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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

( १० ) नवम अनुवाक ११. ऋतादि शुभ कर्मोंकी आवश्यककर्त्तव्यताका विधान ... ६१ दशम अनुवाक १२. त्रिशङ्कुका वेदानुवचन ... ... ६५ एकादश अनुवाक १३. वेदाध्ययनके अनन्तर शिष्यको आचार्यका उपदेश ... ६८ १४. मोक्ष-साधनकी मीमांसा ... ... ७८ द्वादश अनुवाक ... ... ९३ ब्रह्मानन्दवल्ली प्रथम अनुवाक १५. ब्रह्मानन्दवल्लीका शान्तिपाठ ... ... ९४ १६. ब्रह्मज्ञानके फल, सृष्टिक्रम और अन्नमय कोशरूप पक्षीका वर्णन ... ९६ द्वितीय अनुवाक १७. अन्नकी महिमा तथा प्राणमय कोशका वर्णन ... १२४ तृतीय अनुवाक १८. प्राणकी महिमा और मनोमय कोशका वर्णन ... १३० चतुर्थ अनुवाक १९. मनोमय कोशकी महिमा तथा विज्ञानमय कोशका वर्णन ... १३८ पञ्चम अनुवाक २०. विज्ञानकी महिमा तथा आनन्दमय कोशका वर्णन ... १४१ षष्ठ अनुवाक २१. ब्रह्मको सत् और असत् जाननेवालोंका भेद, ब्रह्मज्ञ और अब्रह्मज्ञकी ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें शङ्का तथा सम्पूर्ण प्रपञ्चरूपसे ब्रह्मके स्थित होनेका निरूपण ... ... १५० सप्तम अनुवाक २२. ब्रह्मकी सुकृतता एवं आनन्दरूपताका तथा ब्रह्मवेत्ताकी अभय- प्राप्तिका वर्णन ... ... १७३ अष्टम अनुवाक २३. ब्रह्मानन्दके निरतिशयत्वकी मीमांसा ... ... १८२ २४. ब्रह्मात्मैक्य-दृष्टिका उपसंहार ... ... १९१ नवम अनुवाक २५. ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले विद्वान्‌की अभयप्राप्ति ... २०८

भृगुवल्ली

( ११ ) भृगुवल्ली प्रथम अनुवाक २६. भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मविद्याविषयक प्रश्न करना तथा वरुणका ब्रह्मोपदेश ... ... २१३ द्वितीय अनुवाक २७. अन्न ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २१८ तृतीय अनुवाक २८. प्राण ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसीमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २२० चतुर्थ अनुवाक २९. मन ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २२१ पञ्चम अनुवाक ३०. विज्ञान ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २२२ षष्ठ अनुवाक ३१. आनन्द ही ब्रह्म है—ऐसा भृगुका निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल ... २२३ सप्तम अनुवाक ३२. अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रत तथा शरीर और प्राणरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... २२६ अष्टम अनुवाक ३३. अन्नका त्याग न करनारूप व्रत तथा जल और ज्योतिरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... २२८ नवम अनुवाक ३४. अन्नसञ्चयरूप व्रत तथा पृथिवी और आकाशरूप अन्नब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... २२९ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

( १२ ) दशम अनुवाक ३५. गृहागत अतिथिको आश्रय और अन्न देनेका विधान एवं उससे प्राप्त होनेवाला फल तथा प्रकारान्तरसे ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन ... ... २३० ३६. आदित्य और देहोपाधिक चेतनकी एकता जाननेवाले उपासक- को मिलनेवाला फल ... ... २४१ ३७. ब्रह्मवेत्ताद्वारा गाया जानेवाला साम ... २४५ ३८. शान्तिपाठ ... ... २४९

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वरुण और भृगु

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित

ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः तैत्तिरीयोपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित सर्व्वाशाध्वान्तनिर्मुक्तं सर्व्वाशाभास्करं परम्। चिदाकाशावतंसं तं सद्गुरुं प्रणमाम्यहम्॥ शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु माम्। अवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

