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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८१

विचित्रिताङ्गः स्रग्वी च परिधानविधूनकः ॥ ७८ ॥
शिरःप्रच्छादकश्चैव छिद्रान्वेषणतत्परः ।
आसङ्गी मुक्तकेशश्च घ्राणकर्णाक्षिदर्शकः ॥ ७९ ॥
दन्तोल्लेखनकश्चैव कर्णनासाविशोधकः ।
राज्ञः समीपे पञ्चाशच्छलान्येतानि सन्ति हि ॥ ८० ॥

पञ्चाशत् (५०) छलों का वर्णन— १. मार्ग को नष्ट करनेवाला, २. दूसरे का अपमान करनेवाला, ३. प्राकार (चहार-दीवारी) का लांघनेवाला ४. पीने के लिये बने हुये जलाशय को नष्ट या दूषित करनेवाला, ५. रहने के लिये बने हुये स्थान को नष्ट या दूषित करनेवाला, ६. परिखा (खाई) को पाटनेवाला, ७. राजा के दोषों को प्रकाशित करनेवाला, ८. बिना आज्ञा लिये अन्तःपुर (जनानखाने) में घुस जानेवाला, ९. बिना आज्ञा के वासगृह (रहने का स्थान), १०. भाण्डगृह (खजाना), ११. या महानस (रसोई गृह) में घुसनेवाला, १२. भोजन करते समय खानेवाले को एकटक देखनेवाला, १३. जानबूझ कर मल, १४. मूत्र, १५. कफ १६. अधोवायु का त्याग करनेवाला, १७. राजा के आगे वीरासन बांधकर घमण्ड से बैठनेवाला, १८. राजा के बैठने के आगे के स्थान को छेकनेवाला, १९. राजा से अधिक वेष-भूषा धारण किये हुये राजा के सामने उपस्थित होनेवाला, २१. किसी के गृह में प्रधान द्वार को छोड़कर अन्य मार्ग से प्रवेश करनेवाला, २२. असमय में किसी के घर में जानेवाला, २३. बिना अनुमति के किसी की शय्या पर शयन करनेवाला २४. आसन पर बैठनेवाला, २५. या खड़ाऊं अथवा जूता पहननेवाला, २६. राजा के सोने के समय शय्या पर पहुँच जाने पर भी उनके समीप ठहरनेवाला, २७. राजा के शत्रु की भी सेवा करनेवाला, २८. बिना अनुमति के किसी के गृह में ठहर जानेवाला, २९. बिना अनुमति के किसी के वस्त्र, ३०. आभूषण, ३१. या स्वर्ण का धारण करनेवाला, ३२. जबरदस्ती दूसरे के पान को लेकर खानेवाला, ३३. भाषण के लिये नियुक्त न किये जाने पर भी भाषण करनेवाला, ३४. राजा की निन्दा करनेवाला, ३५. राजा के समीप में केवल एक वस्त्र पहननेवाला, ३६. तेल लगाकर जानेवाला, ३७. केश खोल कर जानेवाला, ३८. मुख ढँक कर जानेवाला, ३९. विचित्र ढङ्ग से अङ्गों को बनाकर जानेवाला, ४०. माला पहनकर जानेवाला, ४१. पहिने हुये वस्त्र को हिलानेवाला, ४२. सिर को ढँकनेवाला, ४३. दूसरे के छिद्रों को ढूंढ़नेवाला, ४४. मद्यपानादि व्यसन करनेवाला, ४५. वेश-भूषादि का त्याग करनेवाला, ४६. अपनी नाक, ४७. कान, ४८. या आंख को विशेष रूप से दिखानेवाला, ४९. दांत को कुरेदनेवाला,

२८२ शुक्रनीतिः

१०. कान या नाक से मल निकालनेवाला, राजा के समीप में ये ५० दुष्ट (दोष) माने जाते हैं।

आज्ञोल्लङ्घनकारित्वं स्त्रीवधो वर्णसङ्करः।
परस्त्रीगमनं चौर्यं गर्भश्चैव पतिं विना ॥ ८१ ॥
वाक्पारुष्यमवाच्याद्यं दण्डपारुष्यमेव च।
गर्भस्य पातनं चैवेत्यपराधा दशैव तु ॥ ८२ ॥

दश अपराधों का वर्णन— १. आज्ञा का उल्लङ्घन करना, २. स्त्री की हत्या करना, ३. विवाह द्वारा वर्णसङ्करता करना, ४. पर-स्त्री गमन करना, ५. चोरी करना, ६. पति के अलावा अन्य पुरुष से गर्भ होना, ७. कठोर वचन बोलना, ८. नहीं कहने योग्य बातें कहना ९. कठोर दण्ड देना, १०. गर्भ का गिराना इस प्रकार से ये १० अपराध होते हैं।

उत्कृती सस्यघाती चाप्यग्निदश्च तथैव च।
राज्ञो द्रोहप्रकर्ता च तन्मुद्राभेदकस्तथा ॥ ८३
तन्मन्त्रस्य प्रभेत्ता च बद्धस्य च विमोचकः।
अस्वामिविक्रयं दानं भागं दण्डं विचिन्वति ॥ ८४ ॥
पटहाघोषणाच्छादी द्रव्यमस्वामिकं च यत्।
राजाबलीढद्रव्यं च यच्चैवाङ्गविनाशनम् ॥ ८५ ॥
द्वाविंशतिपदान्याहुर्नृपज्ञेयानि पण्डिताः।

राजा द्वारा ज्ञेय २२ पदों का वर्णन— १. उद्वेग करनेवाला २. धान्य (खेती) नष्ट करनेवाला, ३. गृहादि में अग्नि लगानेवाला, ४. राजद्रोह करनेवाला, ५. राजचिह्न को नष्ट करनेवाला, ६. राजा की गुप्त मन्त्रणा को प्रकाशित करनेवाला, ७. कैदियों को जेल से भगानेवाला, ८. बिना स्वामी के वस्तु को बेंच देना, ९. किसी के दान, हिस्सा, और दण्ड को लुप्त करनेवाला, ९. राजा के द्वारा जिस विषय की डुग्गी पिटा दी गई हो, उसको छिपानेवाला, १०. बिना स्वामी के (लावारिस) द्रव्य को ले लेनेवाला, ११. राजा से ले लिये द्रव्य पर अधिकार जमानेवाला, १२. किसी अङ्गों को काट देना, ये पूर्वोक्त १० अपराधों के सहित २२ पद अर्थात् विवाद के स्थान कहे हुये हैं जिसे पण्डितों को जानना चाहिये।

उद्धतः क्रूरवाग्वेषो गर्वितश्चण्ड एव हि ॥ ८६ ॥
सहासनश्चाभिमानी वादी दण्डमवाप्नुयात्।

दण्ड-योग्य वादी के लक्षणों का निर्देश— जो वादी उद्धत स्वभाववाला, निष्ठुर वचन बोलनेवाला एवं निष्ठुर कार्य करने योग्य वेषवाला, गर्वी, अत्यन्त

। चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८३

क्रोधी, विचारपति (जज) के साथ १ आसन पर बैठनेवाला और अत्यन्त भागी हो तो उसे दण्ड देना चाहिये ।

अर्थिना कथितं राज्ञे तदावेदनसंज्ञकम् ॥ ८७ ॥
कथितं प्राड्विवाकादौ सा भाषाऽखिलबोधिनी ।
स पूर्वपक्षः सभ्यादिस्तं विमृश्य यथार्थतः ॥ ८८ ॥
अर्थितः पूरयेद्धीनं तत्साध्यमधिकं त्यजेत् ।
वादिनश्चिह्नितं साध्यं कृत्वा राजा विमुद्रयेत् ॥ ८९ ॥

आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध-योग्य भाषा (बयान) का निर्देश—
वादी द्वारा जो राजा के पास आवेदन पत्र दिया जाता है, उसे 'आवेदन' (अर्जी) कहते हैं। और जो प्राड्विवाक (जज) आदि के समक्ष कहा जाता है उसे 'भाषा' (बयान) कहते हैं। जो कि सारी बातों को समझानेवाली होती है। और वही 'पूर्वपक्ष' कहा जाता है। सभ्य (जूरी) आदि उसी पर प्रार्थना किये जाने पर यथार्थ रीति से विचार कर जो कमी हो उसे वादी से पूछकर पूरा कर ले एवं जो अधिक हो उसे निकाल दे। इस भांति से उसके बयान को पूर्ण करके उस पर उसके अंगूठे का निशान लगवावे और अन्त में राजा उस पर अपनी मुहर लगा दे। वादी का यह बयान भी एक प्रकार का साध्य (गवाही) होता है।

