शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* रुद्रसंहिता * १६७
विवाह उन्होंने चन्द्रमाके साथ किया। चन्द्रमा अन्य सब पत्नियोंको छोड़कर केवल रोहिणीसे प्रेम करने लगे। इसके कारण क्रोधसे भरे हुए दक्षने जब चन्द्रमाको शाप दे दिया, तब समस्त देवता तुम्हारे पास आये। परंतु संध्ये! तुम्हारा मन तो मुझमें लगा हुआ था, अतः तुमने ब्रह्माजीके साथ आये हुए उन देवताओंपर दृष्टिपात ही नहीं किया। तब ब्रह्माजीने आकाशकी ओर देखकर और चन्द्रमा पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त करें, यह उद्देश्य मनमें रखकर उन्हें शापसे छुड़ानेके लिये एक नदीकी सृष्टि की, जो चन्द्र या चन्द्रभागा नदीके नामसे विख्यात हुई। चन्द्रभागाके प्रादुर्भावकालमें ही महर्षि मेधातिथि यहाँ उपस्थित हुए थे। तपस्याके द्वारा उनकी समानता करनेवाला न तो कोई हुआ है, न है और न होगा ही। उन महर्षिने महान् विधि-विधानके साथ दीर्घकालतक चलनेवाले ज्योतिष्टोम नामक यज्ञका आरम्भ किया है। उसमें अग्निदेव पूर्णरूपसे प्रज्वलित हो रहे हैं। उसी आगमें तुम अपने शरीरको डाल दो और परम पवित्र हो जाओ। ऐसा करनेसे इस समय तुम्हारी वह प्रतिज्ञा पूर्ण हो जायगी।
इस प्रकार संध्याको उसके हितका उपदेश देकर देवेश्वर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये।
(अध्याय ६)
संध्याकी आत्माहुति, उसका अरुन्धतीके रूपमें अवतीर्ण होकर मुनिवर वसिष्ठके साथ विवाह करना, ब्रह्माजीका रुद्रके विवाहके लिये प्रयत्न और चिन्ता तथा भगवान् विष्णुका उन्हें 'शिवा' की आराधनाके लिये उपदेश देकर चिन्तामुक्त करना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! जब वर देकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये, तब संध्या भी उसी स्थानपर गयी, जहाँ मुनि मेधातिथि यज्ञ कर रहे थे। भगवान् शंकरकी कृपासे उसे किसीने वहाँ नहीं देखा। उसने उस तेजस्वी ब्रह्मचारीका स्मरण किया, जिसने उसके लिये तपस्याकी विधिका उपदेश दिया था। महामुने! पूर्वकालमें महर्षि वसिष्ठने मुझ परमेष्ठीकी आज्ञासे एक तेजस्वी ब्रह्मचारीका वेष धारण करके उसे तपस्या करनेके लिये उपयोगी नियमोंका उपदेश दिया था। संध्या अपनेको तपस्याका उपदेश देनेवाले उन्हीं ब्रह्मचारी ब्राह्मण वसिष्ठको पतिरूपसे मनमें रखकर उस महायज्ञमें प्रज्वलित अग्निके समीप गयी। उस समय भगवान् शंकरकी कृपासे मुनियोंने उसे नहीं देखा। ब्रह्माजीकी वह पुत्री बड़े हर्षके साथ उस अग्निमें प्रविष्ट हो गयी। उसका पुरोडाशमय* शरीर तत्काल दग्ध हो गया। उस पुरोडाशकी अलक्षित गन्ध सब ओर फैल गयी। अग्निने भगवान् शंकरकी
* यज्ञभाग।
१६८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
आज्ञासे उसके सुवर्ण-जैसे शरीरको जलाकर शुद्ध करके पुनः सूर्यमण्डलमें पहुँचा दिया। तब सूर्यने पितरों और देवताओं-की तृप्तिके लिये उसे दो भागोंमें विभक्त करके अपने रथमें स्थापित कर दिया।
मुनीश्वर! उसके शरीरका ऊपरी भाग प्रातःसंध्या हुआ, जो दिन और रातके बीचमें पड़नेवाली आदिसंध्या है तथा उसके शरीरका शेष भाग सायंसंध्या हुआ, जो दिन और रातके मध्यमें होनेवाली अन्तिम संध्या है! सायंसंध्या सदा ही पितरोंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाली होती है। सूर्योदयसे पहले जब अरुणोदय हो— प्राचीके क्षितिजमें लाली छा जाय, तब प्रातःसंध्या प्रकट होती है, जो देवताओंको प्रसन्न करनेवाली है। जब लाल कमलके समान सूर्य अस्त हो जाते हैं, उसी समय सदा सायंसंध्याका उदय होता है, जो पितरोंको आनन्द प्रदान करनेवाली है। परम दयालु भगवान् शिवने उसके मनसहित प्राणोंको दिव्य शरीरसे युक्त देहधारी बना दिया। जब मुनिके यज्ञकी समाप्तिका अवसर आया, तब वह अग्निकी ज्वालामें महर्षि मेधातिथिको तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली पुत्रीके रूपमें प्राप्त हुई। मुनिने बड़े आमोदके साथ उस समय उस पुत्रीको ग्रहण किया। मुने! उन्होंने यज्ञके लिये उसे नहलाकर अपनी गोदमें बिठा लिया। शिष्योंसे घिरे हुए महामुनि मेधातिथिको वहाँ बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। उन्होंने उसका नाम 'अरुन्धती' रखा। वह किसी भी कारणसे धर्मका अवरोध नहीं करती थी; अतः उसी गुणके कारण उसने स्वयं यह त्रिभुवन-विख्यात नाम प्राप्त किया। देवर्षे! यज्ञको समाप्त करके कृतकृत्य हो वे मुनि पुत्रीकी प्राप्ति होनेसे बहुत प्रसन्न थे और अपने शिष्योंके साथ आश्रममें रहकर सदा उसीका लालन-पालन करते थे। देवी अरुन्धती चन्द्रभागा नदीके तटपर तापसारण्यके भीतर मुनिवर मेधातिथिके उस आश्रममें धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। जब वह विवाहके योग्य हो गयी, तब मैंने, विष्णु तथा महेश्वरने मिलकर मुझ ब्रह्माके पुत्र वसिष्ठके साथ उसका विवाह करा दिया। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशके हाथोंसे निकले हुए जलसे शिप्रा आदि सात परम पवित्र नदियाँ उत्पन्न हुईं।
मुने! मेधातिथिकी पुत्री महासाध्वी अरुन्धती समस्त पतिव्रताओंमें श्रेष्ठ थी, वह महर्षि वसिष्ठको पतिरूपमें पाकर उनके साथ बड़ी शोभा पाने लगी। उससे शक्ति
- रुद्रसंहिता * १६१
आदि शुभ एवं श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए। मुनिश्रेष्ठ! वह प्रियतम पति वसिष्ठको पाकर विशेष शोभा पाने लगी। मुनि- शिरोमणे! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष संध्याके पवित्र चरित्रका वर्णन किया है, जो समस्त कामनाओंके फलोंको देनेवाला, परम पावन और दिव्य है। जो स्त्री या शुभ व्रतका आचरण करनेवाला पुरुष इस प्रसंगको सुनता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।
प्रजापति ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर नारदजीका मन प्रसन्न हो गया और वे इस प्रकार बोले।
नारदजीने कहा—ब्रह्मन्! आपने अरुन्धतीकी तथा पूर्वजन्ममें उसकी स्वरूपभूता संध्याकी बड़ी उत्तम दिव्य कथा सुनायी है, जो शिवभक्तिकी वृद्धि करनेवाली है। धर्मज्ञ! अब आप भगवान् शिवके उस परम पवित्र चरित्रका वर्णन कीजिये, जो दूसरोंके पापोंका विनाश करनेवाला, उत्तम एवं मंगलदायक है। जब कामदेव रतिसे विवाह करके हर्षपूर्वक चला गया, दक्ष आदि अन्य मुनि भी जब अपने-अपने स्थानको पधारे और जब संध्या तपस्या करनेके लिये चली गयी, उसके बाद वहाँ क्या हुआ?
ब्रह्माजीने कहा—विप्रवर नारद! तुम धन्य हो, भगवान् शिवके सेवक हो; अतः शिवकी लीलासे युक्त जो उनका शुभ चरित्र है, उसे भक्तिपूर्वक सुनो। तात! पूर्वकालमें मैं एक बार जब मोहमें पड़ गया और भगवान् शंकरने मेरा उपहास किया, तब मुझे बड़ा क्षोभ हुआ था। वस्तुतः शिवकी मायाने मुझे मोह लिया था, इसलिये मैं भगवान् शिवके प्रति ईर्ष्या करने लगा। किस प्रकार, सो बताता हूँ; सुनो। मैं उस स्थानपर गया, जहाँ दक्षराज मुनि उपस्थित थे। वहीं रतिके साथ कामदेव भी था। नारद! उस समय मैंने बड़ी प्रसन्नताके साथ दक्ष तथा दूसरे पुत्रोंको सम्बोधित करके वार्तालाप आरम्भ किया। उस वार्तालापके समय मैं शिवकी मायासे पूर्णतया मोहित था; अतः मैंने कहा—'पुत्रो! तुम्हें ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे महादेवजी किसी कमनीय कान्तिवाली स्त्रीका पाणिग्रहण करें।' इसके बाद मैंने भगवान् शिवको मोहित करनेका भार रतिसहित कामदेवको सौंपा। कामदेवने मेरी आज्ञा मानकर कहा— 'प्रभो! सुन्दरी स्त्री ही मेरा अस्त्र है, अतः शिवजीको मोहित करनेके लिये किसी नारीकी सृष्टि कीजिये।' यह सुनकर मैं चिन्तामें पड़ गया और लंबी साँस खींचने लगा। मेरे उस निःश्वाससे राशि-राशि पुष्पोंसे विभूषित वसन्तका प्रादुर्भाव हुआ। वसन्त और मलयानल—ये दोनों मदनके सहायक हुए। इनके साथ जाकर कामदेवने वामदेवको मोहनेकी बारंबार चेष्टा की, परंतु उसे सफलता न मिली। जब वह निराश होकर लौट आया, तब उसकी बात सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। उस समय मेरे मुखसे जो निःश्वास वायु चली, उससे मारगणोंकी उत्पत्ति हुई। उन्हें मदनकी सहायताके लिये आदेश देकर मैंने पुनः उन सबको शिवजीके पास भेजा, परंतु महान् प्रयत्न करनेपर भी वे भगवान् शिवको मोहमें न डाल सके। काम सपरिवार लौट
१७० * संक्षिप्त शिवपुराण *
आया और मुझे प्रणाम करके अपने स्थानको चला गया।
उसके चले जानेपर मैं मन-ही-मन सोचने लगा कि निर्विकार तथा मनको वशमें रखनेवाले योगपरायण भगवान् शंकर किसी स्त्रीको अपनी सहधर्मिणी बनाना कैसे स्वीकार करेंगे। यही सोचते-सोचते मैंने भक्तिभावसे उन भगवान् श्रीहरिका स्मरण किया, जो साक्षात् शिवस्वरूप तथा मेरे शरीरके जन्मदाता हैं। मैंने दीन वचनोंसे युक्त शुभ स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति की। उस स्तुतिको सुनकर भगवान् शीघ्र ही मेरे सामने प्रकट हो गये। उनके चार भुजाएँ शोभा पाती थीं। नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान सुन्दर थे। उन्होंने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म ले रखे थे। उनके श्याम शरीरपर पीताम्बरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वे भगवान् श्रीहरि भक्त-प्रिय हैं— अपने भक्त उन्हें बहुत प्यारे हैं। सबके उत्तम शरणदाता उन श्रीहरिको उस रूपमें देखकर मेरे नेत्रोंसे प्रेमाश्रुओंकी धारा बह चली और मैं गद्गद कण्ठसे बारंबार उनकी स्तुति करने लगा। मेरे उस स्तोत्रको सुनकर अपने भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले भगवान् विष्णु बहुत प्रसन्न हुए और शरणमें आये हुए मुझ ब्रह्मासे बोले—‘महाप्राज्ञ विधात:! लोकस्रष्टा ब्रह्मन्! तुम धन्य हो। बताओ, तुमने किसलिये आज मेरा स्मरण किया है और किस निमित्तसे यह स्तुति की जा रही है? तुमपर कौन-सा महान् दुःख आ पड़ा है? उसे मेरे सामने इस समय कहो। मैं वह सारा दुःख मिटा दूँगा। इस विषयमें कोई संदेह या अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।’
तब ब्रह्माजीने सारा प्रसंग सुनाकर कहा—‘केशव! यदि भगवान् शिव किसी तरह पत्नीको ग्रहण कर लें तो मैं सुखी हो जाऊँगा, मेरे अन्तःकरणका सारा दुःख दूर हो जायगा। इसीके लिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ।’
मेरी यह बात सुनकर भगवान् मधुसूदन हँस पड़े और मुझ लोकस्रष्टा ब्रह्माका हर्ष बढ़ाते हुए मुझसे शीघ्र ही यों बोले— “विधातः! तुम मेरा वचन सुनो। यह तुम्हारे भ्रमका निवारण करनेवाला है। मेरा वचन ही वेद-शास्त्र आदिका वास्तविक सिद्धान्त है। शिव ही सबके कर्ता-भर्ता (पालक) और हर्ता (संहारक) हैं। वे ही परात्पर हैं। परब्रह्म, परेश, निर्गुण, नित्य, अनिर्देश्य, निर्विकार, अद्वितीय, अच्युत, अनन्त, सबका अन्त करनेवाले, स्वामी और सर्वव्यापी परमात्मा एवं परमेश्वर हैं। सृष्टि, पालन और संहारके कर्ता, तीनों गुणोंको आश्रय देनेवाले, व्यापक, ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामसे प्रसिद्ध, रजोगुण, सत्त्वगुण तथा तमोगुणसे परे, मायासे ही भेदयुक्त प्रतीत होनेवाले, निरीह, मायारहित, मायाके स्वामी या प्रेरक, चतुर, सगुण, स्वतन्त्र, आत्मानन्दस्वरूप, निर्विकल्प, आत्माराम, निर्द्वन्द्व, भक्तपरवश, सुन्दर विग्रहसे सुशोभित योगी, नित्य योगपरायण, योग-मार्गदर्शक, गर्वहारी, लोकेश्वर और सदा दीनवत्सल हैं। तुम उन्हींकी शरणमें जाओ। सर्वात्मना शम्भुका भजन करो। इससे संतुष्ट होकर वे तुम्हारा कल्याण करेंगे। ब्रह्मन्! यदि तुम्हारे मनमें यह विचार हो कि शंकर पत्नीका पाणिग्रहण करें तो शिवाको प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे शिवका स्मरण करते हुए
* रुद्रसंहिता * १७१
उत्तम तपस्या करो। अपने उस मनोरथको हृदयमें रखते हुए देवी शिवाका ध्यान करो। वे देवेश्वरी यदि प्रसन्न हो जायँ तो सारा कार्य सिद्ध कर देंगी। यदि शिवा सगुणरूपसे अवतार ग्रहण करके लोकमें किसीकी पुत्री हो मानवशरीर ग्रहण करें तो वे निश्चय ही महादेवजीकी पत्नी हो सकती हैं। ब्रह्मन्! तुम दक्षको आज्ञा दो, वे भगवान् शिवके लिये पत्नीका उत्पादन करनेके निमित्त स्वतः भक्तिभावसे प्रयत्नपूर्वक तपस्या करें। तात! शिवा और शिव दोनोंको भक्तके अधीन जानना चाहिये। वे निर्गुण परब्रह्मस्वरूप होते हुए भी स्वेच्छासे सगुण हो जाते हैं।
'विधे! भगवान् शिवकी इच्छासे प्रकट हुए हम दोनोंने जब उनसे प्रार्थना की थी, तब पूर्वकालमें भगवान् शंकरने जो बात कही थी, उसे याद करो। ब्रह्मन्! अपनी शक्तिसे सुन्दर लीला-विहार करनेवाले निर्गुण शिवने स्वेच्छासे सगुण होकर मुझको और तुमको प्रकट करनेके पश्चात् तुम्हें तो सृष्टि-कार्य करनेका आदेश दिया और उमासहित उन अविनाशी सृष्टिकर्ता प्रभुने मुझे उस सृष्टिके पालनका कार्य सौंपा। फिर नाना लीला-विशारद उन दयालु स्वामीने हँसकर आकाशकी ओर देखते हुए बड़े प्रेमसे कहा—विष्णो ! मेरा उत्कृष्ट रूप इन विधाताके अंगसे इस लोकमें प्रकट होगा, जिसका नाम रुद्र होगा। रुद्रका रूप ऐसा ही होगा, जैसा मेरा है। वह मेरा पूर्णरूप होगा, तुम दोनोंको सदा उसकी पूजा करनी चाहिये। वह तुम दोनोंके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाला होगा। वही जगत्का प्रलय करनेवाला होगा। वह समस्त गुणोंका द्रष्टा, निर्विशेष एवं उत्तम योगका पालक होगा। यद्यपि तीनों देवता मेरे ही रूप हैं, तथापि विशेषतः रुद्र मेरा पूर्णरूप होगा। पुत्रो! देवी उमाके भी तीन रूप होंगे। एक रूपका नाम लक्ष्मी होगा, जो इन श्रीहरिकी पत्नी होंगी। दूसरा रूप ब्रह्मपत्नी सरस्वती हैं। तीसरा रूप सतीके नामसे प्रसिद्ध होगा। सती उमाका पूर्णरूप होंगी। वे ही भावी रुद्रकी पत्नी होंगी।'
‘‘ऐसा कहकर भगवान् महेश्वर हमपर कृपा करनेके पश्चात् वहाँसे अन्तर्धान हो गये और हम दोनों सुखपूर्वक अपने-अपने कार्यमें लग गये। ब्रह्मन्! समय पाकर मैं और तुम दोनों सपत्नीक हो गये और साक्षात् भगवान् शंकर रुद्रनामसे अवतीर्ण हुए। वे इस समय कैलास पर्वतपर निवास करते हैं। प्रजेश्वर! अब शिवा भी सती नामसे अवतीर्ण होनेवाली हैं। अतः तुम्हें उनके उत्पादनके लिये ही यत्न करना चाहिये।’’
ऐसा कहकर मुझपर बड़ी भारी दया करके भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये और मुझे उनकी बातें सुनकर बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ।
(अध्याय ७—१०)
~~ o ~~
दक्षकी तपस्या और देवी शिवाका उन्हें वरदान देना
नारदजीने पूछा—पूज्य पिताजी! दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दक्षने तपस्या करके देवीसे कौन-सा वर प्राप्त किया तथा वे देवी किस प्रकार दक्षकी कन्या हुईं?