शिक्षावल्ली

शिक्षावल्ली —•1•|००|•1•— प्रथम अनुवाक सम्बन्ध-भाष्य यस्माज्जातं जगत्सर्वं यस्मिन्नेव प्रलीयते । येनेदं धार्यते चैव तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥ १ ॥ जिससे सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें ही यह लीन होता है और जिसके द्वारा यह धारण किया जाता है उस ज्ञानस्वरूपको मेरा नमस्कार है । यैरिमे गुरुभिः पूर्वं पदवाक्यप्रमाणतः । व्याख्याताः सर्ववेदान्तास्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ २ ॥ पूर्वकालमें जिन गुरुजनोंने पद, वाक्य और प्रमाणोंके विवेचनपूर्वक इन सम्पूर्ण वेदान्तों (उपनिषदों) की व्याख्या की है उन्हें मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ । तैत्तिरीयकसारस्य मयाचार्यप्रसादतः । विस्पष्टार्थरुचीनां हि व्याख्येयं संप्रणीयते ॥ ३ ॥ जो स्पष्ट अर्थ जाननेके इच्छुक हैं उन पुरुषोंके लिये मैं श्रीआचार्यकी कृपासे तैत्तिरीयशाखाके सारभूत इस उपनिषद्की व्याख्या करता हूँ । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ नित्यान्यधिगतानि कर्माण्यु- | सञ्चित पापोंका क्षय ही जिनका उपक्रमः पात्तदुरितक्षयार्था- | मुख्य प्रयोजन है ऐसे नित्यकर्मोंका नि, काम्यानि च | तथा सकाम पुरुषोंके लिये विहित फलार्थिनां पूर्वस्मिन्ग्रन्थे । इदानीं | काम्यकर्मोंका इससे पूर्ववर्ती ग्रन्थमें [ अर्थात् कर्मकाण्डमें ] परिज्ञान हो कर्मोपादानहेतुपरिहाराय ब्रह्म- | चुका है । अब कर्मानुष्ठानके कारणकी निवृत्तिके लिये ब्रह्मविद्याका विद्या प्रस्तूयते । | आरम्भ किया जाता है । कर्महेतुः कामः स्यात् । | कामना ही कर्मकी कारण हो आत्मविदेवाप्त- प्रवर्तकत्वात् । आ- | सकती है; क्योंकि वही उसकी कामो भवति प्रवर्तक है । जो लोग पूर्णकाम हैं सकामानां हि कामा- | उनकी कामनाओंका अभाव होनेपर भावे स्वात्मन्यवस्थानात् प्रवृत्त्य- | स्वरूपमें स्थिति हो जानेसे कर्ममें प्रवृत्ति होनी असम्भव है । आत्म- नुपपत्तिः । आत्मकामित्वे चाप्त- | दर्शनकी कामना पूर्ण होनेपर कामता; आत्मा हि ब्रह्म; | ही पूर्णकामता [ की सिद्धि ] होती है; क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है और तद्विदो हि परप्राप्तिं वक्ष्यति । | ब्रह्मवेत्ताको ही परमात्माकी प्राप्ति अतोऽविद्यानिवृत्तौ स्वात्मन्य- | होती है ऐसा आगे [ श्रुति ] वस्थानं परप्राप्तिः । “अभयं | बतलायेगी । अतः अविद्याकी निवृत्ति होनेपर अपने आत्मामें स्थित हो प्रतिष्ठां विन्दते” ( तै० उ० २ । | जाना ही परमात्माकी प्राप्ति है; ७ । १) “एतमानन्दमयमात्मा- | जैसा कि “अभय पद प्राप्त कर लेता है” “[ उस समय ] इस आनन्द- नमुपसंक्रामति” ( तै० उ० २ । | मय आत्माको प्राप्त हो जाता है” ८ । १२) इत्यादिश्रुतेः । | इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा- | पूर्व०—काम्य और निषिद्ध कर्मों- (मीमांसकमत- दारब्धस्य चोप- | का आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मों- समीक्षा) भोगेन क्षयान्नित्या- | का भोगद्वारा क्षय हो जानेसे तथा | नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे प्रत्यवायका नुष्ठानेन प्रत्यवायाभावाद्यत्नत | अभाव हो जानेसे अनायास ही एव स्वात्मन्यवस्थानं मोक्षः । | अपने आत्मामें स्थित होनारूप मोक्ष | प्राप्त हो जायगा; अथवा 'स्वर्ग' अथवा निरतिशयायाः प्रीतेः | शब्दवाच्य आत्यन्तिक प्रीति कर्म- स्वर्गशब्दवाच्यायाः कर्महेतु- | जनित होनेके कारण कर्मसे ही | मोक्ष हो सकता है—यदि ऐसा माना त्वात्कर्मभ्य एव मोक्ष इति चेत् । | जाय तो ? न; कर्मानैकत्वात् । अने- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि कर्म कानि ह्यारब्धफलान्यनारब्ध- | तो बहुत-से हैं । अनेकों जन्मान्तरोंमें | किये हुए ऐसे अनेकों विरुद्ध फलवाले फलानि चानेकजन्मान्तरकृतानि | कर्म हो सकते हैं जिनमेंसे कुछ तो विरुद्धफलानि कर्माणि सम्भवन्ति। | फलोन्मुख हो गये हैं और कुछ अभी अतस्तेष्वनारब्धफलानामेकस्मि- | फलोन्मुख नहीं हुए हैं । अतः उनमें | जो कर्म अभी फलोन्मुख नहीं हुए ञ्जन्मन्युपभोगक्षयासम्भवाच्छेष- | हैं उनका एक जन्ममें ही क्षय होना कर्मनिमित्तशरीरारम्भोपपत्तिः । | असम्भव होनेके कारण उन अवशिष्ट | कर्मोंके कारण दूसरे शरीरका कर्मशेषसद्भावसिद्धिश्च "तद्य इह | आरम्भ होना सम्भव ही है । रमणीयचरणाः" ( छा० उ० | “इस लोकमें जो शुभ कर्म करनेवाले ५।१०।७) “ततः शेषेण” | हैं [ उन्हें शुभयोनि प्राप्त होती है ]” | “[ उपभोग किये कर्मोंसे ] बचे हुए (आ०ध० २।२।२।३, गो० | कर्मोंद्वारा [ जीवको आगेका शरीर

