भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* रुद्रसंहिता * । १४५

चम्पा और केवड़ेको छोड़कर शेष सभी फूल भगवान् शिवको चढ़ाये जा सकते हैं।

विप्रवर! महादेवजीके ऊपर चावल चढ़ानेसे मनुष्योंकी लक्ष्मी बढ़ती है। ये चावल अखण्डित होने चाहिये और इन्हें उत्तम भक्तिभावसे शिवके ऊपर चढ़ाना चाहिये। रुद्रप्रधान मन्त्रसे पूजा करके भगवान् शिवके ऊपर बहुत सुन्दर वस्त्र चढ़ाये और उसीपर चावल रखकर समर्पित करे तो उत्तम है। भगवान् शिवके ऊपर गन्ध, पुष्प आदिके साथ एक श्रीफल चढ़ाकर धूप आदि निवेदन करे तो पूजाका पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है। वहाँ शिवके समीप बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराये। इससे मन्त्रपूर्वक सांगोपांग लक्ष पूजा सम्पन्न होती है। जहाँ सौ मन्त्र जपनेकी विधि हो, वहाँ एक सौ आठ मन्त्र जपनेका विधान किया गया है। तिलोंद्वारा शिवजीको एक लाख आहुतियाँ दी जायें अथवा एक लाख तिलोंसे शिवकी पूजा की जाय तो वह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली होती है। जौद्वारा की हुई शिवकी पूजा स्वर्गीय सुखकी वृद्धि करनेवाली है, ऐसा ऋषियोंका कथन है। गेहूँके बने हुए पकवानसे की हुई शंकरजीकी पूजा निश्चय ही बहुत उत्तम मानी गयी है। यदि उससे लाख बार पूजा हो तो उससे संतानकी वृद्धि होती है। यदि मूँगसे पूजा की जाय तो भगवान् शिव सुख प्रदान करते हैं। प्रियंगु (कँगनी)-द्वारा सर्वाध्यक्ष परमात्मा शिवका पूजन करनेमात्रसे उपासकके धर्म, अर्थ और काम-भोगकी वृद्धि होती है तथा वह पूजा समस्त सुखोंको देनेवाली होती है। अरहरके पत्तोंसे श्रृंगार करके भगवान् शिवकी पूजा करे। यह पूजा नाना प्रकारके सुखों और सम्पूर्ण फलोंको देनेवाली है। मुनिश्रेष्ठ! अब फूलोंकी लक्ष संख्याका तौल बताया जा रहा है। प्रसन्नतापूर्वक सुनो। सूक्ष्म मानका प्रदर्शन करनेवाले व्यासजीने एक प्रस्थ शंखपुष्पको एक लाख बताया है। ग्यारह प्रस्थ चमेलीके फूल हों तो वही एक लाख फूलोंका मान कहा गया है। जूहीके एक लाख फूलोंका भी वही मान है। राईके एक लाख फूलोंका मान साढ़े पाँच प्रस्थ है। उपासकको चाहिये कि वह निष्काम होकर मोक्षके लिये भगवान् शिवकी पूजा करे।

भक्तिभावसे विधिपूर्वक शिवकी पूजा करके भक्तोंको पीछे जलधारा समर्पित करनी चाहिये। ज्वरमें जो मनुष्य प्रलाप करने लगता है, उसकी शान्तिके लिये जलधारा शुभकारक बतायी गयी है। शतरुद्रिय मन्त्रसे, रुद्रीके ग्यारह पाठोंसे, रुद्रमन्त्रोंके जपसे, पुरुषसूक्तसे, छः ऋचावाले रुद्रसूक्तसे, महामृत्युंजय मन्त्रसे, गायत्री-मन्त्रसे अथवा शिवके शास्त्रोक्त नामोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर बने हुए मन्त्रोंद्वारा जलधारा आदि अर्पित करनी चाहिये। सुख और संतानकी वृद्धिके लिये जलधाराद्वारा पूजन उत्तम बताया गया है। उत्तम भस्म धारण करके उपासकको प्रेमपूर्वक नाना प्रकारके शुभ एवं दिव्य द्रव्योंद्वारा शिवकी पूजा करनी चाहिये और शिवपर उनके सहस्त्रनाम मन्त्रोंसे घीकी धारा चढ़ानी चाहिये। ऐसा करनेपर वंशका विस्तार होता है, इसमें संशय नहीं है। इसी प्रकार यदि दस हजार मन्त्रोंद्वारा शिवजीकी पूजा की जाय तो प्रमेह

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रोगकी शान्ति होती है और उपासकको मनोवांछित फलकी प्राप्ति हो जाती है। यदि कोई नपुंसकताको प्राप्त हो तो वह घीसे शिवजीकी भलीभाँति पूजा करे तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराये। साथ ही उसके लिये मुनीश्वरोंने प्राजापत्य व्रतका भी विधान किया है। यदि बुद्धि जड हो जाय तो उस अवस्थामें पूजकको केवल शर्करामिश्रित दुग्धकी धारा चढ़ानी चाहिये। ऐसा करनेपर उसे बृहस्पतिके समान उत्तम बुद्धि प्राप्त हो जाती है। जबतक दस हजार मन्त्रोंका जप पूरा न हो जाय, तबतक पूर्वोक्त दुग्धधारा-द्वारा भगवान् शिवका उत्कृष्ट पूजन चालू रखना चाहिये। जब तन-मनमें अकारण ही उच्चाटन होने लगे—जी उचट जाय, कहीं भी प्रेम न रहे, दुःख बढ़ जाय और अपने घरमें सदा कलह रहने लगे, तब पूर्वोक्त-रूपसे दूधकी धारा चढ़ानेसे सारा दुःख नष्ट हो जाता है। सुवासित तेलसे पूजा करनेपर भोगोंकी वृद्धि होती है। यदि मधुसे शिवकी पूजा की जाय तो राज-यक्ष्माका रोग दूर हो जाता है। यदि शिवपर ईखके रसकी धारा चढ़ायी जाय तो वह भी सम्पूर्ण आनन्दकी प्राप्ति करानेवाली होती है। गंगाजलकी धारा तो भोग और मोक्ष दोनों फलोंको देनेवाली है। ये सब जो-जो धाराएँ बतायी गयी हैं, इन सबको मृत्युंजयमन्त्रसे चढ़ाना चाहिये, उसमें भी उक्त मन्त्रका विधानतः दस हजार जप करना चाहिये और ग्यारह ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये।

(अध्याय १४)


सृष्टिका वर्णन

तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर ब्रह्माजी बोले—मुने! हमें पूर्वोक्त आदेश देकर जब महादेवजी अन्तर्धान हो गये, तब मैं उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ध्यानमग्न हो कर्तव्यका विचार करने लगा। उस समय भगवान् शंकरको नमस्कार करके श्रीहरिसे ज्ञान पाकर परमानन्दको प्राप्त हो मैंने सृष्टि करनेका ही निश्चय किया। तात! भगवान् विष्णु भी वहाँ सदाशिवको प्रणाम करके मुझे आवश्यक उपदेश दे तत्काल अदृश्य हो गये। वे ब्रह्माण्डसे बाहर जाकर भगवान् शिवकी कृपा प्राप्त करके वैकुण्ठधाममें जा पहुँचे और सदा वहीं रहने लगे। मैंने सृष्टिकी इच्छासे भगवान् शिव और विष्णुका स्मरण करके पहलेके रचे हुए जलमें अपनी अंजलि डालकर जलको ऊपरकी ओर उछाला। इससे वहाँ एक अण्ड प्रकट हुआ, जो चौबीस तत्त्वोंका समूह कहा जाता है। विप्रवर! वह विराट् आकारवाला अण्ड जडरूप ही था। उसमें चेतनता न देखकर मुझे बड़ा संशय हुआ और मैं अत्यन्त कठोर तप करने लगा। बारह वर्षोंतक भगवान् विष्णुके चिन्तनमें लगा रहा। तात! वह समय पूर्ण होनेपर भगवान् श्रीहरि स्वयं प्रकट हुए और बड़े प्रेमसे मेरे अंगोंका स्पर्श करते हुए मुझसे प्रसन्नतापूर्वक बोले।

श्रीविष्णुने कहा—ब्रह्मन्! तुम वर माँगो। मैं प्रसन्न हूँ। मुझे तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है। भगवान् शिवकी कृपासे मैं सब कुछ देनेमें समर्थ हूँ।

* रुद्रसंहिता * । १४७

ब्रह्मा बोले—(अर्थात् मैंने कहा—) महाभाग! आपने जो मुझपर कृपा की है, वह सर्वथा उचित ही है; क्योंकि भगवान् शंकरने मुझे आपके हाथोंमें सौंप दिया है। विष्णो! आपको नमस्कार है। आज मैं आपसे जो कुछ माँगता हूँ, उसे दीजिये। प्रभो! यह विराट् रूप चौबीस तत्त्वोंसे बना हुआ अण्ड किसी तरह चेतन नहीं हो रहा है, जडीभूत दिखायी देता है। हरे! इस समय भगवान् शिवकी कृपासे आप यहाँ प्रकट हुए हैं। अतः शंकरकी सृष्टि-शक्ति या विभूतिसे प्राप्त हुए इस अण्डमें चेतनता लाइये।

