भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

मुमुक्षु प्रकरण । ११७

वहाँ इच्छा नहीं रहती और सन्तोषवान् भोगों से दीन नहीं होता । वह उदारात्मा सर्वदा आनन्द से तृप्त रहता है । जैसे मेघ पवन के आने से नष्ट हो जाता है वैसे ही सन्तोष के आने से इच्छा नष्ट हो जाती है । जो सन्तोषवान् पुरुष है उसको देवता और ऋषीश्वर सब नमस्कार करते और धन्य धन्य कहते हैं । हे रामजी ! जब सन्तोष करोगे तब परम शोभा पावोगे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षु प्रकरणे सन्तोषनिरूपणन्नाम पञ्चदशस्सर्गः ॥ १५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जितने दान और तीर्थादिक साधन हैं उनसे आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती. आत्मपद की प्राप्ति साधुसङ्ग से ही होती है । साधुसङ्गरूपी एक वृक्ष है और उसका फल आत्मज्ञान है । जिस पुरुष ने फल की इच्छा की है सो अनुभवरूपी फल को पाता है । जो पुरुष आत्मानन्द से रहित है सो सत्सङ्ग करके आत्मानन्द से पूर्ण होता है जो अज्ञान से मृत्यु पाता है सो सन्त के सङ्ग से ज्ञान पाकर अमर होता है और जो आपदा से दुःखी है सो सन्त के सङ्ग सम्पदा पाता है । आपदारूपी कमल का नाश करनेवाली सत्सङ्गरूपी वरफ की वर्षा है । सत्सङ्ग से ही आत्मबुद्धि प्राप्त होती है जिससे मृत्यु नहीं होती और सब दुःखों से छूटकर परमानन्द को प्राप्त होता है । हे रामजी ! सन्त की संगति से हृदय में ज्ञानरूपी दीपक जलता है जिससे अज्ञान-रूपी तम नष्ट हो जाता है और बड़े बड़े ऐश्वर्य की प्राप्त होता है । फिर उसे किसी भोग्य पदार्थ की इच्छा नहीं रहती और बोधवान् होके सबसे उत्तम पद में विराजता है जैसे कल्पवृक्ष के निकट जाने से वाञ्छित फल की प्राप्ति होती है वैसे ही संसारसमुद्र के पार उतारनेवाले सन्तजन हैं । जैसे धीवर नौका से पार लगाता है वैसे ही सन्तजन युक्ति से संसारसमुद्र से पार करते हैं । हे रामजी ! मोहरूपी मेघ का नाश करनेवाला सन्त का सङ्ग पवन है । जिसको अनात्म देहादिक में स्नेह नष्ट हुआ है और शुद्ध आत्मा में जिसकी स्थिति है वह उसमें तृप्त हुआ है । फिर संसार के इष्ट अनिष्ट में उसकी बुद्धि चलायमान नहीं होती, वह सदा समताभाव में स्थित रहता है । सन्तजन संसारसमुद्र के पार उतारने में पुल के समान

११८ | योगवाशिष्ठ ।

है और आपदारूपी बेलि को जड़ समेत नष्ट करनेवाले हैं। हे रामजी ! सन्तजन प्रकाशरूप हैं, उनके सङ्ग से पदार्थों की प्राप्ति होती है। जो अपने पुरुषार्थरूपी नेत्र से हीन है उनको पदार्थ की प्राप्ति नहीं होती। जिस पुरुष ने सत्सङ्ग का त्याग किया है वह नरकरूपी अग्नि में लकड़ी की नाईं जरेगा और जिस पुरुष ने सत्सङ्ग किया है उसको नरक की अग्नि का नाश करनेवाला सत्सङ्गरूपी मेघ है। हे रामजी ! जिसने सत्सङ्गरूपी गङ्गा का स्नान किया है उसको फिर तप दान आदिक साधनों से प्रयोजन नहीं रहता। वह सत्सङ्ग से ही परम गति को प्राप्त होगा इससे और सब उपायों को त्यागकर सत्सङ्ग को ही खोजना चाहिये। जैसे निर्धन मनुष्य चिन्तामणि आदिक धन को खोजता है वैसे ही मुमुक्षु सत्सङ्ग को खोजता है। जो आध्यात्मिकादि तीनों तापों से जलता है उसको शीतल करनेवाला सत्सङ्ग ही है जैसे तपी हुई पृथ्वी मेघ से शीतल होती है वैसे ही हृदय सत्सङ्ग से शीतल होता है। हे रामजी ! मोहरूपी वृक्ष का नाश करनेवाला सत्सङ्गरूपी कुल्हाड़ा है। सत्सङ्ग से ही मनुष्य अविनाशी पद को प्राप्त होता है। जिस पद के पाने से और कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती। इसमें सबसे उत्तम सत्सङ्ग ही है। जैसे सब अप्सराओं में लक्ष्मी उत्तम हैं, वैसे ही सत्सङ्गकर्ता सबसे उत्तम है। इससे अपने कल्याण के निमित्त सत्सङ्ग करना ही तुमको योग्य है। हे रामजी ! ये जो चारों मोक्ष के द्वारपाल हैं उनका वृत्तान्त तुमसे कहा। जिस पुरुष ने इनके साथ प्रीति की है, वह शीघ्र आत्मपद को प्राप्त होगा और जो इनकी सेवा नहीं करते सो मोक्ष को न प्राप्त होंगे। हे रामजी ! इन चारों में से एक भी जहाँ आता है, वहाँ तीनों और भी आ जाते हैं। जैसे जहाँ समुद्र रहता है वहाँ सब नदी आ जाती हैं वैसे ही जहाँ शम आता है वहाँ सन्तोष, विचार और सत्सङ्ग ये तीनों भी आ जाते हैं और जहाँ साधुसङ्गम होता है वहाँ सन्तोष, विचार और शम ये तीनों आ जाते हैं। जहाँ कल्पवृक्ष रहता है वहाँ सब पदार्थ स्थित होते हैं। जैसे पूर्णमासी के चन्द्रमा में गुण कला सब इकट्ठी हो जाती हैं वैसे ही जहाँ सन्तोष आता है वहाँ और तीनों भी आते हैं और जहाँ तक विचार

मुमुक्षु प्रकरण । १२६

आता है वहाँ सन्तोष, उपशम और सत्संग भी आ रहते हैं। जैसे श्रेष्ठ मन्त्री से राज्य लक्ष्मी आ स्थित होती है वैसे ही जहाँ विचार होता है वहाँ और भी तीनों आते हैं। इससे हे रामजी! जहाँ ये चारों इकट्ठे होते हैं उसे परम श्रेष्ठ जानना। हे रामजी! यदि ये चारों न हों तो एक का तो अवश्य आश्रय करना। जब एक आवेगा तब चारों आ स्थित होंगे। मोक्ष की प्राप्ति के ये चार परम साधन हैं और किसी उपाय से मुक्ति न होगी। श्लोक—"सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परम धनम् । विचारः परमं ज्ञानं शमं च परमं सुखम् ॥" हे रामजी! ये परम कल्याणकर्ता हैं। जो इन चारों से सम्पन्न है उसकी ब्रह्मादिक स्तुति करते हैं। इससे दन्त को दन्त लगा इनका आश्रय करके मन को वश करे। हे रामजी! मनरूपी हस्ती विचाररूपी अंकुश से वश होता है। मनरूपी बन में वासनारूपी नदी चलती है उसके शुभ अशुभ दो किनारे हैं। पुरुषार्थ करना यह है कि अशुभ की ओर से मन को रोक के शुभ की ओर चलाना। जब अन्तर्मुख आत्मा के सम्मुख वृत्ति का प्रवाह होगा तब तुम परमपद को प्राप्त होगे। हे रामजी! प्रथम तो पुरुषार्थ करना यही है कि अविचाररूपी ऊँचाई को दूर करे। जब अविचाररूपी बेंट दूर होगा तब आप ही प्रवाह चलेगा। हे रामजी! दृश्य की ओर जो प्रवाह चलता है सो बन्धन का कारण है। जब आत्मा की ओर अन्तर्मुख प्रवाह हो तब मोक्ष का कारण हो जाय। आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो।

इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे साधुसङ्गनिरूपणन्नाम षोडशस्सर्गः ॥ १६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! ये मेरे वचन परम पावन हैं। विचारवान् शुद्ध अधिकारी को ये परम बोध के कारण हैं। शुद्ध पात्र पुरुष इन वचनों को पाके सोहते हैं और वचन भी उनको पाके शोभा पाते हैं। जैसे शरद काल में मेघ के अभाव में चन्द्रमा और आकाश शोभा देते हैं वैसे ही शुद्धपात्र में ये वचन शोभते हैं और जिज्ञासु निर्मल वचनों की महिमा सुनके प्रसन्न होता है। हे रामजी! तुम परम पात्र हो और मेरे वचन अति उत्तम हैं। यह महारामायण मोक्षोपायक शास्त्र आत्म-

१२०योगवाशिष्ठ ।

बोध का परम कारण है। इसमें परम पावन वाक्य की सिद्धता और युक्तार्थवाक्य है और नाना प्रकार के दृष्टान्त कहे है। जिसके बहुत जन्म के पुण्य इकट्ठे होते है उसको कल्पवृक्ष मिलता है और फल से झुक पड़ता है तब उसको यह शास्त्र श्रवण होता है। नीच को इसका श्रवण प्राप्त नहीं होता और न उसकी वृत्ति इसके श्रवण में आती है। जैसे धर्मात्मा राजा की इच्छा न्यायशास्त्र के सुनने में होती है और पापात्मा की नहीं होती वैसे ही पुण्यवान की इच्छा इसके सुनने में होती है और अधर्मी को इच्छा नहीं होती। जो कोई इस मोक्षोपायक रामायण का आदि से अन्त पर्यन्त अध्ययन करेगा अथवा निष्काम सन्त के मुख से श्रद्धायुक्त सुनकर एकाग्र भाव होकर विचारेगा उसका संसारभ्रम निवृत्त हो जावेगा। जैसे रस्सी के जानने से सर्प का भ्रम दूर हो जाता है वैसे ही अद्वैतात्मा तत्त्व के जानने से उसका संसारभ्रम नष्ट हो जावेगा। इस मोक्षोपायक शास्त्र के बत्तीस सहस्र श्लोक और षट्प्रकरण हैं। पहिला वैराग्य प्रकरण वैराग्य का परम कारण है। हे रामजी ! जैसे मरुस्थल में वृक्ष नहीं होता और कदाचित् बड़ी वर्षा हो तो वहाँ भी वृक्ष होता है वैसे ही अज्ञानी का हृदय मरुस्थल की नाईं है उसमें वैराग्य वृक्ष नहीं होता, पर जो इस शास्त्र की बड़ी वर्षा हो तो वैराग्य वृक्ष उसमें उत्पन्न होता है। इस वैराग्य प्रकरण के एक सहस्र पाँच सौ श्लोक हैं। इसके अनन्तर मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण है, उसके परम निर्मल वचन हैं। जैसे मलीन मणि मार्जन करने से उज्ज्वल हो जाती है वैसे ही इन वचनों से मुमुक्षु का हृदय निर्मल होता है और विचार के बल से आत्मपद पाने को समर्थ होता है। इसके एक सहस्र श्लोक हैं। इसके अनन्तर उत्पत्ति प्रकरण के पाँच सहस्र श्लोक हैं। उसमें बड़ी सुन्दर कथा दृष्टान्तों सहित कही हैं जिनके विचार से जगत् की उत्पत्ति का भाव मन से चला जाता है—अर्थात् इस जगत् का अत्यन्त अभाव जान पड़ता है। हे रामजी ! इस जगत् में जो मनुष्य, देवता, दैत्य, पर्वत, नदी आदि और स्वर्गलोक, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश आदि स्थावर जंगम अज्ञान से भासते हैं इनकी उत्पत्ति

मुमुक्षु प्रकरण । १२१

कैसे हुई। जैसे रस्सी में सर्प, सीप में रूपा, सूर्य की किरणों में जल, आकाश में तरुवर और दूसरा चन्द्रमा; गन्धर्वनगर और मनोराज की सृष्टि भासती है और जैसे समुद्र में तरङ्ग, आकाश में नीलता और नौका में बैठने से किनारे के वृक्ष और पर्वत चलते दृष्टि आते हैं एवम् जैसे बादल के चलने से चन्द्रमा धावता दीखता है, स्तम्भ में पुतली भासती है और भविष्यत् नगर से आदि ले असत्य पदार्थ सत्य भासते हैं वैसे ही सब जगत् है। अज्ञान से अर्थाकार भासता है और अज्ञान से ही इसकी उत्पत्ति दीखती है और ज्ञान में लीन हो जाता है जैसे निद्रा में स्वप्नसृष्टि की उत्पत्ति होती है और जागने से निवृत्त हो जाती है वैसे ही अविद्या में जगत् की उत्पत्ति होती है और सम्यक्ज्ञान में निवृत्त हो जाती है वह अविद्या कुछ वस्तु ही नहीं है। सर्व ब्रह्म, जो चिदाकाश-रूप शुद्ध, अनन्त और परमानन्दस्वरूप है उससे न जगत् उपजता है और न लीन होता है—ज्यों का त्यों आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। उसमें जगत् ऐसा है जैसे भीत में चित्र होता है जैसे स्तम्भ में पुतलियाँ होती हैं जो हुए बिना भासती हैं वैसे ही यह सृष्टि मन में है वास्तव में कुछ बनी नहीं—सब आकाशरूप है। जब चित्तसंवेदन स्पन्द-रूप होता है तब नाना प्रकार का जगत् होके भासता है और जब निस्पन्द होता है तब मिट जाता है। इस प्रकार से जगत् की उत्पत्ति कही है। उसके अनन्तर स्थिति प्रकरण है, उसमें जगत् की स्थिति कही है। जैसे इन्द्र के धनुष में अविचार से रङ्ग है और जैसे सूर्य की किरणों में जल और रस्सी में सर्प भासता है और वह सब सम्यक् दृष्टि से निवृत्त होता है वैसे ही अज्ञान में जगत् की प्रतीति होती है केवल मनोराज से ही जगत् रच लेता है—कुछ उत्पन्न नहीं हुआ है। यह जगत् संकल्पमात्र है। जैसे जब तक मनोराज तब तक वह नगर होता है जब मनोराज का अभाव हुआ तब नगर का भी अभाव हो जाता है वैसे ही जब तक अज्ञान है तब तक जगत् की उत्पत्ति होती है जब संकल्प का लय होता है तब जगत् का भी अभाव हो जाता है। जैसे ब्रह्माजी के दश पुत्रों की सृष्टि संकल्प से हुई थी वैसे ही यह