अशोधयित्वा पक्षं ये ह्युत्तरं दापयन्ति ताम् ।
रागात्क्षोभाद्भयाद्वापि स्मृत्यर्थे बाधिकारिणः ॥ ९० ॥
सभ्यादीन् दण्डयित्वा तु ह्यधिकारात्निवर्तयेत् ।

पूर्वपक्ष को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार-च्युत करने का निर्देश—
जो अधिकारी पुरुष राग, क्षोभ या भय से इस प्रकार से बिना वादी के पक्ष का जांच-परताल किये ही प्रतिवादी से उत्तर दिलाते हैं ऐसा करनेवाले उन अधिकारी सभ्य (जूरी) आदि को भविष्य में ऐसा पुनः निन्दित कार्य न करने का स्मरण रखने के लिये राजा दण्डित करे एवं अधिकार-च्युत कर दे।

ग्राह्याग्राह्यं विवादं तु सुविमृश्य समाश्रयेत् ॥ ९१ ॥
सञ्जातपूर्वपक्षं तु वादिनं सन्निरोधयेत् ।
राजाज्ञया सत्पुरुषैः सत्यवाग्भिर्मनोहरैः ॥ ९२ ॥
निरालसैरिङ्गितज्ञैश्च दृढशस्त्रास्त्रधारिभिः ।

पूर्वपक्ष पूर्ण होने पर वादी को रोक देने का निर्देश—
राजा विवाद (मुकदमा) लेने योग्य है या नहीं इसका भलीभांति विचार कर यदि योग्य हो तो ले ले। और जब वादी का पूर्वपक्ष (बयान) पूरा हो जाय

२८४शुक्रनीतिः

तो आगे कहने के लिये उसे अपनी आज्ञा से सत्य बोलनेवाले, मनोहर, आलस्यशून्य, इङ्गित ( इसारे ) को समझनेवाले, दृढ स्वभावों के धारण करनेवाले ऐसे सत्पुरुषों के द्वारा रोकवा दे ।

वक्तव्येऽर्थे ह्यतिष्ठन्तमुत्क्रामन्तं च तद्वचः ॥ ६३ ॥
आसेधयेद्विवादार्थी यावदाह्वानदर्शनम् ।
प्रत्यर्थिनं तु शपथैराज्ञया वा नृपस्य च ॥ ६४ ॥

जब तक राजाज्ञा न हो तब तक प्रत्यर्थी को रोक देने का निर्देश— विवादार्थी (वादी) व्यक्ति वक्तव्य अर्थ में स्थित न होते हुये अथवा उसके वचन का अतिक्रमण करते हुये प्रतिवादी व्यक्ति को बुलाने पर आने के साथ ही सौगन्ध देकर अथवा राजाज्ञा से रोक देवे ।

स्थानासेधः कालकृतः प्रवासात् कर्मणस्तथा ।
चतुर्विधः स्यादासेधो नासिद्धस्तं विलङ्घयेत् ॥ ९५ ॥

४ प्रकार के आसेधों का वर्णन— आसेध ४ प्रकार का होता है । १. स्थानकृत, २. कालकृत, ३. प्रवासकृत तथा ४. कर्मकृत आसेध । आसिद्ध ( रोका हुआ ) आसेध ( रोक ) का उल्लङ्घन न करे ।

यस्त्विन्द्रियनिरोधेन व्याहारोच्छ्वासनादिभिः ।
आसेधयेदनासेध्यैः स दण्ड्यो न त्वतिक्रमी ॥ ९६ ॥

यदि कोई मल-मूत्रादियों के द्वारों के निरोध से, कटु वाक्यों से अथवा कठिन शासन आदि जैसे अयोग्य आसेध के प्रकारों से किसी को अर्थात् वादी या प्रतिवादी को रोके तो वह दण्डनीय होता है । किन्तु आसेध का अतिक्रमण करनेवाला नहीं दण्डनीय होता है ।

आसेधकाल आसिद्ध आसेधं योऽतिवर्तते ।
स विनेयोऽन्यथा कुर्वन्नासेद्धा दण्डभाग् भवेत् ॥ ६७ ॥

जो आसेध ( अवरोध ) के समय में अवरुद्ध होकर आसेध का उल्लङ्घन करता है वह दण्डनीय होता है और यदि आसेध करनेवाला अन्यथा रीति से आसेध करे तो वह दण्डनीय होता है ।

यस्याभियोगं कुरुते तत्त्वेनाशङ्कयाऽथवा ।
तमेवाह्वानयेद्राजा मुद्रया पुरुषेण वा ॥ ६८ ॥

जिस पर अपराध की शंका या जो अपराधी हो उसी को बुलाने के लिये राजा का निर्देश— वस्तुतः या सन्देहवश जिसके ऊपर अभियोग ( मुकदमा ) चलाया जाता है, उसी को राजा अपनी मुहर लगे हुये पत्र या राजपुरुष ( सिपाही ) द्वारा न्यायालय में बुलावे ।

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८५

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८५

शङ्काऽसतां तु संसर्गादनुभूतकृतेस्तथा । होढाभिदर्शनात्तत्त्वं विजानाति विचक्षणः ॥ ९९ ॥

दुष्टों के साथ संसर्ग होने से तथा उसके किसी कार्य को देखकर अपराध का अनुमान होने से अभियुक्त के ऊपर अपराध की आशंका होती है । और खोये या लुटे हुये द्रव्य के देखने से बुद्धिमान व्यक्ति अपराध के तत्त्व को अर्थात् यथार्थ रूप से अपराध को जान लेता है ।

अकल्पबालस्थविर-विषमस्थक्रियाकुलान् । कार्यातिपातिद्व्यसनि-नृपकार्योत्सवाकुलान् ॥ १०० ॥ मत्तोन्मत्तप्रमत्तार्त्त-भृत्यान् नाह्वानयेन्नृपः ।

अपराधियों को बुलाने के लिये असमर्थादि भृत्यों को न बुलाने का निर्देश— राजा रोगी, बालक, वृद्ध, विषम परिस्थिति में हुये, अनेक कार्यों में फंसे रहने से व्यस्त, अभियोग (मुकदमा) के समय में अनुपस्थित, व्यसनी, राजा के या किसी उत्सव के कार्यों में फंसे हुये, सुरापानादि से मत्त हुये, उन्मत्त, असावधान तथा दुःखी चित्तवाले ऐसे भृत्यों (चपरासियों) को अपराधी को बुलाने के लिये न बुलावे ।

न हीनपक्षां युवतिं कुले जातां प्रसूतिकाम् ॥ १०१ ॥ सर्ववर्णोत्तमां कन्यां नाज्ञातप्रभुकाः स्त्रियः ।

**हीनपक्षादि स्त्रियों को भी न बुलाने का निर्देश—**हीन पक्षवाली (अनाथा) युवती, अच्छे कुल में उत्पन्न हुई सद्यःप्रसूता ऐसी स्त्री या ब्राह्मण की कन्या या जिनके स्वामी का पता न हो ऐसी स्त्रियों को न्यायालय में न बुलवावे प्रत्युत उसके स्थान पर ही जाकर उससे अभियोग-सम्बन्ध में प्रश्न करे ।

निर्वैष्टुकामो रोगार्तो यियक्षुर्व्यसनेस्थितः ॥ १०२ ॥ अभियुक्तस्तथाऽन्येन राजकार्योद्यतस्तथा । गवां प्रचारे गोपालाः सस्यवापे कृषीवलाः ॥ १०३ ॥ शिल्पिनश्चापि तत्कालमायुधीयाश्च विग्रहे । अख्यातव्यवहारश्च दूतो दानोन्मुखो व्रती ॥ १०४ ॥ विषमस्थश्च नासेध्या न चैतानाह्वयेन्नृपः ।

निर्वैष्टुकाम (विवाहोद्यत) आदि को आसेध (बुलाने) का निषेध— विवाह के लिये उद्यत, रोग से दुःखी, यज्ञ करने में इच्छुक, विपत्ति में पड़ा हुआ, अन्य के द्वारा मुकदमे में फंसा हुआ, राजा के कार्य करने में लगा हुआ, गायों के चराने में लगे हुये अहीर, खेत के बोने में तत्पर किसान, शिल्पी (कारीगर), शस्त्र लेकर युद्ध में लड़ते हुये, व्यवहार को न जाननेवाला, दूत

