श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ सेइ-ह्लादिनीर सेइ নহে, याते कर्त्ता-हेतु ५/६२ सेइ नारायण कृष्णेर २/२८ सेइ नारायणेर मुख्य अङ्ग ६/२१ सेइ नेत्रे अविच्छिन्न बहे ५/१६५ सेइ पश्चतत्त्व मिलि' ७/२० सेइ पद्मनाले हैल चौद्द ५/१०३ सेइ पद्मे हैल ब्रह्मार ५/१०२ सेइ परव्योमे नारायणेर ५/४० सेइ परिकरगण सङ्गे ७/९ सेइ पुरुष सृष्टि-स्थिति ५/८० सेइ पुरुषादि-सबार २/१०५ सेइ पुरुषेर सङ्कर्षण ५/४६ सेइ प्रभु नित्यानन्द ५/१०७, ५/११६ सेइ प्रेमार आमि ४/१३२ सेइ प्रेमार राधिका ४/१३२ सेइभावे कहे—'मुञि ५/१३४ सेइ भावे मत्त प्रभु ४/१०८ सेइभावे सुख-दुःख ४/१०६ सेइ भावे हइ आमि ४/२२ सेइ बन्या ता-सबारे ७/३० सेइ बलराम-गौरसङ्गे ५/११ सेइ बलराम-सङ्गे ५/६ सेइ ब्रह्म गोविन्देर २/१५ सेइ भक्तगण हय १/६४ सेइ भावे अनुगत ताँर ६/८६ सेइभावे निजवाञ्छा ४/२२१ सेइ रस आस्वादिते ४/२२३ सेइ रात्रे प्रभु मोरे ५/१८० सेइ राधाभाव लञा ४/२२० सेइ लिखि, येइ शुनि ६/११३ सेइ विष्णु 'शेष'-रूपे ५/११७ सेइ विष्णु हय याँर ५/११६ सेइ सब अस्त्र ३/७२ सेइ सब महादक्ष धाञा ७/३० सेइ सब लभ्य एइ ५/२३२ सेइ सर्ववेदेर 'अभिधेय' ७/१४२ सेइ सिंह वसुक ३/३१ सेइ सुखमाधुर्य-घ्राणे ४/२६३ सेइ सुखे मत्त, किछु ६/१०४ सेइ सूत्र-एइ तार कैल ५/२३१ सेइ हैते संन्यासीर फिरे ७/१४९ सेतुबन्ध पर्यन्त कैला ७/१६७ से पुरुषेर अंश-अद्वैत ६/१० से प्रतिज्ञा भङ्ग हैल ४/१७९ से वैष्णवेर पदरेणु ५/२३० से मङ्गलाचरण हय १/२२ से माधुर्य बाड़े ४/१९० सेवक योगाय ताम्बूल ५/१९२ से-सब तोमार अंश २/४८ से सब पाइनु आमि ५/२३२ से से लीला करिब ४/२८ सेह गोविन्देर अंश २/१८ सेहो त' कृष्णेर ४/१८१ सेहो तोमार अंश ३/६९ स्तुति-भक्त्ये करे ताँर ६/४० स्त्री, वृद्ध, बालक, युवा ७/२५ स्थितिकर्त्ता विष्णु ४/८ स्वकीया-परकीया-रूपे ४/४६ स्वगण सहिते चैतन्येर ६/३३ स्वच्छ धौतवस्त्रे ४/१७० स्वजने करये यत्न ४/१६८ स्वतःप्रमाण वेद-प्रमाण ७/१३२ स्वतन्त्र लीलाय दुःख ५/१५० स्वप्नभङ्ग हैल, देखि ५/१९७ स्वामाधुर्य आस्वादिते ६/१०६ स्वमाधुर्य देखि' कृष्ण ४/१३७ स्वमाधुर्ये लोकेर मन ५/२१५ 'स्वयं-भगवत्ता' पिछे २/८२ स्वयं भगवान् २/८, ७०, ८८, १०६, १२०, ७/७ स्वयं भगवानेर कर्म ४/८ स्वयं-भगवानेर कृष्णत्व २/८३ स्वयंरूप कृष्णेर कायव्यूह १/८१ स्वरूप-ऐश्वर्ये ताँर नाहि ७/१३९ स्वरूप-गोसाञि-प्रभुर ४/१०५ स्वरूप गोसाञि मात्र ४/१६० स्वरूपविग्रह कृष्णेर ५/२७ स्वरूपशक्ति—'ह्लादिनी' ४/५९ स्वसुखार्थ सालोक्य ४/२०४ स्व-स्व-प्रेम-अनुरूप ४/१४३ स्वेद, कम्प, रोमाञ्चाश्रु ७/८९ ह हरिध्वनि करे लोक ७/१५९ हस्तमुखनेत्र-अङ्ग ६/३७ हासाय, नाचाय, मोरे ७/८२ हासि, कान्दि, नाचि, गाइ ७/७८ हिरण्यगर्भ, अन्तर्यामी ५/१०६ हिरण्यगर्भे आत्मा २/५१ हीनाचार कर केने, इथे ७/७० हृदये धरये ये चैतन्य ४/२३३ हृदये बाड़ये प्रेम-लोभ ४/१३६ हेनकाले आइल ४/२६९ हेन चित्र-लीला करे ७/१५२ हेन जीवतत्त्व लञा ७/१२० हेन नारायण,-याँर ५/१०७ हेन प्रभु नित्यानन्द, के ५/१२५ हेन ये गोविन्द प्रभु, ५/२२७ हैते पुरुष करे मायाते ५/६५ ह्लादिनी कराय कृष्णे ४/६० ह्लादिनीर द्वारा करे ४/६० ह्लादिनीर सार 'प्रेम' ४/६८ ४७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
अक्षज-अभिधा ] शब्दकोश
अ अक्षजज्ञान—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान अघटन-घटन-पटीयसी—असम्भवको भी सम्भव तथा इसके विपरीत करनेवाली अचिद्वस्तु—जो वस्तु चित् नहीं हो अच्छेद्य—अविभाज्य, जिसका छेदन ना हो सके अच्युत—जो च्युत नहीं हो अज—अजन्मा अजागलस्तन—बकरीके गलेमें लटकनेवाली स्तनके जैसी चीज अज्ञ—ज्ञानरहित अणिमा—योगकी आठ सिद्धियोंमेंसे एक, जिसमें योगी अणुके समान सूक्ष्म हो जाता है अतिक्रम—मर्यादा, कर्त्तव्य, अधिकार आदिका उल्लंघन अतिक्रान्त—अतीत, क्रमका उल्लंघन किया हुआ अतिशय—अत्यधिक अतिशयोक्ति—किसी बातका बढ़ा-चढ़ाकर कहना अत्याज्य—नहीं त्यागने योग्य अत्युत्तम—अति उत्तम अदृष्ट—न देखा हुआ, अज्ञात अधिदैव—आराध्य देवता अधिरूढ़—बढ़ा हुआ अधिष्ठान—आधार, आश्रय अनभिज्ञ—न जाननेवाला अनवरत—निरन्तर अनायास—बिना कष्टके
अनिर्वचनीय—वचनसे ना वर्णन करने योग्य अनुक्षण—निरन्तर अनुगत—अनुगामी, अधीन अनुवर्त्तन—अनुसरण, अनुगमन अनुष्ठान—आरम्भ करना, कोई धार्मिक कृत्य अनुसन्धान—खोज, प्रयत्न अन्तर्भुक्त—किसीके अन्तर्गत होना अन्तर्भूत—अन्तर्गत अन्त्य—अन्तका, आखिरी अन्यतम—बहुतोंमें से एक, सर्वश्रेष्ठ अन्वय—वाक्यमें शब्दोंका परस्पर सम्बन्ध, मेल अन्वेषण—खोज, ढूँढना अपकार—अहित अपटुता—अकुशलता अपरा—जो श्रेष्ठ ना हो अपरिमित—अगणित, अनगिनत अपवर्ग—मोक्ष, निर्वाण अपूर्व—जो पहले ना हुआ हो, अनूठा अप्राकट्य—अप्रकट होना अप्राकृत—अलौकिक अप्रारब्ध—वैसा फल जो वर्तमान शरीरमें न भोगा जा रहा हो अप्रासङ्गिक—प्रस्तुत विषयसे असम्बद्ध, प्रसङ्गके विरुद्ध अबाध—बाधारहित अभयत्व—अभयता अभिज्ञ—जाननेवाला अभिधा—नाम, वाच्यार्थ प्रकट करनेवाली शब्द शक्ति
शब्दकोश | ४७५
[ अभिधान-इति
अभिधान-शब्दकोष अभिधेय-अर्थ या उपाय, कथनीय, विषय अभिप्राय-मूल अर्थ, तात्पर्य अभिप्रेत-उद्दिष्ट, अभिलाषित, स्वीकृत अभिवृद्धि-अभ्युदय, बढ़ना अभिव्यक्ति-प्रकट करना अभिसन्धि-जोड़, समझौता अभिसार-आगे बढ़ना, प्रियसे मिलने जाना अभिहित-कहा हुआ अभीष्ट-प्रिय, रुचिकर अभ्यस्त-बार बार अभ्यास किया गया अभ्युदय-उदय अमित-अत्यधिक अरण्य-वन अवगत-जाना हुआ अर्वाचीन-नया, बादमें उत्पन्न हुआ अवतारणा-नीचे लाना, इन्द्रियगोचर करना अवतीर्ण-अवतारके रूपमें प्रकट अवधारण-शब्दके अर्थकी सीमा बाँधना, निश्चय करना अवयव-अङ्ग, अंश अवरुद्ध-रुका हुआ अवलम्बन-आश्रय लेना, सहारा लेना अवलोकन-देखना अवशिष्ट-बचा हुआ, शेष अवस्थान-रहना, अवस्थिति अविचिन्त्य-अचिन्त्य अविच्छिन्न-अविभक्त, लगातार अविच्छिन्न तैलधारावत्-तेलकी धाराके समान अटूट अव्यय-अविकारी अव्याकृत-अव्यक्त अशेष-सम्पूर्ण अष्टसिद्धि-आठ प्रकारकी सिद्धियाँ असङ्ग-आसक्तिहीन असङ्गत-प्रसङ्गविरुद्ध, अनुचित असङ्गति-मेलका ना होना असंस्कृत-संस्कारहीन असमोर्द्ध-जिससे बड़ा और जिसके बराबर कोई नहीं हो असार-सारहीन असूया-ईर्ष्या, दूसरेके गुणमें दोष निकालना
आ आख्यायिका-कहानी आच्छन्न-ढका हुआ आत्मविषयणी-आत्म-सम्बन्धी आत्मसात्-अपने अधिकारमें आत्यन्तिक-असीम आदित्य-सूर्य आधान-स्थापन, कोई वस्तु रखनेका स्थान रखना आधिदैविक-देवताओंके द्वारा कृत आधिभौतिक-अन्य प्राणियों द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक-मानसिक, आत्म-सम्बन्धी आपाततः-अचानक, अन्तमें आप्त-पूर्ण, कुशल आम्नाय-वेद, श्रुत, परम्पराप्राप्त उपदेश आयुध-अस्त्र आरूढ़-आसीन आरोहण-चढ़ना, ऊपरकी ओर जाना आर्त्ति-क्लेश, पीड़ा आर्ष-ऋषियोंका आलोचना-गुण-दोष निरूपण आलोच्य-आलोचना योग्य आह्लादित-आनन्दित
इ इति-इस प्रकार, समाप्ति
४७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
इहलोक-ग्रीवा ]
इहलोक—यह लोक
ई ईक्षण—दृष्टिपात ईशिता—ईश्वरत्व
उ उच्छिष्ट—खाकर छोड़ा हुआ, परित्यक्त उत्कृष्ट—उन्नत, श्रेष्ठ उद्बुद्ध—जगा या जगाया हुआ, विकसित उद्भासित—व्यक्त, चमकता हुआ उद्यत—तैयार उद्रेक—प्रचुरता, बढ़ती उद्वेग—क्षोभ, चित्तकी अस्थिरता उपक्रम—योजना, आरम्भ, प्रयास उपशम—विराग, विरक्ति उपलक्षित—इशारेसे बताया हुआ, लक्ष्य किया हुआ उपाङ्ग—छोटा या सहायक अंग उपार्जित—कमाया हुआ उपादान—साधन-सामग्री उपादेय—ग्रहण करने योग्य, उपयोगी उपेयत्व—उपाय-योग्य होनेका भाव उरु—विस्तृत, महान उरुक्रम—विष्णु उरुगाय—उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिसका स्तुतिगान किया गया हो
ए एकरस—जो सदा एक रूपमें रहे, अपरिणामी एकीभूत—जो मिलकर एक हो गया हो
ऐ ऐहिक—सांसारिक
औ औत्सुक्य—उत्सुकता औद्धत्य—उद्धतता, अखड़पन औपाधिक—उपाधियुक्त
क कर्त्तृत्व—कर्ताका धर्म, कार्य कलुषित—गंदा, कलुषयुक्त कल्प—वेदका एक अङ्ग, ब्रह्माका एक दिन कल्पवृक्ष—इच्छा पूरी करनेवाला वृक्ष काम्यकर्म—फलकी कामनासे किया जानेवाला कर्म कैतव—छल, धोखा केवला भक्ति—शुद्धा भक्ति कैङ्कर्य—दासत्व कैवल्य मुक्ति—निर्वाण मुक्ति कौतूहलवश—उत्सुकतावश क्रोड़ीभूत—अन्तर्भूत क्लान्त—थका हुआ, क्षीण
क्ष क्षिति—पृथ्वी क्षेत्र—शरीर क्षेत्रज्ञ—शरीरका ज्ञाता, आत्मा तथा परमात्मा क्षोभ—असन्तोष, व्याकुलता
ग ग्रथित—गूँथा हुआ ग्रन्थि—गाँठ ग्रास—आहार ग्रीवा—गर्दन
शब्दकोश | ४७७
[ घ्राण-निमज्जत घ घ्राण-गन्ध, सूँघनेकी शक्ति च चित्तगुहा-हृदयरूपी कन्दरा चित्-शक्ति-भगवानकी एक प्रकारकी शक्ति चिदालोचना-चित्-वस्तुकी आलोचना चिन्तामल-चिन्तारूपी मल चिन्मयत्व-चिन्मयता चैतन्यत्व-चेतनता चैतन्यनिष्ठ-चित्-वस्तुमें जिसकी निष्ठा है चैतन्यहीन-चेतनारहित छ छन्दविद्या-अठारह विद्याओंमें एक ज जर्जरित-जो जर्जर हो गया हो त तत्त्वज्ञान-तत्त्ववस्तुका ज्ञान तत्त्वतः-यथार्थतः तत्त्वविद्-तत्त्वको जाननेवाला तदीय-भगवत्-सम्बन्धी तनय-पुत्र तन्मय-तल्लीन तादात्म्य-दो वस्तुओंके परस्पर अभिन्न होनेका स्वभाव तारतम्य-दो वस्तुओंके घट-बढ़कर होनेका भाव तिर्यग्-पशु-पक्षी