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अनु० १] शाङ्करभाष्यार्थ १७ स्मृ० ११) इत्यादिश्रुतिस्मृति- | प्राप्त होता है]" इत्यादि सैकड़ों शतेभ्यः । | श्रुति-स्मृतियोंसे अवशिष्ट कर्मके | सद्भावकी सिद्धि होती ही है । इष्टानिष्टफलानामनालब्धानां | पूर्व०-इष्ट और अनिष्ट दोनों | प्रकारके फल देनेवाले सञ्चित कर्मों- क्षयार्थानि नित्यानीति चेत् ? | का क्षय करनेके लिये ही नित्यकर्म | हैं-ऐसी बात हो तो ? न; अकरणे प्रत्यवायश्रव- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उन्हें | न करनेपर प्रत्यवाय होता है-ऐसा णात् । प्रत्यवायशब्दो ह्यनिष्ट- | सुना गया है। 'प्रत्यवाय' शब्द | अनिष्टका ही सूचक है। नित्य- विषयः । नित्याकरणनिमित्तस्य | कर्मोंके न करनेके कारण जो प्रत्यवायस्य दुःखरूपस्यागामिनः | आगामी दुःखरूप प्रत्यवाय होता है | उसका नाश करनेके लिये ही परिहारार्थानि नित्यानीत्यभ्युप- | नित्यकर्म हैं-ऐसा माना जानेके | कारण वे सञ्चित कर्मोंके क्षयके लिये गमान्नानारब्धफलकर्मक्षयार्थानि । | नहीं हो सकते। यदि ना़मानारब्धकर्मक्षया- | और यदि नित्यकर्म, जिनका | फल अभी आरम्भ नहीं हुआ है उन र्थानि नित्यानि कर्माणि तथा- | कर्मोंके क्षयके लिये हों भी तो भी | वे अशुद्ध कर्मका ही क्षय करेंगे, प्यशुद्धमेव क्षपयेयुर्न शुद्धम् । | शुद्धका नहीं; क्योंकि उनसे तो विरोधाभावात् । न हीष्टफलस्य | उनका विरोध ही नहीं है। जिनका | फल इष्ट है उन कर्मोंका तो शुद्ध- कर्मणः शुद्धरूपत्वान्नित्यैर्विरोध | रूप होनेके कारण नित्यकर्मोंसे उपपद्यते । शुद्धाशुद्धयोर्हि विरो- | विरोध होना सम्भव ही नहीं है। | विरोध तो शुद्ध और अशुद्ध कर्मोंका धो युक्तः । | ही होना उचित है। तै० उ० ३-४- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

