सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
६०० सूर्य-सिद्धान्त चाहिए। (१७) ग्रह की युतिकालिक छाया के अग्रविन्दु से शंकु की चोटी तक छाया कर्ण बतलाने वाला एक डोरा सीधा बाँधे। देखने वाले को चाहिये कि अपनी आँख छाया कर्ण के इसी सूत्र पर रखे। (१८) ऐसा करने से ग्रह आकाश में शंकु की चोटी से लगा हुआ देख पड़ेगा। विज्ञान भाष्य—यह साढ़े तीन श्लोक बड़े महत्व के हैं। इनसे यह सिद्ध होता है कि हमारे आचार्य ज्योतिष की सूक्ष्म गणना इसीलिए करते थे कि इससे ग्रहों का प्रत्यक्ष स्थान वही आवे जो वेध से देख पड़ता है क्योंकि जब तक ग्रहों की गणना बिलकुल शुद्ध नहीं होगी तब तक हम उनको इस प्रकार देख ही नहीं सकते जैसा कि इन श्लोकों में बतलाया गया है। इससे एक बात और भी ज्ञात होती है कि हमारे आचार्यों को प्रकाश के परावर्तन का नियम भी ज्ञात था । यहाँ ग्रहों की छाया की गणना करने के लिए त्रिप्रश्नाधिकार में बतलायी हुई रीति के अनुसार युतिकालिक ग्रहों का नतकाल उनके भोगांश, क्रान्ति और चर से पृष्ठ ३३१ में बतलायी गयी रीति के अनुसार जानना चाहिए। नतकाल जान लेने पर पृष्ठ २६२ के समीकरण (ख) और (ग) के अनुसार ग्रहों के नतांश जानना चाहिए। नतांश से पृष्ठ २७३ के समीकरण (ख) के अनुसार दिगंश अथवा अग्रा जानना आवश्यक है। नतांश से छाया जानने के लिए नतांश की स्पर्श-रेखा को शंकु के परिमाण से गुणा कर देना चाहिए। यहाँ १५वें श्लोक के लिए यदि शंकु का परिमाण १२ अंगुल का हो तो कुछ हर्ज नहीं परन्तु १६वें श्लोक के लिए शंकु का परिणाम ४ हाथ का होना चाहिये । ऐसा होने से द्रष्टा खड़ा होकर ग्रहों का बेध सुगमतापूर्वक कर सकता है । १५वें श्लोक का सार चित्र द्वारा इसे प्रकार प्रकट किया जा सकता है :-- द्रष्टा का नेत्र द न रेखा के किसी विन्दु पर होने से दर्पण में ग्रह ग और शंकु की चोटी क एक साथ मिले हुए देख पड़ेंगे । यदि क ख शंकु चार हाथ का हो तो ख द छाया के अग्रविन्दु द से शंकु की चोटी क तक जो सूत्र क द ताना जायगा उस पर किसी जगह द्रष्टा का नेत्र हो तब भी ग्रह ग शंकु की चोटी क से मिला हुआ देख पड़ेगा । यही १६, १७ और १८वें श्लोक के पूर्वार्ध का सार है । यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि आजकल यह वेध तभी ठीक-ठीक आ सकता है जब ग्रह का नतांश दृग्गणित के अनुसार शुद्ध-शुद्ध जाना जाय । इस काम के लिए हमारे सिद्धान्त ग्रन्थों में नवीन बेधों के अनुसार संशोधन करना अत्यन्त आवश्यक है ।
ग्रहयुत्यधिकार ६०१ चित्र १०७ ग = युतकालिक ग्रह का स्थान क ख = समतल भूमि में गड़ा हुआ शंकु द = ख द छाया का अग्रबिन्दु जहाँ दर्पण रखा जायगा न = द्रष्टा का नेत्र इन श्लोकों से यह भी प्रकट होता है कि ज्योतिष-विज्ञान का अध्ययन ग्रन्थों के आधार पर ही नहीं होना चाहिए वरन् वेध भी करना चाहिए । इसलिए सिद्ध है कि ज्योतिष का पठन-पाठन उचित रीति से तभी सम्भव है जब ज्योतिष विद्यालय के साथ अच्छी वेधशाला भी हो । ऐसी वेधशाला में शंकु इत्यादि के स्थान में आजकल के सूक्ष्म यंत्र दूरदर्शक इत्यादि हों तभी वेधों में शुद्धता आ सकती है और सिद्धान्त ग्रन्थों में उचित संशोधन करके उनका जीर्णोद्धार भी हो सकता है । पाँच प्रकार की युतियों के लक्षण— उल्लेखं तारकास्पर्शो भेदे भेदः प्रकीर्तितः ।१८।। आरादंशुविमर्दाख्यमंशुयोगे परस्परम् । अंशादूनेऽपसध्याख्यं युद्धमेकोऽत्र चेदणुः ।।१९।। समागमस्स्यादधिके भवतश्चेद्बलाधिकौ । ११
