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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

( १३६ ) सिंहासनबत्तीसी. जहां आय और एक बार हाय कामकंदला, हाय कामकंदला ! पुकार उठा. चट उसने जा उसका हाथ पकड लिया और कहा मै तेरे ढूंढनेके लिये राजाकी आज्ञा पायके आयी तू उठ मेरे साथ जल्दी चल तेरा मनोरथ होगा. तेरे दुःखसे राजा निपट निपट दुःखी है यह सुनतेही उसके साथ वह होलिया. उसे ले यह दूती राजाके सम्मुख आई और कहने लगी कि, हे महाराज ! यह वही वियोगी है जिसके लिये आपने यह दुःख पाया है. तब राजाने उस ब्राह्मणसे पूंछा कि, महाराज ! आप वियोगसे किससे व्याकुल हो रहे हो सो सब बात मेरे आगे कहो तब उसने एक आह भरकर कहा-महाराज कामकंदला वियोगसे मेरी यह गती हुई हे वह राजा कामसेन पास है तू धर्मात्मा है और मैं तेरे पास आया हूं. तू मुझे उसको दिला दे तो मेरी जान बचेगी. यह बात सुनतेही राजा हँसकर बोला-सुन विप्र ! वह तो वेश्या है तूने उसके प्रेममें अपना सब धर्म कर्म छोड़ दिया यह तुझे उचित नहीं है. तब माधवने कहा महाराज ! प्रेमका पंथ न्यारा है जो नर प्रेम करते है सो अपना तन मन धर्म कर्म सब समर्पण करते है, प्रेमकी कहानी तो अकथनीय है यह मुझसे नहीं कही जाती. राजाने ये बाते सुनी और उसे अपने साथ ले मदिरमें गया और सब रानियोंके आज्ञा की कि, तुम

इकीसवीं पुतली २१. (१३७)

इकीसवीं पुतली २१. (१३७)

बनाव सिंगार करके आओ. रानियां जब सिंगार कर आई तब उस विप्रसे राजाने कहा इनमेंसे जिसे तुम्हारी इच्छा होगी उसको लो और अपने मनमें दुःख न कर चैन करो. तब उसने जवाब दिया कि, महाराज ! मैं आपके आगे सत्य कहताहूं कि मेरी आंखमें वह बस रही इस लिये और कुछ मेरी दृष्टिपे नहीं आता. चातककी तृषा स्वातीके बूँदसे बुझती है और जलपर उसे रुचि नहीं वैसी है प्रेमकी दृढता. यह दृढता विप्रकी देख राजाने अपने मनमें बिचार किया कि इसे साथ ले जाकर काम- कंदलाको दिलाऊं. अन्यथा इसके मनको स्थिरता नहीं होगी. यह बात राजाने बिचार विप्रसे कहा. देवता ! तुम स्नान पूजा कर कुछ खाओ. तब तलक मैंभी अपने लोगोंको बुला तुझे साथ ले चलूंगा. और उसे तुझे दिलाऊंगा तू अपने मनमें किसी बातकी चिंता मत्कर मैने तुझसे यह बचन किया. तब विप्र अपने खाने पीने लगा और राजाने प्रधानको बुलाकर आज्ञा की कि, मेरे डेरे नगरके बाहर निकालो चार घडीके बाद कामनगरकी तरफ मेरा कूच है इस वास्ते सबको खबर दो. इसमें कितनी एक देरके पीछे राजाभी तैयार हो विप्रको साथ ले कूचकर डेरोंमें जा दाखिलाआ. और जितने राजाके नौकर थे वह सब रिका- बमें हाजिर थे राजा वहांसे कूच दरकूच जाताथा, कितने एक मंजिलोंके बाद कामा नगरी दस कोस इधर डेरा किया.

( १३८ ) सिंहासनबत्तीसी.

और उस राजाको पत्र लिखा कि हम इस लिये आये हैं कि, तुम्हारे यहां जो कामकंदला वेश्या है उसे हमारे पास भेजदो. नहीं तो युद्ध करनेका सामान करो. यह पत्र लिख एक दूतके हाथ राजा कामसेनके पास भेज दिया राजाको खबर हुई कि, एक दूत राजा वीरविक्रमादित्यका खत लेकर आया है यह सुनतेही राजाने उसको सन्मुख बुलाया और उसने जा जुहार- कर खत राजाके हाथमे दिया. राजाने उस चिट्ठीको बाँचकर कहा कि, अच्छा कहो अपने राजासे कि चले आवे हम युद्ध करनेको तैयार .हुए हैं. दूतने आ राजासे कहा-महाराज ! वह लडनेको तयार है. तब राजाने भी हुक्म अपने लोगोंको दिया. हमाराभी दल तैयार हो फिर राजाके जीमें आया कि जिसके वास्ते हम आये है उसकी प्रीतिकी परीक्षा लिया चाहिये. इस तरह जीमें ठहराया, और आप वैद्यका स्वांग बन कामनग- रीमें गया और लोगों मकान कामकंदलाका पूंछ दरवाजे- पर जा वैद्य हकीम कर पुकारा. इनका अवाज सुनतेही एक दासी बाहर निकल आई और पूंछा कि तुम वैद्य हो तो हमारी नायकाका कुछ इलाज करो जो यह अच्छी होवेगी तो तुम्हें बहुतसे रुपये मिलेंगे. ये बातें कह दासी उससे विदा हो गई और वह उसके साथ कामकंदलाके सन्मुख गया राजाने देखा कि निर्जीव पडी है. राजाने उसकी नाडी देखकर कहा कि

