शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
२ : शिवसूत्र विमर्श चैतन्य (चिति) ही आत्मा है । अतः चैतन्य और आत्मा में राहु के शिर की तरह कल्पना से ही भेद दिखाई देता है । वास्तव में कोई भेद नहीं । जो चेत्यमान न हो ऐसा स्वभाव न कोई हो सकता है, न किसी का हो सकता है और न कभी हो सकता है । अतः चेत्यमान स्वप्रकाश चिदेकरस चैतन्य ही स्वभाव है, वही आत्मा है । जब चैतन्य समस्त विश्व का स्वभाव है तो उसकी साधना ही क्या और उसके लिये उपाय ही कैसा । इसमें प्रमाण की कोई आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि चैतन्य सदा स्वयंप्रकाश चिद्रूप है और उस पर कोई आवरण नहीं डाल सकता है । श्री त्रिकहृदय में कहा है : "स्वपदा स्वशिरश्छायां यद्वल्लङ्घितुमीहते । पादोद्देशे शिरो न स्यात्तथैवं बैन्दवी कला ॥" अर्थ—ज्यों ज्यों अपना पैर अपने ही सिर की छाया को लाँघने की इच्छा से आगे बढ़ता है त्यों त्यों सिर की छाया आगे और आगे होती जाती है । यही बात बैन्दवी कला (चिति) के विषय में है । चिति को, उसी से बनी, बुद्धि आदि से समझना असंभव है । और भी, स्पन्दकारिका में : "तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥" अर्थ—सर्वात्मक स्वभाव से शब्द और अर्थ की चिन्ता में वह कोई अवस्था नहीं है जो शिवभाव को प्रकट न करती हो । अतः भोक्ता ही भोग्यरूप में सदा और सर्वत्र ठहरा है । यह स्वरूप-विकास-शक्ति ही स्वातन्त्र्य शक्ति है । अतः शिव का स्पन्दतत्त्वरूप चैतन्य सदा स्वयंप्रकाश परमार्थसत् है ॥१॥ सम्बन्ध—आत्मा का लक्षण बता कर अब जीव के बन्धन का कारण अगले दो सूत्रों में बताते हैं । ज्ञानं बन्धः ॥२॥ ज्ञानं—अनात्मा (अर्थात् देह, प्राण, पुर्यष्टकादि रूप) को ही आत्मा जानना बन्धः—बन्धन है । व्याख्या—विषयों का ज्ञान होना ही बन्धन है । इस प्रकार जिस अवस्था में द्वैत का ज्ञान होता है वह अज्ञान है और बन्धन का कारण है । ऐसा आणवमल के कारण होता है । आत्मा में जब अपूर्णता का अनुभव होता है तब इसे आणवमल कहते हैं । इसी से आत्मा अणु अर्थात् जीव कहलाता है । वह देह, प्राण, पुर्यष्टक आदि को ही आत्मा जानता है जिससे उसे विषयों का ही ज्ञान रहता है ॥२॥
प्रथम विकास : ३ सम्बन्ध—यही आणवमल संसार के अङ्कुर का कारण (कार्ममल) बन जाता है जिसकी ओर अगले सूत्र में संकेत किया है। योनिवर्गः कलाशरीरम् ॥३॥ योनि—भेदप्रथा की हेतु माया (का) वर्गः—प्रपञ्च अर्थात् फैलना (यह मायीयमलस्वरूप बन्धन है और) कलाशरीरम्—(कलातत्त्व से पृथ्वी तत्त्व तक शुभाशुभवासनामय) जो व्यापार है वह भी बन्धन का हेतु है। व्याख्या—माया का समूह ही भेदप्रथा का हेतु है। (भिन्नवेद्यप्रथा) वेद्यवर्ग में भिन्नता के ज्ञान को मायीयमल कहते हैं। अतः 'यह', 'वह', 'मैं' आदि का ज्ञान भी बन्धन है। इस स्वरूप-संकोच शक्ति को माया-शक्ति कहते हैं। जीव में जब 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ' इत्यादि शुभ और अशुभ वासनायें पैदा होती हैं तो इसे कार्ममल कहते हैं। इसमें जन्म और भोग को देने वाले कर्त्ता आत्मा का अबोध होता है। यह भी जीव के बन्धन का कारण है ॥३॥ सम्बन्ध—अब इन तीनों मलों का बन्धकत्व कहते हैं। ज्ञानाधिष्ठानं मातृका ॥ ४ ॥ ज्ञान—द्वैतज्ञान का अधिष्ठानं—आधार (अर्थात् आणवमल, मायीयमल और कार्ममलरूप कारण) मातृका—बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित् (अर्थात् अज्ञाता-माता) है। व्याख्या—तीन मलों के आवरण से जीव को द्वैतज्ञान की दृढ़ता होती है। इससे वह ऐसे बन्धन में पड़ जाता है कि स्वात्म-विश्रान्तिरूप अन्तर्मुख-भाव से निरन्तर अलग रहता है और बहिर्मुखता के ज्ञान में भूला रहता है। यह सब अज्ञात संवित् के कारण ही होता है। अतः जीव बन्धन में रहता है ॥४॥ सम्बन्ध—अब इस बन्धन के सम्बन्ध से छूटने का उपाय (जो मलत्रय को हटाना है) कहते हैं। उद्यमो भैरवः ॥ ५ ॥ उद्यमः—मलत्रय को हटाने का उद्योग। भैरवः—भैरव रूप (अर्थात् स्वस्वरूप को प्रकट करने का हेतु) है।
४ : शिवसूत्र विमर्श व्याख्या—तीन मलों को, जिन से आवृत होने के कारण जीवभाव प्राप्त हुआ है, हटाने और समस्त जगत् में परिपूर्ण अहं-परामर्श करने में उद्योग करना चाहिये। क्षण- मात्र में स्पन्दशक्ति के उच्छलन से स्वात्म संवित् का अनुभव होता है। सारा जगत् इसी प्रतिभा में डूब जाता है। सारे विश्व में पूर्णाहन्ता का अभ्यास करने से समस्त शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है जिससे समस्त विकल्पों का भेदन होता है और कोई मल नहीं दबा सकता है। इसी को भैरवभाव या भैरवसमाधि कहते हैं। भैरवरूप इस स्वस्वरूप को प्रकट करने के लिये स्वरूप-संवित् के विमर्श में नित नयेपन का अनुभव होता है। श्रुतपूर्व अनुभव से अभ्यास फलित नहीं होता है। जैसे अष्टावक्रगीता में कहा है : 'मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति' अर्थात् मूढ़पुरुष योगाभ्यासरूप कर्म करके (देहाभिमान दूर होने के बिना ही) ब्रह्मरूप होने की इच्छा करता है इस कारण ब्रह्म को प्राप्त नहीं होता है। अतः साधक को सावधान रहना चाहिये। जब तक देहाभिमान दूर न हो जाये तब तक धीर बन कर अभ्यासपथ पर नित नये अनुभव करते हुए अग्रसर होने के उद्यम में रहना आवश्यक है। अष्टावक्र जी राजा जनक को आगे कहते हैं : 'अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक्' अर्थ—धीर पुरुष मोक्ष की इच्छा न करता हुआ भी परब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त होता है क्योंकि उसका देहाभिमान दूर हुआ होता है। 'तावद्वै ब्रह्मवेगेन मथनं शक्तिविग्रहे' (तब तक, निश्चय ही, ब्रह्मवेग-समाधि१ से ही शक्ति-समूह का मथन करना चाहिये।) अतः पूर्णाहन्ता के विमर्श में साधक को इतना अभ्यासशील रहना चाहिये कि उसे जाग्रत् अथवा व्युत्थान दशा में भी भेद का आभास तक न रहे। ऐसा विमर्श साधक को शक्तिपात द्वारा ही प्राप्त होता है। स्वरूपोपलब्धि के लिये मलत्रय हटाने की अत्यन्ता- वश्यकता है। इसके लिये साधक को तत्पर रहना चाहिये। महिम्नस्तोत्र में कहा है : 'नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव' १. हठपूर्वक नियम-बद्ध होकर परब्रह्मस्वरूप के चिन्तन में लगे रहना ब्रह्मवेग-समाधि है। इसी की ओर संकेत देखिये रामगीता में— यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं, तावन्मदाराधनतत्परो भवेत् । (रामगीता-५८)