तैलधारावत्-तैलकी भाँति धारावाला त्रिगुणातीत-तीनों गुणोंसे अतीत त्रिवर्ग-धर्म, अर्थ और काम द दिक्पाल-दश दिशाओंके रक्षक देवता दुर्ज्ञेय, दुर्बोध-कठिनाईसे जानने योग्य दुर्निगृहीत-कठिनाईसे वशमें लाया हुआ दुर्वारित-कठिनाईसे निवारण किया हुआ दुरूह-कठिन दुस्त्याज्य-नहीं त्यागने योग्य देदीप्यमान-चकमता-दमकता हुआ देहाध्यास-देहमें मिथ्या अभिमान द्रव्यमययज्ञ-द्रव्य द्वारा किया गया यज्ञ द्विजवर-ब्राह्मणश्रेष्ठ द्वैतभाव-दो होनेका भाव ध धूसरित-धूलसे भरा हुआ ध्वनित होना-पता चलना न नराकृति-मनुष्यके समान आकृति नामाभास-नामका आभास निःशक्तिक-शक्तिरहित निःश्वास-प्राणवायु या साँसका बाहर निकलना निःसृत-निकला हुआ निकृष्ट-तुच्छ निकेतन-घर निक्षेप करना-फेंकना निगृहीत-निग्रह किया हुआ निग्रह-संयम नितान्त-अत्यन्त, एकदम निमज्जत-डूबा हुआ, स्नात ४७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
नियम-प्रताड़ित ] नियमाग्रह—नियम-पालनमें आलस्य निरञ्जन—निर्दोष, अज्ञानसे रहित निरपेक्ष—किसी औरकी अपेक्षा नहीं निर्गत—बाहर निकला हुआ निर्गुण—सत्त्व, रज और तमोगुणसे अतीत रखनेवाला निर्दिष्ट—निर्देशित निर्वाण—मोक्ष निर्विकल्प—विकल्पसे रहित निर्विवाद—बिना विवादका निरुद्ध—विशेषरूपसे रोका हुआ निरूपक—निरूपण करनेवाला निरूपण—किसी विषयको ठीक-ठीक समझा देना निशा—रात्रि निष्काम कर्म—कामनासे रहित कर्म निष्पन्न—जिसकी उत्पत्ति हुई है निसर्गवाद—प्रकृतिवाद (प्रकृति ही जगत्की सृष्टि करनेवाली है, ऐसा मतवाद) निस्तारक—निस्तार करनेवाला निस्त्रैगुण्य—तीनों गुणोंसे अतीत निहत—मारा हुआ नीलमणि—नीलम नैतिक—नीति-सम्बन्धी नैमित्तिक—निमित्तसे उत्पन्न नैरन्तर्य—निरन्तर होनेका भाव नैर्घृण्य—निर्ममता, क्रूरता प पक्षान्तर—दूसरी ओर पन्था—पथ परिज्ञात—अच्छे प्रकारसे ज्ञात परनिष्ठित—दूसरेमें निष्ठावाला परदार—दूसरेकी स्त्री परवर्ती—बादमें पराक्रान्त—शक्तिशाली परिग्रह—ग्रहण पराभक्ति—श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति पराभूत—पराजित परिचर्या—सेवा परिचालक—चलानेवाला परिदृष्ट—दृष्ट परिनिष्ठित—पूर्णतया निपुण परिमित—सीमित परिलक्षित—अच्छी तरह देखाभाला हुआ परिव्राजक—संन्यासी परिवेष्टित—घिरा हुआ पर्यन्त—तक पर्यवसित—समाप्त पाण्डित्य—विद्वता पारत्रिक—परलोक-सम्बन्धी पारलौकिक—परलोक-सम्बन्धी पार्षद—परिकर पाषण्डी—पाखण्डी पूर्वपक्ष—संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न पूर्वराग—मिलनसे पहलेका राग प्रकरण—निर्माण, प्रसङ्ग प्रकृत—यथार्थ प्रकृष्ट—उत्तम प्रक्षिप्त—बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ प्रच्छन्न—ढका हुआ प्रजल्प—इधर-उधरकी बात प्रज्ञा—बुद्धि प्रणयन—रचना, निर्माण प्रणत—शरणागत प्रणतपाल—शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रणति—प्रणाम, शरणागति प्रताड़ित—सताया गया शब्दकोश | ४७९
[ प्रतिपादित-म्लेच्छ प्रतिपादित—प्रमाणित प्रतिपाद्य—जिसे प्रमाणित किया जाय प्रतिभात—प्रभावयुक्त, ज्ञात प्रतीयमान—जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति हो रही हो प्रत्यगात्मा—जीवात्मा प्रत्यवाय—दोष प्रत्याहार—निरोध, रोकना प्रत्युपकार—भलाईके बदलेमें की हुई भलाई प्रदत्त—दिया हुआ प्रधान—मायाकी एक वृत्ति प्रधानतः—मुख्यरूपसे प्रपत्ति—शरणागति प्रभूत—अत्यधिक प्रभृति—जैसा प्रयोजनीयता—आवश्यकता प्रयोजक—प्रयुक्त करनेवाला प्रयोजकत्व—प्रयोजक होनेका भाव प्रवर—श्रेष्ठ प्रवर्त्तक—किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ करनेवाला प्रवृत्ति—मनका किसी विषयकी ओर झुकाव, प्रभाव प्रशस्त—प्रशंसाके योग्य प्रशान्तात्मा—शुद्ध या शान्त आत्मा प्रशामक—शान्त करनेवाला प्राकृत—प्रकृति-सम्बन्धी प्राक्तन—प्राचीन प्रादुर्भूत—आविर्भूत, अवतरित प्रादेशिक वाक्य—प्रसङ्गगत, स्थानीय वाक्य प्रापक—प्राप्त करने या करानेवाला प्रापञ्चिक—जगत् या प्रपञ्च-सम्बन्धी प्राप्य—प्राप्त होने योग्य प्रार्थित—प्रार्थना किया हुआ प्रेमास्पद—प्रेमका स्थल प्रेमोत्कर्ष—प्रेमका उत्कर्ष ब बाहुल्य—अधिकता बाह्य अङ्ग—बाहरी अङ्ग बिद्ध—छेदा हुआ, आहत बृहत्—बड़ा बोधगम्य—समझमें आने योग्य ब्रह्मलय—ब्रह्ममें लय होना ब्रह्मवेत्ता—ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मानन्द—ब्रह्मका आनन्द ब्रह्मानुभूति—ब्रह्मकी अनुभूति भ भक्तानन्दायिनी—भक्तोंको आनन्द देनेवाली भोक्तृत्वभाव—भोक्ता होनेका भाव म मत्सम्बन्धी—मेरे सम्बन्धी मत्सरता—डाह, जलन, द्वेष मथन—मथनेका भाव मधुरिमा—माधुर्य मन्वन्तर—ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग मन्तव्य—विचार, मत मर्मार्थ—सार महत्—बड़ा मायाच्छन्न—मायाके द्वारा आच्छन्न मुकुलित—आधा विकसित मुमुक्षु—मुक्तिकी इच्छा करनेवाला मेधायुक्त—मेधावी मोहान्ध—मोहसे अन्धा म्लेच्छ—चारो वर्णोंसे भी नीच ४८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
