स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
४०८ स्पन्दकारिका वस्तुसमूह का विश्रान्ति स्थान वही प्रत्यवमर्शात्मक परावाक् स्वरूप चिति, ज्ञान, सङ्कल्प, अध्यवसाय, स्मृति एवं संशय के नाम से कही गई है । 'माया शक्त्या विभोः सैव भिन्नसंवेद्यगोचरा । कथिता ज्ञानसङ्कल्पाध्यवसायादिनामभिः ॥'१ स्वप्नादिक अवस्थाओं, देह, प्राण, सुख दुःख आदि द्वारा परिबद्ध मनुष्य अपनी माहेश्वरी चिति शक्ति को नहीं पहचानता । जो ज्ञानात्मक अमृत सिन्धु में फेनपिण्ड के समान विश्व को देखे वही साक्षात् शिव है ।२ अहंता और पूर्णतम सिद्धि—तांत्रिक त्रिक दृष्टि १. परिमित अहंता का त्याग । २. भगवत्स्वरूप अहंता का ग्रहण । 'विश्वाहंता' परम सिद्धि है—परम उपलब्धि है । विश्व में अपने शिवस्वरूप को देखना अहंपरामर्श के प्रकार—शुद्ध अहंपरामर्श और मायीय अहं परामर्श हैं । (१) शुद्ध परामर्श—विश्व से अभिन्न रूप में विद्यमान संविन्मात्र में या विश्व की छाया से अस्पृष्ट स्वच्छ आत्मा में होता है । (२) मायीय या अशुद्ध परामर्श—वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को आलम्बन बनाता है । विज्ञानभैरव : 'सर्वं देहं चिन्मयं हि जगत् वा परिभावयेत् । युगपन्निर्विकल्पेन मनसा परमोदयः ।। (६२) (१) ब्रह्मवादी—परम ज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता एवं परमसिद्धि 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति है । (२) शाक्त = परम ज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परमसिद्धि एवं आत्म विकास की पराकाष्ठा— 'अहं देवी न चान्योस्मि' की अनुभूति में है । (३) शैव—परमज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परमपद की प्राणि, परमतत्त्वरूपता, परम सिद्धि एवं अपने स्व का सर्वोच्च विकास— 'शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं' की अनुभूति में है । (४) बौद्ध—परम ज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परम पद का अधिगम, परम तत्त्वज्ञा, परमसिद्धि एवं अपने स्व का पूर्णतम विकास 'विज्ञान' एवं 'शून्य' या शून्यस्थानीय 'महासुख' की प्राप्ति में है । (५) त्रिक, स्पन्द, क्रम (काश्मीरीय शैवदर्शन) परमज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परमपद की प्राप्ति, परमतत्त्व रूपता, परमसिद्धि, अपने स्व का पूर्णतम विकास, 'चक्रेश्वरत्व' 'नित्योदित समाधि' 'स्वरूपावस्थान' 'स्वात्मपरामर्श'-- इस अनुभूति में है कि— १-२. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।
तृतीयः निष्यन्दः ४०९ (क) 'मैं विश्वमय हूँ'—विश्व मेरा विराट् प्रसार है। (ख) मैं विश्वमय के साथ उससे परे 'विश्वातीत भी हूँ' (ग) मैं पंचकृत्यकारी शिव हूँ। पूर्णाहन्ता—पूर्णाहन्ता में स्वातन्त्र्य अभिन्न रूप में रहता है—इसी स्वातन्त्र्य का नाम 'परावाक्' या 'महामातृका' है। मातृका ही प्रत्यवमर्शकारिणी शक्ति है यानी प्रकाश तभी अपने को प्रकाश रूप में पहचान पाता है जब उससे मातृका जुड़ती है। मातृका के अन्तर्लीन हो जाने से प्रकाश ही प्रकाश रहता है किन्तु वह अपने को प्रकाश कहकर पहचान नहीं सकता क्योंकि प्रत्यवमर्शन शक्ति 'मातृका' में ही रहती है। मातृका स्वरूपभूता शक्ति है। यह जो शक्ति है इसी का आश्रय लेकर ही समस्त सत्ता प्रकाशित होती है। समस्त जगत्, ईश्वर, जीव एवं ज्ञेय जड़ पदार्थ व्यष्टि एवं समष्टि रूप में मातृका से उद्भूत हैं। पूर्ण एवं अपूर्ण दोनों अहं में मातृका की ही क्रीड़ा है। पूर्ण अहं सम्पूर्णमातृकामय है आदि में अकार एवं अन्त में हकार—यह महामण्डल मातृका मण्डल है। अ = प्रकाशमान। ह = विमर्श॥ 