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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

न भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं | 'शं नो भवतु' आदि मन्त्रद्वारा

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३


तासु हि सुखकृत्सु विद्या- | उनके सुखप्रद होनेपर ही ज्ञान- श्रवणधारणोपयोगा अप्रतिबन्धे- | के श्रवण, धारण और उपयोग | निर्विघ्नतासे हो सकेंगे—इसलिये ही न भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं | 'शं नो भवतु' आदि मन्त्रद्वारा | उनकी सुखावहताके लिये प्रार्थना प्रार्थ्यते शं नो भवत्विति । | की जाती है । ब्रह्म विविदिषुणा नमस्कार- | अब ब्रह्मके जिज्ञासुद्वारा ब्रह्म- | विद्याके विघ्नोंकी शान्तिके लिये वन्दनक्रिये वायुविषये ब्रह्म- | वायुसम्बन्धी नमस्कार और वन्दन विद्योपसर्गशान्त्यर्थं क्रियेते । सर्व- | किये जाते हैं । समस्त कर्मोंका | फल वायुके ही अधीन होनेके क्रियाफलानां तदधीनत्वाद् | कारण ब्रह्म वायु है । उस ब्रह्म वायुस्तस्मै ब्रह्मणे नमः । | ब्रह्मको मैं नमस्कार अर्थात् प्रह्वीभाव | ( विनीतभाव ) करता हूँ । यहाँ प्रह्वीभावं करोमीति वाक्यशेषः । | 'करोमि' यह क्रिया वाक्यशेष है । नमस्ते तुभ्यं हे वायो नमस्क- | हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है—मैं | तुम्हें नमस्कार करता हूँ—इस प्रकार रोमीति । परोक्षप्रत्यक्षाभ्यां | यहाँ परोक्ष और प्रत्यक्षरूपसे वायु | ही कहा गया है । वायुरेवाभिधीयते । | किं च त्वमेव चक्षुराद्यपेक्ष्य | इसके सिवा क्योंकि बाह्य चक्षु | आदिकी अपेक्षा तुम्हीं समीपवर्ती— बाह्यं संनिकृष्टमव्यवहितं प्रत्यक्षं | अव्यवहित अर्थात् प्रत्यक्ष ब्रह्म हो | इसलिये तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म ब्रह्मासि यस्मात्तस्मात्त्वामेव | कहूँगा । तुम्हींको ऋत अर्थात् शास्त्र | और अपने कर्त्तव्यानुसार बुद्धिमें प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं | सम्यक्रूपसे निश्चित किया हुआ यथाशास्त्रं यथाकर्तव्यं बुद्धौ | अर्थ कहूँगा; क्योंकि वह [ ऋत ] सुपरिनिश्चितमर्थं तदपि त्वद- |


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२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ धीनत्वात्त्वामेव वदिष्यामि । | तुम्हारे ही अधीन है । वाक् और सत्यमिति स एव वाक्कायाभ्यां | शरीरसे सम्पादन किया जानेवाला संपाद्यमानः, सोऽपि त्वदधीन | वह अर्थ ही सत्य कहलाता है, वह एव संपाद्य इति त्वामेव सत्यं | भी तुम्हारे ही अधीन सम्पादन किया वदिष्यामि । | जाता है; अतः तुम्हींको मैं सत्य | कहूँगा । तत्सर्वात्मकं वाय्वाख्यं ब्रह्म | वह वायुसंज्ञक सर्वात्मक ब्रह्म मयैवं स्तुतं सन्मां विद्यार्थिनम- | मेरेद्वारा इस प्रकार स्तुति किये वतु विद्यासंयोजनेन । तदेव | जानेपर मुझ विद्यार्थीको विद्यासे ब्रह्म वक्तारमाचार्यं वक्तृत्व- | युक्त करके रक्षा करे । वही ब्रह्म सामर्थ्यसंयोजनेनावतु । अवतु | वक्ता आचार्यको वक्तृत्वसामर्थ्यसे मामवतु वक्तारमिति पुनर्वचन- | युक्त करके उसकी रक्षा करे । मेरी | रक्षा करे और वक्ताकी रक्षा करे-इस मादरार्थम् । ॐ शान्तिः शान्तिः | प्रकार दो बार कहना आदरके लिये शान्तिरिति त्रिवचनमाध्यात्म- | है । 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः'— काधिभौतिकाधिदैविकानां विद्या- | ऐसा तीन बार कहना विद्याप्राप्तिके | आध्यात्मिक, आधिभौतिक और प्राप्त्युपसर्गाणां प्रशमार्थम् ॥१॥ | आधिदैविक विघ्नोंकी शान्तिके | लिये है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥

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द्वितीय अनुवाक शीक्षाकी व्याख्या अर्थज्ञानप्रधानत्वादुपनिषदो | उपनिषद् अर्थज्ञानप्रधान है [ अर्थात् अर्थज्ञान ही इसमें मुख्य है ], अतः इस ग्रन्थके अध्ययनका ग्रन्थपाठे यत्नोपरमो मा भूदिति प्रयत्न शिथिल न हो जाय— इसलिये पहले शीक्षाध्याय आरम्भ किया शीक्षाध्याय आरभ्यते— | जाता है— शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ १ ॥ हम शीक्षाकी व्याख्या करते हैं । [ अकारादि ] वर्ण, [ उदात्तादि ] स्वर, [ ह्रस्वादि ] मात्रा, [ शब्दोच्चारणमें प्राणका प्रयत्नरूप ] बल, [ एक ही नियमसे उच्चारण करनारूप ] साम तथा सन्तान ( संहिता ) [ ये ही विषय इस अध्यायसे सीखे जाने योग्य हैं ] । इस प्रकार शीक्षाध्याय कहा गया ॥ १ ॥ शिक्षा शिक्ष्यतेऽनयेति वर्णा- | जिससे वर्णादिका उच्चारण सीखा जाय उसे ‘शिक्षा’ कहते हैं अथवा द्युच्चारणलक्षणम् । शिक्ष्यन्त | जो सीखे जायें वे वर्ण आदि ही शिक्षा हैं । शिक्षाको ही ‘शीक्षा’ इति वा शिक्षा वर्णादयः । कहा गया है । [ शीक्षाशब्दमें शिक्षैव शीक्षा । दैर्घ्यं छान्दसम् । | ईकारका ] दीर्घत्व वैदिक प्रक्रियाके अनुसार है । उस शीक्षाकी हम तां शीक्षां व्याख्यास्यामो विस्प- व्याख्या करते हैं अर्थात् उसका ष्टमा समन्तात्कथयिष्यामः । | सर्वतोभावसे स्पष्ट वर्णन करते हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[संस्कृत-भाष्यम्] चक्षिङो वा ख्याञादिष्टस्य व्याङ्पूर्वस्य व्यक्तवाक्कर्मण एत- द्रूपम् । तत्र वर्णोऽकारादिः, स्वर उदात्तादिः, मात्रा ह्रस्वाद्याः, बलं प्रयत्नविशेषः, साम वर्णानां मध्य- मवृत्त्योच्चारणं समता, सन्तानः सन्ततिः संहितेत्यर्थः । एष हि शिक्षितव्योऽर्थः । शिक्षा यस्मिन्न- ध्याये सोऽयं शीक्षाध्याय इत्येव- मुक्त उदितः । उक्त इत्युपसं- हारार्थः ॥ १ ॥


[हिन्दी-अनुवाद] 'व्याख्यास्यामः' यह पद 'वि' और 'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'चक्षिङ्' धातुके स्थानमें वैकल्पिक 'ख्याञ्' आदेश करनेसे निष्पन्न होता है । इसका अर्थ स्पष्ट उच्चारण है । तहाँ अकारादि वर्ण, उदात्तादि स्वर, ह्रस्वादि मात्राएँ, [ वर्णोंके उच्चारणमें ] प्रयत्नविशेषरूप बल, वर्णोंको मध्यम वृत्तिसे उच्चारण करनारूप साम अर्थात् समता तथा सन्तान—सन्तति अर्थात् संहिता—यही शिक्षणीय विषय है । शिक्षा जिस अध्यायमें है उस इस शिक्षा-अध्यायका इस प्रकार कथन यानी प्रकाशन कर दिया गया । यहाँ 'उक्तः' पद उपसंहारके लिये है ॥ १ ॥


इति शीक्षावल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥

तृतीय अनुवाक पाँच प्रकारकी संहितोपासना अधुना संहितोपनिषदुच्यते— | अब संहितासम्बन्धिनी उपनिषत् ( उपासना ) कही जाती है— सह नौ यशः । सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथातः सꣳहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः । पञ्चस्वधिकरणेषु । अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता महासꣳहिता इत्याचक्षते । अथाधिलोकम् । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः संधिः ॥ १ ॥ वायुः संधानम् । इत्यधिलोकम् । अथाधि- ज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् । आपः संधिः । वैद्युतः संधानम् । इत्यधिज्यौतिषम् । अथा- धिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् ॥ २ ॥ अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनꣳ- संधानम् । इत्यधिविद्यम् । अथाधिप्रजम् । माता पूर्व- रूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा संधिः । प्रजननꣳसंधानम् । इत्यधिप्रजम् ॥ ३ ॥ अथाध्यात्मम् । अधरा हनुः पूर्वरूपम् । उत्तरा हनुरुत्तररूपम् । वाक्संधिः । जिह्वा संधानम् । इत्य- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ ध्यात्मम् । इतीमा महासꣳहिता य एवमेता महासꣳहिता व्याख्याता वेद । संधीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसे- नान्‍नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ४ ॥ हम [ शिष्य और आचार्य ] दोनोंको साथ-साथ यश प्राप्त हो और हमें साथ-साथ ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो । [ क्योंकि जिन पुरुषोंकी बुद्धि शास्त्राध्ययनद्वारा परिमार्जित हो गयी है वे भी परमार्थतत्त्वको समझनेमें सहसा समर्थ नहीं होते, इसलिये ] अब हम पाँच अधिकरणोंमें संहिताकी * उपनिषद् [ अर्थात् संहितासम्बन्धिनी उपासना ] की व्याख्या करेंगे । अधिलोक, अधिज्योतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म—ये ही पाँच अधिकरण हैं । पण्डितजन उन्हें महासंहिता कहकर पुकारते हैं । अब अधिलोक ( लोकसम्बन्धी ) दर्शन ( उपासना ) का वर्णन किया जाता है—संहिताका प्रथम वर्ण पृथिवी है, अन्तिम वर्ण द्युलोक है, मध्यभाग आकाश है ॥ १ ॥ और वायु सन्धान ( उनका परस्पर सम्बन्ध करनेवाला ) है [ अधिलोक-उपासकको संहितामें इस प्रकार दृष्टि करनी चाहिये ]—यह अधिलोक दर्शन कहा गया । इसके अनन्तर अधिज्योतिष दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण अग्नि है, अन्तिम वर्ण द्युलोक है, मध्यभाग आप ( जल ) है और विद्युत् सन्धान है [ अधिज्योतिष-उपासकको संहितामें ऐसी दृष्टि करनी चाहिये ]—यह अधिज्योतिष दर्शन कहा गया । इसके पश्चात् अधिविद्य दर्शन कहा जाता है—इसकी संहिताका प्रथम वर्ण आचार्य है ॥ २ ॥ अन्तिम वर्ण शिष्य है, विद्या सन्धि है और प्रवचन ( प्रश्नोत्तर- रूपसे निरूपण करना ) सन्धान है [—ऐसी अधिविद्य-उपासकको दृष्टि

