भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

३८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग- प्रशस्तपादभाष्यम् विनाशास्तु सर्वस्य विभागस्य क्षणिकत्वात्, उत्तरसंयोगावधि- सद्भावात् क्षणिक इति। न तु संयोगवद्वयोरेव विभागस्तयोरेव चूँकि विभाग क्षणिक है, अतः उत्पत्ति के तृतीय क्षण में ही उसका विनाश हो जाता है । सभी विभाग क्षणिक इस हेतु से हैं कि उत्तर देश के साथ (विभाग के दोनों अवधि द्रव्यों के) संयोगपर्यन्त ही उनकी सत्ता रहती है । जिस प्रकार संयोग का विनाश उसके दोनों आश्रयों के विभाग से ही होता है, उसी प्रकार विभाग न्यायकन्दली विनाशास्तु सर्वस्य विभागस्य, क्षणिकत्वात् । कर्मजस्य विभागजस्य च कारणवृत्तेः कारणाकारणवृत्तेश्च विभागस्य सर्वस्य क्षणिकत्वमाशुतरविनाशित्वं कुतः सिद्ध- मित्यत्राह—उत्तरसंयोगावधिसद्भावादिति । उत्तरसंयोगोऽवधिः सीमा, तस्य सद्भावात् क्षणिको विभागः। किमुक्तं स्यान्न विभागो निरवधिः, किन्त्वस्योत्तरसंयोगोऽवधिरस्ति, उत्तर- संयोगश्चानन्तरमेव जायते, तस्मादाशुविनाश्युत्तरसंयोगो विभागस्यावधिरित्येतदेव कुतस्त- त्राह—न तु संयोगवदिति । यथा संयोगः स्वाश्रययोरेव परस्परविभागाद्विनश्यति, नैवं विभागः इसलिए वे दोनों युतसिद्ध नहीं हो सकते, अगर हाथ और शरीर दोनों पृथगाश्रयाश्रयी होते तो वे दोनों युतसिद्ध होते, सो नहीं है, अतः हाथ में शरीर (अयुतसिद्ध होने के कारण) समवाय सम्बन्ध से है (हाथ और शरीर दोनों में संयोग सम्बन्ध नहीं है ) । सभी विभाग के क्षणिक होने के कारण अपनी उत्पत्ति के तीसरे ही क्षण में विनष्ट हो जाते हैं । कारण (मात्र) में रहनेवाले एवं कारण और अकारण दोनों में रहनेवाले क्रिया से उत्पन्न और विभाग से उत्पन्न दोनों ही प्रकार के विभागों में क्षणिकत्व अर्थात् अतिशीघ्र विनष्ट होने का स्वभाव किस हेतु से है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'उत्तरसंयोगावधिसद्भावात्' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् उत्तर संयोग ही उसकी अवधि अर्थात् सीमा है, इसी अवधि के कारण विभाग क्षणिक है । इससे क्या तात्पर्य निकला ? (यही कि) विभाग निरवधि (नित्य) नहीं है एवं उत्तर संयोग ही उसकी अवधि है; क्योंकि विभाग के बाद ही उत्तरसंयोग की उत्पत्ति होती है । अतः शीघ्रतर विनाशी उत्तरसंयोग ही उसकी अवधि है । (प्र.) यही (उत्तरदेश का संयोग) क्यों ? (विभाग का विनाशक है ? केवल अपने दोनों अवयवियों का संयोग ही क्यों नहीं विभाग का विनाशक है ?) इसी प्रश्न का उत्तर 'न तु संयोगवत्' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । अर्थात्

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३८१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३८१ प्रशस्तपादभाष्यम् भावात् परस्परतः संयोगविभागाभाव इति। दिगादीनां तु पृथग्गतिमत्त्वाभावादिति परस्परेण संयोगविभागाभाव इति । तन्तु और अनित्य पट के अलग से स्वतन्त्र आश्रय नहीं रहते, अतः यह सिद्ध होता है कि इन दोनों में संयोग और (तन्मूलक) विभाग नहीं होते । दिगादि (विभु द्रव्यों में) स्वतन्त्र गति न रहने के कारण ही उनमें परस्पर संयोग और विभाग दोनों ही नहीं होते । न्यायकन्दली मत्त्वात् संयोगविभागौ सिद्धाविति । पूर्वमसत्यापि पृथग्गतिमत्त्वे त्वगिन्द्रियशरीरयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वे सति संयोगसम्भवादनित्यानां पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसिद्धिर्न पृथग्गमन- मित्यक्तम् । सम्प्रत्यनेनेवार्थं समर्थयितुं तन्तुपटयोरन्यतरस्य पृथग्गतिमत्त्वासम्भवेऽपि पृथगाश्रयत्या- भावात् संयोगविभागाभावं दर्शयति-तन्तुपटयोरित्यादिना । विभूनां तु द्वयोरन्यतरस्य वा पृथग्गमनाभावान्न परस्परेण संयोगः, नापि विभागः, तस्य संयोगपूर्वकत्वात्; किन्तु स्वरूपस्थितिमात्रमित्याह-दिगादीनामिति । एतावता सन्दर्भेणैतदुपपादितम्, हस्ते गच्छति शरीरं न गच्छतीति, एतावता न युतसिद्धिः । यदि तु हस्तशरीरयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वं स्यात्, तदा भवेदनयोर्युतसिद्धता । तन्तु नास्ति, शरीरस्य हस्ते समवेतत्वात् । अनित्य द्रव्य पृथक् गतिशील हैं एवं इनमें परस्पर संयोग और विभाग भी होते हैं । अतः पृथक् गमनशीलता ही अनित्यों की युतसिद्धि है । इसी अभिप्राय से 'अणु' इत्यादि सन्दर्भ लिखे गये हैं । अर्थात् परमाणु और आकाश इन दोनों का दूसरा कोई आश्रय न रहने पर भी चूँकि दोनों में से एक (अर्थात् परमाणु) स्वतन्त्र रूप से गतिशील है । अतः आकाश और परमाणु (दोनों के युतसिद्ध होने के कारण) इन दोनों में संयोग और विभाग की सिद्धि होती है । पहले पृथक् गति न रहने पर भी त्वगिन्द्रिय और शरीर में पृथगाश्रयाश्रयित्व के रहने के कारण दोनों में संयोग सम्भव होता है । इसीलिए कहा गया है कि पृथगाश्रयाश्रयित्व ही अनित्यों की युतसिद्धि है, पृथक् गमन नहीं । तन्तु और पट इन दोनों में से एक में पृथक् गति की सम्भावना न रहने पर भी, पृथक् आश्रयत्व के न रहने से ही दोनों में संयोग और विभाग नहीं होते, यही बात 'तन्तुपटयोः' इत्यादि सन्दर्भ से दिखलाया गया है । 'दिगादीनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से यह प्रतिपादित हुआ है कि दो विभुद्रव्यों में या दो में से किसी एक विभुद्रव्य में भी पृथक् गति नहीं है । अतः दो विभुद्रव्यों में परस्पर संयोग नहीं होता । संयोग के न होने के कारण ही दोनों में विभाग भी नहीं होता; क्योंकि संयुक्तद्रव्यों में ही विभाग भी होता है । इन पङ्क्तियों के द्वारा यही कहा गया है कि हाथ के चलने पर भी शरीर नहीं चलता,