इक्कीसवीं पुतली २१. ( ११६ )

इक्कीसवीं पुतली २१. ( ११६ )

इसके तई रोग और कुछ नहीं इनके तो प्रियतमका वियोग है जिससे इसकी यह गति बनी है. यह बात सुन कामकंदलाने आँखें खोल उसकी तरफ देखा. और कहा कि-इसका कुछ इलाज तुम्हारे पास होय सो करो. तब उसने कहा कि, इसका इलाज तो था पर इसमें हमें कुछ कहते बन नहीं आता. तब वह बोली-तुम्हारे पास इलाज क्या था ? वह बताओ राजाने कहा-माधव नाम एक ब्राह्मण था उसे हमने उज्जैन नगरीमें विरहवियोगी अति शोकी देखा. सो वह दुःख उपाय मर गया यह सुनतेही हाय कर उसने भी अपना प्राण छोड़ दिया. जितनी दासी दारा उनके घरमें थे. यह दशा देख सिर पीट पीट सब रोने लगे. तब उन्होंने कहा कि-तुम कुछ चिंता अपने मनमें मत करो. इसे मूर्च्छा आई है कितनी देरमें सुध आवेगी तुम इसकी चौकसी करते रहो मैं जाकर अपने घरसे घरसे औषध लाऊ ऐसा कह राजा उलटा फिर अपने दलमें आया और माधवके आगे उसके मरनेकी खबर कही. सुनतेही एक आहके साथ उसकी भी जान निकल गई, यह देखकर राजा अपने जीमें पछताया. विचार करने लगा कि जिसके वास्ते इतनी सेना साजके साथ परभूमिमें आया और इसे इस तरह खो दिया. यह हत्या मेरेपर हुई. अब अपना भी प्राण रखना उचित नही यह बात जीमें ला बहुतसा चंदन मंगवा चिता बनाय राजा

( १४० ) सिंहासनबत्तीसी. जीताही जलनेको तैयार हुआ. दीवान और प्रधानने कितना मना किया पर न माना जो चाहे कि उस चितामे बैठकर आग लगावे कि बैतालने आ हाथ पकड़ लिया और कहा कि- हे राजा ! तू अपना जी क्यों देता है ? तब इसने कहा कि-दो की जान मैंने जानके खोई अब मेरा भी जीना संसारमें उचित नहीं इस बदनामीके जीनेसे मरनाही उत्तम है, तब बैतालने कहा कि-राजा मैं अमृत लाकर देताहूं- तू दोनोंको जिलादे यह कह जल्द बैताल पातालमें जाकर अमृत लेकर आया और उस ब्राह्मणपर छिड़काया तब वह उठा फिर ले जाकर कामकंदलापर छिड़का वह जी उठी और माधव माधव पुकारने लगी. राजाकी सूरत देखकर कहा कि महाराज ! तुम कौन हो और कहाँसे आये सो मुझसे कहो तब राजाने कहा-हम बीर विक्रमादित्य हैं और माधवका बिरह दूर करनेके लिये उज्जैन नगरीसे यहां आये हैं तुम अपने मनमें खातिर जमा रक्खो कि तुम्हें हम माधवसे मिला देंगे. यह बात राजाके मुखसे सुनते ही वह उठ राजाके पांवपर गिरपड़ी और बोली कि-महाराज ! यह तुम जीवदान दोगे. और जैसा तुम्हारा यश सुनतीथी वैसा ही दृष्टिमें आया इतनी बात कह राजा वहांसे फिर अपने लश्करको आय मिला. दूसरे दिन अपनी फौज ले कामनगरी पर चढ़ धाये वहांके राजासे युद्ध कर उसको जीता. तब उस

[Header: बाईसवीं पुतली २२. ( १४१ )]