  • 'संहिता' शब्दका अर्थ सन्धि या वर्णोंका सामीप्य है । भिन्न-भिन्न वर्णोंके मिलनेपर ही शब्द बनते हैं; उनमें जब एक वर्णका दूसरे वर्णसे योग होता है तो उन पूर्वोत्तर वर्णोंके योगको 'सन्धि' कहते हैं और जिस शब्दोच्चारण-सम्बन्धी प्रयत्नके योगसे सन्धि होती है उसे 'सन्धान' कहा जाता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९ करनी चाहिये ] । यह विद्यासम्बन्धी दर्शन कहा गया । इससे आगे अधिप्रज दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण माता है, अन्तिम वर्ण पिता है, प्रजा ( सन्तान ) सन्धि है और प्रजनन ( ऋतु- कालमें भार्यागमन ) सन्धान है [—अधिप्रज-उपासकको ऐसी दृष्टि करनी चाहिये ] । यह प्रजासम्बन्धी उपासनाका वर्णन किया गया ॥ ३ ॥ इसके पश्चात् अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—इसमें संहिताका प्रथम वर्ण नीचेका हनु ( नीचेके होठसे ठोडीतकका भाग ) है, अन्तिम वर्ण ऊपरका हनु ( ऊपरके होठसे नासिकातकका भाग ) है, वाणी सन्धि है और जिह्वा सन्धान है [—ऐसी अध्यात्म-उपासकको दृष्टि करनी चाहिये ] । यह अध्यात्मदर्शन कहा गया । इस प्रकार ये महासंहिताएँ कहलाती हैं । जो पुरुष इस प्रकार व्याख्या की हुई इन महासंहिताओंको जानता है [ अर्थात् इस प्रकार उपासना करता है ] वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज, अन्न और स्वर्गलोकसे संयुक्त किया जाता है । [ अर्थात् उसे इन सबकी प्राप्ति होती है ] ॥ ४ ॥ तत्र संहिताद्युपनिषत्परिज्ञा- | उस संहितादि उपनिषद् [ अर्थात् संहितादिसम्बन्धिनी ननिमित्तं यद्यशः प्रार्थ्यते तन्ना- | उपासना ] के परिज्ञानके कारण जिस यशकी याचना की जाती है वावयोः शिष्याचार्ययोः सहैवा- | वह हम शिष्य और आचार्य दोनोंको साथ-साथ ही प्राप्त हो । तथा स्तु । तन्निमित्तं च यद्ब्रह्मवर्चसं | उसके कारण जो ब्रह्मतेज होता है तेजस्तच्च सहैवास्त्विति शिष्य- | वह भी हम दोनोंको साथ-साथ ही मिले—इस प्रकार यह कामना शिष्य- वचनमाशीः । शिष्यस्य ह्यकृतार्थ- | का वाक्य है; क्योंकि अकृतार्थ होनेके कारण शिष्यके लिये ही त्वात्प्रार्थनोपपद्यते नाचार्यस्य । | प्रार्थना करना सम्भव भी है— आचार्यके लिये नहीं; क्योंकि वह कृतार्थत्वात् । कृतार्थो ह्याचार्यो | कृतार्थ होता है । जो पुरुष कृतार्थ होता है वही आचार्य कहलाता है । नाम भवति । |

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३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

[वाम स्तम्भ / मूल संस्कृत भाष्य]

अथानन्तरमध्ययनलक्षणवि- धानस्य, अतो यतोऽत्यर्थं ग्रन्थ- भाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसार्थ- ज्ञानविषयेऽवतारयितुमित्यतः संहिताया उपनिषदं संहिताविषयं दर्शनमित्येतद्ग्रन्थसंनिकृष्टामेव व्याख्यास्यामः; पञ्चस्वधिकरणे- ष्वाश्रयेषु ज्ञानविषयेष्वित्यर्थः । कानि तानीत्याह—अधिलोकं लोकेष्वधि यद्दर्शनं तदधिलोकम् । तथाधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रज- मध्यात्ममिति । ता एताः पञ्च- विषया उपनिषदो लोकादिमहा- वस्तुविषयत्वात्संहिताविषयत्वाच्च महत्यश्च ताः संहिताश्च महा- संहिता इत्याचक्षते कथयन्ति वेदविदः । अथ तासां यथोपन्यस्ताना- मधिलोकं दर्शनमुच्यते । दर्शन-


[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी अनुवाद]

'अथ' अर्थात् पहले कहे हुए अध्ययनरूप विधानके अनन्तर, 'अतः'—क्योंकि ग्रन्थके अध्ययनमें अत्यन्त आसक्त की हुई बुद्धिको सहसा अर्थज्ञान [ को ग्रहण करने ] में प्रवृत्त नहीं किया जा सकता, इसलिये हम ग्रन्थकी समीपवर्तिनी संहितोपनिषद् अर्थात् संहिता- सम्बन्धिनी दृष्टिकी पाँच अधिकरण —आश्रय अर्थात् ज्ञानके विषयोंमें व्याख्या करेंगे [ तात्पर्य यह कि वर्णोंके विषयमें पाँच प्रकारके ज्ञान बतलावेंगे ] । वे पाँच अधिकरण कौन-से हैं ? सो बतलाते हैं—'अधिलोक'—जो दर्शन लोकविषयक हो उसे अधिलोक कहते हैं । इसी प्रकार अधिद्यौतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म भी समझने चाहिये । ये पञ्चविषय- सम्बन्धिनी उपनिषदें लोकादि महा- वस्तुविषयिणी और संहितासम्बन्धिनी हैं; इसलिये वेदवेत्तालोग इन्हें महती संहिता अर्थात् 'महासंहिता' कहकर पुकारते हैं । अब ऊपर बतलायी हुई उन (पाँच प्रकारकी उपासनाओं) मेंसे पहले अधिलोक-दृष्टि बतलायी जाती है ।


