्पृ॑शति ॥ ५॥ सोपस्पृ॑शति । वाचं॑ ते शुन्धामीति॒ मुखं॑ प्रा॒णं ते शुन्धामीति॒ नासि॑के च- क्षुस्ते॑ शुन्धामीत्य॒क्ष्यौ श्रोत्रं॑ ते शुन्धामीति॒ क॒र्णौ नाभिं॑ ते शुन्धामीति॒ योऽयम्-

कां० ३, अ० ८, ब्रा० १-२, कं० १५-१६ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४७६ पीछे से; यह पितरों की विधि है। या तो उसका मुंह बन्द करके घोंट देते हैं या फन्दा डाल देते हैं। इसलिए ऐसा नहीं कहते 'इसको मार।' यह तो मनुष्यों की भाषा है। किन्तु कहते हैं 'संज्ञपय, अन्वगन्' (इसको शान्त कर दे। यह चला गया)। यह देवों की भाषा है। जब कहते हैं कि 'अन्वगन्' (चला गया) तो यजमान देवों के पास चला जाता है। इसलिए कहते हैं 'अन्वगन्' (चला गया) ॥१५॥ जब ये इसको पकड़कर नीचे गिरा लेते हैं तो संज्ञपन (गला घोंटने) से पहले आहुति देते हैं “स्वाहा देवेभ्यः” (यजु० ६।११)। जब मारनेवाला कहता है 'संज्ञप्तः पशुः' (अर्थात् पशु शान्त हो गया) तो एक आहुति देते हैं-“देवेभ्यः स्वाहा” (यजु० ६।११)। इस प्रकार कुछ देवों के पहले 'स्वाहा' कहा जाता है और कुछ के पीछे। इस प्रकार इन सबको प्रसन्न करता है। इस प्रकार दोनों प्रकार के देव प्रसन्न होकर उसको स्वर्गलोक को ले जाते हैं। ये 'परिपशव्य' आहुतियां हैं। चाहे तो इनकी आहुति दे, चाहे न दे। यदि इच्छा हो तो इनका आदर न करे ॥१६॥ अध्याय ८—ब्राह्मण २ जब घातक ने कहा कि पशु शान्त हो गया तो अध्वर्यु कहता है 'नेष्टा पत्नी को ला।' तब नेष्टा पत्नी को लाता है। उसके हाथ में पैर धोने के लिए पात्र में जल होता है ॥१॥ अब वह उस पत्नी से कहलवाता है—"नमस्तऽआतान" (यजु० ६।१२) - "हे फैले हुए, तुझे नमस्कार हो।" 'फैला हुआ' यज्ञ है क्योंकि यज्ञ फैलाया जाता है, इसलिए यज्ञ का नाम 'आतान' है। यह जो पत्नी है, वह यज्ञ का पिछला अर्द्धभाग है। उसको यज्ञ को प्रसन्न करने के हेतु आगे की ओर बुलाता है। इस प्रकार वह यज्ञ की त्रुटि को पूरा करती है, और यज्ञ उसकी हानि नहीं करता। इसलिए कहा 'यज्ञ, तुझे नमस्कार हो' ॥२॥ “अनर्वा प्रेहि” (यजु० ६।१२) - अर्थात् "स्वच्छ चल।" - "घृतस्य कुल्याऽउपऽऋतस्य पन्थाऽअनु” (यजु० ६।१२) - "घी की नदियों में या सत्यता की गलियों में।" अर्थात् कल्याण- मार्गों में जा। “देवीरापः शुद्धा वोढ्वं, सुपरिविष्टा देवेषु सुपरिविष्टा वयं परिवेष्टारो भूयास्म” (यजु० ६।