२८६ | शुक्रनीतिः

कार्य में नियुक्त, दान करने में उद्यत, किसी व्रत का धारण करनेवाला, विषमस्थान में पड़ा हुआ ऐसे लोग मुकदमे की तारीख के समय पेश करने योग्य नहीं होते हैं अतः राजा इन्हें न बुलवाये।

नदीसन्तारकान्तार-दुर्द्देशोपप्लवादिषु ॥ १०५ ॥
असिद्धस्तं परासेधमुक्तामन्नापराध्नुयात् ।

नदी को पार करने की कठिनाई होने पर, दुर्गम जंगल, दुर्द्देश या किसी उपद्रव में पड़ जाने पर जो आने में असमर्थ हो जाने से मुकद्दमे की तारीख पर न आ सके तो राजा उसे अपराधी नहीं समझे।

कालं देशं च विज्ञाय कार्याणां च बलाबलम् ॥ १०६ ॥
अकल्यादीनपि शनैर्यानैराह्वानयेन्नृपः ।
ज्ञात्वाऽभियोगं येऽपि स्युर्वने प्रव्रजितादयः ॥ १०७ ॥
तानप्याह्वानयेद्राजा गुरुकार्येष्वकोपयन् ।

आने में असमर्थ लोगों को सवारी से बुलवाने का निर्देश— काल, देश और कार्य के बलाबल को समझ कर असमर्थ सज्जन पुरुषों को राजा सवारी से धीरे २ बुलवावे। और जो लोग संन्यास ग्रहण कर वन में रहते हैं उनके ऊपर अभियोग लगने पर उन्हें भी विशेष कार्य यदि हो तभी इस रीति से सम्मानपूर्वक बुलवाये कि वे कुपित न हों।

व्यवहारानभिज्ञेन ह्यन्यकार्याकुलेन च ॥ १०८ ॥
प्रत्यर्थिनाऽर्थिना तज्ज्ञः कार्यः प्रतिनिधिस्तदा ।

अर्थी-प्रत्यर्थी के अन्य कार्य में व्यस्त रहने पर प्रतिनिधि करने का निर्देश— व्यवहार (मुकदमा लड़ना) न जानता हो या किसी कार्य में व्यस्त हो ऐसा वादी या प्रतिवादी चाहे जो हो वह मुकद्दमे के जानकार किसी भी व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि बनावे।

अप्रगल्भजडोन्मत्त-वृद्धस्त्रीबालरोगिणाम् ॥ १०९ ॥
पूर्वोत्तरं वदेद् बन्धु-र्नियुक्तो वाऽथवा नरः ।
पिता माता सुहृद् बन्धु-र्भ्राता संबन्धिनोऽपि च ॥ ११० ॥
यदि कुर्युदुपस्थानं वादं तत्र प्रवर्त्तयेत् ।

अप्रगल्भ आदि के उत्तर पक्ष को बन्धु आदि को कहने का तथा पक्ष ठीक-ठीक कह सकने पर ही विवाद को प्रवृत्त करने का निर्देश— अप्रगल्भ (बातचीत करने में बेवकूफ), जड़, पागल, वृद्ध, स्त्री, बालक और रोगी इन लोगों के पूर्व पक्ष या उत्तर पक्ष को इनके बन्धु या नियुक्त कोई प्रतिनिधि यदि कह सकें अथवा इनके पिता, माता, मित्र, बन्धु, भाई या सम्बन्धी पूर्वपक्षादि को ठीक २ कह सकें तो मुकद्दमे की कार्यवाही प्रारम्भ कर देवें।

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८७

यः कश्चित्कारयेत् किञ्चिन्नियोगाद् येन केनचित् ॥ १११ ॥
तत्तेनैव कृतं ज्ञेयमनिवर्त्यं हि तत्स्मृतम् ।
**जिस किसी से कार्य करा लेने पर वह उसी का किया समझने का निर्देश—**यदि कोई किसी को अपना प्रतिनिधि बनाकर उससे जो कुछ कार्य करा ले तो वह उसी का ही किया हुआ समझना चाहिये । और उसे पलटा नहीं जा सकता है ।

नियोगितस्यापि भृतिं विवादात् षोडशांशिकीम् ॥ ११२ ॥
विंशत्यंशां तदर्धां वा तदर्धां च तदर्धिकाम् ।
यथा द्रव्याधिकं कार्यं हीना हीना भृतिस्तथा ॥ ११३ ॥
यदि बहुनियोगी स्यादन्यथा तस्य पोषणम् ।
धर्मज्ञो व्यवहारज्ञो नियोक्तव्योऽन्यथा न हि ॥ ११४ ॥
अन्यथा भृतिगृह्णन्तं दण्डयेच्च नियोगिनम् ।
**नियोजित पुरुष को १६ वां भाग भृति ( फीस ) देने एवं अन्यथा फीस ग्रहण करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**नियुक्त किये हुये वकील आदि की फीस मुकदमे की हैसियत से १६ वें हिस्से के बराबर या बीसवें, दशवें, पाँचवें या ढ़ाईवें हिस्से के बराबर होनी चाहिये । यदि बहुत से नियोगी हों तो जैसा अधिक द्रव्य हो उसके अनुसार कम कम करके फीस दे । अन्यथा फीस देने की शक्ति न हो तो उसका पालन-पोषण करना चाहिये । और धर्म तथा व्यवहार को जाननेवाला व्यक्ति नियुक्त करना चाहिये अन्यथा नहीं करना चाहिये । यदि इससे अधिक फीस कोई मांगता है तो वह दण्डनीय होता है ।

कार्यो नित्यं नियोगी च नृपेण स्वमनीषया ॥ ११५ ॥
लोभेन त्वन्यथा कुर्वन् नियोगी दण्डमर्हति ।
यो न भ्राता न च पिता न पुत्रो न नियोगकृत् ॥ ११६ ॥
परार्थवादी दण्ड्यः स्याद् व्यवहारेषु विब्रुवन् ।
**राजा को अपनी बुद्धि से नियोगी करने का और नियोगी का लोभ से अन्यथा करने पर दण्डयोग्य होने का एवं भ्राता आदि न होने पर कुछ कहने पर दण्ड योग्य होने का निर्देश—**राजा अपनी बुद्धि से विचार कर सदा नियोगी पुरुष को नियुक्त करे । यदि नियोगी पुरुष लोभ से अन्यथा करे तो वह दण्डनीय होता है । जो भाई, पिता, पुत्र या नियोगी पुरुष ( वकील आदि ) न होकर दूसरे के लिये कुछ कहता है या व्यवहार में अन्यथा ( विपरीत ) बात करता है वह दण्डनीय होता है ।

तदधीनकुटुम्बिन्यः स्वैरिण्यो गणिकाश्च याः ॥ ११७ ॥
निष्कुला याश्च पतितास्तासामाह्वानमिष्यते ।

२८८शुक्रनीतिः

कचहरी में बुलाने योग्य स्त्रियों का निर्देश— जो स्त्रियां स्वयं कमाकर कुटुम्ब की जीविका चला रही हैं या व्यभिचारिणी किंवा वेश्यावृत्ति करनेवाली हैं, या हीन कुलवाली या पतिता (जातिच्युता) हों उन्हें राजा कचहरी में बुला सकता है।

प्रवर्त्तयित्वा वादं तु वादिनौ तु मृतौ यदि ॥ ११८ ॥
तत्पुत्रो विवदेत्तज्ज्ञो ह्यन्यथा तु निवर्त्तयेत् ।

विवाद को लगाकर मर जाने पर पुत्र को विवाद करने का निर्देश— मुकदमा कायम करके यदि वादी-प्रतिवादी मर जायं तो उनके पुत्र मुकदमा लड़ सकते हैं। यदि वे लड़ने के लिये न आयें तो राजा मुकदमा समाप्त (खारिज) कर दे।

मनुष्यमारणे स्तेये परदाराभिमर्शने ॥ ११९ ॥
अभक्ष्यभक्षणे चैव कन्याहरणदूषणे ।
पारुष्ये कूटकरणे नृपद्रोहे च साहसे ॥ १२० ॥
प्रतिनिधिर्न दातव्यः कर्त्ता तु विवदेत् स्वयम् ।

मनुष्य की इत्यादि अपराधों में प्रतिनिधि करने का निर्देश— मनुष्य की हत्या करने पर, या चोरी, किसी पराई स्त्री के साथ व्यभिचार, अभक्ष्य (न खाने योग्य शास्त्र निषिद्ध पदार्थ) भक्षण किंवा किसी की कन्या हरण, या किसी को कठोर वचन का प्रयोग, जालसाजी, राजद्रोह, साहस (डाका पड़ना) इत्यादि करने पर प्रतिनिधि नहीं देना चाहिये प्रत्युत स्वयं कर्त्ता उपस्थित होकर मुकदमा लड़े।

आहूतो यत्र नागच्छेद् दर्पाद् बन्धुबलान्वितः ॥ १२१ ॥
अभियोगानुरूपेण तस्य दण्डं प्रकल्पयेत् ।

अपने बन्धु-बल के घमण्ड में आकर स्वयं न आने पर दण्ड देने का निर्देश— और यदि उक्त मुकदमों में अभियुक्त (अपराधी) अपने बन्धु-बल के घमण्ड में आकर स्वयं न आवे तो राजा उसे जबरदस्ती बुलाकर अपराधानुरूप दण्ड देवे।

दूतेनाह्वानितं प्राप्ताधर्षकं प्रतिवादिनम् ॥ १२२ ॥
दृष्ट्वा राज्ञा तयोश्चिन्त्यो यथार्हप्रतिभूस्त्वतः ।
दास्याम्यदत्तमेतेन दर्शयामि तवान्तिके ॥ १२३ ॥
एनमार्थं दापयिष्ये ह्यस्मात्तेन भयं क्वचित् ।
अकृतं च करिष्यामि ह्यनेनायं च वृत्तिमान् ॥ १२४ ॥

प्रतिभू (जमानतदार) के कृत्यों का निर्देश— दूत (चपरासी) के द्वारा बुलाने से आये हुये अपराधी या प्रतिवादी को देखकर राजा उन दोनों के

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८९

किये योग्य जमानतदार को सोचसमझकर स्वीकार करे जो कि सावधान होकर यह स्वीकार करे कि डिग्री का रुपया यदि प्रतिवादी न दे तो मैं देने को तैयार हूँ और यदि अपराधी नियत तारीख पर नहीं आयेगा तो मैं उसे लाकर उपस्थित करूंगा, और जो कुछ इसके पास धरोहर रूप में रखा होगा उसे मैं दिला दूंगा, इससे तुम्हें कभी भय नहीं करना चाहिये, इसने जो अभी तक नहीं कर पाया है उसे मैं पुनः इसी से करा दूँगा। यह स्थिर आजीविकावाला है, दरिद्र नहीं है।

अस्तीति न च मिथ्यैतदङ्गीकुर्यादतन्द्रितः । प्रगल्भो बहुविश्वस्तश्चाधीनो विश्रुतो धनी ॥ १२५ ॥ उभयोः प्रतिभूर्ग्राह्यः समर्थः कार्यनिर्णये । विवादिनौ संनिरुध्य ततो वादं प्रवर्तयेत् ॥ १२६ ॥

यह कभी मिथ्या व्यवहार नहीं करनेवाला है इस प्रकार से जो बोलनेवाला, बहुत लोगों का विश्वासपात्र, राजा के अधीन रहनेवाला, विख्यात और धनी एवं कार्य का निर्णय करने में समर्थ हो ऐसे जमानतदार को राजा स्वीकार करे। इसके बाद राजा वादी तथा प्रतिवादी को अपने समक्ष उपस्थित कर मुकद्दमा देखना प्रारम्भ करे।

स्वपुष्टौ राजपुष्टौ वा स्वभृत्या पुष्टरक्षकौ । ससाधनौ तत्त्वमिच्छुः कूटसाधनशङ्कया ॥ १२७ ॥

**विवाद के साधनों की जांच कर लेने का निर्देश—**कोई वादी या प्रतिवादी अपने २ साधनों में कोई जालसाजी तो नहीं है इसलिये तत्त्व को जानने का इच्छुक राजा यह देखे कि वादी-प्रतिवादी दोनों अपनी पुष्टि कर रहे हैं या नहीं, राजा के द्वारा उनकी पुष्टि हो रही है या नहीं, अपनी २ नौकरी से प्रमाणों की पुष्टि की रक्षा कर रहे हैं या नहीं, और अपने २ मुकद्दमे के सम्पूर्ण साधनों से युक्त है या नहीं।

प्रतिज्ञादोषनिर्मुक्तं साध्यं सत्कारणान्वितम् । निश्चितं लोकसिद्धं च पक्षं पक्षविदो विदुः ॥ १२८ ॥

**पक्ष के लक्षण—**जो प्रतिज्ञा के दोषों से रहित, उत्तम कारणों से युक्त, साधनों द्वारा सिद्ध किया जानेवाला, निश्चित किया हुआ एवं लोकसिद्ध हो उसे पक्षवेत्ता लोग 'पक्ष' कहते हैं।

अन्यार्थमर्थहीनं च प्रमाणागमवर्जितम् । लेख्यहीनाधिकं भ्रष्टं भाषादोषा उदाहृताः ॥ १२९ ॥

**भाषा (अर्जीदावा) के दोषों का निर्देश—**जो अन्य अर्थक या अर्थ से हीन,

१९ शु०

२६० | शुक्रनीतिः

प्रमाण या लोक-शास्त्र से विरुद्ध, लिखने में न्यूनता, अधिकता या भ्रष्टता से युक्त हो, उसे भाषादोष कहते हैं, अर्थात् ये अर्जीदावा के दोष कहे गये हैं।

अप्रसिद्धं निराबाधं निरर्थं निष्प्रयोजनम् ।
असाध्यं वा विरुद्धं वा पक्षाभासं विवर्जयेत् ॥ १३० ॥

पक्षाभास को छोड़ देने का निर्देश— जो अप्रसिद्ध, निराबाध, निरर्थक, निष्प्रयोजन, असाध्य वा विरुद्ध पक्ष हो उसे 'पक्षाभास' समझ कर छोड़ दे।

न केन चिच्छ्रुतादृष्टः सोऽप्रसिद्ध उदाहृतः ।
अहं मूकेन संशप्तो वन्ध्यापुत्रेण ताडितः ॥ १३१ ॥

अप्रसिद्ध के लक्षण— जो किसी ने न सुना हो और न देखा हो उसे 'अप्रसिद्ध' कहते हैं, जैसे मुझे गूंगे ने गाली दी या बन्ध्या स्त्री के लड़के ने मारा है।

अधीते सुस्वरं गाति स्वगेहे विहरत्ययम् ।
धत्ते मार्गमुखद्वारं मम गेहसमीपतः ॥ १३२ ॥
इति ज्ञेयं निराबाधं निष्प्रयोजनमेव तत् ।

निराबाध या निष्प्रयोजन के लक्षण— यह अपने गृह में रहकर उच्च स्वर से पढ़ता है, या स्वर के साथ सुन्दर रीति से गाता है किंवा विहार करता है। अथवा मेरे घर के समीप में मार्ग की ओर अपने गृह का द्वार बनाता है इन सबों को 'निराबाध' और 'निष्प्रयोजन' भी कहते हैं। क्योंकि ऐसा करने में कोई किसी को रोक नहीं सकता है इससे यह 'निराबाध' और 'निष्प्रयोजन' भी कहलाता है।

सदा मदत्तकन्यायां जामाता विहरत्ययम् ॥ १३३ ॥
गर्भं धत्ते न वन्ध्येयं मृतोऽयं न प्रभाषते ।
किमर्थमिति तज्ज्ञेयमसाध्यं च विरुद्धकम् ॥ १३४ ॥

असाध्य या विरुद्ध के लक्षण— यह मेरा जामाता (दामाद) मेरी दी हुई कन्या के साथ सदा क्यों रमण करता है? यह बन्ध्या स्त्री क्यों नहीं गर्भ धारण करती है। यह मरा हुआ मनुष्य क्यों नहीं बोलता है इन सबों को 'असाध्य' वा 'विरुद्ध' कहते हैं।

मद्दत्तदुःखसुखतो लोको दूयते न न नन्दति ।
निरर्थमिति वा ज्ञेयं निष्प्रयोजनमेव वा ॥ १३५ ॥

निरर्थक या निष्प्रयोजन के लक्षण— मेरे द्वारा दिये दुःख वा सुख से लोग क्यों दुःखी या सुखी होते हैं अथवा निन्दा या स्तुति करते हैं? इसको 'निरर्थक' या 'निष्प्रयोजन' भी कहते हैं।

श्रावयित्वा तु यत्कार्यं त्यजेदन्यद् वदेदसौ ।

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६१

अन्यपक्षाश्रयाद्वादी हीनो दण्ड्यश्च स स्मृतः ॥ १३६ ॥

दण्डनीय वादी के लक्षण— जो वादी जिस कार्य को सुनाकर पुनः उसे छोड़ दे और उसके विरुद्ध पक्ष का आश्रय लेकर दूसरे ढङ्ग से कहने लगे तो वह हीन समझा जाता है और दण्डनीय होता है।

विनिश्चिते पूर्वपक्षे ग्राह्याग्राह्यविशोधिते ।
प्रतिज्ञार्थे स्थिरीभूते लेखयेदुत्तरं ततः ॥ १३७ ॥

उत्तर लेखन का निर्देश— जब पूर्वपक्ष (अर्जीदावा) पूर्ण हो जाय और उसमें ग्रहण करने या त्याग करने योग्य बातों का निर्णय हो जाय और प्रतिज्ञा किये हुये अर्थ का निश्चय हो जाय तब उसके बाद उत्तर लिखावे।

तत्राभियोक्ता प्राक् पृष्टो ह्यभियुक्तस्त्वनन्तरम् ।
प्राड्विवाकः सदस्याश्चैर्दाप्येते ह्युत्तरं ततः ॥ १३८ ॥
श्रुतार्थस्योत्तरं लेख्यं पूर्वावेदकसंनिधौ ।
पक्षस्य व्यापकं सारमसन्दिग्धमनाकुलम् ॥ १३९ ॥
अव्याख्यागम्यमित्येतन्निन्दुष्टं प्रतिवादिना ।

असंदिग्ध उत्तर के लक्षण— उसमें प्रथम वादी से पूछना चाहिये बाद में प्रतिवादी से पूछना उचित है। इन सबों के बाद प्राड्विवाक (जज), सदस्य (जूरी) आदि से उत्तर दिलावे, सुने हुये अर्थ का उत्तर प्रथम दावा करनेवाले के समीप में (समक्ष) लिखे जिसमें उसके पक्ष का व्यापक वर्णन होते हुये सारभाग हो और असंदिग्ध एवं त्रुटिशून्य हो। और जिसमें बिना व्याख्या के ही समझ में आ जाय तथा प्रतिवादी द्वारा किसी प्रकार की आपत्ति करने योग्य न हो।

सन्दिग्धमन्यत् प्रकृतादत्यल्पमतिभूरि च ॥ १४० ॥
पक्षैकदेशो व्याप्यं यत्तत्तु नैवोत्तरं भवेत् ।

सन्दिग्ध उत्तर के लक्षण— और जो उत्तर संदेहयुक्त, प्रसङ्ग से बाहर, अत्यन्त संक्षिप्त, अत्यन्त विस्तृत, पक्ष के एक ही अंश में व्याप्त रहनेवाला (अर्थात् संपूर्ण अंश पर प्रकाश न डाला गया हो) ऐसे जो उत्तर हों उन्हें नहीं लिखना चाहिये।

न चाहूतो वदेत्किञ्चिद्धीनो दण्ड्यश्च स स्मृतः ॥ १४१ ॥

दण्डयोग्य प्रतिवादी के लक्षण— और बुलाने पर भी यदि प्रतिवादी उत्तर न दे तो वह हीन एवं दण्डनीय होता है।

पूर्वपक्षे यथार्थे तु न दद्यादुत्तरं तु यः ।
प्रत्यर्थी दापनीयः स्यात् सामादिभिरुपक्रमैः ॥ १४२ ॥

पूर्वपक्ष (वादी का पक्ष) यदि यथार्थ होने पर प्रतिवादी कुछ उत्तर न

२६२शुक्रनीतिः

वे तो प्रतिवादी पर डिग्री कर देना चाहिये और सामादि उपायों से वादी को रुपया दिला देना चाहिये ।

मोहाद्वा यदि वा शाठ्याद् यन्नोक्तं पूर्ववादिना ।
उत्तरान्तर्गतं वा तत्प्रश्नैर्ग्राह्यं द्वयोरपि ॥ १४३ ॥

मोहवश या शठतावश पहले वादी ने जो नहीं भी कहा है और प्रतिवादी ने उत्तर देते समय जिसे न कहा हो उसे जज प्रश्न करके साफ कर ले ।

सत्यं मिथ्योत्तरं चैव प्रत्यवस्कन्दनं तथा ।
पूर्वन्यायविधिश्चैवमुत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ १४४ ॥

४ प्रकार के उत्तर—१. सत्य उत्तर २. मिथ्या उत्तर, ३. प्रत्यवस्कन्दन, ४. पूर्वन्यायविधि इस भांति से उत्तर ४ प्रकार का होता है ।

अङ्गीकृतं यथार्थं यद् वाद्युक्तं प्रतिवादिना ।
सत्योत्तरं तु तज्ज्ञेयं प्रतिपत्तिश्च सा स्मृता ॥ १४५ ॥

सत्योत्तर के लक्षण—वादी ने जो कुछ कहा है वह ठीक है ऐसा प्रतिवादी के स्वीकार करने पर जो उत्तर है वह 'सत्य' उत्तर कहा जाता है, उसको 'प्रतिपत्ति' भी कहते हैं ।

श्रुत्वा भाषार्थमन्यस्तु यदि तं प्रतिषेधति ।
अर्थतः शब्दतो वापि मिथ्या तज्ज्ञेयमुत्तरम् ॥ १४६ ॥

मिथ्योत्तर के लक्षण—वादी के भाषार्थ ( प्रार्थना पत्र ) को सुनकर यदि प्रतिवादी उसको नहीं स्वीकार करता है अर्थात् निषेध करता है तो उसे 'मिथ्या' उत्तर कहते हैं । चाहे वह शब्द या अर्थ को लेकर हो ।

मिथ्यैतन्नाभिजानामि तदाऽतत्र न सन्निधिः ।
अजातश्चास्मि तत्काले इति मिथ्या चतुर्विधम् ॥ १४७ ॥

मिथ्योत्तर के ४ प्रकार—१. यह मिथ्या है, २. इसे मैं नहीं जानता हूँ, ३. उस समय मैं वहां उपस्थित नहीं था, और ४. मैं तो तब उत्पन्न भी नहीं हुआ था । इस प्रकार से 'मिथ्या उत्तर' चार प्रकार का होता है ।

अर्थिना लिखितो ह्यर्थः प्रत्यर्थी यदि तं तथा ।
प्रपद्य कारणं ब्रूयात् प्रत्यवस्कन्दनं हि तत् ॥ १४८ ॥

प्रत्यवस्कन्दन के लक्षण—अर्थी ( वादी ) ने जो दावा में लिखा है उसको यदि प्रत्यर्थी ( प्रतिवादी ) स्वीकार करके भी उस दोष के करने में कारण को कहे तो वह 'प्रत्यवस्कन्दन' उत्तर कहलाता है । इसको बात मान कर पुनः उसे काटना कहते हैं ।

अस्मिन्नर्थे ममानेन वादः पूर्वमभूत्तदा ।
जितोऽहमिति चेद् ब्रूयात् प्राङ्न्यायः स उदाहृतः ॥ १४९ ॥

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २९३

प्राङ्न्याय के लक्षण— इस तरह का इनका हमारा विवाद, पहले हो चुका है जिसमें हमारी जीत हो चुकी है ऐसा यदि प्रतिवादी कहे तो उस उत्तर का नाम 'पूर्वन्यायविधि' अथवा 'प्राङ्न्याय' कहलाता है ।

जयपत्रेण सभ्यैर्वा साक्षिभिर्भावयाम्यहम् ।
मया जितः पूर्वमिति प्राङ्न्यायस्त्रिविधः स्मृतः ॥ १५० ॥

प्राङ्न्याय के ३ प्रकार— १. जयपत्र (डिक्री), २. जूरियों ३. या साक्षियों के द्वारा 'मेरी डिक्री हो चुकी है' इस बात को सिद्ध कर रहा हूँ' ऐसे उत्तर वाले 'प्राङ्न्याय' के उक्त प्रकार से तीन भेद होते हैं ।

अन्योऽन्ययोः समक्षं तु वादिनोः पक्षमुत्तरम् ।
न हि गृह्णन्ति ये सभ्या दण्ड्यास्ते चौरवत् सदा ॥ १५१ ॥

परस्पर एक दूसरे के समक्ष ही वादी प्रतिवादी के क्रमशः पक्ष और उत्तर को जो सुनकर तदनुरूप नहीं लिख लेते हैं या नहीं स्वीकार करते हैं वे चोर की भांति सदा दण्ड पाने योग्य होते हैं ।

लिखिते शोधिते सम्यक् सति निर्दोष उत्तरे ।
अर्थिप्रत्यर्थिनोर्वापि क्रिया कारणमिष्यते ॥ १५२ ॥

लिखे हुये उत्तर के भलीभांति शोधित हो जाने पर जब दोषरहित हो जाय तब वादी-प्रतिवादी की क्रिया अर्थात् साक्षी का लेखपत्र, आदि का प्रमाण दिखाना आदि ही जयपत्र (डिग्री) का कारण होता है ।

पूर्वपक्षः स्मृतः पादो द्वितीयश्चोत्तरात्मकः ।
क्रियापादस्तृतीयस्तु चतुर्थो, निर्णयाभिधः ॥ १५३ ॥

व्यवहार के ४ पाद— इस प्रकार से व्यवहार (मुकदमे) के ४ पाद होते हैं जिसमें १- पूर्व पक्ष, २- उत्तर ३- क्रिया ४- निर्णय ये क्रमसे हैं ।

कार्यं हि साध्यमित्युक्तं साधनं तु क्रियोच्यते ।
अर्थी तृतीयपादे तु क्रियया प्रतिपादयेत् ॥ १५४ ॥

कार्य को 'साध्य' और साधन को 'क्रिया' कहते हैं, अतः अर्थी (वादी) व्यवहार के तृतीय पाद क्रिया (तहकीकात) होने पर प्रमाणों (साधनों) को जज के समक्ष उपस्थित करे ।

चतुष्पाद् व्यवहारः स्यात् प्रतिपत्त्युत्तरं विना ।

प्रतिपत्त-संज्ञक (सत्य) उत्तर में अर्थात् जहां पर प्रतिवादी वादी के पक्ष को स्वीकार कर लेता है वहां पर व्यवहार (मुकदमा) दो ही पाद का माना जाता है शेष में ४ पाद का होता ही है ।

क्रमागतान् विवादांस्तु पश्येद्वा कार्यगौरवात् ॥ १५५ ॥

प्रथम निर्णय के योग्य न्याय या विवाद का निर्देश— राजा विवादों

२६४ | शुक्रनीतिः

( मुकदमों ) को क्रमानुसार अथवा कार्यं की गुरुता के अनुसार क्रम को त्याग कर सर्वप्रथम देखें ।

यस्य वाऽभ्यधिका पीडा कार्यं वाऽभ्यधिकं भवेत् ।
वर्णानुक्रमतो वापि नयेत् पूर्वं विवादयेत् ॥ १५६ ॥

जिसको अधिक पीड़ा हो या अधिक कार्य हो इसका विचार कर ब्राह्मणादि वर्णों के अनुसार मुकदमों को प्रथम पेशी में लेवे और उसका निर्णय करे ।

कल्पयित्वोत्तरं सभ्यैर्दातव्यैकस्य भावना ।
सभ्यों ( जूरियों ) को उचित है कि वह प्रतिवादी के पास से उत्तर लेकर वादी को साध्य का साधन जुटाने के लिये अवसर दें ।

साध्यस्य साधनार्थं हि निर्दिष्टा यस्य भावना ॥ १५७ ॥
विभावयेत् प्रतिज्ञातं सोऽखिलं लिखितादिना ।
साध्य को सिद्ध करने वाले साधनों को उपस्थित करने के लिये जिस वादी को अवसर दिया गया, वह लिखित आदि साधनों के द्वारा समस्त प्रतिज्ञात अर्थ प्रमाणित करे ।

न चैकस्मिन् विवादे तु क्रिया स्याद्वादिनोर्द्वयोः ॥ १५८ ॥
एक विवाद में दो वादियों की क्रिया नहीं होने का निर्देश—एक ही विवाद में दोनों वादी-प्रतिवादी के लिये प्रमाण देने का प्रयास करना उचित नहीं होता है अर्थात् एक ही को प्रमाण देने के लिये कहना चाहिये ।

मिथ्या क्रिया पूर्ववादे कारणे प्रतिवादिनि ।
प्राङ्न्यायकारणोक्तौ तु प्रत्यर्थी निर्दिशेत् क्रियाम् ॥ १५६ ॥
यह प्रतिवादी का उत्तर मिथ्या हो तो उसे सिद्ध करने के लिये पूर्ववादी को प्रमाण देने के लिये कहना चाहिये । और यदि प्रतिवादी का प्रमाण झूठा हो तो उसे सिद्ध करने के लिये प्रतिवादी से प्रमाण मांगना चाहिये । और यदि प्रतिवादी यह कहे कि मेरा इन के साथ पूर्व में विवाद होकर उसमें मेरी जीत हो चुकी है तो उसका प्रमाण देने के लिये उससे कहना चाहिये ।

कारणात् पूर्वपक्षोऽपि उत्तरत्वं प्रपद्यते ।
पूर्व पक्ष भी कभी २ कारणवश उत्तर पक्ष का आश्रय लेता है ।

ततोऽर्थी लेखयेत् सद्यः प्रतिज्ञातार्थसाधनम् ॥ १६० ॥
तत्साधनं तु द्विविधं मानुषं दैविकं तथा ।
साधन के भेद—पूर्व पक्षी के द्वारा उत्तर दे चुकने के बाद वादी तत्काल प्रतिज्ञात विषय को सिद्ध करने के लिये प्रमाण को लिखावे । वह प्रमाण मानुष तथा दैविक भेद से २ प्रकार का होता है ।

क्रिया स्याल्लिखितं भुक्तिः साक्षिणश्चेति मानुषम् ॥ १६१ ॥

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम्२९५

दैवं घटादि तद्भव्यं भूतालाभाभियोजयेत् ।
उसमें लिखित, भोगयुक्त (कब्जे में रहना), और साक्षी, ये तीन प्रकार के मानुष प्रमाण होते हैं । तुला-दण्डादि रूप प्रमाण को 'दैव' कहते हैं । इसी को 'भव्य' भी कहते हैं । इसका प्रयोग यथार्थ का निश्चय न होने पर किया जाता है ।

तत्त्वच्छलानुसारित्वाद् भूतं भव्यं द्विधा स्मृतम् ॥ १६२ ॥
तत्त्वं सत्यार्थाभिधायि कूटायमभिहितं छलम् ।

तत्त्व तथा छलानुसार से भूत तथा भव्य दो प्रकार एवम् तत्त्व और छल के लक्षण— तत्त्व तथा छल के अनुसार से साधन-क्रम से भूत तथा भव्य रूप से २ प्रकार का कहा गया है । उसमें सत्य अर्थ का प्रतिपादक साधन 'तत्त्व' कपट आदि से युक्त साधन 'छल' कहा जाता है ।

छलं निरस्यं भूतेन व्यवहारान् नयेन्नृपः ॥ १६३ ॥
युक्त्याऽनुमानतो नित्यं सामादिभिरुपक्रमैः ।

राजा युक्ति, अनुमान तथा सामादि उपायों से छल को दूर कर यथार्थ साधनों से व्यवहारों (मुकदमों) को सदा देखे ।

न कालहरणं कार्यं राज्ञा साधनदर्शने ॥ १६४ ॥
महान् दोषो भवेत् कालाद्धर्मव्यापत्तिलक्षणः ।

राजा वादी-प्रतिवादियों के साधनों (प्रमाणों) को देखने में समय न बितावे बल्कि तत्काल ही देखे । अन्यथा विलम्ब करने से धर्मनाश रूपी महान दोष उपस्थित हो जाता है ।

अर्थिप्रत्यर्थिप्रत्यक्षं साधनानि प्रदर्शयेत् ॥ १६५ ॥
अप्रत्यक्षं तयोर्नैव गृह्णीयात् साधनं नृपः ।

विवादी को अपने २ साधन प्रत्यक्ष दिखाने का निर्देश— राजा अर्थी-प्रत्यर्थी (वादी-प्रतिवादी) दोनों के सामने साधनों को दिखाये और दोनों के परोक्ष में साधन न देखे ।

साधनानां च ये दोषा वक्तव्यास्ते विवादिना ॥ १६६ ॥
गूढास्तु प्रकटाः सभ्यैः काले शास्त्रप्रदर्शनात् ।

जो दोष गुप्त हों उनको सभासद् प्रकट करें, इसका निर्देश— विवाद करने वाला (वादी या प्रतिवादी) एक दूसरे के साधनों के दोषों को कहे और छिपे हुये साधन के दोषों को विचार के लिये नियुक्त पुरुषों के द्वारा विचार करने के समय शास्त्रों के आधार पर प्रकट रूप से कहना चाहिये ।

अन्यथा दूषयन् दण्ड्यः साध्यार्थादेव हीयते ॥ १६७ ॥
विमृश्य साधनं सम्यक् कुर्यात् कार्यविनिर्णयम् ।

२९६ | शुक्रनीतिः

यदि वादी अन्यथा अर्थात् शास्त्र (कानून) के विरुद्ध किसी साधन में व्यर्थ दोष दिखाता है तो वह दण्डनीय होता है और वह जिसे सिद्ध करना चाहता है उससे च्युतं हो जाता है (उसका मुकद्दमा खारिज कर दिया जाता है)। अतः राजा साधनों (प्रमाणों) पर पूर्ण विचार कर विवाद का निर्णय करे।

कूटसाधनकारी तु दण्ड्यः कार्यानुरूपतः ॥ १६८ ॥
द्विगुणं कूटसाक्षी तु साक्ष्यलोपी तथैव च ।

कूटसाक्षी और साक्ष्यलोपी को दूना दण्ड देने का निर्देश— झूठा प्रमाण उपस्थित करने वाला (वादी या प्रतिवादी) कार्य (मुकदमा) के अनुसार थोड़ा या अधिक दण्ड (जुर्माना) का अधिकारी होता है। झूठी गवाही देने वाला या गवाह की सही बात को न मानने वाला पुरुष द्विगुण दण्ड का भागी होता है।

अधुना लिखितं वच्मि यथावदनुपूर्वशः ॥ १६९ ॥
अनुभूतस्मारकं तु लिखितं ब्रह्मणा कृतम् ।

इस समय मैं आनुपूर्वी क्रम से यथावत् लिखित साधन के विषय में कहता हूँ। ब्रह्मा ने अनुभूत विषय को स्मरण कराने के लिये 'लिखित' का निर्माण किया है।

राजकीयं लौकिकं च द्विविधं लिखितं स्मृतम् ॥ १७० ॥
स्वहस्तलिखितं वाऽन्यहस्तेनापि विलेखितम् ।
असाक्षिमत् साक्षिमच्च सिद्धिर्देशस्थितेस्तयोः ॥ १७१ ॥

लिखित के दो प्रकारों के निर्देश— राजकीय और लौकिक भेद से लिखित दो प्रकार का होता है। और इनमें से प्रत्येक लिखित पुनः अपने हाथ से और दूसरे के हाथ से लिखा होने से दो प्रकार का होता है। और सभी प्रकार के लेख साक्षी से युक्त या बिना साक्षी के भी होते हैं। उनकी सिद्धि देश की स्थिति के अनुसार होती है।

भाग-दान-क्रयाऽऽधान-संविद्-दास-ऋणादिभिः ।
सप्तधा लौकिकं चैतत्—

लौकिक लिखित के ७ प्रकारों का निर्देश— १. भाग (बटवारा), २. दान, ३. क्रय, ४. आधान (धरोहर), ५. संवित् (इकरार), ६. दास, ७. ऋण आदि भेद से लौकिक लिखित ७ प्रकार का होता है।

—त्रिविधं राजशासनम् ॥ १७२ ॥
शासनार्थं ज्ञापनार्थं निर्णयार्थं तृतीयकम् ।

राजशासन के ३ प्रकार— और राजकीय लिखित तीन प्रकार का है

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २९७

जिसमें प्रथम शासन के लिये, द्वितीय सूचना के लिये, तृतीय निर्णय के लिये है ।

साक्षिमद्रिक्थ्यभिमतं भागपत्रं सुभक्तियुक् ॥ १७३ ॥
सिद्धिकृच्चान्यथा पित्रा कृतमप्यकृतं स्मृतम् ।

जो भाग पत्र (बटवारे का लेख पत्र) साक्षी से हो और जिसमें धनवाले, दायादों (पट्टीदारों) से स्वीकृत, भलीभांति से विभाग का विषय निश्चित किया हुआ हो वह माननीय होता है । अन्यथा पिता से किया हुआ भी भागपत्र अमाननीय होता है ।

दायादाभिमतं दान-क्रय-विक्रय-पत्रकम् ॥ १७४ ॥
स्थावरस्य ग्रामपादिसाक्षिकं सिद्धिकृत् स्मृतम् ।

और दानपत्र, क्रय (खरीदना) पत्र, विक्रय (बेचना) पत्र यदि स्थावर संपत्तिविषयक हो तो पट्टीदारों द्वारा स्वीकृत, ग्रामाधिपति आदि की साक्षी से युक्त, हो तो माननीय होता है अन्यथा अमाननीय होता है ।

राज्ञा स्वहस्तसंयुक्तं स्वमुद्राचिह्नितं तथा ॥ १७५ ॥
राजकीयं स्मृतं लेख्यं प्रकृतिभिश्च मुद्रितम् ।

**साधनक्षम लेख्य के लक्षण—**राजा के द्वारा अपने हाथ से लिखा हुआ या अपनी मुद्रा (मुहर) से या मन्त्री आदि के द्वारा मुद्रा से मुद्रित लिखित को राजकीय लिखित कहते हैं ।

निवेश्य कालं वर्षं च मासं पक्षं तिथिं तथा ॥ १७६ ॥
वेलां प्रदेशं विषयं स्थानं जात्याकृती वयः ।
साध्यं प्रमाणं द्रव्यं च संख्यां नाम तथात्मनः ॥ १७७ ॥
राज्ञां च क्रमशो नाम निवासं साध्यनाम च ।
क्रमात् पितॄणां नामानि पीडामाहर्तृदायकौ ॥ १७८ ॥
क्षमालिङ्गानि चान्यानि पक्षे सङ्कीर्त्य लेखयेत् ।

पक्ष (दावा) में काल, वर्ष मास, पक्ष, तिथि, समय, प्रदेश, विषय (जिला), स्थान (ग्राम), जाति, आकार, अवस्था, साध्य, प्रमाण, द्रव्य, संख्या और अपना नाम लिखकर क्रमशः राजा का नाम तथा निवास और साध्य का नाम, पिता-पितामहादि का नाम, अपना कष्ट, उपार्जन करने वाला और दान देने वाला इन दोनों का नाम, क्षमा के चिह्न इसके अतिरिक्त अन्यान्य भी जो आवश्यक हों उन्हें कह कर लिखवाये ।

यत्रैतानि न लिख्यन्ते हीनं लेख्यं तदुच्यते ॥ १७९ ॥
भिन्नक्रमं व्युत्क्रमार्थं प्रकीर्णार्थं निरर्थकम् ।

२९८ | शुक्रनीतिः

अतीतकाललिखितं न स्यात्तत् साधनक्षमम् ॥ १८० ॥
अप्रगल्भेन च स्त्रिया बलात्कारेण यत् कृतम् ।
साधनायोग्य लेख्य के लक्षण—जिसमें ये सब बातें न लिखी हों वे पत्र ‘हीनलेख्य’ कहलाते हैं अर्थात् अप्रामाणिक होते हैं। और जो सिलसिलेवार न लिखा गया हो, या विपरीत अर्थ को प्रकट करने वाला, बिखरे हुये अर्थ को प्रकट करने वाला, निरर्थक, समय बीत जाने पर लिखा हुआ हो वह प्रमाण के योग्य नहीं होता है। और जो नासमझी से लिखा हुआ या स्त्री द्वारा किया हुआ या जबरदस्ती से लिखाया हुआ हो वह भी अप्रामाणिक होता है।

सद्भिर्लेख्यैः साक्षिभिश्च भोगैर्दिव्यैः प्रमाणताम् ॥ १८१ ॥
व्यवहारे नरो याति चेहामुत्राश्नुते सुखम् ।
अच्छे लेख से फल का निर्देश—मनुष्य निर्दोष लिखित प्रमाणों से, साक्षी के द्वारा, कब्जा होने से, दिव्य परीक्षादि प्रमाणों से व्यवहार में प्रामाणिकता को प्राप्त करता है। और इसलोक में तथा परलोक में सुख भोग करता है।

स्वेतरः कार्यविज्ञानी यः स साक्षी त्वनेकधा ॥ १८२ ॥
दृष्टार्थश्च श्रुतार्थश्च कृतश्चैवाऽकृतो द्विधा ।
साक्षी के लक्षण और भेद का निर्देश—जो अपना सम्बन्धी न हो एवं कार्य (विवाद विषय) को जाननेवाला हो, वह साक्षी (गवाह) मानने योग्य होता है। साक्षी अनेक प्रकार का होता है। कोई आँखों से प्रत्यक्ष देखने वाला और कोई केवल सुनने वाला होता है। कृत और अकृत भेद से साक्षी दो प्रकार के होते हैं अर्थात् वादी द्वारा उपस्थित किया हुआ ‘कृत’ और राजा द्वारा उपस्थित किया हुआ ‘अकृत’ होता है।

अर्थिप्रत्यर्थिसान्निध्यादनुभूतं तु प्राग् यथा ॥ १८३ ॥
दर्शनैः श्रवणैर्यैन स साक्षी तुल्यवाग् यदि ।
वादी या प्रतिवादी के समीप रहने से जैसा पहले देखने या सुनने से मुकद्दमे के विषय का अनुभव हुआ हो उसी के अनुरूप यदि कहने वाला हो तो वह साक्षी कहलाने योग्य होता है।

यस्य नोपहता बुद्धिः स्मृतिः श्रोत्रं च नित्यशः ॥ १८४ ॥
सुदीर्घेणापि कालेन स वै साक्षित्वमर्हति ।
बहुत समय बीत जाने पर भी जिसकी बुद्धि स्मरण शक्ति, और श्रवण शक्ति न क्षीण हो वही सचमुच साक्षी देने योग्य होता है

अनुभूतः सत्यवाग् यः सैकः साक्षित्वमर्हति ॥ १८५ ॥
उभयानुमतः साक्षी भवत्येकोऽपि धर्मवित् ।
जिसने अनुभव किया हो और सत्य बोलने वाला हो वही साक्षी के योग्य

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६६

होता है। और कोई धर्मज्ञ साक्षी अकेले वादी-प्रतिवादी दोनों के लिये मान्य होता है।

यथाजाति यथावर्णं सर्वे सर्वेषु साक्षिणः ॥ १८६ ॥ गृहिणो न पराधीनाः सूरयश्चाप्रवासिनः । युवानः साक्षिणः कार्याः स्त्रियः स्त्रीषु च कीर्त्तिताः ॥ १८७ ॥

जाति और वर्ण के अनुसार सभी वर्णों में सभी वर्ण के लोग साक्षी हो सकते हैं। और गृहस्थ, किसी के अधीन न रहनेवाले, विद्वान, परदेश में नहीं रहनेवाले, युवावस्थावाले जो हों वे साक्षी बनाने योग्य होते हैं। और स्त्रियों के विवाद में स्त्रियों की साक्षी लेनी चाहिये।

साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च । वाग्दण्डयोश्च पारुष्ये न परीक्षेत साक्षिणः ॥ १८८ ॥

**साक्षी की विशेष परीक्षा न करने के विषय—**सभी डांका, चोरी और बलात्कार या अपहरण, कठोर भाषण और कठोर दण्ड इन सबों में साक्षी की विशेष परीक्षा नहीं की जाती है। इनमें चाहे जो भी साक्षी दे सकता है।

बालोऽज्ञानादसत्यात् स्त्री पापाभ्यासाच्च कूटकृत् । विब्रूयाद् बान्धवः स्नेहाद् बैरनिर्या॑तनादरिः ॥ १८६ ॥ अभिमानाच्च लोभाच्च विजातिश्च शठस्तथा । उपजीवनसङ्कोचाद् भृत्यश्चैते ह्यसाक्षिणः ॥ १९० ॥ नार्थसम्बन्धिनो विद्यायौनसम्बन्धिनोऽपि न ।

**बालादिकों को साक्षी योग्य न होने का निर्देश—**बालक अज्ञान से, स्त्री झूठ बोलने का अभ्यास होने से, जालसाज निरन्तर जालसाजी करने से, बान्धव स्नेह से, शत्रु शत्रुता साधने से, हीन जातिवाला अपनी संमान-वृद्धि की आशा से, शठ लोभ से, नौकर जीविका चले जाने के भय से विरुद्ध बोल सकते हैं अतः ये सब साक्षी मानने के योग्य नहीं होते हैं। और किसी प्रकार का अर्थ (धन) सम्बन्ध रखनेवाले, साथ पड़नेवाले और जमाई आदि सम्बन्धी ये सब भी साक्षी बनाने योग्य नहीं होते हैं।

श्रेण्यादिषु च वर्गेषु कश्चिच्चेद् द्वेष्यतामियात् ॥ १९१ ॥ तस्य तेभ्यो न साक्ष्यं स्याद् द्वेष्टारः सर्व एव ते ।

श्रेणी (एक जाति के कारीगरों के समूह) आदि वर्गों में से यदि किसी एक व्यक्ति के प्रति उक्त वर्ग द्वेषी हो जाय तो उस वर्ग के किसी भी व्यक्ति की साक्षी नहीं माननी चाहिये, क्योंकि एकता होने से उस वर्ग के सभी द्वेष करनेवाले हो जाते हैं।

न कालहरणं कार्यं राज्ञा साक्षिप्रभाषणे ॥ १९२ ॥

३००शुक्रनीतिः

अर्थिप्रत्यर्थिसांनिध्ये साध्यार्थेऽपि च सन्निधौ ।

**साक्षी लेने में राजा को कालक्षेप न करने का निर्देश—**साक्षी की साक्षी लेने में राजा समय न बितावे जब कि वादी-प्रतिवादी समीप में उपस्थित हों, और उन दोनों के समक्ष व्यवहार देखने में भी देरी न करे।

प्रत्यक्षं वाद्येत् साक्ष्यं न परोक्षं कथंचन ॥ १६३ ॥
नाङ्गीकरोति यः साक्ष्यं दण्ड्यः स्याद् देशितो यदि ।

**प्रत्यक्ष साक्षी की साक्षी लेने का निर्देश—**और वादी-प्रतिवादी के समक्ष में ही साक्षी की साक्षी सदा लेनी चाहिये, परोक्ष में कभी भी नहीं। और यदि आज्ञा देने पर भी साक्षी देने को साक्षी न तैयार होता है तो वह दण्डनीय होता है।

यः साक्षान्नैव निर्दिष्टो नाहूतो नैव देशितः ॥ १६४ ॥
ब्रूयान्मिथ्येति तथ्यं वा दण्ड्यः सोऽपि नराधमः ।

**दण्ड्य और नीच साक्षी के लक्षण—**जो विचारपति के समक्ष साक्षी देने के लिये उपस्थित न किया गया हो या बुलाया न गया हो अथवा आदेश न प्राप्त किया हो वह नराधम चाहे झूठ या सच ही कहे फिर भी दण्डनीय ही होता है।

द्वैधे बहूनां वचनं समेषु गुणिनां वचः ॥ १६५ ॥
तत्राधिकगुणानां च गृह्णीयाद्वचनं सदा ।

जहां पर बहुत से साक्षियों के वचनों में विभिन्नता होने से सत्यासत्य निर्णय में संशय हो जाय वहाँ पर अधिक संख्यावालों की बात माने। यदि समान संख्यावालों में विभिन्नता हो तो उनमें से जिधर गुणी पुरुष हों उनके वचन माने एवं यदि गुणियों के वचनों में विभिन्नता जिस विषय में हो तो जो अधिक गुणी हों उनकी ही बात माने।

यत्रानियुक्तोऽपीक्षेत शृणुयाद्वापि किञ्चन ॥ १६६ ॥
पृष्टस्तत्रापि स ब्रूयाद् यथादृष्टं यथाश्रुतम् ।

कोई व्यक्ति बिना नियुक्त किये हुये भी यदि कुछ देखें या सुनें तो उस विषय में पूछे जाने पर वह जैसा देखा या सुना हो कहें।

विभिन्नकाले यज्ज्ञातं साक्षिभिश्वांशतः पृथक् ॥ १६७ ॥
एकैकं वाद्येत्तत्र विधिरेष सनातनः ।

**एक २ से साक्षी को कथन करने का निर्देश—**जहां पर विभिन्न २ समयों में विभिन्न २ साक्षियों ने विवाद के विभिन्न २ विषयों की जो कुछ जानकारी प्राप्त की हो, तो उसे जानने के लिये वहां पर प्रत्येक साक्षियों की साक्षी लेना चाहिये। यह सनातन कर्त्तव्य है।