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अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१


[संस्कृत-भाष्य] क्रमविवक्षार्थोऽथशब्दः सर्वत्र । पृथिवी पूर्वरूपं पूर्वो वर्णः पूर्व- रूपम् । संहितायाः पूर्वे वर्णे पृथिवीदृष्टिः कर्तव्येत्युक्तं भवति । तथा द्यौः उत्तररूपमाकाशोऽन्त- रिक्षलोकः संधिर्मध्यं पूर्वोत्तर- रूपयोः संधीयेते अस्मिन्पूर्वोत्तर- रूपे इति । वायुः संधानम् । संधीयतेऽनेनेति संधानम् । इत्य- धिलोकं दर्शनमुक्तम् । अथाधि- ज्यौतिषमित्यादि समानम् । इतीमा इत्युक्ता उपप्रदर्श्यन्ते । यः कश्चिदेवमेता महासंहिता व्याख्याता वेदोपास्ते । वेदेत्यु- पासनं स्याद्विज्ञानाधिकारात् “इति प्राचीनयोग्योपास्स्व” इति च वचनात् । उपासनं च यथा-

[हिन्दी-भाष्यार्थ] यहाँ दर्शनक्रम बतलाना इष्ट होनेके कारण 'अथ' शब्दकी सर्वत्र अनुवृत्ति करनी चाहिये । पृथिवी पूर्वरूप है । यहाँ पूर्ववर्ण ही पूर्वरूप कहा गया है । इससे यह बतलाया गया है कि संहिता (सन्धि) के प्रथम वर्णमें पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये । इसी प्रकार द्युलोक उत्तररूप (अन्तिम वर्ण) है, आकाश अर्थात् अन्तरिक्ष सन्धि—पूर्व और उत्तररूपका मध्य है अर्थात् इसमें ही पूर्व और उत्तररूप एकत्रित किये जाते हैं । वायु सन्धान है । जिससे सन्धि की जाय उसे सन्धान कहते हैं । इस प्रकार अधिलोक दर्शन कहा गया । इसीके समान 'अथाधिज्यौतिषम्' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ भी समझना चाहिये । 'इति' और 'इमाः' इन शब्दोंसे पूर्वोक्त दर्शनोंका परामर्श किया जाता है । जो कोई इस प्रकार व्याख्या की हुई इस महासंहिताको जानता अर्थात् उपासना करता है—यहाँ उपासनाका प्रकरण होनेके कारण 'वेद' शब्दसे उपासना समझना चाहिये जैसा कि 'इति प्राचीनयोग्योपास्स्व'¹ इस आगे (१ । ६ । २ में) कहे जानेवाले वचनसे सिद्ध होता है ।


१. हे प्राचीनयोग्य शिष्य ! इस प्रकार तू उपासना कर ।

३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

शास्त्रं तुल्यप्रत्ययसन्ततिरसंकीर्णा चातत्प्रत्ययैः शास्त्रोक्तालम्बन- विषया च । प्रसिद्धश्चोपासन- शब्दार्थो लोके गुरुमुपास्ते राजानमुपास्त इति । यो हि गुर्वादीन्सन्ततमुपचरति स उपास्त इत्युच्यते । स च फलमाप्नोत्यु- पासनस्य । अतोऽत्रापि च य एवं वेद संधीयते प्रजादिभिः स्वर्गान्तैः । प्रजादिफलान्याप्नो- तीत्यर्थः ॥१–४॥

शास्त्रानुसार समान प्रत्ययके प्रवाहका नाम 'उपासना' है। वह प्रवाह विजा- तीय प्रत्ययोंसे रहित और शास्त्रोक्त आलम्बनको आश्रय करनेवाला होना चाहिये । लोकमें 'गुरुकी उपासना करता है' 'राजाकी उपासना करता है' इत्यादि वाक्योंमें 'उपासना' शब्दका अर्थ प्रसिद्ध ही है । जो पुरुष गुरु आदिकी निरन्तर परिचर्या करता है वही 'उपासना करता है' ऐसा कहा जाता है । वही उस उपासना- का फल भी प्राप्त करता है । अतः इस महासंहिताके सम्बन्धमें भी जो पुरुष इस प्रकार उपासना करता है वह [ मन्त्रमें बतलाये हुए ] प्रजासे लेकर स्वर्गपर्यन्त समस्त पदार्थोंसे सम्पन्न होता है, अर्थात् प्रजादिरूप फल प्राप्त करता है ॥ १–४ ॥

