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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( १३६ ) विष्णुपुराण में भी जैसे—"जैसे अग्नि लोहे के विकारों को समाप्त कर देती है, उसी प्रकार, परमात्मा भी अपने ध्यान करने वालों को आकृष्ट कर आत्मभाव प्रदान करते हैं।" आत्मभावम् आत्मनस्स्वभावम् । नहि आकर्षकस्वरूपापत्तिः आकृष्यमाणस्य । वक्ष्यति च "जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहि- तत्त्वाच्च"—"भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च"— "मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच्च" इति । वृत्तिरपि—"जगद्व्यापारवर्जं समानो ज्योतिषा" इति । द्रवि- डभाष्यकारश्च— "देवता सायुज्यादशरीरस्यापि देवतावत्सर्वार्थसिद्ध- स्स्यात्" । इत्याह-श्रुतयश्च—"यःइहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति"—"ब्रह्मवि- दाप्नोतिपरम्"—"सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सहब्रह्मणा विपश्चिता"- — "एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य, इमान् लोकान् कामान्नीकामरू- प्यनुसंचरन्"—"सतत्रपर्य्येति"—"रसो वै सः, रसह्येवायं लब्ध्वाऽ- नंदीभवति "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे अस्तंगच्छन्ति नामरूपे विहाय, तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्"—"तदा विद्वान् पुण्यपापे विहाय निरंजनः परमं साम्यमु- पैति" इत्याद्याः । 'आत्मभावम्' का तात्पर्य है, आत्मा का स्वभाव । आकृष्ट होने वाली वस्तु आकर्षक के स्वरूप को प्राप्ति नहीं कर पाती । जैसा कि—सूत्रकार— "जगद्व्यापारवर्जं, भोगमात्र साम्य मुक्तोपसृप्य०" इत्यादि सूत्रों में उक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करते हैं । "जगत् रचना की क्षमता न होने से जीवात्मा की ज्योति ही परमात्मा के समान होती है" ऐसी वृत्ति भी है । द्रविडभाष्यकार भी कहते हैं—"भगवत् सायुज्य प्राप्त मुक्तात्मा भी भगवान् के समान सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त करते हैं।" श्रुतियां भी उक्त वस्तु की पुष्टि करती हैं जैसे—"जो परमात्मा के ऐसे स्वरूप तथा सत्य कामनाओं को जानकर, इस लोक से प्रयाण करते हैं, उनकी समस्त ankurnagpal108@gmail.com

( १४० ) लोकों में अप्रतिहत गति होती है।” ब्रह्मवेत्ता परमात्मा को प्राप्त करते हैं—“वह परमात्मा के साथ समस्त कामनाओं को भोगता है।” इस आनन्दमय परमात्मा को प्राप्त कर सभी प्रकार के काम्यफलों का भोग करता है। “परमात्मा रस स्वरूप है, उस रस का आस्वाद कर जीवात्मा आनन्दित होता है।” मुक्तपुरुष वहाँ जाता है। “नदियाँ जैसे समुद्र में मिलने पर अपने नाम रूप का परित्याग कर देती है, वैसे ही जीवात्मा भी अपने नाम रूप से छूटकर उस परात्पर दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है।” ब्रह्मज्ञ पुरुष पुण्य पाप से छूट कर निरंजन परमात्मा की समता प्राप्त करता है।” इत्यादि । पराविद्यासु सर्वासु सगुणमेव ब्रह्मोपास्यम् । फलं चैकरूपमेव । अतो विद्याविकल्प इति सूत्रकारेणैव—“आनन्दादयः प्रधानस्य” “विकल्पोऽविशिष्ट फलत्वात्” इत्यादिषूक्तम्। वाक्यकारेण च सगु- णस्यैवोपास्यत्वं विद्याविकल्पश्चोक्तः “युक्तं तद् गुणकोपासनात्” इति । भाष्यकृता व्याख्यातं च “यद्यपि सच्चितः” इत्यादिना । “ब्रह्मवेद ब्रह्मैवभवति” इत्यत्रापि-“नामरूपादविमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैतिदिव्यम्”—“निरंजनः परमं साम्यमुपैति”—“परंज्योति- रूपसंपद्य स्वेनरूपेणाभिनिष्पद्यते” इत्यादिभिरैकार्थ्यात् प्राकृत- नाम रूपाभ्यां विनिर्मुक्तस्य निरस्ततत्कृतभेदस्य ज्ञानैकाकारतया ब्रह्मप्रकारतोच्यते । प्रकारैक्ये च तत्वव्यवहारो मुख्यएव, यथा सेयं गौरिति । सभी ब्रह्मविद्याओं में सगुणब्रह्म को ही उपास्य तथा ब्रह्मसारूप्यता को मोक्ष बतलाया गया है। विद्याओं की समान प्रणाली का “आनन्द- दयः प्रधानस्य” विकल्पोऽविशिष्ट फलत्वात् “सूत्रों में सूत्रकार प्रतिपादन करते हैं। वाक्यकार भी सगुण की उपास्यता तथा विद्याओं की समानता का प्रतिपादन” युक्तं तद्गुणकोपासनात्” कह कर करते हैं। “यद्यपि सच्चितः” इत्यादि में भाष्यकार भी उक्त तथ्य की ही पुष्टि करते हैं। “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है”, नामरूप से विमुक्त परात्पर दिव्य पुरुष ankurnagpal108@gmail.com

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को प्राप्त करता है, "निरंजन की समता प्राप्त करता है", परमात्मा की ज्योति से संपन्न अपने वास्तविक स्वरूप से निष्पन्न होता है, "इत्यादि श्रुतियाँ भी प्राकृत लौकिक, नामरूप के लोप तथा नामरूप जन्य भेद दृष्टि के लुप्त हो जाने पर जो एकाकार ज्ञान होता है, इतने अंशमात्र में ही, जीवात्मा परमात्मा की एकता का प्रतिपादन करती हैं । एक ही प्रकार की वस्तु में जो एकता का व्यवहार होता है, वह मुख्यता परक ही होता है, जैसे कि—"यह वही गौ है ।" अत्रापि—"विज्ञानं प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव, प्रापणी- यस्तथैवात्मा प्रक्षीणशेषभावनः" इति । परब्रह्मध्यानादात्मा परब्रह्म- वत् प्रक्षीणशेषभावनः कर्मभावना, ब्रह्मभावना,उभयभावना, इति भावनात्रय रहितः । प्रापणीय इत्यभिधाय—"क्षेत्रज्ञः करणी ज्ञानं करणं तस्य वै द्विज, निष्पाद्य मुक्तिकार्यं हि कृतकृत्यं निवर्त्तयेत्" इति करणस्य परब्रह्मध्यानरूपस्य प्रक्षीणाशेषभावनात्मस्वरूप प्राप्त्या कृतकृत्यत्वेन निवृत्ति वचनात् सिद्धि अनुष्ठेयम् इत्युक्त्वा--"तद्- भावभावमापन्नः तदासौ परमात्मना भवत्यभेदोभेदश्च तस्याज्ञान- कृतोभवेत् ।" इति मुक्तस्य स्वरूपमाह । तद्भावः ब्रह्मणोभावः स्वभावः । नतु स्वरूपैक्यम्, तद्भावभावमापन्न इति द्वितीयभाव- शब्दानन्वयात् पूर्वोक्तार्थ विरोधाच्च । यद् ब्रह्मणः प्रक्षीणाशेषभावनत्वं तदापत्तिस्तद् भावभावापत्तिः । यदैवमापन्नस्तदासौ परमात्मा अभेदी भवति, भेदरहितो भवति । ज्ञानैकाकारतया परमात्मनैक प्रकारस्यास्य तस्माद् भेदो देवादिरूपः। तदन्वयोऽस्य कर्मरूपाज्ञानमूलः। न स्वरूपकृतः, सतु देवादिभेदः परब्रह्मध्यानेन मूलभूताज्ञानरूपे कर्मणि विनष्टे हेत्वभावात् निवर्त्तते इति अभेदी भवति । यथोक्तम्— "एक स्वरूपभेदस्तु बाह्य कर्म प्रवृत्तिजः देवादिभेदेऽपध्वस्ते नास्त्येवावरणोहि सः । इति । विष्णुपुराण में भी जैसे—"परब्रह्म ही जीव के लिए एकमात्र प्राप्य है, विज्ञान ही एकमात्र प्रापक ( प्राप्ति का उपाय ) है तथा समस्त ankurnagpal108@gmail.com