न च कर्महेतूनां कामानां │ इसके सिवा कर्मकी हेतुभूत ज्ञानाभावे निवृत्त्यसंभवादशेष- │ कामनाओंकी निवृत्ति भी ज्ञानके │ अभावमें असम्भव होनेके कारण कर्मक्षयोपपत्तिः । अनात्मविदो │ उन (नित्यकर्मों) के द्वारा सम्पूर्ण │ कर्मोंका क्षय होना सम्भव नहीं है; हि कामोऽनात्मफलविषयत्वात् । │ क्योंकि अनात्मफलविषयिणी होनेके │ कारण कामना अनात्मवेत्ताको ही स्वात्मनि च कामानुपपत्तिर्नित्य- │ हुआ करती है । आत्मामें तो कामना- │ का होना सर्वथा असम्भव है; क्योंकि प्राप्तत्वात् । स्वयं चात्मा परं │ वह नित्यप्राप्त है । और यह तो कहा │ ही जा चुका है कि स्वयं आत्मा ही ब्रह्मेत्युक्तम् । │ परब्रह्म है । नित्यानां चाकरणमभावस्ततः │ तथा नित्यकर्मोंका न करना तो │ अभावरूप है, उससे प्रत्यवाय होना प्रत्यवायानुपपत्तिरिति । अतः │ असम्भव है । अतः नित्यकर्मोंका न पूर्वोपचितदुरितेभ्यः प्राप्यमाणा- │ करना यह पूर्वसञ्चित पापोंसे प्राप्त │ होनेवाली प्रत्यवायक्रियाका ही याः प्रत्यवायक्रियाया नित्याकरणं │ लक्षण है । इसलिये “अकुर्वन् लक्षणमिति “अकुर्वन्विहितं कर्म” │ विहितं कर्म” इस वाक्यके │ ‘अकुर्वन्’ पदमें ‘शतृ’ प्रत्ययका (मनु० ११।४४) इति शतृ- │ होना अनुचित नहीं है । अन्यथा │ अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध होने- र्नानुपपत्तिः । अन्यथाभावाद्भा- │ के कारण सभी प्रमाणोंसे विरोध हो वोत्पत्तिरिति सर्वप्रमाणव्याकोप │ जायगा । अतः ऐसा मानना सर्वथा │ अयुक्त है कि [ कर्मानुष्ठानसे ] इति । अतोऽयत्नतः स्वात्मन्य- │ अनायास ही आत्मस्वरूपमें स्थिति वस्थानमित्यनुपपन्नम् । │ हो जाती है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९ यच्चोक्तं निरतिशयप्रीतेः स्वर्ग- शब्दवाच्यायाः कर्मनिमित्तत्वा- त्कर्मारब्ध एव मोक्ष इति, तन्न; नित्यत्वान्मोक्षस्य । न हि नित्यं किञ्चिदारभ्यते लोके यदारब्धं तदनित्यमिति । अतो न कर्मा- रब्धो मोक्षः । विद्यासहितानां कर्मणां नि- त्यारम्भसामर्थ्यमिति चेत् ? न; विरोधात् । नित्यं चा- रभ्यत इति विरुद्धम् । यद्विनष्टं तदेव नोत्पद्यत इति । प्रध्वंसाभाववन्नित्योऽपि मोक्ष आरभ्य एवेति चेत् ? न; मोक्षस्य भावरूपत्वात् । प्रध्वंसाभावोऽप्यारभ्यत इति न संभवति; अभावस्य विशेषाभावाद्विकल्पमात्रमेतत् । और यह जो कहा कि 'स्वर्ग' शब्दसे कही जानेवाली निरतिशय प्रीति कर्मनिमित्तक होनेके कारण मोक्ष कर्मसे ही आरम्भ होनेवाला है; सो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि मोक्ष नित्य है और किसी भी नित्य वस्तुका आरम्भ नहीं किया जाता; लोकमें जिस वस्तुका भी आरम्भ होता है वह अनित्य हुआ करती है; इसलिये मोक्ष कर्मारब्ध नहीं है । पूर्व०-ज्ञानसहित कर्मोंमें तो नित्य मोक्षके आरम्भ करनेकी भी सामर्थ्य है ही ? सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे विरोध आता है, मोक्ष नित्य है और उसका आरम्भ किया जाता है-ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। पूर्व०-जो वस्तु नष्ट हो जाती है वही फिर उत्पन्न नहीं हुआ करती, अतः प्रध्वंसाभावके समान नित्य होनेपर भी मोक्षका आरम्भ किया ही जाता है। ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि मोक्ष तो भावरूप है । प्रध्वंसाभाव भी आरम्भ किया जाता है यह संभव नहीं; क्योंकि अभावमें कोई विशेषता न होनेके कारण यह तो केवल विकल्प ही है। भावका CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

[Header] २० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[वाम स्तम्भ / Left Column - संस्कृत मूल एवं भाष्य]

भावप्रतियोगी ह्यभावः । यथा ह्यभिन्नोऽपि भावो घट- पटादिभिर्विशेष्यते भिन्न इव घटभावः पटभाव इति; एवं निर्विशेषोऽप्यभावः क्रिया- गुणयोगाद्द्रव्यादिवद्विकल्प्यते । न ह्यभाव उत्पलादिवद्विशेषण- सहभावी । विशेषणवत्त्वे भाव एव स्यात् । विद्याकर्मकर्तृनित्यत्वाद्विद्या- कर्मसन्तानजनितमोक्षनित्यत्व- मिति चेत् ? न; गङ्गास्रोतोवत्कर्तृत्वस्य दुःखरूपत्वात् । कर्तृत्वोपरमे च मोक्षविच्छेदात् । तस्मादविद्या- कामकर्मोपादानहेतुनिवृत्तौ स्वा- त्मन्यवस्थानं मोक्ष इति । स्वयं


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column - हिन्दी अनुवाद]

प्रतियोगी ही 'अभाव' कहलाता है । जिस प्रकार भाव वस्तुतः अभिन्न होनेपर भी घट-पट आदि विशेषणोंसे भिन्नके समान घटभाव, पटभाव आदि रूपसे विशेषित किया जाता है इसी प्रकार अभाव निर्विशेष होनेपर भी क्रिया और गुणके योगसे द्रव्यादिके समान विकल्पित होता है । कमल आदि पदार्थोंके समान अभाव विशेषणके सहित रहनेवाला नहीं है । विशेषण- युक्त होनेपर तो वह भाव ही हो जायगा । पूर्व०-विद्या और कर्म इनका कर्ता नित्य होनेके कारण विद्या और कर्मके अविच्छिन्न प्रवाहसे होनेवाला मोक्ष नित्य ही होना चाहिये । ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती-नहीं, गङ्गाप्रवाहके समान जो कर्तृत्व है वह तो दुःख- रूप है । [अतः उससे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती, और यदि उसीसे मोक्ष माना जाय तो भी ] कर्तृत्वकी निवृत्ति होनेपर मोक्षका विच्छेद हो जायगा । अतः अविद्या, कामना और कर्म-इनके उपादान कारणकी निवृत्ति होनेपर आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही मोक्ष है-यह सिद्ध


