भारतकोश
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विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

मनोमय कोश ५१ विवेक-वैराग्यादि गुणोंके उत्कर्षसे शुद्धताको प्राप्त हुआ मन मुक्तिका हेतु होता है, अतः पहले बुद्धिमान् मुमुक्षुके वे (ज्ञान-वैराग्य) दोनों ही दृढ़ होने चाहिये। मनो नाम महाव्याघ्रो विषयारण्यभूमिषु। चरत्यत्र न गच्छन्तु साधवो ये मुमुक्षवः ॥ १७८ ॥ मन नामका भयंकर व्याघ्र विषयरूप वनमें घूमता फिरता है। जो साधु मुमुक्षु हैं, वे वहाँ न जायें। मनः प्रसूते विषयानशेषान् स्थूलात्मना सूक्ष्मतया च भोक्तुः। शरीरवर्णाश्रमजातिभेदान् गुणक्रियाहेतुफलानि नित्यम् ॥ १७९ ॥ मन ही सम्पूर्ण स्थूल-सूक्ष्म विषयोंको, शरीर, वर्ण, आश्रम, जाति आदि भेदोंको तथा गुण, क्रिया, हेतु और फलादिको भोक्ताके लिये नित्य उत्पन्न करता रहता है। असङ्गचिद्रूपममुं विमोह्य देहेन्द्रियप्राणगुणैर्निबध्य । अहम्ममेति भ्रमयत्यजस्रं मनः स्वकृत्येषु फलोपभुक्तिषु ॥ १८० ॥ इस असंग चिद्रूप आत्माको मोहित करके तथा इसे देह, इन्द्रिय, प्राणादि गुणोंसे बाँधकर, यह मन ही इसको 'मैं-मेरा' भावसे अपने कर्म और उनके फलोपभोगमें निरन्तर भटकाता है। अध्यासदोषात्पुरुषस्य संसृति- रध्यासबन्धस्त्वमुनैव कल्पितः। रजस्तमोदोषवतोऽविवेकिनो जन्मादिदुःखस्य निदानमेतत् ॥ १८१ ॥ अध्यास-दोषसे ही पुरुषको जन्म-मरणरूप संसार होता है और यह

५२ विवेक-चूडामणि अध्यासका बन्धन इसीका कल्पित किया हुआ है तथा रज-तम आदि दोषयुक्त अविवेकी पुरुषके लिये यह (अध्यास) ही जन्मादि दुःखका मूल कारण है। अतः प्राहुर्मनोऽविद्यां पण्डितास्तत्त्वदर्शिनः । येनैव भ्राम्यते विश्वं वायुनेवाभ्रमण्डलम् ॥ १८२ ॥ अतः तत्त्वदर्शी विद्वान् मनको ही अविद्या कहते हैं; जिसके द्वारा वायुसे मेघ-मण्डलकी भाँति यह सम्पूर्ण विश्व भ्रमाया जा रहा है। तन्मनःशोधनं कार्यं प्रयत्नेन मुमुक्षुणा। विशुद्धे सति चैतस्मिन्मुक्तिः करफलायते ॥ १८३ ॥ उस मनका मुमुक्षुको प्रयत्नपूर्वक शोधन करना चाहिये, उसके शुद्ध हो जानेपर मुक्ति करामलकवत् हो जाती है। मोक्षैकसक्त्या विषयेषु रागं निर्मूल्य संन्यस्य च सर्वकर्म। सच्छ्रद्धया यः श्रवणादिनिष्ठो रजःस्वभावं स धुनोति बुद्धेः ॥ १८४ ॥ मोक्षकी आसक्तिसे जो विषयोंमें रागका निर्मूलन करके तथा सर्वकर्मोंको त्यागकर, शुद्ध श्रद्धासे युक्त हुआ श्रवणादिमें तत्पर रहता है, वह बुद्धिके रजोमय (चंचल) स्वभावको नष्ट कर देता है। मनोमयो नापि भवेत्परात्मा ह्याद्यन्तवत्त्वात्परिणामिभावात् । दुःखात्मकत्वाद्विषयत्वहेतो- र्द्रष्टा हि दृश्यात्मतया न दृष्टः ॥ १८५ ॥ मनोमय कोश भी आद्यन्तवान्, परिणामी, दुःखात्मक और विषयरूप होनेके कारण परात्मा नहीं हो सकता, क्योंकि द्रष्टा कभी दृश्यरूप नहीं देखा गया।

विज्ञानमय कोश बुद्धिर्बुद्धीन्द्रियैः सार्धं सवृत्तिः कर्तृलक्षणः। विज्ञानमयकोशः स्यात्पुंसः संसारकारणम्॥ १८६॥ ज्ञानेन्द्रियोंके साथ वृत्तियुक्त बुद्धि ही कर्तापनके स्वभाववाला विज्ञानमय कोश है, जो पुरुषके [ जन्म-मरणरूप ] संसारका कारण है। अनुव्रजच्चित्प्रतिविम्बशक्ति- र्विज्ञानसंज्ञः प्रकृतिर्विकारः। ज्ञानक्रियावानहमित्यजस्रं देहेन्द्रियादिष्वभिमन्यते भृशम्॥ १८७॥ चित्त और इन्द्रियादिका अनुगमन करनेवाली चेतनकी प्रतिविम्बशक्ति ही 'विज्ञान' नामक प्रकृतिका विकार है। वह 'मैं ज्ञान और क्रियावान् हूँ' ऐसा देह-इन्द्रिय आदिमें निरन्तर अभिमान किया करता है। अनादिकालोऽयमहंस्वभावो जीवः समस्तव्यवहारवोढा। करोति कर्माण्यपि पूर्ववासनः पुण्यान्यपुण्यानि च तत्फलानि॥ १८८॥ भुङ्क्ते विचित्रास्वपि योनिषु व्रज- न्नायाति निर्यात्यध ऊर्ध्वमेषः। अस्यैव विज्ञानमयस्य जाग्रत्- स्वप्नाद्यवस्था सुखदुःखभोगः॥ १८९॥ देहादिनिष्ठाश्रमधर्मकर्म- गुणाभिमानं सततं ममेति। विज्ञानकोशोऽयमतिप्रकाशः प्रकृष्टसान्निध्यवशात्परात्मनः। अतो भवत्येष उपाधिरस्य यदात्मधीः संसरति भ्रमेण॥ १९०॥