१२२योगवाशिष्ठ ।

जगत् भी है । कोई पदार्थ अर्थरूप नहीं । हे रामजी ! इस प्रकार स्थिति प्रकरण कहा है । उसके तीन सहस्र श्लोक हैं; उनके विचारने से जगत् की सत्यता जाती रहती है । उसके अनन्तर उपशम प्रकरण है उसके पाँच सहस्र श्लोक हैं । जैसे स्वप्न से जागने पर वासना जाती रहती है वैसे ही इसके विचार से अहंतवादिक वासना लीन हो जाती है, क्योंकि उसके निश्चय में जगत् नहीं रहता । जैसे एक पुरुष सोया है उसको स्वप्न में जगत् भासता है और उसके निकट जो जाग्रत् पुरुष है उसको स्वप्न का जगत् आकाशरूप है तो जब आकाशरूप हुआ तब वासना कैसे रहे और जब वासना नष्ट हुई तब मन का उपशम हो जाता है । तब देखनेमात्र उसकी सब चेष्टा होती है और मन में पदार्थों की इच्छा नहीं होती । जैसे अग्नि की मूर्ति देखनेमात्र होती है, अर्थाकार नहीं होती, वैसे ही उसकी चेष्टा होती है । हे रामजी ! जैसे तेल से रहित दीपक निर्वाण हो जाता है वैसे ही इच्छा से रहित मन निर्वाण होता है । उसके अनन्तर निर्वाण प्रकरण है उसमें परम निर्वाण वचन कहे हैं । अज्ञान से चित्त और चित्त का सम्बन्ध है, विचार करने से निर्वाण हो जाता है । जैसे शरदकाल में मेघके अभाव में शुद्ध आकाश होता है वैसे ही विचार में जीव निर्मल होता है । हे रामजी ! अहंकार पिशाच विचार से नष्ट होता है और जितनी कुछ इच्छा फुरती है सो निर्वाण हो जाती है । जैसे पत्थर की शिला फुरने से रहित होती है वैसे ही ज्ञानवान् इच्छा से रहित होता है तब जितनी कुछ उसकी जगत् की यात्रा है सो हो चुकती है और जो कुछ करना है सो कर चुकता है । हे रामजी ! शरीर होते भी वह पुरुष अशरीर हो जाता है । नाना प्रकार का जगत् उसको नहीं भासता; जगत् की नेति से वह रहित होता है और अहं त्वमादिक तमरूप जगत् उसको नहीं भासता । जैसे सूर्य को अन्धकार दृष्टि नहीं आता वैसे ही उसको जगत् दृष्टि में नहीं आता और बड़े पद को प्राप्त होता है जैसे सुमेरु पर्वत के किसी कोने में कमल होता है और उस पर भँवर स्थित रहते हैं वैसे ही ब्रह्म के किसी कोने में जगत् तुषाररूप है और जीवरूपी भँवरे उस पर स्थित हैं । वह पुरुष अचिन्त्य चिन्मात्र

मुमुक्षु प्रकरण । १२३

है; रूप अवलोकन और मनस्कार उसका आकाशरूप हो जाता है । वह उस पद को प्राप्त होता है जिस पद की उपमा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी नहीं कह सकते ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे षट्प्रकरणविवरणन्नाम सप्तदशसर्गः॥१७॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ये परम उत्तम वाक्य हैं । इनको विचारनेवाला उत्तम पद को प्राप्त होता है । जैसे उत्तम खेत में उत्तम बीज बोने से उत्तम फल की उत्पत्ति होती है वैसे ही इनका विचारने-वाला उत्तम पद को प्राप्त होता है । ये वाक्य युक्तिपूर्वक हैं; कदाचित् युक्ति से रहित वाक्यार्थ भी हों तो उनका त्याग करना चाहिये और युक्ति-पूर्वक वाक्य अङ्गीकार करना चाहिये । हे रामजी ! ब्रह्मा के भी वचन युक्ति से रहित हों तो उनको भी सूखे तृण के समान त्याग देना चाहिये और यदि बालक के वचन युक्तिपूर्वक हों तो उनको अङ्गीकार करना चाहिए । जैसे पिता के कूप का स्वादु जल हो तो उसे त्यागकर निकट के मिष्टकूप के जल को पान करते हैं वैसे ही बड़े और छोटे का विचार न करके युक्तिपूर्वक वचन अङ्गीकार करना चाहिये । हे रामजी ! मेरे वचन सब युक्तिपूर्वक और बोध के परम कारण हैं । जो पुरुष एकाग्र होके इस शास्त्र को आदि से अन्त पर्यन्त पढ़ेगा अथवा पण्डित से श्रवण करके विचारेगा तब उसकी बुद्धि संस्कारित होगी । जब पहिले वैराग्य प्रकरण को विचारोगे तब वैराग्य उपजेगा जितने जगत् के रमणीय भोग पदार्थ हैं उनको विरस जानकर किसी पदार्थ की वाञ्छा न करोगे । जब भोग में वैराग्य होता है तब शान्तिरूप आत्मतत्त्व में प्रतीति होती है और जब विचार से बुद्धि संस्कारित होगी तब शास्त्र का सिद्धान्त बुद्धि में स्थित होगा । जैसे शरदकाल में बादल के अभाव से आकाश सब ओर से स्वच्छ हो जाता है वैसे ही संसार के विकार छूटकर बुद्धि निर्मल होगी और फिर आधिव्याधि की पीड़ा न होगी । हे रामजी ! ज्यों २ विचार दृढ़ होगा त्यों-त्यों शान्तात्मा होगे । इससे जितने संसार के यत्न हैं उनको त्याग इस शास्त्र के वारंवार विचार से चैतन्य सत्ता उदय होगी और मोहादिक विकार की सत्ता नष्ट होगी ।

