तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
निरूपण करनेवाला है। आगेका समस्त ग्रन्थ इस सूत्रभूत मन्त्रकी ही
( ५ )
वाक्य है—'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो यह सूत्रभूत वाक्य ही सम्पूर्ण ब्रह्मविद्याका बीज है। ब्रह्म और ब्रह्मवित्के स्वरूपका विचार ही तो ब्रह्मविद्या है और ब्रह्मवेत्ताकी परप्राप्ति ही उसका फल है; अतः निःसन्देह यह वाक्य फलसहित ब्रह्मविद्याका निरूपण करनेवाला है। आगेका समस्त ग्रन्थ इस सूत्रभूत मन्त्रकी ही व्याख्या है। उसमें सबसे पहिले 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस वाक्यद्वारा श्रुति ब्रह्मका लक्षण करती है। इससे ब्रह्मके स्वरूपका निश्चय हो जानेपर उसकी उपलब्धिके लिये पञ्चकोशका विवेक करनेके अभिप्रायसे उसने पक्षीके रूपकद्वारा पाँचों कोशोंका वर्णन किया है और उन सबके आधार- रूपसे सर्वान्तरतम परब्रह्मका 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इस वाक्यद्वारा निर्णय किया है। इसके पश्चात् ब्रह्मकी असत्ता माननेवाले पुरुषकी निन्दा करते हुए उसका अस्तित्व स्वीकार करनेवाले पुरुषकी प्रशंसा की है और उसे 'सत्' बतलाया है। फिर ब्रह्मका सर्वात्म्य प्रतिपादन करनेके लिये 'सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेय' इत्यादि वाक्यद्वारा उसीको जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बतलाया है।
इस प्रकार सत्संज्ञक ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति दिखलाकर फिर सप्तम अनुवाकमें असत्से ही सत्की उत्पत्ति बतलायी है। किन्तु यहाँ 'असत्' का अर्थ अभाव न समझकर अव्याकृत ब्रह्म समझना चाहिये और 'सत्'का व्याकृत जगत् ; क्योंकि अत्यन्ताभावसे किसी भावपदार्थकी उत्पत्ति नहीं हो सकती और उत्पत्तिसे पूर्व सारे पदार्थ अव्यक्त थे ही। इसलिये 'असत्' शब्द अव्याकृत ब्रह्मका ही वाचक है। वह ब्रह्म रसस्वरूप है; उस रसकी प्राप्ति होनेपर यह जीव रसमय—आनन्दमय हो जाता है। उस रसके लेशसे ही सारा संसार सजीव देखा जाता है। जिस समय साधनाका परिपाक होनेपर पुरुष इस अदृश्य अशरीर अनिर्वाच्य और अनाश्रय परमात्मामें स्थिति लाभ करता है उस समय वह सर्वथा निर्भय हो जाता है; और जो उसमें थोड़ा-सा भी अन्तर करता है उसे भय प्राप्त होता है।
( ६ ) अतः ब्रह्ममें स्थित होना ही जीवकी अभयस्थिति है; क्योंकि वहाँ भेदका सर्वथा अभाव है और भय भेदमें ही होता है 'द्वितीयाद्वै भयं भवति' । इस प्रकार ब्रह्मनिष्ठकी अभयप्राप्तिका निरूपण कर ब्रह्मके सर्वान्तर्यामित्व और सर्वशासकत्वका वर्णन करते हुए ब्रह्मवेत्ताके आनन्दकी सर्वोत्कृष्टता दिखलायी है। वहाँ मनुष्य, मनुष्यगन्धर्व, देवगन्धर्व, पितृगण, आजानज- देव, कर्मदेव, देव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति और ब्रह्मा—इन सबके आनन्दोंको उत्तरोत्तर शतगुण बतलाते हुए यह दिखलाया है कि निष्काम ब्रह्मवेत्ताको वे सभी आनन्द प्राप्त हैं। क्यों न हो ? सबके अधिष्ठानभूत परब्रह्मसे अभिन्न होनेके कारण क्या वह इन सभीका आत्मा नहीं है । अतः सर्वरूपसे वही तो सारे आनन्दोंका भोक्ता है। भोक्ता ही क्यों, सर्व-आनन्दस्वरूप भी तो वही है, सारे आनन्द उसीके स्वरूपभूत आनन्द-महोदधिके क्षुद्रातिक्षुद्र कण ही तो हैं। इसके पश्चात् हृदयपुण्डरीकस्थ पुरुषका आदित्यमण्डलस्थ पुरुषके साथ अभेद करते हुए यह बतलाया है कि जो इन दोनोंका अभेद