६०२ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—( १८ ) का उत्तरार्ध--यदि युतिकाल में दोनों ग्रहों के बिम्बों का केवल स्पर्श होता हो तो ऐसी युति को उल्लेख नामक युति कहते हैं। परन्तु यदि एक का बिम्ब दूसरे के विम्ब को भेद करे अर्थात् कुछ ढक ले तो ऐसी युति को भेद नामक युति कहते हैं। (१९) यदि दोनों ग्रहों के बिम्ब तो कुछ दूर हों परन्तु उनकी किरणें मिली हुई देख पड़ें तो ऐसी युति को अंशुविमर्द नामक युद्ध कहते हैं। यदि दोनों ग्रहों के बिम्बों का अन्तर एक-एक अंश से कम हो तो ऐसी युति को अपसव्य युद्ध कहते हैं। इस युद्ध में यदि एक का बिम्ब छोटा हो तो अपसव्य व्यक्त होता है अन्यथा अव्यक्त होता है। ( २० ) यदि दोनों बिम्बों का अन्तर एक अंश से अधिक हो तो ऐसी युति को समागम कहते हैं। यदि दोनों ग्रह बली हों अर्थात् स्थूल हों तो व्यक्त समागम होता है । अन्यथा अव्यक्त समागम होता है । विज्ञान-भाष्य—यहाँ केवल परिभाषा बतलायी गयी है जो स्पष्ट है । इसलिए इस पर कुछ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है । पराजित और विजयी ग्रहों का लक्षण— अपसव्ये जितो युद्धे दूरेऽप्यणुरदीप्तिमान् ॥२०॥ रुक्षो विवर्णो विध्वस्तौ मलिनो दक्षिणाश्रितः । उदक्स्थो दीप्तिमान्स्थूलो जयो याम्येऽपि यो बली ॥२१॥ अनुवाद—(२०) अपसव्य नामक युद्ध में जिस ग्रह का बिम्ब ढक जाता है, छोटा और तेजहीन होता है, (२१) रूखा वर्णहीन या फीका होता है और दक्षिण की ओर होता है वह पराजित समझा जाता है। परन्तु जिस ग्रह का बिम्ब उत्तर की ओर होता है तेजवान और बड़ा होता है वह विजयी समझा जाता है। बली अर्थात् बड़ा और तेजवान ग्रह दक्षिण की ओर हो तब भी विजयी समझा जाता है। विज्ञान-भाष्य—यह भी स्पष्ट है । आसन्नावप्युभौ दीप्तौ भवतस्तौ समागमे । स्वल्पौ द्वावपि विध्वस्तौ भवेतां कूटविग्रहे ॥२२॥ अनुवाद—(२२) यदि दोनों ग्रह पास होते हुए भी प्रभायुक्त हैं तो समागम नामक युद्ध होता है और यदि दोनों ग्रह छोटे और फीके हैं तो कूटविग्रह नामक युद्ध होता है। उदक्स्थो दक्षिणस्थो वा भार्गवः प्रायशो जयो । शशाङ्केनैवमेतेषां कुर्यात्संयोगसाधनम् ॥२३॥
ग्रहयुत्यधिकार ६०३ अनुवाद—(२३) शुक्र चाहे उत्तर की ओर हो चाहे दक्षिण की ओर बहुधा विजयी होता है। इसी प्रकार चंद्रमा के साथ पाँचों ताराग्रहों की युति का साधन करना चाहिए । विज्ञान-भाष्य—पांच तारा ग्रहों की लघुतम और परम बिम्ब मानों की सारणी से यह प्रकट है कि शुक्र ग्रह का लघुतम बिम्ब मंगल और बुध के लघुतम बिम्बों से बड़ा है इसलिए इनकी युक्ति के समय तो शुक्र ही अधिक दीप्तिमान और स्थूल होने से विजयी होता है। जिस समय मंगल का बिम्ब परम होता है उस समय यह सूर्य से १८० अंश आगे होता है। ऐसी दशा में शुक्र के साथ इसकी युति हो ही नहीं सकती; शुक्र और मंगल की युति तभी हो सकती है जब मंगल भी सूर्य के पास रहे। ऐसी दशा में मंगल का बिम्ब शुक्र के बिम्ब से सदैव छोटा रहेगा। इसलिए मंगल और बुध से शुक्र सदैव अधिक दीप्तिमान और विजयी होता है। हाँ, गुरु या शनि के साथ शुक्र की जब युति होती है तब शुक्र पूर्व में अस्त होने के पहले और पच्छिम में उदय होने पर कुछ समय तक इनसे छोटा होता है। इसलिए यह शनि या गुरु से पराजित कहा जा सकता है परन्तु ऐसी अवस्था बहुत कम होती है । इसीलिए इस श्लोक में कहा गया है कि शुक्र प्रायः विजयी होता है । भावाभावाय लोकानां कल्पनेयं प्रदर्शिता । स्वमार्गगाः प्रयान्त्येते दूरमन्योन्यमाश्रिताः ॥२४॥ अनुवाद—(२४) लोगों के शुभाशुभ फल के लिए ग्रहों के युद्ध समागम इत्यादि की कल्पना की गयी है । यथार्थ में ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में भ्रमण करते हैं और एक दूसरे से बहुत दूर हैं परन्तु परस्पर आश्रित अथवा बहुत निकट देख पड़ते हैं । विज्ञान भाष्य—इस श्लोक में आचार्य ने फलित ज्योतिष के सम्बन्ध में कुछ संकेत किया है परन्तु इस पर अच्छी तरह विचार नहीं किया है कि किस प्रकार के युद्ध या समागम से कैसा फल होता है। इसका कारण यही जान पड़ता है कि यह सिद्धान्त ज्योतिष का ग्रन्थ है इसलिए इसमें विस्तार के साथ फलित ज्योतिष की चर्चा करने के लिए स्थान नहीं है । इस प्रकार ग्रहयुत्यधिकार नामक सातवें अधिकार का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ ।