५४ विवेक-चूड़ामणि यह अहंस्वभाववाला विज्ञानमय कोश ही अनादिकालीन जीव और संसारके समस्त व्यवहारोंका निर्वाह करनेवाला है। यह अपनी पूर्व- वासनासे पुण्य-पापमय अनेकों कर्म करता और उनके फल भोगता है तथा विचित्र योनियोंमें भ्रमण करता हुआ कभी नीचे आता और कभी ऊपर जाता है। जाग्रत्, स्वप्न आदि अवस्थाएँ, सुख-दुःख आदि भोग, देहादिसे सम्बन्धित आश्रमादिके धर्म-कर्म, गुणोंका अभिमान और ममता आदि सर्वदा इस विज्ञानमय कोशमें ही रहते हैं। यह आत्माकी अति निकटताके कारण अत्यन्त प्रकाशमय है; अतः यह इसकी उपाधि है, जिसमें भ्रमसे आत्मबुद्धि करके यह जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें पड़ता है। आत्माकी उपाधिसे असंगता योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृदि स्फुरत्स्वयंज्योतिः । कूटस्थः सन्नात्मा कर्ता भोक्ता भवत्युपाधिस्थः ॥ १९१ ॥ यह जो स्वयंप्रकाश विज्ञानस्वरूप हृदयके भीतर प्राणादिमें स्फुरित हो रहा है, वह कूटस्थ (निर्विकार) आत्मा होनेपर भी उपाधिवश कर्ता भोक्ता हो जाता है। स्वयं परिच्छेदमुपेत्य बुद्धे- स्तादात्म्यदोषेण परं मृषात्मनः । सर्वात्मकः सन्नपि वीक्षते स्वयं स्वतः पृथक्त्वेन मृदो घटानिव ॥ १९२ ॥ वह परात्मा मिथ्या बुद्धिसे परिच्छिन्न होकर उससे एकीभूत हो जानेके दोषसे स्वयं सर्वात्मक होते हुए भी मिट्टीसे घड़ेके समान अपनेको अपनेहीसे पृथक् देखता है। उपाधिसम्बन्धवशात्परात्मा ह्युपाधिधर्माननु भाति तद्गुणः । अयोविकारानविकारिवह्निवत् सदैकरूपोऽपि परः स्वभावात् ॥ १९३ ॥

आत्मज्ञान ही मुक्तिका उपाय है ५५ वह परात्मा स्वरूपसे तो सदा एकरूप ही है तथापि उपाधिके सम्बन्धसे उसके गुणोंसे युक्त-सा होकर उसीके धर्मोंके साथ प्रकाशित होने लगता है, जिस प्रकार लोहेके विकारोंमें व्याप्त हुआ अविकारी अग्नि उन्हींके समान प्रकाशित होता है। मुक्ति कैसे होगी ? शिष्य उवाच भ्रमेणाप्यन्यथा वास्तु जीवभावः परात्मनः। तदुपाधेरनादित्वान्नानादेर्नाश इष्यते ॥ १९४॥ शिष्य—हे गुरुदेव ! भ्रमसे हो अथवा किसी अन्य कारणसे, परात्माको ही जीव-भावकी प्राप्ति हुई है; और उसकी उपाधि अनादि है तथा अनादि वस्तुका नाश हो नहीं सकता। अतोऽस्य जीवभावोऽपि नित्यो भवति संसृतिः । न निवर्तेत तन्मोक्षः कथं मे श्रीगुरो वद ॥ १९५ ॥ इसलिये इस आत्माका जीवभाव भी नित्य है और ऐसा होनेसे इसका जन्म-मरणरूप संसार-चक्र कभी निवृत्त नहीं हो सकता; तो फिर, हे श्रीगुरुदेव ! इसका मोक्ष कैसे होगा, सो कहिये ? आत्मज्ञान ही मुक्तिका उपाय है श्रीगुरुरुवाच सम्यक्पृष्टं त्वया विद्वन्सावधानेन तच्छृणु। प्रामाणिकी न भवति भ्रान्त्या मोहितकल्पना ॥ १९६ ॥ गुरु—हे वत्स ! तू बड़ा बुद्धिमान् है, तूने बहुत ठीक बात पूछी है। अच्छा, अब सावधान होकर सुन। देख, मुग्ध पुरुषोंकी भ्रमवश की हुई कल्पना माननीय नहीं हुआ करती। भ्रान्तिं विना त्वसङ्गस्य निष्क्रियस्य निराकृतेः। न घटेतार्थसम्बन्धो नभसो नीलतादिवत् ॥ १९७ ॥

