भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

१० : शिवसूत्र विमर्श सम्बन्ध—उपायक्रमाभ्यास कहकर अब अनुपाय-क्रमाभ्यास में अनादिसिद्ध शिवदशा का वर्णन करते हैं । यह पूर्णाहंता-विमर्श में दूसरा उपाय है । शुद्धतत्त्वानुसंधानाद्वा अपशुशक्तिः ॥१६॥ वा—दूसरे उपाय (अनुपायक्रमाभ्यास) से शुद्धतत्त्व—(परम शिवरूप) शुद्धतत्त्व में अनुसंधानात्—प्रपञ्च के ('विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ', इस) तन्मयभाव से अपशुशक्तिः—जगत् के पति शिव (अर्थात् जीवभाव रहित) शक्ति (का अनु- भव योगी को होता है) । व्याख्या—दूसरे उपाय अर्थात् अनुपायक्रमाभ्यास से जब योगी परमशिवरूप शुद्धतत्त्व में 'विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ' इस भावना के दृढ़ अभ्यास से प्रपञ्च की तन्मयता का अनुभव करता है तब उसे पशु अर्थात् जीवभाव की बन्धशक्ति नहीं रहती और वह सदाशिव की तरह जगत् का पति बन जाता है । पूर्णाहंता में स्थित यह योगी समाधि का अभ्यास करे अथवा न करे, इससे उसे कोई प्रयोजन नहीं है । योगवासिष्ठ में कहा है— समाधिमथ कर्माणि मा करोतु करोतु वा । हृदयेनास्तसर्वाशो मुक्त एवोत्तमाशयः ॥ अर्थ—जिसके अन्तःकरण में शिवोऽहम् भावना के दृढ़ होने पर सब प्रकार की द्वैत- मूलक आशायें अस्त हो गई हैं वह (योगी) समाधि का अभ्यास करे अथवा न करे, देहादि सम्बन्धी कर्म करता रहे अथवा न करे, उत्तम आशय वाला सदा ही मुक्त माना जाता है । ऐसे योगी के लिये हठसमाधि का अनुष्ठान भी बन्धन ही है । अष्टावक्रगीता में कहा गया है— निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः । अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि ॥ (१५-१) अर्थ—तू सर्वसम्बन्धशून्य, फलाकांक्षा की क्रिया से रहित, शुद्धतत्त्वरूप स्वप्रकाश और अभेदभावना से निर्मल है । इस कारण सविकल्प हठसमाधि का अनुष्ठान भी तेरा बन्धन है । अतः स्वरूपज्ञान के अतिरिक्त किसी उपाय का अनुष्ठान मात्र भी ऐसे आत्मज्ञानी योगी के लिये बन्धन ही है । वह प्रारब्धानुसार यथाप्राप्त स्थिति में भी निरावरण स्वरूपलाभ से युक्त है ॥१६॥ सम्बन्ध—शुद्धतत्त्व में अनुसंधान वाले जिसके बन्धन नष्ट हो चुके हैं ऐसे योगी के लिये साधारण विचार भी स्वात्मविमर्शरूप ही होते हैं, अब यह बताते हैं ।

प्रथम विकास : ११ वितर्क आत्मज्ञानम् ॥१७॥ वितर्कः — 'विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ' इस प्रकार का जो विचार अथवा विमर्श है, यह निश्चय ही आत्मज्ञानम् — आत्मा के स्फार का ज्ञान (इस परम योगी के लिये) है। व्याख्या — आत्मानुसन्धान में स्थित होने से ऐसे योगी के बन्धन नष्ट हुए होते हैं। शिवोऽहं भावना में प्रपञ्च का तन्मयीभाव उस को हुआ होता है। अतः उसके संकल्प-विकल्प रूप साधारण विचार भी आत्मरूपता में स्फुरित होते हैं। उसे तो 'स्याम तन, स्याम मन, स्याम ही हमारो धन' की भावना से जगत् के सब विचार आत्ममय ही होते हैं। वह 'अकिञ्चिच्चिन्तक' योगी है ॥१७॥ सम्बन्ध — आगे के तीन सूत्रों में कहते हैं कि वह योगी मायावी जगत् में योगै- श्वर्य का चमत्कार कैसे लेता है। यह उसकी विश्वमय दशा है। अब (अकिञ्चि- च्चिन्तक) स्वात्मविज्ञान से सुशोभित योगी के लिये समाधिसुख क्या है, यह बताते हैं। लोकानन्दः समाधिसुखम् ॥१८॥ लोकानन्दः — अन्तःकरण और बहिष्करण में चित्प्रकाश का चमत्कार समाधिसुखम् — (स्वात्माराम योगी का) समाधिसुख है। व्याख्या — स्वात्माराम योगी सब देहधारियों में विलक्षण चमत्कारपूर्ण होता है। वह पूर्णाहन्ता के सहज अनुभव से (अथवा प्रमातृ-पद पर विश्रान्ति पाने से) लोक के प्रत्येक पदार्थ में स्वरूप-स्फुरण का ही चमत्कार लेता रहता है। यही उसका समाधि- सुख है। कहा भी है — ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं सम्बन्धे सावधानता ॥ अर्थ — सब देहधारियों में ग्राह्य पदार्थ और ग्राहक का ज्ञान सामान्य है। परन्तु योगियों में विशेष बात यह है कि वे इन दोनों की सन्धि में सावधान रहते हैं। यही सावधानता ऐसे योगी की समाधि है और नित्यानन्दभाव में स्थिति है। अथवा इस सूत्र का दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है — उस योगी का यह समाधि- सुख लोगों के लिये कल्याण तथा आनन्द को देने वाला बन जाता है। इस के समाधि- सुख में रहने से ही लोगों का कल्याण होता है ॥१८॥ सम्बन्ध — अब इस योगी के विभूतियोग (सिद्धियों) का वर्णन करते हैं। शक्तिसंधाने शरीरोत्पत्तिः ॥१९॥ शक्तिसंधाने — इच्छाशक्ति के तन्मयीभाव होने पर शरीरोत्पत्तिः — यथाभिमत शरीर की उत्पत्ति हो जाती है। व्याख्या — तेरहवें सूत्र में योगी की पारमेश्वरी इच्छा शक्ति को क्रीडनशीला कहा