( १४२ ) भावनाओं से रहित आत्मा भी उसी प्रकार प्रापणीय है।' परब्रह्म के ध्यान से जीवात्मा परब्रह्म के समान समस्त भावनाओं से शून्य हो जाता है। भावनाये तीन प्रकार की है, कर्मभावना (शुभाशुभ संस्कार) ब्रह्म भावना तथा कमब्रह्म उभयभावना। इन तीनो प्रकार की भावनाओं से रहित होना ही अभिधेय है। ऐसी स्थिति की प्राप्ति को बतलाकर “क्षेत्रज्ञ जीवात्मा करणी (उपासक) तथा उपासना करण (उपास) है, इसके द्वारा मुक्ति कार्य का संपादन कर कृतकृत्य होना चाहिए।” इस वाक्य मे परब्रह्म ध्यान रूप करण से पूर्वोक्त भावनात्रय रहित आत्म- स्वरूप प्राप्ति की कृतार्थता बतलाई गई है। सिद्ध किया गया है कि- जब तक फल सिद्धि न हो जाय तब तक अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए। इसके बाद-“तद्भाव को प्राप्त यह उपासक, परमात्मा के साथ अभिन्न हो जाता है, उस स्थिति मे अज्ञान कृत भेद भी रहता है।” इस वाक्य मे मुक्तात्मा का स्वरूप बतलाया गया है तद्भाव का तात्पर्य है, ब्रह्म का भाव अर्थात् स्वभाव। तद्भाव का तात्पर्य स्वरूपैक्य नहीं है। “तद्भावभावभापन्नः” इस वाक्य में द्वितीय भाव शब्द का उक्त प्रकार का अन्वय नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त अर्थ से विरुद्ध होगा। ब्रह्म की जैसी समस्त भावना रहित स्थिति रहती है वैसे ही मोक्षावस्था में जीवात्मा की भी हो जाती है, यही तद्भावभावापत्ति का तात्पर्य है। जीवात्मा उस स्थिति को प्राप्त कर ही परमात्मा के साथ अभिन्न हो पाता है, अर्थात् भेद भाव रहित हो जाता है। मुक्तपुरुष एक मात्र ज्ञानमय आकार प्राप्त कर ही परमात्मा के आकार का होता है, फिर भी देव मनुष्यादि रूप से उसका भेद रहता है उसकी यह भेदावस्था कर्ममय अज्ञान जन्य होती है, स्वरूपतः नहीं होती। जिस समय परब्रह्म के ध्यान से, भेद- कारक अज्ञानरूपी कर्म विनष्ट हो जाता है, उस समय कारण के अभाव से, कार्यरूप देव आदि भेद भी लुप्त हो जाते हैं। वही अभेदरूपता की स्थिति होती है। जैसा कि कहते हैं-“आत्मा स्वरूपतः एक है, केवल वाह्य देहादिकृत कर्ममय आवरण से आवृत्त होने से उसका भेद होता है, देवादि भेदों के नष्ट हो जाने पर आभ्यन्तर आवरण भी नष्ट हो जाता है।” एतदेव विवृणोति-“विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते, आत्मनो ब्रह्मणोभेदमसन्तं कः करिष्यति “इति। विभेदः विविधो ankurnagpal108@gmail.com

भेदः, देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मकः । यथोक्तः शौनकेनापि-- “चतुर्विधोऽपिभेदोऽयं मिथ्याज्ञाननिबन्धनः “इति । आत्मनि ज्ञान रूपे देवादिरूपविविधभेदहेतुभूतकर्माख्याऽज्ञाने परब्रह्म ध्यानेनात्यं- तिक नाशं गते सति हेत्वभावात् असन्तं परस्मात् ब्रह्मण आत्मनो देवादिरूपभेदं कः करिष्यति इत्यर्थः । “अविद्या कर्मसंज्ञाऽन्या “इति हि अत्रैवोक्तम् । उक्त तथ्य का ही विवेचन करते हुए कहते है— “विभेद जनक अज्ञान के एक दम नष्ट हो जाने पर, आत्मा ब्रह्म के असत् भेद को कौन कर सकेगा । “विभेद का तात्पर्य है ,देव पशु मनुष्य स्थावरादि विविध भेद । जैसा कि शौनक ने भी कहा है- “स्थावर आदि चार प्रकार के भेद , मिथ्या ज्ञान से होते है। “अर्थात् ज्ञान रूप आत्मा में देवादि रूप विविध भेदों के कारणरूपी कर्म नामक अज्ञान के, परब्रह्म की ध्यान रूपी उपासना से एकदम नष्ट होने पर, कारण के अभाव में परमात्मा और जीवात्मा के देवादि रूप भेद को करने वाला कौन शेष रह जाता है । यहीं पर कहा भी गया है—“कर्म नामक अविद्या भेद रूपा है”। “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” इत्यादिना अन्तर्यामिरूपेण सर्वे- ष्यात्मतयैक्याभिधानमन्यथा “क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते, उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः “इत्यादिनिर्विरोधः । अन्तर्यामिरूपेण सर्वेषामात्मत्वं तत्रैव भगवताऽभिहितम्-“ईश्वरस्सर्वभूतानां हृद्दे- शेऽर्जुन तिष्ठति” सर्वस्य चाहं हृदिसंनिविष्ट. “इति च । “अहमा- त्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः “इति च तदेवोच्यते । भूतशब्दो- हि आत्मपर्यन्तदेहवचनः । यतः सर्वेषामयमात्मा तत एव सर्वेषा तच्छरीरतया पृथगवस्थानं प्रतिषिध्यते– ‘ न तदस्ति विनायत्स्यात् “इति, भगवद्विभूत्युपसंहारश्चायमिति तथैवाभ्युपगन्तव्यम् । तत इदमुच्यते –“यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा तत्तदेवाव- गच्छत्वं मम तेजोंऽशसंभवम् “विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो

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जगत्” इति। अतः शास्त्रेषु न निर्विशेष वस्तुप्रतिपादनमस्ति। नाप्यर्थजातस्य भ्रांतत्वप्रतिपादनम्। नापि चिदचिदीश्वराणां स्वरू- पभेद निषेधः। “क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो” इस भगवद् वाक्य में अन्तर्यामी रूप से परमात्मा के सर्वात्म भाव ऐक्य को बतलाया गया है; यदि ऐसा नहीं मानेगे तो, “सभी भूतों को क्षर, कूटस्थ आत्मा को अक्षर तथा इनसे भिन्न श्रेष्ठ उत्तम पुरुषोत्तम है “इत्यादि वाक्य से विरुद्ध होगा। अन्तर्यामी रूप से सभी की आत्मता को गीता मे स्वयं भगवान् ने स्वीकारा है- “अर्जुन ! समस्त प्राणियो के अन्तः करण में ईश्वर विराजमान है “सभी के अन्तः करणों में, मै प्रविष्ट हूँ “इत्यादि ।” गुडाकेश! समस्त प्राणियो के अन्तःकरण में स्थित मैं आत्मा हूँ” इत्यादि में भी वही बात कही गई है। भूत शब्द आत्मा के देह तक सभी का द्योतक है। जैसे परमात्मा सभी के अन्तर्यामी आत्मा है, उसी प्रकार सारा ही भूतवर्ग उनका शरीर स्थानीय है ,इसलिए समस्त भूतों से उनकी पृथक्ता का निषेध किया गया है। “जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे परमात्मा से भिन्न कहा जा सके” यह भगवद् विभूति के उपसंहार का वाक्य है, अतः इसे ही प्रकरण का तात्पर्य मानना चाहिए। इस पर ही कहा गया कि-“जो जो विभूतिमान तथा अलौकिक प्रभा संपन्न हैं ,उन्हें मेरे तेजांश से ही प्रकट समझो, एक अंश से मै ही सारे जगत मे व्याप्त हूँ ।” इत्यादि से ज्ञात होता है कि- शास्त्रों में निर्विशेष वस्तु का प्रतिपादन नही है और न समस्त जागतिक विषयों के मिथ्यात्व का प्रतिपादन है ' जड चेतन ईश्वरीय विभूतियों के स्वरूप भेद का भी निषेध नही है। यदप्युच्यते-निर्विशेषे स्वयंप्रकाशे वस्तुनि दोषपरिकल्पित- मीशेशितव्याद्यनन्तविकल्पं सर्वं जगत्। दोषश्च स्वरूपतिरोधान विविधविचित्र विक्षेपकारी सदसदनिर्वचनीयाऽनाद्यविद्या। सा च अवश्याभ्युपगमनीया; “अनृतेन हि प्रत्यूढाः “इत्यादिभिः श्रुतिभिः, ब्रह्मादस्तत्त्वमस्यादिवाक्यसामानाधिकरण्यावगतजीवैक्यानुपपत्त्या च सातु न सती, भ्रांतिबाधयोरयोगात्। नाप्यसती, ख्यातिबाधयोश्चा- ankurnagpal108@gmail.com

( १४५ ) योगात् । श्रतः कोटिद्वयविनिर्मुक्ते'यमविद्येति तत्त्वविदः इति तद- युक्तम् । (वाद) इसपर भी यह कहते हैं कि—“निर्विशेष स्वयं प्रकाश ईश्वर ही एक मात्र शासन कर्त्ता है तथा समस्त जगत उनका शास्य है ‘ऐसा’ मानना दोष परिकल्पित है । स्वरूप को ढकने वाली—विविध विचित्र विक्षेपों को करने वाली, सद् असद् कुछ भी न कह सकने योग्य, अनादि अविद्या ही दोष है । “अनृतेन ही प्रत्यूढाः “इत्यादि श्रुति के अनुसार उक्त प्रकार की अविद्या का अस्तित्व स्वीकारना पड़ेगा, अस्वीकार करने से तत्वमसि “इत्यादि वाक्य से जो जीव ब्रह्म की एकता की प्रतीति होती है, वह संगत न हो सकेगी । वह अविद्या सत् पदार्थ भी नहीं है, उसे सत् मानने से उसकी भ्रांतिजनकता और ज्ञानाबाध्यता संभव नहीं होगी। अविद्या असत् भी नहीं है, असत् मानने से उसकी सामयिकी प्रतीति और बाध नहीं हो सकेगी । इसलिए तत्त्वविदों ने इसे सद् असद् कोटियों से विल- क्षण अविद्या कहा है । इसलिए तुम्हारा उपर्युक्त शास्य शासन वाला कथन असंगत है । (प्रतिवाद) सा हि किमाश्रित्य भ्रमं जनयति ? न तावज्जीव- माश्रित्यश्रविद्या परिकल्पितत्वात् जीवभावस्य । नापि ब्रह्माश्नित्य तस्य स्वयंप्रकाश ज्ञानस्वरूपत्वेनाविद्याविरोधित्वात् । सा हि ज्ञानबाध्याऽभिमता । “ज्ञानरूपं परंब्रह्म तन्निवर्त्यं मृषात्मकम् , अज्ञानंचेत् तिरस्कुर्यात् कः प्रभुः तन्निवर्त्तने”—ज्ञानं ब्रह्मेति चेत् ज्ञानमज्ञानस्य निवर्त्तकम् , ब्रह्मवत् तत्प्रकाशकत्वात् अपि हि अनिव- र्त्तकम्”—“ज्ञानं ब्रह्मेति विज्ञानमस्ति चेत्स्यात्प्रमेयता ,ब्रह्मणोऽननु- भूतित्वं त्वदुक्त्यैव प्रसज्यते”। ज्ञानस्वरूपं ब्रह्मेति ज्ञानंतस्या अविद्यायाः बाधकम्,। न स्व- रूपभूतं ज्ञानमिति चेत् ,न, उभयोरपि ब्रह्मस्वरूप प्रकाशत्वे सत्यन्यत- रस्यानविद्याविरोधित्वं अन्यतरस्यनेति विशेषानवगमात् । ankurnagpal108@gmail.com

(प्रतिवाद) वह अविद्या किसके आश्रय से भ्रमोत्पादन करती है ? जीव के आश्रय से तो कर नहीं सकती, क्यों कि जीव भाव स्वयं ही अवि- द्या परिकल्पित है। ब्रह्म के आश्रय से भी नहीं कर सकती, क्यों कि वह स्वयंप्रकाश और ज्ञानस्वरूप है, जो कि अविद्या विरोधी रूप है। वह तो ज्ञान बाध्या ही मानी गई है। “परब्रह्म ज्ञानस्वरूप हैं, मिथ्यात्मक ज्ञान उनसे निवर्त्य है, अज्ञान यदि ज्ञानमय ब्रह्म को ही आवृत कर लेगा तो उसका निवारण करने में कौन समर्थ है ? यदि ज्ञान ही ब्रह्म है, और वही अज्ञान का नि- वर्त्तक है, सो ऐसा ज्ञान भी अज्ञान का निवारक नहीं हो सकता क्यों कि, वह भी ब्रह्म की तरह, उसके प्रकाश से प्रकाशित है। यदि कहो कि-ब्रह्म ज्ञान स्वरूप है, ऐसा विशेष ज्ञान होने मात्र से अज्ञान नष्ट हो जायगा, सो ऐसा मानने से ब्रह्म प्रमेय हो जायगा तथा तुम्हारे ही कथन से तुम्हारी अभिमत ब्रह्म की अनुभूतिता बाधित हो जायगी।” यदि कहो कि--ब्रह्म ज्ञान स्वरूप है, ऐसा ज्ञान ही उस अविद्या का बाधक है, ब्रह्म का स्वरूपगत ज्ञान अविद्या निवर्त्तक नहीं है, सो ऐसा कहना भी उपयुक्त न होगा क्यों कि-दोनों ही प्रकार के ज्ञान ब्रह्म के स्वरूप से प्रकाशित होने के कारण प्रकाश स्वरूप हैं, इसलिए उनमें एक अविद्या का विरोधी हो और दूसरा अविरोधी, यह कैसे संभव है। एतदुक्तं भवति--ज्ञानस्वरूपं ब्रह्मेत्यनेनज्ञानेनब्रह्मणि यस्स्वभा- वोऽवगम्यते, स ब्रह्मणः स्वयं प्रकाशत्वेन स्वयमेव प्रकाशते, इति अविद्या विरोधित्वेन कश्चिद् विशेषस्वरूपस्तद्विषयज्ञानयोः इति किंच अनुभवस्वरूपस्यब्रह्मणोऽनुभवान्तरानुभाव्यत्वेन भवतो न तद्विषयं ज्ञानमस्ति। अतो ज्ञानमज्ञान विरोधि चेत् स्वयमेव विरोधि भवतीति, नास्या ब्रह्माश्रयत्व संभवः। शुक्त्यादयस्तु स्वयाथात्म्यप्रकाशे स्वयमसमर्थास्तु अज्ञानाविरोधिनः तन्निवर्त्तने च ज्ञानान्तरमपेक्षन्ते। ब्रह्म तु स्वानुभवसिद्धस्वयाथात्म्यमिति स्वाज्ञानविरोध्येव। तत एव निवर्त्तकान्तरं च नापेक्षते। अथोच्येत ankurnagpal108@gmail.com