५६ विवेक-चूड़ामणि जो असंग, निष्क्रिय और निराकार है, उस आत्माका पदार्थोंसे, नीलता आदिसे आकाशके समान भ्रमके अतिरिक्त और किसी प्रकार सम्बन्ध नहीं हो सकता। स्वस्य द्रष्टुर्निर्गुणस्याक्रियस्य प्रत्यग्बोधानन्दरूपस्य बुद्धेः। भ्रान्त्या प्राप्तो जीवभावो न सत्यो मोहापाये नास्त्यवस्तुस्वभावात् ॥ १९८ ॥ साक्षी, निर्गुण, अक्रिय और प्रत्यग्ज्ञानानन्दस्वरूप उस आत्मामें बुद्धिके भ्रमसे ही जीव-भावकी प्राप्ति हुई है, वह वास्तविक नहीं है; क्योंकि वह अवस्तुरूप होनेसे, मोह दूर हो जानेपर स्वभावसे ही नहीं रहता। यावद् भ्रान्तिस्तावदेवास्य सत्ता मिथ्याज्ञानोज्जृम्भितस्य प्रमादात्। रज्ज्वां सर्पो भ्रान्तिकालीन एव भ्रान्तेर्नाशे नैव सर्पोऽपि तद्वत् ॥ १९९ ॥ जैसे भ्रमकी स्थितिपर्यन्त ही रज्जुमें सर्पकी प्रतीति होती है, भ्रमके नाश होनेपर फिर सर्प प्रतीत नहीं होता, वैसे ही जबतक भ्रम है, तभीतक प्रमादवश मिथ्या ज्ञानसे प्रकट हुए इस (जीव-भाव)-की सत्ता है। अनादित्वमविद्यायाः कार्यस्यापि तथेष्यते। उत्पन्नायां तु विद्यायामाविद्यकमनाद्यपि ॥ २०० ॥ प्रबोधे स्वप्नवत्सर्वं सहमूलं विनश्यति। लोकमें अविद्या और उसके कार्य जीव-भावका अनादित्व माना जाता है। किन्तु जग पड़नेपर जैसे सम्पूर्ण स्वप्न-प्रपंच अपने मूलसहित नष्ट हो जाता है उसी प्रकार ज्ञानोदय होनेपर अविद्या-जनित जीव-भावका नाश हो जाता है। अनाद्यपीदं नो नित्यं प्रागभाव इव स्फुटम् ॥ २०१ ॥ अनादेरपि विध्वंसः प्रागभावस्य वीक्षितः।

आत्मज्ञान ही मुक्तिका उपाय है ५७ यह जीव-भाव अनादि होनेपर भी प्रागभावके समान नित्य नहीं है, क्योंकि अनादि प्रागभावका भी ध्वंस होना देखा ही गया है। यद्बुद्ध्युपाधिसम्बन्धात्परिकल्पितमात्मनि ॥२०२॥ जीवत्वं न ततोऽन्यत्तु स्वरूपेण विलक्षणम्। सम्बन्धः स्वात्मनो बुद्ध्या मिथ्याज्ञानपुरःसरः ॥२०३॥ विनिवृत्तिर्भवेत्तस्य सम्यग्ज्ञानेन नान्यथा। ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं सम्यग्ज्ञानं श्रुतेर्मतम्॥२०४॥ अतः जिस जीवत्वकी बुद्धिरूप उपाधिके सम्बन्धसे ही आत्मामें कल्पना हुई है, वह स्वरूपसे उस (आत्मा)-से पृथक् नहीं हो सकता। बुद्धिके साथ यह आत्माका सम्बन्ध मिथ्या ज्ञानके ही कारण है। इसकी निवृत्ति ठीक-ठीक ज्ञान हो जानेसे ही हो सकती है और किसी प्रकार नहीं; तथा ब्रह्म और आत्माकी एकताका ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है— ऐसा श्रुतिका सिद्धान्त है [ अतः ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञान हो जानेसे जीवभावकी निवृत्ति हो जाती है ]। तदात्मानात्मनोः सम्यग्विवेकेनैव सिध्यति। ततो विवेकः कर्तव्यः प्रत्यगात्मासदात्मनोः ॥२०५॥ उस ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानकी सिद्धि आत्मा और अनात्माका भली प्रकार विवेक (पार्थक्य-ज्ञान) हो जानेसे ही होती है। इसलिये प्रत्यगात्मा और मिथ्यात्माका भली प्रकार विवेचन करना चाहिये। जलं पङ्कवदत्यन्तं पङ्कापाये जलं स्फुटम्। यथा भाति तथात्मापि दोषाभावे स्फुटप्रभः॥२०६॥ अत्यन्त गँदला जल भी जिस प्रकार कीचड़के बैठ जानेपर स्वच्छ जलमात्र रह जाता है उसी प्रकार दोषसे रहित हो जानेपर आत्मा भी स्पष्टतया प्रकाशित होने लगता है।

५८ विवेक-चूडामणि असन्निवृत्तौ तु सदात्मना स्फुटं प्रतीतिरेतस्य भवेत्प्रतीचः । ततो निरासः करणीय एवा- सदात्मनः साध्वहमादिवस्तुनः ॥ २०७ ॥ सत्य आत्माके विचारसे असत्की निवृत्ति होनेपर इस प्रत्यक् (आन्तरिक) आत्माकी स्पष्ट प्रतीति होने लगती है। अतः अहंकार आदि असदात्माओंका भली प्रकार बाध करना ही चाहिये। अतो नायं परात्मा स्याद्विज्ञानमयशब्दभाक् । विकारित्वाज्जडत्वाच्च परिच्छिन्नत्वहेतुतः । दृश्यत्वाद्व्यभिचारित्वान्नानित्यो नित्य इष्यते ॥ २०८ ॥ अतएव विज्ञानमय शब्दसे कहा जानेवाला यह विज्ञानमय कोश भी विकारी, जड, परिच्छिन्न तथा दृश्य और व्यभिचारी होनेके कारण परात्मा नहीं हो सकता; [ क्योंकि यह अनित्य है ] और अनित्य वस्तु कभी नित्य नहीं हो सकती। आनन्दमय कोश आनन्दप्रतिविम्बचुम्बिततनुर्वृत्तिस्तमोजृम्भिता स्यादानन्दमयः प्रियादिगुणकः स्वेष्टार्थलाभोदयः । पुण्यस्यानुभवे विभाति कृतिनामानन्दरूपः स्वयं भूत्वा नन्दति यत्र साधु तनुभृन्मात्रः प्रयत्नं विना ॥ २०९ ॥ आनन्दस्वरूप आत्माके प्रतिबिम्बसे चुम्बित तथा तमोगुणसे प्रकट हुई वृत्ति आनन्दमय कोश है। वह प्रिय आदि (प्रिय, मोद और प्रमोद—इन तीन) गुणोंसे युक्त है और अपने अभीष्ट पदार्थके प्राप्त होनेपर प्रकट होती है। पुण्य-कर्मके परिपाक होनेपर उसके फलरूप सुखका अनुभव करते समय भाग्यवान् पुरुषोंको उस आनन्दमय कोशका स्वयं ही भान होता है, जिससे सम्पूर्ण देहधारी जीव बिना प्रयत्नके ही अति आनन्दित होते हैं।

आनन्दमय कोश ५९ आनन्दमयकोशस्य सुषुप्तौ स्फूर्तिरुत्कटा। स्वप्नजागरयोरीषदिष्टसंदर्शनादिना ॥ २१० ॥ आनन्दमय कोशकी उत्कट (तीव्र) प्रतीति तो सुषुप्तिमें ही होती है, तथापि जागर्त्ति और स्वप्नमें भी इष्टवस्तुके दर्शन आदिसे उसका यत्किंचित् भान होता है। नैवायमानन्दमयः परात्मा सोपाधिकत्वात्प्रकृतेर्विकारात् । कार्यत्वहेतोः सुकृतक्रियाया विकारसङ्घातसमाहितत्वात् ॥ २११॥ यह परात्मा आनन्दमय नहीं है, क्योंकि आनन्द उपाधियुक्त एवं प्रकृतिका विकार है, शुभ कर्मोंका कार्य है और प्रकृतिके विकारोंके समूह (स्थूल-शरीर)-के आश्रित है। पंचानामपि कोशानां निषेधे युक्तितः श्रुतेः। तन्निषेधावधिः साक्षी बोधरूपोऽवशिष्यते ॥ २१२॥ श्रुतिके अनुकूल युक्तियोंसे पाँचों कोशोंका निषेध कर देनेपर उनके निषेधकी अवधिरूप (शुद्ध) बोधस्वरूप साक्षी आत्मा बच रहता है। योऽयमात्मा स्वयंज्योतिः पञ्चकोशविलक्षणः । अवस्थात्रयसाक्षी सन्निविकारो निरंजनः । सत्स्वरूपः स विज्ञेयः स्वात्मत्वेन विपश्चिता ॥ २१३ ॥ इस प्रकार जो आत्मा स्वयंप्रकाश, अन्नमयादि पाँचों कोशोंसे पृथक् तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंका साक्षी होकर सत्- रूप निर्विकार, निर्मल और शुद्धसत्स्वरूप है, उसे ही विद्वान् पुरुषको अपना वास्तविक आत्मा समझना चाहिये।

आत्मस्वरूपविषयक प्रश्न शिष्य उवाच मिथ्यात्वेन निषिद्धेषु कोशेष्वेतेषु पञ्चसु । सर्वाभावं विना किञ्चिन्न पश्याम्यत्र हे गुरो। विज्ञेयं किमु वस्त्वस्ति स्वात्मनात्र विपश्चिता ॥ २१४॥ शिष्य—हे गुरो ! इन पाँचों कोशोंको मिथ्यारूपसे निषिद्ध हो जानेपर तो मुझे सर्वाभाव (शून्य)-के अतिरिक्त और कुछ भी प्रतीत नहीं होता, फिर [आपके कथनानुसार] बुद्धिमान् पुरुष किस वस्तुको अपना आत्मा माने ? आत्मस्वरूप-निरूपण श्रीगुरुरुवाच सत्यमुक्तं त्वया विद्वन्निपुणोऽसि विचारणे । अहमादिविकारास्ते तदभावोऽयमप्यनु ॥ २१५ ॥ गुरु—हे विद्वन् ! तू बहुत ठीक कहता है, विचार करनेमें तू बहुत कुशल है। अरे, जैसे अहंकार आदि तेरे विकार हैं वैसे ही उनका अभाव भी है। सर्वे येनानुभूयन्ते यः स्वयं नानुभूयते। तमात्मानं वेदितारं विद्धि बुद्ध्या सुसूक्ष्मया ॥ २१६ ॥ ये सब जिसके द्वारा अनुभव किये जाते हैं और जो स्वयं अनुभव नहीं किया जा सकता, अपनी सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा उस सबके साक्षीको ही तू अपना आत्मा जान। तत्साक्षिकं भवेत्तद्यद्यद्येनानुभूयते । कस्याप्यननुभूतार्थे साक्षित्वं नोपयुज्यते ॥ २१७ ॥ जिस-जिसके द्वारा जो-जो अनुभव किया जाता है वह सब उसीके साक्षित्वमें कहा जाता है; बिना अनुभव किये पदार्थमें किसीका भी साक्षी होना नहीं माना जाता।

