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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

( ८२ ) सिंहासनबत्तीसी. कृपा कर दीजिये. यह सुनतेही उसने वह थैली दी वह खुश हो उसी राजाके स्थानपर गया और दूसरे दिन रातको फिर वह राजा बनमें गया और वहां उसने देखा कि न देवीका मंदिर है और न कड़ाह है. स्थान भंग पड़ा है. यह दशा वहांकी देख सोचमें डूब गया. फिर जो होश आया तो हाय मारके रोने लगा, आखिरको लाचार हो उलटा फिर अपने मंदिरको आया उदास होकर सोरहा भोर हुवा जो सभाके लोग आया और राजाको देखा कि, विह्वल पड़ा है. न हँसता है, न किसीसे बोलता है, बल्कि जो कोई राज्यकी बात करता है, यह सुन- कर मुँह फेर लेता है. यह हालत राजाकी देख दीवानने विनत किया कि-महाराज ! आपका मन मलीन होनेसे सारी सभा उदास होरही है. राजाने यह जवाब दिया कि- आज तुम बैठकर दरबारका काम करो; मेरा शरीर माँदा है. तब प्रधान बैठ राजकाजकी बातें करने लगा. और जो कोई आताथा सो अपने मनमें जो चाहताथा सोई विचारताथा. कोई कहता था कि, राजा बीमार हो गया है, कोई कहता कि, राजाको कोई मोह गया है. और कोई कहताथा कि, राजा है नहीं. पर जो इसकी अवस्था थी वो किसीको मालूम न थी, इतनेमें अपने समयपर राजा बीर विक्रमादित्यभी गया और पूंछा कि-तुम्हारे मनमें क्या दुःख है ? क्योंकि मैंने

[Header] बारह्वीं पुतली १२. ( ८३ )

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तुमसे प्रतिज्ञा की थी कि, मैं तुम्हारी मुश्किलके वक्त काम आऊंगा. सो मेरा बचन क्या आप भूल गये ! मेरे आगे अपनी सब अवस्था ब्योरेवार कहिये. तब राजा बोला कि- मैं तेरे आगे क्या अपनी बात कहूँ ? पर एक मेरे जीमें है कि, अब अपना प्राणघात करूंगा. विक्रमने कहा-पृथ्वीनाथ ! एक बेर मेरे आगे अपने मनकी व्यथा कहिये और पीछे अपने मनमें जो करना होय सो करो. राजाने कहा-एक देवी मेरे पास थी सो मैं नहीं जानता वह कहां गई ? लाख रुपये रोज वह मुझे देतीथी. और वे लाख रुपये मैं नित्य दान पुण्य करताथा. और अब मुझे बड़ा कष्ट हुआ है मेरी नित्यक्रिया निबहेगी नहीं. इसवास्ते अब मैं जान दूंगा. और ऐसा मैं किसीको नहीं देखता कि जिससे मेरा नित्यनेम चले और जो धर्म पुण्य न रहेगा तो मेरा जीना संसारमें अकारण है. यह बात उसकी विक्रम सुनतेही बोला-ऐसा काम मैं करूंगा. ऐसा बोलकर वह थैली हाथमें दी. और कहा-महा- राज ! स्नान ध्यान कर नित्यधर्म कीजिये और थैलीसे जितने रुपये चाहोगे वे खर्च करोगे. कम कभी न होंगे. यह बात सुनतेही राजा खुश होकर उठ बैठा और थैली हाथमें ले प्रधानको बुला उसमेंसे रुपये निकाल प्रधानको दिये और खर्च करनेका हुक्म किया. और कहा कि-जितने ब्राह्मण

( ८४ ) सिंहासनबत्तीसी.

सदा दान पाते हैं उन्होंको उसी तरहसे दो. दीवान मुवाफिक हुकमके अपने काममें मशगूल हुआ. और राजा बीर विक्रमा- दित्यने कहा—महाराज ! मुझे आज्ञा दीजिये तो मैं अपने देशको जाऊं. बहुत दिन गुजरे हैं तब वह राजा बोला-हम तुम्हारे कहांलक गुण मानेंगे ? तुमने हमें जीवदान दिया है. फिर कहा—जो तुम अपने देश पहुँचोगे. तब संदेसा हमें भेज देना कि, हम क्षेम कुशलसे पहुँचे. और ठीक अपना ठिकाना बता जाओ, जो हमारा पत्र तुम्हारे पास पहुँचे. तब उसने कहा कि-हे राजा ! मैं राजा बीर विक्रमादित्य हूं,अंबा वती नगरीमें राज्य करता हूं. तुम्हारा नाम और यश सुनकर दर्शनके लिये आयाथा. सो तुम्हें देखा और मेरा चित्त प्रसन्न हुआ. तुम अच्छी तरहसे राज करो और हमें विदा दो. तुम्हारा साहस बल धर्म हमने देखा. यह सुनतेही वह राजा उसके पाँओंपर गिरपड़ा और हाथ जोड़कर कहने लगा कि— महाराज ! बड़ा अपराध हुआ . मैंने तुम्हारा मर्म न जाना. तुमने मेरी सेवा की सो तुम अपने जीमें कुछ न लाना. और जैसा धर्म मैंने आपका सुनाथा वैसा ही देखा. और धन्य हैं तुम्हारे तांई और तुम्हारे धर्म साहस और पराक्रमको. यह कह राजाको तिलक दे विदा किया. राजा बीरोंको—बुला सवार हो अपने नगरमें आया. इतनी बात कीर्तिवती पुतली