यतिगण-व्योम ]
य यतिगण-संन्यासी लोग याग-यज्ञ यादृच्छिक-स्वतन्त्र, ऐच्छिक युक्तियुक्त-उचित, युक्तिपूर्ण युगपत्-एक ही समयमें, साथ-साथ युगावतार-प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार योगमाया-भगवान्की परा शक्ति योगस्थैर्य-योगकी स्थिरता
र रक्तिम-लालिमायुक्त रञ्जित-रंगा हुआ रूक्ष-रूखा, नीरस
ल लिङ्गशरीर-सूक्ष्म शरीर लिप्सा-किसी वस्तुको पानेकी इच्छा लुब्ध-ललचाया हुआ, लोभित लोकपाल-लोकका पालन करनेवाला लोकप्रवर्त्तन-लोगोंके कल्याणके लिये
व वञ्चक-वञ्चना करनेवाला वयस-उम्र वर्चस्व-अधिकार वर्णविशिष्ट-वर्णवाला वर्णसङ्कर-भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न वाक्-वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय वाचाल-अधिक बोलनेवाला वागिन्द्रिय-जिह्वा विक्षिप्त-पागल, उद्विग्न विगुण-गुणहीन
विच्युति-भूल, पतन, वियोग विजितात्मा-जिसने मनको जीत लिया है विज्ञ-पण्डित, जाननेवाला विदित-मालूम विधर्म-धर्मविरुद्ध विधिवादिगण-नैतिक लोग विधेय-करने योग्य विधेयात्मा-जिसकी आत्मा संयत हो विन्यास-व्यवस्थित करना विपर्यय-प्रतिकूलता, विपरीतता विभूति-ऐश्वर्य विरहकातर-विरहसे कातर विरोधाभास-विचारमें विरोध प्रतीत होना विलास-क्रीड़ा विवक्षित-इच्छित, कथित विवृत-स्पष्ट, व्यक्त विशारद-निपुण विशिष्ट-विशेषतायुक्त विशिष्टता-विशेषता विशुद्धचित्त-जिसका चित्त शुद्ध है विशेषत्व-विशेषता विषयणी-विषयसे सम्बन्धित विहित-आदेश किया हुआ वृष्टि-वर्षा वेदज्ञ-वेदोंके जाननेवाला वैषम्य-विषमता व्यङ्गोक्ति-गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग हो व्यतिक्रम-उल्लङ्घन व्यतिरेक-असङ्गति, निषेध व्यवहृत-व्यवहार किया हुआ व्योम-आकाश
शब्दकोश | ४८१
[ शोच्य-स्वानन्द श शोच्य—शोचनीय शैव—शिवके उपासक श्रुत—सुना हुआ श्रोतव्य—सुनने योग्य श्लेषोक्ति—छिपे अर्थवाली बात ष षडैश्वर्यपूर्ण—छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण स सङ्कीर्णता—उदार ना होनेका भाव संवरण—छिपाना संवेदन—अनुभूति संस्पर्श—अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श संहर्त्ता—संहार करनेवाला सङ्गति—मेल सञ्चित—जमा किया हुआ सदातन—विष्णु सद्विवेकी—सद् विवेकवाला समत्वभाव—समताका भाव सन्निविष्ट—उत्तम रूपसे एकाग्र समाहर—समुच्चय, समूह समाहित—संयमित, व्यवस्थित सम्बन्धविशिष्ट—सम्बन्धवाला सम्मत—सहमत, एक मत समन्वित—संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध सम्यक्—भलीभाँति, अच्छी तरह सर्वतन्त्र—समस्त सिद्धान्त सर्वतोभावेन—सम्पूर्ण रूपसे सर्वभूतात्मा—सभी जीवोंके आत्मा अर्थात् परमात्मा सर्वभुक्—सब कुछ खा जानेवाला सर्वात्मकत्व—सर्वात्मकता सहस्र—हजार साम—सामवेद सामर्थ्यविशिष्ट—सामर्थ्यवान् साम्यलक्षण—समानताका लक्षण सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्के साथ एक ही लोकमें वास करना साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर, हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय, वचन और मन) सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला सुदुराचारी—अति दुराचारी सुधा—अमृत सुरस—रसयुक्त सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट सौम्य—सुन्दर, कोमल स्खलित—गिरा हुआ स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा स्फुरण—व्यक्त होना स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी स्थायित्व—स्थिरता स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी स्वच्छन्द—स्वतन्त्र स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण ४८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
हत-हृदगत ] ह हत—मरा हुआ हतभागा—भाग्यहीन हन्त—मारना हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा हेयता—तुच्छता हृदगत—हृदय-सम्बन्धी शब्दकोश | ४८३