जानता है वह इस लोक अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट विषयसमूहसे निवृत्त होकर इस समष्टि अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय आत्माको प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सारा प्रपञ्च उसका अपना शरीर हो जाता है—उसके लिये अपनेसे भिन्न कुछ भी नहीं रहता। उस निर्भय और अनिर्वाच्य स्वात्मतत्त्वकी जिसे प्राप्ति हो जाती है, उसे न तो किसीका भय रहता है और न किसी कृत या अकृतका अनुताप ही। जब अपनेसे भिन्न कुछ है ही नहीं तो भय किसका और क्रिया कैसी ? क्रिया तो देश, काल या वस्तुका परिच्छेद होनेपर ही होती है; उस एक, अखण्ड, अमर्यादित, अद्वितीय वस्तुमें किसी प्रकारकी क्रियाका प्रवेश कैसे हो सकता है ? इस प्रकार ब्रह्मानन्दवल्लीमें ब्रह्मविद्याका निरूपण कर भृगुवल्लीमें उसकी प्राप्तिका मुख्य साधन पञ्चकोश-विवेक दिखलानेके लिये वरुण और भृगुका आख्यान दिया गया है। आत्मतत्त्वका जिज्ञासु भृगु अपने CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
( ७ ) पिता वरुणके पास जाता है और उससे प्रश्न करता है कि जिससे ये सब भूत उत्पन्न हुए हैं, जिससे उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं और अन्तमें जिसमें ये लीन हो जाते हैं उस तत्त्वका मुझे उपदेश कीजिये । इसपर वरुणने अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और वाणी--ये ब्रह्मोपलब्धिके छः मार्ग बतलाकर उसे तप करनेका आदेश किया और कहा कि 'तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्म'--तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है । भृगुने जाकर मनःसमाधानरूप तप किया और इन सबमें अन्नको ही ब्रह्म जाना । किन्तु फिर उसमें सन्देह हो जानेपर उसने फिर वरुणके पास आकर वही प्रश्न किया और वरुणने भी फिर वही उत्तर दिया । इसके पश्चात् उसने प्राणको ब्रह्म जाना और इसी प्रकार पुनः-पुनः सन्देह होने और पुनः-पुनः वरुणके वही आदेश देनेपर अन्तमें उसने आनन्दको ही ब्रह्म निश्चय किया । यहाँ ब्रह्मज्ञानका प्रथम द्वार अन्न था । इसीसे श्रुति यह आदेश करती है कि अन्नकी निन्दा न करे-यह नियम है, अन्नका तिरस्कार न करे-यह नियम है और खूब अन्नसंग्रह करे-यह भी नियम है । यदि कोई अपने निवासस्थानपर आवे तो उसकी उपेक्षा न करे; सामर्थ्यानुसार अन्न, जल एवं आसनादिसे उसका अवश्य सत्कार करे । ऐसा करनेसे वह अन्नवान्, कीर्तिमान् तथा प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होता है। इस प्रकार अन्नकी महिमाका वर्णन कर भिन्न-भिन्न आश्रयोंमें भिन्न-भिन्न रूपसे उसकी उपासनाका विधान किया गया है। उस उपासनाके द्वारा जब उसे अपने सर्वात्म्यका अनुभव होता है उस समय उस लोकोत्तर आनन्दसे उन्मत्त होकर वह अपनी कृतकृत्यताको व्यक्त करते हुए अत्यन्त विस्मयपूर्वक गा उठता है--"अहमन्नमहमन्नम- हमन्नम् । अहमन्नादो ३ऽहमन्नादो ३ऽहमन्नादः ! अहꣳश्लोककृदहꣳश्लोक- कृदहꣳश्लोककृद्" इत्यादि । उसकी यह उन्मत्तोक्ति उसके कृतकृत्य हृदयका उद्गार है, यह उसका अनुभव है और यही है उसके आध्यात्मिक संग्रामके अयत्नसाध्य भगवत्कृपालभ्य विजयका उद्घोष । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