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राजाने हार मानी और कबूल किया कि, हम कामकंदलाको भेज देंगे. और यह जो हमने युद्ध किया सो आपके दर्शनके वास्ते किया है इसलिये कि किसीतरह हमारे नगरमें आपका चरण पड़े आगे राजासे मुलाकत करके वह राजा अपने मंदिरमे विक्रमादित्यको लेगया. और बहुत भेंट आगे धर कामकंद- लाको बुलाकर राजाके आगे खड़ी किया. और उसनेभी माधवको बुला कामकंदलाका हाथ पकड़ हवाले किया. फिर वहासे कूचकर अपने नगरमें आये और माधवको बहुत धन दौलत दे विदा किया. इतनी बातें कह अनुरोधवती पुतली बोली कि-हे राजा भोज ! इतनी सामर्थ्य और इतना साहस जो तुझमे हो तो सिंहासनपर बैठ नही तो पतित हो नरक भोग करेगा. पहभी दिन राजाका टल गया. दूसरे दिन वह फिर मौजूद हुआ तब अनुरेखा नाम्नी-

बाईसवीं पुतली-

बोली-कि हे राजा भोज ! तू अपने मनकी चिंता छोडदे और मैं जो तेरेसे कहतीहूं सो सुन. एक दिन राजा वीर विक्रमादित्य सभा कर बैठाथा और प्रधानसे पूंछा कि-मनुष्य बुद्धि अपने कर्मसे पाते हैं या उनके मातापिताके सिखानेसे पाते हैं ? यह सुनकर मंत्री बोला-महाराज ! यह नर पूर्वजन्ममें जैसा कर्म

( १४२ ) सिंहासनबत्तीसी. करता है वैसा विधाता उसके कर्ममें लिख देता है, तिसी प्रमाण बुद्धि होती है, मातापिताके सिखाये बुद्धि होती नहीं. कर्म लिखवाही फल पाता है, आदमी आदमीको क्या सिखावे ? और जो सिखेसे बुद्धि हो जाय तो सभी पंडित होजाते इससे महाराज ! कर्मके लिखे बिना विद्या होती नहीं. करोड यत्न कोई करे पर कर्मकी रेखा मेटे मिटती नहीं. राजाने कहा-ऐ दीवान ! तूने यह क्या कहा ? संसारमें यह जो जाहिर देखते हैं कि जन्म लेतेही लडका मातापितासे जो सुनता है और जो देखता है उसी व्यौहारसे चलता है ? इसमें कर्मका लिखा क्या है ? यह सिखायेसे सीखता है. ओर जैसो संगमें बैठता है वैसीही उसकी बुद्धि होती है. इतनी बात सुन मंत्री बोला कि-धर्माव- तार ! आपकी बराबरी हम नहीं करसकते, यह अपने मनमें विचारके तुम समझो कि कर्मका लिखा हुआ फल मिलता है. तब राजाने कहा-अच्छा इस बातकी परीक्षा लिया चाहिये. ऐसा कह राजाने एक महावनमें मंदिर बनवाया कि जहां मनुष्यकी आवाजही नहीं जाय. एक अपने बेटेको पैदा होतेही उस मंदिरमें भिजवा दिया. और उसके साथ एक दाई ऐसी कर दी कि, आँखोंसे अंधी, कानोंसे बहिरी और मुँहसे गूँगी. वही उसको दूध पिलातीथी. और परवरिश करतीथी. फिर इसी तरहसे एक दीवानके बेटेको, एक ब्राह्मणके सुतको, एक कोत- बालके पुत्रको जन्मतेही गूँगी, बहरी अंधी दाइयां दे उसी

बाईसवीं पुतली २२. ( १४३ )

बाईसवीं पुतली २२. ( १४३ )

मंदिरमें भिजवा दिया. दिन बदिन वे बढ़ने लगे और ऐसी गार्द चौकी उस मंदिरमें दोदोकोस गिर्दमें बैठादी कि मनुष्यके जानेकी तो क्या सामर्थ्य थी ? ढोल नकारेकीभी आवाज न जातीथी. इसतरहसे बारह बरस जब बीतगये तब एकदिन ब्राह्मणीने अपने स्वामीसे कहा कि--एक युग पुरा होचुका और मैंने अपने पुत्रका मुँह नहीं देखा कदाचित् जी निकल जाय तो मनमें देखनेकी अभिलाषा रहजाय इससे तुम अब राजाके निकट जाकर कहो, कि--महाराज ! बारह बरस बीत गये पर मैने बेटेका मुँह नहीं देखा अब मेरे जीमें है कि, पुत्रको घर सौंप- कर दंडी हो तपस्या करूं. यह ब्राह्मणकी बात सुन ब्राह्मण तैयार हो राजाके पास गया. राजाने देखतेही दंडवत् की और उस ने भी आशीष दी राजा बोला--तुम आनंद मंगलसे हो ? ब्राह्मणने कहा कि--महाराज ! आपकी कृपासे सब आनंद मंगल है पर मैं एक कामनाकर आपके पास आयाहूं. यह सुनकर राजाने कहा कि--जो तुम्हारा काम हो सो कहो. तब उस ब्राह्मणने अपना सब अहवाल कहा. सुनतेही राजाने प्रधानको बुलाकर आज्ञा की कि, उन चार बालकोंको मंगाओ जिसको कि बारह बरस होचुके. दीवान सुनतेही तुर्त आप सवार हो लडकोको लेने गया. पहले उनमेंसे राजकुँवरको ले आया. नख और केश बढे हुए, शरीर तमाम मैला कुचैला इस भेषसे राजाके सम्मुख ला खडा किया.

