श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२१० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २ जून, १८८३
हैं - कर वसूल करने पर ही अग्निसंस्कार करने देंगे। कितने ही शव जल रहे हैं, कितने जलकर भस्मीभूत हो गए हैं। घोर अँधेरी रात में श्मशान कितना भयावना दिखायी दे रहा है! शैब्या उस स्थान पर आकर विलाप करने लगी।”
उस करुण क्रन्दन को सुनकर, ऐसा कौन है जो व्याकुल न हो, जिसका हृदय विदीर्ण न हो? सभी श्रोतागण रो पड़े।
श्रीरामकृष्ण क्या कर रहे हैं? वे स्थिर होकर कथा सुन रहे हैं - बिलकुल स्थिर हैं! केवल एक बार आँख के कोने में एक बूँद आँसू छलक उठा पर आपने उसे पोंछ डाला। आपने अधीर होकर रुदन क्यों नहीं किया?
अन्त में रोहिताश्व को जीवनदान, सब लोगों का विश्वेश्वरदर्शन और हरिश्चन्द्र का पुनः राज्यलाभ वर्णन कर कथक महोदय ने कथा समाप्त की। श्रीरामकृष्ण बहुत समय तक वेदी के सम्मुख बैठकर कथा सुनते रहे। कथा समाप्त होने पर बाहर के कमरे में जाकर बैठे। चारों ओर भक्तमण्डली बैठी है, कथक भी पास आकर बैठ गये। श्रीरामकृष्ण कथक से बोले, “कुछ उद्धवसंवाद कहो।”
मुक्ति और भक्ति – गोपीप्रेम
कथक कहने लगे, “जब उद्धव वृन्दावन आए, गोपियाँ और ग्वालबाल उनके दर्शन के लिए व्याकुल हो दौड़कर उनके पास गए। सभी पूछने लगे, 'श्रीकृष्ण कैसे हैं? क्या वे हम लोगों को भूल गए? क्या वे कभी हम लोगों का स्मरण करते हैं?' यह कहकर कोई रोने लगा, कोई उन्हें साथ ले वृन्दावन के अनेक स्थानों को दिखलाने और कहने लगा, 'इस स्थान में श्रीकृष्ण ने गोवर्धन धारण किया था; यहाँ पर धेनुकासुर और वहाँ पर शकटासुर का वध किया था; इस मैदान में गौओं को चराते थे; इसी यमुना के तट पर वे विहार करते थे; यहाँ पर ग्वालबालों सहित क्रीड़ा करते थे; इस कुंज में गोपियों के साथ वार्तालाप करते थे।' उद्धव बोले, 'आप लोग कृष्ण के लिए इतने व्याकुल क्यों हो रहे हैं? वे तो सर्वभूतों में व्याप्त हैं। वे साक्षात् नारायण हैं! उनके सिवाय और कुछ नहीं है।' गोपियों ने कहा, 'हम यह सब नहीं समझ सकतीं। लिखना पढ़ना हमें नहीं मालूम। हम तो केवल अपने वृन्दावनविहारी कृष्ण को जानती हैं, जो यहाँ बहुत-कुछ लीला कर गए हैं।' उद्धव फिर बोले, 'वे साक्षात् नारायण हैं, उनकी चिन्ता करने से पुनः संसार में नहीं आना पड़ता, जीव मुक्त हो जाता है।' गोपियों ने कहा, 'हम मुक्ति आदि - ये सब बातें नहीं समझतीं। हम तो अपने प्राणवल्लभ कृष्ण को देखना चाहती हैं।'”
श्रीरामकृष्णदेव यह सब ध्यान से सुनते रहे और भाव में मग्न हो बोले, “गोपियों का कहना सत्य है।” यह कहकर वे अपने मधुर कण्ठ से गाने लगे। गाने का आशय यह है :-
२ जून, १८८३ | परिच्छेद ३५ | २११
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“मैं मुक्ति देने में कातर नहीं होता, पर शुद्धा भक्ति देने में कातर होता हूँ। जो शुद्धा भक्ति प्राप्त कर लेते हैं वे सब से आगे हैं। वे पूज्य होकर त्रिलोकजयी होते हैं। सुनो चन्द्रावलि, भक्ति की बात करता हूँ – मुक्ति तो मिलती है, पर भक्ति कहाँ मिलती है? भक्ति के कारण मैं पाताल में बलिराजा का द्वारपाल होकर रहता हूँ। शुद्धा भक्ति एक वृन्दावन में है जिसे गोप-गोपियों के सिवाय दूसरा कोई नहीं जानता। भक्ति के कारण मैं नन्द के भवन में उन्हें पिता जानकर उनके जूते सिर पर ले चलता हूँ।”
श्रीरामकृष्ण (कथक के प्रति) – गोपियों की भक्ति थी प्रेमाभक्ति – अव्यभिचारिणी भक्ति – निष्ठा-भक्ति। व्यभिचारिणी भक्ति किसे कहते हैं, जानते हो? ज्ञानमिश्रित भक्ति। जैसे कृष्ण ही सब हुए हैं – वे ही परब्रह्म हैं, वे ही राम, वे ही शिव, वे ही शक्ति हैं। पर प्रेमाभक्ति में उस ज्ञान का संयोग नहीं है। द्वारका में आकर हनुमान ने कहा, ‘सीताराम के दर्शन करूँगा।’ भगवान् रुक्मिणी से बोले, ‘तुम सीता बनकर बैठो, अन्यथा हनुमान से रक्षा नहीं है।’ पाण्डवों ने जब राजसूय यज्ञ किया, उस समय देश देश के नरेश युधिष्ठिर को सिंहासन पर बिठाकर प्रणाम करने लगे। विभीषण बोले, ‘मैं एक नारायण को प्रणाम करूँगा, और दूसरे को नहीं!’ यह सुनते ही भगवान् स्वयं भूमिष्ठ होकर युधिष्ठिर को प्रणाम करने लगे। तब विभीषण ने राजमुकुट धारण किए हुए भी युधिष्ठिर को साष्टांग प्रणाम किया।
“किस प्रकार, जानते हो? – जैसे घर की बहू अपने देवर, जेठ, ससुर और स्वामी सब की सेवा करती है। पैर धोने के लिए जल देती है, अँगोछा देती है, पौढ़ा रख देती है, परन्तु दूसरी तरह का सम्बन्ध एकमात्र स्वामी ही के साथ रहता है।
“इस प्रेमाभक्ति में दो चीजें हैं। ‘अहंता’ और ‘ममता’। यशोदा सोचती थीं, ‘गोपाल को मैं न देखूँगी तो और कौन देखेगा? मेरे देखभाल न करने पर उसे रोग-व्याधि हो सकती है।’ यशोदा नहीं जानती थीं कि कृष्ण स्वयं भगवान् हैं। और ‘ममता’ – ‘मेरा कृष्ण, मेरा गोपाल’। उद्धव बोले, ‘माँ, तुम्हारे कृष्ण साक्षात् नारायण हैं, वे संसार के चिन्तामणि हैं। वे सामान्य वस्तु नहीं हैं।’ यशोदा कहने लगीं, ‘अरे तुम्हारे चिन्तामणि कौन! मेरा गोपाल कैसा है, मैं पूछती हूँ। चिन्तामणि नहीं, मेरा गोपाल।’
“गोपियों की निष्ठा कैसी थी! मथुरा में द्वारपाल से अनुनयविनय कर वे सभा में आयीं। द्वारपाल उन लोगों को कृष्ण के पास ले गया। कृष्ण को देख गोपियाँ मुख नीचा कर परस्पर कहने लगीं, ‘यह पगड़ी बाँधे राजवेश में कौन है? इसके साथ वार्तालाप कर क्या अन्त में हम द्विचारिणी बनेंगी? हमारे मोहन मोरमुकुट-पीताम्बरधारी प्राणवल्लभ कहाँ हैं?’ देखते हो इन लोगों की निष्ठा कैसी है! वृन्दावन का भाव ही दूसरा है। सुना है, द्वारका की तरफ लोग पार्थसखा श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं – वे राधा को नहीं चाहते!”
२१२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जून, १८८३
गोपियों की निष्ठा-ज्ञानभक्ति और प्रेमाभक्ति
भक्त – कौन श्रेष्ठ है, ज्ञानमिश्रित भक्ति या प्रेमाभक्ति?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर के प्रति एकान्त अनुराग हुए बिना प्रेमाभक्ति का उदय नहीं होता। और ‘ममत्व’-ज्ञान अर्थात् भगवान् मेरे अपने हैं, यह ज्ञान। तीन मित्र जंगल में जा रहे थे, सहसा एक बाघ सामने आ खड़ा हुआ! एक आदमी बोला, ‘भाई, हम सब आज मरे।’ दूसरा आदमी बोला, ‘क्यों, मरेंगे क्यों? आओ, ईश्वर का स्मरण करें।’ तीसरा आदमी बोला, ‘नहीं, ईश्वर को कष्ट देकर क्या होगा? आओ, इसी पेड़ पर चढ़कर बैठें।’
“जिस आदमी ने कहा, ‘हम लोग मरे’ वह नहीं जानता था कि ईश्वर रक्षा करनेवाले हैं। जिसने कहा, ‘आओ, ईश्वर का स्मरण करें’ वह ज्ञानी था, वह जानता था कि ईश्वर सृष्टि, स्थिति, प्रलय के मूल कारण हैं। और जिसने कहा, ‘भगवान् को कष्ट देकर क्या होगा, आओ, पेड़ पर चढ़ बैठें’, उसके भीतर प्रेम उत्पन्न हुआ था – स्नेह-ममत्व का भाव आया था। तो प्रेम का स्वभाव ही यह है कि प्रेमी अपने को बड़ा समझता है और प्रेमास्पद को छोटा। वह देखता है, कहीं उसे कोई कष्ट न हो। उसकी यही इच्छा होती है कि जिससे प्रेम करें उसके पैर में एक काँटा भी न चुभे।”
श्रीरामकृष्णदेव तथा भक्तों को ऊपर ले जाकर अनेक प्रकार के मिष्टान्न आदि से रामबाबू ने उनकी सेवा की। भक्तों ने बड़े आनन्द से प्रसाद पाया।
परिच्छेद ३६
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परिच्छेद ३६
दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ
(१)
मनुष्य में ईश्वरदर्शन। नरेन्द्र से प्रथम भेंट
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में अपने कमरे में बैठे हैं। भक्तगण उनके दर्शन के लिए आ रहे हैं। आज ज्येष्ठ मास की कृष्णा चतुर्दशी, सावित्री-चतुर्दशी व्रत का दिन है। सोमवार, ४ जून, १८८३ ई.। आज रात को अमावस्या तिथि में फलहारिणी कालीपूजा होगी।
मास्टर कल रविवार से आए हैं। कल रात को कात्यायनीपूजा हुई थी। श्रीरामकृष्ण प्रेमाविष्ट हो नाट-मन्दिर में माता के सामने खड़े हो गाते हुए कह रहे थे, “माता, तुम्हीं ब्रज की कात्यायनी हो। तुम्हीं स्वर्ग हो, तुम्हीं मर्त्य हो, तुम्हीं पाताल भी हो। तुम्हीं से हरि, ब्रह्मा और द्वादश गोपाल पैदा हुए हैं। दशमहाविद्याएँ और दशावतार भी तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं। अब की बार तुम्हें किसी प्रकार मुझे पार करना होगा।”
श्रीरामकृष्ण गा रहे थे और माँ से बातें कर रहे थे। प्रेम से बिलकुल मतवाले हो गए थे। मन्दिर से वे अपने कमरे में आकर तख्त पर बैठे।
रात के दूसरे पहर तक माँ का नामकीर्तन होता रहा।
सोमवार को सबेरे के समय बलराम और कुछ दूसरे भक्त आए। फलहारिणी कालीपूजा के उपलक्ष्य में त्रैलोक्यबाबू आदि भी सपरिवार आए हैं। सबेरे नौ बजे का समय है। श्रीरामकृष्णदेव प्रसन्नमुख, गंगा की ओर के गोल बरामदे में बैठे हैं। पास ही मास्टर बैठे हैं। राखाल लेटे हैं। आनन्द में श्रीरामकृष्ण ने राखाल का मस्तक अपनी गोद में उठा लिया है। आज कुछ दिनों से आप राखाल को साक्षात् गोपाल के रूप में देखते हैं।
त्रैलोक्य सामने से माँ काली के दर्शन को जा रहे हैं। साथ में नौकर उनके सिर पर छाता लगाये जा रहा है। श्रीरामकृष्ण राखाल से बोले, 'उठ रे, उठ'।
श्रीरामकृष्ण बैठे हैं। त्रैलोक्य ने आकर प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण (त्रैलोक्य से) – कल 'यात्रा' नहीं हुई?
त्रैलोक्य – जी नहीं, अब की बार 'यात्रा' की वैसी सुविधा नहीं हुई।
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२१४ । श्रीरामकृष्णवचनामृत । ४ जून, १८८३
श्रीरामकृष्ण — तो इस बार जो हुआ सो हुआ। देखना, जिससे फिर ऐसा न होने पाए। जैसा नियम है वैसा ही हमेशा होना अच्छा है।
त्रैलोक्य यथोचित उत्तर देकर चले गए। कुछ देर बाद विष्णुमन्दिर के पुरोहित राम चटर्जी आए।
श्रीरामकृष्ण — राम, मैंने त्रैलोक्य से कहा, इस साल 'यात्रा' नहीं हुई, देखना जिससे आगे ऐसा न हो। तो क्या यह कहना ठीक हुआ?
राम — महाराज, उससे क्या हुआ! अच्छा ही तो कहा। जैसा नियम है उसी प्रकार हमेशा होना चाहिए।
श्रीरामकृष्ण (बलराम से) — अजी, आज तुम यहीं भोजन करो।
भोजन के कुछ पहले श्रीरामकृष्णदेव अपनी अवस्था के सम्बन्ध में भक्तों को बहुत बातें बताने लगे। राखाल, बलराम, मास्टर, रामलाल तथा और दो-एक भक्त बैठे थे।
श्रीरामकृष्ण — हाजरा मुझे उपदेश देता है कि तुम इन लड़कों के लिए इतनी चिन्ता क्यों करते हो! गाड़ी में बैठकर बलराम के मकान पर जा रहा था, उसी समय मन में बड़ी चिन्ता हुई। कहने लगा, 'माँ, हाजरा कहता है, नरेन्द्र आदि बालकों के लिए मैं इतनी चिन्ता क्यों करता हूँ; वह कहता है, ईश्वर की चिन्ता त्यागकर इन लड़कों की चिन्ता आप क्यों करते हैं?' मेरे यह कहते कहते अचानक माँ ने दिखलाया कि वे ही मनुष्य रूप में लीला करती हैं। शुद्ध आधार में उनका प्रकाश स्पष्ट होता है। इस दर्शन के बाद जब समाधि कुछ टूटी तो हाजरा के ऊपर बड़ा क्रोध हुआ। कहा, साले मेरा मन खराब कर दिया था। फिर सोचा, उस बेचारे का अपराध ही क्या है; वह यह कैसे जान सकता है?
"मैं इन लोगों को साक्षात् नारायण जानता हूँ। नरेन्द्र के साथ पहले भेंट हुई। देखा, देहबुद्धि नहीं है। जरा छाती को स्पर्श करते ही उसका बाह्य-ज्ञान लोप हो गया। होश आने पर कहने लगा, 'आपने यह क्या किया! मेरे तो माता-पिता हैं।' यदु मल्लिक के मकान में भी ऐसा ही हुआ था। क्रमशः उसे देखने के लिए व्याकुलता बढ़ने लगी, प्राण छटपटाने लगे। तब भोलानाथ* से कहा, 'क्यों जी, मेरा मन ऐसा क्यों होता है? नरेन्द्र नाम का एक कायस्थ लड़का है, उसके लिए ऐसा क्यों होता है?' भोलानाथ बोले, 'इस सम्बन्ध में महाभारत में लिखा है कि समाधिवान् पुरुष का मन जब नीचे उतरता है, तब सतोगुणी लोगों के साथ विलास करता है। सतोगुणी मनुष्य देखने से उसका मन शान्त होता है।' — यह बात सुनकर मेरे चित्त को शान्ति मिली। बीच बीच में नरेन्द्र को देखने के लिए मैं बैठा बैठा रोया करता था।"
* भोलानाथ मुखर्जी ठाकुरवाड़ी के मुन्शी थे, बाद में खजांची हुए थे।
४ जून, १८८३ | परिच्छेद ३६ | २१५
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(२)
श्रीरामकृष्ण का प्रेमोन्माद और रूपदर्शन
श्रीरामकृष्ण – ओह, कैसी अवस्था बीत गयी है! पहले जब ऐसी अवस्था हुई थी तो रातदिन कैसे बीत जाते थे, कह नहीं सकता। सब कहने लगे थे, पागल हो गया; इसीलिए इन लोगों ने शादी कर दी। उन्माद अवस्था थी। पहले स्त्री के बारे में चिन्ता हुई, बाद में सोचा कि वह भी इसी प्रकार रहेगी, खाएगी, पिएगी। ससुराल गया, वहाँ भी खूब संकीर्तन हुआ। नफर, दिगम्बर बनर्जी के पिता आदि सब लोग आये। खूब संकीर्तन होता था। कभी कभी सोचता था, क्या होगा। फिर कहता था, माँ, गाँव के जमींदार यदि मानें तो समझूँगा यह अवस्था सत्य है। और सचमुच वे भी आप ही आने लगे और बातचीत करने लगे।
पूर्वकथा – सुन्दरीपूजा – और कुमारीपूजा, रामलीला – दर्शन
“कैसी अवस्था बीत गयी है! किंचित् ही कारण से एकदम भगवान् की उद्दीपना होती थी। मैंने सुन्दरी-पूजा की। चौदह वर्ष की लड़की थी। देखा साक्षात् माँ जगदम्बा! रुपये देकर मैंने प्रणाम किया।
“रामलीला देखने के लिए गया तो सीता, राम, लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण, सभी को साक्षात् प्रत्यक्ष देखा। तब जो जो बने थे उनकी पूजा करने लगा।
“कुमारी कन्याओ को बुलाकर उनकी पूजा करता – देखता साक्षात् माँ जगदम्बा।
“एक दिन बकुलवृक्ष के तले देखा, नीला वस्त्र पहने हुए एक स्त्री खड़ी है। वह वेश्या थी, पर मेरे मन में एकदम सीता की उद्दीपना हो गयी। उस स्त्री को बिलकुल भूल गया और देखा साक्षात् सीतादेवी लंका से उद्धार पाकर राम के पास जा रही हैं। बहुत देर तक बाह्य-संज्ञाहीन हो समाधि-अवस्था में रहा।
“और एक दिन कलकत्ते में किले के मैदान में घूमने के लिए गया था। उस दिन ‘बलून’ (गुब्बारा) उड़नेवाला था। बहुतसे लोगों की भीड़ थी। अचानक एक अंग्रेज बालक की ओर दृष्टि गयी, वह पेड़ के सहारे त्रिभंग होकर खड़ा था। देखते ही श्रीकृष्ण की उद्दीपना हो समाधि हो गयी।
“शिऊड़ गाँव में चरवाहों को भोजन कराया। सब के हाथ में मैंने जलपान की सामग्री दी। देखा, साक्षात् व्रज के ग्वालबाल! उनसे जलपान लेकर मैं भी खाने लगा।
“प्रायः होश न रहता था। मथुरबाबू ने मुझे ले जाकर जानबाजार के मकान में कुछ दिन रखा। मैं देखने लगा, साक्षात् माँ की दासी हो गया हूँ। घर की औरतें बिलकुल शरमाती नहीं थीं, जैसे छोटे छोटे बच्चों को देख कोई भी स्त्री लज्जा नहीं करती। रात को बाबू की कन्या को जमाई के पास पहुँचाने जाता।
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"अब भी थोड़ी ही में उद्दीपना हो जाती है। राखाल जप करते समय ओठ हिलाता था। मैं उसे देखकर स्थिर नहीं रह सकता था, एकदम ईश्वर की उद्दीपना होती और विह्वल हो जाता।"
श्रीरामकृष्ण अपने प्रकृति-भाव की और भी कथाएँ कहने लगे। बोले, "मैंने एक कीर्तनिया को स्त्री-कीर्तनिया के ढंग दिखलाए थे। उसने कहा, 'आप बिलकुल ठीक कहते हैं। आपने यह सब कैसे सीखा?'" यह कहकर आप स्त्री-कीर्तनिया के ढंग का अनुकरण कर दिखलाने लगे। कोई भी अपनी हँसी न रोक सका।
(३)
श्रीरामकृष्ण 'अहेतुक कृपासिन्धु'
भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम कर रहे हैं। गाढ़ी नींद नहीं, तन्द्रा-सी है। श्री मणिलाल मल्लिक ने आकर प्रणाम किया और आसन ग्रहण किया। श्रीरामकृष्ण अब भी लेटे हैं। मणिलाल बीच बीच में बातें करते हैं। श्रीरामकृष्ण अर्धनिद्रित अर्धजाग्रत अवस्था में हैं, वे किसी किसी बात का उत्तर दे देते हैं।
मणिलाल – शिवनाथ नित्यगोपाल की प्रशंसा करते हैं। कहते हैं, उनकी अच्छी अवस्था है।
श्रीरामकृष्ण अभी पूरी तरह से नहीं जागे। वे पूछते हैं, "हाजरा को वे लोग क्या कहते हैं?"