३८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग- प्रशस्तपादभाष्यम् विनाशस्तु सर्वस्य विभागस्य क्षणिकत्वात्, उत्तरसंयोगावधि- सद्भावात् क्षणिक इति। न तु संयोगवद्वयोरेव विभागस्तयोरेव चूँकि विभाग क्षणिक है, अतः उत्पत्ति के तृतीय क्षण में ही उसका विनाश हो जाता है। सभी विभाग क्षणिक इस हेतु से हैं कि उत्तर देश के साथ (विभाग के दोनों अवधि द्रव्यों के) संयोगपर्यन्त ही उनकी सत्ता रहती है। जिस प्रकार संयोग का विनाश उसके दोनों आश्रयों के विभाग से ही होता है, उसी प्रकार विभाग न्यायकन्दली विनाशस्तु सर्वस्य विभागस्य, क्षणिकत्वात्। कर्मजस्य विभागजस्य च कारणवृत्तेः कारणाकारणवृत्तेश्च विभागस्य सर्वस्य क्षणिकत्वमाशुतरविनाशित्वं कुतः सिद्ध- मित्यत्राह—उत्तरसंयोगावधिसद्भावादिति। उत्तरसंयोगोऽवधिः सीमा, तस्य सद्भावात् क्षणिको विभागः। किमुक्तं स्यान्न विभागो निरवधिः; किन्त्वस्योत्तरसंयोगोऽवधिरिति, उत्तर- संयोगाश्चानन्तरमेव जायते, तस्मादाशुविनाश्युत्तरसंयोगो विभागस्यावधिरित्येतदेव कुतस्त- त्राह—न तु संयोगवदिति। यथासंयोगः स्वाश्रययोरेव परस्परविभागाद्विनश्यति, नैवं विभागः इसलिए वे दोनों युतसिद्ध नहीं हो सकते, अगर हाथ और शरीर दोनों पृथगाश्रयाश्रयी होते तो वे दोनों युतसिद्ध होते, सो नहीं है, अतः हाथ में शरीर (अयुतसिद्ध होने के कारण) समवाय सम्बन्ध से है (हाथ और शरीर दोनों में संयोग सम्बन्ध नहीं है)। सभी विभाग के क्षणिक होने के कारण अपनी उत्पत्ति के तीसरे ही क्षण में विनष्ट हो जाते हैं। कारण (मात्र) में रहनेवाले एवं कारण और अकारण दोनों में रहनेवाले क्रिया से उत्पन्न और विभाग से उत्पन्न दोनों ही प्रकार के विभागों में क्षणिकत्व अर्थात् अतिशीघ्र विनष्ट होने का स्वभाव किस हेतु से है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'उत्तरसंयोगावधिसद्भावात्' इस वाक्य से दिया गया है। अर्थात् उत्तर संयोग ही उसकी अवधि अर्थात् सीमा है, इसी अवधि के कारण विभाग क्षणिक है। इससे क्या तात्पर्य निकला ? (यही कि) विभाग निरवधि (नित्य) नहीं है एवं उत्तर संयोग ही उसकी अवधि है; क्योंकि विभाग के बाद ही उत्तरसंयोग की उत्पत्ति होती है। अतः शीघ्रतर विनाशी उत्तरसंयोग ही उसकी अवधि है। (प्र.) यही (उत्तरदेश का संयोग) क्यों ? (विभाग का विनाशक है ? केवल अपने दोनों अवयवियों का संयोग ही क्यों नहीं विभाग का विनाशक है?) इसी प्रश्न का उत्तर 'न तु संयोगवत्' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है। अर्थात्

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३८३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३८३ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगाद्विनाशो भवति । कस्मात् ? संयुक्तप्रत्ययवद्विभक्तप्रत्ययानुवृत्त्यभावात् । तस्मादुत्तरसंयोगावधिसद्भावात् क्षणिक इति । का विनाश विभाग की दोनों अवधियों के संयोग से ही नहीं होता; किन्तु विभाग के एक अवधि के उत्तर देश के साथ संयोग से भी होता है । (उत्तर संयोग होते ही विभाग का नाश हो जाता है; किन्तु) संयोग से युक्त दो द्रव्यों में 'ये दोनों संयुक्त हैं' इस प्रकार की प्रतीति की तरह विभक्त हो जानेवाले दो द्रव्यों में 'ये दोनों विभक्त हैं' इस आकार की प्रतीति चिरकाल तक नहीं होती । इससे सिद्ध होता है, उत्तर देश संयोग तक ही विभाग की सत्ता है, अतः विभाग क्षणिक है । न्यायकन्दली स्वाश्रययोरेव परस्परसंयोगाद् विनश्यति; किन्तु स्वाश्रयस्यान्येनापि संयोगात् । तथा हि वृक्षस्य मूले पुरुषेण विभागस्तयोः परस्परसंयोगाद्विनश्यति, पुरुषस्य प्रदेशान्तरसंयो- गाद्वा । एवं चेत् सिद्धमुत्तरसंयोगावधित्वं विभागस्य, तदारम्भकस्य कर्मणः स्वाश्रयस्य देशान्तरप्राप्तिमकृत्या पर्यवसानाभावात् । नन्वेतदपि साध्यसमं संयोगमात्रेण विभाग- निवृत्तिरिति ? तत्राह-संयुक्तप्रत्ययवदिति । यथा संयुक्तप्रत्ययश्चिरमनुवर्तते, नैवं स्वाश्रयस्य देशान्तरसंयोगे भूते विभक्तप्रत्ययानुवृत्तिरस्ति । अतस्तस्य संयोगमात्रेणैव निवृत्तिः । उपसंहरति-तस्मादिति । जिस प्रकार अपने आश्रयों के विभाग से ही संयोग का नाश होता है, उसी प्रकार विभाग का विनाश केवल अपने आश्रयों के संयोग से ही नहीं होता है; किन्तु अपने आश्रय का दूसरे देश के (उत्तरदेश के ) साथ संयोग से भी (विभाग का) नाश होता है; क्योंकि वृक्ष के मूल के साथ पुरुष का विभाग, उन दोनों के परस्पर संयोग से विनष्ट होता है, अथवा पुरुष का दूसरे प्रदेश के साथ संयोग से भी (उक्त विभाग विनष्ट होता है) । अगर ऐसी बात है तो फिर यह सिद्ध है कि उत्तरदेश का संयोग ही विभाग की अवधि है । विभाग के आश्रय का दूसरे देश के साथ संयोग को उत्पन्न किये बिना विभाग के कारणीभूत क्रिया का नाश नहीं होता, अतः यह सिद्ध होता है कि उत्तरदेश का संयोग विभाग की अवधि है । (प्र.) संयोग (की उत्पत्ति) होते ही विभाग का नाश हो जाता है, यह भी तो 'साध्यसम' ही है, अर्थात् सिद्ध नहीं है; किन्तु इसे भी सिद्ध ही करना है ? इसी आक्षेप के समाधान के लिए 'संयुक्तप्रत्ययवत्' यह वाक्य लिखा गया है । जिस प्रकार 'ये संयुक्त हैं' इत्यादि आकार के संयोगवैशिष्ट्य की प्रतीतियाँ चिरकाल तक रहती हैं, उसी प्रकार 'ये विभक्त हैं' इत्यादि आकार के विभागवैशिष्ट्य

३८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग- प्रशस्तपादभाष्यम् क्वचिच्चाश्रयविनाशादेव विनश्यतीति । कथम् ? यदा द्वितन्तुककारणायवे अंशौ कर्मोत्पन्नमंशवन्तरात् विभागमारभते तदैव तन्त्वन्तरेऽपि कर्मोत्पद्यते, विभागाच्च तन्त्वारम्भकसंयोगविनाशः, तन्तु- कर्मणा तन्त्वन्तराद् विभागः क्रियत इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले विभागात् तन्तुसंयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले संयोगविनाशात् तन्तुविनाशस्तस्मिन् विनष्टे तदाश्रितस्य तन्त्वन्तरविभागस्य विनाश कहीं आश्रय के विनाश से भी विभाग का नाश होता है । (प्र.) किस प्रकार ? (आश्रय के नाश से विभाग का नाश होता है ? ) (उ.) (जहाँ) जिस समय दो तन्तुओं से बने हुए पट के कारणीभूत एक तन्तु के अवयवरूप एक अंशु में उत्पन्न हुई क्रिया दूसरे अंशु से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय उक्त पट के अवयवरूप दूसरे तन्तु में भी क्रिया उत्पन्न होती है, इस विभाग से दोनों तन्तुओं के उत्पादक अंशुओं में रहनेवाले संयोग का नाश होता है । एवं तन्तु की क्रिया से इस तन्तु का दूसरे तन्तु से विभाग उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस समय दोनों तन्तुओं के विभाग से (पट के आरम्भक दोनों) तन्तुओं के संयोग का नाश होता है, उसी समय (अंशुओं के) संयोग के विनाश से तन्तु का भी विनाश होता है । तन्तु का विनाश हो जाने पर उसमें न्यायकन्दली क्वचिदाश्रयविनाशादपि विनाशः । कथमित्यज्ञस्य प्रश्नः । उत्तरम्- यदेति । द्वितन्तुककारणस्य तन्तोरवयवे अंशौ कर्मोत्पन्नमंश्वन्तरस्यांशोर्विभाग- मारभते यदा, तदैव तन्त्वन्तरेऽपि कर्म, विभागाच्चांशोस्तन्त्वारम्भकसंयोग- विनाशो यदा, तदा तन्तुकर्मणा तन्त्वन्तराद् विभागः क्रियत इत्येकः कालः । की प्रतीतियाँ चिरकाल तक नहीं होती रहतीं, अतः संयोग से ही विभाग का नाश होता है । 'तस्मात्' इत्यादि वाक्य से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । 'कहीं आश्रय के विनाश से भी (विभाग का) विनाश होता है' । 'कथम्' इत्यादि वाक्य से इस विषय में अनभिज्ञ का प्रश्न सूचित किया गया है और 'यदा' इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । जहाँ दो तन्तुओं से निष्पन्न पट के अवयविभूत एक तन्तु के समवायिकारण अंशु में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय उस अंशु के दूसरे अंशु से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय दूसरे तन्तु में भी क्रिया

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८५

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८५ प्रशस्तपादभाष्यम् इति । एवं तर्ह्युत्तरविभागानुत्पत्तिप्रसङ्गः, कारणविभागाभावात् । ततः प्रदेशान्तरसंयोगवति संयोगाभाव इत्यतो विरोधिगुणासम्भवात् । रहनेवाले दूसरे तन्तु के विभाग का विनाश होता है । इस प्रकार यहाँ आश्रय के विनाश से ही विभाग का विनाश होता है, उत्तर देश के संयोग से नहीं । (प्र.) अगर उक्त स्थल में उक्त प्रकार से आश्रय नाश के द्वारा ही विभाग का नाश मानें, तो फिर तन्तु का आकाशादि देशों के साथ जो (विभागज) विभाग उत्पन्न होता है, वह न हो सकेगा; क्योंकि इस न्यायकन्दली ततो यस्मिन् काले विभागात् तन्त्वोः संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव कालेऽद्वयोः संयोगविनाशात् तदारब्धस्य तन्तोर्विनाशः, तस्मिंस्तन्तौ विनष्टे तदाश्रितस्य तन्त्वन्तरविभागस्य विनाशः, तदाऽऽश्रयविनाशः, कारणमन्यस्य विनाशहेतोरभावात् । अत्र पुनः प्रत्यवतिष्ठते-एवं तर्हीति । द्वितन्तुकविनाशसमकालमेव तन्तुविभागस्य विनाशः । उत्तरो विभागः सक्रियस्य तन्तोराकाशादिदेशेन समं विभागजविभागेनोत्पद्यते, कारणस्य तन्त्वोर्विभागस्याभावात् । यद्युत्तरो विभागो न संवृत्तः, ततः किं तत्राह-तत इति । तत उत्तरविभागानुत्पादात् प्राक्तनस्य तन्त्वाकाशसंयोगस्य उत्पन्न होती है । जिस समय विभाग के द्वारा तन्तु के उत्पादक (दोनों अंशुओं के) संयोग का विनाश होता है । उसी समय एक तन्तु की क्रिया से उसका दूसरे तन्तु से विभाग भी उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस समय विभाग से दोनों तन्तुओं के संयोग का नाश होता है, उसी समय विभागजनित दोनों अंशुओं के संयोग के नाश के द्वारा उन दोनों अंशुओं से उत्पन्न तन्तु का भी विनाश होता है । इसलिए (इस विभाग के विनाश का) आश्रयविनाश ही कारण है; क्योंकि किसी दूसरे कारण से उसके विनष्ट होने की सम्भावना नहीं है । 'एवं तर्हि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग में फिर आक्षेप करते हैं । अगर दो तन्तुओं से निष्पन्न पट के विनाश के समय में ही तन्तुविभाग का भी विनाश हो जाता है, तो फिर उत्तरविभाग की अर्थात् क्रिया से युक्त तन्तु के आकाशादि देशों के साथ विभागज विभाग की उत्पत्ति न हो सकेगी; क्योंकि (इस विभागज विभाग के) कारण अर्थात् दोनों तन्तुओं का विभाग वहाँ नहीं है । (प्र.) अगर 'उत्तरविभाग' (अर्थात् उक्त विभागज विभाग) की उत्पत्ति न हो सकेगी तो क्या हानि होगी ? इसी प्रश्न के समाधान के लिए 'ततः' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । 'ततः' अर्थात् उत्तर विभाग की उत्पत्ति न होने के कारण, तन्तु

३८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग- प्रशस्तपादभाष्यम् कर्मणश्चिरकालावस्थायित्वं नित्यद्रव्यसमवेतस्य च नित्यत्वमिति दोषः । कथम् ? यदाप्यद्व्यणुकारम्भकपरमाणौ कर्मोत्पन्नमप्यनन्तराद् (विभागज) विभाग के कारणीभूत दोनों तन्तुओं का विभाग विनष्ट हो चुका है । इससे (१) जहाँ आश्रय के नाश से विभाग उत्पन्न होगा, उस विभाग के अवधिभूत अनित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रिया चिरकालस्थायिनी होगी (तीन क्षणों से अधिक समय तक रहेगी), (२) एवं नित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रिया तो नित्य ही हो जाएगी; क्योंकि (उक्त उत्तरदेश विभागरूप विभागज विभाग के उत्पन्न न होने के कारण तन्तु का उत्तरदेश के साथ संयोग रहेगा ही, एवं) एक प्रदेश में एक संयोग के रहते दूसरे संयोग की उत्पत्ति नहीं हो सकती, अतः क्रिया के विरोधी (दूसरे) न्यायकन्दली प्रतिबन्धकस्यनिवृत्तेः प्रदेशान्तरेण सह संयोगो न भवति, अतः कारणाद् विरोधिनो गुणस्योत्तरसंयोगस्याभावात् कर्मणः कालान्तरावस्थायित्वं स्यात्, यावदाश्रयविनाशो विनाश- हेतुर्नोपनिपतति-नित्यद्रव्यसमवेतस्य नित्यत्वमिति दोषः । कथमिति प्रश्नः । उत्तरमाह- यदेति । आप्यद्व्यणुकस्यारम्भके परमाणौ कर्मोत्पन्नमप्यनन्तराद् विभागं करोति यदा, तदैव द्व्यणुकसंयोगिन्यनारम्भकपरमाण्वन्तरेऽपि कर्म । ततो यस्मिन्नेव काले परमाणुसंयोग- और आकाश के संयोग की भी निवृत्ति नहीं होगी, जो कि पूर्ववर्ती संयोग का प्रतिबन्धक है । जिससे दूसरे प्रदेशों का संयोग रुक जाएगा । अतः विरोधी संयोग रूप गुण के न रहने से क्रिया में से स्थायित्व की आपत्ति होगी ; क्योंकि (उत्तरदेश संयोग को छोड़कर केवल) आश्रय का विनाश ही क्रिया के नाश का कारण है, सो जब तक नहीं होता, तब तक क्रिया की सत्ता रहेगी ही । फलतः, नित्यद्रव्यों (परमाणुओं) में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली क्रिया नित्य हो जाएगी । उक्त क्रिया के आश्रय परमाणु नित्य होने के कारण विनष्ट नहीं हो सकते, अतः विभागज विभाग के न मानने से क्रिया में नित्यत्व रूप दोष की आपत्ति होगी । 'कथम्' यह पद प्रश्न का बोधक है । 'यदा' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । जिस समय जलीय द्व्यणुक के एक परमाणु में उत्पन्न हुई क्रिया, उसके दूसरे जलीय परमाणु के साथ विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय दूसरे परमाणु में भी क्रिया उत्पन्न होती है, जो जलीय द्व्यणुक का उत्पादक तो नहीं है; किन्तु उसमें जलीय द्व्यणुक का संयोग है । इसके बाद जिस समय (जलीय दोनों) परमाणुओं के संयोग के विनाश से, उन परमाणुओं

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३८५ प्रशस्तपादभाष्यम् इति । एवं तर्ह्युत्तरविभागानुपत्तिप्रसङ्गः, कारणविभागाभावात् । ततः प्रदेशान्तरसंयोगवति संयोगाभाव इत्यतो विरोधिगुणासम्भवात् । रहनेवाले दूसरे तन्तु के विभाग का विनाश होता है । इस प्रकार यहाँ आश्रय के विनाश से ही विभाग का विनाश होता है, उत्तर देश के संयोग से नहीं । (प्र.) अगर उक्त स्थल में उक्त प्रकार से आश्रय नाश के द्वारा ही विभाग का नाश मानें, तो फिर तन्तु का आकाशादि देशों के साथ जो (विभागज) विभाग उत्पन्न होता है, वह न हो सकेगा; क्योंकि इस न्यायकन्दली ततो यस्मिन् काले विभागात् तन्त्वोः संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव कालेऽंश्वोः संयोगविनाशात् तदारब्धस्य तन्तोर्र्विनाशः, तस्मिंस्तन्तौ विनष्टे तदाश्रितस्य तन्त्वन्तरविभागस्य विनाशः, तदाऽऽश्रयविनाशः, कारणमन्यस्य विनाशहेतोरभावात् । अत्र पुनः प्रत्यवतिष्ठते-एवं तर्हीति । द्वितन्तुकविनाशसमकालमेव तन्तुविभागस्य विनाशः । उत्तरो विभागः सक्रियस्य तन्तोराकाशादिदेशेन समं विभागजविभागेनोत्पद्यते, कारणस्य तन्त्वोर्विभागस्याभावात् । यद्युत्तरो विभागो न संवृत्तः, ततः किं तत्राह-तत इति । तत उत्तरविभागानुत्पादात् प्राक्तनस्य तन्त्याकाशसंयोगस्य उत्पन्न होती है । जिस समय विभाग के द्वारा तन्तु के उत्पादक (दोनों अंशुओं के) संयोग का विनाश होता है । उसी समय एक तन्तु की क्रिया से उसका दूसरे तन्तु से विभाग भी उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस समय विभाग से दोनों तन्तुओं के संयोग का नाश होता है, उसी समय विभागजनित दोनों अंशुओं के संयोग के नाश के द्वारा उन दोनों अंशुओं से उत्पन्न तन्तु का भी विनाश होता है । इसलिए (इस विभाग के विनाश का) आश्रयविनाश ही कारण है; क्योंकि किसी दूसरे कारण से उसके विनष्ट होने की सम्भावना नहीं है । 'एवं तर्हि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग में फिर आक्षेप करते हैं । अगर दो तन्तुओं से निष्पन्न पट के विनाश के समय में ही तन्तुविभाग का भी विनाश हो जाता है, तो फिर उत्तरविभाग की अर्थात् क्रिया से युक्त तन्तु के आकाशादि देशों के साथ विभागज विभाग की उत्पत्ति न हो सकेगी; क्योंकि (इस विभागज विभाग के) कारण अर्थात् दोनों तन्तुओं का विभाग वहाँ नहीं है । (प्र.) अगर 'उत्तरविभाग' (अर्थात् उक्त विभागज विभाग) की उत्पत्ति न हो सकेगी तो क्या हानि होगी ? इसी प्रश्न के समाधान के लिए 'ततः' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । 'ततः' अर्थात् उत्तर विभाग की उत्पत्ति न होने के कारण, तन्तु

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८७ प्रशस्तपादभाष्यम् विभागं करोति, तदैवाण्यन्तरेऽपि कर्म । ततो यस्मिन्नेव काले विभागाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, तदैवाण्यन्तरकर्मणा द्वयणुकण्वोर्वि- भागः क्रियते । ततो यस्मिन्नेव काले विभागाद् द्वयणुकाणुसंयोगस्य विनाशः, तस्मिन्नेव काले संयोगाद्विनाशाद् द्वयणुकस्य विनाशः । उत्तरदेश के साथ तन्तु का संयोग भी उक्त स्थल में नहीं है, (अतः कथित युक्ति से) तन्तु प्रभृति अनित्य द्रव्यों में रहनेवाली उक्त क्रिया क्षणिक न होकर अधिक समय तक रहेगी एवं परमाणु प्रभृति नित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रिया तो नित्य ही हो जाएगी । (प्र.) कैसे ? (अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रियाओं में नित्यत्व की आपत्ति किस प्रकार किस स्थिति में और किस स्थल में होगी ? (उ.) जिस समय (जहाँ) जलीय द्वयणुक के उत्पादक जलीय परमाणु में उत्पन्न क्रिया (जलीय द्वयणुक के अनुत्पादक) दूसरे परमाणु के साथ (जलीय द्वयणुक के) विभाग को उत्पन्न करती है, उसी क्षण में (जलीय द्वयणुक के ) उत्पादक निष्क्रिय दूसरे परमाणु में भी क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस क्षण में विभाग के द्वारा द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश होता है, उसी क्षण (जलीय द्वयणुक के अनुत्पादक) दूसरे परमाणु की क्रिया से जलीय द्वयणुक और (उदासीन) परमाणु इन दोनों में भी विभाग उत्पन्न होता है । इसके अनन्तर जिस क्षण में (इस जलीय द्वयणुक और उदासीन परमाणु के ) विभाग से जलीय द्वयणुक और (उदासीन) परमाणु इन दोनों के संयोग का नाश होता है, उसी क्षण (द्वयणुक के उत्पादक जलीय दोनों परमाणुओं के) संयोग के नाश से जलीय न्यायकन्दली विनाशात् तदारब्धस्य द्वयणुकस्य विनाशः, तस्मिन् द्वयणुके विनष्टे तदाश्रि- तस्य द्वयणुकाणुविभागस्य विनाशः, ततो विभागस्य कारणस्याभावात् परमाणोराकाशदेशविभागानुत्पादे पूर्वसंयोगानिवृत्तावुत्तरसंयोगस्य विरोधिगुणस्य के द्वारा उत्पन्न द्वयणुक का विनाश होता है, उसी समय द्वयणुकविनाश के कारण उसमें रहनेवाले विभाग का भी नाश हो जाता है । इसके बाद विभागरूप कारण के न रहने से परमाणु का आकाशादि देशों के साथ विभाग उत्पन्न न हो सकेगा, जिससे कि पहले संयोग का विनाश भी रुक जाएगा । (इस विनाश के रुक जाने पर) उत्तर संयोग रूप

३८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग- प्रशस्तपादभाष्यम् तस्मिन् विनष्टे तदाश्रितस्य द्व्यणुकाणुविभागस्य विनाशः। ततश्च विरोधि- गुणासम्भवान्नित्यद्रव्यसमवेतकर्मणो नित्यत्वमिति। द्व्यणुक का भी नाश हो जाता है। जलीय द्व्यणुक के विनष्ट हो जाने पर उसमें रहनेवाले जलीय द्व्यणुक और उदासीन परमाणु के विभाग का भी नाश होता है। अतः (उत्तरसंयोग रूप) विरोधी गुण की उत्पत्ति की सम्भावना नहीं रहती; क्योंकि उत्तरदेश संयोग के लिए पूर्वदेश के संयोग का विनाश भी आवश्यक है। एवं पूर्वदेश के संयोग का विनाश तभी होगा, जब कि उससे अव्यवहित पूर्व काल में जलीय द्व्यणुक और उदासीन परमाणु के विभाग की सत्ता रहे, (क्योंकि वही वह विरोधी गुण है, जिससे यहाँ उस पूर्वदेश के संयोग का नाश होगा। विरोधी गुण की इस असम्भावना से) परमाणुरूप नित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रिया में नित्यत्व की आपत्ति होगी। न्यायकन्दली विनाशहेतोरसम्भवान्नित्यपरमाणुसमवेतस्य कर्मणो नित्यत्वं स्यात्। पूर्वोक्तं तावत्परिहरति—तन्त्वंश्र्वन्तरविभागाद्विभाग इत्यदोषः। कार्याविष्टे कारणे कर्मोत्पन्नमवयवान्तरेण समं स्वाश्रयस्य विभागं कुर्वदाकाशादिदेशाद्विभागं न करोतीति नियमः, आकाशादिदेशविभाग- कर्तृत्वस्य विशिष्टविभागानाम्भकत्वेन व्याप्तत्वात्। अवयवान्तरस्यावयवेन स्वाश्रयसंयोगिना समं तु करोत्येव, विरोधाभावात्। अतो द्वितन्तुककारणे (क्रिया का) विरोधी गुण के विनाश का कोई कारण ही नहीं रह पाएगा। अतः परमाणु में रहनेवाली क्रिया (परमाणु की नित्यता के कारण) नित्य हो जाएगी। 'तन्त्वंश्र्वन्तरविभागाद्विभागः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पूर्वकथित दोष का परिहार करते हैं। यह नियम है कि कार्य के साथ सम्बद्ध कारण में उत्पन्न हुई क्रिया अपने आश्रय के दूसरे अववयव के साथ विभाग को उत्पन्न करने के समय अपने आश्रय के आकाशादि देशों के साथ विभागों को उत्पन्न नहीं करती; क्योंकि यह व्याप्ति है कि जो अपने आश्रय का आकाशादि देशों के साथ विभाग का उत्पादक होगा, वह कभी भी विशिष्ट विभाग (अर्थात् क्रिया के आश्रयीभूत एक अवयव का दूसरे अवयव के साथ विभाग) का उत्पादक नहीं हो सकता। (किन्तु उक्त क्रिया) अपने आश्रय के संयोग से युक्त अवयव के साथ तो विभाग को अवश्य ही उत्पन्न करती है; क्योंकि इसमें कोई विरोध नहीं है। दो तन्तुओं से बने हुए पट के कारणीभूत एक तन्तु में उत्पन्न हुई क्रिया,

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८९ प्रशस्तपादभाष्यम् तन्त्वंशवन्तरविभागाद्विभाग इत्यदोषः। आश्रयविनाशात् तन्त्वोरेव विभागो विनष्टो न तन्त्वंशवन्तरविभाग इति। एतस्मादुत्तरो विभागो जायते, अङ्गुल्या- काशविभागाच्छरीराकाशविभागवत्, तस्मिन्नेव काले कर्म संयोगं कृत्वा विनश्यतीत्यदोषः। (उ.) (आश्रय के विनाश से विभागनाश के प्रसङ्ग में जो उत्तर विभाग की अनुत्पत्ति का अतिप्रसङ्ग दिया गया है, उसका यह समाधान है कि) उत्तर विभाग आकाशादि देशों के साथ तन्तु के (विभागज) विभाग एवं तन्तु और तन्तु के अनारम्भक दूसरे अंशु, इन दोनों के विभाग से उत्पन्न होता है, अतः (प्रकृत में उक्त विभागानुत्पत्ति रूप) दोष नहीं है; क्योंकि आश्रय के विनाश से दोनों तन्तुओं का विभाग ही नष्ट होता है, इससे तन्तु और (उसके अनुत्पादक) दूसरे तन्तु, इन दोनों के विभाग का नाश नहीं होता। इसी विभाग से आकाशादि देशों के साथ तन्तु के इस उत्तर विभाग की उत्पत्ति होती है, जैसे कि अङ्गुलि और आकाश के विभाग से शरीर और आकाश के विभाग की उत्पत्ति होती है। उसी समय क्रिया उत्तर (देश) संयोग को उत्पन्न कर स्वयं भी विनष्ट हो जाती है। इस प्रकार अनित्य द्रव्यों की क्रिया में चिर- स्थायित्व और परमाणुओं में रहनेवाली क्रियाओं में नित्यत्व रूप दोनों दोषों का निराकरण हो जाता है। न्यायकन्दली तन्तौ कर्मोत्पन्नं तन्त्वन्तराद् विभागसमकालं तदंशुनापि तन्तुसंयुक्तेन समं विभागमार- भते। स च विभागस्तन्तोरंशोश्चावस्थानादवस्थित इत्याह-आश्रयविनाशात् तन्त्वोरेव विभागो विनष्टः, तन्त्वंशवन्तरविभागस्त्ववस्थित इति। किम्तो यद्येवमित्यत आह-एतस्मादिति । अङ्गुल्याकाश- विभागाच्छरीराकाशविभागवत् । यथा कर्मजादङ्गुल्याकाशविभागाच्छरीरा- दूसरे तन्तु के साथ विभाग की उत्पत्ति के समय ही तन्तु के साथ संयुक्त अंशु के साथ भी विभाग को उत्पन्न करती है। यह विभाग (अपने आश्रय) तन्तु और अंशु के विद्यमान रहने के कारण रहता ही है। यही बात 'आश्रयविनाशात्त- न्त्वोरेव विभागो विनष्टः' इत्यादि सन्दर्भ से कहा गया है। अर्थात् आश्रय के विनाश से दोनों तन्तुओं के विभाग का ही विनाश होता है, तन्तु और दूसरे अंशु का विभाग तो रहता ही है। अगर ऐसी बात है तो इससे प्रकृत में क्या? इसी प्रश्न का समाधान 'एतस्मात्' इत्यादि से दिया गया है। 'अङ्गुल्याकाशविभागाच्छरीराकाशविभागवत्' इस उदाहरण वाक्य का यह तात्पर्य है कि जैसे अंगुलि और आकाश के विभाग से शरीर और

३१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग- प्रशस्तपादभाष्यम् अथवा अंश्वन्तरविभागोत्पत्तिकालं तस्मिन्नेव तन्तौ कर्मोत्पद्यते, ततोऽश्वन्तरविभागात् तन्त्वारम्भकसंयोगविनाशः, तन्तु- अथवा (इस प्रकार से भी आश्रय के विनाश से विभाग का विनाश हो सकता है) जिस समय (तन्तु के उत्पादक एक अंशु का) दूसरे अंशु के साथ विभाग उत्पन्न होता है, उसी समय (उन्हीं अंशुओं से आरब्ध) उसी तन्तु में क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद एक अंशु का दूसरे अंशु के विभाग से तन्तु के उत्पादक (दोनों अंशुओं के) संयोग का विनाश होता है न्यायकन्दली काशविभागः, एवं कर्मजादंशुतन्तुविभागात् तन्त्वाकाशविभाग इत्युदाहरणार्थः । हस्ताकाशविभागाच्छरीराकाशविभागो युक्तो न त्वङ्गुल्याकाशविभागात् । अङ्गुलेः शरीरं प्रत्यकारणत्वादिति चेत् ? हस्तोऽपि बाहोराश्रयो न शरीरस्य, कुतस्तद्विभागादपि शरीरविभागादपि शरीरविभागः । अथ समस्तावयवव्यापित्वाच्छरीरस्य हस्तोऽप्याश्रयः, एवमङ्गुल्यप्याश्रयो हस्ताङ्गुल्याद्यवयवसमुदाये शरीरप्रत्यभिज्ञानात् । तस्मिंस्तन्त्वाकाशविभागे जाते पूर्वसंयोगस्य प्रतिबन्धकस्य निवृत्तौ तन्तुसमवेतं कर्मोत्तरसंयोगं कृत्या ततो विनश्य- तीत्याह-तस्मिन्निति । प्रकारान्तरेणाप्याश्रयविनाशाद् विनाशं कथयति-अथवेति । अंश्वन्तर- विभागोत्पत्तिकालं तस्मिन्नेव तन्तौ विभज्यमानावयवे कर्मोत्पद्यते, आकाश का विभाग उत्पन्न होता है, उसी प्रकार क्रियाजनित अंशु और तन्तु के विभाग से तन्तु और आकाश का विभाग भी उत्पन्न होता है । (प्र.) शरीर और आकाश का विभाग तो हाथ और आकाश के विभाग से होना चाहिए, अंगुलि और आकाश के विभाग से नहीं; क्योंकि अंगुलि शरीर का कारण नहीं है । (उ.) हाथ भी तो बाँह का आश्रय (अवयव) है, शरीर का नहीं, तो फिर हाथ और आकाश के विभाग से ही शरीर और आकाश का विभाग कैसे उत्पन्न होगा ? अगर शरीर सभी अवयवों में व्याप्त है, तो फिर हाथ की तरह अंगुलि भी शरीर का आश्रय है ही; क्योंकि हाथ, अंगुलि प्रभृति सभी समुदायों में शरीर की प्रत्यभिज्ञा होती है । 'तस्मिन्' इत्यादि वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि तन्तु और आकाश के विभाग की उत्पत्ति हो जाने के बाद, प्रतिबन्धकीभूत पूर्वसंयोग के विनष्ट हो जाने पर, तन्तु में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली क्रिया उत्तर संयोग को उत्पन्न कर स्वयं भी विनष्ट हो जाती है । 'अथवा' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा आश्रय के नाश से विभागनाश की दूसरी रीति दिखलायी गई है । जहाँ दूसरे अंशु में विभाग की उत्पत्ति के समय ही विभक्त अवयव रूप उसी (अंशु विभाग के आश्रय) तन्तु में क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद विभाग

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१९ प्रशस्तपादभाष्यम् कर्मणा च तन्त्वन्तराद् विभागः क्रियत इत्येकः कालः । ततः संयोगविनाशात् तन्तुविनाशः, तद्विनाशाच्च तदाश्रितयोर्विभागकर्मणोर्युगपद्विनाशः । और तन्तु की क्रिया से एक तन्तु का दूसरे तन्तु के साथ विभाग उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद कथित दोनों अंशुओं के विभाग के द्वारा उत्पन्न दोनों अंशुओं के संयोग के विनाश से तन्तु का विनाश होता है एवं तन्तु के विनाश से उसमें रहनेवाले विभाग और क्रिया, इन दोनों का एक ही समय विनाश हो जाता है । अतः इस पक्ष में क्रिया में चिरकालस्थायित्व की आपत्ति भी नहीं है । न्यायकन्दली ततो विभागात् तन्त्वारम्भकस्यांशोःसंयोगस्य विनाशः, तन्तुकर्मणा च तस्य तन्तोरुतस्तन्त्वन्तराद् विभाग इत्येकः कालः । तदनन्तरं संयोगस्य विनाशात् तदारब्धस्य तन्तोर्विनाशः, तद्विनाशाच्च तदाश्रितयोर्विभागकर्मणोर्युगपद्विनाशः । यच्च नित्यसमवेतस्य नित्यत्वमिति चोदितम्, तत्र प्रतिसमाधानं नोक्तम्, तस्यात्यन्तमसङ्गतार्थत्वात् । कार्याविष्टे हि कारणे कर्मोत्पन्नमवयवान्तरविभागसमकालमाकाशादिदेशेन समं विभागं न करोति, आकाशादिविभागकर्तृत्त्वस्य द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधिविभागोत्पादकत्वस्य च विरोधात् । अनारम्भके तु द्वयणुकसंयोगिनि परमाणौ कर्म द्वयणुकविभागसमकालं तस्याकाशदेशेन के द्वारा तन्तु के उत्पादक अंशु के संयोग का विनाश होता है एवं तन्तु की क्रिया से उस तन्तु का दूसरे तन्तु से विभाग उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद संयोग के विनाश से उस संयोग के द्वारा उत्पन्न तन्तु का विनाश होता है । तन्तु के विनष्ट हो जाने से उसमें रहनेवाले विभाग और कर्म दोनों ही एक ही समय नष्ट हो जाते हैं । नित्य द्रव्य में रहनेवाले कर्म में नित्यत्व की जो शङ्का की गई है, उसका उत्तर इस कारण से नहीं दिया गया, चूँकि वह अत्यन्त ही निःसार है । कार्य के साथ सम्बद्ध कारण में उत्पन्न हुई क्रिया दूसरे अवयव के साथ विभाग के उत्पत्तिक्षण में आकाशादि देशों के साथ (अपने आश्रय के) विभाग को नहीं उत्पन्न करती; क्योंकि आकाशादि देशों के साथ विभाग का कर्तृत्व एवं द्रव्य के उत्पादक संयोग के विभाग का कर्तृत्व, ये दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध हैं (अतः एक समय एक आश्रय में दोनों नहीं रह सकते), द्वयणुक के संयोग से युक्त (उस द्वयणुक के ) अनुत्पादक परमाणु में (विद्यमान) क्रिया द्वयणुक की उत्पत्ति के समय ही आकाशादि देशों के साथ भी विभाग

३९२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग- प्रशस्तपादभाष्यम् तन्तुवीरणयोर्वा संयोगे सति द्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेनाश्रयविनाश- संयोगाभ्यां तन्तुवीरणविभागविनाश इति । अथवा (इस स्थिति में भी आश्रय के नाश से विभाग का नाश हो सकता है, जहाँ) तन्तु और वीरण (तृणविशेष) में संयोग होता है । इस संयोग से किसी द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती; क्योंकि यह विजातीय दो द्रव्यों का संयोग है । पहले कथित रीति के अनुसार आश्रय का विनाश और संयोग इन दोनों से तन्तु और वीरण के विभाग का नाश होता है । न्यायकन्दली समं विभागं करोत्येव, ततो विभागाच्च परमाणोराकाशसंयोगनिवृत्तावुत्तरसंयोगे सति तदाश्रितस्य कर्मणो विनाशो भवत्येव । समानजातीयसंयोगे सति द्रव्योत्पत्तावाश्रयविनाशाद् विभागकर्मणोर्विनाशः कथितः, सम्प्रति विजातीयसंयोगे द्रव्यानुत्पत्तौ संयोगाश्रयविनाशाभ्यां विभागविनाशं कथयति-तन्तु- वीरणयोर्वा संयोगे सतिद्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेनेति । तन्त्वारम्भकांशौ कर्मोत्पत्ति- समकालं वीरणे कर्म, ततोंऽशुक्रियया अंशान्तराद् विभागो वीरणकर्मणा च तस्य विभज्य- मानावयवेन तन्तुना आकाशाद्देशेन च समं विभागः क्रियते, ततोंऽशुविभागादंशुसंयोगविनाशो को अवश्य ही उत्पन्न करती है । इसके बाद विभाग के द्वारा परमाणु और आकाश के संयोग के नष्ट हो जाने पर उत्तर संयोग के बाद परमाणु में रहनेवाली क्रिया का भी अवश्य विनाश होता है । (समानजातीय द्रव्यों के संयोग के रहने पर) द्रव्य की उत्पत्ति के बाद आश्रय के विनाश से विभाग और क्रिया दोनों का ही नाश अभी कहा गया है । अब विजातीय द्रव्यों के संयोग के रहने के कारण द्रव्य की उत्पत्ति न होने पर भी संयोग और आश्रय के विनाश, इन दोनों से विभाग का विनाश 'तन्तुवीरणयोर्वा संयोगे सति द्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेन' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कहा गया है । इसकी यही प्रक्रिया है कि तन्तु के उत्पादक अंशु में क्रिया की उत्पत्ति के समय ही वीरण (तृणविशेष) में भी क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद अंशु की क्रिया से दूसरे अंशु के साथ उसका विभाग उत्पन्न होता है । वीरण की क्रिया से अवयव से विभक्त होते हुए तन्तु के साथ एवं आकाशादि देशों के साथ भी विभाग उत्पन्न होते हैं ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१३ प्रशस्तपादभाष्यम् परत्वमपरत्वं च परापराभिधानप्रत्ययनिमित्तम् । तत्तु द्विविधं दिक्कृतं कालकृतं च । तत्र दिक्कृतं दिग्विशेषप्रत्ययकम् । 'यह इससे पर (दूर अथवा ज्येष्ठ) है', 'यह इससे अपर (समीप अथवा कनिष्ठ) है' इन शब्दों के प्रयोगों और इन आकार के ज्ञानों का (असाधारण) कारण ही (क्रमशः) परत्व और अपरत्व है । १. दिक्कृत (दिशामूलक) और २. कालकृत (कालमूल) भेद से वे दोनों ही दो-दो प्रकार के हैं । इनमें दिक्कृत (परत्व और अपरत्व) दिशाओं की न्यायकन्दली वीरणविभागाच्च तन्तुवीरणसंयोगस्याकाशवीरणसंयोगस्य च विनाशः, ततोऽशुसंयोग- विनाशात् तन्तुविनाशो वीरणस्य चोत्तरसंयोगोऽत उत्तरसंयोगाश्रयविनाशाभ्यां तन्तु- वीरणविभागस्य विनाश इति प्रक्रिया । परत्वमपरत्वं च परापराभिधानप्रत्ययनिमित्तमिति । परमित्यभिधानस्य प्रत्ययस्य च निमित्तं परत्वम् । अपरमित्यभिधानप्रत्यययोर्निमित्तमपरत्वमिति कार्येण सत्तां प्रतिपादयति । यद्यप्याकाशं कण्ठाद्याकाशसंयोगादिकं च परापराभिधानयोः कारणं भवति, यद्यप्यात्ममनःसंयोगादिकं च परापरप्रतीतिकारणं स्यात्, तथापि निमित्तान्तरसिद्धिः, विशिष्टप्रत्ययस्य कारणविशेष- इसके बाद दोनों अंशुओं के विभाग से दोनों अंशुओं के (तन्तु के उत्पादक) संयोग का विनाश होता है । एवं वीरण के विभाग से तन्तु और वीरण के संयोग का एवं आकाश और वीरण के संयोग का भी विनाश होता है । इसके बाद दोनों अंशुओं के संयोग के विनाश से तन्तु का विनाश होता है एवं वीरण और उत्तरदेश, इन दोनों के संयोग की उत्पत्ति होती है । अतः उत्तरदेशसंयोग और आश्रय के विनाश इन दोनों से तन्तु और वीरण के विभाग का विनाश होता है । 'परत्वमपरत्वञ्च परापराभिधानप्रत्ययनिमित्तम्' इस सन्दर्भ के द्वारा यह उपपादन किया गया है कि 'यह इससे पर है' इत्यादि आकार के ज्ञान और शब्द .के प्रयोग इन दोनों का कारणीभूत गुण ही 'परत्व' है एवं 'यह इससे अपर है' इस आकार के ज्ञान और शब्द के प्रयोग, इन दोनों का कारणीभूत गुण ही 'अपरत्व' है । इस प्रकार कार्य से कारण के प्रतिपादन की रीति से परत्व और अपरत्व की सत्ता दिखलायी गयी है । यद्यपि 'यह पर है' एवं 'यह अपर है' इत्यादि शब्दों के प्रयोगों के आकाश, कण्ठ एवं आकाश के संयोगादि भी कारण हैं एवं उक्त आकार की प्रतीतियों के आत्मा एवं मन के संयोगादि भी कारण हैं, फिर भी (ये सब सामान्य कारण हैं, उन विशिष्ट

३९४ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व- प्रशस्तपादभाष्यम् कालकृतं च वयोभेदप्रत्यायकम् । तत्र दिक्कृतस्योत्पत्तिरभिधीयते । कथम् ? एकस्यां दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोः संयुक्तसंयोगबहूल्प- विशिष्टता को समझाते हैं। एवं कालकृत (परत्व और अपरत्व वस्तुओं के) वयस् के भेद को समझाते हैं। इनमें दिक्कृत (परत्व और अपरत्व) की उत्पत्ति बतलाते हैं। (प्र.) किस प्रकार (इनकी उत्पत्ति होती है ?) (उ.) एक दिशा में अवस्थित दो कार्य द्रव्यों में (इन द्रव्यों के आश्रयीभूत प्रदेश के साथ) संयुक्त (प्रदेशों के) संयोग की अधिकता और अल्पता न्यायकन्दली मन्तरेणोत्पत्त्यभावात् । एकत्र द्वयोरुपन्यासस्तयोरितरेतरसापेक्षत्वात् । 'तत् द्विविधम्', 'तत्' परत्वमपरत्वं च 'द्विविधम्' द्विप्रकारमिति भेदनिरूपणम् । किंकृतस्तयोर्भेद इत्याशङ्क्य कारणभेदाद् भेदमाह-दिक्कृतं कालकृतं चेति । दिक्पिण्डसंयोगकृतं दिक्कृतम् । कालपिण्डसंयोगकृतं कालकृतम् । अनयोर्भेदः कुतः प्रत्येतव्यः ? कार्यभेदादित्याह-दिक्कृतं दिग्विंशेषप्रत्यायकम्, कालकृतं तु वयोभेद- प्रत्यायकम् । दिक्कृतं परत्वं देशविप्रकृष्टत्वं प्रत्याययति, अपरत्वं च देशसंनिकृष्टत्वम् । कालकृतं तु परत्वं पिण्डस्य कालविप्रकृष्टत्वं प्रतिपादयति, अपरत्वं च शब्द प्रयोगों के एवं उक्त प्रतीतियों के लिए) विशेष कारणों की सिद्धि आवश्यक है; क्योंकि विशेष कारण के बिना विशेष प्रकार के शब्दों का प्रयोग या विशेष प्रकार की प्रतीतियाँ नहीं हो सकतीं । चूँकि परत्व और अपरत्व दोनों ही परस्पर सापेक्ष हैं, अतः दोनों का एक साथ निरूपण किया गया है । 'द्विविधं तत्' यह वाक्य उनके भेद को दिखलाने के लिए लिखा गया है । किस हेतु से दोनों में भेद है ? यह प्रश्न करके कारण के भेद से उनका भेद 'दिक्कृतं कालकृतञ्च' इत्यादि से दिखलाया गया है । दिक्कृत (परत्व और अपरत्व) काल और पिण्ड (अर्थात् परत्वादि के आश्रयीभूत द्रव्य) के संयोग से होता है । इसी प्रकार काल और पिण्ड के संयोग से 'कालकृत परत्व और अपरत्व' उत्पन्न होता है । इन दोनों का भेद किससे समझेंगे ? इसी प्रश्न का उत्तर 'दिक्कृतम्' इत्यादि से देते हैं कि कार्य की विभिन्नता से ही उन दोनों का भेद समझेंगे । विशेष प्रकार की दिशा के ज्ञान का कारण ही दिक्कृत परत्व और अपरत्व है । एवं वय के भेद के ज्ञान का कारण ही कालकृत 'परत्वापरत्व' है । अर्थात् दिक्कृत (परत्व और अपरत्व) दिशा विशेष की प्रतीति के कारण हैं । एवं कालकृत (परत्व और अपरत्व) वयोभेद के ज्ञान के कारण हैं । इनमें 'दिक्कृत परत्व' देशविप्रकृष्टत्व अर्थात् देश की दूरी का ज्ञापक है । 'दिक्कृत अपरत्व' देश के सामीप्य का बोधक है । एवं 'कालकृत परत्व' पिण्ड (आश्रयभूत द्रव्य) के कालविप्रकृष्टत्व अर्थात् ज्येष्ठत्व का

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३९५

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३९५ प्रशस्तपादभाष्यम् भावे सत्येकस्य द्रष्टुः सन्निकृष्टमवधिं कृत्वा एतस्माद् विप्रकृष्टोऽय- मिति परत्वाधारेऽसन्निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्य परेण के रहने पर देखनेवाले एक पुरुष के समीप (प्रदेश) को अवधि मानकर 'इससे यह दूर है' इस प्रकार की दूरत्वविषयक बुद्धि परत्व के आधारद्रव्य में उत्पन्न होती है । इसके बाद इसी बुद्धि के सहयोग से दूर दिशा के न्यायकन्दली कालसन्निकृष्टत्वमिति विशेषः । तत्र तयोर्दिककृतकालकृतयोर्मध्ये दिक्कृतस्योत्पत्तिर- भिधीयते । कथमिति प्रश्ने सत्युत्तरमाह- एकस्यामिति । पूर्वापरदिग्व्यवस्थितयोः पिण्डयोः परापरप्रत्ययौ न सम्भवतः, तदर्थमेकस्यां दिश्यवस्थितयोरित्युक्तम् । एकस्यां दिशि प्राच्यां वा प्रतीच्यां वाऽवस्थितयोः पिण्डयोर्मध्य एकस्य द्रष्टुः संयुक्तेन भूप्रदेशेन सहापरस्य प्रदेशस्य संयोगः, तेनापि सममपरस्येति संयुक्तसंयोगानां बहुत्वे सत्यल्पसंयोगवन्तं पिण्डं सन्निकृष्टमवधिं कृत्वैतस्मात् पिण्डाद् विप्रकृष्टोऽय- मिति संयोगभूयस्त्ववति भविष्यतः परत्वस्याधारे पिण्डे विप्रकृष्टा बुद्धिरुदेति । ततो प्रतिपादन करता है । 'कालकृत अपरत्व' काल के सन्निकृष्टत्व का, अर्थात् कनिष्ठत्व का ज्ञापक है । यही इनमें विशेष है । 'तत्र' अर्थात् दिक्कृत परत्वापरत्व और कालकृत परत्वापरत्व इन दोनों में दिक्कृत परत्वापरत्व का निरूपण करते हैं । (इसी प्रसङ्ग में) 'कथम्' इस वाक्य से प्रश्न किये जाने पर 'एकस्याम्' इत्यादि वाक्य के द्वारा उत्तर देते हैं । पूर्व और पश्चिमादि विरुद्ध दिशाओं में स्थित दो पिण्डों में परत्व और अपरत्व की प्रतीति नहीं हो सकती, अतः 'एकस्यां दिश्यवस्थितयोः' यह वाक्य लिखा गया है । 'एक ही' अर्थात् पूर्व या पश्चिमादि किसी एक दिशा में अवस्थित दो पिण्डों में से किसी एक पिण्ड और देखनेवाले पुरुष, इन दोनों से संयुक्त भूप्रदेश के साथ दूसरे भूप्रदेश का संयोग है, उसके साथ फिर तीसरे भूप्रदेश का संयोग है, इस प्रकार संयुक्त प्रदेशों के बहुत से संयोगों के रहने पर, संयुक्त प्रदेशों के संयोगों की अधिकता के कारण, उन भूप्रदेशों के संयोगों से अल्प संयोग से युक्त अतएव समीपस्थ पिण्ड को अवधि मानकर उत्पन्न होनेवाले परत्व के आधारभूत एवं उक्त बहुत से संयोगों से युक्त पिण्ड में 'इससे यह दूर है' इस प्रकार की विप्रकृष्ट बुद्धि अर्थात् दूरत्व की बुद्धि उत्पन्न होती है । 'ततः' अर्थात् उस दूरत्व की बुद्धि के बाद उसी विप्रकृष्ट द्रव्य को

३१६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व- प्रशस्तपादभाष्यम् दिक्प्रदेशेन संयोगात् परत्वस्योत्पत्तिः । विप्रकृष्टं चावधिं कृत्वा एतस्मात् सन्निकृष्टोऽयमित्यपरत्वाधारे इतरस्मिन् सन्निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्ताम- पेक्ष्यापरेण दिक्प्रदेशेन संयोगादपरत्वस्योत्पत्तिः । प्रदेशों के संयोग के द्वारा (दिक्कृत) परत्वविषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इसके बाद इसी परत्वविषयक को अवलम्बन बनाकर दूर के दिक् प्रदेशों के संयोग से दिक्कृत परत्व (गुण) की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार दूर दिशा के द्रव्य को अवधि मानकर 'इससे यह समीप है' इस प्रकार की बुद्धि अपरत्व गुण के आधारभूत द्रव्य में उत्पन्न होती है । इसके बाद इस बुद्धि को अवलम्बन मानकर 'अपर' अर्थात् समीपवाले प्रदेशों के संयोग से दिक्कृत अपरत्व गुण की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली विप्रकृष्टबुद्ध्युत्पत्त्यनन्तरं विप्रकृष्टं बुद्धिमपेक्ष्य परेण संयोगभूयस्त्ववता दिक्प्रदेशेन संयोगादसमवायिकारणाद् विप्रकृष्टे पिण्डे समवायिकारणभूते परत्वस्योत्पत्तिः । द्रष्टुः स्वशरीरापेक्षया संयुक्तसंयोगभूयस्त्ववन्तं विप्रकृष्टं चावधिं कृत्वेतरस्मिन् संयुक्तसंयोगा- ल्पीयस्त्ववति सन्निकृष्टा बुद्धिरुदेति । तां सन्निकृष्टां बुद्धिं निमित्तकारणीकृत्यापरेण संयुक्तसंयोगाल्पीयस्त्वविशिष्टेन दिक्प्रदेशेन सह संयोगादसमवायिकारणात् सन्निकृष्टे पिण्डे समवायिकारणे परत्वस्योत्पत्तिः । सन्निकृष्टविप्रकृष्टबुद्ध्योः परस्परापेक्षित्वेनाुभयाभावप्रसङ्ग इति चेत् ? न, अनभ्युपगमात् । न सन्निकृष्टोऽयमित्येवं प्रतीत्यैव तदपेक्षया विप्रकृष्टबुद्धिः, अवधि मानकर बहुत से संयोगों से युक्त दूसरे देश की अपेक्षा परत्व की उत्पत्ति उस पिण्ड (द्रव्य) में होती है । इस परत्व का उक्त द्रव्य समवायिकारण है, पिण्ड में रहनेवाले कथित संयोग उसके असमवायिकारण हैं । अर्थात् देखनेवाले को अपने शरीर की अपेक्षा अधिक संयोगवाले दूर देश के द्रव्य को अवधि मानकर उससे भिन्न एवं उससे अल्प संयोगवाले देश के द्रव्य में 'सन्निकृष्ट बुद्धि' अर्थात् 'इससे यह समीप है' इस आकार की बुद्धि उत्पन्न होती है । इस प्रकार समीप के पिण्ड में परत्व की उत्पत्ति का उक्त पिण्ड समवायिकारण है, अल्प संयोग से युक्त दिक् प्रदेशों के साथ उक्त पिण्ड का संयोग निमित्तकारण है । एवं उक्त सन्निकृष्टबुद्धि निमित्तकारण है । (प्र.) किसी के सन्निकृष्ट समझे जाने पर उसकी अपेक्षा कोई विप्रकृष्ट समझा जाता है । एवं किसी के विप्रकृष्ट समझे जाने पर ही उसकी अपेक्षा कोई सन्निकृष्ट समझा जाता है । इस प्रकार दोनों बुद्धियाँ अगर परस्पर सापेक्ष हैं, तो फिर

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३९७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३९७ प्रशस्तपादभाष्यम् कालकृतयोरपि कथम् ? वर्त्तमानकालयोरनियतदिग्देश- संयुक्तयोर्युवस्थविरयो रूढमश्रुकारकश्यवलिपलितादिसन्निध्ये सत्येकस्य (प्र.) कालिक (कालकृत) परत्व और अपरत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है ? (उ.) वर्त्तमानकाल में अवस्थित किसी भी दिक्प्रदेश के साथ संयुक्त युवा पुरुष में कड़ी मूँछ और गठित शरीर (प्रभृति असाधारण) स्थिति और किसी भी दिक् प्रदेश से संयुक्त वृद्ध पुरुष में पके न्यायकन्दली नापि विप्रकृष्टोऽयमिति प्रतीत्यैव तदपेक्षया सन्निकृष्टबुद्ध्युदयः; किन्तु संयोगाल्पी- यस्त्वसहचरितं पिण्डं प्रतीत्यैव तदपेक्षया संयोगभूयस्त्ववति विप्रकृष्टबुद्धिः । एवं संयोगभूयस्त्वसहचरितं पिण्डं प्रतीत्यैव तदपेक्षया संयोगाल्पीयस्त्ववति सन्निकृष्टबुद्ध्यु- त्पत्तिरिति न परस्परापेक्षित्त्वमनयोः । कालकृतयोरपि कथम् ? दिक्कृतयोस्तावत्परत्वापरत्वयोरुत्पत्तिः दोनों बुद्धियों के कारणीभूत परत्व और अपरत्व इन दोनों की सत्ता ही उठ जाएगी। (उ.) दोनों की सत्ता के उठ जाने की आपत्ति नहीं है; क्योंकि हम ऐसा नहीं मानते; क्योंकि 'ततः' अर्थात् इस विप्रकृष्ट बुद्धि के बाद उसी के साहाय्य से बहुत से संयोगों से युक्त दूसरे उस पिण्ड में परत्व की उत्पत्ति होती है। इस परत्व का समवायिकारण उक्त पिण्ड ही है एवं उन दिशाओं के साथ उस पिण्ड का संयोग ही उसका असमवायिकारण है । अभिप्राय यह है कि द्रष्टा पुरुष के शरीर के मध्यवर्त्ती बहुत से दिग्देशों के संयोग से युक्त होने के कारण 'विप्रकृष्ट' अर्थात् दूर देश को अवधि मानकर, उससे अल्प संयोग से युक्त मध्यवर्त्ती देश में 'सन्निकृष्ट बुद्धि' अर्थात् 'उससे यह समीप है' इस आकार की बुद्धि उक्त द्रष्टा पुरुष को होती है । इस सन्निकृष्ट बुद्धिरूप निमित्तकारण से उक्त पिण्डरूप समवायिकारण में परत्व की उत्पत्ति होती है, जिसका अल्प संयोग से युक्त दिक्प्रदेश और पिण्ड का संयोग असमवायिकारण है । 'सन्निकृष्टोऽयम्' अर्थात् 'यह समीप है' इस प्रकार की सन्निकृष्ट बुद्धि से ही उसकी अपेक्षा 'यह दूर है' इस आकार की विप्रकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है एवं 'विप्रकृष्टोऽयम्' इस बुद्धि से ही इसकी अपेक्षा 'यह समीप है' इस आकार की सन्निकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है; किन्तु उक्त प्रदेशों के संयोगों की अल्पता के साथ ज्ञात द्रव्य (पिण्ड) की प्रतीति से ही (इस पिण्ड की) अपेक्षा अधिक दिक्प्रदेशों के संयोगों से युक्त पिण्ड में विप्रकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है । इसी प्रकार दिक्प्रदेशों के अधिक संयोगों के साथ ज्ञात द्रव्य की प्रतीति से ही उसकी अपेक्षा अल्प दिक्प्रदेशों के संयोगवाले पिण्ड में सन्निकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है । अतः परस्परापेक्ष होने के कारण परत्व और अपरत्व दोनों की असत्ता की आपत्ति नहीं है । 'कालकृतयोरपि कथम्' ? अर्थात् 'कथम्' इत्यादि सन्दर्भ से प्रश्न करते हैं कि दिक्कृत परत्व और अपरत्व की उत्पत्ति तो उपपादित हुई; किन्तु कालिक परत्व और

३९८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे परत्वापरत्व- प्रशस्तपादभाष्यम् द्रष्टुर्युवानमवधिं कृत्वा स्थविरे विप्रकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्य परेण कालप्रदेशेन संयोगात् परत्वस्योत्पत्तिः, स्थविरं चावधिं कृत्वा यूनि सन्निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्यापरेण कालप्रदेशेन संयोगादपरत्वस्योत्पत्तिरिति । हुए केश और शरीर की शिथिलता (प्रभृति) की स्थिति, इन दोनों स्थितियों के रहते हुए दोनों को देखनेवाले पुरुष को उक्त युवा पुरुष की अपेक्षा उक्त वृद्ध पुरुष में 'विप्रकृष्ट' बुद्धि अर्थात् कालकृत परत्व (ज्येष्ठत्व) की बुद्धि उत्पन्न होती है । इसके बाद इसी बुद्धि के साहाय्य से दूसरे कालप्रदेश के साथ के संयोग से (वृद्ध पुरुष) में कालकृत परत्व (ज्येष्ठत्व) की उत्पत्ति होती है । एवं इसी वृद्ध पुरुष की अपेक्षा युवा पुरुष में 'सन्निकृष्ट' बुद्धि उत्पन्न होती है । इसी बुद्धि के साहाय्य से दूसरे कालप्रदेश के साथ (युवा) पुरुष के संयोग से कालकृत अपरत्व (कनिष्ठत्व) की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली कथिता, कालकृतयोरपि तयोरुत्पत्तिः कथमिति प्रश्नः । समाधानं वर्तमानकालयोरिति । द्वयोरेकस्मिन् वा पिण्डेऽविद्यमाने परत्वापरत्वे न भवतः, तदर्थं वर्तमानकालयोरित्युक्तम् । अनियतदिग्देशयोरित्येकदिश्यवस्थितयोर्भिन्नदिगवस्थितयोर्वा युवस्थविरयो रूढश्मश्रु च कार्क- श्यं च वलिश्च पलितं च येषां कालविप्रकर्षलिङ्गानां सान्निध्ये सत्येकस्य द्रष्टुर्युवानं रूढ- अपरत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है ? इसी प्रश्न का समाधान 'वर्तमान- कालयोः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है । इस समाधान वाक्य में 'वर्त्तमानकालयोः' यह पद इसलिए दिया गया है कि चूँकि दोनों ही पिण्डों के न रहने पर या दोनों में से किसी एक के न रहने पर भी (उनमें से किसी में) परत्व या अपरत्व की उत्पत्ति नहीं होती है । 'अनियतदिग्देशयोः' अर्थात् एक दिशा में अथवा विभिन्न दिशाओं में स्थित युवक और वृद्ध पुरुष में (से युवा पुरुष में रहनेवाले) मूँछों का कड़ापन और देह का कड़ा गठन एवं (वृद्ध पुरुष की) झुर्री और पके केश प्रभृति काल के ज्ञापक हेतुओं का सामीप्य रहने पर दोनों को देखनेवाले किसी एक पुरुष को मूँछों की कड़ाई और देह के काठिन्य से युवा पुरुष में अल्पकाल सम्बन्धरूप कनिष्ठत्व या सन्निकृष्ट बुद्धिरूप ज्येष्ठत्व की अनुमिति होती है । इस अल्पकाल को अवधि मानकर झुर्री और पके केश वाले वृद्ध पुरुष में अधिककाल सम्बन्धरूप ज्येष्ठत्व या कालविप्रकृष्टत्व की बुद्धि उत्पन्न होती है । इस प्रकार उस वृद्ध पुरुष में कालिक परत्व (ज्येष्ठत्व) की उत्पत्ति