वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
६५२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट- न्यायकन्दली गतत्यान्नित्यत्वाच्च । बुद्धिक्रमनिबन्धनस्तु वर्णानां क्रमो भवेत्, स चैकस्यां स्मृतिबुद्धौ परिवर्तमानानां प्रत्यस्तमित इत्यक्रमाणांमेव प्रतिपादकत्वम् । अतश्च सरो रसो वनं नवं नदी दीनेत्यादिष्वर्थभेदप्रत्ययो न स्यात्, वर्णानामभेदात्, क्रमस्य प्रतीत्यनङ्गत्याच्च । अस्ति चायं प्रतीतिभेदः सवर्णेष्वनुपपद्यमानः ? तर्हातिरिक्तं निमित्तान्तरमाक्षिपतीति स्फोटसिद्धिः । ननु स्फोटोऽपि नानभिव्यक्तोऽर्थं प्रतिपादयति, सर्वदार्थोपलब्धिप्रसङ्गात् । अभि- व्यक्तिश्च न तस्य वर्णैभ्यः सम्भवति, उक्तेन न्यायेन तेषामेकैकतः समुदितानां वासा- मर्थ्यात्, तस्मात् स्फोटादपि दुर्लभा अर्थप्रतीतिः । अत्र वदन्ति । प्रयत्नभेदानुपातिनो वायवीया ध्वनयः प्रत्येकमेव तद्वर्णा- त्मकतया स्फोटमस्फुटमभिव्यञ्जयन्तः पूर्वं विषयसंस्कारसाचिव्यलाभादन्ते स्फोटमाभासयन्ते । तथा चान्ते प्रत्यस्तमितनिखिलवर्णविभागोल्लेखक्रमम- जाता है कि बुद्धिक्रम के अनुसार वर्णों का क्रम मानें; किन्तु सभी वर्णों का एक ही संस्कार मान लेने से वह मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है । अतः इस पक्ष में यह आपत्ति आ खड़ी होती है कि 'बिना क्रम के ही वर्णों से अर्थ का बोध होता है' । जिससे 'सर' शब्द से और 'रस' शब्द से, एवं 'वन' शब्द से और 'नव' शब्द से अथवा 'नदी' शब्द से और 'दीन' शब्द से समानविषयक बोधों की आपत्ति होगी; क्योंकि दोनों शब्दों के वर्ण समान ही हैं, क्रम को बोध का करण मान नहीं सकते; किन्तु उन दोनों शब्दों के समुदायों में से प्रत्येक पद के द्वारा विभिन्न बोध ही होता है । अतः समान वर्ण के उक्त पदों से विभिन्न प्रकार की उक्त प्रतीति की उपपत्ति स्फोट के बिना नहीं हो सकती, अतः 'स्फोट' का मानना आवश्यक है । (प्र.) स्फोट भी तो ज्ञात होकर ही अर्थविषयक बोध का उत्पादन कर सकता है, यदि ऐसा न मानें, स्वरूपतः ही स्फोट को अर्थबोध का कारण मानें तो सर्वदा अर्थविषयक बोध की आपत्ति होगी । (अब यह देखना है कि स्फोट की अभिव्यक्ति किससे होती है ?) वर्णों से स्फोट की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण से यदि स्फोट की अभिव्यक्ति मानेंगे, तो अवशिष्ट वर्ण ही व्यर्थ हो जायेंगे । यदि वर्णसमुदाय से स्फोट की अभिव्यक्ति मानें, तो सो भी सम्भव नहीं है; क्योंकि सभी वर्णों में दैशिक या कालिक साहित्य सम्भव ही नहीं है । तस्मात् स्फोट से भी अर्थ का बोध सम्भव नहीं है । इस आक्षेप के प्रसङ्ग में स्फोट से अर्थबोध माननेवालों का कहना है कि स्फोट पहले से ही रहते हैं; किन्तु अनभिव्यक्त रहते हैं; किन्तु तत्तद्वर्णों के उच्चारण के उक्त प्रयत्न से निष्पन्न (कौष्ठ्य) वायु की ध्वनियाँ उक्त अनभिव्यक्त स्फोट को ही पहले तत्तद्वर्ण स्वरूप से अस्फुट रूप में अभिव्यक्त करती हुई पश्चात् अर्थविषयक संस्कार की सहायता से अतिस्फुट रूप से भी अभिव्यक्त करती हैं । यही कारण है कि अन्त में वर्णों के अलग-अलग स्वरूप नहीं रह जाते एवं वर्णों का अलग-अलग उल्लेख भी नहीं रह जाता, इन सबों से अलग
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५३ न्यायकन्दली नवयवमेकं विस्पष्टमर्थतत्त्वमनुभूयते । यदि हि वर्णा एव पदम् ? न तदेकबुद्धि- निर्ग्राह्यमिति अनालम्बना बुद्धिः पर्यवस्यति । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति च व्यपदेशो न घटते । तस्माद् वर्णव्यतिरिक्तः कोऽपि सम्भवत्येको यस्मादर्थः स्फुटीभवतीति । एवं प्राप्तेऽभिधीयते । गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासइत्यादिषु पदेषूच्चार्यमाणेषु क्रमभाविनो वर्णाः परं प्रतीयन्ते न त्वन्ते वर्णव्यतिरिक्तस्य कस्यचिदर्थस्य संवेदनमस्ति । यदि हि तस्य पूर्वं वर्णात्मकतया संविदितस्यान्ते स्वरूपसंवेदनम्, पूर्वज्ञानस्य मिथ्यात्वमवसीयते रजतज्ञानस्येव शुक्तिकासंवित्तौ । न चैवं प्रतिपत्तिरस्ति 'नायं वर्णः, किन्तु स्फोटः' इति । या चेयमेकार्थावमर्शिनी बुद्धिः, सापि नार्थान्तरमवभासयति किन्तु वन- एक सम्पूर्ण और अत्यन्त स्पष्ट अर्थतत्त्व का बोध होता है । यदि वर्णों का समुदाय ही पद हो (वर्णों का कोई एक स्फोट न हो) तो फिर पद में एकत्व की प्रतीति न हो सकेगी, अतः 'एकं पदम्' इत्यादि बुद्धियाँ निर्विषयक हो जायेंगी । एवं 'शब्दाद् अर्थं प्रतिपद्यामहे' (एक अखण्ड शब्द से अर्थ को हम समझते हैं) यह व्यवहार न हो सकेगा (किन्तु 'बहुत से शब्दों से हम अर्थ को समझते हैं' इस प्रकार का व्यवहार होगा) । अतः वर्णों से भिन्न कोई एक वस्तु है, जिससे अर्थ 'प्रस्फुटित' होता है (उसी की अन्वर्थसंज्ञा 'स्फोट' है ) । इन सब युक्तियों से स्फोट की सत्ता की सम्भावना उपस्थित होने पर सिद्धान्तियों का कहना है कि 'गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासः' (अर्थात् पाण्डुदास कायस्थ कुल के तिलकरूप हैं एवं गुणरूपी रत्न ही उनके भूषण हैं) इन सब वाक्यों के उच्चारण करने पर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले वर्णों की ही प्रतीति होती है; किन्तु उच्चारण के अन्त में इन वर्णों से भिन्न किसी (स्फोट रूप) अर्थ का भान नहीं होता है । यदि ऐसा कहें कि (प्र.) प्रथमतः वर्ण का जो भान होता है, वह वस्तुतः स्फोट का ही वर्णरूप से भान होता है और अन्त में स्फोट का स्फोटत्वरूप से भान होता है । (उ.) तो फिर जैसे कि शुक्तिका में रजत ज्ञान को मिथ्या मानना पड़ता है, वैसे ही स्फोट में वर्णविषयक प्रथम ज्ञान को मिथ्या ही मानना पड़ेगा । (किन्तु आगे) यह बाधज्ञान भी नहीं होता कि 'ज्ञात होनेवाला यह वर्ण नहीं है, किन्तु स्फोट है' । वर्णों के समुदाय में जो एकत्व की प्रतीति होती है, उस प्रतीति का भी विषय उन वर्णों के समुदाय से भिन्न कुछ भी नहीं है, जैसे कि 'यह वन है' इस प्रतीति का विषय वृक्षसमुदाय से भिन्न स्वतन्त्र वन नाम की कोई वस्तु नहीं है । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' यह पञ्चमी एकवचन से युक्त वाक्य का प्रयोग भी उन वर्णों के समुदाय को ही एक वस्तु मानकर किया जाता है । प्रत्यक्ष के द्वारा जिसका सर्वथा ज्ञान होना ही असम्भव है, उस (स्फोट) का अन्य प्रमाणों के द्वारा निरूपण सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके ज्ञान का कोई दूसरा उपाय
६५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट- न्यायकन्दली प्रत्ययवद् वर्णसमुदायमात्रमवलम्बते । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति वर्णसमुदायमेवोरी- कृत्य लोकः प्रयुङ्क्ते । न च प्रत्यक्षेणाप्रतीयमानः प्रमाणान्तरतः शक्यो निरूपयितुम्, उपायाभावात् । अर्थप्रतीत्यन्यथानुपपत्तिस्तदुपाय इति चेत् ? किमप्रतीयमानः स्फोटोऽर्थाधिगमे हेतुः समर्थितो भवद्भिः ? प्रतीयमानो वा ? अप्रतीयमानस्य हेतुत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । प्रतीतिश्च तस्य नास्तीत्युक्तम्, अर्थप्रत्ययो वर्णानामेव तद्भावभावितामनुगच्छति, तेनैषामेव वरं व्युत्पत्त्यनुसारेणार्थप्रतिपादने कश्चिदुपाय आश्रीयताम्, न पुनरप्रतीयमानस्य गगन- कुसुमस्येव कल्पना युक्ता । न चेदं वाच्यं वर्णानां प्रतिपादकत्वे क्रमभेदे कर्तृभेदे व्यवधाने च प्रतीतिप्रसङ्ग इति । न हि ते विपरीतक्रमाः कर्तृभेदानुपातिनो देशकालव्यवहितास्त- दर्थधियः कारणम्, कार्योन्नेया हि शक्तयो भावानाम्, यथा तेभ्यः कार्यं दृश्यते, तथैव तेषां शक्तयः कल्प्यन्ते । यथोपद्दिशन्ति सन्तः - यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने । वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति । ही नहीं है । अर्थ की प्रतीति से वर्णों में ही उसके अन्वय और व्यतिरेक का आक्षेप होता है, अतः वर्णों से ही अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए कोई उपाय ढूँढ़ निकालना ही युक्त है । यह अनुचित है कि इसके लिए आकाश-कुसुम की तरह सर्वथा अप्रतीत होनेवाले किसी (स्फोट रूप) अर्थ की कल्पना की जाय । (वर्णों से ही अर्थ का बोध मानने के पक्ष में) इन दोषों का उद्भावन करना अयुक्त है कि (प्र.) (वर्णों से ही यदि अर्थ की प्रतीति हो तो) (१) विभिन्न क्रम से पठित शब्दों से अर्थात् रस सर, वन नव, नदी दीन प्रभृति शब्दयुगलों से समान अर्थविषयक बोध की आपत्ति होगी; क्योंकि दोनों में समान ही वर्ण हैं । (२) एवं विभिन्न कर्त्ताओं से उच्चरित विभिन्न वर्णों से (अर्थात् देवदत्त से उच्चरित 'घ' और यज्ञदत्त से उच्चरित 'ट' शब्द से घटविषयक) बोध की आपत्ति होगी । एवं (३) व्यवहित वर्णों से (अर्थात् 'घ' के उच्चारण के बाद ककारादि वर्णों का उच्चारण और उसके बाद उच्चरित 'ट' वर्ण से) घटविषयक बोध की आपत्ति होगी । (उ.) ये आपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि उक्त विभिन्न क्रमों से पठित या विभिन्न कर्त्ताओं से पठित या व्यवहित होकर पठित वर्णों को समान अर्थविषयक बोध का कारण ही नहीं मानते; क्योंकि किस प्रकार की वस्तुओं में किसकी कारणता है ? यह केवल कार्य से ही अनुमान किया जा सकता है । जिन वस्तुओं से जिन प्रकार के कार्यों की उत्पत्ति देखी जाती है, उन वस्तुओं को ही उन कार्यों का कारण माना जाता है । जैसा कि विद्वानों का उपदेश है कि "जितने एवं जिन वर्णों के जिस प्रकार के विन्यास में जिन अर्थों के बोध का सामर्थ्य (कार्य से) निश्चित है,
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५५ न्यायकन्दली सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमभावः । अत एव नदीदीनेत्यादिष्वर्थभेदः, क्रमभेदात् । वर्णेषु क्रमो नास्ति स कथमेषामङ्गं स्यादिति चेत्, न, तेषामुत्पत्तिभाजा- मव्याप्यवृत्तीनां देशकालकृतस्य पौर्वापर्यस्य सम्भवात् । यच्चेदमूक्तम्- प्रत्येकशः समुदितानां च न सामर्थ्यमिति, तदपि न परस्य मतमालोचितम् । यद्यपि वर्णा अनवस्थायिनस्त- थापि तद्विषयाः क्रमभाविनः संस्काराः सम्भूय पदार्थधियमातन्वते । यद्वा पूर्ववर्ण- वे ही वर्ण उसी विन्यास-क्रम से उस अर्थ के बोधक हैं।" अत एव इसी क्रमभेद के कारण नदी शब्द से और दीन शब्द से विभिन्न विषयक बोध होते हैं । (प्र.) वर्ण नित्य और व्यापक हैं, अतः उनका क्रम ही सम्भव नहीं है, फिर शब्दों का क्रम शब्दबोध का अङ्ग कैसे होगा ? (उ.) 1 नहीं, ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वर्ण उत्पत्तिशील हैं और अव्याप्यवृत्ति हैं (अर्थात् अपने आश्रयीभूत आकाश में कहीं किसी प्रदेश में रहते हैं और किसी प्रदेश में नहीं) अतः उनमें कालिक और दैशिक दोनों ही प्रकार के क्रम हो सकते हैं । यह जो कहा गया था कि (प्र.) पद या वाक्यघटक प्रत्येक वर्ण में अर्थबोध की हेतुता मानने से अवशिष्ट वर्णों का प्रयोग व्यर्थ हो जाएगा एवं वर्णों के समुदाय में अर्थबोध की जनकता सम्भव नहीं है; क्योंकि सभी वर्णों की कहीं एकत्र स्थिति ही सम्भव नहीं है फिर उनका समुदाय ही कैसा ? इस प्रकार वर्ण न प्रत्येकशः ही अर्थबोध के कारण हो सकते हैं, न समूहापन्न होकर ही (अतः स्फोट ही अर्थबोध
- यहाँ मुद्रित न्यायकन्दली पुस्तक का पाठ कुछ अशुद्ध और व्यस्त मालूम पड़ता है । 'एवं प्राप्तेऽभिधीयते' इत्यादि वाक्यों से स्फोट का खण्डन और 'वाक्य से ही अर्थबोध की उत्पत्ति का सिद्धान्त' उपपादित हुआ है, जिसका उपसंहार 'यावन्तो यादृशाः' इत्यादि श्लोकवार्त्तिक के श्लोक को उद्धृत कर किया गया है । इसके बाद 'सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमभावः' ऐसी पङ्क्ति है । यहीं कुछ त्रुटि मालूम होती है; क्योंकि वर्णों का सर्वगतत्व उनके क्रमभाव का बाधक है, जिसका अनुपद ही 'क्रमो हि पौर्वापर्यम्' इत्यादि से उपपादन किया गया है । तदनुसार वर्णों का असर्वगतत्व और अनित्यत्व ये ही वर्णों के क्रमभाव के ज्ञापक होंगे । अतः उक्त पङ्क्ति को यदि सिद्धान्तपक्षीय मानें तो 'सर्वगतत्वात्' इत्यादि पाठ के स्थान पर उसके विरुद्ध 'अनित्यत्वादसर्वगतत्वाच्च वर्णानां क्रमभावः' ऐसा पाठ मानना पड़ेगा । दूसरा उपाय वह है कि उक्त पङ्क्ति को सिद्धान्तपक्षीय न मानकर पूर्वपक्षीय ही मान लें और उस वाक्य के 'क्रमभावः' इस पद को 'क्रमाभावः' में परिवर्तित कर दें । तदनुसार "सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमाभावः अत एव" इतने अंश को 'वर्णेषु क्रमो नास्ति' इस पूर्वपक्षवाक्य के पहले पाठ करें एवं 'यावन्तो यादृशा ये च' इस श्लोक के नीचे सिद्धान्त पक्ष का 'नदीदीनेत्यादिष्वर्थभेदः क्रमात्' इतना ही रक्खें । इनमें द्वितीय पक्ष के अनुसार ही मैंने अनुवाद किया है ।
६५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार- प्रशस्तपादभाष्यम् प्रयत्नेन मनश्चक्षुषि स्थापयित्वाऽपूर्वमर्थं दिदृक्षमाणस्य विद्युतस्- प्रयत्न के द्वारा मन को चक्षु में सम्बद्ध कर विशेष प्रकार की वस्तु को देखने न्यायकन्दली संस्कारस्मरणयोरन्यतरसापेक्षोऽन्त्यो वर्णः प्रत्यायकः, यथा चानेकसंस्काराः सम्भूय स्मरणं जनयन्ति तथोपपादितं द्वित्वे । अथ मन्यसे वर्णविषयात् संस्कारादर्थप्रतीतिरयुक्ता, संस्कारा हि यद्विषयोपलम्भसम्भावितजन्मानस्तद्विषयानेव स्मृतिमाधातुमीशते न कार्यान्तरम् । यथाह मण्डनः स्फोटसिद्धौ- संस्काराः खलु यद्वस्तुरूपप्रख्याविभाविताः । फलं तत्रैव जनयन्त्यतोऽर्थे धीर्न कल्प्यते ॥ इति । तदप्यसमीचीनम् । यतः पदार्थप्रतीत्यनुगुणतया प्रत्येकमनुभवैराधीय- माना वर्णविषयाः संस्काराः स्मृतिहेतुसंस्कारविलक्षणशक्तय एवाधीयन्ते, के कारण हैं, वर्ण नहीं) । (उ.) यह कहना भी वर्ण को ही अर्थबोध का कारण माननेवाले प्रतिपक्षी के मत की आलोचना किये बिना ही मालूम होता है । यह ठीक है कि वर्ण चिरस्थायी नहीं हैं (क्षणिक हैं), फिर क्रमशः उत्पन्न उनके सभी संस्कार मिलकर पदार्थविषयक बोध को उत्पन्न करेंगे । अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि पहले-पहले वर्ण के संस्कार अथवा पहले-पहले वर्ण की स्मृति इन दोनों में से किसी एक के साहाय्य से केवल अन्तिम वर्ण से भी अर्थ का बोध मान सकते हैं । अनेक संस्कार मिलकर एक ही स्मरण का जिस रीति से सम्पादन करते हैं, वह रीति द्वित्वनिरूपण के प्रसङ्ग में लिख आये हैं । यदि यह कहना चाहते हों कि (प्र.) जिस विषयक अनुभव से जिस संस्कार की उत्पत्ति होगी, वह संस्कार उसी विषयक स्मृति को उत्पन्न कर सकता है, जिससे एक विषयक संस्कार से अपर विषयक स्मृतिरूप भी दूसरा कार्य नहीं हो सकता । अतः वर्णविषयक संस्कार से अर्थविषयक बोधरूप दूसरे कार्य की उत्पत्ति कैसे होगी ? (क्योंकि वर्णविषयक संस्कार से तो वर्णविषयक स्मृतिरूप कार्य ही उत्पन्न हो सकता है) । जैसा कि आचार्य मण्डन ने अपने 'स्फोटसिद्धि' नामक ग्रन्थ में कहा है कि 'संस्कार जिन विषयों की 'प्रख्या' अर्थात् अनुभव से उत्पन्न होंगे, उन्हीं विषयों में वे स्मृति को उत्पन्न कर सकते हैं, अतः वर्णविषयक संस्कारों से अर्थविषयक 'धी' अर्थात् बोध उत्पन्न नहीं हो सकता । (उ.) किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि (अन्यत्र स्मृति और संस्कार के कार्यकारणभाव में समानविषयत्व का नियम यद्यपि ठीक है; तथापि) पदों में या वाक्यों में प्रयुक्त होनेवाले वर्णों के हर एक अनुभव से आत्मा में जिस संस्कार का आधान होता है, वह संस्कार स्मृति के कारणीभूत संस्कारों से कुछ विलक्षण प्रकार का होता है, जिस संस्कार में पद के अर्थविषयक अनुभव कराने की शक्ति होती है, उस संस्कार के कार्य
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७ प्रशस्तपादभाष्यम् म्पातदर्शनयदादरप्रत्ययः, तमपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते । यथा देवह्रदे रजतसौवर्णपद्मदर्शनादिति । की इच्छावाले पुरुष को विद्युत् सम्पात के देखने की तरह (उक्त विशेष वस्तु में) आदरबुद्धि उत्पन्न होती है। इस आदरबुद्धि एवं आत्मा और मन के संयोग, इन दोनों से विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है । जैसे देवताओं के सरोवर में चाँदी और सोने के कमलफूल देखने से (विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है) । न्यायकन्दली तथाभूतानामेव तेषां कार्येणाधिगमात् । सन्तु वा भावनारूपाः संस्कारास्तथापि तेषामर्थ- प्रतिपादनसामर्थ्यमुपपद्यते, तद्भावभावित्वात् । यो हि स्फोटं कल्पयति, तेन स्फोटस्यार्थ- प्रतिपादनशक्तिरपि कल्पनीयेति कल्पनागौरवम् । उभयसिद्धस्य संस्कारस्य सामर्थ्यमात्र- कल्पनायां लाघवमस्तीत्येतदेव कल्पयितुमुचितम् । यथोक्तं न्यायवादिभिः - यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं संस्कारस्य व्यवस्थितम् । कार्यान्तरेऽपि सामर्थ्यं न तस्य प्रतिहन्यते ॥ इति । तदेवं वर्णेभ्य एव संस्कारद्वारेणार्थप्रत्ययसम्भवादयुक्ता स्फोटकल्पनेति । से ऐसा ही निश्चय करना पड़ता है । मान लिया कि वह भावनाख्य संस्कार है (जिससे सामान्य नियम के अनुसार समानविषयक स्मृति ही हो सकती है), तथापि पदार्थबोध के साथ उसके अन्वय (और व्यतिरेक) से इस संस्कार में अर्थ का प्रतिपादन करने की शक्ति की कल्पना अयुक्त नहीं कही जा सकती । जो कोई स्फोट नाम की अतिरिक्त वस्तु की कल्पना करते हैं, उन्हें उस वस्तु की कल्पना और स्फोट नाम की उस वस्तु में अर्थबोध के सामर्थ्य की कल्पना, ये दो कल्पनायें करनी पड़ती हैं । स्फोट न माननेवाले को वर्णविषयक संस्कार में अर्थविषयक बोध के सामर्थ्यरूप धर्म की कल्पना करनी पड़ती है; क्योंकि वर्णविषयक संस्काररूप धर्मी को तो दोनों पक्षों को मानना ही है । अतः लाघव की दृष्टि से भी वर्णों से ही अर्थविषयक बोध का मानना उचित है । जैसा कि न्यायवादियों ने (भट्टकुमारिल ने) कहा है कि "यद्यपि यह निर्णीत है कि संस्कार स्मृति का कारण है, फिर भी उसमें दूसरे कार्य की शक्ति का निराकरण नहीं किया जा सकता" । तस्मात् वर्णों से ही उनके संस्काररूप व्यापार के द्वारा अर्थबोध हो सकता है, अतः स्फोट की कल्पना अयुक्त है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७ प्रशस्तपादभाष्यम् म्पातदर्शनवदादरप्रत्ययः, तमपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते । यथा देवह्रदे राजतसौवर्णपद्मदर्शनादिति । की इच्छावाले पुरुष को विद्युत् सम्पात के देखने की तरह (उक्त विशेष वस्तु में) आदरबुद्धि उत्पन्न होती है। इस आदरबुद्धि एवं आत्मा और मन के संयोग, इन दोनों से विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है । जैसे देवताओं के सरोवर में चाँदी और सोने के कमलफूल देखने से (विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है) । न्यायकन्दली तथाभूतानामेव तेषां कार्येणाधिगमात् । सन्तु वा भावनारूपाः संस्कारास्तथापि तेषामर्थ- प्रतिपादनसामर्थ्यमुपपद्यते, तद्भावभावित्वात् । यो हि स्फोटं कल्पयति, तेन स्फोटस्यार्थ- प्रतिपादनशक्तिरपि कल्पनीयेति कल्पनागौरवम् । उभयसिद्धस्य संस्कारस्य सामर्थ्यमात्र- कल्पनायां लाघवमस्तीत्येतदेव कल्पयितुमुचितम् । यथोक्तं न्यायवादिभिः - यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं संस्कारस्य व्यवस्थितम् । कार्यान्तरेऽपि सामर्थ्यं न तस्य प्रतिहन्यते ॥ इति । तदेवं वर्णेष्व एव संस्कारद्वारेणार्थप्रत्ययसम्भवादयुक्ता स्फोटकल्पनेति । से ऐसा ही निश्चय करना पड़ता है । मान लिया कि वह भावनारूप संस्कार है (जिससे सामान्य नियम के अनुसार समानविषयक स्मृति ही हो सकती है), तथापि पदार्थबोध के साथ उसके अन्वय (और व्यतिरेक) से इस संस्कार में अर्थ का प्रतिपादन करने की शक्ति की कल्पना अयुक्त नहीं कही जा सकती । जो कोई स्फोट नाम की अतिरिक्त वस्तु की कल्पना करते हैं, उन्हें उस वस्तु की कल्पना और स्फोट नाम की उस वस्तु में अर्थबोध के सामर्थ्य की कल्पना, ये दो कल्पनायें करनी पड़ती हैं । स्फोट न माननेवाले को वर्णविषयक संस्कार में अर्थविषयक बोध के सामर्थ्यरूप धर्म की कल्पना करनी पड़ती है; क्योंकि वर्णविषयक संस्काररूप धर्मी को तो दोनों पक्षों को मानना ही है । अतः लाघव की दृष्टि से भी वर्णों से ही अर्थविषयक बोध का मानना उचित है । जैसा कि न्यायवादियों ने (भट्टकुमारिल ने) कहा है कि "यद्यपि यह निर्णीत है कि संस्कार स्मृति का कारण है, फिर भी उसमें दूसरे कार्य की शक्ति का निराकरण नहीं किया जा सकता" । तस्मात् वर्णों से ही उनके संस्काररूप व्यापार के द्वारा अर्थबोध हो सकता है, अतः स्फोट की कल्पना अयुक्त है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५९ प्रशस्तपादभाष्यम् भुग्नसंवर्तितेषु स्थितिस्यापकस्य कार्यं संलक्ष्यते । नित्यानित्यत्व- निष्पत्तयोऽस्यापि गुरुत्ववत् । कार्यरूप धनुष, शाखा, शृङ्ग, दाँत, अस्थि, सूत्र एवं वस्त्र प्रभृति वस्तुओं को सीधा होने पर लक्षित होता है । गुरुत्व के सदृश ही इसके नित्यत्व और अनित्यत्व के प्रसङ्ग में भी जानना चाहिए । न्यायकन्दली माख्यातुं तुशब्दः । ये घना निविडा अवयवसंनिवेशविशिष्टेषु स्पर्शवत्सु द्रव्येषु वर्तमानः स्थितिस्यापकः स्वाश्रयमन्यथाकृतमवनमितं यथावत् स्थापयति पूर्ववदृजुं करोति । ये प्रत्यक्षतोऽनुपलम्भात् स्थितिस्यापकस्याभावमिच्छन्ति तान् प्रति तस्य कार्येण सद्भावं दर्शयन्नाह-स्थावरजङ्गमविकारेष्विति । भुग्नाः कुब्जीकृताः संवर्तिताः पूर्वावस्थां प्रापिताः, भुग्नाश्च ते संवर्तिताश्चेति भुग्नसंवर्तिताः, तेषु स्थितिस्यापकस्य कार्यं लक्ष्यते । किमुक्तं स्यात् ? धनुःशाखादिष्ववनमितविमुक्तेषु यत् पूर्वावस्थाप्राप्तिहेतोराद्यस्य कर्मण एकार्थसमवेतमसमवायिकारणं स स्थितिस्यापकः संस्कारः, अन्यस्यासम्भवात् । अन्ये तु भुग्नसंवर्तितेष्विति सूत्रवस्त्रादिष्विति अस्यैव विशेषणमिति मन्यमाना भुग्नानि संस्कार स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण है, आश्रयों के (अस्पर्शवत्त्व और स्पर्शवत्त्व) इन दोनों अन्तर के द्वारा दोनों संस्कारों में अन्तर दिखलाने के लिए प्रकृत सन्दर्भ में 'तु' शब्द का प्रयोग किया गया है । अवयवों के 'घन' अर्थात् कठिन संनिवेशयुक्त स्पर्शवाले द्रव्य में विद्यमान 'स्थितिस्यापक' संस्कार 'अन्यथाकृत' अर्थात् नमाये हुए अपने आश्रयभूत द्रव्य को 'यथावत्स्थापन' अर्थात् पहले की तरह सीधा कर देता है । जो समुदाय प्रत्यक्ष न होने के कारण 'स्थितिस्यापक' संस्कार को मानना ही नहीं चाहते, उन्हें कार्यहेतुक अनुमान के द्वारा स्थितिस्यापक संस्कार की सत्ता को समझाने के लिए ही 'स्थावरजङ्गमविकारेषु' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । 'भुग्न' शब्द का अर्थ है टेढ़ा किया हुआ (तिर्यक्कृत) और 'संवर्तित' शब्द का अर्थ है पहली अवस्था को प्राप्त । प्रकृत सन्दर्भ का 'भुग्न- संवर्तितेषु' पद 'भुग्नाश्च ते संवर्तिताश्च भुग्नसंवर्तिताः, तेषु' इस प्रकार के समास से निष्पन्न है । इस शब्द के द्वारा स्थितिस्यापक संस्कार से उत्पन्न कार्य दिखलाये गये हैं । इससे फलितार्थ क्या निकला ? यही कि धनुष या वृक्ष की डाल प्रभृति जब अवनमित होकर फिर जिन क्रियाओं के द्वारा पहली अवस्था को प्राप्त होते हैं, उन क्रियाओं में से पहली क्रिया का असमवायिकारण एवं उस क्रिया के साथ (उसके आश्रयरूप) एक अर्थ में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला संस्कार ही 'स्थितिस्यापक संस्कार' है; क्योंकि अवनमित शाखादि की पुनः पूर्वावस्था की प्राप्ति का कोई दूसरा कारण नहीं हो सकता । कुछ अन्य लोग इस सन्दर्भ के 'भुग्नसंवर्तितेषु' इस पद को इसी सन्दर्भ के 'सूत्रवस्त्रादिषु' का विशेषण
६६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म- प्रशस्तपादभाष्यम् धर्मः पुरुषगुणः । कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः, अतीन्द्रियोऽन्त्यसुखसंविज्ञान- विरोधी पुरुषान्तःकरणसंयोगविशुद्धाभिसन्धिजः, वर्णाश्रमिणां प्रतिनियत- साधननिमित्तः । तस्य तु साधनानि श्रुतिस्मृतिविहितानि वर्णाश्रमिणां सामान्य- विशेषभावेनावस्थितानि द्रव्यगुणकर्माणि । धर्म पुरुष (जीवात्मा) का गुण है । वह अपने उत्पादक जीव के प्रिय, हित और मोक्ष का कारण है एवं अतीन्द्रिय है । अन्तिम सुख और तत्त्वज्ञान इन दोनों से इसका नाश होता है । पुरुष और अन्तःकरण (मन) के संयोग और संकल्प इन दोनों से इसकी उत्पत्ति होती है । वर्णों और आश्रमियों के लिए विहित कर्म (भी) उसके साधन हैं । वेद एवं धर्मशास्त्रादि ग्रन्थों में वर्णों और आश्रमियों के साधारण धर्मों और विशेष धर्मों के साधन के लिए कहे गये द्रव्य, गुण और कर्म भी इसके कारण हैं । न्यायकन्दली यानि सूत्रादीनि संवर्तितानि तेष्विति व्याचक्षते । तस्य नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो गुरुत्ववत् । यथा गुरुत्वं परमाणुषु नित्यं कार्येष्वनित्यं कारणगुणपूर्वकं च, तथा स्थितिस्थापकोऽ- पीत्यर्थः । धर्मः पुरुषेति । यो धर्मः, स पुरुषस्य गुणो न कर्मसामर्थ्यमित्यर्थः । कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः । प्रियं सुखम्, हितं सुखसाधनम्, मोक्षो नवानामात्म- विशेषगुणानामत्यन्तोच्छेदस्तेषां हेतुः । कर्तुः प्रियादीनामेव यो हेतुः स धर्म मानते हैं, (तदनुसार इस वाक्य का ऐसा अर्थ करते हैं) कि संवर्तित जो सूत्रादि, उनमें रहनेवाला संस्कार ही 'स्थितिस्थापक कार' है । 'तस्य नित्यानित्यत्व- निष्पत्तयो गुरुत्ववत्' अर्थात् जैसे कि परमाणुओं में रहनेवाला गुरुत्व नित्य है एवं कार्यद्रव्यों में रहनेवाला गुरुत्व अनित्य है, उसी प्रकार 'स्थितिस्थापक संस्कार' को भी समझना चाहिए । (अर्थात् परमाणुओं में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार नित्य है एवं कार्यद्रव्यों में रहनेवाला अनित्य) । 'धर्मः पुरुषेति' । अर्थात् धर्म (नाम का) जो गुण है, वह 'पुरुष' का अर्थात् जीव का ही गुण है, (ज्योतिष्टोमादि) क्रियाओं का शक्तिरूप नहीं है 'कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः' (इस वाक्य में प्रयुक्त) प्रिय शब्द का अर्थ है सुख, 'हित' शब्द सुख के साधनों को समझने के लिए लिखा गया है एवं 'मोक्ष' शब्द जीव के बुद्धि प्रभृति नौ विशेष गुणों का अत्यन्त विनाशरूप अर्थ का बोधक है । इन सबों का हेतु (ही 'धर्म' है ) । 'कर्तुः
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६१ न्यायकन्दली इति व्याख्येयम् । न तु कर्तुरेव यः प्रियादिहेतुः स धर्म इति व्याख्या, पुत्रेण कृतस्य श्राद्धस्य पितृगामित्तिफलश्रवणात् । वृष्टिकामेन कारीर्यां कृतायां तदन्यस्यापि समीप- देशवर्तिनो वृष्टिफलसम्बन्धदर्शनात् । स्वर्गकामो यजेतेत्यादिवाक्ये यागेन स्वर्गं कुर्यादिति कर्मणः श्रेयःसाधनत्वं श्रूयते । यश्च निःश्रेयसेन पुरुषं संयुनक्ति स धर्मः, तस्माद् यागादिकमेव धर्मः, न पुरुषगुणः । तथा हि, यो यागमनुतिष्ठति तं धार्मिकमित्याचक्षते । एतदयुक्तम् । क्षणिकस्य कर्मणः काला- न्तरभाविफलसाधनत्वासम्भवात् । अथोच्यते । क्षणिकं कर्म, कालान्तरभावि च स्वर्ग- फलम्, विनष्टाच्च कारणात् कार्यस्यानुत्पत्तिः, श्रुतं च यागादेः कारणत्वम्, तदेतदन्य- थानुपपत्त्या फलोत्पत्त्यनुगुणं किमपि कालान्तरावस्थायि कर्मसामर्थ्यं कल्प्यते, यद्द्वारेण कर्मणां श्रुता फलसाधनता निर्वहति । तच्च प्रमाणान्तरागोचरत्वादपूर्वमिति व्यपदिश्यते । प्रियहितमोक्षहेतुः' इस वाक्य की व्याख्या इस रीति से करनी चाहिए कि (धर्मजनक क्रियाओं के) कर्त्ता के 'प्रियादि' का जो हेतु वही 'धर्म' है । इस प्रकार की व्याख्या नहीं करनी चाहिए; क्योंकि पुत्र के द्वारा अनुष्ठित श्राद्धरूप क्रिया से पिता में ही प्रीतिरूप फल का होना शास्त्रों में उपलब्ध होता है । एवं वृष्टि की कामना से 'कारीरी' नाम के याग के अनुष्ठान से जो वृष्टिरूप फल उत्पन्न होता है, उससे याग करनेवाले और उनके समीप के और लोग भी प्रीति का लाभ करते हैं । (प्र.) 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि वाक्यों से 'याग के द्वारा स्वर्ग का सम्पादन करना चाहिए' इस प्रकार यागादि श्रेय कर्म ही स्वर्गादि इष्टों के साधक के रूप में सुने जाते हैं । 'धर्म' उसी का नाम है जो पुरुष को श्रेयस् के साथ सम्बद्ध करे । तस्मात् यागादि कर्म ही धर्म हैं, धर्म जीव का गुण नहीं है । एवं जो यागादि कर्मों का अनुष्ठान करता है उसे ही लोग 'धार्मिक' कहते भी हैं । (उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि कर्म क्षण भर ही रहते हैं, उनसे बहुत काल बाद होनेवाले स्वर्गादि का सम्पादन सम्भव नहीं है । यदि यह कहें कि (प्र.) यागादि क्रियायें क्षणिक हैं । उनके स्वर्गादि फल उनसे बहुत समय बाद होते हैं । यह भी निर्णीत है कि विनाश को प्राप्त हुए कारणों से कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है । फिर भी यागादि क्रियाओं में स्वर्गादि फलों की हेतुता वेदों से श्रुत है; किन्तु यह हेतुता तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि यागादि के बाद और स्वर्गादि की उत्पत्ति से पहले तक रहनेवाले किसी व्यापार की कल्पना न कर लें, जिससे यागादि में वेदों के द्वारा श्रुत स्वर्गादिजनकता का निर्वाह हो सके । वही व्यापार और किसी प्रमाण के द्वारा गम्य न होने के कारण 'अपूर्व' कहलाता है ।