( १४४ ) सिंहासनबत्तीसी. तब राजाने देखकर कहा कि, सुत ! तुम कुशलहो ? इतने दिन तुम कहां थे ? और अब कहांसे आये ? सब ब्यौरा अपना हमसे समझाकर कहो. यह सुन कुँवरने हँसकर राजासे कहा कि, आपकी कृपासे सब कुशल है और आजका दिनभी कुश- लका है जो आपके दर्शन पाये. यह कुँवरकी बात सुनकर अपने मनमे हर्षित हो राजाने मंत्रीकी तरफ देखा तो मंत्री उठ हाथ जोडकरके बोला कि,-महाराज ! यह सब कर्महीका लिखा है. फिर दीवानके पुत्रको बुलवाया, वह आकर राजाके सम्मुख भयानक भेषसे खडा हुआ. जैसे बनसे भालूको पकड लाते हैं. मुखपर बाल उसी तरह बढे हुए शर्मसे नीचीगर्दन किये खडा था. तब उसको राजाने कहा कि-तुम अपनी कुशल कहो कहां थे ? और किधरसे आये हो ! तब वह बोला, महाराज ! कुशल क्षेम कहां होगी ? उधर संसारमें उपजे हैं इधर विनसे हैं जैसे घडी भरती ओर डूब जाती है नर जानता है ! दिन जाने हैं पर नर जाता है. यही जगत्का व्यौहार है. इससे कुशल क्षेम काहेकी कहूं ? ये उसकी बातें सुन राजाने दीवानसे कहा-इसे यह किसने सिखाया है ? जो कुछ तूने कहाथा वह सब सच है. यह फल कर्मसेही इसने पाया. फिर राजाने कोत- वालके बेटेको बुलवाया. उसने आतेही राजाको सलाम किया और हाथ जोड खडा हुआ राजाने कुशल पूंछी. तब उसने-कहा

बाईसवीं पुतली २२. ( १४५ )

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पृथ्वीनाथ ! दिनरात नगरका पहरा हम देते हैं. इसमें भी चोर आन चोरी करता है, बदनाम हम होते हैं. बिना अपराध कलंक लगे तो फिर कुशल काहेकी है ? राजाने फिर ब्राह्मणके बेटेको बुलाया. जब वह सन्मुख आया तब राजाने दंडवत् की. वो मंत्र पढ आशीष देने लगा. तब राजाने कहा आप कुशल क्षेमसे हैं ? उसने कहा महाराज ! आप पूंछते हैं मुझसे यह बात कि तेरे शरीरमें कुशल है सो कुशल कहांसे हो ? मेरे शरीरकी दिन बदिन उमर घटती है महाराज ! कुशल तो तब कहनेमें आवे कि मनुष्य चिरंजीव होवे जिसके जीवन मरण साथ है उसको क्या खुशी है ? चारोंकी चार बातें सुनकर दीवानसे कहा कि सच है. पढानेसे पंडित नहीं. पंडिताई जो कर्ममें लिखी हो तो मिलै यह कह दीवानके तईं सब प्रधानोंका सरदार किया और अपने राजका भार दिया. उन चारों लड़कोंके विवाह कर दिये. ओर बहुत धन दौलत दी इतनी बात कह पुतली बोली सुन राजा भोज ! कलियुगमें ऐसा धर्मात्मा और साहसी राजा होना कठिन है जो इतनी बुजुर्गी और धन पाय अपनी कही बातका ख्याल- न करे और जो न्यायका धर्म था सोही कहे. ऐसा जो तू कर्म करे और इसके योग्य हो तो इस सिंहासनपर पाँव धर और नहीं तो अपनी यह आशा तज. यह पुतलीकी बातें सुन राजा अ पने मनमें चिंता करता हुआ वहांसे उठ मंदिरमें आया और १०

तेईसवीं पुतली २३. (१४७)

तेईसवीं पुतली २३. (१४७)