कहकर राजा भोजको समझाने लगी कि-सुन राजा भोज राजा बीर विक्रमादित्यका साहस ! ऐसी वस्तु पाकर देते कुछ बिलंब न लाया और अपने जीमें न पछताया. और जैसा साहस राजाने किया वैसा सुनकर कोई न करता; किस गिनतीमें है ? यह बात सुन राजा भोज चुप हो रहा पुनि दूसरे दिनके प्रभात समयमें राजा उठ, तैयार हो, सिंहासन पर बैठनेको गया. और मनमें इरादः बैठनेका करताथा फिर झिझक कर रह जाताथा इतनेमे त्रिलोचनी -

तेरहवीं पुतली-

बोल उठी-सुन राजा भोज ! एक पुरातन कथा मैं तुँ सुनाऊँ कि, इस सिंहासनपर वही चढ़ेगा, जो राजा वि क्रमके समान पराक्रम करेगा. तब राजाने कहा-कह सुंदरी ! बिक्रमका बल और कथा सुननेको मेराभी म चाहता है. पुतली बोली-राजा ! कान देके सुन' एक दिन राज बीर विक्रमादित्य शिकार खेलनेको चला. और साथमें जित मुसाहिब रजपूत बली थे वेभी सजकर तैयार हो आये और ए एककी सवारीमें हजार हजार कोसके धावेका तुरंग था. राजा अप घोड़ेपर सवार था. और बह गोया छलावा था. राजकुमार अपने शिकारी जानवर बाज, बहरी, जुर्रा, शाहीन, कूही, करगा भँगवा भँगवा अपने अपने हाथोंपर ले ले साथ हुए अ

( ४६ ) सिंहासनबत्तीसी. राजानेभी एक बाज अपने हाथपर बिठा लिया. मीरशिकारोंके हुक्म पहुँचा कि, जिस जिसके पास जो जो शिकारी जानवर तैयार हैं सो लेकर रिकाबमें हाजिर होवें. इस तरह बन उसने एक बनकी राहली और वहां जाकर किसीने बाज और किसीने बहरी और किसीने कुही, किसीने शाईन उड़ाई और अपने अपने जानवरोंके पीछे घोड़े बढ़ाये. और उधर राजा- नेभी जितने मीर शिकार थे उन्हें हुक्म किया कि, इस जंगलमे सब शिकार करो, मैं तमाशा देखूंगा. जो शिकार कर लावेगा वह इनाम पावेगा. और जो शिकार न कर लावेगा सो नौक- रीसे दूर होवेगा. यह बात सुनतेही जितने मीरशिकार थे उन सबोंने उस बनमें चारों तरफ जानवर छोड़े और उधर हुकुम बहेलियोंको किया कि, तुमभी शिकार करो. इस तरह सब शिकार करते थे और लालाके राजाको गुजराते थे वह खडा तमाशा देख रहथा. फिर उसने एक मरिंदापर बाज उड़ाया और आप उसके पीछे लगा. जिधर जिधर वह बाज जाताथा राजाभी पीछा किये जाताथा. इसमें कोसों निकल गया. देखो तो शाम होगई तब याद आई और फिरकर पीछे देखा तो वहां कोई आदमी नज़र न आया. और वह तमाम फौज राजाकी शाम हुएपर राजाको ढूँढ़ शिकार लेले आनकर नगरमें दाखिल हुई और वहां सूने जंगलमें राजा भटकता फिरता था. कहीं रहा

तेरहवीं पुतली १३. ( ८७ )

तेरहवीं पुतली १३. ( ८७ )