प्रथम विकास : ५ अर्थ—तीन मलों से आवृत जीव (मनुष्य) इनको हटाने के दृढ़ अभ्यास से चिदा- नन्दस्वरूप शिव से एक होते हैं जैसे सब छोटी-बड़ी नदियाँ एक ही समुद्र को प्राप्त कर एक रूप होती हैं : अतः 'उद्यमो भैरवः' सूत्र का तात्पर्य यही है कि साधक को 'तद्बुद्धयस्तदात्मानः' (आत्मा में ही मन और बुद्धि लगा कर) रहना चाहिये ॥५॥ सम्बन्ध—बन्धन से छूटने के लिये अब भैरव-समाधि का प्रकार कहते हैं । शक्तिचक्रसंधाने विश्वसंहारः ॥ ६ ॥ शक्ति—शब्दादि शक्तियों (के) चक्र—समूह (के) संधाने—उन्मेष और अहंपरामर्शरूप अनुसंधान के होने पर विश्व—भेदप्रथा रूप मलत्रयमय जगत् का संहारः—परसंवित्रूप अग्नि में एकीकार होता है । व्याख्या—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध यह शक्तियों का समूह है । इनको स्वरूप में विमर्श करना चाहिये । उस से परसंवित् रूप अग्नि में भेद प्रथा पैदा करने वाले तीन मल भस्मीभूत होते हैं । यह शब्दादि भैरवरूप संवित्स्फार की महान् शक्तियाँ हैं जो शाम्भवोपाय में क्रम और अक्रम का भी उल्लंघन करती हैं। शिवभाव से पृथ्वी तत्त्व तक का यह शक्तिप्रसार प्रतिलोम वृत्ति से इन्हीं शक्तियों के संधान, अर्थात् पर-संवित् स्वात्म-चमत्कृति, में एकीकार करना है । इसी से भेदमय जगत् का ह्रास और शिवभाव की प्राप्ति होती है । यह शाम्भवोपाय में भैरव-समाधि है ॥६॥ सम्बन्ध—ऐसे योगी को समाधि और व्युत्थान का कोई भेद नहीं होता, यह कहते हैं। जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिभेदे तुर्याभोगसम्भवः ॥७॥ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिभेदे—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की नानारूपता में पृथक्- पृथक् अवभास होने पर तुर्य—आत्मस्फुरणरूप तुर्यावस्था (के) आभोग—चमत्कार (की) सम्भवः—प्राप्ति (होती है) । व्याख्या—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के भेद में नानारूपता होती है । इन तीनों अवस्थाओं में पृथक्-पृथक् अवभास होते हैं । परन्तु भैरव-समाधि का अभ्यास करने वाले योगी को दोनों निमेषरूप समाधि और उन्मेषरूप समाधि में आत्मस्फुरण के अनुभव का चमत्कार रहता है । इसे तुर्य अवस्था कहते हैं । ऐसे योगी को समाधि तथा व्युत्थान
६ : शिवसूत्र विमर्श में कोई अन्तर नहीं रहता । वह यथास्थित अवस्था में स्वरूप संवित् के चमत्कार का आनन्द लेता है । कहा भी है : “यथास्थितः तथैवासुः मा गा बाह्यं तथान्तरम् ।” केवलं चिद्विकासेन विकारनिकराञ्जहि ॥७॥ सम्बन्ध—अब अगले तीन सूत्रों में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के लक्षण क्रम से कहते हैं । ज्ञानं जाग्रत् ॥८॥ ज्ञानं—(बाह्य इन्द्रियों से पैदा हुआ) सर्वसाधारण अर्थ के विषय-वाला ज्ञान जाग्रत्—जाग्रत् (अवस्था कहलाती है) । व्याख्या—जागते हुये भी यदि जीव को कभी असाधारण अर्थ के विषय का अस्फुट विवेक हो तो उसे 'जाग्रत् में स्वप्न' कहते हैं । जाग्रत् अवस्था में ही हम कभी कुछ कहने को उद्यत होते हैं परन्तु इसका अस्फुट-विवेक भी कभी विस्मृति में जाने के कारण कहा नहीं जाता, इसे जाग्रत्-सुषुप्ति कहते हैं । अतः जागते हुए सभी दशाओं में जाग्रत् अवस्था नहीं होती है । जाग्रत् केवल बाह्य इन्द्रियों से पैदा हुआ सर्वसाधारण अर्थ के विषय का ज्ञान है ॥८॥ स्वप्नो विकल्पाः ॥९॥ स्वप्न :—स्वप्नावस्था विकल्पा :—मनोमात्र से पैदा हुए असाधारण अर्थों का विषय (है) । व्याख्या—अस्फुट-विवेक को ही स्वप्न कहते हैं । यह केवल मन के विकार से ही होता है । स्वप्न में बाह्य इन्द्रिय किसी काम के नहीं होते, वहाँ मन के कल्पित इन्द्रिय ही कल्पित अथवा असाधारण अर्थों को विषय करते हैं । इस अवस्था में स्पष्ट विवेक नहीं रहता । जाग्रत् के शरीर की वर्तमान दशा का ज्ञान बहुत ही अस्फुट रहता है । इस अवस्था की दशायें भी स्वप्न-जाग्रद् तथा स्वप्न-सुषुप्ति के रूप में भिन्न- भिन्न होती हैं ॥९॥ अविवेको माया सौषुप्तम् ॥१०॥ अविवेकः—विवेकराहित्य (अथवा निश्चित बुद्धि का न रहना, तथा) माया—मोह (गाढ़ तम) सौषुप्तम्—सुषुप्ति अवस्था (कहलाती है) । व्याख्या—विवेक-बुद्धि के अभाव को अख्याति कहते हैं । यह अख्याति मोह में पड़ने से होती है । इसी अवस्था को सुषुप्ति कहते हैं । इस में विवेक नहीं रहता । यह गाढ़ तमोगुण अवस्था है ॥१०॥
प्रथम विकास : ७ सम्बन्ध—योगी की तुर्य अवस्था के विचार में लौकिक जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति को समझाया। अब उसी की तुर्यातीत अवस्था का विचार कहते हैं। त्रितयभोक्ता वीरेशः ॥११॥ त्रितय—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति (अवस्थाओं का) भोक्ता—स्वतन्त्रता से चमत्कार करने वाला (योगी) वीरेशः—(भेदप्रथा को ग्रास करने वाले) वीरों में उत्तम वीर (है)। व्याख्या—जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं में शक्तिचक्र का अनुसंधान करने वाला योगी तुर्य के आनन्दरस से भरा रहता है। उसे भेद-प्रथा का अभाव रहता है। इस आनन्दरस में मग्न वह हर अवस्था में (अश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् आदि) परम-व्योम रूप शिवस्वरूप की भावना में मग्न रहता है और इस प्रकार इन तीनों अवस्थाओं में स्वा- तन्त्र्य के चमत्कार से पूर्ण होता है। इस अवस्था की स्थिति को तुर्यातीत अवस्था कहते हैं। उसका स्वातन्त्र्य रूप चमत्कार इस प्रकार कहा गया है : 'त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद्भवेत्। तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः ॥' (कठोपनिषद्) अर्थ—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में जो कुछ भोग्य [विषय] भोक्ता [विषयी] और भोग [विषयग्रहण] है, उससे विलक्षण मैं चिन्मात्र सदाशिव साक्षी सर्वथा भिन्न हूँ। ऐसा योगी केवल चिन्मात्र ही रहता है। संवित् साम्राज्य का वैभव होने से वह भेद जगत् को ग्रास करने वाले वीरों में उत्तम वीर है क्योंकि वह अन्तः तथा बाह्य प्रवणशील इन्द्रियों का अधीश्वर है। उसकी इन्द्रियां भेदप्रथारूप संसार में ग्रस्त नहीं रहतीं। अतः योगियों में वही उत्तम योगी है। वही तुर्यातीत है ॥११॥ सम्बन्ध—तुर्यातीत योगी की परचित्-तत्त्व में स्थिति को सूचित करने वाली अवस्था बतलाते हैं। विस्मयो योगभूमिकाः ॥१२॥ योगभूमिकाः—(ऐसे योगी की) परविश्रान्ति को सूचित करने वाली भूमिकाएँ (अवस्थाएँ) विस्मयः—अवर्णनीय आश्चर्य (की मुद्रायें) हैं। व्याख्या—जैसे किसी को अतिशय आनन्द की वस्तु पाकर आश्चर्यपूर्ण हर्ष होता है वैसे ही परानन्द की अनुभूति में मग्न इस तुर्यातीत अवस्था में स्थित योगी को पर- विश्रान्ति को सूचित करने वाली अवर्णनीय आश्चर्य-मुद्रायें होती हैं। उसके बोधसुधा
८ : शिवसूत्र विमर्श रूप समुद्र की कोई परिधि नहीं होती । स्वात्मानन्द में अतृप्त होने से उससे यह आश्चर्य प्रकट होते हैं । 'सुखे दुःखे विमोहे च स्थितोऽहं परमः शिवः' अर्थ—सांसारिक सुख (सत्त्व) दुःख (रजस्) और मोह (तमस्) की अवस्थाओं में भी मैं परमशिव स्वरूप ही ठहरा हूँ ॥१२॥ सम्बन्ध—ऐसे योगी की इच्छा को कोई शक्ति रोक नहीं सकती । इच्छाशक्तिरुमा कुमारी ॥१३॥ इच्छाशक्तिः—(ऐसे योगी की) इच्छाशक्ति उमा—परा-रूप पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति (है) कुमारी—(और वही) विश्व के सर्जन तथा संहार करने की क्रीडा में तत्पर है । व्याख्या—तुर्यातीत योगी की इच्छा शक्ति, शक्तिपात द्वारा प्राप्त हुई युक्ति से पर-भैरवरूप ही होती है । उसी विश्व के सर्जन तथा संहार में क्रीड़नशीला शक्ति के योग से वह सारे दृश्यजगत् में अप्रतिहत (बेरोक) स्वातन्त्र्यमय हो जाता है । वह सदाशिव से पृथ्वी तत्त्व तक सारे दृश्यवर्ग को अपना अङ्ग (स्वरूप) ही देखता है । उसे आवरण-रहित चिद्घनरूप का स्फुरण होता है । 'या अस्य इच्छा सा अस्य शक्तिः सा च कुमारी' अर्थ—जो इसकी इच्छा है वही इसकी पारमेश्वरी शक्ति है और वही जगत् के सृष्टि-स्थिति रूप क्रीडा में तत्परता है ॥१३॥ सम्बन्ध—ऐसे प्रभाववाली इच्छाशक्ति से युक्त योगी के लिये दृश्यवर्ग अपना स्वरूप होता है, ऐसा कहते हैं । दृश्यं शरीरम् ॥१४॥ दृश्यं—(जगत् में जो) दृश्य पदार्थ (हैं) शरीरम्—(वह उसका) स्वरूप (है) । व्याख्या—जो बाह्य (घटपटादि, नीलपीतादि) तथा आभ्यन्तर (देहादि) जगत्रूप दृश्य अर्थात् वेद्यवर्ग है वह सब यह अपने स्वरूप से अभिन्न अनुभव करता है । सारे दृश्य पदार्थ को अहंरूपता से देखता है । सारे विश्व को अपना शरीर जानता है । यह समझने के लिये एक कथा प्रस्तुत की जाती है—एक बार इन्द्र अपनी सभा में प्रसन्न होकर विराजमान थे । नर्तकियां नृत्य करती थीं । गायक संगीत से आह्ला- दित करने में व्यस्त थे । सामने दो हाथी आपस में एक दूसरे से टकराने का विनोद करते थे । इन्द्र यह सब देखकर आनन्दित था । इतने में भगवान् शिव उधर आ
सूत्र में बताते हैं।
प्रथम विकास : ९ पहुँचे । इन्द्र अपने विनोद में मस्त थे। वह भगवान् शिव का स्वागत करने अपने आसन से नहीं हिले । भगवान् शिव अन्दर आये और अपनी जटाओं को एक झटका मारा तो आसपास के दो पर्वत आपस में टकराने लगे । इस से नृत्य, संगीत और हाथियों की टक्कर यह सब नष्ट-भ्रष्ट होने लगा । इन्द्र ने डर कर कहा, "भगवन् ! यह क्या हुआ और कैसे हुआ ?" भगवान् शिव ने कहा कि विषयभोग में अपना विनोद मानना सांसारिक सुख-दुःख देता है । सारे दृश्यवर्ग में अहंता के अनुभव से विश्व का सर्जन तथा संहार अपनी क्रीडा ही तो होती है । इस सूत्र का अर्थ दूसरे प्रकार से भी किया जा सकता है। वह है— शरीरं दृश्यम् ॥ शरीर—देह, प्राण, पुर्यष्टक आदि (जिसको साधारण जन अहंता रूप से देखते हैं) दृश्यम्—(उसे भी वह) इदं रूप (में देखता है) । व्याख्या—वह योगी देह, प्राण आदि सब को आत्म-सत्ता से अलग समझ कर स्वरूप-चैतन्य से विचलित नहीं होता । उसका निश्चय होता है कि आत्मसत्ता के बिना देहादि ठहर नहीं सकते । अतः यह चित्स्वरूप से भिन्न हैं और त्याज्य हैं, उसे अपना शरीर भी ऐसा ही प्रतीत होता है । इस प्रकार वह योगी देहादि को इदंरूप जानकर भेद का निराकरण करके स्वयं पूर्णाहन्ता में मग्न रहता है ॥१४॥ सम्बन्ध—इस प्रकार जगद्रूप दृश्य को अहंकरूपता से स्वरूप में अथवा देह, प्राण, पुर्यष्टक आदि को इदंरूप दृश्यवर्ग मानकर योगी संसार को कैसे देखता है, यह अगले सूत्र में बताते हैं। हृदये चित्तसंघट्टाद् दृश्यस्वापदर्शनम् ॥१५॥ चित्तसंघट्टात्—चंचल चित्त की एकाग्रभावना से (ऐसा योगी) हृदये—संवित् में (अथवा चेतनता की पूर्णता के अनुभव में) दृश्य—जाग्रत् तथा स्वप्न अवस्था-रूप दृश्य (इदंता-रूप प्रमेय वर्ग) और स्वाप—सुषुप्तिरूप दृश्य (अहंतारूप प्रमातृवर्ग को) दर्शनम्—(अद्वैत भावना के दृढ़ होने के कारण) आत्मस्वरूप ही देखता है । व्याख्या—चित्त स्वभाव से चंचल है । योगी जब एकाग्रभावना में दृढ़ होता है तो चेतनता की पूर्णता में अहंता का अनुभव करने लगता है । संवित् के इस महाबोध में वह जाग्रत् तथा स्वप्नरूप दृश्य और सुषुप्ति-रूप दृश्य को आत्मस्वरूप में ही देखता है । इस आरोहक्रम के अभ्यास में वह भाव और अभाव रूप जगत् को अपना अंग मानकर स्वरूपचमत्कार का आनन्द लेता है । यह उपायक्रमाभ्यास से मुक्तशिव की अवस्था है ॥१५॥
