भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* वायवीयसंहिता * ६९१

पार्वतीकी तपस्या, एक व्याघ्रपर उनकी कृपा, ब्रह्माजीका उनके पास आना, देवीके साथ उनका वार्तालाप, देवीके द्वारा काली त्वचाका त्याग और उससे कृष्णवर्णा कुमारी कन्याके रूपमें उत्पन्न हुई कौशिकीके द्वारा शुम्भ-निशुम्भका वध

वायुदेव कहते हैं—महर्षियो! तदनन्तर पतिव्रता माता पार्वती पतिकी परिक्रमा करके उनके वियोगसे होनेवाले दुःखको किसी तरह रोककर हिमालय पर्वतपर चली गयीं। उन्होंने पहले सखियोंके साथ जिस स्थानपर तप किया था, उस स्थानसे उनका प्रेम हो गया था। अतः फिर उसीको उन्होंने तपस्याके लिये चुना। तदनन्तर माता-पिताके घर जा उनका दर्शन और प्रणाम करके उन्हें सब समाचार बताकर उनकी आज्ञा ले उन्होंने सारे आभूषण उतार दिये और फिर तपोवनमें जा स्नानके पश्चात् तपस्वीका परमपावन वेष धारण करके अत्यन्त तीव्र एवं परम दुष्कर तपस्या करनेका संकल्प किया। वे मन-ही-मन सदा पतिके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई किसी क्षणिक लिंगमें उन्हींका ध्यान करके पूजनकी बाह्य विधिके अनुसार जंगलके फल-फूल आदि उपकरणोंद्वारा तीनों समय उनका पूजन करती थीं। 'भगवान् शंकर ही ब्रह्माका रूप धारण करके मेरी तपस्याका फल मुझे देंगे।' ऐसा दृढ़ विश्वास रखकर वे प्रतिदिन तपस्यामें लगी रहती थीं। इस तरह तपस्या करते-करते जब बहुत समय बीत गया, तब एक दिन उनके पास कोई बहुत बड़ा व्याघ्र देखा गया। वह दुष्टभावसे वहाँ आया था। पार्वतीजीके निकट आते ही उस दुरात्माका शरीर जड़वत् हो गया। वह उनके समीप चित्रलिखित-सा दिखायी देने लगा। दुष्टभावसे पास आये हुए उस व्याघ्रको देखकर भी देवी पार्वती साधारण नारीकी भाँति स्वभावसे विचलित नहीं हुईं। उस व्याघ्रके सारे अंग अकड़ गये थे। वह भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो रहा था और यह सोचकर कि 'यही मेरा भोजन है' निरन्तर देवीकी ओर ही देख रहा था। देवीके सामने खड़ा-खड़ा वह उनकी उपासना-सी करने लगा। इधर देवीके हृदयमें सदा यही भाव आता था कि यह व्याघ्र मेरा ही उपासक है, दुष्ट वन-जन्तुओंसे मेरी रक्षा करनेवाला है। यह सोचकर वे उसपर कृपा करने लगीं। उन्हींकी कृपासे उसके तीनों प्रकारके मल तत्काल नष्ट हो गये। फिर तो उस व्याघ्रको सहसा देवीके स्वरूपका बोध हुआ, उसकी भूख मिट गयी और उसके अंगोंकी जड़ता भी दूर हो गयी। साथ ही उसकी जन्मसिद्ध दुष्टता नष्ट हो गयी और उसे निरन्तर तृप्ति बनी रहने लगी। उस समय उत्कृष्टरूपसे अपनी कृतार्थताका अनुभव करके वह तत्काल भक्त हो गया और उन परमेश्वरीकी सेवा करने लगा। अब वह अन्य दुष्ट जन्तुओंको खदेड़ता हुआ तपोवनमें विचरने लगा। इधर देवीकी तपस्या बढ़ी और तीव्रसे तीव्रतर होती गयी।

देवता शुम्भ आदि दैत्योंके दुराग्रहसे दुःखी हो ब्रह्माजीकी शरणमें गये। उन्होंने शत्रुपीड़नजनित अपने दुःखको उनसे निवेदन

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किया। शुम्भ और निशुम्भ वरदान पानेके घमंडसे देवताओंको जैसे-जैसे दुःख देते थे, वह सब सुनकर ब्रह्माजीको उनपर बड़ी दया आयी। उन्होंने दैत्यवधके लिये भगवान् शंकरके साथ हुई बातचीतका स्मरण करके देवताओंके साथ देवीके तपोवनको प्रस्थान किया। वहाँ सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने उत्तम तपमें परिनिष्ठित परमेश्वरी पार्वतीको देखा। वे सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा-सी जान पड़ती थीं। अपने, श्रीहरिके तथा रुद्रदेवके भी जन्मदाता पिता महामहेश्वरकी भार्या आर्या जगन्माता गिरिराजनन्दिनी पार्वतीजीको ब्रह्माजीने प्रणाम किया।

देवगणोंके साथ ब्रह्माजीको आया देख देवीने उनके योग्य अर्घ्य देकर स्वागत आदिके द्वारा उनका सत्कार किया। बदलेमें उनका भी सत्कार और अभिनन्दन करके ब्रह्माजी अनजानकी भाँति देवीकी तपस्याका कारण पूछने लगे।

ब्रह्माजी बोले—देवि! इस तीव्र तपस्याके द्वारा आप यहाँ किस अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि करना चाहती हैं? तपस्याके सम्पूर्ण फलोंकी सिद्धि तो आपके ही अधीन है। जो समस्त लोकोंके स्वामी हैं, उन्हीं परमेश्वरको पतिके रूपमें पाकर आपने तपस्याका सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लिया है अथवा यह सारा ही क्रियाकलाप आपका लीलाविलास है। परंतु आश्चर्यकी बात तो यह है कि आप इतने दिनोंसे महादेवजीके विरहका कष्ट कैसे सह रही हैं?

देवीने कहा—ब्रह्मन्! जब सृष्टिके आदिकालमें महादेवजीसे आपकी उत्पत्ति सुनी जाती है, तब समस्त प्रजाओंमें प्रथम होनेके कारण आप मेरे ज्येष्ठ पुत्र होते हैं। फिर जब प्रजाकी वृद्धिके लिये आपके ललाटसे भगवान् शिवका प्रादुर्भाव हुआ, तब आप मेरे पतिके पिता और मेरे श्वशुर होनेके कारण गुरुजनोंकी कोटिमें आ जाते हैं और जब मैं यह सोचती हूँ कि स्वयं मेरे पिता गिरिराज हिमालय आपके पुत्र हैं, तब आप मेरे साक्षात् पितामह लगते हैं। लोकपितामह! इस तरह आप लोकयात्राके विधाता हैं। अन्तःपुरमें पतिके साथ जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे मैं आपके सामने कैसे कह सकूँगी? अतः यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ। मेरे शरीरमें जो यह कालापन है, इसे सात्त्विकविधिसे त्यागकर मैं गौरवर्णा होना चाहती हूँ।

ब्रह्माजी बोले—देवि! इतने ही प्रयोजनके लिये आपने ऐसा कठोर तप क्यों किया? क्या इसके लिये आपकी इच्छामात्र ही पर्याप्त नहीं थी? अथवा यह आपकी एक लीला ही है। जगन्मातः! आपकी लीला भी लोकहितके लिये ही होती है। अतः आप इसके द्वारा मेरे एक अभीष्ट फलकी सिद्धि कीजिये। निशुम्भ और शुम्भ नामक दो दैत्य हैं, उनको मैंने वर दे रखा है। इससे उनका घमंड बहुत बढ़ गया है और वे देवताओंको सता रहे हैं। उन दोनोंको आपके ही हाथसे मारे जानेका वरदान प्राप्त हुआ है। अतः अब विलम्ब करनेसे कोई लाभ नहीं। आप क्षणभरके लिये सुस्थिर हो जाइये। आपके द्वारा जो शक्ति रची या छोड़ी जायगी, वही उन दोनोंके लिये मृत्यु हो जायगी।

ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर गिरिराजकुमारी देवी पार्वती सहसा अपने काली त्वचाके आवरणको उतारकर

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गौरवर्णा हो गयीं। त्वचाकोष (काली त्वचामय आवरण) रूपसे त्यागी गयी जो उनकी शक्ति थी उसका नाम 'कौशिकी' हुआ। वह काले मेघके समान कान्तिवाली कृष्णवर्णा कन्या हो गयी। देवीकी वह मायामयी शक्ति ही योगनिद्रा और वैष्णवी कहलाती है। उसके आठ बड़ी-बड़ी भुजाएँ थीं। उसने उन हाथोंमें शंख, चक्र और त्रिशूल आदि आयुध धारण कर रखे थे। उस देवीके तीन रूप हैं—सौम्य, घोर और मिश्र। वह तीन नेत्रोंसे युक्त थी। उसने मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट धारण कर रखा था। उसे पुरुषका स्पर्श तथा रतिका योग नहीं प्राप्त था और वह अत्यन्त सुन्दरी थी। देवीने अपनी इस सनातन शक्तिको ब्रह्माजीके हाथमें दे दिया। वही दैत्यप्रवर शुम्भ और निशुम्भका वध करनेवाली हुई। उस समय प्रसन्न हुए ब्रह्माजीने उस पराशक्तिको सवारीके लिये एक प्रबल सिंह प्रदान किया, जो उनके साथ ही आया था। उस देवीके रहनेके लिये ब्रह्माजीने विन्ध्यगिरिपर वासस्थान दिया और वहाँ नाना प्रकारके उपचारोंसे उनका पूजन किया। विश्वकर्मा ब्रह्माके द्वारा सम्मानित हुई वह शक्ति अपनी माता गौरीको और ब्रह्माजीको क्रमशः प्रणाम करके अपने ही अंगोंसे उत्पन्न और अपने ही समान शक्तिशालिनी बहुसंख्यक शक्तियोंको साथ ले दैत्यराज शुम्भ-निशुम्भको मारनेके लिये उद्यत होकर विन्ध्यपर्वतको चली गयी। उसने समरांगणमें उन दोनों दैत्यराजोंको मार गिराया। उस युद्धका अन्यत्र वर्णन हो चुका है, इसलिये उसकी विस्तृत कथा यहाँ नहीं कही गयी। दूसरे स्थलोंसे उसकी ऊहा कर लेनी चाहिये। अब मैं प्रस्तुत प्रसंगका वर्णन करता हूँ। (अध्याय २५)


गौरीदेवीका व्याघ्रको अपने साथ ले जानेके लिये ब्रह्माजीसे आज्ञा माँगना, ब्रह्माजीका उसे दुष्कर्मी बताकर रोकना, देवीका शरणागतको त्यागनेसे इनकार करना, ब्रह्माजीका देवीकी महत्ता बताकर अनुमति देना और देवीका माता-पितासे मिलकर मन्दराचलको जाना

वायुदेवता कहते हैं—कौशिकीको उत्पन्न करके उसे ब्रह्माजीके हाथमें देनेके पश्चात् गौरीदेवीने प्रत्युपकारके लिये पितामहसे कहा।

देवी बोलीं—क्या आपने मेरे आश्रममें रहनेवाले इस व्याघ्रको देखा है? इसने दुष्ट जन्तुओंसे मेरे तपोवनकी रक्षा की है। यह मुझमें अपना मन लगाकर अनन्यभावसे मेरा भजन करता रहा है। अतः इसकी रक्षाके सिवा दूसरा कोई मेरा प्रिय कार्य नहीं है। यह मेरे अन्तःपुरमें विचरनेवाला होगा। भगवान् शंकर इसे प्रसन्नतापूर्वक गणेश्वरका पद प्रदान करेंगे। मैं इसे आगे करके सखियोंके साथ यहाँसे जाना चाहती हूँ। इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें; क्योंकि आप प्रजापति हैं।

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देवीके ऐसा कहनेपर उन्हें भोली-भाली जान हँसते और मुसकराते हुए ब्रह्माजी उस व्याघ्रकी पुरानी क्रूरतापूर्ण करतूतें बताते हुए उसकी दुष्टताका वर्णन करने लगे।

ब्रह्माजीने कहा—देवि! कहाँ तो पशुओंमें क्रूर व्याघ्र और कहाँ यह आपकी मंगलमयी कृपा। आप विषधर सर्पके मुखमें साक्षात् अमृत क्यों सींच रही हैं? यह केवल व्याघ्रके रूपमें रहनेवाला कोई दुष्ट निशाचर है। इसने बहुत-सी गौओं और तपस्वी ब्राह्मणोंको खा डाला है। यह उन सबको इच्छानुसार ताप देता हुआ मनमाना रूप धारण करके विचरता है। अतः इसे अपने पापकर्मका फल अवश्य भोगना चाहिये। ऐसे दुष्टोंपर आपको कृपा करनेकी क्या आवश्यकता है? इस स्वभावसे ही कलुषित चित्तवाले दुष्ट जीवसे देवीको क्या काम है?

देवी बोलीं—आपने जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है। यह ऐसा ही सही, तथापि मेरी शरणमें आ गया है। अतः मुझे इसका त्याग नहीं करना चाहिये।

ब्रह्माजीने कहा—देवि! इसकी आपके प्रति भक्ति है, इस बातको जाने बिना ही मैंने आपके समक्ष इसके पूर्वचरित्रका वर्णन किया है। यदि इसके भीतर भक्ति है तो पहलेके पापोंसे इसका क्या बिगड़नेवाला है; क्योंकि आपके भक्तका कभी नाश नहीं होता। जो आपकी आज्ञाका पालन नहीं करता, वह पुण्यकर्मा होकर भी क्या करेगा। देवि! आप ही अजन्मा, बुद्धिमती, पुरातन शक्ति और परमेश्वरी हैं। सबके बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था आपके ही अधीन है। आपके सिवा पराशक्ति कौन है? आपके बिना किसको कर्मजनित सिद्धि प्राप्त हो सकती है? आप ही असंख्य रुद्रोंकी विविध शक्ति हैं। शक्तिरहित कर्ता काम करनेमें कौन-सी सफलता प्राप्त करेगा? भगवान् विष्णुको, मुझको तथा अन्य देवता, दानव और राक्षसोंको उन-उन ऐश्वर्योंकी प्राप्ति करानेके लिये आपकी आज्ञा ही कारण है। असंख्य ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र, जो आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं, बीत चुके हैं और भविष्यमें भी होंगे। देवेश्वरि! आपकी आराधना किये बिना हम सब श्रेष्ठ देवता भी धर्म आदि चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति नहीं कर सकते। आपके संकल्पसे ब्रह्मत्व और स्थावरत्वका तत्काल व्यत्यास (फेर-बदल) भी हो जाता है अर्थात् ब्रह्मा स्थावर (वृक्ष आदि) हो जाता है और स्थावर ब्रह्मा; क्योंकि पुण्य और पापके फलोंकी व्यवस्था आपने ही की है। आप ही जगत्‌के स्वामी परमात्मा शिवकी अनादि, अमध्य और अनन्त आदि सनातन शक्ति हैं। आप सम्पूर्ण लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये किसी अद्भुत मूर्तिमें आविष्ट हो नाना प्रकारके भावोंसे क्रीड़ा करती हैं। भला, आपको ठीक-ठीक कौन जानता है। अतः यह पापाचारी व्याघ्र भी आज आपकी कृपासे परम सिद्धि प्राप्त करे, इसमें कौन बाधक हो सकता है।

इस प्रकार उनके परम तत्त्वका स्मरण कराकर ब्रह्माजीने जब उचित प्रार्थना की, तब गौरीदेवी तपस्यासे निवृत्त हुईं। तदनन्तर देवीकी आज्ञा लेकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये। फिर देवीने अपने वियोगको न सह सकनेवाले माता-पिता मैना और हिमवान्‌का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया

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तथा उन्हें नाना प्रकारसे आश्वासन दिया। इसके बाद देवीने तपस्याके प्रेमी तपोवनके वृक्षोंको देखा। वे उनके सामने फूलोंकी वर्षा कर रहे थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो उनसे होनेवाले वियोगके शोकसे पीड़ित हो वे आँसू बरसा रहे हों। अपनी शाखाओंपर बैठे हुए विहंगमोंके कलरवोंके व्याजसे मानो वे व्याकुलतापूर्वक नाना प्रकारसे दीनतापूर्ण विलाप कर रहे थे।

तदनन्तर पतिके दर्शनके लिये उतावली हो उस व्याघ्रको औरस पुत्रकी भाँति स्नेहसे आगे करके सखियोंसे बातचीत करती और देहकी दिव्य प्रभासे दसों दिशाओंको उद्दीपित करती हुई गौरीदेवी मन्दराचलको चली गयीं, जहाँ सम्पूर्ण जगत्के आधार, स्रष्टा, पालक और संहारक पतिदेव महेश्वर विराजमान थे।

(अध्याय २६)


मन्दराचलपर गौरीदेवीका स्वागत, महादेवजीके द्वारा उनके और अपने उत्कृष्ट स्वरूप एवं अविच्छेद्य सम्बन्धपर प्रकाश तथा देवीके साथ आये हुए व्याघ्रको उनका गणाध्यक्ष बनाकर अन्तःपुरके द्वारपर सोमनन्दी नामसे प्रतिष्ठित करना


ऋषियोंने पूछा—अपने शरीरको दिव्य गौरवर्णसे युक्त बनाकर गिरिराजकुमारी देवी पार्वती ने जब मन्दराचल प्रदेशमें प्रवेश किया, तब वे अपने पतिसे किस प्रकार मिलीं? प्रवेशकालमें उनके भवनद्वारपर रहनेवाले गणेश्वरोंने क्या किया तथा महादेवजीने भी उन्हें देखकर उस समय उनके साथ कैसा बर्ताव किया?

उस समय उस भवनमें रहनेवाले श्रेष्ठ पार्षदोंने देवीकी वन्दना की। फिर देवीने विनययुक्त वाणीद्वारा भगवान् त्रिलोचनको प्रणाम किया। वे प्रणाम करके अभी उठने भी नहीं पायी थीं कि परमेश्वरने उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़कर बड़े आनन्दके साथ हृदयसे लगा लिया। फिर मुसकराते हुए वे एकटक नेत्रोंसे उनके मुखचन्द्रकी सुधाका पान-सा करने लगे। फिर उनसे बातचीत करनेके लिये उन्होंने पहले अपनी ओरसे वार्ता आरम्भ की।

वायुदेवताने कहा—जिस प्रेमगर्भित रसके द्वारा अनुरागी पुरुषोंके मनका हरण हो जाता है, उस परम रसका ठीक-ठीक वर्णन करना असम्भव है। द्वारपाल बड़ी उतावलीसे राह देखते थे। उनके साथ ही महादेवजी भी देवीके आगमनके लिये उत्सुक थे। जब वे भवनमें प्रवेश करने लगीं, तब शंकित हो उन-उन प्रेमजनित भावोंसे वे उनकी ओर देखने लगे। देवी भी उनकी ओर उन्हीं भावोंसे देख रही थीं।

देवाधिदेव महादेवजी बोले—सर्वांगसुन्दरि प्रिये! क्या तुम्हारी वह मनोदशा दूर हो गयी, जिसके रहते तुम्हारे क्रोधके कारण मुझे अनुनय-विनयका कोई भी उपाय नहीं सूझता था। यदि साधारण लोगोंकी भाँति हम दोनोंमें भी एक-दूसरेके अप्रियका कारण विद्यमान है, तब तो इस चराचर

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जगत्‌का नाश हुआ ही समझना चाहिये। मैं अग्निके मस्तकपर स्थित हूँ और तुम सोमके। हम दोनोंसे ही यह अग्नि-सोमात्मक जगत् प्रतिष्ठित है! जगत्‌के हितके लिये स्वेच्छासे शरीर धारण करके विचरनेवाले हम दोनोंके वियोगमें यह जगत् निराधार हो जायगा। इसमें शास्त्र और युक्तिसे निश्चित किया हुआ दूसरा हेतु भी है। यह स्थावर-जंगमरूप जगत् वाणी और अर्थमय ही है। तुम साक्षात् वाणीमय अमृत हो और मैं अर्थमय परम उत्तम अमृत हूँ। ये दोनों अमृत एक-दूसरेसे विलग कैसे हो सकते हैं। तुम मेरे स्वरूपका बोध करानेवाली विद्या हो और मैं तुम्हारे दिये हुए विश्वासपूर्ण बोधसे जाननेयोग्य परमात्मा हूँ। हम दोनों क्रमशः विद्यात्मा और वेद्यात्मा हैं, फिर हममें वियोग होना कैसे सम्भव है। मैं अपने प्रयत्नसे जगत्‌की सृष्टि और संहार नहीं करता! एकमात्र आज्ञासे ही सबकी सृष्टि और संहार उपलब्ध होते हैं। वह अत्यन्त गौरवपूर्ण आज्ञा तुम्हीं हो। ऐश्वर्यका एकमात्र सार आज्ञा (शासन) है, क्योंकि वही स्वतन्त्रताका लक्षण है। आज्ञासे वियुक्त होनेपर मेरा ऐश्वर्य कैसा होगा। हमलोगोंका एक-दूसरेसे विलग होकर रहना कभी सम्भव नहीं है। देवताओंके कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे ही मैंने उस समय उस दिन लीलापूर्वक व्यंग्य वचन कहा था। तुम्हें भी तो यह बात अज्ञात नहीं थी। फिर तुम कुपित कैसे हो गयीं! अतः यही कहना पड़ता है कि तुमने मुझपर भी जो क्रोध किया था, वह त्रिलोकीकी रक्षाके लिये ही था; क्योंकि तुममें ऐसी कोई बात नहीं है, जो जगत्‌के प्राणियोंका अनर्थ करनेवाली हो।

इस प्रकार प्रिय वचन बोलनेवाले साक्षात् परमेश्वर शिवके प्रति शृंगाररसके सारभूत भावोंकी प्राकृतिक जन्मभूमि देवी पार्वती अपने पतिकी कही हुई यह मनोहर बात सुनकर इसे सत्य जान मुसकराकर रह गयीं, लज्जावश कोई उत्तर न दे सकीं। केवल कौशिकीके यशका वर्णन छोड़कर और कुछ उन्होंने नहीं कहा। देवीने कौशिकीके विषयमें जो कुछ कहा उसका वर्णन करता हूँ।

देवी बोलीं—'भगवन्! मैंने जिस कौशिकीकी सृष्टि की है, उसे क्या आपने नहीं देखा? वैसी कन्या न तो इस लोकमें हुई है और न होगी।' यों कहकर देवीने उसके विन्ध्यपर्वतपर निवास करने तथा समरांगणमें शुम्भ और निशुम्भका वध करके उनपर विजय पानेका प्रसंग सुनाकर उसके बल-पराक्रमका वर्णन किया। साथ ही यह भी बताया कि वह उपासना करनेवाले लोगोंको सदा प्रत्यक्ष फल देती है तथा

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निरन्तर लोकोंकी रक्षा करती रहती है। इस विषयमें ब्रह्माजी आपको आवश्यक बातें बतायेंगे।

उस समय इस प्रकार बातचीत करती हुई देवीकी आज्ञासे ही एक सखीने उस व्याघ्रको लाकर उनके सामने खड़ा कर दिया। उसे देखकर देवी कहने लगीं—'देव ! यह व्याघ्र मैं आपके लिये भेंट लायी हूँ। आप इसे देखिये। इसके समान मेरा उपासक दूसरा कोई नहीं है। इसने दुष्ट जन्तुओंके समूहसे मेरे तपोवनकी रक्षा की थी। यह मेरा अत्यन्त भक्त है और अपने रक्षणात्मक कार्यसे मेरा विश्वासपात्र बन गया है। मेरी प्रसन्नताके लिये यह अपना देश छोड़कर यहाँ आ गया है। महेश्वर! यदि मेरे आनेसे आपको प्रसन्नता हुई है और यदि आप मुझसे अत्यन्त प्रेम करते हैं तो मैं चाहती हूँ कि यह नन्दीकी आज्ञासे मेरे अन्तःपुरके द्वारपर अन्य रक्षकोंके साथ उन्हींके चिह्न धारण करके सदा स्थित रहे।'

वायुदेव कहते हैं—देवीके इस मधुर और अन्ततोगत्वा प्रेम बढ़ानेवाले शुभ वचनको सुनकर महादेवजीने कहा—'मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' फिर तो वह व्याघ्र उसी क्षण लचकती हुई सुवर्णजटित बेंतकी छड़ी, रत्नोंसे जटित विचित्र कवच, सर्पकी-सी आकृतिवाली छुरी तथा रक्षकोचित वेष धारण किये गणाध्यक्षके पदपर प्रतिष्ठित दिखायी दिया। उसने उमासहित महादेव और नन्दीको आनन्दित किया था। इसलिये सोमनन्दी नामसे विख्यात हुआ। इस प्रकार देवीका प्रिय कार्य करके चन्द्रार्धभूषण महादेवजीने उन्हें रत्नभूषित दिव्य आभूषणोंसे भूषित किया। चन्द्रभूषण भगवान् शिवने सर्वमनोहारिणी गिरिराजकुमारी गौरी देवीको पलंगपर बिठाकर उस समय सुन्दर अलंकारोंसे स्वयं ही उनका शृंगार किया।

(अध्याय २७)


अग्नि और सोमके स्वरूपका विवेचन तथा जगत्की अग्नीषोमात्मकताका प्रतिपादन

ऋषियोंने पूछा—प्रभो! पार्वतीदेवीका समाधान करते हुए महादेवजीने यह बात क्यों कही कि 'सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमात्मक एवं वागर्थात्मक है। ऐश्वर्यका सार एकमात्र आज्ञा ही है और वह आज्ञा तुम हो।' अतः इस विषयमें हम क्रमशः यथार्थ बातें सुनना चाहते हैं।

वायुदेव बोले—महर्षियो ! रुद्रदेवका जो घोर तेजोमय शरीर है, उसे अग्नि कहते हैं और अमृतमय सोम शक्तिका स्वरूप है; क्योंकि शक्तिका शरीर शान्तिकारक है। जो अमृत है, वह प्रतिष्ठा नामक कला है और जो तेज है, वह साक्षात् विद्या नामक कला है। सम्पूर्ण सूक्ष्म भूतोंमें वे ही दोनों रस और तेज हैं। तेजकी वृत्ति दो प्रकारकी है। एक सूर्यरूपा है और दूसरी अग्निरूपा। इसी तरह रसवृत्ति भी दो प्रकारकी है—एक सोमरूपिणी और दूसरी जलरूपिणी। तेज विद्युत् आदिके रूपमें उपलब्ध होता है तथा रस, मधुर आदिके रूपमें। तेज और रसके भेदोंने ही इस चराचर जगत्‌को धारण कर रखा है। अग्निसे अमृतकी उत्पत्ति होती है

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और अमृतस्वरूप घीसे अग्निकी वृद्धि होती है, अतएव अग्नि और सोमको दी हुई आहुति जगत्के लिये हितकारक होती है। शस्य-सम्पत्ति हविष्यका उत्पादन करती है। वर्षा शस्यको बढ़ाती है। इस प्रकार वर्षासे ही हविष्यका प्रादुर्भाव होता है, जिससे यह अग्नीषोमात्मक जगत् टिका हुआ है। अग्नि वहाँतक ऊपरको प्रज्वलित होता है, जहाँतक सोम-सम्बन्धी परम अमृत विद्यमान है और जहाँतक अग्निका स्थान है, वहाँतक सोम-सम्बन्धी अमृत नीचेको झरता है। इसीलिये कालाग्नि नीचे है और शक्ति ऊपर। जहाँतक अग्नि है, उसकी गति ऊपरकी ओर है और जो जलका आप्लावन है, उसकी गति नीचेकी ओर है। आधारशक्तिने ही इस ऊर्ध्वगामी कालाग्निको धारण कर रखा है तथा निम्नगामी सोम शिवशक्तिके आधारपर प्रतिष्ठित है। शिव ऊपर हैं और शक्ति नीचे तथा शक्ति ऊपर है और शिव नीचे। इस प्रकार शिव और शक्तिने यहाँ सब कुछ व्याप्त कर रखा है। बारंबार अग्निद्वारा जलाया हुआ जगत् भस्मसात् हो जाता है। यह अग्निका वीर्य है। भस्मको ही अग्निका वीर्य कहते हैं। जो इस प्रकार भस्मके श्रेष्ठ स्वरूपको जानकर 'अग्निः' इत्यादि मन्त्रोंद्वारा भस्मसे स्नान करता है, वह बँधा हुआ जीव पाशसे मुक्त हो जाता है। अग्निके वीर्यरूप भस्मको सोमने अयोग्ययुक्तिके द्वारा फिर आप्लावित किया; इसलिये वह प्रकृतिके अधिकारमें चला गया। यदि योगयुक्तिसे शाक्त अमृतवर्षाके द्वारा उस भस्मका सब ओर आप्लावन हो तो वह प्रकृतिके अधिकारोंको निवृत्त कर देता है। अतः इस तरहका अमृतप्लावन सदा मृत्युपर विजय पानेके लिये ही होता है। शिवाग्निके साथ शक्ति-सम्बन्धी अमृतका स्पर्श होनेपर जिसने अमृतका आप्लावन प्राप्त कर लिया, उसकी मृत्यु कैसे हो सकती है। जो अग्निके इस गुह्य स्वरूपको तथा पूर्वोक्त अमृतप्लावनको ठीक-ठीक जानता है, वह अग्नीषोमात्मक जगत्को त्यागकर फिर यहाँ जन्म नहीं लेता। जो शिवाग्निसे शरीरको दग्ध करके शक्तिस्वरूप सोमामृतसे योगमार्गके द्वारा इसे आप्लावित करता है, वह अमृतस्वरूप हो जाता है। इसी अभिप्रायको हृदयमें धारण करके महादेवजीने इस सम्पूर्ण जगत्को अग्नीषोमात्मक कहा था। उनका वह कथन सर्वथा उचित है।

(अध्याय २८)


जगत् 'वाणी और अर्थरूप' है—इसका प्रतिपादन

वायुदेवता कहते हैं—महर्षियो! अब यह बता रहा हूँ कि जगत्की वागर्थात्मकता-की सिद्धि कैसे की गयी है। छः अध्वाओं (मार्गों)-का सम्यक् ज्ञान मैं संक्षेपसे ही करा रहा हूँ, विस्तारसे नहीं। कोई भी ऐसा अर्थ नहीं है, जो बिना शब्दका हो और कोई भी ऐसा शब्द नहीं है जो बिना अर्थका हो। अतः समयानुसार सभी शब्द सम्पूर्ण अर्थोंके बोधक होते हैं। प्रकृतिका यह परिणाम शब्दभावना और अर्थभावनाके भेदसे दो प्रकारका है। उसे परमात्मा शिव तथा पार्वतीकी प्राकृत मूर्ति कहते हैं। उनकी जो शब्दमयी विभूति है, उसे विद्वान् तीन प्रकारकी बताते हैं—स्थूला, सूक्ष्मा और परा। स्थूला वह है, जो कानोंको प्रत्यक्ष सुनायी देती है; जो केवल चिन्तनमें आती है,

* वायवीयसंहिता * ६९९

वह सूक्ष्मा कही गयी है और जो चिन्तनकी भी सीमासे परे है, उसे परा कहा गया है। वह शक्तिस्वरूपा है। वही शिवतत्त्वके आश्रित रहनेवाली, पराशक्ति कही गयी है। ज्ञानशक्तिके संयोगसे वही इच्छाकी उपोद्वलिका (उसे दृढ़ करनेवाली) होती है। वह सम्पूर्ण शक्तियोंकी समष्टिरूपा है। वही शक्तितत्त्वके नामसे विख्यात हो समस्त कार्यसमूहकी मूल प्रकृति मानी गयी है। उसीको कुण्डलिनी कहा गया है। वही विशुद्धाध्वपरा माया है। वह स्वरूपतः विभागरहित होती हुई भी छः अध्वाओंके रूपमें विस्तारको प्राप्त होती है। उन छः अध्वाओंमेंसे तीन तो शब्दरूप हैं और तीन अर्थरूप बताये गये हैं। सभी पुरुषोंको आत्मशुद्धिके अनुरूप सम्पूर्ण तत्त्वोंके विभागसे लय और भोगके अधिकार प्राप्त होते हैं। वे सम्पूर्ण तत्त्वकलाओंद्वारा यथायोग्य प्राप्त हैं। परा प्रकृतिके जो आदिमें पाँच प्रकारके परिणाम होते हैं, वे ही निवृत्ति आदि कलाएँ हैं। मन्त्राध्वा, पदाध्वा और वर्णाध्वा—ये तीन अध्वा शब्दसे सम्बन्ध रखते हैं तथा भुवनाध्वा, तत्त्वाध्वा और कलाध्वा—ये तीन अर्थसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं। इन सबमें भी परस्पर व्याप्य-व्यापक भाव बताया जाता है। सम्पूर्ण मन्त्र पदोंसे व्याप्त हैं; क्योंकि वे वाक्यरूप हैं। सम्पूर्ण पद भी वर्णोंसे व्याप्त हैं; क्योंकि विद्वान् पुरुष वर्णोंके समूहको ही पद कहते हैं। वे वर्ण भी भुवनोंसे व्याप्त हैं; क्योंकि उन्हींमें उनकी उपलब्धि होती है। भुवन भी तत्त्वोंके समूहद्वारा बाहर-भीतरसे व्याप्त हैं; क्योंकि उनकी उत्पत्ति ही तत्त्वोंसे हुई है। उन कारणभूत तत्त्वोंसे ही उनका आरम्भ हुआ है। अनेक भुवन उनके अंदरसे ही प्रकट हुए हैं। उनमेंसे कुछ तो पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं। अन्य भुवनोंका ज्ञान शिवसम्बन्धी आगमसे प्राप्त करना चाहिये। कुछ तत्त्व सांख्य और योगशास्त्रोंमें भी प्रसिद्ध हैं।

शिवशास्त्रोंमें प्रसिद्ध तथा दूसरे-दूसरे भी जो तत्त्व हैं, वे सब-के-सब कलाओंद्वारा यथायोग्य व्याप्त हैं। परा प्रकृतिके जो आदिकालमें पाँच परिणाम हुए, वे ही निवृत्ति आदि कलाएँ हैं। वे पाँच कलाएँ उत्तरोत्तर तत्त्वोंसे व्याप्त हैं। अतः परा शक्ति सर्वत्र व्यापक है। वह विभागरहित होकर भी छः अध्वाओंके रूपमें विभक्त है। शक्तिसे लेकर पृथ्वीतत्त्वपर्यन्त सम्पूर्ण तत्त्वोंका प्रादुर्भाव शिवतत्त्वसे हुआ है। अतः जैसे घड़े आदि मिट्टीसे व्याप्त हैं, उसी प्रकार वे सारे तत्त्व एकमात्र शिवसे ही व्याप्त हैं। जो छः अध्वाओंसे प्राप्त होनेवाला है, वही शिवका परम धाम है। पाँच तत्त्वोंके शोधनसे व्यापिका और अव्यापिका शक्ति जानी जाती है। निवृत्तिकलाके द्वारा रुद्रलोकपर्यन्त ब्रह्माण्डकी स्थितिका शोधन होता है। प्रतिष्ठा-कलाद्वारा उससे भी ऊपर जहाँतक अव्यक्तकी सीमा है, वहाँतककी शोध की जाती है। मध्यवर्तिनी विद्या-कलाद्वारा उससे भी ऊपर विद्येश्वरपर्यन्त स्थानका शोधन होता है। शान्ति-कलाद्वारा उससे भी ऊपरके स्थानका तथा शान्त्यतीता-कलाके द्वारा अध्वाके अन्ततकका शोधन हो जाता है। उसीको 'परम व्योम' कहा गया है।

ये पाँच तत्त्व बताये गये, जिनसे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। वहीं साधकोंको यह सब

७०० * संक्षिप्त शिवपुराण *

कुछ देखना चाहिये; जो अध्वाकी व्याप्तिको न जानकर शोधन करना चाहता है, वह शुद्धिसे वंचित रह जाता है, उसके फलको नहीं पा सकता। उसका सारा परिश्रम व्यर्थ, केवल नरककी ही प्राप्ति करानेवाला होता है। शक्तिपातका संयोग हुए बिना तत्त्वोंका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो सकता। उनकी व्याप्ति और वृद्धिका ज्ञान भी असम्भव है। शिवकी जो चित्स्वरूपा परमेश्वरी परा-शक्ति है, वही आज्ञा है। उस कारणरूपा आज्ञाके सहयोगसे ही शिव सम्पूर्ण शिवके अधिष्ठाता होते हैं। विचारदृष्टिसे देखा जाय तो आत्मामें कभी विकार नहीं होता। यह विकारकी प्रतीति मायामात्र है। न तो बन्धन है और न उस बन्धनसे छुटकारा दिलानेवाली कोई मुक्ति है। शिवकी जो अव्यभिचारिणी पराशक्ति है, वही सम्पूर्ण ऐश्वर्यकी पराकाष्ठा है। वह उन्हींके समान धर्मवाली है और विशेषतः उनके उन-उन विलक्षण भावोंसे युक्त है। उसी शक्तिके साथ शिव गृहस्थ बने हुए हैं और वह भी सदा उन शिवके ही साथ उनकी गृहिणी बनकर रहती है। जो प्रकृतिजन्य जगत्-रूप कार्य है, वही उन शिव दम्पतिकी संतान है। शिव कर्ता हैं और शक्ति कारण। यही उन दोनोंका भेद है। वास्तवमें एकमात्र साक्षात् शिव ही दो रूपोंमें स्थित हैं। कुछ लोगोंका कहना है कि स्त्री और पुरुषरूपमें ही उनका भेद है। अन्य लोग कहते हैं कि पराशक्ति शिवमें नित्य समवेत है। जैसे प्रभा सूर्यसे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार चित्स्वरूपिणी पराशक्ति शिवसे अभिन्न ही है। यही सिद्धान्त है। अतः शिव परम कारण हैं, उनकी आज्ञा ही परमेश्वरी है। उसीसे प्रेरित होकर शिवकी अविनाशी मूल प्रकृति कार्यभेदसे महामाया, माया और त्रिगुणात्मक प्रकृति—इन तीन रूपोंमें स्थित हो छः अध्वाओंको प्रकट करती है। वह छः प्रकारका अध्वा वागर्थमय है, वही सम्पूर्ण जगत्के रूपमें स्थित है; सभी शास्त्रसमूह इसी भावका विस्तारसे प्रतिपादन करते हैं।
(अध्याय २९)


ऋषियोंके प्रश्नका उत्तर देते हुए वायुदेवके द्वारा शिवके स्वतन्त्र एवं सर्वानुग्राहक स्वरूपका प्रतिपादन

तदनन्तर ऋषियोंने कई कारण दिखाकर पूछा—वायुदेव! यदि शिव सदा शान्तभावसे रहकर ही सबपर अनुग्रह करते हैं तो सबकी अभिलाषाओंको एक साथ ही पूर्ण क्यों नहीं कर देते? जो सब कुछ करनेमें समर्थ होगा, वह सबको एक साथ ही बन्धन-मुक्त क्यों नहीं कर सकेगा? यदि कहें अनादिकालसे चले आनेवाले सबके विचित्र कर्म अलग-अलग हैं, अतः सबको एक समान फल नहीं मिल सकता, तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि कर्मोंकी विचित्रता भी यहाँ नियामक नहीं हो सकती। कारण कि वे कर्म भी ईश्वरके करानेसे ही होते हैं। इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ। उपर्युक्त-रूपसे विभिन्न युक्तियोंद्वारा फैलायी गयी नास्तिकता जिस प्रकारसे शीघ्र ही निवृत्त हो जाय, वैसा उपदेश दीजिये।

वायुदेवताने कहा—ब्राह्मणो! आप-

* वायवीयसंहिता * ७०१

लोगोंने युक्तियोंसे प्रेरित होकर जो संशय उपस्थित किया है, वह उचित ही है; क्योंकि किसी बातको जाननेकी इच्छा अथवा तत्त्वज्ञानके लिये उठाया गया प्रश्न साधु-बुद्धिवाले पुरुषोंमें नास्तिकताका उत्पादन नहीं कर सकता। मैं इस विषयमें ऐसा प्रमाण प्रस्तुत करूँगा, जो सत्पुरुषोंके मोहको दूर करनेवाला है। असत् पुरुषोंका जो अन्यथा भाव होता है, उसमें प्रभु शिवकी कृपाका अभाव ही कारण है। परिपूर्ण परमात्मा शिवके परम अनुग्रहके बिना कुछ भी कर्तव्य नहीं है, ऐसा निश्चय किया गया है। परानुग्रह कर्ममें स्वभाव ही पर्याप्त (पूर्णतः समर्थ) है, अन्यथा निःस्वभाव पुरुष किसीपर भी अनुग्रह नहीं कर सकता। पशु और पाशरूप सारा जगत् ही पर कहा गया है। वह अनुग्रहका पात्र है। परको अनुगृहीत करनेके लिये पतिकी आज्ञाका समन्वय आवश्यक है। पति आज्ञा देनेवाला है, वही सदा सबपर अनुग्रह करता है। उस अनुग्रहके लिये ही आज्ञा-रूप अर्थको स्वीकार करनेपर शिव परतन्त्र कैसे कहे जा सकते हैं। अनुग्राहककी अपेक्षा न रखकर कोई भी अनुग्रह सिद्ध नहीं हो सकता। अतः स्वातन्त्र्य-शब्दके अर्थकी अपेक्षा न रखना ही अनुग्रहका लक्षण है। जो अनुग्राह्य है, वह परतन्त्र माना जाता है; क्योंकि पतिके अनुग्रहके बिना उसे भोग और मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती। जो मूर्त्यात्मा हैं, वे भी अनुग्रहके पात्र हैं; क्योंकि उनसे भी शिवकी आज्ञाकी निवृत्ति नहीं होती—वे भी शिवकी आज्ञासे बाहर नहीं हैं। यहाँ कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो शिवकी आज्ञाके अधीन न हो। सकल (सगुण या साकार) होनेपर भी जिसके द्वारा हमें निष्कल (निर्गुण या निराकार) शिवकी प्राप्ति होती है, उस मूर्ति या लिंगके रूपमें साक्षात् शिव ही विराज रहे हैं। वह ‘शिवकी मूर्ति है’ यह बात तो उपचारसे कही जाती है। जो साक्षात् निष्कल तथा परम कारणरूप शिव हैं, वे किसीके द्वारा भी साकार अनुभावसे उपलक्षित नहीं होते, ऐसी बात नहीं है। यहाँ प्रमाणगम्य होना उनके स्वभावका उपपादक नहीं है, प्रमाण अथवा प्रतीकमात्रसे अपेक्षा-बुद्धिका उदय नहीं होता। वे परम तत्त्वके उपलक्षणमात्र हैं, इसके सिवा उनका और कोई अभिप्राय नहीं है। कोई-न-कोई मूर्ति ही आत्माका साक्षात् उपलक्षण होती है। ‘शिवकी मूर्ति है’ इस कथनका अभिप्राय यह है कि उस मूर्तिके रूपमें परम शिव विराजमान हैं। मूर्ति उनका उपलक्षण है। जैसे काष्ठ आदि आलम्बनका आश्रय लिये बिना केवल अग्नि कहीं उपलब्ध नहीं होती, उसी प्रकार शिव भी मूर्त्यात्मामें आरूढ़ हुए बिना उपलब्ध नहीं होते। यही वस्तुस्थिति है। जैसे किसीसे यह कहनेपर कि ‘तुम आग ले आओ’ उसके द्वारा जलती हुई लकड़ी आदिके सिवा साक्षात् अग्नि नहीं लायी जाती, उसी प्रकार शिवका पूजन भी मूर्तिरूपमें ही हो सकता है, अन्यथा नहीं। इसीलिये पूजा आदिमें ‘मूर्त्यात्मा’ की परिकल्पना होती है; क्योंकि मूर्त्यात्माके प्रति जो कुछ किया जाता है, वह साक्षात् शिवके प्रति किया गया ही माना गया है। लिंग आदिमें विशेषतः अर्चाविग्रहमें जो पूजनकृत्य होता है, वह भगवान् शिवका ही पूजन है। उन-उन मूर्तियोंके रूपमें शिवकी भावना करके हमलोग शिवकी ही उपासना

७०२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

करते हैं। जैसे परमेष्ठी शिव मूर्त्यात्मापर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार मूर्त्यात्मामें स्थित शिव हम पशुओंपर अनुग्रह करते हैं। परमेष्ठी शिवने लोकोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही सदाशिव आदि सम्पूर्ण मूर्त्यात्माओंको अधिष्ठित—अपनी आज्ञामें रखकर अनुगृहीत किया है।

भगवान् शिव सबपर अनुग्रह ही करते हैं, किसीका निग्रह नहीं करते, क्योंकि निग्रह करनेवाले लोगोंमें जो दोष होते हैं, वे शिवमें असम्भव हैं। ब्रह्मा आदिके प्रति जो निग्रह देखे गये हैं, वे भी श्रीकण्ठमूर्ति शिवके द्वारा लोकहितके लिये ही किये गये हैं। विद्वानोंकी दृष्टिमें निग्रह भी स्वरूपसे दूषित नहीं है। (जब वह राग-द्वेषसे प्रेरित होकर किया जाता है, तभी निन्दनीय माना जाता है।) इसीलिये दण्डनीय अपराधियोंको राजाओंकी ओरसे मिले हुए दण्डकी प्रशंसा की जाती है। यदि साधुकी रक्षा करनी है तो असाधुका निवारण करना ही होगा। पहले साम आदि तीन उपायोंसे असाधुके निवारणका प्रयत्न किया जाता है। यदि यह प्रयत्न सफल नहीं हुआ तो अन्तमें चौथे उपाय दण्डका ही आश्रय लिया जाता है। यह दण्डान्त अनुशासन लोकहितके लिये ही किया जाना चाहिये। यही उसके औचित्यको परिलक्षित कराता है। यदि अनुशासन इसके विपरीत हो तो उसे अहितकर कहते हैं। जो सदा हितमें ही लगे रहनेवाले हैं, उन्हें ईश्वरका दृष्टान्त अपने सामने रखना चाहिये। (ईश्वर केवल दुष्टोंको ही दण्ड देते हैं, इसीलिये निर्दोष कहे जाते हैं।) अतः जो दुष्टोंको ही दण्ड देता है, वह उस निग्रह-कर्मको लेकर सत्पुरुषोंद्वारा लांछित कैसे किया जा सकता है। लोकमें जहाँ कहीं भी निग्रह होता है, वह यदि विद्वेषपूर्वक न हो, तभी श्रेष्ठ माना जाता है। जो पिता पुत्रको दण्ड देकर उसे अधिक शिक्षित बनाता है, वह उससे द्वेष नहीं करता।

शिवकी आज्ञाका पालन ही हित है और जो हित है, वही उनका अनुग्रह है। अतएव सबको हितमें नियुक्त करनेवाले शिव सबपर अनुग्रह करनेवाले कहे गये हैं। जो उपकार-शब्दका अर्थ है, उसे भी अनुग्रह ही कहा गया है; क्योंकि उपकार भी हितरूप ही होता है। अतः सबका उपकार करनेवाले शिव सर्वानुग्राहक हैं। शिवके द्वारा जड़-चेतन सभी सदा हितमें ही नियुक्त होते हैं। परंतु सबको जो एक साथ और एक समान हितकी उपलब्धि नहीं होती, इसमें उनका स्वभाव ही प्रतिबन्धक है। जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा सभी कमलोंको विकासके लिये प्रेरित करते हैं, परंतु वे अपने-अपने स्वभावके अनुसार एक साथ और एक समान विकसित नहीं होते, स्वभाव भी पदार्थोंके भावी अर्थका कारण होता है, किंतु वह नष्ट होते हुए अर्थको कर्ताओंके लिये सिद्ध नहीं कर सकता। जैसे अग्निका संयोग सुवर्णको ही पिघलाता है, कोयले या अंगारको नहीं, उसी प्रकार भगवान् शिव परिपक्व मलवाले पशुओंको ही बन्धनमुक्त करते हैं, दूसरोंको नहीं। जो वस्तु जैसी होनी चाहिये, वैसी वह स्वयं नहीं बनती। वैसी बननेके लिये कर्ताकी भावनाका सहयोग होना आवश्यक है। कर्ताकी भावनाके बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है, अतः कर्ता सदा स्वतन्त्र होता है।

* वायवीयसंहिता *७०३

सबपर अनुग्रह करनेवाले शिव जिस तरह स्वभावसे ही निर्मल हैं, उसी तरह 'जीव' संज्ञा धारण करनेवाली आत्माएँ स्वभावतः मलिन होती हैं। यदि ऐसी बात न होती तो वे जीव क्यों नियमपूर्वक संसारमें भटकते और शिव क्यों संसार-बन्धनसे परे रहते ? विद्वान् पुरुष कर्म और मायाके बन्धनको ही जीवका 'संसार' कहते हैं। यह बन्धन जीवको ही प्राप्त होता है, शिवको नहीं। इसमें कारण है, जीवका स्वाभाविक मल। वह कारणभूत मल जीवोंका अपना स्वभाव ही है, आगन्तुक नहीं है। यदि आगन्तुक होता तो किसीको भी किसी भी कारणसे बन्धन प्राप्त हो जाता। जो यह हेतु है, वह एक है; क्योंकि सब जीवोंका स्वभाव एक-सा है। यद्यपि सबमें एक-सा आत्मभाव है, तो भी मलके परिपाक और अपरिपाकके कारण कुछ जीव बद्ध हैं और कुछ बन्धनसे मुक्त हैं। बद्ध जीवोंमें भी कुछ लोग लय और भोगके अधिकारके अनुसार उत्कृष्ट और निकृष्ट होकर ज्ञान और ऐश्वर्य आदिकी विषमताको प्राप्त होते हैं अर्थात् कुछ लोग अधिक ज्ञान और ऐश्वर्यसे युक्त होते हैं तथा कुछ लोग कम। कोई मूर्त्यात्मा होते हैं और कोई साक्षात् शिवके समीप विचरनेवाले होते हैं। मूर्त्यात्माओंमें कोई तो शिवस्वरूप हो छहों अध्वाओंके ऊपर स्थित होते हैं, कोई अध्वाओंके मध्यमार्गमें महेश्वर होकर रहते हैं और कोई निम्नभागमें रुद्ररूपसे स्थित होते हैं। शिवके समीपवर्ती स्वरूपमें भी मायासे परे होनेके कारण उत्कृष्ट, मध्यम और निकृष्टके भेदसे तीन श्रेणियाँ होती हैं—वहाँ निम्न स्थानमें आत्माकी स्थिति है, मध्यम स्थानमें अन्तरात्माकी स्थिति है और जो सबसे उत्कृष्ट श्रेणीका स्थान है, उसमें परमात्माकी स्थिति है। ये ही क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर कहलाते हैं। कोई वसु (जीव) परमात्मपदका आश्रय लेनेवाले होते हैं, कोई अन्तरात्मपदपर और आत्मपदपर प्रतिष्ठित होते हैं।

भगवान् शिव तो अनायास ही समस्त पशुओंको बन्धनसे मुक्त करनेमें समर्थ हैं। फिर वे उन्हें बन्धनमें डाले रखकर क्यों दुःख देते हैं? यहाँ ऐसा विचार या संदेह नहीं करना चाहिये; क्योंकि सारा संसार दुःखरूप ही है, ऐसा विचारवानोंका निश्चित सिद्धान्त है। जो स्वभावतः दुःखमय है, वह दुःखरहित कैसे हो सकता है। स्वभावमें उलट-फेर नहीं हो सकता। वैद्यकी दवासे रोग अरोग नहीं होता। वह रोगपीड़ित मनुष्यका अपनी दवासे सुखपूर्वक उद्धार कर देता है। इसी प्रकार जो स्वभावतः मलिन और स्वभावसे ही दुःखी हैं, उन पशुओंको अपनी आज्ञारूपी ओषधि देकर शिव दुःखसे छुड़ा देते हैं। रोग होनेमें वैद्य कारण नहीं है, परंतु संसारकी उत्पत्तिमें शिव कारण हैं। अतः रोग और वैद्यके दृष्टान्तसे शिव और संसारके दार्ष्टान्तमें समानता नहीं है। इसलिये इसके द्वारा शिवपर दोषारोपण नहीं किया जा सकता। जब दुःख स्वभाव-सिद्ध है, तब शिव उसके कारण कैसे हो सकते हैं। जीवोंमें जो स्वाभाविक मल है, वही उन्हें संसारके चक्रमें डालता है। संसारका कारणभूत जो मल—अचेतन माया आदि है, वह शिवका सांनिध्य प्राप्त किये बिना स्वयं चेष्टाशील नहीं हो सकता। जैसे चुम्बकमणि लोहेका सांनिध्य पाकर

७०४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

ही उपकारक होता है—लोहेको खींचता है, उसी प्रकार शिव भी जड माया आदिका सांनिध्य पाकर ही उसके उपकारक होते हैं, उसे सचेष्ट बनाते हैं। उनके विद्यमान सांनिध्यको अकारण हटाया नहीं जा सकता। अतः जगत्‌के लिये जो सदा अज्ञात हैं, वे शिव ही इसके अधिष्ठाता हैं। शिवके बिना यहाँ कोई भी प्रवृत्त (चेष्टाशील) नहीं होता, उनकी आज्ञाके बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। उनसे प्रेरित होकर ही यह सारा जगत् विभिन्न प्रकारकी चेष्टाएँ करता है, तथापि वे शिव कभी मोहित नहीं होते। उनकी आज्ञारूपिणी जो शक्ति है, वही सबका नियन्त्रण करती है। उसका सब ओर मुख है। उसीने सदा इस सम्पूर्ण दृश्यप्रपंचका विस्तार किया है, तथापि उसके दोषसे शिव दूषित नहीं होते। जो दुर्बुद्धि मानव मोहवश इसके विपरीत मान्यता रखता है, वह नष्ट हो जाता है। शिवकी शक्तिके वैभवसे ही संसार चलता है, तथापि इससे शिव दूषित नहीं होते।

इसी समय आकाशसे शरीररहित वाणी सुनायी दी—‘सत्यम् ओम् अमृतं सौम्यम्’* इन पदोंका वहाँ स्पष्ट उच्चारण हुआ, उसे सुनकर सब लोग बहुत प्रसन्न हुए। उनके समस्त संशयोंका निवारण हो गया तथा उन मुनियोंने विस्मित हो प्रभु पवनदेवको प्रणाम किया। इस प्रकार उन मुनियोंको संदेहरहित करके भी वायुदेवने यह नहीं माना कि इन्हें पूर्ण ज्ञान हो गया। ‘इनका ज्ञान अभी प्रतिष्ठित नहीं हुआ है’ ऐसा समझकर ही वे इस प्रकार बोले।

वायुदेवताने कहा—मुनियो! परोक्ष और अपरोक्षके भेदसे ज्ञान दो प्रकारका माना गया है। परोक्ष ज्ञानको अस्थिर कहा जाता है और अपरोक्ष ज्ञानको सुस्थिर। युक्तिपूर्ण उपदेशसे जो ज्ञान होता है, उसे विद्वान् पुरुष परोक्ष कहते हैं। वही श्रेष्ठ अनुष्ठानसे अपरोक्ष हो जायगा। अपरोक्ष ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं होता, ऐसा निश्चय करके तुमलोग आलस्यरहित हो श्रेष्ठ अनुष्ठानकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करो। (अध्याय ३२)

~~ o ~~

परम धर्मका प्रतिपादन, शैवागमके अनुसार पाशुपत ज्ञान तथा उसके साधनोंका वर्णन

ऋषियोंने पूछा—वायुदेव! वह कौन-सा श्रेष्ठ अनुष्ठान है, जो मोक्षस्वरूप ज्ञानको अपरोक्ष कर देता है? उसको और उसके साधनोंको आज आप हमें बतानेकी कृपा करें।

वायुने कहा—भगवान् शिवका बताया हुआ जो परम धर्म है, उसीको श्रेष्ठ अनुष्ठान कहा गया है। उसके सिद्ध होनेपर साक्षात् मोक्षदायक शिव अपरोक्ष हो जाते हैं। वह परम धर्म पाँचों पर्वोंके कारण क्रमशः पाँच प्रकारका जानना चाहिये। उन पर्वोंके नाम हैं—क्रिया, तप, जप, ध्यान और ज्ञान। ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं, उन उत्कृष्ट साधनोंसे सिद्ध हुआ धर्म परम धर्म माना गया है। जहाँ परोक्ष


* इन पदोंका सम्मिलित अर्थ इस प्रकार है—हाँ, वह सत्य है, अमृतमय है और सौम्य है।

* वायवीयसंहिता * ७०५

ज्ञान भी अपरोक्ष ज्ञान होकर मोक्षदायक होता है। वैदिक धर्म दो प्रकारके बताये गये हैं—परम और अपरम। धर्म-शब्दसे प्रतिपाद्य अर्थमें हमारे लिये श्रुति ही प्रमाण है। योगपर्यन्त जो परम धर्म है, वह श्रुतियोंके शिरोभूत उपनिषद्में वर्णित है और जो अपरम धर्म है, वह उसकी अपेक्षा नीचे श्रुतिके मुख-भागसे अर्थात् संहिता-मन्त्रोंद्वारा प्रतिपादित हुआ है। जिसमें पशु (बद्ध) जीवोंका अधिकार नहीं है, वह वेदान्तवर्णित धर्म 'परम धर्म' माना गया है। उससे भिन्न जो यज्ञ-यागादि हैं, उसमें सबका अधिकार होनेसे वह साधारण या 'अपरम धर्म' कहलाता है। जो अपरम धर्म है, वही परम धर्मका साधन है। धर्म-शास्त्र आदिके द्वारा उसका सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक सांगोपांग निरूपण हुआ है। भगवान् शिवके द्वारा प्रतिपादित जो परम धर्म है, उसीका नाम श्रेष्ठ अनुष्ठान है। इतिहास और पुराणोंद्वारा उसका किसी प्रकार विस्तार हुआ है, परंतु शैव-शास्त्रोंद्वारा उसके विस्तारका सांगोपांग निरूपण किया गया है। वहीं उसके स्वरूपका सम्यक् रूपसे प्रतिपादन हुआ है। साथ ही उसके संस्कार और अधिकार भी सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक बताये गये हैं। शैव-आगमके दो भेद हैं—श्रौत और अश्रौत। जो श्रुतिके सार तत्त्वसे सम्पन्न है वह श्रौत है; और जो स्वतन्त्र है, वह अश्रौत माना गया है। स्वतन्त्र शैवागम पहले दस प्रकारका था, फिर अठारह प्रकारका हुआ। वह कायिका आदि संज्ञाओंसे सिद्ध होकर सिद्धान्त नाम धारण करता है। श्रुतिसारमय जो शैव-शास्त्र है, उसका विस्तार सौ करोड़ श्लोकोंमें किया गया है। उसीमें उत्कृष्ट 'पाशुपत व्रत' और 'पाशुपत ज्ञान-का वर्णन किया गया है। युग-युगमें होनेवाले शिष्योंको उसका उपदेश देनेके लिये भगवान् शिव स्वयं ही योगाचार्यरूपसे जहाँ-तहाँ अवतीर्ण हो उसका प्रचार करते हैं।

इस शैव-शास्त्रको संक्षिप्त करके उसके सिद्धान्तका प्रवचन करनेवाले मुख्यतः चार महर्षि हैं—रुरु, दधीच, अगस्त्य और महायशस्वी उपमन्यु। उन्हें संहिताओंका प्रवर्तक 'पाशुपत' जानना चाहिये। उनकी संतान-परम्परामें सैकड़ों-हजारों गुरुजन हो चुके हैं। पाशुपत सिद्धान्तमें जो परम धर्म बताया गया है, वह चर्या* आदि चार पादोंके कारण चार प्रकारका माना गया है। उन चारोंमें जो पाशुपत योग है, वह दृढ़तापूर्वक शिवका साक्षात्कार करानेवाला है। इसलिये पाशुपत योग ही श्रेष्ठ अनुष्ठान माना गया है। उसमें भी ब्रह्माजीने जो उपाय बताया है, उसका वर्णन किया जाता है। भगवान् शिवके द्वारा परिकल्पित जो 'नामाष्टकमय योग' है, उसके द्वारा सहसा 'शैवी प्रज्ञा' का उदय होता है। उस प्रज्ञाद्वारा पुरुष शीघ्र ही सुस्थिर परम ज्ञान प्राप्त कर लेता है। जिसके हृदयमें वह ज्ञान प्रतिष्ठित हो जाता है, उसके ऊपर भगवान् शिव प्रसन्न होते हैं। उनके कृपा-प्रसादसे वह परम योग सिद्ध होता है, जो शिवका अपरोक्ष दर्शन कराता है। शिवके अपरोक्ष ज्ञानसे संसार-बन्धनका कारण दूर हो जाता है। इस प्रकार


* चर्या, विद्या, क्रिया और योग—ये चार पाद हैं।

789 संक्षिप्त शिवपुराण—23 A

७०६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

संसारसे मुक्त हुआ पुरुष शिवके समान हो जाता है। यह ब्रह्माजीका बताया हुआ उपाय है। उसीका पृथक् वर्णन करते हैं। शिव, महेश्वर, रुद्र, विष्णु, पितामह (ब्रह्मा), संसारवैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा—ये मुख्यतः आठ नाम हैं। ये आठों मुख्य नाम शिवके प्रतिपादक हैं। इनमेंसे आदि पाँच नाम क्रमशः शान्त्यतीता आदि पाँच कलाओंसे सम्बन्ध रखते हैं और उन पाँच उपाधियोंको ग्रहण करनेसे सदाशिव आदिके बोधक होते हैं। उपाधिकी निवृत्ति होनेपर इन भेदोंकी निवृत्ति हो जाती है। वह पद ही नित्य है। किंतु उस पदपर प्रतिष्ठित होनेवाले अनित्य कहे गये हैं। पदोंका परिवर्तन होनेपर पदवाले पुरुष मुक्त हो जाते हैं। परिवर्तनके अनन्तर पुनः दूसरे आत्माओंको उस पदकी प्राप्ति बतायी जाती है और उन्हींके वे आदि पाँच नाम नियत होते हैं। उपादान आदि योगसे अन्य तीन नाम (संसारवैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा) भी त्रिविध उपाधिका प्रतिपादन करते हुए शिवमें ही अनुगत होते हैं।

अनादि मलका संसर्ग उनमें पहलेसे ही नहीं है तथा वे स्वभावतः अत्यन्त शुद्धस्वरूप हैं, इसलिये ‘शिव’ कहलाते हैं अथवा वे ईश्वर समस्त कल्याणमय गुणोंके एकमात्र घनीभूत विग्रह हैं। इसलिये शिवतत्त्वके अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ महात्मा उन्हें शिव कहते हैं। तेईस तत्त्वोंसे परे जो प्रकृति बतायी गयी है, उससे भी परे पचीसवें तत्त्वके स्थानमें पुरुषको बताया गया है, जिसे वेदके आदिमें ओंकाररूप कहा गया है। ओंकार और पुरुषमें वाच्य-वाचक-भाव सम्बन्ध है। उसके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान एकमात्र वेदसे ही होता है। वे ही वेदान्तमें प्रतिष्ठित हैं। किंतु वह प्रकृतिसे संयुक्त है; अतः उससे भी परे जो परम पुरुष है, उसका नाम ‘महेश्वर’ है; क्योंकि प्रकृति और पुरुष दोनोंकी प्रवृत्ति उसीके अधीन है अथवा यह जो अविनाशी त्रिगुणमय तत्त्व है, इसे प्रकृति समझना चाहिये। इस प्रकृतिको माया कहते हैं। यह माया जिनकी शक्ति है, उन मायापतिका नाम ‘महेश्वर’ है। महेश्वरके सम्बन्धसे जो माया अथवा प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न करते हैं, वे अनन्त या ‘विष्णु’ कहे गये हैं। वे ही कालात्मा और परमात्मा आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं। उन्हींको स्थूल और सूक्ष्मरूप भी कहा गया है। दुःख अथवा दुःखके हेतुका नाम ‘सत्’ है। जो प्रभु उसका द्रावण करते हैं—उसे मार भगाते हैं, उन परम कारण शिवको साधु पुरुष ‘रुद्र’ कहते हैं। कला, काल आदि तत्त्वोंसे लेकर भूतोंमें पृथ्वी-पर्यन्त जो छत्तीस* तत्त्व हैं, उन्हींसे शरीर बनता है। उस शरीर, इन्द्रिय आदिमें जो तन्द्रारहित हो व्यापकरूपसे स्थित हैं, वे भगवान् शिव ‘रुद्र’ कहे गये। जगत्‌के पितारूप जो मूर्त्यात्मा हैं, उन सबके पिताके रूपमें भगवान् शिव विराजमान हैं; इसलिये वे ‘पितामह’ कहे गये हैं। जैसे रोगोंके निदानको जाननेवाला वैद्य तदनुकूल उपायों और दवाओंसे रोगको दूर कर देता है, उसी तरह ईश्वर लययोगाधिकारसे सदा जड-


* कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण—ये सात तत्त्व, पंचतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण, पाँच शब्द आदि विषय तथा आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी ये छत्तीस तत्त्व हैं।

789 संक्षिप्त शिवपुराण—23 B

* वायवीयसंहिता * ७०७

मूलसहित संसार-रोगकी निवृत्ति करते हैं; अतः सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता विद्वान् उन्हें 'संसारवैद्य' कहते हैं। दस विषयोंके ज्ञानके लिये दसों इन्द्रियोंके होते हुए भी जीव तीनों कालोंमें होनेवाले स्थूल-सूक्ष्म पदार्थोंको पूर्णरूपसे नहीं जानते; क्योंकि मायाने ही उन्हें मलसे आवृत्त कर दिया है। परंतु भगवान् सदाशिव सम्पूर्ण विषयोंके ज्ञानके साधनभूत इन्द्रियादिके न होनेपर भी जो वस्तु जिस रूपमें स्थित है, उसे उसी रूपमें ठीक-ठीक जानते हैं; इसलिये वे 'सर्वज्ञ' कहलाते हैं। जो इन सभी उत्तम गुणोंसे नित्य संयुक्त होनेके कारण सबके आत्मा हैं, जिनके लिये अपनेसे अतिरिक्त किसी दूसरे आत्माकी सत्ता नहीं है, वे भगवान् शिव स्वयं ही 'परमात्मा' हैं।

आचार्यकी कृपासे इन आठों नामोंका अर्थसहित उपदेश पाकर शिव आदि पाँच नामोंद्वारा निवृत्ति आदि पाँचों कलाओंकी ग्रन्थिका क्रमशः छेदन और गुणके अनुसार शोधन करके गुणित, उद्घातयुक्त और अनिरुद्ध प्राणोंद्वारा हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य और ब्रह्मरन्ध्रसे युक्त पुर्यष्टकका भेदन करके सुषुम्णा नाड़ीद्वारा अपने आत्माको सहस्रार चक्रके भीतर ले जाय। उसका शुभ्रवर्ण है। वह तरुण सूर्यके सदृश रक्तवर्ण केसरके द्वारा रंजित और अधोमुख है। उसके पचास दलोंमें स्थित 'अ' से लेकर 'क्ष' तक सबिन्दु अक्षर-कर्णिकाके बीचमें गोलाकार चन्द्रमण्डल है। यह चन्द्रमण्डल छत्राकारमें स्थित है। उसने एक ऊर्ध्वमुख द्वादश-दल कमलको आवृत कर रखा है। उस कमलकी कर्णिकामें विद्युत्-सदृश अकथादि त्रिकोण यन्त्र है। उस यन्त्रके चारों ओर सुधासागर होनेके कारण वह मणिद्वीपके आकारका हो गया है। उस द्वीपके मध्यभागमें मणिपीठ है। उसके बीचमें नाद बिन्दुके ऊपर हंसपीठ है। उसपर परम शिव विराजमान हैं। उक्त चन्द्रमण्डलके ऊपर शिवके तेजमें अपने आत्माको संयुक्त करे। इस प्रकार जीवको शिवमें लीन करके शाक्त अमृतवर्षाके द्वारा अपने शरीरके अभिषिक्त होनेकी भावना करे। तत्पश्चात् अमृतमय विग्रहवाले अपने आत्माको ब्रह्मरन्ध्रसे उतारकर हृदयमें द्वादश-दल कमलके भीतर स्थित चन्द्रमासे परे श्वेत कमलपर अर्द्धनारीश्वर रूपमें विराजमान मनोहर आकृतिवाले निर्मल देव भक्तवत्सल महादेव शंकरका चिन्तन करे। उनकी अंगकान्ति शुद्धस्फटिक मणिके समान उज्ज्वल है। वे शीतल प्रभासे युक्त और प्रसन्न हैं। इस प्रकार मन-ही-मन ध्यान करके शान्तचित्त हुआ मनुष्य शिवके आठ नामोंद्वारा ही भावमय पुष्पोंसे उनकी पूजा करे। पूजनके अन्तमें पुनः प्राणायाम करके चित्तको भलीभाँति एकाग्र रखते हुए शिव-नामाष्टकका जप करे। फिर भावनाद्वारा नाभिमें आठ आहुतियोंका हवन करके पूर्णाहुति एवं नमस्कारपूर्वक आठ फूल चढ़ाकर अन्तिम अर्चना पूरी करके चुल्लूमें लिये हुए जलकी भाँति अपने-आपको शिवके चरणोंमें समर्पित कर दे। इस प्रकार करनेसे शीघ्र ही मंगलमय पाशुपत ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है और साधक उस ज्ञानकी सुस्थिरता पा लेता है। साथ ही वह परम उत्तम पाशुपत-व्रत एवं परम योगको पाकर मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।

(अध्याय ३२)


789 संक्षिप्त शिवपुराण—23 C

७०८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पाशुपत-व्रतकी विधि और महिमा तथा भस्मधारणकी महत्ता

ऋषि बोले—भगवन्! हम परम उत्तम पाशुपत-व्रतको सुनना चाहते हैं, जिसका अनुष्ठान करके ब्रह्मा आदि सब देवता पाशुपत माने गये हैं।

वायुदेवने कहा—मैं तुम सब लोगोंको गोपनीय पाशुपत-व्रतका रहस्य बताता हूँ, जिसका अथर्वशीर्षमें वर्णन है तथा जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। चित्रासे युक्त पौर्णमासी इसके लिये उत्तम काल है। शिवके द्वारा अनुगृहीत स्थान ही इसके लिये उत्तम देश है अथवा क्षेत्र, बगीचे आदि तथा वनप्रान्त भी शुभ एवं प्रशस्त देश हैं। पहले त्रयोदशीको भलीभाँति स्नान करके नित्यकर्म सम्पन्न कर ले। फिर अपने आचार्यकी आज्ञा लेकर उनका पूजन और नमस्कार करके व्रतके अंगरूपसे देवताओंकी विशेष पूजा करे। उपासकको स्वयं श्वेत वस्त्र, श्वेत यज्ञोपवीत, श्वेत पुष्प और श्वेत चन्दन धारण करना चाहिये। वह कुशके आसनपर बैठकर हाथमें मुट्ठीभर कुश ले पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके तीन प्राणायाम करनेके पश्चात् भगवान् शिव और देवी पार्वतीका ध्यान करे। फिर यह संकल्प करे कि मैं शिवशास्त्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार यह पाशुपत-व्रत करूँगा। वह जबतक शरीर गिर न जाय, तबतकके लिये अथवा बारह, छः या तीन वर्षोंके लिये अथवा बारह, छः, तीन या एक महीनेके लिये अथवा बारह, छः, तीन या एक दिनके इस व्रतकी दीक्षा ले। संकल्प करके विरजा होमके लिये विधिवत् अग्निकी स्थापना करके क्रमशः घी, समिधा और चरुसे हवन करे। तत्पश्चात् तत्त्वोंकी शुद्धिके उपदेशसे फिर मूलमन्त्रद्वारा उन समिधा आदि सामग्रियोंकी ही आहुतियाँ दे। उस समय वह बारंबार यह चिन्तन करे कि ‘मेरे शरीरमें जो ये तत्त्व हैं, सब शुद्ध हो जायँ।’ उन तत्त्वोंके नाम इस प्रकार हैं—पाँचों भूत, उनकी पाँचों तन्मात्राएँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विषय, त्वचा आदि सात धातु, प्राण आदि पाँच वायु, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति, पुरुष, राग, विद्या, कला, नियति, काल, माया, शुद्ध विद्या, महेश्वर, सदाशिव, शक्ति-तत्त्व और शिव-तत्त्व—ये क्रमशः तत्त्व कहे गये हैं।

विरज मन्त्रोंसे आहुति करके होता रजोगुणरहित शुद्ध हो जाता है। फिर शिवका अनुग्रह पाकर वह ज्ञानवान् होता है। तदनन्तर गोबर लाकर उसकी पिण्डी बनाये। फिर उसे मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित करके अग्निमें डाल दे। इसके बाद इसका प्रोक्षण करके उस दिन व्रती केवल हविष्य खाकर रहे। जब रात बीतकर प्रातःकाल आये, तब चतुर्दशीमें पुनः पूर्वोक्त सब कृत्य करे। उस दिन शेष समय निराहार रहकर ही बिताये। फिर पूर्णिमाको प्रातःकाल इसी तरह होमपर्यन्त कर्म करके रुद्राग्निका उपसंहार करे। तदनन्तर यत्नपूर्वक उसमेंसे भस्म ग्रहण करे। इसके बाद साधक चाहे जटा रखा ले, चाहे सारा सिर मुड़ा ले या चाहे तो केवल सिरपर शिखा धारण करे। इसके बाद स्नान करके यदि वह


789 संक्षिप्त शिवपुराण—23 D

* वायवीयसंहिता * ७०९

लोकलज्जासे ऊपर उठ गया हो तो दिगम्बर हो जाय। अथवा गेरुआ वस्त्र, मृगचर्म या फटे-पुराने चीथड़ेको ही धारण कर ले। एक वस्त्र धारण करे या वल्कल पहनकर रहे। कटिमें मेखला धारण करके हाथमें दण्ड ले ले। तदनन्तर दोनों पैर धोकर आचमन करे। विरजाग्निसे प्रकट हुए भस्मको एकत्र करके 'अग्निरिति भस्म' इत्यादि छः अथर्ववेदीय मन्त्रोंद्वारा उसे अपने शरीरमें लगाये। मस्तकसे लेकर पैरतक सभी अंगोंमें उसे अच्छी तरह मल दे। इसी क्रमसे प्रणव या शिवमन्त्रद्वारा सर्वांगमें भस्म रमाकर 'त्र्यायुषम्' इत्यादि मन्त्रोंसे ललाट आदि अंगोंमें त्रिपुण्ड्रकी रचना करे। इस प्रकार शिवभावको प्राप्त हो शिवयोगका आचरण करे। तीनों संध्याओंके समय ऐसा ही करना चाहिये। यही 'पाशुपत-व्रत' है, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है। यह जीवोंके पशुभावको निवृत्त कर देता है। इस प्रकार पाशुपत-व्रतके अनुष्ठानद्वारा पशुत्वका परित्याग करके लिंगमूर्ति सनातन महादेवजीका पूजन करना चाहिये। यदि वैभव हो तो सोनेका अष्टदल कमल बनवाये, जिसमें नौ प्रकारके रत्न जड़े गये हों। उसमें कर्णिका और केसर भी हों। ऐसे कमलको भगवान्‌का आसन बनाये। धनाभाव होनेपर लाल या सफेद कमलके फूलका आसन अर्पित करे। वह भी न मिले तो केवल भावनामय कमल समर्पित करे।

उस कमलकी कर्णिकामें पीठिका-सहित छोटेसे स्फटिक मणिमय लिंगकी स्थापना करके क्रमशः विधिपूर्वक उसका पूजन करे। उस लिंगका शोधन करके पहले शास्त्रीय विधिके अनुसार उसकी स्थापना कर लेनी चाहिये। फिर आसन दे पंचमुखके प्रकारसे मूर्तिकी कल्पना करके पंचगव्य आदिसे पूर्ण, अपने वैभवके अनुसार संगृहीत भरे हुए सुवर्णनिर्मित कलशोंसे उस मूर्तिको स्नान कराये। फिर सुगन्धित द्रव्य, कपूर, चन्दन और कुंकुम आदिसे वेदीसहित भूषणभूषित शिवलिंगका अनुलेपन करके बिल्वपत्र, लाल कमल, श्वेत कमल, नील कमल, अन्यान्य सुगन्धित पुष्प, पवित्र एवं उत्तम पत्र तथा दूर्वा और अक्षत आदि विचित्र उपचार चढ़ाकर यथाप्राप्त सामग्रियोंद्वारा महापूजनकी विधिसे उसमें मूर्तिकी अभ्यर्थना करे। फिर धूप, दीप और नैवेद्य निवेदन करे। इस तरह भगवान् शिवको उत्तम वस्त्र निवेदन करके अपना कल्याण करे। उस व्रतमें विशेषतः वे सभी वस्तुएँ देनी चाहिये, जो अपनेको अधिक प्रिय हों, श्रेष्ठ हों, और न्यायपूर्वक उपार्जित हुई हों। बिल्वपत्र, उत्पल और कमलोंकी संख्या एक-एक हजार होनी चाहिये। अन्य पत्रों और फूलोंमेंसे प्रत्येककी संख्या एक सौ आठ होनी चाहिये। इन सामग्रियोंमें भी बिल्वपत्रको विशेष यत्नपूर्वक जुटाये। उसे भूलकर भी न छोड़े। सोनेका बना हुआ एक ही कमल एक सहस्र कमलोंसे श्रेष्ठ बताया गया है। नील कमल आदिके विषयमें भी यही बात है। ये सब बिल्वपत्रोंके समान ही महत्त्व रखते हैं। अन्य पुष्पोंके लिये कोई नियम नहीं है। वे जितने मिलें, उतने ही चढ़ाने चाहिये। अष्टांग अर्घ्य उत्कृष्ट माना जाता है। धूप और आलेप (चन्दन)-के विषयमें विशेष बात यह है। 'वामदेव' नामक मुखमें चन्दन, 'तत्पुरुष' नामक मुखमें हरिताल और 'ईशान' नामक मुखमें

७१० * संक्षिप्त शिवपुराण *

भस्म लगाना चाहिये। कोई-कोई भस्मकी जगह आलेपनका विधान करते हैं। दूसरे प्रकारके धूपका विधान होनेसे कुछ लोग प्रसिद्ध धूपका निषेध करते हैं। ‘अघोर’ नामक मुखके लिये श्वेत अगुरुका धूप देना चाहिये। ‘तत्पुरुष’ नामक मुखके लिये कृष्ण अगुरुके धूपका विधान है। ‘वामदेव’के लिये गुग्गुल, ‘सद्योजात’ मुखके लिये सौगन्धिक तथा ‘ईशान’ के लिये भी उशीर आदि धूपको विशेषरूपसे देना चाहिये। शर्करा, मधु, कपूर, कपिला गायका घी, चन्दनका चूरा तथा अगुरु नामक काष्ठ आदिका चूर्ण—इन सबको मिलाकर जो धूप तैयार किया जाता है, उसे सबके लिये सामान्यरूपसे उपयोगके योग्य बताया गया है। कपूरकी बत्ती और घीके दीपक जलाकर दीपमाला देनी चाहिये। तत्पश्चात् प्रत्येक मुखके लिये पृथक्-पृथक् अर्घ्य और आचमन देनेका विधान है।

प्रथम आवरणमें गणेश और कार्तिकेयकी पूजा करनी चाहिये। उनके साथ ही बाह्य अंगोंकी भी पूजा आवश्यक है। प्रथमावरणकी पूजा हो जानेपर द्वितीयावरणमें चक्रवर्ती विघ्नेश्वरोंका पूजन करना चाहिये। तृतीयावरणमें भव आदि अष्टमूर्तियोंकी पूजाका विधान है। वहीं महादेव आदि एकादश मूर्तियोंका भी पूजन आवश्यक है। चौथे आवरणमें सभी गणेश्वर पूजनीय हैं। पंचमावरणमें कमलके बाह्यभागमें क्रमशः दस दिक्पालों, उनके अस्त्रों और अनुचरोंकी क्रमशः पूजा करनी चाहिये। वहीं ब्रह्माके मानस पुत्रोंकी, समस्त ज्योतिर्गणोंकी, सब देवी-देवताओंकी, सभी आकाशचारियोंकी, पातालवासियोंकी, अखिल मुनीश्वरोंकी, योगियोंकी, सब यज्ञोंकी, द्वादश सूर्योंकी, मातृकाओंकी, गणोंसहित क्षेत्रपालोंकी और इस समस्त चराचर जगत्की पूजा करनी चाहिये। इन सबको शंकरजीकी विभूति मानकर शिवकी प्रसन्नताके लिये ही इनका पूजन करना उचित है।

इस प्रकार आवरणपूजाके पश्चात् परमेश्वर शिवका पूजन करके उन्हें भक्तिपूर्वक घृत और व्यंजनसहित मनोहर हविष्य निवेदन करना चाहिये। मुखशुद्धिके लिये आवश्यक उपकरणोंसहित ताम्बूल देकर नाना प्रकारके फूलोंसे पुनः इष्टदेवका श्रृंगार करे। आरती उतारे। तत्पश्चात् पूजनका शेष कृत्य पूर्ण करे। प्याला तथा उपकारक सामग्रियोंसहित शय्या समर्पित करे। शय्यापर चन्द्रमाके समान चमकीला हार दे। राजोचित मनोहर वस्तुएँ सब प्रकारसे संचित करके दे। स्वयं पूजन करे, दूसरोंसे भी कराये तथा प्रत्येक पूजनमें आहुति दे। इसके बाद स्तुति, प्रार्थना और जप करके पंचाक्षरी विद्याको जपे। परिक्रमा और प्रणाम करके अपने-आपको समर्पित करे। तदनन्तर इष्टदेवके सामने ही गुरु और ब्राह्मणकी पूजा करे। इसके बाद अर्घ्य और आठ फूल देकर पूजित लिंग या मूर्तिसे देवताका विसर्जन करे। फिर अग्निदेवका भी विसर्जन करके पूजा समाप्त करे। मनुष्यको चाहिये कि प्रतिदिन इसी प्रकार पूर्वोक्तरूपसे सेवा करे। पूजनके अन्तमें सुवर्णमय कमल तथा अन्य सब उपकरणोंसहित उस शिवलिंगको गुरुके हाथमें दे दे अथवा शिवालयमें स्थापित कर दे। गुरुओं, ब्राह्मणों तथा विशेषतः