१२ : शिवसूत्र विमर्श गया है। इसके अनुसार योगी की इच्छा जब व्यापकरूप धारण करती है तो वह अन्तः तथा बाह्य रूप में इसी इच्छा के द्वारा किसी शरीर की उत्पत्ति कर सकता है। यह शक्ति उसे स्वप्न तथा सुषुप्ति में भी सुलभ होती है ॥१९॥ सम्बन्ध—आगे और सिद्धियों का वर्णन करते हैं। भूतसन्धान-भूतपृथक्त्व-विश्वसंघट्टाः ॥२०॥ भूत—देह-प्राण-पुर्यष्टकादि का संधान—पोषण (अथवा सहायता) करना, भूतपृथक्त्व—देहादि की पृथक्ता (और) विश्वसंघट्टा:—विश्वात्मा के साथ एकीभाव होने से अपने शरीर को एक से अधिक स्थानों पर एक ही समय प्रकट करना (इसकी और सिद्धियाँ हैं)। व्याख्या—ऐसा योगी विश्वात्मस्वरूप का अनुभव करता हुआ इस योग्य होता है कि वह (१) देह-प्राण आदि की सहायता करने में समर्थ होता है; (२) व्याधि आदि क्लेशों को शान्त करने के लिये देहादि से किञ्चित् काल के लिये अलग हो जाता है और (३) भिन्न-भिन्न स्थानों पर एक ही समय में अपने शरीर को प्रकट करता है। यह विश्वमय दशा में इसकी कुछ परिमित सिद्धियाँ हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं:— (१) यदि योगी का शरीर वृद्ध हो और युवा साथियों के साथ उसे किसी पर्वत पर चढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ हो तो इस स्थिति में युवकजन स्वभावतः अल्प-आयास से ही पर्वत के ऊपर आ सकते हैं। परन्तु देह-प्राण आदि की सहायता करने में समर्थ योगी में यह सामर्थ्य होता है कि, देहादि को पृथक् करके विश्वात्मा में एकीभाव होने की युक्ति से, पर्वत पर वृद्ध देह में भी अनायास ही चढ़ जाता है। देह की शिथिलता उसे कोई बाधा नहीं पहुँचा सकती है। (२) यदि योगी का शरीर प्रारब्धकर्मानुसार किसी व्याधि से ग्रस्त हो परन्तु अवश्य-कर्तव्य कार्य सामने आ पड़े और व्याधि उस में बाधा डालती हो तो वह योगी उस व्याधि को किञ्चित् काल के लिये शान्त कर सकता है। व्याधि को शरीर से किञ्चित् काल के लिए अलग करके कार्यसिद्धि होने के उपरान्त फिर उस का ग्रहण प्रारब्ध-भोग के लिये करता है। ऐसा सुनने में आया है कि एक योगी-जन अपने आसन पर स्वरूप-चिन्तन में लीन था। पास ही एक लोई पड़ी थी जिस में स्वयमेव कम्पन होता था। एक भक्त के आने पर योगी महाराज ने आँखें खोलीं और लोई को अपने शरीर पर ओढ़ लिया। इसके साथ ही योगिराज के शरीर में कम्पन आरम्भ हुआ। आश्चर्यचकित भक्त ने पूछा, 'महाराज, यह मैं क्या देख रहा हूँ। आप अभी स्वस्थ थे परन्तु ज्योंही आपने लोई ओढ़ी त्योंही आप का शरीर ज्वर से काँप उठा है।' योगी जी ने कहा, 'प्रियवर ! प्रारब्धानुसार यह शरीर रोगग्रस्त है। ज्वर से पीडित होने के कारण कम्पन हो रहा

प्रथम विकास : १३ है। ईश्वर का भजन शान्ति से हो इस कारण इस व्याधि को किञ्चित्कालमात्र के लिए इस लोई में रखा था।' (३) योगिराज भगवान् कृष्ण की विश्वमयदशा का वर्णन हमें पुराणों में मिलता है। वह एक हो समय भिन्न-भिन्न स्थानों पर अपने दिव्य शरीर को प्रकट करते थे। रास- क्रीडा में प्रत्येक गोपी के साथ एक एक कृष्ण नृत्य में रत रहता था और बीच में भी राधा के साथ मुरलीवादन करता कृष्ण होता था ॥२०॥ सम्बन्ध—जब इन परिमित सिद्धियों को न चाहता हुआ विश्वात्मप्रथारूप परा सिद्धि को ही चाहता है तब योगी तुर्य दशा का अनुभव करता है। शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः ॥२१॥ शुद्धविद्योदयात्—शुद्ध निर्मल विद्या (बोध) से चक्रेशत्वसिद्धिः—स्वरूपसमाधि की सिद्धि (होती है)। व्याख्या—विश्वात्मरूपता का ज्ञान जब निर्मल होता है तब अन्तर्मुखभाव सिद्ध होता है। यह योगी की विश्वोत्तीर्ण दशा है। इसे तुर्यदशा कहते हैं। 'मैं ही यह जगत् आदि सब कुछ हूँ' यह माहेश्वरी दृष्टि सिद्ध होती है ॥२१॥ संबन्ध—अब योगी की तुर्यातीत दशा का अनुभव कहते हैं। महाह्रदानुसंधानान्मन्त्रवीर्यानुभवः ॥२२॥ महाह्रद—(स्वच्छ अनावृत तथा गम्भीर धर्मों से युक्त होने के कारण बोध हो) बड़ा समुद्र (कहलाता है) अनुसन्धानात्—(उस बोध में) अनुसन्धान करने से अर्थात् लगातार उसके साथ तादात्म्य-विमर्श से (योगी का) मन्त्रवीर्य—पूर्णाहन्ता (में) अनुभवः—प्रवेश (होता है)। व्याख्या—परासंवित् स्वच्छ, निर्मल और गम्भीर होने से महासमुद्र है। इस बोध- सुधाब्धि का अन्तर्मुखभाव से लगातार अनुसन्धान होने पर योगी को शिवस्थितिरूप निर्व्युत्थानसमाधि का अनुभव होता है। वह पूर्णाहन्ता में प्रवेश करता है। यह विश्वमयदशा है। योगी इस दशा में जगत् के हानादान-व्यवहार में भी युक्त होता है और स्वरूपस्थित भी होता है। इसे ऊर्ध्वकुण्डलिनी-पद भी कहते हैं। ऊपर कहे हुए १९ और २० सूत्रों के ऐश्वर्य योगी को स्वरूप से दूर ले जा सकते हैं परन्तु २१ और २२ सूत्र के ऐश्वर्य इसे अधिकाधिक बोधसुधाब्धि में ही मज्जन कराने में समर्थ होते हैं ॥२२॥ इस प्रकार शिवसूत्र का शाम्भवोपाय-प्रकाशन नामक प्रथम विकास समाप्त हुआ

द्वितीय विकास इस द्वितीय विकास में शाक्तोपाय के द्वारा शिवस्वरूप के अनुभव का वर्णन है । शाक्तोपाय इस प्रकार है :— उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयन् । यं समावेशमाप्नोति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते ॥ —मालिनीविजयोत्तर तन्त्र : अधि : २ श्लोक २२ अर्थ—मन्त्र का उच्चारण करने के बिना ही अपने मन में उसके अर्थ [ध्येय] का चिन्तन [ध्यान] करने से जो समावेश होता है उसे शाक्तोपाय कहते हैं । चित्तं मन्त्रः ॥१॥ चित्तम्—(शाक्तपरामर्श से रंगा हुआ आराधन करने वाले का) मन मन्त्रः—अहं परामर्श में मग्न (होता है) । व्याख्या—जिससे परमतत्त्व चेता या विमर्श किया जाता है उसे चित्त कहते हैं । शाक्त या शाम्भव-प्रणव (ह्रीं) अथवा प्रासाद-प्रणव (सौ) के द्वारा प्रमातृदशा में अभेद- रूप से विमर्श करना ही मन्त्र है । भेदमय संसार का प्रशमनरूप, त्राण ही मन्त्र है । यहाँ योगी का मन ही मन्त्र बन जाता है। मन्त्रदेवता के विमर्श से सामरस्य को प्राप्त हुआ आराधक का चित्त ही मन्त्र है । केवल 'ह्रीं' आदि मन्त्रों का उच्चारण करना ही मन्त्र नहीं कहलाता । कहा भी है :— 'शिवो भूत्वा शिवं यजेत्' अर्थ—शिव बनकर अर्थात् प्रमातृभाव में स्थित होकर ही शिव की आराधना करनी चाहिए ॥१॥ संबन्ध—इस आराधना के लिये प्रयत्न अर्थात् अभ्यास करने की अत्यन्त आवश्य- कता है। प्रयत्नः साधकः ॥२॥ प्रयत्नः—स्वाभाविक अथवा सहज प्रयत्न (ही) साधकः—मन्त्र जपने वाले साधक का मन्त्रदेवता के साथ तादात्म्य (करा देता) है। व्याख्या—प्रथम विकास में शाम्भवोपाय से परिपूर्ण अहं-परामर्श करने के लिए उद्योग करने की आवश्यकता बताई है :—'उद्यमो भैरवः' ।।१-५।। यहाँ शाक्तोपाय से भी योगी के चित्त को अहं परामर्श में मग्न करने की आवश्यकता बताई गई है। इसके