था, जब अँधेरा होगया और रात बहुत होगई तब एक किनारेपर जा पहुँचा, यहां उतरकर अपने हाथ जीन- डा घोड़ेको एक झाड़ीसे बांधकर बैठ रहा, फिर देखता क्या है कि,वह नदी बढ़ती आती है, और यह हटने लगा, गरज ज्यों ज्यों राजा हटता जाताथा त्यों त्यों बह बढ़ती जा- तीथी, फिर जो निगाह की तो यह देखा कि, नदीकी बीच धारमें एक मुर्दा बहा चला आता है, और उसके साथ एक बैताल और एक योगी खैंचा खैंची किये हुए आते हैं, और आपसमें झगडते हैं, योगी बैतालसे कहता है कि-तुने बहुतसे मुर्दे खाये हैं और यह मैंने अपने अवसरपर पाया है तू छोड़दे मैं उसे लेजाकर अपना योग कमाऊंगा, यह सिद्धि मैंने तुझसे पाई, यह सुन बैताल बोला-भाई ! मैं आयाना नहीं हूं, जो तू मुझे फुसलावे, क्योंकर मैं अपना आहार तुझे दूं ? इसी तरह दोनों आपसमें झगडतेथे और कहतेथे, कि, कोई तीसरा पुरुष इस बखत ऐसा नहीं कि, हमारा न्याय चुकावे, फिर योगी कहने लगा कि- बैताल ! तू मेरी बात सुन कल प्रभातको हम तुम सभाको जावें और जो सभामें न्याय चुके वही तूभी प्रमाणभी कर और मैं भी करूंगा, इतनेमें एककी दृष्टि राजाकी ओर जा पडी, देखकर दोनों हँसे और कहने लगे कि-वह कोई मनुष्य नदीके किना- रेमें नजर आता है, वहां चलो कि, वह अपना न्याय निबडेगा,

किस्सा सुनाकर कहा कि-महाराज ! तुम धर्मात्मा हो इसवास्ते

( ८८ ) सिंहासनबत्तीसी.

यह कहकर मुर्दा लेकर दोनों किनारेपर आये. राजाको तमाम किस्सा सुनाकर कहा कि-महाराज ! तुम धर्मात्मा हो इसवास्ते धर्म विचारके हमारा न्याय करो. योगी बोला-महाराज ! मैं कहताहूं सो आप ध्यान लगाकर सुनिये इस बैतालने बहुत मुर्दे खाये और यह मुर्दा मैंने अपने दांवपर पाया है और यह नाहक मुझसे तक रार करता है ! और कहता है कि-मैं तुझे न दूंगा. मैं इससे बिनती करके माँगता हूं और कहता हूं कि- गोया यह प्रसाद मैंने तुझसे पाया. यह नहीं मानता. तब राजाने बैतालको पूंछा कि- तू अपने भी मुझसे बात कह ? बह बोला-महाराज ! यह योगी बडा मूर्ख है, जो इसने मुझसे राहमें झगडा लगाया. मैं हजार कोशसे इस मुदको ले आयाहूं और यह मुझसे मांग रहा है. मैं इसे क्यों कर दूंगा ? इस मुर्देके लिये मैंने बहुत कष्ट किया. यह नाहक देखके मन चलाता है. मैं क्या कहूं कि, जो जो मैंने इसके वास्ते दुःख उठाया है और आहारके समयमें इस दुष्टने आन सताया. और इसका न्याय तेरे हाथ है; क्योंकि तू धर्मात्मा राजा है. जो तू कहेगा सो मुझे प्रमाण है. तब राजा कहने लगा कि-तुम दोनोंही बड़े हो इस वास्ते यह प्रसाद हमें दो कुछ तुमसे हम मांगते हैं. तब तुम्हारा न्याय हम चुकावेंगे. यह सुन योगीने हँसकर झोलीमेंसे एक गट्ठा निकाल राजाके हाथ देकर कहा-राजा ! तुझे जिनता

तेरहवीं पुतली १३. (८९)

तेरहवीं पुतली १३. (८९)

द्रव्य अभीष्ट होगा उतना यह बटुआ देगा, और इसमेंसे कभी कम न होगा, पुनि बैतालने कहा-राजा ! मैं एक मोहनी तिलक तुझे देताहूं इसे जब तू घिसकर टीका देगा, तब सब तुझे दबेंगे तेरे सामने कोई न होगा. ये दोनोंने प्रसाद राजाको दिया. उसने करओटकर लिया और बोला कि-सुन बैताल ! तू इस मुर्देको छोडदे और मेरे घोडेको खा, यह मुर्दा योगीके हवाले करदे; क्योंकि तू भूखा न रहे और उसका कामभी बंद न होय यह सुनतेही बैताल उस घोड़ेको खागया और योगी मुर्दा ले अपना मंत्र साधने लगा. राजा वीरोंको बुलाय उनपर सवार हो अपने देशको चला. रास्तेमें एक भिकारी सन्मुख चला आताथा, उसने देखा कि, शकबँधी राजा आता है, डरते डरते उसने सवाल किया कि-महाराज ! आपके नगरमें मैं बहुत दिन रहा लेकिन कुछभी अर्थ मेरा सिद्ध न हुवा. अब मैं कुछ तुमसे माँगता हूँ, मेरे तईं दीजिये. यह सुनतेही राजाने वह बटुआ उसके हाथ दिया और उसका भेद बताया. वह अशीस दे अपने घरको गया और राजाभी अपने मंदिरमें आया. इतनी बात कह त्रिलोचनी. पुतली बोली-सुन राजा भोज ! ऐसा दानी और ऐसा साहसी जो होगा सोही इस सिंहासनपर बैठे; नहीं तो पातक है. उसके दूसरे दिनराजा सबेर उठ स्नान ध्यानकर दरबारमें आन बैठा. और दीवान मुत्सद्दियोंको बुलाकर कहा-