( १४७ ) ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य मिथ्यात्वज्ञानमज्ञान विरोधि इति। न इदं ब्रह्मव्यतिरिक्तमिथ्यात्वज्ञानं किं ब्रह्म याथात्म्य ज्ञान विरोधि ? उत् प्रपंच सत्यत्वरूपाज्ञानविरोधीति विवेचनीयम् न तावद्ब्रह्म- याथात्म्यज्ञानविरोधि अतद्विषयत्वात् , ज्ञानाज्ञानयोरेकविषयत्वेन हि विरोधः। प्रपंच मिथ्यात्वज्ञानं तत् सत्यस्वरूपा ज्ञानेन विरुध्यते । तेन प्रपंचसत्यत्वरूपाज्ञानमेव बाधितमिति ब्रह्मस्वरूपाज्ञानं तिष्ठत्येव । ब्रह्मस्वरूपाज्ञानं नाम तस्य सद्वितीयत्वमेव । तत्तु तद् व्यतिरिक्तस्य मिथ्यात्वज्ञानेन निवृत्तम् । स्वरूपंतु स्वानुभवसिद्धमिति चेन्न, ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वं स्वरूपं स्वानुभवसिद्धमिति तद्विरोधि सद्वितीय- त्वरूपाज्ञानं न बाधश्च न स्याताम् । अद्वितीयत्वंधर्मं इति चेन्न, अनुभवस्वरूपस्य ब्रह्मणोऽनुभाव्यधर्मं विरहस्य भवतैव प्रतिपा- दित्वात् अतोज्ञानस्वरूपस्य ब्रह्मणो विरोधादेव ना ज्ञानाश्रयत्वं । कथन यह है कि—"ज्ञान स्वरूप ब्रह्म" ऐसे ज्ञान से ब्रह्म स्वभाव की जो प्रतीति होती है, वह ब्रह्म के स्वयं प्रकाश होने से स्वतः ही प्रकाशित होता है, उसका माहात्म्यज्ञान ही अविद्या का निवारक हो, यह कोई आवश्यक बात नहीं है । बात दोनों ही एक हैं, स्वरूप ज्ञान और माहात्म्य ज्ञान दोनों ही समान वस्तु हैं । और तुम्हारे मतानुसार ब्रह्म स्वयं ही अनुभव स्वरूप है, उसके लिए किसी दूसरे अनुभव की अपेक्षा नहीं है, इसलिए तद्विषयक कोई ज्ञान नाम की वस्तु भी नहीं है ज्ञान को यदि स्वभावतः अज्ञान का विरोधी कहा जाय तो, वह स्वयं ही विरोधी हो जायगा, फिर भी उस अविद्या की ब्रह्माश्रयता संभव नहीं है । शुक्ति आदि अपनी वास्तविकता की प्रतीति कराने में स्वयं असमर्थ हैं, अज्ञान स्वरूप शुक्ति आदि को उस अज्ञान की निवृत्ति के लिए किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा होती है । ब्रह्म तो स्वानुभव सिद्ध है, उसे अपने वास्तविक स्वरूप का स्वयमेव ज्ञान है, इसलिए वह स्वयं ही अज्ञान का विरोधी है । तभी उसे किसी अन्य निवर्त्तक ज्ञान की अपेक्षा नहीं है । इस पर यदि यह कहो कि—ब्रह्म के अतिरिक्त पदार्थ के मिथ्यात्व का ज्ञान ही अज्ञान का विरोधी है, सो बात भी ठीक नहीं है—जिसे तुम ankurnagpal108@gmail.com

( १४८ ) अन्य पदार्थ के मिथ्यात्व का ज्ञान बतला रहे हो, क्या वह ब्रह्म से यथार्थ ज्ञान का विरोधी है ? अथवा जगत सत्यता रूप अज्ञान का विरोधी है ? इस विषय पर विवेचन करना होगा । ब्रह्म के यथार्थ ज्ञान का विरोधी तो हो नही सकता, क्यों कि—अज्ञान का ब्रह्मविषयक होना संभव नही है। ज्ञान और अज्ञान एकविषयक होते भी नहीं। प्रपंचमय जगत की मिथ्यात्व की प्रतीति, उसकी सत्यस्वरूपा प्रतीति से स्वयं ही विरुद्ध है। इससे प्रपंचमय की सत्यता रूप प्रतीति का बाध हो जाता है, जगत की सत्यता की प्रतीति का बाध ब्रह्म के स्वरूप का बाध है, अद्वैत ब्रह्म में द्वैतभाव भावना ही तो ब्रह्म के स्वरूप से संबंधी अज्ञान है, इस प्रकार जगत की सत्यता की प्रतीति के बाध का तात्पर्य है ब्रह्म जगत के अद्वैत स्वरूप का बाध, ऐसे बाध को स्वीकारने का तात्पर्य है कि ब्रह्म में अज्ञान की स्वीकृति । अद्वैत ब्रह्म में जो द्वैतभाव है, वह ब्रह्म से भिन्न किसी वस्तु के मिथ्यात्व मानने से ही निवृत्त हो सकता है, ब्रह्म संबंधी वस्तु के मिथ्यात्व की स्वीकृति तो द्वैतभाव की ही स्वीकृति है। ब्रह्म का स्वरूप ही केवल स्वानुभव सिद्ध है, ऐसा नही कहा जा सकता । ब्रह्म से अभिन्न जगत का स्वरूप भी स्वानुभव सिद्ध है। ऐसा मानने से, ब्रह्म के अद्वैत ज्ञान के विरोधी द्वैतरूपी अज्ञान और उस अज्ञान के बाध का प्रश्न ही नही रह जाता । यदि कहें कि—द्वैतभाव ब्रह्म का धर्म है, सो कहना तो आपके इस कथन “अनुभव स्वरूप ब्रह्म अनुभव्य नहीं हो सकता" के सर्वथा विपरीत होगा । इसलिए अज्ञान का विरोधी ब्रह्म कभी अज्ञान का आश्रय नहीं हो सकता । तिरोधान किं च अविद्यया प्रकाशैकस्वरूपं ब्रह्म तिरोहितमिति वदता, स्वरूपनाश एवोक्तः स्यात्, प्रकाश तिरोधानं नाम, प्रकाशोत्पत्ति प्रतिबन्धो विद्यमानस्य विनाशो वा । प्रकाशस्यानुत्पाद्यत्वाभ्युपगमेन प्रकाश तिरोधानं प्रकाश नाश एव । प्रकाशैक स्वरूप ब्रह्म को अविद्या से तिरोहित कहना, ब्रह्म का स्वरूप नाश ही मानना है। प्रकाशोत्पत्ति का प्रतिबन्ध ही प्रकाश का तिरोधान है, अथवा उसके अस्तित्व का विनाश है। प्रकाश की अनुत्पा- द्यता तो हो नहीं सकती, इसलिए प्रकाश के तिरोधान का तात्पर्य, प्रकाश नाश ही कहना होगा । ankurnagpal108@gmail.com

स्वरूपानुपपत्ति ( १४६ ) अपि च निर्विषया निराश्रया स्वप्रकाशेयमनुभूतिः स्वाश्रय- दोषवशात् अनंताश्रयमनन्तविषयमात्मानमनुभवतीत्यत्र किमयं स्वाश्रयदोषः परमार्थ भूत. ? उत् अपरमार्थभूत इति विवेच- नीयम् । न तावत् परमार्थः, अनभ्युपगमात्। नाप्यपरमार्थः, तथा सति हि द्रष्टृत्वेन वा, दृश्यत्वेन वा, दृशित्वेनवाऽभ्युपगमनीयः । न तावद्दृशिः, दृशिस्वरूपभेदानभ्युपगमात्, भ्रमाधिष्ठानभूतायास्तु साक्षात् दृशेर्माध्यमिक पक्ष प्रसंगेनापारमार्थ्यानभ्युपगमाच्च । द्रष्टृ दृश्ययोस्तदवच्छिन्नाया दृशेश्च काल्पनिकत्वेन मूलदोषान्तराऽपेक्षयाऽ- ननवस्था स्यात् । अथैतत्परिजिहीर्षया परमार्थसत्यनुभूतिरेव ब्रह्मरूपा दोष इति चेत्, ब्रह्मैव चेद्दोषः प्रपंचदर्शनस्यैव तन्मूलं स्यात् । कि प्रपंचतुल्याऽविद्यान्तर परिकल्पनेन ? ब्रह्मणो दोषत्वे सति तस्य नित्यत्वेनानिर्मोक्षश्च स्यात् । अतो यावद्ब्रह्मं व्यतिरिक्त पारमार्थिक दोषानभ्युपगमः, न तावद् भ्रांतिरूपपादिता भवति । निर्विषय और निराश्रय स्वप्रकाश अनुभूति, अपने आश्रय दोष से, अनंत आश्रय, अनंत विषयों का स्वयं अनुभव करती है इस कथन में जो आश्रय दोष की बात है, वह आश्रय दोष परमार्थिक है, या अपारमार्थिक यह विवेचनीय विषय है । पारमार्थिक तो हो नहीं सकता क्योंकि-दोष की सत्यता संभव नहीं है । अपारमार्थिक भी नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने में प्रश्न होता है कि, वह दोष द्रष्टा है, दृश्य है, या दृशि (ज्ञान) है ? दृशि तो हो नहीं सकता क्यों कि उसमें भेद की सम्भावना नही है । यदि भ्रांति के आश्रय भूत दृशि (ज्ञान) के भेद स्वीकार लिए जाये तो, वह बौद्धमद की बात हो जायगी, जिससे उसकी अयथार्थता नहीं मानी जा सकती । द्रष्टा, दृश्य और दृशि जब काल्पनिक हैं, तो उसका मूलभूत कोई दोष अवश्य होना चाहिए, तथा उस मूल दोष का भी कोई मूल दोष होना चाहिए, ऐसी अनवस्था होती है । इस अनवस्था के निवारण के लिए यदि ब्रह्मरूप सत्य अनुभूति को ही दोष माना जाय तो वह ब्रह्म ही दोष हुआ, फिर प्रपंचमय सारे जगत के लिए, जो कि ब्रह्ममूलक ही है, ankurnagpal108@gmail.com

( १५० ) किसी अन्य अविद्या नाम दोष की कल्पना की आवश्यकता ही क्या है ? ब्रह्म की दोषता सिद्ध हो जाने से, उसकी स्वाभाविक नित्यता के कारण दोष से कभी मोक्ष तो हो न सकेगा । इसलिए जब तक ब्रह्म से भिन्न किसी दोष नामक वस्तु को नहीं माना जाया, तब तक जगत को मिथ्या या भ्रान्त नहीं कहा जा सकता । अनिर्वचनीयत्वं च किमभिप्रेतम् ? सदसद्विलक्षणत्वमिति चेत्, तथाविधस्य वस्तुनः प्रमाणशून्यत्वेन अनिर्वचनीयतैव स्यात् । एतदुक्तं भवति—सर्वं हि वस्तुना तं प्रतीतिव्यवस्थाप्यम् । सर्वा च प्रतीतिः सदसदाकारा । सदसदाकारायास्तु प्रतीतेः सदसद् विलक्षणं विषय इत्यभ्युपगम्यमाने सर्वं सर्व प्रतीतेर्विषयस्यात्—इति । अनिर्वचनीयता से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ? सद्असद् विलक्षणता को मानते हो तो, ऐसी वस्तु का कोई प्रमाण नहीं मिलता इसलिए वह अनिर्वचनीय तो है ही । कथन यह है कि-सारी वस्तुएं प्रतीति के आधार पर निर्धारित होती हैं, सारी वस्तुएं सद् या असद् रूप में ही होती हैं । सद् असद् आकार वाली यदि सद् असद् विलक्षण वस्तु को ही प्रमाणित करने लगेगी तो कोई भी वस्तु प्रतीति का विषय ही न रह जायगी । अथस्यात्—वस्तुस्वरूपतिरोधानकरमान्तरवाह्यरूपविविधाध्या- सोपादानं सदसदनिर्वचनीयमविद्यानादिपदवाच्यंवस्तुयाथात्म्य ज्ञान निवर्त्यं ज्ञानप्रागभावातिरेकेण भावरूपमेव किंचिद् वस्तु प्रत्यक्षानुमानाभ्यां प्रतीयते । तदुपहितब्रह्मोपादानश्चाविकारे स्व- प्रकाशचिन्मात्रवपुषि तेनैवतिरोहित स्वरूपे प्रत्यगात्मन्यहंकार ज्ञान- ज्ञेय विभागरूपोऽध्यासः । तस्यैवावस्थारूपेणाध्यासरूपे जगति ज्ञानबाध्य सर्परजतादिवस्तु तत्तज्ज्ञानरूपाध्यासोऽपि जायते । कृत्स्न- स्यमिथ्यारूपस्य तदुपादनत्वं च मिथ्याभूतस्यार्थस्य मिथ्याभूतमेव कारणं भवितुमर्हतीति हेतुबलादवगम्यते । कारणाज्ञानविषयं प्रत्यक्षं तावत् “अहमज्ञो मामन्यं च न जानामि" इत्यपरोक्षावभासः । ankurnagpal108@gmail.com

२. प्रथमाध्याय: समन्वयाध्याय (जन्माद्यस्य यतः आदि सूत्रों का ब्रह्म-समन्वय)

: + ध्या + सों = अध्यासों! Wait, let's look closely at L7: विविध अध्यासों का उपादान - yes, Adhyasa! Adhyasa is the core Advaita concept being discussed! But wait, is it अध्यासों or अभ्यासों? Look at L7: the letter has a loop at the bottom? No, it's ध्! Wait, let's zoom in: In अभ्यन्तर: has a distinct circle on the left with a horizontal stroke to the right. In the word after विविध: it is अध्यासों! Wait, no, look at the top: does it have a loop? It is अध्यासों. Wait, let's check L13: अध्यास. L14: अध्यास. Yes, it's अध्यासों.