पुरुषार्थ था यह सुनकर करुणावती पुतली बोली राजा ! जो तुम स्थिर होकर बैठो और कान देकर सुनो तो मैं सब कथा कहती हूँ. तब राजा यह बात सुन प्रसन्न हो आसन बिछवा वहां बैठगया और जितने लोग राजाके साथ थे गिर्द ओ पेश वे सब बैठगये. फिर पुतली बोली कि, राजा ! वीरविक्रमादित्यके गुण तू सुन. ऐसा यशी, साहसी और पुण्यात्मा इस कलियुगमें कोई जन्मा नहीं और न कोई जन्मेगा. जिस समय राजा वीरविक्रमादित्य शंखको मार राजगद्दीपर बैठा तब शंखके दीवानको बुलाकर कहा कि, तुझसे मेरा काम न चलेगा. इससे यह बेहतर है कि, बीस दास मुझे अच्छे ढूंढकर दे कि जो राजकाज करनेके लायक हों, क्योंकि तुझसे कामका बंदोबस्त न होगा. मैं उनसे अपना सब काम करा लूंगा. राजाकी आज्ञा सुन दीवानभी बीस आदमी उसी नगरमेंसे ढूंढकर लाया. कुलमे, उमरमें, सुंदरतामें, सबके सब अच्छे थे. उनको राजाके सामने खड़े करदिये. तब राजा उनको देखतेही बहुत प्रसन्न होगया. और उसी समय सबको बागे पहना पान देकर कहा कि, तुम हमारी खिदमतमें सदा हाजिर रहो. फिर उसके कई दिनके बाद उनमेंसे किसीको दीवान, किसीको कोतवाल, किसीको सेनाध्यक्ष किया. गरज इसी तरहमें हर एकको एक काम देकर पुराने लोगोंको जवाब दिया. और सब नया बंदोबस्त कर दिया. पर एक उस पुराने दीवानको जवाब न दिया, दीवान जब अपने घरमें बैठा करता तब वे सब

( १४८ ) सिंहासनबत्तीसी. पुराने लोग आकर हाजिर हुआ करते और आपसमें चर्चा करते कि यह राजा बुद्धिमान है, जो राजको यों लिया और बंदोबस्त यों किया, कई दिनके बात उन लोगोंसे दीवानने कहा कि, तुम मेरेपास आया न करो इस लिये कि काम तो मेरे हाथ तुम्हारा निकलता नहीं और नाहकको राजा सुनेगा, तो खपा होगा कि, यह अपने घरमें क्या मता किया करते हैं ? इस वास्ते मैं अपनी बदनामीसे डरताहूं कुछ तुम मेरे इस कहनेका अपने मनमें बुरा न मानना. यह सुनकर उनमेंसे फिर कोई उसके पास न आया, यह अपने मनमें कहने लगा कि, ऐसा कुछ काम कीजिये जिसमें संतुष्ट हो रैनादिन यही विचार करता रहा था. एक दिन वह प्रधान नदीके किनार गया, वहां जाकर स्नान ध्यान कर कमरभर पानीमें खड़ा हुआ जप करताथा इसमें उसे नदीमे एक फूल अति सुंदर कि वैसा कभी दृष्टीमें न आया था बहता हुआ देखा. अपना जप छोड़कर आगे बढ़ फूल लेकर जीमें विचारा कि यह राजाको भेंट करूंगा तो वह देखकर बहुत खुश होवेगा, वह फूल हाथमें ले खुशी खुशी अपने घरमें आ कपडे दरबारके पहन राजाके पास गया, और फूल नजर किया. राजा फूल लेकर खुश बहुत हो बोला कि, अपने राज पाट‌का मैंने तुझे प्रधान किया, उसने उठकर भेंट दी और आदाब बजा‌लिया. फिर राजाने कहा इस फूलका वृक्ष मुझे लादे, और लादेगा तो मैं तुझसे बहुत खुश हूंगा और न लादेगा तो अपने नगरसे

तेईसवीं पुतली २३. ( १४९ )

तेईसवीं पुतली २३. ( १४९ )