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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१ चात्मा ब्रह्म । तद्विज्ञानादविद्या- | होता है । तथा स्वयं आत्मा ही ब्रह्म | है और उसके ज्ञानसे ही अविद्याकी निवृत्तिरिति ब्रह्मविद्यार्थोपनिष- | निवृत्ति होती है; अतः अब ब्रह्म- | ज्ञानके लिये उपनिषद्का आरम्भ दारभ्यते । | किया जाता है । उपनिषदिति विद्योच्यते; | अपना सेवन करनेवाले पुरुषोंके उपनिषच्छब्द- तच्छीलिनां गर्भज- | गर्भ, जन्म और जरा आदिका निशातन निरुक्तिः | ( उच्छेद ) करने या उनका अवसादन न्मजरादिनिशात- | ( नाश ) करनेके कारण 'उपनिषद्' नात्तदवसादनाद्वा ब्रह्मणो वोप- | शब्दसे विद्या ही कही जाती है । | अथवा ब्रह्मके समीप ले जानेवाली निगमयितृत्वादुपनिषण्णं वास्यां | होनेसे या इसमें परम श्रेय ब्रह्म | उपस्थित है इसलिये [ यह विद्या 'उप- परं श्रेय इति । तदर्थत्वाद्- | निषद्' है ] । उस विद्याके ही लिये ग्रन्थोऽप्युपनिषत् । | होनेके कारण ग्रन्थ भी 'उपनिषद्' है । शीक्षावल्लीका शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥ [ प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी देवता ] मित्र ( सूर्यदेव ) हमारे लिये सुखकर हो । [ अपानवृत्ति और रात्रिका अभिमानी ] वरुण CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ हमारे लिये सुखावह हो । [ नेत्र और सूर्यका अभिमानी देवता ] अर्यमा हमारे लिये सुखप्रद हो । बलका अभिमानी इन्द्र तथा [ वाक् और बुद्धिका अभिमानी देवता ] बृहस्पति हमारे लिये शान्तिदायक हो । तथा जिसका पादविक्षेप ( डग ) बहुत विस्तृत है वह [ पादाभिमानी देवता ] विष्णु हमारे लिये सुखदायक हो । ब्रह्म [ रूप वायु ] को नमस्कार है । हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम्हींको ऋत ( शास्त्रोक्त निश्चित अर्थ ) कहूँगा और [ क्योंकि वाक् और शरीरसे सम्पन्न होनेवाले कार्य भी तुम्हारे ही अधीन हैं इसलिये ] तुम्हींको मैं सत्य कहूँगा । अतः तुम [ विद्यादानके द्वारा ] मेरी रक्षा करो तथा ब्रह्मका निरूपण करनेवाले आचार्यकी भी [ उन्हें वक्तृत्व-सामर्थ्य देकर ] रक्षा करो । मेरी रक्षा करो और वक्ताकी रक्षा करो । आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक तीनों प्रकारके तापोंकी शान्ति हो ॥ १ ॥ शं सुखं प्राणवृत्तेरहश्चाभि- | प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी मानी देवतात्मा मित्रो नोऽस्माकं | देवता मित्र हमारे लिये शं सुखरूप भवतु । तथैवापानवृत्ते रात्रेश्चाभि- | हो । इसी प्रकार अपानवृत्ति और | रात्रिका अभिमानी देवता वरुण, मानी देवतात्मा वरुणः । चक्षु- | नेत्र और सूर्यमें अभिमान करनेवाला ष्यादित्ये चाभिमान्यर्थमा । | अर्यमा, बलमें अभिमान करनेवाला बल इन्द्रः । वाचि बुद्धौ च | इन्द्र, वाणी और बुद्धिका अभिमानी | बृहस्पति तथा उरुक्रम अर्थात् बृहस्पतिः । विष्णुरुरुक्रमो वि- | विस्तीर्ण पादविक्षेपवाला पादाभिमानी स्तीर्णक्रमः पादयोरभिमानी । | देवता विष्णु-इत्यादि सभी अध्यात्म- एवमाध्यात्मदेवताः शं नः । | देवता हमारे लिये सुखदायक हों । | 'भवतु' ( हों ) इस क्रियाका सभी भवत्विति सर्वत्रानुषङ्गः । | वाक्योंके साथ सम्बन्ध है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

न भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं | 'शं नो भवतु' आदि मन्त्रद्वारा

