शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
कथा- 51
"ब्राह्मण गाङ्ग्लि की सेना की कथा"
चमत्कार पुर नामक नगर में चारों वेद को जानने वाले, चारों वर्ण वाले, चारों आश्रम वाले, लोग रहते थे। एक बार वहाँ के ब्राह्मण बल्लभनाथ का दर्शन करने के लिए गाड़ियों, घोड़ो आदि पर सवार हो, भोजन सामग्री लेकर और अच्छे मूल्यवान वस्त्र पहिनकर पुत्रकलत्र समेत चल दिये गये। रास्ते में चोर लूटमार करने लगे। जिससे वे सभी भयभीत होकर भाग गये लेकिन गाङ्ग्लि नामक लंगड़ा ब्राह्मण उन सभी के साथ भाग नहीं सका। चोरों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। गाङ्ग्लि ने डरे हुए अपने भाई से साहसी मनुष्यों की भाँति कहा भ्रातः! कितने हाथी और घोडे हैं? शीघ्र ही बताओ और धनुष दो जिससे इन्हें दिव्य अस्त्र से एक साथ मारूँ। यह सुनकर सभी चोर भाग गये। अतः जो धर्म-अर्थ-काम के विषय में बोलना जानता है उसे पुरूषो में कौन ऐसा है जो बल से जीत सकता है अर्थात् कोई नहीं।
कथा- 52
"जयश्री की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- भूतल पर प्रतिष्ठान नामक नगर में सत्त्वशील नाम का राजा था। उसके पुत्र का नाम दुर्दमन था। वह पैतृक सम्पत्ति को त्याग कर सम स्वभाव वाले मित्रों ब्राह्मण, बढ़ई तथा वणिक् पुत्र के साथ परदेश को चला गया और चारों ने मिलकर विचार किया कि हमें रत्न भूमि समुद्र की सेवा करनी चाहिए। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर समुद्र ने उन चारों को चिन्तामणि के समान गुण वाले चार रत्न दिये घर लौटते समय विश्वास कर सबने चारों रत्नों को बनिये को सौंप दिया।
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तब उस दुष्ट ने चारों रत्नो को जांघ के भीतर डालकर सी लिया और मार्ग मे चिल्लाने लगा कि मैं तो मूस लिया गया (ठगा गया)।
उसके ऐसा करने पर उन सबने यह समझ लिया कि यह कपट कर रहा है और विवाद करते-करते वे सब ऐरावती पुरी में नीतिसार राजा के यहाँ गये और अपनी समस्या को बताया। जब यह सब बात राजा के मन्त्री को पता चली तो उसने अपनी पुत्री से बताया। पुत्री ने उन सबको स्नान, भोजन कराके शृङ्गार, करके क्रम से प्रत्येक से अपना उपभोग करने के लिए कहा और सौ स्वर्ण मुद्राएँ मांगा। क्षत्रिय, ब्राह्मण एवं बढई ने धनाभाव दर्शाया किन्तु जब वह बनिये के पास गयी तो उसने कहा स्वामिनि! चार रत्न लेकर मेरा उपभोग करो।
इस प्रकार मन्त्री की पुत्री अपने शील की रक्षा करती हुई चारों रत्नों को अपने पिता को सौंप दिया। मंत्री ने उन्हें बुलाकर प्रत्येक को दे दिया। वे भी अपना-अपना धन पाकर कृतकृत्य हो अपने-अपने घर गये।
कथा- 53
"चर्मकार की पत्नी की कथा"
शुक ने कहा चर्मण्वती के किनारे चर्मकूट नामक गाँव है। वहाँ दोहड नाम का चमार था उसकी पत्नी देविका परपुरुषों मे आसक्त रहती थी। एक बार चमार चमड़ा खरीदने बाहर गया तो वह उपपति को अपने घर लाई। जब दोनों सुरत कर चुके तभी उसका पति घर के बाहर आ गया। जब उसने पति को आया हुआ जाना तो निरर्थक वाक्य बड़-बड़ाती हुई बाहर आयी। उसका वाक्य सुनकर मूर्ख डर गया और मन्त्रवेत्ता को बुलाने चला गया तब तक उसने उस उपपति को भाग दिया।
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कथा- 54