'पूर्ण अहं' परमेश्वर का नित्यसिद्ध निजस्वरूप है। पूर्ण अहं एक एवं अभिन्न हैं। 'पूर्णअहं' चैतन्यस्वरूप है इसमें इदन्ता नहीं इसमें केवल अहंता ही है। 'इदन्ता' स्वातन्त्र्यबल से सृष्टिमुख में आविर्भूत होती है। उस सृष्टि का नाम है 'महासृष्टि'। जो कुछ है—था—या होगा—सभी नित्य वर्तमान रूप में उस 'महासृष्टि' में स्थित है। वहाँ काल नहीं है। उसमें अतीत, अनागत एवं वर्तमान कुछ भी नहीं है। जिस किसी समय में, जहाँ कहीं भी कुछ था—या होगा—'महासृष्टि' में वह विद्यमान है किन्तु यह अवस्था पूर्णावस्था नहीं प्रत्युत संकुचित अवस्था है क्योंकि वह इदरूप में भासमान है अहं रूप में नहीं। पूर्णअहं—महासृष्टि। महासृष्टि का संहार = महासंहार॥ काल के हिसाब से यह अकल्पनीय है। इसका अवसान होता है—पूर्णाहंतावबोध के साथ-साथ क्योंकि उस समय इदंभाव नहीं रहता। इसे ही पूर्णतालाभ, परमेश्वरत्व, परमशिवभाव कहते हैं। यह पूर्णसत्ता वेदान्त का ब्रह्म नहीं है क्योंकि ब्रह्म—अहंभाव वर्णित है—किन्तु पूर्णाहन्ता में अहंभाव का पूर्णत्व है। महाशक्ति का सर्वात्मना परमशिव के साथ सामरस्यभाव—इस अवस्था की विशिष्टता है। 'विश्वाहंता' अहंता का सर्वोच्च शिखर है—उच्चता की परा काष्ठा है—सिद्धि एवं उपलब्धि का 'एवरेस्ट' है। 'चक्रेश्वरत्व' पूर्णता का वैभवात्मक पक्ष है और 'विश्वाहन्ता' आत्मविस्तार, चैतन्य-प्रसार एवं आत्मपरामर्श का उच्चतम शिखर है। 'चक्रेश्वरत्व' एवं 'पूर्णाहन्ता' दोनों प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्दशास्त्र में प्रतिपादित है। विश्वाहंताः समस्त विश्व के साथ अहंभाव है। (१) विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन्। (दृढ़ेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥) ॥ १०२ ॥
४१० स्पन्दकारिका (२) 'विज्ञानभैरव' 'सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् । युगपद् स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥' अहं— 'अहं' : विश्वात्मक एवं विश्वोत्तीर्ण दोनों है । 'विश्वात्मविश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् । अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेति कः ॥ (विमर्शदीपिका) गुरुवाणी की वन्दना एवं भट्टकल्लट के द्वारा स्पन्दकारिका के प्रणयन की पुष्टि— अगाधसंशयाम्भोधिसमुत्तरणतारिणीम् । वन्दे विचित्रार्थपदां चित्रां तां गुरुभारतीम् ॥ ५२ ॥ वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः । रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्रीभट्टकल्लटः ॥ ५३ ॥ मैं गंभीर एवं अपार संशय के समुद्र से पार उतारने वाली तथा विचित्र शब्दार्थों वाली तथा अद्भुत गुरुवाणी की वन्दना करता हूँ ॥ ५२ ॥ तत्त्वद्रष्टा गुरु वसुगुप्त से यह (उपदेश) प्राप्त करके श्री भट्टकल्लट ने इसके रहस्य को भलीभाँति श्लोकबद्ध कर दिया ॥ ५३ ॥ भट्टकल्लट की 'स्पन्दकारिकावृत्ति' एवं रामकण्ठाचार्य की 'स्पन्दकारिकाविवृति' में तिरपनवीं कारिका समाविष्ट नहीं है ।