आत्मस्वरूप-निरूपण ६१ असौ स्वसाक्षिको भावो यतः स्वेनानुभूयते। अतः परं स्वयं साक्षात्प्रत्यगात्मा न चेतरः ॥ २१८ ॥ अपना तो यह आत्मा स्वयं ही साक्षी है, क्योंकि यह स्वयं अपने- आपसे ही अनुभव किया जाता है। इसलिये इससे परे कोई और अपना साक्षात् अन्तरात्मा नहीं है। जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरं योऽसौ समुज्जृम्भते प्रत्यग्रूपतया सदाहमहमित्यन्तःस्फुरन्नैकधा। नाना कारविकारभागिन इमान्पश्यन्नहंधीमुखान् नित्यानन्दचिदात्मना स्फुरति तं विद्धि स्वमेतं हृदि ॥ २१९ ॥ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंमें जो अन्तःकरणके भीतर सदा अहम्-अहम् (मैं-मैं) रूपसे अनेक प्रकार स्फुरित होता हुआ प्रत्यग्रूपसे स्पष्टतया प्रकाशित होता है और अहंकारसे लेकर प्रकृतिके इन नाना विकारोंको साक्षीरूपसे देखता हुआ नित्य चिदानन्दरूपसे स्फुरित होता है, उसीको तू अपने अन्तःकरणमें विराजमान अपना-आप समझ। घटोदके विम्बितमर्कविम्ब- मालोक्य मूढो रविमेव मन्यते। तथा चिदाभासमुपाधिसंस्थं भ्रान्त्याहमित्येव जडोऽभिमन्यते ॥ २२० ॥ जिस प्रकार मूढ़ पुरुष घड़ेके जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यबिम्बको देखकर उसे सूर्य ही समझता है, उसी प्रकार उपाधिमें स्थित चिदाभासको अज्ञानी पुरुष भ्रमसे अपना-आप ही मान बैठता है। घटं जलं तद्गतमर्कविम्बं विहाय सर्वं विनिरीक्ष्यतेऽर्कः। तटस्थ एतत्त्रितयावभासकः स्वयंप्रकाशो विदुषा यथा तथा ॥ २२१ ॥

६२ विवेक-चूडामणि देहं धियं चित्प्रतिबिम्बमेतं विसृज्य बुद्धौ निहितं गुहायाम्। द्रष्टारमात्मानमखण्डबोधं सर्वप्रकाशं सदसद्विलक्षणम्॥ २२२॥ नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्म- मन्तर्बहिःशून्यमनन्यमात्मनः । विज्ञाय सम्यङ्निजरूपमेतत् पुमान्विपाप्मा विरजो विमृत्युः॥ २२३॥ विद्वान् पुरुष घड़ा, जल और उसमें स्थित सूर्यका प्रतिबिम्ब—इन सबको छोड़कर जैसे इन तीनोंके प्रकाशक इनसे पृथक् और स्वयंप्रकाशरूप सूर्यको देखता है, उसी प्रकार देह, बुद्धि और चिदाभास—इन तीनोंको छोड़कर बुद्धिगुहामें स्थित साक्षीरूप इस आत्माको अखण्डबोधस्वरूप, सबके प्रकाशक और सत्-असत् दोनोंसे भिन्न, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्म, भीतर-बाहरके भेदसे रहित और अपने-आपसे सर्वथा अभिन्न इस-(आत्मा) को भलीभाँति अपना निजरूप जानकर पुरुष पापरहित, निर्मल और अमर हो जाता है। विशोक आनन्दघनो विपश्चित् स्वयं कुतश्चिन्न बिभेति कश्चित्। नान्योऽस्ति पन्था भवबन्धमुक्ते- र्विना स्वतत्त्वावगमं मुमुक्षोः॥ २२४॥ वह अति बुद्धिमान् पुरुष शोकरहित और आनन्दघनरूप हो जानेसे कभी किसीसे भयभीत नहीं होता। मुमुक्षु पुरुषके लिये आत्मतत्त्वके ज्ञानको छोड़कर संसारबन्धनसे छूटनेका और कोई मार्ग नहीं है। ब्रह्माभिन्नत्वविज्ञानं भवमोक्षस्य कारणम्। येनाद्वितीयमानन्दं ब्रह्म सम्पद्यते बुधैः॥ २२५॥ ब्रह्म और आत्माके अभेदका ज्ञान ही भवबन्धनसे मुक्त होनेका कारण

ब्रह्म और जगत्की एकता ६३ है, जिसके द्वारा बुद्धिमान् पुरुष अद्वितीय आनन्दस्वरूप ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मभूतस्तु संसृत्यै विद्वानावर्तते पुनः। विज्ञातव्यमतः सम्यग्ब्रह्माभिन्नत्वमात्मनः ॥ २२६ ॥ ब्रह्मभूत हो जानेपर विद्वान् फिर जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें नहीं पड़ता; इसलिये आत्माका ब्रह्मसे अभिन्नत्व भली प्रकार जान लेना चाहिये। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म विशुद्धं परं स्वतःसिद्धम्। नित्यानन्दैकरसं प्रत्यगभिन्नं निरन्तरं जयति ॥ २२७ ॥ ब्रह्म सत्य ज्ञानस्वरूप और अनन्त है; वह शुद्ध, पर, स्वतःसिद्ध, नित्य, एकमात्र आनन्दरसस्वरूप, प्रत्यक् (अन्तरतम) और अभिन्न है, तथा निरन्तर उन्नतिशाली है। ब्रह्म और जगत्की एकता सदिदं परमाद्वैतं स्वस्मादन्यस्य वस्तुनोऽभावात्। न ह्यन्यदस्ति किञ्चित्सम्यक्परमार्थतत्त्वबोधे हि ॥ २२८ ॥ यह परमाद्वैत ही एक सत्य पदार्थ है, क्योंकि इस स्वात्मासे अतिरिक्त और कोई वस्तु है ही नहीं। इस परमार्थ-तत्त्वका पूर्ण बोध हो जानेपर और कुछ भी नहीं रहता। यदिदं सकलं विश्वं नानारूपं प्रतीतमज्ञानात्। तत्सर्वं ब्रह्मैव प्रत्यस्ताशेषभावनादोषम् ॥ २२९ ॥ यह सम्पूर्ण विश्व, जो अज्ञानसे नाना प्रकारका प्रतीत हो रहा है, समस्त भावनाओंके दोषसे रहित [ अर्थात् निर्विकल्प ] ब्रह्म ही है। मृत्कार्यभूतोऽपि मृदो न भिन्नः कुम्भोऽस्ति सर्वत्र तु मृत्स्वरूपात्। न कुम्भरूपं पृथगस्ति कुम्भः कुतो मृषा कल्पितनाममात्रः ॥ २३० ॥

६४ विवेक-चूडामणि मिट्टीका कार्य होनेपर भी घड़ा उससे पृथक् नहीं होता, क्योंकि सब ओरसे मृत्तिकारूप होनेके कारण घड़ेका रूप मृत्तिकासे पृथक् नहीं है, अतः मिट्टीमें मिथ्या ही कल्पित नाममात्र घड़ेकी सत्ता ही कहाँ है? केनापि मृद्भिन्नतया स्वरूपं घटस्य संदर्शयितुं न शक्यते। अतो घटः कल्पित एव मोहान् मृदेव सत्यं परमार्थभूतम् ॥ २३१ ॥ मिट्टीसे अलग घड़ेका रूप कोई भी नहीं दिखा सकता। इसलिये घड़ा तो मोहसे ही कल्पित है; वास्तवमें सत्य तो तत्त्वस्वरूपा मृत्तिका ही है। सद्ब्रह्मकार्यं सकलं सदैव तन्मात्रमेतन्न ततोऽन्यदस्ति। अस्तीति यो वक्ति न तस्य मोहो विनिर्गतो निद्रितवत्प्रजल्पः ॥ २३२ ॥ सत् ब्रह्मका कार्य यह सकल प्रपंच सत्स्वरूप ही है, क्योंकि यह सम्पूर्ण वही तो है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। जो कहता है कि [ उससे पृथक् भी कुछ ] है, उसका मोह दूर नहीं हुआ; उसका यह कथन सोये हुए पुरुषके प्रलापके समान है। ब्रह्मैवेदं विश्वमित्येव वाणी श्रौती ब्रूतेऽथर्वनिष्ठा वरिष्ठा। तस्मादेतद् ब्रह्ममात्रं हि विश्वं नाधिष्ठानाद्भिन्नतारोपितस्य ॥ २३३ ॥ 'यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म ही है'—ऐसा अति श्रेष्ठ अथर्व-श्रुति कहती है। इसलिये यह विश्व ब्रह्ममात्र ही है, क्योंकि अधिष्ठानसे आरोपित वस्तुकी पृथक् सत्ता हुआ ही नहीं करती।

ब्रह्म और जगत्की एकता ६५ सत्यं यदि स्याज्जगदेतदात्मनो- ऽनन्तत्वहानिर्निगमाप्रमाणता । असत्यवादित्वमपीशितुः स्या- न्नैतत्त्रयं साधु हितं महात्मनाम् ॥ २३४॥ यदि यह जगत् सत्य हो तो आत्माकी अनन्ततामें दोष आता है और श्रुति अप्रामाणिक हो जाती है तथा ईश्वर (भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र) भी मिथ्यावादी ठहरते हैं। ये तीनों ही बातें सत्पुरुषोंके लिये शुभ और हितकर नहीं हैं। ईश्वरो वस्तुतत्त्वज्ञो न चाहं तेष्ववस्थितः। न च मत्स्थानि भूतानीत्येवमेव व्यचीक्लृपत् ॥ २३५॥ परमार्थ-तत्त्वके जाननेवाले भगवान् कृष्णचन्द्रने यह निश्चित किया है कि 'न तो मैं ही भूतोंमें स्थित हूँ और न वे ही मुझमें स्थित हैं।' यदि सत्यं भवेद्विश्वं सुषुप्तावुपलभ्यताम्। यन्नोपलभ्यते किञ्चिदतोऽसत्स्वप्नवन्मृषा ॥ २३६॥ यदि विश्व सत्य होता तो सुषुप्तिमें भी उसकी प्रतीति होनी चाहिये थी; किन्तु उस समय इसकी कुछ भी प्रतीति नहीं होती; इसलिये यह स्वप्नके समान असत् और मिथ्या है। अतः पृथङ्नास्ति जगत्परात्मनः पृथक्प्रतीतिस्तु मृषा गुणादिवत्। आरोपितस्यास्ति किमर्थवत्ता- धिष्ठानमाभाति तथा भ्रमेण ॥ २३७॥ इसलिये परमात्मासे पृथक् जगत् है ही नहीं, उसकी पृथक् प्रतीति तो गुणीसे गुण आदिकी पृथक् प्रतीतिके समान मिथ्या ही है; आरोपित वस्तुकी वास्तविकता ही क्या ? वह तो अधिष्ठान ही भ्रमसे उस प्रकार भास रहा है। 133 विवेक-चूड़ामणि—3 A

६६ विवेक-चूडामणि भ्रान्तस्य यद्यद्‌भ्रमतः प्रतीतं ब्रह्मैव तत्तद्रजतं हि शुक्तिः। इदंतया ब्रह्म सदैव रूप्यते त्वारोपितं ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥ २३८ ॥ अज्ञानीको अज्ञानवश जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह सब ब्रह्म ही है; जिस प्रकार भ्रमसे प्रतीत हुई चाँदी वस्तुतः सीपी ही है। [ इदं जगत् (यह जगत् है)—इसमें ] इदम् (यह) रूपसे सदा ब्रह्म ही कहा जाता है, ब्रह्ममें आरोपित [ जगत् ] तो नाममात्र ही है। ब्रह्म-निरूपण अतः परं ब्रह्म सद्वितीयं विशुद्धविज्ञानघनं निरञ्जनम्। प्रशान्तमाद्यन्तविहीनमक्रियं निरन्तरानन्दरसस्वरूपम् ॥ २३९ ॥ इसलिये परब्रह्म सत्, अद्वितीय, शुद्ध विज्ञानघन, निर्मल, शान्त, आदि-अन्तरहित, अक्रिय और सदैव आनन्दरसस्वरूप है। निरस्तमायाकृतसर्वभेदं नित्यं सुखं निष्कलमप्रमेयम्। अरूपमव्यक्तमनाख्यमव्ययं ज्योतिःस्वयं किञ्चिदिदं चकास्ति ॥ २४० ॥ वह समस्त मायिक भेदोंसे रहित है; नित्य, सुख-स्वरूप, कलारहित और प्रमाणादिका अविषय है तथा वह कोई अरूप, अव्यक्त, अनाम और अक्षय तेज है जो स्वयं ही प्रकाशित हो रहा है। ज्ञातृज्ञेयज्ञानशून्यमनन्तं निर्विकल्पकम्। केवलाखण्डचिन्मात्रं परं तत्त्वं विदुर्बुधाः ॥ २४१ ॥ बुधजन उस परम तत्त्वको ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इस त्रिपुटीसे रहित, अनन्त, निर्विकल्प, केवल और अखण्ड-चैतन्यमात्र जानते हैं। 133 विवेक-चूडामणि—3 B

महावाक्य-विचार ६७ अहेयमनुपादेयं मनोवाचामगोचरम्। अप्रमेयमनाद्यन्तं ब्रह्म पूर्णं महन्महः॥ २४२॥ वह ब्रह्म त्याग अथवा ग्रहणके अयोग्य, मन-वाणीका अविषय, अप्रमेय, आदि-अन्तरहित, परिपूर्ण तथा महान् तेजोमय है। महावाक्य-विचार तत्त्वं पदाभ्यामभिधीयमानयो- र्ब्रह्मात्मनोः शोधितयोर्यदीत्थम्। श्रुत्या तयोस्तत्त्वमसीति सम्य- गकत्वमेव प्रतिपाद्यते मुहुः॥ २४३॥ 'तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८) आदि वाक्योंके तत् और त्वम् पदोंसे शोधन करके कहे हुए ब्रह्म और आत्माका श्रुतिके द्वारा बारम्बार पूर्ण एकत्व प्रतिपादन किया गया है। ऐक्यं तयोर्लक्षितयोर्न वाच्ययो- र्निगद्यतेऽन्योन्यविरुद्धधर्मिणोः । खद्योतभान्वोरिव राजभृत्ययोः कूपाम्बुराश्योः परमाणुमेर्वोः॥ २४४॥ उन सूर्य और खद्योत (जुगनू), राजा और सेवक, समुद्र और कूप तथा सुमेरु और परमाणुके समान परस्पर विरुद्ध धर्मवालोंका एकत्व लक्ष्यार्थमें ही कहा गया है, वाच्यार्थमें नहीं। तयोर्विरोधोऽयमुपाधिकल्पितो न वास्तवः कश्चिदुपाधिरेषः। ईशस्य माया महदादिकारणं जीवस्य कार्यं शृणु पंचकोशम्॥ २४५॥ उन दोनोंका यह विरोध उपाधिके कारण है और यह उपाधि कुछ वास्तविक नहीं है। ईश्वरकी उपाधि महत्तत्वादिकी कारणरूपा माया है तथा जीवकी उपाधि कार्यरूप पंचकोश हैं। 133 विवेक-चूडामणि-3 C