अष्टम अध्याय नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ श्लोक १—नक्षत्रों के भोग से उनके ध्रुव कैसे जाने जाते हैं। श्लोक २-६- नक्षत्रों के भोग और विक्षेपों के मान । श्लोक १०, ११ और १२ का पूर्वार्ध—अगस्त्य, मृगव्याध, अग्नि और ब्रह्म-हृदय नामक तारों के भोग, ध्रुव और विक्षेप । श्लोक १२ का उत्तरार्ध—ध्रुव और विक्षेप को परीक्षा करने की रीति । श्लोक १३—रोहिणी-शकट भेद कब हो सकता है। श्लोक १४-१५—तारे के साथ ग्रह की युति का काल और स्थान जानने की रीति । श्लोक १६-१६—नक्षत्र पुंजों का कौन तारा योगतारा है। श्लोक २०-२१—प्रजापति, अपाम्वत्स और आप ताराओं के ध्रुव और विक्षेप । ] इस अधिकार में यह बतलाया गया है कि सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के मार्ग में कौन-कौन नक्षत्र पुंज पड़ते हैं, उनके स्थान कहाँ हैं और ग्रहों के साथ उनके मुख्य तारे अथवा योगतारे की युति का समय कैसे जाना जाता है। कुछ ऐसे तारों की भी चर्चा आ गयी है जो अत्यन्त प्रतिभावान होने के कारण प्राचीनकाल के साहित्य में विशेष स्थान रखते हैं, परन्तु जिनके साथ ग्रहों की युति नहीं होती । परन्तु ऐसे सब तारों या तारापुंजों की चर्चा यहाँ मालूम नहीं क्यों नहीं की गयी। मैं परिशिष्ट में ऐसे तारों या तारापुंजों की भी चर्चा करूँगा जो इस अधिकार में नहीं दिये गये हैं परन्तु प्राचीन साहित्य में आये हैं अथवा विशेष महत्व रखते हैं जैसे सप्तर्षि, काश्यप मंडल, इत्यादि । इन ताराओं के विषय में आजकल नवीन वेधों से जो कुछ मालूम हुआ है वह भी संक्षेप में वहीं दिया जायगा । प्रोच्यते लिप्तिका भानां स्वभोगेन दशाहताः । भवन्त्यतीतधिष्ण्यानां योगलिप्तायुता ध्रुवाः ॥१॥ अनुवाद- (१) अश्विनी आदि तरीकों के जो भोग आगे कहे जाते हैं उनको दस से गुणा करके गुणनफल को गत नक्षत्रों की भोग-कलाओं में जोड़ने से जो आता है वही उन तारों के ध्रुव हैं । विज्ञानभाष्य—इस श्लोक के पूर्वार्ध में जो स्वभोग शब्द आया है उसका
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०५ चित्र ११० वक्रा = क्रान्तिवृत्त धतता = त तारे का ध्रुवप्रोतवृत्त व वि = विषुवद्वृत्त कतति = त तारे का कदम्बप्रोतवृत्त व = वसन्त सम्पात अता = त का ध्रुवाभिमुख भोग या ध्रुव अ = अश्विनी का आदि बिन्दु तता = त का ध्रुवाभिमुख विक्षेप त = तारे का स्थान अति = त का कदम्बाभिमुख भोग अथवा भोग क = कदम्ब तति = त का कदम्बाभिमुख विक्षेप अथवा विक्षेप ध = ध्रुव
६०६ सूर्य-सिद्धान्त अर्थ भोगांश नहीं है और न इसका परिमाण अंशों या कलाओं में ही है। तारे के स्वभोग का अर्थ है तारे का अपने नक्षत्र के आदि विन्दु से अन्तर। यह अन्तर ऐसी इकाई में है जिसको न तो अंश कह सकते हैं और न कला । इसीलिए यह बतलाया गया है कि यदि इस स्वभोग को दस से गुणा किया जाय तो इसका परिमाण कलाओं में मालूम होता है। ऐसा जान पड़ता है कि प्रचलित इकाइयों से भिन्न इकाई का प्रयोग संक्षेप के लिए किया गया है। दस से गुणा करने पर जो आता है वही तारे की अपने नक्षत्र के आदि बिन्दु से कलाओं में दूरी होती है। इस दूरी को गत नक्षत्रों की भोग-कलाओं में जोड़ने से अश्विनी के आदि बिन्दु से अर्थात् राशि-चक्र के आदि विन्दु से उक्त तारे का ध्रुव कलाओं में जाना जाता है। पहले बतलाया गया है कि अश्विनी के आदि विन्दु से किसी ग्रह का क्रान्तिवृत्त पर जो अन्तर होता है वह भोगांश कहलाता है और क्रान्तिवृत्त से उस ग्रह का कदम्ब-प्रोतवृत्त पर जो अन्तर होता है वह विक्षेप कहलाता है। परन्तु यहाँ भोगांश न कहकर ध्रुवांश या ध्रुव कहा गया है। यह चित्र ११० से स्पष्ट हो जाता है। यदि त तारे से जाते हुए कदम्बप्रोतवृत्त और ध्रुवप्रोतवृत्त खींचे जायें तो ये क्रान्तिवृत्त पर दो भिन्न विन्दुओं पर मिलते हैं। क्रान्तिवृत्त के जिस विन्दु ति पर कदम्बप्रोतवृत्त मिलता है उससे अश्विनी के आदि का जो अन्तर होता है उसे तारे का भोग अथवा कदम्बाभिमुख भोग कहते हैं। जैसा कि पहले के अध्यायों में बतलाया गया है और इसी विन्दु से तारे के अन्तर तति को विक्षेप या शर कहते हैं। जिसे यहाँ कदम्बाभिमुख विक्षेप कहना अधिक उपयुक्त होगा परन्तु इस अध्याय में भोग और विक्षेप दूसरे अर्थ में प्रयोग किये गये हैं। भोग का अर्थ कदम्बाभिमुख भोग नहीं है वरन् ध्रुवाभिमुख भोग है और आगे जिस विक्षेप की चर्चा की गयी है उसका अर्थ कदम्बाभिमुख विक्षेप नहीं वरन् ध्रुवाभिमुख विक्षेप है। यह बात चित्र के नीचे जो विवरण दिया है उससे और भी स्पष्ट हो जाती है। एक ही परिभाषिक शब्द से दो भिन्न अर्थ प्रकट करने में भ्रम हो जाता है इसलिये इसको अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिये । ग्रहयुत्यधिकार में यह बतलाया गया है कि ग्रहों के भोगों और विक्षेपों में आयन दृक्कर्म और आक्षदृक्कर्म दो संस्कार करने पड़ते हैं। ग्रहों के भोग में आयन दृक्कर्म का संस्कार करने से जो आता है वही ग्रह का ध्रुवाभिमुख भोग अथवा ध्रुव होता है। इसलिए जब इस अध्याय में ग्रहों का ध्रुवाभिमुख भोग ही लिखा गया है, तब नक्षत्रों के साथ आयनदृक्कर्म की आवश्यकता न पड़ेगी, केवल आक्षदृक्कर्म की आवश्यकता पड़ेगी जैसा कि इसी अध्याय के १४वें श्लोक में बतलाया गया है। इस
प्रकार यह प्रगट है कि तारों का ध्रुवांश लिखने में यही सुभीता है कि इसमें आयनदृक्कर्म नहीं करना पड़ता । तारों के स्वभोग और विक्षेप-- अष्टार्णवाः शून्यकृताः पञ्चषष्टिर्नगेषवः । अष्टार्या गोऽब्धयोऽष्टागा षड्मा मनवस्तथा ॥२॥ कृतेषवो युगरसाः शून्यबाणा वियद्रसा । खवेदास्सागरनगा अष्टागाः सागरर्तवः ॥३॥ नवोऽथ रसा वेदा वैश्वमाप्याधभोगगम् । आप्यस्यान्तेऽभिजित्तारा वैश्वान्ते श्रवणस्थितः ॥४॥ त्रिचतुः पादयोः सन्धौ श्रविष्ठा श्रवणस्य तु । स्वभोगतो वियन्नागाः षट्कृतिर्यमलाश्विनः ॥५॥ रन्ध्राद्रयः क्रमादेषां विक्षेपाः स्वादपक्रमात् । विङ्मासविषयास्सौम्ये याम्ये पञ्च दिशो भवाः ॥६॥ सौम्ये रसाः खं याम्येऽगाः सौम्ये खार्का स्त्रयोदश । दक्षिणे रुद्रयमलाः सप्तत्रिंशत्तथोत्तरे ॥७॥ याम्येऽध्यर्धं त्रककृता नव सार्धशरेषवः । उत्तरस्यां तथा षष्टिः त्रिंशत्षट्त्रिंशदेव हि ॥८॥ दक्षिणेऽतोर्धभागास्तु चतुर्विंशतिरुत्तरे । भागाः षड्विंशतिः खञ्च दस्त्रादीनां यथाक्रमम् ॥६॥ अनुवाद—अश्विनी से लेकर पूर्वाषाढ़ तक के योग-तारों के स्वभोग क्रम से ४८, ४०, ६५, ५७, ५८, ४, ७८, ७६, १४, ५४, ६४, ५०, ६०, ४०, ७४, ७८, ६४, १४, ६, ४ हैं; उत्तराषाढ़ का योगतारा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के आधे पर, अभिजित के योग तारे का भोग पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के अंत में, श्रवण का योग-तारा उत्तराषाढ़ नक्षत्र के अन्त में, धनिष्ठा का योग-तारा श्रवण नक्षत्र के तीसरे और चौथे चरणों की सन्धि में अर्थात् तीसरे चरण के अंत में हैं। शतभिषक् पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्र पद, और रेवती के योग तारों के स्वभोग क्रम के ८०, ३६, २२ और ७६ हैं। क्रान्तिवृत्त से इन अश्विन्यादि योग-तारों के विक्षेप क्रम से १२, १२, ५, उत्तर की ओर; ५, १०, ६ दक्षिण की ओर; ६, ० उत्तर की ओर; ७ दख्खिन की ओर; ०, १२, १३ उत्तर की ओर; ११, २ दक्षिण की ओर; ३७ उत्तर की ओर; १ १/२, ३, ४, ६, ५ १/२, ५ दक्षिण की ओर; ६०, ३०, ३६, उत्तर की ओर; १/२ दक्षिण की ओर; २४, २६, और ० अंश उत्तर की ओर हैं।
६०८ सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान भाष्य—प्रत्येक तारे के स्वभोग को पहले श्लोक के अनुसार १० से गुणा करने पर तारे की स्वभोग-कला आ जायगी। इसको गत नक्षत्रों की भाग- कक्षाओं में जोड़ देने से उस तारे का ध्रुव ज्ञात होगा। जैसे अश्विनी तारे का स्वभोग ४८ है, इसको १० से गुणा किया तो इसका स्वभोग ४८० कला हुआ। अश्विनी तारा अश्विनी नामक पहले ही नक्षत्र में है इसलिए गत नक्षत्र शून्य हुआ इसलिए ४८० कला अथवा ८ अंश अश्विनी तारे का ध्रुव हुआ। इसी प्रकार रोहिणी तारे का स्वभोग कलाओं में ५७० हुआ। रोहिणी के पहले तीन नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृत्तिका गत हैं इसलिए इनका भोग ३ x ८०० कला हुआ क्योंकि एक नक्षत्र ८०० कलाओं के समान होता है (देखो स्पष्टाधिकार श्लोक ६४)। इसलिए रोहिणी तारे का ध्रुव = ५७० + ३ + ८०० कला = ५७० x २४०० कला = २६७० कला = ४६ अंश ३० कला। इसी प्रकार प्रत्येक तारे का ध्रुवांश जाना जा सकता है। उत्तराषाढ़, अभिजित, श्रवण और धनिष्ठा तारों के स्वभोगों में विशेषता है, इसलिए इनके ध्रुवांश नीचे लिखे अनुसार बतलाये जाते हैं :— उत्तराषाढ़ का तारा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के आधे पर अर्थात् पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के ४०० कला पर है। पूर्वाषाढ़ के पहले अश्विनी से मूल तक १६ नक्षत्र होते हैं जिनके भोग १६ x ८०० कला = १५२०० कला के समान है। इसलिए उत्तराषाढ़ का ध्रुव ४०० + १५२०० कला = १५६०० कला = २६० अंश हुआ। अभिजित तारा पूर्वाषाढ़ के अंत में बतलाया गया है, इसलिए इसका ध्रुव २६० अंश + ४०० कला अर्थात् २६६ अंश ४० कला हुआ। श्रवण तारे का ध्रुव उत्तराषाढ़ नक्षत्र के अंत में है। एक नक्षत्र = १३ अंश २० कला। पूर्वाषाढ़ नक्षत्र का अंत २६६ अंश ४० कला पर होता है, इसलिए उत्तराषाढ़ के अंत में श्रवण तारे का ध्रुव २८० अंश हुआ। धनिष्ठा तारा श्रवण नक्षत्र के तीसरे चरण के अंत में हैं। नक्षत्र के तीन चरण ६०० कला। अथवा १० अंश के समान होते हैं। इसलिए धनिष्ठा का ध्रुव २८० + १० = २६० अंश हुआ। विक्षेप तो अंशों में दिया ही हुआ है, इसलिए इस पर अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि ऊपर दिये हुए तारों के ध्रुव सब सिद्धान्त ग्रन्थों में समान नहीं हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं—(१) वेधों की
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०६ भिन्नता (२) अश्विनी के आदि विन्दु की स्थिति के निश्चय करने में भिन्नता (३) योग तारों के निश्चय में भिन्नता और (४) सम्पात विन्दु की गति । पहला कारण तो स्पष्ट है क्योंकि वेध यन्त्रों की स्थूलता के कारण वेध के फलों में भिन्नता स्वाभाविक है। दूसरा कारण भी विशेष महत्व का है। इससे यह जान पड़ता है कि अश्विनी के आदि विन्दु के निश्चय में पुराने आचार्यों में भी मतभेद था जैसा कि आजकल है। परन्तु इस मतभिन्नता से आजकल संक्रान्तियों और मलमासों के निश्चय करने में बड़ी कठिनाई उपस्थित हो रही है जिससे अखिल भारतीय तिथियों और पर्वों की स्थिरता ही नहीं हो सकती । इस बात पर सब प्रान्तों के ज्योतिषाचार्यों में एकता हो जाय तो बड़ा भारी काम हो जायगा और इसके उद्योग में जो सज्जन तन मन धन लगावेंगे वे बड़े पुण्य के भागी होंगे । महाराष्ट्र और गुजरात प्रान्तों में इसके सम्बन्ध में बहुत दिनों से उद्योग हो रहा है परन्तु अभी तक कुछ निश्चय नहीं हुआ । इसी प्रकार सम्पात विन्दु की गति के कारण तारों के ध्रुवों और विक्षेपों में अन्तर पड़ता जाता है यद्यपि इनके कदम्बाभिमुख भोगों और शरों में स्थिरता रहती है। अब १०-१२ श्लोकों में बतलाये गये तारों के ध्रुवक और विक्षेप देकर कई सारणियों में यह बतलाने का उद्योग किया जायगा कि तारों के ध्रुवांशों के सम्बन्ध में प्राचीन और अर्वाचीन आचार्यों के क्या मत हैं। अशीतिभागं र्यस्यायामगस्त्यो मिथुनान्तगः । विंशे च मिथुनस्यांशे मृगव्याधो व्यवस्थितः ॥१०॥ विक्षिप्तो दक्षिणे भागैः खार्णवैस्त्वावपक्रमात् । हुतभुग्ब्रह्म हृदयौ वृषद्वाविंशभागगौ ॥११॥ अष्टाभिः त्रिंशता चैव विक्षिप्तावुत्तरेण तौ । गोलं बद्ध्वोपरिक्षेत्रं विक्षेपध्रुवकान् स्फुटान् ॥१२॥ अनुवाद-(१०) अगस्त्य तारे का ध्रुव मिथुन राशि के अन्त में अर्थात् ६० अंश और दक्षिण विक्षेप ८० अंश है। मृगव्याध अथवा लुब्धक तारे का ध्रुव मिथुन के २० अंश पर अर्थात् ८० अंश है। (११) इसका विक्षेप क्रान्तिवृत्त से दक्षिण ४० अंश पर है। अग्नि और ब्रह्महृदय दोनों तारों के ध्रुव वृषराशि के २२ अंश पर अर्थात् ५२ अंश हैं। (१२) इनके विक्षेप क्रम से ८ अंश और ३० अंश क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर हैं। गोलयंत्र के द्वारा इन स्फुटविक्षेपों और ध्रुवकों की परीक्षा करना चाहिए । विज्ञान-भाष्य-१२ वें श्लोक का उत्तरार्ध बड़े महत्व का है। इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे आचार्यों को लकोर का फकीर होना इष्ट नहीं था इसीलिए