६६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म- न्यायकन्दली यथोक्तम्- फलाय विहितं कर्म क्षणिकं चिरभाविने । तत्सिद्धिर्नान्यथेत्येतदपूर्वमपि कल्प्यते ॥ अत्रोच्यते । न कर्मसामर्थ्यं क्षणिके कर्मणि समवेति, शक्तिमति विनष्टे निराश्रयस्य सामर्थ्यस्यावस्थानासम्भवात् । स्वर्गादिकं च फलं तदानीमनागतमेव, न शक्तेराश्रयो भवितुमर्हति । यदि त्यनुष्ठानानन्तरमेव स्वर्गो भवति ? अपूर्वकल्पनावैय्यर्थ्यम्, तदुप- भोगश्च दुर्निवारः । विशिष्टशरीरेन्द्रियादिविरहादननुभवश्चेत् ? तर्ह्ययं तदानीमनुपजात एव स्वर्गस्योपभोग्यैकस्वभावत्वात् । अनुपभोग्यमपि सुखस्वरूपमस्तीति अदृष्टकल्पनैव । तस्मान्न फलाश्रयमपूर्वम् । न चाकाशादिसमवेतादपूर्वादात्मगामिफलसम्भवः । वस्तुभूतं च कार्यमनाधारं नोपपद्यते, तस्मादात्मसमवेतस्यैव तस्योत्पत्तिरभ्युपेया । तथा सति न तत्कर्मसामर्थ्यं स्यात्, अन्यसामर्थ्यस्यान्यत्रासमवायात् । अथान्यत्राप्यन्यसमवेता शक्ति- रिष्यते, तस्याः कार्यानुमेयत्वादिति चेत् ? जैसा कहा गया है कि 'बहुत दिनों बाद होनेवाले स्वर्गादि फलों के लिए जो क्षण मात्र रहनेवाले यागादि का विधान किया गया है, वह विधान तब तक उपपन्न नहीं हो सकता, जब तक कि 'अपूर्व' की कल्पना न कर ली जाय। अतः 'अपूर्व' की कल्पना करते हैं । (उ.) इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि यह कर्म का सामर्थ्यरूप अपूर्व (जिसे स्वर्गसाधन पर्यन्त रहना है) यागादि क्रियाओं में तो रह नहीं सकता; क्योंकि वे क्षणिक हैं । अतः उनके नाश हो जाने पर बिना आश्रय के अपूर्व (स्वर्गोत्पादन पर्यन्त) की अवस्थिति ही सम्भव नहीं है । स्वर्गादि फल भी अपूर्व के आश्रय नहीं हो सकते; क्योंकि अपूर्व की उत्पत्ति के समय स्वर्गादि भविष्य के गर्भ में ही रहते हैं । यदि यागादि के अनुष्ठान के तुरन्त बाद ही स्वर्गादि की उत्पत्ति (आश्रय को उपपन्न करने के लिए) मानें, तो उनका उपयोग भी (उसी समय) मानना पड़ेगा । यदि ऐसा कहें कि उस समय (यागादि के अनुष्ठान के तुरन्त बाद) स्वर्गादि भोगों के उपयुक्त शरीर या इन्द्रियाँ नहीं हैं, इसी से स्वर्ग की उत्पत्ति नहीं होती है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि स्वर्गादि उस समय उत्पन्न ही नहीं होते, क्योंकि स्वर्गादि उपभोगस्वभाव के ही हैं । यह कल्पना अभूतपूर्व होगी कि स्वर्ग की सत्ता तो उस समय भी है, किन्तु वह स्वर्ग उपभोग्य नहीं है । यह भी सम्भव नहीं है कि (पुरुष से भिन्न) आकाशादि कोई भी वस्तु उसके आश्रय हों; क्योंकि आकाशादि में रहनेवाले अपूर्व से आत्मा में स्वर्ग की उत्पत्ति नहीं हो सकती । यह भी सम्भव नहीं है कि अपूर्व रूप कार्य की उत्पत्ति बिना आश्रय के ही हो; क्योंकि वह भावरूप कार्य है । अतः अपूर्व को यदि मानना है, तो उसकी उत्पत्ति आत्मा में ही माननी पड़ेगी । यदि ऐसा कहें कि (प्र.) हम यह भी मान लेंगे कि एक वस्तु की ऐसी भी शक्ति हो सकती है, जो समवाय सम्बन्ध से दूसरी वस्तु में रहे; क्योंकि शक्ति की सत्ता तो उससे उत्पन्न कार्यरूप
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६६३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६६३ न्यायकन्दली यथोक्तम्- शक्तिः कार्यानुमेया हि यद्गतैयोपलभ्यते । तद्गतैवाभ्युपेतव्या स्वाश्रयान्याश्रयापि च ॥ इति । तदयुक्तम् । विनष्टे शक्तिमति तन्निरपेक्षस्य शक्तिमात्रस्य कार्यजनकत्वानुपलम्भादेव । तेनैतदपि प्रत्युक्तम् । यदुक्तं मण्डनेन विधिविवेके-"तदाहितत्वात् तस्य शक्तिरिति" यागेनाहितत्वादपूर्व्वं यागस्य कार्यं स्यान्न तु शक्तिः, अपूर्वोपकृतात् कर्मणः फलानु- त्पत्तेः, तस्माच्चिरनिवृत्ते कर्मणि देशकालावरस्थादिसहकारिणोऽपूर्वादेव फलोत्पत्तेर- पूर्वमेव श्रेयःसाधनम् । कारणत्वश्रुतिस्तु यागादरपूर्वजननद्वारेण न साक्षादिति प्रमाणानुरोधादाश्रयणीयम् । तथा सति युक्तं धर्मः पुरुषगुण इति । योऽपि यागादौ धर्मव्यपदेशः, सोऽप्यपूर्वसाधनतया प्रीतिसाधन इव स्वर्गशब्दप्रयोगः। स्वर्ग- साधने हि चोदितस्य ज्योतिष्टोमस्य निरन्तरं प्रीतिसाधनतयार्थवादेन स्तुतेश्चन्द- नादौ च प्रीतियोगे सति प्रयोगात्, तदभावे चाप्रयोगात्, प्रीतिनिबन्धनः स्वर्गशब्दः, लिङ्ग के द्वारा ही अनुमित हो सकती है। जैसा कहा गया है कि "कार्यरूप हेतु से अनुमित होनेवाली शक्ति जहाँ जिस आश्रय में उपलब्ध होगी, उसी में उसकी सत्ता माननी पड़ेगी" अतः उस कारण की शक्ति उसी कारण में ही रहेगी, कभी उससे भिन्न आश्रय में नहीं रह सकती । (उ.) किन्तु यह भी अयुक्त ही है; क्योंकि शक्ति के आश्रय का विनाश हो जाने पर उस आश्रय से सर्वथा निरपेक्ष केवल शक्ति से कार्य की उत्पत्ति की उपलब्धि नहीं होती है । आगे कहे हुए इस समाधान से आचार्य मण्डन मिश्र की विधिविवेक ग्रन्थ की यह उक्ति भी खण्डित हो जाती है कि "उससे (याग से) जिस लिए कि 'उसका' अपूर्व का आधान होता है; अतः 'अपूर्व' याग की शक्ति कहलाता है ।" क्योंकि याग से 'आहित' अर्थात् उत्पन्न होने के कारण अपूर्व याग से उत्पन्न हुआ कार्य है । अपूर्व याग की शक्ति नहीं है, क्योंकि ऐसी बात नहीं है कि याग से ही स्वर्ग की उत्पत्ति होती है और इस उत्पादन कार्य में अपूर्व याग का साहाय्य करता है (क्योंकि स्वर्ग की उत्पत्ति के अव्यवहित पूर्वक्षण में याग की सत्ता ही नहीं है, फिर अपूर्व किसका साहाय्य करेगा ? ) । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि यागादि कर्मों के नाश हो जाने के बहुत पीछे उनसे उत्पन्न अपूर्व से ही स्वर्गादि फलों की उत्पत्ति होती है, जिसमें उसे उपयुक्त देश-कालादि का भी सहयोग प्राप्त होता है । अतः प्रमाण के द्वारा इसी पक्ष का अवलम्बन करना पड़ेगा कि अपूर्व ही स्वर्गादि श्रेयों का साक्षात् कारण है । यागादि क्रियाओं में जो स्वर्गादि फलों के हेतुत्व की चर्चा श्रुतियों में है,वह हेतुता 'अपूर्व' का उत्पादक होने से परम्परया यागादि भी स्वर्गादि के साधन हैं, इसी अभिप्राय से समझना चाहिए । तस्मात् भाष्य की यह उक्ति ठीक है कि 'धर्म पुरुष का ही गुण है' । यागादि क्रियाओं में जो 'धर्म' शब्द का व्यवहार होता है, उसे अपूर्व या धर्म के साधनरूप अर्थ में लाक्षणिक समझना चाहिए । जैसे कि प्रीति के चन्दन-
६६४ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म- न्यायकन्दली यस्य यथालक्षणया प्रीतिसाधने प्रयोगः प्रीतिमात्राभिधानेऽपि, तस्मात् प्रीतिसाधन- प्रतीत्युत्तेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनावैयर्थ्यात् । एवं धर्मशब्दस्यापि लक्षण्या तत्साधने प्रयोगः, एकाभिधानादेवोभयप्रतीतिसिद्धेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनानवकाशादिति तार्किकाणां प्रक्रिया । अतीन्द्रियः केनचिदिन्द्रियेणायोगिभिर्न गृह्यत इत्यतीन्द्रियो धर्मः। अन्त्यसुख- संविज्ञानविरोधी । धर्मस्तावत् कार्यत्वादवश्यं विनाशी, न च निर्हेतुको विनाशः कस्यचिद् विद्यते । अन्यतस्ततो विनाशे चास्य नियमेन फलोत्पत्तिकालं यावदवस्थानं न स्यात् । फलं च धर्मस्य कस्यचिदनेकसंवत्सरसहस्रोपभोग्यम्, तस्य यदि प्रथमोपभोगादपि नाशः, कालान्तरे फलानुत्पादः । न चैकस्य निर्भागस्य भागशो नाशः सम्भाव्यते, तस्मादन्त्यस्यैव । सम्यग्विज्ञानेन धर्मो विनाश्यते । ये तु वनितादि साधनों में 'स्वर्ग' शब्द का प्रयोग किया जाता है । स्वर्ग के साधनीभूत अपूर्व के लिए विहित ज्योतिष्टोमादि क्रियाओं का जो धर्मशब्द से नियमित व्यवहार होता है, वह उसका स्तुति रूप अर्थवाद है । एवं चन्दनादि साधनों में जब प्रीति का सम्बन्ध रहता है, तभी 'स्वर्ग' शब्द का प्रयोग होता है, जब जिसे उन साधनों से सुख नहीं मिलता है, तब उससे चन्दनादि में स्वर्गशब्द का प्रयोग नहीं होता । अतः यही समझना चाहिए कि प्रीति के साधनों में स्वर्गशब्द लाक्षणिक है और प्रीति में ही उसकी अभिधा शक्ति है; क्योंकि प्रीति और उसके साधन इन दोनों में स्वर्गशब्द की अभिधा की कल्पना व्यर्थ है । इसी प्रकार धर्म के ज्योतिष्टोमादि साधनों में धर्मशब्द का प्रयोग लक्षणा के द्वारा ही होता है; क्योंकि धर्म को अपूर्वरूप एक ही अर्थ में अभिधा मान लेने से ही अपूर्वरूप उसके मुख्यार्थ और ज्योतिष्टोमादि रूप लक्ष्यार्थ दोनों के बोध की उत्पत्ति हो जाएगी । अपूर्व में और अपूर्व के कारण ज्योतिष्टोमादि, दोनों में धर्म शब्द की अभिधा शक्ति की कल्पना व्यर्थ है । यही तार्किक लोगों की रीति है । 'अतीन्द्रियः' अर्थात् योगियों से भिन्न कोई भी साधारण पुरुष धर्म को किसी भी इन्द्रिय से नहीं देख सकता, अतः 'धर्म अतीन्द्रिय' है । 'अन्त्यसुखसंविज्ञानविरोधी' धर्म यतः उत्पत्तिशील वस्तु है, अतः वह विनाशशील भी है; किन्तु कोई भी विनाश बिना किसी कारण के नहीं होता । यदि अन्त्यसुख और संविज्ञान इन दोनों से भिन्न किसी से धर्म का विनाश मानें तो नियमपूर्वक स्वर्गादि. फलों की उत्पत्ति से पहले तक उसकी सत्ता नहीं रह सकेगी । (यदि किसी भी उपभोग से धर्म का विनाश मानें तो) किसी-किसी धर्म के फल का उपभोग हजारों साल चलता है, अतः उनमें पहले उपभोग से ही उसका विनाश हो जाएगा, आगे उससे उपभोग ही रुक जाएगा । यह भी सम्भव नहीं है कि एक अखण्ड वस्तु में उसके किसी एक भाग का विनाश हो (और अवशिष्ट भाग बचा रहे), तस्मात् अन्तिम सुख ही धर्म का नाशक
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६५ न्यायकन्दली नित्यं धर्ममाहुस्तेषां प्रायेणानुपपत्तिः, धर्माधर्मक्षयाभावात् । पुरुषान्तःकरणेति । आत्मविशेषगुणत्वात् सुखादिवत् । विशुद्धेति । विशुद्धोऽभिसन्धिः दम्भादिरहितः सङ्कल्पविशेषः, तस्माद्धर्मो जायते । वर्णाश्रमिणामिति । वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः । आश्रमिणो ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थयतयः । तेषां धर्मः प्रतिवर्णं प्रत्याश्रमं चाधिकृत्य विहितैः साधनैर्जन्यत इत्यर्थः । अतीन्द्रियस्य धर्मस्य साधनानि कुतः प्रत्येतव्यानि, तत्राह- तस्य त्विति । विशिष्टेनानुष्ठानेनाचार्यमुखाच्छ्रूयत एव न लिखित्या गृह्यत इति श्रुतिर्वेदः, स्मृतिर्मन्वादिवाक्यम्, ताभ्यां विहितानि प्रतिपादितानि वर्णाश्रमिणां सामान्यविशेषभावेनाव- स्थितानि द्रव्यगुणकर्माणि सामान्यानि धर्मसाधनानि । तत्र सर्वेषां वर्णाश्रमिणां च सामान्य- रूपतया धर्मसाधनानि कथ्यन्ते । धर्मे श्रद्धा धर्मे मनःप्रसादः । अहिंसा भूतानामन- भिद्रोहसंकल्पः । प्रतिषिद्धस्याभिद्रोहस्य निवृत्तेरधर्मो न भवति, न धर्मो जायते । अनभि- है (अवान्तर सुख नहीं) । संविज्ञान अर्थात् सम्यग् विज्ञान (तत्त्वज्ञान) से भी धर्म का नाश होता है । जो कोई धर्म को नित्य मानते हैं, उनके मत में मोक्ष की उत्पत्ति नहीं हो सकेगी; क्योंकि उसके लिए धर्म और अधर्म दोनों ही का विनाश आवश्यक है, जो धर्म को नित्य मानने से सम्भव नहीं है । 'पुरुषान्तःकरणेति' (धर्म पुरुष और अन्तःकरण के संयोग से उत्पन्न होता है क्योंकि) वह भी सुखादि की तरह आत्मा का विशेष गुण है । 'विशुद्धेति' विशुद्ध जो अभिसन्धि अर्थात् दम्भादि से रहित जो विशेष प्रकार का संकल्प, उससे धर्म की उत्पत्ति होती है । 'वर्णाश्रमिणामिति' 'वर्ण' शब्द से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अभिप्रेत हैं । 'आश्रमी' - ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी चार हैं । अर्थात् इन सबों के तथ्यतः प्रत्येक वर्ण के मनुष्यों के लिए एवं प्रत्येक आश्रम के मनुष्यों के लिए शास्त्रों में विहित जो साधन हैं, उनसे धर्म की उत्पत्ति होती है । धर्म तो अतीन्द्रिय है, फिर उसके कारणों का ज्ञान कैसे होगा ? इसी प्रश्न का उत्तर 'तस्य तु' इत्यादि से दिया गया है । विहित विशेष प्रकार के अनुष्ठान से आचार्य के मुख से जिसे सुना ही जाता है, अर्थात् जिसका लिप्यादि से ज्ञान नहीं होता, वही है 'श्रुति' अर्थात् वेद । 'स्मृति' शब्द से मन्वादि ऋषियों के वाक्य अभिप्रेत हैं । श्रुति और स्मृति इन दोनों से 'विहित' अर्थात् प्रतिपादित जो सभी वर्णों और सभी आश्रम वाले पुरुषों के लिए सामान्यभाव और विशेषभाव से स्थित द्रव्य, गुण और क्रिया, वे सभी धर्म के सामान्य साधन हैं । इनमें सभी वर्णों और सभी आश्रमियों के लिए समान रूप से जो धर्म के साधन हैं, उनका निरूपण 'धर्मे श्रद्धा' इत्यादि से करते हैं । धर्म के प्रसङ्ग में चित्त की प्रसन्नता ही धर्म में श्रद्धा है । सभी प्राणियों के प्रति द्रोह न करने का संकल्प अहिंसा है । जो द्रोह निषिद्ध है, उस द्रोह के न करने से इतना ही होता है कि 'अधर्म' नहीं होता; किन्तु उससे धर्म की उत्पत्ति नहीं होती ।
६६६ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म- प्रशस्तपादभाष्यम् तत्र सामान्यानि—धर्मे श्रद्धा, अहिंसा, भूतहितत्वम्, सत्यवचनम्, अस्तेयम्, ब्रह्मचर्यम्, अनुपधा, क्रोधवर्जनमभिषेचनम्, शुचिद्रव्यसेवनम्, विशिष्टदेवताभक्तिरुपवासोऽप्रमादश्च । उन (सामान्य धर्मों के और विशेष धर्मों के साधनों) में धर्म में श्रद्धा, अहिंसा, प्राणियों का उपकार, सत्यवचन, अस्तेय (दूसरे की वस्तु को विना उसकी आज्ञा के न लेना), ब्रह्मचर्य, दूसरे को ठगने की अनिच्छा (अनुपधा), अक्रोध, स्नान, पवित्र वस्तुओं का सेवन, इष्ट देवता में भक्ति, उपवास और अप्रमाद ये (१३) सभी वर्णों और सभी आश्रमियों के लिए समान रूप से धर्म के साधन हैं । न्याय्कन्दली द्रोहसङ्कल्पस्य विहितत्वात् स्यादेव धर्मसाधनम् । भूतहितत्वं भूतानामनुग्रहः । सत्य- वचनं यथार्थवचनम् । अस्तेयमशास्त्रपूर्वकं परस्वग्रहणं मया न कर्तव्यमिति सङ्कल्पः, न तु परस्यादाननिवृत्तिमात्रमभावरूपम् । ब्रह्मचर्यम् स्त्रीसेवापरिवर्जनम् । एतदपि संकल्प- रूपम् । अनुपधा भावशुद्धिः, विशुद्धेनाभिप्रायेण कृतानां कर्मणां धर्मसाधनत्वात् । क्रोध- वर्जनं क्रोधपरित्यागः, सोऽपि सङ्कल्पात्मक एव । अभिषेचनं स्नानम् । शुचिद्रव्यसेवनं शुचीनां तिलादिद्रव्याणां क्वचित् पर्वणि नियमेन सेवनं धर्मसाधनम् । विशिष्टदेवताभक्तिः त्रयीसम्मतायां देवतायां भक्तिरित्यर्थः । उपवास एकादश्यादिभोजननिवृत्तिसङ्कल्पः । अप्रमादो नित्यनैमित्तिकानां कर्मणामवश्यम्भावेन करणम् । एतानि सर्वेषामेव समानानि द्रोह न करने का कथित जो संकल्प है, उससे अवश्य ही धर्म उत्पन्न होगा; क्योंकि उसका विधान किया गया है । 'भूतहितत्व' शब्द से प्राणियों के प्रति अनुग्रह अभीष्ट है । 'सत्यवचन' शब्द का अर्थ है सच बोलना । 'दूसरे व्यक्ति के जिस धन का लेना शास्त्र में विहित नहीं है, वह धन मुझे नहीं लेना चाहिए' इस प्रकार का संकल्प ही 'अस्तेय' है । अस्तेय शब्द से 'दूसरे के धन का न लेना' केवल यह अभावरूप अर्थ नहीं है । 'ब्रह्मचर्य्य' शब्द का अर्थ है, 'स्त्री से उपभोगसम्बन्ध का परित्याग' यह भी संकल्प रूप ही है । 'अनुपधा' शब्द से 'अभिप्रायशुद्धि' अभीष्ट है, यतः विशुद्ध बुद्धि के द्वारा अनुष्ठित कर्म ही धर्म के कारण है । 'क्रोधवर्जन' है क्रोध का परित्याग, यह भी संकल्परूप ही है । 'अभिषेचन' है स्नान । 'शुचिद्रव्य का सेवन' अर्थात् किसी विशेष पर्व में तिल प्रभृति पवित्र द्रव्यों का सेवन धर्म का कारण है । 'विशिष्टदेवता में भक्ति' अर्थात् तीनों वेदों के द्वारा प्रतिपादित किसी देवता में भक्ति । 'उपवास' शब्द से एकादशी प्रभृति विशेष तिथियों में भोजन न करने का संकल्प अभिप्रेत है । 'अप्रमाद' शब्द का अर्थ है, 'नित्य एवं नैमित्तिक कर्मों का अवश्य अनुष्ठान करना' । ये सभी वर्णों और सभी आश्रमों के व्यक्तियों के लिए धर्म के साधन हैं । 'इज्या' शब्द
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६७ प्रशस्तपादभाष्यम् ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानामिज्याध्ययनदानानि । ब्राह्मणस्य विशिष्टानि प्रतिग्रहाध्यापनयाजनानि, स्ववर्णविहिताश्च संस्काराः । यज्ञ, वेदों का अध्ययन और दान ये तीन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य (द्विजों) इन तीनों वर्णों के लिए समान रूप से धर्म के साधन हैं । प्रतिग्रह, अध्यापन (वेदों का पढ़ना), यज्ञ कराना (याजन) अपने वर्ण (ब्राह्मण) के लिए विहित संस्कार, ये सभी ब्राह्मणों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं । न्यायकन्दली धर्मसाधनानि । इज्या यागहोमानुष्ठानम् । अध्ययनं वेदपाठः । दानं स्वद्रव्यस्य परस्वत्वापत्तिसङ्कल्पविशेषः । शूद्रस्यापि दानमस्त्येव, तेन यज्ञादिषु यद्दानं तदभिप्रायेणेदं त्रैवर्णिकानां विशिष्टं धर्मसाधनमुक्तम् । ब्राह्मणस्य विशिष्टान्यसाधारणानि धर्मसाधनानि प्रतिपादयति-प्रतिग्रहाध्यापन- याजनानि । प्रतिग्रहो विशिष्टाद् द्रव्यग्रहणम् । अध्यापनं तु प्रसिद्धमेव । याजनमर्त्वि- ज्यम् । एतानि ब्राह्मणस्य धर्मसाधनानि, तस्यामीभिरेवोपायैरर्जितानां द्रव्याणां धर्माधि- कारात् । स्ववर्णविहिताश्चाष्टचत्वारिंशत् संस्कारा वैदिककर्मानुष्ठानयोग्यतापादनद्वारेण ब्राह्मणस्य धर्मसाधनम् ।। से याग एवं होम का अनुष्ठान समझना चाहिए । 'अध्ययन' शब्द का अर्थ है वेदों का पाठ । 'दान' शब्द से वह विशेष प्रकार का संकल्प अभीष्ट है, जिससे अपने स्वत्ववाले धन में दूसरे के स्वत्व की उत्पत्ति हो सके । यज्ञादि में जो दान किये जाते हैं, यहाँ उन्हीं दानों को समझना चाहिए, यदि ऐसी बात न हो; किन्तु दान शब्द से सामान्यतः सभी दान अभीष्ट हों (तो फिर) त्रैवर्णिकों के लिए निर्दिष्ट विशेष धर्मों में इसकी गणना असङ्गत हो जाएगी; क्योंकि केवल दान तो शूद्रों के लिए भी धर्म का साधन है ही । ब्राह्मणों के 'विशिष्ट' अर्थात् असाधारण धर्म के जो साधन हैं (अर्थात् जो साधन केवल ब्राह्मणों में ही धर्म का उत्पादन कर सकते हैं) उनका प्रतिपादन 'प्रतिग्रहाध्यापनयाजनानि' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । विहित एवं विशेष व्यक्ति से दान का ग्रहण ही 'प्रतिग्रह' शब्द से लेना चाहिए । 'अध्यापन' शब्द का अर्थ प्रसिद्ध ही है । 'याजन' शब्द का अर्थ है- ऋत्विक् का कार्य करना । 'एतानि ब्राह्मणस्य धर्मसाधनानि' ब्राह्मणों को इन्हीं उपायों से प्राप्त धन के द्वारा धर्म सम्पादन का अधिकार है । 'स्ववर्णविहिताश्च संस्काराः' अर्थात् ब्राह्मणों के लिए विहित अड़तालिस प्रकार के संस्कार भी उनमें वेदों से निर्दिष्ट अनुष्ठान करने की योग्यता सम्पादन के द्वारा धर्म के साधन हैं ।
६६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म- प्रशस्तपादभाष्यम् क्षत्रियस्य सम्यक् प्रजापालनमसाधुनिग्रहो युद्धेष्वनिवर्त्तनं स्वकीयाश्च संस्काराः । वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि स्वकीयाश्च संस्काराः । अच्छी तरह प्रजा का पालन करना, दुष्टों का दमन, युद्ध से न लौटना (अनिवृत्ति) और अपने (क्षत्रियों) के लिए शास्त्रों में विहित संस्कार ये सभी क्षत्रियों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं । खरीद, बिक्री, खेती करना, पशुओं का पालन, अपने (वैश्यों के) लिए शास्त्रों के द्वारा विहित संस्कार ये सभी वैश्यों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं । न्यायकन्दली क्षत्रियस्य विशिष्टानि धर्मसाधनानि । सम्यक् प्रजापालनं न्यायवृत्तीनां प्रजानां परिरक्षणम् । असाधुनिग्रहः, दुष्टानां यथाशास्त्रं शासनम् । युद्धेष्वनिवर्त्तनं युद्धेषु विजयावधिः प्राणावधिर्वा आयुधव्यापारः । स्वकीयाश्च संस्काराः । वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि । मूल्यं दत्त्वा परस्माद् द्रव्यग्रहणं क्रयः, मूल्यमादाय परस्य स्वद्रव्यदानं विक्रयः । कृषिः परिकर्षितायां भूमौ बीजस्य वपनं रोपणं च, पशुपालनं गोऽजादिकादिपरिरक्षणम् । एतानि वैश्यस्य धर्मसाधनानि, तस्यामीभि- रेवोपायैरर्जितानां धनानां धर्माङ्गत्वात् । शूद्रस्य पूर्वेषु वर्णेषु पारतन्त्र्यममन्त्रिकाश्च क्रिया धर्मसाधनम् । 'क्षत्रियस्य विशिष्टानि धर्मसाधनानि' । 'सम्यक् प्रजापालन' अर्थात् उचित न्याय की रीति से चलनेवाली प्रजाओं का पालन करना, 'असाधुनिग्रह' अर्थात् शास्त्रों में कही गयी रीति के अनुसार दुष्टों को दण्ड देना, 'युद्धेष्वनिवर्त्तनम्' अर्थात् जब तक विजय प्राप्त न हो जाय या जब तक प्राण रहें तब तक अस्त्र- शस्त्रों को चलाते रहना एवं क्षत्रियों के लिए विहित संस्कार, ये सभी क्षत्रियों के लिए धर्म के साधन हैं । 'वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि' । मूल्य देकर दूसरों से द्रव्य लेना 'क्रय' कहलाता है । मूल्य लेकर दूसरे को अपना द्रव्य देना ही 'विक्रय' है । जोती हुई भूमि में बीजों को बोना या रोपना ही 'कृषि' है । गाय, बकरी प्रभृति को पालना ही 'पशुपालन' है । ये सभी और वैश्यों के लिए कहे गये संस्कार, ये ही वैश्यों के लिए ही धर्म के साधन हैं । इन्हीं उपायों से प्राप्त धन वैश्यों के धर्म के साधक हैं । 'शूद्रस्य पूर्ववर्णेषु पारतन्त्र्यममन्त्रिकाश्च क्रियाः' अर्थात् पहले कहे हुए ब्राह्मणादि वर्णों की अधीनता, बिना मन्त्र के ही विवाहादि क्रियाओं के अनुष्ठान प्रभृति ही शूद्रों के धर्म के साधन हैं ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६९ प्रशस्तपादभाष्यम् शूद्रस्य पूर्ववर्णपारतन्त्र्यममन्त्रिकाश्च क्रियाः । आश्रमिणां तु ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिनः स्वशास्त्रविहितानि गुरुशुश्रूषा- ऽग्नीन्धनभैक्ष्याचरणानि मधुमांसदिवास्वप्नाञ्जनाभ्यञ्जनादिवर्जनं च । कथित तीनों वर्णों की पराधीनता एवं बिना मन्त्र की क्रिया, ये शूद्रों के विशेष धर्म के साधन हैं । आश्रमियों में गुरुकुलनिवासी ब्रह्मचारियों के लिए शास्त्रों में विहित गुरु और अग्नि की सेवा, (होम के लिए) लकड़ी लाना, भिक्षा माँगना एवं मधु, मांस, दिन की निद्रा, अञ्जन और अभ्यङ्ग (मालिश), इन सबों को छोड़ना (ये सभी) उनके विशेष (असाधारण) धर्म के साधन हैं । न्यायकन्दली आश्रमिणां तु धर्मसाधनमुच्यते । ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिन इति । उपनीय यः शिष्यं साङ्गं सरहस्यं च वेदमध्यापयति स गुरुः, तस्य कुले गृहे वसनशीलस्य ब्रह्मचारिणः स्वशास्त्रविहितानि ब्रह्मचारिणमधिकृत्य शास्त्रेण विहितानि । गुरुशुश्रूषा गुरोः परिचर्या, गुरुशुश्रूषा च अग्निश्चेन्धनं च भैक्ष्यं च तेषामाचरणानि । गुरुशुश्रूषा- भैक्ष्ययोः करणमेवाचरणम् । अग्नेराचरणम्, प्रत्यहमग्नौ होमः, इन्धनस्याचरणमग्न्यर्थं वनादिन्धनस्याहरणमिति विवेकः । गृहस्थस्य धर्मसाधनं कथयति-विद्याव्रतस्नातकस्येति । यो वेदा- 'ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिनः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब आश्रमियों के धर्म का साधन कहते हैं । यहाँ 'गुरु' शब्द से उस विशिष्ट पुरुष को समझना चाहिए जो शिष्य का उपनयन संस्कार कराकर अङ्गों सहित वेदों के रहस्य को समझावे । ऐसे 'गुरु' के गृह में सम्पूर्ण अध्ययनकाल तक नियमतः निवास कर अध्ययन करनेवाले 'ब्रह्मचारी' के लिए 'स्वशास्त्रविहितानि' अर्थात् विशेषकर ब्रह्मचारी के लिए ही शास्त्रों में विहित (जो 'गुरुशुश्रूषादि' उनका) आचरण करना चाहिए । 'गुरुशुश्रूषाग्नीन्धनभैक्ष्याचरणानि' यह वाक्य 'गुरुशुश्रूषा च अग्निश्चेन्ध- नञ्च भैक्ष्यं च तेषामाचरणानि' इस प्रकार की व्युत्पत्ति से सिद्ध है । गुरु की शुश्रूषा (सेवा) करना ही गुरुशुश्रूषा का आचरण है । भिक्षा माँगना ही भिक्षाचरण है । प्रतिदिन अग्नि में होम करना ही अग्नि का आचरण है । होम के लिए वन से लकड़ी लाना ही इन्धनाचरण है । इस प्रकार का विभाग प्रकृत में जानना चाहिए । 'विद्याव्रतस्नातकस्य' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गृहस्थाश्रमी के लिए जो धर्म के साधन हैं, वे कहे गये हैं । 'विद्याव्रतस्नातक' शब्द से वे पुरुष अभिप्रेत हैं, जिन्होंने
६७० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म- प्रशस्तपादभाष्यम् विद्याव्रतस्नातकस्य कृतदारस्य गृहस्थस्य शालीनयायावरवृत्त्युपार्जितैरथैँ- र्भूतमनुष्यदेवपितृब्रह्माख्यानां पञ्चानां महायज्ञानां सायम्प्रातरनुष्ठानम्, एकाग्नि- विधानेन पाकयज्ञसंस्थानां च नित्यानां शक्तौ विद्यमानायामग्न्याधेयादीनां च हविर्यज्ञसंस्थानामग्निष्टोमादीनां सोमयज्ञसंस्थानां च । ऋत्वन्तरेषु ब्रह्मचर्य- मपत्योत्पादनं च । शालीनवृत्ति एवं यायावरवृत्ति के द्वारा उपार्जित धन से प्रातःकाल और सायंकाल भूतयज्ञ (काकादि प्राणियों के लिए अन्न उत्सर्ग करना), मनुष्ययज्ञ (अतिथिसेवा), देवयज्ञ (होम), पितृयज्ञ (नित्यश्राद्ध), ब्रह्मयज्ञ (वेदपाठ) एवं सामर्थ्य के रहने पर एकाग्निविधान (विवाह के समय गृहीत अग्नि) से पाकयज्ञसंस्थाओं (अष्टका, पार्वणी, चैत्र्य, आश्वयुज्य प्रभृति) का अनुष्ठान, अग्निहोत्र एवं विशेष प्रकार के हविर्यज्ञ संस्था के (दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य एवं आग्रायण प्रभृति) इष्टियों का, सोमयज्ञ संस्था के (अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र एवं आप्तोर्याम) यज्ञों का अनुष्ठान एवं (पत्नी के) ऋतुकाल से भिन्न समय में ब्रह्मचर्य का पालन एवं पुत्र का उत्पादन, ये सभी विद्याव्रतस्नातक (वेदाध्ययन के लिए स्वीकार किये गये व्रतों को अध्ययन के समाप्त हो जाने के कारण छोड़ देनेवाले) विवाहित गृहस्यों के विशेष धर्म के साधन हैं । न्यायकन्दली ध्ययनार्थं गृहीतं व्रतमधीते वेदे विसर्जितवान् स विद्याव्रतस्नातकः, तस्य कृतदारस्य कृतपत्नीपरिग्रहस्य गृहस्थस्य शालीनयायावरवृत्त्युपार्जितैरर्थैर्भूतमनुष्यदेवपितृब्रह्मा- ख्यानां पञ्चानां महायज्ञानां सायं प्रातरनुष्ठानम् । यावता धान्येन कुशूलपात्रं कुम्भीपात्रं वा परिपूर्यते, त्र्यहमेकाहं वा वर्तनं भवति, तावन्मात्रस्य परेण स्वयमानीयमानस्य श्रद्धया दीयमानस्य यः परिग्रहः सा शालीना वृत्तिः । परस्मादप्रतिग्रहगतश्चक्रमादाय यत् प्रत्यहं भिक्षाटनं सा यायावरवृत्तिः । ताभ्यामुपार्जितैरथैँः पञ्चानां महायज्ञानां सायं प्रातरपराह्णे चानुष्ठानं वेदाध्ययन का व्रत लिया हो एवं वेदाध्ययन के सम्पन्न हो जाने पर ही उसकी समाप्ति की हो । वे ही जब 'कृतदार' हो जाँय अर्थात् विवाह कर लें, ऐसे गृहस्थों के लिए ही जो धर्म के साधन हैं, वे 'शालीनयायावर' इत्यादि सन्दर्भ से गिनाये गये हैं । जितने अन्न से एक कुशूलपात्र (कच्ची मिट्टी की कोठी) या एक घड़ा भर जाय, अथवा तीन दिनों तक या एक ही दिन का भोजन चल सके, उतने ही अन्न को स्वयं ले आने पर या श्रद्धापूर्वक दूसरों के देने पर जो ग्रहण किया जाता है, उस वृत्ति को 'शालीना वृत्ति' कहते हैं ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७१ न्यायकन्दली गृहस्थस्य धर्मसाधनम् । भूतेभ्यो बलिप्रदानं भूतयज्ञः । अतिथिपूजनं मनुष्ययज्ञः । होमो देवयज्ञः । श्राद्धं पितृयज्ञः । ब्रह्मयज्ञो वेदपाठः । एकाग्निविधानेन पाकयज्ञ- संस्थानामिति । अनुष्ठानम् । एकाग्निरिति औपासनिकः । तस्य विधानं विवाहकाले परिग्रहः । तेन पाकयज्ञसंस्थानां पाकयज्ञविशेषाणामष्टकापार्वणीचैत्र्याश्वयुज्यादीनां नित्यानामवश्यकरणीयानां सति सामर्थ्येऽनुष्ठानम् । अग्न्याधेयादीनामिति । अनुष्ठानं धर्मसाधनम्, अग्न्याधेयशब्देनाग्न्याधानस्याभिधानम्, यद् ब्राह्मणेन वसन्ते क्रियते । हविर्यज्ञसंस्था हविर्यज्ञविशेषा दर्शपूर्णमासचातुर्मास्याग्रायणादिका इष्टयः कथ्यन्ते । अग्निष्टोमादीति अग्निष्टोमोक्थ्यषोडशीवाजपेयातिरात्राप्तोर्यामाः सप्तसोमयज्ञविशेषाः सोमयज्ञसंस्था उच्यन्ते । ऋत्वन्तरेष्विति । ऋतुकालादन्यकालेषु ब्रह्मचर्यं व्रतरूपेण स्त्री- सेवापरिवर्जनं धर्मसाधनम् । अपत्योत्पादनमपि धर्मसाधनम्, पुत्रेण लोकाञ्जयतीति श्रुतेः । दूसरों से प्रतिग्रह न लेकर बारी-बारी से प्रत्येक आँगन में भिक्षा माँगने को 'यायावरवृत्ति' कहते हैं। इन दोनों वृत्तियों से ही उपार्जित धन के द्वारा सायङ्काल, प्रातःकाल और अपराह्नकाल में पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान गृहस्थों के लिए धर्म का साधन है । काकादि प्राणियों के लिए बलि देने को 'भूतयज्ञ' कहते हैं । अतिथियों की पूजा को ही 'मनुष्ययज्ञ' कहते हैं। होम ही 'देवयज्ञ' है । श्राद्ध को 'पितृयज्ञ' कहते हैं । वेदों का पाठ ही 'ब्रह्मयज्ञ' है । 'एकाग्निविधानेन पाकयज्ञसंस्थानाम्' अर्थात् इनके अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं । 'एकाग्नि' शब्द से औपासनिक अग्नि को समझना चाहिए, जिसका ग्रहण विवाह के समय किया जाता है । उस अग्नि के द्वारा 'पाकयज्ञसंस्था' के होमों का अर्थात् अष्टका, पार्वणी, चैत्र्य एवं आश्वयुज्य प्रभृति नित्यकर्मों का अर्थात् अवश्य- करणीय कर्मों का सामर्थ्य रहने पर जो अनुष्ठान (वे भी धर्म के साधन हैं), 'अग्न्याधेयादीनाम्' अर्थात् अग्न्याधेयादि के अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं । 'अग्न्याधेय' शब्द से अग्नि का आधान समझना चाहिए, जो वसन्त के समय ब्राह्मणों के द्वारा अनुष्ठित होता है । 'हविर्यज्ञसंस्था' शब्द से विशेष प्रकार के दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रायण प्रभृति इष्टियाँ कही जाती हैं । 'अग्नि ष्टोमादीति' अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम ये विशेष प्रकार के सात सोमयज्ञ ही 'सोमयज्ञसंस्था' कहलाते हैं । 'ऋत्वन्तरेषु' स्त्री के ऋतुकाल से भिन्न समय में व्रतरूप से 'ब्रह्मचर्य' का अर्थात् स्त्रीसङ्ग का त्याग भी धर्म का साधन है । पुत्र को उत्पन्न करना भी धर्म का साधन है; क्योंकि 'पुत्रेण लोकान् जयति' यह श्रुति है ।