६८ विवेक-चूड़ामणि एतावुपाधी परजीवयोस्तयोः सम्यङ्निरासे न परो न जीवः। राज्यं नरेन्द्रस्य भटस्य खेटक- स्तयोरपोहे न भटो न राजा॥ २४६॥ ये परमात्मा और जीवकी उपाधियाँ हैं; इनका भली प्रकार बाध हो जानेपर न परमात्मा ही रहता है और न जीवात्मा ही। जिस प्रकार राज्य राजाकी उपाधि है तथा ढाल सैनिककी; इन दोनों उपाधियोंके न रहनेपर न कोई राजा है और न योद्धा। अथात आदेश इति श्रुतिः स्वयं निषेधति ब्रह्मणि कल्पितं द्वयम्। श्रुतिप्रमाणानुगृहीतयुक्त्या तयोर्निरासःकरणीय एव॥ २४७॥ ब्रह्ममें कल्पित द्वैतको 'अथात आदेशो नेति नेति' (बृह० २।३।६) इत्यादि श्रुति स्वयं निषेध करती है; इसलिये श्रुति-प्रमाणानुकूल युक्तिसे उपर्युक्त उपाधियोंका बाध करना ही चाहिये। नेदं नेदं कल्पितत्वान्न सत्यं रज्जौ दृष्टव्यालवत्स्वप्नवच्च। इत्थं दृश्यं साधुयुक्त्या व्यपोह्य ज्ञेयः पश्चादेकभावस्तयोर्यः ॥ २४८ ॥ यह दृश्य कल्पित होनेके कारण रज्जुमें प्रतीत होनेवाले सर्प और स्वप्नमें भासनेवाले विविध पदार्थोंकी भाँति सत्य नहीं है; ऐसी ही प्रबल युक्तियोंसे दृश्यका निषेध करनेपर पीछे उन (जीव और ईश्वर)-का जो एक-भाव बच रहता है वही जाननेयोग्य है। ततस्तु तौ लक्षणया सुलक्ष्यौ तयोरखण्डैकरसत्वसिद्धये । नालं जहत्या न तथाजहत्या किन्तूभयार्थात्मिकयैव भाव्यम्॥ २४९॥ 133 विवेक-चूड़ामणि—3 D

महावाक्य-विचार ६९ जीवात्मा और परमात्माकी अखण्डैकरसताकी सिद्धिके लिये महावाक्यमें लक्षणा करनेसे ही उनका ज्ञान होता है। उनका ठीक-ठीक ज्ञान न तो जहती-लक्षणासे होता है और न अजहतीसे ही; इसलिये इस जगह जहत्यजहती लक्षणाका प्रयोग करना चाहिये। स देवदत्तोऽयमितीह चैकता विरुद्धधर्मांशमपास्य कथ्यते। यथा तथा तत्त्वमसीति वाक्ये विरुद्धधर्मानुभयत्र हित्वा ॥ २५०॥ 'वह देवदत्त यह है' इस वाक्यमें [ 'वह' शब्दका परोक्षत्व और 'यह' शब्दका अपरोक्षत्व इन दोनों ] विरुद्ध धर्मोंका बाध करके जिस प्रकार देवदत्तकी एकता ही बतलायी जाती है, उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इस वाक्यमें [ 'तत्' पदके वाच्य ईश्वरकी उपाधि 'माया' और 'त्वम्' पदके वाच्य जीवकी उपाधि 'अन्तःकरण'-इन ] दोनोंके विरुद्ध धर्मोंका बाध करके [ शुद्ध चैतन्यांशकी ] एकता कही जाती है। संलक्ष्य चिन्मात्रतया सदात्मनो- रखण्डभावः परिचीयते बुधैः। एवं महावाक्यशतेन कथ्यते ब्रह्मात्मनोरैक्यमखण्डभावः ॥ २५१ ॥ इस प्रकार लक्षणाद्वारा जीवात्मा और परमात्माके चेतनांशकी एकताका निश्चय कर बुद्धिमान् जन उनके अखण्डभावका परिचय (ज्ञान) प्राप्त करते हैं। ऐसे ही सैकड़ों महावाक्योंसे ब्रह्म और आत्माकी अखण्ड एकताका स्पष्ट वर्णन किया गया है।

ब्रह्म-भावना अस्थूलमित्येतदसन्निरस्य सिद्धं स्वतो व्योमवदप्रतर्क्यम्। अतो मृषामात्रमिदं प्रतीतं जहीहि यत्स्वात्मतया गृहीतम्। ब्रह्माहमित्येव विशुद्धबुद्ध्या विद्धि स्वमात्मानमखण्डबोधम् ॥ २५२॥ 'अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्' (बृह० ३।८।७) इत्यादि श्रुतिसे असत् स्थूलता आदिका निरास करनेसे आकाशके समान व्यापक अतर्क्य वस्तु स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। इसलिये आत्मरूपसे गृहीत ये देह आदि मिथ्या ही प्रतीत होते हैं, इनमें आत्मबुद्धिको छोड़; और 'मैं ब्रह्म हूँ' इस शुद्ध बुद्धिसे अखण्ड बोधस्वरूप अपने आत्माको जान। मृत्कार्यं सकलं घटादि सततं मृन्मात्रमेवाभित- स्तद्वत्सज्जनितं सदात्मकमिदं सन्मात्रमेवाखिलम्। यस्मान्नास्ति सतः परं किमपि तत्सत्यं स आत्मा स्वयं तस्मात्तत्त्वमसि प्रशान्तममलं ब्रह्माद्वयं यत्परम् ॥ २५३ ॥ जिस प्रकार मृत्तिकाके कार्य घट आदि हर तरहसे मृत्तिका ही हैं, उसी प्रकार सत्से उत्पन्न हुआ यह सत्स्वरूप सम्पूर्ण जगत् सन्मात्र ही है। क्योंकि सत्से परे और कुछ भी नहीं है तथा वही सत्य और स्वयं आत्मा भी है, इसलिये जो शान्त, निर्मल और अद्वितीय परब्रह्म है वह तुम्हीं हो। निद्राकल्पितदेशकालविषयज्ञात्रादि सर्वं यथा मिथ्या तद्वदिहापि जाग्रति जगत्स्वाज्ञानकार्यत्वतः। यस्मादेवमिदं शरीरकरणप्राणाहमाद्यप्यसत् तस्मात्तत्त्वमसि प्रशान्तममलं ब्रह्माद्वयं यत्परम् *॥ २५४॥

  • लक्ष्मीनारायणप्रेस मुरादाबादकी प्रतिमें इसके पश्चात् यह श्लोक और है—