"विप्र विष्णु के दूतकर्म की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि– शक्रावती नामक नगर में धर्मादिगुणों से युक्त धर्मदत्त नामक राजा था। उसका मन्त्री सुशील था। उस मन्त्री का पुत्र विष्णु परराष्ट्र मन्त्री था। जब उस पद से उसे हटा दिया गया तो वह धनहीन होकर भी मैं राज–कुल का अमात्य हूँ ऐसा अहंकार युक्त और कठोर हो गया। मन्त्री ने राजा से कहा कि विष्णु के ऊपर आपकी कोई कृपा नहीं है वह आपका भक्त, अनुरक्त और दूतकर्म में प्रवीण है, तो देव? कहीं भेजकर इसकी परीक्षा लें। तब राजा ने भस्म रूप भेट सामग्री पर अपनी मुहर लगाकर उसे विदिशा नगर में शत्रुदमन नामक राजा के पास भेजा। राजा ने जब उस अमङ्गलकारी भस्म को देखा तो कुपित हो गया। विष्णु ने राजा को क्रोधित देखकर कहा कि– अश्वमेघ यज्ञ कुण्ड का भस्म है जो त्रेता की अग्नि से उत्पन्न पवित्र पापनाशक तथा कल्याणकारक है। ऐसा कहकर सहसा उठकर हाथ पर भस्म रख, राजा को समर्पित कर दिया। राजा ने उसके वचन से प्रसन्न हो भस्म का वन्दन किया। उस तुष्ट राजा ने उसके बदले मूल्यवान उपायन भेजा और विष्णु को सम्मानित कर विदा किया।
कथा- 55
"श्रीधर ब्राह्मण की कथा"
चर्मकूट नामक गाँव में श्रीधर ब्राह्मण था। वहीं पर चन्दन चमार भी रहता था। श्रीधर ने उस चमार से एक जोड़ी जूता बनवाया और पैसे नहीं दिया। वह चमार रोज पैसे मांगता लेकिन श्रीधर यही कहता कि मैं तुम्हें प्रसन्नचित कर दूँगा। बहुत दिन बाद चमार ने ब्राह्मण को पकड़ लिया। उसी समय ग्रामपाल के घर पुत्र हुआ था। तब ब्राह्मण ने छलपूर्वक चमार से कहा मैंने तुम्हें प्रसन्नचित करने को कहा था इस पुत्र के पैदा होने पर तुम प्रसन्न हो या नहीं। चमार यदि नहीं कहता है तो राजा
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का दण्ड पात्र बने अन्यथा धन जाता है। उसने कहा मैं प्रसन्न हूँ। अतः छलपूर्वक मुक्त होकर ब्राह्मण अपने घर गया।
कथा- 56
"सन्तक्त वणिक् की कथा"
त्रिपथ गाँव में सान्तक नाम बनिया बड़ा धनी किन्तु कृपण दुःस्वभाव था और उसे अपना गाँव नही अन्य-अन्य गाँव प्रिय थे। एक दिन वह अन्य गाँव से वसूली करके आ रहा था तो उसे चारों ओर से चोरों ने घेर लिया। चोरों से घिरा जानकर उसने गलग्रह नामक यक्ष के आगे द्रव्य रखकर हाथ में खरिया मिट्टी लेकर कहा-देव! मैने तुम्हारी सबसे वसूली की, यह धन जो कुछ वृद्धि (व्याज) समेत मुझे मिला है इसे लीजिए।
यह देखकर कि 'यह तो यक्ष का धन है' उसे प्रणाम कर चोर चले गये और वह भी धन लेकर कुशल पूर्वक घर गया।
कथा- 57
"शुभङ्कर की कथा"
अवन्तीपुरी में विक्रमार्क राजा था। उसकी पत्नी का नाम चन्द्रलेखा था। मदनातुरा उसने शुभङ्कर नामक राजपण्डित को चाह लिया और अपने स्थान पर अपनी दासी को अपना परिधान पहनाकर स्वयं दासी का वेष बनाकर कामुक के घर जाकर रतिक्रीडा नित्य इच्छा भर करती। एक दिन राजा ने रानी की चोरी पकड़ ली।
अगले दिन राजा ने प्रातः क्रियाओं को समाप्त कर पण्डित शुभङ्कर और रानी को बुलाया। पण्डित को सिंहासन पर बिठाकर बात-चीत के सिलसिले में राजा ने हँसते हुए कहा- 'कृतकं मन्ये भयं योषिताम्' यह वचन सुनकर उसका हृदय अपने दोष से विस्मत हो गया और पण्डित ने कहा-
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हे मदनावतार!, तुम्हारी कीर्ति समुद्र के भयंङ्कर ग्राहों से व्याप्त जल को लाँघ जाती है, निराधार आकाश में स्थित होती है, दुर्गम पर्वतों के शिखर पर चढ़ जाती है, विषैले सर्पों से व्याप्त पाताल लोक को अकेले चली जाती है, अतः मैं समझता हूँ कि स्त्रियो का भय कृत्रिम होता है।
ऐसा सुनकर राजा ने रानी को उस पण्डित के हाथ पकड कर सौप दिया। अब पण्डित राजा की कृपा से उसके साथ सुख भोगने लगा।
कथा- 58
“दुःशीला पति और गणपति की कथा“