इति शीक्षावल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥ ३ ॥

और होमसम्बन्धी मन्त्र

चतुर्थ अनुवाक श्री और बुद्धिकी कामनावालोंके लिये जप और होमसम्बन्धी मन्त्र यश्छन्दसामिति मेधाकाम- | अब 'यश्छन्दसाम्' इत्यादि मन्त्रोंसे मेधाकामी तथा श्रीकामी स्य श्रीकामस्य च तत्प्राप्तिसाधनं | पुरुषोंके लिये उनकी प्राप्तिके साधन जप और होम बतलाये जाते हैं; जपहोमावुच्येते । “स मेन्द्रो | क्योंकि “वह इन्द्र मुझे मेधासे प्रसन्न अथवा बलयुक्त करे” तथा “अतः उस श्रीको तू मेरे पास ला” इन मेधया स्पृणोतु” “ततो मे श्रिय- | वाक्योंमें [ क्रमशः मेधा और श्री- प्राप्तिके लिये की गयी प्रार्थनाके ] मावह” इति च लिङ्गदर्शनात् । | लिङ्ग देखे जाते हैं । यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्य- मृतात्संबभूव । स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः । श्रुतं मे गोपाय । आवहन्ती वितन्वाना ॥१॥ कुर्वाणाचीरमात्मनः । वासाꣳसि मम गावश्च । अन्नपाने च सर्वदा । ततो मे श्रियमावह । लोमशां पशुभिः सह स्वाहा । आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ॥ २ ॥ तै० उ० ५–६– CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ जो वेदोंमें ऋषभ ( श्रेष्ठ अथवा प्रधान ) और सर्वरूप है तथा वेदरूप अमृतसे प्रधानरूपसे आविर्भूत हुआ है वह [ ओंकाररूप ] इन्द्र ( सम्पूर्ण कामनाओंका ईश ) मुझे मेधासे प्रसन्न अथवा बलयुक्त करे । हे देव ! मैं अमृतत्व ( अमृतत्वके हेतुभूत ब्रह्मज्ञान ) का धारण करने- वाला होऊँ । मेरा शरीर विचक्षण (योग्य) हो । मेरी जिह्वा अत्यन्त मधुमती ( मधुर भाषण करनेवाली ) हो । मैं कानोंसे खूब श्रवण करूँ । [ हे ओंकार ! ] तू ब्रह्मका कोष है और लौकिक बुद्धिसे ढँका हुआ है [ अर्थात् लौकिक बुद्धिके कारण तेरा ज्ञान नहीं होता ] । तू मेरी श्रवण की हुई विद्याकी रक्षा कर । मेरे लिये वस्त्र, गौ और अन्न-पानको सर्वदा शीघ्र ही ले आनेवाली और इनका विस्तार करनेवाली श्रीको [ भेड़-बकरी आदि ] ऊनवाले तथा अन्य पशुओंके सहित बुद्धि प्राप्त करानेके अनन्तर तू मेरे पास ला—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग मेरे पास आवें-स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग मेरे प्रति निष्कपट हों—स्वाहा । ब्रह्मचारी- लोग प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) को धारण करें—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग दम ( इन्द्रियदमन ) करें—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग शम ( मनोनियम ) करें—स्वाहा । [ इन मन्त्रोंके पीछे जो 'स्वाहा' शब्द है वह इस बातको सूचित करता है कि ये हवनके लिये हैं ] ॥ १-२ ॥ यश्छन्दसां वेदानाम्पृषभ | जो [ ओंकार ] प्रधान होनेके कारण छन्द- वेदोंमें श्रेष्ठके समान ओङ्कारतो बुद्धि- इवर्षभः प्राधान्यात् । श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण वाणीमें व्याप्त बलं प्रार्थ्यते विश्वरूपः सर्वरूपः होनेके कारण विश्वरूप यानी सर्वमय है; जैसा कि “जिस प्रकार शङ्कुओं सर्ववाग्व्याप्तेः । “तद्यथा श- ( पत्तोंकी नसों ) से [ सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओंकारसे ङ्कना" (छा० उ० २।२३।३) सम्पूर्ण वाणी व्याप्त है-ओंकार ही यह सब कुछ है ]" इस एक अन्य इत्यादि श्रुत्यन्तरात् । अत एव- श्रुतिसे सिद्ध होता है । इसीलिये

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५


[वाम स्तम्भ / संस्कृत भाष्य]

र्षभत्वमोङ्कारस्य । ओङ्कारो ह्यत्रोपास्य इति ऋषभादि- शब्दैः स्तुतिर्न्याय्यैवोङ्कारस्य । छन्दोभ्यो वेदेभ्यो वेदा ह्यमृतं तस्मादमृतादधिसंबभूव । लोक- देववेदव्याहृतिभ्यः सारिष्ठं जिघृक्षोः प्रजापतेस्तपस्यत ओङ्कारः सारिष्ठत्वेन प्रत्यभा- दित्यर्थः । न हि नित्यस्योङ्कार- स्याञ्जसैवोत्पत्तिरेव कल्प्यते । स एवंभूत ओङ्कार इन्द्रः सर्व- कामेशः परमेश्वरो मा मां मेधया प्रज्ञया स्पृणोतु प्रीणयतु बलयतु वा । प्रज्ञाबलं हि प्रार्थ्यते । अमृतस्य अमृतत्वहेतुभूतस्य ब्रह्मज्ञानस्य तदधिकारात्, हे देव धारणी धारयिता भूयासं भवेयम् । किं च शरीरं मे मम विचर्षणं विचक्षणं योग्यमित्ये- तत् । भूयादिति प्रथमपुरुष- विपरिणामः । जिह्वा मे मधु-


[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी भाष्यार्थ]

ओंकारकी श्रेष्ठता है । यहाँ ओंकार ही उपासनीय है, इसलिये 'ऋषभ' आदि शब्दोंसे ओंकारकी स्तुति की जानी उचित ही है । छन्द अर्थात् वेदोंसे—वेद ही अमृत हैं, उस अमृतसे जो प्रधानरूपसे हुआ है । तात्पर्य यह है कि लोक, देव, वेद और व्याहृतियोंसे सर्वोत्कृष्ट सार ग्रहण करनेकी इच्छासे तप करते हुए प्रजा- पतिको ओंकार ही सर्वोत्तम साररूपसे भासित हुआ था; क्योंकि नित्य ओंकारकी साक्षात् उत्पत्तिकी कल्पना नहीं की जा सकती । वह इस प्रकारका ओंकाररूप इन्द्र—सम्पूर्ण कामनाओंका स्वामी परमेश्वर मुझे मेधाद्वारा प्रसन्न अथवा सबल करे; इस प्रकार यहाँ बुद्धिबलके लिये प्रार्थना की जाती है । हे देव ! मैं अमृत—अमृतत्वके हेतुभूत ब्रह्मज्ञानका धारण करने- वाला होऊँ; क्योंकि यहाँ ब्रह्मज्ञान- का ही प्रसङ्ग है । तथा मेरा शरीर विचर्षण—विचक्षण अर्थात् योग्य हो । [ मूलमें ‘भूयासम्’ (होऊँ) यह उत्तम पुरुषका प्रयोग है इसे ] ‘भूयात्’ (हो) इस प्रकार प्रथम पुरुष- में परिणत कर लेना चाहिये । मेरी

३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

मत्तमा मधुमत्यतिशयेन मधुर- | जिह्वा मधुमत्तमा-अतिशय मधुमती भाषिणीत्यर्थः । कर्णाभ्यां श्रोत्रा- | अर्थात् अत्यन्त मधुरभाषिणी हो । मैं भ्यां भूरि बहु विश्रुवं व्यश्रवं | कानोंसे भूरि-अधिक मात्रामें श्रवण श्रोता भूयासमित्यर्थः । आत्म- | करूँ अर्थात् बड़ा श्रोता होऊँ । ज्ञानयोग्यः कार्यकारणसंघातो- | इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि ऽस्त्विति वाक्यार्थः । मेधा च | मेरा शरीर और इन्द्रियसंधात आत्म- तदर्थमेव हि प्रार्थ्यते । | ज्ञानके योग्य हो । तथा उसीके लिये ही बुद्धिकी याचना की जाती है । ब्रह्मणः परमात्मनः कोशो- | परमात्माकी उपलब्धिका स्थान ऽसि । असेरिवोपलब्ध्यधिष्ठान- | होनेके कारण तू तलवारके कोशके त्वात् । त्वं हि ब्रह्मणः प्रतीकं | समान ब्रह्म यानी परमात्माका कोश त्वयि ब्रह्मोपलभ्यते । मेधया | है; क्योंकि तू ब्रह्मका प्रतीक है— लौकिकप्रज्ञया पिहित आच्छा- | तुझमें ब्रह्मकी उपलब्धि होती है । दितः स त्वं सामान्यप्रज्ञैरविदि- | वही तू मेधा अर्थात् लौकिकी बुद्धि- ततत्त्व इत्यर्थः । श्रुतं श्रवणपूर्व- | से आच्छादित यानी ढका हुआ है; कमात्मज्ञानादिकं मे गोपाय | अर्थात् सामान्य-बुद्धि पुरुषोंको तेरे रक्ष । तत्प्राप्त्यविस्मरणादि | तत्त्वका ज्ञान नहीं होता । मेरे कुर्वित्यर्थः । जपार्था एते मन्त्रा | श्रुत अर्थात् श्रवणपूर्वक आत्म- ज्ञानादि विज्ञानकी रक्षा कर; अर्थात् उसकी प्राप्ति एवं अविस्मरण आदि मेधाकामस्य । | कर । ये मन्त्र मेधाकामी पुरुषके जपके लिये हैं । होमार्थास्त्वधुना श्रीकामस्य | अब लक्ष्मीकामी पुरुषको होमके ओङ्कारतः मन्त्रा उच्यन्ते । | लिये मन्त्र बतलाये जाते हैं—आव- श्रियः प्रार्थना आवहन्त्यानयन्ती । | हन्ती—लानेवाली; वितन्वाना— वितन्वाना विस्तारयन्ती । तनो- | विस्तार करनेवाली; क्योंकि 'तनु'

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


संस्कृत मूल एवं भाष्यहिन्दी अनुवाद
तैस्तत्कर्मत्वात् । कुर्वाणा निर्वर्त-धातुका अर्थ विस्तार करना ही है;
यन्ती, अचीरमचिरं क्षिप्रमेव,कुर्वाणा—करनेवाली; अचीरम्—
छान्दसो दीर्घः; चिरं वा कुर्वा-अचिर अर्थात् शीघ्र ही; 'अचीरम्' में
णा आत्मनो मम, किमित्याह—दीर्घ ईकार वैदिक प्रक्रियाके अनुसार
वासांसि वस्त्राणि मम गावश्चहै । अथवा चिरं ( चिरकालतक )
गाश्चेति यावत्, अन्नपाने चआत्मनः—मेरे लिये करनेवाली, क्या
सर्वदैवमादीनि कुर्वाणा श्रीर्याकरनेवाली ? सो बतलाते हैं—मेरे वस्त्र,
तां ततो मेधानिर्वर्तनात्परमा-गौ और अन्न-पान इन्हें जो श्री सदा
वहानय । अमेधसो हि श्रीरन-ही करनेवाली है उसे, बुद्धि प्राप्त
र्थायैवेति ।करानेके अनन्तर तू मेरे पास ला; क्योंकि बुद्धिहीनके लिये तो लक्ष्मी अनर्थका ही कारण होती है ।
किंविशिष्टाम् । लोमशामजाव्या-किन विशेषणोंसे युक्त श्रीको
दियुक्तामन्यैश्च पशुभिः संयुक्ता-लावे ? लोमश अर्थात् भेड़-बकरी
मावहेत्यधिकारादोङ्कार एवाभि-आदि ऊनवालोंके सहित और अन्य
संबध्यते । स्वाहा स्वाहाकारोपशुओंसे युक्त श्रीको ला । यहाँ 'आवह' क्रियाका अधिकार होनेके कारण [ उसके कर्ता ] ओंकारसे ही सम्बन्ध
होमार्थमन्त्रान्तज्ञापनार्थः । आ-है । स्वाहा—यह स्वाहाकार होमार्थ मन्त्रोंका अन्त सूचित करनेके लिये
यन्तु मामिति व्यवहितेन सं-है । [ 'आ मायन्तु ब्रह्मचारिणः' इस वाक्यमें ] 'आयन्तु माम्' इस प्रकार
बन्धः । ब्रह्मचारिणो विमायन्तु'आ' का व्यवधानयुक्त 'यन्तु' शब्दसे सम्बन्ध है । [ इसी प्रकार मेरे प्रति ]
प्रमायन्तु दमायन्तु शमायन्वित्-ब्रह्मचारीलोग निष्कपट हों । वे प्रमा-
त्यादि ॥१-२॥को धारण करें, इन्द्रिय-निग्रह करें, मनोनिग्रह करें, इत्यादि ॥ १-२ ॥

३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ यशो जनेऽसानि स्वाहा । श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा । तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश स्वाहा । तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा । यथापः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम् । एवं मां ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा । प्रतिवेशोऽसि प्र मा पाहि प्र मा पद्यस्व ॥ ३ ॥ मैं जनतामें यशस्वी होऊँ—स्वाहा । मैं अत्यन्त प्रशंसनीय और धनवान् होऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! मैं उस ब्रह्मकोशभूत तुझमें प्रवेश कर जाऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! वह तू मुझमें प्रवेश कर--स्वाहा । हे भगवन् ! उस सहस्रशाखायुक्त [ अर्थात् अनकों भेदवाले ] तुझमें मैं अपने पापा- चरणोंका शोधन करता हूँ—स्वाहा । जिस प्रकार जल निम्न प्रदेशकी ओर जाता है तथा महीने अहर्जर—संवत्सरमें अन्तर्हित हो जाते हैं, उसी प्रकार हे धातः ! ब्रह्मचारीलोग सब ओरसे मेरे पास आवें-- स्वाहा । तू [ शरणागतोंका ] आश्रयस्थान है अतः मेरे प्रति भासमान हो, तू मुझे प्राप्त हो ॥ ३ ॥ यशो यशस्वी जने जनसमूहे- | मैं जनतामें यशस्वी होऊँ तथा ऽसानि भवानि। श्रेयान्प्रशस्यतरो | श्रेयान्-प्रशस्यतर और वस्यसः- वस्यसो वसीयसो वसुतराद्वसुमत्त- | वसीयसः अर्थात् वसुमान्से भी राद्वासानीत्यन्वयः । किं च तं | वसुमान् यानी अत्यन्त धनी पुरुषों- से भी विशेष धनवान् होऊँ । तथा ब्रह्मणः कोशभूतं त्वा त्वां हे भग | हे भग-भगवन्-पूजनीय ! ब्रह्मके कोशभूत उस तुझमें मैं प्रवेश करूँ; भगवन्पूज्यावन्प्रविशानि प्रविश्य | तात्पर्य यह है कि तुझमें प्रवेश करके चानन्यस्त्वदात्मैव भवानीत्यर्थः। | तुझसे अनन्य हो मैं तेरा ही रूप CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९ स त्वमपि मा मां भग भगवन् | हो जाऊँ; तथा तू भी, हे भग- प्रविश । आवयोरेकत्वमेवास्तु । | भगवन् ! मुझमें प्रवेश कर । अर्थात् | हम दोनोंकी एकता ही हो जाय । हे तस्मिंस्त्वयि सहस्रशाखे बहु- | भगवन् ! उस सहस्रशाख-अनेकों शाखाभेदे हे भगवन्, निमृजे | शाखाभेदवाले तुझमें मैं अपने पाप- शोधयाम्यहं पापकृत्याम् । | कर्मोंका शोधन करता हूँ । यथा लोक आपः प्रवता | लोकमें जिस प्रकार जल प्रवण- प्रवणवता निम्नवता देशेन यन्ति | वान्-निम्नतायुक्त देशकी ओर जाते गच्छन्ति । यथा च मासा | हैं और महीने जिस प्रकार अहर्जरमें अहर्जरं संवत्सरोऽहर्जरः । | अन्तर्हित होते हैं। अहर्जर संवत्सर- अहोभिः परिवर्तमानो लोकान्जर- | को कहते हैं; क्योंकि वह अहः यतीत्यहानि वास्मिञ्जीर्यन्त्यन्त- | दिनोंके रूपमें परिवर्तित होता हुआ र्भवन्तीत्यहर्जरः । तं च यथा | लोकोंको जीर्ण करता है अथवा मासा यन्त्येवं मां ब्रह्मचारिणो | उसमें अहः-दिन जीर्ण यानी हे धातः सर्वस्य विधातः मामा- | अन्तर्भूत होते हैं इसलिये वह यन्त्वागच्छन्तु सर्वतः सर्व- | अहर्जर है । उस संवत्सरमें जिस दिग्भ्यः । | प्रकार महीने जाते हैं उसी प्रकार | हे धातः ! मेरे पास सब ओरसे- | सम्पूर्ण दिशाओंसे ब्रह्मचारीलोग | आवें । प्रतिवेशः-श्रमापनयनस्थान- | 'प्रतिवेश' श्रमनिवृत्तिके स्थान मासन्नगृहमित्यर्थः । एवं त्वं | अर्थात् समीपवर्ती गृहको कहते हैं । प्रतिवेश इव प्रतिवेशस्त्वच्छी- | इस प्रकार तू प्रतिवेशके समान प्रति- लिनां सर्वपापदुःखापनयनस्था- | वेश यानी अपना अनुशीलन करने- नमसि, अतो मा मां प्रति प्रभाहि | वालोंका दुःखनिवृत्तिका स्थान है । | अतः तू मेरे प्रति अपनेको प्रकाशित प्रकाशयात्मानं प्रपद्यस्व च । | कर और मुझे प्राप्त हो; अर्थात् CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


मां रसविद्धमिव लोहं तन्मयं | पारदसंयुक्त लोहेके समान तू मुझे त्वदात्मानं कुर्वित्यर्थः । | अपनेसे अभिन्न कर ले । श्रीकामोऽस्मिन्विद्याप्रकरणे- | इस ज्ञानके प्रकरणमें जो लक्ष्मी- <sub>विद्योपलब्धौ धनस्योपयोगः</sub> ऽभिधीयमानो धना- | की कामना कही जाती है वह धनके र्थः । धनं च कर्मा- | लिये है, धन कर्मके लिये होता है, र्थम् । कर्म चोपात्तदुरितक्षयाय । | और कर्म प्राप्त हुए पापोंके क्षयके तत्क्षये हि विद्या प्रकाशते । तथा | लिये है । उनके क्षीण होनेपर ही च स्मृतिः "ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां | ज्ञानका प्रकाश होता है; जैसा कि क्षयात्पापस्य कर्मणः । यथादर्श- | यह स्मृति भी कहती है—"पाप- तले प्रख्ये पश्यन्त्यात्मान- | कर्मोंका क्षय हो जानेपर ही पुरुष- मात्मनि" (महा० शा० २०४ । | को ज्ञान होता है । जिस प्रकार ८, गरुड० १ । २३७ । ६ ) | दर्पणके स्वच्छ हो जानेपर उसमें इति ॥ ३ ॥ | मुख देखा जा सकता है उसी प्रकार शुद्ध अन्तःकरणमें आत्माका साक्षात्कार होता है" ॥ ३ ॥


इति शीक्षावल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

मन्त्रा अनुक्रान्ताः । ते च पार- | श्रीकामी पुरुषोंके लिये मन्त्र बतलाये

पञ्चम अनुवाक व्याहृतिरूप ब्रह्मकी उपासना संहिताविषयमुपासनमुक्तं त- | पहले संहितासम्बन्धिनी दनु मेधाकामस्य श्रीकामस्य | उपासनाका वर्णन किया गया । तत्पश्चात् मेधाकी कामनावाले तथा मन्त्रा अनुक्रान्ताः । ते च पार- | श्रीकामी पुरुषोंके लिये मन्त्र बतलाये म्पर्येण विद्योपयोगार्था एव । | गये । वे भी परम्परासे ज्ञानके अनन्तरं व्याहृत्यात्मनो ब्रह्मणो- | उपयोगके लिये ही हैं । उसके पश्चात् अब जिसका फल स्वाराज्य ऽन्तरुपासनं स्वाराज्यफलं प्र- | है उस व्याहृतिरूप ब्रह्मकी आन्तरिक स्तूयते— | उपासनाका आरम्भ किया जाता है— भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते । मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः । भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ लोकः ॥ १ ॥ मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते । भूरिति वा अग्निः । भुव इति वायुः । सुवरित्या- दित्यः । मह इति चन्द्रमाः । चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतींषि महीयन्ते । भूरिति वा ऋचः । भुव इति सामानि । सुवरिति यजूंषि ॥ २ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ मह इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते । भूरिति वै प्राणः । भुव इत्यपानः । सुवरिति व्यानः । मह इत्यन्नम् । अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते । ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः । ता यो वेद । स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥ 'भूः, भुवः और सुवः' ये तीन व्याहृतियाँ हैं । उनमेंसे 'महः' इस चौथी व्याहृतिको माहाचमस्य ( महाचमसका पुत्र ) जानता है । वह महः ही ब्रह्म है । वही आत्मा है । अन्य देवता उसके अङ्ग ( अवयव ) हैं । 'भूः' यह व्याहृति यह लोक है, 'भुवः' अन्तरिक्षलोक है और 'सुवः' यह स्वर्गलोक है ॥ १ ॥ तथा 'महः' आदित्य है । आदित्यसे ही समस्त लोक वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही अग्नि है, 'भुवः वायु है, 'सुवः' आदित्य है तथा 'महः' चन्द्रमा है । चन्द्रमासे ही सम्पूर्ण ज्योतियाँ वृद्धिको प्राप्त होती हैं । 'भूः' यही ऋक् है, 'भुवः' साम है, 'सुवः' यजुः है ॥ २ ॥ तथा 'महः' ब्रह्म है । ब्रह्मसे ही समस्त वेद वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही प्राण है, 'भुवः' अपान है, 'सुवः' व्यान है तथा 'महः' अन्न है । अन्नसे ही समस्त प्राण वृद्धिको प्राप्त होते हैं । इस प्रकार ये चार व्याहृतियाँ हैं । इनमेंसे प्रत्येक चार-चार प्रकारकी है । जो इन्हें जानता है वह ब्रह्मको जानता है । सम्पूर्ण देवगण उसे बलि ( उपहार ) समर्पण करते हैं ॥३॥ भूर्भुवःसुवरिति;इतीत्युक्तोप- | 'भूर्भुवः सुवरिति' इसमें 'इति' | शब्द पूर्वकथित [ व्याहृतियों ] को प्रदर्शनार्थः । एता- | ही प्रदर्शित करनेके लिये है; [हाशिए में: व्याहृतिचतुष्टयम्] स्तिस्र इति च प्रद- | 'एतास्तिस्रः' ये शब्द भी पूर्व- | प्रदर्शित [ व्याहृतियों ] के ही र्शितानां परामर्शार्थः । परामृष्टाः | परामर्शके लिये हैं । 'वै' इस

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