Wait, let's check L14: समय जगत् तथा ज्ञान बाध्य सर्प, रजत आदि वस्तु जन्य' अध्यास के Wait, is it अध्या- at the end of L13 and समय at L14? L13 ends with: अध्या- L14 starts with: समय जगत् -> wait! अध्यास-मय जगत्! Yes! अध्या- at the end of L13

स्यानुमेयत्वे अभावाख्यप्रमाणविषयत्वे चेयमनुपपत्तिः समाना । अस्याज्ञानस्यभावरूपत्वे धर्मिप्रतियोगिज्ञान सद्भावेऽपि विरोधाभा- वादयमनुभवो भावरूपाज्ञान विषय एवाभ्युपगंतव्य इति । कथन यह है कि—"मैं अज्ञ हूं" इस प्रकार की प्रतीति में "अहं" संज्ञक आत्मा और उसके (अहं) के अभावधर्मीज्ञान की प्रतियोगी के रूप ने अवगति होती है या नही ? यह विचारणीय प्रश्न है। यदि वैसा ज्ञान रहता है, तो अभावात्मक और भावात्मक ज्ञान की सहस्थिति से ऐसा होना संभव नहीं है। यदि नहीं रहता, तब भी उस अभावात्मक ज्ञान की अवगति संभव नही है, क्योकि—अभाव की प्रतीति का सामान्य नियम है कि—जिसका अभाव जानना है तो उसके प्रतियोगी की जान- कारी आवश्यक है, बिना प्रतियोगी ज्ञान के अभाव का ज्ञान होता है, न हो सकता है। अभावात्मक ज्ञान चाहे अनुभव विषयक हो या अनुपलब्धि प्रमाण विषयक हो दोनों में ही उक्त असंगति समान रूप से होती है। इस अज्ञान को भावरूप मानने पर धर्मि प्रतियोगी ज्ञान की स्थिति में भी "मैं अज्ञान हूं" ऐसी प्रतीति असंगत नहीं होती, क्योंकि—इसमें परस्पर कोई विरोध नहीं रहता, इसलिए उक्त प्रकार की प्रतीति (मैं अज्ञ हूं) को भाव रूप अज्ञान विषयक ही मानना चाहिए। ननु च—भावरूपमप्यज्ञानं वस्तुयाथात्म्यावभासरूपेण साक्षि चैतन्येन विरुध्यते ? मैवम्—साक्षिचैतन्यं न वस्तुयाथात्म्यविषयं अपितु अज्ञानविषयम् अन्यथामिथ्यार्थविभासानुपपत्तेः । नहि अज्ञान विषयेण ज्ञानेनाज्ञानं निवर्त्यते, इति न विरोधः ननु चेदं भावरूपमप्यज्ञानं विषयविशेषव्यावृत्तमेव साक्षिचैतन्यस्य विषयो भवति। स विषयः प्रमाणाधीन सिद्धिरिति कथमिव साक्षि चैतन्येन अस्मदर्थव्यावृत्तमज्ञानं विषयी क्रियते ? नैष दोषः, सर्वं मेववस्तुजातं ज्ञाततया अज्ञाततया वा साक्षि चैतन्यस्य विषयभूतम् तत्र जडत्वेज्ञाततया सिध्यते एव, प्रमाणव्यवधानापेक्षा । अजडस्य तु प्रत्यग्वस्तुनः स्वयं सिध्यतो न प्रमाणव्यवधानापेक्षेति, सदैवा-

( १५३ ) ज्ञानस्य व्यावत्त॑कत्वेनावभासो युज्यते । तस्मात् न्यायोपवृंहितेन प्रत्यक्षेण भावरूपमेवाज्ञानं प्रतीयते । तदिदं भावरूपमज्ञानं अनु- मानेनापि सिध्यति । विवादाध्यसितं प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभाव- व्यतिरिक्त स्वविषयावरण स्वनिवर्त्त्य स्वदेशगतस्तु अन्तरपूर्वकम्, अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वात्, अन्धकारे प्रथमोत्पन्न प्रदीपप्रभा- वत् इति । वस्तु के यथार्थ स्वभाव को प्रकाशित करने वाले साक्षी चैतन्य (अनुभविता जीवात्मा) से, भावरूप अज्ञान की विरुद्धता हो गयी ? ऐसा संशय नहीं करना चाहिए, वस्तु का यथार्थ स्वभाव प्रकाशन साक्षी चैत- न्य का विषय नहीं है, अपितु उसका विषय तो अज्ञान प्रकाशन है' अन्यथा वह मिथ्यार्थावभास न कर सकता । अज्ञान (असत्यवस्तु) विषयक अवभास से अज्ञान का निवारण तो हो नहीं सकता, इसलिए चैतन्य के साथ अज्ञान का विरोध भी नहीं है । “मै अज्ञ हूँ” इस प्रतीति में “अहं” पदार्थ आत्मा के साथ अज्ञान की भी प्रतीति होती है । स्वयं सिद्ध स्वयं प्रकाश आत्मा जब किसी भी प्रमाण के अधीन नहीं है, ऐसा साक्षी चैतन्य आत्मा “अहं” पदार्थ को छोड़कर केवल अज्ञान को ही अपना विषय कैसे करता है ? ऐसी आपत्ति भी नही की जा सकती क्योंकि—सभी ज्ञात अज्ञात वस्तुएं साक्षी चैतन्य की प्रतीति की विषय हैं । जडरूप से ज्ञात होने वाली वस्तुओं में प्रमाण अपेक्षित होते हैं । अजड वस्तुएं स्वयं सिद्ध स्वयं प्रकाश होने से, प्रमाणों की अपेक्षा नहीं रखतीं, वो सब तो अज्ञान से भिन्न हैं इसलिए सदा अवभासित हो सकती हैं । इस प्रकार युक्ति सिद्ध प्रत्यक्ष प्रमाण से अज्ञान की भावरूप प्रतीति सिद्ध होती है । अज्ञान पदार्थ भावरूप है, अभावरूप नहीं, यह बात अनुमान से भी प्रमाणित है । प्रमाण समुत्पादित ज्ञान द्वारा अज्ञात विषय प्रकाशित हुआ करता है, ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व, उसके प्रागभाव से भिन्न उसके प्रकाश विषय को आवरक वस्तु स्वयं उसके द्वारा ही निवार्य होती है (अर्थात्— ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व किसी एक ऐसी वस्तु की स्थिति माननी पड़ेगी जो