लोहपुरी नामक नगर मे राजड नाम का एक नीची जाति का व्यक्ति था। उसकी पत्नी दुःशीला पर पुरुषों में अत्यन्त आसक्ति रखती थी। वह पद्मावती पुरी सूत बेचने जाया करती थी। एक दिन उन सभी ने गणेश जी को मनौती मानी। उसने चुम्बन की मनौती मानी। गणेश जी ने सभी का लाभ कराया। तब सभी ने अपनी-अपनी मनौती गणेश जी को दिया। जब दुःशीला की बारी आयी तो विनोद प्रिय गणेश जी ने उसका अधर धर लिया। यह सारा कथा सखियों ने उसके पति को जाकर सुनाया। यह सुनकर उसने गणेश जी के सामने एक गधा के साथ रमण करना प्रारम्भ कर दिया। तब गणेश जी को हँसी आ गयी। उनके हँसने से दोनों होंठ शिथिल हो गये। इस प्रकार वह छूटकर गणेश जी को प्रणाम कर अपने पति के घर चली गयी।
इस प्रकार जो समयोचित कार्य करता है उसका यही फल होता है कि वह समय की परख रखने वाला व्यक्ति कदापि नष्ट नहीं होता।¹
1 समयोचितमारम्भं कुरुते यस्तु कृत्यवित्।
सर्वदा तु फलं तस्य समयज्ञो हि शिष्यते।
शुकसप्तति' श्लोक सं० 278, पृ०सं० 237
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अधिक देर तक इधर-उधर घूमता रहा तब उसने मनमानी रति किया और पति से इस प्रकार कहा-
हे मूर्ख! तुम्हारे सामने मैंने मनमानी रति की तुम शूर किन्तु मेरे अहित हो अत. मै तुम्हारे यहाँ से जा रही हूँ और उपपति द्वारा लाये गये घोडे पर चढकर चली गयी। उसको जाते देख राहड भी लज्जित हो मुख छिपाकर रह गया। अतएव स्त्रियों के अधीन होकर कौन तिरस्कृत नहीं होता। क्योकि-
(स्त्री के वश में होकर) प्राचीन काल मे शङ्कर को नाचना पड़ा। श्रीकृष्ण ने रास किया और ब्रह्म पशुता को प्राप्त हुये, स्त्रियो से किसकी विडम्बना नहीं हुई?¹
शुक का यह वचन सुनकर प्रभावती ने कहा स्त्री, जन्म का, वृद्धि का तथा सुख का कारण है, उसकी तुम कैसे निन्दा करते हो?²
शुक ने कहा-तुम्हारी यह बातें पतिव्रता के विषय से सम्बन्धित हैं, अन्य स्त्रियों के विषय में यह बात नहीं लागू होती।
कथा- 60
"राजदूत हरिदत्त की कथा"
वीर नामक राजा की सभा के विषय में कच्छ देश के राजा ने सुना कि वह आश्चर्यमय, देवनिर्मित तथा सकल रत्नों से विभूषित है। उसने अपने दूत हरिदत्त को सुन्दर रत्न तथा घोड़े एवं हजार उपायन देकर भेजा। वह दूत उसकी पुरी में जाकर राजा से बोला-मेरे स्वामी ने आपकी विचित्र सभा को देखने के लिए मुझे भेजा है।
1 आननर्त पुरा शम्भुर्गोविन्दो रासकृत्तथा।
ब्रह्मा पशुत्वमापन्नः स्त्रीभिः को न विडम्बितः।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 284, पेज सं० 241-42
2 उत्पत्तिकारणं तन्वी तन्वी वृद्धेश्च कारणम्।
सुखस्य कारणं तन्वी सा कथ कीर दुष्यते।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 287, पेज सं० 242
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कथा- 63
"शकटाल और चाणक्य की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- जिस प्रकार शकटाल ने अपने कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए उत्पन्न दुःख को चाणक्य के द्वारा नन्दकुल को उच्छिन्न कर दुःख का शमन किया उसी प्रकार यदि तुम भी करना जानती हो तो जाओ। अन्यथा तुम्हारा दूसरे के घर जाना युक्त नहीं है।
कहा गया है- जिसका परिवार तारागण है, जो औषधियों का स्वामी है, शरीर जिसका अमृतमय, जो कान्ति से युक्त है- ऐसा चन्द्रमा भी सूर्यमण्डल में जाकर कान्तिरहित हो जाता है। अतः यह सत्य है कि दूसरे के घर जाकर सभी लघुता को प्राप्त होते हैं।¹
कथा- 64