- सरोजिनी * गुरुभारती = गुरु की शक्ति सम्पन्ना वाणी ॥ ग्रन्थ के अन्त में ग्रन्थकार परम स्पन्द भूमि (The Supreme state of spanda) रूपा 'गुरुभारती' (गुरु वाणी) को नमस्कार करते हैं । विज्ञानभैरव (२०) में शिव की शक्ति को शिव का मुख कहा गया है—'शैवी मुखमिहोच्यते ॥'१ अगाधसंशयाम्भोधि = अथाह शङ्काओं का समुद्र । (Fathomless sea) 'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः ॥ (कल्लट) समुत्तरणतारिणी = उद्धार करने की नाव । वन्दे = अभिवादन करता हूँ । (समाविशामि) 'सर्वोत्कृष्टेन समाविशामि' विचि- त्रार्थपदां = विचित्र अर्थों से युक्त पदों वाली । चित्रां = विचित्र । लोकोत्तर चमत्कार रूपा । तां = उस । गुरु = शिवधाम प्राप्ति कराने वाले आचार्य ।२ गुरुभारतीम् = गुरुवाणी को । वह वाक् जो कि गुरु का कार्य करती हो । परावाक् को । १-२. स्पन्दनिर्णय ।
तृतीयः निष्यन्दः ४११ वह सर्वोच्च वाणी (Supreme speech) जो पश्यन्ती, मध्यमा आदि समस्त वाणियों का केन्द्र हो । यही वाक् शिवधाम पहुँचाती है । (अथ च गुरुं पश्यन्त्यादि क्रोडीकारात् महतीं भारतीं परां वाच्यम्) 'वन्दे' = वह गुरुभारती जो असाधारण एवं सभी के लिए सर्वोच्च है उसमें प्रवेश करता हूँ । विचित्रार्थपदां = (नानाचमत्कारप्रयोजनानि पदानि विश्रायन्तो यस्यां परस्यां वाचि तां विचित्राणि)१ मैं उस असामान्य (लोकोत्तर) गुरुवाक् के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ या उसमें सम्यक् रूप से प्रवेश करता हूँ जो कि सर्वोत्कृष्ट है, जो लौकोत्तर है—अद्वितीय आनन्द स्वरूप है । या मैं— उस वाणी का अभिकथन करता हूँ जो कि मुझे आह्लाद प्रदान करती है क्योंकि यह सभी अवस्थाओं में स्फुरित है और जो कि व्यक्ति को अपनी सत्यता (स्वरूप) को जानने हेतु आत्मचिंतन में निरत रहने की योग्यता प्रदान करती है । गुरुभारती—वह परा वाणी जो कि पश्यन्ती प्रभृति समस्त वाणियों के विभिन्न रूपों को आलिंगित किये हुए हैं । वन्दे = 'स्वरूपविमर्शनिष्ठां तां समावेश्टुं संमुखीकरोमि ।' 'सर्वावस्थासु स्फुरद्रू- पत्वात् अभिवदन्ती उद्यन्तृता प्रयत्नेन अभिवादये ।।'२ वसुगुप्तात् = आचार्य वसुगुप्त से । वसुगुप्त ने ही शिव सूत्रों को पहाड़ के पत्थरों पर उत्कीर्ण रूप में पाया था । अवाप्य = प्राप्त करके । इदं = इस त्रिक ज्ञान को । ज्ञानघन को । तत्त्वार्थदर्शी—तत्त्वों के रहस्यों को जानने वाले । रहस्यं = अवाच्य, अगम्य एवं गूढ़ तत्त्व । नित्य शङ्करात्मक स्वस्वभाव समावेश को प्राप्त करने हेतु इस शास्त्र का उपदेश किया गया है । आचार्य उत्पलदेव कहते हैं—हमारे गुरु की वाणी आश्चर्यकारिणी है । उसके वाच्य और वाचक—अर्थ और पद—दोनों ही विचित्र हैं । अगाध संदेह के पयोधि में निमज्जित होते हुए लोगों का संतरण करने वाली यह नौका है । मैं उसकी वन्दना करता हूँ । गुरु से श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है । जयाख्यसंहिता में कहा गया है—स्वयं प्रकाश भगवान् जगन्नाथ ही मन्त्रमय शरीर धारण करके करुणावश अपने शास्त्ररूपी कर कमलों से संसार—समुद्र में डूबते हुए लोगों का उद्धार करते हैं— 'यस्माद्देवो जगन्नाथः कृत्वा मन्त्रमयीं तनुम् । मग्नानुद्धरते लोकान् कारुण्याच्छास्त्रपाणिना ।।' १-२. स्पन्दनिर्णय ।
४१२ स्पन्दकारिका 'नारद संग्रह' में भी कहा गया है—संसार का मूलोच्छेद करने वाले गुरु को अपने सर्वस्व की दक्षिणा दे देना भी बहुत थोड़ा है'— 'गुरवे दक्षिणां दद्यात् सर्वस्वं सार्थमेव वा । सर्वस्वमथवाऽत्यल्पं संसारोच्छेदहेतवे ॥' 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहा गया है—जिसके मन में भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा हो, उसे पहले गुरु का अन्वेषण करना चाहिए ।' भगवान् की पहचान होती है—शास्त्र से और शास्त्र का अनुभवात्मक ज्ञान होता है—गुरु से । शास्त्रज्ञान से विषयज्ञान का विलय हो जाता है । सच पूछो तो प्रत्यभिज्ञा भर का विलम्ब है; भगवान् तो मिला हुआ ही है । अतः शास्त्र और ईश्वर दोनों से गुरु श्रेष्ठतर है— 'भवत्प्राप्तिकामो यस्तेनान्वेष्यो गुरुर्यतः । भगवान् ज्ञायते शास्त्राच्छास्त्रं च ज्ञायते गुरोः ॥ तद्बोधात् ज्ञानविलयाज्ज्ञानाप्तौ प्राप्त एव स । तस्माच्छास्त्रादीश्वराच्च गरीयान् गुरुरुच्यते ॥'¹ पञ्चरात्र में भी कहा गया है—'यथा भगवत्येव वक्तुरि वृत्तिः' अर्थात् 'गुरु के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा भगवान् के साथ ।' भट्टकल्लट ने अपने तत्त्वार्थदर्शी गुरु वसुगुप्त से यह रहस्य सम्यक् रूप से प्राप्त करके इसे श्लोकबद्ध किया ।' यह ब्रह्मविद्या का बीज है । बिना परीक्षा किए अयोग्य क्षेत्र में इसको बोना नहीं चाहिए—'इदं च ब्रह्मविद्याबीजं नाऽपरीक्ष्याऽस्थाने वपेत् ॥' भट्टकल्लट ने अन्यत्र भी कहा है—सिद्ध विद्या एक गुणवती कन्या के समान है । गुणवर्जित पुरुष के प्रति उसका दान करने से वह संभोग तो देती ही नहीं, दाता को अपकीर्ति का भी कारण बनाती है । इसलिए सद्गुणसम्पन्न को ही इस विद्या का उपदेश देना चाहिए— 'गुणैरुपैताऽपि तु सिद्धविद्या कन्येव दत्ता गुणावर्जिताय । संभोगहीना विदधात्यकीर्तिं दातुर्यतस्तत्प्रगुणाय दद्यात् ॥' इत्यविद्यातमःस्थानां दर्शनाय प्रकाशिता । सतां सुपर्णादिशेव शुद्धामलगुणोज्ज्वला ॥ वागलुण्ठनार्थमन्येषां विद्वन्मन्यताऽपि तु । शुद्ध बोधोल्लासवशात् कृता स्पन्दप्रदीपिका । तस्मात् प्रोत्सार्य मात्सर्यमर्थमर्थं विचार्य च । आर्यैराश्चर्यभूताया न कार्योऽस्या अनादरः ॥ अब कारिकाकार एक, अद्वैत आत्म तत्त्व के अज्ञान का कारण मात्र संशय को बताता हुआ कहता है कि वह महाकारण सद्गुरु के बिना उन्मूलित होना संभव नहीं है । १. स्पन्दप्रदीपिका—(उत्पलदेवाचार्य) ।