चौदहवीं पुतली-

( ९० ) सिंहासनबत्तीसी. कि-आज मेरा चित्त बहुत प्रसन्न है. जल्दी चलकर सिंहासन- पर बैठूंगा. इतनी बात कह वहांसे उठ सिंहासनके पास आ- कर गोदान कर ब्राह्मणको वृत्ति कर दी. फिर गणेशको मना सिंहासनपर बैठनेको पाव बढ़ाया इतनेमें त्रिलोचना नामक-

चौदहवीं पुतली-

बोली-हे राजा भोज ! पहिले कथा सुन जो मैं कहतीहूं पीछे सिंहासनपर बैठ. यह बात राजाने सुनतेही पांव खैंच लिया. और सिंहासनके नीचे आसन बिछाया बैठगया. तब पुतली बोली कि-राजा ! सुन एक- दिन राजा बीर विक्रमादित्यने अपने प्रधानको बु- लाकर कहा कि-मैं यज्ञ करूंगा जिसमें पुण्य हो और आगेका निस्तार होवे. दीवानने सुनते ही देशदेशको नौता भेजा जहां तलक राजा प्रजा थे उन्हें बुलाया. कर्नाटक, गुज- रात, काश्मीर, कन्नोज, तिलंगान इन नगरोंको भी नौता भेज जितने ब्राह्मण थे उन्हें बुलाया और सातों द्वीपोंको नौता भेजा वहांके राजाओंको तलब किया. फिर एक बीराको पाता- लके राजाके पास नौता 'भेज उसे बुलाया और दूसरे बीराको

चौदहवीं पुतली १४. (९१)

चौदहवीं पुतली १४. (९१) स्वर्गको रवाना कर देवताओंको नौता भेज बुलाया और एक ब्राह्मणको बुलाकर कहा कि-तुम समुद्रके पास जाकर हमारा दंडवत कहो और निवेदन करो कि-राजा विक्रमादित्यने यज्ञका आरंभ किया है और आपको बहुत नम्रता कर बुलाया है. वह ब्राह्मण तुरंत वहाँसे चला और कितनेएक दिनोंमें साग- रके तीरपर जा पहुँचा और वहां देखता तौ क्या है कि, न कोई मनुष्य है और न कोई वहां पशु पक्षी है. केवल जलही जल नजर आता है. तब उस ब्राह्मण अपने जीमें चिंता कर कहने लगा कि-राजाका संदेश किससे कहूं? यहा तो कोई जीव दिखाई नहीं देता उधर है तो जलही जल है. ऐसा अपने मनमें विचारकर वह पुकारा कि-राजा वीरविक्रमादित्यका नौता मैं दिये आता हूँ और तुम जल्दी पहुँचना. इतना कह वहांसे वह जब चला तब प्रत्यक्ष एक बूढ़े ब्राह्मणके रूप समुद्र नजर आया. और उसने पूछा कि-बीर विक्रमादित्यने हमें किसवास्ते बुलाया है? तब उसने कहा कि-राजाके यहां यज्ञ है ! और तुम्हें जरूर बुलाया है तब समुद्र बोला कि-मैं चलूंगा पर मेरे चलनेसे पानी जो यहांसे बढ़ेगा तौ कई नगर डूब जावेंगे इसलिये मेरी तरफसे तुम राजाको विनती कर कहना कि, मेरे न आनेका कुछ पछताव न करना. मैं इस सबबसे पहुँच नहीं सक्ता. तब समुद्रने ब्राह्मणको पाँच लाल दिये और एक घोडा राजाको सौंप दिया, और आप वहीं रहा- तब ब्राह्मण सब-