निकाल दूंगा. यह राजाकी आज्ञा ले अपनी मंदिरमें आया और जीमें विचार करने लगा कि, मैने पूर्व जन्ममे ऐसा क्या पाप किया है कि जो ऐसी सुंदर खुवस्तु राजाको दी और राजाने प्रसन्न होकर ली. फिर यह क्रोध किया. कर्मकी गति बूझी नहीं जाती कि भला वारते बुरा होवे. अकेला बैठा बहुत चिंता करने लगा. कि, अगर राजाकी आज्ञा न मानू तो देशनिकाल मिले ओर ढूंढने जाऊं तो कहांसे ढूंढकर लाऊं. जो दुःख पाकर कही जाऊं और ढूँढे न पाऊं तो और भी दूना दुःख होगा. मैं यह जानता हूं कि, काल मेरे निकट आकर पहुँचा है. इससे अप- यशका मरना भला नहीं अगर योंही मरना है तो वनम जाइये जो ढूँढे मिले तो ले आइये नहीं तो वहीं मर जाइये इतनी बातें अपने जीमें विचार ढाढ़स करके बैठा अपने दीवानको बुलाकर कहा कि किसी कारीगर बढ़ईको बुलादो कि एक नाव हमें ऐसी तयार करके दे कि बगैर मल्लाह जिधरको चाहें ले जायें. कारीगर बढ़ईको बुलवा दीवानने हाजिर कर किया. बढईने कहा कि महाराज ! कुछ मुझे खर्चकी आज्ञा होवे तो मैं जल्दी बनालाऊं. मंत्रीने दीवानको कहा कि यह जितने रुपये मागे उतने इसे दो. उसने मुँहमांगे रुपये उसे दिये वह घरको ले गया और कितनेक दिनोंके बाद नाव तैयार करके खबर दी कि नाव तैयार हो चुकी. दीवाननेभी अपने स्वामीसे जाकर कहा कि, आपने जो

( १६० ) सिंहासनबत्तीसी. नाव बनानेकी आज्ञा दी थी सो तैयार है. यह सुनतेही दीवान उठ नदीके किनारे आकर नावको देख प्रसन्न हो उस बढ़ईको घोडा जोडा दे पांच गांव वृत्ति कर दिये और दीवान अपना सामान नावपर रखवा आप कुटुंबसे बिदा हो हाथ जोडकर कहने लगा कि, जो हम जीते फिरेंगे तो फिर तुमसे मिलेंगे और जो मरगये तो यही बिदा हमारी है. यह कह कर रुखसत हुआ. तमाम घरके लोग कूक मार रोने लगे. फिर यह भी जी भारी किये हुये इस नावपर बैठा पाल बढा कि कीश्ती खोल जिस तरफसे वह फूल बहता हुआ आया उसी तरफको वह चला जाता था और दोनों किनारेके वृक्षोंको देखता जाताथा. कितनेक दिनोंमें चला चला एक महावनमें जा पहुँचा और खानेकी जिनसभी तमाम हो गई तब उसने अपने जीमें विचारा कि, अब नावपर बैठ रहना उचित नहीं जिस कामको आया हूं उस कामकी फिक्र किया चाहिये. यह सोचकर किसी पाल कर उडाये जाता था. कि एक पहाड दरमियान उस दरियाके नजर आया. और उसी पहाडसे पानी आता था. किश्ती वहीं लगा, आप उतर कर पहाडपर जाकर क्या देखता है कि जहां तहां हाथी गैंडे शेर अरने दौड रहे हैं सिवाय उनकी आवाजोंके और कोई बात कान नहीं पडती, सुन सुन आवाजें अपने जीमें सहमा जाता

तेईसवीं पुतली २३. ( १५१

तेईसवीं पुतली २३. ( १५१

था, इस परभी आगेही पांव धरता था. जब उस पहाडको लांघ गया वहां जाकर देखे तो एक वैसाही फूल बहा हुआ चला आता है. उस फूलको देख जीमें ढाढ़स हुई और कहने लगा कि वैसा फूल दूसराभी देखा. भगवान् चाहे तो वृक्ष भी नजर आवेगा. ज्यों ज्यों आगे बढा त्यों त्यों फूल और भी बहते देखे वह अंदेशा करनेका कारण उसके जीमें कमती हुआ. और उसके मनमें कुछ करार आया, आगे देखता है कि एक बडा पहाड है और उसके नीचे एक मंदिर है. उस मंदिरको देखकर अपने मनमें विचारा कि, ऐसा सुंदर मंदिर उस जगह बना हुआ है चाहिये कोई मनुष्यभी होय. यह कहता हुआ उस मंदिरके पास जाकर पहुँचा, और वहां जाकर देखे तो एक तरुवरमें तपस्वी जंजीर पांवोंमें बांधे हुए उलटा लटक रहा है मांस, चाम सूखकर काठ हो गया है और उसमेंसे एक एक बूंद रक्तका उस नदीमें गिरता है, और फूल हो वहांसे चला जाता है. ऐसे अचरजको देख जीमें यों कहने लगा कि भगवानकी लीला कुछ बुद्धिमें नहीं आती. नीचे निगाह करके देखे तो बीस योगी वैसेही जटाधारी बैठे हैं और सूख के वेभी खडंग होरहे हैं और चारों तरफ उनके दंडकमंडलू पडे हुए हैं और जिस ज्ञान ध्यानमें जैसे बैठे थे वैसेही बैठे हैं. यह दशा वहांकी देख प्रधान उलटा फिर अपनी

( १५२ ) सिंहासनबत्तीसी.

