भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

* यह अकम्पन हनुमानजीके द्वारा मारे गये अकम्पनसे भिन्न है।
१. यह त्रिशिरा जनस्थानमें मारे गये त्रिशिरासे भिन्न है। यह रावणका पुत्र है और वह भाई था।
२. यह नरान्तक रावणका पुत्र है।

साठवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

साठवाँ सर्ग

अपनी पराजयसे दुःखी हुए रावणकी आज्ञासे सोये हुए कुम्भकर्णका जगाया जाना और उसे देखकर वानरोंका भयभीत होना

भगवान् श्रीरामके बाणों और भयसे पीड़ित हो राक्षसराज रावण जब लङ्कापुरीमें पहुँचा, तब उसका अभिमान चूर-चूर हो गया था। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्यथासे व्याकुल थीं॥ १ ॥

जैसे सिंह गजराजको और गरुड़ विशाल नागको पीड़ित एवं पराजित कर देता है, उसी प्रकार महात्मा रघुनाथजीने राजा रावणको अभिभूत कर दिया था॥ २ ॥

भगवान् श्रीरामके बाण ब्रह्मदण्डके प्रतीक जान पड़ते थे। उनकी दीप्ति चपलाके समान चञ्चल थी। उन्हें याद करके राक्षसराज रावणके मनमें बड़ी व्यथा हुई॥ ३ ॥

सोनेके बने हुए दिव्य एवं श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठकर राक्षसोंकी ओर देखता हुआ रावण उस समय इस प्रकार कहने लगा— ॥ ४ ॥

‘मैंने जो बहुत बड़ी तपस्या की थी, वह सब अवश्य ही व्यर्थ हो गयी; क्योंकि आज महेन्द्रतुल्य पराक्रमी मुझ रावणको एक मनुष्यने परास्त कर दिया॥

‘ब्रह्माजीने मुझसे कहा था कि ‘तुम्हें मनुष्योंसे भय प्राप्त होगा। इस बातको अच्छी तरह जान लो’। उनका कहा हुआ यह घोर वचन इस समय सफल होकर मेरे समक्ष उपस्थित हुआ है॥ ६ ॥

‘मैंने तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सर्पोंसे ही अवध्य होनेका वर माँगा था, मनुष्योंसे अभय होनेकी वर-याचना नहीं की थी॥ ७ ॥

‘पूर्वकालमें इक्ष्वाकुवंशी राजा अनरण्यने मुझे शाप देते हुए कहा था कि ‘राक्षसाधम! कुलाङ्गार! दुर्मते! मेरे ही वंशमें एक ऐसा श्रेष्ठ पुरुष उत्पन्न होगा, जो तुझे पुत्र, मन्त्री, सेना, अश्व और सारथिके सहित समराङ्गणमें मार डालेगा।’ मालूम होता है कि अनरण्यने जिसकी ओर संकेत किया था, यह दशरथकुमार राम वही मनुष्य है॥ ८-९ १/२ ॥

‘इसके सिवा पूर्वकालमें मुझे वेदवतीने भी शाप दिया था; क्योंकि मैंने उसके साथ बलात्कार किया था। जान पड़ता है वही यह महाभागा जनकनन्दिनी सीता होकर प्रकट हुई है॥ १० १/२ ॥

‘इसी तरह उमा, नन्दीश्वर, रम्भा और वरुण-कन्याने भी जैसा-जैसा कहा था, वैसा ही परिणाम मुझे प्राप्त हुआ है। * सच है ऋषियोंकी बात कभी झूठी नहीं होती॥ ११ १/२ ॥

‘ये शाप ही मुझपर भय अथवा संकट लानेमें कारण हुए हैं। इस बातको जानकर अब तुमलोग आये हुए संकटको टालनेका प्रयत्न करो। राक्षसलोग राजमार्गों तथा गोपुरोंके शिखरोंपर उनकी रक्षाके लिये डटे रहें॥

‘साथ ही जिसके गाम्भीर्यकी कहीं तुलना नहीं है, जो देवताओं और दानवोंका दर्प दलन करनेवाला है तथा ब्रह्माजीके शापसे प्राप्त हुई निद्रा जिसे सदा अभिभूत किये रहती है, उस कुम्भकर्णको भी जगाया जाय’॥ १३ १/२ ॥

‘प्रहस्त मारा गया और मैं भी समराङ्गणमें परास्त हो गया’ ऐसा जानकर महाबली रावणने राक्षसोंकी भयानक सेनाको आदेश दिया कि ‘तुमलोग नगरके दरवाजोंपर रहकर उनकी रक्षाके लिये यत्न करो। परकोटोंपर भी चढ़ जाओ और निद्राके अधीन हुए कुम्भकर्णको जगा दो॥ १४-१५ १/२ ॥

‘(मैं तो दुःखी, चिन्तित और अपूर्णकाम होकर जाग रहा हूँ और) वह राक्षस कामभोगसे अचेत हो बड़ी निश्चिन्तताके साथ सुखपूर्वक सो रहा है। वह कभी नौ, कभी सात, कभी दस और कभी आठ मासतक सोता रहता है। यह आजसे नौ महीने पहले मुझसे सलाह करके सोया था॥ १६-१७ ॥

‘अतः तुमलोग महाबली कुम्भकर्णको शीघ्र जगा दो। महाबाहु कुम्भकर्ण सभी राक्षसोंमें श्रेष्ठ है। वह युद्धस्थलमें वानरों और उन राजकुमारोंको भी शीघ्र ही मार डालेगा॥ १८ ॥

‘समस्त राक्षसोंमें प्रधान यह कुम्भकर्ण समरभूमिमें हमारे लिये सर्वोत्तम विजय-वैजयन्तीके समान है; किंतु खेदकी बात है कि वह मूर्ख ग्राम्यसुखमें आसक्त होकर सदा सोता रहता है॥ १९ ॥

‘यदि कुम्भकर्णको जगा दिया जाय तो इस भयंकर संग्राममें मुझे रामसे पराजित होनेका शोक नहीं होगा॥ २० ॥

‘यदि इस घोर संकटके समय भी कुम्भकर्ण मेरी सहायता करनेमें समर्थ नहीं हो रहा है तो इन्द्रके तुल्य बलशाली होनेपर भी उससे मेरा प्रयोजन ही क्या है— मैं उसे लेकर क्या करूँगा?’॥ २१ ॥

राक्षसराज रावणकी वह बात सुनकर समस्त राक्षस बड़ी घबराहटमें पड़कर कुम्भकर्णके घर गये॥ २२ ॥