( ८ ) इस प्रकार हम देखते हैं कि इस उपनिषद्का प्रधान लक्ष्य ब्रह्म- ज्ञान ही है। इसकी वर्णन-शैली बड़ी ही मर्मस्पर्शिनी और शृङ्खलाबद्ध है। भगवान् शङ्कराचार्यने इसके ऊपर जो भाष्य लिखा है वह भी बहुत विचारपूर्ण है। आशा है, विज्ञजन उससे यथेष्ट लाभ उठानेका प्रयत्न करेंगे। इस उपनिषद्के प्रकाशनके साथ प्रथम आठ उपनिषदोंके प्रकाशनका कार्य समाप्त हो जाता है। हमें इनके अनुवादमें श्रीविष्णु- वापटशास्त्रीकृत मराठी-अनुवाद, श्रीदुर्गाचरण मजूमदारकृत बंगला- अनुवाद, ब्रह्मनिष्ठ पं० श्रीपीताम्बरजीकृत हिन्दी-अनुवाद और महा- महोपाध्याय डा० श्रीगंगानाथजी झा एवं पं० श्रीसीतारामजी शास्त्रीकृत अंग्रेजी अनुवादसे यथेष्ट सहायता मिली है। अतः हम इन सभी महानुभावोंके अत्यन्त कृतज्ञ हैं। फिर भी हमारी अल्पज्ञताके कारण इनमें बहुत-सी त्रुटियाँ रह जानी स्वाभाविक हैं। उनके लिये हम कृपालु पाठकोंसे सविनय क्षमा-प्रार्थना करते हैं और आशा करते हैं कि वे उनकी सूचना देकर हमें अनुगृहीत करेंगे, जिससे कि हम अगले संस्करणमें उनके संशोधनका प्रयत्न कर सकें। हमारी इच्छा है कि हम शीघ्र ही छान्दोग्य और बृहदारण्यक भी हिन्दी-संसारके सामने रख सकें। यदि विचारशील वाचकवृन्दने हमें प्रोत्साहित किया तो बहुत सम्भव है कि हम इस सेवामें शीघ्र ही सफल हो सकें। अनुवादक
शीक्षावल्ली
श्रीहरिः विषय-सूची विषय पृष्ठ १. शान्तिपाठ ... ... १३ शीक्षावल्ली · प्रथम अनुवाक २. सम्बन्ध-भाष्य ... ... १४ ३. शीक्षावल्लीका शान्तिपाठ ... ... २१ द्वितीय अनुवाक ४. शीक्षाकी व्याख्या ... ... २५ तृतीय अनुवाक ५. पाँच प्रकारकी संहितोपासना ... ... २७ चतुर्थ अनुवाक ६. श्री और बुद्धिकी कामनावालोंके लिये जप और होम-सम्बन्धी मन्त्र ३३ पञ्चम अनुवाक ७. व्याहृतिरूप ब्रह्मकी उपासना ... ... ४१ षष्ठ अनुवाक ८. ब्रह्मके साक्षात् उपलब्धिस्थान हृदयाकाशका वर्णन ... ४७ सप्तम अनुवाक ९. पाङ्क्तरूपसे ब्रह्मकी उपासना ... ... ५४ अष्टम अनुवाक १०. ओङ्कारोपासनाका विधान ... ... ५७ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
( १० ) नवम अनुवाक ११. ऋतादि शुभ कर्मोंकी आवश्यककर्त्तव्यताका विधान ... ६१ दशम अनुवाक १२. त्रिशङ्कुका वेदानुवचन ... ... ६५ एकादश अनुवाक १३. वेदाध्ययनके अनन्तर शिष्यको आचार्यका उपदेश ... ६८ १४. मोक्ष-साधनकी मीमांसा ... ... ७८ द्वादश अनुवाक ... ... ९३ ब्रह्मानन्दवल्ली प्रथम अनुवाक १५. ब्रह्मानन्दवल्लीका शान्तिपाठ ... ... ९४ १६. ब्रह्मज्ञानके फल, सृष्टिक्रम और अन्नमय कोशरूप पक्षीका वर्णन ... ९६ द्वितीय अनुवाक १७. अन्नकी महिमा तथा प्राणमय कोशका वर्णन ... १२४ तृतीय अनुवाक १८. प्राणकी महिमा और मनोमय कोशका वर्णन ... १३० चतुर्थ अनुवाक १९. मनोमय कोशकी महिमा तथा विज्ञानमय कोशका वर्णन ... १३८ पञ्चम अनुवाक २०. विज्ञानकी महिमा तथा आनन्दमय कोशका वर्णन ... १४१ षष्ठ अनुवाक २१. ब्रह्मको सत् और असत् जाननेवालोंका भेद, ब्रह्मज्ञ और अब्रह्मज्ञकी ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें शङ्का तथा सम्पूर्ण प्रपञ्चरूपसे ब्रह्मके स्थित होनेका निरूपण ... ... १५० सप्तम अनुवाक २२. ब्रह्मकी सुकृतता एवं आनन्दरूपताका तथा ब्रह्मवेत्ताकी अभय- प्राप्तिका वर्णन ... ... १७३ अष्टम अनुवाक २३. ब्रह्मानन्दके निरतिशयत्वकी मीमांसा ... ... १८२ २४. ब्रह्मात्मैक्य-दृष्टिका उपसंहार ... ... १९१ नवम अनुवाक २५. ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले विद्वान्की अभयप्राप्ति ... २०८
भृगुवल्ली
( ११ ) भृगुवल्ली प्रथम अनुवाक २६. भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मविद्याविषयक प्रश्न करना तथा वरुणका ब्रह्मोपदेश ... ... २१३ द्वितीय अनुवाक २७. अन्न ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २१८ तृतीय अनुवाक २८. प्राण ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसीमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २२० चतुर्थ अनुवाक २९. मन ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २२१ पञ्चम अनुवाक ३०. विज्ञान ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २२२ षष्ठ अनुवाक ३१. आनन्द ही ब्रह्म है—ऐसा भृगुका निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल ... २२३ सप्तम अनुवाक ३२. अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रत तथा शरीर और प्राणरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... २२६ अष्टम अनुवाक ३३. अन्नका त्याग न करनारूप व्रत तथा जल और ज्योतिरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... २२८ नवम अनुवाक ३४. अन्नसञ्चयरूप व्रत तथा पृथिवी और आकाशरूप अन्नब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... २२९ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
( १२ ) दशम अनुवाक ३५. गृहागत अतिथिको आश्रय और अन्न देनेका विधान एवं उससे प्राप्त होनेवाला फल तथा प्रकारान्तरसे ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन ... ... २३० ३६. आदित्य और देहोपाधिक चेतनकी एकता जाननेवाले उपासक- को मिलनेवाला फल ... ... २४१ ३७. ब्रह्मवेत्ताद्वारा गाया जानेवाला साम ... २४५ ३८. शान्तिपाठ ... ... २४९
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वरुण और भृगु
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः तैत्तिरीयोपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित सर्व्वाशाध्वान्तनिर्मुक्तं सर्व्वाशाभास्करं परम्। चिदाकाशावतंसं तं सद्गुरुं प्रणमाम्यहम्॥ शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु माम्। अवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
शिक्षावल्ली
शिक्षावल्ली —•1•|००|•1•— प्रथम अनुवाक सम्बन्ध-भाष्य यस्माज्जातं जगत्सर्वं यस्मिन्नेव प्रलीयते । येनेदं धार्यते चैव तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥ १ ॥ जिससे सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें ही यह लीन होता है और जिसके द्वारा यह धारण किया जाता है उस ज्ञानस्वरूपको मेरा नमस्कार है । यैरिमे गुरुभिः पूर्वं पदवाक्यप्रमाणतः । व्याख्याताः सर्ववेदान्तास्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ २ ॥ पूर्वकालमें जिन गुरुजनोंने पद, वाक्य और प्रमाणोंके विवेचनपूर्वक इन सम्पूर्ण वेदान्तों (उपनिषदों) की व्याख्या की है उन्हें मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ । तैत्तिरीयकसारस्य मयाचार्यप्रसादतः । विस्पष्टार्थरुचीनां हि व्याख्येयं संप्रणीयते ॥ ३ ॥ जो स्पष्ट अर्थ जाननेके इच्छुक हैं उन पुरुषोंके लिये मैं श्रीआचार्यकी कृपासे तैत्तिरीयशाखाके सारभूत इस उपनिषद्की व्याख्या करता हूँ । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ नित्यान्यधिगतानि कर्माण्यु- | सञ्चित पापोंका क्षय ही जिनका उपक्रमः पात्तदुरितक्षयार्था- | मुख्य प्रयोजन है ऐसे नित्यकर्मोंका नि, काम्यानि च | तथा सकाम पुरुषोंके लिये विहित फलार्थिनां पूर्वस्मिन्ग्रन्थे । इदानीं | काम्यकर्मोंका इससे पूर्ववर्ती ग्रन्थमें [ अर्थात् कर्मकाण्डमें ] परिज्ञान हो कर्मोपादानहेतुपरिहाराय ब्रह्म- | चुका है । अब कर्मानुष्ठानके कारणकी निवृत्तिके लिये ब्रह्मविद्याका विद्या प्रस्तूयते । | आरम्भ किया जाता है । कर्महेतुः कामः स्यात् । | कामना ही कर्मकी कारण हो आत्मविदेवाप्त- प्रवर्तकत्वात् । आ- | सकती है; क्योंकि वही उसकी कामो भवति प्रवर्तक है । जो लोग पूर्णकाम हैं सकामानां हि कामा- | उनकी कामनाओंका अभाव होनेपर भावे स्वात्मन्यवस्थानात् प्रवृत्त्य- | स्वरूपमें स्थिति हो जानेसे कर्ममें प्रवृत्ति होनी असम्भव है । आत्म- नुपपत्तिः । आत्मकामित्वे चाप्त- | दर्शनकी कामना पूर्ण होनेपर कामता; आत्मा हि ब्रह्म; | ही पूर्णकामता [ की सिद्धि ] होती है; क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है और तद्विदो हि परप्राप्तिं वक्ष्यति । | ब्रह्मवेत्ताको ही परमात्माकी प्राप्ति अतोऽविद्यानिवृत्तौ स्वात्मन्य- | होती है ऐसा आगे [ श्रुति ] वस्थानं परप्राप्तिः । “अभयं | बतलायेगी । अतः अविद्याकी निवृत्ति होनेपर अपने आत्मामें स्थित हो प्रतिष्ठां विन्दते” ( तै० उ० २ । | जाना ही परमात्माकी प्राप्ति है; ७ । १) “एतमानन्दमयमात्मा- | जैसा कि “अभय पद प्राप्त कर लेता है” “[ उस समय ] इस आनन्द- नमुपसंक्रामति” ( तै० उ० २ । | मय आत्माको प्राप्त हो जाता है” ८ । १२) इत्यादिश्रुतेः । | इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा- | पूर्व०—काम्य और निषिद्ध कर्मों- (मीमांसकमत- दारब्धस्य चोप- | का आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मों- समीक्षा) भोगेन क्षयान्नित्या- | का भोगद्वारा क्षय हो जानेसे तथा | नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे प्रत्यवायका नुष्ठानेन प्रत्यवायाभावाद्यत्नत | अभाव हो जानेसे अनायास ही एव स्वात्मन्यवस्थानं मोक्षः । | अपने आत्मामें स्थित होनारूप मोक्ष | प्राप्त हो जायगा; अथवा 'स्वर्ग' अथवा निरतिशयायाः प्रीतेः | शब्दवाच्य आत्यन्तिक प्रीति कर्म- स्वर्गशब्दवाच्यायाः कर्महेतु- | जनित होनेके कारण कर्मसे ही | मोक्ष हो सकता है—यदि ऐसा माना त्वात्कर्मभ्य एव मोक्ष इति चेत् । | जाय तो ? न; कर्मानैकत्वात् । अने- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि कर्म कानि ह्यारब्धफलान्यनारब्ध- | तो बहुत-से हैं । अनेकों जन्मान्तरोंमें | किये हुए ऐसे अनेकों विरुद्ध फलवाले फलानि चानेकजन्मान्तरकृतानि | कर्म हो सकते हैं जिनमेंसे कुछ तो विरुद्धफलानि कर्माणि सम्भवन्ति। | फलोन्मुख हो गये हैं और कुछ अभी अतस्तेष्वनारब्धफलानामेकस्मि- | फलोन्मुख नहीं हुए हैं । अतः उनमें | जो कर्म अभी फलोन्मुख नहीं हुए ञ्जन्मन्युपभोगक्षयासम्भवाच्छेष- | हैं उनका एक जन्ममें ही क्षय होना कर्मनिमित्तशरीरारम्भोपपत्तिः । | असम्भव होनेके कारण उन अवशिष्ट | कर्मोंके कारण दूसरे शरीरका कर्मशेषसद्भावसिद्धिश्च "तद्य इह | आरम्भ होना सम्भव ही है । रमणीयचरणाः" ( छा० उ० | “इस लोकमें जो शुभ कर्म करनेवाले ५।१०।७) “ततः शेषेण” | हैं [ उन्हें शुभयोनि प्राप्त होती है ]” | “[ उपभोग किये कर्मोंसे ] बचे हुए (आ०ध० २।२।२।३, गो० | कर्मोंद्वारा [ जीवको आगेका शरीर