"मण्डुका और उसकी सखी देविका की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि-कूटपुर नामक गाँव में सोमराज नामक राजपूत था। जिसकी पत्नी मण्डुका बड़ी सुन्दर तथा परपुरुषों में आसक्त रहती थी। उसका उपभोग, संकेतित एक मनुष्य, घण्टा लिए, रात मे घर के आँगन में किया करता। एक दिन उसके पति ने घण्टे का शब्द सुनकर बैल के आने का सन्देह कर हाथ में लाठी लेकर दौड़ा।
मण्डुका के पति को घण्टा के शब्द का अनुसरण कर आता देखकर देविका नामक सखी ने उसे भगाकर घण्टा हाथ में ले लिया और कहा-
1 उडुगणपरिवारो नायकोऽप्योषधीना-
ममृृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः।
भवति विकलमूर्तिमण्डलं प्राप्य भानोः
परसदननिविष्टः को न धत्ते लघुत्वम् ।।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 307, पेज सं० 257
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कामुक बैल घबड़ाकर भाग गया। वह लौटकर पत्नी से अपने पौरूष का वर्णन करने लगा।
कथा- 65
"श्रावक श्रीवत्स की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि– जनस्थान नामक नगर में नन्दन नामक राजा नाम के अनुसार गुणवाला था। उसी नगर में परम शिव भक्त श्रीवत्स नामक साधु था। एक बार वह शिष्यों समेत वाराणसी नगर को जा रहा था। रास्ते में एक शिष्य को मांस लाने के लिए भेजा। अन्य साधुओं ने उसे ऐसा करते देख लिया। जब सभी साधु बैठ गये तब वह साधु हँसने लगा और सभी साधुओं से पूछने पर कहा– यह ऐसा विचित्र शिष्य है। मैंने कहा–"मां संवर्तते" इति, इसने नासमझी से इस वाक्य के 'मां' के साथ संवर्तते के सम् को मिलाकर वाक्य का विच्छेद यों कर दिया–'मांसं वर्तते'। तदुनसार व्यवहार में प्रवृत्त हुआ।
कथा- 66
"हंसराट् शङ्खधवल की कथा"
भूतल पर निर्जन, पक्षियों को रुचिकर एवं प्रिय, दशयोजन विस्तृत एक रम्य वन है। उसमें दो कोस विस्तृत शीतल छाया वाले, जलाशय के तीर पर स्थित बरगद के वृक्ष पर हंसधवल नामक हंसराज कुटुम्ब समेत दिन भर विचरण करके शाम को विश्राम करता था। एक दिन वे हंस शिकारी की जाल में फँस गये। अपने कुटुम्ब को उस प्रतार जाल में बंधा जानकर शंखधवल ने कहा–पुत्रों! जब वह व्याध प्रातः तुम लोगों को देखे तो तुम सब मुर्दे के समान श्वांस छोड़कर लेट जाना और वह तुम्हें मरा हुआ समझकर भूमि पर फेंक देगा तो तुम सब उड़ जाना। बहेलिया प्रातः आया और उसने उनको मरा हुआ समझकर फेंक दिया और वे सब उड़कर अभीष्ट देश को चले गये।
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कथा- 67
"मकर और प्लवङ्गम (बन्दर) की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- पुष्पाकर वन में वनप्रिय नाम का एक बौना वानर था। उसने समुद्र सीमा के जल में लोटते-पोटते घड़ियाल को देखकर कहा हे मित्र! क्या तुम जीवन से ऊब गये हो जो पृथ्वी तल पर आये हो।
उसने कहा- हे वानर! विधाता ने जिसके लिए जो स्थान और जो आजीविका विदित कर दी है, उसका मन उसी में रमता है अन्यत्र नहीं।¹
कहा भी गया है- (श्री रामचन्द्र जी कह रहे हैं) हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्ण निर्मित लङ्का मुझे पसन्द नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन रहित भी मुझे सुखकर है।²
यह सुनकर उसने कहा-स्थल पर उत्पन्न प्राणी धन्य हैं जहाँ आप सरीखे प्रियवादी मित्र हैं। यह सुनकर वानर ने कहा-आज से तुम मेरे प्राणो से भी अधिक प्रिय मित्र हुए और उसे अमृत सदृश पके फल दिये।
मकर की पत्नी ने जब पके फलों का वृतान्त जाना तो उसने गर्भ के प्रभाव से वानर के हृदय का मांस खाने की अभिलाषा व्यक्त की।
मकर ने वानर से कहा-मित्र! मेरी पत्नी ने तुम्हें बुलाया है जरा चलकर मेरे घर की परिचर्या का भी अनुभव कीजिए। ऐसा विश्वास दिलाकर उसे पीठ पर बिठाकर चल दिया। शङ्कित वानर ने कहा-मित्र! वहाँ चलकर मुझे क्या करना होगा।
ऐसा सुनकर मगर ने सोचा अब तो मैं इसे उस स्थान पर ला चुका हूँ जहाँ से यह समुद्रतट, को वापस नहीं जा सकेगा इसलिए साफ-साफ बता दिया।
1 यस्य यद्विहितं स्थानं यस्य यद्वेतनं कृतम्।
तत्रैव रमते चित्त तस्य नान्यत्र वानर।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 313, पृ०सं० 263
2 सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
पितुक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 314, पृ०सं० 263
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वानर ने कहा—मगर! तो तुम मुझे बेकार ले जाते हो क्योंकि मैं हृदयहीन हूँ। मेरा हृदय गूलर अथवा बरगद के पेड़ पर रहता है, उसे लेकर मैं पुनः जल में वापस आता हूँ।
ऐसा कहने पर मूर्ख मगर समुद्र के किनारे वापस आया। वानर भी उसकी पीठ से उछलकर वृक्ष पर चढ़ गया और मगर से बोला— अब पेड़ पर स्थित मुझे तुझ ऐसे लोग नही ग्रहण कर सकते।
कथा- 68
"वचचेवति की कथा"
विद्यास्थान नामक एक ब्राह्मणों का गाँव है। जहाँ पर केशव नामक ब्राह्मण ने स्नान के लिये गये हुए सरोवर पर एक सुन्दर बनिये की पुत्री देखी। वह उसके साथ रति करना चाहता था। वणिक् पुत्री ने ब्राह्मण से सिर पर दूसरा घड़ा रखने को कहा। घड़ा रखते समय उसने उसके ओठ चूम लिए। ऐसा करता हुआ वह उसके पति द्वारा देख लिया गया और राजा के पास लाया गया। उसका वितर्क नामक मित्र था। उसने उसके पास आकर यह कहा—मित्र!—राजा के पास पहुँचकर 'वचचेवति' वाक्य ही कहना और कुछ नहीं। वैसा करने पर मन्त्री ने कहा— यह निर्दोष है। इसकी ऐसी प्रकृति ही है। उसी उत्तर से लेकर लोक में विर्तक की सहायिका बुद्धि से वह सज्जनता को प्राप्त माना गया।
कथा- 69
"वेजिका की कथा"
कलास्थान नामक स्थान है, वहाँ एक बनिया था जिसकी भार्या वेजिका अत्यन्त प्रिय थी। एक दिन जब वह पति को स्नान करा रही थी तो उपपति को मार्ग पर जाता देखकर यहाँ काफी पानी नहीं है— ऐसा बहाना बनाकर पानी लेने घर से निकल पड़ी और उपपति के साथ बहुत समय लगा दिया। तब जार से उपभोग की
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गयी उसने अपने पति को धोखा देना सोचकर कुएँ में कूद गयी। बहुत शोरगुल मचा। कुएँ मे स्त्री गिर गयी-ऐसा प्रवाद फैल गया। उसके पति ने यह प्रवाद सुनकर अवश्य मेरी पत्नी कुएँ में गिर गयी होगी। वह जल्दी से आया और अपनी पत्नी को कुएँ में से निकाला और सम्मान किया।
कथा- 70
"प्रभावती और मदन की कथा"
इतनी कथाओ के अन्त होते-होते उसका पति मदन विनोद विदेश से आ गया। उसके आ जाने वह उसी प्रकार पूर्ववत् उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करने लगी। और बोली-आर्यपुत्र! आप वन्दनीय है जिनके घर में त्रिविक्रम के लाये हुए दो पक्षियों में से एक शुक सब लोगों का हितभाषी है, विशेषतः मेरा तो बन्धु के समान है, ज्यों-ज्यो वह शुक की प्रशंसा करती त्यों-त्यों शुक लज्जित होता जाता था।
तब मदन उसका वचन सुनकर बोला-शुक ने तुम्हारा क्या उपकार किया है। यह कैसे इस प्रकार गुणशाली हो गया।
उसने कहा-स्वामिन्! तुम्हारे विदेश चले जाने पर कुछ समय तक मैंने तुम्हारा वियोग सहा, बाद में दुष्ट सखियों की सङ्गति में पड़ गयी। अन्य पुरूष से रमण करने की इच्छा वाली मेरे गमन में बाधा डालने वाली सारिका को मैंने मारना चाहा, लेकिन वह उडकर दूर चली गयी। इस शुक ने अपने वाग्रपञ्च से मुझे सत्तर दिनों तक रोक रक्खा, अतः मैने कर्म से तो पाप नही किया केवल मनसा पाप किया।¹ आज से तुम मेरे जीवन-मरण के स्वामी हो-मेरा जीवन मरण आपके हाथ में हैं। ऐसा सुनकर मदनविनोद ने शुक से पूछ तो उसने कहा-
¹ अतो मया कर्मणा पापं नं विहितं मनसा तु कृतम्।
शुकसप्ततिः पेज सं० 276,
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दुष्टो की सङ्गति से सज्जन भी विकार को प्राप्त हो जाते हैं। दुर्योधन का साथ करने से भीष्म गायो को हरने के लिए गये थे।¹
क्योकि प्राचीन काल मे छल से विद्याधर ने राजा की पुत्री का उपभोग किया था। विद्याधर के द्वारा उपभुक्त उस कन्या को उसके पति ने निर्दोष ही माना और शुक ने मदन के आगे इस कथा को कहा-
भूतल पर मलय पर्वत है। उसके अङ्क पर मनोहर नाम गन्धर्वपुर है। उसमें मदन नामक गन्धर्व रहता था। उसकी रत्नावली नाम की पत्नी थी।
उनकी पुत्री मदनमञ्जरी थी। उसके रूप को देखकर देव अथवा दानव सभी उधोमुख अथवा पतनोन्मुख हो मुग्ध हो जाते थे।
एक दिन नारद जी आये। वे भी इसके रूप को देखकर मूर्च्छित और सकाम हो गये और वाद में होश आने पर शाप दिया कि इसका शील अवश्य भङ्ग होगा। तब राजा ने कहा-स्वामिन्! प्रसन्न होकर अनुग्रह करें।
नारद ने कहा-इसके शील के भङ्ग होने से इसे दोष नही होगा और न इसका पति परित्याग करेगा और कहा कि मेरु पर्वत पर विपुलापरी में रहने वाला कनकप्रभ नाम गन्धर्व है, वही तुम्हारी पुत्री का वर होगा।
तब मुनि के कथनानुसार उसका विवाह गन्धर्व के साथ हुआ। वह एक बार उसे छोड़कर कैलाश को गया। तब किसी विद्याधर ने उसके पति का गन्धर्व रूप धारण कर उसका भोग किया। उसे दुष्ट मानकर उसका पति देवी के सामने उसे मारने लगा तो उसने कहा स्वामी! तुमने मुझे वर दिया था कि तुम्हें गन्धर्व चक्रवर्ती पुत्र होगा तो क्यों बिना पुत्र का मुख देखे मर रही हूँ।
1 असतां सङ्गदोषेण साधवो यान्ति विक्रियाम्।
दुर्योधनप्रसङ्गेन भीष्मो गोहरणे गतः।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 338, पेज सं० 279
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इस प्रकार विलाप करती मदनमञ्जरी के सामने उसके विषय में देवी ने कनकप्रभ से कहा-हे गन्धर्व वीर इसका कोई दोष नही है, विद्याधर ने माया से तुम्हारा रूप धारण कर इसका उपभोग किया तो रहस्य न जानने वाली इसका दोष नही है और नारदमुनि का ऐसा शाप भी था।
हे वणिक् पुत्र! यदि मेरा वचन सत्य समझते हो तो इस निर्दोष के प्रति अनुग्रह करो। इस प्रकार शुक के कहने से मदन ने उसे अङ्गीकार किया। हरिदत्त ने भी पुत्र के आगमन से बडा भारी उत्सव किया। उस महोत्सव में एक दिव्यमाला आकाश से आ गिरी। उस माला का दर्शन होने पर शुक, सारिका और त्रिविक्रम शाप मुक्त हो स्वर्ग को गये। मदन भी प्रिया प्रभावती के साथ सुख भोगने लगा।
कथाओं का वर्गीकरण एवं उद्देश्य :
उपर्युक्त कहानियों में 69 कथायें शिक्षापरक हैं। 70 वी कथा भी जो कि उपसहार के रुप मे शुक द्वारा कही गयी भी शिक्षा प्रद तो है ही साथ ही निश्चित उद्देश्य को ध्यान मे रखकर कही गयी है। प्रत्येक कहानी का एक लक्ष्य है, एक उद्देश्य है। ये कहानियाँ आकर्षक एवं मनोरञ्जक होने के साथ ही एक उद्देश्य को भी व्यक्ति के समक्ष रखती हैं- वह है कुमार्ग से बचने का।