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३


तासु हि सुखकृत्सु विद्या- | उनके सुखप्रद होनेपर ही ज्ञान- श्रवणधारणोपयोगा अप्रतिबन्धे- | के श्रवण, धारण और उपयोग | निर्विघ्नतासे हो सकेंगे—इसलिये ही न भविष्यन्तीति तत्सुखकर्तृत्वं | 'शं नो भवतु' आदि मन्त्रद्वारा | उनकी सुखावहताके लिये प्रार्थना प्रार्थ्यते शं नो भवत्विति । | की जाती है । ब्रह्म विविदिषुणा नमस्कार- | अब ब्रह्मके जिज्ञासुद्वारा ब्रह्म- | विद्याके विघ्नोंकी शान्तिके लिये वन्दनक्रिये वायुविषये ब्रह्म- | वायुसम्बन्धी नमस्कार और वन्दन विद्योपसर्गशान्त्यर्थं क्रियेते । सर्व- | किये जाते हैं । समस्त कर्मोंका | फल वायुके ही अधीन होनेके क्रियाफलानां तदधीनत्वाद् | कारण ब्रह्म वायु है । उस ब्रह्म वायुस्तस्मै ब्रह्मणे नमः । | ब्रह्मको मैं नमस्कार अर्थात् प्रह्वीभाव | ( विनीतभाव ) करता हूँ । यहाँ प्रह्वीभावं करोमीति वाक्यशेषः । | 'करोमि' यह क्रिया वाक्यशेष है । नमस्ते तुभ्यं हे वायो नमस्क- | हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है—मैं | तुम्हें नमस्कार करता हूँ—इस प्रकार रोमीति । परोक्षप्रत्यक्षाभ्यां | यहाँ परोक्ष और प्रत्यक्षरूपसे वायु | ही कहा गया है । वायुरेवाभिधीयते । | किं च त्वमेव चक्षुराद्यपेक्ष्य | इसके सिवा क्योंकि बाह्य चक्षु | आदिकी अपेक्षा तुम्हीं समीपवर्ती— बाह्यं संनिकृष्टमव्यवहितं प्रत्यक्षं | अव्यवहित अर्थात् प्रत्यक्ष ब्रह्म हो | इसलिये तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म ब्रह्मासि यस्मात्तस्मात्त्वामेव | कहूँगा । तुम्हींको ऋत अर्थात् शास्त्र | और अपने कर्त्तव्यानुसार बुद्धिमें प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं | सम्यक्रूपसे निश्चित किया हुआ यथाशास्त्रं यथाकर्तव्यं बुद्धौ | अर्थ कहूँगा; क्योंकि वह [ ऋत ] सुपरिनिश्चितमर्थं तदपि त्वद- |


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२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ धीनत्वात्त्वामेव वदिष्यामि । | तुम्हारे ही अधीन है । वाक् और सत्यमिति स एव वाक्कायाभ्यां | शरीरसे सम्पादन किया जानेवाला संपाद्यमानः, सोऽपि त्वदधीन | वह अर्थ ही सत्य कहलाता है, वह एव संपाद्य इति त्वामेव सत्यं | भी तुम्हारे ही अधीन सम्पादन किया वदिष्यामि । | जाता है; अतः तुम्हींको मैं सत्य | कहूँगा । तत्सर्वात्मकं वाय्वाख्यं ब्रह्म | वह वायुसंज्ञक सर्वात्मक ब्रह्म मयैवं स्तुतं सन्मां विद्यार्थिनम- | मेरेद्वारा इस प्रकार स्तुति किये वतु विद्यासंयोजनेन । तदेव | जानेपर मुझ विद्यार्थीको विद्यासे ब्रह्म वक्तारमाचार्यं वक्तृत्व- | युक्त करके रक्षा करे । वही ब्रह्म सामर्थ्यसंयोजनेनावतु । अवतु | वक्ता आचार्यको वक्तृत्वसामर्थ्यसे मामवतु वक्तारमिति पुनर्वचन- | युक्त करके उसकी रक्षा करे । मेरी | रक्षा करे और वक्ताकी रक्षा करे-इस मादरार्थम् । ॐ शान्तिः शान्तिः | प्रकार दो बार कहना आदरके लिये शान्तिरिति त्रिवचनमाध्यात्म- | है । 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः'— काधिभौतिकाधिदैविकानां विद्या- | ऐसा तीन बार कहना विद्याप्राप्तिके | आध्यात्मिक, आधिभौतिक और प्राप्त्युपसर्गाणां प्रशमार्थम् ॥१॥ | आधिदैविक विघ्नोंकी शान्तिके | लिये है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥

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द्वितीय अनुवाक शीक्षाकी व्याख्या अर्थज्ञानप्रधानत्वादुपनिषदो | उपनिषद् अर्थज्ञानप्रधान है [ अर्थात् अर्थज्ञान ही इसमें मुख्य है ], अतः इस ग्रन्थके अध्ययनका ग्रन्थपाठे यत्नोपरमो मा भूदिति प्रयत्न शिथिल न हो जाय— इसलिये पहले शीक्षाध्याय आरम्भ किया शीक्षाध्याय आरभ्यते— | जाता है— शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ १ ॥ हम शीक्षाकी व्याख्या करते हैं । [ अकारादि ] वर्ण, [ उदात्तादि ] स्वर, [ ह्रस्वादि ] मात्रा, [ शब्दोच्चारणमें प्राणका प्रयत्नरूप ] बल, [ एक ही नियमसे उच्चारण करनारूप ] साम तथा सन्तान ( संहिता ) [ ये ही विषय इस अध्यायसे सीखे जाने योग्य हैं ] । इस प्रकार शीक्षाध्याय कहा गया ॥ १ ॥ शिक्षा शिक्ष्यतेऽनयेति वर्णा- | जिससे वर्णादिका उच्चारण सीखा जाय उसे ‘शिक्षा’ कहते हैं अथवा द्युच्चारणलक्षणम् । शिक्ष्यन्त | जो सीखे जायें वे वर्ण आदि ही शिक्षा हैं । शिक्षाको ही ‘शीक्षा’ इति वा शिक्षा वर्णादयः । कहा गया है । [ शीक्षाशब्दमें शिक्षैव शीक्षा । दैर्घ्यं छान्दसम् । | ईकारका ] दीर्घत्व वैदिक प्रक्रियाके अनुसार है । उस शीक्षाकी हम तां शीक्षां व्याख्यास्यामो विस्प- व्याख्या करते हैं अर्थात् उसका ष्टमा समन्तात्कथयिष्यामः । | सर्वतोभावसे स्पष्ट वर्णन करते हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[संस्कृत-भाष्यम्] चक्षिङो वा ख्याञादिष्टस्य व्याङ्पूर्वस्य व्यक्तवाक्कर्मण एत- द्रूपम् । तत्र वर्णोऽकारादिः, स्वर उदात्तादिः, मात्रा ह्रस्वाद्याः, बलं प्रयत्नविशेषः, साम वर्णानां मध्य- मवृत्त्योच्चारणं समता, सन्तानः सन्ततिः संहितेत्यर्थः । एष हि शिक्षितव्योऽर्थः । शिक्षा यस्मिन्न- ध्याये सोऽयं शीक्षाध्याय इत्येव- मुक्त उदितः । उक्त इत्युपसं- हारार्थः ॥ १ ॥


[हिन्दी-अनुवाद] 'व्याख्यास्यामः' यह पद 'वि' और 'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'चक्षिङ्' धातुके स्थानमें वैकल्पिक 'ख्याञ्' आदेश करनेसे निष्पन्न होता है । इसका अर्थ स्पष्ट उच्चारण है । तहाँ अकारादि वर्ण, उदात्तादि स्वर, ह्रस्वादि मात्राएँ, [ वर्णोंके उच्चारणमें ] प्रयत्नविशेषरूप बल, वर्णोंको मध्यम वृत्तिसे उच्चारण करनारूप साम अर्थात् समता तथा सन्तान—सन्तति अर्थात् संहिता—यही शिक्षणीय विषय है । शिक्षा जिस अध्यायमें है उस इस शिक्षा-अध्यायका इस प्रकार कथन यानी प्रकाशन कर दिया गया । यहाँ 'उक्तः' पद उपसंहारके लिये है ॥ १ ॥


इति शीक्षावल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥

तृतीय अनुवाक पाँच प्रकारकी संहितोपासना अधुना संहितोपनिषदुच्यते— | अब संहितासम्बन्धिनी उपनिषत् ( उपासना ) कही जाती है— सह नौ यशः । सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथातः सꣳहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः । पञ्चस्वधिकरणेषु । अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता महासꣳहिता इत्याचक्षते । अथाधिलोकम् । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः संधिः ॥ १ ॥ वायुः संधानम् । इत्यधिलोकम् । अथाधि- ज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् । आपः संधिः । वैद्युतः संधानम् । इत्यधिज्यौतिषम् । अथा- धिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् ॥ २ ॥ अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनꣳ- संधानम् । इत्यधिविद्यम् । अथाधिप्रजम् । माता पूर्व- रूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा संधिः । प्रजननꣳसंधानम् । इत्यधिप्रजम् ॥ ३ ॥ अथाध्यात्मम् । अधरा हनुः पूर्वरूपम् । उत्तरा हनुरुत्तररूपम् । वाक्संधिः । जिह्वा संधानम् । इत्य- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri