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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* रुद्रसंहिता * २४७

जगत्की शान्ति हैं। आप ही धारण करनेवाली धात्री एवं प्राणोंका पोषण करनेवाली शक्ति हैं। आप ही पाँचों भूतोंके सारतत्त्वको प्रकट करनेवाली तत्त्वस्वरूपा हैं। आप ही नीतिज्ञोंकी नीति तथा व्यवसायरूपिणी हैं। आप ही सामवेदकी गीति हैं। आप ही ग्रन्थि हैं। आप ही यजुर्मन्त्रोंकी आहुति हैं। ऋग्वेदकी मात्रा तथा अथर्ववेदकी परम गति भी आप ही हैं। जो प्राणियोंके नाक, कान, नेत्र, मुख, भुजा, वक्षःस्थल और हृदयमें धृतिरूपसे स्थित हो सदा ही उनके लिये सुखका विस्तार करती हैं। जो निद्राके रूपमें संसारके लोगोंको अत्यन्त सुभग प्रतीत होती हैं, वे देवी उमा जगत्की स्थिति एवं पालनके लिये हम सबपर प्रसन्न हों।

इस प्रकार जगज्जननी सती-साध्वी महेश्वरी उमाकी स्तुति करके अपने हृदयमें विशुद्ध प्रेम लिये वे सब देवता उनके दर्शनकी इच्छासे वहाँ खड़े हो गये।

(अध्याय ३)


उमादेवीका दिव्यरूपसे देवताओंको दर्शन देना, देवताओंका उनसे अपना अभिप्राय निवेदन करना और देवीका अवतार लेनेकी बात स्वीकार करके देवताओंको आश्वासन देना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर दुर्गम पीड़ाका नाश करनेवाली जगज्जननी देवी दुर्गा उनके सामने प्रकट हुईं। वे परम अद्भुत दिव्य रत्नमय रथपर बैठी हुई थीं। उस श्रेष्ठ रथमें घुँघुरू लगे हुए थे और मुलायम बिस्तर बिछे थे। उनके श्रीविग्रहका एक-एक अंग करोड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रकाशमान और रमणीय था। ऐसे अवयवोंसे वे अत्यन्त उद्भासित हो रही थीं। सब ओर फैली हुई अपनी तेजोराशिके मध्यभागमें वे विराजमान थीं। उनका रूप बहुत ही सुन्दर था और उनकी छविकी कहीं तुलना नहीं थी। सदाशिवके साथ विलास करनेवाली उन महामायाकी किसीके साथ समानता नहीं थी। शिवलोकमें निवास करनेवाली वे देवी त्रिविध चिन्मय गुणोंसे युक्त थीं। प्राकृत गुणोंका अभाव होनेसे उन्हें निर्गुणा कहा जाता है। वे नित्यरूपा हैं। वे दुष्टोंपर प्रचण्ड कोप करनेके कारण चण्डी कहलाती हैं, परंतु स्वरूपसे शिवा (कल्याणमयी) हैं। सबकी सम्पूर्ण पीड़ाओंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण जगत्की माता हैं। वे ही

२४८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

प्रलयकालमें महानिद्रा होकर सबको अपने अंकमें सुला लेती हैं तथा वे समस्त स्वजनों (भक्तों)-का संसार-सागरसे उद्धार कर देती हैं। शिवादेवीकी तेजोरशिके प्रभावसे देवता उन्हें अच्छी तरह देख न सके। तब उनके दर्शनकी अभिलाषासे देवताओंने फिर उनका स्तवन किया। तदनन्तर दर्शनकी इच्छा रखनेवाले विष्णु आदि सब देवता उन जगदम्बाकी कृपा पाकर वहाँ उनका सुस्पष्ट दर्शन कर सके।

इसके बाद देवता बोले—अम्बिके! महादेवि! हम सदा आपके दास हैं। आप प्रसन्नतापूर्वक हमारा निवेदन सुनें। पहले आप दक्षकी पुत्रीरूपसे अवतीर्ण हो लोकमें रुद्रदेवकी वल्लभा हुई थीं। उस समय आपने ब्रह्माजीके तथा दूसरे देवताओंके महान् दुःखका निवारण किया था। तदनन्तर पितासे अनादर पाकर अपनी की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार आपने शरीरको त्याग दिया और स्वधाममें पधार आयीं। इससे भगवान् हरको भी बड़ा दुःख हुआ। महेश्वरि! आपके चले आनेसे देवताओंका कार्य पूरा नहीं हुआ। अतः हम देवता और मुनि व्याकुल होकर आपकी शरणमें आये हैं। महेशानि! शिवे! आप देवताओंका मनोरथ पूर्ण करें, जिससे सनत्कुमारका वचन सफल हो। देवि! आप भूतलपर अवतीर्ण हो पुनः रुद्रदेवकी पत्नी होइये और यथायोग्य ऐसी लीला कीजिये, जिससे देवताओंको सुख प्राप्त हो। देवि! इससे कैलास पर्वतपर निवास करनेवाले रुद्रदेव भी सुखी होंगे। आप ऐसी कृपा करें, जिससे सब सुखी हों और सबका सारा दुःख नष्ट हो जाय।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर विष्णु आदि सब देवता प्रेममें मग्न हो गये और भक्तिसे विनम्र होकर चुपचाप खड़े रहे। देवताओंकी यह स्तुति सुनकर शिवादेवीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। उसके हेतुका विचार करके अपने प्रभु शिवका स्मरण करती हुई भक्तवत्सला दयामयी उमादेवी उस समय विष्णु आदि देवताओंको सम्बोधित करके हँसकर बोलीं।

उमाने कहा—हे हरे! हे विधे! और हे देवताओ तथा मुनियो! तुम सब लोग अपने मनसे व्यथाको निकाल दो और मेरी बात सुनो। मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, इसमें संशय नहीं है। सब लोग अपने-अपने स्थानको जाओ और चिरकालतक सुखी रहो। मैं अवतार ले मेनाकी पुत्री होकर उन्हें सुख दूँगी और रुद्रदेवकी पत्नी हो जाऊँगी। यह मेरा अत्यन्त गुप्त मत है। भगवान् शिवकी लीला अद्भुत है। वह ज्ञानियोंको भी मोहमें डालनेवाली है। देवताओ! उस यज्ञमें जाकर पिताके द्वारा अपने स्वामीका अनादर देख जबसे मैंने दक्षजनित शरीरको त्याग दिया है, तभीसे वे मेरे स्वामी कालाग्नि रुद्रदेव तत्काल दिगम्बर हो गये। वे मेरी ही चिन्तामें डूबे रहते हैं। उनके मनमें यह विचार उठा करता है कि धर्मको जाननेवाली सती मेरा रोष देखकर पिताके यज्ञमें गयी और वहाँ मेरा अनादर देख मुझमें प्रेम होनेके कारण उसने अपना शरीर त्याग दिया। यही सोचकर वे घर-बार छोड़ अलौकिक वेष धारण करके योगी हो गये। मेरी स्वरूपभूता सतीके वियोगको वे महेश्वर सहन न कर सके। देवताओ! भगवान् रुद्रकी भी यह अत्यन्त इच्छा है कि भूतलपर मेना और

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हिमाचलके घरमें मेरा अवतार हो; क्योंकि वे पुनः मेरा पाणिग्रहण करनेकी अधिक अभिलाषा रखते हैं। अतः मैं रुद्रदेवके सन्तोषके लिये अवतार लूँगी और लौकिक गतिका आश्रय लेकर हिमालय-पत्नी मेनाकी पुत्री होऊँगी।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर जगदम्बा शिवा उस समय समस्त देवताओंके देखते-देखते ही अदृश्य हो गयीं और तुरंत अपने लोकमें चली गयीं। तदनन्तर हर्षसे भरे हुए विष्णु आदि समस्त देवता और मुनि उस दिशाको प्रणाम करके अपने-अपने धाममें चले गये।

(अध्याय ४)


मेनाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर शिवादेवीका उन्हें अभीष्ट वरदानसे संतुष्ट करना तथा मेनासे मैनाकका जन्म

नारदजीने पूछा—पिताजी! जब देवी दुर्गा अन्तर्धान हो गयीं और देवगण अपने-अपने धामको चले गये, उसके बाद क्या हुआ?

ब्रह्माजीने कहा—मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ विप्रवर नारद! जब विष्णु आदि देवसमुदाय हिमालय और मेनाको देवीकी आराधनाका उपदेश दे चले गये, तब गिरिराज हिमाचल और मेना दोनों दम्पतिने बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की। वे दिन-रात शम्भु और शिवाका चिन्तन करते हुए भक्तियुक्त चित्तसे नित्य उनकी सम्यक् रीतिसे आराधना करने लगे। हिमवान्‌की पत्नी मेना बड़ी प्रसन्नतासे शिवसहित शिवादेवीकी पूजा करने लगीं। वे उन्हींके संतोषके लिये सदा ब्राह्मणोंको दान देती रहती थीं। मनमें संतानकी कामना ले मेना चैत्रमासके आरम्भसे लेकर सत्ताईस वर्षोंतक प्रतिदिन तत्परतापूर्वक शिवा-देवीकी पूजा और आराधनामें लगी रहीं। वे अष्टमीको उपवास करके नवमीको लड्डू, बलि-सामग्री, पीठी, खीर और गन्ध-पुष्प आदि देवीको भेंट करती थीं। गंगाके किनारे ओषधिप्रस्थमें उमाकी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर नाना प्रकारकी वस्तुएँ समर्पित करके उसकी पूजा करती थीं। मेनादेवी कभी निराहार रहतीं, कभी व्रतके नियमोंका पालन करतीं, कभी जल पीकर रहतीं और कभी हवा पीकर ही रह जाती थीं। विशुद्ध तेजसे दमकती हुई दीप्तिमती मेनाने प्रेमपूर्वक शिवामें चित्त लगाये सत्ताईस वर्ष व्यतीत कर दिये। सत्ताईस वर्ष पूरे होनेपर जगन्मयी शंकरकामिनी जगदम्बा उमा अत्यन्त प्रसन्न हुईं। मेनाकी उत्तम भक्तिसे संतुष्ट हो वे परमेश्वरी देवी उनपर अनुग्रह करनेके लिये उनके सामने प्रकट हुईं। तेजोमण्डलके बीचमें विराजमान तथा दिव्य अवयवोंसे संयुक्त उमादेवी प्रत्यक्ष दर्शन दे मेनासे हँसती हुई बोलीं।

देवीने कहा—गिरिराज हिमालयकी रानी महासाध्वी मेना! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहो। मेना! तुमने तपस्या, व्रत और समाधिके द्वारा जिस-जिस वस्तुके लिये प्रार्थना की है, वह सब मैं तुम्हें दूँगी। तब मेनाने प्रत्यक्ष प्रकट हुई कालिकादेवीको देखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।

२५० * संक्षिप्त शिवपुराण *

मेना बोलीं—देवि! इस समय मुझे आपके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है। अतः मैं आपकी स्तुति करना चाहती हूँ। कालिके! इसके लिये आप प्रसन्न हों।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनाके ऐसा कहनेपर सर्वमोहिनी कालिकादेवीने मनमें अत्यन्त प्रसन्न हो अपनी दोनों बाहोंसे खींचकर मेनाको हृदयसे लगा लिया। इससे उन्हें तत्काल महाज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। फिर तो मेनादेवी प्रिय वचनोंद्वारा भक्ति-भावसे अपने सामने खड़ी हुई कालिकाकी स्तुति करने लगीं।

मेना बोलीं—जो महामाया जगत्‌को धारण करनेवाली चण्डिका, लोकधारिणी तथा सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको देनेवाली हैं, उन महादेवीको मैं प्रणाम करती हूँ। जो नित्य आनन्द प्रदान करनेवाली माया, योगनिद्रा, जगज्जननी तथा सुन्दर कमलोंकी मालासे अलंकृत हैं, उन नित्य-सिद्धा उमादेवीको मैं नमस्कार करती हूँ। जो सबकी मातामही, नित्य आनन्दमयी, भक्तोंके शोकका नाश करनेवाली तथा कल्पपर्यन्त नारियों एवं प्राणियोंकी बुद्धिरूपिणी हैं, उन देवीको मैं प्रणाम करती हूँ। आप यतियोंके अज्ञानमय बन्धनके नाशकी हेतुभूता ब्रह्मविद्या हैं। फिर मुझ-जैसी नारियाँ आपके प्रभावका क्या वर्णन कर सकती हैं। अथर्ववेदकी जो हिंसा (मारण आदिका प्रयोग) है, वह आप ही हैं। देवि! आप मेरे अभीष्ट फलको सदा प्रदान कीजिये। भावहीन (आकाररहित) तथा अदृश्य नित्यानित्य तन्मात्राओंसे आप ही पंचभूतोंके समुदायको संयुक्त करती हैं। आप ही उनकी शाश्वत शक्ति हैं। आपका स्वरूप नित्य है। आप समय-समयपर योगयुक्त एवं समर्थ नारीके रूपमें प्रकट होती हैं। आप ही जगत्‌की योनि और आधार-शक्ति हैं। आप ही प्राकृत तत्त्वोंसे परे नित्या प्रकृति कही गयी हैं। जिसके द्वारा ब्रह्मके स्वरूपको वशमें किया जाता (जाना जाता) है, वह नित्या विद्या आप ही हैं। मातः! आज मुझपर प्रसन्न होइये। आप ही अग्निके भीतर व्याप्त उग्र दाहिका शक्ति हैं। आप ही सूर्य-किरणोंमें स्थित प्रकाशिका शक्ति हैं। चन्द्रमामें जो आह्लादिका शक्ति है, वह भी आप ही हैं। ऐसी आप चण्डी-देवीका मैं स्तवन और वन्दन करती हूँ। आप स्त्रियोंको बहुत प्रिय हैं। ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारियोंकी ध्येयभूता नित्या ब्रह्मशक्ति

  • रुद्रसंहिता * २५१

भी आप ही हैं। सम्पूर्ण जगत्‌की वांछा तथा श्रीहरिकी माया भी आप ही हैं। जो देवी इच्छानुसार रूप धारण करके सृष्टि, पालन और संहारमयी हो उन कार्योंका सम्पादन करती हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रके शरीरकी भी हेतुभूता हैं, वे आप ही हैं। देवि! आज आप मुझपर प्रसन्न हों। आपको पुनः मेरा नमस्कार है।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनाके इस प्रकार स्तुति करनेपर दुर्गा कालिकाने पुनः उन मेनादेवीसे कहा—'तुम अपना मनोवांछित वर माँग लो। हिमाचलप्रिये! तुम मुझे प्राणोंके समान प्यारी हो। तुम्हारी जो इच्छा हो, वह माँगो। उसे मैं निश्चय ही दे दूँगी। तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।'

महेश्वरी उमाका यह अमृतके समान मधुर वचन सुनकर हिमगिरिकामिनी मेना बहुत संतुष्ट हुईं और इस प्रकार बोलीं—'शिवे! आपकी जय हो, जय हो। उत्कृष्ट ज्ञानवाली महेश्वरि! जगदम्बिके! यदि मैं वर पानेके योग्य हूँ तो फिर आपसे श्रेष्ठ वर माँगती हूँ। जगदम्बे! पहले तो मुझे सौ पुत्र हों। उन सबकी बड़ी आयु हो। वे बल-पराक्रमसे युक्त तथा ऋद्धि-सिद्धिसे सम्पन्न हों। उन पुत्रोंके पश्चात् मेरे एक पुत्री हो, जो स्वरूप और गुणोंसे सुशोभित होनेवाली हो; वह दोनों कुलोंको आनन्द देनेवाली तथा तीनों लोकोंमें पूजित हो। जगदम्बिके! शिवे! आप ही देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मेरी पुत्री तथा रुद्रदेवकी पत्नी होइये और तदनुसार लीला कीजिये।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनकाकी बात सुनकर प्रसन्नहृदया देवी उमाने उनके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये मुसकराकर कहा।

देवी बोलीं—पहले तुम्हें सौ बलवान् पुत्र प्राप्त होंगे। उनमें भी एक सबसे अधिक बलवान् और प्रधान होगा, जो सबसे पहले उत्पन्न होगा। तुम्हारी भक्तिसे संतुष्ट हो मैं स्वयं तुम्हारे यहाँ पुत्रीके रूपमें अवतीर्ण होऊँगी और समस्त देवताओंसे सेवित हो उनका कार्य सिद्ध करूँगी।

ऐसा कहकर जगद्धात्री परमेश्वरी कालिका शिवा मेनकाके देखते-देखते वहीं अदृश्य हो गयीं। तात! महेश्वरीसे अभीष्ट वर पाकर मेनकाको भी अपार हर्ष हुआ। उनका तपस्याजनित सारा क्लेश नष्ट हो गया। मुने! फिर कालक्रमसे मेनाके गर्भ रहा और वह प्रतिदिन बढ़ने लगा। समयानुसार उसने एक उत्तम पुत्रको उत्पन्न किया, जिसका नाम मैनाक था। उसने समुद्रके साथ उत्तम मैत्री बाँधी। वह अद्भुत पर्वत नागवधुओंके उपभोगका स्थल बना हुआ है। उसके समस्त अंग श्रेष्ठ हैं। हिमालयके सौ पुत्रोंमें वह सबसे श्रेष्ठ और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है। अपनेसे या अपने बाद प्रकट हुए समस्त पर्वतोंमें एकमात्र मैनाक ही पर्वतराजके पदपर प्रतिष्ठित है।

(अध्याय ५)

२५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

देवी उमाका हिमवान्‌के हृदय तथा मेनाके गर्भमें आना, गर्भस्था देवीका देवताओं‌द्वारा स्तवन, उनका दिव्यरूपमें प्रादुर्भाव, माता मेनासे बातचीत तथा नवजात कन्याके रूपमें परिवर्तित होना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर मेना और हिमालय आदरपूर्वक देवकार्यकी सिद्धिके लिये कन्याप्राप्तिके हेतु वहाँ जगज्जननी भगवती उमाका चिन्तन करने लगे। जो प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं, वे महेश्वरी उमा अपने पूर्ण अंशसे गिरिराज हिमवान्‌के चित्तमें प्रविष्ट हुईं। इससे उनके शरीरमें अपूर्व एवं सुन्दर प्रभा उतर आयी। वे आनन्दमग्न हो अत्यन्त प्रकाशित होने लगे। उस अद्भुत तेजोराशिसे सम्पन्न महामना हिमालय अग्निके समान अधृष्य हो गये थे। तत्पश्चात् सुन्दर कल्याणकारी समयमें गिरिराज हिमालयने अपनी प्रिया मेनाके उदरमें शिवाके उस परिपूर्ण अंशका आधान किया। इस तरह गिरिराजकी पत्नी मेनाने हिमवान्‌के हृदयमें विराजमान करुणानिधान देवीकी कृपासे सुखदायक गर्भ धारण किया। सम्पूर्ण जगत्‌की निवासभूता देवीके गर्भमें आनेसे गिरिप्रिया मेना सदा तेजोमण्डलके बीचमें स्थित होकर अधिक शोभा पाने लगीं। अपनी प्रिया शुभांगी मेनाको देखकर गिरिराज हिमवान् बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करने लगे। गर्भमें जगदम्बाके आ जानेसे वे महान् तेजसे सम्पन्न हो गयी थीं। मुने! उस अवसरमें विष्णु आदि देवता और मुनियोंने वहाँ आकर गर्भमें निवास करनेवाली शिवा-देवीकी स्तुति की और तदनन्तर महेश्वरीकी नाना प्रकारसे स्तुति करके प्रसन्नचित्त हुए वे सब देवता अपने-अपने धामको चले गये। जब नवाँ महीना बीत गया और दसवाँ भी पूरा हो चला, तब जगदम्बा कालिकाने समय पूर्ण होनेपर गर्भस्थ शिशुकी जो गति होती है, उसीको धारण किया अर्थात् जन्म ले लिया। उस अवसरपर आद्याशक्ति सती-साध्वी शिवा पहले मेनाके सामने अपने ही रूपसे प्रकट हुईं। वसन्त-ऋतुमें चैत्र मासकी नवमी तिथिको मृगशिरा नक्षत्रमें आधी रातके समय चन्द्रमण्डलसे आकाशगंगाकी भाँति मेनकाके उदरसे देवी शिवाका अपने ही स्वरूपमें प्रादुर्भाव हुआ। उस समय सम्पूर्ण संसारमें प्रसन्नता छा गयी। अनुकूल हवा चलने लगी, जो सुन्दर, सुगन्धित एवं गम्भीर थी। उस समय जलकी वर्षाके साथ फूलोंकी वृष्टि हुई। विष्णु आदि सब देवता वहाँ आये। सबने सुखी होकर प्रसन्नताके साथ जगदम्बाके दर्शन किये और शिवलोकमें निवास करनेवाली दिव्यरूपामहामाया शिवकामिनी मंगलमयी कालिका माताका स्तवन किया।

नारद! जब देवतालोग स्तुति करके चले गये, तब मेनका उस समय प्रकट हुई नील कमल-दलके समान कान्तिवाली श्यामवर्णा देवीको देखकर अतिशय आनन्दका अनुभव करने लगीं। देवीके उस दिव्य रूपका दर्शन करके गिरिप्रिया मेनाको ज्ञान प्राप्त हो गया। वे उन्हें परमेश्वरी समझकर अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उठीं और संतोषपूर्वक बोलीं।

* रुद्रसंहिता * २५३


मेनाने कहा—जगदम्बे! महेश्वरि! आपने बड़ी कृपा की, जो मेरे सामने प्रकट हुईं। अम्बिके! आपकी बड़ी शोभा हो रही है। शिवे! आप सम्पूर्ण शक्तियोंमें आद्याशक्ति तथा तीनों लोकोंकी जननी हैं। देवि! आप भगवान् शिवको सदा ही प्रिय हैं तथा सम्पूर्ण देवताओंसे प्रशंसित पराशक्ति हैं। महेश्वरि! आप कृपा करें और इसी रूपसे मेरे ध्यानमें स्थित हो जायँ। साथ ही मेरी पुत्रीके अनुरूप प्रत्यक्ष दर्शनीय रूप धारण करें।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! पर्वतपत्नी मेनाकी यह बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई शिवादेवीने उस गिरिप्रियाको इस प्रकार उत्तर दिया।

देवी बोलीं—मेना! तुमने पहले तत्परतापूर्वक मेरी बड़ी सेवा की थी। उस समय तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न हो मैं वर देनेके लिये तुम्हारे निकट आयी। 'वर माँगो' मेरी इस वाणीको सुनकर तुमने जो वर माँगा, वह इस प्रकार है—'महादेवि! आप मेरी पुत्री हो जायँ और देवताओंका हित-साधन करें।' तब मैंने 'तथास्तु' कहकर तुम्हें सादर यह वर दे दिया और मैं अपने धामको चली गयी। गिरिकामिनि! उस वरके अनुसार समय पाकर आज मैं तुम्हारी पुत्री हुई हूँ। आज मैंने जो दिव्य रूपका दर्शन कराया है, इसका उद्देश्य इतना ही है कि तुम्हें मेरे स्वरूपका स्मरण हो जाय; अन्यथा मनुष्य-रूपमें प्रकट होनेपर मेरे विषयमें तुम अनजान ही बनी रहतीं। अब तुम दोनों दम्पति पुत्रीभावसे अथवा दिव्यभावसे मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मुझमें स्नेह रखो। इससे मेरी उत्तम गति प्राप्त होगी। मैं पृथ्वीपर अद्भुत लीला करके देवताओंका कार्य सिद्ध करूँगी। भगवान् शम्भुकी पत्नी होऊँगी और सज्जनोंका संकटसे उद्धार करूँगी।

ऐसा कहकर जगन्माता शिवा चुप हो गयीं और उसी क्षण माताके देखते-देखते प्रसन्नतापूर्वक नवजात पुत्रीके रूपमें परिवर्तित हो गयीं।

(अध्याय ६)

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पार्वतीका नामकरण और विद्याध्ययन, नारदका हिमवान्‌के यहाँ जाना, पार्वतीका हाथ देखकर भावी फल बताना, चिन्तित हुए हिमवान्‌को आश्वासन दे पार्वतीका विवाह शिवजीके साथ करनेको कहना और उनके संदेहका निवारण करना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनाके सामने महातेजस्विनी कन्या होकर लौकिक गतिका आश्रय ले वह रोने लगी। उसका मनोहर रुदन सुनकर घरकी सब स्त्रियाँ हर्षसे खिल उठीं और बड़े वेगसे प्रसन्नतापूर्वक वहाँ आ पहुँचीं। नील कमल-दलके समान श्याम कान्तिवाली उस परम तेजस्विनी और मनोरम कन्याको देखकर गिरिराज हिमालय अतिशय आनन्दमें निमग्न हो गये। तदनन्तर सुन्दर मुहूर्तमें मुनियोंके साथ हिमवान्‌ने अपनी पुत्रीके काली आदि सुखदायक नाम रखे। देवी शिवा गिरिराजके भवनमें

२५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

दिनोंदिन बढ़ने लगीं—ठीक उसी तरह, जैसे वर्षाके समयमें गंगाजीकी जलराशि और शरद्-ऋतुके शुक्लपक्षमें चाँदनी बढ़ती है। सुशीलता आदि गुणोंसे संयुक्त तथा बन्धुजनोंकी प्यारी उस कन्याको कुटुम्बके लोग अपने कुलके अनुरूप पार्वती नामसे पुकारने लगे। माताने कालिकाको 'उमा' (अरी! तपस्या मत कर) कहकर तप करनेसे रोका था। मुने! इसलिये वह सुन्दर मुखवाली गिरिराजनन्दिनी आगे चलकर लोकमें उमाके नामसे विख्यात हो गयी। नारद! तदनन्तर जब विद्याके उपदेशका समय आया, तब शिवादेवी अपने चित्तको एकाग्र करके बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रेष्ठ गुरुसे विद्या पढ़ने लगीं। पूर्वजन्मकी सारी विद्याएँ उन्हें उसी तरह प्राप्त हो गयीं, जैसे शरत्कालमें हंसोंकी पाँत अपने-आप स्वर्गंगाके तटपर पहुँच जाती है और रात्रिमें अपना प्रकाश स्वतः महौषधियोंको प्राप्त हो जाता है। मुने! इस प्रकार मैंने शिवाकी किसी एक लीलाका ही वर्णन किया है। अब अन्य लीलाका वर्णन करूँगा, सुनो।

एक समयकी बात है तुम भगवान् शिवकी प्रेरणासे प्रसन्नतापूर्वक हिमाचलके घर गये। मुने! तुम शिवतत्त्वके ज्ञाता और उनकी लीलाके जानकारोंमें श्रेष्ठ हो। नारद! गिरिराज हिमालयने तुम्हें घरपर आया देख प्रणाम करके तुम्हारी पूजा की और अपनी पुत्रीको बुलाकर उससे तुम्हारे चरणोंमें प्रणाम करवाया। मुनीश्वर! फिर स्वयं ही तुम्हें नमस्कार करके हिमाचलने अपने सौभाग्यकी सराहना की और अत्यन्त मस्तक झुका हाथ जोड़कर तुमसे कहा।

हिमालय बोले—हे मुने नारद! हे ब्रह्मपुत्रोंमें श्रेष्ठ ज्ञानवान् प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं और कृपापूर्वक दूसरोंके उपकारमें लगे रहते हैं। मेरी पुत्रीकी जन्मकुण्डलीमें जो गुण-दोष हो, उसे बताइये। मेरी बेटी किसकी सौभाग्यवती प्रिय पत्नी होगी।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! तुम बातचीतमें कुशल और कौतुकी तो हो ही, गिरिराज हिमालयके ऐसा कहनेपर तुमने कालिकाका हाथ देखा और उसके सम्पूर्ण अंगोंपर विशेषरूपसे दृष्टिपात करके हिमालयसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

नारद बोले—शैलराज और मेना! आपकी यह पुत्री चन्द्रमाकी आदिकलाके समान बढ़ी है। समस्त शुभ लक्षण इसके अंगोंकी शोभा बढ़ाते हैं। यह अपने पतिके लिये अत्यन्त सुखदायिनी होगी और माता-पिताकी भी कीर्ति बढ़ायेगी। संसारकी समस्त नारियोंमें यह परम साध्वी और स्वजनोंको सदा महान् आनन्द देनेवाली होगी। गिरिराज! तुम्हारी पुत्रीके हाथमें

* रुद्रसंहिता * २५५

सब उत्तम लक्षण ही विद्यमान हैं। केवल एक रेखा विलक्षण है, उसका यथार्थ फल सुनो। इसे ऐसा पति प्राप्त होगा, जो योगी, नंग-धड़ंग रहनेवाला, निर्गुण और निष्काम होगा। उसके न माँ होगी न बाप। उसे मान-सम्मानका भी कोई खयाल नहीं रहेगा और वह सदा अमंगल वेष धारण करेगा।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तुम्हारी इस बातको सुन और सत्य मानकर मेना तथा हिमाचल दोनों पति-पत्नी बहुत दुःखित हुए, परंतु जगदम्बा शिवा तुम्हारे ऐसे वचनको सुनकर और लक्षणोंद्वारा उस भावी पतिको शिव मानकर मन-ही-मन हर्षसे खिल उठीं। 'नारदजीकी बात कभी झूठ नहीं हो सकती' यह सोचकर शिवा भगवान् शिवके युगलचरणोंमें सम्पूर्ण हृदयसे अत्यन्त स्नेह करने लगीं। नारद! उस समय मन-ही-मन दुःखी हो हिमवान्ने तुमसे कहा—'मुने! उस रेखाका फल सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ है। मैं अपनी पुत्रीको उससे बचानेके लिये क्या उपाय करूँ?'

'मुने! तुम महान् कौतुक करनेवाले और वार्तालाप-विशारद हो।' हिमवान्‌की बात सुनकर अपने मंगलकारी वचनोंद्वारा उनका हर्ष बढ़ाते हुए तुमने इस प्रकार कहा।

नारद बोले—गिरिराज! तुम स्नेहपूर्वक सुनो, मेरी बात सच्ची है। वह झूठ नहीं होगी। हाथकी रेखा ब्रह्माजीकी लिपि है। निश्चय ही वह मिथ्या नहीं हो सकती। अतः शैलप्रवर! इस कन्याको वैसा ही पति मिलेगा, इसमें संशय नहीं। परंतु इस रेखाके कुफलसे बचनेके लिये एक उपाय भी है, उसे प्रेमपूर्वक सुनो। उसे करनेसे तुम्हें सुख मिलेगा। मैंने जैसे वरका निरूपण किया है, वैसे ही भगवान् शंकर हैं। वे सर्वसमर्थ हैं और लीलाके लिये अनेक रूप धारण करते रहते हैं। उनमें समस्त कुलक्षण सद्गुणोंके समान हो जायँगे। समर्थ पुरुषमें कोई दोष भी हो तो वह उसे दुःख नहीं देता। असमर्थके लिये ही वह दुःखदायक होता है। इस विषयमें सूर्य, अग्नि और गंगाका दृष्टान्त सामने रखना चाहिये। इसलिये तुम विवेकपूर्वक अपनी कन्या शिवाको भगवान् शिवके हाथमें सौंप दो। भगवान् शिव सबके ईश्वर, सेव्य, निर्विकार, सामर्थ्यशाली और अविनाशी हैं। वे जल्दी ही प्रसन्न हो जाते हैं। अतः शिवाको ग्रहण कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है। विशेषतः वे तपस्यासे वशमें हो जाते हैं। यदि शिवा तप करे तो सब काम ठीक हो जायगा। सर्वेश्वर शिव सब प्रकारसे समर्थ हैं। वे इन्द्रके वज्रका भी विनाश कर सकते हैं। ब्रह्माजी उनके अधीन हैं तथा वे सबको सुख देनेवाले हैं। पार्वती भगवान् शंकरकी प्यारी पत्नी होगी। वह सदा रुद्रदेवके अनुकूल रहेगी; क्योंकि यह महासाध्वी और उत्तम व्रतका पालन करनेवाली है तथा माता-पिताके सुखको बढ़ानेवाली है। यह तपस्या करके भगवान् शिवके मनको अपने वशमें कर लेगी और वे भगवान् भी इसके सिवा किसी दूसरी स्त्रीसे विवाह नहीं करेंगे। इन दोनोंका प्रेम एक-दूसरेके अनुरूप है। वैसा उच्चकोटिका प्रेम न तो किसीका हुआ है, न इस समय है और न आगे होगा। गिरिश्रेष्ठ! इन्हें देवताओंके कार्य करने हैं। उनके जो-जो काम नष्टप्राय हो गये हैं, उन सबका इनके द्वारा पुनः उज्जीवन या उद्धार होगा। अद्रिराज! आपकी कन्याको पाकर ही

२५६* संक्षिप्त शिवपुराण *

भगवान् हर अर्द्धनारीश्वर होंगे। इन दोनोंका पुनः हर्षपूर्वक मिलन होगा। आपकी यह पुत्री अपनी तपस्याके प्रभावसे सर्वेश्वर महेश्वरको संतुष्ट करके उनके शरीरके आधे भागको अपने अधिकारमें कर लेगी, उनका अर्धांग बन जायगी। गिरिश्रेष्ठ! तुम्हें अपनी यह कन्या भगवान् शंकरके सिवा दूसरे किसीको नहीं देनी चाहिये। यह देवताओंका गुप्त रहस्य है, इसे कभी प्रकाशित नहीं करना चाहिये।

हिमालयने कहा—ज्ञानी मुने नारद! मैं आपको एक बात बता रहा हूँ, उसे प्रेमपूर्वक सुनिये और आनन्दका अनुभव कीजिये। सुना जाता है, महादेवजी सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके अपने मनको संयममें रखते हुए नित्य तपस्या करते हैं। देवताओंकी भी दृष्टिमें नहीं आते। देवर्षे! ध्यानमार्गमें स्थित हुए वे भगवान् शम्भु परब्रह्ममें लगाये हुए अपने मनको कैसे हटायेंगे? ध्यान छोड़कर विवाह करनेको कैसे उद्यत होंगे? इस विषयमें मुझे महान् संदेह है। दीपककी लौके समान प्रकाशमान, अविनाशी, प्रकृतिसे परे, निर्विकार, निर्गुण, सगुण, निर्विशेष और निरीह जो परब्रह्म है, वही उनका अपना सदाशिव नामक स्वरूप है। अतः वे उसीका सर्वत्र साक्षात्कार करते हैं, किसी बाह्य—अनात्मवस्तुपर दृष्टि नहीं डालते। मुने! यहाँ आये हुए किंनरोंके मुखसे उनके विषयमें नित्य ऐसी ही बात सुनी जाती है। क्या वह बात मिथ्या ही है। विशेषतः यह बात भी सुननेमें आती है कि भगवान् हरने पूर्वकालमें सतीके समक्ष एक प्रतिज्ञा की थी। उन्होंने कहा था—'दक्षकुमारी प्यारी सती! मैं तुम्हारे सिवा दूसरी किसी स्त्रीका अपनी पत्नी बनानेके लिये न वरण करूँगा न ग्रहण। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।' इस प्रकार सतीके साथ उन्होंने पहले ही प्रतिज्ञा कर ली है। अब सतीके मर जानेपर वे दूसरी किसी स्त्रीको कैसे ग्रहण करेंगे?

यह सुनकर तुम (नारद)-ने कहा—महामते! गिरिराज! इस विषयमें तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये। तुम्हारी यह पुत्री काली ही पूर्वकालमें दक्षकन्या सती हुई थी। उस समय इसीका सदा सर्वमंगलदायी सती नाम था। वे सती दक्षकन्या होकर रुद्रकी प्यारी पत्नी हुई थीं। उन्होंने पिताके यज्ञमें अनादर पाकर तथा भगवान् शंकरका भी अपमान हुआ देख क्रोधपूर्वक अपने शरीरको त्याग दिया था। वे ही सती फिर तुम्हारे घरमें उत्पन्न हुई हैं। तुम्हारी पुत्री साक्षात् जगदम्बा शिवा है। यह पार्वती भगवान् हरकी पत्नी होगी, इसमें संशय नहीं है।

नारद! ये सब बातें तुमने हिमवान्‌को विस्तारपूर्वक बतायीं। पार्वतीका वह पूर्वरूप और चरित्र प्रीतिको बढ़ानेवाला है। कालीके उस सम्पूर्ण पूर्ववृत्तान्तको तुम्हारे मुखसे सुनकर हिमवान् अपनी पत्नी और पुत्रके साथ तत्काल संदेहरहित हो गये। इसी तरह तुम्हारे मुखसे अपनी उस पूर्वकथाको सुनकर कालीने लज्जाके मारे मस्तक झुका लिया और उसके मुखपर मन्द मुसकानकी प्रभा फैल गयी। गिरिराज हिमालय पार्वतीके उस चरित्रको सुनकर उसके माथेपर हाथ फेरने लगे और मस्तक सूँघकर उसे अपने आसनके पास ही बिठा लिया।

नारद! इसके पश्चात् तुम उसी क्षण

* रुद्रसंहिता * २५७

प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकको चले गये और आनन्दसे युक्त हो अपने सर्वसम्पत्तिशाली गिरिराज हिमवान् भी मन-ही-मन मनोहर भवनमें प्रविष्ट हो गये। (अध्याय ७-८)

~~ ० ~~

मेना और हिमालयकी बातचीत, पार्वती तथा हिमवान्‌के स्वप्न तथा भगवान् शिवसे 'मंगल' ग्रहकी उत्पत्तिका प्रसंग

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! जब तुम स्वर्गलोकको चले गये, तबसे कुछ काल और व्यतीत हो जानेपर एक दिन मेनाने हिमवान्‌के निकट जाकर उन्हें प्रणाम किया। फिर खड़ी हो वे गिरिकामिनी मेना अपने पतिसे विनयपूर्वक बोलीं।

मेनाने कहा—प्राणनाथ! उस दिन नारद मुनिने जो बात कही थी, उसको स्त्री-स्वभावके कारण मैंने अच्छी तरह नहीं समझा; मेरी तो यह प्रार्थना है कि आप कन्याका विवाह किसी सुन्दर वरके साथ कर दीजिये। वह विवाह सर्वथा अपूर्व सुख देनेवाला होगा। गिरिजाका वर शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और कुलीन होना चाहिये। मेरी बेटी मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है। वह उत्तम वर पाकर जिस प्रकार भी प्रसन्न और सुखी हो सके, वैसा कीजिये। आपको मेरा नमस्कार है।

ऐसा कहकर मेना अपने पतिके चरणोंपर गिर पड़ीं। उस समय उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी। प्राज्ञशिरोमणि हिमवान्‌ने उन्हें उठाया और यथावत् समझाना आरम्भ किया।

हिमालय बोले—देवि मेनके! मैं यथार्थ और तत्त्वकी बात बताता हूँ सुनो! भ्रम छोड़ो। मुनिकी बात कभी झूठी नहीं हो सकती। यदि बेटीपर तुम्हें स्नेह है तो उसे सादर शिक्षा दो कि वह भक्तिपूर्वक सुस्थिर चित्तसे भगवान् शंकरके लिये तप करे। मेनके! यदि भगवान् शिव प्रसन्न होकर कालीका पाणिग्रहण कर लेते हैं तो सब शुभ ही होगा। नारदजीका बताया हुआ अमंगल या अशुभ नष्ट हो जायगा। शिवके समीप सारे अमंगल सदा मंगलरूप हो जाते हैं। इसलिये तुम पुत्रीको शिवकी प्राप्तिके लिये तपस्या करनेकी शीघ्र शिक्षा दो।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! हिमवान्‌की यह बात सुनकर मेनाको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे तपस्यामें रुचि उत्पन्न करनेके लिये पुत्रीको उपदेश देनेके निमित्त उसके पास गयीं। परंतु बेटीके सुकुमार अंगपर दृष्टिपात करके मेनाके मनमें बड़ी व्यथा हुई। उनके दोनों नेत्रोंमें तुरंत आँसू भर आये। फिर तो


789 संक्षिप्त शिवपुराण—9 A

२५८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

गिरिप्रिया मेनामें अपनी पुत्रीको उपदेश देनेकी शक्ति नहीं रह गयी। अपनी माताकी उस चेष्टाको पार्वतीजी शीघ्र ही ताड़ गयीं। तब वे सर्वज्ञ परमेश्वरी कालिका देवी माताको बारंबार आश्वासन दे तुरंत बोलीं।

पार्वतीने कहा—माँ ! तुम बड़ी समझदार हो। मेरी यह बात सुनो। आज पिछली रात्रिके समय ब्राह्ममुहूर्तमें मैंने एक स्वप्न देखा है, उसे बताती हूँ। माताजी ! स्वप्नमें एक दयालु एवं तपस्वी ब्राह्मणने मुझे शिवकी प्रसन्नताके लिये उत्तम तपस्या करनेका प्रसन्नतापूर्वक उपदेश दिया है।

नारद ! यह सुनकर मेनकाने शीघ्र अपने पतिको बुलाया और पुत्रीके देखे हुए स्वप्नको पूर्णतः कह सुनाया। मेनकाके मुखसे पुत्रीके स्वप्नको सुनकर गिरिराज हिमालय बड़े प्रसन्न हुए और अपनी प्रिय पत्नीको समझाते हुए बोले।

गिरिराजने कहा—प्रिये ! पिछली रातमें मैंने भी एक स्वप्न देखा है। मैं आदरपूर्वक उसे बताता हूँ। तुम प्रेमपूर्वक उसे सुनो। एक बड़े उत्तम तपस्वी थे। नारदजीने वरके जैसे लक्षण बताये थे, उन्हीं लक्षणोंसे युक्त शरीरको उन्होंने धारण कर रखा था। वे बड़ी प्रसन्नताके साथ मेरे नगरके निकट तपस्या करनेके लिये आये। उन्हें देखकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ और मैं अपनी पुत्रीको साथ लेकर उनके पास गया। उस समय मुझे ज्ञात हुआ कि नारदजीके बताये हुए वर भगवान् शम्भु ये ही हैं। तब मैंने उन तपस्वीकी सेवाके लिये अपनी पुत्रीको उपदेश देकर उनसे भी प्रार्थना की कि वे इसकी सेवा स्वीकार करें। परंतु उस समय उन्होंने मेरी बात नहीं मानी, इतनेमें ही वहाँ सांख्य और वेदान्तके अनुसार बहुत बड़ा विवाद छिड़ गया। तदनन्तर उनकी आज्ञासे मेरी बेटी वहीं रह गयी और अपने हृदयमें उन्हींकी कामना रखकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा करने लगी। सुमुखि ! यही मेरा देखा हुआ स्वप्न है, जिसे मैंने तुम्हें बता दिया। अतः प्रिये मेने! कुछ कालतक इस स्वप्नके फलकी परीक्षा या प्रतीक्षा करनी चाहिये, इस समय यही उचित जान पड़ता है। तुम निश्चित समझो, यही मेरा विचार है।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुनीश्वर नारद ! ऐसा कहकर गिरिराज हिमवान् और मेनका शुद्ध हृदयसे उस स्वप्नके फलकी परीक्षा एवं प्रतीक्षा करने लगे।

देवर्षे ! शिवभक्तशिरोमणे ! भगवान् शंकरका यश परम पावन, मंगलकारी, भक्तिवर्धक और उत्तम है। तुम इसे आदरपूर्वक सुनो। दक्ष-यज्ञसे अपने निवासस्थान कैलास पर्वतपर आकर भगवान् शम्भु प्रियाविरहसे कातर हो गये और प्राणोंसे भी अधिक प्यारी सतीदेवीका हृदयसे चिन्तन करने लगे। अपने पार्षदोंको बुलाकर सतीके लिये शोक करते हुए उनके प्रेमवर्द्धक गुणोंका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक वर्णन करने लगे। यह सब उन्होंने सांसारिक गतिको दिखानेके लिये किया। फिर, गृहस्थ-आश्रमकी सुन्दर स्थिति तथा नीति-रीतिका परित्याग करके वे दिगम्बर हो गये और सब लोकोंमें उन्मत्तकी भाँति भ्रमण करने लगे। लीलाकुशल होनेके कारण विरहीकी अवस्थाका प्रदर्शन करने लगे। सतीके विरहसे दुःखित हो कहीं भी उनका दर्शन न पाकर भक्तकल्याणकारी भगवान् शंकर पुनः कैलासगिरिपर लौट आये और


789 संक्षिप्त शिवपुराण—9 B

* रुद्रसंहिता * २५९

मनको यत्नपूर्वक एकाग्र करके उन्होंने समाधि लगा ली, जो समस्त दुःखोंका नाश करनेवाली है। समाधिमें वे अविनाशी स्वरूपका दर्शन करने लगे। इस तरह तीनों गुणोंसे रहित हो वे भगवान् शिव चिरकालतक सुस्थिरभावसे समाधि लगाये बैठे रहे। वे प्रभु स्वयं ही मायाके अधिपति निर्विकार परब्रह्म हैं। तदनन्तर जब असंख्य वर्ष व्यतीत हो गये, तब उन्होंने समाधि छोड़ी। उसके बाद तुरंत ही जो चरित्र हुआ, उसे मैं तुम्हें बताता हूँ। भगवान् शिवके ललाटसे उस समय श्रमजनित पसीनेकी एक बूँद पृथ्वीपर गिरी और तत्काल एक शिशुके रूपमें परिणत हो गयी। मुने! उस बालकके चार भुजाएँ थीं, शरीरकी कान्ति लाल थी और आकार मनोहर था। दिव्य द्युतिसे दीप्तिमान् वह शोभाशाली बालक अत्यन्त दुःसह तेजसे सम्पन्न था, तथापि उस समय लोकाचार-परायण परमेश्वर शिवके आगे वह साधारण शिशुकी भाँति रोने लगा। यह देख पृथ्वी भगवान् शंकरसे भय मान उत्तम बुद्धिसे विचार करनेके पश्चात् सुन्दरी स्त्रीका रूप धारण करके वहीं प्रकट हो गयीं। उन्होंने उस सुन्दर बालकको तुरंत उठाकर अपनी गोदमें रख लिया और अपने ऊपर प्रकट होनेवाले दूधको ही स्तन्यके रूपमें उसे पिलाने लगीं। उन्होंने स्नेहसे उसका मुँह चूमा और अपना ही बालक मान हँस-हँसकर उसे खेलाने लगीं। परमेश्वर शिवका हितसाधन करनेवाली पृथ्वीदेवी सच्चे भावसे स्वयं उसकी माता बन गयीं।

संसारकी सृष्टि करनेवाले, परम कौतुकी एवं विद्वान् अन्तर्यामी शम्भु वह चरित्र देखकर हँस पड़े और पृथ्वीको पहचानकर उनसे बोले—'धरणि! तुम धन्य हो! मेरे इस पुत्रका प्रेमपूर्वक पालन करो। यह श्रेष्ठ शिशु मुझ महातेजस्वी शम्भुके श्रमजल (पसीने)-से तुम्हारे ही ऊपर उत्पन्न हुआ है। वसुधे! यह प्रियकारी बालक यद्यपि मेरे श्रमजलसे प्रकट हुआ है, तथापि तुम्हारे नामसे तुम्हारे ही पुत्रके रूपमें इसकी ख्याति होगी। यह सदा त्रिविध तापोंसे रहित होगा। अत्यन्त गुणवान् और भूमि देनेवाला होगा। यह मुझे भी सुख प्रदान करेगा। तुम इसे अपनी रुचिके अनुसार ग्रहण करो।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर भगवान् शिव चुप हो गये। उनके हृदयसे विरहका प्रभाव कुछ कम हो गया। उनमें विरह क्या था, वे लोकाचारका पालन कर रहे थे। वास्तवमें सत्पुरुषोंके प्रिय श्रीरुद्रदेव निर्विकार परमात्मा ही हैं। शिवकी उपर्युक्त आज्ञाको शिरोधार्य करके पुत्रसहित पृथ्वीदेवी शीघ्र ही अपने स्थानको चली गयीं। उन्हें आत्यन्तिक सुख मिला। वह बालक 'भौम' नामसे प्रसिद्ध हो युवा होनेपर तुरंत काशी चला गया और वहाँ उसने दीर्घकालतक भगवान् शंकरकी सेवा की। विश्वनाथजीकी कृपासे ग्रहकी पदवी पाकर वे भूमिकुमार शीघ्र ही श्रेष्ठ एवं दिव्यलोकमें चले गये, जो शुक्रलोकसे परे है।

(अध्याय ९-१०)


789 संक्षिप्त शिवपुराण—9 C

२६० * संक्षिप्त शिवपुराण *

भगवान् शिवका गंगावतरण तीर्थमें तपस्याके लिये आना, हिमवान्‌द्वारा उनका स्वागत, पूजन और स्तवन तथा भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार उनका उस स्थानपर दूसरोंको न जाने देनेकी व्यवस्था करना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! हिमवान्‌की पुत्री लोकपूजित शक्तिस्वरूपा पार्वती हिमालयके घरमें रहकर बढ़ने लगीं। जब उनकी अवस्था आठ वर्षकी हो गयी, तब सतीके विरहसे कातर हुए शम्भुको उनके जन्मका समाचार मिला। नारद! उस अद्भुत बालिका पार्वतीको हृदयमें रखकर वे मन-ही-मन बड़े आनन्दका अनुभव करने लगे। इसी बीचमें लौकिक गतिका आश्रय ले शम्भुने अपने मनको एकाग्र करनेके लिये तप करनेका विचार किया। नन्दी आदि कुछ शान्त पार्षदोंको साथ ले वे हिमालयके उत्तम शिखरपर गंगावतार* नामक तीर्थमें चले आये, जहाँ पूर्वकालमें ब्रह्मधामसे च्युत होकर समस्त पापराशिका विनाश करनेके लिये चली हुई परम पावनी गंगा पहले-पहल भूतलपर अवतीर्ण हुई थीं। जितेन्द्रिय हरने वहीं रहकर तपस्या आरम्भ की। वे आलस्यरहित हो चेतन, ज्ञानस्वरूप, नित्य, ज्योतिर्मय, निरामय, जगन्मय, चिदानन्द-स्वरूप, द्वैतहीन तथा आश्रयरहित अपने आत्मभूत परमात्माका एकाग्रभावसे चिन्तन करने लगे। भगवान् हरके ध्यानपरायण होनेपर नन्दी-भृंगी आदि कुछ अन्य पार्षदगण भी ध्यानमें तत्पर हो गये। उस समय कुछ ही प्रमथगण परमात्मा शम्भुकी सेवा करते थे। वे सब-के-सब मौन रहते और एक शब्द भी नहीं बोलते थे। कुछ द्वारपाल हो गये थे।

इसी समय गिरिराज हिमवान् उस ओषधि-बहुल शिखरपर भगवान् शंकरका शुभागमन सुनकर उनके प्रति आदरकी भावनासे वहाँ आये। आकर सेवकों-सहित गिरिराजने भगवान् रुद्रको प्रणाम किया, उनकी पूजा की और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़ उनका सुन्दर स्तवन किया। फिर हिमालयने कहा—'प्रभो! मेरे सौभाग्यका उदय हुआ है, जो आप यहाँ पधारे हैं। आपने मुझे सनाथ कर दिया। क्यों न हो, महात्माओंने यह ठीक ही


* गंगोत्तरी।

789 संक्षिप्त शिवपुराण—9 D

* रुद्रसंहिता * २६१

वर्णन किया है कि आप दीनवत्सल हैं। आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मेरा जीवन सफल हुआ और आज मेरा सब कुछ सफल हो गया; क्योंकि आपने यहाँ पदार्पण करनेका कष्ट उठाया है। महेश्वर! आप मुझे अपना दास समझकर शान्तभावसे मुझे सेवाके लिये आज्ञा दीजिये। मैं बड़ी प्रसन्नतासे अनन्यचित्त होकर आपकी सेवा करूँगा।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! गिरिराजका यह वचन सुनकर महेश्वरने किंचित् आँखें खोलीं और सेवकोंसहित हिमवान्‌को देखा। सेवकोंसहित गिरिराजको उपस्थित देख ध्यानयोगमें स्थित हुए जगदीश्वर वृषभध्वजने मुसकराते हुए-से कहा।

महेश्वर बोले—शैलराज! मैं तुम्हारे शिखरपर एकान्तमें तपस्या करनेके लिये आया हूँ। तुम ऐसा प्रबन्ध करो, जिससे कोई भी मेरे निकट न आ सके। तुम महात्मा हो, तपस्याके धाम हो तथा मुनियों, देवताओं, राक्षसों और अन्य महात्माओंको भी सदा आश्रय देनेवाले हो। द्विज आदिका तुम्हारे ऊपर सदा ही निवास रहता है। तुम गंगासे अभिषिक्त होकर सदाके लिये पवित्र हो गये हो। दूसरोंका उपकार करनेवाले तथा सम्पूर्ण पर्वतोंके सामर्थ्यशाली राजा हो। गिरिराज! मैं यहाँ गंगावतरण-स्थलमें तुम्हारे आश्रित होकर आत्मसंयमपूर्वक बड़ी प्रसन्नताके साथ तपस्या करूँगा। शैलराज! गिरिश्रेष्ठ! जिस साधनसे यहाँ मेरी तपस्या बिना किसी विघ्न-बाधाके चालू रह सके, उसे इस समय प्रयत्नपूर्वक करो। पर्वतप्रवर! मेरी यही सबसे बड़ी सेवा है। तुम अपने घर जाओ और मैंने जो कुछ कहा है, उसका उत्तम प्रीतिसे यत्नपूर्वक प्रबन्ध करो।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर सृष्टिकर्ता जगदीश्वर भगवान् शम्भु चुप हो गये। उस समय गिरिराजने शम्भुसे प्रेमपूर्वक यह बात कही—'जगन्नाथ! परमेश्वर! आज मैंने अपने प्रदेशमें स्थित हुए आपका स्वागतपूर्वक पूजन किया है, यही मेरे लिये महान् सौभाग्यकी बात है। अब आपसे और क्या प्रार्थना करूँ। महेश्वर! कितने ही देवता बड़े-बड़े यत्नका आश्रय ले महान् तप करके भी आपको नहीं पाते। वे ही आप यहाँ स्वयं उपस्थित हो गये। मुझसे बढ़कर श्रेष्ठ सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि आप मेरे पृष्ठभागपर तपस्याके लिये उपस्थित हुए हैं। परमेश्वर! आज मैं अपनेको देवराज इन्द्रसे भी अधिक भाग्यवान् मानता हूँ; क्योंकि सेवकोंसहित आपने यहाँ आकर मुझे अनुग्रहका भागी बना दिया। देवेश! आप स्वतन्त्र हैं। यहाँ बिना किसी विघ्न-बाधाके उत्तम तपस्या कीजिये। प्रभो! मैं आपका दास हूँ। अतः सदा आपकी आज्ञाके अनुसार सेवा करूँगा।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर गिरिराज हिमालय तुरंत अपने घरको लौट आये। उन्होंने अपनी प्रिया मेनाको बड़े आदरसे वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तत्पश्चात् शैलराजने साथ जानेवाले परिजनों तथा समस्त सेवकगणोंको बुलाकर उन्हें ठीक-ठीक समझाया।

हिमालय बोले—आजसे कोई भी

२६२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

गंगावतरण नामक स्थानमें, जो मेरे पृष्ठ-भागमें ही है, मेरी आज्ञा मानकर न जाय। यह मैं सच्ची बात कहता हूँ। यदि कोई वहाँ जायगा तो उस महादुष्टको मैं विशेष दण्ड दूँगा। मुने! इस प्रकार अपने समस्त गणोंको शीघ्र ही नियन्त्रित करके हिमवान्ने विघ्ननिवारणके लिये जो सुन्दर प्रयत्न किया, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो। (अध्याय ११)


हिमवान्‌का पार्वतीको शिवकी सेवामें रखनेके लिये उनसे आज्ञा माँगना और शिवका कारण बताते हुए इस प्रस्तावको अस्वीकार कर देना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर शैलराज हिमालय उत्तम फल-फूल लेकर अपनी पुत्रीके साथ हर्षपूर्वक भगवान् हरके समीप गये। वहाँ जाकर उन्होंने ध्यान-परायण त्रिलोकीनाथ शिवको प्रणाम किया और अपनी अद्भुत कन्या कालीको हृदयसे उनकी सेवामें अर्पित कर दिया। फल-फूल आदि सारी सामग्री उनके सामने रखकर पुत्रीको आगे करके शैलराजने शम्भुसे कहा—'भगवन्! मेरी पुत्री आप भगवान् चन्द्रशेखरकी सेवा करनेके लिये उत्सुक है। अतः आपके आराधनकी इच्छासे मैं इसको साथ लाया हूँ। यह अपनी दो सखियोंके साथ सदा आप शंकरकी ही सेवामें रहे। नाथ! यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो इस कन्याको सेवाके लिये आज्ञा दीजिये।'

तब भगवान् शंकरने उस परम मनोहर कामरूपिणी कन्याको देखकर आँखें मूँद लीं और अपने त्रिगुणातीत, अविनाशी, परमतत्त्वमय उत्तम रूपका ध्यान आरम्भ किया। उस समय सर्वेश्वर एवं सर्वव्यापी जटाजूटधारी वेदान्तवेद्य चन्द्रकलाविभूषण शम्भु उत्तम आसनपर बैठकर नेत्र बंद किये तप (ध्यान)-में ही लग गये। यह देख हिमाचलने मस्तक झुकाकर पुनः उनके चरणोंमें प्रणाम किया। यद्यपि उनके हृदयमें दीनता नहीं थी, तो भी वे उस समय इस संशयमें पड़ गये कि न जाने भगवान् मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे या नहीं। वक्ताओंमें श्रेष्ठ गिरिराज हिमवान्ने जगत्‌के एकमात्र बन्धु भगवान् शिवसे इस प्रकार कहा।

हिमालय बोले—देवदेव! महादेव! करुणाकर! शंकर! विभो! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आँखें खोलकर मेरी ओर देखिये। शिव! शर्व! महेशान! जगत्‌को आनन्द प्रदान करनेवाले प्रभो! महादेव! आप सम्पूर्ण आपत्तियोंका निवारण करनेवाले हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। स्वामिन्! प्रभो! मैं अपनी इस पुत्रीके साथ प्रतिदिन आपका दर्शन करनेके लिये आऊँगा। इसके लिये आदेश दीजिये।

उनकी यह बात सुनकर देवदेव महेश्वरने आँखें खोलकर ध्यान छोड़ दिया और कुछ सोच-विचारकर कहा।

महेश्वर बोले—गिरिराज! तुम अपनी इस कुमारी कन्याको घरमें रखकर ही नित्य मेरे दर्शनको आ सकते हो, अन्यथा मेरा दर्शन नहीं हो सकता।

महेश्वरकी ऐसी बात सुनकर शिवाके पिता हिमवान् मस्तक झुकाकर उन भगवान् शिवसे बोले—'प्रभो! यह तो बताइये, किस कारणसे मैं इस कन्याके साथ आपके

* रुद्रसंहिता * २६३

दर्शनके लिये नहीं आ सकता। क्या यह आपकी सेवाके योग्य नहीं है? फिर इसे नहीं लानेका क्या कारण है, यह मेरी समझमें नहीं आता।'

यह सुनकर भगवान् वृषभध्वज शम्भु हँसने लगे और विशेषतः दुष्ट योगियोंको लोकाचारका दर्शन कराते हुए वे हिमालयसे बोले—'शैलराज! यह कुमारी सुन्दर कटिप्रदेशसे सुशोभित, तन्वंगी, चन्द्रमुखी और शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है। इसलिये इसे मेरे समीप तुम्हें नहीं लाना चाहिये। इसके लिये मैं तुम्हें बारंबार रोकता हूँ। वेदके पारंगत विद्वानोंने नारीको मायारूपिणी कहा है। विशेषतः युवती स्त्री तो तपस्वीजनोंके तपमें विघ्न डालनेवाली ही होती है। गिरिश्रेष्ठ! मैं तपस्वी, योगी और सदा मायासे निर्लिप्त रहनेवाला हूँ। मुझे युवती स्त्रीसे क्या प्रयोजन है। तपस्वियोंके श्रेष्ठ आश्रय हिमालय! इसलिये फिर तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये, क्योंकि तुम वेदोक्त धर्ममें प्रवीण, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और विद्वान् हो। अचलराज! स्त्रीके संगसे मनमें शीघ्र ही विषयवासना उत्पन्न हो जाती है। उससे वैराग्य नष्ट होता है और वैराग्य न होनेसे पुरुष उत्तम तपस्यासे भ्रष्ट हो जाता है। इसलिये शैल! तपस्वीको स्त्रियोंका संग नहीं करना चाहिये; क्योंकि स्त्री महाविषय-वासनाकी जड़ एवं ज्ञान-वैराग्यका विनाश करनेवाली होती है।'*

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस तरहकी बहुत-सी बातें कहकर महायोगिशिरोमणि भगवान् महेश्वर चुप हो गये। देवर्षे! शम्भुका यह निरामय, निःस्पृह और निष्ठुर वचन सुनकर कालीके पिता हिमवान् चकित, कुछ-कुछ व्याकुल और चुप हो गये। तपस्वी शिवकी कही हुई बात सुनकर और गिरिराज हिमवान्‌को चकित हुआ जानकर भवानी पार्वती उस समय भगवान् शिवको प्रणाम करके विशद वचन बोलीं।

(अध्याय १२)


* भवत्यचल तत्सङ्गाद् विषयोत्पत्तिराशु वै। विनश्यति च वैराग्यं ततो भ्रश्यति सत्तपः ॥
अतस्तपस्विना शैल न कार्या स्त्रीषु संगतिः। महाविषयमूलं सा ज्ञानवैराग्यनाशिनी ॥
(शि० पु० रू० सं० पा० खं० १२। ३१-३२)

२६४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पार्वती और शिवका दार्शनिक संवाद, शिवका पार्वतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा देना तथा पार्वतीद्वारा भगवान्‌की प्रतिदिन सेवा

भवानीने कहा—योगिन्! आपने तपस्वी होकर गिरिराजसे यह क्या बात कह डाली? प्रभो! आप ज्ञानविशारद हैं, तो भी अपनी बातका उत्तर मुझसे सुनिये। शम्भो! आप तपःशक्तिसे सम्पन्न होकर ही बड़ा भारी तप करते हैं। उस शक्तिके कारण ही आप महात्माको तपस्या करनेका विचार हुआ है। सभी कर्मोंको करनेकी जो वह शक्ति है, उसे ही प्रकृति जानना चाहिये। प्रकृतिसे ही सबकी सृष्टि, पालन और संहार होते हैं। भगवन्! आप कौन हैं? और सूक्ष्म प्रकृति क्या है? इसका विचार कीजिये। प्रकृतिके बिना लिंगरूपी महेश्वर कैसे हो सकते हैं? आप सदा प्राणियोंके लिये जो अर्चनीय, वन्दनीय और चिन्तनीय हैं, वह प्रकृतिके ही कारण हैं। इस बातको हृदयसे विचारकर ही आपको जो कहना हो, वह सब कहिये।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! पार्वतीजीके इस वचनको सुनकर महती लीला करनेमें लगे हुए प्रसन्नचित्त महेश्वर हँसते हुए बोले।

महेश्वरने कहा—मैं उत्कृष्ट तपस्याद्वारा ही प्रकृतिका नाश करता हूँ और तत्त्वतः प्रकृतिरहित शम्भुके रूपमें स्थित होता हूँ। अतः सत्पुरुषोंको कभी या कहीं प्रकृतिका संग्रह नहीं करना चाहिये। लोकाचारसे दूर एवं निर्विकार रहना चाहिये।

नारद! जब शम्भुने लौकिक व्यवहारके अनुसार यह बात कही, तब काली मन-ही-मन हँसकर मधुर वाणीमें बोलीं।

कालीने कहा—कल्याणकारी प्रभो! योगिन्! आपने जो बात कही है, क्या वह वाणी प्रकृति नहीं है? फिर आप उससे परे क्यों नहीं हो गये? (क्यों प्रकृतिका सहारा लेकर बोलने लगे?) इन सब बातोंको विचार करके तात्त्विक दृष्टिसे जो यथार्थ बात हो, उसीको कहना चाहिये। यह सब कुछ सदा प्रकृतिसे बँधा हुआ है। इसलिये आपको न तो बोलना चाहिये और न कुछ करना ही चाहिये; क्योंकि कहना और करना—सब व्यवहार प्राकृत ही है। आप अपनी बुद्धिसे इसको समझिये। आप जो कुछ सुनते, खाते, देखते और करते हैं, वह सब प्रकृतिका ही कार्य है। झूठे वाद-विवाद करना व्यर्थ है। प्रभो! शम्भो! यदि आप प्रकृतिसे परे हैं तो इस समय इस हिमवान् पर्वतपर आप तपस्या किसलिये करते हैं? हर! प्रकृतिने आपको निगल लिया है। अतः आप अपने स्वरूपको नहीं जानते। ईश! आप यदि अपने स्वरूपको जानते हैं तो किसलिये तप करते हैं? योगिन्! मुझे आपके साथ वाद-विवाद करनेकी क्या आवश्यकता है? प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध होनेपर विद्वान् पुरुष अनुमान प्रमाणको नहीं मानते। जो कुछ प्राणियोंकी इन्द्रियोंका विषय होता है, वह सब ज्ञानी पुरुषोंको बुद्धिसे विचारकर प्राकृत ही मानना चाहिये। योगीश्वर! बहुत कहनेसे क्या लाभ? मेरी उत्तम बात सुनिये। मैं प्रकृति हूँ। आप पुरुष हैं। यह सत्य है, सत्य है। इसमें संशय नहीं है। मेरे अनुग्रहसे ही

  • रुद्रसंहिता * २६५

आप सगुण और साकार माने गये हैं। मेरे बिना तो आप निरीह हैं। कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आप जितेन्द्रिय होनेपर भी प्रकृतिके अधीन हो सदा नाना प्रकारके कर्म करते रहते हैं। फिर निर्विकार कैसे हैं? और मुझसे लिप्त कैसे नहीं? शंकर! यदि आप प्रकृतिसे परे हैं और यदि आपका यह कथन सत्य है तो आपको मेरे समीप रहनेपर भी डरना नहीं चाहिये।

ब्रह्माजी कहते हैं—पार्वतीका यह सांख्य-शास्त्रके अनुसार कहा हुआ वचन सुनकर भगवान् शिव वेदान्तमतमें स्थित हो उनसे यों बोले।

श्रीशिवने कहा—सुन्दर भाषण करनेवाली गिरिजें! यदि तुम सांख्य-मतको धारण करके ऐसी बात कहती हो तो प्रतिदिन मेरी सेवा करो; परंतु वह सेवा शास्त्रनिषिद्ध नहीं होनी चाहिये।

गिरिजासे ऐसा कहकर भक्तोंपर अनुग्रह और उनका मनोरंजन करनेवाले भगवान् शिव हिमवान्‌से बोले।

शिवने कहा—गिरिराज! मैं यहीं तुम्हारे अत्यन्त रमणीय श्रेष्ठ शिखरकी भूमिपर उत्तम तपस्या तथा अपने आनन्दमय परमार्थस्वरूपका विचार करता हुआ विचरूँगा। पर्वतराज! आप मुझे यहाँ तपस्या करनेकी अनुमति दें। आपकी अनुज्ञाके बिना कोई तप नहीं किया जा सकता।

देवाधिदेव शूलधारी भगवान् शिवका यह कथन सुनकर हिमवान्‌ने उन्हें प्रणाम करके कहा—'महादेव! देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् तो आपका ही है। मैं तुच्छ होकर आपसे क्या कहूँ?'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! गिरिराज हिमवान्‌के ऐसा कहनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शंकर हँस पड़े और आदरपूर्वक उनसे बोले—'अब तुम जाओ।' शंकरकी आज्ञा पाकर हिमवान् अपने घर लौट गये। वे गिरिजाके साथ प्रतिदिन उनके दर्शनके लिये आते थे। काली अपने पिताके बिना भी दोनों सखियोंके साथ नित्य शंकरजीके पास जातीं और भक्तिपूर्वक उनकी सेवामें लगी रहतीं। नन्दीश्वर आदि कोई भी गण उन्हें रोकता नहीं था। तात! महेश्वरके आदेशसे ही ऐसा होता था। प्रत्येक गण पवित्रतापूर्वक रहकर उनकी आज्ञाका पालन करता था। जो विचार करनेसे परस्पर अभिन्न सिद्ध होते हैं, उन्हीं शिवा और शिवने सांख्य और वेदान्त-मतमें स्थित हो जो कल्याणदायक संवाद किया, वह सर्वदा सुख देनेवाला है। वह संवाद मैंने यहाँ कह सुनाया। इन्द्रियातीत भगवान् शंकरने गिरिराजके कहनेसे उनका गौरव मानकर उनकी पुत्रीको अपने पास रहकर सेवा करनेके लिये स्वीकार कर लिया।

काली अपनी दो सखियोंके साथ चन्द्रशेखर महादेवजीकी सेवाके लिये प्रतिदिन आती-जाती रहती थीं। वे भगवान् शंकरके चरण धोकर उस चरणामृतका पान करती थीं। आगसे तपाकर शुद्ध किये हुए वस्त्रसे (अथवा गरम जलसे धोये हुए वस्त्रके द्वारा) उनके शरीरका मार्जन करतीं, उसे मलती-पोंछती थीं। फिर सोलह उपचारोंसे विधिवत् हरकी पूजा करके बारंबार उनके चरणोंमें प्रणाम करनेके पश्चात् प्रतिदिन पिताके घर लौट जाती रहीं। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार

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ध्यानपरायण शंकरकी सेवामें लगी हुई शिवाका महान् समय व्यतीत हो गया, तो भी वे अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर पूर्ववत् उनकी सेवा करती रहीं। महादेवजीने जब फिर उन्हें अपनी सेवामें नित्य तत्पर देखा, तब वे दयासे द्रवित हो उठे और इस प्रकार विचार करने लगे—'यह काली जब तपश्चर्याव्रत करेगी और इसमें गर्वका बीज नहीं रह जायगा, तभी मैं इसका पाणिग्रहण करूँगा।'

ऐसा विचार करके महालीला करनेवाले महायोगीश्वर भगवान् भूतनाथ तत्काल ध्यानमें स्थित हो गये। मुने! परमात्मा शिव जब ध्यानमें लग गये, तब उनके हृदयमें दूसरी कोई चिन्ता नहीं रह गयी। काली प्रतिदिन महात्मा शिवके रूपका निरन्तर चिन्तन करती हुई उत्तम भक्तिभावसे उनकी सेवामें लगी रही। ध्यानपरायण भगवान् हर शुद्धभावसे वहाँ रहती हुई कालीको नित्य देखते थे। फिर भी पूर्व चिन्ताको भुलाकर उन्हें देखते हुए भी नहीं देखते थे।

इसी बीचमें इन्द्र आदि देवताओं तथा मुनियोंने ब्रह्माजीकी आज्ञासे कामदेवको वहाँ आदरपूर्वक भेजा। वे कामकी प्रेरणासे कालीका रुद्रके साथ संयोग कराना चाहते थे। उनके ऐसा करनेमें कारण यह था कि महापराक्रमी तारकासुरसे वे बहुत पीड़ित थे (और शंकरजीसे किसी महान् बलवान् पुत्रकी उत्पत्ति चाहते थे)। कामदेवने वहाँ पहुँचकर अपने सब उपायोंका प्रयोग किया, परंतु महादेवजीके मनमें तनिक भी क्षोभ नहीं हुआ। उलटे उन्होंने कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया। मुने! तब सती पार्वतीने भी गर्वरहित हो उनकी आज्ञासे बहुत बड़ी तपस्या करके शिवको पतिरूपमें प्राप्त किया। फिर वे पार्वती और परमेश्वर परस्पर अत्यन्त प्रेमसे और प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। उन दोनोंने परोपकारमें तत्पर रहकर देवताओंका महान् कार्य सिद्ध किया।

(अध्याय १३)


तारकासुरके सताये हुए देवताओंका ब्रह्माजीको अपनी कष्टकथा सुनाना, ब्रह्माजीका उन्हें पार्वतीके साथ शिवके विवाहके लिये उद्योग करनेका आदेश देना, ब्रह्माजीके समझानेसे तारकासुरका स्वर्गको छोड़ना और देवताओंका वहाँ रहकर लक्ष्यसिद्धिके लिये यत्नशील होना

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर पार्वतीके विवाहके विस्तृत प्रसंगको उपस्थित करते हुए ब्रह्माजीने तारकासुरकी उत्पत्ति, उसके उग्र तप, मनोवांछित वरप्राप्ति तथा देवता और असुर—सबको जीतकर स्वयं इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हो जानेकी कथा सुनायी।

तत्पश्चात् ब्रह्माजीने कहा—तारकासुर तीनों लोकोंको अपने वशमें करके जब स्वयं इन्द्र हो गया, तब उसके समान दूसरा कोई शासक नहीं रह गया। वह जितेन्द्रिय असुर त्रिभुवनका एकमात्र स्वामी होकर अद्भुत ढंगसे राज्यका संचालन करने लगा। उसने समस्त देवताओंको निकालकर उनकी जगह