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अनु० १] शाङ्करभाष्यार्थ १७ स्मृ० ११) इत्यादिश्रुतिस्मृति- | प्राप्त होता है]" इत्यादि सैकड़ों शतेभ्यः । | श्रुति-स्मृतियोंसे अवशिष्ट कर्मके | सद्भावकी सिद्धि होती ही है । इष्टानिष्टफलानामनालब्धानां | पूर्व०-इष्ट और अनिष्ट दोनों | प्रकारके फल देनेवाले सञ्चित कर्मों- क्षयार्थानि नित्यानीति चेत् ? | का क्षय करनेके लिये ही नित्यकर्म | हैं-ऐसी बात हो तो ? न; अकरणे प्रत्यवायश्रव- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उन्हें | न करनेपर प्रत्यवाय होता है-ऐसा णात् । प्रत्यवायशब्दो ह्यनिष्ट- | सुना गया है। 'प्रत्यवाय' शब्द | अनिष्टका ही सूचक है। नित्य- विषयः । नित्याकरणनिमित्तस्य | कर्मोंके न करनेके कारण जो प्रत्यवायस्य दुःखरूपस्यागामिनः | आगामी दुःखरूप प्रत्यवाय होता है | उसका नाश करनेके लिये ही परिहारार्थानि नित्यानीत्यभ्युप- | नित्यकर्म हैं-ऐसा माना जानेके | कारण वे सञ्चित कर्मोंके क्षयके लिये गमान्नानारब्धफलकर्मक्षयार्थानि । | नहीं हो सकते। यदि ना़मानारब्धकर्मक्षया- | और यदि नित्यकर्म, जिनका | फल अभी आरम्भ नहीं हुआ है उन र्थानि नित्यानि कर्माणि तथा- | कर्मोंके क्षयके लिये हों भी तो भी | वे अशुद्ध कर्मका ही क्षय करेंगे, प्यशुद्धमेव क्षपयेयुर्न शुद्धम् । | शुद्धका नहीं; क्योंकि उनसे तो विरोधाभावात् । न हीष्टफलस्य | उनका विरोध ही नहीं है। जिनका | फल इष्ट है उन कर्मोंका तो शुद्ध- कर्मणः शुद्धरूपत्वान्नित्यैर्विरोध | रूप होनेके कारण नित्यकर्मोंसे उपपद्यते । शुद्धाशुद्धयोर्हि विरो- | विरोध होना सम्भव ही नहीं है। | विरोध तो शुद्ध और अशुद्ध कर्मोंका धो युक्तः । | ही होना उचित है। तै० उ० ३-४- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
न च कर्महेतूनां कामानां │ इसके सिवा कर्मकी हेतुभूत ज्ञानाभावे निवृत्त्यसंभवादशेष- │ कामनाओंकी निवृत्ति भी ज्ञानके │ अभावमें असम्भव होनेके कारण कर्मक्षयोपपत्तिः । अनात्मविदो │ उन (नित्यकर्मों) के द्वारा सम्पूर्ण │ कर्मोंका क्षय होना सम्भव नहीं है; हि कामोऽनात्मफलविषयत्वात् । │ क्योंकि अनात्मफलविषयिणी होनेके │ कारण कामना अनात्मवेत्ताको ही स्वात्मनि च कामानुपपत्तिर्नित्य- │ हुआ करती है । आत्मामें तो कामना- │ का होना सर्वथा असम्भव है; क्योंकि प्राप्तत्वात् । स्वयं चात्मा परं │ वह नित्यप्राप्त है । और यह तो कहा │ ही जा चुका है कि स्वयं आत्मा ही ब्रह्मेत्युक्तम् । │ परब्रह्म है । नित्यानां चाकरणमभावस्ततः │ तथा नित्यकर्मोंका न करना तो │ अभावरूप है, उससे प्रत्यवाय होना प्रत्यवायानुपपत्तिरिति । अतः │ असम्भव है । अतः नित्यकर्मोंका न पूर्वोपचितदुरितेभ्यः प्राप्यमाणा- │ करना यह पूर्वसञ्चित पापोंसे प्राप्त │ होनेवाली प्रत्यवायक्रियाका ही याः प्रत्यवायक्रियाया नित्याकरणं │ लक्षण है । इसलिये “अकुर्वन् लक्षणमिति “अकुर्वन्विहितं कर्म” │ विहितं कर्म” इस वाक्यके │ ‘अकुर्वन्’ पदमें ‘शतृ’ प्रत्ययका (मनु० ११।४४) इति शतृ- │ होना अनुचित नहीं है । अन्यथा │ अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध होने- र्नानुपपत्तिः । अन्यथाभावाद्भा- │ के कारण सभी प्रमाणोंसे विरोध हो वोत्पत्तिरिति सर्वप्रमाणव्याकोप │ जायगा । अतः ऐसा मानना सर्वथा │ अयुक्त है कि [ कर्मानुष्ठानसे ] इति । अतोऽयत्नतः स्वात्मन्य- │ अनायास ही आत्मस्वरूपमें स्थिति वस्थानमित्यनुपपन्नम् । │ हो जाती है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९ यच्चोक्तं निरतिशयप्रीतेः स्वर्ग- शब्दवाच्यायाः कर्मनिमित्तत्वा- त्कर्मारब्ध एव मोक्ष इति, तन्न; नित्यत्वान्मोक्षस्य । न हि नित्यं किञ्चिदारभ्यते लोके यदारब्धं तदनित्यमिति । अतो न कर्मा- रब्धो मोक्षः । विद्यासहितानां कर्मणां नि- त्यारम्भसामर्थ्यमिति चेत् ? न; विरोधात् । नित्यं चा- रभ्यत इति विरुद्धम् । यद्विनष्टं तदेव नोत्पद्यत इति । प्रध्वंसाभाववन्नित्योऽपि मोक्ष आरभ्य एवेति चेत् ? न; मोक्षस्य भावरूपत्वात् । प्रध्वंसाभावोऽप्यारभ्यत इति न संभवति; अभावस्य विशेषाभावाद्विकल्पमात्रमेतत् । और यह जो कहा कि 'स्वर्ग' शब्दसे कही जानेवाली निरतिशय प्रीति कर्मनिमित्तक होनेके कारण मोक्ष कर्मसे ही आरम्भ होनेवाला है; सो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि मोक्ष नित्य है और किसी भी नित्य वस्तुका आरम्भ नहीं किया जाता; लोकमें जिस वस्तुका भी आरम्भ होता है वह अनित्य हुआ करती है; इसलिये मोक्ष कर्मारब्ध नहीं है । पूर्व०-ज्ञानसहित कर्मोंमें तो नित्य मोक्षके आरम्भ करनेकी भी सामर्थ्य है ही ? सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे विरोध आता है, मोक्ष नित्य है और उसका आरम्भ किया जाता है-ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। पूर्व०-जो वस्तु नष्ट हो जाती है वही फिर उत्पन्न नहीं हुआ करती, अतः प्रध्वंसाभावके समान नित्य होनेपर भी मोक्षका आरम्भ किया ही जाता है। ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि मोक्ष तो भावरूप है । प्रध्वंसाभाव भी आरम्भ किया जाता है यह संभव नहीं; क्योंकि अभावमें कोई विशेषता न होनेके कारण यह तो केवल विकल्प ही है। भावका CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[Header] २० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[वाम स्तम्भ / Left Column - संस्कृत मूल एवं भाष्य]
भावप्रतियोगी ह्यभावः । यथा ह्यभिन्नोऽपि भावो घट- पटादिभिर्विशेष्यते भिन्न इव घटभावः पटभाव इति; एवं निर्विशेषोऽप्यभावः क्रिया- गुणयोगाद्द्रव्यादिवद्विकल्प्यते । न ह्यभाव उत्पलादिवद्विशेषण- सहभावी । विशेषणवत्त्वे भाव एव स्यात् । विद्याकर्मकर्तृनित्यत्वाद्विद्या- कर्मसन्तानजनितमोक्षनित्यत्व- मिति चेत् ? न; गङ्गास्रोतोवत्कर्तृत्वस्य दुःखरूपत्वात् । कर्तृत्वोपरमे च मोक्षविच्छेदात् । तस्मादविद्या- कामकर्मोपादानहेतुनिवृत्तौ स्वा- त्मन्यवस्थानं मोक्ष इति । स्वयं
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column - हिन्दी अनुवाद]
प्रतियोगी ही 'अभाव' कहलाता है । जिस प्रकार भाव वस्तुतः अभिन्न होनेपर भी घट-पट आदि विशेषणोंसे भिन्नके समान घटभाव, पटभाव आदि रूपसे विशेषित किया जाता है इसी प्रकार अभाव निर्विशेष होनेपर भी क्रिया और गुणके योगसे द्रव्यादिके समान विकल्पित होता है । कमल आदि पदार्थोंके समान अभाव विशेषणके सहित रहनेवाला नहीं है । विशेषण- युक्त होनेपर तो वह भाव ही हो जायगा । पूर्व०-विद्या और कर्म इनका कर्ता नित्य होनेके कारण विद्या और कर्मके अविच्छिन्न प्रवाहसे होनेवाला मोक्ष नित्य ही होना चाहिये । ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती-नहीं, गङ्गाप्रवाहके समान जो कर्तृत्व है वह तो दुःख- रूप है । [अतः उससे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती, और यदि उसीसे मोक्ष माना जाय तो भी ] कर्तृत्वकी निवृत्ति होनेपर मोक्षका विच्छेद हो जायगा । अतः अविद्या, कामना और कर्म-इनके उपादान कारणकी निवृत्ति होनेपर आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही मोक्ष है-यह सिद्ध
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१ चात्मा ब्रह्म । तद्विज्ञानादविद्या- | होता है । तथा स्वयं आत्मा ही ब्रह्म | है और उसके ज्ञानसे ही अविद्याकी निवृत्तिरिति ब्रह्मविद्यार्थोपनिष- | निवृत्ति होती है; अतः अब ब्रह्म- | ज्ञानके लिये उपनिषद्का आरम्भ दारभ्यते । | किया जाता है । उपनिषदिति विद्योच्यते; | अपना सेवन करनेवाले पुरुषोंके उपनिषच्छब्द- तच्छीलिनां गर्भज- | गर्भ, जन्म और जरा आदिका निशातन निरुक्तिः | ( उच्छेद ) करने या उनका अवसादन न्मजरादिनिशात- | ( नाश ) करनेके कारण 'उपनिषद्' नात्तदवसादनाद्वा ब्रह्मणो वोप- | शब्दसे विद्या ही कही जाती है । | अथवा ब्रह्मके समीप ले जानेवाली निगमयितृत्वादुपनिषण्णं वास्यां | होनेसे या इसमें परम श्रेय ब्रह्म | उपस्थित है इसलिये [ यह विद्या 'उप- परं श्रेय इति । तदर्थत्वाद्- | निषद्' है ] । उस विद्याके ही लिये ग्रन्थोऽप्युपनिषत् । | होनेके कारण ग्रन्थ भी 'उपनिषद्' है । शीक्षावल्लीका शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥ [ प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी देवता ] मित्र ( सूर्यदेव ) हमारे लिये सुखकर हो । [ अपानवृत्ति और रात्रिका अभिमानी ] वरुण CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ हमारे लिये सुखावह हो । [ नेत्र और सूर्यका अभिमानी देवता ] अर्यमा हमारे लिये सुखप्रद हो । बलका अभिमानी इन्द्र तथा [ वाक् और बुद्धिका अभिमानी देवता ] बृहस्पति हमारे लिये शान्तिदायक हो । तथा जिसका पादविक्षेप ( डग ) बहुत विस्तृत है वह [ पादाभिमानी देवता ] विष्णु हमारे लिये सुखदायक हो । ब्रह्म [ रूप वायु ] को नमस्कार है । हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम्हींको ऋत ( शास्त्रोक्त निश्चित अर्थ ) कहूँगा और [ क्योंकि वाक् और शरीरसे सम्पन्न होनेवाले कार्य भी तुम्हारे ही अधीन हैं इसलिये ] तुम्हींको मैं सत्य कहूँगा । अतः तुम [ विद्यादानके द्वारा ] मेरी रक्षा करो तथा ब्रह्मका निरूपण करनेवाले आचार्यकी भी [ उन्हें वक्तृत्व-सामर्थ्य देकर ] रक्षा करो । मेरी रक्षा करो और वक्ताकी रक्षा करो । आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक तीनों प्रकारके तापोंकी शान्ति हो ॥ १ ॥ शं सुखं प्राणवृत्तेरहश्चाभि- | प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी मानी देवतात्मा मित्रो नोऽस्माकं | देवता मित्र हमारे लिये शं सुखरूप भवतु । तथैवापानवृत्ते रात्रेश्चाभि- | हो । इसी प्रकार अपानवृत्ति और | रात्रिका अभिमानी देवता वरुण, मानी देवतात्मा वरुणः । चक्षु- | नेत्र और सूर्यमें अभिमान करनेवाला ष्यादित्ये चाभिमान्यर्थमा । | अर्यमा, बलमें अभिमान करनेवाला बल इन्द्रः । वाचि बुद्धौ च | इन्द्र, वाणी और बुद्धिका अभिमानी | बृहस्पति तथा उरुक्रम अर्थात् बृहस्पतिः । विष्णुरुरुक्रमो वि- | विस्तीर्ण पादविक्षेपवाला पादाभिमानी स्तीर्णक्रमः पादयोरभिमानी । | देवता विष्णु-इत्यादि सभी अध्यात्म- एवमाध्यात्मदेवताः शं नः । | देवता हमारे लिये सुखदायक हों । | 'भवतु' ( हों ) इस क्रियाका सभी भवत्विति सर्वत्रानुषङ्गः । | वाक्योंके साथ सम्बन्ध है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri