योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । ३६५
और संसार की ओर से निवृत्त होकर आत्मपद में स्थिर होता है वह श्रेष्ठ महापुरुष कहाता है। जिसका मन संसार की ओर धावता है वह दलदल का कीट है और जिसका मन अचल है और शास्त्र के अर्थरूपी संग और संसार की ओर से निवृत्त होकर एकाग्रभाव में स्थित हुआ है और आत्मपद के ध्यान में लगा हुआ है वह संसार के बन्धन से मुक्त होता है। हे रामजी ! जब मन से मनन दूर होता है तब शान्ति प्राप्त होती है—जैसे क्षीरसमुद्र से मन्दराचल निकला तो शान्त हुआ था। जिस पुरुष का मन भोगों की ओर प्रवृत्त होता है वह पुरुष संसाररूपी विष के वृक्ष का बीज होता है। हे रामजी ! जिसका चित्त स्वरूप से मूढ़ हुआ है और संसार के भोगों में लगा है वह बड़े कष्ट पाता है। जैसे जल के चक्र में आया तृण क्षोभवान् होता है तैसे ही यह जीव मनभाव को प्राप्त हुआ श्रम पाता है। इससे तुम इस मन को स्थित करो कि शान्तात्मा हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तवर्णनन्नाम पञ्चाशीतितमस्सर्गः ॥ ८५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह चित्तरूपी महाव्याधि है, उसकी निवृत्ति के अर्थ में तुमको एक श्रेष्ठ औषध कहता हूँ वह तुम सुनो कि जिसमें यत्न भी अपना हो, साध्य भी आप ही हो और औषध भी आप हो और सब पुरुषार्थ आप ही से सिद्ध होता है। इस यत्न से चित्तरूपी वैताल को नष्ट करो। हे रामजी ! जो कुछ पदार्थ तुमको रस संयुक्त दृष्टि आवें उनको त्याग करो। जब वाञ्छित पदार्थों का त्याग करोगे तब मन को जीत लोगे और अचलपद को प्राप्त होगे। जैसे लोहे से लोहा कटता है तैसे ही मन से मन को काटो और यत्न करके शुभगुणों से चित्तरूपी वैताल को दूर करो। देहादिक अवस्तु में जो वस्तु की भावना है और वस्तु आत्मतत्त्व में जो देहादिक की भावना है उनको त्यागकर आत्म-तत्त्व में भावना लगाओ। हे रामजी ! जैसे चित्त में पदार्थों की चिन्तना होती है तैसे ही आत्मपद पाने की चिन्तना से सत्यकर्म की शुद्धता लेकर चित्त को यत्न करके चैतन्यसंवित् की ओर लगाओ और सब वासना को त्याग के एकाग्रता करो तब परमपद की प्राप्ति होगी। हे
३६६ | योगवाशिष्ठ ।
रामजी ! जिन पुरुषों को अपनी इच्छा त्यागनी कठिन है वे विषयों के कीट हैं, क्योंकि अशुभ पदार्थ मूढ़ता से रमणीय भासते हैं उस अशुभ को अशुभ और शुभ को शुभ जानना यही पुरुषार्थ है। हे रामजी ! शुभ अशुभ दोनों पहलवान हैं, उन दोनों में जो बली होता है उसकी जय होती है। इससे शीघ्र ही पुरुष प्रयत्न करके अपने चित्त को जीतो। जब तुम अचित्त होगे तब यत्न बिना आत्मपद को प्राप्त होगे। जैसे बादलों के अभाव हुए यत्न बिना सूर्य भासता है तैसे ही आत्मपद के आगे चित्त का फुरना जो बादलवत् आवरण है उसका जब अभाव होगा तब अक्षयसिद्ध आत्मपद भासेगा जो चित्त के स्थित करने का मन्त्र भी आप से होता है। जिसको अपने चित्त वश करने की भी शक्ति नहीं उसको धिक्कार है वह मनुष्यों में गर्दभ है। अपने पुरुषार्थ से मन का वश करना अपने साथ परम मित्रता करनी है और अपने मन के वश किये बिना अपना आप ही शत्रु है अर्थात् मन के उपशम किये बिना घटीयन्त्र की नाईं संसारचक्र में भटकता है जिन मनुष्यों ने मन को उपशम किया है उनको परम लाभ हुआ है। हे रामजी ! मन के मारने का मन्त्र यही है कि दृश्य की ओर से चित्त को निवृत्त करे और आत्मचेतन संवित् में लगावे, आत्मचिन्तना करके चित्त को मारना सुखरूप है। हे रामजी ! इच्छा से मन पुष्ट रहता है। जब भीतर से इच्छा निवृत्त होती है तब मन उपशम होता है और जब मन उपशम होता है तब गुरु और शास्त्रों के उपदेश और मन्त्र आदिकों की अपेक्षा नहीं रहती । हे रामजी ! जब पुरुष असंकल्परूपी औषध करके चित्त-रूपी रोग काटे तब उस पद को प्राप्त हो जो सर्व और सर्वगत शान्त-रूप है। इस देह को निश्चय करके मूढ़ मन ने कल्पा है। इससे पुरु-षार्थ करके चित्त को अचित्त करो तब इस बन्धन से छुटोगे। हे रामजी ! शुद्ध चित्त आकाश में यत्न करके चित्त को लगाओ। जब चिरकाल पर्यन्त मन का तीव्र संवेग आत्मा की ओर होगा तब चेतन चित्त का भक्षण कर लेगा और जब चित्त का चिन्तत्व निवृत्त हो जावेगा तब केवल चेतनमात्र ही शेष रहेगा। हे रामजी ! जब जगत् की भावना से
उत्पत्ति प्रकरण । ३६७
तुम मुक्त होगे तब तुम्हारी बुद्धि परमार्थतत्त्व में लगेगी अर्थात् बोधरूप हो जावेगी । इससे इस चित्त को चित्त से ग्रास कर लो, जब तुम परम पुरुषार्थ करके चित्त को अचित्त करोगे तब महा अद्वैतपद को प्राप्त होगे । हे रामजी ! मन के जीतने में तुमको और कुछ यत्न नहीं, केवल एक संवेदन का प्रवाह उलटना है कि दृश्य की ओर से निवृत्त करके आत्मा की ओर लगाओ, इसी से चित्त अचित्त हो जावेगा । चित्त के क्षोभ से रहित होना परम कल्याण है, इससे क्षोभ से रहित हो जाओ । जिसने मन को जीता है उसको त्रिलोकी का जीतना तृण समान है। हे रामजी ! ऐसे शूरमा हैं जो कि शस्त्रों के प्रहार सहते हैं, अग्नि में जलना भी सहते हैं और शत्रु को मारते हैं तब स्वाभाविक फुरने के सहने में क्या कृपणता है ? हे रामजी ! जिनको अपने चित्त के उलटाने की सामर्थ्य नहीं वे नरों में अधम हैं । जिनको यह अनुभव होता है कि मैं जन्मा हूँ, मैं मरूँगा और मैं जीव हूँ, उनको वह असत्यरूप प्रमाद चपलता से भासता है । जैसे कोई किसी स्थान में बैठा हो और मन के फुरने से और देश में कार्य करने लगे तो वह भ्रमरूप है तैसे ही आपको जन्म-मरण भ्रम से मानता है । हे रामजी ! मनुष्य मनरूपी शरीर से इस लोक और परलोक में मोक्ष होने पर्यन्त चित्त में भटकता है । यदि चित्त स्थिर है तो तुमको मृत्यु का भय कैसे होता है । तुम्हारा स्वरूप नित्य शुद्धबुद्ध और सर्वविकार से रहित है । यह लोक आदिक भ्रम मन के फुरने से उपजा है, मन से भिन्न जगत् का कुछ रूप नहीं । पुत्र, भाई, नोकर आदिक जो स्नेह के स्थान हैं और उनके क्लेश से आपको क्लेशित मानते हैं वह भी चित्त से मानते हैं । जब चित्त अचित्त हो जावे तब सर्व बन्धनों से मुक्त हो । हे रामजी ! मैंने अधःऊर्ध्व सर्वस्थान देखे हैं, सब शास्त्र भी देखे हैं और उनको एकान्त में बैठकर बारम्बार विचारा भी है, शान्त होने का और कोई उपाय नहीं, चित्त का उपशम करना ही उपाय है । जब तक चित्त दृश्य को देखता है तब तक शान्ति प्राप्त नहीं होती और जब चित्त उपशम होता है तब उस पद में विश्राम होता है जो नित्य, शुद्ध, सर्वात्मा और सबके हृदय में चेतन आकाश परम
३६८ | योगवाशिष्ठ ।
शान्तरूप है । हे रामजी ! हृदयकाश में जो चेतन चक्र है अर्थात् जो ब्रह्माकार वृत्ति है उसकी ओर जब मन का तीव्र संवेग हो तब सब ही दुःखों का अभाव ही जावे । मन का मनन भाव उसी ब्रह्माकार वृत्तिरूपी चक्र से नष्ट होता है । हे रामजी ! संसार के भोग जो मन से रमणीय भासते हैं वे जब रमणीय न भासें तब जानिये कि मन के अङ्ग कटे । जो कुछ अहं और त्वं आदि शब्दार्थ भासते हैं वे सब मनोमात्र हैं । जब दृढ़ विचार करके इनकी अभावना हो तब मन की वासना नष्ट हो । जैसे हँसिये से खेती कट जाती है तैसे ही वासना नष्ट होने से परमतत्त्व शुद्ध भासता है । जैसे घटा के अभाव हुए शरदकाल का आकाश निर्मल भासता है तैसे ही वासना से रहित मन शुद्ध भासेगा । हे रामजी ! मन ही जीव का परम शत्रु है और इच्छा संकल्प करके पुष्ट हो जाता है । जब इच्छा कोई न उपजे तब आप ही निवृत्त हो जावेगा । जैसे अग्नि में काष्ठ डालिये तो बढ़ जाती है और यदि न डालिये तो आप ही नष्ट हो जाती है । हे रामजी ! इस मन में जो संकल्प कल्पना उठती है उसका त्याग करो तब तुम्हारा मन स्वतः नष्ट होगा । जहाँ शस्त्र चलते हैं और अग्नि लगती है, वहाँ शूरमा निर्भय होके जा पड़ते हैं और शत्रु को मारते हैं, प्राण जाने का भय नहीं रखते तो तुमको संकल्प त्यागने में क्या भय होता है ? हे रामजी ! चित्त के फैलाने से अनर्थ होता है और चित्त के अस्फुरण होने से कल्याण होता है—यह वार्ता बालक भी जानता है। जैसे पिता बालक को अनुग्रह करके कहता है तैसे ही मैं भी तुमको समझाता हूँ कि मनरूपी शत्रु ने भय दिया है और संकल्प कल्पना से जितनी आपदायें हैं वे मन से उपजती हैं। जैसे सूर्य की किरणों से मृगतृष्णा का जल दीखता है तैसे ही सब आपदा मन से दीखती हैं जिसका मन स्थिर हुआ है उसको कोई क्षोभ नहीं होता । हे रामजी ! प्रलयकाल का पवन चले, सप्त समुद्र मर्यादा त्यागकर इकट्ठे हो जावें और द्वादश सूर्य इकट्ठे होके तपें तो भी मन से रहित पुरुष को कोई विघ्न नहीं होता—वह सदा शान्तरूप है । हे रामजी ! मनरूपी बीज है, उससे संसारवृक्ष उपजा है, सात लोक उसके पत्र हैं और शुभ-अशुभ सुख-दुःख उसके फल हैं ।
उत्पत्ति प्रकरण । ३६६
वह मन संकल्प से रहित नष्ट हो जाता है और संकल्प के बढ़ने से अनर्थ का कारण होता है । इससे संकल्प से रहित उस चक्रवर्ती राजा-पद में आरूढ़ हुआ परमपद को प्राप्त होगा जिस पद में स्थित होने से चक्रवर्ती राज तृणवत् भासता है । हे रामजी ! मन के क्षीण होने से जीव उत्तम परमानन्द पद को प्राप्त होता है । हे रामजी ! सन्तोष से जब मन वश होता है तब नित्य, उदयरूप, निरीह, परमपावन, निर्मल, सम, अनन्त और सर्वविकार विकल्प से रहित जो आत्मपद शेष रहता है वह तुमको प्राप्त होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे मनशक्तिरूपप्रतिपादननाम षडशीतितमसर्गः ॥ ८६ ॥
वशिष्टजी बोले, हे रामजी ! जिसके मन में तीव्रसंवेग होता है उसका मन देखता है । अज्ञान से जो दृश्य का तीव्र संवेग हुआ है उससे चित्त जन्म-मरणादिक विकार देखता है और जैसा निश्चय मन में दृढ़ होता है उसी का अनुभव करता है, जैसा मन का फुरना फुरता है तैसा ही रूप हो जाता है । जैसे बरफ का शीतल और शुक्ल रूप है और काजल का कृष्ण रूप है, तैसे ही मन का चञ्चल रूप है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे ब्रह्मन् ! यह मन जो वेग अवेग का कारण चञ्चल रूप है उस मन की चपलता कैसे निवृत्त हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! तुम सत्य कहते हो, चञ्चलता से रहित मन नहीं दीखता; क्योंकि मन का चञ्चल स्वभाव ही है । हे रामजी ! मन में जो चञ्चलता फुरना मानसी शक्ति है वही जगत्आडम्बर का कारणरूप है । जैसे वायु का स्पन्द रूप है तैसे ही मन का चञ्चल रूप है जिसका मन चञ्चलता से रहित है उसको मृतक कहते हैं । हे रामजी ! तप और शास्त्र का जो सिद्धान्त है वह यही है कि मन के मृतकरूप को मोक्ष कहते हैं, उसके क्षीण हुए सब दुःख नष्ट हो जाते हैं । जब चित्तरूपी राक्षस उठता है तब बड़े दुःख को प्राप्त होता है और चित्त के लय होने से अनन्त सुखभोग प्राप्त होते हैं अर्थात् परमानन्दस्वरूप आत्मपद प्राप्त होता है । हे रामजी ! मन में चञ्चलता अविचार से सिद्ध है और विचार से नष्ट हो जाती है । चित्त की चञ्चलतारूप
| ३७० | योगवाशिष्ठ । |
|---|
जो वासना भीतर स्थित है जब वह नष्ट हो तब परमसार की प्राप्ति हो, इससे यत्न करके चपलतारूपी अविद्या का त्याग करो। जब चपलता निवृत्त होगी तब मन शान्त होगा। सत्य, असत्य और जड़, चेतन के मध्य जो दोलायमान शक्ति है उसका नाम मन है। जब यह तीव्रता से जड़ की ओर लगता है तब आत्मा के प्रमाद से जड़रूप हो जाता है, अर्थात अनात्म में आत्मप्रतीति होती है और जब विवेक विचार में लगता है तब उस अभ्यास से जड़ता निवृत्त हो जाती है और केवल चेतना आत्मतत्त्व भासता है। जैसा अभ्यास दृढ़ होता है तैसा ही अनुभव इसको होता है और जैसे पदार्थ की एकता चित्त में होती है अभ्यास के वश से तैसा ही रूप चित्त का हो जाता है। हे रामजी! जिस पद के निमित्त मन प्रयत्न करता है उस पद को प्राप्त होता है और अभ्यास की तीव्रता से भावितरूप हो जाता है। इसी कारण तुमसे कहता हूँ कि चित्त को चित्त से स्थिर करो और अशोकपद का आश्रय करो। जो कुछ भाव अभाव रूप संसार के पदार्थ हैं वे सब मन से उपजे हैं, इससे मन के उपशम करने का प्रयत्न करो, मन के उपशम बिना छूटने का और कोई उपाय नहीं और मन को मन ही निग्रह करता है और कोई नहीं कर सकता। जैसे राजा से राजा ही युद्ध करता है और कोई नहीं कर सकता तैसे ही मन से मन ही युद्ध करता है। इससे तुम मन ही से मन को मारो कि शान्ति को प्राप्त हो। हे रामजी! मनुष्य बड़े संसार समुद्र में पड़ा है जिसमें तृष्णारूपी मगर ने इसको घेर लिया है; इस कारण अधः को चला जाता है और राग, द्वेषरूपी भँवर में कष्ट पाता है। उसमे तरने के निमित्तमन रूपी नाव है. जब शुद्ध मनरूपी नाव पर आरूढ़ हो तब संसार समुद्र के पार उतरे अन्यथा कष्ट को प्राप्त होता है। हे रामजी! अपना मन ही बन्धन का कारण है; उस मन को मन ही से छेदन करो और दृश्य की ओर जो सदा धावता है उससे वैराग्य करके आत्मतत्त्व का अभ्यास करो तब छूटोगे, और उपाय छूटने का नहीं। जहाँ जैसी वासना से मन आशा करके उठे उसको वहीं बोध करके त्यागने से तुम्हारी अविद्या नष्ट हो जावेगी। हे रामजी! जब प्रथम भोगों की वासना का त्याग करोगे तब
उत्पत्ति प्रकरण । ३७१
यत्न बिना ही जगत् की वासना छूट जावेगी । जब भाव रूप अभाव जगत् का त्याग किया तब निर्विकल्प सुस्वरूप होगा । जब सब दृश्य भाव पदार्थों का अभाव होता है तब भावना करनेवाला मन भी नष्ट होता है । हे रामजी ! जो कुछ संवेदन फुरता है उस संवेदन का होना ही जगत् है और असंवेदन होने का नाम निर्वाण है संवेदन होने से दुःख है, इससे यत्न करके संवेदन का अभाव ही कर्त्तव्य है। जब भावना की अभावना हो तब कल्याण हो । जो कुछ भाव अभाव पदार्थों का रागद्वेष उठता है वह मन के अबोध से होता है पर वे पदार्थ मृगतृष्णा के जलवत् मिथ्या हैं । इससे इनकी आस्था को त्याग करो, ये सब अवस्तुरूप हैं और तुम्हारा स्वरूप नित्य तृप्त अपने आपमें स्थित है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सुखोपदेशवर्णनंनाम सप्तशीतितमस्सर्गः ॥ ८७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह वासना भ्रान्ति से उठी है । जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रान्ति से भासता है । तैसे ही आत्मा में जगत् भ्रान्ति से भासता है—इसकी वासना दूर से त्याग करो । हे रामजी ! जो ज्ञानवान् हैं उनको जगत् नहीं भासता और जो अज्ञानी हैं उनको अविद्यमान ही विद्यमान भासता है और संसार नाम से संसार को अङ्गीकार करता है । ज्ञानवान् सम्यक्दर्शी को आत्मतत्त्व से भिन्न सब अवस्तुरूप भासता है । जैसे समुद्र द्रवता से तरङ्ग और बुद्बुदे होके भासता है परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं तैसे ही अपने ही विकल्प से भाव अभावरूप जगत् देखता है, जो वास्तव में असत्यरूप है, क्योंकि आत्मतत्त्व ही अपने स्वरूप में स्थित है । जो नित्य, शुद्ध, सम और अद्वैत तुम्हारा अपना आप है, न तुम कर्त्ता हो, न अकर्त्ता हो, कर्त्ता और अकर्त्ता, ग्रहण-त्याग भेद को लेकर कहाता है । दोनों विकल्पों को त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो और जो कुछ क्रिया आचार आ प्राप्त हों उनको करो पर भीतर से अना-सक्त रहो अर्थात् अपने को कर्त्ता और भोक्ता मत मानो क्योंकि कर्त्तव्य आदिक तब होते हैं जब कुछ ग्रहण वा त्याग करना होता है और ग्रहण-त्याग तब होता है जब पदार्थ सत्य भासते हैं, पर ये सब पदार्थ तो
३७२ योगवाशिष्ठ ।
मिथ्या इन्द्रजाल का मायावत है। हे रामजी ! मिथ्या पदार्थों में आस्था करनी और उसमें ग्रहण और त्याग करना क्या है ? सब संसार का बीज अविद्या है और वह अविद्यास्वरूप के प्रमाद से अविद्यमान ही सत्य की नाईं हो भासती है। हे रामजी ! चित्त में चैत्यमय वासना फुरती है सो ही मोह का कारण है। संसाररूपी वासना का चक्र है, जैसे कुम्हार चक्र पर चढ़ाके मृत्तिका से अनेक प्रकार के घट आदिक बर्तन रचता है तैसे ही चित्त में जो चैत्यमय वासना फुरती है वह संसार के पदार्थों को उत्पन्न करती है। यह अविद्यारूपी संसार देखनेमात्र बड़ा सुन्दर भासता है पर जैसे बाँस बड़े विस्तार को प्राप्त होता है और भीतर से शून्य है तैसे ही यह भी भीतर से शून्य है और जैसे केले का वृक्ष देखने को विस्तार सहित भासता है और उसके भीतर सार कुछ नहीं होता तैसे ही संसार असाररूप है। जैसे नदी का प्रवाह चला जाता है तैसे ही संसार नाशरूप है। हे रामजी ! इस अविद्या को पकड़िये तो कुछ ग्रहण नहीं होता, कोमल भासती है पर अत्यन्त क्षीणरूप है और प्रकट आकार भी दृष्टि आते हैं पर मृगतृष्णा के जल समान असत्यरूप है। अविद्या-माया जिससे यह जगत उपजता है, कहीं विकार है, कहीं स्पष्ट है और कहीं दीर्घरूप भासती है और आत्मा से व्यतिरेक भाव को प्राप्त होती है। जड़ है परन्तु आत्मा की सत्ता पाके चेतन होती है और चेतनरूप भासती है तो भी असत्यरूप है। एक निमेष के भूलने से वह बड़े भ्रम को दिखाती है। जहाँ निर्मल प्रकाशरूप आत्मा है उसमें तम दिखाती कि मैं आत्मा को नहीं जानती। जैसे उलूक को सूर्य में अन्धकार भासता है तैसे ही मूर्खों को अनुभवरूप आत्मा नहीं भासता, जगत भासता है जो असत्यरूप है। जैसे मृगतृष्णा की नदी विस्तार सहित भासती है तैसे ही अविद्या नाना रङ्ग, विलास, विकार, विषम सूक्ष्म, कोमल और कठिनरूप है और स्त्री की नाईं चञ्चल और शोभरूप सर्पिणी है, जो तृष्णारूपी जिह्वा मे मार डालती है। वह दीपक की शिखावत प्रकाशमान है। जैसे जब तक स्नेह होता है तब तक दीपशिखा प्रज्वलत होती है और जब तेल चुक जाता है तब निर्वाण हो जाती है तैसे
उत्पत्ति प्रकरण । ३७३
ही जब तक भोगों में प्रीति है तब तक अविद्या वृद्धि है और जब भोगों में स्नेह क्षीण होता है तब नष्ट हो जाती है । गगरूपी अविद्या तृष्णा बिना नहीं रहती और भोगरूप प्रकाश बिजली की नाईं चमत्कार करती है । इनके आश्रय में जो कार्य करो तो नहीं होता । जगद्भंगुररूप है । जैसे बिजली मेघ के आश्रय है तैसे ही अविद्या मूर्खों के आश्रय रहती है और तृष्णा देनेवाली है । भोग पदार्थ बड़े यत्न से प्राप्त होते हैं और जब प्राप्त हुए तब अनर्थ उत्पन्न करते हैं । जो भोगों के निमित्त यत्न करते हैं उनको धिक्कार है, क्योंकि भोग बड़े यत्न से प्राप्त होते हैं और फिर स्थिर नहीं रहते, बल्कि अनर्थ उत्पन्न करते हैं । उनकी तृष्णा करके जो भटकते हैं वे महामूर्ख हैं । हे रामजी ! ज्यों-ज्यों इनका स्मरण होता है त्यों-त्यों अनर्थ होते हैं और ज्यों ज्यों इनका विस्मरण होता है त्यों त्यों सुख होता है । इस कारण अत्यन्त सुख का निमित्त इनका विस्मरण है और स्मरण दुःख का निमित्त है । जैसे किसी को क्रूर स्वप्न आता है तो उसके स्मरण से कष्टवान् होता है और जैसे और किसी उपद्रव प्राप्त होने की स्मृति में अनर्थ जानता है तैसे ही अविद्या जगत् के स्मरण में अनर्थ कष्ट होता है । अविद्या एक मुहूर्त में त्रिलोकी रच लेती है और एकक्षण में ग्रास कर लेती है । हे रामजी ! स्त्री के वियोगी और रोगी पुरुष की रात्रि कल्प की नाईं व्यतीत होती है और जो बहुत सुखी होता है उसको रात्रि क्षण की नाईं व्यतीत हो जाती है । काल भी अविद्या प्रमाद से विपर्ययरूप हो जाता है । हे रामजी ! ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो अविद्या से विपर्यय न हो । शुद्ध, निर्विकार, निराकार, अद्वैत तत्त्व में कर्तृत्व भोक्तृत्व का स्पन्द फुरता है । हे रामजी ! यह सब जगत्- जाल तुमको अविद्या से भासता है । जैसे दीपक का प्रकाश चक्षु इन्द्रियों को रूप दिखाता है तैसे ही अविद्या जिन पदार्थों को दिखाती है वह सब असत्यरूप हैं जैसे नाना प्रकार की सृष्टि मनोराज में है और जैसे स्वप्नसृष्टि भासती है और उनमें अनेक शाखासंयुक्त वृक्ष भासते हैं वे सब असत्यरूप हैं तैसे ही यह जगत् असत्यरूप है जैसे मृगतृष्णा की नदी बड़े आडम्बर सहित भासती है तैसे ही यह जगत् भी है । जैसे मृगतृष्णा
३७४ | योगवाशिष्ठ ।
की नदी को देख के मूर्ख मृग जल पान के निमित्त दौड़ते हैं और कष्ट- वान् होते हैं तैसे ही जगत् के पदार्थों को देखकर अज्ञानी दौड़के यत्न करते हैं और ज्ञानवान् तृष्णा के लिये यत्न नहीं करते । ज्यों ज्यों मूर्ख मृग दौड़ते हैं त्यों त्यों कष्ट पाते हैं, शान्ति नहीं पाते, तैसे ही अज्ञानी जगत् के भोगों की तृष्णा करते हैं परन्तु शान्ति नहीं पाते । जैसे तरङ्ग और बुद्बुदे सुन्दर भासते हैं परन्तु ग्रहण किये से कुछ नहीं निकलते तैसे ही शान्ति का कारण जगत् में सार पदार्थ कोई नहीं निकलता । जडरूप अविद्या जगदाकार हुई है, वह चेतन से अभिन्नरूप है परन्तु भिन्न की नांई स्थित हुई है । जैसे मकड़ी अपनी तन्तु फैलाकर फिर अपने में लीन कर लेती है, वह उससे अभिन्नरूप है परन्तु भिन्न की नांई भासती है और जैसे अग्नि से धूम निकलकर बादल का आकार हो रस खींचता है और मेघ होकर वर्षा करता है तैसे ही अविद्या आत्मा में उपजकर और आत्मा की सत्ता पाकर जगत् रचती है, उस जगत् में यह जीव घटीयन्त्र की नांई भटकता है । जैसे रस्सी में बँधी हुई घड़ियाँ ऊपर नीचे भटकती हैं तैसे ही तीनों गुणों की वासना से बँधा हुआ जीव भटकता है । जैसे कीचड़ में कमल की जड़ उपजती है और उसके भीतर छिद्र होते हैं तैसे ही अविद्यारूपी कीचड़ से यह जगत् उपजा है और विकाररूपी दृश्य इसमें छिपे हैं-सारभूत इसमें कुछ नहीं । जैसे अग्नि घृत और ईंधन के संयोग से बढ़ती जाती है तैसे ही अविद्या विषयों की तृष्णा में बढ़ती जाती है, जैसे घृत और ईंधन से रहित अग्नि शान्त हो जाती है तैसे ही तृष्णा से रहित अविद्या शान्त हो जाती है । जब विवेकरूपी जल पड़े और तृष्णारूपी घृत न पड़े तब अग्निरूपी अविद्या नष्ट हो जाती है अन्यथा नहीं नष्ट होती । हे रामजी ! यह अविद्या दीपक शिखा के तुल्य है और तृष्णारूपी तेल से अधिक प्रकाशवान् होती है । जब तृष्णा रूपी तेल में रहित हो और विवेकरूपी वायु चले तब दीपक शिखा- वत अविद्या निर्वाण हो जावेगी और न जानियेगा कि कहाँ गई । अविद्या कुहिरे की नांई आवरण करती भासती है परन्तु ग्रहण करिये तो कुछ हाथ नहीं आती । देखनेमात्र स्पष्ट दृष्टि आती है, परन्तु विचार
उत्पत्ति प्रकरण । ३७५
करने से अणुमात्र भी नहीं रहती । जैसे रात्रि को बड़ा अन्धकार भासता है परन्तु जब दीपक लेकर देखिये तब अणुमात्र भी अन्धकार नहीं दीखता वैसे ही विचार करने से अविद्या नहीं रहती । जैसे भ्रान्ति से आकाश में नीलता और दूसरा चन्द्रमा भासता है, जैसे स्वप्न की सृष्टि भासती है, जैसे नाव पर चढ़े को तट के वृक्ष चलने भासते हैं और जैसे मृगतृष्णा की नदी, सीपी में रूपा और रस्सी में सर्प भ्रम से भासता है वैसे ही अविद्यारूपी जगत् अज्ञानी को सत्य भासता है । हे रामजी ! यह जाग्रत् जगत् भी दीर्घकाल का स्वप्न है । जैसे सूर्य की किरणों में जलबुद्धि मृग के चित्त में आती है वैसे ही जगत् की सत्यता मूर्ख के चित्त में रहती है । हे रामजी ! जिन पुरुषों की पदार्थों में गति रही है, उनकी भावना से उनका चित्त खिंचता है और उन पदार्थों को अङ्गीकार करके बड़े कष्ट पाता है । जैसे पक्षी आकाश में उड़ता है पर दाने में उसकी प्रीति होती है उससे चुगने के निमित्त पृथ्वी पर आता है और सुखरूप जानके चुगने लगता है तो जाल में फँसता है और कष्टवान् होता है । जैसे कण की तृष्णा पक्षी को दुःख देती है वैसे ही जीवों को भोगों की तृष्णा दुःख देती है । हे रामजी ! ये भोग प्रथम तो अमृत की नाईं सुखरूप भासते हैं परन्तु परिणाम में विष की नाईं होते हैं, मूर्ख अज्ञानी को ये सुन्दर भासते हैं । जैसे मूर्ख पतङ्ग दीपक को सुखरूप जानके वाञ्छा करता है परन्तु दीपक से स्पर्श करता है तब नाश को प्राप्त होता है वैसे ही भोगों के स्पर्श से ये जीव नाश होते हैं । जैसे संध्याकाल आकाश में लाली भासती है वैसे ही अविद्या से जगत् भासता है । जैसे भ्रम से दूर वस्तु निकट भासती है और निकट वस्तु दूर भासती है और स्वप्न में बहुत काल में थोड़ा और थोड़े काल में बहुत भासता है वैसे ही यह सब जगत्काल अविद्या से भासता है । वह अविद्या आत्मज्ञान से नष्ट होती है इससे यत्न करके मन के प्रवाह को रोको । हे रामजी ! जो कुछ दृश्यमान जगत् है वह सब तुच्छरूप है, बड़ा आश्चर्य है कि मिथ्या भावना करके जगत् अन्धा हुआ है । हे रामजी ! अविद्या निराकार और शून्य है, उसने सत्य होकर जगत् को
३७६ | योगवाशिष्ट ।
अन्धा किया है अर्थात् संसारी लोग असतरूप पदार्थों को सत् जानके यत्न करते हैं । जैसे सूर्य के प्रकाश में उलू को अन्धकार भासता है और भ्रान्ति से सूर्य उसको नहीं भासता । वैसे ही चिदानन्द आत्मा सदा अनुभव में प्रकाशता है और अविद्या से नहीं भासता । असत्यरूप अविद्या ने जगत् को अन्धा किया है, जो विकर्मों को कराती है और विचार करने में नहीं रहती, उसमें अपना आप नहीं भासता और बड़ा आश्चर्य है कि धैर्यवान् धर्मात्मा को भी अपने वश करके समर्थ होने नहीं देती । अविचार सिद्ध अविद्यारूपी स्त्री ने पुरुषों को अन्धा किया है और अनन्त दुःखों का विस्तार फैलाती है, यह उत्पत्ति और नाश सुख और दुःख को कराती है, आत्मा को भासती है, अनन्त दुःख अज्ञान से दिखाती है, बोध से ही हीन कराती है और काम, क्रोध उपजाती है और मन में वासना से यही भावना वृद्धि करती है । हे रामजी ! यह अविद्या निराकाररूप है और उसने जीव को बाँधा है । जैसे स्वप्न में कोई आपको बाँधा देखे वैसे ही अविद्या है । स्वरूप के प्रमाद का ही नाम अविद्या है और कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे अविद्यावर्णनन्नाम अशीतितमस्सर्गः ॥ ८८ ॥
इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जो कुछ जगत् दीखता है वह सब यदि अविद्या से उपजा है तो वह निवृत्त किस भाँति होती है? वशिष्ठजी बोले हे रामजी ! जैसे बर्फ की पुतली सूर्य के तेज से क्षण में नष्ट हो जाती है वैसे ही आत्मा के प्रकाश से अविद्या नष्ट हो जाती है । जब तक आत्मा का दर्शन नहीं होता तब तक अविद्या मनुष्य को भ्रम दिखाती है और नाना प्रकार के दुःखों को प्राप्त कराती है, पर जब आत्मा के दर्शन की इच्छा होती है तब वही इच्छा मोह का नाश करती है । जैसे धूप से छाया क्षीण हो जाती है वैसे ही आत्मपद की इच्छा से अविद्या क्षीण हो जाती है और सर्वगत देव आत्मा के साक्षात्कार होने से नष्ट हो जाती है । हे रामजी ! दृश्य पदार्थों में इच्छा उपजने का नाम अविद्या है और उस इच्छा के नाश का नाम विद्या है । उस विद्या ही
उत्पत्ति प्रकरण । ३७७
का नाम मोक्ष है। अविद्या का नाश भी संकल्पमात्र है। जितने दृश्य
पदार्थ हैं उनकी इच्छा न उपजे और केवल चिन्मात्र में चित्त की वृत्ति
स्थित हो—यही अविद्या के नाश का उपाय है । जब सब वासना निवृत्ति
हों तब आत्मतत्त्व का प्रकाश होवे । जैसे रात्रि के क्षय होने से सूर्य
प्रकाशता है वैसे ही वासना के क्षय होने से आत्मा प्रकाशता है । जैसे
सूर्य के उदय होने से नहीं विदित होता कि रात्रि कहाँ गई वैसे ही विवेक
के उपजे नहीं विदित होता कि अविद्या कहाँ गई । हे रामजी ! मनुष्य
संसार का दृढ़ वासना में बँधा है । और जैसे संध्याकाल में मूर्ख बालक
परछाहीं में वेताल कल्पकर भयवान् होता है वैसे ही मनुष्य अपनी वासना
में भय पाता है । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह सब दृश्य अविद्या से
हुआ है और अविद्या आत्मभाव से नष्ट होती है तो वह आत्मा कैसा है ?
वशिष्ठजी बोले, चेत्योन्मुखत्व से रहित और सर्वगत समान और अनुभव
रूप जो अशब्दरूप चेतन तत्त्व है वह आत्मा परमेश्वर है । हे रामजी !
ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त जगत् सब आत्मा है और अविद्या कुछ नहीं ।
हे रामजी ! सब देहों में नित्य चेतनघन अविनाशी पुरुष स्थित है,
उसमें मनो नाम्नी कल्पना अन्य की नाईं आभास होकर भासती है, पर
आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ नहीं । हे रामजी ! कोई न जन्मता है, न मरता
है और न कोई विकार है, केवल आत्मतत्त्व प्रकाश सत्तासमान, अवि-
नाशी, चेत्य से रहित, शुद्ध चिन्मात्रतत्त्व अपने आपमें स्थित है
अनित्य, सर्वगत, शुद्ध, चिन्मात्र, निरुपद्रव, शान्तरूप, सत्तासमान
निर्विकार अद्वैत आत्मा है । हे रामजी ! उस एक सर्वगत देव, सर्वशक्ति-
महात्मा में जब विभागकल्पना शक्ति प्रकट होती है तो उसका नाम मन
होता है। जैसे समुद्र में द्रवता से लहरें होती हैं वैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में
जो चैत्यता होती है उसका नाम मन है वही संकल्प कल्पना में दृश्य
की नाईं भासता है और उसी संकल्पना का नाम अविद्या है ।
संकल्प ही से वह उपजी है और कल्पना से ही नष्ट हो जाती है । जैसे
वायु से अग्नि उपजती है और वायु से ही लीन होती है वैसे ही
संकल्प से अविद्यारूपी जगत् उपजता है और संकल्प ही से नष्ट हो जाता
३७= योगवाशिष्ठ ।
है । जब चित्त की वृत्ति दृश्य की ओर फुरती है तब अविद्या बढ़ती है और जब दृश्य की वृत्ति नष्ट हो और स्वरूप की ओर आवे तब अविद्या नष्ट हो जाती है । हे रामजी ! जब यह संकल्प करता है कि मैं 'ब्रह्म नहीं हूँ' तब मन दृढ़ बन्धमय होता है और जब यही संकल्प दृढ़ करता है कि 'सब ब्रह्म है' तब मुक्त होता है । जब अनात्म में अहं अभिमान का संकल्प करता है तब बन्धन होता है और सर्व ब्रह्म के संकल्प से मुक्त होता है । दृश्य का संकल्प बन्ध है और असंकल्प ही मोक्ष है, आगे जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो । जैसे बालक आकाश में सुवर्ण के कमलों की कल्पना करे कि सूर्यवत् प्रकाशित और सुगन्ध से पूर्ण हैं तो वे भावनामात्र होते हैं वैसे अविद्या भावनामात्र है । अज्ञानी जो जानता है कि मैं कृश, अतिदुःखी और वृद्ध हूँ और मेरे हाथ, पाँव और इन्द्रिय हैं, तो ऐसे व्यवहार से बन्धवान् होता है और यदि ऐसे जाने कि मैं दुःखी नहीं न मेरी देह है, न मेरे बन्धन हैं, न मांस हूँ और न मेरे अस्थि हैं मैं तो देह से अन्य साक्षी हूँ, ऐसे निश्चयवान् को मुक्त कहना चाहिए । जैसे सूर्य में और मणि के प्रकाश में अन्धकार नहीं होता वैसे ही आत्मा में अविद्या नहीं । जैसे पृथ्वी पर स्थित पुरुष आकाश में नीलता कल्पता है वैसे ही अज्ञानी आत्मा में अविद्या कल्पता है-वास्तव में कुछ नहीं । फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! सुमेरु की छाया आकाश में पड़ती है अथवा तम की प्रभा है वह और कुछ है, आकाश में नीलता कैसे भासती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आकाश में नीलता नहीं है, न सुमेरु की छाया ही है और न तम है, आकाश पोलमात्र है यह शून्यता गुण है । हे रामजी ! यह ब्रह्माण्ड तेजरूप है, इसका प्रकाश ही स्वरूप है, तम का स्वभाव नहीं । तम ब्रह्माण्ड के बाह्य है, भीतर नहीं, ब्रह्माण्ड का प्रकाश स्वभाव है और दृढ़ शून्यता से आकाश में नीलता भासती है और कुछ नहीं । जिसकी मन्ददृष्टि है उसको नीलता भासती है और जिसकी दिव्य-दृष्टि है उसको नीलता नहीं भासती-पोल भासता है । जैसे मन्द दृष्टि को आकाश में नीलता भासती है, वैसे ही अज्ञानी को अविद्या सत्य भासती है। जैसे दिव्यदृष्टि वाले को नीलता नहीं भासती, वैसे ही ज्ञानवान्
उत्पत्ति प्रकरण ।
३७६
को अविद्या नहीं भासती—ब्रह्मसत्ता ही भासती है । हे रामजी ! जहाँ तक इसके नेत्रों की दृष्टि जाती है वहाँ तक आकाश भासता है और जहाँ दृष्टि कुण्ठित होती है वहाँ नीलता भासती है । हे रामजी ! जैसे जिसकी दृष्टि क्षय होती है उसको नीलता भासती है वैसे ही जिस जीव की आत्मदृष्टि क्षय होती है, उसको अविद्यारूपी सृष्टि भासने लगती है—वही दुःखरूप है । हे रामजी ! चेतन को छोड़के जो कुछ स्मरण करता है उसका नाम अविद्या है और जब चित्त अचल होता है तब अविद्या नष्ट हो जाती है—असंकल्प होने से ही अविद्या नष्ट होती है । जैसे आकाश के फूल हैं वैसे ही अविद्या है । यह भ्रमरूप जगत् मूर्खों को सत्य भासता है, वास्तव में कुछ नहीं है, मन जब फुरने से रहित हो तब जगत् भावनामात्र है। उसी भावना का नाम अविद्या है और यह मोह का कारण है । जब वही भावना उलटकर आत्मा की ओर आवे तब अविद्या का नाश हो । वारम्वार चिन्तना करने का नाम भावना है । जब भावना आत्मा की ओर वृद्धि होती है तब आत्मा की प्राप्ति होती है और अविद्या नष्ट हो जाती है । मन के संसरने का नाम अविद्या है । जब आत्मा की ओर संसरना होता है तब अविद्या नष्ट हो जाती है । हे रामजी ! जैसे राजा के आगे मन्त्री और टहलुए कार्य करते हैं, वैसे ही मन के आगे इन्द्रियाँ कार्य करती हैं । हे रामजी ! बाह्य के विषय पदार्थों की भावना छोड़के तुम भीतर आत्मा की भावना करो तब आत्मपद को प्राप्त होगे । जिन पुरुषों ने अन्तःकरण में आत्मा की भावना का यत्न किया है वे शान्ति को प्राप्त हुए हैं। हे रामजी ! जो पदार्थ आदि में नहीं होता, वह अन्त में भी नहीं रहता, इससे जो कुछ भासता है वह सब ब्रह्मसत्ता है । उससे कुछ भिन्न नहीं और जो भिन्न भासता है वह मनो-मात्र है । तुम्हारा स्वरूप निर्विकार और आदि अन्त से रहित ब्रह्मतत्त्व है । तुम क्यों शोक करते हो ? अपना पुरुषार्थ करके संसार की भोग वासना को मूल से उखाड़ो और आत्मपद का अभ्यास करो तो दृश्य भ्रम मिट जावे । हे रामजी ! इस संसार की वासना का उदय होना जरामरण और मोह देने वाला है। जब स्वरूप का प्रमाद होता है तब जीव की यह कल्पना
३८० योगवाशिष्ठ ।
उठती है और आकाशरूपी अनन्त फाँसियों से बन्धवान् होता है । तब वासना और वृद्धि हो जाती है और कहता है कि ये मेरे पुत्र हैं, यह मेरा धन है, यह मेरे बान्धव हैं, ये में हूँ; वह और है । हे रामजी ! जिस शरीर से मिलकर यह कल्पना करता है वह शरीर शून्यरूप है । जैसे वायु गोले के साथ तृण उड़ते हैं, वैसे अविद्यारूपी वासना से शरीर उड़ते हैं अहं त्वं आदिक जगत् अज्ञानी को भासता है और ज्ञानवान् को केवल सत्य ब्रह्म भासता है । जैसे रस्सी के न जानने से सर्प भासता है और रस्सी के सम्यक् ज्ञान से सर्पभ्रम नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से जगत् भासता है और आत्मा के सम्यक्ज्ञान से जगद्भ्रम नष्ट हो जाता है । इससे तुम आत्मा की भावना करो । हे रामजी ! रस्सी में दो विकल्प होते हैं-एक रस्सी का और दूसरा सर्प का, वे दोनों विकल्प अज्ञानी को होते हैं ज्ञानी को नहीं होते । जो जिज्ञासु होता है उसकी वृत्ति सत्य और असत्य में डोलायमान होती है और जो ज्ञानवान् है उसको विचार से ब्रह्मतत्त्व ही भासता है । इससे तुम अज्ञानी मत होना ज्ञानवान् होना, जो कुछ जगत् की वासना है उन सबका त्याग करो तब शान्तिमान् होगे, हे रामजी ! संसार भोग की वासना भी तब होती है जब अनात्मा में आत्माभिमान होता है, तुम इसके साथ काहे को अभिमान करते हो ? यह देह तो मूक जड़ है और अस्थि-मांस की थैली है । ऐसी देह तुम क्यों होते हो ? जब तक देह में अभिमान होता है तब तक सुख और दुःख भोगता है और इच्छा करता है । जैसे काष्ठ और लाख तथा घट और आकाश का संयोग होता है वैसे ही देह और देही का संयोग होता है । जैसे नली के अन्तर आकाश होता है सो उसके नष्ट होने से आकाश नहीं नष्ट होता और जैसे घट के नष्ट होने से घटाकाश नहीं नष्ट होता वैसे ही देह के नष्ट होने से आत्मा का नाश नहीं होता । हे रामजी ! जैसे मृगतृष्णा की नदी भ्रान्ति से भासती है वैसे ही अज्ञान से सुख दुःख की कल्पना होती है । इससे तुम सुख दुःख की कल्पना को त्यागके अपने स्वभावसत्ता में स्थित हो । बड़ा आश्चर्य है कि ब्रह्मतत्त्व सत्यस्वरूप है पर मनुष्य उसे भूल गया है और जो
उत्पत्ति प्रकरण । ३८१
असत्य अविद्या है उसको बारम्बार स्मरण करता है ऐसी अविद्या को तुम मत प्राप्त हो । हे रामजी ! मन का मनन ही अविद्या है और अनर्थ का कारण है, इससे जीव अनेक भ्रम देखता है । मन के फुरने से अमृत से पूर्ण चन्द्रमा का बिम्ब भी नरक की अग्नि समान भासता है और बड़ी लहरों तरंगों और कमलों से संयुक्त जल भी मरुस्थल की नदी समान भासता है । जैसे स्वप्न में मन के फुरने से नाना प्रकार के सुख और दुःख का अनुभव होता है वैसे ही यह सब जगद्भ्रम चित्त की वासना से भासता है । जाग्रत और स्वप्न में यह जीव मन के फुरने से विचित्र रचना देखता है । जैसे स्वर्ग में बैठे हुए को भी स्वप्न में नरकों का अनुभव होता है वैसे ही आनन्दरूप आत्मा में प्रमाद से दुःख का अनुभव होता है । हे रामजी ! अज्ञानी मन के फुरने से शून्य अणु में भी सम्पूर्ण जगत् भ्रम दीखता है जैसे राजा लवण को सिंहासन पर बैठे चाण्डाल की अवस्था का अनुभव हुआ था । इससे संसार की वासना को तुम चित्त से त्याग दो । यह संसार वासना बन्धन का कारण है । सब भावों में बतों परन्तु राग किसी में न हो । जैसे स्फटिक मणि सब प्रतिबिम्बों को लेता है परन्तु रङ्ग किसी का नहीं लेता तैसे ही तुम सब कार्य करो परन्तु द्वेष किसी में न रखो । ऐसा पुरुष निर्बन्धन है उसको शास्त्र के उपदेश की आवश्यकता नहीं, वह तो निजरूप है । हे रामजी ! जो कुछ प्रकृत आचार तुमको प्राप्त हो तो देना, लेना, बोलना, चलना आदिक सब कार्य करो परन्तु भीतर से अभिमान कुछ न करो, निर्गभिमान होकर कार्य करो-यह ज्ञान सबसे श्रेष्ठ है ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे यथाकथितदोषपरिहारोपदेशो- नाम नवाशीतितमस्सर्गः ॥ ८९ ॥
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब महात्मा वशिष्ठजी ने कहा तब कमलनयन रामजी ने वशिष्ठजी की ओर देखा और उनका अन्तःकरण रात्रि के मूँदे हुए कमल की नाईं प्रफुल्लित हो आया । तब रामजी बोले कि बड़ा आश्चर्य है । पद्म की ताँत के साथ पर्वत बाँधा है । अविद्यमान अविद्या ने सम्पूर्ण जगत् वश किया है और अविद्यमान जगत्
| ३८२ | योगवाशिष्ठ । |
|---|
को वज्रसारवत् दृढ़ किया है । यह सब जगत् असत्यरूप है और सत्य की नाईं स्थित किया है । हे भगवन् ! इस संसार की नटनी माया में क्या रूप है, महापुण्यवान् लवण राजा ऐसी बड़ी आपदा में कैसे प्राप्त हुआ और इन्द्रजाली जिसने भ्रम दिखाया था वह कौन था कि उसको अपना अर्थ कुछ न था ? वह कहाँ गया और इस देही और देह का कैसे सम्बन्ध हुआ और शुभ अशुभ कर्मों के फल कैसे भोगता है? इतने प्रश्नों का उत्तर मेरे बोध के निमित्त दीजिए । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह देह काष्ठ और मिट्टी के समान है, जैसे स्वप्न में चित्त के फुरने से देह भासता है वैसे ही यह देह भी चित्त से कल्पित है और चित्त ही चैत्य सम्बन्ध से जीव पद को प्राप्त हुआ है । यह जीव चित्त सत्ता से शोभायमान है उस चित्त के फुरने से संसार उपजा है, वह वानर के बालक के समान चञ्चल है और अपने फुरनेरुप कर्मों से नाना प्रकार के शरीर धरता है । उसी चित्त के नाम अहङ्कार, मन और जीव हैं । वह चित्त ही अज्ञान से सुख दुःख भोगता है, शरीर नहीं भोगता । जो प्रबोधचित्त है वह शान्तरूप है । जब तक मन अप्रबोध है और अविद्यारूपी निद्रा में सोया है तब तक स्वप्नरूप अनेकसृष्टि देखता है और जब अविद्या निद्रा से जागता है तब नहीं देखता । हे रामजी ! जब तक जीव अविद्या से मलिन है तब तक संसार भ्रम देखता है और जब बोधवान् होता है तब संसारभ्रम निवृत्त हो जाता है । जैसे रात्रि होने से कमल मूँद जाते हैं और सूर्य के उदय होने से खिल आते हैं वैसे ही अविद्या से जगद्भ्रम देखता है और बोध से अद्वैत रूप होता है । इससे अज्ञान ही दुःख का कारण है । अविवेक से पञ्च-कोश देह में अभिमानी होकर जैसे कर्म करता है वैसे ही भोगता है, शुभ करता है तो सुख भोगता है और अशुभ से दुःख भोगता है जैसे नटवा अपनी क्रिया से अनेक स्वाँग धारता है वैसे ही मन अपने फुरने से अनेक शरीर धारता है जो कुछ इष्ट-अनिष्ट सुख दुःख हैं वे एक मन के फुरने में हैं और शरीर में स्थित होकर मन ही करता है । जैसे रथ पर आरूढ़ होकर सारथी चेष्टा करता है और बाँबी में बैठकर सर्प चेष्टा करता है वैसे शरीर में स्थित होकर मन चेष्टा करता है । हे रामजी ! अचल
उत्पत्ति प्रकरण । ३८३
रूप शरीर को मन चञ्चल करता है। जैसे वृक्ष को वायु चञ्चल करता है वैसे जड़ शरीर को मन चञ्चल करता है। जो कुछ सुख दुःख की कलना है वह मन ही करता है और वही भोगता और वही मनुष्य है। हे रामजी ! अब लवण का वृत्तान्त सुनो। लवण राजा मन के भ्रमने से चाण्डाल हुआ। जो कुछ मन से करता है वही सफल होता है। हे रामजी ! एक काल में हरिश्चन्द्र के कुल में उपजा राजा लवण एकान्त बगीचे में बैठ के विचारने लगा कि मेरा पितामह बड़ा राजा हुआ है और मेरे बड़ों ने राजसूय यज्ञ किये हैं। मैं भी उनके कुल में उत्पन्न हुआ हूँ इससे मैं भी राजसूय यज्ञ करूँ। इस प्रकार चिन्तना करके लवण ने मानसी यज्ञ आरम्भ किया और देवता, ऋषि, सुर, मुनीश्वर, अग्नि, पवन आदिक देवताओं की मन से पूजा की और मन्त्र और सामग्री जो कुछ राजसूय यज्ञ का कर्म है सो सम्पूर्ण करके मन से दक्षिणा दी। सवावर्ष पर्यन्त उसने यह यज्ञ किया और मन ही से उसका फल भोगा। इससे हे रामजी ! मन ही से सब कर्म होता है और मन ही भोगता है। जैसा चित्त है वैसा ही पुरुष है, पूर्णचित्त से पूर्ण होता है और नष्ट चित्त से नष्ट होता है अर्थात् जिसका चित्त आत्मतत्त्व से पूर्ण है सो पूर्ण है और जो आत्मतत्त्व से नष्टचित्त है वह नष्टपुरुष है। हे रामजी ! जिसको यह निश्चय है कि मैं देह हूँ वह नीचबुद्धि है और अनेक दुःखों को प्राप्त होगा और जिसका चित्त पूर्ण विवेक में जागा है उसको सब दुःखों का अभाव हो जाता है। जैसे सूर्य के उदय होने से कमलों का सकुचना दूर हो जाता है और वे खिल आते हैं, वैसे ही विवेकरूपी सूर्य के प्रकाश से रहित पुरुष दुःखों में संकुचित रहते हैं। जो विवेकरूपी सूर्य के प्रकाश से प्रफुल्लित हुए हैं वे संसार के दुःखों से तर जाते हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सुखदुःखभोक्तव्योपदेश कथनान्नाम नवतितमस्सर्गः ॥ ६० ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! राजा लवण ने राजसूय यज्ञ मन से किया और मन ही से उसका फल भोगा परन्तु ऐसा साम्बरी कौन था जिसने उसको भ्रम दिखाया। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब वह साम्बरी
३८४ योगवाशिष्ठ ।
लवण राजा की सभा में आया तब में वहाँ था । मुझसे लवण और उसके मन्त्री ने पूछा कि यह कौन है ? तब मैंने उनसे जो कुछ कहा था वह तुमसे भी कहता हूँ । हे रामजी ! जो पुरुष राजसूय यज्ञ करता है उसको द्वादश वर्ष की आपदा प्राप्त होती है उस द्वादश वर्ष में वह अनेक दुःख देखता है । राजा लवण ने जो मन से यज्ञ किया इसलिये उसकी आपदा ही मन ही से प्राप्त हुई । स्वर्ग मे इन्द्र ने अपना दूत आपदा भुगवाने के निमित्त भेजा। वह साम्बरी का रूप होकर आया और राजा को चाण्डाल की आपदा भुगताकर फिर स्वर्ग में चला गया । हे रामजी ! जो कुछ मैंने प्रत्यक्ष देखा था वह तुमसे कहा । इससे मन ही करता है और मन ही भोगता है । जैसे जैसे दृढ़ संकल्प मन में फुरता है उसके अनुसार उसको सुखदुःख का अनुभव होता है। हे रामजी ! जब तक चित्त फुरता है तब तक आपदा प्राप्त होती है । जैसे ज्यों ज्यों कीकर का वृक्ष बढ़ता है त्यों त्यों कण्टक बढ़ते जाते हैं वैसे ही मन के फुरने से आपदा बढ़ती जाती है । जब मन स्थिर होता है तब आपदा मिट जाती है । इससे हे रामजी ! इस चित्तरूपी बरफ़ को विवेकरूपी तपन से पिघलाओ तब परम सार की प्राप्ति होगी । यह चित्त ही सकल जगत् आडम्बर का कारण है, उसको तुम अविद्या जानो । जैसे वृक्ष, विटप और तरु एक ही वस्तु के नाम हैं वैसे ही अविद्या, जीव, बुद्धि अहंकार सब फुरने के नाम हैं इसको विवेक से लीन करो । हे रामजी ! जैसा संकल्प दृढ़ होता है वैसा ही देखता है । हे रामजी ! वह कौन पदार्थ है जो यत्न करने से सिद्ध न हो ? जो हठ से न फिरे तो सब सिद्ध होता है । जैसे बरफ के बासनों को जल में डालिये तो जल से एकता ही हो जाती है तैसे ही आत्मबोध से सब पदार्थों की एकता हो जाती है । रामजी ने फिर पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि सुख-दुःख सब मन ही में स्थिर हैं और मन की वृत्ति नष्ट होने से नष्ट ही जाते हैं सो चपल वृत्ति कैसे क्षय हो ! वशिष्ठजी बोले, हे रघुकुल में श्रेष्ठ और आकाश के चन्द्रमा ! मैं तुमसे मन के उप-शम की युक्ति कहता हूँ । जैसे सवार के वश घोड़ा होता है तैसे ही मन तुम्हारे वश रहेगा । हे रामजी ! सब भूत ब्रह्म ही में उपजे हैं ।