रक्त-मांसका भोजन करनेवाले वे राक्षस रावणकी आज्ञा पाकर गन्ध, माल्य तथा खाने-पीनेकी बहुत-सी सामग्री लिये सहसा कुम्भकर्णके पास गये॥ २३ ॥

कुम्भकर्ण एक गुफामें रहता था, जो बड़ी ही सुन्दर थी और वहाँके वातावरणमें फूलोंकी सुगन्ध छायी रहती थी। उसकी लंबाई-चौड़ाई सब ओरसे एक-एक योजनकी थी तथा उसका दरवाजा बहुत बड़ा था। उसमें प्रवेश करते ही वे महाबली राक्षस कुम्भकर्णकी साँसके वेगसे सहसा पीछेको ठेल दिये गये। फिर बड़ी कठिनाईसे पैर जमाते हुए वे पूरा प्रयत्न करके उस गुफाके भीतर घुसे॥ २४-२५ ॥

उस गुफाकी फर्शमें रत्न और सुवर्ण जड़े गये थे, जिससे उसकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। उसके भीतर प्रवेश करके उन श्रेष्ठ राक्षसोंने देखा, भयानक पराक्रमी कुम्भकर्ण सो रहा है॥ २६ ॥

महानिद्रामें निमग्न हुआ कुम्भकर्ण बिखरे हुए पर्वतके समान विकृतावस्थामें सोकर खर्राटे ले रहा था, अतः वे सब राक्षस एकत्र हो उसे जगानेकी चेष्टा करने लगे॥ २७ ॥

उसका सारा शरीर ऊपर उठी हुई रोमावलियोंसे भरा था। वह सर्पके समान साँस लेता और अपने निःश्वासोंसे लोगोंको चक्करमें डाल देता था। वहाँ सोया हुआ वह राक्षस भयानक बल-विक्रमसे सम्पन्न था॥ २८ ॥

उसकी नासिकाके दोनों छिद्र बड़े भयंकर थे। मुँह पातालके समान विशाल था। उसने अपना सारा शरीर शय्यापर डाल रखा था और उसकी देहसे रक्त और चर्बीकी-सी गन्ध प्रकट होती थी॥ २९ ॥

उसकी भुजाओंमें बाजूबन्द शोभा पाते थे। मस्तकपर तेजस्वी किरीट धारण करनेके कारण वह सूर्यदेवके समान प्रभापुञ्जसे प्रकाशित हो रहा था। इस रूपमें निशाचरश्रेष्ठ शत्रुदमन कुम्भकर्णको उन राक्षसोंने देखा॥ ३० ॥

तदनन्तर उन महाकाय निशाचरोंने कुम्भकर्णके सामने प्राणियोंके मेरुपर्वत-जैसे ढेर लगा दिये, जो उसे अत्यन्त तृप्ति प्रदान करनेवाले थे॥ ३१ ॥

उन श्रेष्ठ राक्षसोंने वहाँ मृगों, भैंसों और सूअरोंके समूह खड़े कर दिये तथा अन्नकी भी अद्भुत राशि एकत्र कर दी॥ ३२ ॥

इतना ही नहीं, उन देवद्रोहियोंने कुम्भकर्णके आगे रक्तसे भरे हुए बहुतेरे घड़े और नाना प्रकारके मांस भी रख दिये॥ ३३ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने शत्रुसंतापी कुम्भकर्णके शरीरमें बहुमूल्य चन्दनका लेप किया। दिव्य सुगन्धित पुष्प और चन्दन सुघाँये। धूपोंकी सुगन्ध फैलायी। उस शत्रुदमन वीरकी स्तुति की तथा जहाँ-तहाँ खड़े हुए राक्षस मेघोंके समान गम्भीर ध्वनिसे गर्जना करने लगे॥

(इतनेपर भी जब कुम्भकर्ण नहीं उठा, तब) अमर्षसे भरे हुए राक्षस चन्द्रमाके समान श्वेत रंगके बहुत-से शङ्ख फूँकने तथा एक साथ तुमुल-ध्वनिसे गर्जना करने लगे॥ ३६ ॥

वे निशाचर सिंहनाद करने, ताल ठोंकने और कुम्भकर्णके विभिन्न अङ्गोंको झकझोरने लगे। उन्होंने कुम्भकर्णको जगानेके लिये बड़े जोर-जोरसे गम्भीर ध्वनि की॥ ३७ ॥

शङ्ख, भेरी और पणव बजने लगे। ताल ठोंकने, गर्जने और सिंहनादका शब्द सब ओर गूँज उठा। वह तुमुल नाद सुनकर पक्षी समस्त दिशाओंकी ओर भागने और आकाशमें उड़ने लगे। उड़ते-उड़ते वे सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ते थे॥ ३८ ॥

जब उस महान् कोलाहलसे भी सोया हुआ विशालकाय कुम्भकर्ण नहीं जग सका, तब उन समस्त राक्षसोंने अपने हाथोंमें भुशुण्डी, मूसल और गदाएँ ले लीं॥ ३९ ॥

कुम्भकर्ण भूतलपर ही सुखसे सो रहा था। उसी अवस्थामें उन प्रचण्ड राक्षसोंने उस समय उसकी छातीपर पर्वतशिखरों, मूसलों, गदाओं, मुद्गरों और मुक्कोंसे मारना आरम्भ किया॥ ४० ॥

किंतु राक्षस कुम्भकर्णकी निःश्वास-वायुसे प्रेरित हो वे सब निशाचर उसके आगे ठहर नहीं पाते थे॥

तदनन्तर अपने वस्त्रोंको खूब कसकर बाँध लेनेके पश्चात् वे भयानक पराक्रमी राक्षस जिनकी संख्या लगभग दस हजार थी, एक ही समय कुम्भकर्णको घेरकर खड़े हो गये और काले कोयलेके ढेरके समान पड़े हुए उस निशाचरको जगानेका प्रयत्न करने लगे। उन सबने एक साथ मृदंग, पणव, भेरी, शङ्ख और कुम्भ (धौंसा) बजाने आरम्भ किये॥ ४२-४३ ॥

इस तरह वे राक्षस बाजे बजाते और गर्जते रहे तो भी कुम्भकर्णकी निद्रा नहीं टूटी। जब वे उसे किसी तरह जगा न सके, तब उन्होंने पहलेसे भी भारी प्रयत्न आरम्भ किया॥ ४४ १/२ ॥

वे घोड़ों, ऊँटों, गदहों और हाथियोंको डंडों, कोड़ों तथा अंकुशोंसे मार-मारकर उसके ऊपर ठेलने लगे। सारी शक्ति लगाकर भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख बजाने लगे तथा पूरा बल लगाकर उठाये गये बड़े-बड़े काष्ठोंके समूहों, मुद्गरों और मूसलोंसे भी उसके अङ्गोंपर प्रहार करने लगे। उस महान् कोलाहलसे पर्वतों और वनोंसहित सारी लङ्का गूँज उठी, परंतु कुम्भकर्ण नहीं जागा, नहीं जागा॥ ४५—४७ ॥

तदनन्तर सब ओर सहस्रों धौँसे एक साथ बजाये जाने लगे। वे सब-के-सब लगातार बजते रहे। उन्हें बजानेके लिये जो डंडे थे, वे सुन्दर सुवर्णके बने हुए थे॥ ४८ ॥

इतनेपर भी शापके अधीन हुआ वह अतिशय निद्रालु निशाचर नहीं जागा। इससे वहाँ आये हुए सब राक्षसोंको बड़ा क्रोध हुआ॥ ४९ ॥

फिर वे रोषसे भरे हुए सभी भयानक पराक्रमी निशाचर उस राक्षसको जगानेके लिये पराक्रम करने लगे॥

कोई धौँसे बजाने लगे, कोई महान् कोलाहल करने लगे, कोई कुम्भकर्णके सिरके बाल नोचने लगे और कोई दाँतोंसे उसके कान काटने लगे॥ ५१ ॥

दूसरे राक्षसोंने उसके दोनों कानोंमें सौ घड़े पानी डाल दिये तो भी महानिद्राके वशमें पड़ा हुआ कुम्भकर्ण टस-से-मस नहीं हुआ॥ ५२ ॥

दूसरे बलवान् राक्षस काँटेदार मुद्गर हाथमें लेकर उन्हें उसके मस्तक, छाती तथा अन्य अङ्गोंपर गिराने लगे॥ ५३ ॥

तत्पश्चात् रस्सियोंसे बँधी हुई शतघ्नियोंद्वारा उसपर सब ओरसे चोटें पड़ने लगीं। फिर भी उस महाकाय राक्षसकी नींद नहीं टूटी॥ ५४ ॥

इसके बाद उसके शरीरपर हजारों हाथी दौड़ाये गये। तब उसे कुछ स्पर्श मालूम हुआ और वह जाग उठा॥

यद्यपि उसके ऊपर पर्वतशिखर और वृक्ष गिराये जाते थे, तथापि उसने उन भारी प्रहारोंको कुछ भी नहीं गिना। हाथियोंके स्पर्शसे जब उसकी नींद टूटी, तब वह भूखके भयसे पीड़ित हो अँगड़ाई लेता हुआ सहसा उछलकर खड़ा हो गया॥ ५६ ॥

उसकी दोनों भुजाएँ नागोंके शरीर और पर्वतशिखरोंके समान जान पड़ती थीं। उन्होंने वज्रकी शक्तिको पराजित कर दिया था। उन दोनों बाँहों और मुँहको फैलाकर जब वह निशाचर

जम्हाऽइ लेने लगा, उस समय उसका मुख बड़वानलके समान विकराल जान पड़ता था॥ ५७ ॥

जम्हाऽइ लेते समय कुम्भकर्णका पाताल-जैसा मुख मेरुपर्वतके शिखरपर उगे हुए सूर्यके समान दिखायी देता था॥ ५८ ॥

इस तरह जम्हाऽइ लेता हुआ वह अत्यन्त बलशाली निशाचर जब जगा, तब उसके मुखसे जो साँस निकलती थी, वह पर्वत-से चली हुऽइ वायुके समान प्रतीत होती थी॥

नींदसे उठे हुए कुम्भकर्णका वह रूप प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंके संहारकी इच्छा रखनेवाले कालके समान जान पड़ता था॥ ६० ॥

उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखें प्रज्वलित अग्नि और विद्युत्के समान दीप्तिमती दिखायी देती थीं। वे ऐसी लगती थीं मानो दो महान् ग्रह प्रकाशित हो रहे हों॥ ६१ ॥

तदनन्तर राक्षसोंने वहाँ जो अनेक प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें रखी गयी थीं, वे सब-की-सब कुम्भकर्णको दिखायीं। वह महाबली राक्षस बात-की-बातमें बहुतेरे भैंसों और सूअरोंको चट कर गया॥ ६२ ॥

उसे बड़ी भूख लगी थी, अतः उसने भरपेट मांस खाया और प्यास बुझानेके लिये रक्त पान किया। तदनन्तर उस इन्द्रद्रोही निशाचरने चर्बीसे भरे हुए कितने ही घड़े साफ कर दिये और वह कऽइ घड़े मदिरा भी पी गया॥ ६३ ॥

तब उसे तृप्त जानकर राक्षस उछल-उछलकर उसके सामने आये और उसे सिर झुका प्रणाम करके उसके चारों ओर खड़े हो गये॥ ६४ ॥

उस समय उसके नेत्र निद्राके कारण अप्रसन्न— कुछ-कुछ खुले हुए थे और मलिन जान पड़ते थे। उसने सब ओर दृष्टि डालकर वहाँ खड़े हुए निशाचरोंको देखा॥ ६५ ॥

निशाचरोंमें श्रेष्ठ कुम्भकर्णने उन सब राक्षसोंको सान्त्वना दी और अपने जगाये जानेके कारण विस्मित हो उनसे इस प्रकार पूछा—॥ ६६ ॥

‘तुमलोगोंने इस प्रकार आदर करके मुझे किसलिये जगाया है? राक्षसराज रावण कुशलसे हैं न? यहाँ कोऽइ भय तो नहीं उपस्थित हुआ है?॥ ६७ ॥

‘अथवा निश्चय ही यहाँ दूसरोंसे कोऽइ महान् भय उपस्थित हुआ है, जिसके निवारणके लिये तुमलोगोंने इतनी उतावलीके साथ मुझे जगाया है॥ ६८ ॥

‘अच्छा तो आज मैं राक्षसराजके भयको उखाड़ फेंरूकूँगा। महेन्द्र (पर्वत या इन्द्र)-को भी चीर डालूँगा और अग्निको भी ठंडा कर दूँगा॥ ६९॥

‘मुझ-जैसे पुरुषको किसी छोटे-मोटे कारणवश नींदसे नहीं जगाया जायगा। अतः तुमलोग ठीक-ठीक बताओ, मेरे जगाये जानेका क्या कारण है?’॥ ७०॥

शत्रुसूदन कुम्भकर्ण जब रोषमें भरकर इस प्रकार पूछने लगा, तब राजा रावणके सचिव यूपाक्षने हाथ जोड़कर कहा—॥ ७१॥

‘महाराज! हमें देवताओंकी ओरसे तो कभी कोऽइ भय हो ही नहीं सकता। इस समय केवल एक मनुष्यसे तुमुल भय प्राप्त हुआ है, जो हमें सता रहा है॥ ७२॥

‘राजन्! इस समय एक मनुष्यसे हमारे लिये जैसा भय उपस्थित हो गया है, वैसा तो कभी दैत्यों और दानवोंसे भी नहीं हुआ था॥ ७३॥

‘पर्वताकार वानरोंने आकर इस लङ्कापुरीको चारों ओरसे घेर लिया है। सीताहरणसे संतप्त हुए श्रीरामकी ओरसे हमें तुमुल भयकी प्राप्ति हुऽइ है॥ ७४॥

‘पहले एक ही वानरने यहाँ आकर इस महापुरीको जला दिया था और हाथियों तथा साथियोंसहित राजकुमार अक्षको भी मार डाला था॥ ७५॥

‘श्रीराम सूर्यके समान तेजस्वी हैं। उन्होंने देवशत्रु पुलस्त्यकुलनन्दन साक्षात् राक्षसराज रावणको भी युद्धमें हराकर जीवित छोड़ दिया और कहा—‘लङ्काको लौट जाओ’॥ ७६॥

‘महाराजकी जो दशा देवता, दैत्य और दानव भी नहीं कर सके थे, वह रामने कर दी। उनके प्राण बड़े संकटसे बचे हैं’॥ ७७॥

युद्धमें भाऽइकी पराजयसे सम्बन्ध रखनेवाली यूपाक्षकी यह बात सुनकर कुम्भकर्ण आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगा और यूपाक्षसे इस प्रकार बोला—॥ ७८॥

‘यूपाक्ष! मैं अभी सारी वानरसेनाको तथा लक्ष्मणसहित रामको भी रणभूमिमें परास्त करके रावणका दर्शन करूँगा॥ ७९॥

‘आज वानरोंके मांस और रक्तसे राक्षसोंको तृप्त करूँगा और स्वयं भी राम और लक्ष्मणके खून पीऊँगा’॥ ८०॥

कुम्भकर्णके बढ़े हुए रोष-दोषसे युक्त अहङ्कारपूर्ण वचन सुनकर राक्षस-योद्धाओंमें प्रधान महोदरने हाथ जोड़कर यह बात कही—॥ ८१॥

‘महाबाहो! पहले चलकर महाराज रावणकी बात सुन लीजिये। फिर गुण-दोषका विचार करनेके पश्चात् युद्धमें शत्रुओंको परास्त कीजियेगा’॥ ८२ ॥

महोदरकी यह बात सुनकर राक्षसोंसे घिरा हुआ महातेजस्वी महाबली कुम्भकर्ण वहाँसे चलनेकी तैयारी करने लगा॥ ८३ ॥

इस तरह सोये हुए भयानक नेत्र, रूप और पराक्रमवाले कुम्भकर्णको उठाकर वे राक्षस शीघ्र ही दशमुख रावणके महलमें गये॥ ८४ ॥

दशग्रीव उत्तम सिंहासनपर बैठा हुआ था, उसके पास जा सभी निशाचर हाथ जोड़कर बोले— ॥ ८५ ॥

‘राक्षसेश्वर! आपके भाई कुम्भकर्ण जाग उठे हैं। कहिये, वे क्या करें? सीधे युद्धस्थलमें ही पधारें या आप उन्हें यहाँ उपस्थित देखना चाहते हैं?॥ ८६ ॥

तब रावणने बड़े हर्षके साथ उन उपस्थित हुए राक्षसोंसे कहा— ‘मैं कुम्भकर्णको यहाँ देखना चाहता हूँ, उनका यथोचित सत्कार किया जाय’॥ ८७ ॥

तब ‘जो आज्ञा’ कहकर रावणके भेजे हुए वे सब राक्षस पुनः कुम्भकर्णके पास आ इस प्रकार बोले— ॥

‘प्रभो! सर्वराक्षसशिरोमणि महाराज रावण आपको देखना चाहते हैं। अतः आप वहाँ चलनेका विचार करें और पधारकर अपने भाईका हर्ष बढ़ावें’॥ ८९ ॥

भाईका यह आदेश पाकर महापराक्रमी दुर्जय वीर कुम्भकर्ण ‘बहुत अच्छा’ कहकर शय्यासे उठकर खड़ा हो गया॥ ९० ॥

उसने बड़े हर्ष और प्रसन्नताके साथ मुँह धोकर स्नान किया और पीनेकी इच्छासे तुरंत बलवर्धक पेय ले आनेकी आज्ञा दी॥ ९१ ॥

तब रावणके आदेशसे वे सब राक्षस तुरंत मद्य तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ ले आये॥ ९२ ॥

कुम्भकर्ण दो हजार घड़े मद्य गटककर चलनेको उद्यत हुआ। इससे उसमें कुछ ताजगी आ गयी तथा वह मतवाला, तेजस्वी और शक्तिसम्पन्न हो गया॥ ९३ ॥

फिर जब राक्षसोंकी सेनाके साथ कुम्भकर्ण भाईके महलकी ओर चला, उस समय वह रोषसे भरे हुए प्रलयकालके विनाशकारी यमराजके समान जान पड़ता था। कुम्भकर्ण अपने

पैरोंकी धमकसे सारी पृथ्वीको कम्पित कर रहा था॥ ९४ ॥

जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंसे भूतलको प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार वह अपने तेजस्वी शरीरसे राजमार्गको उद्भासित करता हुआ हाथ जोड़े अपने भाईके महलमें गया। ठीक उसी तरह, जैसे देवराज इन्द्र ब्रह्माजीके धाममें जाते हैं॥ ९५ ॥

राजमार्गपर चलते समय शत्रुघाती कुम्भकर्ण पर्वतशिखरके समान जान पड़ता था। नगरके बाहर खड़े हुए वानर सहसा उस विशालकाय राक्षसको देखकर सेनापतियोंसहित सहम गये॥ ९६ ॥

उनमेंसे कुछ वानरोंने शरणागतवत्सल भगवान् श्रीरामकी शरण ली। कुछ व्यथित होकर गिर पड़े। कोई पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये और जहाँ-तहाँ धराशायी हो गये और कितने ही वानर भयसे पीड़ित हो धरतीपर लेट गये॥ ९७ ॥