तुम लो. मैने तुम्हें दिया है यह कहकर त्रिलोचना पुतलीने

( ९२ ) सिंहासनबत्तीसी. सत हो राजाके पास गया. वे पांच रत्न राजाको दिया और घोडा अपने खडा कियाँ फिर सब वहांका वृत्तांत कहा. तब राजाने प्रसन्न हो ब्राह्मणसे कहा कि-यह लाल और घोडा तुम लो. मैने तुम्हें दिया है यह कहकर त्रिलोचना पुतलीने राजा भोजको समझाया कि, सुन राजा भोज ! ऐसा पदार्थ राजा विक्रमने देते विलंब न किया. वे लाल और घोडा कई राजाओंकी कीमतके थे ऐसे दानी राजाके आसनपर बैठनेके योग्य तू नहीं॥ पंडित तू है पर माया तुझसे छूटती नहीं. वह दिनभी योंही गुजर गया, दूसरे रोज राजा फिर सिंहासनपर बैठनेको तैयार हो गया. तब अनूपवती- पंद्रहवीं पुतली १५- कहने लगी-सुन राजा भोज ! राजा वीर विक्रमादि- त्यके गुण कहनेमें नहीं आसकते जो बात कहने योग्य होवे तो कहिये. अयुक्त कहतेहुए जी शक खाता है. राजा बोला-तू कह. मेरा जी सुननेको चाहता है जैसी बात हुई है वैसी कह इसमें तुझे दोष नहीं तब अनूपवती बोली, अच्छा अब मैं कहती हूँ वह तुम कान देकर सुनिये. एक दिन राजा विक्रमादित्य सभामें बैठा था. और कहींसे पंडित आया. उसने आक-

पंद्रहवीं पुतली १५. ( ९३ )

पंद्रहवीं पुतली १५. ( ९३ ) राजाके सम्मुख एक श्लोक पढा वह सुनकर राजा मनमें बहुत प्रसन्न हुवा, इस श्लोकका मुद्दा यह था कि, मित्रद्रोही और विश्वासघातकी जो हैं सो नरक भोग करेंगे, जबतलक चंद्र और सूर्य हैं. यह सुनकर लाख रुपये राजाने उस ब्राह्मणको दान दिये और कहा कि-इसका अर्थ मुझे समझाकर कहो कि, क्या वृत्तांत है इसका ? तब वह ब्राह्मण कहने लगा कि—एक राजा बड़ा अज्ञानी था-उसकी रानी जो प्राणकी आधार थी, पलपरभी राजा उसे आपसे जुदा न करता था. जब सभामें बैठता था तब साथही जांघपर ले बैठता था. और जब शिकारको जाता था तब दूसरे घोडेपर बिठा साथ ले लेता. गरज जागना, सोना, खाना, पीना,एकही साथ था. पर ऐसा मूर्ख था कि, किसीसे लजाता न था. रानीको दृष्टिमें रखता था. एक दिन उसके प्रधा- नने अवसर पाकर हाथ जोड़ और शिर नवा कहने लगा कि-स्वामी ! जो मुझे जीव दान दें तो मैं एक बात कहू तब राजा बोला-अच्छा. वह बोला कि-महाराज ! रानीके संग आप शोभा नहीं पाते. राजकुलकी आन और मर्याद रहती नहीं आपको देश देशके राजा हँसते हैं, और कहते हैं कि- ऐसी सुंदरी राजाके मनमें बसी है कि, पलक ओटभी नहीं करता. एक मेरी बात मानिये. जो आपको वह बहुत प्यारी है तो एक चित्रपट लिखवाइये और अपने पास रखिये. इसमें लोक निंदा न करेंगे. यह बात प्रधानकी राजाके मनमें भाई

( ९४ ) सिंहासनबत्तीसी. और कहा-अच्छा चित्रकारको बुलाकर चित्र लिखावो. मंत्रीने उसको बुला भेजा. वह तुर्त आकर हाजिर हुआ और वह कैसा था कि ज्योतिषविद्यामें अति निपुण था. और चित्रकारी विद्यामें भी पंडित था. उसे राजाने कहा कि-रानीकी मूर्त्तिका पट लिख दे जो मैं अपनी नजरमें हमेशा रक्खूं सुन- कर इस शारदापुत्रने मस्तक झुकाके कहा-महाराज ! अच्छा. मैं लिख लाताहू. राजासे रुखसत हो अपने घरको आया. और लिखना आरंभ किया. सो ऐसा कि जानें अभी इंद्रलोकसे अप्सरा उतरी है और उस रानीका जैसा अंग जहां था तैसाही उसने अपनी विद्याके जोरसे लिखा. जब वह तसबीर तैयार हुई तब लेकर राजाके पास गया. और राजाने देखकर बहुत पसंद किया. अंग अंग उसने निरख देखा नखसे शिख तलक गोया सांचेकी ढाली हुईथी. राजाकी दृष्टि देखते देखते दाहनी जांघपर जा पड़ी तो वहां एक तिल देखा तब बहुतसा अपने जीमें घबराया और कहने लगा कि-इसने रानीकी जांघका तिल क्योंकर देखा ? हो न हो रानीसे इसकी मुलाकात है. इस तरह अपने मनमें विचार क्रोधकर दीवानसे कहा कि-इस चित्रकारको तुरत बुलाओ उसने सुन- तेही उसे बुला भेजा. जाना कि, राजा खुश हुआ है. सो कुछ इनाम देगा. जब वह आनकर राजाके सन्मुख हुआ तब बधि- कको बुलाकर हुकुम किया कि इसकी गर्दन मारके आँखें