तृतीयः निष्यन्दः ४१३ परमेश्वर गुरुमूर्ति में प्रवेश करके अपने अनुग्राह्यों को स्वप्रत्यभिज्ञापन द्वारा उपदेश देता है—'परमेश्वरो हि गुरुमूर्तिमाविश्य अनुग्राह्यान् स्वप्रत्यभिज्ञापनेन प्रबोधयति ।।' ताम् = उसको । उस । जिसके स्वरूप का प्रतिपादन करना अशक्य है ऐसी उस, हृदय में स्फुरित वाणी को । गुरुभारतीं वन्दे = गुरु वसुगुप्त के सिद्धमुख से निःसृत समस्त रहस्योपनिषद्भूत स्पन्दतत्त्वामृतनिष्यन्दरूपा वाणी को नमन करता हूँ—स्तुति करता हूँ । वह वाणी है कैसी ? अगाध = जिसका गाध (विश्रान्ति भूमिका) अविद्यमान हो । संशय = तत्त्व की अप्राप्ति रूप विभ्रमः 'संशयः तत्त्वाप्रतिपत्तिरूपो विभ्रमः ।।' अम्भोधि = समुद्र । यह संशयपूर्ण विभ्रम दुर्जरकल्पोर्मि जाल संकुलत्व से परिपूर्ण है । समुत्तरणे = सम्यक् विलङ्घन । तारिणीम् = नावम् । संसार सागर से पार करने वाली नौका । विचित्रार्थपदां = अत्यद्भुत अभिधेय (विचित्रार्थ) वस्तु जिसमें ऐसे पदों वाली । चित्रां = विचित्र । घटनाविशेषशाली होने के कारण विस्मयाधायी ।। विचित्र एवं चित्र—दोनों शब्दों का एक साथ प्रयोग शब्दगत एवं अर्थगत वैचित्र्य का संसूचक है । सकल लोकाशय निर्विषय लोकोत्तर प्रबुद्ध हृदय संवादी विचित्रार्थ पदों के अर्थ का प्रतिपादन करने वाली चित्रा पदवाक्य रचना । वृत्तिकार ने कहा है—'अगाधो हि अप्रतिष्ठोऽनन्तः ।।' १ यद्यपि तिरपनवीं कारिका भट्टकल्लट एवं रामकण्ठ की 'वृत्ति' एवं 'विवृति' में नहीं है किन्तु उत्पलाचार्य की 'स्पन्दप्रदीपिका' में है । भट्टकल्लट ने इस पर कोई व्याख्या भी नहीं की । उत्पलदेवाचार्य ने स्पन्दप्रदीपिका के अन्त में संभवतः 'रहस्य' शब्द को दृष्टि में रखकर इसे अपायों को अदेय कहा है क्योंकि यह 'ब्रह्मविद्या बीज' है—'इदं च ब्रह्म- विद्याबीजं नाऽपरीक्षाऽस्थाने वपेत्' उक्तञ्च— गुणैरुपैताऽपि तु सिद्धविद्या कन्येव दत्ता गुणवर्जिताय । संभोगहीना विदधात्यकीर्तिं दातुर्यतस्तत्प्रगुणाय दद्यात् ॥ इत्यविद्यातमःस्थानां दर्शनाय प्रकाशिता । सतां सुपर्णा देशेव शुद्धामल गुणोज्ज्वला ॥ २ वागलुण्ठनार्थमन्येषां विद्वन्मन्यताऽपि तु । शुद्धबोधोल्लासवशात् कृता स्पन्दप्रदीपिका ॥ ३ 'अगाधसंशयाम्भोधि' = अगाध = 'अविद्यमानो गाधो विश्रान्ति भूमिका यत्र' (रामकण्ठाचार्य) संशय = तत्त्वाप्रतिपत्तिरूपो विभ्रमः । दुर्जर विकल्पोर्मिजालसंकुल होने से अम्भोधि १. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दविवृति' । २-३. स्पन्दप्रदीपिका ।
४१४ स्पन्दकारिका समुत्तरण = सम्यक् विलंघन (रामकण्ठ) कारिकाकार का कथन है कि मैं आश्चर्यान्वित करने वाले शब्दों एवं अर्थों से संवलित एवं अतिशय अद्भुत (सरस्वती के समान अनन्त ज्ञान, अनन्त योगसिद्धि, अनन्त शक्ति पावित्र्य तथा अमोघ फल प्रदा) गुरु-वाणी की वन्दना करता हूँ जो कि अत्यन्त गंभीर तथा अमित संशय-सागर को पार कराने वाली है । वृत्तिकार भट्टकल्लट ने इस कारिका की सविस्तार व्याख्या तो नहीं की है किन्तु 'अगाध' शब्द को रेखांकित अवश्य किया है । 'अगाध' शब्द सामान्यतया अथाह, अपार एवं अपरिमेय का बोधक है । वृत्तिकार ने इसका अर्थ—'अप्रतिष्ठ' एवं 'अनन्त' किया है—'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः' ।१ भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में 'संशय' को विनाश का कारण माना है—'संशयात्मा विनश्यति' (गीता) । अगाध = (१) 'न अस्ति गाधो विश्रान्ति भूमिका यस्य ।' (जिसका अपना कोई अधिष्ठान नहीं है ।) (२) 'न अस्ति गाधो विश्रान्ति भूमिका यस्मिन् ।' (जिसमें विश्राम लेने के लिए कोई पुलिन नहीं है ।) (क) अप्रतिष्ठ = जिसका कोई अधिष्ठान या वास्तविक आधार नहीं है । (ख) अनन्त = जो अन्तहीन है । 