१२४ योगवाशिष्ठ ।

जैसे ज्यों २ सूर्य उदय होता है त्यों २ अन्धकार नष्ट होता है वैसे ही विकार नष्ट होंगे । तब उस पद की प्राप्ति होगी जिसके पाने से संसार के क्षोभ मिट जायँगे । जैसे शरदकाल में मेघ नष्ट हो जाता है वैसे ही संसार के क्षोभ मिट जाते हैं । हे रामजी ! जिस पुरुष ने कवच पहना हो उसको बाण नहीं बेध सकते वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष को संसार के राग द्वेष नहीं बेध सकते । उसको भोग की भी इच्छा नहीं रहती और जब विषय भोग आते हैं तब उनको विषय जानके बुद्धि ग्रहण नहीं करती जैसे पतिव्रता स्त्री अपने अन्तःपुर से बाहर नहीं निकलती वैसे ही उसकी बुद्धि भीतर से बाहर नहीं निकलती । हे रामजी ! बाहर से तो वह भी प्राकृतिक मनुष्यों के समान दृष्टि आते हैं और जो कुछ अनिश्चित प्राप्त होते हैं उनको भुगतता हुआ दृष्टि में आता है पर अन्तर में उसको राग द्वेष नहीं फुरता । हे रामजी ! जो कुछ जगत् की उत्पत्ति और प्रलय का क्षोभ है वह ज्ञानवान् को नष्ट नहीं कर सकता । जैसे चित्र की बेलि को आंधी नहीं चला सकती वैसे ही उसको जगत् का दुःख नहीं चला सकता । वह संसार की ओर से जड़ हो जाता है और वृद्ध के समान गम्भीर, पर्वत की नाईं स्थिर और चन्द्रमा के सदृश शीतल हो जाता है । हे रामजी ! वह आत्मज्ञान से ऐसे पद को प्राप्त होता है जिसके पाने से और कुछ पाने योग्य नहीं रहता । आत्मज्ञान का कारण यह मोक्षोपाय शास्त्र है इसमें नाना प्रकार के दृष्टान्त कहे हैं । जो वस्तु अपरिच्छिन्न हो और देखने में न आवे और उसका न्याय देखने में हो तो उसको उपमा से विधिपूर्वक समझाने का नाम दृष्टान्त है । हे रामजी ! जगत् कार्य और कारण से रहित है तो आत्मा और जगत् की एकता कैसे हो इससे मैं जो दृष्टान्त कहूँगा उसका एक अंश अंगीकार करना, सब देश अङ्गीकार न करना । हे रामजी ! कार्य कारण की कल्पना मूर्खों ने की है । उसके मिटाने के लिये मैं स्वप्न दृष्टान्त कहता हूँ, उसके समझने से तेरे मन का संशय नष्ट हो जावेगा । दृग और दृश्य का भेद मूर्ख को भासता है । उसके दूर करने के अर्थ में स्वप्न दृष्टान्त कहूँगा जिसके विचारने से मिथ्याविभाग कल्पना का अभाव होता है । हे रामजी ! ऐसी कल्पना का

मुमुक्षु प्रकरण । १२५

नाशकर्त्ता यह मेरा मोक्षउपाय शास्त्र है। जो पुरुष आदि मे अंत-पर्यन्त इसे विचारेगा सो पूर्ण संस्कारी होगा। जो पद पदार्थ को जाननेवाला हो और दृश्य को बारंबार विचारे तो उसका दृश्य भ्रम नष्ट होगा। इस शास्त्र के विचार में किसी तीर्थ, तप, दान आदिक की अपेक्षा नहीं है। जहाँ स्थान हो वहाँ बैठे और जैसा भोजन गृह में हो वैसा करे और बारंबार इसका विचार करे तो अज्ञान नष्ट होकर आत्मपद की प्राप्ति होवेगी। हे रामजी! यह शास्त्र प्रकाशरूप है। जैसे अन्धकार में पदार्थ नहीं दीखता और दीपक के प्रकाश से चक्षुसहित दीखता है वैसे शास्त्र रूपी दीपक विचाररूपी नेत्रसहित हो तो आत्मपद की प्राप्ति हो। हे रामजी! आत्मज्ञान विचार बिना वर और शाप से प्राप्त नहीं होता। जब विचार करके दृढ़ अभ्यास कीजिये तब प्राप्त होता है इससे इस मोक्ष-पावन शास्त्र के विचार से जगद्भ्रम नष्ट हो जावेगा और जगत् को देखते २ जगत् भाव मिट जावेगा। जैसे लिखी हुई सर्प की मूर्ति से बिना विचार भ्रम होता है और जब विचारकर देखिये तब सर्पभ्रम मिट जाता है वैसे ही जगद्भ्रम विचार करने से नष्ट हो जाता है और जन्म-मरण का भय भी नहीं रहता। हे रामजी! जन्म-मरण का भय भी बड़ा दुःख है, परन्तु इस शास्त्र के विचार से वह भी नष्ट हो जाता है। जिन्होंने इसका विचार त्यागा है वह माता के गर्भ में कीट होकर भी कष्ट से न छूटेंगे और विचारवान पुरुष आत्मपद को प्राप्त होंगे। जो श्रेष्ठ ज्ञानी है उसको अनन्त सृष्टि अपना ही रूप भासती है कोई पदार्थ आत्मा से भिन्न नहीं भासता। जैसे जिसको जल का ज्ञान है उसको लहर और आवर्त्त सब जलरूप ही भासती है वैसे ही ज्ञानवान् को सब आत्मारूप ही भासता है और वह इन्द्रियों के इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में इच्छा द्वेष नहीं करता, सदा एकरस मन के संकल्प से रहित शान्तरूप होता है जैसे मंदराचल पर्वत के निकलने से क्षीर समुद्र शान्त हुआ है वैसे ही संकल्प विकल्प रहित मनुष्य शान्तिरूप होता है। हे रामजी! और तेज दाहक होता है परन्तु ज्ञान का तेज जिस घट में उदय होता है सो शीतल और शांतिरूप हो जाता है और फिर उसमें संसार का

१२६योगवाशिष्ठ ।

विकार कोई नहीं रहता। जैसे कलियुग में शिखावाला तारा उदय होता है और कलियुग के अभाव में नहीं उदय होता वैसे ही ज्ञानवान् के चित्त में विकार उत्पन्न नहीं होता। हे रामजी! संसार भ्रम आत्मा के प्रमाद में उत्पन्न होता है; पर आत्मज्ञान होने से वह यत्न के बिना ही शान्त हो जाता है। फूल और पत्र के काटने में भी कुछ यत्न होता है परन्तु आत्मा के पाने में कुछ यत्न नहीं होता क्योंकि बोधरूप को बोध ही से जानता है। हे रामजी! जो जाननेमात्र ज्ञानस्वरूप है उसमें स्थिति होने का क्या यत्न है। आत्मा शुद्ध और अद्वैतरूप है और जगद्भ्रममात्र है। जिसकी सत्यता पूर्वापर विचार से न पाइये उसको भ्रममात्र जानिये और पूर्वापर विचार से जो स्थिर रहे उसको सत्यरूप जानिये। इस जगत् की सत्यता आदि अन्त में नहीं है। इससे स्वप्नवत् है। जैसे स्वप्न आदि अन्त में कुछ नहीं होता वैसे ही जाग्रत भी आदि अन्त में नहीं है इससे जाग्रत और स्वप्न दोनों तुल्य हैं। हे रामजी! यह वार्ता बालक भी जानता है कि जिसकी आदि अन्त में सत्यता न पाइये सो स्वप्नवत् है। जिसका आदि भी न हो और अन्त भी न रहे उसका मध्य भी असत्य जानिये। उसका दृष्टान्त यह है कि संकल्प पुरीवत्, ध्यान नगर की नाईं, स्वप्नपुरी की नाईं; वर और शाप से जो उपजता है उसकी नाईं और औषधि से उपज की नाईं, इन पदार्थों की सत्यता न आदि में होती है और न अन्त में होती है और मध्य में जो भासता है सो भी भ्रममात्र है वैसे ही यह जगत् अकारण है और कार्यकारणभाव सम्बन्ध से भासता है तो कार्य-कारण से कार्यरूप जगत् हुआ, पर आत्मसत्ता अकारण है। जगत् साकार और आत्मा निराकार है। इस जगत् का दृष्टान्त जो आत्मा में देंगे उसका तुमको एक अंश ग्रहण करना चाहिये। जैसे स्वप्न की सृष्टि का पूर्व अपर भाव आत्मा है, क्योंकि अकारण है और मध्यभाव का दृष्टान्त नहीं मिलता क्योंकि उपमेय अकारण है तो उसका इसके समान दृष्टान्त क्योंकर हो। इससे अपने बोध के अर्थ दृष्टान्त का एक अंश ग्रहण करना। हे रामजी! जो विचारवान् पुरुष है सो गुरु और शास्त्र के वचन सुनके सुखबोध के अर्थ दृष्टान्त का एक अंश ग्रहण