पंद्रहवीं पुतली १५. (९५)

पंद्रहवीं पुतली १५. (९५) निकालके मेरेपास ले आओ जब वह उसे मारने चला तब दीवानभी बिदा हो पीछे हो लिया बाहर निकल जल्लादसे कहा कि-तू इसे मुझे दे और आंखें हरनकी निकालका राजाके पास लेजा. जल्लादने प्रधानका कहना किया. और दीवान राजाकी तरफसे बहुत बेइतिबार हुआ कि, ऐसा मूर्ख राजा हमने नहीं देखा, न सुना. गुणवंत पुरुषोंको यों जीता मारे. कदाचित् गुणवान् पुरुषसे कुछ तकसीर हो जाय तो उससे देशसे निकाल देते हैं. यह राजाओंका चलन हमेशासे है. पर कोई राजाओंकी बातपर न भूले मुहमें तो उनके अमृत रहता है और पेटमें बिषभरे हुए हैं. जो कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं. इस तरह दीवानने अपने जीमें बिचारकर डरते डरते उसे छिपा रक्खा और जल्लाद हिरनकी आंखें निकाल राजाके पास लेगया कि महाराज ! उसको मारकर आंखें निकालकर आपके पास लाया हूं. राजाने हुक्म किया कि, इन आंखोंको संडासमें लेजाकर डालदो, इस तरह वह साअत तो यों टलगई. फिर कितनेएक दिनोंके बाद उस राजाका बेटा एकदिन अकेला शिकारको गया जाते जाते एक महाबनमें जा निकला, एक शेर वहां नजर आया. बाघको देख वह राजपुत्र बहुत घबराया तब घोडा वहीं छोड़ एक वृक्षपर चढ़ गया. उसके ऊपर जो देखे तो एक रींछ बैठा है. रींछको देखतेही उसके हाथ पांव फूलगये और कांपने लगा, चाहे कि, बेहाल होकर गिरें. इतनेमें वह रींछ बोला

( ९६ ) सिंहासनबत्तीसी. कि-ऐ कुँवर ! तू अपने मनमें भय मत कर. मैं तुझे नहीं खाऊंगा; क्योंकि, तू मेरे शरण आया है और मैंने तुझे जीवदान दिया है. अब तू निःसंदेश होकर आनंदसे यहां बैठ. यह बात रींछसे सुन उसके जीमें जी आया. इसमें दिन बीतगया और रात होगई तब रींछ बोला—राजपुत्र ! अब तो रात होगई यह नाहर शत्रु हम दोनोंको बैठा है इस वक्त सोना जीका जियान है. बेहतर यह है कि, दो दो पहर रात हम आपसमें जागें. आधी २ रात जागना. आधीरात तू जाग और आधी रात मैं जागूं राजपुत्रने कहा-बहुत अच्छा. रींछने कहा-पहले दोपहर रातको तू सोरह. मैं अब जागताहूं और पिछले दो याम निशाको तू जागियो, मैं सो रहूंगा. आपसमें इस तरह दोनोंने करार किया. और राजपुत्र सोरहा वह रींछ बैठा और चौकी देने लगा. इतनेमे शेरने रींछसे कहा कि-तू मेरी बात सुन और अज्ञानी मत हो. यह मनुष्य तो अपना भक्ष्य है तू क्यों विषका बीज बोता है? इसे नीचे डालदे हम दोनों इसे खाजाँय. यह आदमी है और हम तुम दोनों बनबासी हैं. हाथका माणिक गिरके हाथ फिर नहीं आता. जब यह जाग उठेगा और तू सोवेगा तो वह तेरा शिर काटकर फेंक देवेगा. अब यही बेह- तर है कि, मेरा कहना कर. फिर यह अवसर न पावेगा और आखिरको तू पछतावेगा रींछने जवाब दिया कि-सुन अज्ञानी बाघ ? अपने ऊपर अपराध लेना उचित नहीं ? जितना होता है