वह पर्वतशिखरके समान ऊँचा था। उसके मस्तकपर मुकुट शोभा देता था। वह अपने तेजसे सूर्यका स्पर्श करता-सा जान पड़ता था। उस बढ़े हुए विशालकाय एवं अद्भुत राक्षसको देखकर सभी वनवासी वानर भयसे पीड़ित हो इधर-उधर भागने लगे॥ ९८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

६० ॥


* उमाने कैलास उठानेके समय भयभीत होनेसे रावणको शाप दिया था कि ‘तेरी मृत्यु स्त्रीके कारण होगी।’ नन्दीश्वरकी वानरमूर्ति देखकर रावण हँसा था, इसलिये उन्होंने कहा था— ‘मेरे समान रूप और पराक्रमवाले ही तेरे कुलका नाश करेंगे।’ रम्भाके निमित्तसे नल-कूबरने और वरुण-कन्या पुञ्जिकस्थलाके निमित्तसे ब्रह्माजीने शाप दिया था कि ‘अनिच्छासे किसी स्त्रीके साथ सम्भोग करनेपर तेरी मृत्यु हो जायगी।’

इकसठवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

इकसठवाँ सर्ग

विभीषणका श्रीरामसे कुम्भकर्णका परिचय देना और श्रीरामकी आज्ञासे वानरोंका युद्धके लिये लङ्काके द्वारोंपर डट जाना

तदनन्तर हाथमें धनुष लेकर बल-विक्रमसे सम्पन्न महातेजस्वी श्रीरामने किरीटधारी महाकाय राक्षस कुम्भकर्णको देखा॥ १ ॥

वह पर्वतके समान दिखायी देता था और राक्षसोंमें सबसे बड़ा था। जैसे पूर्वकालमें भगवान् नारायणने आकाशको नापनेके लिये डग भरे थे, उसी प्रकार वह भी डग बढ़ाता जा रहा था। सजल जलधरके समान काला कुम्भकर्ण सोनेके बाजूबन्दसे विभूषित था। उसे देखकर वानरोंकी वह विशाल सेना पुनः बड़े वेगसे भागने लगी॥ २-३ ॥

अपनी सेनाको भागते तथा राक्षस कुम्भकर्णको बढ़ते देख श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने विभीषणसे पूछा—॥ ४ ॥

‘यह लङ्कापुरीमें पर्वतके समान विशालकाय वीर कौन है, जिसके मस्तकपर किरीट शोभा पाता है और नेत्र भूरे हैं? यह ऐसा दिखायी देता है मानो बिजलीसहित मेघ हो॥ ५ ॥

‘इस भूतलपर यह एकमात्र महान् ध्वज-सा दृष्टिगोचर होता है। इसे देखकर सारे वानर इधर-उधर भाग चले हैं॥ ६ ॥

‘विभीषण! बताओ। यह इतने बड़े डील-डौलका कौन है? कोई राक्षस है या असुर? मैंने ऐसे प्राणीको पहले कभी नहीं देखा’॥ ७ ॥

अनायास ही बड़े-बड़े कर्म करनेवाले राजकुमार श्रीरामने जब इस प्रकार पूछा, तब परम बुद्धिमान् विभीषणने उन ककुत्स्थकुलभूषण रघुनाथजीसे इस प्रकार कहा—॥ ८ ॥

‘भगवन्! जिसने युद्धमें वैवस्वत यम और देवराज इन्द्रको भी पराजित किया था, वही यह विश्रवाका प्रतापी पुत्र कुम्भकर्ण है। इसके बराबर लंबा दूसरा कोई राक्षस नहीं है॥ ९ ॥

‘रघुनन्दन! इसने देवता, दानव, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरोंको सहस्रों बार युद्धमें मार भगाया है॥ १० ॥

‘इसके नेत्र बड़े भयंकर हैं। यह महाबली कुम्भकर्ण जब हाथमें शूल लेकर युद्धमें खड़ा हुआ, उस समय देवता भी इसे मारनेमें समर्थ न हो सके। यह कालरूप है, ऐसा समझकर वे सब-

के-सब मोहित हो गये थे॥

‘कुम्भकर्ण स्वभावसे ही तेजस्वी और महाबलवान् है। अन्य राक्षसपतियोंके पास जो बल है, वह वरदानसे प्राप्त हुआ है॥ १२ ॥

‘इस महाकाय राक्षसने जन्म लेते ही बाल्यावस्थामें भूखसे पीड़ित हो कऽइ सहस्र प्रजाजनोंको खा डाला था॥

‘जब सहस्रों प्रजाजन इसका आहार बनने लगे, तब भयसे पीड़ित हो वे सब-के-सब देवराज इन्द्रकी शरणमें गये और उन सबने उनके समक्ष अपना कष्ट निवेदन किया॥ १४ ॥

‘इससे वज्रधारी देवराज इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने अपने तीखे वज्रसे कुम्भकर्णको घायल कर दिया। इन्द्रके वज्रकी चोट खाकर यह महाकाय राक्षस क्षुब्ध हो उठा और रोषपूर्वक जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा॥ १५ ॥

‘राक्षस कुम्भकर्णके बारंबार गर्जना करनेपर उसका भयंकर सिंहनाद सुनकर प्रजावर्गके लोग भयभीत हो और भी डर गये॥ १६ ॥

‘तदनन्तर कुपित हुए महाबली कुम्भकर्णने इन्द्रके ऐरावतके मुँहसे एक दाँत उखाड़ लिया और उसीसे देवेन्द्रकी छातीपर प्रहार किया॥ १७ ॥

‘कुम्भकर्णके प्रहारसे इन्द्र व्याकुल हो गये और उनके हृदयमें जलन होने लगी। यह देखकर सब देवता, ब्रह्मर्षि और दानव सहसा विषादमें डूब गये॥ १८ ॥

‘तत्पश्चात् इन्द्र उन प्रजाजनोंके साथ ब्रह्माजीके धाममें गये। वहाँ जाकर उन सबने प्रजापतिके समक्ष कुम्भकर्णकी दुष्टताका विस्तारपूर्वक वर्णन किया॥

‘इसके द्वारा प्रजाके भक्षण, देवताओंके धर्षण (तिरस्कार), ऋषियोंके आश्रमोंके विध्वंस तथा परायी स्त्रियोंके बारंबार हरण होनेकी भी बात बतायी॥ २० ॥

‘इन्द्रने कहा— ‘भगवन्! यदि यह नित्यप्रति इसी प्रकार प्रजाजनोंका भक्षण करता रहा तो थोड़े ही समयमें सारा संसार सूना हो जायगा’॥ २१ ॥

‘इन्द्रकी यह बात सुनकर सर्वलोकपितामह ब्रह्माने सब राक्षसोंको बुलाया और कुम्भकर्णसे भी भेंट की॥ २२ ॥

‘कुम्भकर्णको देखते ही स्वयम्भू प्रजापति थर्रा उठे। फिर अपनेको सँभालकर वे उस राक्षससे बोले—॥ २३ ॥

“कुम्भकर्ण! निश्चय ही इस जगत्का विनाश करनेके लिये ही विश्ववाने तुझे उत्पन्न किया है; अतः मैं शाप देता हूँ, आजसे तू मुर्देके समान सोता रहेगा' ॥

‘ब्रह्माजीके शापसे अभिभूत होकर वह रावणके सामने ही गिर पड़ा। इससे रावणको बड़ी घबराहट हुई और उसने कहा— ॥ २५ ॥

“प्रजापते! अपने द्वारा लगाया और बढ़ाया हुआ सुवर्णरूप फल देनेवाला वृक्ष फल देनेके समय नहीं काटा जाता है। यह आपका नाती है, इसे इस प्रकार शाप देना कदापि उचित नहीं है॥ २६ ॥

“आपकी बात कभी झूठी नहीं होती, इसलिये अब इसे सोना ही पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है; परंतु आप इसके सोने और जागनेका कोई समय नियत कर दें' ॥ २७ ॥

‘रावणका यह कथन सुनकर स्वयम्भू ब्रह्माने कहा— ‘यह छः मासतक सोता रहेगा और एक दिन जगेगा॥ २८ ॥

“उस एक दिन ही यह वीर भूखा होकर पृथ्वीपर विचरेगा और प्रज्वलित अग्निके समान मुँह फैलाकर बहुत-से लोगोंको खा जायगा' ॥ २९ ॥

‘महाराज! इस समय आपत्तिमें पड़कर और आपके पराक्रमसे भयभीत होकर राजा रावणने कुम्भकर्णको जगाया है॥ ३० ॥

‘यह भयानक पराक्रमी वीर अपने शिविरसे निकला है और अत्यन्त कुपित हो वानरोंको खा जानेके लिये सब ओर दौड़ रहा है॥ ३१ ॥

‘जब कुम्भकर्णको देखकर ही आज सारे वानर भाग चले, तब रणभूमिमें कुपित हुए इस वीरको ये आगे बढ़नेसे कैसे रोक सकेंगे?॥ ३२ ॥

‘सब वानरोंसे यह कह दिया जाय कि यह कोई व्यक्ति नहीं, कायाद्वारा निर्मित ऊँचा यन्त्रमात्र है। ऐसा जानकर वानर निर्भय हो जायँगे' ॥ ३३ ॥

विभीषणके सुन्दर मुखसे निकली हुई यह युक्तियुक्त बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने सेनापति नीलसे कहा— ॥

‘अग्निनन्दन! जाओ, समस्त सेनाओंकी मोर्चेबंदी करके युद्धके लिये तैयार रहो और लङ्काके द्वारों तथा राजमार्गोंपर अधिकार जमाकर वहीं डटे रहो॥ ३५ ॥

'पर्वतोंके शिखर, वृक्ष और शिलाएँ एकत्र कर लो तथा तुम और सब वानर अस्त्र-शस्त्र एवं पत्थर लिये तैयार रहो'॥ ३६ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह आज्ञा पाकर वानरसेनापति कपिश्रेष्ठ नीलने वानरसैनिकोंको यथोचित कार्यके लिये आदेश दिया॥ ३७ ॥

तदनन्तर गवाक्ष, शरभ, हनुमान् और अङ्गद आदि पर्वताकार वानर पर्वतशिखर लिये लङ्काके द्वारपर डट गये॥ ३८ ॥

विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वीर वानर श्रीरामचन्द्रजीकी पूर्वोक्त आज्ञा सुनकर वृक्षोंद्वारा शत्रुसेनाको पीड़ित करने लगे॥ ३९ ॥

तदनन्तर हाथोंमें शैल-शिखर और वृक्ष लिये वानरोंकी वह भयंकर सेना पर्वतके समीप घिरी हुई मेघोंकी बड़ी भारी उग्र घटाके समान सुशोभित होने लगी॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१ ॥

बासठवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

बासठवाँ सर्ग

कुम्भकर्णका रावणके भवनमें प्रवेश तथा रावणका रामसे भय बताकर उसे शत्रुसेनाके विनाशके लिये प्रेरित करना

महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि कुम्भकर्ण निद्रा और मदसे व्याकुल हो अलसाया हुआ-सा शोभाशाली राजमार्गसे जा रहा था॥ १ ॥

वह परम दुर्जय वीर हजारों राक्षसोंसे घिरा हुआ यात्रा कर रहा था। सड़कके किनारेपर जो मकान थे, उनमेंसे उसके ऊपर फूल बरसाये जा रहे थे॥ २ ॥

उसने राक्षसराज रावणके रमणीय एवं विशाल भवनका दर्शन किया, जो सोनेकी जालीसे आच्छादित होनेके कारण सूर्यदेवके समान दीप्तिमान् दिखायी देता था॥ ३ ॥

जैसे सूर्य मेघोंकी घटामें छिप जायँ, उसी प्रकार कुम्भकर्णने राक्षसराजके महलमें प्रवेश किया और राजसिंहासनपर बैठे हुए अपने भाईको दूरसे ही देखा, मानो देवराज इन्द्रने दिव्य कमलासनपर विराजमान स्वयम्भू ब्रह्माका दर्शन किया हो॥ ४ ॥

राक्षसोंसहित कुम्भकर्ण अपने भाईके भवनमें जाते समय जब-जब एक-एक पैर आगे बढ़ाता था, तब-तब पृथ्वी काँप उठती थी॥ ५ ॥

भाईके भवनमें जाकर जब वह भीतरकी कक्षामें प्रविष्ट हुआ, तब उसने अपने बड़े भाईको उद्विग्न अवस्थामें पुष्पक विमानपर विराजमान देखा॥ ६ ॥

कुम्भकर्णको उपस्थित देख दशमुख रावण तुरंत उठकर खड़ा हो गया और बड़े हर्षके साथ उसे अपने समीप बुला लिया॥ ७ ॥

महाबली कुम्भकर्णने सिंहासनपर बैठे हुए अपने भाईके चरणोंमें प्रणाम किया और पूछा — ‘कौन-सा कार्य आ पड़ा है?’॥ ८ ॥

रावणने उछलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ कुम्भकर्णको हृदयसे लगा लिया। भाई रावणने उसका आलिंगन करके यथावत्रूपसे अभिनन्दन किया॥ ९ ॥

इसके बाद कुम्भकर्ण सुन्दर दिव्य सिंहासनपर बैठा। उस आसनपर बैठकर महाबली कुम्भकर्णने क्रोधसे लाल आँखें किये रावणसे पूछा— ॥ १० १/२ ॥

'राजन्! किसलिये तुमने बड़े आदरके साथ मुझे जगाया है? बताओ,यहाँ तुम्हें किससे भय प्राप्त हुआ है? अथवा कौन परलोकका पथिक होनेवाला है?'॥ ११ १/२ ॥

तब रावण अपने पास बैठे हुए कुपित भार्इ कुम्भकर्णसे रोषसे चञ्चल आँखें किये बोला—॥ १२ १/२ ॥

'महाबली वीर! तुम्हारे सोये-सोये दीर्घकाल व्यतीत हो गया। तुम गाढ़ निद्रामें निमग्न होनेके कारण नहीं जानते कि मुझे रामसे भय प्राप्त हुआ है॥ १३ १/२ ॥

'ये दशरथकुमार बलवान् श्रीमान् राम सुग्रीवके साथ समुद्र लाँघकर यहाँ आये हैं और हमारे कुलका विनाश कर रहे हैं॥ १४ १/२ ॥

'हाय! देखो तो सही, समुद्रमें पुल बाँधकर सुखपूर्वक यहाँ आये हुए वानरोंने लङ्काके समस्त वनों और उपवनोंको एकार्णवमय बना दिया है—यहाँ वानररूपी जलका समुद्र-सा लहरा रहा है॥ १५ १/२ ॥

'हमारे जो मुख्य-मुख्य राक्षस वीर थे, उन्हें वानरोंने युद्धमें मार डाला; किंतु रणभूमिमें वानरोंका संहार होता मुझे किसी तरह नहीं दिखायी देता। युद्धमें कभी कोर्इ वानर पहले जीते नहीं गये हैं॥ १६-१७ ॥

'महाबली वीर! इस समय हमारे ऊपर यही भय उपस्थित हुआ है। तुम इससे हमारी रक्षा करो और आज इन वानरोंको नष्ट कर दो। इसीलिये हमने तुम्हें जगाया है॥ १८ ॥

'हमारा सारा खजाना खाली हो गया है; अतः मुझपर अनुग्रह करके तुम इस लङ्कापुरीकी रक्षा करो; अब यहाँ केवल बालक और वृद्ध ही शेष रह गये हैं॥ १९ ॥

'महाबाहो! तुम अपने इस भार्इके लिये अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करो। परंतप! आजसे पहले कभी किसी भार्इसे मैंने ऐसी अनुनय-विनय नहीं की थी॥ २० ॥

'तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा स्नेह है और मुझे तुमसे बड़ी आशा है। राक्षसशिरोमणे! तुमने देवासुर-संग्रामके अवसरोंपर अनेक बार प्रतिद्वन्द्वीका स्थान लेकर रणभूमिमें देवताओं और असुरोंको भी परास्त किया है॥

'अतः भयंकर पराक्रमी वीर! तुम्हीं यह सारा पराक्रमपूर्ण कार्य सम्पन्न करो; क्योंकि समस्त प्राणियोंमें तुम्हारे समान बलवान् मुझे दूसरा कोर्इ नहीं दिखायी देता है॥ २३ ॥

‘तुम युद्धप्रेमी तो हो ही, अपने बन्धु-बान्धवोंसे भी बड़ा प्रेम रखते हो। इस समय तुम मेरा यही प्रिय और उत्तम हित करो। अपने तेजसे शत्रुओंकी सेनाको उसी तरह व्यथित कर दो, जैसे वेगसे उठी हुई प्रचण्ड वायु शरद्-ऋतुके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है’॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६२ ॥

तिरसठवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

तिरसठवाँ सर्ग

कुम्भकर्णका रावणको उसके कुकृत्योंके लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना

राक्षसराज रावणका यह विलाप सुनकर कुम्भकर्ण ठहाका मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला— ॥

‘भाईसाहब! पहले (विभीषण आदिके साथ) विचार करते समय हमलोगोंने जो दोष देखा था, वही तुम्हें इस समय प्राप्त हुआ है; क्योंकि तुमने हितैषी पुरुषों और उनकी बातोंपर विश्वास नहीं किया था॥ २ ॥

‘तुम्हें शीघ्र ही अपने पापकर्मका फल मिल गया। जैसे कुकर्मी पुरुषोंका नरकोंमें पड़ना निश्चित है, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने दुष्कर्मका फल मिलना अवश्यम्भावी था॥ ३ ॥

‘महाराज! केवल बलके घमंडसे तुमने पहले इस पापकर्मकी कोई परवा नहीं की। इसके परिणामका कुछ भी विचार नहीं किया था॥ ४ ॥

‘जो ऐश्वर्यके अभिमानमें आकर पहले करनेयोग्य कार्योंको पीछे करता है और पीछे करनेयोग्य कार्योंको पहले कर डालता है, वह नीति तथा अनीतिको नहीं जानता है॥ ५ ॥

‘जो कार्य उचित देश-काल न होनेपर विपरीत स्थितिमें किये जाते हैं, वे संस्कारहीन अग्नियोंमें होमे गये हविष्यकी भाँति केवल दुःखके ही कारण होते हैं॥ ६ ॥

‘जो राजा सचिवोंके साथ विचार करके क्षय, वृद्धि और स्थानरूपसे उपलक्षित साम, दान और दण्ड—इन तीनों कर्मोंके पाँच^१ प्रकारके प्रयोगको काममें लाता है, वही उत्तम नीति-मार्गपर विद्यमान है, ऐसा समझना चाहिये॥ ७ ॥

‘जो नरेश नीतिशास्त्रके अनुसार मन्त्रियोंके साथ क्षय^२ आदिके लिये उपयुक्त समयका विचार करके तदनुरूप कार्य करता है और अपनी बुद्धिसे सुहृदोंकी भी पहचान कर लेता है, वही कर्तव्य और अकर्तव्यका विवेक कर पाता है॥ ८ ॥

‘राक्षसराज! नीतिज्ञ पुरुषको चाहिये कि धर्म, अर्थ या कामका अथवा सबका अपने समयपर सेवन करे अथवा तीनों द्वन्द्वोंका—धर्म-अर्थ, अर्थ-धर्म और काम-अर्थ इन सबका भी उपयुक्त समयमें ही सेवन करे^३॥

‘धर्म, अर्थ और काम—इन तीनोंमें धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः विशेष अवसरोंपर अर्थ और कामकी उपेक्षा करके भी धर्मका ही सेवन करना चाहिये—इस बातको विश्वसनीय पुरुषोंसे सुनकर भी जो राजा या राजपुरुष नहीं समझता अथवा समझकर भी स्वीकार नहीं करता, उसका अनेक शास्त्रोंका अध्ययन व्यर्थ ही है॥ १० ॥

‘राक्षसशिरोमणे! जो मनस्वी राजा मन्त्रियोंसे अच्छी तरह सलाह करके समयके अनुसार दान, भेद और पराक्रमका, इनके पूर्वोक्त पाँच प्रकारके योगका, नय और अनयका तथा ठीक समयपर धर्म, अर्थ और कामका सेवन करता है, वह इस लोकमें कभी दुःख या विपत्तिका भागी नहीं होता॥ ११-१२ ॥

‘राजाको चाहिये कि वह अर्थतत्त्वज्ञ एवं बुद्धिजीवी मन्त्रियोंकी सलाह लेकर जो अपने लिये परिणाममें हितकर दिखायी देता हो, वही कार्य करे॥ १३ ॥

‘जो पशुके समान बुद्धिवाले किसी तरह मन्त्रियोंके भीतर सम्मिलित कर लिये गये हैं, वे शास्त्रके अर्थको तो जानते नहीं, केवल धृष्टतावश बातें बनाना चाहते हैं॥ १४ ॥

‘शास्त्रके ज्ञानसे शून्य और अर्थशास्त्रसे अनभिज्ञ होते हुए भी प्रचुर सम्पत्ति चाहनेवाले उन अयोग्य मन्त्रियोंकी कही हुई बात कभी नहीं माननी चाहिये॥

‘जो लोग धृष्टताके कारण अहितकर बातको हितका रूप देकर कहते हैं, वे निश्चय ही सलाह लेनेयोग्य नहीं हैं। अतः उन्हें इस कार्यसे अलग कर देना चाहिये। वे तो काम बिगाड़नेवाले ही होते हैं॥ १६ ॥

‘कुछ बुरे मन्त्री साम आदि उपायोंके ज्ञाता शत्रुओंके साथ मिल जाते हैं और अपने स्वामीका विनाश करनेके लिये ही उससे विपरीत कर्म करवाते हैं॥ १७ ॥

‘जब किसी वस्तु या कार्यके निश्चयके लिये मन्त्रियोंकी सलाह ली जा रही हो, उस समय राजा व्यवहारके द्वारा ही उन मन्त्रियोंको पहचाननेका प्रयत्न करे, जो घूस आदि लेकर शत्रुओंसे मिल गये हैं और अपने मित्र-से बने रहकर वास्तवमें शत्रुंका काम करते हैं॥

‘जो राजा चंचल है—आपातरमणीय वचनोंको सुनकर ही संतुष्ट हो जाता है और सहसा बिना सोचे-विचारे ही किसी भी कार्यकी ओर दौड़ पड़ता है, उसके इस छिद्र (दुर्बलता)-को शत्रुलोग उसी तरह ताड़ जाते हैं, जैसे क्रौंच पर्वतके छेदको पक्षी। (क्रौंचपर्वतके छेदसे होकर पक्षी जैसे पर्वतके उस पार आते-जाते हैं, उसी तरह शत्रु भी राजाके उस छिद्र या कमजोरीसे लाभ उठाते हैं)॥ १९ ॥

‘जो राजा शत्रुकि अवहेलना करके अपनी रक्षाका प्रबन्ध नहीं करता है, वह अनेक अनर्थोंका भागी होता और अपने स्थान (राज्य)-से नीचे उतार दिया जाता है॥

‘तुम्हारी प्रिय पत्नी मन्दोदरी और मेरे छोटे भाई विभीषणने पहले तुमसे जो कुछ कहा था, वही हमारे लिये हितकर था। यों तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो’॥

कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर दशमुख रावणने भौंहें टेढ़ी कर लीं और कुपित होकर उससे कहा—॥ २२ ॥

‘तुम माननीय गुरु और आचार्यकी भाँति मुझे उपदेश क्यों दे रहे हो? इस तरह भाषण देनेका परिश्रम करनेसे क्या लाभ होगा? इस समय जो उचित और आवश्यक हो, वह काम करो॥ २३ ॥

‘मैंने भ्रमसे, चितके मोहसे अथवा अपने बल-पराक्रमके भरोसे पहले जो तुमलोगोंकी बात नहीं मानी थी, उसकी इस समय पुनः चर्चा करना व्यर्थ है॥ २४ ॥

‘जो बात बीत गयी, सो तो बीत ही गयी। बुद्धिमान् लोग बीती बातके लिये बारंबार शोक नहीं करते हैं। अब इस समय हमें क्या करना चाहिये, इसका विचार करो। अपने पराक्रमसे मेरे अनीतिजनित दुःखको शान्त कर दो॥ २५ १/२ ॥

‘यदि मुझपर तुम्हारा स्नेह है, यदि अपने भीतर यथेष्ट पराक्रम समझते हो और यदि मेरे इस कार्यको परम कर्तव्य समझकर हृदयमें स्थान देते हो तो युद्ध करो॥

‘वही सुहृद् है, जो सारा कार्य नष्ट हो जानेसे दुःखी हुए स्वजनपर अकारण अनुग्रह करता है तथा वही बन्धु है, जो अनीतिके मार्गपर चलनेसे संकटमें पड़े हुए पुरुषोंकी सहायता करता है’॥ २७ १/२ ॥

रावणको इस प्रकार धीर एवं दारुण वचन बोलते देख उसे रुष्ट समझकर कुम्भकर्ण धीरे-धीरे मधुर वाणीमें कुछ कहनेको उद्यत हुआ॥ २८ १/२ ॥

उसने देखा मेरे भाईकी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठी हैं; अतः कुम्भकर्णने धीरे-धीरे उसे सान्त्वना देते हुए कहा—॥ २९ १/२ ॥

‘शत्रुदमन महाराज! सावधान होकर मेरी बात सुनो। राक्षसराज! संताप करना व्यर्थ है। अब तुम्हें रोष त्यागकर स्वस्थ हो जाना चाहिये॥ ३०-३१ ॥