'दुष्पार' 'दुरतिक्रम' । अप्रतिष्ठ = निराधार, आधार-शून्य, अयथार्थ । अज्ञान-कल्पित होने के कारण संशय निराधार है । वृत्तिकार का अभिप्राय—वृत्तिकार यह संदेश देना चाहते हैं कि— (१) जीवों के डूबने का कारण 'संशय' है । (२) यह संशय दुस्तर समुद्र के समान है । (३) स्वरूप-साधना (स्वस्वरूप-प्रत्यभिज्ञा) यथार्थ का दर्शन कराकर समस्त संशयों का उच्छेद कर देती हैं अतः संशय समुद्रवत् दुस्तार दिखाई पड़ते रहने पर भी गुरु भारती के द्वारा प्रकाशित आत्मस्वरूप का साक्षात्कार होने के कारण दुस्तार समुद्र सूखकर इतना निर्विघ्न बन जाता है कि मानों वह पूर्णतया 'अप्रतिष्ठ' (आधारहीन) हो और केवल मन की भ्रान्ति मात्र हो, न कि वास्तविक ॥ यही वास्तविकता भी है क्योंकि जीवत्व (अणुत्व) सत्य नहीं है अपितु शिवत्व ही सत्य है—जीवत्व केवल एक 'संशय' है—कल्पना है—मायावरण है और वास्तविकता तो यह है कि—'सर्वशक्ति योगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरूपचर्यते, स च भगवान् स्वातन्त्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्मानं संकु- चितमिव आभासयन् 'अणुः' इति उच्यते । यथोक्तम्—'व्यापको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्त- संकोचमुद्रणात् विचित्रफलकर्मौघवशात्तत्तच्छरीरभाक् ॥'२ स्वयं 'शिव' ही अपनी 'स्वातन्त्र्यशक्ति' के माध्यम से अपनी माया शक्ति के द्वारा अपने अमित स्वरूप को संकुचित करके अणु (अज्ञानोपहित जीव) बन जाता है । १. 'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट) । २. 'जन्ममरणविचार' ।
तृतीय: निष्यन्द: ४१५ वह एक आणव मल से उपहित होकर—'विज्ञानाकल' बन जाता है । वह दो आणव मलों से उपहित होकर—'प्रलयाकल' बन जाता है और वह तीन आणव मलों से उपहित होकर—'सकल' बन जाता है । 'असौ भगवान् स्वमायाशक्त्याख्येन अव्यभिचरितस्वातन्त्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्म- नैव आत्मानं संकुचितमिव अवभासयन् विज्ञानाकलः, प्रलयाकलः सकलश्च संपद्यते ॥' १ अतः जीवत्व भी एक भ्रान्तिमूलक उपाधि है । सत्य तो 'शिवत्व' है । जीवत्व शङ्कराचार्य की दृष्टि के समान मिथ्या भी नहीं है क्योंकि स्वयं शिव ही जीव है । होता यह है कि सृष्ट्युन्मुख भगवान् शुद्धाध्वा में वर्तमान होकर अपनी शक्तियों द्वारा माया को विक्षुब्ध करके— (क) 'कलातत्त्व' को किञ्चित्कर्तृत्व में परिवर्तित करके (ख) 'विद्या तत्त्व' को किञ्चिद् अवबोध में परिवर्तित करके (ग) 'राग तत्त्व' को किञ्चिद् अभिलाषा में परिवर्तित करके (घ) 'काल तत्त्व' को भूत, भविष्य, वर्तमान के खण्डित एवं संकुचित काल खण्डों में विभक्त करके स्थित कालावच्छेद में परिवर्तित कर देता है । (ङ) 'नियति तत्त्व' को कर्तृत्वावच्छेद में परिवर्तित कर देता है । 