१७२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
ब्रह्माजीने कहा—नारद! तुम धन्य हो! इन सभी मुनियोंके साथ भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनो। मेरी आज्ञा पाकर उत्तम बुद्धिवाले महाप्रजापति दक्षने क्षीरसागरके उत्तर तटपर स्थित हो देवी जगदम्बिकाको पुत्रीके रूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा तथा उनके प्रत्यक्ष दर्शनकी कामना लिये उन्हें हृदय-मन्दिरमें विराजमान करके तपस्या प्रारम्भ की। दक्षने मनको संयममें रखकर दृढ़तापूर्वक कठोर व्रतका पालन करते हुए शौच-संतोषादि नियमोंसे युक्त हो तीन हजार दिव्य वर्षोंतक तप किया। वे कभी जल पीकर रहते, कभी हवा पीते और कभी सर्वथा उपवास करते थे। भोजनके नामपर कभी सूखे पत्ते चबा लेते थे।
मुनिश्रेष्ठ नारद! तदनन्तर यम-नियमादिसे युक्त हो जगदम्बाकी पूजामें लगे हुए दक्षको देवी शिवाने प्रत्यक्ष दर्शन दिया। जगन्मयी जगदम्बाका प्रत्यक्ष दर्शन पाकर प्रजापति दक्षने अपने-आपको कृतकृत्य माना। वे कालिकादेवी सिंहपर आरूढ़ थीं। उनकी अंगकान्ति श्याम थी। मुख बड़ा ही मनोहर था। वे चार भुजाओंसे युक्त थीं और हाथोंमें वरद, अभय, नील कमल और खड्ग धारण किये हुए थीं। उनकी मूर्ति बड़ी मनोहारिणी थी। नेत्र कुछ-कुछ लाल थे। खुले हुए केश बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाली उन जगदम्बाको भलीभाँति प्रणाम करके दक्ष विचित्र वचनावलियोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे।
दक्षने कहा—जगदम्ब! महामाये! जगदीशे! महेश्वरि! आपको नमस्कार है। आपने कृपा करके मुझे अपने स्वरूपका दर्शन कराया है। भगवति! आद्ये! मुझपर प्रसन्न होइये। शिवरूपिणि! प्रसन्न होइये। भक्तवरदायिनि! प्रसन्न होइये। जगन्माये! आपको मेरा नमस्कार है।*
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! संयत चित्तवाले दक्षके इस प्रकार स्तुति करनेपर महेश्वरी शिवाने स्वयं ही उनके अभिप्रायको जान लिया तो भी दक्षसे इस प्रकार कहा—'दक्ष! तुम्हारी इस उत्तम भक्तिसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुम अपना मनोवांछित वर माँगो। तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।'
* प्रसीद भगवत्याद्ये प्रसीद शिवरूपिणि। प्रसीद भक्तवरदे जगन्माये नमोऽस्तु ते॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० १२।१४)
* रुद्रसंहिता * १७३
जगदम्बाकी यह बात सुनकर प्रजापति दक्ष बहुत प्रसन्न हुए और उन शिवाको बारंबार प्रणाम करते हुए बोले।
दक्षने कहा—जगदम्ब! महामाये! यदि आप मुझे वर देनेके लिये उद्यत हैं तो मेरी बात सुनिये और प्रसन्नतापूर्वक मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये। मेरे स्वामी जो भगवान् शिव हैं, वे रुद्रनाम धारण करके ब्रह्माजीके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए हैं। वे परमात्मा शिवके पूर्णावतार हैं। परंतु आपका कोई अवतार नहीं हुआ। फिर उनकी पत्नी कौन होगी ? अतः शिवे! आप भूतलपर अवतीर्ण होकर उन महेश्वरको अपने रूप-लावण्यसे मोहित कीजिये। देवि! आपके सिवा दूसरी कोई स्त्री रुद्रदेवको कभी मोहित नहीं कर सकती। इसलिये आप मेरी पुत्री होकर इस समय महादेवजीकी पत्नी होइये। इस प्रकार सुन्दर लीला करके आप हरमोहिनी (भगवान् शिवको मोहित करनेवाली) बनिये। देवि! यही मेरे लिये वर है। यह केवल मेरे ही स्वार्थकी बात हो, ऐसा नहीं सोचना चाहिये। इसमें मेरे ही साथ सम्पूर्ण जगत्का भी हित है। ब्रह्मा, विष्णु और शिवमेंसे ब्रह्माजीकी प्रेरणासे मैं यहाँ आया हूँ।
प्रजापति दक्षका यह वचन सुनकर जगदम्बिका शिवा हँस पड़ीं और मन ही-मन भगवान् शिवका स्मरण करके यों बोलीं।
देवीने कहा—तात! प्रजापते! दक्ष! मेरी उत्तम बात सुनो। मैं सत्य कहती हूँ, तुम्हारी भक्तिसे अत्यन्त प्रसन्न हो तुम्हें सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तु देनेके लिये उद्यत हूँ। दक्ष! यद्यपि मैं महेश्वरी हूँ, तथापि तुम्हारी भक्तिके अधीन हो तुम्हारी पत्नीके गर्भसे तुम्हारी पुत्रीके रूपमें अवतीर्ण होऊँगी— इसमें संशय नहीं है। अनघ! मैं अत्यन्त दुस्सह तपस्या करके ऐसा प्रयत्न करूँगी जिससे महादेवजीका वर पाकर उनकी पत्नी हो जाऊँ। इसके सिवा और किसी उपायसे कार्य सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि वे भगवान् सदाशिव सर्वथा निर्विकार हैं, ब्रह्मा और विष्णुके भी सेव्य हैं तथा नित्य परिपूर्णरूप ही हैं। मैं सदा उनकी दासी और प्रिया हूँ। प्रत्येक जन्ममें वे नानारूपधारी शम्भु ही मेरे स्वामी होते हैं। भगवान् सदाशिव अपने दिये हुए वरके प्रभावसे ब्रह्माजीकी भृकुटिसे रुद्ररूपमें अवतीर्ण हुए हैं। मैं भी उनके वरसे उनकी आज्ञाके अनुसार यहाँ अवतार लूँगी। तात! अब तुम अपने घरको जाओ। इस कार्यमें जो मेरी दूती अथवा सहायिका होगी, उसे मैंने जान लिया है। अब शीघ्र ही मैं तुम्हारी पुत्री होकर महादेवजीकी पत्नी बनूँगी।
दक्षसे यह उत्तम वचन कहकर मन-ही-मन शिवकी आज्ञा प्राप्त करके देवी शिवाने शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए फिर कहा—'प्रजापते! परंतु मेरा एक प्रण है, उसे तुम्हें सदा मनमें रखना चाहिये। मैं उस प्रणको सुना देती हूँ। तुम उसे सत्य समझो, मिथ्या न मानो। यदि कभी मेरे प्रति तुम्हारा आदर घट जायगा, तब उसी समय मैं अपने शरीरको त्याग दूँगी, अपने स्वरूपमें लीन हो जाऊँगी अथवा दूसरा शरीर धारण कर लूँगी। मेरा यह कथन सत्य है। प्रजापते! प्रत्येक सर्ग या कल्पके लिये तुम्हें यह वर दे दिया गया—मैं तुम्हारी पुत्री होकर भगवान्
१७४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शिवकी पत्नी होऊँगी।'
मुख्य प्रजापति दक्षसे ऐसा कहकर महेश्वरी शिवा उनके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं। दुर्गाजीके अन्तर्धान होनेपर दक्ष भी अपने आश्रमको लौट गये और यह सोचकर प्रसन्न रहने लगे कि देवी शिवा मेरी पुत्री होनेवाली हैं।
(अध्याय ११-१२)
ब्रह्माजीकी आज्ञासे दक्षद्वारा मैथुनी सृष्टिका आरम्भ, अपने पुत्र हर्यश्वों और शबलाश्वोंको निवृत्तिमार्गमें भेजनेके कारण दक्षका नारदको शाप देना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! प्रजापति दक्ष अपने आश्रमपर जाकर मेरी आज्ञा पा हर्षभरे मनसे नाना प्रकारकी मानसिक सृष्टि करने लगे। उस प्रजासृष्टिको बढ़ती हुई न देख प्रजापति दक्षने अपने पिता मुझ ब्रह्मासे कहा।
दक्ष बोले—ब्रह्मन्! तात! प्रजानाथ! प्रजा बढ़ नहीं रही है। प्रभो! मैंने जितने जीवोंकी सृष्टि की थी, वे सब उतने ही रह गये हैं। प्रजानाथ! मैं क्या करूँ? जिस उपायसे ये जीव अपने-आप बढ़ने लगें, वह मुझे बताइये। तदनुसार मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा, इसमें संशय नहीं है।
ब्रह्माजीने (मैंने) कहा—तात! प्रजापते दक्ष! मेरी उत्तम बात सुनो और उसके अनुसार कार्य करो। सुरश्रेष्ठ भगवान् शिव तुम्हारा कल्याण करेंगे। प्रजेश! प्रजापति पंचजन (वीरण)-की जो परम सुन्दरी पुत्री असिक्नी है, उसे तुम पत्नीरूपसे ग्रहण करो। स्त्रीके साथ मैथुन-धर्मका आश्रय ले तुम पुनः इस प्रजासर्गको बढ़ाओ। असिक्नी-जैसी कामिनीके गर्भसे तुम बहुत-सी संतानें उत्पन्न कर सकोगे।