मेरे ऐसा कहनेपर शिवकी आज्ञामें तत्पर रहनेवाले महाविष्णुने अनन्तरूपका आश्रय ले उस अण्डमें प्रवेश किया। उस समय उन परम पुरुषके सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर थे। उन्होंने भूमिको सब ओरसे घेरकर उस अण्डको व्याप्त कर लिया। मेरे द्वारा भलीभाँति स्तुति की जानेपर जब श्रीविष्णुने उस अण्डमें प्रवेश किया, तब वह चौबीस तत्त्वोंका विकाररूप अण्ड सचेतन हो गया। पातालसे लेकर सत्यलोकतककी अवधिवाले उस अण्डके रूपमें वहाँ साक्षात् श्रीहरि ही विराजने लगे। उस विराट् अण्डमें व्यापक होनेसे ही वे प्रभु 'वैराज पुरुष' कहलाये। पंचमुख महादेवने केवल अपने रहनेके लिये सुरम्य कैलास-नगरका निर्माण किया, जो सब लोकोंसे ऊपर सुशोभित होता है। देवर्षे! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका नाश हो जानेपर भी वैकुण्ठ और कैलास—इन दो धामोंका यहाँ कभी नाश नहीं होता। मुनिश्रेष्ठ! मैं सत्यलोकका आश्रय लेकर रहता हूँ। तात! महादेवजीकी आज्ञासे ही मुझमें सृष्टि रचनेकी इच्छा उत्पन्न हुई है। बेटा! जब मैं सृष्टिकी इच्छासे चिन्तन करने लगा, उस समय पहले मुझसे अनजानमें ही पापपूर्ण तमोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अविद्या-पंचक (अथवा पंचपर्वा अविद्या) कहते हैं। तदनन्तर प्रसन्नचित्त होकर शम्भुकी आज्ञासे मैं पुनः अनासक्त-भावसे सृष्टिका चिन्तन करने लगा। उस समय मेरे द्वारा स्थावर-संज्ञक वृक्ष आदिकी सृष्टि हुई, जिसे मुख्य-सर्ग कहते हैं। (यह पहला सर्ग है।) उसे देखकर तथा वह अपने लिये पुरुषार्थका साधक नहीं है, यह जानकर सृष्टिकी इच्छावाले मुझ ब्रह्मासे दूसरा सर्ग प्रकट हुआ, जो दुःखसे भरा हुआ है; उसका नाम है—तिर्यक्स्रोता*। वह सर्ग भी पुरुषार्थका साधक नहीं था। उसे भी पुरुषार्थ-साधनकी शक्तिसे रहित जान जब मैं पुनः सृष्टिका चिन्तन करने लगा, तब मुझसे शीघ्र ही तीसरे सात्त्विक सर्गका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे 'ऊर्ध्वस्रोता' कहते हैं। यह देवसर्गके नामसे विख्यात हुआ। देवसर्ग सत्यवादी तथा अत्यन्त सुखदायक है। उसे भी पुरुषार्थसाधनकी रुचि एवं अधिकारसे रहित मानकर मैंने अन्य सर्गके लिये अपने स्वामी श्रीशिवका चिन्तन आरम्भ किया। तब भगवान् शंकरकी आज्ञासे एक रजोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव


* पशु, पक्षी आदि तिर्यक्स्रोता कहलाते हैं। वायुकी भाँति तिरछा चलनेके कारण ये तिर्यक् अथवा 'तिर्यक्स्रोता' कहे गये हैं।

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हुआ, जिसे अर्वाक्स्रोता कहा गया है। इस सर्गके प्राणी मनुष्य हैं, जो पुरुषार्थ-साधनके उच्च अधिकारी हैं। तदनन्तर महादेवजीकी आज्ञासे भूत आदिकी सृष्टि हुई। इस प्रकार मैंने पाँच तरहकी वैकृत सृष्टिका वर्णन किया है। इनके सिवा तीन प्राकृत सर्ग भी कहे गये हैं, जो मुझ ब्रह्माके सांनिध्यसे प्रकृतिसे ही प्रकट हुए हैं। इनमें पहला महत्तत्त्वका सर्ग है, दूसरा सूक्ष्म भूतों अर्थात् तन्मात्राओंका सर्ग है और तीसरा वैकारिकसर्ग कहलाता है। इस तरह ये तीन प्राकृत सर्ग हैं। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकारके सर्गोंको मिलानेसे आठ सर्ग होते हैं। इनके सिवा नवाँ कौमारसर्ग है, जो प्राकृत और वैकृत भी है। इन सबके अवान्तर भेदका मैं वर्णन नहीं कर सकता; क्योंकि उसका उपयोग बहुत थोड़ा है।

अब द्विजात्मक सर्गका प्रतिपादन करता हूँ। इसीका दूसरा नाम कौमारसर्ग है, जिसमें सनक-सनन्दन आदि कुमारोंकी महत्त्वपूर्ण सृष्टि हुई है। सनक आदि मेरे चार मानस पुत्र हैं, जो मुझ ब्रह्माके ही समान हैं। वे महान् वैराग्यसे सम्पन्न तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हुए। उनका मन सदा भगवान् शिवके चिन्तनमें ही लगा रहता है। वे संसारसे विमुख एवं ज्ञानी हैं। उन्होंने मेरे आदेश देनेपर भी सृष्टिके कार्यमें मन नहीं लगाया। मुनिश्रेष्ठ नारद! सनकादि कुमारोंके दिये हुए नकारात्मक उत्तरको सुनकर मैंने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया। उस समय मुझपर मोह छा गया। उस अवसरपर मैंने मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण किया। वे शीघ्र ही आ गये और उन्होंने समझाते हुए मुझसे कहा—'तुम भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तपस्या करो।' मुनिश्रेष्ठ! श्रीहरिने जब मुझे ऐसी शिक्षा दी, तब मैं महाघोर एवं उत्कृष्ट तप करने लगा। सृष्टिके लिये तपस्या करते हुए मेरी दोनों भौंहों और नासिकाके मध्यभागसे, जो उनका अपना ही अविमुक्त नामक स्थान है, महेश्वरकी तीन मूर्तियोंमेंसे अन्यतम पूर्णांश, सर्वेश्वर एवं दयासागर भगवान् शिव अर्धनारीश्वररूपमें प्रकट हुए।

जो जन्मसे रहित, तेजकी राशि, सर्वज्ञ तथा सर्वस्रष्टा हैं, उन नीललोहित-नामधारी साक्षात् उमावल्लभ शंकरको सामने देख बड़ी भक्तिसे मस्तक झुका उनकी स्तुति करके मैं बड़ा प्रसन्न हुआ और उन देवदेवेश्वरसे बोला—'प्रभो! आप भाँति-भाँतिके जीवोंकी सृष्टि कीजिये।' मेरी यह बात सुनकर उन देवाधिदेव महेश्वर रुद्रने अपने ही समान बहुत-से रुद्रगणोंकी सृष्टि

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की। तब मैंने अपने स्वामी महेश्वर महारुद्रसे फिर कहा—‘देव! आप ऐसे जीवोंकी सृष्टि कीजिये, जो जन्म और मृत्युके भयसे युक्त हों।’ मुनिश्रेष्ठ! मेरी ऐसी बात सुनकर करुणासागर महादेवजी हँस पड़े और तत्काल इस प्रकार बोले।

महादेवजीने कहा—विधातः! मैं जन्म और मृत्युके भयसे युक्त अशोभन जीवोंकी सृष्टि नहीं करूँगा; क्योंकि वे कर्मोंके अधीन हो दुःखके समुद्रमें डूबे रहेंगे। मैं तो दुःखके सागरमें डूबे हुए उन जीवोंका उद्धारमात्र करूँगा, गुरुका स्वरूप धारण करके उत्तम ज्ञान प्रदानकर उन सबको संसार-सागरसे पार करूँगा। प्रजापते! दुःखमें डूबे हुए सारे जीवकी सृष्टि तो तुम्हीं करो। मेरी आज्ञासे इस कार्यमें प्रवृत्त होनेके कारण तुम्हें माया नहीं बाँध सकेगी।

मुझसे ऐसा कहकर श्रीमान् भगवान् नीललोहित महादेव मेरे देखते-देखते अपने पार्षदोंके साथ वहाँसे तत्काल तिरोहित हो गये। (अध्याय १५)


स्वायम्भुव मनु और शतरूपाकी, ऋषियोंकी तथा दक्षकन्याओंकी संतानोंका वर्णन तथा सती और शिवकी महत्ताका प्रतिपादन

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर मैंने शब्दतन्मात्रा आदि सूक्ष्म-भूतोंको स्वयं ही पंचीकृत करके अर्थात् उन पाँचोंका परस्पर सम्मिश्रण करके उनसे स्थूल आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीकी सृष्टि की। पर्वतों, समुद्रों और वृक्षों आदिको उत्पन्न किया। कलासे लेकर युगपर्यन्त जो काल-विभाग हैं, उनकी रचना की। मुने! उत्पत्ति और विनाशवाले और भी बहुत-से पदार्थोंका मैंने निर्माण किया, परंतु इससे मुझे संतोष नहीं हुआ। तब साम्ब शिवका ध्यान करके मैंने साधनपरायण पुरुषोंकी सृष्टि की। अपने दोनों नेत्रोंसे मरीचिको, हृदयसे भृगुको, सिरसे अंगिराको, व्यानवायुसे मुनिश्रेष्ठ पुलहको, उदानवायुसे पुलस्त्यको, समान-वायुसे वसिष्ठको, अपानसे क्रतुको, दोनों कानोंसे अत्रिको, प्राणोंसे दक्षको, गोदसे तुमको, छायासे कर्दम मुनिको तथा संकल्पसे समस्त साधनोंके साधन धर्मको उत्पन्न किया। मुनिश्रेष्ठ! इस तरह इन उत्तम साधकोंकी सृष्टि करके महादेवजीकी कृपासे मैंने अपने-आपको कृतार्थ माना। तात! तत्पश्चात् संकल्पसे उत्पन्न हुए धर्म मेरी

१५० * संक्षिप्त शिवपुराण *

आज्ञासे मानवरूप धारण करके साधकोंकी प्रेरणासे साधनमें लग गये। इसके बाद मैंने अपने विभिन्न अंगोंसे देवता, असुर आदिके रूपमें असंख्य पुत्रोंकी सृष्टि करके उन्हें भिन्न-भिन्न शरीर प्रदान किये। मुने ! तदनन्तर अन्तर्यामी भगवान् शंकरकी प्रेरणासे अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त करके मैं दो रूपवाला हो गया। नारद! आधे शरीरसे मैं स्त्री हो गया और आधेसे पुरुष। उस पुरुषने उस स्त्रीके गर्भसे सर्वसाधनसमर्थ उत्तम जोड़ेको उत्पन्न किया। उस जोड़ेमें जो पुरुष था, वही स्वायम्भुव मनुके नामसे प्रसिद्ध हुआ। स्वायम्भुव मनु उच्चकोटिके साधक हुए तथा जो स्त्री हुई, वह शतरूपा कहलायी। वह योगिनी एवं तपस्विनी हुई। तात! मनुने वैवाहिक विधिसे अत्यन्त सुन्दरी शतरूपाका पाणिग्रहण किया और उससे वे मैथुनजनित सृष्टि उत्पन्न करने लगे। उन्होंने शतरूपासे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र और तीन कन्याएँ उत्पन्न कीं। कन्याओंके नाम थे—आकूति, देवहूति और प्रसूति। मनुने आकूतिका विवाह प्रजापति रुचिके साथ किया। मझली पुत्री देवहूति कर्दमको ब्याह दी और उत्तानपादकी सबसे छोटी बहिन प्रसूति प्रजापति दक्षको दे दी। उनकी संतान-परम्पराओंसे समस्त चराचर जगत् व्याप्त है।

रुचिसे आकूतिके गर्भसे यज्ञ और दक्षिणा नामक स्त्री-पुरुषका जोड़ा उत्पन्न हुआ। यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र हुए। मुने! कर्दमद्वारा देवहूतिके गर्भसे बहुत-सी पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। दक्षके प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ हुईं। उनमेंसे श्रद्धा आदि तेरह कन्याओंका विवाह दक्षने धर्मके साथ कर दिया। मुनीश्वर! धर्मकी उन पत्नियोंके नाम सुनो—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वसु, शान्ति, सिद्धि और कीर्ति—ये सब तेरह हैं। इनसे छोटी जो शेष ग्यारह सुलोचना कन्याएँ थीं, उनके नाम इस प्रकार हैं—ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संनति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा तथा स्वधा। भृगु, शिव, मरीचि, अंगिरा मुनि, पुलस्त्य, पुलह, मुनिश्रेष्ठ क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ, अग्नि और पितरोंने क्रमशः इन ख्याति आदि कन्याओंका पाणिग्रहण किया। भृगु आदि मुनिश्रेष्ठ साधक हैं। इनकी संतानोंसे चराचर प्राणियोंसहित सारी त्रिलोकी भरी हुई है।

इस प्रकार अम्बिकापति महादेवजीकी आज्ञासे अपने पूर्वकर्मोंके अनुसार बहुत-से प्राणी असंख्य श्रेष्ठ द्विजोंके रूपमें उत्पन्न हुए। कल्पभेदसे दक्षके साठ कन्याएँ बतायी

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गयी हैं। उनमेंसे दस कन्याओंका विवाह उन्होंने धर्मके साथ किया। सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको ब्याह दीं और विधिपूर्वक तेरह कन्याओंके हाथ दक्षने कश्यपके हाथमें दे दिये। नारद! उन्होंने चार कन्याएँ श्रेष्ठ रूपवाले तार्क्ष्य (अरिष्टनेमि)-को ब्याह दीं तथा भृगु, अंगिरा और कृशाश्वको दो-दो कन्याएँ अर्पित कीं। उन स्त्रियोंसे उनके पतियोंद्वारा बहुसंख्यक चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई। मुनिश्रेष्ठ! दक्षने महात्मा कश्यपको जिन तेरह कन्याओंका विधिपूर्वक दान दिया था, उनकी संतानोंसे सारी त्रिलोकी व्याप्त है। स्थावर और जंगम कोई भी सृष्टि ऐसी नहीं है, जो कश्यपकी संतानोंसे शून्य हो। देवता, ऋषि, दैत्य, वृक्ष, पक्षी, पर्वत तथा तृण-लता आदि सभी कश्यपपत्नियोंसे पैदा हुए हैं। इस प्रकार दक्ष-कन्याओंकी संतानोंसे सारा चराचर जगत् व्याप्त है। पातालसे लेकर सत्यलोकपर्यन्त समस्त ब्रह्माण्ड निश्चय ही उनकी संतानोंसे सदा भरा रहता है, कभी खाली नहीं होता।

इस तरह भगवान् शंकरकी आज्ञासे ब्रह्माजीने भलीभाँति सृष्टि की। पूर्वकालमें सर्वव्यापी शम्भुने जिन्हें तपस्याके लिये प्रकट किया था तथा रुद्रदेवने त्रिशूलके अग्रभागपर रखकर जिनकी सदा रक्षा की है, वे ही सतीदेवी लोकहितका कार्य सम्पादित करनेके लिये दक्षसे प्रकट हुई थीं। उन्होंने भक्तोंके उद्धारके लिये अनेक लीलाएँ कीं। इस प्रकार देवी शिवा ही सती होकर भगवान् शंकरसे ब्याही गयीं; किंतु पिताके यज्ञमें पतिका अपमान देख उन्होंने अपने शरीरको त्याग दिया और फिर उसे ग्रहण नहीं किया। वे अपने परमपदको प्राप्त हो गयीं। फिर देवताओंकी प्रार्थनासे वे ही शिवा पार्वतीरूपमें प्रकट हुईं और बड़ी भारी तपस्या करके पुनः भगवान् शिवको उन्होंने प्राप्त कर लिया। मुनीश्वर! इस जगत्में उनके अनेक नाम प्रसिद्ध हुए। उनके कालिका, चण्डिका, भद्रा, चामुण्डा, विजया, जया, जयन्ती, भद्रकाली, दुर्गा, भगवती, कामाख्या, कामदा, अम्बा, मृडानी और सर्वमंगला आदि अनेक नाम हैं, जो भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। ये सभी नाम उनके गुण और कर्मोंके अनुसार हैं।

मुनिश्रेष्ठ नारद! इस प्रकार मैंने सृष्टिक्रमका तुमसे वर्णन किया है। ब्रह्माण्डका यह सारा भाग भगवान् शिवकी आज्ञासे मेरे द्वारा रचा गया है। भगवान् शिवको परब्रह्म परमात्मा कहा गया है। मैं, विष्णु तथा रुद्र—ये तीन देवता गुणभेदसे उन्हींके रूप बतलाये गये हैं। वे मनोरम शिवलोकमें शिवाके साथ स्वच्छन्द विहार करते हैं। भगवान् शिव स्वतन्त्र परमात्मा हैं। निर्गुण और सगुण भी वे ही हैं।

(अध्याय १६)

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१५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *


यज्ञदत्तकुमारको भगवान् शिवकी कृपासे कुबेरपदकी प्राप्ति तथा उनकी भगवान् शिवके साथ मैत्री

सूतजी कहते हैं—मुनीश्वरो! ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर नारदजीने विनयपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और पुनः पूछा—'भगवन्! भक्तवत्सल भगवान् शंकर कैलास पर्वतपर कब गये और महात्मा कुबेरके साथ उनकी मैत्री कब हुई? परिपूर्ण मंगलविग्रह महादेवजीने वहाँ क्या किया? यह सब मुझे बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है।'

ब्रह्माजीने कहा—नारद! सुनो, चन्द्र-मौलि भगवान् शंकरके चरित्रका वर्णन करता हूँ। वे कैसे कैलास पर्वतपर गये और कुबेरकी उनके साथ किस प्रकार मैत्री हुई, यह सब सुनाता हूँ। काम्पिल्य नगरमें यज्ञदत्त नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहते थे, जो बड़े सदाचारी थे। उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम गुणनिधि था। वह बड़ा ही दुराचारी और जुआरी हो गया था। पिताने अपने उस पुत्रको त्याग दिया। वह घरसे निकल गया और कई दिनोंतक भूखा भटकता रहा। एक दिन वह नैवेद्य चुरानेकी इच्छासे एक शिवमन्दिरमें गया। वहाँ उसने अपने वस्त्रको जलाकर उजाला किया। यह मानो उसके द्वारा भगवान् शिवके लिये दीपदान किया गया। तत्पश्चात् वह चोरीमें पकड़ा गया और उसे प्राणदण्ड मिला। अपने कुकर्मोंके कारण वह यमदूतोंद्वारा बाँधा गया। इतनेमें ही भगवान् शंकरके पार्षद वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने उसे उनके बन्धनसे छुड़ा दिया। शिवगणोंके संगसे उसका हृदय शुद्ध हो गया था। अतः वह उन्हींके साथ तत्काल शिवलोकमें चला गया। वहाँ सारे दिव्य भोगोंका उपभोग तथा उमा-महेश्वरका सेवन करके कालान्तरमें वह कलिंगराज अरिंदमका पुत्र हुआ। वहाँ उसका

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नाम था दम। वह निरन्तर भगवान् शिवकी सेवामें लगा रहता था। बालक होनेपर भी वह दूसरे बालकोंके साथ शिवका भजन किया करता था। वह क्रमशः युवावस्थाको प्राप्त हुआ और पिताके परलोकगमनके पश्चात् राजसिंहासनपर बैठा।

राजा दम बड़ी प्रसन्नताके साथ सब ओर शिवधर्मोंका प्रचार करने लगे। भूपाल दमका दमन करना दूसरोंके लिये सर्वथा कठिन था। ब्रह्मन्! समस्त शिवालयोंमें दीपदान करनेके अतिरिक्त वे दूसरे किसी धर्मको नहीं जानते थे। उन्होंने अपने राज्यमें रहनेवाले समस्त ग्रामाध्यक्षोंको बुलाकर यह आज्ञा दे दी कि ‘शिवमन्दिरमें दीपदान करना सबके लिये अनिवार्य होगा। जिस-जिस ग्रामाध्यक्षके गाँवके पास जितने शिवालय हों, वहाँ-वहाँ बिना कोई विचार किये सदा दीप जलाना चाहिये।’ आजीवन इसी धर्मका पालन करनेके कारण राजा दमने बहुत बड़ी धर्मसम्पत्तिका संचय कर लिया। फिर वे काल-धर्मके अधीन हो गये। दीपदानकी वासनासे युक्त होनेके कारण उन्होंने शिवालयोंमें बहुत-से दीप जलवाये और उसके फलस्वरूप जन्मान्तरमें वे रत्नमय दीपोंकी प्रभाके आश्रय हो अलकापुरीके स्वामी हुए। इस प्रकार भगवान् शिवके लिये किया हुआ थोड़ा-सा भी पूजन या आराधन समयानुसार महान् फल देता है, ऐसा जानकर उत्तम सुखकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको शिवका भजन अवश्य करना चाहिये। वह दीक्षितका पुत्र, जो सदा सब प्रकारके अधर्मोंमें ही रचा-पचा रहता था, दैवयोगसे शिवालयमें धन चुरानेके लिये गया और उसने स्वार्थवश अपने कपड़ेको दीपककी बत्ती बनाकर उसके प्रकाशसे शिवलिंगके ऊपरका अँधेरा दूर कर दिया; इस सत्कर्मके फलस्वरूप वह कलिंगदेशका राजा हुआ और धर्ममें उसका अनुराग हो गया। फिर दीपकी वासनाका उदय होनेसे शिवालयोंमें दीप जलवाकर उसने यह दिक्पालका पद पा लिया। मुनीश्वर! देखो तो सही, कहाँ उसका वह कर्म और कहाँ यह दिक्पालकी पदवी, जिसका यह मानवधर्मा प्राणी इस समय यहाँ उपभोग कर रहा है। तात! यह तो उसके ऊपर शिवके संतुष्ट होनेकी बात बतायी गयी। अब एकचित्त होकर यह सुनो कि किस प्रकार सदाके लिये उसकी भगवान् शिवके साथ मित्रता हो गयी। मैं इस प्रसंगका तुमसे वर्णन करता हूँ।

नारद! पहलेके पाद्मकल्पकी बात है, मुझ ब्रह्माके मानस पुत्र पुलस्त्यसे विश्रवाका जन्म हुआ और विश्रवाके पुत्र वैश्रवण (कुबेर) हुए। उन्होंने पूर्वकालमें अत्यन्त उग्र तपस्याके द्वारा त्रिनेत्रधारी महादेवकी आराधना करके विश्वकर्माकी बनायी हुई इस अलकापुरीका उपभोग किया। जब वह कल्प व्यतीत हो गया और मेघवाहनकल्प आरम्भ हुआ, उस समय वह यज्ञदत्तका पुत्र, जो प्रकाशका दान करनेवाला था, कुबेरके रूपमें अत्यन्त दुःसह तपस्या करने लगा। दीपदानमात्रसे मिलनेवाली शिवभक्तिके प्रभावको जानकर वह शिवकी चित्रप्रकाशिका काशिकापुरीमें गया और अपने चित्तरूपी रत्नमय प्रदीपोंसे ग्यारह रुद्रोंको उद्बोधित करके अनन्यभक्ति एवं स्नेहसे सम्पन्न हो वह तन्मयतापूर्वक शिवके ध्यानमें मग्न हो निश्चलभावसे बैठ गया। जो शिवकी एकताका महान् पात्र है, तपरूपी अग्निसे बढ़ा हुआ है, काम-

१५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

क्रोधादि महाविघ्नरूपी पतंगोंके आघातसे शून्य है, प्राणनिरोधरूपी वायुशून्य स्थानमें निश्चलभावसे प्रकाशित है, निर्मल दृष्टिके कारण स्वरूपसे भी निर्मल है तथा सद्भावरूपी पुष्पोंसे जिसकी पूजा की गयी है, ऐसे शिवलिंगकी प्रतिष्ठा करके वह तबतक तपस्यामें लगा रहा, जबतक उसके शरीरमें केवल अस्थि और चर्ममात्र ही अवशिष्ट नहीं रह गये। इस प्रकार उसने दस हजार वर्षोंतक तपस्या की। तदनन्तर विशालाक्षी पार्वतीदेवीके साथ भगवान् विश्वनाथ कुबेरके पास आये। उन्होंने प्रसन्नचित्तसे अलकापतिकी ओर देखा। वे शिवलिंगमें मनको एकाग्र करके ठूंठे काठकी भाँति स्थिरभावसे बैठे थे। भगवान् शिवने उनसे कहा—'अलकापते! मैं वर देनेके लिये उद्यत हूँ। तुम अपना मनोरथ बताओ।'

यह वाणी सुनकर तपस्याके धनी कुबेरने ज्यों ही आँखें खोलकर देखा, त्यों ही उमावल्लभ भगवान् श्रीकण्ठ सामने खड़े दिखायी दिये। वे उदयकालके सहस्रों सूर्योंसे भी अधिक तेजस्वी थे और उनके मस्तकपर चन्द्रमा अपनी चाँदनी बिखेर रहे थे। भगवान् शंकरके तेजसे उनकी आँखें चौंधिया गयीं। उनका तेज प्रतिहत हो गया और वे नेत्र बंद करके मनोरथसे भी परे विराजमान देवदेवेश्वर शिवसे बोले—'नाथ! मेरे नेत्रोंको वह दृष्टिशक्ति दीजिये, जिससे आपके चरणारविन्दोंका दर्शन हो सके। स्वामिन्! आपका प्रत्यक्ष दर्शन हो, यही मेरे लिये सबसे बड़ा वर है। ईश! दूसरे किसी वरसे मेरा क्या प्रयोजन है। चन्द्रशेखर! आपको नमस्कार है।'

कुबेरकी यह बात सुनकर देवाधिदेव उमापतिने अपनी हथेलीसे उनका स्पर्श करके उन्हें देखनेकी शक्ति प्रदान की। दृष्टिशक्ति मिल जानेपर यज्ञदत्तके उस पुत्रने आँखें फाड़-फाड़कर पहले उमाकी ओर ही देखना आरम्भ किया। वह मन-ही-मन सोचने लगा, 'भगवान् शंकरके समीप यह सर्वांगसुन्दरी कौन है? इसने कौन-सा ऐसा तप किया है, जो मेरी भी तपस्यासे बढ़ गया है। यह रूप, यह प्रेम, यह सौभाग्य और यह असीम शोभा—सभी अद्भुत हैं।' वह ब्राह्मणकुमार बार-बार यही कहने लगा। जब बार-बार यही कहता हुआ वह क्रूर दृष्टिसे उनकी ओर देखने लगा, तब वामाके अवलोकनसे उसकी बायीं आँख फूट गयी। तदनन्तर देवी पार्वतीने महादेवजीसे कहा—'प्रभो! यह दुष्ट तपस्वी बार-बार मेरी ओर देखकर क्या बक रहा है? आप मेरी तपस्याके तेजको प्रकट कीजिये।' देवीकी यह बात सुनकर भगवान् शिवने हँसते हुए उनसे कहा—'उमे! यह तुम्हारा पुत्र है। यह तुम्हें क्रूर दृष्टिसे नहीं देखता, अपितु तुम्हारी तपःसम्पत्तिका वर्णन कर रहा है।' देवीसे ऐसा कहकर भगवान् शिव पुनः उस ब्राह्मणकुमारसे बोले—'वत्स! मैं तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट होकर तुम्हें वर देता हूँ। तुम निधियोंके स्वामी और गुह्यकोंके राजा हो जाओ। सुव्रत! यक्षों, किन्नरों और राजाओंके भी राजा होकर पुण्यजनोंके पालक और सबके लिये धनके दाता बनो। मेरे साथ तुम्हारी सदा मैत्री बनी रहेगी और मैं नित्य तुम्हारे निकट निवास करूँगा। मित्र! तुम्हारी प्रीति बढ़ानेके लिये मैं अलकाके पास ही रहूँगा। आओ, इन उमादेवीके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करो; क्योंकि ये तुम्हारी माता हैं। महाभक्त यज्ञदत्तकुमार! तुम अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे इनके चरणोंमें गिर जाओ।'

  • रुद्रसंहिता *
    १५५

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार वर देकर भगवान् शिवने पार्वतीदेवीसे फिर कहा—‘देवेश्वरी! इसपर कृपा करो। तपस्विनि! यह तुम्हारा पुत्र है।’ भगवान् शंकरका यह कथन सुनकर जगदम्बा पार्वतीने प्रसन्नचित्त हो यज्ञदत्तकुमारसे कहा—‘वत्स! भगवान् शिवमें तुम्हारी सदा निर्मल भक्ति बनी रहे। तुम्हारी बायीं आँख तो फूट ही गयी। इसलिये एक ही पिंगलनेत्रसे युक्त रहो। महादेवजीने जो वर दिये हैं, वे सब उसी रूपमें तुम्हें सुलभ हों। बेटा! मेरे रूपके प्रति ईर्ष्या करनेके कारण तुम कुबेर नामसे प्रसिद्ध होओगे।’ इस प्रकार कुबेरको वर देकर भगवान् महेश्वर पार्वतीदेवीके साथ अपने विश्वेश्वर-धाममें चले गये। इस तरह कुबेरने भगवान् शंकरकी मैत्री प्राप्त की और अलकापुरीके पास जो कैलास पर्वत है, वह भगवान् शंकरका निवास हो गया।
(अध्याय १७–१९)

~~ ० ~~

भगवान् शिवका कैलास पर्वतपर गमन तथा सृष्टिखण्डका उपसंहार

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! मुने ! कुबेरके तपोबलसे भगवान् शिवका जिस प्रकार पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर शुभागमन हुआ, वह प्रसंग सुनो। कुबेरको वर देनेवाले विश्वेश्वर शिव जब उन्हें निधिपति होनेका वर देकर अपने उत्तम स्थानको चले गये, तब उन्होंने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—‘ब्रह्माजीके ललाटसे जिनका प्रादुर्भाव हुआ है तथा जो प्रलयका कार्य सँभालते हैं, वे रुद्र मेरे पूर्ण स्वरूप हैं। अतः उन्हींके रूपमें मैं गुह्यकोंके निवासस्थान कैलास पर्वतको जाऊँगा। उन्हींके रूपमें मैं कुबेरका मित्र बनकर उसी पर्वतपर विलासपूर्वक रहूँगा और बड़ा भारी तप करूँगा।’

शिवकी इस इच्छाका चिन्तन करके उन रुद्रदेवने कैलास जानेके लिये उत्सुक डमरू बजाया। डमरूकी वह ध्वनि, जो उत्साह बढ़ानेवाली थी, तीनों लोकोंमें व्याप्त हो गयी। उसका विचित्र एवं गम्भीर शब्द आह्वानकी गतिसे युक्त था अर्थात् सुननेवालोंको अपने पास आनेके लिये प्रेरणा दे रहा था। उस ध्वनिको सुनकर मैं तथा श्रीविष्णु आदि सभी देवता, ऋषि, मूर्तिमान् आगम, निगम और सिद्ध वहाँ आ पहुँचे। देवता और असुर आदि सब लोग बड़े उत्साहमें भरकर वहाँ आये। भगवान् शिवके समस्त पार्षद तथा सर्वलोकवन्दित महाभाग गणपाल जहाँ कहीं भी थे, वहाँसे आ गये।

इतना कहकर ब्रह्माजीने वहाँ आये हुए गणपालोंका नामोल्लेखपूर्वक विस्तृत परिचय दिया, फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया। वे बोले—वहाँ असंख्य महाबली गणपाल पधारे। वे सब-के-सब सहस्रों भुजाओंसे युक्त थे और मस्तकपर जटाका ही मुकुट धारण किये हुए थे। सभी चन्द्रचूड़, नीलकण्ठ और त्रिलोचन थे। हार, कुण्डल, केयूर तथा मुकुट आदिसे अलंकृत थे। वे मेरे, श्रीविष्णुके तथा इन्द्रके समान तेजस्वी जान पड़ते थे। अणिमा आदि आठों सिद्धियोंसे घिरे थे तथा करोड़ों सूर्योंके समान उद्भासित हो रहे थे। उस समय भगवान् शिवने विश्वकर्माको उस पर्वतपर निवासस्थान बनानेकी आज्ञा दी। अनेक

१५६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

भक्तोंके साथ अपने और दूसरोंके रहनेके लिये यथायोग्य आवास तैयार करनेका आदेश दिया।

मुने! तब विश्वकर्माने भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार उस पर्वतपर जाकर शीघ्र ही नाना प्रकारके गृहोंकी रचना की। फिर श्रीहरिकी प्रार्थनासे कुबेरपर अनुग्रह करके भगवान् शिव सानन्द कैलास पर्वतपर गये। उत्तम मुहूर्तमें अपने स्थानमें प्रवेश करके भक्तवत्सल परमेश्वर शिवने सबको प्रेमदान दे सनाथ किया, इसके बाद आनन्दसे भरे हुए श्रीविष्णु आदि समस्त देवताओं, मुनियों और सिद्धोंने शिवका प्रसन्नतापूर्वक अभिषेक किया। हाथोंमें नाना प्रकारकी भेंटें लेकर सबने क्रमशः उनका पूजन किया और बड़े उत्सवके साथ उनकी आरती उतारी। मुने! उस समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई, जो मंगलसूचक थी। सब ओर जय-जयकार और नमस्कारके शब्द गूँजने लगे। महान् उत्साह फैला हुआ था, जो सबके सुखको बढ़ा रहा था। उस समय सिंहासनपर बैठकर श्रीविष्णु आदि सभी देवताओंद्वारा की हुई यथोचित सेवाको बारंबार ग्रहण करते हुए भगवान् शिव बड़ी शोभा पा रहे थे। देवता आदि सब लोगोंने सार्थक एवं प्रिय वचनों-द्वारा लोककल्याणकारी भगवान् शंकरका पृथक्-पृथक् स्तवन किया। सर्वेश्वर प्रभुने प्रसन्नचित्तसे वह स्तवन सुनकर उन सबको प्रसन्नतापूर्वक मनोवांछित वर एवं अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान कीं। मुने! तदनन्तर श्रीविष्णुके साथ मैं तथा अन्य सब देवता और मुनि मनोवांछित वस्तु पाकर आनन्दित हो भगवान् शिवकी आज्ञासे अपने-अपने धामको चले गये। कुबेर भी शिवकी आज्ञासे प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको गये। फिर वे भगवान् शम्भु, जो सर्वथा स्वतन्त्र हैं, योगपरायण एवं ध्यान-तत्पर हो पर्वतप्रवर कैलासपर रहने लगे। कुछ काल बिना पत्नीके ही बिताकर परमेश्वर शिवने दक्षकन्या सतीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। देवर्षे! फिर वे महेश्वर दक्षकुमारी सतीके साथ विहार करने लगे और लोकाचारपरायण हो सुखका अनुभव करने लगे। मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने तुमसे यह रुद्रके अवतारका वर्णन किया है, साथ ही उनके कैलासपर आगमन और कुबेरके साथ मैत्रीका भी प्रसंग सुनाया है। कैलासके अन्तर्गत होनेवाली उनकी ज्ञानवर्द्धिनी लीलाका भी वर्णन किया, जो इहलोक और परलोकमें सदा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाली है। जो एकाग्रचित्त हो इस कथाको सुनता या पढ़ता है, वह इस लोकमें भोग पाकर परलोकमें मोक्ष लाभ करता है।

(अध्याय २०)

~~ ० ~~ ॥ रुद्रसंहिताका सृष्टिखण्ड सम्पूर्ण ॥ ~~ ० ~~

रुद्रसंहिता: द्वितीय (सती) खण्ड

रुद्रसंहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

नारदजीके प्रश्न और ब्रह्माजीके द्वारा उनका उत्तर, सदाशिवसे त्रिदेवोंकी उत्पत्ति तथा ब्रह्माजीसे देवता आदिकी सृष्टिके पश्चात् एक नारी और एक पुरुषका प्राकट्य

नारदजी बोले—महाभाग! महाप्रभो! विधातः! आपके मुखारविन्दसे मंगलकारिणी शम्भुकथा सुनते-सुनते मेरा जी नहीं भर रहा है। अतः भगवान् शिवका सारा शुभ चरित्र मुझसे कहिये। सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मदेव! मैं सतीकी कीर्तिसे युक्त शिवका दिव्य चरित्र सुनना चाहता हूँ। शोभाशालिनी सती किस प्रकार दक्षपत्नीके गर्भसे उत्पन्न हुईं? महादेवजीने विवाहका विचार कैसे किया? पूर्वकालमें दक्षके प्रति रोष होनेके कारण सतीने अपने शरीरका त्याग कैसे किया? चेतनाकाशको प्राप्त होकर वे फिर हिमालयकी कन्या कैसे हुईं? पार्वतीने किस प्रकार उग्र तपस्या की और कैसे उनका विवाह हुआ? कामदेवका नाश करनेवाले भगवान् शंकरके आधे शरीरमें वे किस प्रकार स्थान पा सकीं? महामते! इन सब बातोंको आप विस्तारपूर्वक कहिये। आपके समान दूसरा कोई संशयका निवारण करनेवाला न है, न होगा।

ब्रह्माजीने कहा—मुने! देवी सती और भगवान् शिवका शुभ यश परम-पावन, दिव्य तथा गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय है। तुम वह सब मुझसे सुनो। पूर्वकालमें भगवान् शिव निर्गुण, निर्विकल्प,

१५८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

निराकार, शक्तिरहित, चिन्मय तथा सत् और असत्‌से विलक्षण स्वरूपमें प्रतिष्ठित थे। फिर वे ही प्रभु सगुण और शक्तिमान् होकर विशिष्ट रूप धारण करके स्थित हुए। उनके साथ भगवती उमा विराजमान थीं। विप्रवर! वे भगवान् शिव दिव्य आकृतिसे सुशोभित हो रहे थे। उनके मनमें कोई विकार नहीं था। वे अपने परात्पर स्वरूपमें प्रतिष्ठित थे। मुनिश्रेष्ठ! उनके बायें अंगसे भगवान् विष्णु, दायें अंगसे मैं ब्रह्मा और मध्य अंग अर्थात् हृदयसे रुद्रदेव प्रकट हुए। मैं ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हुआ, भगवान् विष्णु जगत्‌का पालन करने लगे और स्वयं रुद्रने संहारका कार्य सँभाला। इस प्रकार भगवान् सदाशिव स्वयं ही तीन रूप धारण करके स्थित हुए। उन्हींकी आराधना करके मुझ लोकपितामह ब्रह्माने देवता, असुर और मनुष्य आदि सम्पूर्ण जीवोंकी सृष्टि की। दक्ष आदि प्रजापतियों और देवशिरोमणियोंकी सृष्टि करके मैं बहुत प्रसन्न हुआ तथा अपनेको सबसे अधिक ऊँचा मानने लगा। मुने! जब मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, वसिष्ठ, नारद, दक्ष और भृगु—इन महान् प्रभावशाली मानसपुत्रोंको मैंने उत्पन्न किया, तब मेरे हृदयसे अत्यन्त मनोहर रूपवाली एक सुन्दरी नारी उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'संध्या' था। वह दिनमें क्षीण हो जाती, परंतु सायंकालमें उसका रूप-सौन्दर्य खिल उठता था। वह मूर्तिमती सायं-संध्या ही थी और निरन्तर किसी मन्त्रका जप करती रहती थी। सुन्दर भौंहोंवाली वह नारी सौन्दर्यकी चरम सीमाको पहुँची हुई थी और मुनियोंके भी मनको मोहे लेती थी।

इसी तरह मेरे मनसे एक मनोहर पुरुष भी प्रकट हुआ, जो अत्यन्त अद्भुत था। उसके शरीरका मध्यभाग (कटिप्रदेश) पतला था। दाँतोंकी पंक्तियाँ बड़ी सुन्दर थीं। उसके अंगोंसे मतवाले हाथीकी-सी गन्ध प्रकट होती थी। नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान शोभा पाते थे। अंगोंमें केसर लगा था, जिसकी सुगन्ध नासिकाको तृप्त कर रही थी। उस पुरुषको देखकर दक्ष आदि मेरे सभी पुत्र अत्यन्त उत्सुक हो उठे। उनके मनमें विस्मय भर गया था। जगत्‌की सृष्टि करनेवाले मुझ जगदीश्वर ब्रह्माकी ओर देखकर उस पुरुषने विनयसे गर्दन झुका दी और मुझे प्रणाम करके कहा।

वह पुरुष बोला—ब्रह्मन्! मैं कौन-सा कार्य करूँगा? मेरे योग्य जो काम हो, उसमें मुझे लगाइये; क्योंकि विधाता! आज आप ही सबसे अधिक माननीय और योग्य पुरुष हैं। यह लोक आपसे ही शोभित हो रहा है।

ब्रह्माजीने कहा—भद्रपुरुष! तुम अपने इसी स्वरूपसे तथा फूलके बने हुए पाँच बाणोंसे स्त्रियों और पुरुषोंको मोहित करते हुए सृष्टिके सनातन कार्यको चलाओ। इस चराचर त्रिभुवनमें ये देवता आदि कोई भी जीव तुम्हारा तिरस्कार करनेमें समर्थ नहीं होंगे। तुम छिपे रूपसे प्राणियोंके हृदयमें प्रवेश करके सदा स्वयं उनके सुखका हेतु बनकर सृष्टिका सनातन कार्य चालू रखो। समस्त प्राणियोंका जो मन है, वह तुम्हारे पुष्पमय बाणका सदा अनायास ही अद्भुत लक्ष्य बन जायगा और तुम निरन्तर उन्हें मदमत्त किये रहोगे। यह मैंने तुम्हारा कर्म बताया है, जो सृष्टिका प्रवर्तक होगा और तुम्हारे ठीक-ठीक नाम क्या होंगे, इस बातको मेरे ये पुत्र बतायेंगे।

*रुद्रसंहिता * १५९

सुरश्रेष्ठ! ऐसा कहकर अपने पुत्रोंके लिये अपने कमलमय आसनपर चुपचाप मुखकी ओर दृष्टिपात करके मैं क्षणभरके बैठ गया। (अध्याय १-२) $\sim\sim\circ\sim\sim$

कामदेवके नामोंका निर्देश, उसका रतिके साथ विवाह तथा कुमारी संध्याका चरित्र—वसिष्ठ मुनिका चन्द्रभाग पर्वतपर उसको तपस्याकी विधि बताना

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर मेरे अभिप्रायको जाननेवाले मरीचि आदि मेरे पुत्र सभी मुनियोंने उस पुरुषका उचित नाम रखा। दक्ष आदि प्रजापतियोंने उसका मुँह देखते ही परोक्षके भी सारे वृत्तान्त जानकर उसे रहनेके लिये स्थान और पत्नी प्रदान की। मेरे पुत्र मरीचि आदि द्विजोंने उस पुरुषके नाम निश्चित करके उससे यह युक्तियुक्त बात कही।

ऋषि बोले—तुम जन्म लेते ही हमारे मनको भी मथने लगे हो। इसलिये लोकमें ‘मन्मथ’ नामसे विख्यात होओगे। मनोभव! तीनों लोकोंमें तुम इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हो, तुम्हारे समान सुन्दर दूसरा कोई नहीं है; अतः कामरूप होनेके कारण तुम ‘काम’ नामसे भी विख्यात होओ। लोगोंको मदमत्त बना देनेके कारण तुम्हारा एक नाम ‘मदन’ होगा। तुम बड़े दर्पसे उत्पन्न हुए हो, इसलिये ‘दर्पक’ कहलाओगे और सदर्प होनेके कारण ही जगत्‌में ‘कंदर्प’ नामसे भी तुम्हारी ख्याति होगी। समस्त देवताओंका सम्मिलित बल-पराक्रम भी तुम्हारे समान नहीं होगा। अतः सभी स्थानोंपर तुम्हारा अधिकार होगा और तुम सर्वव्यापी होओगे। जो आदिप्रजापति हैं, वे ही ये पुरुषोंमें श्रेष्ठ दक्ष तुम्हारी इच्छाके अनुरूप पत्नी स्वयं देंगे। वह तुम्हारी कामिनी (तुमसे अनुराग रखनेवाली) होगी।

ब्रह्माजीने कहा—मुने! तदनन्तर मैं वहाँसे अदृश्य हो गया। इसके बाद दक्ष मेरी बातका स्मरण करके कंदर्पसे बोले—‘कामदेव! मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई मेरी यह कन्या सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे सुशोभित है। इसे तुम अपनी पत्नी बनानेके लिये ग्रहण करो। यह गुणोंकी दृष्टिसे सर्वथा तुम्हारे योग्य है। महातेजस्वी मनोभव! यह सदा तुम्हारे साथ रहनेवाली और तुम्हारी

१६० * संक्षिप्त शिवपुराण *

रुचिके अनुसार चलनेवाली होगी। धर्मतः यह सदा तुम्हारे अधीन रहेगी।

ऐसा कहकर दक्षने अपने शरीरके पसीनेसे प्रकट हुई उस कन्याका नाम 'रति' रखकर उसे अपने आगे बैठाया और कंदर्पको संकल्पपूर्वक सौंप दिया। नारद! दक्षकी वह पुत्री रति बड़ी रमणीय और मुनियोंके मनको भी मोह लेनेवाली थी। उसके साथ विवाह करके कामदेवको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। अपनी रति नामक सुन्दरी स्त्रीको देखकर उसके हाव-भाव आदिसे अनुरंजित हो कामदेव मोहित हो गया। तात! उस समय बड़ा भारी उत्सव होने लगा, जो सबके सुखको बढ़ानेवाला था। प्रजापति दक्ष इस बातको सोचकर बड़े प्रसन्न थे कि मेरी पुत्री इस विवाहसे सुखी है। कामदेवको भी बड़ा सुख मिला। उसके सारे दुःख दूर हो गये। दक्षकन्या रति भी कामदेवको पाकर बहुत प्रसन्न हुई। जैसे संध्याकालमें मनोहारिणी विद्युन्मालाके साथ मेघ शोभा पाता है, उसी प्रकार रतिके साथ प्रिय वचन बोलनेवाला कामदेव बड़ी शोभा पा रहा था। इस प्रकार रतिके प्रति भारी मोहसे युक्त रतिपति कामदेवने उसे उसी तरह अपने हृदयके सिंहासनपर बिठाया, जैसे योगी पुरुष योगविद्याको हृदयमें धारण करता है। इसी प्रकार पूर्ण चन्द्रमुखी रति भी उस श्रेष्ठ पतिको पाकर उसी तरह सुशोभित हुई, जैसे श्रीहरिको पाकर पूर्णचन्द्रानना लक्ष्मी शोभा पाती हैं।

सूतजी कहते हैं—ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और भगवान् शंकरका स्मरण करके हर्षपूर्वक बोले—'महाभाग! विष्णुशिष्य! महामते! विधातः! आपने चन्द्रमौलि शिवकी यह अद्भुत लीला कही है। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि विवाहके पश्चात् जब कामदेव प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चला गया, दक्ष भी अपने घरको पधारे तथा आप और आपके मानसपुत्र भी अपने-अपने धामको चले गये, तब पितरोंको उत्पन्न करनेवाली ब्रह्मकुमारी संध्या कहाँ गयी? उसने क्या किया और किस पुरुषके साथ उसका विवाह हुआ? संध्याका यह सब चरित्र विशेषरूपसे बताइये।

ब्रह्माजीने कहा—मुने! संध्याका वह सारा शुभ चरित्र सुनो, जिसे सुनकर समस्त कामिनियाँ सदाके लिये सती-साध्वी हो सकती हैं। वह संध्या, जो पहले मेरी मानस-पुत्री थी, तपस्या करके शरीरको त्यागकर

* रुद्रसंहिता *
१६१

मुनिश्रेष्ठ मेधातिथिकी बुद्धिमती पुत्री होकर अरुन्धतीके नामसे विख्यात हुई। उत्तम व्रतका पालन करके उस देवीने ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरके कहनेसे श्रेष्ठ व्रतधारी महात्मा वसिष्ठको अपना पति चुना। वह सौम्य स्वरूपवाली देवी सबकी वन्दनीया और पूजनीया श्रेष्ठ पतिव्रताके रूपमें विख्यात हुई।

नारदजीने पूछा—भगवन्! संध्याने कैसे, किसलिये और कहाँ तप किया? किस प्रकार शरीर त्यागकर वह मेधातिथिकी पुत्री हुई? ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों देवताओंके बताये हुए श्रेष्ठ व्रतधारी महात्मा वसिष्ठको उसने किस तरह अपना पति बनाया? पितामह! यह सब मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। अरुन्धतीके इस कौतूहलपूर्ण चरित्रका आप यथार्थ-रूपसे वर्णन कीजिये।

ब्रह्माजीने कहा—मुने! संध्याके मनमें एक बार सकामभाव आ गया था, इसलिये उस साध्वीने यह निश्चय किया कि 'वैदिकमार्गके अनुसार मैं अग्निमें अपने इस शरीरकी आहुति दे दूँगी। आजसे इस भूतलपर कोई भी देहधारी उत्पन्न होते ही कामभावसे युक्त न हों, इसके लिये मैं कठोर तपस्या करके मर्यादा स्थापित करूँगी (तरुणावस्थासे पूर्व किसीपर भी कामका प्रभाव नहीं पड़ेगा, ऐसी सीमा निर्धारित करूँगी)। इसके बाद इस जीवनको त्याग दूँगी।'

मन-ही-मन ऐसा विचार करके संध्या चन्द्रभाग नामक उस श्रेष्ठ पर्वतपर चली गयी, जहाँसे चन्द्रभागा नदीका प्रादुर्भाव हुआ है। मनमें तपस्याका दृढ़ निश्चय ले संध्याको श्रेष्ठ पर्वतपर गयी हुई जान मैंने अपने समीप बैठे हुए वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान्, सर्वज्ञ, जितात्मा एवं ज्ञानयोगी पुत्र वसिष्ठसे कहा—'बेटा वसिष्ठ! मनस्विनी संध्या तपस्याकी अभिलाषासे चन्द्रभाग नामक पर्वतपर गयी है। तुम जाओ और उसे विधिपूर्वक दीक्षा दो। तात! वह तपस्याके भावको नहीं जानती है। इसलिये जिस तरह तुम्हारे यथोचित उपदेशसे उसे अभीष्ट लक्ष्यकी प्राप्ति हो सके, वैसा प्रयत्न करो।'

नारद! मैंने दयापूर्वक जब वसिष्ठको इस प्रकार आज्ञा दी, तब वे 'जो आज्ञा' कहकर एक तेजस्वी ब्रह्मचारीके रूपमें संध्याके पास गये। चन्द्रभाग पर्वतपर एक देवसरोवर है, जो जलाशयोचित गुणोंसे परिपूर्ण हो मानसरोवरके समान शोभा पाता है। वसिष्ठने उस सरोवरको देखा और उसके तटपर बैठी हुई संध्यापर भी दृष्टिपात किया। कमलोंसे प्रकाशित होनेवाला वह सरोवर


789 संक्षिप्त शिवपुराण—6 A

१६२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

तटपर बैठी हुई संध्यासे उपलक्षित हो उसी तरह सुशोभित हो रहा था, जैसे प्रदोषकालमें उदित हुए चन्द्रमा और नक्षत्रोंसे युक्त आकाश शोभा पाता है। सुन्दर भाववाली संध्याको वहाँ बैठी देख मुनिने कौतूहलपूर्वक उस बृहल्लोहित नामवाले सरोवरको अच्छी तरह देखा। उसी प्रकारभूत पर्वतके शिखरसे दक्षिण समुद्रकी ओर जाती हुई चन्द्रभागा नदीका भी उन्होंने दर्शन किया। जैसे गंगा हिमालयसे निकलकर समुद्रकी ओर जाती है, उसी प्रकार चन्द्रभागके पश्चिम शिखरका भेदन करके वह नदी समुद्रकी ओर जा रही थी। उस चन्द्रभाग पर्वतपर बृहल्लोहित सरोवरके किनारे बैठी हुई संध्याको देखकर वसिष्ठजीने आदरपूर्वक पूछा।

वसिष्ठजी बोले—भद्रे ! तुम इस निर्जन पर्वतपर किसलिये आयी हो? किसकी पुत्री हो और तुमने यहाँ क्या करनेका विचार किया है? मैं यह सब सुनना चाहता हूँ। यदि छिपानेयोग्य बात न हो तो बताओ।

महात्मा वसिष्ठकी यह बात सुनकर संध्याने उन महात्माकी ओर देखा। वे अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो ब्रह्मचर्य देह धारण करके आ गया हो। वे मस्तकपर जटा धारण किये बड़ी शोभा पा रहे थे। संध्याने उन तपोधनको आदरपूर्वक प्रणाम करके कहा।

संध्या बोली—ब्रह्मन्! मैं ब्रह्माजीकी पुत्री हूँ। मेरा नाम संध्या है और मैं तपस्या करनेके लिये इस निर्जन पर्वतपर आयी हूँ। यदि मुझे उपदेश देना आपको उचित जान पड़े तो आप मुझे तपस्याकी विधि बताइये। मैं यही करना चाहती हूँ। दूसरी कोई भी गोपनीय बात नहीं है। मैं तपस्याके भावको—उसके करनेके नियमको बिना जाने ही तपोवनमें आ गयी हूँ। इसलिये चिन्तासे सूखी जा रही हूँ और मेरा हृदय काँपता है।

संध्याकी बात सुनकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीने, जो स्वयं सारे कार्योंके ज्ञाता थे, उससे दूसरी कोई बात नहीं पूछी। वह मन-ही-मन तपस्याका निश्चय कर चुकी थी और उसके लिये अत्यन्त उद्यमशील थी। उस समय वसिष्ठने मनसे भक्तवत्सल भगवान् शंकरका स्मरण करके इस प्रकार कहा।

वसिष्ठजी बोले—शुभानने ! जो सबसे महान् और उत्कृष्ट तेज हैं, जो उत्तम और महान् तप हैं तथा जो सबके परमाराध्य परमात्मा हैं, उन भगवान् शम्भुको तुम हृदयमें धारण करो। जो अकेले ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके आदिकारण हैं, उन त्रिलोकीके आदिस्रष्टा, अद्वितीय पुरुषोत्तम शिवका भजन करो। आगे बताये जानेवाले मन्त्रसे देवेश्वर शम्भुकी आराधना करो। उससे तुम्हें सब कुछ मिल जायगा, इसमें संशय नहीं है। ‘ॐ नमः शंकराय ॐ’ इस मन्त्रका निरन्तर जप करते हुए मौन तपस्या आरम्भ करो और जो मैं नियम बताता हूँ, उन्हें सुनो। तुम्हें मौन रहकर ही स्नान करना होगा, मौनालम्बनपूर्वक ही महादेवजीकी पूजा करनी होगी। प्रथम दो बार छठे समयमें तुम केवल जलका पूर्ण आहार कर सकती हो। जब तीसरी बार छठा समय आये, तब केवल उपवास किया करो। इस तरह तपस्याकी समाप्तितक छठे कालमें


789 संक्षिप्त शिवपुराण—6 B

* रुद्रसंहिता * १६३

जलाहार एवं उपवासकी क्रिया होती रहेगी।
देवि! इस प्रकार की जानेवाली मौन
तपस्या ब्रह्मचर्यका फल देनेवाली तथा
सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली
होती है। यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय
नहीं है। अपने चित्तमें ऐसा शुभ उद्देश्य
लेकर इच्छानुसार शंकरजीका चिन्तन
करो, वे प्रसन्न होनेपर तुम्हें अवश्य ही
अभीष्ट फल प्रदान करेंगे।

इस तरह संध्याको तपस्या करनेकी
विधिका उपदेश दे मुनिवर वसिष्ठ
यथोचितरूपसे उससे विदा ले वहीं
अन्तर्धान हो गये।

(अध्याय ३–५)


संध्याकी तपस्या, उसके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा उससे संतुष्ट हुए शिवका उसे अभीष्ट वर दे मेधातिथिके यज्ञमें भेजना

ब्रह्माजी कहते हैं—मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ महाप्राज्ञ नारद! तपस्याके नियमका उपदेश दे जब वसिष्ठजी अपने घर चले गये, तब तपके उस विधानको समझकर संध्या मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। फिर तो वह सानन्द मनसे तपस्विनीके योग्य वेष बनाकर बृहल्लोहित सरोवरके तटपर ही तपस्या करने लगी। वसिष्ठजीने तपस्याके लिये जिस मन्त्रको साधन बताया था, उसीसे उत्तम भक्तिभावके साथ वह भगवान् शंकरकी आराधना करने लगी। उसने भगवान् शिवमें अपने चित्तको लगा दिया और एकाग्र मनसे वह बड़ी भारी तपस्या करने लगी। उस तपस्यामें लगे हुए उसके चार युग व्यतीत हो गये। तब भगवान् शिव उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो बड़े प्रसन्न हुए तथा बाहर-भीतर और आकाशमें अपने स्वरूपका दर्शन कराकर जिस रूपका वह चिन्तन करती थी, उसी रूपसे उसकी आँखोंके सामने प्रकट हो गये। उसने मनसे जिनका चिन्तन किया था, उन्हीं प्रभु शंकरको अपने सामने खड़ा देख वह अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गयी। भगवान्‌का मुखारविन्द बड़ा प्रसन्न दिखायी देता था। उनके स्वरूपसे शान्ति बरस रही थी। वह सहसा भयभीत हो सोचने लगी कि ‘मैं भगवान् हरसे क्या कहूँ? किस तरह इनकी स्तुति करूँ?’ इसी चिन्तामें पड़कर उसने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये। नेत्र बंद कर लेनेपर भगवान् शिवने उसके हृदयमें प्रवेश करके


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१६४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

उसे दिव्य ज्ञान दिया, दिव्य वाणी और दिव्य दृष्टि प्रदान की। जब उसे दिव्य ज्ञान, दिव्य दृष्टि और दिव्य वाणी प्राप्त हो गयी, तब वह कठिनाईसे ज्ञात होनेवाले जगदीश्वर शिवको प्रत्यक्ष देखकर उनकी स्तुति करने लगी।

संध्या बोली—जो निराकार और परम ज्ञानगम्य हैं, जो न तो स्थूल हैं, न सूक्ष्म हैं और न उच्च ही हैं तथा जिनके स्वरूपका योगीजन अपने हृदयके भीतर चिन्तन करते हैं, उन्हीं लोकस्रष्टा आप भगवान् शिवको नमस्कार है। जिन्हें शर्व कहते हैं, जो शान्तस्वरूप, निर्मल, निर्विकार और ज्ञानगम्य हैं, जो अपने ही प्रकाशमें स्थित हो प्रकाशित होते हैं, जिनमें विकारका अत्यन्त अभाव है, जो आकाशमार्गकी भाँति निर्गुण, निराकार बताये गये हैं तथा जिनका रूप अज्ञानान्धकारमार्गसे सर्वथा परे है, उन नित्यप्रसन्न आप भगवान् शिवको मैं प्रणाम करती हूँ। जिनका रूप एक (अद्वितीय), शुद्ध, बिना मायाके प्रकाशमान, सच्चिदानन्द-मय, सहज निर्विकार, नित्यानन्दमय, सत्य, ऐश्वर्यसे युक्त, प्रसन्न तथा लक्ष्मीको देनेवाला है, उन आप भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके स्वरूपकी ज्ञानरूपसे ही उद्भावना की जा सकती है, जो इस जगत्से सर्वथा भिन्न है एवं सत्त्वप्रधान, ध्यानके योग्य, आत्मस्वरूप, सारभूत, सबको पार लगानेवाला तथा पवित्र वस्तुओंमें भी परम पवित्र है, उन आप महेश्वरको मेरा नमस्कार है। आपका जो स्वरूप शुद्ध, मनोहर, रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित तथा स्वच्छ कर्पूरके समान गौरवर्ण है, जिसने अपने हाथोंमें वर, अभय, शूल और मुण्ड धारण कर रखा है, उस दिव्य, चिन्मय, सगुण, साकार विग्रहसे सुशोभित आप योगयुक्त भगवान् शिवको नमस्कार है। आकाश, पृथ्वी, दिशाएँ, जल, तेज तथा काल—ये जिनके रूप हैं, उन आप परमेश्वरको नमस्कार है।*

प्रधान (प्रकृति) और पुरुष जिनके शरीररूपसे प्रकट हुए हैं अर्थात् वे दोनों जिनके शरीर हैं, इसीलिये जिनका यथार्थ रूप अव्यक्त (बुद्धि आदिसे परे) है, उन भगवान् शंकरको बारंबार नमस्कार है। जो ब्रह्मा होकर जगत्की सृष्टि करते हैं, जो विष्णु होकर संसारका पालन करते हैं तथा जो रुद्र होकर अन्तमें इस सृष्टिका संहार करेंगे, उन्हीं आप भगवान् सदाशिवको बारंबार नमस्कार है। जो कारणके भी कारण हैं, दिव्य अमृतरूप ज्ञान तथा अणिमा आदि ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हैं, समस्त लोकान्तरोंका वैभव देनेवाले हैं, स्वयं


* संध्योवाच—
निराकारं ज्ञानगम्यं परं यन्नैव स्थूलं नापि सूक्ष्मं न चोच्चम्। अन्तश्चिन्त्यं योगिभिस्तस्य रूपं तस्मै तुभ्यं लोककर्त्रे नमोऽस्तु॥
शर्वं शान्तं निर्मलं निर्विकारं ज्ञानगम्यं स्वप्रकाशेऽविकारम्। खाध्वप्रख्यं ध्वान्तमार्गात्परस्ताद् रूपं यस्य त्वां नमामि प्रसन्नम्॥
एकं शुद्धं दीप्यमानं विनाजां चिदानन्दं सहजं चाविकारि। नित्यानन्दं सत्यभूतिप्रसन्नं यस्य श्रीदं रूपमस्मै नमस्ते॥
विद्याकारोद्भावनीयं प्रभिन्नं सत्त्वच्छन्दं ध्येयमात्मस्वरूपम्। सारं पारं पावनानां पवित्रं तस्मै रूपं यस्य चैवं नमस्ते॥
यत्वाकारं शुद्धरूपं मनोज्ञं रत्नाकल्पं स्वच्छकर्पूरगौरम्। इष्टाभीती शूलमुण्डे दधानं हस्तैर्नमौ योगयुक्ताय तुभ्यम्॥
गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरेव च। पुनः कालश्च रूपाणि यस्य तुभ्यं नमोऽस्तु ते॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ६। १२—१७)

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