द्वितीय विकास : १५ लिए इतने प्रयत्न की आवश्यकता है कि अभ्यास स्वाभाविक बन जाय। शकुनि पक्षी में यह स्वाभाविक है कि ज्यों ही उसकी दृष्टि दूर भी पड़े हुए मांस के टुकड़े पर पड़ जाय तो बह वेग से (और सब कुछ भूल कर) उस पर झपट पड़ता है। इसी प्रकार योगीन्द्र का मन पर-प्रकाश को सहज ही ग्रहण करता है। अतः अभ्यास को स्वाभाविक बनाने के लिए उद्योग की आवश्यकता है ॥२॥ संबन्ध—इस प्रकार के साधक के साध्य-मन्त्र के वीर्य अर्थात् शक्ति के बारे में, जिसका उपक्षेप पहले विकास के २२वें सूत्र में किया है, आगे के सूत्र में बताते हैं ! विद्याशरीरसत्ता मन्त्ररहस्यम् ॥३॥ विद्या—पराद्वयप्रथा (जिसे शब्दराशि—भैरव कहते हैं) शरीर—स्वरूप (है जिसका) सत्ता—(उसकी जो) सत्ता (अर्थात् सारे विश्व के साथ अभेद रखने वाला पूर्णाहन्ता का विमर्शरूप विकास है) मन्त्ररहस्यम्—(वही) मन्त्रों का वीर्य है। व्याख्या—पहले विकास के २२वें सूत्र में शाम्भवोपाय के आधार पर जो बोध- सुधाब्धि के साथ तादात्म्य के विमर्श से पूर्णाहंता में प्रवेश कहा गया है वही अब शाक्तो- पाय के द्वारा शब्दराशि भैरव के स्वरूप में विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के विमर्श के विकास में बताया जाता है। यह अ-क्षकारात्मक पचास अक्षरों की स्थिति रूप सारी शब्दराशि का समन्वय है। इसका विशद वर्णन तन्त्रालोक में मातृकाचक्र तथा न-फकोटि (मालिनी) के वर्णन में आचार्याभिनवगुप्तपाद द्वारा विशद रूप से किया गया है। शब्द ही चराचर में व्याप्त है और इसी से चराचर वाच्य है। यह शब्द हृदय में एक अणु (पश्यन्ती), कण्ठ में दो अणु (मध्यमा) और जिह्वाग्र पर तीन अणु (वैखरी) होकर वर्णों के द्वारा प्रकट होता है। इसकी पर तथा सूक्ष्म शक्ति सब प्राणियों में ठहरी हुई है जो हृदय-बिन्दु (हृद्बिन्दु) अर्थात् चित्त-प्रकाशरूप साढ़े तीन वलय वाली कुण्डलिनी को ढाँप कर सुषुप्त भुजगाकार है। जब प्राणापान संघर्ष-रूप दृढ़ साधना से यह पराशक्ति जाग्रत् होती है तब प्राण-शक्ति समूह से नाद द्वारा प्रकट होती है। अर्थात् पर-ज्ञानरूप निनाद द्वारा प्रबुद्ध होती है और शरीर केन्द्र से बाह्य व्याप्त होती है। यह नाद सचेत साधक को जाग्रत् और स्वप्न तथा स्वप्न और सुषुप्ति की सन्धियों में सुनाई देता है और उसे शुद्ध निर्विषय भाव में अद्वयानन्द की अनुभूति होती है। भगवत्पाद श्री शङ्कराचार्य ने इसका संकेत इस प्रकार किया है :— यद्भावानुभवः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते। अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते तदाद्वयानन्दम्॥ —प्रबोधसुधाकर : श्लोक १६०

१६ : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—निद्रा के आरम्भ में और जाग्रत् के अन्त में जिस शुद्ध और निर्विषय भाव का अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरण में स्थिर हो जाये तो उससे अद्वयानन्द की प्राप्ति होती है । प्राणापान-संघर्ष में दृढ़ाभ्यासी साधक को ब्रह्मवेग से (अर्थात् यह जानने के बिना कि क्या होने वाला है) सूर्यकोटिसम-प्रभा (करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के समान) प्रकाशरूप आकारता का अनुभव होता है । यह पर-ज्ञानरूप नाद है । यही सूक्ष्म कुण्डलिनी का जागरण है । पराशक्ति के उदर में बिन्दु (कुण्डलिनी) की चार कलायें हैं । वे इस प्रकार हैं :— १. प्रमेय-प्रधान पहला वलय २. प्रमाण-प्रधान दूसरा वलय ३. प्रमातृ-प्रधान तीसरा वलय ४. प्रमिति-प्रधान चौथा अर्धवलय (यह परप्रमातृभावरूप अर्धवलय है) इस प्रकार कुण्डलिनी के साढ़े तीन वलय हैं । प्राणापान संघर्ष के द्वारा पराशक्ति जब दो बिन्दुओं अर्थात् मूलाधारचक्र और ब्रह्मारन्ध्र के मध्य सीधी रेखा का रूप धारण करती है तो इसे ज्येष्ठा-शक्ति जानना चाहिये । इस दशा में यह शरीर-दशा से बाहर व्याप्त होती है । यह योगी की समाधि-दशा है । यही इच्छा-ज्ञान-क्रिया रूप त्रिवेणी तीर्थ है । यह प्रकाशरूप दशा वीर्य से प्राप्त होती है । सुप्त अवस्था में मोक्षमार्ग का निरोध करने के कारण इसे रौद्री-शक्ति कहते हैं । यह शक्ति मोह तथा विघ्न-बाधाओं के कारण साधक में पराशक्ति का विकास नहीं होने देती । जब यह परा-शक्ति साधनाभ्यास के स्वाभाविक होने पर योगी की व्युत्थान दशा में भी अन्तर्भूत रहती है तो यह शशाङ्कशकलाकार पूर्णानन्दमय अवस्था ही उसकी पूर्णसिद्धि है । इसे अम्बिका-शक्ति कहते हैं । इस प्रकार एक ही पराशक्ति के त्रिविध रूप हैं । इन्हीं तीन शक्तियों से अ-क्ष माला के नौ वर्ग उत्पन्न हुए । इनकी शक्तिदेवियाँ इस प्रकार हैं :— १. अमा (अ-वर्ग), २. कामा (क-वर्ग), ३. चार्वङ्गी (च-वर्ग), ४. टङ्कधारिणी (ट-वर्ग), ५ तारा (त-वर्ग), ६. पार्वती (प-वर्ग), ७. यक्षिणी (य-वर्ग), ८. शारिका (श-वर्ग) और ९. क्षेमङ्करी (क्ष-वर्ग) । इसे नवार-चक्र कहते हैं । इन नौ वर्गों से पाँच मन्त्रदेवताओं का प्रादुर्भाव हुआ । वे इस तरह हैं :— १. सद्योजात (इच्छा) इ प्रत्यवमर्शनरूप २. तत्पुरुष (आनन्द) लृ विश्रान्तिरूप ३. वामदेव (ज्ञान) उ आनन्दरूप ४. ईशान (चित्) अ स्वाभावरूप ५. अघोर (क्रिया) ऋ प्रकाशरूप