श्रीरामकृष्ण उठ बैठे। मणिलाल से भवनाथ की भक्ति के बारे में कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अहा, उसका भाव कैसा सुन्दर है! गाना गाते आँखें आँसुओ से भर जाती हैं। हरीश को देखते ही उसे भाव हो गया। कहता है, ये लोग अच्छे हैं। हरीश घर छोड़ यहाँ कभी कभी रहता है न, इसीलिए।
मास्टर से प्रश्न कर रहे हैं, "अच्छा, भक्ति का कारण क्या है? भवनाथ आदि बालकों की उद्दीपना क्यों होती है?" मास्टर चुप हैं।
श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि बाहर से देखने में सभी मनुष्य एक ही तरह के होते हैं। पर किसी किसी में खोए का पूर भरा होता है। पकवान के भीतर उरद का पूर भी हो सकता है और खोए का भी, पर देखने में दोनों एक-से हैं। भगवान् को जानने की इच्छा, उन पर प्रेम और भक्ति, इसी का नाम खोए का पूर है।
अब आप भक्तों को अभय देते हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – कोई सोचता है कि मुझे ज्ञानभक्ति न होगी, मैं शायद बद्धजीव हूँ। श्रीगुरु की कृपा होने पर कोई भय नहीं है। बकरियों के एक झुण्ड में बाघिन कूद पड़ी थी। कूदते समय बाघिन को बच्चा पैदा हो गया। बाघिन तो मर गयी, पर वह
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बच्चा बकरियों के साथ पलने लगा। बकरियाँ घास खातीं तो वह भी घास खाता। बकरियाँ ‘में में’ करतीं तो वह भी करता। धीरे धीरे वह बच्चा बड़ा हो गया। एक दिन इन बकरियों के झुण्ड पर एक दूसरा बाघ झपटा। वह उस घास खानेवाले बाघ को देखकर आश्चर्य में पड़ गया। दौड़कर उसने उसे पकड़ा तो वह ‘में में’ कर चिल्लाने लगा। उसे घसीटकर वह जल के पास ले गया और बोला, ‘देख, जल में तू अपना मुँह देख। देख, मेरे ही समान तू भी है; और ले यह थोड़ासा माँस है, इसे खा ले।’ यह कहकर वह उसे बलपूर्वक खिलाने लगा। पर वह किसी तरह खाने को राजी न हुआ, ‘में में’ चिल्लाता ही रहा। अन्त में रक्त का स्वाद पाकर वह खाने लगा। तब उस नये बाघ ने कहा, ‘अब तूने समझा कि जो मैं हूँ वही तू भी है। अब आ, मेरे साथ जंगल को चल।’
“इसीलिए गुरु की कृपा होने पर फिर कोई भय नहीं। वे बतला देंगे, तुम कौन हो, तुम्हारा स्वरूप क्या है।
“थोड़ा साधन करने पर गुरु सब बातें साफ साफ समझा देते हैं। तब मनुष्य स्वयं समझ सकता है, क्या सत् है, क्या असत्। ईश्वर ही सत्य और यह संसार अनित्य है।”
कपट साधना भी बुरी नहीं
“एक धीवर किसी दूसरे के बाग में रात के समय चुराकर मछलियाँ पकड़ रहा था। मालिक को इसकी टोह लग गयी और दूसरे लोगों की सहायता से उसने उसे घेर लिया। मशाल जलाकर वे चोर को खोजने लगे। इधर वह धीवर शरीर में कुछ भस्म लगाए, एक पेड़ के नीचे साधु बनकर बैठ गया। उन लोगों ने बहुत ढूँढ़-तलाश की, पर केवल भभूत रमाए एक ध्यानमग्न साधु के सिवाय और किसी को न पाया। दूसरे दिन गाँव भर में खबर फैल गयी कि अमुक के बाग में एक बड़े महात्मा आए हैं। फिर क्या था, सब लोग फल, फूल, मिठाई आदि लेकर साधु के दर्शन को आए। बहुतसे रुपये-पैसे भी साधु के सामने पड़ने लगे। धीवर ने विचारा, आश्चर्य की बात है कि मैं सच्चा साधु नहीं हूँ, फिर भी मेरे ऊपर लोगों की इतनी भक्ति है! इसलिए यदि मैं हृदय से साधु हो जाऊँ तो अवश्य ही भगवान् मुझे मिलेंगे, इसमें सन्देह नहीं।
“कपट साधना से ही उसे इतना ज्ञान हुआ, सत्य साधना होने पर तो कोई बात ही नहीं। क्या सत्य है, क्या असत्य—साधना करने से तुम समझ सकोगे। ईश्वर ही सत्य हैं और सारा संसार अनित्य।”
एक भक्त चिन्ता कर रहे हैं, क्या संसार अनित्य है? धीवर तो संसार त्यागकर चला गया। फिर जो संसार में हैं उनका क्या होगा? उन लोगों को भी क्या त्याग करना होगा? श्रीरामकृष्ण अहेतुक कृपासिन्धु हैं, तत्काल कहते हैं, “यदि किसी आफिस के कर्मचारी को जेल जाना पड़े तो वह जेल में सजा काटेगा सही, पर जब जेल से मुक्त हो
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जाएगा, तब क्या वह रास्ते में नाचता फिरेगा? वह फिर किसी आफिस की नौकरी ढूँढ़ लेगा, वही पुराना काम करता रहेगा। इसी तरह गुरु की कृपा से ज्ञानलाभ होने पर मनुष्य संसार में भी जीवन्मुक्त होकर रह सकता है।”
यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने सांसारिक मनुष्यों को अभय प्रदान किया।
(४)
श्रीरामकृष्ण और निराकारवाद। विश्वास ही सब कुछ है।
मणिलाल (श्रीरामकृष्ण से) – उपासना के समय उनका ध्यान किस जगह करेंगे?
श्रीरामकृष्ण – हृदय तो खूब प्रसिद्ध स्थान है। वहीं उनका ध्यान करना।
मणिलाल निराकारवादी ब्राह्म हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें लक्ष्य कर कहते हैं, “कबीर कहते थे –
'निर्गुण तो है पिता हमारा और सगुण महतारी।
काकों निन्दौ काकों बन्दौ दोनों पल्ले भारी।।'
“हलधारी दिन में साकार भाव में और रात को निराकार भाव में रहता था। बात यह है कि चाहे जिस भाव का आश्रय करो, विश्वास पक्का होना चाहिए। चाहे साकार में विश्वास करो चाहे निराकार में, परन्तु वह ठीक ठीक होना चाहिए।
“शम्भु मल्लिक बागबाजार से पैदल अपने बाग में आया करते थे। किसी ने कहा था, 'इतनी दूर है, गाड़ी से क्यों नहीं आते? रास्ते में कोई विपत्ति हो सकती है।' उस समय शम्भु ने नाराज होकर कहा था, 'क्या मैं भगवान् का नाम लेकर निकला हूँ, फिर मुझे विपत्ति'?
“विश्वास से ही सब कुछ होता है। मैं कहता था यदि अमुक से भेंट हो जाय या यदि अमुक खजांची मेरे साथ बात करे तो समझूँ कि मेरी यह अवस्था सत्य है। परन्तु जो मन में आता, वही हो जाता था।”
मास्टर ने अंग्रेजी का न्यायशास्त्र पढ़ा था। उसमें लिखा है कि सबेरे के स्वप्न का सत्य होना लोगों के कुसंस्कार की ही उपज है। इसलिए उन्होंने पूछा, “अच्छा, कभी ऐसा भी हुआ है कि कोई घटना नहीं हुई?”
श्रीरामकृष्ण – “नहीं, उस समय सब हो जाता था। ईश्वर का नाम लेकर जो विश्वास करता था, वही हो जाता था। (मणिलाल से) पर इसमें एक बात है। सरल और उदार हुए बिना यह विश्वास नहीं होता। जिसके शरीर की हड्डियाँ दिखायी देती हैं, जिसकी आँखें छोटी और घुसी हुई हैं, जो ऐंचाताना है, उसे सहज में विश्वास नहीं होता। इसी प्रकार और भी कई लक्षण हैं।”
४ जून, १८८३ | परिच्छेद ३६ | २१९
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श्रीरामकृष्ण और सतीत्त्व धर्म
शाम हो गयी। दासी कमरे में धूनी दे गयी। मणिलाल आदि के चले जाने के बाद दो एक भक्त अभी बैठे हैं। कमरा शान्त और धूने से सुवासित है। श्रीरामकृष्ण अपने छोटे तख्त पर बैठे हुए जगन्माता का चिंतन कर रहे हैं। मास्टर और राखाल जमीन पर बैठे हैं।
थोड़ी देर बाद मथुरबाबू के घर की दासी भगवती ने आकर दूर से श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। आपने उसे बैठने के लिए कहा। भगवती बाबू की बहुत पुरानी दासी है। बहुत साल से बाबू के यहाँ रह रही है। श्रीरामकृष्ण उसे बहुत दिनों से जानते हैं। पहले पहल उसका स्वभाव अच्छा न था; पर श्रीरामकृष्ण दया के सागर, पतितपावन हैं, इसीलिए उससे पुरानी बातें कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अब तो तेरी उम्र बहुत हुई है। जो रुपये कमाए हैं उनसे साधु-वैष्णवों को खिलाती है या नहीं?
भगवती (मुसकराकर) – यह भला कैसे कहूँ?
श्रीरामकृष्ण – काशी, वृन्दावन यह सब तो हो आयी?
भगवती (थोड़ा सकुचाती हुई) – कैसे बतलाऊँ? एक घाट बनवा दिया है उसमें पत्थर पर मेरा नाम लिखा है।
श्रीरामकृष्ण – ऐसी बात!
भगवती – हाँ, नाम लिखा है, 'श्रीमती भगवती दासी।'
श्रीरामकृष्ण (मुसकराकर) – बहुत अच्छा।
भगवती ने साहस पाकर श्रीरामकृष्ण के चरण छूकर प्रणाम किया।
बिच्छू के काटने से जैसे कोई चौंक उठता है और अस्थिर हो खड़ा हो जाता है, वैसे ही श्रीरामकृष्ण अधीर हो, 'गोविन्द' 'गोविन्द' उच्चारण करते हुए खड़े हो गए। कमरे के कोने में गंगाजल का एक मटका था – और अब भी है – हाँफते हाँफते, मानो घबराए हुए, उसी के पास गए और पैर के जिस स्थान को दासी ने छुआ था, उसे गंगाजल से धोने लगे।
दो-एक भक्त जो कमरे में थे, स्तब्ध और चकित हो एकटक यह दृश्य देख रहे हैं। दासी जीवन्मृत की तरह बैठी है। दयासिन्धु पतितपावन श्रीरामकृष्ण ने दासी से करुणा से सने हुए स्वर में कहा, "तुम लोग ऐसे ही प्रणाम करना।" यह कहकर फिर आसन पर बैठकर दासी को बहलाने की चेष्टा करते रहे। उन्होंने कहा, "कुछ गाते हैं, सुन।" यह कहकर उसे गाना सुनाने लगे। –
(१) (भावार्थ) – "मेरा मनमधुप श्यामापद-नीलकमल में मस्त हो गया। कामादि पुष्पों में जितने विषय-मधु थे सब तुच्छ हो गए। ..."
| २२० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ४ जून, १८८३ |
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(२) (भावार्थ) – “श्यामा माँ के चरणरूपी आकाश में मन की पतंग उड़ रही थी। कलुष की कुवायु से वह चक्कर खाकर गिर पड़ी। ...”
(३) (भावार्थ) – “मन! अपने आप में रहो। किसी दूसरे के घर न जाओ। जो कुछ चाहोगे वह बैठे हुए ही पाओगे, अपने अन्तःपुर में जरा खोजो तो सही! ...”
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</div>परिच्छेद ३७
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परिच्छेद ३७
श्रीरामकृष्ण का प्रथम प्रेमोन्माद
(१)
पूर्वकथा – देवेन्द्र ठाकुर, दीन मुखर्जी और कुँवरसिंह
आज अमावस्या, मंगलवार का दिन है, ५ जून १८८३ ई.। श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर में हैं। भक्त-समागम रविवार को विशेष होता है; आज अधिक लोग नहीं है। राखाल श्रीरामकृष्ण के पास रहते हैं। हाजरा भी हैं, श्रीरामकृष्ण के कमरे के सामने वाले बरामदे में अपना आसन लगाया है। मास्टर पिछले रविवार से यहाँ हैं।
कल सोमवार रात को कालीमन्दिर में कृष्णलीला पर नाटक हुआ था। श्रीरामकृष्ण ने कुछ देर तक देखा था। वैसे यह नाटक रविवार को होनेवाला था, पर उस दिन न हो पाया इसलिए कल सोमवार को हुआ।
दोपहर को भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण अपने प्रेमोन्माद की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – कैसी हालत बीत चुकी है! यहाँ भोजन न करता था, वराहनगर या दक्षिणेश्वर या आरियादह में किसी ब्राह्मण के घर चला जाता, और जाता भी देर में था। जाकर बैठ जाता था, पर बोलता कुछ नहीं। घर के लोग पूछते तो केवल कहता, ‘मैं यहाँ खाऊँगा।’ और कोई बात नहीं करता। आलमबाजार में राम चटर्जी के यहाँ जाता। कभी दक्षिणेश्वर में सावर्ण चौधरी के मकान पर जाता। उनके यहाँ खाया तो करता था, पर अच्छा नहीं लगता था; उसमें कैसी गन्ध आती थी!
“एक दिन हठ कर बैठा, देवेन्द्रनाथ ठाकुर के घर जाऊँगा। मथुरबाबू से कहा, ‘देवेन्द्र ईश्वर का नाम लेते हैं, उनको देखना चाहता हूँ, मुझे ले चलोगे?’ मथुरबाबू को अपनी मान-मर्यादा का बड़ा अभिमान था, वे अपनी गरज से किसी के मकान पर क्यों जाने लगे? आगापीछा करने लगे। बाद में बोले, ‘अच्छा, देवेन्द्र और हम एक साथ पढ़ चुके हैं, चलिए, आपको ले चलेंगे।’
“एक दिन सुना कि दीन मुखर्जी नाम का एक भला आदमी बागबाजार के पुल के पास रहता है। भक्त है। मथुरबाबू को पकड़ा, दीन मुखर्जी के यहाँ जाऊँगा। मथुरबाबू क्या
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करते, गाड़ी पर मुझे ले गए। छोटासा मकान और इधर एक बड़ी भारी गाड़ी पर एक बड़ा आदमी आया है; वह भी शरमा गयाऔर हम भी। फिर उसके लड़के का जनेऊ होनेवाला था। कहाँ बैठाए! हम लोग बाजू के कमरे में जाने लगे तो वह बोल उठा, 'वहाँ न जाइए, उस कमरे में औरतें हैं।' बड़ा असमंजस था। मथुरबाबू लौटते समय बोले, 'बाबा, तुम्हारी बात अब कभी न मानूँगा।' मैं हँसने लगा।
“कैसी अनोखी अवस्था थी! कुँवरसिंह ने साधुओ को भोजन कराना चाहा, मुझे भी न्योता दिया। जाकर देखा बहुतसे साधु आए हैं। मेरे बैठने पर साधुओ में से कोई कोई मेरा परिचय पूछने लगे – 'आप गिरी हैं या पुरी?' पर ज्योंही उन्होंने पूछा त्योंही मैं अलग जाकर बैठा। सोचा कि इतनी खबर काहे की? बाद को ज्योंही पत्तल बिछाकर भोजन के लिए बैठाया, किसी के कुछ कहने के पहले ही मैंने खाना शुरू कर दिया। साधुओं में से किसी किसी को कहते सुना, 'अरे यह क्या!'