नावके पास आया. नावपर सवार हो कितनेक दिनोंमें अपने नगरमें आन पहुँचा लोगोंने खबर उसके आनेकी पा पेशवाई लेनेको गये और इसे ले आये. जो कोई आताथा सो मिलकर क्षेम कुशल पूंछ कर बधाई देता था घरमें भी उसके नौबत बजने लगी, मंगलाचार होने लगा. यह खबर राजाने सुनी और एक प्रधानको भेज दीवानको बुलाया. वह आनकर लेगया. यह जाकर राजाके पांवपर गिर पडा, रा- जाने उठा छातीस लगा क्षेम कुशल पूंछी और कहा. कहां तलक- तू गयाथा और कहां ठिकाणा उसका कर आया ! यह सुनतेही वे फूल जो लायेथे सो भेंट किये और हाथ जोडकर कहने लगा कि महाराज ! एक अचंभेकी बात है जो मैं कहूँगा तो आप न पतियायेंगे फिर राजाने कहा जो तूने अचंभा देखा है सो बयान कर । तब वह बोला महाराज मैं यहांसे चला हुआ एक जंगलमें पहुँचा और वहां जाकर एक पहाड़ देखा उस पहाड पर जब मैं चढा तो और एक पहाड नजरआया. इस तरहके पहाड लांघ जब मैं आगे गया, तब तक पहाडके तले एक सुंदर मंदिर देखा जब मैं उसके पास गया तो एक पेडपर तपस्वी पांवोंमें जंजीर बाँधे हुए उलटा लटकता हुआ. नजर पडा मांस चाम सब उसका हाडमें सट रहा है और रक्त उसकी देहसे जो टपकता है सो फूल बनकर बहता है और उसके नीचे

तेईसवीं पुतली २३. (१५३)

तेईसवीं पुतली २३. (१५३) देखा तो बीस तपस्वी आसन मारे जिस ध्यानमे बैठे थे योंके योंही रहगये हैं और जान एकमेंभी नहीं. यह सुनकर राजा हँसा और मंत्रीसे बोला कि, तू सुन मैं उसका विचार तुझसे कहता हू कि वह जो तूने तपस्वी सांकलमें लटकता हुआ देखा वह तो मेरी देह है. मैने उस जन्ममें ऐसी कठिन तपस्या की थी कि उसका फल यह राज मुझे मिला है और जो वह बीस सिद्ध तूने देखे सो बीसों दास हैं कि, जो तूने ला दिये और उस तपस्याके तेजसे मेरे आगे कोई नहीं ठहर सकता. उसी बलसे मैंने शंखको मारा और यह पूर्वजन्मका लिखा था इसमें मेरा कुछ दोष नहीं. जबतक मैं इस पृथ्वीमें अखंड राज करूंगा तबतक तू मंत्री रहेगा. तू अपने जीमें चिंता मतकर. इसमें दोष तेरा भी कुछ नहीं. जैसा पूर्वजन्मका लिखा था सो हुआ और जैसी तब उन्होंने मेरी सेवा कीथी वैसाही अब उसके फलभोग करेंगे. तब उन्होंने मेरेसाथ जी दिया था उस लिये मै उन बीसोंको अपने निकट रक्खा है. यह अपना परिचय दिखानेके लिये तुझसे निठुराई की थी. अब तेरा मन पतियाया. और तूने हमारा मर्म बूझा. क्योंकि सब लोग कहते हैं विक्रमने अपने बड़े भाईको मारा इसमें दोष मेरा कुछ नहीं और जो कर्मका लिखा है सो हो रहता है. आजसे मैंने तुझे अपना प्रधान किया. और जिसमें राजकाज अच्छा होवे वह कीजो. यह बात किसीके आगे मत कहियो किसलिये कि, जो सुनेगा सो राजके लोभसे

योग कमावेगा. इतनी बात कहणावती पुतली कहकर बोली कि,

An exact line-by-line transcription of the Hindi text provided in the image:

( १५४ ) सिंहासनबत्तीसी. योग कमावेगा. इतनी बात कहणावती पुतली कहकर बोली कि, सुन राजा भोज ! जितना बीरविक्रमादित्यका राज था तिसका भार उसने दीवानको दे मुखत्यार करदिया, और राज पाट हवाले करदिया. जो इसके समान तू होगा तो इस सिंहासनपर बैठनेको नाम ले नहीं तो यह खयाल दिलसे दूर कर. वह साअत और वह दिनभी राजाका टल गया. दूसरे दिन सुबह आन फिर सिंहासनके पास खड़ा रहा. तब चित्रकला- चौबीसवीं पुतली- बोली सुन राजा भोज ! मैं एक दिनकी हकीकत राजा बीर विक्रमादित्यकी तेरे आगे कहती हूं, तू दिलमें अपने खूब तरह समझ. एक दिन राजा विक्रमादित्य नदीके किनारे दशहराको नहाने गया था. वहाँ जाकर देखे तो एक रंडी बनियेकी जवान खूब सूरत नदीके तीर खडी हुई बाल सुखाती है और सामने उसके साह- कारका बच्चा बैठा तिलक दे रहा है. आपसमें दोनोंकी सैन चल रहीथी. कभी तो यह स्त्री हाथ नचाय भौंहें मटकाय बाल सुखाती है और कभी शिरका अचला छातीसे सरका बदन दिखा फिर छिपाती है, कभी आरसी दिखा चूमकर छातीसे

चौबीसवीं पुतली २४. ( १६६ )

चौबीसवीं पुतली २४. ( १६६ )

लगाती है इस तरहसे अनेक रीतिसे चेष्टा कर रही है और वह भी इसी तरह इशारे कर रहा है. उन दोनोंकी हालत देख राजाने अपने जीमें विचारा कि इतना तमाशा देखा चाहिये कि, ये क्या करते है. राजाने स्नान ध्यान अपनाभी सब किया. पर उनकी ओरभी देखता रहा. इतनेमें वह स्त्री स्नान कर चद्दर ओढ घूँघट कर अपने घरकू चली और साहुकार बच्चाभी उसके पीछे चला. राजाने एक हलकारा उन दोनोंके पीछे लगाया और उस हलकारेको कह दिया कि इन दोनोंका मकान देख सबसे वाकिफ हो और हमे जल्दी खबर दे. जब वह औरत अपने घरमें गई तब उसने फिरकर देखा और शिर खोलकर दिखाया. फिर छातीपर हाथ धर अपने मंदिरमें गई और सेठके बेटेनेभी अपनी छातीपर हाथ रख लिया. यह खबर हलकारेने आ राजाको दी तब राजाभी अपनी सभामें आकर बैठा और एक पंडितसे पूँछा कि कोई स्त्रीचरित्र हमें सुनाओ कि हमारा जी सुनना चाहता है. तब पंडितने उत्तर दिया कि महाराज ! मेरा तो क्या सामर्थ्य है जो मैं स्त्रियोंका चरित्र और पुरुषका भाग कहूँ. ब्रह्माभी नहीं जानता, आदमीकी तो क्या कुदरत है ! और यह देखतेही बन आवै जबानसे कहा नहीं जाता. यह बात पंडितसे सुन राजा चुप हो रहा. और अपने जीमें कहा यह चरित देखा चाहिये. इतनेमें शाम होगई राजा उठ महालमें गया और कुछ खा तुरंत बाहर निकल आया और

(११६) सिंहासनबचीसी.

उस हलकारैको बुलाकर कहा कि तू, इस बातका ब्यौरा कुछ समझ गया है क्या ? तब उसने जबाब दिया कि महाराज कुछ मेरे जीमें आया है पर आपके आगे मुझे कहते शंका होती है. तब राजाने कहा कि तू जो समझा है सो निडर होकर बयान कर. वह बोला महाराज ! उसने जो शिर खोलकर छाती- पर हाथ रखखा शो उसने कहा कि जिस वक्त अँधेरी रात होगी तब मैं तुझसे मिलूंगा और उसनेभी छातीपर हाथ रख जबाब दिया कि, अच्छा दासकी समझमें यह कुछ आता है राजा कहा तू तो सब समझा है यही उनका मतलब है. मैंनेभी बडी देरतक घाटपर बैठे उनका मुद्धा मालूम कियाथा. पर तू अब मेरे तईं उसके घर लेचल. हलकारेने कहा अच्छा मैं हाजिर हूं महाराज ! चलिये. तब राजा हलकारेको ले उसके मकानके पास आया और उसको बिदा किया पिछवाडे चौबारेके एक खिडकी थी उसमेंसे चिरागकी ज्योति नजर आतीथी और कभी २ जो झाँकती थी तो उसकी झलकभी मालूम होतीथी जब जब दो प्रहर रात गुजरी और खूब अंधेरी होगया तब राजाने उधरसे एक कंकरी उस खिडकीमें मारी लगतेही वह झाँकि राजाको देख यह जाना कि वही पुरुष यहां आन पहुंचा. तब उसने तमाम घरका जवाहिर और सब गहना एक डब्बेमें भरा और साथ लेकर निकल राजा के पास आई कहा कि, यह ले और मुझे लेकर चल. राजाने कहा यों तो मैं तुझे न ले जाऊंगा क्योंकि तेरा खाविंद जाती