यदि इन कहानियो का वर्गीकरण किया जाय तो इनमें से लगभग आधे से अधिक अर्थात 40 से 45 कथाये व्यभिचारिणी स्त्रियों की कथायें हैं। इन कहानियों के मुख्य पात्र विवाहिता स्त्रियाँ है जो पति के रहने पर भी उपपति के साथ रति भोग करती है और पकडे जाने पर उसे किसी न किसी बहाने बड़े चालाकी के साथ छिपाने का प्रयत्न करती हैं। यशोदेवी, राजिका, धनश्री, श्रियादेवी आदि इसी श्रेणी की विवाहित स्त्रियाँ है। कुछ कथाये वेश्या स्त्रियों से सम्बन्धित हैं जो व्यभिचार के माध्यम से पुरुषों को धोखा देती हैं। जैसे-कलावती, मदनावेश्या आदि इसी श्रेणी के अंतर्गत आती हैं। कतिपय कथायें कुलटा स्त्रियों से भी सम्बन्धित हैं जो परपुरुषों का
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व्यभिचार के माध्यम से अपना स्वार्थ सिद्ध करती हैं जैसे- केलिका एवं धूर्तमाया कुट्टिनी की कथा। जो चौर्यरति सम्बन्धी शिक्षा देने के माध्यम से वणिक् पुत्र का सम्पूर्ण धन ग्रहण कर लेती हैं।
इन कहानियों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि 'शुकसप्तति' कालीन (14 वीं शताब्दी के आस-पास) समाज में विवाहित स्त्रियों की दाशा सुदृढ़ नहीं थी। पति के कार्यवश विदेश चले जाने पर पत्नियाँ अपने मनोरञ्जन हेतु व्यभिचार रूप कुमार्ग का अवलम्ब लेती थीं और उस घृणित कार्य का पता लग जाने पर उसे छिपाने के लिए कभी चतुरता पूर्वक, कभी बुद्धि-कौशल द्वारा और कभी व्यवहार-कौशल द्वारा उसे छिपाने का हर संभव उपाय करती थीं किन्तु समाज में एक ऐसा भी प्रबुद्ध वर्ग था जो इन स्त्रियो के विषय में यह चिन्ता करता था एवं प्रयत्न करता था कि वे कुमार्ग पर न जायें। वस्तुतः इसी भावना को लेकर शुकसप्तति की रचना हुई है। कवि शुक के माध्यम से यह अथक प्रयास कर रहा है कि कथा की नायिका प्रभावती मदनविनोद के परदेश चले जाने पर यह प्रयत्न कर रही है कि वह व्यभिचारिणी न बने, जिसके फलस्वरूप 70 कहानियों का जन्म हुआ। यद्यपि ये कहानियाँ कल्पित ही अधिक हैं किन्तु इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता कि कवि इस प्रकार की स्त्रियों के आचरण से प्रभावित है। कुछ कथायें पशुओं से भी सम्बन्धित हैं। जैसे-शशक और पिङ्गलनाम सिंह की कथा, व्याघ्रचारी और सिंह की कथा, व्याघ्रमारी और जम्बुक की कथा, जम्बुक की मुक्ति की कथा, हंसराट् शङ्खधवल की कथा, आदि।
उपर्युक्त पशुओं की कथाओं के माध्यम से कवि सबल पर निर्बल प्राणी के विजय को द्योतित करना चाहता है। शश, वानर आदि निर्बल प्राणी होते हुये भी अपनी बुद्धि पराक्रम द्वारा शक्तिशाली, पराक्रमी सिंह जैसे पशुओं को कैसे परास्त करते हैं तथा अपने प्राणों की रक्षा करते हैं इत्यादि भावना को लक्ष्य में रखकर ये कथाये लिखी गयी हैं।
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चतुर्थ अध्याय : कथा में पात्रों का विधान एवं शुकसप्तति के पात्रें का परिचय
कुछ जगह पक्षियों से सम्बन्धित कथाये भी हैं जैसे मन्दोदरी और उसके मयूर भक्षण की कथा।
एकादिक कथायें चोरो से सम्बन्धित हैं जैसे-सर्षपचौर की कथा।
कुछ कथायें भूत एवं पिशाचों से सम्बन्धित हैं- जैसे मूलदेव एवं पिशाच की कथा, करगरा एवं करगरानाथ की कथा।
इन पक्षियो एव भूत-प्रेतों की कथा के माध्यम से कवि ने सबल पर निर्बल की विजय किस प्रकार होती है आदि भावना का प्रदर्शन किया है।
इस प्रकार समस्त 70 कहानियों का पर्यालोचन करने के बाद दो ही प्रमुख विचार सम्मुख आते हैं-
- विवाहित स्त्री द्वारा कुमार्ग का अनुसरण न करना।
- पराक्रमी, शूरवीर किन्तु धोखेबाज प्राणियों से कमजोर व्यक्ति किस प्रकार अपनी रक्षा करें।
प्राचीन काल से चली आ रही ये दोनों ही भावनायें आज भी समाज में देखी जा सकती है।
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चतुर्थ अध्याय
कथा में पात्रों का विधान एवं
शुकसप्तति के पात्रों
का परिचय
“कथा में पात्रों का विधान एवं शुकसप्तति के पात्रों का परिचय”
(अ) कथा में पात्र विधान
(1) कथा में पात्रों की उपयोगिता :
किसी भी काव्य का मूलाधार पात्र ही होता है। दशरूपक में धनञ्जय ने रुपक के प्रमुख तीन भेदक तत्व माना (1) वस्तु, (2) नेता, (3) रस। “वस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः”।
वस्तु के पश्चात् पात्र कथा का अनिवार्य तत्व है क्योंकि पात्रों के अभाव में कथा का विकास असम्भव है। कथानक के अन्तर्गत पात्रों के आचरण, पात्रों के व्यवहार, उनके कथोपकथन, उनकी जीवनचर्या तात्कालिक सामाजिक एवं सास्कृतिक परिस्थितियों का बोध कराते हैं, साथ ही साथ कर्ता, कवि के जीवन आदि का रहस्योद्घाटन करते हैं।
पात्र रसभिव्यक्ति के केन्द्र बिन्दु होते है। वहीं कथा का आदि और अन्त कर्ता होता है। अतएव कथा में पात्रो की उपस्थिति तो और भी अनिवार्य हो जाती है। लघु कथाओ के अन्तर्गत विस्तृत विविधरूपो का दिग्दर्शन कर पाना तो कवि के लिए कठिन हो जाता है, किन्तु कवि पात्रों के चरित्र चित्रण के माध्यम से विविध प्रकार के जीवन संदेश देने का प्रयास करता है।
'शुकसप्तति' के कथाओं के अन्तर्गत विविध प्रकार के पात्रों का कथन हुआ है। इसमें राज परिवार, ब्राह्मण, राजा-महारानियाँ, राजकुमार, मन्त्री, सेनापति, स्वामीभक्त, सेवक, चोर, कपटी, दास-दासियाँ, गणिकायें गन्धर्व इत्यादि सभी वर्गों के पात्रों का इन कथाओं के माध्यम से वर्णन हुआ है।
(2) पात्रों का वर्गीकरण :
पात्रो का वर्गीकरण कई आधारो पर किया गया है। सामान्यतया पात्र दो वर्गों मे रखे जाते है, (1) पुरुष पात्र, (2) स्त्रीपात्र। शुकसप्तति के समस्त पात्रों को प्रमुख रूप से चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है -
(1) समस्त पुरूष पात्र, (2) समस्त स्त्री पात्र, (3) पशु एवं पक्षी श्रेणी के पात्र, (4) भूत, पिशाच आदि। यद्यपि कथाओं में प्रधानता स्त्री और पुरुष पात्रों की है।
(क) इतिवृत्त के आधार पर :
कथावस्तु किसी भी रचना का मूलाधार है। कथावस्तु के स्वरूप के अनुसार ही उसके अन्तर्गत आने वाले समस्त पात्रों का स्वरूप निर्धारित होता है। कथावस्तु भी कई प्रकार की होती है दिव्य, अदिव्य अर्थात् मर्त्य और दिव्यादिव्य। दिव्य कथावस्तु के पात्र दिव्ययोनि के, अदिव्य में पृथ्वी लोक के तथा दिव्यादिव्य के अन्तर्गत पृथ्वीलोक से सम्बन्धित ऋषि, मुनि इत्यादि पात्र आते हैं।
शुकसप्तति के अधिकांश पात्र मर्त्य अर्थात् अदिव्य श्रेणी के हैं। कुछ पात्र जैस-गन्धर्व आदि दिव्य कोटि के है। जिनका परिचय आगे दिया जायेगा।
(ख) घटनाओं के आधार पर :
कथावस्तु की आवश्यकता एवं रसपरिपोषण की दृष्टि से अनेक प्रकार की घटनाओं की संरचना कवि करता है। जैसी घटनायें होती हैं उसी के अनुसार पात्रों का भी सृजन किया जाता है। कुछ घटनाओं का विषय राजवर्गीय होता है। कुछ प्रजावर्गीय अर्थात लोक या समाज से सम्बन्धित होती हैं। कुछ आर्षवर्गीय पात्रों को लेकर के उपदेशात्मक होती हैं। इस प्रकार घटनाओं के आधार पर पात्रों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है- (1) राजवर्गीय, (2) प्रजावर्गीय (लोक एवं समाज), (3) आर्षवर्गीय।
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