द्वितीय विकास : १७ इसे पंचार-चक्र कहते हैं। अ इ उ दीर्घ स्वरों के साथ मिल कर (अर्थात् क्षोभ को पाकर) जन्मस्थान अथवा बीजस्थान कहलाते हैं। ऋ तथा ऌ अपने दीर्घ स्वरों के साथ भी न बीज हैं न योनि, क्योंकि यह शिवतत्त्व में ही अनादिरूप से आनन्दभोग में मग्न हैं। इस प्रकार इस पंचार-चक्र से पराशक्ति देवी का विस्तार बारह स्वरों में हुआ। फिर व्यञ्जनों की सृष्टि करके वर्णमाला के पचास अक्षरों में विस्तार पाया। परारूप पराशक्ति में यह शब्द-राशि-भैरव सनातन रूप से ब्रह्मरन्ध्र में ठहरा है। यही प्राणी के हृदय में एक अणु से पश्यन्ती के द्वारा, कण्ठ में दो अणुओं से मध्यमा द्वारा और फिर जिह्वामूल में तीन अणुओं से वैखरी के द्वारा प्रकट होता है। इस प्रकार शब्द से ही चर तथा अचर व्याप्त है। अतः परभैरवीय परावाक् शक्तिरूप जो मातृका है वह ज्येष्ठा, रौद्री तथा अम्बा शक्तियों द्वारा विचित्ररूप धारण कर सब वर्णों में उदित हुई है। इन वर्णों के संघट्ट (मेल) का स्वरूप मन्त्रों में प्रकट होता है। वही मन्त्रों की भगवती यहाँ विद्याशरीर- सत्ता का रहस्य कही गई है। इसका साक्षात्कार करके योगी कृतकृत्य बन जाता है क्योंकि उसे शब्दराशि भैरव के स्वरूप में विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के विमर्श का विकास होता है। विषय गहन होने के कारण यदि उपर्युक्त विवरण समझने में कुछ कठिन लगे तो सद्गुरु महाराज की शरण का ही आश्रय लेना उचित है ॥३॥ सम्बन्ध—जिन साधकों को ऊपर कहे हुए के अनुसार पूर्णाहन्ता के विमर्श का विकास परमेश्वर की इच्छा से हृदयङ्गम न हो उन्हें बिन्दुनाद की शक्तियों से उत्पन्न हुई मितसिद्धियों में ही मन ऐसे रमता है जैसे मार्ग में जाता हुआ पथिक अपने ध्येय को भूलकर तृण तथा पर्णों को ही इकट्ठा करने में लगता है (रथ्यां गमने तृणपर्णानि इति नीत्या)। इस विषय का अगले सूत्र में वर्णन किया है। गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः ॥४॥ गर्भे—योगमाया भूमि (अख्याति-रूप महामाया अर्थात् मित मन्त्र- सिद्धियों) के प्रपञ्च में (ही) चित्तविकासः—(जिस के) मन का विकास (अर्थात् जिस का मन प्रसन्न) हो (उसको) अविशिष्टविद्या—(वह) सर्वजन साधारण विद्या अर्थात् किञ्चित् ज्ञान वाली अशुद्धविद्या स्वप्नः—स्वप्न के बराबर ही भ्रमात्मक है अर्थात् उसकी समाधि स्वप्न तुल्य ही है। २

१८ : शिवसूत्र विमर्श व्याख्या—जो साधक ईश्वर-इच्छा से ही उस परप्रमातृभाव पर स्थिति प्राप्त करने में असमर्थ होकर मार्ग के प्रलोभनों में ही रमता है उसका मन योगमाया भूमि (छः मित-सिद्धियों) में प्रसन्न रहता है। यद्यपि उसे किञ्चित् ज्ञानलाभ होता भी है तथापि वह अशुद्धविद्या (अर्थात् सर्व-जन-साधारण विद्या) के ही विशेष चमत्कारों में व्यस्त रहता है और परलाभ से वञ्चित रहता है। उसकी समाधि-दशा वैसी ही भ्रमात्मक है जैसे स्वप्न में पड़ा साधारण जीव । व्युत्थान दशा में वह यद्यपि इन मितसिद्धियों का प्रदर्शन करता है परन्तु समाधि में उसे ये ही विघ्न बन जाती हैं। फलतः ऐसा साधक स्वच्छन्द परमार्थ लाभ से वंचित रह जाता है। पातञ्जल योगदर्शन में कहा है— 'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः' —(३-२७) अर्थ—वे छः प्रकार की मितसिद्धियाँ समाधि की सिद्धि अर्थात् ज्ञानप्राप्ति में विघ्न हैं और व्युत्थान में सिद्धियाँ हैं। ऐसे साधक की देहवासना छूटी नहीं होती है। इस कारण उसकी बिन्दु-नाद की शक्तियों से उत्पन्न हुई मितसिद्धियाँ अस्थायी होती हैं और उसे क्षोभ में डालती रहती हैं। अतः साधक को सचेत रहने की आवश्यकता है। यह सद्गुरु का कृपापात्र बनकर रहने से ही हो सकता है ॥४॥ सम्बन्ध—परन्तु इन मितसिद्धियों के समीप आने पर भी जब योगी ईश्वरकृपा से इनका आश्रय नहीं लेता है और परम स्थिति का ही आलम्बन धारण कर सकता है तो वह परप्रमातृभाव की सहज-स्थिति को पाता है। इसके लिए अगला सूत्र कहा गया है। विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था ॥५॥ विद्यासमुत्थाने—पराद्वयप्रथारूप शुद्धविद्या का उदय स्वाभाविके—स्वाभाविक (सहज) होने पर खेचरी—चिदाकाशगामी खेचरी मुद्रा (में) शिवावस्था—परसंविद्रूप शिव अवस्था (योगी को प्राप्त होती है)। व्याख्या—अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल होने पर योगी शुद्धविद्या को पाता है। यहाँ उसे परम अद्वैत-स्वरूप ज्ञान का उदय होता है। परमेश्वर की इच्छा मात्र से वह अनेक जन्माजित पुण्य-पुञ्जों के फलस्वरूप पराद्वयस्वरूप में मज्जन करता है। यहाँ मित सिद्धियों का अनादर होता है और समस्त मायीय भेद शान्त हो जाते हैं। योगी बोधगगन में विचरण रूप खेचरी मुद्रा के आस्वादन में स्वाभाविकी स्थिति को प्राप्त होता है। यह उसकी पराहंतारूप स्वानन्दपूरित शिवावस्था है। फिर यह स्वाभाविक विद्यासमुत्थान उसे केवल अनुसंधान मात्र से होता है। श्रुति कहती है:—