मुमुक्षु प्रकरण । १२७

करते हैं तो उनको आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है, क्योंकि वे सारग्राहक होते हैं और जो अपने बोध के अर्थ दृष्टान्त का एक अंश ग्रहण नहीं करते और वाद करते हैं उनको आत्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं होती । इस से दृष्टान्त का एक अंश सारभूत ग्रहण करके दृष्टान्त के सर्वभाव से न मिलना चाहिये और पृथक् को देखकर तर्क न करना चाहिए । जैसे अन्धकार में पदार्थ पड़ा हो तो दीपक के प्रकाश से देख लेते हैं क्योंकि दीपक के साथ प्रयोजन है, ऐसा नहीं कहते कि दीपक किसका है और तेलबत्ती कैसी है और किस स्थान की है वैसे ही दृष्टान्त का एक अंश आत्मबोध के निमित्त अङ्गीकार करना । हे रामजी ! जिसके वाक्य में अर्थ सिद्ध हो और जो अनुभव को प्रकट करे वह वचन अङ्गीकार करना और जिससे वाक्यार्थ सिद्ध न हो उसका त्याग करना । जो पुरुष अपने बोध के निमित्त वचन को ग्रहण करता है वही श्रेष्ठ है और जो वाद के निमित्त ग्रहण करता है वह मूर्ख है । जो कोई अभिमान को लेकर ग्रहण करता है वह हस्ती के समान अपने शिर पर मिट्टी डालता है—उसका अर्थ सिद्ध नहीं होता और जो अपने बोध के निमित्त वचन को ग्रहण करके विचारपूर्वक उसका अभ्यास करता है उसका आत्मा शान्त होता है । हे रामजी ! आत्मपद पाने के निमित्त अवश्यमेव अभ्यास चाहिये । जब शम, विचार, सन्तोष और सन्त समागम से बोध को प्राप्त हो तब परम पद को पाता है । हे रामजी ! जो कोई दृष्टान्त देता है वह एक देश लेकर कहता है, सर्वमुख कहने से असङ्गतता का अभाव हो जाता है सर्वमुख दृष्टान्त मुख्य को जानिये वह सत्य-रूप होता है । ऐसे तो नहीं होता कि आत्मा तो सत्यरूप, कार्य कारण से रहित, शुद्ध और चैतन्य है उसके बताने के लिये कार्य कारण जगत् का दृष्टान्त कैसे दीजिये जो कोई जगत् का दृष्टान्त देता है वह केवल एक अंश लेके कहता है और बुद्धिमान् भी दृष्टान्त के एक अंश को ग्रहण करते हैं । श्रेष्ठ पुरुष अपने बोध के निमित्त सार को ही ग्रहण करते हैं । जैसे क्षुधार्थी को चावलपाक प्राप्त हो तो भोजन करने का प्रयोजन है वैसे ही जिज्ञासु को भी यही चाहिये कि अपने बोध के

१२८ योगवाशिष्ठ ।

निमित्त सार को ग्रहण करके वाद न करे, क्योंकि उसकी उत्पत्ति और स्थिति का वाद करना व्यर्थ है । हे रामजी ! वाक्य वही है जो अनुभव को प्रकट करे और जो अनुभव को न प्रकट करे उसका त्याग करना चाहिये । कदाचित् स्त्री का वाक्य आत्मअनुभव को प्रत्यक्ष करनेवाला हो तो उसको भी ग्रहण करना चाहिये और जो परमगुरु के तथा वेद-वाक्य भी हों और अनुभव को प्रकट न करें तो उनका त्याग करना चाहिये । जब तक विश्राम न पावै तब तक विचार करना चाहिये । विश्राम का नाम तुरीयपद है । जैसे मन्दराचल पर्वत के क्षोभ से क्षीरसमुद्र शान्त हुआ था वैसे ही विश्राम की प्राप्ति होने में अक्षय शान्ति होती है । हे रामजी ! तुरीयपद संयुक्त पुरुष को श्रुति-स्मृति उक्त कर्मों के करने से कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता और न करने से कुछ प्रत्यवाय नहीं होता । वह सदेह हो चाहे विदेह हो गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो उसको कुछ नहीं करना है । वह पुरुष संसारसमुद्र से पार ही है । हे रामजी ! उपमेय की उपमा एक अंश मे ग्रहण कर जानता है तब बोध की प्राप्ति होती है और बोध के बिना मुक्ति को प्राप्त नहीं होता, वह केवल व्यर्थ वाद करता है । हे रामजी ! जिसके घट में शुद्ध स्वरूप आत्मसत्ता विराजमान है वह जो उसकी त्यागकर और विकल्प उठाता है तो वह चोग चञ्चु और मूर्ख है । हे रामजी ! प्रत्यक्ष प्रमाण मानने योग्य है, क्योंकि अनुमान और अर्थापत्ति आदि प्रमाणों से उसकी सत्ता ही प्रकट होती है । जैसे सब नदियों का अधिष्ठान समुद्र है वैसे ही सब प्रमाणों का अधिष्ठान प्रत्यक्ष प्रमाण है । वह प्रत्यक्ष क्या है सो सुनिये । हे रामजी ! चक्षुजन्य ज्ञान संवित संवेदन है, जो उस चक्षु से विद्यमान होता है उसका नाम प्रत्यक्ष प्रमाण है । उन प्रमाणों को विषय करनेवाला जीव है । अपने वास्तव स्वरूप के अज्ञान से अनात्मारूपी दृश्य बना है उसमें अहंकृति से अभिमान हुआ है और अभिमान ही से सब दृश्य होता है उसमें हेयोपादेय बुद्धि होती है जिससे राग द्वेष करके जलता है और आपको कर्त्ता मानकर बहिर्मुख हुआ भटकता है । हे रामजी ! जब विचार करके संवेदन अन्तर्मुखी हो तब आत्मपद प्रत्यक्ष होकर निज भाव को प्राप्त होता है और फिर प्रच्छन्न