४८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः ॥ गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन चौथी पीढ़ीके महापुरुष श्रीरूपानुग अप्राकृत-कविकुलश्रेष्ठ- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् कृष्णदास-कविराज-गोस्वामी-रचित श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला [द्वितीय भाग (अध्याय 8-17)] गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन आठवीं पीढ़ीके पुरुषप्रधान श्रीरूपानुगवर- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् सच्चिदानन्द-भक्तिविनोद-ठाकुर-रचित अमृतप्रवाह-भाष्य, गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन नौवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीरूपानुगश्रेष्ठ- श्रीब्रह्मामाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायके सर्वोत्तम संरक्षक- ॐ विष्णुपाद परमहंसस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-रचित श्रीस्वरूप-रूप-विरोधी समस्त-कुसिद्धान्तोंको निरस्त करनेवाला अनुभाष्य एवं विविध गौड़ीय वैष्णवाचार्योंके लेखों एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके प्रवचनोंसे सङ्कलित 'अमृतानुकणिका' भाष्य, भूमिका, विविध सूची और विवरण आदि-सहित गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन दसवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके प्रतिष्ठाता-आचार्य-भास्कर नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अनुकम्पा-पात्र नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके- आदेश-निर्देशानुसार उनके चरणाश्रितजनोंके द्वारा अनुवादित और सम्पादित प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स
मूल बङ्गला पयार, संस्कृत श्लोक, अमृतप्रवाह भाष्य, अनुभाष्य और अमृतानुकणिका सहित प्रकाशित प्रथम संस्करण — श्रीगौरपूर्णिमा, 23 मार्च, 2016 1000 प्रतियाँ 卐 卐 卐 卐 卐 ग्रन्थ प्राप्ति स्थान श्रीरमणविहारी गौड़ीय मठ बी-3, म्यूज़िकल फॉउन्टेन पार्कके निकट, जनकपुरी, नई दिल्ली 011-25533568 श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ जवाहर हाट, मथुरा (उ.प्र.) 0565-2502334 श्रीरूप-सनातन गौड़ीय मठ दान गली, वृन्दावन (उ.प्र.) +91 9219478001 श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ दसविसा, राधाकुण्ड रोड, गोवर्धन (उ.प्र.) 0565-2815668 श्रीश्रीकेशवजी गौड़ीय मठ कोलेरडाङ्गा लेन, नवद्वीप (प.ब.) +91 9153125442 श्रीराधामाधव गौड़ीय मठ 293, सैक्टर-14, फरीदाबाद (हरियाणा) +91 9911283869 जयश्री दामोदर गौड़ीय मठ चक्रतीर्थ रोड़, जगन्नाथपुरी (ओडीशा) +91 9776238328 श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ डी-5, सैक्टर-55, नौएडा, (उ.प्र.) +91 9910400878 खण्डेलवाल एण्ड सन्स अठखम्बा बाज़ार, वृन्दावन (उ.प्र.) 0565-2443101
विषय-सूची सम्पादक-मण्डली निवेदन 。。。。。 i उद्धृत ग्रन्थ 。。。。。。。。。。 ii - iii अध्याय विवरण 。。。。。。。。。 iv - vi अध्याय 8 ग्रन्थ-रचनार्थ वैष्णव-आज्ञा-कथन 。。。。 3-24 अध्याय 9 भक्तिकल्पवृक्ष वर्णन 。。。。。。。 27-38 अध्याय 10 मूलस्कन्ध-शाखा वर्णन 。。。。。。。 41-94 अध्याय 11 श्रीनित्यानन्दस्कन्ध-शाखा वर्णन 。。。。 97-120 अध्याय 12 श्रीअद्वैतस्कन्ध-शाखा वर्णन 。。。。。 123-144 अध्याय 13 जन्म-महोत्सव वर्णन 。。。。。。。 147-171 अध्याय 14 बाल्यलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 173-188 अध्याय 15 पौगण्डलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 191-198 अध्याय 16 कैशोरलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 201-216 अध्याय 17 यौवनलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 219-269 श्लोक सूची 。。。。。。。。。 271-272 पद्य सूची 。。。。。。。。。 273-297 शब्दकोश 。。。。。。。。。 299-306
प्रकाशन-मण्डली टङ्कण (Typing) श्रीमती ऐश्वर्य दासी श्रीमती प्रज्ञा दासी ध्वन्यात्मक अभिलेखन (Transcription) श्रीमती कुन्दलता दासी चित्र श्रीमान् गुलशन श्रीमान् राधेश्याम अनुवाद, विन्यास, शोधकार्य (Translation, Layout & Research) श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास प्रूफ-संशोधन (Proof Reading) श्रीमती जानकी दासी संस्कृत-हिन्दी अनुवाद श्रीमान् डॉ अच्युतलाल भट्ट (पी०एच०डी०) श्रीमान् गणेशीलाल शर्मा एम०ए० (संस्कृत) प्रकाशक : श्रीपाद रामचन्द्र दास इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स