( १५४ ) उस ज्ञानको आवृत किये रहती हैं। जिसे कि ज्ञान निवारण कर सके, आत्मा से समुत्पन्न यह ज्ञान आत्मा के आश्रित तो रहता ही है, इसलिए आवृत करने वाली वस्तु को ज्ञान का प्रागभाव नहीं कह सकते, अर्थात् ज्ञान की स्थिति नित्य है, उसका प्रागभाव होता नहीं, इसलिए उत्पत्ति के पूर्व वह किसी वस्तु से आवृत रहता है, अभावरूप नहीं रहता) उत्पत्ति के पूर्व वह ज्ञान, अन्धकार में प्रथमोत्पन्न प्रदीपप्रभा की तरह सदा आत्मा के आश्रित विद्यमान रहता है। आलोकाभावमात्रं वा रूपं दर्शनाभावमात्रं वा तमो न द्रव्यान्तरम्, तत्कथं भावरूपाज्ञान साधने निदर्शनतयोपन्यस्यते ? इति चेत् उच्यते-बहुलत्वविरलत्वाद्यवस्थायोगेन रूपवत्तया चोपलब्धेर्द्रव्यान्तरमेव तम इति निरवद्यम्, इति । (संशय) यदि कहो कि—आलोक का अभाव या रूप के दर्शन का अभाव ही तो अन्धकार है, अन्धकार कोई वस्तु नहीं है इसलिए उसे भाव- रूप अज्ञान की सिद्धि के लिए दृष्टान्तरूप से उपस्थित कर रहे है ? (समाधान) हल्के और घने तथा काले रूप से उस अन्धकार की उपलब्धि होती है, इसलिए अन्धकार नाम की कोई वस्तु अवश्य है। अत्रोच्यते-“अहमज्ञो मामन्यंच न जानामि” इत्यत्रोपपत्ति- सहितेन केवलेन च प्रत्यक्षेण न भावरूपमज्ञानं प्रतीयते । वस्तु- ज्ञान प्रागभावविषयत्वे विरोध उक्त., सहि भावरूपाज्ञानेऽपि तुल्यः । विषयत्वेनाश्रयत्वेन चाज्ञानस्य व्यावर्त्तंकया प्रत्यगर्थः प्रतिपन्नो वा अप्रतिपन्नो वा ? प्रतिपन्नश्चेत् तस्वरूपज्ञान निवर्त्यं तद ज्ञानं तस्मिन् प्रतिपन्ने कथमिव तिष्ठति । अप्रतिपन्नश्चेत—व्यावर्त्त- काश्रय विषय ज्ञान शून्यमज्ञानं कथमनुभूयेत ? (पूर्वपक्ष के उक्त तर्क का समाधान)— “मैं अज्ञ अपने को तथा अन्यों को नही जानता” ऐसी जो अज्ञान की प्रतीति होती है, युक्ति या प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा उसे भाव रूप से

( १५५ ) प्रमाणित नही किया जा सकता । अज्ञान को ज्ञान का प्रागभाव बतलाने वाले सिद्धान्त में जो असंगति बतलाई गई है वह तो भाव रूप अज्ञान में भी रहेगी । आत्मा यदि अज्ञान का विषय या आश्रय है तो आश्रित अज्ञान, विशेष्य और आत्मा विशेषण होगा फिर बतलाओ कि—'अहं- अज्ञ'' कहने में आत्मा की प्रतीति रहती है या नहीं ? यदि रहती है तो आत्मज्ञान से नष्ट होने वाला वह अज्ञान आत्मा का आश्रित कैसे हो सकता है ? यदि नहीं रहती तो किस विषय का अज्ञान कब हुआ, इसका भान न होने से अज्ञान की प्रतीति होगी कैसे ? अथ-विशदस्वरूपावभासोऽज्ञानविरोधी, अविशदस्वरूपं तु प्रतीयते, इत्याश्रयविषयज्ञाने सत्यपि नाज्ञानानुभव विरोधः इति । हन्त र्तहि ज्ञान प्रागभावोऽपि विशदस्वरूप विषयः । आश्रय- प्रतियोगि ज्ञानंतु अविशदस्वरूपविषयमिति न कश्चिद् विशेषोऽन्य- त्राभिनिवेशात् । भावरूपस्याज्ञानस्यापि हि अज्ञानमिति सिध्यतः प्रागभावसिद्धाविव सापेक्षत्वमस्त्येव । तथाहि-अज्ञानमिति ज्ञाना- भावः, तदन्यः, तद्विरोधी वा ? त्रयाणामपि तत् स्वरूपज्ञानापेक्षाऽ- वश्याश्रयणीया । यद्यपि तमः स्वरूपप्रतिपत्तौ प्रकाशापेक्षा न विद्यते तथाऽपि प्रकाशविरोधीत्यनेनाकारेण प्रतिपत्तौ प्रकाश प्रतिपत्ति अपेक्षाऽस्त्येव । भवदभिमताज्ञानं न कदाचित् स्वरूपेण सिध्यति अपितु अज्ञानमित्येव । तथा सति ज्ञानाभाववत् तदपेक्षत्वं समानम् ज्ञानप्रागभावस्तु भवताऽप्यभ्युपगम्यते । प्रतीयते चेत्युभ- याभ्युपेतो ज्ञान प्रागभाव एव "अहमज्ञो मामन्यं च जानामि', इत्यनुभूयते इति अभ्युपगन्तव्यम् । यदि कहो कि—आत्म विषयक कोई विशेषज्ञान ही अज्ञान का निवर्त्तक हो, ऐसा कोई आवश्यक नहीं है, अपितु आत्मा का यथार्थ विशुद्ध स्वरूप विषयक ज्ञान ही उस अज्ञान का निवर्त्तक है । "मैं अज्ञ " में जो प्रतीति होती है, आश्रय और विषय रूप से होने वाली वह प्रतीति विशुद्ध

( १५६ )

निर्मल आत्मा की नहीं होती अपितु अज्ञान कलुषित होती है । इसलिए अज्ञान के साथ उसका कोई विरोध नहीं है । (उत्तर) बहुत अच्छे; यदि ऐसी ही बात है, तो ज्ञान का प्रागभाव अज्ञान, विशुद्ध आत्म स्वरूप विषयक होगा, तथा आश्रय और विषय रूप से होने वाला आत्मज्ञान, विशुद्ध आत्म विषयक न होगा, इसलिए उक्त प्रकार के आत्मज्ञान की स्थिति में भी प्रागभाव रूपी अज्ञान बना रहेगा । आपके इस कथन में तो सिवा अज्ञान भाव सिद्धि की चेष्टा के, कोई और विशेष बात समझ में नहीं आती, अज्ञान को यदि भावस्वरूप मान भी ले, तब भी वह कहलायेगा तो अज्ञान ही, प्रागभाव की तरह, उसमें भी पूर्वोक्त सापेक्षता तो रहेगी ही । जरा सोचिये—अज्ञान है क्या वस्तु ? क्या वह ज्ञान का अभाव है, या ज्ञान विरोधी अज्ञान है, या ज्ञान से भिन्न कोई वस्तु विशेष है ? इन तीनों की जानकारी के पहिले ज्ञान के स्वरूप की जानकारी आवश्यक है । यद्यपि अन्धकार के स्वरूप की प्रतीति में प्रकाश ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती, फिर भी अन्धकार को जब प्रकाश के विरोधी रूप में जानने की इच्छा होती है तब प्रकाश की प्रतीति की अपेक्षा होती है । आपका अभिप्रेत “अज्ञान ” कभी भी स्वरूप से तो प्रतीत होता नहीं, केवल “अज्ञान” इस नाम से ही ज्ञात होता है इस प्रकार ज्ञानाभाव की तरह सापेक्षता इसमे भी रहती है इसलिए ज्ञान का प्रागभाव तो आप भी मानते है ऐसा लगता है । “मैं अज्ञ” इत्यादि प्रतीति में उभय संमत प्राग्- भाव स्वीकारना ही संगत है । नित्यमुक्तस्वप्रकाश चैतन्यैकस्वरूपस्यब्रह्मणोऽज्ञानानुभवश्च न संभवति स्वानुभवस्वरूपत्वात् । स्वानुभवस्वरूपमपि तिरोहितस्व- रूपमज्ञानमनुभवतीति चेत्, किमिदं तिरोहित स्वरूपत्वम् ? अप्रकाशितस्वरूपत्वमिति चेत् , स्वानुभवस्वरूपस्य कथम् प्रकाशित स्वरूपत्वम् ? स्वानुभवस्वरूपस्याप्यन्यतोऽप्रकाशित स्वरूपमापद्यत इति चेत् , एवं तर्हि प्रकाशाख्यधर्मानभ्युपगमेन प्रकाशस्यैव स्वरूप- त्वादन्धतः स्वरूपनाश एव स्यात् इति पूर्वमेवमोक्तम् ।

( १५७ ) किञ्च-ब्रह्मस्वरूपतिरोधानहेतुभूतमेतदज्ञानं स्वयमनुभूतं सत् ब्रह्मतिरस्करोति, ब्रह्मतिरस्कृत्य स्वयं तदनुभवविषयो भवतीत्य- न्योन्याश्रयणम् । नित्य मुक्त, एकमात्र स्वप्रकाश चैतन्य स्वरूप ब्रह्म में तो अज्ञाना- नुभव हो नही सकता, क्योंकि-वह स्वयं अनुभवस्वरूप है। यदि कहो कि- स्वानुभवस्वरूप भी, तिरोहित स्वरूप अज्ञान का अनुभव करता है। तो वह तिरोहित स्वरूपता क्या है, यदि कहो कि-अप्रकाशित स्वरूपता ही तिरोहित रूपता है। तो स्वानुभव स्वरूप वस्तु तिरोहित स्वरूप कैसे हो सकती है ? स्वानुभव स्वरूप होते हुए भी, अन्य से आवृत होने से तिरोहित स्वरूपता होती है, इस कथन का तात्पर्य तो यह हुआ कि स्वानुभवस्वरूप प्रकाश ही किसी अन्य से आवृत होकर तिरोहित होता है अर्थात् उस प्रकाश के स्वरूप का नाश होता है, ऐसा तो पहिले भी कह चुके हैं । उक्त तर्क से तो यह तात्पर्य हुआ कि-ब्रह्म के स्वरूप को तिरोहित करने वाला अज्ञान स्वयं अनुभूत होकर ही, ब्रह्म को तिरोहित करता है, उसे तिरोहित करके, स्वयं उस ब्रह्म के अनुभव का विषय हो जाता है । इस प्रकार वे दोनों परस्पर एक दूसरे पर आश्रित हैं । अनुभूतमेव तिरस्करोति, चेत्, यद्यतिरोहितस्वरूपमेव ब्रह्मा- ज्ञानमनुभवति, तदा तिरोधानकल्पना निष्प्रयोजना स्यात् अज्ञान स्वरूपकल्पना च । ब्रह्मणोऽज्ञानदर्शनवत् अज्ञान कार्यतयाऽभिमत प्रपंचदर्शनस्यापि संभवात् । यदि कहो कि-अनुभूत होकर तिरस्कृत करता है, तब तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि अतिरोहित स्वरूप ब्रह्म अज्ञान का अनुभव करता है; यदि ऐसी बात है, तो फिर तिरोधान की कल्पना व्यर्थ ही की, तथा अज्ञान के स्वरूप की कल्पना भी । ऐसा निश्चित होने से, ब्रह्म के अज्ञान अनुभव की तरह, अज्ञान का कार्यरूप प्रपंचमय सारा जगत भी सहज अनुभूति का विषय सिद्ध होता है । ankurnagpal108@gmail.com

किं च--ब्रह्मणोऽज्ञानानुभवः किं स्वतोऽन्यतो वा ? स्वतः- चेत् अज्ञानानुभवस्य स्वरूपप्रयुक्तत्वेनानिर्मोक्षस्स्यात् । अनुभूति- स्वरूपस्य ब्रह्मणोऽज्ञानानुभव स्वरूपत्वेन मिथ्या रजतबाधक ज्ञानेन रजतानुभवस्यापि, निवृत्तिवत् निवर्त्तक ज्ञानेनाज्ञानानुभूतिरूप ब्रह्म स्वरूपनिवृत्तिर्वा । अन्यतश्चेत् किं तदन्यत् ? अज्ञानान्तरमिति- चेत् अनवस्था स्यात् ब्रह्म तिरस्कृत्यैव स्वयमनुभवविषयो भवतीति तथा सतीदमज्ञानं काचादिवत् स्वसत्तया ब्रह्मतिरस्करोति, इति ज्ञानबाध्यत्वं अज्ञानस्य न स्यात् । यह बतावें कि--ब्रह्म की उक्त अज्ञानानुभूति स्वतः होती है या दूसरे के द्वारा होती है ? यदि स्वतः होती है तो वह सदा होती रहेगी कभी छूटेगी ही नही जिसके फलस्वरूप, अज्ञानानुभव स्वरूप से प्रतीत होने वाला वह ब्रह्म शुक्ति रजत की तरह, अज्ञान निवर्त्तक तत्वज्ञान के द्वारा अज्ञान के साथ ही साथ तदनुभवरूप होने से स्वरूपतः समाप्त हो जायगा। यदि कहो कि नहीं उसकी वह अज्ञानानुभूति परतः होती है, तो वह परवस्तु क्या है ? यदि वह अज्ञान से भिन्न कोई और दूसरा अज्ञान है, तो फिर अनवस्था दोष उपस्थित होगा (अज्ञान के लिए अज्ञानों की ही कल्पना करते रह जाओगे) यदि कहो कि--अज्ञान ब्रह्म को आवृत करने के बाद अनुभूत होता है, तो काच आदि नेत्र रोगों की तरह जो कि--नेत्रों को आवृत कर दर्शन शक्ति समाप्त कर प्रतीत होते हैं, वैसे ही यह भी हुआ । ऐसा अज्ञान तो, तत्त्वज्ञान के द्वारा हटाया नहीं जा सकता । अथेदमज्ञानं स्वयमनादि ब्रह्मणः स्वसाक्षित्वं ब्रह्मस्वरूपति- रस्कृतिं च युगपदेव करोति, अतो नानवस्थादयो दोषा इति नैतत् । स्वानुभवस्वरूपस्य ब्रह्मणः स्वरूपतिरस्कृतिमंतरेण साक्षित्वापादना- योगात् । हेत्वंतरेण तिरस्कृतमिति चेत् तर्हि अस्यानादित्वं मपा- स्तम् । अनवस्था च पूर्वोक्ता । अतिरस्कृत स्वरूपस्यैव साक्षित्वा- पादेन ब्रह्मणः स्वानुभवैकतानता न स्यात् । ankurnagpal108@gmail.com