द्वितीय विकास : १९ 'शरवत् संहितो भवेत्' अर्थ—जिस प्रकार तीर अपने लक्ष्य पर अति वेग से जा लगता है उसी प्रकार ऐसे योगी का चिदात्मस्वरूप में मज्जन होता है, यही योगी की परम सिद्धि है। इसी अवस्था के लिये आचार्य उत्पलदेव ने भगवान् शिव से प्रार्थना की है— त्वद्विलोकनसमुत्कचेतसो योगसिद्धिरियती सदास्तु मे। यद्विशेयमभिसन्धिमात्रत्- स्त्वत्सुधासदनमर्चनाय ते ॥ —(शिवस्तोत्रावली २२-६) अर्थ—हे परमेश्वर ! तुम्हारे दर्शन के लिये उत्कण्ठित हृदयवाले मुझे इतनी सी ही योग-सिद्धि सदा प्राप्त होती रहे कि मैं केवल इच्छा होते हुए ही (अर्थात् जब मैं चाहूँ तब) तुम्हारी पूजा करने के लिए तुम्हारे चिदानन्द-सदन (अर्थात् परमानन्द धाम) में प्रवेश करूँ ॥ ऐसे परम सिद्ध योगी की सिद्धियां उसका अनुसरण करती हैं परन्तु वह उनकी ओर देखता तक भी नहीं। परम भक्त सन्त परमानन्द महाराज ने क्या सुन्दर कविता इस संदर्भ में कश्मीरी भाषा में कही है : 'पत् ल़ारन्स् ऋद् त् सिद्ध स्योद् वुछ्यक् न् जांह्' अर्थ—ऋद्धि और सिद्धि योगी का पीछा करेंगी परन्तु वह उनकी ओर एक आंख भी नहीं देखेगा। श्रुति के अनुसार ऐसे योगी का अनुभव—'सवं इदं अहं च ब्रह्मैव' (अर्थात् यह सर्व चराचर विश्व ओर मैं ब्रह्म ही हैं) इस प्रकार स्वरूप चमत्कार पूर्ण होता है। काश्मीर शैव-दर्शन में इसे कुलमार्ग कहते हैं। कुलरूप परमशिव हैं। 'कुल' का अर्थ है 'विश्वाभेद अवस्था' । इसी से इसको 'कौल' अर्थात् 'त्रिक' नाम दिया गया है। यहाँ सब प्रकार के क्षोभ का लय होता है। इस प्रकार मन्त्रवीर्य स्वरूप के कथन द्वारा मुद्रा- वीर्य का भी संग्रह हो गया। तन्त्रालोक में श्रीअभिनवगुप्तपाद इसे जगदानन्द की संज्ञा देते हैं। यह स्थिति इस प्रकार है :— यत्र कोऽपि व्यवच्छेदो नास्ति यद्विश्वत: स्फुरत् । यदनाहतसंवित्ति परमामृतबृंहितम् ॥ यत्रास्ति भावनादीनां न मुख्या कापि संगतिः । तदेव जगदानन्दमस्मभ्यं शम्भूरुचिवान् ॥ —(तन्त्रालोकः)

२० : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—जिस चिदानन्द दशा में कोई रुकावट न हो, जो [स्वात्मलाभरूप चमत्कार] विकास वाला हो, जहाँ किसी दूसरी अपेक्षा से रहित, प्रमाता-प्रमेयादि रूप से संवित् परिपूर्ण विकसित हो, जिस अवस्था में समाधि, धारणा आदि की कोई विशेष उप- योगिता न हो वही (योगी की) जगदानन्द दशा है ऐसा श्री शम्भुनाथ ने हम (अभिनव गुप्त) से कहा है ॥५॥ सम्बन्ध—अब इस स्थिति की प्राप्ति का उपाय कहते हैं । गुरुरुपायः ॥६॥ उपायः—(इस अवस्था अर्थात् परमसिद्धि की प्राप्ति का) उपाय गुरुः—गुरु (ही हैं) । व्याख्या—मन्त्रवीर्य और खेचरी मुद्रा से सृष्टि बीज हंसः अथवा अहम् और संहार बीज सोऽहं अथवा म ह अ क्रमशः तात्पर्य है । यहाँ सृष्टिबीज की ही प्रधानता कही गई है । इस तात्त्विक अर्थ का जो उपदेश करे उसे गुरु कहते हैं । 'मनुष्य देह- मास्थाय छन्नास्ते परमेश्वरः' (परमेश्वर ही गुरुजनों के रूप में मनुष्य देह में छिपे हुए हैं) । या यों समझना चाहिये कि—'गुर्वी पारमेश्वरी अनुग्राहिका शक्तिः' (गुरु तो परमेश्वर की अनुग्रह करने वाली ही शक्ति है) अतः गुरु, ऊपर कही हुई परमसिद्धि के उपाय का अवकाश देता है, ऐसा स्पष्ट है, (सैवावकाशं ददतीत्युपायः भवति) ॥६॥ सम्बन्ध—अतः गुरु के प्रसाद से ही शिष्य को स्वात्मरूपता का परिज्ञान होता है । वह अहं-परामर्श का तात्त्विक क्रम है । इसका कथन अगले सूत्र में है । मातृकाचक्रसंबोधः ॥७॥ मातृकाचक्र—अहं-परामर्श के तात्त्विक क्रम का । संबोधः—सम्यक् बोध (गुरु की प्रसन्नता से शिष्य को होता है) । व्याख्या—जिन साधारण जनों को स्वरूपज्ञान की चेतना नहीं होती है उनको प्रति- लोमरूप परमेश्वर की जो शक्ति बहिर्मुखता में विषयों की ओर दौड़ाती है उसे मातृका कहते हैं । यही जीव-संसार है । परन्तु जो विरले योगी-जन मन्त्रवीर्य रहस्य को जानकर खेचरी मुद्रा में अ-ह वाचक-वाच्य रूप जगत् (शब्दादि) के शब्दराशि भैरव में सद्गुरु महाराज की प्रसन्नता के फलस्वरूप स्थिति प्राप्त करते हैं उन्हीं को चिदानन्दघन स्व- स्वरूप का सम्यक् ज्ञान अर्थात् समावेश होता है । उनको विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के विमर्श का विकास होता है । अहं-विमर्श दो प्रकार का है । पहला परमशिवरूप स्वरूपान्तर्गत अहं की प्रथम कला है जिसे कुल कहते हैं । इसी को कौल अर्थात् त्रिक.मत से जाना जाता है । दूसरा

द्वितीय विकास : २१ शिवरूप प्रसरोन्मुख द्वितीय कला है जिसे अकुल अर्थात् विमर्शोन्मुख अहं कहते हैं। यहाँ शाक्तोपाय में दूसरे प्रकार के विमर्श से तात्पर्य है, मातृकाचक्र की यत्किञ्चित् व्याख्या इसी विकास के तीसरे सूत्र में की गई है ॥७॥ सम्बन्ध — इस प्रकार अहं परामर्श के तात्त्विक क्रम का सम्यक् बोध प्राप्त करने के लिए योगी चिदग्नि में स्थूल-सूक्ष्मादिरूप शरीर की आहुति देता है। इस पर कहते हैं। शरीरं हविः ॥८॥ शरीरं — (योगी) स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा पररूप शरीर के अहम्भाव की हविः — (चिद्-अग्नि में) आहुति देता है। व्याख्या — देह स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा पर चार प्रकार का है। इस तरह जीव शरीर में चार प्रमाताओं से अभिषिक्त है। वे हैं देह, पुर्यष्टक, प्राण और शून्य । अतः जीव की मितप्रमातृता जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और शून्य अवस्थाओं में रहती है। महा- योगी पूर्णाहन्ता को प्राप्त करने के लिए इन चारों प्रमाताओं को पर प्रमातृरूप चिदग्नि में जब आहुति देता है तब वह कृतकृत्य हो जाता है। अतः देह-प्रमातृता का शमन ही यहाँ तात्पर्य है । गीता जी में कहा है :— बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन् विषयांस्र्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ —(गीताः अध्याय १८; श्लोक ५१-५३) अर्थ—संशय, विपर्यय आदि से विमुक्त बुद्धि से युक्त ब्रह्मवित् यति सात्त्विक धृति से बाह्यविषयों में प्रवृत्त चित्त का निरोध कर, शब्दादि विषयों का त्याग कर (अर्थात् अनुसन्धान न कर) तथा राग और द्वेष का परित्याग कर, जो निर्जन अरण्य आदि देशों में रहता है, परिमित अशन करता है, वाणी, शरीर और मन को वश में रखता है, सदा ध्यान और योग में तत्पर रहता है एवं सदा वैराग्य से पूर्ण रहता है, अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग कर देह आदि में ममतारहित और शान्त रहता है, वह यति ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। स्पन्दशास्त्र में भी कहा हैः— 'यदा क्षोभः प्रलीयेत, तदा स्यात् परमं पदम् ।' —(९)

२२ : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—जब देह में आत्मा के अभिमान करने का 'अहं' पूर्णाहन्ता में लय हो जाये तब योगी की प्रतिष्ठा परम पद में होती है ॥८॥ 'सम्बन्ध—क्योंकि पूर्णता प्राप्त करने तक षट्-कञ्चुक इसके साथ हो रहते हैं अतः; वही योगी: ज्ञानमन्नम् ॥९॥ ज्ञानं—घटपटादि तथा रागद्वेषादि रूप भेदप्रथा के ज्ञान का अन्नम्—ग्रास करने में (तत्पर रहता है) । व्याख्या—पहले विकास के दूसरे सूत्र-'ज्ञानं बन्धः' (द्वैतज्ञान ही बन्धन है)—के अनुसार योगी द्वैतज्ञान को ग्रास करने में तत्पर रहता है। भेदज्ञान बाह्येन्द्रियों द्वारा घटपटादि में होता है और अन्तःकरण द्वारा रागद्वेषादि में प्रकट होता है ! इस अवस्था में यह भेदज्ञान ही योगी के ग्रास करने योग्य अन्न है। सब प्रकार की भेदप्रथा का वह ग्रास करके अद्वयानन्द में मग्न रहता है। श्री भर्गशिखा शास्त्र में कहा है:— 'मृत्युं च कालं च कलाकलापं विकारजातं प्रतिपत्तिसात्म्यम्। ऐकात्म्यनानात्मविकल्पजातं तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥' अर्थ—तब स्वरूप साक्षात्कार के समय वह महायोगी स्थूलदेह के विनाश, महाकाल, क्रियासमूह, हासक्रोधादि द्वन्द्वविकार, भेदप्रथा के ज्ञान से तत्तत् भाव में तन्मय होना, जीवों के साथ एकता और स्थाणु आदि के साथ नानात्व का विकल्प, इन सब को ग्रास करता है। ऐसे उदारचित्त योगिराजों का कुटुम्ब सारी सृष्टि है। कहा भी है : 'उदारचरि- तानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्' । इस सूत्र का दूसरा अर्थ इस प्रकार है— ज्ञानं—स्वरूप विमर्शरूप ज्ञान अन्नम्—(योगी का) पोषक है। व्याख्या—स्वरूपविमर्शरूप ज्ञान ऐसे महायोगी का अन्न है अर्थात् पूर्णरूप से परितृप्त होने से यह स्वरूपज्ञान ही उसकी विश्रान्ति का कारण बन जाता है। इसमें युक्ति प्राप्त करने के लिए श्रीविज्ञानभैरव में कथित एक सौ बारह (११२) धारणाएँ सहायक बन सकती हैं। ऐसा योगी संकोचरहित स्वातन्त्र्यशक्तिसम्पन्न रहता है। 'स्पन्दशास्त्र में कहा है :— “प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत्…………” अर्थ—स्वातन्त्र्यशक्ति सम्पन्न होने से वह महायोगी सदा स्वरूप ज्ञान में प्रबुद्ध रहता है ॥९॥

द्वितीय विकास : २३ सम्बन्ध—परन्तु जब वह योगी सतत रूप से समाहित नहीं रहता है तब ज्ञानवान् होकर भी उसे रुकावट (स्वरूप में स्वेच्छानुसन्धान की कमी) रहती है; इस पर कहते हैं । विद्यासंहारे तदुत्थस्वप्नदर्शनम् ॥१०॥ विद्यासंहारे—शुद्ध विद्या के संहार (लोप) होने पर तदुत्थ—उससे निकल कर स्वप्न--भेदमय विकल्प प्रपञ्च-रूपता में दर्शनम्—मज्जन होता है । व्याख्या—शुद्धविद्या के एक बार उदय होने पर उसका अभ्यास सदा उत्थित रहता है । परन्तु एक बार असावधानी हो तो विक्षेप आता है । योगी तब स्वप्नरूप भेद में जाता है । अर्थात् वह भेदमय विकल्प प्रपञ्च में डूब कर त्रिशङ्कु की तरह, जो शापवश आकाश और पृथ्वी के बीच में लटका रहा, अर्धनिमग्न ही रहता है । वह जाग्रत् के विकल्पमय-भ्रम से स्वप्न में जाता है और पूर्णता से वञ्चित ही रह जाता है । अतः योगी को यहाँ सावधानी से अभ्यास में रहना चाहिये ॥१०॥ इस प्रकार शिवसूत्र का शाक्तोपाय प्रकाश नामक द्वितीय विकास समाप्त हुआ

तृतीय विकास अब आणवोपाय द्वारा शिवस्वरूप के आनन्दानुभव का वर्णन किया जाता है। आणवोपाय का लक्षण मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में इस प्रकार वर्णित है :- उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ —(मा० वि० : अधिकार २ श्लोक २१) अर्थ—प्राणादि पंच प्रवाहों द्वारा उच्चार से, मुद्रा से, ध्वन्याभ्यास से और कदली सम्पुटाकार की तरह हृदयादि देश में धारणा से जो समावेश साधक को होता है उसे आणवोपाय कहते हैं। सम्बन्ध—यह साधारण जीवोपाय है। अणु का अर्थ है जीवात्मा। उसी से आणव अर्थात् जीवात्मा सम्बन्धी अर्थ बनता है। अब आणवोपाय का वर्णन करने की इच्छा से पहले अणु अर्थात् जीव का स्वरूप कहते हैं। आत्मा चित्तम् ॥१॥ आत्मा—लगातार जन्म-जरादि में गमन करने वाला जीवात्मा चित्तम्—विषय वासनाओं से रंगे हुए मन वाला है। व्याख्या—'अत्' धातु सातत्य अर्थात् सतत गमन के अर्थ में लगता है। जो लगातार गमनशील हो उसे आत्मा कहते हैं। जिस प्रकार परमात्मा तीनों कालों (भूत, वर्तमान और भविष्य—स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति) में गमन करता है, अर्थात् एक आत्मा संवित् रूप से स्वयं प्रभा है, उसी प्रकार जीवात्मा भी जन्म-जरादि (स्वप्न- जाग्रदादि) में सत्त्व, रज, तम वृत्तियों से गमन करता रहता है। वही आत्मा मन अर्थात् अन्तःकरण है जो सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण वृत्तियों (निश्चय, विकल्प और अभिमान प्रधान) विषय-वासनाओं, प्रकाश (अविद्या सत्त्व विशेष), चंचलता और आवरण से रंगा हुआ है। वही जीव अथवा अणु कहलाता है जो मन, बुद्धि, अहंकार के व्यापार वाला चित्त है। शाम्भवपरामर्श में यह आत्मा भाव और अभाव रूप जगत् के स्वभाव वाला ज्ञान- रूप क्रिया में स्वतन्त्र है। बोधसुधाब्धि के साथ तादात्म्य होने के कारण आत्मा यहाँ पूर्णाहन्ता में प्रवेश वाला है। चिदेकरूप आत्मा का यहाँ उत्क्रमण (अर्थात् जन्मान्तर

तृतीय विकास : २५ देशान्तरादि में गमन) नहीं होता । 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति अत्रैव समवलीयन्ते-२' इस प्रकार श्रुति कहती है । अतः 'चैतन्यमात्मा'-(१/१) इस प्रकार स्वभावभूत तात्त्विक स्वरूप के प्रतिपादन से यहाँ पूर्णात्मा ही लक्षित होता है । शाक्तपरामर्श में रंगा हुआ यह आत्मा 'चित्तं मन्त्रः' -(२-१), अहं-परामर्श में मग्न आराधन करने वाले का मन है । आणव विमर्श में यह आत्मा मन, बुद्धि, अहंकार के व्यापार वाला चित्त है (आत्मा चित्तम्-३-१) ॥१॥ सम्बन्ध-चित्त के बन्धन का कारण कहते हैं । ज्ञानं बन्धः ॥२॥ ज्ञानं-(सत्त्व, रज, तम रूप विषयवासना का) ज्ञान बन्धः- (भेद प्रथामय होने के कारण) बन्धन है । व्याख्या-सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण की विषय वृत्तियों वाला जीव विषय वासनाओं में रंगा रहता है । इससे उसे भेदमयज्ञान के कारण सुख-दुःख, राग- द्वेष तथा मोह आदि में निश्चय और विकल्प में अभिमान होता है । अतः भेदप्रथा का ज्ञान ही जीव को बन्धन में डाल कर उसे जन्म-मरण के चक्र में यातनादेह धारण करवाता है ॥२॥ सम्बन्ध-यहाँ यह शङ्का होती है कि सर्वशब्द वाच्य ज्ञेयजात ज्ञान से पृथक् नहीं हो सकता, अतः यह ज्ञान कैसे बन्धन का कारण हो सकता है ? इसके समाधान में कहते हैं कि यह बात सत्य है । परन्तु ऐसा तब ही हो सकता है जब योगी को पर- मेश्वर के प्रसाद से इस प्रकार के प्रत्यभिज्ञान का विमर्श हो । किन्तु जब परमेश्वर की मायाशक्ति से ऐसा विमर्श न हो तब माया के प्रभाव से अज्ञान का ज्ञान स्वरूपोपलब्धि में बाधक है । अतः तत्त्वों का अविवेक माया है, यह कहते हैं । कलादीनां तत्त्वानामविवेको माया ॥३॥ कलादीनां - कला तत्त्व से पृथ्वी तत्त्व तक तत्त्वानां - (इन) तत्त्वों का अविवेकः--अज्ञान (ही) माया --माया (कहलाती है) । व्याख्या--मालिनीविजयोत्तर तन्त्र के अनुसार अवरोह-क्रम में परमशिव की स्वा- तन्त्र्य शक्ति से पाँच शक्तियाँ प्रकाशित हैं (१) चित् (२) आनन्द (३) इच्छा (४) ज्ञान

२६ : शिवसूत्र विमर्श और (५) क्रिया। इन शक्तियों के पाँच ऐश्वर्य क्रमशः (१) सर्वज्ञता (२) सर्वकर्तृता (३) पूर्णता (४) नित्यता और (५) सर्वव्यापकता हैं। यही शक्तियाँ मायाशक्ति द्वारा क्रमशः (१) विद्या (२) कला (३) राग (४) काल और (५) नियति में परिवर्तित होती हैं। उपरोक्त ऐश्वर्य फलतः पाँच गुणों में परिवर्तित होते हैं। यह गुण क्रमशः इस प्रकार हैं-- (१) अल्पज्ञता (२) अल्पकर्तृता (३) अपूर्णता (४) अनित्यता तथा (५) नियति (अर्थात् नियतरूपता) यह गुण मायाशक्ति के प्रभाव से अज्ञान का ही बोध कराने वाले हैं। इनके साथ साथ तीन मलों अर्थात् कोशत्रय का उद्भव होता है। वे तीन मल इस प्रकार हैं-- (१) आणव मल-इस मल से स्वातन्त्र्य का अभाव अर्थात् अपूर्णता का अनुभव होने लगता है-स्वरूप के अन्दर नहीं रहा जा सकता है। (२) मायीय मल-इस मल से भिन्न वेद्य प्रथा अर्थात् द्वैत प्रथा का भान होने लगता है। (३) कार्म मल-इस मल से कर्माशय के कारण शुभ और अशुभ वासनाएँ प्रकट होती हैं और स्थूल शरीरों का आश्रय लिया जाता है। ऐसे ही छत्तीस तत्त्वों का विकास होने में आता है। परमशिव ने अवरोह क्रम में सात प्रमाता प्रकाशमान किये, जिनके अन्तर्गत छत्तीस (३६) तत्त्व, सात (७) अवस्थायें, परामर्श और वाणी के चार रूप हैं। इनकी तालिका यहाँ पाठकों के सुबोधार्थ दी जाती है :-- छत्तीस तत्त्व इस प्रकार हैं-- १. शिव } | १४. अहंकार २७. शब्द ] पंच २. शक्ति } | १५. बुद्धि २८. स्पर्श ] तन्मा- ३. सदाशिव } शुद्धाध्वा १६. मन २९. रूप } त्राणि- ४. ईश्वर } १७. श्रोत्र } ३०. रस ] ५. शुद्ध विद्या ] १८. त्वक् } पंच ३१. गन्ध ] ६. माया (माया तथा महामाया) १९. चक्षु } ज्ञाने- ३२. आकाश ] ७. कला ] २०. जिह्वा } न्द्रिय ३३. वायु ] पंच ८. विद्या ] पंच २१. घ्राण } ३४. अग्नि ] भूतानि ९. राग } कञ्चुक २२. वाक् } ३५. जल ] १०. काल ] २३. पाणि } पंच ३६. पृथिवी ] ११. नियति ] २४. पाद } कर्में- १२. पुरुष २५. पायु } न्द्रिय १३. प्रकृति २६. उपस्थ }

तृतीय विकास : २७ तत्त्वान्तर्गत प्रमाता अवस्था परामर्श वाणी १ २ ३ ४ १. शिव प्रमाता अनाख्य — परा (शक्ति के साथ अभिन्न तत्त्व) २. मन्त्रमहेश्वर प्रमाता तुर्यातीत अहमिदम् (सदाशिव तत्त्व) ३. मन्त्रेश्वर प्रमाता तुर्य इदमहम् पश्यन्ती (ईश्वर तत्त्व) ४. मन्त्र प्रमाता तुर्यारम्भ इदमिदमहमहम् (शुद्धविद्या तत्त्व) यह यहाँ तक शुद्धाध्वा कहलाते हैं । अब आगे अशुद्धाध्वा बतलाते हैं । ५. विज्ञानाकल प्रमाता★. सविद्यशून्य आणवमल (माया और महामाया, दोनों माया तत्त्व के अन्तर्गत) ६. प्रलयाकल प्रमाता सुषुप्ति आणव तथा मध्यमा (कला से पुरुष-तत्त्व तक) मायीय मल (सुखमहम् अस्वाप्सम्) ७. सकल प्रमाता जाग्रत्-स्वप्न आणव, मायीय (प्रकृति से पृथ्वी तक) तथा वैखरी २४ तत्त्व कार्ममल इस प्रकार कला से पृथ्वी तत्त्व तक यह तीस तत्त्व मायाकार्य होने के कारण स्व- रूपोपलब्धि में बाधक होते हैं । अज्ञान का आवरण यथार्थ स्वरूप को ढंक लेता है। इसी अज्ञान अथवा तत्त्वों के अविवेक को माया कहते हैं ॥३॥ सम्बन्ध—अतः इस माया के प्रशमन के लिए यहाँ उपाय कहते हैं । यह आत्म- व्याप्ति का प्रकरण है। इसमें समाधि में ही आत्मलाभ का सुख मिलता है। शरीरे संहारः कलानाम् ॥४॥ शरीरे—स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरों में कलानाम्—पृथ्वी में शिव तत्त्व तक सब तत्त्व भागों का संहारः—अपने कारण में लय-भावना द्वारा (व्यक्तियों से ध्यान करना चाहिए) । व्याख्या—महाभूत, पुर्यष्टक और समना तक जो स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर हैं उनमें पृथ्वी से शिव तत्त्व तक सब कला-भागों का प्रतिलोम-वृत्ति से एक का दूसरे में, दूसरे का तीसरे में, इस प्रकार लय-भावना द्वारा ध्यान करना चाहिये जब तक अन्त ★ यहाँ अनुसन्धान करने पर अनुसन्धान तथा न करने पर बहिर्मुखता ही रहती है।

२८ : शिवसूत्र विमर्श में मन का स्वकारण में लय हो । इसे लय-चिन्तनाभ्यास कहते हैं। जैसे विज्ञान- भैरव में कहा है :- भुवनाध्वादिरूपेण चिन्तयेत्क्रमशोऽखिलम् । स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या यावदन्ते मनोलयः ॥श्लोक५६॥ अर्थ—भुवन, तत्त्व, कला, पद, मन्त्र और वर्ण षडध्वाओं का वाच्य-वाचक व्यक्ति के रूप में प्रतिलोम के क्रम से चिन्तन करना चाहिए । इस प्रकार इस चराचर जगत् का स्थूल से सूक्ष्म में और सूक्ष्म से सूक्ष्मतर में तब तक लय-चिन्तन का अभ्यास करते रहना चाहिए जब तक अन्त में मन चित्स्वरूप में विलीन न हो । इस प्रकार के अभ्यास का वर्णन वेदान्त में भी कहा गया है। योग-वासिष्ठ में यह वाल्मीकि-भरद्वाज संवाद के अन्तर्गत स्पष्टरूप से मिलता है:— व्यस्तेन च समस्तेन व्यापिना ग्रथितं जगत् । क्षितिं चाप्सु समावेश्य सलिलं चाऽनले क्षिपेत् ॥ अग्निं वायौ समावेश्य वायुं च नभसि क्षिपेत् । नभश्च महादाकाशे समस्तोत्पत्तिकारणे ॥ स्थित्वा तस्मिन् क्षणं योगो लिङ्गमात्रशरीरदृक् । .................................................... ............................................ ततोऽर्धोऽण्डाद्बहिर्यातिस्तत्राऽऽत्मास्मीति चिन्तयेत् ॥ —(निर्वाण प्र०, पूर्वार्ध सर्गः २२८ श्लोक २६-२९) अर्थ—पञ्चीकृत या अपञ्चीकृत आकाश से यह सारा जगत् ग्रथित है । योगी को चाहिए कि वह पृथिवी का जल में लय करके उस जल को फिर तेज में लीन कर दे । तेज को वायु में विलीन करके उस वायु को फिर आकाश में विलीन कर दे और आकाश को समस्त स्थूल प्रपञ्चों की उत्पत्ति के कारणभूत हिरण्यगर्भाकाश में विलीन कर दे । उस हिरण्यगर्भाकाश में एक मात्र लिङ्गशरीर धारण कर योगी क्षण भर स्थित रहे ।........ तदनन्तर स्थूल उपाधि का लय हो जाने से अर्धशरीर से सम्पन्न हुआ सा वह योगी ब्रह्माण्डरूपता के अभिमान का त्याग करके उस से बाहर निकल कर सूक्ष्मभूतात्मक लिङ्गसमष्टि देह में 'मैं ही आत्मरूप अधिष्ठाता हिरण्यगर्भ हूँ' यों चिन्तन करे । आदि ।। दाह-चिन्तन प्रकार से ध्यान आगमों में इस प्रकार कहा है— कालाग्निना कालपदादुत्थितेन स्वकं पुरम् । प्लुष्टं विचिन्तयेदन्ते शान्ताभासः प्रजायते ॥ --(वि० भै० श्लोक ५२) अर्थ--रंबीजयुक्त कालाग्निरुद्र की ज्वाला वामपादाङ्गुष्ठ [बायें पैर के अंगूठे] से उठती हुई अपने सारे शरीर को जलाती है ऐसा चिन्तन करे । अन्त में शान्त आभास प्रकट होता है ।

तृतीय विकास : २९ आणवोपाय से ध्यानादि श्रीमालिनीविजय तन्त्र में कहा है ।-- उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ अर्थ--प्राणादि पंच द्वारा उच्चार से, खेचरी आदि मुद्रा से, ध्वन्याभ्यास से कदली सम्पुटाकार की तरह हृदयादि में धारणा से जो पूर्ण समावेश हो उसे आणवोपाय द्वारा ध्यान कहते हैं । इसका पर्यवसान शाक्तोपाय में होता है । ऐसी किसी भी युक्ति से जो गुरूपदिष्ट हो लय-भावना द्वारा ध्यान करने से माया का प्रशमन होता है ॥४॥ सम्बन्ध--आणवोपाय से ध्यान की विधि कहकर अब उसके योग (अप्राप्त को पाना) और क्षेम (प्राप्त किये की रक्षा) देने वाले प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार और समाधि कहते हैं । नाडीसंहार-भूतजय-भूतकैवल्य-भूतपृथक्त्वानि ॥ ५ ॥ नाडीसंहार—प्राणापानादि का मध्यनाडी (सुषुम्ना) में संहार अर्थात् लय करना (प्राणायाम), भूतजय—पृथ्वी आदि भूतों का धारणाओं से वश करना (धारणा), भूतकैवल्य—पंचभूतों का आत्मा से अलग करना अर्थात् चित्त का भूतों से हटाना (प्रत्याहार) और भूतपृथक्त्वानि—पंचभूतों से पृथक् होकर निर्मल तथा स्वच्छन्द चिदात्मा में वास करना (समाधि) —योगी को यह भावनाएँ करनी चाहिए । व्याख्या—आत्मव्याप्ति दृढ़ करने के लिए अन्य साधन हैं । (१) नाडीसंहार के प्रकार में प्राण, अपान, समान आदि मध्यनाडी (सुषुम्ना) में लय करना है । इसके लिए सामान्य (बाह्य) दो प्राणायाम और विशेष (आभ्यन्तर) एक प्राणायाम कहे गये हैं । क—सामान्य (बाह्य) प्राणायाम दायें नासापुट को दायें हाथ के अंगूठे से बन्द करके बायें नासापुट से वायु धीरे-धीरे अन्दर लेना चाहिये । इसे पूरक कहते हैं । फिर बायें नासापुट को मध्यमा अंगुली से बन्द करके दायें नासापुट से वायु धीरे-धीरे बाहर छोड़ देना चाहिये । इसे रेचक कहते हैं। इस प्रकार तीन से पांच बार तक सामान्य रूप से करना चाहिये । इसके निरन्तर अभ्यास करने से नाडी-शोधन होता है अर्थात् मोक्षमार्ग के मध्य-धाम का विकास होता है । ख—सामान्य (बाह्य) प्राणायाम ऊपर कहे हुए के अनुसार पूरक करके ही वायु को यथाशक्ति कुछ देर अन्दर ही रोके रखना चाहिये । इसे प्राण-निरोध कहते हैं और यह कुम्भक है । इसके उपरान्त रेचक करना चाहिये ।