(२)
साधु और अवतार में अन्तर
पाँच बजे हैं। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे के बरामदे की सीढ़ी पर बैठे हैं। राखाल, हाजरा और मास्टर पास बैठे हैं।
हाजरा का भाव है – 'सोऽहं – मैं ही ब्रह्म हूँ।'
श्रीरामकृष्ण (हाजरा से) – हाँ, यह सोचने से सब गड़बड़ मिट जाती है, – वे ही आस्तिक हैं, वे ही नास्तिक; वे ही भले हैं, वे ही बुरे; वे ही नित्यवस्तु हैं, वे ही अनित्य जगत्; जागृति और निद्रा उन्हीं की अवस्थाएँ हैं; फिर वे ही इन सारी अवस्थाओं से परे भी हैं।
“एक किसान को बुढ़ापे में एक लड़का हुआ था। लड़के को वह बहुत यत्न से पालता था। धीरे धीरे लड़का बड़ा हुआ। एक दिन जब किसान खेत में काम कर रहा था, किसी ने आकर उसे खबर दी कि तुम्हारा लड़का बहुत बीमार है – अब-तब हो रहा है। उसने घर में आकर देखा, लड़का मर गया है। स्त्री खूब रो रही है; पर किसान की आँखों में आँसू तक नहीं। उसकी स्त्री अपनी पड़ोसिनों के पास इसलिए और भी शोक करनें लगी कि ऐसा लड़का चला गया, पर इनकी आँखों में आँसू का नाम नहीं! बड़ी देर बाद किसान ने अपनी स्त्री को पुकारकर कहा, 'मैं क्यों नहीं रोता, जानती हो? मैंने कल स्वप्न में देखा कि राजा हो गया हूँ और सात लड़कों का बाप बना हूँ। स्वप्न में ही देखा कि वे लड़के रूप और गुण में अच्छे हैं। क्रमशः वे बड़े हुए और विद्या तथा धर्म उपार्जन करने लगे। इतने में ही नींद खुल गयी। अब सोच रहा हूँ कि तुम्हारे इस एक लड़के के लिए रोऊँ या अपने उन सात लड़कों के लिए?' ज्ञानियों के मत से स्वप्न की अवस्था जैसी सत्य है,
५ जून, १८८३ परिच्छेद ३७ २२३
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जाग्रत् अवस्था भी वैसी ही सत्य है।
“ईश्वर ही कर्ता हैं, उन्हीं की इच्छा से सब कुछ हो रहा है।”
हाजरा – पर यह समझना बड़ा कठिन है। भू-कैलास के साधु को कितना कष्ट दिया गया, जो एक तरह से उनकी मृत्यु का कारण हुआ। वे समाधि की हालत में मिले थे। होश में लाने के लिए लोगों ने उन्हें कभी जमीन में गाड़ा, कभी जल में डुबोया और कभी उनका शरीर दाग दिया। इस तरह उन्हें चैतन्य कराया। इन यन्त्रणाओं के कारण उनका शरीर छूट गया। लोगों ने उन्हें कष्ट भी दिया और इधर ईश्वर की इच्छा से उनकी मृत्यु भी हुई।
श्रीरामकृष्ण – जिसका जैसा कर्म है, उसका फल वह पाएगा। किन्तु ईश्वर की इच्छा से उन साधु का शरीर-त्याग हुआ। वैद्य बोतल के अन्दर मकरध्वज तैयार करते हैं। उसके चारों ओर मिट्टी लीपकर वे उसे आग में रख देते हैं। बोतल के अन्दर का सोना आग की गर्मी से और कई चीजों के साथ मिलकर मकरध्वज बन जाता है। तब वैद्य बोतल को उठाकर उसे धीरे धीरे तोड़ता है और उससे मकरध्वज निकालकर रख लेता है। उस समय बोतल रहे चाहे नष्ट हो जाए, उससे क्या? उसी तरह लोग सोचते हैं कि साधु मार डाले गए, पर शायद उनकी चीज बन चुकी होगी। भगवान् का लाभ होने के बाद शरीर रहे भी तो क्या, और जाय तो भी क्या?
“भू-कैलास के वे साधु समाधिस्थ थे। समाधि अनेक प्रकार की होती है। हृषीकेश के साधु के कथन से मेरी अवस्था मिल गयी थी। कभी शरीर में चींटी की तरह वायु चलती हुई जान पड़ती है; कभी बड़े वेग के साथ, जैसे बन्दर एक डाल से दूसरी डाल पर कूदते हैं; कभी मछली की तरह गति होती है। जिसको हो वही जान सकता है। जगत् का ख्याल जाता रहता है। मन के कुछ उतरने पर मैं कहता हूँ, 'माँ, मुझे अच्छा कर दो, मैं बातें करना चाहता हूँ।'
“ईश्वरकोटि जैसे अवतार आदि, न होने पर कोई समाधि से नहीं लौट सकता। जीवकोटि के कोई कोई साधना के बल से समाधिस्थ होते तो हैं; पर वे फिर नहीं लौटते। जब ईश्वर स्वयं मनुष्य होकर आते हैं, अवतार रूप में आते हैं और जीवों की मुक्ति की चाबी उनके हाथ में रहती है, तब वे समाधि के बाद लौटते हैं – लोगों के कल्याण के लिए।”
मास्टर (मन ही मन) – क्या श्रीरामकृष्ण के हाथ में जीवों की मुक्ति की चाबी है?
हाजरा – ईश्वर को सन्तुष्ट करने से सब कुछ हुआ। अवतार हों या न हों।
श्रीरामकृष्ण (हँसकर) – हाँ, हाँ। विष्णुपुर में रजिस्ट्री का बड़ा दफ्तर है, वहाँ रजिस्ट्री हो जाने पर फिर 'गोघाट' में कोई बखेड़ा नहीं होता।
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गुरुशिष्य-संवाद
शाम हुई। मन्दिर में आरती हो रही है। बारह शिवमन्दिरों तथा श्रीराधाकान्त के और माता भवतारिणी के मन्दिर में शंख घण्टा आदि मंगल-वाद्य बज रहे हैं। आरती समाप्त होने के कुछ समय बाद श्रीरामकृष्ण अपने कमरे से दक्षिण के बरामदे में आ बैठे। चारों ओर घना अन्धकार है, केवल मन्दिर में स्थान स्थान पर दीपक जल रहे हैं। गंगाजी के वक्ष पर आकाश की काली छाया पड़ी है। आज अमावस्या है। श्रीरामकृष्ण सहज ही भावमय हैं, आज भाव और भी गम्भीर हो रहा है। बीच बीच में प्रणव उच्चारण कर रहे हैं और देवी का नाम ले रहे हैं। गर्मी का मौसम है, कमरे के भीतर गर्मी बहुत है। इसलिए बरामदे में आए हैं। किसी भक्त ने एक कीमती चटाई दी है। वही बरामदे में बिछायी गयी है। श्रीरामकृष्ण को सर्वदा माँ का ध्यान लगा रहता है। लेटे हुए आप मणि से धीरे धीरे बातें कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – देखो, ईश्वर के दर्शन होते हैं। अमुक को दर्शन मिले हैं, परन्तु किसी से कहना मत। तुम्हें ईश्वर का रूप पसन्द है या निराकार-चिन्ता?
मणि – इस समय तो निराकार-चिन्ता कुछ अच्छी लगती है, पर यह भी कुछ कुछ समझ में आया है कि वे ही साकार हो इन अनेक रूपों में विराजते हैं।
श्रीरामकृष्ण – देखो, मुझे गाड़ी पर बेलघरिया में मोती शील की झील को ले चलोगे? वहाँ चारा फेंक दो, मछलियाँ आकर उसे खाने लगेंगी। अहा! मछलियों को खेलती हुई देखकर क्या आनन्द होता है, तुम्हें उद्दीपना होगी कि मानो सच्चिदानन्दरूपी सागर में आत्मारूपी मछली खेल रही है। उसी तरह लम्बे-चौड़े मैदान में खड़े होने से ईश्वरीय भाव आ जाता है, जैसे किसी हण्डी में रखी हुई मछली तालाब को पहुँच गयी हो।
“उनके दर्शन के लिए साधना चाहिए। मुझे कठोर साधनाएँ करनी पड़ीं। बिल्ववृक्ष के नीचे तरह तरह की साधनाएँ कर चुका। वृक्ष के नीचे पड़ा रहता था, – यह कहते हुए कि माँ, दर्शन दो। रोते रोते आँसुओं की झड़ी लग जाती थी।
मणि – जब आप ही इतनी साधनाएँ कर चुके तब दूसरे लोग क्या एक ही क्षण में सब कर लेंगे? मकान के चारों ओर उँगली फेर देने ही से क्या दीवाल बन जाएगी?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – अमृत कहता है, एक आदमी के आग जलाने पर दस आदमी उसके ताप से लाभ उठाते हैं। एक बात और है, – नित्य को पहुँचकर लीला में रहना अच्छा है।
मणि – आपने तो कहा है कि लीला विलास के लिए है।
श्रीरामकृष्ण – नहीं, लीला भी सत्य है। और देखो, जब यहाँ आओगे तब अपने साथ थोड़ा कुछ लेते आना। खुद नहीं कहना चाहिए, इससे अभिमान होता है। अधर सेन से भी कहता हूँ, एक पैसे का कुछ लेकर आना। भवनाथ से कहता हूँ कि एक पैसे का
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पान लाना। भवनाथ की भक्ति कैसी है, देखी है तुमने? भवनाथ और नरेन्द्र मानो स्त्री और पुरुष हैं। भवनाथ नरेन्द्र का अनुगत हैं। नरेन्द्र को गाड़ी पर ले आना। कुछ खाने की चीज लाना। इससे बहुत भला होता है।
ज्ञानपथ और नास्तिकता
“ज्ञान और भक्ति – दोनों ही मार्ग हैं। भक्तिमार्ग में आचार कुछ अधिक पालन करना पड़ता है। ज्ञानमार्ग में यदि कोई अनाचार भी करे तो वह मिट जाता है। खूब आग जलाकर एक केले का पेड़ भी झोंक दो, वह भी भस्म हो जाता है।
“ज्ञानी का मार्ग विचारमार्ग है। विचार करते करते कभी कभी नास्तिकपन भी आ सकता है। पर भगवान् को जानने के लिए भक्त की यदि हार्दिक इच्छा हो, तो नास्तिकता आने पर भी वह ईश्वरचिन्तन नहीं त्यागता। जिसके बाप-दादे किसानी करते आ रहे हैं, अतिवृष्टि और अनावृष्टि के कारण किसी साल फसल न होने पर भी वह खेती करता ही रहता है।”
श्रीरामकृष्ण लेटे लेटे बातें कर रहे हैं। बीच में मणि से बोले, “मेरा पैर थोड़ा दर्द कर रहा है, जरा हाथ फेर दो।”
अहेतुक कृपासिन्धु गुरुदेव के कमलचरणों की सेवा करते हुए, मणि उनके श्रीमुख से वे अपूर्व तत्त्व सुन रहे हैं।
परिच्छेद ३८
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दक्षिणेश्वर मन्दिर में
श्रीरामकृष्ण की समाधि। भक्तों के द्वारा श्रीचरण-पूजा
श्रीरामकृष्ण आज सन्ध्या-आरती के बाद दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में देवी की प्रतिमा के सम्मुख खड़े होकर दर्शन करते और चमर लेकर कुछ देर डुलाते रहे।
ग्रीष्म ऋतु है। ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया तिथि है। शुक्रवार, ८ जून १८८३ ई.। आज शाम को राम, केदार चटर्जी और तारक श्रीरामकृष्ण के लिए फूल और मिठाई लिये कलकत्ते से गाड़ी पर आये हैं।
केदार की उम्र कोई पचीस वर्ष की होगी। बड़े भक्त हैं। ईश्वर की चर्चा सुनते ही उनके नेत्र अश्रुपूर्ण हो जाते हैं। पहले ब्राह्मसमाज में आते-जाते थे। फिर कर्ताभजा, नवरसिक आदि अनेक सम्प्रदायों से मिलकर अन्त में उन्होंने श्रीरामकृष्ण के चरणों में शरण ली है। सरकारी नौकरी में हिसाबनवीस का काम करते हैं। उनका घर काँचड़ापाड़ा के निकट हालीशहर गाँव में है।
तारक की उम्र चौबीस वर्ष की होगी। विवाह के कुछ दिन बाद उनके स्त्री की मृत्यु हो गयी। उनका मकान बारासात गाँव में है। उनके पिता एक उच्च कोटि के साधक थे, श्रीरामकृष्ण के दर्शन उन्होंने अनेक बार किये थे। तारक की माता की मृत्यु होने पर उनके पिता ने अपना दूसरा विवाह कर लिया था।
तारक राम के मकान पर सर्वदा आते-जाते रहते हैं। उनके और नित्यगोपाल के साथ वे प्रायः श्रीरामकृष्णदेव के दर्शन करने के लिए आते हैं। इस समय भी किसी आफिस में काम करते हैं। परन्तु सर्वदा विरक्ति का भाव है।
श्रीरामकृष्ण ने कालीमन्दिर से निकलकर चबूतरे पर भूमिष्ठ हो माता को प्रणाम किया। उन्होंने देखा राम, मास्टर, केदार तारक आदि भक्त वहाँ खड़े हैं।
तारक को देखकर आप बड़े प्रसन्न हुए और उनकी ठुड्डी छूकर प्यार करने लगे।
अब श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर अपने कमरे में जमीन पर बैठे हैं। उनके दोनों पैर फैले हैं। राम और केदार ने उन चरणकमलों को पुष्पमालाओं से शोभित किया है। श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हैं।
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केदार का भाव नवरसिक समाज का है। वे श्रीरामकृष्ण के चरणों के अँगूठों को पकड़े हुए हैं। उनकी धारणा है कि इससे शक्ति का संचार होगा। श्रीरामकृष्ण कुछ प्रकृतिस्थ हो कह रहे हैं, “माँ! अँगूठों को पकड़कर वह मेरा क्या कर सकेगा?”
केदार विनीत भाव से हाथ जोड़े बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण (केदार से भावावेश में) – कामिनी और कांचन पर तुम्हारा मन खिंचता है। मुँह से कहने से क्या होगा कि मेरा मन उधर नहीं है!
“आगे बढ़ चलो। चन्दन की लकड़ी के आगे और भी बहुतकुछ हैं, – चाँदी की खान – सोने की खान – फिर हीरे और माणिक। थोड़ीसी उद्दीपना हुई है, इससे यह मत सोचो कि सब कुछ हो गया।”
श्रीरामकृष्ण फिर अपनी माता से बातें कर रहे हैं। कहते हैं, “माँ! इसे हटा दो।”
केदार का कण्ठ सूख गया है। भयभीत हो राम से कहते हैं, “ये यह क्या कह रहे हैं?
राखाल को देखकर श्रीरामकृष्ण फिर भावाविष्ट हो रहे हैं। उन्हें पुकारकर कहते हैं, “मैं यहाँ बहुत दिनों से आया हूँ। तू कब आया?”
क्या श्रीरामकृष्ण इशारे से कहते हैं कि वे भगवान् के अवतार हैं और राखाल उनके एक अन्तरंग पार्षद?
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परिच्छेद ३९
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मणिरामपुर तथा बेलघर के भक्तों के साथ
(१)
श्रीमुख-कथित चरितामृत
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर के अपने कमरे में कभी खड़े होकर, कभी बैठकर भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। आज रविवार, १० जून १८८३ ई., ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी है। दिन के दस बजे का समय होगा। राखाल, मास्टर, लाटू, किशोरी, रामलाल, हाजरा आदि अनेक व्यक्ति उपस्थित हैं।
श्रीरामकृष्ण स्वयं अपने चरित्र का वर्णन कर अपनी पूर्वकथा सुना रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – उस देश में बचपन में मुझे स्त्री-पुरुष सभी चाहते थे। सभी मेरा गाना सुनते थे। फिर मैं लोगों की नकल उतार सकता था – लोग मेरा नकल उतारना देखते और सुनते थे। उनके घर की बहू-बेटियाँ मेरे लिए खाने की चीजें रख देती थीं। कोई मुझ पर अविश्वास न करता था। सभी घर के लड़के जैसा मानते थे।
“परन्तु मैं सुख पर लट्टू था। अच्छा सुखी घर देखकर आया-जाया करता था। जिस घर पर दुःख-विपत्ति देखता था, वहाँ से भाग जाता था।
“लड़कों में किसी को भला देखने पर उससे प्रेम करता था। और किसी किसी के साथ गहरी मित्रता जोड़ता था। परन्तु अब वे घोर संसारी बन गए हैं। अब उनमें से कोई कोई यहाँ पर आते हैं, आकर कहते हैं, ‘वाह खूब! पाठशाला में भी जैसा देखा, यहाँ पर भी वैसा ही देख रहे हैं।’
“पाठशाला में हिसाब देखकर सिर चकराता था, परन्तु चित्र अच्छा खींच सकता था और अच्छी मूर्तियाँ गढ़ सकता था।
“जहाँ भी सदावर्त, धर्मशाला देखता था वहीं पर जाता था – जाकर बहुत देर तक खड़ा देखता रहता था।
“कहीं पर रामायण या भागवत की कथा होने पर बैठकर सुनता था, परन्तु यदि कोई मुँह-हाथ बनाकर पढ़ता, तो उसकी नकल उतारता था और लोगों को सुनाता था।
“औरतों का चालचलन खूब समझ सकता था। उनकी बातें, स्वर आदि की नकल
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उतारता था।
“बदचलन औरतों को पहचान सकता था। विधवा है - पर सिर पर सीधी माँग है और बड़ी लगन से शरीर पर तेल की मालिश कर रही है। लज्जा कम, बैठने का ढंग ही दूसरा है।
“रहने दो विषयी लोगों की बातें!”
रामलाल को गाना गाने के लिए कह रहे हैं। रामलाल गा रहे हैं -
(भावार्थ) - “रणांगण में यह कौन मेघवर्ण नारी नाच रही है? मानो रुधिर-सरोवर में नवीन नलिनी तैर रही हो।”
अब रामलाल रावण-वध के बाद मन्दोदरी के विलाप का गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) - “हे कान्त, अबला के प्राणप्रिय, यह तुमने क्या किया! प्राणों का अन्त हुए बिना तो अब शान्ति नहीं मिलेगी! स्वर्णपुरी के सम्राट् होते हुए भी तुम आज धरती पर लेटे हो - यह देखकर भला तुम्हारी भार्या कैसे धीरज धर सकती है! स्वयं यमराज जहाँ दासत्व करें इतना बड़ा आधिपत्य स्वर्ग, मर्त्य, पाताल में और किसी का देखा गया है? जो इन्द्रादि की भी अधिश्वरी थी, वह तुम्हारी रानी आज संसार में भिखारिन बन गयी! उन नवीन जटाधारी वनविहारी को मनुष्य समझने के कारण तुमने सब कुछ खो डाला। स्वयं ब्रह्मा और ईशान जिनके चरणों की अभिलाषा रखते हैं, उन राम को हे राजा, तुमने माना ही नहीं। तुमने तो सुना था कि उनके चरण-स्पर्श से पाषाण भी नारी बन जाता है।”
आखिर का गाना सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण आँसू बहा रहे हैं और कह रहे हैं - “मैने झाऊतल्ले में शौच जाते समय सुना था, नाव के माँझी नाव में यही गाना गा रहे हैं। वहाँ जब तक बैठा रहा, केवल रो रहा था। लोग पकड़कर मुझे कमरे में लाए थे।”
फिर गाना चलने लगा -
(भावार्थ) - “सुना है राम तारकब्रह्म हैं, जटाधारी राम मनुष्य नहीं हैं। हे पिताजी, क्या वंश का नाश करने के लिए उनकी सीता को चुराया है?”
अक्रूर श्रीकृष्ण को रथ पर बैठाकर मथुरा ले जा रहे हैं। यह देख गोपियों ने रथचक्रों को जकड़कर पकड़ लिया है और उनमें से कोई कोई रथचक्र के सामने लेट गयी हैं। वे अक्रूर पर दोषारोपण कर रही हैं। वे नहीं जानतीं कि श्रीकृष्ण अपनी ही इच्छा से जा रहे हैं।
(भावार्थ) - “रथचक्र को न पकड़ो, न पकड़ो। क्या रथ चक्र से चलता है? जिनके चक्र से जगत् चलता है वे हरि ही इस चक्र के चक्री है।”
श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) - अहा, गोपियों का यह कैसा प्रेम! श्रीमती राधिका ने अपने हाथ से श्रीकृष्ण का चित्र अंकित किया है, परन्तु पैर नहीं बनाया, कहीं वे वृन्दावन से मथुरा न भाग जाएँ!
“मैं इन सब गानों को बचपन में खूब गाता था। एक एक नाटक सारा का सारा गा