'कला तत्त्व' शिव के सर्वकर्तृत्व को किञ्चिद् कर्तृत्व में बदल देता है और सुख- दुःख एवं मोह के आवरण उत्पन्न कर देता है शिव का जीवत्व-ग्रहण केवल 'निजस्वरूप गोपनकेलि' मात्र है । २ अतः स्पष्ट है कि स्वरूप गोपन की क्रीड़ा के अभिनय के लिए संशय भूमिका पर स्वेच्छा से स्थित शिव के लिए यह पाशव भूमिका छोड़कर संशयों का उच्छेद करना तो अत्यन्त सरल है क्योंकि यह संशयावृत पशु भूमिका उसने अपनी स्वेच्छा से गृहीत किया है अतः यह सत्य नहीं है अपितु भट्टकल्लट के मतानुसार 'अप्रतिष्ठ' (आधार शून्य, निराधार एवं अयाथार्थ) है किन्तु पाशवभूमिका का त्याग न करने पर यह 'संशय' 'अनन्त' समुद्रवत् दुस्तर भी है तथापि 'गुरुभारती' की शक्ति से यह 'अगाध' (अनन्त समुद्र) तरना अत्यन्त सरल है । इसी दृष्टि से वृत्तिकार कहते हैं— 'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः ॥' कारिकाकार कहते हैं—'अगाध संशयांभोधिसमुत्तरणतारिणीम्' । वृत्तिकार का प्रधान संदेश—वृत्तिकार 'अगाधसंशयाम्भोधि' की व्याख्या के संदर्भ में 'अगाध' की व्याख्या में जो उसका अर्थ—'अप्रतिष्ठ' करते हैं उसके पीछे उनका शैव सम्प्रदाय के 'बन्धन' एवं 'मुक्ति' के स्वरूप पर प्रकाश डालना है जो कि निम्नानुसार है— शैवदर्शन में 'बन्धन' नामक कोई यथार्थवस्तु है ही नहीं— न मे बन्धो न मोक्षो में भीतस्यैता विभीषिकाः । प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥ ३ १-२. वामदेव भट्टाचार्य—'जन्ममरणविचारः' । ३. विज्ञानभैरव ।
४१६ स्पन्दकारिका कल्हण ने 'बन्धन को फूस का निर्मित मुझौसा जैसा मिथ्या कहा है— 'शालीनपलालपुरुषोऽवति यः कृशानुः । दग्धाननश्चटकपेटकभीतिदानैः ॥' जिस प्रकार किसान लोग अपनी फसल की रक्षा करने के लिए घास-फूस का एक आदमी बनाकर खड़ा कर देते हैं और उसे जानवर आदमी समझते हुए भयभीत होकर खेतों से भाग जाते हैं किन्तु हाथी उससे भयभीत होकर नहीं भागता क्योंकि पलाल पुरुष भला हाथियों का क्या बिगाड़ सकता है? इसी प्रकार पञ्चकञ्चुक, वासना, अनात्म पदार्थ, इन्द्रिय, उनके विषय, माया एवं अज्ञान एवं तज्जन्य बन्धन किसी अज्ञ प्राणी को तो भयभीत कर सकते हैं किन्तु किसी स्वरूपावस्थित योगी का क्या बिगाड़ सकते हैं? जैसे सूर्य ही जल के मध्य प्रतिबिम्ब के रूप में उल्टा भासित होता है उसी प्रकार परिमित विषय वाली बुद्धि ही 'मैं बद्ध हूँ, मैं मुक्त हूँ'—आदि आकारों में परिणत होती रहती है—इससे चिदात्मा का—मेरा क्या बनता-बिगड़ता है?— 'प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ।'¹ बन्धनोपहित चेतना 'जीव' कहलाती है तथा बन्धनमुक्त 'शिव' कहलाती है, पहला 'पशु' कहलाता है दूसरा 'पशुपति' (पति) कहलाता है। दोनों में मूलतः भेद नहीं है— स्वांगरुपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते 'पति' । मायातो भेदिषु क्लेश कर्मादि कलुषः 'पशुः' ॥² अर्थात् ऐश्वर्यदशायां प्रमाता विश्वं शरीरतया पश्यन् 'पतिः' पुंस्त्वभावस्थायां तु रागादिक्लेशकर्मविपाकाशयैः परीतः 'पशु' ।³ जो समस्त विश्व को अपने शरीर के रूप में देखकर उसे अपने से अभिन्न मानता है उसे 'पति' एवं जो उसे अपने से भिन्न मानकर माया द्वारा भेददृष्टि के कारण रागादिक्लेशों से कर्मविपाक के वात्याचक्र में फँस जाता है उसे 'पशु' कहा जाता है । शिवसूत्रकार की दृष्टि—शिवसूत्रकार का कथन है कि बन्धन कोई मौलिक एवं नित्य वस्तु नहीं है और न तो निरपेक्ष स्वतन्त्र सत्ता ही है प्रत्युत् यह एक स्वारोपित मिथ्या कल्पना है—अज्ञान है—मल है अज्ञता है—'ज्ञानं बन्धः' (१।