श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- किष्किन्धाकाण्ड *
७०७
जामवंत अंगद दुख देखी। कहीं कथा उपदेस बिसेषी॥ तात राम कहूं नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु॥
जाम्बवान्ने अंगदका दुःख देखकर विशेष उपदेशकी कथाएँ कहीं। [वे बोले—] हे तात! श्रीरामजीको मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो॥६॥
हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥
हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, जो निरन्तर सगुण ब्रह्म (श्रीरामजी) में प्रीति रखते हैं॥७॥
दो०—निज इच्छां प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिँ मोच्छ सब त्यागि॥२६॥
देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणोंके लिये प्रभु अपनी इच्छासे [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोपासक [भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकारके मोक्षोंको त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं॥२६॥
एहि बिधि कथा कहहिँ बहु भाँती। गिरि कंदराँ सुनी संपाती॥ बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा॥
इस प्रकार जाम्बवान् बहुत प्रकारसे कथाएँ कह रहे हैं। इनकी बातें पर्वतकी कन्दरामें सम्पातीने सुनीं। बाहर निकलकर उसने बहुत-से वानर देखे। [तब वह बोला—] जगदीश्वरने मुझको घर बैठे बहुत-सा आहार भेज दिया!॥१॥
आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ॥ कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिँ बारा॥
आज इन सबको खा जाऊँगा। बहुत दिन बीत गये, भोजनके बिना मर रहा था। पेटभर भोजन कभी नहीं मिलता। आज विधाताने एक ही बारमें बहुत-सा भोजन दे दिया॥२॥
डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना॥ कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी॥
गीधके वचन कानोंसे सुनते ही सब डर गये कि अब सचमुच ही मरना हो गया, यह हमने जान लिया। फिर उस गीध (सम्पाती) को देखकर सब वानर उठ खड़े हुए। जाम्बवान्के मनमें विशेष सोच हुआ॥३॥
कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं॥ राम काज कारन तनु त्यागी। हरि पुर गयउ परम बड़भागी॥
अंगदने मनमें विचारकर कहा—अहा! जटायुके समान धन्य कोई नहीं है। श्रीरामजीके कार्यके लिये शरीर छोड़कर वह परम बड़भागी भगवान्के परमधामको चला गया॥४॥
७०८
- रामचरितमानस *
सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी ॥ तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई । कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई ॥
हर्ष और शोकसे युक्त वाणी (समाचार) सुनकर वह पक्षी (सम्पाती) वानरोंके पास आया। वानर डर गये। उनको अभय करके (अभय-वचन देकर) उसने पास जाकर जटायुका वृत्तान्त पूछा, तब उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनायी ॥५॥
सुनि संपाति बंधु कै करनी । रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी ॥
भाई जटायुकी करनी सुनकर सम्पातीने बहुत प्रकारसे श्रीरघुनाथजीकी महिमा वर्णन की ॥६॥
दो०—मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि ।
बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि ॥ २७ ॥
[उसने कहा—] मुझे समुद्रके किनारे ले चलो, मैं जटायुको तिलाञ्जलि दे दूँ। इस सेवाके बदले मैं तुम्हारी वचनसे सहायता करूँगा (अर्थात् सीताजी कहाँ हैं सो बतला दूँगा) जिसे तुम खोज रहे हो उसे पा जाओगे ॥ २७ ॥
अनुज क्रिया करि सागर तीरा । कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा ॥
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उड़ाई ॥
समुद्रके तीरपर छोटे भाई जटायुकी क्रिया (श्राद्ध आदि) करके सम्पाती अपनी कथा कहने लगा—हे वीर वानरो! सुनो, हम दोनों भाई उठती जवानीमें एक बार आकाशमें उड़कर सूर्यके निकट चले गये ॥ १ ॥
तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मैं अभिमानी रबि निअरावा ॥
जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ॥
वह (जटायु) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया। (किन्तु) मैं अभिमानी था इसलिये सूर्यके पास चला गया। अत्यन्त अपार तेजसे मेरे पंख जल गये। मैं बड़े जोरसे चीख मारकर जमीनपर गिर पड़ा ॥ २ ॥
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही । लागी दया देखि करि मोही ॥
बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा । देहजनित अभिमान छड़ावा ॥
वहाँ चन्द्रमा नामके एक मुनि थे। मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी। उन्होंने बहुत प्रकारसे मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित (देहसम्बन्धी) अभिमानको छुड़ा दिया ॥ ३ ॥
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही । तासु नारि निसिचर पति हरिही ॥
तासु खोज पठइहि प्रभु दूता । तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता ॥
- किष्किन्धाकाण्ड *
७०९
[उन्होंने कहा—] त्रेतायुगमें साक्षात् परब्रह्म मनुष्यशरीर धारण करेंगे। उनकी स्त्रीको राक्षसोंका राजा हर ले जायगा। उसकी खोजमें प्रभु दूत भेजेंगे। उनसे मिलनेपर तू पवित्र हो जायगा ॥ ४ ॥
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता। तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता ॥ मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू। सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू ॥
और तेरे पंख उग आयेंगे; चिन्ता न कर। उन्हें तू सीताजीको दिखा देना। मुनिकी वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर तुम प्रभुका कार्य करो ॥ ५ ॥
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहैं रह रावन सहज असंका ॥ तहैं असोक उपवन जहैं रहई। सीता बैठि सोच रत अहई ॥
त्रिकूट पर्वतपर लङ्का बसी हुई है। वहाँ स्वभावहीसे निडर रावन रहता है। वहाँ अशोक नामका उपवन (बगीचा) है, जहाँ सीताजी रहती हैं। [इस समय भी] वे सोचमें मग्न बैठी हैं ॥ ६ ॥
दो०—मैं देखउँ तुम्ह नहीं गीधहि दृष्टि अपार। बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार ॥ २८ ॥
मैं उन्हें देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते; क्योंकि गीधकी दृष्टि अपार होती है (बहुत दूरतक जाती है)। क्या करूँ? मैं बूढ़ हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ तो सहायता अवश्य करता ॥ २८ ॥
जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर ॥ मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा ॥
जो सौ योजन (चार सौ कोस) समुद्र लॉघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा वही श्रीरामजीका कार्य कर सकेगा। [निराश होकर घबराओ मत] मुझे देखकर मनमें धीरज धरो। देखो, श्रीरामजीकी कृपासे [देखते-ही-देखते] मेरा शरीर कैसा हो गया (बिना पाँखका बेहाल था, पाँख उगनेसे सुन्दर हो गया) !! १ ॥
पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं ॥ तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई ॥
पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अत्यन्त अपार भवसागरसे तर जाते हैं, तुम उनके दूत हो, अतः कायरता छोड़कर श्रीरामजीको हृदयमें धारण करके उपाय करो ॥ २ ॥
अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ ॥ निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा ॥
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! इस प्रकार कहकर जब गीध चला गया, तब उन (वानरों) के मनमें अत्यन्त विस्मय हुआ। सब किसीने अपना-अपना बल कहा! पर समुद्रके पार जानेमें सभीने सन्देह प्रकट किया ॥ ३ ॥
७१०
- रामचरितमानस *
जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा । नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा ॥ जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी । तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी ॥
ऋक्षराज जाम्बवान् कहने लगे—मैं अब बूढ़ा हो गया। शरीरमें पहलेवाले बलका लेश भी नहीं रहा। जब खरारि (खरके शत्रु श्रीराम) वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझमें बड़ा बल था ॥ ४ ॥
दो०—बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ।
उभय घरी महाँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ ॥ २९ ॥
बलिके बाँधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीरका वर्णन नहीं हो सकता, किन्तु मैंने दो ही घड़ीमें दौड़कर [उस शरीरकी] सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं ॥ २९ ॥
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा । जियँ संसय कछु फिरती बारा ॥
जामवंत कह तुम्ह सब लायक । पठइअ किमि सबही कर नायक ॥
अंगदने कहा—मैं पार तो चला जाऊँगा। परन्तु लौटते समयके लिये हृदयमें कुछ सन्देह है। जाम्बवान्ने कहा—तुम सब प्रकारसे योग्य हो। परन्तु तुम सबके नेता हो, तुम्हें कैसे भेजा जाय ? ॥ १ ॥
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना । का चुप साधि रहेहु बलवाना ॥
पवन तनय बल पवन समाना । बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ॥
ऋक्षराज जाम्बवान्ने श्रीहनुमान्जीसे कहा—हे हनुमान्! हे बलवान्! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवनके पुत्र हो और बलमें पवनके समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञानकी खान हो ॥ २ ॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं । जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ॥
राम काज लगि तव अवतारा । सुनतहिं भयउ पर्वताकारा ॥
जगत्में कौन-सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्रीरामजीके कार्यके लिये ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्जी पर्वतके आकारके (अत्यन्त विशालकाय) हो गये ॥ ३ ॥
कनक बरन तन तेज बिराजा । मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा ॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा । लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा ॥
उनका सोनेका-सा रंग है, शरीरपर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतोंका राजा सुमेरु हो। हनुमान्जीने बार-बार सिंहनाद करके कहा—मैं इस खारे समुद्रको खेलमें ही लाँघ सकता हूँ ॥ ४ ॥
सहित सहाय रावनहि मारी । आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी ॥
जामवंत मैं पूछउँ तोही । उचित सिखावनु दीजहु मोही ॥
और सहायकोंसहित रावणको मारकर त्रिकूट पर्वतको उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना [कि मुझे क्या करना चाहिये] ॥ ५ ॥
- किष्किन्धाकाण्ड *
७११
एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥ तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥
[जाम्बवान्ने कहा—] हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजीको देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्रीरामजी अपने बाहुबलसे [ही राक्षसोंका संहार कर सीताजीको ले आयेंगे, केवल] खेलके लिये ही वे वानरोंकी सेना साथ लेंगे॥ ६ ॥
छं०—कपि सेन संग सँधारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं। त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं॥ जो सुनत गावत कहत समुद्गत परम पद नर पावई। रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥
वानरोंकी सेना साथ लेकर राक्षसोंका संहार करके श्रीरामजी सीताजीको ले आयेंगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान्के तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाले सुन्दर यशका बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझनेसे मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीरके चरणकमलका मधुकर (भ्रमर) तुलसीदास गाता है।
दो०— भव भेषज रघुनाथजसु सुनहिंजे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥ ३० ( क )॥
श्रीरघुवीरका यश भव (जन्म-मरण)-रूपी रोगकी [अचूक] दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिराके शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथोंको सिद्ध करेंगे॥ ३० ( क )॥
सो०—नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक। सुनिअतासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥ ३० ( ख )॥
जिनका नीले कमलके समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियोंको मारनेके लिये बधिक (व्याध) के समान है, उन श्रीरामके गुणोंके समूह (लीला) को अवश्य सुनना चाहिये॥ ३० ( ख )॥
मासपारायण, तेईसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्भामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने चतुर्थः सोपानः समाप्तः।
कलियुगके समस्त पापोंके नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका
यह चौथा सोपान समाप्त हुआ।
( किष्किन्धाकाण्ड समाप्त )
लङ्कादहन
अदृहास करि गर्जा कपि बद्धि लाग अकास ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस
पञ्चम सोपान
सुन्दरकाण्ड
श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् । रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १ ॥
शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणोंसे परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजीसे निरन्तर सेवित, वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, सर्वव्यापक, देवताओंमें सबसे बड़े, मायासे मनुष्यरूपमें दीखनेवाले, समस्त पापोंको हरनेवाले, करुणाकी खान, रघुकुलमें श्रेष्ठ तथा राजाओंके शिरोमणि, राम कहलानेवाले जगदीश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिवोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥
हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अन्तरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदयमें दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिये और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिये ॥ २ ॥
७१४
- रामचरितमानस *
अतुलितबलधामं
हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं
ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं
वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं
वातजातं नमामि ॥ ३ ॥
अतुल बलके धाम, सोनेके पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [को ध्वंस करने] के लिये अग्निरूप, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणोंके निधान, वानरोंके स्वामी, श्रीरघुनाथजीके प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३ ॥
जामवंत के बचन सुहाए । सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कंद मूल फल खाई ॥
जाम्बवान्के सुन्दर वचन सुनकर हनुमान्जीके हृदयको बहुत ही भाये। [वे बोले—] हे भाई! तुमलोग दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर तबतक मेरी राह देखना ॥ १ ॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी । होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥
जबतक मैं सीताजीको देखकर [लौट] न आऊँ। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदयमें श्रीरघुनाथजीको धारण करके हनुमान्जी हर्षित होकर चले ॥ २ ॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर । कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ॥ बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥
समुद्रके तीरपर एक सुन्दर पर्वत था। हनुमान्जी खेलसे ही (अनायास ही) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार श्रीरघुवीरका स्मरण करके अत्यन्त बलवान् हनुमान्जी उसपरसे बड़े वेगसे उछले ॥ ३ ॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता । चलेउ सो गा पाताल तुरंता ॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना । एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥
जिस पर्वतपर हनुमान्जी पैर रखकर चले (जिसपरसे वे उछले), वह तुरंत ही पातालमें धँस गया। जैसे श्रीरघुनाथजीका अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमान्जी चले ॥ ४ ॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी । तैं मैनाक होहि श्रमहारी ॥
समुद्रने उन्हें श्रीरघुनाथजीका दूत समझकर मैनाक पर्वतसे कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करनेवाला हो (अर्थात् अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे) ॥ ५ ॥
- सुन्दरकाण्ड *
७१५
दो०—हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥ १ ॥
हनुमान्जीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा—भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ? ॥ १ ॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जाँनै कहूँ बल बुद्धि बिसेषा ॥ सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥
देवताओंने पवनपुत्र हनुमान्जीको जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल-बुद्धिको जाननेके लिये (परीक्षार्थ) उन्होंने सुरसा नामक सर्पोंकी माताको भेजा, उसने आकर हनुमान्जीसे यह बात कही— ॥ १ ॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥ राम काजु करि फिरि मैं आवौँ। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौँ ॥
आज देवताओंने मुझे भोजन दिया है। यह बचन सुनकर पवनकुमार हनुमान्जीने कहा—श्रीरामजीका कार्य करके मैं लौट आऊँ और सीताजीकी खबर प्रभुको सुना दूँ, ॥ २ ॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ॥ कवनेहूँ जतन देइ नहीं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥
तब मैं आकर तुम्हारे मुँहमें घुस जाऊँगा [तुम मुझे खा लेना]। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपायसे उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान्जीने कहा—तो फिर मुझे खा न ले ॥ ३ ॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥ सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ॥
उसने योजनभर (चार कोसमें) मुँह फैलाया। तब हनुमान्जीने अपने शरीरको उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजनका मुख किया। हनुमान्जी तुरंत ही बत्तीस योजनके हो गये ॥ ४ ॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा ॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥
जैसे-जैसे सुरसा मुखका विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान्जी उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन (चार सौ कोसका) मुख किया। तब हनुमान्जीने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया ॥ ५ ॥
७१६
- रामचरितमानस *
बदन पड़ठि पुनि बाहेर आवा । मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा । बुधि बल मरमु तोर मैं पावा ॥
और वे उसके मुखमें घुसकर [तुरंत] फिर बाहर निकल आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। [उसने कहा—] मैंने तुम्हारे बुद्धि-बलका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओंने मुझे भेजा था ॥ ६ ॥
दो०—राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥ २ ॥
तुम श्रीरामचन्द्रजीका सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धिके भण्डार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब हनुमानजी हर्षित होकर चले ॥ २ ॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई । करि माया नभु के खग गहई ॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं । जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥
समुद्रमें एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंको पकड़ लेती थी। आकाशमें जो जीव-जन्तु उड़ा करते थे, वह जलमें उनकी परछाई देखकर ॥ १ ॥
गहड़ छाहँ सक सो न उड़ाई । एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥
सोइ छल हनुमान कहँ कीन्हा । तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥
उस परछाईको पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे [और जलमें गिर पड़ते थे] इस प्रकार वह सदा आकाशमें उड़नेवाले जीवोंको खाया करती थी। उसने वही छल हनुमानजीसे भी किया। हनुमानजीने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया ॥ २ ॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा । बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा । गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥
पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्रीहनुमानजी उसको मारकर समुद्रके पार गये। वहाँ जाकर उन्होंने वनकी शोभा देखी। मधु (पुष्परस) के लोभसे भौरें गुज़ार कर रहे थे ॥ ३ ॥
नाना तरु फल फूल सुहाए । खग मृग बृंद देखि मन भाए ॥
सैल बिसाल देखि एक आगें । ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें ॥
अनेकों प्रकारके वृक्ष फल-फूलसे शोभित हैं। पक्षी और पशुओंके समूहको देखकर तो वे मनमें [बहुत ही] प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी भय त्यागकर उसपर दौड़कर जा चढ़े ॥ ४ ॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई । प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी । कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥
- सुन्दरकाण्ड *
७१७
[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! इसमें वानर हनुमान्की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभुका प्रताप है, जो कालको भी खा जाता है। पर्वतपर चढ़कर उन्होंने लङ्का देखी। बहुत ही बड़ा किला है, कुछ कहा नहीं जाता ॥ ५ ॥
अति उत्तंग जलनिधि चहु पासा । कनक कोट कर परम प्रकासा ॥
वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोनेके परकोटे (चहारदीवारी) का परम प्रकाश हो रहा है ॥ ६ ॥
छं०— कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना । चउहद्वु हद्वु सुबद्वु बीर्थीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरुथन्हि को गनै । बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥
विचित्र मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकारसे सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरोंके समूह तथा पैदल और रथोंके समूहोंको कौन गिन सकता है! अनेक रूपोंके राक्षसोंके दल हैं, उनकी अत्यन्त बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती ॥ १ ॥
बन बाग उपवन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं । नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं । नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं ॥
वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वोंकी कन्याएँ अपने सौन्दर्यसे मुनियोंके भी मनोंको मोहे लेती हैं। कहीं पर्वतके समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान् मल्ल (पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ोंमें बहुत प्रकारसे भिड़ते और एक-दूसरेको ललकारते हैं ॥ २ ॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं । कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही । रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥
७१८
- रामचरितमानस *
भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानीसे) नगरकी चारों दिशाओंमें (सब ओरसे) रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे हैं। तुलसीदासने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके बाणरूपी तीर्थमें शरीरोंको त्यागकर परमगति पावेंगे ॥ ३ ॥
दो०—पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौँ निसि नगर करौँ पड़सार ॥ ३ ॥
नगरके बहुसंख्यक रखवालोंको देखकर हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धरूँ और रातके समय नगरमें प्रवेश करूँ ॥ ३ ॥
मसक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥
हनुमान्जी मच्छड़के समान (छोटा-सा) रूप धारण कर नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके लङ्काको चले। [लङ्काके द्वारपर] लङ्किनी नामकी एक राक्षसी रहती थी। वह बोली—मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है? ॥ १ ॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा । मोर अहार जहाँ लंगि चोरा ॥
मुठिका एक महा कपि हनी । रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥
हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहाँतक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी ॥ २ ॥
पुनि संभारि उठी सो लंका । जोरि पानि कर बिनय ससंका ॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा । चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥
वह लङ्किनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली—] रावणको जब ब्रह्माजीने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसोंके विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि— ॥ ३ ॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे । तब जानेसु निसिचर संधारे ॥
तात मोर अति पुन्य बहूता । देखेउँ नयन राम कर दूता ॥
जब तू बंदरके मारनेसे व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसोंका संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्रीरामचन्द्रजीके दूत (आप) को नेत्रोंसे देख पायी ॥ ४ ॥
दो०—तात स्वर्ग अपर्बर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥ ४ ॥
- सुन्दरकाण्ड *
७११
हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़ेपर रखे हुए] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण)-मात्रके सत्सङ्गसे होता है ॥ ४ ॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा । हृदयँ राखि कोसलपुर राजा ॥ गरल सुधा रिपु करहिं मितार्ई । गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥
अयोध्यापुरीके राजा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखे हुए नगरमें प्रवेश करके सब काम कीजिये। उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गायके खुरके बराबर हो जाता है, अग्निमें शीतलता आ जाती है ॥ १ ॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही । राम कृपा करि चितवा जाही ॥ अति लघु रूप धरेउ हनुमाना । पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥
और हे गरुड़जी! सुमेरु पर्वत उसके लिये रजके समान हो जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने एक बार कृपा करके देख लिया। तब हनुमान्जीने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान्का स्मरण करके नगरमें प्रवेश किया ॥ २ ॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा । देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥ गयउ दसानन मंदिर माहीं । अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ॥
उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महलकी खोज की। जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे। फिर वे रावणके महलमें गये। वह अत्यन्त विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता ॥ ३ ॥
सयन किऐँ देखा कपि तेही । मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ॥ भवन एक पुनि दीख सुहावा । हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ॥
हनुमान्जीने उस (रावण) को शयन किये देखा; परन्तु महलमें जानकीजी नहीं दिखायी दीं। फिर एक सुन्दर महल दिखायी दिया। वहाँ (उसमें) भगवान्का एक अलग मन्दिर बना हुआ था ॥ ४ ॥
दो०—रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ ॥ ५ ॥
वह महल श्रीरामजीके आयुध (धनुष-बाण) के चिह्नोंसे अङ्कित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन-नवीन तुलसीके वृक्ष-समूहोंको देखकर कपिराज श्रीहनुमान्जी हर्षित हुए ॥ ५ ॥
लंका निसिचर निकर निवासा । इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥ मन महुँ तरक करें कपि लागा । तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥
७२०
- रामचरितमानस *
लङ्का तो राक्षसोंके समूहका निवासस्थान है। यहाँ सज्जन (साधु पुरुष) का निवास कहाँ? हनुमान्जी मनमें इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे ॥ १ ॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥ एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी । साधु ते होइ न कारज हानी ॥
उन्होंने (विभीषणने) रामनामका स्मरण (उच्चारण) किया। हनुमान्जीने उन्हें सज्जन जाना और हृदयमें हर्षित हुए। [हनुमान्जीने विचार किया कि] इनसे हठ करके (अपनी ओरसे ही) परिचय करूँगा, क्योंकि साधुसे कार्यकी हानि नहीं होती [प्रत्युत लाभ ही होता है] ॥ २ ॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए । सुनत बिभीषन उठि तहाँ आए ॥ करि प्रनाम पूँछी कुसलाई । बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥
ब्राह्मणका रूप धरकर हनुमान्जीने उन्हें वचन सुनाये (पुकारा)। सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आये। प्रणाम करके कुशल पूछी [और कहा कि] हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा समझाकर कहिये ॥ ३ ॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महाँ कोई । मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥ की तुम्ह रामु दीन अनुरागी । आयहु मोहि करन बड़भागी ॥
क्या आप हरिभक्तोंमेंसे कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदयमें अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनोंसे प्रेम करनेवाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने (घर-बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं? ॥ ४ ॥
दो०—तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥ ६ ॥
तब हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीकी सारी कथा कहकर अपना नाम बताया। सुनते ही दोनोंके शरीर पुलकित हो गये और श्रीरामजीके गुणसमूहोंका स्मरण करके दोनोंके मन [प्रेम और आनन्दमें] मग्न हो गये ॥ ६ ॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी । जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥ तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा । करिहहिँ कृपा भानुकुल नाथा ॥
[विभीषणजीने कहा—] हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दांतोंके बीचमें बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुलके नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी मुझपर कृपा करेंगे? ॥ १ ॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं । प्रीति न पद सरोज मन माहीं ॥ अब मोहि भा भरोस हनुमंता । बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ॥
- सुन्दरकाण्ड *
७२१
मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होनेसे साधन तो कुछ बनता नहीं और न मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें प्रेम ही है। परन्तु हे हनुमान्! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजीकी मुझपर कृपा है; क्योंकि हरिकी कृपाके बिना संत नहीं मिलते ॥ २ ॥
जों रघुबीर अनुग्रह कीन्हा । तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥ सुनहु बिभीषण प्रभु कै रीती । करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥
जब श्रीरघुवीरने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओरसे) दर्शन दिये हैं। [हनुमान्जीने कहा—] हे विभीषणजी! सुनिये, प्रभुकी यही रीति है कि वे सेवकपर सदा ही प्रेम किया करते हैं ॥ ३ ॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना । कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ॥ प्रात लेड़ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ॥
भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? [जातिका] चञ्चल वानर हूँ और सब प्रकारसे नीच हूँ। प्रातःकाल जो हमलोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले ॥ ४ ॥
दो०—अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥ ७ ॥
हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ; पर श्रीरामचन्द्रजीने तो मुझपर भी कृपा ही की है। भगवान्के गुणोंका स्मरण करके हनुमान्जीके दोनों नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया ॥ ७ ॥
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥ एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा । पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ॥
जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी) को भुलाकर [विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वाचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की ॥ १ ॥
पुनि सब कथा बिभीषण कही । जेहि बिधि जनकसुता तहाँ रही ॥ तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता । देखी चहउँ जानकी माता ॥
फिर विभीषणजीने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहाँ (लङ्कामें) रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमान्जीने कहा—हे भाई! सुनो, मैं जानकी माताको देखना चाहता हूँ ॥ २ ॥
जुगुति बिभीषण सकल सुनाई । चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥ करि सोड़ रूप गयउ पुनि तहवाँ । बन असोक सीता रह जहवाँ ॥
७२२
- रामचरितमानस *
विभीषणजीने [माताके दर्शनकी] सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनायीं। तब हनुमान्जी विदा लेकर चले। फिर वही (पहलेका मसक-सरीखा) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें (वनके जिस भागमें) सीताजी रहती थीं ॥ ३ ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा । बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥ कृस तनु सीस जटा एक बेनी । जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥
सीताजीको देखकर हनुमान्जीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया। उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी (लट) है। हृदयमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका जाप (स्मरण) करती रहती हैं ॥ ४ ॥
दो०—निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥ ८ ॥
श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं (नीचेकी ओर देख रही हैं) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है। जानकीजीको दीन (दुखी) देखकर पवनपुत्र हनुमान्जी बहुत ही दुखी हुए ॥ ८ ॥
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई । करइ बिचार करौँ का भाई ॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा । संग नारि बहु किएँ बनावा ॥
हनुमान्जी वृक्षके पत्तोंमें छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ)? उसी समय बहुत-सी स्त्रियोंको साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया ॥ १ ॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा । साम दान भय भेद देखावा ॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी । मंदोदरी आदि सब रानी ॥
उस दुष्टने सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावणने कहा—हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियोंको— ॥ २ ॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा । एक बार बिलोकु मम ओरा ॥ तून धरि ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥
मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ (परदा) करके कहने लगीं— ॥ ३ ॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥ अस मन समुझु कहति जानकी । खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥
- सुन्दरकाण्ड *
७२३
हे दशमुख! सुन, जुगनूके प्रकाशसे कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं— तू [अपने लिये भी] ऐसा ही मनमें समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीरके बाणकी खबर नहीं है ॥ ४ ॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही । अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥
रे पापी! तू मुझे सूनेमें हर लाया है। रे अधम! निलज्ज! तुझे लज्जा नहीं आती? ॥ ५ ॥
दो०—आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।
परुष बचन सुनि काहि असि बोला अति खिसिआन ॥ ९ ॥
अपनेको जुगनूके समान और रामचन्द्रजीको सूर्यके समान सुनकर और सीताजीके कठोर वचनोंको सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्सेमें आकर बोला— ॥ ९ ॥
सीता तैं मम कृत अपमाना । कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना ॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी । सुमुखि होती न त जीवन हानी ॥
सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाणसे काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा! ॥ १ ॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर । प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर ॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा । सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥
[सीताजीने कहा—] हे दशग्रीव! प्रभुकी भुजा जो श्याम कमलकी मालाके समान सुन्दर और हाथीकी सूँड़के समान [पुष्ट तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठमें पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है ॥ २ ॥
चंद्रहास हरु मम परितापं । रघुपति बिरह अनल संजातं ॥
सीतल निसित बहसि बर धारा । कह सीता हरु मम दुख भारा ॥
सीताजी कहती हैं—हे चन्द्रहास (तलवार)! श्रीरघुनाथजीके विरहकी अग्निसे उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले। हे तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी धारा ठंडी और तेज है), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले ॥ ३ ॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा । मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई । सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥
सीताजीके ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय दानवकी पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया। तब रावणने सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि जाकर सीताको बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ ॥ ४ ॥
मास दिवस महुँ कहा न माना । तौ मैं मारबि काहि कृपाना ॥
७२४
- रामचरितमानस *
यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा ॥ ५ ॥
दो०— भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बूंद। सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद ॥ १० ॥
[यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियोंके समूह बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे ॥ १० ॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका ॥ सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥
उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान) में निपुण थी। उसने सबोंको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा—सीताजीकी सेवा करके अपना कल्याण कर लो ॥ १ ॥
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी ॥ खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥
स्वप्नमें [मैंने देखा कि] एक बंदरने लड़्का जला दी। राक्षसोंकी सारी सेना मार डाली गयी। रावण नङ्गा है और गदहेपर सवार है। उसके सिर मुँडे हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं ॥ २ ॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई ॥ नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥
इस प्रकारसे वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशाको जा रहा है और मानो लड़्का विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा ॥ ३ ॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गाउँ दिन चारी ॥ तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं ॥
मैं पुकारकर (निश्चयके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं ॥ ४ ॥
दो०— जहाँ तहाँ गई सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ॥ ११ ॥
तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा ॥ ११ ॥
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी ॥ तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥
- सुन्दरकाण्ड *
७२५
सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोली—हे माता! तू मेरी विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता ॥ १ ॥
आनि काठ रचु चिता बनाई । मातु अनल पुनि देहि लगाई ॥ सत्य करहि मम प्रीति सयानी । सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥
काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावणकी शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने? ॥ २ ॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि । प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥ निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी । अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥
सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [उसने कहा—] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी ॥ ३ ॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला । मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥ देखिअत प्रगट गगन अंगारा । अवनि न आवत एकउ तारा ॥
सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं—[क्या करूँ] विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाशमें अङ्गारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी तारा नहीं आता ॥ ४ ॥
पावकमय ससि स्वत न आगी । मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥ सुनहि बिनय मम बिटप असोका । सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥
चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन! मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर ॥ ५ ॥
नूतन किसलय अनल समाना । देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥ देखि परम बिरहाकुल सीता । सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥
तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्निके समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोगका अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोगको बढ़ाकर सीमातक न पहुँचा)। सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमान्जीको कल्पके समान बीता ॥ ६ ॥
सो०—कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब ।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥ १२ ॥
७२६
- रामचरितमानस *
तब हनुमान्जीने हृदयमें विचारकर [सीताजीके सामने] अँगूठी डाल दी, मानो अशोकने अङ्गारा दे दिया। [यह समझकर] सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया ॥ १२ ॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर । राम नाम अंकित अति सुंदर ॥ चकित चित्त मुदरी पहिचानी । हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥
तब उन्होंने राम-नामसे अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं ॥ ११ ॥
जीति को सकड़ अजय रघुराई । माया तें अस्मि रचि नहीं जाई ॥ सीता मन बिचार कर नाना । मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥
[वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है ? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान्जी मधुर बचन बोले— ॥ २१ ॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई । आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥
वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥ ३१ ॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई । कही सो प्रगट होती किन भाई ॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥
[सीताजी बोलीं—] जिसने कानोंके लिये अमूर्तरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई ! प्रकट क्यों नहीं होता ? तब हनुमान्जी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ ॥ ४ ॥
राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुणानिधान की ॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी । दीन्हि राम तुम्ह कहैं सहिदानी ॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे माता जानकी ! मैं श्रीरामजीका दूत हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता ! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है ॥ ५ ॥
नर बानरहि संग कहु कैसैं । कही कथा भड़ संगति जैसैं ॥
[सीताजीने पूछा—] नर और वानरका सङ्ग कहो कैसे हुआ ? तब हनुमान्जीने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही ॥ ६ ॥