निवेदन हमारे परमाराध्य गुरुदेव नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजजीकी गौड़ीय वैष्णवाचार्योंकी विविध टीकाओं सहित श्रीचैतन्यचरितामृत हिन्दी भाषामें प्रकाशित करनेकी चिर-अभिलाषा थी। इस कार्यको सम्पादित करनेके लिये उन्होंने प्रकाशन मण्डलीको आज्ञा एवं निज शक्ति प्रदान की थी। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा अनुमोदित गूढ़ तत्त्व-सिद्धान्तों और सर्वोच्च रस-तत्त्वका अनूठा, अद्भुत और चमत्कारी समन्वय इस ग्रन्थमें अति सरल बङ्गला भाषामें करके अपने अप्राकृत कवित्वका परिचय प्रदान किया है। “मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता”, श्रील कविराज गोस्वामीकी लेखनी इस उक्तिका उज्ज्वल उदाहरण है, उन्होंने अति अल्प शब्दोंमें समस्त शास्त्रोंके सारको प्रमाण सहित इस ग्रन्थमें प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थकी भाषा सरल होने पर भी इसमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य समन्वित हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी टीकाओं एवं अनेकानेक लेखोंके द्वारा उन गूढ़ रहस्योंको उद्घाटित किया है। इन टीकाओं और लेखों तथा श्रील गुरुदेवके प्रवचनोंको इस प्रकाशनमें समन्वय करके ग्रन्थके गूढ़ भावोंको सर्वसाधारणके लिये बोधगम्य बनानेका हमारा प्रयास है। श्रील गुरुदेवके अहैतुकी कृपाशीर्वादसे श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीलाका प्रथम भाग गत वर्ष श्रीगौर-पूर्णिमाके दिन उनके करकमलोंमें समर्पित किया गया था। उनके मनोवाञ्छित कार्यको सम्पूर्ण करनेके लिये प्रकाशन मण्डलीके सेवक निरन्तर प्रयासशील हैं और श्रील गुरुदेवकी प्रेरणा एवं निरुपाधिक निरवधि कृपाशक्ति हमें इस महत् कार्यमें सदा उत्साहशील बनाये रखती है। यह अति हर्षका विषय है कि श्रीचैतन्यचरितामृतका द्वितीय भाग भी अब प्रकाशित हो गया है और श्रीगुरुदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी निज वस्तुको उनके ही करकमलोंमें अर्पित करते हुए परमानन्दका अनुभव कर रहे हैं। इस ग्रन्थके प्रकाशनके लिये आत्मीय सहायता एवं प्रेरणाके लिये हम श्रीयुता उमादेवी दासीके आभारी हैं। इस ग्रन्थमें कुछ त्रुटियोंका रह जाना स्वाभाविक है। सुधी पाठकोंके द्वारा उनका संशोधनपूर्वक पाठ करनेसे हम आनन्दित होंगे। प्रकाशन मण्डली इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स (IGVP) i
श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला उत्तरार्द्धमें उद्धृत प्रमाण-ग्रन्थ तालिका एकादशी-तत्त्व—16/58; उद्वाह-तत्त्व—15/27; उज्ज्वलनीलमणि—17/293; केशव-काश्मीरी-श्लोक—16/41; बृहन्नारदीयपुराण—17/21; ब्रह्मवैवर्त्तपुराण—17/164; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/17; भरतमुनि-वाक्य—16/71; भागवत—8/19, 25, 58; 9/42, 43, 46; 13/77; 14/69; 17/76, 78; मलमासतत्त्व—17/164; महाभारत—17/308; ललितमाधव—17/281; श्रीचैतन्यचन्द्रोक्त-श्लोक—16/82; 17/31; सामुद्र—14/15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका पुरुषसूक्त—17/18; बृहद्व्याकरण—13/29; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/58; योगवाशिष्ठ—17/65; रामाष्टक—17/69; लघु-व्याकरण—13/29; सामुद्रिक ग्रन्थ—13/120 ॥ अनुभाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका अथर्ववेद-संहिता—14/19; अद्वैतचरित—12/13-18, 27; अभिज्ञान-शकुन्तल—16/101; उत्तरचरित—16/101; एकादशी-तत्त्व—17/265, 266; कुमारसम्भव—16/101; कूर्मपुराण—17/78; कृष्णगणोद्देशदीपिका—12/83; कौस्तुभप्रभा—16/25; गीतगोविन्द या अष्टपदी—13/42; गौतमीय-तन्त्र—17/293; गौरगणोद्देशदीपिका—8/41, 59-60, 66; 9/14, 10/8, 14-17, 21-25, 29, 31-38, 40, 53, 56, 61-63, 67-68, 70-71, 73, 75-78, 80, 84-85, 91, 106-115, 119-120, 130-131, 134-136, 139, 143, 153; 11/13, 21, 23-26, 29, 31-33, 37-39, 41-42, 44-45, 51, 53-54; 12/13-18, 57-59, 65, 79-81, 83-87; 13/56, 60-61, 74; 14/68; 15/29; 17/296, 300-301; चण्डीदास-गीतिग्रन्थ—13/42; चैतन्यचन्द्रामृत—13/123; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक—13/89; 17/55; चैतन्य-चरित महाकाव्य—10/49, 62, 136; 14/62-68; 17/55; चैतन्यभागवत—9/11, 14; 10/30-32, 34-37, 41, 43-47, 49, 53, 58, 64, 67-73, 75-77, 113, 115, 126, 131, 135; 11/20, 23, 26, 28, 29, 31, 33-39, 41-47; 12/13-17, 40-42; 13/28, 29, 67-71; 14/19, 21-23, 25, 37-40, 73; 15/7, 23, 31; 17/7-12, 17-20, 23, 31, 37, 55, 64-65, 69-71, 79-86, 99-100, 103-114, 116, 124, 138-142, 228-230, 241-243, 262, 274, 278; चैतन्यमङ्गल (श्रीलोचनदास)—14/46; 17/69, 89, 95, 119; छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्कर-टीका)—17/78; तत्त्व-सन्दर्भ—10/105; नरोत्तमदास ठाकुरकी प्रार्थना—13/123; दशम-टिप्पणी (वैष्णवतोषणी)—17/78; नरोत्तमविलास—12/13-17; नित्यानन्दायिनी पत्रिका—12/13-17; पद्मपुराण—8/16; प्रेमतरङ्गिणी—12/58; भक्तिरत्नाकर—10/78, 84, 85, 91, 105; 11/13, 25; 12/58; 16/25; 17/55; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/16; 14/90; ii
16/11; भक्तिसन्दर्भ—15/9-10; भागवत—12/70; 13/86, 100, 123, 124; 14/73, 88; 16/11; 17/77-78, 117, 201, 257, 312, 331; भावार्थ-दीपिका—13/80-86, 104; 17/57; भोगनिर्णय-पद्धति—12/83; महाभारत—15/27; मालती-माधव—16/101; मेघदूत—16/101; योगवाशिष्ट रामायण—12/40; रघुवंश—16/101; लघुभागवतामृत—13/86; विद्यापतिके गीतिग्रन्थ—13/42; वीरचरित—16/101; वृहज्जातकादि ग्रन्थ—13/90; वेदान्तकौस्तुभ (श्रीनिवासाचार्य)—16/25; वेदान्तदर्शनका परिजात-भाष्य—16/25; वैष्णव-तोषणी—17/77-78; वैष्णव-मञ्जुषा—10/17, 53; 12/18, 27; 13/42; 16/25; वैष्णव-वन्दना—11/29, 40; शाखानिर्णयामृत—12/13-17, 58, 62, 79-87; श्वेताश्वतरोपनिषद्—17/257; साधन-दीपिका—12/58; सीताद्वैतचरित—12/13-17; स्कन्दपुराण—15/9 हरिभक्तिविलास—10/105; 12/27; होराशास्त्र—13/90 ॥
अमृतानुक्रमणिकामें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका
अग्निपुराण—15/9-10; उज्ज्वलनीलमणि (आनन्दलोचनीटीका)—10/85; कर्णानन्द—10/85; गौरगणोद्देश-दीपिका—15/28; 16/25; गीता—9/39; चैतन्यभागवत—9/10; 10/14, 19, 32, 40; 12/40-42; 14/61; 16/20-21; 17/7; नारदपुराण—15/9-10, 24; पद्मपुराण—15/9-10, 24; बृहन्नारदीयपुराण—15/9-10; ब्रह्मवैवर्तपुराण—15/24; ब्रह्मसंहिता—10/85; भक्तिरत्नाकर—9/10; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/18, 57; भविष्यपुराण—15/9-10; भागवत—8/12; 17/155-158; मत्स्यपुराण—15/9-10; मनुसंहिता—12/49-53; विष्णोधर्मोत्तर—15/9-10, 24; स्कन्दपुराण—8/24; 15/24; स्मृतिवाक्य—15/9-10; हरिभक्तिविलास—12/49-53; 15/9-10, 24 ॥
साङ्केतिक चिह्नोंकी सूची
अन्त्य — अन्त्यलीला आदि — आदिलीला उःनीः — उज्ज्वलनीलमणि कठः — कठोपनिषद छाः — छान्दोग्योपनिषद तैः — तैत्तिरयोपनिषद नाःपःराः — नारदपञ्चरात्र ब्रःसः — ब्रह्मसंहिता बृःआः — बृहदारण्यकोपनिषद मध्य — मध्यलीला मःभाः — महाभारत भःरःसिः — भक्तिरसामृतसिन्धु भाः — भागवत विःपुः — विष्णुपुराण श्वेः — श्वेताश्वतरोपनिषद हःभःविः —हरिभक्तिविलास
iii
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (उत्तरार्द्ध) अध्याय-विवरण आठवाँ अध्याय— 3-24 पञ्चतत्त्वका माहात्म्य न मानकर पृथक् बुद्धिसे श्रीगौर अथवा श्रीकृष्णकी पूजा घोर अपराध, श्रीकृष्णभक्तिके बिना श्रीगौरभक्ति और श्रीगौरभक्तिके बिना श्रीकृष्णभक्ति 'अभक्ति' अथवा 'आसुरवृत्ति'; श्रीचैतन्य दयाकी चमत्कारिता; अपराधयुक्त होनेपर असंख्य बार श्रीकृष्णका श्रवण-कीर्तन वृथा, श्रीकृष्ण भुक्ति-मुक्ति देकर जीवकी वञ्चना करके 'भक्ति' नहीं देते, श्रीकृष्णके साथ रस सम्बन्ध न होनेसे केवल मुक्ति ही लाभ; महाप्रभुकी महापापीके भी प्रति प्रेम-भक्ति प्रदान लीला, श्रीगौर-निताइ सेवासे ही श्रीकृष्ण-प्रेमोदय, श्रीकृष्ण नामापराधोंका विचार करते हैं, श्रीगौर-निताईके नामोंमें अपराधका विचार नहीं है, श्रीचैतन्यभागवतके श्रवणसे श्रीगौर-निताईकी महिमा और श्रीकृष्णभक्ति-सिद्धान्तके विषयमें ज्ञान; श्रीवृन्दावनदास ठाकुरकी महिमाका कीर्तन, श्रीपण्डित हरिदास, वैष्णवोंके पचास सद्गुण, श्रीकृष्णराज गोस्वामीके द्वारा श्रीचैतन्यचरितामृतके वर्णनका रहस्य। नौवाँ अध्याय— 27-38 महाप्रभु द्वारा माली बननेका धर्म ग्रहण और नवद्वीपमें भक्तिके फलोंके उद्यानकी रचना, भक्तिकल्पवृक्ष, श्रीमाधवेन्द्रपुरी कल्पवृक्षके प्रथम अङ्कुर, अचिन्त्य शक्तिके बलसे माली होकर भी महाप्रभु स्वयं स्कन्ध एवं सभी शाखाओंके आश्रय, परमानन्दपुरी और केशव भारती-प्रमुख नौ संन्यासी वृक्षके नौ मूल, परमानन्दपुरी मध्यमूल, श्रीअद्वैत और श्रीनित्यानन्द-दो स्कन्ध, स्कन्धकी बहुतसी शाखाएँ और उपशाखाएँ, प्रेमफल, प्रेमफलास्वादन, प्रेमफल वितरण, जीवोंका नित्य-मङ्गल विधान ही परोपकार, श्रीकृष्णप्रेम अर्पण द्वारा जीवोंको अपने अनुरूप महाभागवत बनाना तथा निन्दकोंका भी श्रीकृष्णप्रेम प्राप्तिसे उद्धार। दसवाँ अध्याय— 41-94 मूल स्कन्ध शाखा अर्थात् महाप्रभुकी निजशाखाका वर्णन, श्रीगौरभक्तोंमें गुरु-लघु-भेद शून्यता; 'प्रभुपादोपाधान' शङ्कर पण्डित, वासुदेव ठाकुरकी परदुःख-कातरता, नामाचार्य हरिदास ठाकुर और उनके शिष्य सत्यराज खाँ आदि कुलीन-ग्रामवासी, कुछ भी शुल्क न लेनेवाले देहरोग-भवरोग चिकित्सक मुरारिगुप्तका आत्मवृत्तिके द्वारा कुटुम्ब भरण-पोषण, महाप्रभुका 'साक्षात्', 'आवेश' और 'आविर्भाव'-इन तीन रूपोंमें अवतीर्ण होकर कृपा, नकुल ब्रह्मचारीकी देहमें महाप्रभुका आवेश, 'नकुल ब्रह्मचारी' अथवा 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' तथा महाप्रभु प्रदत्त 'नृसिंहानन्द' एक ही व्यक्तिके नाम, कुलीन-ग्रामवासियोंका माहात्म्य; श्रीरूप-सनातन-शाखाके विस्तारसे समस्त भारतका उद्धार-१) भक्त-आचार-प्रवर्तन, २) लुप्ततीर्थ उद्धार और ३) श्रीमूर्तिकी पूजाका प्रचार; श्रीस्वरूप दामोदरके अन्तर्धान होनेपर 'स्वरूपके रघुका' श्रीरूप-सनातनके चरणोंके दर्शन और महाप्रभु-स्वरूप दामोदरके विरहसे कातर होकर गोवर्धनसे कूदकर देह त्यागका सङ्कल्प लेकर वृन्दावन आगमन, श्रीरूप-सनातनके द्वारा तृतीय भाईके रूपमें रघुनाथ दास गोस्वामीको अपने समीप रखना, दास गोस्वामीके दैनिक कृत्य, रघुनाथभट्ट गोस्वामीका विवरण। iv
ग्यारहवाँ अध्याय— 97-120 श्रीनित्यानन्दस्कन्ध-शाखा अर्थात् नित्यानन्दगणोंका वर्णन। बारहवाँ अध्याय— 123-144 श्रीअद्वैतस्कन्ध-शाखा अर्थात् श्रीअद्वैतगणोंका वर्णन, श्रीअद्वैतगण पहले एकमत, बादमें दो मत-आचार्यके अनुगत और उनसे स्वतन्त्र, श्रीअच्युतानन्दानुग 'सारग्राही' एवं अन्य सब 'असार', सारग्राही-सहित सभीकी गणना करनेके बाद असारग्राहियोंका त्याग, श्रीचैतन्य महाप्रभु चौदह भुवनोंके गुरु, बाउलिया विश्वास, बाउल अथवा मायावादमतका खण्डन, महाप्रभुके द्वारा वैष्णव आचार्यके कर्त्तव्यका निर्णय, असार गणोंका श्रीगौरकृपाके अभावके कारण पतन, श्रीगौरकृष्ण-भक्त यमके गुरु और श्रीगौरकृष्ण-विमुख यमके दण्डके योग्य, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीकी उपशाखाएँ, शाखा-स्मरणसे भवबन्धनका विमोचन। तेरहवाँ अध्याय— 147-171 महाप्रभुकी आदिलालाका सूत्र, गृहस्थ-लीला ही आदि-लीला एवं संन्यास-लीला ही मध्य और अन्त्य लीला, मुरारिगुप्तके द्वारा आदिलाला और स्वरूप गोस्वामीके द्वारा मध्य और अन्त्य लीलाका सूत्र-ग्रन्थन, आदिलालाके चार भाग; आदि, मध्य और अन्त्य लीलाका संक्षेपमें विवरण, पहले गुरुवर्गोंको अवतरित कराना, बादमें स्वयं अवतरण, श्रीअद्वैतकी भक्तिपूर्ण व्याख्या, श्रीकृष्णोवतार हेतु प्रतिज्ञा, विश्वरूप-जन्म, विश्वरूप-तत्त्व, श्रीगौराविर्भाव, नीलाम्बर-चक्रवर्त्तीकी गणना, आर्याओं (कुलीन स्त्रियों) का विविध उपहारों सहित श्रीगौर-दर्शन हेतु आगमन, सर्वत्र आनन्द-कोलाहल। चौदहवाँ अध्याय— 173-188 महाप्रभुकी बाल्यलीलाओंका वर्णन और माता-पिताको चरणचिह्न-प्रदर्शन, महापुरुषोंके बत्तीस लक्षण, नीलाम्बर चक्रवर्त्तीकी भविष्यवाणी, नामकरण—'विश्वम्भर' नाम, घुटनोंके बल चलना, रोनेके छलसे नाम-प्रचार, पैरोंके बल चलना, मिट्टी खानेके छलसे माताको ज्ञान प्रदान, अतिथि-ब्राह्मणके प्रति कृपा, चोरोंको दिशा-भ्रम कराना, रोगके बहानेसे एकादशीके दिन हिरण्य-जगदीशके नैवेद्यको खाना, बाल-चपलता, माताकी मूर्च्छा और नारियल लाना, गंगाके तटपर कन्याओंके साथ परिहास, लक्ष्मीदेवीकी पूजा ग्रहण और वर प्रदान, उच्छिष्ट हाँडीके ऊपर बैठना तथा माताको ब्रह्मज्ञान-उपदेश, खाली पैरोंमें ही नूपुर ध्वनि, मिश्रका शुद्ध वात्सल्य, कलम पकड़ना। पन्द्रहवाँ अध्याय— 191-198 महाप्रभुकी पौगण्ड लीलाका वर्णन-गङ्गादास पण्डितके स्थानपर व्याकरण-अध्ययन, माताको एकादशीके दिन अन्न न खाने हेतु अनुरोध, विश्वरूपका संन्यास, महाप्रभुकी मूर्च्छा और विश्वरूपके साथ वार्त्तालापरूपी कहानी, जगन्नाथ मिश्रका अप्रकट होना, लक्ष्मीदेवीके पाणिग्रहणकी लीला। सोलहवाँ अध्याय— 201-216 महाप्रभुकी कैशोर लीलाका वर्णन-अध्यापन, पण्डित विजय, जाह्नवी (गङ्गा) में जलकेलि, पूर्वबङ्गाल-गमन, वहाँ विद्याका विचार और नामसङ्कीर्त्तन, तपनमिश्रके साथ मिलन, उनको साध्य-साधन उपदेश और वाराणसी जाने हेतु आदेश प्रदान, महाप्रभुकी विरहमें लक्ष्मीदेवीकी वैकुण्ठ-प्राप्ति, महाप्रभुका घर लौटना, माताको सान्त्वना देना, विष्णुप्रियाके साथ विवाह, दिग्विजयी-जय, दिग्विजयीके द्वारा कहे गये श्लोकके दोष और गुणोंका विचार, दिग्विजयीका सरस्वतीके निकट श्रीगौरतत्त्व-विषयक ज्ञान प्राप्त करना एवं महाप्रभुका चरणाश्रय। v