तदनन्तर मैथुन-धर्मसे प्रजाकी उत्पत्ति करनेके उद्देश्यसे प्रजापति दक्षने मेरी आज्ञाके अनुसार वीरण प्रजापतिकी पुत्रीके साथ विवाह किया। अपनी पत्नी वीरिणीके गर्भसे प्रजापति दक्षने दस हजार पुत्र उत्पन्न किये, जो हर्यश्व कहलाये। मुने! वे सब-के-सब पुत्र समान धर्मका आचरण करनेवाले हुए। पिताकी भक्तिमें तत्पर रहकर वे सदा वैदिक मार्गपर ही चलते थे। एक समय पिताने उन्हें प्रजाकी सृष्टि करनेका आदेश दिया। तात! तब वे सभी दाक्षायण नामधारी पुत्र सृष्टिके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये पश्चिम दिशाकी ओर गये। वहाँ नारायण-सर नामक परम पावन तीर्थ है, जहाँ दिव्य सिन्धु नद और समुद्रका संगम हुआ है। उस तीर्थजलका ही निकटसे स्पर्श करते उनका अन्तःकरण शुद्ध एवं ज्ञानसे सम्पन्न हो गया। उनकी आन्तरिक मलराशि धुल गयी और वे परमहंस-धर्ममें स्थित हो गये। दक्षके वे सभी पुत्र पिताके आदेशमें बँधे हुए थे। अतः मनको सुस्थिर करके प्रजाकी वृद्धिके लिये वहाँ तप करने लगे। वे सभी सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे।
नारद! जब तुम्हें पता लगा कि हर्यश्वगण सृष्टिके लिये तपस्या कर रहे हैं, तब भगवान् लक्ष्मीपतिके हार्दिक अभिप्रायको जानकर तुम स्वयं उनके पास गये और आदरपूर्वक यों बोले—'दक्षपुत्र हर्यश्वगण! तुमलोग पृथ्वीका अन्त देखे
- रुद्रसंहिता * १७५
बिना सृष्टि-रचना करनेके लिये कैसे उद्यत हो गये ?'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! हर्यश्व आलस्यसे दूर रहनेवाले थे और जन्मकालसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे सब-के-सब तुम्हारा उपर्युक्त कथन सुनकर स्वयं उसपर विचार करने लगे। उन्होंने यह विचार किया कि 'जो उत्तम शास्त्ररूपी पिताके निवृत्तिपरक आदेशको नहीं समझता, वह केवल रज आदि गुणोंपर विश्वास करनेवाला पुरुष सृष्टिनिर्माणका कार्य कैसे आरम्भ कर सकता है।' ऐसा निश्चय करके वे उत्तम बुद्धि और एकचित्तवाले दक्षकुमार नारदको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके ऐसे पथपर चले गये, जहाँ जाकर कोई वापस नहीं लौटता है। नारद! तुम भगवान् शंकरके मन हो और मुने! तुम समस्त लोकोंमें अकेले विचरा करते हो। तुम्हारे मनमें कोई विकार नहीं है; क्योंकि तुम सदा महेश्वरकी मनोवृत्तिके अनुसार ही कार्य करते हो। जब बहुत समय बीत गया, तब मेरे पुत्र प्रजापति दक्षको यह पता लगा कि मेरे सभी पुत्र नारदसे शिक्षा पाकर नष्ट हो गये (मेरे हाथसे निकल गये)। इससे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे बार-बार कहने लगे—उत्तम संतानोंका पिता होना शोकका ही स्थान है (क्योंकि श्रेष्ठ पुत्रोंके बिछुड़ जानेसे पिताको बड़ा कष्ट होता है)। शिवकी मायासे मोहित होनेसे दक्षको पुत्रवियोगके कारण बहुत शोक होने लगा। तब मैंने आकर अपने बेटे दक्षको बड़े प्रेमसे समझाया और सान्त्वना दी। दैवका विधान प्रबल होता है—इत्यादि बातें बताकर उनके मनको शान्त किया। मेरे सान्त्वना देनेपर दक्ष पुनः पंचजनकन्या असिक्नीके गर्भसे शबलाश्व नामके एक सहस्त्र पुत्र उत्पन्न किये। पिताका आदेश पाकर वे पुत्र भी प्रजासृष्टिके लिये दृढ़तापूर्वक प्रतिज्ञापालनका नियम ले उसी स्थानपर गये, जहाँ उनके सिद्धिको प्राप्त हुए बड़े भाई गये थे। नारायणसरोवरके जलका स्पर्श होनेमात्रसे उनके सारे पाप नष्ट हो गये, अन्तःकरणमें शुद्धता आ गयी और वे उत्तम व्रतके पालक शबलाश्व ब्रह्म (प्रणव)-का जप करते हुए वहाँ बड़ी भारी तपस्या करने लगे। उन्हें प्रजासृष्टिके लिये उद्यत जान तुम पुनः पहलेकी ही भाँति ईश्वरीय गतिका स्मरण करते हुए उनके पास गये और वही बात कहने लगे, जो उनके भाइयोंसे पहले कह चुके थे। मुने! तुम्हारा दर्शन अमोघ है, इसलिये तुमने उनको भी भाइयोंका ही मार्ग दिखाया। अतएव वे भाइयोंके ही पथपर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त हुए। उसी समय प्रजापति दक्षको बहुत-से उत्पात दिखायी दिये। इससे मेरे पुत्र दक्षको बड़ा विस्मय हुआ और वे मन-ही-मन दुःखी हुए। फिर उन्होंने पूर्ववत् तुम्हारी ही करतूतसे अपने पुत्रोंका नाश हुआ सुना, इससे उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे पुत्रशोकसे मूर्च्छित हो अत्यन्त कष्टका अनुभव करने लगे। फिर दक्षने तुमपर बड़ा क्रोध किया और कहा—'यह नारद बड़ा दुष्ट है।' दैववश उसी समय तुम दक्षपर अनुग्रह करनेके लिये वहाँ आ पहुँचे। तुम्हें देखते ही शोकावेशसे युक्त हुए दक्षके ओठ रोषसे फड़कने लगे। तुम्हें सामने पाकर वे धिक्कारने और निन्दा करने लगे।
दक्षने कहा—ओ नीच! तुमने यह क्या किया? तुमने झूठ-मूठ साधुओंका
१७६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
बाना पहन रखा है। इसीके द्वारा ठगकर हमारे भोले-भाले बालकोंको जो तुमने भिक्षुओंका मार्ग दिखाया है, यह अच्छा नहीं किया। तुम निर्दय और शठ हो। इसीलिये तुमने हमारे इन बालकोंके, जो अभी ऋषि$^१$-ऋण, देव$^२$-ऋण और पितृ$^३$-ऋणसे मुक्त नहीं हो पाये थे, लोक और परलोक दोनोंके श्रेयका नाश कर डाला। जो पुरुष इन तीनों ऋणोंको उतारे बिना ही मोक्षकी इच्छा मनमें लिये माता-पिताको त्यागकर घरसे निकल जाता है—संन्यासी हो जाता है, वह अधोगतिको प्राप्त होता है। तुम निर्दय और बड़े निर्लज्ज हो। बच्चोंकी बुद्धिमें भेद पैदा करनेवाले हो और अपने सुयशको स्वयं ही नष्ट कर रहे हो। मूढ़मते! तुम भगवान् विष्णुके पार्षदोंमें व्यर्थ ही घूमते-फिरते हो। अधमाधम! तुमने बारंबार मेरा अमंगल किया है। अतः आजसे तीनों लोकोंमें विचरते हुए तुम्हारा पैर कहीं स्थिर नहीं रहेगा अथवा कहीं भी तुम्हें ठहरनेके लिये सुस्थिर ठौर-ठिकाना नहीं मिलेगा।'
नारद! यद्यपि तुम साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित हो, तथापि उस समय दक्षने शोकवश तुम्हें वैसा शाप दे दिया। वे ईश्वरकी इच्छाको नहीं समझ सके। शिवकी मायाने उन्हें अत्यन्त मोहित कर दिया था। मुने! तुमने उस शापको चुपचाप ग्रहण कर लिया और अपने चित्तमें विकार नहीं आने दिया। यही ब्रह्मभाव है। ईश्वरकोटिके महात्मा पुरुष स्वयं शापको मिटा देनेमें समर्थ होनेपर भी उसे सह लेते हैं।
(अध्याय १३)
दक्षकी साठ कन्याओंका विवाह, दक्ष और वीरिणीके यहाँ देवी शिवाका अवतार, दक्षद्वारा उनकी स्तुति तथा सतीके सद्गुणों एवं चेष्टाओंसे माता-पिताकी प्रसन्नता
ब्रह्माजी कहते हैं—देवर्षे! इसी समय दक्षके इस बर्तावको जानकर मैं भी वहाँ आ पहुँचा और पूर्ववत् उन्हें शान्त करनेके लिये सान्त्वना देने लगा। तुम्हारी प्रसन्नताको बढ़ाते हुए मैंने दक्षके साथ तुम्हारा सुन्दर स्नेहपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कराया। तुम मेरे पुत्र हो, मुनियोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण देवताओंके प्रिय हो। अतः बड़े प्रेमसे तुम्हें
१-३. ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे ऋषि-ऋण, यज्ञ और पूजा आदिसे देव-ऋण तथा पुत्रके उत्पादनसे पितृ-ऋणका निवारण होता है।
* रुद्रसंहिता * १७७
आश्वासन देकर मैं फिर अपने स्थानपर आ गया। तदनन्तर प्रजापति दक्षने मेरी अनुनयके अनुसार अपनी पत्नीके गर्भसे साठ सुन्दरी कन्याओंको जन्म दिया और आलस्यरहित हो धर्म आदिके साथ उन सबका विवाह कर दिया। मुनीश्वर ! मैं उसी प्रसंगको बड़े प्रेमसे कह रहा हूँ, तुम सुनो। मुने! दक्षने अपनी दस कन्याएँ विधिपूर्वक धर्मको ब्याह दीं, तेरह कन्याएँ कश्यप मुनिको दे दीं और सत्ताईस कन्याओंका विवाह चन्द्रमाके साथ कर दिया। भूत (या बहुपुत्र), अंगिरा तथा कृशाश्वको उन्होंने दो-दो कन्याएँ दीं और शेष चार कन्याओंका विवाह तार्क्ष्य (या अरिष्टनेमि)-के साथ कर दिया। इन सबकी संतान-परम्पराओंसे तीनों लोक भरे पड़े हैं। अतः विस्तार-भयसे उनका वर्णन नहीं किया जाता। कुछ लोग शिवा या सतीको दक्षकी ज्येष्ठ पुत्री बताते हैं। दूसरे लोग उन्हें मझली पुत्री कहते हैं तथा कुछ अन्य लोग सबसे छोटी पुत्री मानते हैं। कल्पभेदसे ये तीनों मत ठीक हैं। पुत्र और पुत्रियोंकी उत्पत्तिके पश्चात् पत्नीसहित प्रजापति दक्षने बड़े प्रेमसे मन-ही-मन जगदम्बिकाका ध्यान किया। साथ ही गद्गदवाणीसे प्रेमपूर्वक उनकी स्तुति भी की। बारंबार अंजलि बाँध नमस्कार करके वे विनीतभावसे देवीको मस्तक झुकाते थे। इससे देवी शिवा संतुष्ट हुईं और उन्होंने अपने प्रणकी पूर्तिके लिये मन-ही-मन यह विचार किया कि अब मैं वीरिणीके गर्भसे अवतार लूँ। ऐसा विचार कर वे जगदम्बा दक्षके हृदयमें निवास करने लगीं। मुनिश्रेष्ठ ! उस समय दक्षकी बड़ी शोभा होने लगी। फिर उत्तम मुहूर्त देखकर दक्षने अपनी पत्नीमें प्रसन्नतापूर्वक गर्भाधान किया। तब दयालु शिवा दक्ष-पत्नीके चित्तमें निवास करने लगीं। उनमें गर्भधारणके सभी चिह्न प्रकट हो गये। तात! उस अवस्थामें वीरिणीकी शोभा बढ़ गयी और उसके चित्तमें अधिक हर्ष छा गया। भगवती शिवाके निवासके प्रभावसे वीरिणी महामंगलरूपिणी हो गयी। दक्षने अपने कुल-सम्प्रदाय, वेदज्ञान और हार्दिक उत्साहके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक पुंसवन आदि संस्कारसम्बन्धी श्रेष्ठ क्रियाएँ सम्पन्न कीं। उन कर्मोंके अनुष्ठानके समय महान् उत्सव हुआ। प्रजापतिने ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन दिया।
उस अवसरपर वीरिणीके गर्भमें देवीका निवास हुआ जानकर श्रीविष्णु आदि सब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई।
१७८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
उन सबने वहाँ आकर जगदम्बाका स्तवन किया और समस्त लोकोंका उपकार करनेवाली देवी शिवाको बारंबार प्रणाम किया। वे सब देवता प्रसन्नचित्त हो दक्ष प्रजापति तथा वीरिणीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके अपने-अपने स्थानको लौट गये। नारद! जब नौ महीने बीत गये, तब लौकिक गतिका निर्वाह कराकर दसवें महीनेके पूर्ण होनेपर चन्द्रमा आदि ग्रहों तथा ताराओंकी अनुकूलतासे युक्त सुखद मुहूर्तमें देवी शिवा शीघ्र ही अपनी माताके सामने प्रकट हुईं। उनके अवतार लेते ही प्रजापति दक्ष बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें महान् तेजसे देदीप्यमान देख उनके मनमें यह विश्वास हो गया कि साक्षात् वे शिवादेवी ही मेरी पुत्रीके रूपमें प्रकट हुई हैं। उस समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और मेघ जल बरसाने लगे। मुनीश्वर! सतीके जन्म लेते ही सम्पूर्ण दिशाओंमें तत्काल शान्ति छा गयी। देवता आकाशमें खड़े हो मांगलिक बाजे बजाने लगे। अग्निशालाओंकी बुझी हुई अग्नियाँ सहसा प्रज्वलित हो उठीं और सब कुछ परम मंगलमय हो गया। वीरिणीके गर्भसे साक्षात् जगदम्बाको प्रकट हुई देख दक्षने दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया और बड़े भक्ति-भावसे उनकी बड़ी स्तुति की।
बुद्धिमान् दक्षके स्तुति करनेपर जगन्माता शिवा उस समय दक्षसे इस प्रकार बोलीं, जिससे माता वीरिणी न सुन सके।
देवी बोलीं—प्रजापते! तुमने पहले पुत्रीरूपमें मुझे प्राप्त करनेके लिये मेरी आराधना की थी, तुम्हारा वह मनोरथ आज सिद्ध हो गया। अब तुम उस तपस्याके फलको ग्रहण करो।
उस समय दक्षसे ऐसा कहकर देवीने अपनी मायासे शिशुरूप धारण कर लिया और शैशवभाव प्रकट करती हुई वे वहाँ रोने लगीं। उस बालिकाका रोदन सुनकर सभी स्त्रियाँ और दासियाँ बड़े वेगसे प्रसन्नतापूर्वक वहाँ आ पहुँचीं। असिक्नीकी पुत्रीका अलौकिक रूप देखकर उन सभी स्त्रियोंको बड़ा हर्ष हुआ। नगरके सब लोग उस समय जय-जयकार करने लगे। गीत और वाद्योंके साथ बड़ा भारी उत्सव होने लगा। पुत्रीका मनोहर मुख देखकर सबको बड़ी ही प्रसन्नता हुई। दक्षने वैदिक और कुलोचित आचारका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया। ब्राह्मणोंको दान दिया और दूसरोंको भी धन बाँटा। सब ओर यथोचित गान और नृत्य होने लगे। भाँति-भाँतिके मंगल-कृत्योंके साथ बहुत-से बाजे बजने लगे। उस समय दक्षने समस्त सद्गुणोंकी सत्तासे प्रशंसित होनेवाली अपनी उस पुत्रीका नाम प्रसन्नतापूर्वक ‘उमा’ रखा। तदनन्तर संसारमें लोगोंकी ओरसे उसके और भी नाम प्रचलित किये गये, जो सब-के-सब महान् मंगल-दायक तथा विशेषतः समस्त दुःखोंका नाश करनेवाले हैं। वीरिणी और महात्मा दक्ष अपनी पुत्रीका पालन करने लगे तथा वह शुक्लपक्षकी चन्द्रकलाके समान दिनोदिन बढ़ने लगी। द्विजश्रेष्ठ! बाल्यावस्थामें भी समस्त उत्तमोत्तम गुण उसमें उसी तरह प्रवेश करने लगे, जैसे शुक्लपक्षके बाल चन्द्रमामें भी समस्त मनोहारिणी कलाएँ प्रविष्ट हो जाती हैं। दक्षकन्या सती सखियोंके बीच बैठी-बैठी जब अपने भावमें निमग्न होती थी, तब बारंबार
* रुद्रसंहिता * १७९
भगवान् शिवकी मूर्तिको चित्रित करने लगती थी। मंगलमयी सती जब बाल्योचित सुन्दर गीत गाती, तब स्थाणु, हर एवं रुद्र नाम लेकर स्मरशत्रु शिवका स्मरण किया करती थी।
(अध्याय १४)
o
सतीकी तपस्यासे संतुष्ट देवताओंका कैलासमें जाकर भगवान् शिवका स्तवन करना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! एक दिन मैंने तुम्हारे साथ जाकर पिताके पास खड़ी हुई सतीको देखा। वह तीनों लोकोंकी सारभूता सुन्दरी थी। उसके पिताने मुझे नमस्कार करके तुम्हारा भी सत्कार किया। यह देख लोक-लीलाका अनुसरण करनेवाली सतीने भक्ति और प्रसन्नताके साथ मुझको और तुमको भी प्रणाम किया। नारद! तदनन्तर सतीकी ओर देखते हुए हम और तुम दक्षके दिये हुए शुभ आसनपर बैठ गये। तत्पश्चात् मैंने उस विनयशीला बालिकासे कहा—'सती! जो केवल तुम्हें ही चाहते हैं और तुम्हारे मनमें भी एकमात्र जिनकी ही कामना है, उन्हीं सर्वज्ञ जगदीश्वर महादेवजीको तुम पतिरूपमें प्राप्त करो। शुभे! जो तुम्हारे सिवा दूसरी किसी स्त्रीको पत्नीरूपमें न तो ग्रहण कर सके हैं, न करते हैं और न भविष्यमें ही ग्रहण करेंगे, वे ही भगवान् शिव तुम्हारे पति हों। वे तुम्हारे ही योग्य हैं, दूसरेके नहीं।'
नारद ! सतीसे ऐसा कहकर मैं दक्षके घरमें देरतक ठहरा रहा। फिर उनसे विदा ले मैं और तुम दोनों अपने-अपने स्थानको चले आये। मेरी बातको सुनकर दक्षको बड़ी प्रसन्नता हुई। उनकी सारी मानसिक चिन्ता दूर हो गयी और उन्होंने अपनी पुत्रीको परमेश्वरी समझकर गोदमें उठा लिया। इस प्रकार कुमारोचित सुन्दर लीला-विहारोंसे सुशोभित होती हुई भक्तवत्सला सती, जो स्वेच्छासे मानवरूप धारण करके प्रकट हुई थीं, कौमारावस्था पार कर गयीं। बाल्यावस्था बिताकर किंचित् युवावस्थाको प्राप्त हुई सती अत्यन्त तेज एवं शोभासे सम्पन्न हो सम्पूर्ण अंगोंसे मनोहर दिखायी देने लगीं। लोकेश दक्षने देखा कि सतीके शरीरमें युवावस्थाके लक्षण प्रकट होने लगे हैं। तब उनके मनमें यह चिन्ता हुई कि मैं महादेवजीके साथ इनका विवाह कैसे करूँ ? सती स्वयं भी महादेवजीको पानेकी प्रतिदिन अभिलाषा रखती थीं। अतः पिताके मनोभावको समझकर वे माताके निकट गयीं। विशाल बुद्धिवाली सतीरूपिणी परमेश्वरी शिवाने अपनी माता वीरिणीसे भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके निमित्त तपस्या करनेके लिये आज्ञा माँगी। माताकी आज्ञा मिल गयी। अतः दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाली सतीने महेश्वरको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये अपने घरपर ही उनकी आराधना आरम्भ की।
आश्विन मासमें नन्दा (प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी) तिथियोंमें उन्होंने भक्तिपूर्वक गुड़, भात और नमक चढ़ाकर भगवान् शिवका पूजन किया और उन्हें
१८० * संक्षिप्त शिवपुराण *
नमस्कार करके उसी नियमके साथ उस मासको व्यतीत किया। कार्तिक मासकी चतुर्दशीको सजाकर रखे हुए मालपूओं और खीरसे परमेश्वर शिवकी आराधना करके वे निरन्तर उनका चिन्तन करने लगीं। मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको तिल, जौ और चावलसे हरकी पूजा करके ज्योतिर्मय दीप दिखाकर अथवा आरती करके सती दिन बिताती थीं। पौष मासके शुक्लपक्षकी सप्तमीको रातभर जागरण करके प्रातःकाल खिचड़ीका नैवेद्य लगा वे शिवकी पूजा करती थीं। माघकी पूर्णिमाको रातमें जागरण करके सबेरे नदीमें नहातीं और गीले वस्त्रसे ही तटपर बैठकर भगवान् शंकरकी पूजा करती थीं। फाल्गुन मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको रातमें जागरण करके उस रात्रिके चारों पहरोंमें शिवजीकी विशेष पूजा करतीं और नटोंद्वारा नाटक भी कराती थीं। चैत्र मासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको वे दिन-रात शिवका स्मरण करती हुई समय बितातीं और ढाकके फूलों तथा दवनोंसे भगवान् शिवकी पूजा करती थीं। वैशाख शुक्ला तृतीयाको सती तिलका आहार करके रहतीं और नये जौके भातसे रुद्रदेवकी पूजा करके उस महीनेको बिताती थीं। ज्येष्ठकी पूर्णिमाको रातमें सुन्दर वस्त्रों तथा भटकटैयाके फूलोंसे शंकरजीकी पूजा करके वे निराहार रहकर ही वह मास व्यतीत करती थीं। आषाढ़के शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको काले वस्त्र और भटकटैयाके फूलोंसे वे रुद्रदेवका पूजन करती थीं। श्रावण मासके शुक्लपक्षकी अष्टमी एवं चतुर्दशीको वे यज्ञोपवीतों, वस्त्रों तथा कुशकी पवित्रीसे शिवकी पूजा किया करती थीं। भाद्रपद मासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको नाना प्रकारके फूलों और फलोंसे शिवका पूजन करके सती चतुर्दशी तिथिको केवल जलका आहार किया करतीं। भाँति-भाँतिके फलों, फूलों और उस समय उत्पन्न होनेवाले अन्नोंद्वारा वे शिवकी पूजा करतीं और महीनेभर अत्यन्त नियमित आहार करके केवल जपमें लगी रहती थीं। सभी महीनोंमें सारे दिन सती शिवकी आराधनामें ही संलग्न रहती थीं। अपनी इच्छासे मानवरूप धारण करनेवाली वे देवी दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करती थीं। इस प्रकार नन्दाव्रतको पूर्णरूपसे समाप्त करके भगवान् शिवमें अनन्यभाव रखनेवाली सती एकाग्रचित्त हो बड़े प्रेमसे भगवान् शिवका ध्यान करने लगीं तथा उस ध्यानमें ही निश्चलभावसे स्थित हो गयीं।
- रुद्रसंहिता * १८१
मुने! इसी समय सब देवता और ऋषि भगवान् विष्णु और मुझको आगे करके सतीकी तपस्या देखनेके लिये गये। वहाँ आकर देवताओंने देखा, सती मूर्तिमती दूसरी सिद्धिके समान जान पड़ती हैं। वे भगवान् शिवके ध्यानमें निमग्न हो उस समय सिद्धावस्थाको पहुँच गयी थीं। समस्त देवताओंने बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ दोनों हाथ जोड़कर सतीको नमस्कार किया, मुनियोंने भी मस्तक झुकाये तथा श्रीहरि आदिके मनमें प्रीति उमड़ आयी। श्रीविष्णु आदि सब देवता और मुनि आश्चर्यचकित हो सती देवीकी तपस्याकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। फिर देवीको प्रणाम करके वे देवता और मुनि तुरंत ही गिरिश्रेष्ठ कैलासको गये, जो भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय है। सावित्रीके साथ मैं और लक्ष्मीके साथ भगवान् वासुदेव भी प्रसन्नतापूर्वक महादेवजीके निकट गये। वहाँ जाकर भगवान् शिवको देखते ही बड़े वेगसे प्रणाम करके सब देवताओंने दोनों हाथ जोड़ विनीतभावसे नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके अन्तमें कहा—
प्रभो! आपकी सत्त्व, रज और तम नामक जो तीन शक्तियाँ हैं, उनके राग आदि वेग असह्य हैं। वेदत्रयी अथवा लोकत्रयी आपका स्वरूप है। आप शरणागतोंके पालक हैं तथा आपकी शक्ति बहुत बड़ी है—उसकी कहीं कोई सीमा नहीं है; आपको नमस्कार है। दुर्गापते! जिनकी इन्द्रियाँ दुष्ट हैं—वशमें नहीं हो पातीं, उनके लिये आपकी प्राप्तिका कोई मार्ग सुलभ नहीं है। आप सदा भक्तोंके उद्धारमें तत्पर रहते हैं, आपका तेज छिपा हुआ है; आपको नमस्कार है। आपकी मायाशक्तिरूपा जो अहंबुद्धि है, उससे आत्माका स्वरूप ढक गया है; अतएव यह मूढ़बुद्धि जीव अपने स्वरूपको नहीं जान पाता। आपकी महिमाका पार पाना अत्यन्त कठिन (ही नहीं, सर्वथा असम्भव) है। हम आप महाप्रभुको मस्तक झुकाते हैं।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके श्रीविष्णु आदि सब देवता उत्तम भक्तिसे मस्तक झुकाये प्रभु शिवजीके आगे चुपचाप खड़े हो गये।
(अध्याय १५)
~~ ० ~~
ब्रह्माजीका रुद्रदेवसे सतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध, श्रीविष्णुद्वारा अनुमोदन और श्रीरुद्रकी इसके लिये स्वीकृति
ब्रह्माजी कहते हैं—श्रीविष्णु आदि देवताओंद्वारा की हुई उस स्तुतिको सुनकर सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोरसे हँसने लगे। मुझ ब्रह्मा और विष्णुको अपनी-अपनी पत्नीके साथ आया हुआ देख महादेवजीने हमलोगोंसे यथोचित वार्तालाप किया और हमारे आगमनका कारण पूछा।
रुद्र बोले—हे हरे! हे विधे! तथा हे देवताओ और महर्षियो! आज निर्भय होकर यहाँ अपने आनेका ठीक-ठीक कारण बताओ। तुमलोग किसलिये यहाँ आये हो और कौन-सा कार्य आ पड़ा है? वह सब मैं सुनना चाहता हूँ; क्योंकि
१८२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
तुम्हारे द्वारा की गयी स्तुतिसे मेरा मन बहुत प्रसन्न है।
मुने! महादेवजीके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् विष्णुकी आज्ञासे मैंने वार्तालाप आरम्भ किया।
मुझ ब्रह्माने कहा—देवदेव! महादेव! करुणासागर! प्रभो! हम दोनों इन देवताओं और ऋषियोंके साथ जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हैं, उसे सुनिये। वृषभध्वज! विशेषतः आपके ही लिये हमारा यहाँ आगमन हुआ है; क्योंकि हम तीनों सहार्थी हैं—सृष्टि-चक्रके संचालनरूप प्रयोजनकी सिद्धिके लिये एक-दूसरेके सहायक हैं। सहार्थीको सदा परस्पर यथायोग्य सहयोग करना चाहिये अन्यथा यह जगत् टिक नहीं सकता। महेश्वर! कुछ ऐसे असुर उत्पन्न होंगे, जो मेरे हाथसे मारे जायँगे। कुछ भगवान् विष्णुके और कुछ आपके हाथों नष्ट होंगे। महाप्रभो! कुछ असुर ऐसे होंगे, जो आपके वीर्यसे उत्पन्न हुए पुत्रके हाथसे ही मारे जा सकेंगे। प्रभो! कभी कोई विरले ही असुर ऐसे होंगे, जो मायाके हाथोंद्वारा वधको प्राप्त होंगे। आप भगवान् शंकरकी कृपासे ही देवताओंको सदा उत्तम सुख प्राप्त होगा। घोर असुरोंका विनाश करके आप जगत्को सदा स्वास्थ्य एवं अभय प्रदान करेंगे अथवा यह भी सम्भव है कि आपके हाथसे कोई भी असुर न मारे जायँ; क्योंकि आप सदा योगयुक्त रहते हुए राग-द्वेषसे रहित हैं तथा एकमात्र दया करनेमें ही लगे रहते हैं। ईश! यदि वे असुर भी आराधित हों—आपकी दयासे अनुगृहीत होते रहें तो सृष्टि और पालनका कार्य कैसे चल सकता है। अतः वृषभध्वज! आपको प्रतिदिन सृष्टि आदिके उपयुक्त कार्य करनेके लिये उद्यत रहना चाहिये। यदि सृष्टि, पालन और संहार-रूप कर्म न करने हों तब तो हमने मायासे जो भिन्न-भिन्न शरीर धारण किये हैं, उनकी कोई उपयोगिता अथवा औचित्य ही नहीं है। वास्तवमें हम तीनों एक ही हैं, कार्यके भेदसे भिन्न-भिन्न देह धारण करके स्थित हैं। यदि कार्यभेद न सिद्ध हो, तब तो हमारे रूपभेदका कोई प्रयोजन ही नहीं है। देव! एक ही परमात्मा महेश्वर तीन स्वरूपोंमें अभिव्यक्त हुए हैं। इस रूपभेदमें उनकी अपनी माया ही कारण है। वास्तवमें प्रभु स्वतन्त्र हैं। वे लीलाके उद्देश्यसे ही ये सृष्टि आदि कार्य करते हैं। भगवान् श्रीहरि उनके बायें अंगसे प्रकट हुए हैं, मैं ब्रह्मा उनके दायें अंगसे प्रकट हुआ हूँ और आप रुद्रदेव उन सदाशिवके हृदयसे आविर्भूत हुए हैं; अतः आप ही शिवके पूर्ण रूप हैं। प्रभो! इस प्रकार अभिन्नरूप होते हुए भी हम तीन रूपोंमें प्रकट हैं। सनातनदेव! हम तीनों उन्हीं भगवान् सदाशिव और शिवाके पुत्र हैं, इस यथार्थ तत्त्वका आप हृदयसे अनुभव कीजिये। प्रभो! मैं और श्रीविष्णु आपके आदेशसे प्रसन्नता-पूर्वक लोककी सृष्टि और पालनके कार्य कर रहे हैं तथा कार्य-कारणवश सपत्नीक भी हो गये हैं; अतः आप भी विश्वहितके लिये तथा देवताओंको सुख पहुँचानेके लिये एक परम सुन्दरी रमणीको अपनी पत्नी बनानेके लिये ग्रहण करें। महेश्वर! एक बात और है, उसे सुनिये; मुझे पहलेके वृत्तान्तका स्मरण हो आया है। पूर्वकालमें आपने ही शिवरूपसे जो बात हमारे सामने कही थी, वही इस समय सुना
* रुद्रसंहिता * १८३
रहा हूँ। आपने कहा था, 'ब्रह्मन्! मेरा ऐसा ही उत्तम रूप तुम्हारे अंगविशेष—ललाटसे प्रकट होगा, जिसकी लोकमें 'रुद्र' नामसे प्रसिद्धि होगी। तुम ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हो गये, श्रीहरि जगत्का पालन करनेवाले हुए और मैं सगुण रुद्ररूप होकर संहार करनेवाला होऊँगा। एक स्त्रीके साथ विवाह करके लोकके उत्तम कार्यकी सिद्धि करूँगा।' अपनी कही हुई इस बातको याद करके आप अपनी ही पूर्वप्रतिज्ञाको पूर्ण कीजिये। स्वामिन्! आपका यह आदेश है कि मैं सृष्टि करूँ, श्रीहरि पालन करें और आप स्वयं संहारके हेतु बनकर प्रकट हों; सो आप साक्षात् शिव ही संहारकर्ताके रूपमें प्रकट हुए हैं। आपके बिना हम दोनों अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ नहीं हैं; अतः आप एक ऐसी कामिनीको स्वीकार करें, जो लोकहितके कार्यमें तत्पर रहे। शम्भो! जैसे लक्ष्मी भगवान् विष्णुकी और सावित्री मेरी सहधर्मिणी हैं, उसी प्रकार आप इस समय अपनी जीवनसहचरी प्राणवल्लभाको ग्रहण करें।
मेरी यह बात सुनकर लोकेश्वर महादेवजीके मुखपर मुसकराहट दौड़ गयी। वे श्रीहरिके सामने मुझसे इस प्रकार बोले।
ईश्वरने कहा—ब्रह्मन्! हरे! तुम दोनों मुझे सदा ही अत्यन्त प्रिय हो। तुम दोनोंको देखकर मुझे बड़ा आनन्द मिलता है। तुमलोग समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ तथा त्रिलोकीके स्वामी हो। लोकहितके कार्यमें मन लगाये रहनेवाले तुम दोनोंका वचन मेरी दृष्टिमें अत्यन्त गौरवपूर्ण हैं। किंतु सुरश्रेष्ठगण! मेरे लिये विवाह करना उचित नहीं होगा; क्योंकि मैं तपस्यामें संलग्न रहकर सदा संसारसे विरक्त ही रहता हूँ और योगीके रूपमें मेरी प्रसिद्धि है। जो निवृत्तिके सुन्दर मार्गपर स्थित है, अपने आत्मामें ही रमण करता—आनन्द मानता है, निरंजन (मायासे निर्लिप्त) है, जिसका शरीर अवधूत (दिगम्बर) है, जो ज्ञानी, आत्मदर्शी और कामनासे शून्य है, जिसके मनमें कोई विकार नहीं है, जो भोगोंसे दूर रहता है तथा जो सदा अपवित्र और अमंगलवेशधारी है, उसे संसारमें कामिनीसे क्या प्रयोजन है—यह इस समय मुझे बताओ तो सही!* मुझे तो सदा केवल योगमें लगे रहनेपर ही आनन्द आता है। ज्ञानहीन पुरुष ही योगको छोड़कर भोगको अधिक महत्त्व देता है। संसारमें विवाह करना पराये बन्धनमें बँधना है। इसे बहुत बड़ा बन्धन समझना चाहिये। इसलिये मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, विवाहके लिये मेरे मनमें थोड़ी-सी भी अभिरुचि नहीं है। आत्मा ही अपना उत्तम अर्थ या स्वार्थ है। उसका भलीभाँति चिन्तन करनेके कारण मेरी लौकिक स्वार्थमें प्रवृत्ति नहीं होती। तथापि जगत्के हितके लिये तुमने जो कुछ कहा है, उसे करूँगा। तुम्हारे वचनको गरिष्ठ मानकर अथवा अपनी कही हुई बातको पूर्ण करनेके लिये मैं अवश्य विवाह करूँगा; क्योंकि मैं सदा भक्तोंके वशमें
* यो निवृत्तिसुमार्गस्थः स्वात्मारामो निरञ्जनः। अवधूततनुर्ज्ञानी स्वद्रष्टा कामवर्जितः॥
अविकारी ह्यभोगी च सदा शुचिरमङ्गलः। तस्य प्रयोजनं लोके कामिन्या किं वदाधुना॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० १५। ३१-३२)
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रहता हूँ। परंतु मैं जैसी नारीको प्रिय पत्नीके रूपमें ग्रहण करूँगा और जैसी शर्तके साथ करूँगा, उसे सुनो। हरे! ब्रह्मन्! मैं जो कुछ कहता हूँ, वह सर्वथा उचित ही है। जो नारी मेरे तेजको विभागपूर्वक ग्रहण कर सके, जो योगिनी तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली हो, उसीको तुम पत्नी बनानेके लिये मुझे बताओ। जब मैं योगमें तत्पर रहूँ, तब उसे भी योगिनी बनकर रहना होगा और जब मैं कामासक्त होऊँ, तब उसे भी कामिनीके रूपमें ही मेरे पास रहना होगा। वेदवेत्ता विद्वान् जिन्हें अविनाशी बतलाते हैं, उन ज्योतिःस्वरूप सनातन शिवका मैं सदा चिन्तन करता हूँ और करता रहूँगा। ब्रह्मन्! उन सदाशिवके चिन्तनमें जब मैं न लगा होऊँ तभी उस भामिनीके साथ मैं समागम कर सकता हूँ। जो मेरे शिवचिन्तनमें विघ्न डालनेवाली होगी, वह जीवित नहीं रह सकती, उसे अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा। तुम, विष्णु और मैं तीनों ही ब्रह्मस्वरूप शिवके अंशभूत हैं। अतः महाभागगण! हमारे लिये उनका निरन्तर चिन्तन करना ही उचित है। कमलासन! उनके चिन्तनके लिये मैं बिना विवाहके भी रह लूँगा। (किंतु उनका चिन्तन छोड़कर विवाह नहीं करूँगा।) अतः तुम मुझे ऐसी पत्नी प्रदान करो, जो सदा मेरे कर्मके अनुकूल चल सके। ब्रह्मन्! उसमें भी मेरी एक और शर्त है, उसे तुम सुनो; यदि उस स्त्रीका मुझपर और मेरे वचनपर अविश्वास होगा तो मैं उसे त्याग दूँगा।
उनकी यह बात सुनकर मैंने और श्रीहरिने मन्द मुसकानके साथ मन-ही-मन प्रसन्नताका अनुभव किया; फिर मैं विनम्र होकर बोला— 'नाथ! महेश्वर! प्रभो! आपने जैसी नारीकी खोज आरम्भ की है, वैसी ही स्त्रीके विषयमें मैं आपको प्रसन्नतापूर्वक कह रहा हूँ। साक्षात् सदाशिवकी धर्मपत्नी जो उमा हैं, वे ही जगत्का कार्य सिद्ध करनेके लिये भिन्न-भिन्न रूपमें प्रकट हुई हैं। प्रभो! सरस्वती और लक्ष्मी— ये दो रूप धारण करके वे पहले ही यहाँ आ चुकी हैं। इनमें लक्ष्मी तो श्रीविष्णुकी प्राणवल्लभा हो गयीं और सरस्वती मेरी। अब हमारे लिये वे तीसरा रूप धारण करके प्रकट हुई हैं। प्रभो! लोकहितका कार्य करनेकी इच्छावाली देवी शिवा दक्षपुत्रीके रूपमें अवतीर्ण हुई हैं। उनका नाम सती है। सती ही ऐसी भार्या हो सकती हैं, जो सदा आपके लिये हितकारिणी हो। देवेश! महातेजस्विनी सती आपके लिये, आपको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये दृढ़तापूर्वक कठोर व्रतका पालन करती हुई तपस्या कर रही हैं। महेश्वर! आप उन्हें वर देनेके लिये जाइये, कृपा कीजिये और बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें उनकी तपस्याके अनुरूप वर देकर उनके साथ विवाह कीजिये। शंकर! भगवान् विष्णुकी, मेरी तथा इन सम्पूर्ण देवताओंकी यही इच्छा है। आप अपनी शुभ दृष्टिसे हमारी इस इच्छाको पूर्ण कीजिये, जिससे हम आदरपूर्वक इस उत्सवको देख सकें। ऐसा होनेसे तीनों लोकोंमें सुख देनेवाला परम मंगल होगा और सबकी सारी चिन्ता मिट जायगी, इसमें संशय नहीं है।'
तदनन्तर मेरी बात समाप्त होनेपर लीला-विग्रह धारण करनेवाले भक्तवत्सल
* रुद्रसंहिता * १८५
महेश्वरसे मधुसूदन अच्युतने इसीका समर्थन किया।
तब भक्तवत्सल भगवान् शिवने हँसकर कहा, 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा।' उनके ऐसा कहनेपर हम दोनों उनसे आज्ञा ले अपनी पत्नी तथा देवताओं और मुनियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्न हो अपने अभीष्ट स्थानको चले आये। (अध्याय १६)
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सतीको शिवसे वरकी प्राप्ति तथा भगवान् शिवका ब्रह्माजीको दक्षके पास भेजकर सतीका वरण करना
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! उधर सतीने आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास करके भक्तिभावसे सर्वेश्वर शिवका पूजन किया। इस प्रकार नन्दाव्रत पूर्ण होनेपर नवमी तिथिको दिनमें ध्यानमग्न हुई सतीको भगवान् शिवने प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उनका श्रीविग्रह सर्वांगसुन्दर एवं गौरवर्णका था। उनके पाँच मुख थे और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। भालदेशमें चन्द्रमा शोभा दे रहा था। उनका चित्त प्रसन्न था और कण्ठमें नील चिह्न दृष्टिगोचर होता था। उनके चार भुजाएँ थीं। उन्होंने हाथोंमें त्रिशूल, ब्रह्मकपाल, वर तथा अभय धारण कर रखे थे। भस्ममय अंगरागसे उनका सारा शरीर उद्भासित हो रहा था। गंगाजी उनके मस्तककी शोभा बढ़ा रही थीं। उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे। वे महान् लावण्यके धाम जान पड़ते थे। उनके मुख करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान एवं आह्लादजनक थे। उनकी अंगकान्ति करोड़ों कामदेवोंको तिरस्कृत कर रही थी तथा उनकी आकृति स्त्रियोंके लिये सर्वथा ही प्रिय थी। सतीने ऐसे सौन्दर्य-माधुर्यसे युक्त प्रभु महादेवजीको प्रत्यक्ष देखकर उनके चरणोंकी वन्दना की। उस समय उनका मुख लज्जासे झुका हुआ था। तपस्याके पुंजका फल प्रदान करनेवाले महादेवजी उन्हींके लिये कठोर व्रत धारण करनेवाली सतीको पत्नी बनानेके लिये प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हुए भी उनसे इस प्रकार बोले।
महादेवजीने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाली दक्षकनन्दिनि! मैं तुम्हारे इस व्रतसे बहुत प्रसन्न हूँ। इसलिये कोई वर माँगो। तुम्हारे मनको जो अभीष्ट होगा, वही वर मैं तुम्हें दूँगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! जगदीश्वर महादेवजी यद्यपि सतीके मनोभावको जानते थे तो भी उनकी बात सुननेके लिये बोले—'कोई वर माँगो।' परंतु सती लज्जाके अधीन हो गयी थीं; इसलिये उनके हृदयमें जो बात थी, उसे वे स्पष्ट शब्दोंमें कह न सकीं। उनका जो अभीष्ट मनोरथ था, वह लज्जासे आच्छादित हो गया। प्राणवल्लभ शिवका प्रिय वचन सुनकर सती अत्यन्त प्रेममें मग्न हो गयीं। इस बातको जानकर भक्तवत्सल भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और शीघ्रतापूर्वक बारंबार कहने लगे—'वर माँगो, वर माँगो।' सत्पुरुषोंके आश्रय-भूत अन्तर्यामी शम्भु सतीकी भक्तिके वशीभूत हो गये थे। तब सतीने अपनी लज्जाको रोककर महादेवजीसे कहा—'वर देनेवाले प्रभो! मुझे मेरी इच्छाके अनुसार
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ऐसा वर दीजिये जो टल न सके।' भक्त-वत्सल भगवान् शंकरने देखा सती अपनी बात पूरी नहीं कह पा रही हैं, तब वे स्वयं ही उनसे बोले—'देवि! तुम मेरी भार्या हो जाओ।' अपने अभीष्ट फलको प्रकट करनेवाले उनके इस वचनको सुनकर आनन्दमग्न हुई सती चुपचाप खड़ी रह गयीं; क्योंकि वे मनोवांछित वर पा चुकी थीं। फिर दक्षकन्या प्रसन्न हो दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुका भक्तवत्सल शिवसे बारंबार कहने लगीं।
सती बोलीं—देवाधिदेव महादेव! प्रभो! जगतपते! आप मेरे पिताको कहकर वैवाहिक विधिसे मेरा पाणिग्रहण करें।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! सतीकी यह बात सुनकर भक्तवत्सल महेश्वरने प्रेमसे उनकी ओर देखकर कहा—'प्रिये! ऐसा ही होगा।' तब दक्षकन्या सती भी भगवान् शिवको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक विदा माँग—जानेकी आज्ञा प्राप्त करके मोह और आनन्दसे युक्त हो माताके पास लौट गयीं। इधर भगवान् शिव भी हिमालयपर अपने आश्रममें प्रवेश करके दक्षकन्या सतीके वियोगसे कुछ कष्टका अनुभव करते हुए उन्हींका चिन्तन करने लगे। देवर्षे! फिर मनको एकाग्र करके लौकिक गतिका आश्रय ले भगवान् शंकरने मन-ही-मन मेरा स्मरण किया। त्रिशूलधारी महेश्वरके स्मरण करनेपर उनकी सिद्धिसे प्रेरित हो मैं तुरंत ही उनके सामने जा खड़ा हुआ। तात! हिमालयके शिखरपर जहाँ सतीके वियोगका अनुभव करनेवाले महादेवजी विद्यमान थे, वहीं मैं सरस्वतीके साथ उपस्थित हो गया। देवर्षे! सरस्वतीसहित मुझे आया देख सतीके प्रेमपाशमें बँधे हुए शिव उत्सुकतापूर्वक बोले।
शम्भुने कहा—ब्रह्मन्! मैं जबसे विवाहके कार्यमें स्वार्थबुद्धि कर बैठा हूँ, तबसे अब मुझे इस स्वार्थमें ही स्वत्व-सा प्रतीत होता है। दक्षकन्या सतीने बड़ी भक्तिसे मेरी आराधना की है। उसके नन्दाव्रतके प्रभावसे मैंने उसे अभीष्ट वर देनेकी घोषणा की। ब्रह्मन्! तब उसने मुझसे यह वर माँगा कि 'आप मेरे पति हो जाइये।' यह सुनकर सर्वथा संतुष्ट हो मैंने भी कह दिया कि 'तुम मेरी पत्नी हो जाओ।' तब दाक्षायणी सती मुझसे बोलीं—'जगतपते! आप मेरे पिताको सूचित करके वैवाहिक विधिसे मुझे ग्रहण करें।' ब्रह्मन्! उसकी भक्तिसे संतोष होनेके कारण मैंने उसका वह अनुरोध भी स्वीकार कर लिया। विधातः! तब सती अपनी माताके घर चली गयी और मैं यहाँ चला आया। इसलिये अब तुम मेरी आज्ञासे दक्षके घर जाओ और ऐसा यत्न करो, जिससे प्रजापति दक्ष शीघ्र ही मुझे अपनी कन्याका दान कर दें।
उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैं कृतकृत्य और प्रसन्न हो गया तथा उन भक्तवत्सल विश्वनाथसे इस प्रकार बोला।
मुझ ब्रह्माने कहा—भगवन्! शम्भो! आपने जो कुछ कहा है, उसपर भलीभाँति विचार करके हमलोगोंने पहले ही उसे सुनिश्चित कर दिया है। वृषभध्वज! इसमें मुख्यतः देवताओंका और मेरा भी स्वार्थ है। दक्ष स्वयं ही आपको अपनी पुत्री प्रदान करेंगे, किंतु आपकी आज्ञासे मैं भी उनके सामने आपका संदेश कह दूँगा।