२) वरदराज कहते हैं—अज्ञानमिति तत्राद्यं चैतन्यस्फाररूपिणि । आत्मन्यनात्मताज्ञानं ज्ञानं पुनरनात्मनि ॥ देहादावात्ममानित्वं द्वयमप्येतदाणवम् । मलं स्वकल्पितं स्वस्मिन्बन्धः स्वेच्छाविभाजतः ॥⁴ शङ्कराचार्य की बन्धन-दृष्टि एवं त्रिक-दृष्टि में भी भेद है । त्रिक दृष्टि में 'बन्धन' भी शिव की आत्मगोपन जन्य, स्वेच्छा-निष्पादित एवं रसात्मिकी क्रीड़ा है १. विज्ञानभैरव । २. प्रत्यभिज्ञाकारिका (उत्पलदेव) । ३. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति । ४. शिवसूत्रवार्तिक ।
तृतीयः निष्यन्दः ४१७ क्योंकि एक ही चेतना शिव भी है और वही जीव भी है—वही बन्धन भी है और वही मुक्ति भी है तथा परमार्थतः न बन्धन है न तो मुक्ति है—'न मे बन्धो न मोक्षो मे' ॥१ ये मिथ्या भी नहीं है क्योंकि—'न सावस्था न यः शिवः ।' शिव एवं जीव की एकता का ज्ञान ही मुक्ति है और इसका अपरिज्ञान ही मुक्ति है—'शिवजीवयोरभेद एव उक्तः । एतत्तत्वपरिज्ञानमेव मुक्तिः एतत्तत्वापरिज्ञानमेव च बन्धः ॥ भला चैतन्य को बन्धन कैसा ? जड़ चेतनात्मक जगत् तो परमशिवरूप है फिर उसको बन्धन कैसा ? 'यदि जीवजडात्मनो विश्वस्य परमशिवरूपं चैतन्यमेव स्वभावः तत् कथम् अयं बन्धः ?' २ 'बन्धन' का स्वरूप—'बन्धन' का स्वरूप क्या है? आचार्य क्षेमराज कहते हैं—परमेश्वर अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' के द्वारा अपने सत्स्वरूप के गोपन को आभासित करते हैं (और यह कार्य वे 'महामाया' द्वारा सम्पन्न करते हैं ।) इसके परिणाम स्वरूप मायाप्रमाता पर्यन्त सभी सत्ताएँ सङ्कोचावभासित होने के कारण उनका शिवाभेद को भूलकर शिव से अपना भेद मानना 'अपूर्णम्मन्दतात्मक- आणवमलतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा' हो जाना ही 'बन्धन' है— (१) 'परमेश्वरेण स्वस्वातन्त्र्य-शक्त्याभासितस्वरूपगोपनारूपया महामाया शक्त्या .... माया प्रमात्रन्तं सङ्कोचोऽवभासितः स एव शिवाभेदाख्यात्मका ज्ञानस्वभावोऽपूर्णा- म्मन्यतात्मकाणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा 'बन्धः' ।३ (२) आत्मा में अनात्मा एवं अनात्मा में आत्मा भ्रमात्मक अवबोध भी 'बन्धन' है— (३) एवमात्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बन्धो ।४ (४) 'यावद् अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बन्ध एव ॥'५ (५) सुख दुःख मोह आदि की अध्यवसाय वृत्ति से युक्त जो भेदावभासनात्मक ज्ञान है वही बन्धन है । 'सुखदुःखमोहमयाध्यवसायादिवृत्तिरूपं तदुचितभेदावभासनात्मकं यत् ज्ञानं तत् बन्धः' ।६ (६) अन्तः सुखादिं संवेद्य व्यवसायादिवृत्तिमत् । बहिस्तद्योग्यनीलादिदेहादिविषयोन्मुखम् ॥ भेदाभासात्मकं चास्य ज्ञानं बन्धोऽणुरूपिणः । तत्पाशितत्वादेवासावणुः संसरति ध्रुवम् ॥७ १. विज्ञानभैरव । २. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । ३-७. क्षेमराज—शिवसूत्रविमर्शिनी । स्पं० २७
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