६१० सूर्य-सिद्धान्त नक्षत्रों के योग ताराओं तथा कुछ अन्य ताराओं के ध्रुवाभिमुख भोग ( ध्रुव ) ( देखो भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५२ )
| नक्षत्र की क्रम संख्या | ताराओं के नाम | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त | लल्ल तंत्र | दामोदरीय भट तुल्य | सुन्दर सिद्धान्त | ग्रहलाघव | शंकर बालकृष्ण दीक्षित | अन्य तारों के अंग्रेजी नाम | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | |||
| १ | अश्विनी | ८ | ० | ८ | ० | ८ | ० | ८ | ३० | ८ | ८ | ७ | ४३ | |||
| २ | भरणी | २० | ० | २० | ० | २० | ० | २१ | १५ | २० | २१ | २१ | ५१ | |||
| ३ | कृत्तिका | ३७ | ३० | ३७ | २८ | ३६ | ० | ३७ | ४५ | ३८ | ३८ | ३६ | २ | |||
| ४ | रोहिणी | ४६ | ३० | ४६ | २८ | ४६ | ० | ४६ | ० | ५० | ४६ | ४७ | ३७ | |||
| ५ | मृगशिरा | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ० | ६३ | ६२ | ६१ | २६ | |||
| ६ | आर्द्रा | ६७ | ० | ६७ | ० | ७० | ० | ६६ | ० | ६७ | ६६ | ७५ | ४३ | |||
| ७ | पुनर्वसु | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ४५ | ६२ | ६४ | ६१ | २१ |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१९ ८ पुष्य १०६ ० १०६ ० १०५ ० १०६ ० १०६ १०६ १०५ ४३ ९ आश्लेषा १०६ ० १०८ ० ११४ ० १०७ १५ १०८ १०७ १०८ ३८ १० मघा १२६ ० १२६ ० १२८ ० १२६ ० १२६ १२६ १२६ ५६ ११ पूर्वा फाल्गुनी १४४ ० १४७ ० १३६ २० १४८ १४८ १४४ ३१ १२ उत्तरा फाल्गुनी १५५ ० १५५ ० १५४ ० १५५ ३० १५५ १५५ १५४ १ १३ हस्त १७० ० १७० ० १७३ ० १७० ० १७० १६५ ६ १४ चित्रा १८० ० १८३ ० १८४ ० १८३ ० १८३ १८३ १८० ० १५ स्वाती १६६ ० १६६ ० १६७ ० ११८ ३० १६६ १६८ १६३ २८ १६ विशाखा २१३ ० २१२ ५ २१२ ० २१२ १५ २१२ २१२ २०२ ११ १७ अनुराधा २२४ ० २२४ ५ २२२ ० २२४ १५ २२४ २११ ८ १८ ज्येष्ठा २२६ ० २२६ ५ २२८ ० २२६ ३० २२६ २३० २२२ ५६ १९ मूल २४१ ० २४१ ० २४१ ० २४२ ० २४० २४० ४५
६१२ सूर्य-सिद्धान्त
नक्षत्र की क्रम | ताराओं | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त | लल्लतंत्र | दामोदरीय भट तुल्य | सुन्दर सिद्धान्त | प्रह्लादघव | शंकर बालकृष्ण दीक्षित | अन्य तारों के अंग्रेजी नाम संख्या | के नाम | अंश कला | अंश कला | अंश कला | अंक वर्ग | अंश काल | अंश कला | अंश कला |
२० | पूर्वाषाढा | २५४ ० | २५४ ० | २५४ ० | २५५ ३२ | २५४ | २५५ | २५३ २३ | २१ | उत्तराषाढा | २७० ० | २६० ० | २६७ २० | २६० ० | २६० | २६१ | २६३ ५ | | अभिजित | २६६ ४० | २६५ ० | २६७ ० | २५६ ४५ | | २५८ | २५६ १० | २२ | श्रवण | २८० ० | २७८ ० | २८३ १० | २७५ १५ | २७८ | २७५ | २७२ ५८ | २३ | धनिष्ठा | २९० ० | २९० ० | २९६ २० | ३०७ ३० | २९० | २८६ | २८४ ४७ | २४ | शततारका | ३२० ० | ३२० ० | ३१३ २० | ३२० ० | ३२० | ३२० | ३१९ ४३ | २५ | पूर्वाभाद्रपद | ३२६ ० | ३२६ ० | ३२७ ० | ३२५ ० | ३२६ | ३२५ | ३२२ ३ | २६ | उत्तर भाद्रपद | ३३७ ० | ३३७ ० | ३३५ २० | ३३७ ० | ३३७ | ३३७ | ३४० ३५ |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१३ २७ रेवती ३५६ ५० ० ० ३५६ ० ० ० ० ० ३५६ ५७ १ २० अगस्त्य ६० ० ८७ ० ८७ ० ८७ ८० Canopus व्याध ८० ० ८६ ० ८६ ० ८६ ८१ Sirius अग्नि ५२ ० ५२ ५३ β Tauri ब्रह्मा ५२ ० ५२ ५६ α aurigae (capella) β aurigae प्रजापति ५७ ० ५७ ६१ θvirginis* अपांवत्स १८० ० १८३ δvirginis* आपस १८० ० Popular Hindu Astronomy Part I pp. 240-241
६१४ | सूर्य-सिद्धान्त
नक्षत्रों के योग ताराओं तथा कुछ अन्य ताराओं के ध्रुवाभिमुख शर या विक्षेप (देखो भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५३)
| नक्षत्रों की क्रम-संख्या | ताराओं के नाम | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त (अंश | कला) | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त (अंश | कला) | लल्लतंत्र (अंश | कला) | दामोदरीय भटतुल्य (अंश | कला) | सुन्दर सिद्धान्त (अंश | कला) | ग्रहलाघव (अंश | कला) | शंकर बालकृष्ण दीक्षित (अंश | कला) | शर की दिशा |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | १० | १० | १० | १० | १० | १० | ८ | उत्तर |
| २ | भरणी | १२ | १२ | १२ | १२ १५ | १२ | १२ | १० ५७ | उत्तर |
| ३ | कृत्तिका | ५ | ४ ३१ | ५ | ४ | ४ | ५ | ४ ८ | उत्तर |
| ४ | रोहिणी | ५ | ४ ३३ | ५ | ४ | ४ ३० | ५ | ५ ३२ | दक्षिण |
| ५ | मृगशिरा | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १३ २४ | दक्षिण |
| ६ | आर्द्रा | ९ | ११ | ११ | ११ | ११ | ११ | ६ ४६ | दक्षिण |
| ७ | पुनर्वसु | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ ४६ | उत्तर |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१५ ८ पुष्य ० ० ० ० ० ० ० ५ उत्तर ९ आश्लेषा ७ ७ ७ ७ ७ ७ ११ २४ दक्षिण १० मघा ० ० ० ० ० ० ० २६ उत्तर ११ पू०फाल्गुनी १२ १२ १२ १३ १ ४५ १२ १० ३१ उत्तर १२ उ०फाल्गुनी १३ १३ १३ १२ ४५ १३ १३ २४ उत्तर १३ हस्त ११ ११ ८ ११ ११ ११ १३ १७ दक्षिण १४ चित्रा २ १ ४५ २ १ ४५ १ ४५ २ २ १२ दक्षिण १५ स्वाती ३७ ३७ ३७ ३७ १५ ३७ ३२ ५६ उत्तर १६ विशाखा १ ३० १ २३ १ ३० १ १५ १ ० २२ दक्षिण १७ अनुराधा ३ ० १ ४४ ३ १ ४५ २ २ १ दक्षिण १८ ज्येष्ठा ४ ३ ३० ४ ३ ३० ३ ४ ३७ दक्षिण १९ मूल ८ ८ ३० ८ ३० ८ ३० ८ १३ ४८ दक्षिण
६१६ सूर्य-सिद्धान्त | नक्षत्रों की क्रम-संख्या | ताराओं के नाम | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त (अंश | कला) | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त (अंश | कला) | लल्ल तंत्र (अंश | कला) | दामोदरदेव भटतुल्य (अंश | कला) | सुन्दर सिद्धान्त (अंश | कला) | ग्रहलाघव (अंश | कला) | शंकर बालकृष्ण दीक्षित (अंश | कला) | शर की दिशा | | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | | २० | पूर्वाषाढ़ | ५ | ३० | ५ | २० | ५ | २० | ५ | ३० | | | ५ | | २ | ७ | दक्षिण | | २१ | उत्तराषाढ़ | ५ | | ५ | | ५ | | ५ | | | | ५ | | १ | २८.७ | दक्षिण | | | अभिजित् | ६० | | ६२ | | ६३ | | ६२ | | ६२ | | ६२ | | ६१ | ५५ | उत्तर | | २२ | श्रवण | ३० | | ३० | | ३० | | २६ | ३० | ३० | | ३० | | २६ | ४६ | उत्तर | | २३ | धनिष्ठा | ३६ | | ३६ | | ३६ | | २५ | ३० | ३६ | | ३६ | | ३४ | १५ | उत्तर | | २४ | शततारका | ० | ३० | ० | १८ | ० | २० | ० | १५ | ० | २० | ० | | ० | २५ | दक्षिण | | २५ | पू. भाद्रपद | २४ | | २४ | | २४ | | २३ | ४५ | | | २४ | | २१ | ६ | उत्तर | | २६ | उ. भाद्रपद | २६ | | २६ | | २६ | | २६ | | | | २७ | | १३ | ४५ | उत्तर |
नक्षत्रग्रहणाधिकार ६१७ २७ रेवती ० ० ० ० ७७ ० ० १४ } दक्षिण ३ १८ } अगस्त्य ८० ७७ ८० ७७ ७६ दक्षिण व्याध ४० ४० ४० ४० ४० दक्षिण अग्नि ८ ८ ८ उत्तर ब्रह्मा ३० ३० ३० उत्तर प्रजापति ३८ ३८ ३८ उत्तर अपांवत्स ४५ ३ उत्तर आप उत्तर
६१८ सूर्य-सिद्धान्त वह स्थान-स्थान पर कहते गये हैं कि यंत्रों के द्वारा ग्रहों और नक्षत्रों का वेध करके जो ध्रुवक यथार्थ आवें उनको मानना चाहिए। यहाँ उन्होंने केवल गोलयंत्र की चर्चा की है। त्रिप्रश्नाधिकार के ११ वें श्लोक में बतलाया गया है कि शंकु की छाया से सूर्य का जो भोगांश आता है उससे गणित से निकाले हुए भोगांश का जो अंतर होता है वही स्पष्ट अयनांश है। इन बातों से स्पष्ट होता है कि हमारे आचार्यों को यह इष्ट था कि ज्योतिष सम्बन्धी गणित का मिलान आकाश के प्रत्यक्ष वेध से करके उचित संशोधन भी करते रहना चाहिए। यहाँ गोलयंत्र की विशेष चर्चा नहीं की जायगी क्योंकि यह विषय ज्योति- षोपनिषद्ध्याय नामक १३ वें अध्याय में जहां और यंत्रों की चर्चा है स्वयम् आवेगा इसलिए वहीं चित्र देकर यह अच्छी तरह समझाया जायगा। साथ ही साथ यह भी बतलाया जायगा कि इस समय कुछ नवीन यंत्रों जैसे दूरदर्शक यंत्र इत्यादि से बहुत ही सूक्ष्मतापूर्वक कैसे काम लिया जा सकता है और प्रत्येक ज्योतिष विद्यालय के साथ नवीन ढंग के एक-एक वेधालय की कितनी आवश्यकता होती है। पिछली सारणियों में यह बताया गया है कि भिन्न-भिन्न आचार्यों के मत से उपर्युक्त तारों के ध्रुवक और विक्षेप क्या हैं। ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त के ध्रुवक और विक्षेप भास्कराचार्य की सिद्धान्तशिरोमणि के ध्रुवक और विक्षेप से मिलते हैं। लल्लतंत्र, दामोदरीयभट तुल्य, और सुन्दरी-सिद्धान्त के ध्रुवक और विक्षेप स्वर्गीय शंकर बालकृष्ण दीक्षित के भारतीय ज्योतिष शास्त्र से लिये गये हैं। दीक्षित जी ने चित्रा तारे का ध्रुवक १८० अंश मानकर सन् १८८७ ई० के नाटिकल अलमैनेक में दिये हुए तारों के विषुवांशों और क्रान्तियों से जो ध्रुवक और विक्षेप स्थिर किये थे वे भी इस सारिणी में दिये जायेंगे। दीक्षित जी ने रेवती तारे के दो ध्रुवक और दो विक्षेप दिये हैं । इसका कारण यह है कि इनके मत से रेवती का योग तारा जीटा पिसियम या म्यू पिसियम हो सकता है। इसीलिए पहला ध्रुवक या विक्षेप जीटा पिसियम का है और दूसरा म्यू पिसियम का। ग्रह का रोहिणी-शकट-भेद कब होता है— वृषे सप्तदशे भागे यस्य याम्योऽशकद्वयात् । विक्षेपोऽभ्यधिको हन्याद् रोहिण्याश्शकटं तु सः ॥१३॥ अनुवाद—(१३) वृषराशि के १७ वें अंश पर स्थित जिस ग्रह का दक्षिण विक्षेप २ अंश से अधिक होता है वह ग्रह रोहिणी नक्षत्र के शकट को भेद करता है ।
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१६ विज्ञान भाष्य—रोहिणी नक्षत्र में ५ तारे हैं जिनकी आकृत गाड़ी की तरह अथवा अंग्रेजी के वी (V) अक्षर की तरह है । इन पांच तारों में सबसे उत्तर वाले तारे का दक्षिण विक्षेप २ अंश ३५ कला के लगभग है । इस तारे को आजकल एपसिलान टारि कहते हैं। और रोहिणी के योग तारे का दक्षिण शर ५ अंश ३२ कला है । जिस ग्रह का दक्षिण शर या विक्षेप इन दो सीमाओं के बीच में होता है वह रोहिणी के शकट के भीतर हो जाता है । इसी को रोहिणी के शकट का भेदन कहते हैं । यह प्रकट है कि ग्रह का विक्षेप उसके पात पर आश्रित रहता है । चन्द्रमा का पात १८ वर्षों में एक फेरा करता है। इस एक फेरे में चन्द्रमा केवल ५,६ वर्ष शकट का भेद करता है । यदि चन्द्रमा का दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से अधिक हो और ५ अंश ३२ कला से कम और उस समय यह रोहिणी नक्षत्र में हो तो यह अवश्य रोहिणी के शकट में होकर चलेगा इसलिए चन्द्रमा का रोहिणी-शकट-भेद होगा । अब यह देखना है कि जिस समय चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र में होता है उस समय इसका दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से अधिक कम होता है । मध्यमाधिकार के पृष्ठ ७५ में बतलाया गया है कि चन्द्रमा का परमविक्षेप ५ अंश ८ कला ४२ विकला है । इसका अर्थ यह है कि जब चन्द्रमा राहु से ६० अंश आगे रहता है तब इसका उत्तर शर ५ अंश ८ कला और ४२ विकला होता है और जब यह केतु से ६० अंश आगे रहता है तब इसका दक्षिण शर इतना ही होता है । परन्तु जब यह राहु या केतु पर रहता हैतब इसका शर शून्य होता है । इसलिए स्पष्टा- धिकार के श्लोक २८, चित्र २५ के आधार पर यह सहज ही जाना जा सकता है कि चन्द्रमा का शर २ अंश ३५ कला से अधिक कब होता है । इस चित्र में यदि व स चन्द्रमा की कक्षा, व प क्रान्तिवृत्त, व राहु का स्थान, स चन्द्रमा का स्थान, स ए चन्द्रशर और स व प चन्द्रमा का परम विक्षेप मान लिया जाय तो व स और प का सम्बन्ध सहज ही जाना जा सकता है। यहां यदि स प को २ अंश ३५ कला मान लिया जाय तो ज्या (वस) = ज्या ( स प ) / ज्या (सवप) = ज्या २°३५′ / ज्या ५° ८′ = .०४५१ / .०८६८ = .५०२२ ∴ व स = ३० अंश ६ कला अर्थात् जब चन्द्रमा अपने पात से एक राशि आगे रहता है तब इसका शर २ अंश ३५ कला से अधिक होता है । परन्तु रोहिणी क्रान्तिवृत्त के दक्षिण है और इसका ध्रुवाभिमुख भोगांश सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ४६ अंश ३० कला और शंकर बालकृष्ण दीक्षित के अनुसार ४७ अंश ३७ कला है तथा कदम्बाभिमुख भोगांश