१३) - "हे दैवी जलो ! भलीभांति तैयार होकर तुम देवों को प्राप्त होओ। हम भलीभांति तैयार हो जावें।" इस प्रकार वह जल को पवित्र करती है ॥३॥ अब पत्नी पशु के प्राणों को जलों से स्पर्श करती है। वह प्राणों को जलों से इसलिए स्पर्श करती है कि देवों की हवि जीव है—अमृतों की अमृत। संज्ञपन में पशु को मारते हैं। जल प्राण है, इस प्रकार इसमें प्राणों को धारण कराती है। इस प्रकार 'देवों' का हवि जीव हो जाता है—अमृतों का अमृत ॥४॥ पत्नी क्यों स्पर्श करती है ? पत्नी स्त्री है। स्त्री से ही प्रजा उत्पन्न होती है। इसको इस प्रजा को स्त्री से उत्पन्न कराता है, इसलिए पत्नी ही इसका स्पर्श करती है ॥५॥ वह इस प्रकार स्पर्श करती है—"वाचं ते शुन्धामि” से मुख को (यजु० ६।१४)। “प्राणं ते शुन्धामि” से नासिका को। “चक्षुस्ते शुन्धामि” से आँखों को। “श्रोत्रं ते शुन्धामि” से कानों को। "नाभिं ते शुन्धामि" से अस्पष्ट प्राण को। "मेढ्रं ते शुन्धामि" या "पायुं ते शुन्धामि" से

४८० शतप॑थ ब्रा॒ह्म॒ण नि॒रुक्तः॑ प्रा॒णो मेढ्रं॑ ते शुन्धामी॒ति वा पा॒युं ते॑ शुन्धामी॒ति योऽयं प॒श्चात्प्रा॒णास्त- त्प्रा॒णा॒न्दधा॑ति॒ तत्स॒मीर॑य॒त्यथ सं॑कृत्य॒ पद्भिश्चरि॑त्रांस्ते शुन्धामी॒ति प॒द्भिवै प्रति॑ति- ष्ठति॒ प्रति॑ष्ठित्याऽए॒व त॒देनं॑ प्रति॒ष्ठाप॑यति ॥६॥ अथ॒ या आपः॑ परि॒शिष्य॑न्ते । अ॒र्द्धा वा याव॑त्यो वा ताभि॒रेनं॒ यज॑मानश्च शी॒र्षतो॑ऽग्रे॒ऽनुषि॑ञ्चतस्तत्प्रा॒णांश्चैवा- स्मिंस्तत्तौ ध॑त्तस्त॒द्यैन॑मतः समी॒रय॑तः ॥७॥ तद्यत्क्रू॒रीकु॒र्वन्ति॑ । य॒दास्या॒पय॑न्ति शा- न्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शा॒न्त्या श॑मय॒तस्तद॒द्भिः सं॑धत्तः ॥८॥ ताव॑नुषि॑ञ्चतः । मन॑स्त॒ऽआ- प्यायतां॒ वाक्त॒ऽआ॑प्यायतां प्रा॒णस्त॒ऽआ॑प्यायतां॒ चक्षु॑स्त॒ऽआ॑प्यायता॒ꣳ॒ श्रोत्रं॑ त॒ऽआ- प्यायता॒मिति॑ तत्प्रा॒णान्वे॒त्तत्स॒मीर॑यतो य॒त्ते क्रू॒रं यदा॑स्थि॒तं तत्त॒ऽआ॑प्यायतां निष्ठीयता॒मिति॑ ॥९॥ तद्यत्क्रू॒रीकु॒र्वन्ति॑ । य॒दास्या॒पय॑न्ति शा॒न्तिराप॒स्तद॒द्भिः शा- न्त्या श॑मय॒तस्तद॒द्भिः सं॑धत्त॒स्त॒त्ते शुध्य॑त्विति॒ तन्मेध्यं॑ कुरुतः शम॒द्भोभ्य॒ इति॒ शश॑ने- न प॒शुं न॑िनयतः ॥१०॥ तद्यत्क्रू॒रीकु॒र्वन्ति॑ । य॒दास्या॒पय॑न्ति॒ नेदे॑त॒दन्व॑शा॒न्तान्य- हो॑रा॒त्राण्यस॒न्निति॒ तस्मा॒द्द्मद्भोभ्य॒ इति॒ शश॑नेन प॒शुं नि॑नयतः ॥११॥ अथो॑त्ता॒नं प॒शुं पर्य॑स्यन्ति । स तृण॒मन्त॑र्दधात्योषधे॒ त्राय॑स्वेति वज्रो वाऽअ॒सिस्तथो॒ हैन॑मेष वज्रोऽसि॑र्न हिनस्त्य॒थासि॑नाभि॒निद॑धाति॒ स्वधि॑ते॒ मैनꣳ॑ हिꣳसी॒रिति॒ वज्रो वा॒ऽअ- सिस्तथो॒ हैन॑मेष वज्रोऽसि॑र्न॒ हिन॑स्ति ॥१२॥ सा या प्र॒ज्ञाता॒ग्रिः॑ । तया॑भि॒निद॑- धाति॒ सा हि य॒ज्ञुकृता॒ मेध्या॒ तद्यदग्रं॒ तृण॑स्य॒ तत्स॒व्ये पा॒णौ कु॑रुते॒ऽथ यद्बुध्नं॑ त- द्दक्षि॑णेनाद॒त्ते ॥१३॥ स यत्रा॒ह्यति॑ । यत ए॒तल्लोहि॑तमुत्प॒तति॒ तदु॑भयतो॒ऽनक्ति॑ र॒क्षसां॑ भा॒गोऽसीति॑ र॒क्षसा॒ꣳ ह्ये॑ष भा॒गो यदसृ॑क् ॥१४॥ तदु॒पास्या॑भिति॒ष्ठति॑ । इ॒दम॒हꣳ रक्षो॒ऽभि॑तिष्ठामी॒दम॒हꣳ रक्षो॒ऽवबा॑ध॒ऽइ॒दम॒हꣳ रक्षो॒ऽधमं॒ तमो॑ नयामी- ति नह्ये॑तेनैवैतन्नाष्ट्रा रक्षाꣳ॒स्यव॑बाधते तद्यद॒मूल॑मुभयतः परिच्छिन्नं॑ भवत्यमूलं॑ वा ऽइ॒दमुभयतः॑ परिच्छिन्नꣳ॑ र॒क्षोऽन्तरि॑क्षम॒नुच॑रति यथायं पुरु॑षोऽमूल॒ उभ॑यतः परि- च्छिन्नो॑ऽन्तरि॑क्षम॒नुच॑रति तस्मा॒दमू॑लमुभयतः॑ परिच्छिन्नं॑ भवति ॥१५॥ अथ वपामु-

का० ३, अ० ८, ब्रा० २, कं० ६-१५ शतपथब्राह्मण / ४८१ पीछे के प्राण को। इस प्रकार वह प्राणों को धारण कराती है अर्थात् उसको फिर जीवन देती है। “चरित्राँस्ते शुन्धामि” से पैरों को। पैरों पर खड़ा होता है अतः पैरों पर उसको खड़ा करती है, प्रतिष्ठा के लिए ॥६॥ अब जो जल बच रहे उससे या उसके आधे से अध्वर्यु और यजमान उसको स्पर्श करते हैं। सिर से लेकर। इस प्रकार वे उसमें प्राण धारण कराते हैं और उसको पुनर्जीवित करते हैं ॥७॥ इस प्रकार जहाँ कहीं वे उसको घाव लगाते हैं, वहाँ जलों से शान्ति दिलाते हैं। शान्ति- दायक जलों से शान्ति दिलाते हैं। वे उसको जलों से चंगा करते हैं ॥८॥ इन मन्त्रों से स्पर्श करते हैं— “मनस्तऽआप्यायतां वाक्तऽआप्यायतां प्राणस्तऽआप्यायतां चक्षुस्तऽआप्यायताᳪ श्रोत्रं तऽआप्यायताम्” (यजु० ६।१५)— “तेरा मन चंगा हो, तेरी वाणी चंगी हो, तेरे प्राण चंगे हों, तेरी आँखें चंगी हों, तेरे कान चंगे हों।” इस प्रकार वे इसमें प्राण धारण कराते हैं— “यत्ते क्रूरं यदास्थितं तत्तऽआप्यायतां निष्प्यायतां” (यजु० ६।१५)— “जो कुछ तेरा घाव हो, जो तुझे क्षति हो, वह सब पूरी हो जाय और तू मजबूत हो जा” ॥६॥ इस प्रकार जो कुछ घाव लगाते हैं, जहाँ कहीं चोट लगाते हैं, वहाँ शान्तिदायक जलों के द्वारा उसको चंगा कर देते हैं। उसको वे ठीक कर देते हैं। “तत्ते शुध्यतु” (यजु० ६।१५)— “इस प्रकार वे उसे शुद्ध करते हैं।” “शमहोभ्यः” (यजु० ६।१५)— “तेरे दिन कल्याणकर हों।” इससे जो जल बचता है उसको पशु के पिछले भाग में डाल देते हैं ॥१०॥ इस प्रकार जहाँ घाव करते हैं या जहाँ चोट पहुँचाते हैं वहाँ ‘शमहोभ्यः’ से जल को पशु के पिछले भाग में डाल देते हैं कि कहीं रात-दिन अहितकर न हो जायें ॥११॥ अब वे पशु को उलटा लिटा देते हैं। अब अध्वर्यु उसके ऊपर कुश रखता है, “ओषधे त्रायस्व” (यजु० ६।१५) से। असि वज्र है। इस प्रकार वह वज्र उस पशु को नहीं सताता। और असि को उसमें लगाता है, “स्वधिते मैनँ॒ हिँ॒सीः” (यजु० ६।१५)— “हे छुरा, तू इसको न सता। असि वज्र है।” इस प्रकार यह वज्र (असि) उसको हानि नहीं पहुँचाता ॥१२॥ जो प्रज्ञातधार है उसका प्रयोग करता है क्योंकि यजुः पढ़कर वह पवित्र की जा चुकी है। कुशा का जो अग्रभाग है उसे बायें हाथ में रखता है और जो नीचे का भाग है उसे दाहिने हाथ में ॥१३॥ जहाँ चमड़ा उचेला जाय या रक्त निकले वहाँ दोनों ओर से इसके नीचे के भाग में रुधिर लगा देता है, इस मन्त्र से— “रक्षसां भागोऽसि” (यजु० ६।१६)— “तू राक्षसों का भाग है।” यह जो रुधिर (असृक्) है वह राक्षसों का ही भाग है ॥१४॥ उसको फेंककर उस पर चढ़ता है— “इदमहँ॒ रक्षोऽभितिष्ठामीदमहँ॒ रक्षोऽबबाधऽइदम- हँ॒ रक्षोऽधमं तमो नयामि” (यजु० ६।१६)— “यह मैं राक्षसों को कुचलता हूँ। यह मैं राक्षसों को निकालता हूँ। यह मैं राक्षसों को सबसे निकृष्ट अँधेरे को प्राप्त कराता हूँ।” यज्ञ के द्वारा ही वह राक्षसों को निकाल भगाता है। यह कुश मूलरहित और दोनों ओर से कटा इसलिए रहता है कि राक्षस भी तो मूलरहित, दोनों ओर से परिच्छिन्न, अन्तरिक्ष में विचरा करता है, जैसे इस लोक में मनुष्य मूलरहित और दोनों ओर से परिच्छिन्न विचरता है; इसीलिए यह कुश मूलरहित होता है और दोनों ओर से परिच्छिन्न होता है ॥१५॥

त्ति॒खद॑ति ।॒ तया॑ वपाश्रप॒ण्यौ प्रोर्णो॑ति घृ॒तेन॒ द्यावा॑पृथि॒वी प्रोर्णु॑वाथामिति त- दि॒मे द्यावा॑पृथि॒वीऽऊ॒र्जा र॑सेन॒ भाजय॑त्यन॒योरे॒वैत॑द्रसं दधाति ते र॒सव॑त्याऽउप- जीव॑नीयेऽइ॒माः प्र॒जा उप॑जीवन्ति ॥ १६॥ का॒र्श्म॒र्य॒मय्यौ॑ वपाश्रप॒ण्यौ भ॑वतः । य॒त्र वै दे॒वा अग्रे॑ प॒शुमाले॑भिरे तदु॒दीचः॒ कृष्य॒माणास्यावा॒ञ्च्मेधः प॑पात स ए॒ष वन॒स्प- ति॒रजाय॑त॒ तद्य॑त्कृ॒ष्यमा॑णास्यावा॒ऽपत॑त्तस्मात्कार्श्मर्य्यस्ते॒नैवैन॒मेतन्मेधे॑न सम॒र्धय॑ति कृ॒त्स्नं क॑रोति तस्मात्कार्श्मर्य्यमय्यौ॑ वपाश्रप॒ण्यौ भ॑वतः ॥ १७॥ तां प॒रिवा॑सयति । तां प॒शुश्रप॑णे प्रतप॑ति तथो ह्वास्या॒त्रापि॑ शृता भव॑ति पुनरु॒ल्मुकम॒ग्नीदाद॑त्ते ते जघने॑न चावा॒लं य॑न्ति तऽआ॒ग्नीध्रा॒दाग॒त्याह॑वनीयꣳ स ए॒तत्तृण॑मध्व॒र्युराह॑वनीये प्रास्य॑ति वा॒यो वे स्तोका॒नामि॑ति स्तोकानाꣳ ह्यै॒षा समि॑त् ॥ १८॥ अथो॒त्तर॑त्त- स्तिष्ठ॒न्वपा॑ प्रतप॑ति । अत्ये॒षन्वाऽए॒षोऽग्निं भ॑वति द॒क्षिण॒तः परी॑त्य श्रपयिष्यं- स्तस्मा॒द्वैवैतन्नि॒ङ्क्ते तथो॒ ह्वैनमे॒षोऽत्ये॑त्त॒मग्नि॒र्न हिन॑स्ति॒ तस्मा॑दु॒त्तर॑त्तस्तिष्ठ॒- न्वपां प्रतप॑ति ॥ १९॥ ताम॒न्तरे॑ण यू॒पं चा॒ग्निं च हर॑न्ति । तद्य॒त्सम॑या न ह॒रन्ति येना॒न्यानि॑ ह॒वीꣳषि॒ हर॑न्ति नेद॒धृत॑या समया य॒ज्ञं प्रस॑जामेति तदु॒ बाह्येन न ह॒रन्त्ये॒वं यू॒पं ब॒हिर्धा य॒ज्ञात्कुर्यु॑स्तस्माद॒न्तरे॑ण यू॒पं चा॒ग्निं च हर॑न्ति द॒क्षिण॒तः परी॑त्य प्रतिप्रस्था॒ता श्र॑पयति ॥ २०॥ अथ स्रु॒वेणोप॑हत्या॒ज्यम् । अध्व॒र्युर्व॒पाम॒भिञ्जु॒- होत्य॒ग्निरा॒ज्यस्य॑ वेतु॒ स्वाहेति॒ तथो॒ ह्वास्यै॒ते स्तोकाः शृ॒ताः स्वाहा॑कृता आहु॑त- यो भूत्वा॒ग्निं प्रा॒प्नुव॑न्ति ॥ २१॥ अथाहा॑ स्तोके॒भ्योऽनु॑ब्रूहीति॑ । स आ॒ग्नेयीꣳ स्तोके॑- भ्योऽन्वा॑ह॒ तद्यदा॒ग्नेयीꣳ स्तोके॑भ्योऽन्वाहैत॒त्प्रदा॑ना वै वृ॒ष्टिरितो॒ ह्य॒ग्निवृ॑ष्टिं व- नुतै स ए॒तै स्तोकैरे॒ताꣳस्तोकान्व॑नुते तऽए॒ते स्तोका वर्षन्ति तस्मादाग्नेयी स्तो- केभ्यो॒ऽन्वाह यदा॑ शृ॒ता भव॑ति ॥ २२॥ अथाहा॑ प्रतिप्रस्थात॒ा शृता प्रच॑रेति । स्रु- चावादा॒याध्व॒र्यु॑रति॒क्रम्या॑श्रा॒व्याह॒ स्वाहा॑कृतिभ्यः प्रेष्येति॑ वषट्कृ॒ते जुहो॑ति ॥ २३॥ जु॒ह्वा वपामे॒वाग्रेऽभि॑घारयति । अथ पृषदा॒ज्यं तडु ह चर॒काध्व॒र्यवः पृषदा॒ज्यमे-

कां० ३, अ० ८, ब्रा० २, कं० १६-२४ शतपथब्राह्मण / ४८३ अब वह वपा को निकालकर दोनों वपाश्रपणियों को ढक देता है इस मन्त्र से—"घृतेन द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथां" (यजु० ११।१६)—"द्यौ और पृथिवी को घी से ढको।" अर्थात् इस द्यौ और पृथिवी को शक्ति और रस से युक्त करता है। इनमें शक्ति और रस की स्थापना करता है। यह प्रजा इस ऊर्ज और रस के सहारे ही जीवित है॥१६॥ ये दोनों वपा-पात्र कार्ष्मर्य लकड़ी के होते हैं। जब देव लोगों ने पहले पशु को पकड़ा (मारा) तो उसको ऊपर को खींचा, तब उसका मेध नीचे को गिर पड़ा। उससे वनस्पति उत्पन्न हुआ। और चूंकि यह खिंचा और मेध नीचे को गिरा, इससे कार्ष्मर्य वृक्ष हुआ। इसी मेध से वह इसको पूरा करता है। इसीलिए वपा-पात्र कार्ष्मर्य लकड़ी के होते हैं॥१७॥ उस वपा को चारों ओर से काटता है और उसको पशुश्रपण में पकाता है। इस प्रकार यह पक जाता है। अब आग्नीध्र एक जलती लकड़ी लेता है। वे चात्वाल के पीछे जाते और आहवनीय की ओर चलते हैं। अध्वर्यु आहवनीय में उस तृण को डाल देता है—"वायो वे स्तोकानम्" (यजु० ६।१६)—"हे वायो, इन बूंदों को लो," क्योंकि यह उन बूंदों को जलाने- वाला है॥१८॥ अब उत्तर को खड़ा होकर वपा को तपाता है। उसे अग्नि के पास होकर गुजरना है और दक्षिण की ओर चलकर पकाना है। इससे वह उसको प्रसन्न करता है और इस प्रकार प्रसन्न होकर अग्नि उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसलिए उत्तर की ओर वपा को पकाता है॥१९॥ उसको यूप और अग्नि के बीच में ले जाते हैं। इसको वेदी के बीच में होकर क्यों नहीं ले जाते जहाँ अन्य हवियों को ले जाते हैं ? इसलिए कि कहीं बे-पकी वपा के साथ इसका संसर्ग न हो जाय। यूप के आगे बाहर की ओर क्यों नहीं ले जाते ? यदि ऐसा करें तो यज्ञ से बहिष्कृत हो जाय। इसलिए यूप और अग्नि के बीच से ले जाते हैं। दक्षिण की ओर जाकर प्रतिप्रस्थाता उसको पकाता है॥२०॥ अध्वर्यु स्रुवा में घी लेकर छोड़ता है—"अग्निराज्यस्य वेतु स्वाहा" (यजु० ६।१६)— "अग्नि घी को स्वीकार करे।" इस प्रकार स्वाहा-युक्त पकी हुई आहुतियाँ अग्नि को पहुँचती हैं॥२१॥ अब वह (मैत्रावरुण से) कहता है—स्तोकों (बूंदों) के लिए अनुवाक कहो। अब वह आग्नेय मन्त्रों को स्तोकों के लिए पढ़ता है। स्तोकों के लिए आग्नेय मन्त्रों के अनुवाक क्यों पढ़ता है ? इसलिए कि इसी (पृथिवी) के दान से वृष्टि होती है। अग्नि यहीं से वृष्टि को लेती है। यही बूंदें बरसती हैं जो यहाँ ली जाती हैं। इसलिए अग्नि के मन्त्रों से, अनुवाक से बूंदों की प्रशंसा में बोले जाते हैं। जब पक जाय तब—॥२२॥ प्रतिप्रस्थाता कहता है 'पक गया, आगे चलो।' अध्वर्यु दो स्रुचों को लेकर, आगे चलकर 'श्रौषट्' कहता है; 'स्वाहा-कृति को करो।' ऐसा कहकर वषट्कार करके घी की आहुति देता है॥२३॥ आहुति देकर पहले वपा को और फिर पृषद् घी को अभिघार करता है। चरकाध्वर्यु