मुमुक्षु प्रकरण । <span style="float:right;">१२६</span>

भाव नहीं रहता, शुद्ध शान्ति को प्राप्त होता है। जैसे स्वप्न से जगकर स्वप्न का शरीर और दृश्यभ्रम नष्ट हो जाता है वैसे ही आत्मा के प्रत्यक्ष होने से सब भ्रम मिट जाता है और शुद्ध आत्मसत्ता भासती है। हे रामजी ! यह दृश्य और द्रष्टा मिथ्या है। जो द्रष्टा है सो दृश्य होता है और जो दृश्य है सो द्रष्टा होता है—यह भ्रम मिथ्या आकाशरूप है। जैसे पवन में स्पन्दशक्ति रहती है वैसे ही आत्मा में संवेदन रहती है। जब संवेदन स्पन्दरूप होती है तब दृश्यरूप होकर स्थित होती है। जैसे स्वप्न में अनुभवसत्ता दृश्य रूप होकर स्थित होती है वैसे ही यह दृश्य है। सब आत्मसत्ता ही है, ऐसा विचार करके आत्मपद को प्राप्त हो जावो और जो ऐसा विचार करके आत्मपद को प्राप्त न हो सको तो अहङ्कार का जो उल्लेख फुरता है उसका अभाव करो। पीछे जो शेष रहेगा सो शुद्धबोध आत्मसत्ता है। जब तुम शुद्धबोध को प्राप्त होगे तब ऐसी चेष्टा गहो जैसे यंत्र की पुतली संवेदन बिना चेष्टा करती है वैसे ही देहरूपी पुतली का चलानेवाला मनरूपी संवेदन है, उसके बिना पड़ी रहेगी और अहङ्कार का अभाव होगा। इससे यत्न करके उस पद के पाने का अभ्यास करो जो नित्य, शुद्ध और शान्तरूप है। हे रामजी ! "दैव" शब्द को त्यागकर अपना पुरुषार्थ करो और आत्मपद को प्राप्त हो। जो कोई पुरुषार्थ में शूरमा है सो आत्मपद को प्राप्त होता है और जो नीच पुरुषार्थ का आश्रय करता है सो संसारसमुद्र में डूबता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे दृष्टान्त प्रमाणनामाष्टादशस्सर्गः ॥ १८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब सत्सङ्ग करके मनुष्य शुद्धबुद्धि करे तब आत्मपद पाने को समर्थ होता है। प्रथम सत्सङ्ग यह है कि जिसकी चेष्टा शास्त्र के अनुसार हो उसका संग करे और उसके गुणों को हृदय में धरे। फिर महापुरुषों के शम और संतोषादि गुणों का आश्रय करे। शम संतोषादिक से ज्ञान उपजता है। जैसे मेघ से अन्न उपजता है। अन्न से जगत् होता है और जगत् से मेघ होता है वैसे ही शम, सन्तोष और शमादिक गुण और आत्मज्ञान परस्पर सहकारी होते हैं। शमादिक गुणों से ज्ञान उपजता है आत्मज्ञान करने से शमा-

१३०योगवाशिष्ठ ।

दिक गुण स्थित होते हैं। जैसे बड़े ताल से मेघ और मेघ से ताल पुष्ट होता है वैसे ही शमादिक गुणों से आत्मज्ञान होता है और आत्मज्ञान से शमादि गुण पुष्ट होते हैं। ऐसा विचार करके शम सन्तोषादिक गुणों का अभ्यास करो तब शीघ्र ही आत्मतत्त्व को प्राप्त होगे। हे रामजी! ज्ञानवान पुरुष को शमादिक गुण स्वाभाविक प्राप्त होते हैं और जिज्ञासुको अभ्यास करने से प्राप्त होते हैं। जैसे धान्य की रक्षा जब स्त्री करती है और ऊँचे शब्द से पक्षियों को उड़ाती है तब फल को पाती है और उससे पुष्ट होती है वैसे ही शम सन्तोषादिक के पालने से आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है। हे रामजी! इस मोक्ष उपाय शास्त्र को आदि से लेकर अन्त पर्यन्त विचारे तो भ्रान्ति निवृत्ति होके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सर्व पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। यह शास्त्र मोक्ष उपाय का परम कारण है। जो शुद्ध बुद्धिमान् पुरुष इसको विचारेगा उसको शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी। इससे इस मोक्ष उपाय शास्त्र का भले प्रकार अभ्यास करो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे आत्माप्तिवर्णनन्नामैकोन-विंशतितमस्सर्गः ॥ १९ ॥

समाप्तमिदं मुमुक्षुप्रकरणं द्वितीयम् ॥


श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीयोगवाशिष्ठ

तृतीय उत्पत्ति प्रकरण प्रारम्भ ।


वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ब्रह्म और ब्रह्मवेत्ता में "त्व" "इदं" "सः" इत्यादिक सर्व शब्द आत्मसत्ता के आश्रय स्फुरते हैं । जैसे स्वप्न में सब अनुभव सत्ता में शब्द होते हैं वैसे ही यह भी जानो और जो उसमें यह विकल्प होते हैं कि "जगत् क्या है" "कैसे उत्पन्न हुआ है" "और किसका है" इत्यादिक योगचक्षु हैं । हे रामजी ! यह सब जगत् ब्रह्मरूप है यहाँ स्वप्न का दृष्टान्त विचार लेना चाहिए । इसके पहिले मुमुक्षुप्रकरण मैंने तुमसे कहा है अब क्रम से उत्पत्तिप्रकरण कहता हूँ सो सुनिये—जो ज्ञान वस्तुस्वभाव है । हे रामजी ! जो पदार्थ उपजता है वही बढ़ता, घटता, मोक्ष और नीच, ऊँच होता है और जो उपजता न हो, उसका बढ़ना, घटना, बन्ध, मोक्ष और नीच, ऊँच होना भी नहीं होता । हे रामजी ! स्थावर-जंगम जो कुछ जगत् दीखता है सो सब आकाशरूप है । द्रष्टा का जो दृश्य के साथ संयोग है इसी का नाम बन्धन है और उसी संयोग के निवृत्त होने का नाम मोक्ष है । उसकी निवृत्ति का उपाय मैं कहता हूँ । देहरूपी जगत्चिन्मात्ररूप है और कुछ उपजा नहीं, जो उपजा भासता है सो ऐसा है जैसे सुषुप्ति में स्वप्न । जैसे स्वप्न में सुषुप्ति होती है वैसे ही जगत् का प्रलय होता है और जो प्रलय में शेष रहता है उसकी संज्ञा व्यवहार के निमित्त कहते हैं । नित्य सत्य, ब्रह्म, आत्मा, सच्चिदानन्द इत्यादिक जिसके नाम रखे हैं वह सबका अपना आप है । चेतनता से उसका नाम जीव हुआ है और शब्द अर्थों को ग्रहण करने लगा है । हे रामजी ! चैतन्य में जो स्पन्दता हुई है सो संकल्प विकल्परूपी मन होकर स्थित हुआ है । उसके संसरने से देश, काल, नदियाँ, पर्वत, स्थावर और जंगमरूप जगत् हुआ

१३२ | योगवाशिष्ठ ।

है। जैसे सुषुप्ति जैसे स्वप्न हो वैसे जगत् हुआ है। उसको कोई अविद्या, कोई जगत् कोई माया कोई संकल्प और कोई दृश्य कहते हैं; वास्तव में सब ब्रह्मस्वरूप है—इतर कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण से भूषण बनता है तो भूषण सुवर्णरूप है; सुवर्ण से इतर भूषण कुछ वस्तु नहीं है वैसे ही जगत् और ब्रह्म में कुछ भेद नहीं है। भेद तो तब हो जब जगत् उपजा हो; जो उपजा ही नहीं तो भेद कैसे भासे और जो भेद भासता है सो मृगतृष्णा के जलवत् है—अर्थात् जैसे मृगतृष्णा की नदी के तरङ्ग भासते हैं पर वहाँ सूर्य की किरणें ही जल के समान भासती हैं, जल का नाम भी नहीं, वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। चैतन्य के अणु अणु प्रति सृष्टि आभासरूप है कुछ उपजी नहीं। अद्वैतसत्ता सर्वदा अपने आप में स्थित है, फिर उसमें जन्म, मरण और बन्ध, मोक्ष कैसे हो जितनी कल्पना बन्ध-मोक्ष आदि भासती है सो वास्तविक कुछ नहीं है आत्मा के अज्ञान से भासती है। हे रामजी ! जगत् उपजा नहीं, अपनी कल्पना ही जगतरूप होकर भासती है और प्रमाद से सत् हो रही है निवृत्त होना कठिन है। अनियत और नियत शब्द जो कहे हैं सो भावनामात्र हैं, ऐसे वचनों से तो जगत् दूर नहीं होता। हे रामजी ! अर्थयुक्त वचनों के बिना दृश्यभ्रम नहीं निवृत्त होता। जो तर्क करके और तप, तीर्थ, दान, स्नान, ध्यानादिक करके जगत् के भ्रम को निवृत्त करना चाहे वह मूर्ख है, इस प्रकार से तो और भी दृढ़ होता है। क्योंकि जहाँ जावेगा वहाँ देश, काल और क्रिया सहित नित्य पाञ्चभौतिक सृष्टि ही दृष्टि आवेगी और कुछ दृष्टि न आवेगी, इससे इसका नाश न होगा और जो जगत् से उपराम होकर समाधि लगाके बैठेगा तब भी चिरकाल में उतरेगा और फिर भी जगत् का शब्द और अर्थ भास आवेगा। जो फिर भी अनर्थरूप संसार भासा तो समाधि का क्या सुख हुआ ? क्योंकि जब तक समाधि में रहेगा तभी तक वह सुख रहेगा। निदान इन उपायों से जगत् निवृत्त नहीं होता। जैसे कमल के डोड़े में बीज होता है और जब तक उस बीज का नाश नहीं होता तब तक फिर उत्पन्न होता रहता है और जैसे वृक्ष के पात तोड़िये तो भी बीज

उत्पत्ति प्रकरण । १३३

का नाश नहीं होता वैसेही तप, दानादिकों से जगत् निवृत्त नहीं होता और तभी तक अज्ञानरूपी बीज भी नष्ट नहीं होता। जब अज्ञानरूपी बीज नष्ट होगा तब जगतरूपी वृक्ष का अभाव हो जावेगा और उपाय करना मानो पत्तों को तोड़ना है। इन उपायों से अक्षय पद और अक्षय समाधि नहीं प्राप्त होती। हे रामजी! ऐसी समाधि तो किसी को नहीं प्राप्त होती कि शिला के समान हो जावै। मैं सब स्थान देख रहा हूँ कदाचित ऐसे भी समाधि हो तो भी संसारसत्ता निवृत्त न होगी, क्योंकि अज्ञानरूपी बीज निवृत्त नहीं हुआ। समाधि ऐसी है जैसे जाग्रत् से सुषुप्ति होती है, क्योंकि अज्ञानरूपी वासना के कारण सुषुप्ति से फिर जाग्रत् आती है वैसे ही अज्ञानरूपी वासना से समाधि से भी जाग जाता है क्योंकि उसको वासना खींच ले आती है। हे रामजी! तप, समाधि आदिकों से संसारभ्रम निवृत्त नहीं होता। जैसे कांजी से क्षुधा किसी की निवृत्त नहीं होती वैसे ही तप और समाधि से चित्त की वृत्ति एकाग्र होती है परन्तु संसार निवृत्त नहीं होता। जब तक चित्त समाधि में लगा रहता है तब तक सुख होता है और जब उत्थान होता है तब फिर नाना प्रकार के शब्दों और अर्थों से युक्त संसार भासता है। हे रामजी! अज्ञान से जगत् भासता है और विचार से निवृत्त होता है। जैसे बालक को अपनी अज्ञानता से परछाईं में वेताल की कल्पना होती है और ज्ञान से निवृत्त होती है वैसे ही यह जगत् अविचार से भासता है और विचार से निवृत्त होता है। हे रामजी! वास्तव में जगत् उपजा नहीं--असतरूप है। जो स्वरूप से उपजा होता तो निवृत्त न होता पर यह तो विचार से निवृत्त होता है इससे जाना जाता है कि कुछ नहीं बना। जो वस्तु सत्य होती है उसकी निवृत्ति नहीं होती और जो असत् है सो स्थिर नहीं रहनी। हे रामजी! सतस्वरूप आत्मा का अभाव कदाचित् नहीं होता और असतरूप जगत् स्थिर नहीं होता। जगत् आत्मा में आभासरूप है आरम्भ और परिणाम से कुछ उपजा नहीं। जहाँ चैतन्य नहीं होता वहाँ सृष्टि भी नहीं होती, क्योंकि सृष्टि आभासरूप है। आत्मा आदर्शरूप है उसमें अनन्त सृष्टियाँ प्रतिबिम्बत होती हैं।

१३४योगवाशिष्ठ ।

आदर्श में प्रतिबिम्ब भी तब होता है जब दूसरा निकट होता है, पर आत्मा के निकट दूसरा और कोई प्रतिबिम्ब नहीं होता, क्योंकि आभास-रूप है । एक ही आत्मसत्ता चैतन्यता से द्वैत की नाई होकर भासती है, पर कुछ बना नहीं । जैसे फूल में सुगन्ध होती है, तिलों में तेल होता है और अग्नि में उष्णता होती है और जैसे मनोराज की सृष्टि होती है वैसे ही आत्मा में जगत् है । जैसे मनोराज से मनोराज की सृष्टि भिन्न नहीं होती वैसे ही यह जगत् आत्मा से भिन्न नहीं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बोधहेतुवर्णनन्नाम प्रथमस्सर्गः ॥ १ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! एक आकाशज आख्यान जो श्रवण का भूषण और बोध का कारण है उसको सुनिये । आकाशज नामक एक ब्राह्मण शुद्धिचिद्देश से उत्पन्न हुए । वह धर्मनिष्ठ सदा आत्मा में स्थिर रहते थे, भले प्रकार प्रजा का पालन करते थे और चिरजीवी थे । तब मृत्यु विचार करने लगी कि मैं अविनाशिनी हूँ और जो जीव उपजते हैं उनको मारती हूँ परन्तु इस ब्राह्मण को में नहीं मार सकती । जैसे खड्ग की धार पत्थर पर चलाने से कुण्ठित हो जाती है वैसे ही मेरी शक्ति इस ब्राह्मण पर कुण्ठित हो गई है । हे रामजी ! ऐसा विचारकर मृत्यु ब्राह्मण को भोजन करने के निमित्त उठी और जैसे श्रेष्ठ पुरुष अपने आचार कर्म को नहीं त्याग करते वैसे ही मृत्यु भी अपने कर्मों को विचार कर चली । जब ब्राह्मण के गृह में मृत्यु ने प्रवेश किया तो जैसे प्रलय-काल में महातेज संयुक्त अग्नि सब पदार्थों को जलाने लगती है वैसे ही अग्नि इसके जलाने को उठी और आगे दौड़ के जहाँ ब्राह्मण बैठा था अन्तःपुर में जाकर पकड़ने लगा । पर जैसे बड़ा बलवान् पुरुष भी और के संकल्परूप पुरुष को नहीं पकड़ सकता वैसे ही मृत्यु ब्राह्मण को न पकड़ सकी । तब उसने धर्मराज के गृह में जाकर कहा, हे भगवन् ! जो कोई उपजा है उसको मैं अवश्य भोजन करती हूँ, परन्तु एक ब्राह्मण जो आकाश से उपजा है उसको मैं वश में नहीं कर सकी । यह क्या कारण है ? यम बोले, हे मृत्यो ! तुम किसी को नहीं मार सकतीं, जो कोई मरता है वह अपने कर्मों से मरता है । जो कोई कर्मों का कर्ता है उसके

उत्पत्ति प्रकरण । १३५

मारने को तुम भी समर्थ हो, पर जिसका कोई कर्म नहीं उसके मारने को तुम समर्थ नहीं हो। इससे तुम जाकर उस ब्राह्मण के कर्म खोजो जब कर्म पावोगी तब उसके मारने को समर्थ होगी—अन्यथा समर्थ न होगी। हे रामजी! जब इस प्रकार यम ने कहा तब कर्म खोजने के निमित्त मृत्यु चली। कर्म वासना का नाम है। वहाँ जाकर ब्राह्मण के कर्मों को ढूँढ़ने लगी और दशों दिशा में ताल, समुद्र बगीचे और द्वीप से द्वीपान्तर इत्यादिक सब स्थान देखती फिरी, परन्तु ब्राह्मण के कर्मों की प्रतिभा कहीं न पाई। हे रामजी! मृत्यु बड़ी बलवन्त है, परन्तु उस ब्राह्मण के कर्मों को उसने न पाया तब फिर धर्मराज के पास गई—जो सम्पूर्ण संशयों को नाश करनेवाले और ज्ञानस्वरूप हैं—और उनसे कहने लगी, हे संशयों के नाशकर्त्ता ! इस ब्राह्मण के कर्म मुझको कहीं नहीं दृष्टि आते, मैंने बहुत प्रकार से ढूँढ़ा। जो शरीरधारी हैं सो सब कर्म-संयुक्त हैं पर इसका तो कर्म कोई भी नहीं है इसका क्या कारण है? यम बोले, हे मृत्यो! इस ब्राह्मण की उत्पत्ति शुद्ध चिदाकाश से हुई है जहाँ कोई कारण न था। जो कारण बिना भासता है सो ईश्वररूप है। हे मृत्यो! शुद्ध आकाश से जो इसकी उत्पत्ति हुई है तो यह भी वही रूप है। यह ब्राह्मण भी शुद्ध चिदाकाशरूप है और इसका चेतन ही वपु है। इसका कर्म कोई नहीं और न कोई किया है। अपने स्वरूप से आप ही इसका होना हुआ है, इस कारण इसका नाम स्वयम्भू है और सदा अपने आपमें स्थित है। इसको जगत् कुछ नहीं भासता—सदा अद्वैत है। मृत्यु बोली, हे भगवन्! जो यह आकाशस्वरूप है तो साकाररूप क्यों दृष्टि आता है? यमजी बोले, हे मृत्यो! यह सदा निराकार चैतन्य वपु है और इसके साथ आकार और अहंभाव भी नहीं है इससे इसका नाश कैसे हो। यह तो अहं त्वं जानता ही नहीं और जगत् का निश्चय भी इसको नहीं है। यह ब्राह्मण अचेत चिन्मात्र है, जिसके मन में पदार्थों का सद्भाव होता है उसका नाश भी होता है और जिसको जगत् भासता ही नहीं उसका नाश कैसे हो? हे मृत्यो! जो कोई बड़ा बलिष्ठ भी हो और सैकड़ों जंजीरें भी हों तो भी आकाश को

१३६ | योगवाशिष्ठ ।

बांध न सकेगा वैसे ही ब्राह्मण आकाशरूप है इसका नाश कैसे हो ? इससे इसके नाश करने का उद्यम त्यागकर देहधारियों को जाकर मारो-यह तुमसे न मरेगा। हे रामजी ! यह सुनकर मृत्यु आश्चर्यवत् हो अपने गृह लौट आई। रामजी बोले, हे भगवन् ! यह तो हमारे बड़े पितामह ब्रह्मा की वार्त्ता तुमने कही है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह वार्त्ता तो मैंने ब्रह्मा की कही है, परन्तु मृत्यु और यम के विवाद निमित्त यह कथा मैंने तुमको सुनाई है। इस प्रकार जब बहुत काल व्यतीत होकर कल्प का अन्त हुआ तब मृत्यु सब भूतों को भोजनकर फिर ब्रह्मा को भोजन करने गई। जैसे किसी का काम हो और यदि एक बार सिद्ध न हुआ तो वह उसे छोड़ नहीं देता फिर उद्यम करता है वैसे ही मृत्यु भी ब्रह्मा के सम्मुख गई। तब धर्मराज ने कहा, हे मृत्यो ! यह ब्रह्मा है। यह आकाशरूप है और आकाश ही इसका शरीर है। आकाश के पकड़ने को तुम कैसे समर्थ होगी ? यह तो पञ्चभूत के शरीर से रहित है। जैसे संकल्प पुरुष होता है तो उसका आकाश ही वपु होता है वैसे ही यह आकाशरूप आदि, अन्त मध्य और अहं त्वं, के उल्लेख से रहित और अचेत चिन्मात्र है इसके मारने को तू कैसे समर्थ होगी ? यह जो इसका वपु भासता है सो ऐसा है जैसे शिल्पी के मन में स्तम्भ की पुतली होती है पर वह कुद्य हुई नहीं वैसे ही स्वरूप से इतर इसका होना नहीं है। यह तो ब्रह्मस्वरूप है, हमारे तुम्हारे मन में इसकी प्रतिभा हुई है, यह तो निर्वपु है। जो पुरुष देहवन्त होता है उसको ग्रहण करना सुगम होता है और वन्ध्या के पुत्र के ग्रहण में श्रम होता है क्योंकि निर्वपु है वैसे यह भी निर्वपु है। इसके मारने की कल्पना को त्याग देहधारियों को जाकर मारो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे प्रथमसृष्टिवर्णनन्नामद्वितीयस्सर्गः ॥ २ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! शुद्ध चिन्मात्र सत्ता ऐसी सूक्ष्म है कि उसमें आकाश भी पर्वत के समान स्थूल है। उस चिन्मात्र में जो अहं अस्मि चैत्योन्मुखत्व हुआ है उसने अपने साथ देह को देखा । पर वह देह भी आकाशरूप है। हे रामजी ! शुद्ध चिन्मात्र में चैत्य का उल्लेख