१० : शिवसूत्र विमर्श सम्बन्ध—उपायक्रमाभ्यास कहकर अब अनुपाय-क्रमाभ्यास में अनादिसिद्ध शिवदशा का वर्णन करते हैं । यह पूर्णाहंता-विमर्श में दूसरा उपाय है । शुद्धतत्त्वानुसंधानाद्वा अपशुशक्तिः ॥१६॥ वा—दूसरे उपाय (अनुपायक्रमाभ्यास) से शुद्धतत्त्व—(परम शिवरूप) शुद्धतत्त्व में अनुसंधानात्—प्रपञ्च के ('विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ', इस) तन्मयभाव से अपशुशक्तिः—जगत् के पति शिव (अर्थात् जीवभाव रहित) शक्ति (का अनु- भव योगी को होता है) । व्याख्या—दूसरे उपाय अर्थात् अनुपायक्रमाभ्यास से जब योगी परमशिवरूप शुद्धतत्त्व में 'विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ' इस भावना के दृढ़ अभ्यास से प्रपञ्च की तन्मयता का अनुभव करता है तब उसे पशु अर्थात् जीवभाव की बन्धशक्ति नहीं रहती और वह सदाशिव की तरह जगत् का पति बन जाता है । पूर्णाहंता में स्थित यह योगी समाधि का अभ्यास करे अथवा न करे, इससे उसे कोई प्रयोजन नहीं है । योगवासिष्ठ में कहा है— समाधिमथ कर्माणि मा करोतु करोतु वा । हृदयेनास्तसर्वाशो मुक्त एवोत्तमाशयः ॥ अर्थ—जिसके अन्तःकरण में शिवोऽहम् भावना के दृढ़ होने पर सब प्रकार की द्वैत- मूलक आशायें अस्त हो गई हैं वह (योगी) समाधि का अभ्यास करे अथवा न करे, देहादि सम्बन्धी कर्म करता रहे अथवा न करे, उत्तम आशय वाला सदा ही मुक्त माना जाता है । ऐसे योगी के लिये हठसमाधि का अनुष्ठान भी बन्धन ही है । अष्टावक्रगीता में कहा गया है— निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः । अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि ॥ (१५-१) अर्थ—तू सर्वसम्बन्धशून्य, फलाकांक्षा की क्रिया से रहित, शुद्धतत्त्वरूप स्वप्रकाश और अभेदभावना से निर्मल है । इस कारण सविकल्प हठसमाधि का अनुष्ठान भी तेरा बन्धन है । अतः स्वरूपज्ञान के अतिरिक्त किसी उपाय का अनुष्ठान मात्र भी ऐसे आत्मज्ञानी योगी के लिये बन्धन ही है । वह प्रारब्धानुसार यथाप्राप्त स्थिति में भी निरावरण स्वरूपलाभ से युक्त है ॥१६॥ सम्बन्ध—शुद्धतत्त्व में अनुसंधान वाले जिसके बन्धन नष्ट हो चुके हैं ऐसे योगी के लिये साधारण विचार भी स्वात्मविमर्शरूप ही होते हैं, अब यह बताते हैं ।
प्रथम विकास : ११ वितर्क आत्मज्ञानम् ॥१७॥ वितर्कः — 'विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ' इस प्रकार का जो विचार अथवा विमर्श है, यह निश्चय ही आत्मज्ञानम् — आत्मा के स्फार का ज्ञान (इस परम योगी के लिये) है। व्याख्या — आत्मानुसन्धान में स्थित होने से ऐसे योगी के बन्धन नष्ट हुए होते हैं। शिवोऽहं भावना में प्रपञ्च का तन्मयीभाव उस को हुआ होता है। अतः उसके संकल्प-विकल्प रूप साधारण विचार भी आत्मरूपता में स्फुरित होते हैं। उसे तो 'स्याम तन, स्याम मन, स्याम ही हमारो धन' की भावना से जगत् के सब विचार आत्ममय ही होते हैं। वह 'अकिञ्चिच्चिन्तक' योगी है ॥१७॥ सम्बन्ध — आगे के तीन सूत्रों में कहते हैं कि वह योगी मायावी जगत् में योगै- श्वर्य का चमत्कार कैसे लेता है। यह उसकी विश्वमय दशा है। अब (अकिञ्चि- च्चिन्तक) स्वात्मविज्ञान से सुशोभित योगी के लिये समाधिसुख क्या है, यह बताते हैं। लोकानन्दः समाधिसुखम् ॥१८॥ लोकानन्दः — अन्तःकरण और बहिष्करण में चित्प्रकाश का चमत्कार समाधिसुखम् — (स्वात्माराम योगी का) समाधिसुख है। व्याख्या — स्वात्माराम योगी सब देहधारियों में विलक्षण चमत्कारपूर्ण होता है। वह पूर्णाहन्ता के सहज अनुभव से (अथवा प्रमातृ-पद पर विश्रान्ति पाने से) लोक के प्रत्येक पदार्थ में स्वरूप-स्फुरण का ही चमत्कार लेता रहता है। यही उसका समाधि- सुख है। कहा भी है — ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं सम्बन्धे सावधानता ॥ अर्थ — सब देहधारियों में ग्राह्य पदार्थ और ग्राहक का ज्ञान सामान्य है। परन्तु योगियों में विशेष बात यह है कि वे इन दोनों की सन्धि में सावधान रहते हैं। यही सावधानता ऐसे योगी की समाधि है और नित्यानन्दभाव में स्थिति है। अथवा इस सूत्र का दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है — उस योगी का यह समाधि- सुख लोगों के लिये कल्याण तथा आनन्द को देने वाला बन जाता है। इस के समाधि- सुख में रहने से ही लोगों का कल्याण होता है ॥१८॥ सम्बन्ध — अब इस योगी के विभूतियोग (सिद्धियों) का वर्णन करते हैं। शक्तिसंधाने शरीरोत्पत्तिः ॥१९॥ शक्तिसंधाने — इच्छाशक्ति के तन्मयीभाव होने पर शरीरोत्पत्तिः — यथाभिमत शरीर की उत्पत्ति हो जाती है। व्याख्या — तेरहवें सूत्र में योगी की पारमेश्वरी इच्छा शक्ति को क्रीडनशीला कहा
१२ : शिवसूत्र विमर्श गया है। इसके अनुसार योगी की इच्छा जब व्यापकरूप धारण करती है तो वह अन्तः तथा बाह्य रूप में इसी इच्छा के द्वारा किसी शरीर की उत्पत्ति कर सकता है। यह शक्ति उसे स्वप्न तथा सुषुप्ति में भी सुलभ होती है ॥१९॥ सम्बन्ध—आगे और सिद्धियों का वर्णन करते हैं। भूतसन्धान-भूतपृथक्त्व-विश्वसंघट्टाः ॥२०॥ भूत—देह-प्राण-पुर्यष्टकादि का संधान—पोषण (अथवा सहायता) करना, भूतपृथक्त्व—देहादि की पृथक्ता (और) विश्वसंघट्टा:—विश्वात्मा के साथ एकीभाव होने से अपने शरीर को एक से अधिक स्थानों पर एक ही समय प्रकट करना (इसकी और सिद्धियाँ हैं)। व्याख्या—ऐसा योगी विश्वात्मस्वरूप का अनुभव करता हुआ इस योग्य होता है कि वह (१) देह-प्राण आदि की सहायता करने में समर्थ होता है; (२) व्याधि आदि क्लेशों को शान्त करने के लिये देहादि से किञ्चित् काल के लिये अलग हो जाता है और (३) भिन्न-भिन्न स्थानों पर एक ही समय में अपने शरीर को प्रकट करता है। यह विश्वमय दशा में इसकी कुछ परिमित सिद्धियाँ हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं:— (१) यदि योगी का शरीर वृद्ध हो और युवा साथियों के साथ उसे किसी पर्वत पर चढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ हो तो इस स्थिति में युवकजन स्वभावतः अल्प-आयास से ही पर्वत के ऊपर आ सकते हैं। परन्तु देह-प्राण आदि की सहायता करने में समर्थ योगी में यह सामर्थ्य होता है कि, देहादि को पृथक् करके विश्वात्मा में एकीभाव होने की युक्ति से, पर्वत पर वृद्ध देह में भी अनायास ही चढ़ जाता है। देह की शिथिलता उसे कोई बाधा नहीं पहुँचा सकती है। (२) यदि योगी का शरीर प्रारब्धकर्मानुसार किसी व्याधि से ग्रस्त हो परन्तु अवश्य-कर्तव्य कार्य सामने आ पड़े और व्याधि उस में बाधा डालती हो तो वह योगी उस व्याधि को किञ्चित् काल के लिये शान्त कर सकता है। व्याधि को शरीर से किञ्चित् काल के लिए अलग करके कार्यसिद्धि होने के उपरान्त फिर उस का ग्रहण प्रारब्ध-भोग के लिये करता है। ऐसा सुनने में आया है कि एक योगी-जन अपने आसन पर स्वरूप-चिन्तन में लीन था। पास ही एक लोई पड़ी थी जिस में स्वयमेव कम्पन होता था। एक भक्त के आने पर योगी महाराज ने आँखें खोलीं और लोई को अपने शरीर पर ओढ़ लिया। इसके साथ ही योगिराज के शरीर में कम्पन आरम्भ हुआ। आश्चर्यचकित भक्त ने पूछा, 'महाराज, यह मैं क्या देख रहा हूँ। आप अभी स्वस्थ थे परन्तु ज्योंही आपने लोई ओढ़ी त्योंही आप का शरीर ज्वर से काँप उठा है।' योगी जी ने कहा, 'प्रियवर ! प्रारब्धानुसार यह शरीर रोगग्रस्त है। ज्वर से पीडित होने के कारण कम्पन हो रहा
प्रथम विकास : १३ है। ईश्वर का भजन शान्ति से हो इस कारण इस व्याधि को किञ्चित्कालमात्र के लिए इस लोई में रखा था।' (३) योगिराज भगवान् कृष्ण की विश्वमयदशा का वर्णन हमें पुराणों में मिलता है। वह एक हो समय भिन्न-भिन्न स्थानों पर अपने दिव्य शरीर को प्रकट करते थे। रास- क्रीडा में प्रत्येक गोपी के साथ एक एक कृष्ण नृत्य में रत रहता था और बीच में भी राधा के साथ मुरलीवादन करता कृष्ण होता था ॥२०॥ सम्बन्ध—जब इन परिमित सिद्धियों को न चाहता हुआ विश्वात्मप्रथारूप परा सिद्धि को ही चाहता है तब योगी तुर्य दशा का अनुभव करता है। शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः ॥२१॥ शुद्धविद्योदयात्—शुद्ध निर्मल विद्या (बोध) से चक्रेशत्वसिद्धिः—स्वरूपसमाधि की सिद्धि (होती है)। व्याख्या—विश्वात्मरूपता का ज्ञान जब निर्मल होता है तब अन्तर्मुखभाव सिद्ध होता है। यह योगी की विश्वोत्तीर्ण दशा है। इसे तुर्यदशा कहते हैं। 'मैं ही यह जगत् आदि सब कुछ हूँ' यह माहेश्वरी दृष्टि सिद्ध होती है ॥२१॥ संबन्ध—अब योगी की तुर्यातीत दशा का अनुभव कहते हैं। महाह्रदानुसंधानान्मन्त्रवीर्यानुभवः ॥२२॥ महाह्रद—(स्वच्छ अनावृत तथा गम्भीर धर्मों से युक्त होने के कारण बोध हो) बड़ा समुद्र (कहलाता है) अनुसन्धानात्—(उस बोध में) अनुसन्धान करने से अर्थात् लगातार उसके साथ तादात्म्य-विमर्श से (योगी का) मन्त्रवीर्य—पूर्णाहन्ता (में) अनुभवः—प्रवेश (होता है)। व्याख्या—परासंवित् स्वच्छ, निर्मल और गम्भीर होने से महासमुद्र है। इस बोध- सुधाब्धि का अन्तर्मुखभाव से लगातार अनुसन्धान होने पर योगी को शिवस्थितिरूप निर्व्युत्थानसमाधि का अनुभव होता है। वह पूर्णाहन्ता में प्रवेश करता है। यह विश्वमयदशा है। योगी इस दशा में जगत् के हानादान-व्यवहार में भी युक्त होता है और स्वरूपस्थित भी होता है। इसे ऊर्ध्वकुण्डलिनी-पद भी कहते हैं। ऊपर कहे हुए १९ और २० सूत्रों के ऐश्वर्य योगी को स्वरूप से दूर ले जा सकते हैं परन्तु २१ और २२ सूत्र के ऐश्वर्य इसे अधिकाधिक बोधसुधाब्धि में ही मज्जन कराने में समर्थ होते हैं ॥२२॥ इस प्रकार शिवसूत्र का शाम्भवोपाय-प्रकाशन नामक प्रथम विकास समाप्त हुआ
द्वितीय विकास इस द्वितीय विकास में शाक्तोपाय के द्वारा शिवस्वरूप के अनुभव का वर्णन है । शाक्तोपाय इस प्रकार है :— उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयन् । यं समावेशमाप्नोति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते ॥ —मालिनीविजयोत्तर तन्त्र : अधि : २ श्लोक २२ अर्थ—मन्त्र का उच्चारण करने के बिना ही अपने मन में उसके अर्थ [ध्येय] का चिन्तन [ध्यान] करने से जो समावेश होता है उसे शाक्तोपाय कहते हैं । चित्तं मन्त्रः ॥१॥ चित्तम्—(शाक्तपरामर्श से रंगा हुआ आराधन करने वाले का) मन मन्त्रः—अहं परामर्श में मग्न (होता है) । व्याख्या—जिससे परमतत्त्व चेता या विमर्श किया जाता है उसे चित्त कहते हैं । शाक्त या शाम्भव-प्रणव (ह्रीं) अथवा प्रासाद-प्रणव (सौ) के द्वारा प्रमातृदशा में अभेद- रूप से विमर्श करना ही मन्त्र है । भेदमय संसार का प्रशमनरूप, त्राण ही मन्त्र है । यहाँ योगी का मन ही मन्त्र बन जाता है। मन्त्रदेवता के विमर्श से सामरस्य को प्राप्त हुआ आराधक का चित्त ही मन्त्र है । केवल 'ह्रीं' आदि मन्त्रों का उच्चारण करना ही मन्त्र नहीं कहलाता । कहा भी है :— 'शिवो भूत्वा शिवं यजेत्' अर्थ—शिव बनकर अर्थात् प्रमातृभाव में स्थित होकर ही शिव की आराधना करनी चाहिए ॥१॥ संबन्ध—इस आराधना के लिये प्रयत्न अर्थात् अभ्यास करने की अत्यन्त आवश्य- कता है। प्रयत्नः साधकः ॥२॥ प्रयत्नः—स्वाभाविक अथवा सहज प्रयत्न (ही) साधकः—मन्त्र जपने वाले साधक का मन्त्रदेवता के साथ तादात्म्य (करा देता) है। व्याख्या—प्रथम विकास में शाम्भवोपाय से परिपूर्ण अहं-परामर्श करने के लिए उद्योग करने की आवश्यकता बताई है :—'उद्यमो भैरवः' ।।१-५।। यहाँ शाक्तोपाय से भी योगी के चित्त को अहं परामर्श में मग्न करने की आवश्यकता बताई गई है। इसके
द्वितीय विकास : १५ लिए इतने प्रयत्न की आवश्यकता है कि अभ्यास स्वाभाविक बन जाय। शकुनि पक्षी में यह स्वाभाविक है कि ज्यों ही उसकी दृष्टि दूर भी पड़े हुए मांस के टुकड़े पर पड़ जाय तो बह वेग से (और सब कुछ भूल कर) उस पर झपट पड़ता है। इसी प्रकार योगीन्द्र का मन पर-प्रकाश को सहज ही ग्रहण करता है। अतः अभ्यास को स्वाभाविक बनाने के लिए उद्योग की आवश्यकता है ॥२॥ संबन्ध—इस प्रकार के साधक के साध्य-मन्त्र के वीर्य अर्थात् शक्ति के बारे में, जिसका उपक्षेप पहले विकास के २२वें सूत्र में किया है, आगे के सूत्र में बताते हैं ! विद्याशरीरसत्ता मन्त्ररहस्यम् ॥३॥ विद्या—पराद्वयप्रथा (जिसे शब्दराशि—भैरव कहते हैं) शरीर—स्वरूप (है जिसका) सत्ता—(उसकी जो) सत्ता (अर्थात् सारे विश्व के साथ अभेद रखने वाला पूर्णाहन्ता का विमर्शरूप विकास है) मन्त्ररहस्यम्—(वही) मन्त्रों का वीर्य है। व्याख्या—पहले विकास के २२वें सूत्र में शाम्भवोपाय के आधार पर जो बोध- सुधाब्धि के साथ तादात्म्य के विमर्श से पूर्णाहंता में प्रवेश कहा गया है वही अब शाक्तो- पाय के द्वारा शब्दराशि भैरव के स्वरूप में विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के विमर्श के विकास में बताया जाता है। यह अ-क्षकारात्मक पचास अक्षरों की स्थिति रूप सारी शब्दराशि का समन्वय है। इसका विशद वर्णन तन्त्रालोक में मातृकाचक्र तथा न-फकोटि (मालिनी) के वर्णन में आचार्याभिनवगुप्तपाद द्वारा विशद रूप से किया गया है। शब्द ही चराचर में व्याप्त है और इसी से चराचर वाच्य है। यह शब्द हृदय में एक अणु (पश्यन्ती), कण्ठ में दो अणु (मध्यमा) और जिह्वाग्र पर तीन अणु (वैखरी) होकर वर्णों के द्वारा प्रकट होता है। इसकी पर तथा सूक्ष्म शक्ति सब प्राणियों में ठहरी हुई है जो हृदय-बिन्दु (हृद्बिन्दु) अर्थात् चित्त-प्रकाशरूप साढ़े तीन वलय वाली कुण्डलिनी को ढाँप कर सुषुप्त भुजगाकार है। जब प्राणापान संघर्ष-रूप दृढ़ साधना से यह पराशक्ति जाग्रत् होती है तब प्राण-शक्ति समूह से नाद द्वारा प्रकट होती है। अर्थात् पर-ज्ञानरूप निनाद द्वारा प्रबुद्ध होती है और शरीर केन्द्र से बाह्य व्याप्त होती है। यह नाद सचेत साधक को जाग्रत् और स्वप्न तथा स्वप्न और सुषुप्ति की सन्धियों में सुनाई देता है और उसे शुद्ध निर्विषय भाव में अद्वयानन्द की अनुभूति होती है। भगवत्पाद श्री शङ्कराचार्य ने इसका संकेत इस प्रकार किया है :— यद्भावानुभवः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते। अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते तदाद्वयानन्दम्॥ —प्रबोधसुधाकर : श्लोक १६०
१६ : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—निद्रा के आरम्भ में और जाग्रत् के अन्त में जिस शुद्ध और निर्विषय भाव का अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरण में स्थिर हो जाये तो उससे अद्वयानन्द की प्राप्ति होती है । प्राणापान-संघर्ष में दृढ़ाभ्यासी साधक को ब्रह्मवेग से (अर्थात् यह जानने के बिना कि क्या होने वाला है) सूर्यकोटिसम-प्रभा (करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के समान) प्रकाशरूप आकारता का अनुभव होता है । यह पर-ज्ञानरूप नाद है । यही सूक्ष्म कुण्डलिनी का जागरण है । पराशक्ति के उदर में बिन्दु (कुण्डलिनी) की चार कलायें हैं । वे इस प्रकार हैं :— १. प्रमेय-प्रधान पहला वलय २. प्रमाण-प्रधान दूसरा वलय ३. प्रमातृ-प्रधान तीसरा वलय ४. प्रमिति-प्रधान चौथा अर्धवलय (यह परप्रमातृभावरूप अर्धवलय है) इस प्रकार कुण्डलिनी के साढ़े तीन वलय हैं । प्राणापान संघर्ष के द्वारा पराशक्ति जब दो बिन्दुओं अर्थात् मूलाधारचक्र और ब्रह्मारन्ध्र के मध्य सीधी रेखा का रूप धारण करती है तो इसे ज्येष्ठा-शक्ति जानना चाहिये । इस दशा में यह शरीर-दशा से बाहर व्याप्त होती है । यह योगी की समाधि-दशा है । यही इच्छा-ज्ञान-क्रिया रूप त्रिवेणी तीर्थ है । यह प्रकाशरूप दशा वीर्य से प्राप्त होती है । सुप्त अवस्था में मोक्षमार्ग का निरोध करने के कारण इसे रौद्री-शक्ति कहते हैं । यह शक्ति मोह तथा विघ्न-बाधाओं के कारण साधक में पराशक्ति का विकास नहीं होने देती । जब यह परा-शक्ति साधनाभ्यास के स्वाभाविक होने पर योगी की व्युत्थान दशा में भी अन्तर्भूत रहती है तो यह शशाङ्कशकलाकार पूर्णानन्दमय अवस्था ही उसकी पूर्णसिद्धि है । इसे अम्बिका-शक्ति कहते हैं । इस प्रकार एक ही पराशक्ति के त्रिविध रूप हैं । इन्हीं तीन शक्तियों से अ-क्ष माला के नौ वर्ग उत्पन्न हुए । इनकी शक्तिदेवियाँ इस प्रकार हैं :— १. अमा (अ-वर्ग), २. कामा (क-वर्ग), ३. चार्वङ्गी (च-वर्ग), ४. टङ्कधारिणी (ट-वर्ग), ५ तारा (त-वर्ग), ६. पार्वती (प-वर्ग), ७. यक्षिणी (य-वर्ग), ८. शारिका (श-वर्ग) और ९. क्षेमङ्करी (क्ष-वर्ग) । इसे नवार-चक्र कहते हैं । इन नौ वर्गों से पाँच मन्त्रदेवताओं का प्रादुर्भाव हुआ । वे इस तरह हैं :— १. सद्योजात (इच्छा) इ प्रत्यवमर्शनरूप २. तत्पुरुष (आनन्द) लृ विश्रान्तिरूप ३. वामदेव (ज्ञान) उ आनन्दरूप ४. ईशान (चित्) अ स्वाभावरूप ५. अघोर (क्रिया) ऋ प्रकाशरूप
द्वितीय विकास : १७ इसे पंचार-चक्र कहते हैं। अ इ उ दीर्घ स्वरों के साथ मिल कर (अर्थात् क्षोभ को पाकर) जन्मस्थान अथवा बीजस्थान कहलाते हैं। ऋ तथा ऌ अपने दीर्घ स्वरों के साथ भी न बीज हैं न योनि, क्योंकि यह शिवतत्त्व में ही अनादिरूप से आनन्दभोग में मग्न हैं। इस प्रकार इस पंचार-चक्र से पराशक्ति देवी का विस्तार बारह स्वरों में हुआ। फिर व्यञ्जनों की सृष्टि करके वर्णमाला के पचास अक्षरों में विस्तार पाया। परारूप पराशक्ति में यह शब्द-राशि-भैरव सनातन रूप से ब्रह्मरन्ध्र में ठहरा है। यही प्राणी के हृदय में एक अणु से पश्यन्ती के द्वारा, कण्ठ में दो अणुओं से मध्यमा द्वारा और फिर जिह्वामूल में तीन अणुओं से वैखरी के द्वारा प्रकट होता है। इस प्रकार शब्द से ही चर तथा अचर व्याप्त है। अतः परभैरवीय परावाक् शक्तिरूप जो मातृका है वह ज्येष्ठा, रौद्री तथा अम्बा शक्तियों द्वारा विचित्ररूप धारण कर सब वर्णों में उदित हुई है। इन वर्णों के संघट्ट (मेल) का स्वरूप मन्त्रों में प्रकट होता है। वही मन्त्रों की भगवती यहाँ विद्याशरीर- सत्ता का रहस्य कही गई है। इसका साक्षात्कार करके योगी कृतकृत्य बन जाता है क्योंकि उसे शब्दराशि भैरव के स्वरूप में विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के विमर्श का विकास होता है। विषय गहन होने के कारण यदि उपर्युक्त विवरण समझने में कुछ कठिन लगे तो सद्गुरु महाराज की शरण का ही आश्रय लेना उचित है ॥३॥ सम्बन्ध—जिन साधकों को ऊपर कहे हुए के अनुसार पूर्णाहन्ता के विमर्श का विकास परमेश्वर की इच्छा से हृदयङ्गम न हो उन्हें बिन्दुनाद की शक्तियों से उत्पन्न हुई मितसिद्धियों में ही मन ऐसे रमता है जैसे मार्ग में जाता हुआ पथिक अपने ध्येय को भूलकर तृण तथा पर्णों को ही इकट्ठा करने में लगता है (रथ्यां गमने तृणपर्णानि इति नीत्या)। इस विषय का अगले सूत्र में वर्णन किया है। गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः ॥४॥ गर्भे—योगमाया भूमि (अख्याति-रूप महामाया अर्थात् मित मन्त्र- सिद्धियों) के प्रपञ्च में (ही) चित्तविकासः—(जिस के) मन का विकास (अर्थात् जिस का मन प्रसन्न) हो (उसको) अविशिष्टविद्या—(वह) सर्वजन साधारण विद्या अर्थात् किञ्चित् ज्ञान वाली अशुद्धविद्या स्वप्नः—स्वप्न के बराबर ही भ्रमात्मक है अर्थात् उसकी समाधि स्वप्न तुल्य ही है। २
१८ : शिवसूत्र विमर्श व्याख्या—जो साधक ईश्वर-इच्छा से ही उस परप्रमातृभाव पर स्थिति प्राप्त करने में असमर्थ होकर मार्ग के प्रलोभनों में ही रमता है उसका मन योगमाया भूमि (छः मित-सिद्धियों) में प्रसन्न रहता है। यद्यपि उसे किञ्चित् ज्ञानलाभ होता भी है तथापि वह अशुद्धविद्या (अर्थात् सर्व-जन-साधारण विद्या) के ही विशेष चमत्कारों में व्यस्त रहता है और परलाभ से वञ्चित रहता है। उसकी समाधि-दशा वैसी ही भ्रमात्मक है जैसे स्वप्न में पड़ा साधारण जीव । व्युत्थान दशा में वह यद्यपि इन मितसिद्धियों का प्रदर्शन करता है परन्तु समाधि में उसे ये ही विघ्न बन जाती हैं। फलतः ऐसा साधक स्वच्छन्द परमार्थ लाभ से वंचित रह जाता है। पातञ्जल योगदर्शन में कहा है— 'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः' —(३-२७) अर्थ—वे छः प्रकार की मितसिद्धियाँ समाधि की सिद्धि अर्थात् ज्ञानप्राप्ति में विघ्न हैं और व्युत्थान में सिद्धियाँ हैं। ऐसे साधक की देहवासना छूटी नहीं होती है। इस कारण उसकी बिन्दु-नाद की शक्तियों से उत्पन्न हुई मितसिद्धियाँ अस्थायी होती हैं और उसे क्षोभ में डालती रहती हैं। अतः साधक को सचेत रहने की आवश्यकता है। यह सद्गुरु का कृपापात्र बनकर रहने से ही हो सकता है ॥४॥ सम्बन्ध—परन्तु इन मितसिद्धियों के समीप आने पर भी जब योगी ईश्वरकृपा से इनका आश्रय नहीं लेता है और परम स्थिति का ही आलम्बन धारण कर सकता है तो वह परप्रमातृभाव की सहज-स्थिति को पाता है। इसके लिए अगला सूत्र कहा गया है। विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था ॥५॥ विद्यासमुत्थाने—पराद्वयप्रथारूप शुद्धविद्या का उदय स्वाभाविके—स्वाभाविक (सहज) होने पर खेचरी—चिदाकाशगामी खेचरी मुद्रा (में) शिवावस्था—परसंविद्रूप शिव अवस्था (योगी को प्राप्त होती है)। व्याख्या—अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल होने पर योगी शुद्धविद्या को पाता है। यहाँ उसे परम अद्वैत-स्वरूप ज्ञान का उदय होता है। परमेश्वर की इच्छा मात्र से वह अनेक जन्माजित पुण्य-पुञ्जों के फलस्वरूप पराद्वयस्वरूप में मज्जन करता है। यहाँ मित सिद्धियों का अनादर होता है और समस्त मायीय भेद शान्त हो जाते हैं। योगी बोधगगन में विचरण रूप खेचरी मुद्रा के आस्वादन में स्वाभाविकी स्थिति को प्राप्त होता है। यह उसकी पराहंतारूप स्वानन्दपूरित शिवावस्था है। फिर यह स्वाभाविक विद्यासमुत्थान उसे केवल अनुसंधान मात्र से होता है। श्रुति कहती है:—
द्वितीय विकास : १९ 'शरवत् संहितो भवेत्' अर्थ—जिस प्रकार तीर अपने लक्ष्य पर अति वेग से जा लगता है उसी प्रकार ऐसे योगी का चिदात्मस्वरूप में मज्जन होता है, यही योगी की परम सिद्धि है। इसी अवस्था के लिये आचार्य उत्पलदेव ने भगवान् शिव से प्रार्थना की है— त्वद्विलोकनसमुत्कचेतसो योगसिद्धिरियती सदास्तु मे। यद्विशेयमभिसन्धिमात्रत्- स्त्वत्सुधासदनमर्चनाय ते ॥ —(शिवस्तोत्रावली २२-६) अर्थ—हे परमेश्वर ! तुम्हारे दर्शन के लिये उत्कण्ठित हृदयवाले मुझे इतनी सी ही योग-सिद्धि सदा प्राप्त होती रहे कि मैं केवल इच्छा होते हुए ही (अर्थात् जब मैं चाहूँ तब) तुम्हारी पूजा करने के लिए तुम्हारे चिदानन्द-सदन (अर्थात् परमानन्द धाम) में प्रवेश करूँ ॥ ऐसे परम सिद्ध योगी की सिद्धियां उसका अनुसरण करती हैं परन्तु वह उनकी ओर देखता तक भी नहीं। परम भक्त सन्त परमानन्द महाराज ने क्या सुन्दर कविता इस संदर्भ में कश्मीरी भाषा में कही है : 'पत् ल़ारन्स् ऋद् त् सिद्ध स्योद् वुछ्यक् न् जांह्' अर्थ—ऋद्धि और सिद्धि योगी का पीछा करेंगी परन्तु वह उनकी ओर एक आंख भी नहीं देखेगा। श्रुति के अनुसार ऐसे योगी का अनुभव—'सवं इदं अहं च ब्रह्मैव' (अर्थात् यह सर्व चराचर विश्व ओर मैं ब्रह्म ही हैं) इस प्रकार स्वरूप चमत्कार पूर्ण होता है। काश्मीर शैव-दर्शन में इसे कुलमार्ग कहते हैं। कुलरूप परमशिव हैं। 'कुल' का अर्थ है 'विश्वाभेद अवस्था' । इसी से इसको 'कौल' अर्थात् 'त्रिक' नाम दिया गया है। यहाँ सब प्रकार के क्षोभ का लय होता है। इस प्रकार मन्त्रवीर्य स्वरूप के कथन द्वारा मुद्रा- वीर्य का भी संग्रह हो गया। तन्त्रालोक में श्रीअभिनवगुप्तपाद इसे जगदानन्द की संज्ञा देते हैं। यह स्थिति इस प्रकार है :— यत्र कोऽपि व्यवच्छेदो नास्ति यद्विश्वत: स्फुरत् । यदनाहतसंवित्ति परमामृतबृंहितम् ॥ यत्रास्ति भावनादीनां न मुख्या कापि संगतिः । तदेव जगदानन्दमस्मभ्यं शम्भूरुचिवान् ॥ —(तन्त्रालोकः)
२० : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—जिस चिदानन्द दशा में कोई रुकावट न हो, जो [स्वात्मलाभरूप चमत्कार] विकास वाला हो, जहाँ किसी दूसरी अपेक्षा से रहित, प्रमाता-प्रमेयादि रूप से संवित् परिपूर्ण विकसित हो, जिस अवस्था में समाधि, धारणा आदि की कोई विशेष उप- योगिता न हो वही (योगी की) जगदानन्द दशा है ऐसा श्री शम्भुनाथ ने हम (अभिनव गुप्त) से कहा है ॥५॥ सम्बन्ध—अब इस स्थिति की प्राप्ति का उपाय कहते हैं । गुरुरुपायः ॥६॥ उपायः—(इस अवस्था अर्थात् परमसिद्धि की प्राप्ति का) उपाय गुरुः—गुरु (ही हैं) । व्याख्या—मन्त्रवीर्य और खेचरी मुद्रा से सृष्टि बीज हंसः अथवा अहम् और संहार बीज सोऽहं अथवा म ह अ क्रमशः तात्पर्य है । यहाँ सृष्टिबीज की ही प्रधानता कही गई है । इस तात्त्विक अर्थ का जो उपदेश करे उसे गुरु कहते हैं । 'मनुष्य देह- मास्थाय छन्नास्ते परमेश्वरः' (परमेश्वर ही गुरुजनों के रूप में मनुष्य देह में छिपे हुए हैं) । या यों समझना चाहिये कि—'गुर्वी पारमेश्वरी अनुग्राहिका शक्तिः' (गुरु तो परमेश्वर की अनुग्रह करने वाली ही शक्ति है) अतः गुरु, ऊपर कही हुई परमसिद्धि के उपाय का अवकाश देता है, ऐसा स्पष्ट है, (सैवावकाशं ददतीत्युपायः भवति) ॥६॥ सम्बन्ध—अतः गुरु के प्रसाद से ही शिष्य को स्वात्मरूपता का परिज्ञान होता है । वह अहं-परामर्श का तात्त्विक क्रम है । इसका कथन अगले सूत्र में है । मातृकाचक्रसंबोधः ॥७॥ मातृकाचक्र—अहं-परामर्श के तात्त्विक क्रम का । संबोधः—सम्यक् बोध (गुरु की प्रसन्नता से शिष्य को होता है) । व्याख्या—जिन साधारण जनों को स्वरूपज्ञान की चेतना नहीं होती है उनको प्रति- लोमरूप परमेश्वर की जो शक्ति बहिर्मुखता में विषयों की ओर दौड़ाती है उसे मातृका कहते हैं । यही जीव-संसार है । परन्तु जो विरले योगी-जन मन्त्रवीर्य रहस्य को जानकर खेचरी मुद्रा में अ-ह वाचक-वाच्य रूप जगत् (शब्दादि) के शब्दराशि भैरव में सद्गुरु महाराज की प्रसन्नता के फलस्वरूप स्थिति प्राप्त करते हैं उन्हीं को चिदानन्दघन स्व- स्वरूप का सम्यक् ज्ञान अर्थात् समावेश होता है । उनको विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के विमर्श का विकास होता है । अहं-विमर्श दो प्रकार का है । पहला परमशिवरूप स्वरूपान्तर्गत अहं की प्रथम कला है जिसे कुल कहते हैं । इसी को कौल अर्थात् त्रिक.मत से जाना जाता है । दूसरा
द्वितीय विकास : २१ शिवरूप प्रसरोन्मुख द्वितीय कला है जिसे अकुल अर्थात् विमर्शोन्मुख अहं कहते हैं। यहाँ शाक्तोपाय में दूसरे प्रकार के विमर्श से तात्पर्य है, मातृकाचक्र की यत्किञ्चित् व्याख्या इसी विकास के तीसरे सूत्र में की गई है ॥७॥ सम्बन्ध — इस प्रकार अहं परामर्श के तात्त्विक क्रम का सम्यक् बोध प्राप्त करने के लिए योगी चिदग्नि में स्थूल-सूक्ष्मादिरूप शरीर की आहुति देता है। इस पर कहते हैं। शरीरं हविः ॥८॥ शरीरं — (योगी) स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा पररूप शरीर के अहम्भाव की हविः — (चिद्-अग्नि में) आहुति देता है। व्याख्या — देह स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा पर चार प्रकार का है। इस तरह जीव शरीर में चार प्रमाताओं से अभिषिक्त है। वे हैं देह, पुर्यष्टक, प्राण और शून्य । अतः जीव की मितप्रमातृता जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और शून्य अवस्थाओं में रहती है। महा- योगी पूर्णाहन्ता को प्राप्त करने के लिए इन चारों प्रमाताओं को पर प्रमातृरूप चिदग्नि में जब आहुति देता है तब वह कृतकृत्य हो जाता है। अतः देह-प्रमातृता का शमन ही यहाँ तात्पर्य है । गीता जी में कहा है :— बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन् विषयांस्र्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ —(गीताः अध्याय १८; श्लोक ५१-५३) अर्थ—संशय, विपर्यय आदि से विमुक्त बुद्धि से युक्त ब्रह्मवित् यति सात्त्विक धृति से बाह्यविषयों में प्रवृत्त चित्त का निरोध कर, शब्दादि विषयों का त्याग कर (अर्थात् अनुसन्धान न कर) तथा राग और द्वेष का परित्याग कर, जो निर्जन अरण्य आदि देशों में रहता है, परिमित अशन करता है, वाणी, शरीर और मन को वश में रखता है, सदा ध्यान और योग में तत्पर रहता है एवं सदा वैराग्य से पूर्ण रहता है, अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग कर देह आदि में ममतारहित और शान्त रहता है, वह यति ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। स्पन्दशास्त्र में भी कहा हैः— 'यदा क्षोभः प्रलीयेत, तदा स्यात् परमं पदम् ।' —(९)