पंद्रहवीं पुतली १५. (९७)

पंद्रहवीं पुतली १५. (९७) पाप राजाके मारने और वृक्षके काटने, गुरुसे झूठ बोलने और- वन जलाने और विश्वासघात करनेसे, इतनाही होताहै. शरणा- गताको मारने इन सबका पाप महापाप है. और यह पाप किसी तरहसे छूटता नहीं. इसने मेरी शरण ली है. क्या हुआ जो एक जी मैने न खाया ? तब बाघ खफा होकर बोला, कि-तूनेमेरा कहा तो न माना इस वास्ते मैभी तुझे जीता न जाने दूंगा. इतनेमें रींछकी बारी तो होगई और राजपुत्र जागया रींछ सोया. वह चौकी देने लगा. इससेभी बाघने वही बात की कि- भाई ! जो मैं कहूं सो तू सुन. भूलकरभी तू इससे मत पतिया सोकर सुबहको जब उठेगा तब अलसाकर तुझे खा जायगा. यह मुझसे कह चुका है कि, सोकर उठूं तो मैं इसे खाजाऊं. इससे यह भला है कि तू पहलेही इस रींछको गिरा दे. जो मैं इसे खाजाऊ और अपनी राहालूं तूंभी सहीह सलामत अपने घरको जा. उसके प्रबोध देनेसे यह बातोंमें आ गया और उस डह- नीको पकड़ ऐसा हिलाया कि जिससे वह रींछ तले गिरपड़े इससे उसकी आँख खुल गई और टहनीसे लिपट कर रह गया. और इससे कहा कि-अय पापी ! जो तूने मुझसे सलूक किया उससे मैंने तेरी जान रक्खी और तू मतिहीन मेरे मारनेको तयार हुआ. अब जो मैं तुझे मार कर खाजाऊं तो तू क्या करेगा ? यह बाते रींछकी सुनतेही इसकी जान सूख गई. और ७

( ९८ ) सिंहासनबचीसी.

अपने दिलमे जाना कि, अब यह मुझे मुकर्रर खायगा. इतनेमें सबेरा होगया. बाघ उठकर वहांसे चला गया. रींछने उसके कानो- में मूत दिया और कहा-तुझे जीते तो क्या मारूं ? क्योंकि, अब यहां तेरा कोई बचानेवाला नहीं है. इससे असमर्थ जानकर मैं तुझे छोड देताहूं. यह कहकर रींछ तो चला गया और वह गूँगा बहरा हो बहुत घबरा और व्याकुल हो घरमें आया. राजा उसकी दशा देख अपने जीमें चिंता करने लगा. महलोंमें यह खबर हुई तो रानियां कूक मार मार रोने लगी. और कहने लगी कि-भगवान्ने यह क्या अयुक्त किया. कोई कहने लगी कि-किसीने इसे छला है तिससे इसकी यह हालत हो गई है. तब राजाने सोचकर दीवानसे कहा कि-जितने गुणी लोग हैं मंत्र- यंत्र जाननेवाले अपने नगरमें उन सबको बुलाकर कुँवरको दिखलाओ. प्रधानने आदमियोंको भेज सब सयानोंको बुलाया और उनसे कहा-जिससे इसे आराम होय ऐसा काम किया चाहिये. तब वे अपने २ मंत्र यंत्र करने लगे. जिस कदर कि उन्होने उसका उतार किया परंतु कुछभी फायदा न हुआ. तब हारकर उनसबोंने जवाब दिया कि, हमारी विद्या यहां कुछ काम नहीं करती. जब मंत्रीने यह देखा कि-उन्होंके गुणोंसे उसे कुछ आराम न हुवा, तब राजासे हाथ जोड़ विनती किया कि-महाराज ! मेरे पुत्रकी बहू जो है सो बड़े गुणवती है. इस

और उस योगीने मंत्र, यंत्र तंत्र, विद्या सब उसे सिखादी है !

वास्ते आप आज्ञा कीजिये तो मै उसके तईं ले आऊं और वह कुँवरको देखे भगवान् चाहे तो आराम हो जायगा. इसके सिवाय और कुछ यत्न नहीं. राजाने कहा-तेरे बेटकी स्त्री क्या जाने ? तब फिर दीवानने कहा-महाराज ! वह एक योगीकी चेली है, और उस योगीने मंत्र, यंत्र तंत्र, विद्या सब उसे सिखादी है ! राजाने आज्ञा दी और दीवान सवार हो अपने घरको चला गया और वहां चित्रकारको बुला सब अवस्था वहांकी कही और कहा कि-मै इस तरहसे राजाको बचन देकर आयाहूं. तुम स्त्रीका भेष बनाकर मेरे संग चलो. तंग उसने कबूल किया. और स्त्रीका भेष बन साथ हो लिया. दोनों सवार होकर राजाके पाय आये लोग महलमें उसे परदा करके लेगये. दरमि- यान एक कनात खैंचला. और उस तरफ कनातके उसे बैठाया. राजा और लडका और दीवान ये तीनें कनातके बाहर बैठे और उसने कनातके अंदरसे कहा कि-कुवरको स्नान करावा कपडे बदलवा चौका दिलवा एक पठढा बिछवाकर बिठाओ और कुँवरको कहो कि, तुम सावधान होकर बैठो और जोन मै मंत्र कहूं सो तू कान देकर सुन. बिभीषण बडा शूर बीर था और दगा करके रामचंद्ररे जा मिला. उन्होंने रावणका राज सब खराब किया, और अपने कुलका नाश किया. उस लाजसे एक वर्षतक सिर न उठाया. और अपने कियेका फल पाया.

( १०० ) सिंहासनबत्तीसी.

कि सब कुल गँवाया. और भस्मासुने महादेवजी तपस्या कर बर पाया और उन्हींसेही विश्वासघात किया कि, पार्वतीजीको लेनेकी इच्छा की और उसकाभी फल उसने तुर्त पाया कि, क्षणभरमे आपही जलमे भस्म होगया. और कुँवर ? तु मित्र द्रोही और विश्वासघाती क्यों हुआ है ? सोएहुए रीछको तूने नीचे ढकेल दिया ! उसने तो तेरेपर उपकार किया था और तूने उसका बुरा बिचारा. पर उसमें तेरा दोष कुछ नहीं है, तेरे पिताका दोष है; इसवास्ते कि, जैसा बीज होवेगा वैसाही फल होवेगा. यह तुमने अपने पिताके पापसे दुःख पाया. इतनी बात सुनतेही कुँवर सचेत हो बोल उठा. तब राजा बोला-अय सुंदरी ! तू सच कह कि तूने वह बनका जानावर क्योंकर पहॅचाना ? यह उसे सुनकर उसने जवाब दिया कि- राजा! मैं अपनी पूर्व अवस्था तेरे आगे प्रकट करतीहु सो चित्त लगाय सुनो जब मै अपने गुरूके पास पढ़ने जातीथी तब गुरूका अति सेवा करतीथी. गुरूने प्रसन्न होकर एक मंत्र मुझे बताया. वह मंत्र मैने साधा, तबसे सरस्वती मेरे मनमें बसी है. और जैसे मैने रानीकी जांघका तिल पहँचाना वैसेही बनके रिंछकोभी जाना. यह सुनतेही राजा प्रसन्न हो पदरा दरमियानसे दूरकर दिया और कहा कि-तू सच्चा शारद- पुत्र है, तेरे गुणको मैने अब जाना. यह कह राजाने आधा राज उसे दिया और अपना मंत्री किया. इतनी बात कह

सोरहवीं पुतली १६. ( १०१ )

सोरहवीं पुतली १६. ( १०१ ) वह ब्राह्मण बोला कि-राजा वीरविक्रमादित्य ! यह इस श्लोकका अर्थ है. यह कथा उस ब्राह्मणके मुंहसे सुनकर राजा वीर विक्रमादित्यने उसे हजार गांव वृत्ति कर दिया. यह बात कहकर पुतली बोली कि-सुन राजा भोज ! तुझमें इतना गुण कहां है ? और अब इस नगरमें विक्रमादित्यके समान राजा होना मुश्किल है. मैंने तुझसे यह सच बात कही. और तू इस सिंहासनके योग्य नहीं. ऐसा सुन उस दिनकीभी साअत जाती रही. राजा महलमें दाखिल हुआ और अपने प्रधान और पुरोहितको बुलाके वह हालत कही. दूसरे दिन सुबहको उठ स्नान पूजा कर ध्यान लगा सिंहासनके पास जाकर खड़ा हुआ और प्रधानको बुलाकर कहा कि-अब मेरा जी चाहता है कि, सिंहासनपर आज बैठूं. बेहतर है कि, दुघड़ी अच्छा मुहूर्त इस वक्त मुझे देख दो. तब दिवानने कहा-महाराज ! आप तो बैठियेगा पर पुतलियां आपके आगे रोरो मरेंगी. राजा उठकर खड़ा रहा तब सुन्दरवती-- सोलहवीं पुतली-- बोल उठी-सुन राजा भोज ! मैं तुझसे विचार कर कथाका अहवाल कहती हूं. उज्जैन नगरीमें छत्तीस कौम और चार जाति बसती थीं. एक वहांकाही नगरसेठ जिसके यहां अति धन था